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बहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजना से भरपूर कामोत्तेजक अपडेट है भाई मजा आ गयाशीला के इस अद्भुत और पागल कर देने वाले मुखमैथुन से पूर्ण संतुष्ट होकर संजय आराम से बैठा था
अपने खुले स्तन को दबाकर ब्लाउस के अंदर घुसाते हुए शीला ने कहा "तुम्हें मज़ा आया बेटा??"
संजय: "क्या कहूँ मम्मीजी.. !! मेरे पास बयान करने के लिए शब्द नही है.. आपने तो मुझे पागल बना दिया.. वैशाली को हाथ जोड़कर विनती करता हूँ तब कहीं जाकर एकाध मिनट के लिए मुंह में लेती है.. और वो भी इतनी घिन के साथ की चुसाई का कोई मज़ा ही नही आता.. पर जिस उत्तेजना से आपने आज चूसा.. भई वाह.. !! मज़ा ही आ गया.. !!"
संजय की जांघ पर हाथ फेरते हुए शीला ने कहा "बेटा.. मैं अपने साथी को आनंद देने के लिए नही चूसती.. बल्कि इसलिए चूसती हूँ क्योंकि मुझे मज़ा आता है.. चूसना मुझे बेहद पसंद है.. खड़ा लंड देखने के बाद मैं अपने आप को रोक ही नही पाती.. तुम्हारा लंड चूसने में मुझे बहोत मज़ा आया.. गोरा लंड काफी कम देखने को मिलता है.. तुम्हारे पापा जी का भी काला है.. ब्लू फिल्मों में जब मैं गोरा लंड देखती हूँ तब इतना मन करता था की कभी ऐसा लंड चुसूँ.. आज मेरी दिली तमन्ना पूरी हो गई.. "
संजय: "मम्मी जी, जैसे आपको मेरे लंड का रंग पसंद है.. वैसे ही मुझे आपकी मदमस्त छातियाँ पागल बनाती है.. आप जब दबाकर अपना स्तन ब्लाउस में डाल रही थी तब मेरे लंड में फिर से झटका लग गया.. मेरी एक रीक्वेस्ट है आप से.. मानोगी?"
शीला: "हाँ हाँ.. बोलो ना बेटा.. "
संजय: "अब हम इतने खुल ही चुके है.. तो मैं चाहता हूँ की आप अपना एक स्तन बाहर खुला ही रखिए.. ताकि मैं जब चाहूँ आपकी गुलाबी निप्पल को चूस सकु और स्तन को दबा सकूँ.. आपके नंगे स्तन की त्वचा को छूना बहोत अच्छा लगता है.. जैसे आपको मेरा गोरा लंड चूसने की इच्छा होती है वैसे ही मैं आपके स्तन को घंटों तक चूसना चाहता हूँ.. मैं जब कहूँ आप अपने स्तन के दर्शन खोलकर करवाना मुझे.. प्लीज.. अभी हमारे पास मौका है.. घर जाकर तो पता नही कब ऐसा मौका फिर मिलेगा.. !!!
अपने दामाद के मुंह से स्तनों की तारीफ सुनकर खुश हो गई शीला.. वैसे अपने स्तनों की तारीफ सुनना उसके लिए कोई नई बात नही थी.. जिस किसी ने भी उसके स्तन खुले देखे थे वह उसका दीवाना हो गया था..
शीला: "तुम चिंता मत करो.. वो सब मैं मेनेज कर लूँगी.. तुम्हें तुम्हारी पसंदीदा चीज के लिए तड़पना नही पड़ेगा ये वादा है मेरा.. पर मुझे भी जब मेरी पसंदीदा चीज को देखने या चूसने का मन करें तब तुम्हें भी मेरा खयाल रखना पड़ेगा"
संजय: "आप निश्चिंत रहिए मम्मी जी.. आप जब कहोगी मैं लंड खोलकर दे दूंगा आपको.. "
जवाब में शीला ने संजय के कंधे पर हाथ रख दिया और उसके शर्ट का पहला बटन खोलकर अपना हाथ अंदर डाल दिया.. बालों वाली छाती पर हाथ फेरते हुए उसने दूसरा बटन भी खोल दिया.. इसके साथ ही संजय की आधी छाती खुली हो गई.. उसकी मजबूत छाती देखकर शीला की सिसकी निकल गई.. उस मर्दाना छाती पर शीला ने अपना सर रख दिया.. जैसे प्रेमिका अपने प्रेमी की छाती पर रखती है.. अपने कोमल गालों को संजय की छाती के बालों पर रगड़ते हुए उसने संजय की निप्पल पर अपनी जीभ फेर दी.. एक ही सेकंड में संजय उत्तेजित हो गया..
संजय: "ओह्ह मम्मी जी, ये क्या कर दिया आपने?"
शीला अब संजय की छाती पर जगह जगह चाटने लगी.. संजय ने भी अपना हाथ शीला की क्लीवेज में डाल दिया और उसके स्तनों को दबाने लगा.. दबाते दबाते उसने शीला के ब्लाउस के दो बटन खोल दिए.. और हाथ को और अंदर धकेलने गया पर वहाँ पर ब्रा की किलेबंदी थी.. हाथ अंदर डालने का प्रयास निष्फल हो गया.. बस उंगलियों से ब्रा के ऊपर से स्तनों को दबाते हुए संजय को देख शीला को हंसी आ गई.. उसने खुद ही एक स्तन को ब्रा से बाहर निकालकर संजय के सामने पेश कर दिया..
अद्भुत कलाबाज थी शीला.. उसकी एक एक हरकत में मर्द को पागाल बना देने की क्षमता थी.. दोनों मस्ती में मस्त थे तभी ड्राइवर ने रंग में भंग डाल दिया.. परदे के पीछे से उसने कहा "साहब, चाय पानी के लिए आगे गाड़ी रोकनी पड़ेगी.."
संजय: "ठीक है.. कोई अच्छी सी होटल देखकर गाड़ी रोक देना.. मुझे भी फ्रेश होना है " शीला के सामने देखकर उसने आँख मारी.. शीला शरमा गई..
एक होटल के बाहर इनोवा खड़ी हो गई.. संजय और शीला नीचे उतरे.. आसमानी रंग की पारदर्शक पतली साड़ी का पल्लू शीला ने ठीक किया.. अपने बाल और ब्लाउस भी ठीक कीये.. अपने दोनों उरोजों को पल्लू से ढँक दिया..
संजय: "मम्मी जी, एक तरफ की कटोरी तो खुली रखो.. यहाँ हमारी जान पहचान का तो कोई है नही.. !!"
शीला: "पागल.. ये कोई सबको दिखाने वाली चीज थोड़े ही है.. सिर्फ चुनिंदा लोगों को ही इसके दर्शन मिलते है" हँसते हुए उसने कहा
संजय: "पर मेरे लिए तो खुले रखिए.. प्लीज मम्मी जी.. मुझे ऐसे ब्लाउस के ऊपर से देखने में भी बहोत मज़ा आता है"
शीला: "जिद मत करो बेटा.. यहाँ कितने सारे लोग है.. वो क्या सोचेंगे? कार में बैठकर फिर तुम्हें खेलने दूँगी.. ठीक है !!!"
संजय: "नही मम्मी जी.. मुझे खुलेआम दिखाइए.. ऊपर ऊपर से.. ऐसा मौका हमें दोबारा नही मिलने वाला.. "
ड्राइवर गाड़ी से उतरकर चला गया था.. संजय और शीला अकेले थे.. कार की आड़ में संजय ने शीला का पल्लू हटाकर एक स्तन खुला कर दिया.. हालांकि स्तन ब्लाउस के तो अंदर ही था.. "बस ऐसे ही रहने दीजिए.. जबरदस्त लग रहा है" संजय ने कहा
शाम के साढ़े छह बज रहे थे.. होटल में २०-२५ के करीब लोग बैठे थे.. सब अपनी मस्ती में मस्त थे.. पर शीला ने जैसे ही होटल में एंट्री ली.. नाश्ता कर रहे लोगों का निवाला गले में अटक गया.. पारदर्शक साड़ी पहनी हुई शीला का गोरा मांसल पेट और उसके बीचोंबीच गहरी सेक्सी नाभि.. आह्ह.. देखने वालों के होश उड़ाने के लिए काफी थे.. उस गोल नाभि को देखकर किसी का भी मन कर जाएँ अंदर लंड डालने को.. सब की नजर शीला के गोलाईदार जिस्म पर चिपक गई थी.. जब तक शीला कुर्सी पर बैठ न गई तब तक सारे देखने वाले उसके शरीर को अपनी आँखों से चोदते रहे.. जानते हुए भी अनजान होकर शीला बड़ी ही बेफिक्री से अपने दामाद के हाथों में हाथ डालकर मस्ती से बैठी थी..
शीला यह जानती थी की पल्लू हटने के बाद नजर आ रही एक तरफ की ब्लाउस की कटोरी को ही तांक रहे थे सारे लोग.. पर अपने दामाद की खुशी के लिए उसने उस हिस्से को ढंका नही.. सब दंग हो गए थे शीला की खूबसूरती को देखकर.. शीला संजय की हथेली को अपने हाथ में लेकर सहला रही थी.. और झुककर उसे अपनी क्लीवेज के दर्शन भी दे रही थी.. उनके अगल बगल के टेबल खाली थे इसलिए उनकी बात किसी को भी सुनाई नही दे रही थी
संजय: "मम्मी जी, आपने जबरदस्त ओरल सेक्स किया आज तो.. अभी तक लंड दर्द कर रहा है.. बिना लंड चुत में डाले दो बार ठंडा कर दिया आपने.. ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ है"
शीला मुसकुराती रही.. और अपनी तारीफ सुनती रही.. वेटर आकर बिस्किट और चाय रखकर चला गया.. एक कप संजय को देते हुए शीला ने पूछा "कितने बजे पहुंचेंगे हम? देर रात तक पहुँच जाएंगे?"
संजय: "नही मम्मी जी, रात तो हमें किसी होटल में ही गुज़ारनी होगी.. कल दोपहर से पहले पहुँच जाएंगे.. एक रात गोवा में रुकेंगे.. फिर निकल जाएंगे.. वैशाली के लौटने से पहले हम घर पहुँच चुके होंगे" अपने दामाद की प्लैनिंग पर गर्व हुआ शीला को
दोनों चाय की चुसकियाँ लेते रहे.. संजय की नजर शीला की गोल चुची पर अब भी चिपकी हुई थी "आहह मम्मी जी, दिल करता है की यहीं खोलकर चूस लूँ.. "
शीला हँसते हुए चाय पीती रही और बोली "तुम इसकी झलक तो देख पा रहे हो.. मेरे नसीब में तो अभी वो भी नही है.. अभी अगर मुझे तेरा गोरा गोरा देखने का मन हो तो मैं क्या करू?"
संजय: "मम्मी जी, कार में खोलकर दे दूंगा आपको.. जितना मर्जी खेल लेना.. "
शीला ने टेबल के नीचे से अपना पैर उठाकर संजय के लंड पर रख दिया.. पैर के अंगूठे से लंड की खबर लेकर शीला ने कहा "ये तो फिर से तैयार हो गया.. !!! क्या बात है बेटा !! इतने समय में ही तीसरी बार........!!!!!"
संजय: "मम्मी जी.. मैं तो आखिर मर्द हूँ.. आप के साथ अगर कोई किन्नर भी होता तो उसे भी उत्तेजित कर देती आप.. "
शीला ने अपने पैरों से ही संजय का लंड दबा दिया..
शीला: "जल्दी जल्दी चाय पी ली बेटा.. अब मुझे ईसे चूसना ही पड़ेगा.. और नही रुक सकती मैं.. " चाय खतम कर शीला खड़ी हो गई.. और कार की तरफ चलने लगी.. आखिरी घूंट खतम कर संजय भी तुरंत शीला के पीछे भागा
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अपनी प्रेमिका कविता की पीठ पर हाथ सहलाते हुए उसे शांत कर रहा था पिंटू.. पीयूष के ऐसे बर्ताव से कविता के दिल को गहरी ठेस पहुंची थी.. ..पिंटू जल्दी से जल्दी बाहर निकल जाना चाहता था क्यों की उसे डर था किसी के आ जाने का.. लेकिन कविता ने उसे रोक लिया और अपने बाहुपाश में जकड़ कर किस कर लिया.. और बोली "पिंटू.. पीयूष मेरे साथ हमेशा ऐसा ही बर्ताव करते हुए मेरा दिल तोड़ देता है.. मुझे पता नही चल रहा की मैं क्या करू? इस कठिन समय में तू मेरे साथ रहना.. प्लीज!!"
पिंटू: "तू चिंता मत कर कविता.. मैं उसे समझाऊँगा.. ठीक है !! " कविता को अपनी बाहों में कसकर पकड़ते हुए उसने कहा "कविता.. मेरा यहाँ ज्यादा देर तक रुकना ठीक नही होगा.. पीयूष को अगर जरा सी भी भनक लग गई तो गजब हो जाएगा.. मैं जा रहा हूँ.. पर तुम तैयार होकर रात की पार्टी में जरूर आना.. मैं इंतज़ार करूंगा तेरा.. ऐसे तैयार होकर आना की देखने वाले देखते ही रह जाएँ.. !! दूर से ही सही.. मैं तुझे देख तो पाऊँगा.. " कविता को एक आखिरी किस करके पिंटू बिस्तर से खड़ा हो गया.. और कमरे से बाहर निकल गया
बालकनी में खड़ी हुई वैशाली ने देखा की पीयूष और मौसम हाथ में गिफ्ट लिए हुए आ रहे थे.. मौसम के साथ पीयूष को इतना खुश देखकर वैशाली के दिल पर आरी चल गई.. बहोत गुस्सा आया उसे मौसम पर.. पूरा दिन जीजू जीजू करती रहती है कमीनी.. पीयूष भी अपनी साली पर लट्टू हो कर उसके आगे पीछे घूमता रहता है.. क्या कहें इन मर्दों को?? इन सब से अच्छा तो मेरा हिम्मत है.. किसी को आँख उठाकर भी नही देखता.. मौसम और पीयूष के बीच कैसे संबंध होंगे? साली और जीजा के संबंधों के बारे में तो बहोत कुछ कहा गया है.. आज कल की लड़कियों को अपने चारित्र से उतना लगाव होता नही है.. वो शादी से पहले के सेक्स को नेट-प्रेक्टिस मानती है.. वैशाली को अपनी कॉलेज की सहेली मोनिका की याद आ गई.. वैशाली और उनकी सारी सहेलियाँ मोनिका के एन्गैज्मन्ट पर गई थी.. उसके बाद जब भी वो मिलती तब सारी लड़कियां उसे घेर लेती.. ये पूछने के लिए की उसका होने वाला पति.. जतिन.. उसका कैसा खयाल रखता है? कितनी बार फोन करता है? और खास कर ये की.. उसके साथ अकेले में क्या क्या करता है.. !!!! दो ही महीनों में उनकी सगाई टूट गई.. उसे पूछने पर यह पता चला की.. इतनी बार मिलने के बावजूद जतिन उसके साथ कुछ करता ही नही था.. सिर्फ बातें करता था.. मौसम भी वैसी लड़कियों जैसी ही लगती थी वैशाली को.. मुझे यकीन है की मौसम अपने स्तन तो किसी न किसी से दबवाती ही होगी.. वरना बगैर किसी के दबाए.. उसके स्तन इतने मस्त कैसे हो सकते है?? जरा से भी ढीले-ढाले नही है.. जिस तरह से वो और पीयूष हंस हंस कर बात करते है.. मुझे पक्का दाल में कुछ काला लग रहा है..
कितना शंकाशील होता है स्त्री का मन.. !!! पीयूष के संग अपनी जिस्म की आग ठंडी करने की आशा से वैशाली यहाँ आई थी पर अब उसे लगने लगा था की कविता और मौसम दोनों के रहते हुए उसका पीयूष से मिलन नामुमकिन सा था.. पीयूष और मौसम को वह जाते हुए देखती ही रही.. उसके विचारों में भंग तब पड़ा जब किसी ने पीछे से उसकी आँखों पर हथेलियाँ दबा दी.. और उसकी गर्दन को चूम लिया.. इतनी हिम्मत कौन कर सकता है?? पीयूष का स्पर्श तो वो जानती थी.. और वैसे भी उसने अभी अभी पीयूष को मौसम के साथ जाते हुए देखा था.. फिर यह कौन था ??
"कौन है??" कहते हुए वैशाली ने अपनी आँखों से हाथ हटाने की कोशिश की पर पीयूष ने एक हाथ उसकी आँख पर दबा रखा था और दूसरे हाथों से वह उसकी चूचियाँ रगड़ने लगा.. मर्द के स्पर्श के लिए तड़प रही वैशाली.. स्तनों पर स्पर्श होते ही बेचारी चुप हो गई.. पीयूष ने उसकी आँखों से हाथ हटा लिया.. वैशाली पीयूष की ओर मुड़ी.. उसे देखते ही वैशाली के चेहरे की चाँदनी खिल उठी.. दो मिनट पहले मौसम के साथ देखकर पीयूष को वो गालियां दे रही थी.. पर पीयूष का एक स्पर्श होते ही उसका सारा गुस्सा मोम की तरह पिघल गया..
वैशाली: "नालायक.. कुछ शर्म नाम की चीज है की नही!!! ऐसे खुले में मेरे बॉल दबा रहा है.. अगर तेरी कविता ने देख लिया तो यहाँ माउंट आबू में ही तुझे तलाक दे देगी.. " उसने पीयूष को झाड दिया.. बात भी सही थी.. होटल की गॅलरी में कोई भी देख लेता.. पर गनीमत थी की किसी ने देखा नही था..
पीयूष: "ये बात है!!! तब तो मैं जरूर करूंगा.. " कहते हुए पीयूष ने वैशाली को बाहों में भरते हुए किस कर लिया.. उतना ही नहीं.. वैशाली के टीशर्ट में हाथ डालकर उसके दोनों बेचैन बबलों को जोर से मसल दिए.. निप्पलों पर मर्दाना स्पर्श होते ही वैशाली की चुत ने विद्रोह कर दिया.. वह पीयूष का हाथ पकड़कर अपने कमरे में ले गई और खिड़की का पर्दा बंद करके पीयूष के गले लग गई.. पीयूष की गर्दन पकड़कर अपनी ओर खींचते हुए वह उसके होंठों को चूसती ही रही.. हतप्रभ होकर पीयूष वैशाली के इस आक्रमण का आनंद ले रहा था.. वैशाली ने खुद ही अपना टीशर्ट ऊपर कर लिया और साथ में ब्रा भी.. मक्खन के गोलों जैसी चूचियाँ खुली हो गई.. गोलमटोल मस्त चूचियों को देखते ही पीयूष का लंड ९० डिग्री का कोण बनाते हुए खड़ा हो गया.. उसने झुककर एक स्तन की निप्पल मुंह में भर ली.. ऐसे चूसने लगा जैसे सदियों से भूखा हो.. दूसरे खाली हाथ से वह उस तरफ के स्तन को पकड़कर उसकी निप्पल को मरोड़ता रहा.. कभी वह इस स्तन को चूसता तो कभी उस स्तन को..
पीयूष जब बबले चूस रहा था तब वैशाली.. अनुभवी चुदक्कड़ की तरह पीयूष के पेंट में हाथ डालकर लंड की सख्ती नाप रही थी.. और चेक कर रही थी की क्या वह उसकी चूत में घुसने के लिए तैयार था या नही !!! मौसम बाथरूम में जीजू के स्पर्श को याद करते हुए अपनी क्लिटोरिस को रगड़ रही थी.. वह झड़कर पार्टी में जाने के लिए तैयार होना चाहती थी
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पीयूष को सबक सिखाने के लिए और पिंटू को खुश करने के लिए.. कविता ने जबरदस्त ड्रेस पहन लिया था.. नीले कलर के पतले से कपड़े से बना टॉप और नीचे एकदम छोटी सी टाइट शॉर्ट्स.. वेक्स करवाए हुए गोरे दूध जैसे उसके पैर और जांघें देखकर अच्छे अच्छों का पानी निकल जाएँ.. एक तो वो एकदम स्लिम थी.. रंग गोरा था.. चेहरे एकदम क्यूट था.. और उसके पतले बदन के मुकाबले स्तन थोड़े से बड़े थे.. पिंटू ने गिफ्ट किया हुआ महंगा परफ्यूम छिड़क कर वह महकने लगी.. परफ्यूम की खुशबू से उसे ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे पिंटू उसके आसपास ही था..
अभी एक घंटे की देर थी पार्टी शुरू होने में.. कविता ने नीला टॉप उतार दिया.. और पिंटू का पसंदीदा गुलाबी स्लीवलेस टॉप पहनने के लिए बाहर निकाला.. अभी वह केवल ब्रा और शॉर्ट्स पहने हुए थी.. इसी अवस्था में कविता झुककर पुराने कपड़े बेग में रख रही थी तभी उसके कमरे का दरवाजा खुला.. !!! और राजेश ने अंदर प्रवेश किया.. !!! पिंटू के जाने के बाद दरवाजा बंद करना याद ही नही आया था कविता को.. !!! एक पल के लिए तो कविता को पता नहीं चला की क्या छुपायें.. पर राजेश ने उसकी परेशानी समझते ही "ओह्ह आई एम सॉरी.. मैं पीयूष से मिलने आया था" कहते हुए मुड़ गया और कमरे से बाहर निकल गया.. किसी पराए मर्द के सामने अपने जिस्म की नुमाइश होने से कविता अपसेट हो गई..
उसने वापिस अपने ड्रेसिंग पर ध्यान देने का सोचा.. पिंटू की अपेक्षा पर खरा उतरना चाहती थी वो.. अपना हाथ पीछे ले जाते हुए उसने ब्रा के हुक खोले.. और सोचती रही.. ऐसा क्या पहनूँ जिससे सब के होश उड़ जाएँ?? आज तो सारे बंधन तोड़कर ऐसे तैयार होना है की सब चोंक जाएँ.. ससुराल में तो ढेर सारी पाबंदियाँ रहती है.. पर यहाँ वो खुलकर जीना चाहती थी.. वह आज पिंटू को खुश कर देना चाहती थी.. ज्यादा उत्तेजक कपड़े पहनने पर पीयूष को बुरा लग सकता था.. पर पीयूष के बारे में वे ज्यादा सोचना नही चाहती थी.. जब से आया तब से किसी न किसी के अंदर घुसा ही रहता था वो.. कविता के सामने देखने का वक्त ही कहाँ था उसके पास.. !! कविता सोचने लगी.. मैं वहीं पहनूँगी जो मुझे पसंद आए और खासकर पिंटू को पसंद आयें.. बेचारा कितना खयाल रखता है मेरा.. पीयूष को मेरी कदर ही नही है.. घर की मुर्गी दाल बराबर.. !! उदास हो गई कविता.. पर पिंटू की याद आते ही वह फिर से आईने में अपने नग्न सौन्दर्य को देखकर आहें भरने लगी.. काश मेरी शादी पिंटू से हुई होती!!!
कविता आज पीयूष को सबक सिखाना चाहती थी.. उसने एक क्रान्तिकारी निर्णय लिया.. बिना ब्रा पहने ही उसने पिंटू का पसंदीदा गुलाबी टॉप चढ़ा लिया.. माय गॉड.. बिना ब्रा के टॉप पहनकर वह खुद ही शरमा रही थी.. उसकी इस हरकत पर सबका ध्यान जाने वाला था ये तो तय था.. नही नही कविता.. इस तरह लोगों के सामने नही जा सकते.. कविता वापिस टॉप उतारकर ब्रा पहनने ही वाली थी तब वापिस पीयूष की याद आ गई.. उस कड़वाहट ने उसे बिना ब्रा के ही टॉप पहनने के लिए राजी कर लिया..
पतले कपड़े वाले टॉप से उसके उरोज दबाकर देखे.. पत्थर जैसी सख्त चूचियाँ थी.. कुछ दिनों से उनका कोई उपयोग भी तो नही हुआ था.. !! कविता ने अपने बाल सँवारे.. और बालों की एक लट को कान के पीछे दबा दिया.. कातिल लग रही थी कविता.. बिना ब्रा के उसके स्तन.. ज्यादा बड़े नही.. और छोटे भी नही.. गुलाबी टॉप में बेहद सुंदर लग रहे थे.. कविता ने कमरे के अंदर चलकर देखा.. की कैसा लग रहा है.. अपने स्तनों को थिरकते देख वह खुद ही शरमा गई.. आज तो देखने वालों के होश ही उड़ जाने वाले थे.. पेंट की चैन टूट जाएगी सब की..
कविता तैयार होकर मौसम और फाल्गुनी के कमरे की तरफ जाने लगी..
दूसरी तरफ पीयूष का लंड घुटनों के बल बैठकर चूस रही थी वैशाली.. थोड़ी देर चूसते ही सख्त गन्ने जैसा हो गया पीयूष का लंड..
"मस्त हो गया है पीयूष.. चल डाल दे अंदर.. !!" कहते हुए वैशाली मुड़कर झुक गई.. पीयूष ने उसका स्कर्ट ऊपर किया और पेन्टी को घुटनों तक सरका दिया.. उसके गोरे कूल्हों पर एक थप्पड़ लगाकर वह अपनी उंगलियों से चूत का छेद ढूँढने लगा.. छेद पर सुपाड़ा रखकर उसने एक धक्के में ही पूरा लंड अंदर डाल दिया.. वैशाली के मुंह से आनंद भरी चीखी निकल गई..
"ओह्ह.. मर गई पीयूष.. आह्ह.. जल्दी जल्दी कर.. " पीयूष फूल स्पीड में धक्के लगाने लगा.. वैशाली की कमर को कसकर पकड़कर वो धक्के लगाए जा रहा था.. ए.सी. ऑन था फिर भी दोनों पसीने से तरबतर हो गए.. थोड़ी ही देर में वैशाली चुदकर ठंडी हो गई और पीयूष ने बेज़ीन में अपना वीर्य गिरा दिया.. वैशाली ने तुरंत कपड़े पहने और पीयूष को बाहर धकेला ताकि कोई देख न ले.. अपना काम हो गया अब तू जल्दी से निकल
"पार्टी मे मिलते है.. बाय" पीयूष चला गया..
पीयूष अब मौसम और फाल्गुनी के कमरे में गया.. मौसम नहा रही थी और फाल्गुनी कोई इंग्लिश मूवी देख रही थी.. फाल्गुनी की जांघ पर हल्की सी चपत लगाते हुए उसने पूछा "मौसम कहाँ है ?"
"वो नहा रही है जीजू.. पता नही बहोत देर लगा दी आज उसने.. " तभी फाल्गुनी की नजर पीयूष के लंड वाले हिस्से पर गई "जीजू, आप की पोस्ट ऑफिस खुली हुई है" कहते हुए वह हंसने लगी.. पीयूष को पता नही चला की वो क्या कहना चाहती थी
"क्या पागलों की तरह हंस रही है?" पीयूष ने कहा.. तभी फाल्गुनी ने उंगली से पेंट की तरफ इशारा किया.. हड़बड़ाहट में चैन बंद करना भूल गया था पीयूष.. उसका लंड अब भी थोड़ा सख्त था इसलिए अंदर उभार भी नजर आ रहा था.. पीयूष ने शरमाकर अपनी चैन बंद करने की कोशिश की.. पर लंड सख्त होने की वजह से बंद करने में दिक्कत आ रही थी.. अभी थोड़ी देर पहले ही वैशाली की चूत से बाहर निकला था.. उसका नशा उतरा नही था लंड का.. आधी चैन बंद करके ही पीयूष को संतोष लेना पड़ा.. फाल्गुनी की नजर बार बार उसके उभार पर जा कर अटक जाती थी.. पीयूष का वो उभरा हुआ हिस्सा फाल्गुनी के नादान मन मे अजीब सी गुदगुदी पैदा कर रहा था..
तभी टीवी पर चल रहे मूवी मे हीरो और हीरोइन एक दूसरे को किस करने लगे.. फाल्गुनी शरमा गई और चैनल बदलने के लिए रीमोट ढूँढने लगी.. वैसे उसने इंग्लिश मूवी लगाई ही इसलिए थी ताकि ऐसे सीन देख सके वरना वो आस्था चैनल न लगाती!!! पर किसी पुरुष के सामने ये सीन चल जाने पर वह शर्म से पानी पानी हो गई.. आधे घंटे से मूवी मे कोई सीन नही आया.. और पीयूष की हाजरी मे ही सब शुरू हो गया.. मौसम की बात अलग थी.. वो पीयूष की साली थी.. लेकिन पीयूष के सामने फाल्गुनी अपनी मर्यादा मे ही रहती.. जब मौसम और पीयूष किसी नॉनवेज जोक पर हँसते तब फाल्गुनी शरमाकर चुप ही रहती.. मौसम हमेशा उसे टोकती की वह सब के साथ ज्यादा बात नही करती.. पर पता नही क्यों.. सेक्स को लेकर कोई बात आते ही फाल्गुनी के पसीने छूट जाते.. और वो थरथर कांपने लगती.. सेक्स के प्रति इस अभिगम के बारे मे मौसम ने कई बार फाल्गुनी से पूछा पर उसने कभी कुछ बताया नही.. मौसम को ऐसा लगता था जैसे फाल्गुनी कुछ कहना तो चाहती थी पर कह नही पाती थी
पीयूष बेफिक्र होकर सोफ़े पर बैठकर टीवी देखने लगा.. अभी अभी खतम हुए किसिंग सीन को लेकर फाल्गुनी काफी अपसेट थी.. पर पीयूष को इससे कोई फरक नही पड़ा.. वो तो बस मौसम को देखने आया था.. उस कच्ची कली को नंगी करके उसका सील तोड़ने का मौका मिल जाए तो पूरा जीवन सफल हो जाएँ.. टीवी देखते देखते ये सोच रहा था पीयूष.. अभी मौका था.. आबू के मदमस्त वातावरण मे साली को गरम कर दिया हो तो वापिस घर जाकर कोई न कोई मौका जरूर मिल जाएगा.. ऐसा कुछ करना था यहाँ की मौसम पूरा दिन उसी के नाम की माला जपती रहे.. जो भी करना था यहीं करना था.. एक बार घर चले गए फिर घंटा कुछ होना था.. !!! माउंट आबू में सिर्फ प्रोजेक्ट मौसम की प्राथमिकता रहेगी.. प्रोजेक्ट रेणुका, प्रोजेक्ट वैशाली और प्रोजेक्ट शीला को घर जाकर देख लेंगे..
इन सारी बातों से बेखबर मौसम बाथरूम के अंदर साबुन के झाग को अपने स्तनों पर रगड़ते हुए.. जीजू के साथ आज दोपहर को जो हुआ था.. उसे याद कर रही थी.. मदहोश कर देने वाली किस.. और स्तन मर्दन.. आह्ह.. मौसम ने बेसिन से टूथब्रश उठाया और अपनी चूत पर रगड़ दिया.. आह्ह.. शावर से गिर रहा गरम पानी.. उस गर्माहट की याद दिलाने लगा जो उसने तब महसूस की थी जब पीयूष ने उसके स्तन दबा दिए थे.. आज से पहले कभी भी मौसम इतना उत्तेजित नही हुई थी.. वो अपने मनपसंद हीरो को याद कर अपनी चूत मे उंगली तो पहले भी करती थी.. पर आज प्रत्यक्ष अनुभवों को याद करते हुए वह हस्तमैथुन कर रही थी.. और उसे बड़ा ही अनोखा मज़ा मिल रहा था.. पीयूष ने जिस तरह उसकी निप्पल को मसला था.. ओह्ह.. कितना मज़ा आया था यार.. !!! हाययय.. मौसम का मन कर रहा था की ऐसे ही नंगी होकर वो बाहर निकले और पीयूष से लिपट जाए.. पीयूष को याद करते हुए उसने आधा टूथब्रश अपनी चूत मे डाल दिया.. अब असली लंड को अंदर घुसाने का समय आ चुका था
लंड की याद में आज पहली बार ऑर्गजम मिला था मौसम को.. अद्भुत.. अवर्णनीय सुख का अनुभव हुआ उसे.. सारा जिस्म हल्का हल्का सा महसूस हो रहा था.. जवानी की दहलीज पर खड़ी लड़की तभी खिलती है जब किसी प्रेमी का स्पर्श होता है..
ब्रा के हुक बंद करते हुए.. मौसम अपने जीजू के साथ संसर्ग से खिल उठे अपने स्तनों को संभालकर ब्रा में फिट करते हुए हंस पड़ी.. जैसे किसी महत्वपूर्ण डॉक्यूमेन्ट को लॉकर में रख रही हो उतना संभालकर उसने अपने स्तनों को ब्रा के अंदर बांध लिया.. पेन्टी पहनकर उसने तौलिया छाती पर लपेट लिया और बाहर निकली.. भीगे बाल.. अर्धनग्न जिस्म पर तौलिया लपेटा हुआ जवान जिस्म.. मौसम का रूप किसी एटम-बॉम्ब से कम नही था.. और इस बॉम्ब की झपेट में जो सबसे पहले आया.. वो था पीयूष.. !!
मौसम का यह रूप देखकर पीयूष चोंक उठाया.. मौसम को भी यह कल्पना नही थी की जीजू अभी उसके कमरे में ही उपस्थित होंगे.. वो तो आराम से बाथरूम के बाहर निकली.. पर सामने सोफ़े पर पीयूष को बैठा देखकर शरमा गई.. और बेड पर पड़े अपने कपड़े लेकर तुरंत बाथरूम में चली गई.. जाते हुए पीछे से उसकी गीली पीठ और घुटनों को देखकर पीयूष का लंड उसकी पतलून के अंदर ही भारत-नाट्यम करने लगा..
बाथरूम का दरवाजा बंद करते वक्त मौसम ने पीयूष की तरफ देखा.. दोनों की नजर एक हुई.. और पीयूष उस कातिल नज़रों से घायल हो गया.. इस पूरे तमाशे को फाल्गुनी देख रही थी.. पर उसके चेहरे के हावभाव में कोई बदलाव नही आया.. छेड़छाड़.. रोमांस.. शारीरिक आकर्षण.. यह सारे विषय उसके लिए सिलेबस में फिलहाल कहीं मौजूद ही नही थे..
करीब दस मिनटों के बाद मौसम कपड़े पहनकर बाहर आई.. कमरे में सन्नाटा था.. मौसम का हुस्न इतना कातिल था की ट्यूबलाइट की रोशनी भी उसके सामने फीकी लग रही थी.. जैसे ही मौसम बाहर निकली.. फाल्गुनी अपने कपड़े लेकर अंदर नहाने के लिए चली गई.. पीयूष और मौसम कमरे में अकेले थे.. एकांत मिलते ही पीयूष के अंदर का बंदर उछलकूद करने लगा.. उसने मौसम को आँख मारी.. मौसम शरमा गई.. वो अब आईने मेइन देखकर मेकअप करते हुए बार बार पीयूष को कनखियों से देख रही थी.. पीयूष पीछे से उसके कूल्हें देखकर अपने लंड को बार बार सहला रहा था..
पीयूष से अब ओर रहा नही गया.. इस मौके का फायदा उठाने के इरादे से वह खड़ा होकर मौसम के पास गया और उसे बाहों में भर लिया.. फाल्गुनी बाथरूम में थी इसलिए मौसम ने विरोध नही किया.. पीयूष ने झुककर उसकी गर्दन के पिछले हिस्से को चूम लिया.. अपने जीजू की इस प्रेमभरी हरकत से मौसम को इतना मज़ा आया की उसकी आँखें बंद हो गई..
अपना हाथ पीछे ले जाकर वो पीयूष के बालों में अपनी उँगलियाँ फेरने लगी.. हाथ ऊपर होते ही उसके दोनों स्तन उभरकर बाहर आ गए.. आईने में उन स्तनों का प्रतिबिंब देखकर पीयूष बावरा होकर उनपर टूट पड़ा.. कच्ची कुंवारी छाती पर मर्द का स्पर्श अनुभवित कर मौसम मस्त होकर जैसे स्वर्ग में पहुँच गई.. पीयूष का खड़ा लंड उत्तेजना पूर्वक मौसम की पीठ पर वार कर रहा था.. मौसम को पीयूष का लंड अपनी पीठ पर चुभता हुआ महसूस हो रहा था.. अनजाने में ही वह अपनी पीठ को उनके लंड पर रगड़ने लगी..
पीयूष ने अपना हाथ मौसम के ड्रेस के अंदर डालकर उसकी चूचियों को दबोच लीया.. मौसम ने अपना चेहरा घुमाया और दोनों के होंठ एक हो गए.. कामाग्नि से दोनों के बदन तपने लगे.. एक दूसरे के जिस्म को भोगने की चाह तीव्र होने लगी.. पर मौसम को ये मालूम नही था की इस भूख को जितना तृप्त करो उतना ही बढ़ती जाती है.. !! अपने जिस्म पर पीयूष के स्पर्श से बेकाबू हो रही मौसम को ये भी अंदाजा नही रहा की जिसके साथ वो ये खतरनाक खेल खेल रही है.. वह उसकी बड़ी बहन का सुहाग था.. वाकई वासना इंसान को अंधा बना देती है
"मौसम, आई वॉन्ट टू सक यॉर निप्पल.. !!!" पीयूष ने मौसम के कान में कहा
मौसम इस प्रपोज़ल को सुनकर कामुक हो उठी.. लेकिन औरत कितनी भी उत्तेजित क्यों न हो.. अपने आसपास की परिस्थितियों का पूरा ध्यान रखती है..
"जीजू, फाल्गुनी किसी भी वक्त बाहर आ सकती है.. अभी नही, प्लीज.. अब आप जाइए, वो थोड़ी ही देर में बाहर निकलेगी.. " मौसम ने समझाया
"नही मौसम.. मुझसे रहा नही जाता.. कुछ भी कर.. मुझे तेरा बॉल चूसना है अभी.. प्लीज"
"ओह्ह जीजू.. आप समझते क्यों नही.. अभी ये पॉसिबल नही है.. प्लीज ट्राय टू अन्डर्स्टैन्ड.. !!"
"आई लव यू, मौसम" पीयूष उसके कान में फुसफुसाया और उसके दोनों स्तनों को मसल दिए.. मौसम ने भी अपनी पीठ से पीयूष के लंड को दबा दिया..
पीयूष के मुंह से "आई लव यू" सुनकर मौसम को बहोत अच्छा लगा.. वह अपने जीजू से बार बार यह सुनना चाहती थी.. पर ऐसा करने से उसकी बहन के संसार को बड़ा खतरा था ये अब ज्ञात हुआ मौसम को.. वैसे वो कुछ बोले या न बोले उससे क्या फरक पड़ता था? वो जो कुछ भी कर रही थी वह अपने जीजू के प्रेम का स्वीकार नही था तो और क्या था? मौसम पीयूष की बाहों में समा गई.. जीजू की बाहों में उसे अद्भुत सलामती और प्रेम की संवेदना महसूस होती थी.. उसने पीयूष को चूमा.. पीयूष ने उसकी जीभ चूस ली.. मौसम भी अब बेहद उत्तेजित हो चुकी थी..
मौसम के वी-नेक गले वाले ड्रेस के अंदर हाथ डालकर पीयूष ने उसका एक स्तन बाहर खींचने की कोशिश की.. पर ड्रेस इतना टाइट था की वह उसे बाहर निकाल नही पाया.. लेकिन स्तन का ५० प्रतिशत हिस्सा बाहर निकल गया था.. उस आधे दिख रहे स्तन की गोरी गोलाई को उसे चूमकर ही संतोष लेना पड़ा.. आक्रामक होकर उसने अपने दांत गाड़ते हुए उसके स्तन को काट लिया.. अपने उभार को वापस ब्रा के अंदर डालते हुए मौसम ने देखा की पीयूष के काटने से उसके स्तन पर लाल निशान बन गया था.. मौसम के जीवन का प्रथम लव-बाइट.. !!
तभी बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज आई.. दोनों एकदम से अलग हो गए.. और पीयूष कमरे से बाहर चला गया
Thanks Napster bhaiबहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
शीला को अपनी बेटी वैशाली के वैवाहिक जीवन के बारें चिंता सताये जा रही है तो उसने वैशाली की सहेली फोरम का सहारा लिया जानकारी जुटाने के लिये सारी जानकारी जान कर फोरम तो लौट गयी पर शीला को वो जानकारी कब साझा करेगी
रसिक और शीला की रासलीला वैशाली ने देख लिया
अब पियुष के घर के लोग पिकनिक पर जाने वाले है और वो शीला और वैशाली को भी ले जाना चाहते
Shandaar updateपीयूष अपने कमरे में आया और कपड़े बदलकर वापस ऊपर कान्फ्रन्स रूम में पहुँच गया.. सब लोगों अलग अलग तीन-चार के ग्रुप में खड़े खड़े गप्पे लड़ा रहे थे.. हॉल में शराब, सिगरेट और महंगे परफ्यूम के मिश्रण की गंध फैली हुई थी..
गुलाबी स्लीवलेस टॉप में अपनी तंदूरस्त जवानी को उछालते हुए कविता बातें कीये जा रही थी.. और सब का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी.. वो बार बार अलग ग्रुप में जाकर बातें कर रही थी.. अनजाने लोगों से भी हाई-हैलो कर रही थी.. वो जिस ग्रुप की ओर जाती उस ग्रुप के सारे मर्द उसे आते देख चुप हो जाते.. बस उसकी उन्नत छातियों को ताड़ते रहते.. सागर की लहरों की तरह उछल रहे उसके स्तनों की गोलाई, पतले से टॉप में इतनी आसानी से नजर आ रही थी की सब की नजर वहीं चिपकी रहती.. कोन्फ्रन्स हॉल का एसी थोड़ा सा तेज था.. वातावरण में फैली ठंडक के कारण कविता की निप्पल सख्त होकर टॉप के कपड़ों में अपना आकार बना रही थी.. एक दो पुरुष तो कविता को देखते ही अपना लंड ऐडजस्ट करने लगे.. कुछ मर्द टॉइलेट जाने का बहाना बनाकर अपना लंड हिलाकर लौटे..
राजेश सर कोने में किसी के साथ फोन पर बात कर रहे थे.. उन्हें भी जाकर हाई बोलकर आई कविता.. फिर वो चलते चलते रेणुका और वैशाली के पास आकर खड़ी हो गई..
"हाय मैडम, हैप्पी बर्थडे.. ढेर सारी शुभकामनाएं और विशिज.. ईश्वर आपको लंबी उम्र दे"
"ओह शुक्रिया कविता.. वैसे तू आज कमाल लग रही है.. क्या गजब का बोल्ड ड्रेस है तेरा.. राजेश तुझे देखने के बाद आज मेरी हालत खराब कर देगा!!"
सब कुछ जानते हुए भी कविता ने पूछा "अरे ऐसी भी क्या बात है रेणुका?"
रेणुका: "अरे, तेरे इस गरमागरम डिस्प्ले को देखकर राजेश मुझे बोल रहा था की चल रूम में चलते है"
कविता: "हाँ तो दिक्कत क्या है!!! जाकर आइए.. हम सब आपका वेइट करेंगे.. " हँसते हुए उसने कहा
वैशाली: "नही रे नही.. ऐसा थोड़े ही चलता है!! हम यहाँ बाहर खड़े खड़े तड़पे और आप अंदर मजे करो.. मैं नही जाने दूँगी आपको" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा
रेणुका: "तो तू भी चल मेरे साथ अंदर.. मुझे कोई दिक्कत नही है.. राजेश हम दोनों को एक साथ बिस्तर में संभालने के लिए काफी है.. हा हा हा हा हा.. !!"
वैशाली: "नही रे बाबा.. मैं कबाब में हड्डी बनना नही चाहती.. आप कविता को ले जाइए अगर उसकी इच्छा हो तो.." तभी मौसम ने वैशाली को आवाज दी.. "मैं अभी आती हूँ.. एक्स्क्यूज़ मी" कहते हुए वैशाली मौसम और फाल्गुनी की ओर चल पड़ी
रेणुका ने आँख मारते हुए कविता से कहा "क्यों कविता.. क्या खयाल है? चलना है अंदर मेरे साथ?"
कविता: "ना बाबा ना.. ऑफकोर्स मेरी इच्छा तो है पर वो आपके पति के साथ नही.. मेरी पसंद के पुरुष के साथ"
रेणुका: "तो बोल न.. तेरी पसंद के साथी के साथ मजे करने हो तो मैं अभी कुछ मेनेज कर दूँगी.. कौन पसंद है तुझे बता मुझे.. पर राजेश को छोड़कर"
कविता: "मेरी पसंद तो तुम्हें पता है ही.. दरअसल मैं तुम से वही कहने आई थी.. माउंट आबू के इस रोमेन्टीक माहोल में मैं पिंटू के साथ थोड़ा वक्त बिताने की बहोत इच्छा हो रही है.. पर चांस ही नही मिलता.. !! क्या करू? तुम मेरी कुछ मदद करो ना प्लीज!!"
रेणुका सोचने लगी.. फिर उसने कहा "चिंता मत कर.. मैं कुछ करती हूँ.. मेरे बर्थडे के दिन कोई उदास हो, ऐसा कैसे हो सकता है !!"
कविता: "पर ध्यान रखना.. पीयूष को पता नही लगना चाहिए.. वरना लेने के देने पड़ जाएंगे"
रेणुका: "डॉन्ट वरी.. मैं जब तुझे फोन करू तब तू आ जाना.. " कविता को आश्वासन देते हुए उसने कहा
अपने प्रेमी को अकेले में मिलने को बेकरार कविता के दिल को ठंडक मिली.. "और हाँ.. वैशाली को भी कुछ मत बताना.." वैशाली को अपनी ओर आते देख कविता ने रेणुका से कहा
रेणुका: "ओके बेबी डन.. और कविता.. हमारी ऑफिस में कंप्युटर ऑपरेटर की नौकरी के लिए तेरा नाम तय है.. बोल कब से जॉइन करेगी?" जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ रेणुका ने कहा.. उसका कहने का मतलब साफ था.. अगर कविता पिंटू से अकेले मिलना चाहती हो तो उसे रेणुका की बात माननी होगी..
कविता: "मुझे एक बार पीयूष से इस बारे में बात करनी होगी.. बाकी मुझे आप की कंपनी में जॉब करने में कोई आपत्ति नही है"
रेणुका: "वो सब तू मुझ पर छोड़ दे.. पीयूष को मैं मना लूँगी.. " तब तक वैशाली उनके करीब आ चुकी थी और रेणुका का आखिरी वाक्य उसने सुन लिया था.. उस वाक्य का दूसरा अर्थ भी निकलता था जो वैशाली समझ गई.. पर फिलहाल वो कुछ नही बोली.. समय आने पर ही बोलने में विश्वास रखती थी वैशाली..
नौकरी की ऑफर के बारे में गंभीरता से सोच रही थी कविता.. अगर वो हाँ कर दे तो पिंटू के साथ रहने का मौका मिल जाएगा.. वो रोज उसे कम से कम आठ घंटों के लिए देख पाएगी.. मिल पाएगी.. बात कर पाएगी.. और कंपनी का मालिक और उनकी पत्नी के साथ अब घर जैसे संबंध बन चुके थे.. कविता के दिल में.. उसके स्तन के साइज़ के लड्डू फूटने लगे.. समस्या बस एक ही थी.. पीयूष और अपने सास ससुर से नौकरी करने के लिए इजाजत लेनी थी.. अगर वह नही माने तो उसका सपना एक पल में चूर हो जाने वाला था.. कविता सोच रही थी की इस समस्या का समाधान कैसे करे.. !!
जब भी कविता का दिमाग काम करना बंद करे तब उसे शीला भाभी की याद आ जाती थी.. शीला के पास सारी समस्याओं का हल मिल जाता था.. घर जाते ही शीला भाभी को इस के बारे में बताती हूँ.. वो कुछ न कुछ तरीका ढूंढ निकालेगी.. मन में गांठ मार ली कविता ने
सब धीरे धीरे कोन्फ्रन्स रूम में इकठ्ठा होने लगे थे.. मौसम और फाल्गुनी.. दोनों चिड़िया की तरह चहचहा रही थी.. सब का ध्यान बार बार उनकी ओर चला जाता था.. चंचल परवाने जैसी मौसम और शांत गंभीर फाल्गुनी.. दोनों दिखने में बेहद सुंदर और आकर्षक..
"लेडिज एंड जेन्टलमेन.. माउंट आबू की इन हसीन वादियों में मेरी प्रियतमा पत्नी के ३५वे जन्मदिन की पार्टी में.. मैं और रेणुका आप सब का स्वागत करते है.. " माइक पर बोल रहे राजेश की आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी.. सब ने तालियों से सराहा.. शराब के नशे में काफी लोग मस्त थे.. मुक्त और मस्त वातावरण था.. और इस वातावरण का असर मौसम और फाल्गुनी पर भी धीरे धीरे होता जा रहा था
रेणुका केक काटने ही वाली थी तब राजेश ने उसे एक मिनट के लिए रोक लिया.. और पीयूष को आवाज लगाई..
"यस सर.. " पीयूष राजेश के करीब आया.. राजेश ने पीयूष के कान में गिफ्ट के बारे में पूछा.. "वो तो मेरे कमरे में है" पीयूष ने कहा
"अरे भई.. तो लेकर आओ जल्दी.. " राजेश ने कहा.. पीयूष अपने कमरे की ओर भागा
तभी रेणुका ने पिंटू को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा.. पिंटू ने जवाब में "स्योर मैडम" कहा और वो भी हॉल के बाहर चला गया.. अब रेणुका ने कविता को बुलाया.. और सब सुन सके उस तरह कहा "अरे कविता.. मेरा पर्स रूम पर भूल आई हूँ.. जरा लेकर आएगी प्लीज.. टेबल पर ही पड़ा है"
"अभी लेकर आती हूँ" अपने बॉल उछालते हुए कविता रेणुका के कमरे की तरफ दौड़ी
जाते जाते कविता को याद आया की वह कमरे की चाबी लेना तो भूल ही गई थी.. पर तब तक वो कमरे तक पहुँच गई थी.. उसने देखा की कमरा तो पहले से ही खुला हुआ था.. दरवाजा खोलकर उसने प्रवेश किया.. बेग के अंदर कुछ ढूंढ रहे पिंटू की पीठ देखकर वह चोंक उठी.. तभी कविता के मोबाइल की रिंग बजी.. पिंटू ने घबराकर पीछे देखा और आश्चर्य से पूछा "अरे कविता? तुम यहाँ? क्या बात है?"
पिंटू को बोलने से रोकने के लिए कविता ने अपने होंठ पर उंगली रखते हुए इशारा किया और फोन रिसीव किया "हैलो.. !!"
"ओके मैडम" एक ही सेकंड में उसने फोन काट दिया
कविता ने दरवाजा अंदर से लॉक कर दिया और पिंटू को अपनी बाहों में भरकर.. रेणुका-राजेश के बिस्तर पर गिरा दिया
पिंटू घबरा गया "ये क्या कर रही है पगली??" उसने कविता को धक्का देकर अपने आप को उससे दूर किया
"अरे पिंटू मेरी जान.. रेणुका मैडम ने जान बूझकर हम दोनों को यहाँ भेजा है.. अभी उनका ही फोन था.. डरने की कोई बात नही है.. हम एकदम सेफ है यहाँ.. आई लव यू पिंटू" कहते हुए वह पिंटू से लिपट पड़ी..
उसी वक्त.. पूरे माउंट आबू में एक साथ लाइट चली गई.. कहीं किसी ट्रैन्स्फॉर्मर में एक जबरदस्त धमाके की आवाज सब ने सुनी.. अंधेरा होते ही पीयूष का हाथ कविता के पतले टॉप के अंदर घुस गया और वह उसके दसहरी आम का रस निकालने लगा.. कविता के अद्भुत कामुक स्तनों को वो मसलने लगा.. कविता का हाथ सीधा पीयूष के लंड पर पहुँच गया.. पेंट के ऊपर से लंड को मालते हुए उसने अपने लिपस्टिक लगे होंठ पीयूष के होंठों पर रख दिए..
कविता के बिना ब्रा वाले स्तनों को हाथ में पकड़ते ही पिंटू की आह निकल गई.. कविता ने तुरंत अपना टॉप ऊपर कर लिया और पिंटू का चेहरा अपने दोनों स्तनों पर दबा दिया.. दोनों एक दूसरे में ऐसे खो गए.. जैसे धरती पर वो दो आखिरी इंसान हो.. पिंटू से ज्यादा भूख कविता की थी इसलिए वह काफी आक्रामक थी.. पीयूष की अवहेलना से परेशान कविता अपने प्रेमी के आगोश में आते ही उत्तेजित हो गई.. उसका जिस्म किसी मर्द को चाहता था.. क्योंकि पिछले काफी दिनों से पीयूष ने उसे हाथ भी नही लगाया था.. ऊपर से माउंट आबू आने के बाद उसकी इच्छाएं और उछलने लगी थी.. पिछले दो घंटों में.. अनगिनत मर्दों की भूखी नज़रों को अपने स्तन पर पड़ती हुई महसूस कर वह तड़पने लगी थी..
पिंटू भी अपने पहले प्यार को पा कर खुश हो गया था.. कविता के स्तनों की गर्माहट का मज़ा लेते हुए वह उसकी जांघों को सहलाने लगा.. जैसे जैसे पिंटू का हाथ उसकी जांघों पर आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे कविता अपनी टांगें चौड़ी करते हुए अपना राजद्वार खोल रही थी..पिंटू के हाथ के स्पर्श से वह सिहरते हुए उसने अपनी आँखें बंद कर ली.. चिकनी जांघों को सहलाते हुए पिंटू को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे संगेमरमर पर हाथ फेर रहा हो.. कविता का सहकार भी ऐसा मिल रहा था की कुछ ही सेकंड में पिंटू का हाथ उसकी चूत तक पहुँच गया..
पता नही.. ऐसा कौनसा जादू होता है स्त्री की योनि में..जिसे देखते ही पुरुष बेकाबु होकर जानवर की तरह टूट पड़ता है.. कविता ने अब पेंट की अंदर हाथ डालकर पिंटू का लंड पकड़ लिया था..
"कितना सख्त हो गया है यार" कविता को उसके लंड की गर्मी अपनी हथेली पर महसूस हो रही थी
"तुझे इस तरह देखने के बाद.. किसी का भी सख्त हो जाए.. क्या लग रही है तू कविता.. आह्ह.. " कविता की छाती को चूम चाटकर मदहोश कर दिया उसे पिंटू ने ..
उत्तेजनावश पिंटू के लंड पर कविता के हाथों की पकड़ और सख्त हो गई.. अपने स्तनों को और सख्ती से दबा दिया पिंटू के मुंह पर..
"अब मुझसे रहा नहीं जाता पिंटू.. कुछ कर ना जल्दी.. "
"ओह्ह कविता.. मेरी जान.. " कहते हुए पिंटू ने अपने पेंट की चैन खोलकर लंड बाहर निकाल लिया.. कविता बेचैन होकर पिंटू के लंड के टोपे को चूसने लगी.. कविता की इस हरकत से पिंटू भी अपना आपा खो बैठा.. कभी वो कविता की नंगी पीठ को सहलाता.. कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरता.. तो कभी उसके स्तन को दबाता
"जल्दी करना होगा कविता.. सब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे.. तू जल्दी उलटी लेट जा.. हमारी फेवरिट पोजीशन में करेंगे.. " पिंटू ने कहा
"नही यार.. मेरी बिना चाटे मैं तुझे छोड़ने वाली नही हूँ आज.. कितना वक्त हो गया.. आखिरी बार जब मेरे घर के पीछे की अंधेरी गली में मिले थे तब तूने चाटी थी मेरी.. वो रात मुझे बहोत याद आती है.. तेरी जीभ जब अंदर गई थी तब.. आह्ह इतना मज़ा आया था की क्या बताऊ.. प्लीज यार.. आज अपनी जीभ अंदर तक घुसेड़कर चाट दे एक बार"
"जो भी करवाना है जरा जल्दी कर यार" पिंटू ने कहा..
कविता ने तुरंत अपनी छोटी सी शॉर्ट्स और पेन्टी एक साथ उतार फेंकी.. पिंटू कविता की जांघों को चाटने लगा.. वो भी गरम हो चुका था.. कविता ने उसका सर पकड़ा और उसके मुंह को अपनी चिपचिपी बुर पर लगा दिया.. पिंटू की जीभ का अपनी चूत पर स्पर्श प्राप्त होते ही कविता स्वर्ग में पहुँच गई.. पिंटू के कामुक चुंबनों का असर इतनी तीव्रता से हुआ की एक ही पल में उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. उसके स्तन सख्त हो गए और निप्पल बंदूक की गोली जैसी टाइट हो गई.. पिंटू जैसे जैसे चाटता गया.. कविता की सिसकियों का वॉल्यूम बढ़ता गया.. अपने पसंदीदा पात्र के साथ संभोग करने से बेहतर मज़ा ओर कोई नही है..
पिंटू की जीभ ने कविता को उसके सारे गम भुला दिए.. कमर को उचक उचक कर वह अपनी चूत को पिंटू के मुंह से घिस रही थी.. कराहते हुए कविता का जिस्म एकदम सख्त और सीधा हो गया.. वह थरथराने लगी.. और एक छोटी सी चीख के साथ पिंटू के मुंह में झड़ गई.. स्खलित होते ही कविता का जिस्म एकदम हल्का हो गया.. दिमाग शांत हो गया.. मन तृप्त हो गया.. अपना काम खतम होते ही उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ..
अब लाइट भी आ चुकी थी
"अब हमे चलना चाहिए पिंटू.. बहोत देर हो गई" कविता ने कहा
"अच्छा?? तो फिर इस सख्त लोडे का क्या करू? ये अब ढीला होने नही वाला.. अब ईसे वापिस पेंट में डालना भी मुमकिन नही है.. क्या करू? तू बता" पिंटू ने थोड़े गुस्से से कहा..
कविता उठकर पिंटू के लंड को तेज गति से हिलाने लग गई.. पिंटू कविता के बॉल को पागलों की तरह दबाने लगा.. पिंटू को बिस्तर पर सुलाते हुए कविता उसके ऊपर चढ़ बैठी.. और अपने हाथ को नीचे ले गई.. पिंटू के कड़े लंड को अपनी चूत के सेंटर पर रखकर उसने दबाया.. पर लंड अंदर गया नही.. कविता ने अपनी हथेली पर थोड़ा सा थूक लेकर नीचे लंड पर लगाया.. और ऊपर वज़न देने लगी..
"उफ्फ़ पिंटू.. तेरा ज्यादा मोटा हो गया है क्या.. !! अंदर जा ही नही रहा.. दर्द हो रहा है मुझे.. ऊईई माँ.. !!" धीरे धीरे कविता की चूत लंड निगलती रही.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए कविता ऊपर नीचे होते हुए धक्के लगाने लगी..
अपना ऑर्गजम हो जाने के बावजूद.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए.. अपनी कामुक अदाओं से वह पिंटू को रिझाने लगी.. कविता की चूत के एकदम टाइट वर्टिकल होंठों की पकड़ इतनी मजबूत थी की पिंटू नीचे लैटे लैटे स्वर्ग का आनंद ले रहा था.. ऊपर नीचे करते हुए लय बनाकर कविता अपने स्तनों को उछाल रही थी.. अपनी चूत की गहराई में अंदर तक उसे लंड की गर्माहट का एहसास हो रहा था.. गति बढ़ाते हुए कविता चाहती थी पिंटू जल्दी से जल्दी झड़ जाए..
अपने स्तनों पर पिंटू की टाइट पकड़ महसूस करते हुए कविता को पता चल गया की पिंटू अब झड़ने के करीब था.. उसने अपनी उछलने की गति दोगुनी कर दी..
"ओह्ह गॉड.. फक मी.. लव यू मेरी जान.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे.. कितनी टाइट है तेरी चूत.. पीयूष डालता भी है या नही अंदर.. ओह्ह ओह!!" कविता की कमर पकड़कर उसे धक्के लगाने में मदद कर रहा था पिंटू
लंड के घर्षण से अभी अभी स्खलित हुई कविता फिर से गरम होने लगी.. अपनी चूत की मांसपेशियों को उसने इतना टाइट कर दिया जैसे पिंटू के लंड का गला घोंट देना चाहती हो.. लंड और चूत की लड़ाई में हम मानते है की आखिर में लंड जीता या चूत जीती.. पर हकीकत में चूत कभी हारती नही.. हार हमेशा लंड की ही होती है.. कभी चूत से बाहर निकले लंड के हाल देखें है!!! कोल्हू से निकले हुए गन्ने जैसी हालत होती है लंड की..
लंड पर दबाव बढ़ते ही पिंटू के लंड ने पिचकारी मार दी.. दोनों प्रेमी एक दूसरे से लिपट गए..
कुछ सेकंडों तक लिपटे रहने के बाद रीलैक्स होकर पिंटू के होंठों को चूमते हुए कविता ने कहा.. "अब मुझे जाना होगा पिंटू.. जाने का मन तो नही है पर क्या करें.. !! काश हम दोनों को साथ में एक रात गुजारने का मौका मिल जाएँ "
"फिलहाल तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन नही है.. तू अब कुंवारी नही है.. पीयूष की पत्नी है तू.. चल अब तू जल्दी जा.. मैं थोड़ी देर में आता हूँ वरना किसी को शक हो जाएगा"
"नही.. तू पहले निकल.. मैं यह बेड की चादर और मेरा मेकअप ठीक करके आती हूँ" पिंटू का चेहरा उसने अपने रुमाल से पोंछ कर उसके बाल ठीक कर दिए और उसे एक आखिर किस देकर जाने दिया.. उसके जाने के बाद कविता ने आईने में देखकर अपना मेकअप ठीक किया.. लिपस्टिक फिर से लगाई.. ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी रेणुका की डार्क ब्राउन शेड की लिपस्टिक होंठों पर लगाते हुए उसे पिंटू के सुपाड़े की याद आ गई.. कविता हंस पड़ी.. सोचने लगी.. दुनिया की सर्वश्रेष्ठ लिपस्टिक तो लंड ही है.. उससे होंठ गीले करने में जो मज़ा है वो बेजान लिपस्टिक में कहाँ!!! शायद इसी कारण सारी कंपनियां लिपस्टिक को लंड के आकार की ही बनाते है..
कविता ने फटाफट अपने बाल ठीक कीये.. बेड की चादर की सिलवटें दूर की.. और सब कुछ एक आखिरी बार चेक करते हुए रूम से बाहर निकली। हॉल में पहुंचते ही उसने देखा की सब पार्टी इन्जॉय कर रहे थे.. कविता के उछलते स्तनों की गैरमौजूदगी में सारा वातावरण शांत सा था.. पर जैसे आंधी आते ही सब अस्तव्यस्त हो जाता है.. वैसे ही कविता की पायलों की झंकार सुनते ही सब अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसे देखने लगे.. अपने हाथ के ग्लास में पड़ी दारू को भूलकर कविता के जोबन को पीने लगे.. मर्द तो मर्द.. सारी औरतें भी कविता के स्तन युग्म को देखती ही रह गई.. सब कविता को देख रहे थे.. एक पीयूष को छोड़कर.. पीयूष नाम का भँवरा.. मौसम नाम के ताजे खिले फूल का रस चूसने के लिए यहाँ वहाँ मंडरा रहा था..
Pintu ki jeebh ka sparsh apni yoni pr pa kr Kavita swarg mein pahunch gyi.पीयूष अपने कमरे में आया और कपड़े बदलकर वापस ऊपर कान्फ्रन्स रूम में पहुँच गया.. सब लोगों अलग अलग तीन-चार के ग्रुप में खड़े खड़े गप्पे लड़ा रहे थे.. हॉल में शराब, सिगरेट और महंगे परफ्यूम के मिश्रण की गंध फैली हुई थी..
गुलाबी स्लीवलेस टॉप में अपनी तंदूरस्त जवानी को उछालते हुए कविता बातें कीये जा रही थी.. और सब का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी.. वो बार बार अलग ग्रुप में जाकर बातें कर रही थी.. अनजाने लोगों से भी हाई-हैलो कर रही थी.. वो जिस ग्रुप की ओर जाती उस ग्रुप के सारे मर्द उसे आते देख चुप हो जाते.. बस उसकी उन्नत छातियों को ताड़ते रहते.. सागर की लहरों की तरह उछल रहे उसके स्तनों की गोलाई, पतले से टॉप में इतनी आसानी से नजर आ रही थी की सब की नजर वहीं चिपकी रहती.. कोन्फ्रन्स हॉल का एसी थोड़ा सा तेज था.. वातावरण में फैली ठंडक के कारण कविता की निप्पल सख्त होकर टॉप के कपड़ों में अपना आकार बना रही थी.. एक दो पुरुष तो कविता को देखते ही अपना लंड ऐडजस्ट करने लगे.. कुछ मर्द टॉइलेट जाने का बहाना बनाकर अपना लंड हिलाकर लौटे..
राजेश सर कोने में किसी के साथ फोन पर बात कर रहे थे.. उन्हें भी जाकर हाई बोलकर आई कविता.. फिर वो चलते चलते रेणुका और वैशाली के पास आकर खड़ी हो गई..
"हाय मैडम, हैप्पी बर्थडे.. ढेर सारी शुभकामनाएं और विशिज.. ईश्वर आपको लंबी उम्र दे"
"ओह शुक्रिया कविता.. वैसे तू आज कमाल लग रही है.. क्या गजब का बोल्ड ड्रेस है तेरा.. राजेश तुझे देखने के बाद आज मेरी हालत खराब कर देगा!!"
सब कुछ जानते हुए भी कविता ने पूछा "अरे ऐसी भी क्या बात है रेणुका?"
रेणुका: "अरे, तेरे इस गरमागरम डिस्प्ले को देखकर राजेश मुझे बोल रहा था की चल रूम में चलते है"
कविता: "हाँ तो दिक्कत क्या है!!! जाकर आइए.. हम सब आपका वेइट करेंगे.. " हँसते हुए उसने कहा
वैशाली: "नही रे नही.. ऐसा थोड़े ही चलता है!! हम यहाँ बाहर खड़े खड़े तड़पे और आप अंदर मजे करो.. मैं नही जाने दूँगी आपको" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा
रेणुका: "तो तू भी चल मेरे साथ अंदर.. मुझे कोई दिक्कत नही है.. राजेश हम दोनों को एक साथ बिस्तर में संभालने के लिए काफी है.. हा हा हा हा हा.. !!"
वैशाली: "नही रे बाबा.. मैं कबाब में हड्डी बनना नही चाहती.. आप कविता को ले जाइए अगर उसकी इच्छा हो तो.." तभी मौसम ने वैशाली को आवाज दी.. "मैं अभी आती हूँ.. एक्स्क्यूज़ मी" कहते हुए वैशाली मौसम और फाल्गुनी की ओर चल पड़ी
रेणुका ने आँख मारते हुए कविता से कहा "क्यों कविता.. क्या खयाल है? चलना है अंदर मेरे साथ?"
कविता: "ना बाबा ना.. ऑफकोर्स मेरी इच्छा तो है पर वो आपके पति के साथ नही.. मेरी पसंद के पुरुष के साथ"
रेणुका: "तो बोल न.. तेरी पसंद के साथी के साथ मजे करने हो तो मैं अभी कुछ मेनेज कर दूँगी.. कौन पसंद है तुझे बता मुझे.. पर राजेश को छोड़कर"
कविता: "मेरी पसंद तो तुम्हें पता है ही.. दरअसल मैं तुम से वही कहने आई थी.. माउंट आबू के इस रोमेन्टीक माहोल में मैं पिंटू के साथ थोड़ा वक्त बिताने की बहोत इच्छा हो रही है.. पर चांस ही नही मिलता.. !! क्या करू? तुम मेरी कुछ मदद करो ना प्लीज!!"
रेणुका सोचने लगी.. फिर उसने कहा "चिंता मत कर.. मैं कुछ करती हूँ.. मेरे बर्थडे के दिन कोई उदास हो, ऐसा कैसे हो सकता है !!"
कविता: "पर ध्यान रखना.. पीयूष को पता नही लगना चाहिए.. वरना लेने के देने पड़ जाएंगे"
रेणुका: "डॉन्ट वरी.. मैं जब तुझे फोन करू तब तू आ जाना.. " कविता को आश्वासन देते हुए उसने कहा
अपने प्रेमी को अकेले में मिलने को बेकरार कविता के दिल को ठंडक मिली.. "और हाँ.. वैशाली को भी कुछ मत बताना.." वैशाली को अपनी ओर आते देख कविता ने रेणुका से कहा
रेणुका: "ओके बेबी डन.. और कविता.. हमारी ऑफिस में कंप्युटर ऑपरेटर की नौकरी के लिए तेरा नाम तय है.. बोल कब से जॉइन करेगी?" जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ रेणुका ने कहा.. उसका कहने का मतलब साफ था.. अगर कविता पिंटू से अकेले मिलना चाहती हो तो उसे रेणुका की बात माननी होगी..
कविता: "मुझे एक बार पीयूष से इस बारे में बात करनी होगी.. बाकी मुझे आप की कंपनी में जॉब करने में कोई आपत्ति नही है"
रेणुका: "वो सब तू मुझ पर छोड़ दे.. पीयूष को मैं मना लूँगी.. " तब तक वैशाली उनके करीब आ चुकी थी और रेणुका का आखिरी वाक्य उसने सुन लिया था.. उस वाक्य का दूसरा अर्थ भी निकलता था जो वैशाली समझ गई.. पर फिलहाल वो कुछ नही बोली.. समय आने पर ही बोलने में विश्वास रखती थी वैशाली..
नौकरी की ऑफर के बारे में गंभीरता से सोच रही थी कविता.. अगर वो हाँ कर दे तो पिंटू के साथ रहने का मौका मिल जाएगा.. वो रोज उसे कम से कम आठ घंटों के लिए देख पाएगी.. मिल पाएगी.. बात कर पाएगी.. और कंपनी का मालिक और उनकी पत्नी के साथ अब घर जैसे संबंध बन चुके थे.. कविता के दिल में.. उसके स्तन के साइज़ के लड्डू फूटने लगे.. समस्या बस एक ही थी.. पीयूष और अपने सास ससुर से नौकरी करने के लिए इजाजत लेनी थी.. अगर वह नही माने तो उसका सपना एक पल में चूर हो जाने वाला था.. कविता सोच रही थी की इस समस्या का समाधान कैसे करे.. !!
जब भी कविता का दिमाग काम करना बंद करे तब उसे शीला भाभी की याद आ जाती थी.. शीला के पास सारी समस्याओं का हल मिल जाता था.. घर जाते ही शीला भाभी को इस के बारे में बताती हूँ.. वो कुछ न कुछ तरीका ढूंढ निकालेगी.. मन में गांठ मार ली कविता ने
सब धीरे धीरे कोन्फ्रन्स रूम में इकठ्ठा होने लगे थे.. मौसम और फाल्गुनी.. दोनों चिड़िया की तरह चहचहा रही थी.. सब का ध्यान बार बार उनकी ओर चला जाता था.. चंचल परवाने जैसी मौसम और शांत गंभीर फाल्गुनी.. दोनों दिखने में बेहद सुंदर और आकर्षक..
"लेडिज एंड जेन्टलमेन.. माउंट आबू की इन हसीन वादियों में मेरी प्रियतमा पत्नी के ३५वे जन्मदिन की पार्टी में.. मैं और रेणुका आप सब का स्वागत करते है.. " माइक पर बोल रहे राजेश की आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी.. सब ने तालियों से सराहा.. शराब के नशे में काफी लोग मस्त थे.. मुक्त और मस्त वातावरण था.. और इस वातावरण का असर मौसम और फाल्गुनी पर भी धीरे धीरे होता जा रहा था
रेणुका केक काटने ही वाली थी तब राजेश ने उसे एक मिनट के लिए रोक लिया.. और पीयूष को आवाज लगाई..
"यस सर.. " पीयूष राजेश के करीब आया.. राजेश ने पीयूष के कान में गिफ्ट के बारे में पूछा.. "वो तो मेरे कमरे में है" पीयूष ने कहा
"अरे भई.. तो लेकर आओ जल्दी.. " राजेश ने कहा.. पीयूष अपने कमरे की ओर भागा
तभी रेणुका ने पिंटू को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा.. पिंटू ने जवाब में "स्योर मैडम" कहा और वो भी हॉल के बाहर चला गया.. अब रेणुका ने कविता को बुलाया.. और सब सुन सके उस तरह कहा "अरे कविता.. मेरा पर्स रूम पर भूल आई हूँ.. जरा लेकर आएगी प्लीज.. टेबल पर ही पड़ा है"
"अभी लेकर आती हूँ" अपने बॉल उछालते हुए कविता रेणुका के कमरे की तरफ दौड़ी
जाते जाते कविता को याद आया की वह कमरे की चाबी लेना तो भूल ही गई थी.. पर तब तक वो कमरे तक पहुँच गई थी.. उसने देखा की कमरा तो पहले से ही खुला हुआ था.. दरवाजा खोलकर उसने प्रवेश किया.. बेग के अंदर कुछ ढूंढ रहे पिंटू की पीठ देखकर वह चोंक उठी.. तभी कविता के मोबाइल की रिंग बजी.. पिंटू ने घबराकर पीछे देखा और आश्चर्य से पूछा "अरे कविता? तुम यहाँ? क्या बात है?"
पिंटू को बोलने से रोकने के लिए कविता ने अपने होंठ पर उंगली रखते हुए इशारा किया और फोन रिसीव किया "हैलो.. !!"
"ओके मैडम" एक ही सेकंड में उसने फोन काट दिया
कविता ने दरवाजा अंदर से लॉक कर दिया और पिंटू को अपनी बाहों में भरकर.. रेणुका-राजेश के बिस्तर पर गिरा दिया
पिंटू घबरा गया "ये क्या कर रही है पगली??" उसने कविता को धक्का देकर अपने आप को उससे दूर किया
"अरे पिंटू मेरी जान.. रेणुका मैडम ने जान बूझकर हम दोनों को यहाँ भेजा है.. अभी उनका ही फोन था.. डरने की कोई बात नही है.. हम एकदम सेफ है यहाँ.. आई लव यू पिंटू" कहते हुए वह पिंटू से लिपट पड़ी..
उसी वक्त.. पूरे माउंट आबू में एक साथ लाइट चली गई.. कहीं किसी ट्रैन्स्फॉर्मर में एक जबरदस्त धमाके की आवाज सब ने सुनी.. अंधेरा होते ही पीयूष का हाथ कविता के पतले टॉप के अंदर घुस गया और वह उसके दसहरी आम का रस निकालने लगा.. कविता के अद्भुत कामुक स्तनों को वो मसलने लगा.. कविता का हाथ सीधा पीयूष के लंड पर पहुँच गया.. पेंट के ऊपर से लंड को मालते हुए उसने अपने लिपस्टिक लगे होंठ पीयूष के होंठों पर रख दिए..
कविता के बिना ब्रा वाले स्तनों को हाथ में पकड़ते ही पिंटू की आह निकल गई.. कविता ने तुरंत अपना टॉप ऊपर कर लिया और पिंटू का चेहरा अपने दोनों स्तनों पर दबा दिया.. दोनों एक दूसरे में ऐसे खो गए.. जैसे धरती पर वो दो आखिरी इंसान हो.. पिंटू से ज्यादा भूख कविता की थी इसलिए वह काफी आक्रामक थी.. पीयूष की अवहेलना से परेशान कविता अपने प्रेमी के आगोश में आते ही उत्तेजित हो गई.. उसका जिस्म किसी मर्द को चाहता था.. क्योंकि पिछले काफी दिनों से पीयूष ने उसे हाथ भी नही लगाया था.. ऊपर से माउंट आबू आने के बाद उसकी इच्छाएं और उछलने लगी थी.. पिछले दो घंटों में.. अनगिनत मर्दों की भूखी नज़रों को अपने स्तन पर पड़ती हुई महसूस कर वह तड़पने लगी थी..
पिंटू भी अपने पहले प्यार को पा कर खुश हो गया था.. कविता के स्तनों की गर्माहट का मज़ा लेते हुए वह उसकी जांघों को सहलाने लगा.. जैसे जैसे पिंटू का हाथ उसकी जांघों पर आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे कविता अपनी टांगें चौड़ी करते हुए अपना राजद्वार खोल रही थी..पिंटू के हाथ के स्पर्श से वह सिहरते हुए उसने अपनी आँखें बंद कर ली.. चिकनी जांघों को सहलाते हुए पिंटू को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे संगेमरमर पर हाथ फेर रहा हो.. कविता का सहकार भी ऐसा मिल रहा था की कुछ ही सेकंड में पिंटू का हाथ उसकी चूत तक पहुँच गया..
पता नही.. ऐसा कौनसा जादू होता है स्त्री की योनि में..जिसे देखते ही पुरुष बेकाबु होकर जानवर की तरह टूट पड़ता है.. कविता ने अब पेंट की अंदर हाथ डालकर पिंटू का लंड पकड़ लिया था..
"कितना सख्त हो गया है यार" कविता को उसके लंड की गर्मी अपनी हथेली पर महसूस हो रही थी
"तुझे इस तरह देखने के बाद.. किसी का भी सख्त हो जाए.. क्या लग रही है तू कविता.. आह्ह.. " कविता की छाती को चूम चाटकर मदहोश कर दिया उसे पिंटू ने ..
उत्तेजनावश पिंटू के लंड पर कविता के हाथों की पकड़ और सख्त हो गई.. अपने स्तनों को और सख्ती से दबा दिया पिंटू के मुंह पर..
"अब मुझसे रहा नहीं जाता पिंटू.. कुछ कर ना जल्दी.. "
"ओह्ह कविता.. मेरी जान.. " कहते हुए पिंटू ने अपने पेंट की चैन खोलकर लंड बाहर निकाल लिया.. कविता बेचैन होकर पिंटू के लंड के टोपे को चूसने लगी.. कविता की इस हरकत से पिंटू भी अपना आपा खो बैठा.. कभी वो कविता की नंगी पीठ को सहलाता.. कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरता.. तो कभी उसके स्तन को दबाता
"जल्दी करना होगा कविता.. सब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे.. तू जल्दी उलटी लेट जा.. हमारी फेवरिट पोजीशन में करेंगे.. " पिंटू ने कहा
"नही यार.. मेरी बिना चाटे मैं तुझे छोड़ने वाली नही हूँ आज.. कितना वक्त हो गया.. आखिरी बार जब मेरे घर के पीछे की अंधेरी गली में मिले थे तब तूने चाटी थी मेरी.. वो रात मुझे बहोत याद आती है.. तेरी जीभ जब अंदर गई थी तब.. आह्ह इतना मज़ा आया था की क्या बताऊ.. प्लीज यार.. आज अपनी जीभ अंदर तक घुसेड़कर चाट दे एक बार"
"जो भी करवाना है जरा जल्दी कर यार" पिंटू ने कहा..
कविता ने तुरंत अपनी छोटी सी शॉर्ट्स और पेन्टी एक साथ उतार फेंकी.. पिंटू कविता की जांघों को चाटने लगा.. वो भी गरम हो चुका था.. कविता ने उसका सर पकड़ा और उसके मुंह को अपनी चिपचिपी बुर पर लगा दिया.. पिंटू की जीभ का अपनी चूत पर स्पर्श प्राप्त होते ही कविता स्वर्ग में पहुँच गई.. पिंटू के कामुक चुंबनों का असर इतनी तीव्रता से हुआ की एक ही पल में उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. उसके स्तन सख्त हो गए और निप्पल बंदूक की गोली जैसी टाइट हो गई.. पिंटू जैसे जैसे चाटता गया.. कविता की सिसकियों का वॉल्यूम बढ़ता गया.. अपने पसंदीदा पात्र के साथ संभोग करने से बेहतर मज़ा ओर कोई नही है..
पिंटू की जीभ ने कविता को उसके सारे गम भुला दिए.. कमर को उचक उचक कर वह अपनी चूत को पिंटू के मुंह से घिस रही थी.. कराहते हुए कविता का जिस्म एकदम सख्त और सीधा हो गया.. वह थरथराने लगी.. और एक छोटी सी चीख के साथ पिंटू के मुंह में झड़ गई.. स्खलित होते ही कविता का जिस्म एकदम हल्का हो गया.. दिमाग शांत हो गया.. मन तृप्त हो गया.. अपना काम खतम होते ही उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ..
अब लाइट भी आ चुकी थी
"अब हमे चलना चाहिए पिंटू.. बहोत देर हो गई" कविता ने कहा
"अच्छा?? तो फिर इस सख्त लोडे का क्या करू? ये अब ढीला होने नही वाला.. अब ईसे वापिस पेंट में डालना भी मुमकिन नही है.. क्या करू? तू बता" पिंटू ने थोड़े गुस्से से कहा..
कविता उठकर पिंटू के लंड को तेज गति से हिलाने लग गई.. पिंटू कविता के बॉल को पागलों की तरह दबाने लगा.. पिंटू को बिस्तर पर सुलाते हुए कविता उसके ऊपर चढ़ बैठी.. और अपने हाथ को नीचे ले गई.. पिंटू के कड़े लंड को अपनी चूत के सेंटर पर रखकर उसने दबाया.. पर लंड अंदर गया नही.. कविता ने अपनी हथेली पर थोड़ा सा थूक लेकर नीचे लंड पर लगाया.. और ऊपर वज़न देने लगी..
"उफ्फ़ पिंटू.. तेरा ज्यादा मोटा हो गया है क्या.. !! अंदर जा ही नही रहा.. दर्द हो रहा है मुझे.. ऊईई माँ.. !!" धीरे धीरे कविता की चूत लंड निगलती रही.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए कविता ऊपर नीचे होते हुए धक्के लगाने लगी..
अपना ऑर्गजम हो जाने के बावजूद.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए.. अपनी कामुक अदाओं से वह पिंटू को रिझाने लगी.. कविता की चूत के एकदम टाइट वर्टिकल होंठों की पकड़ इतनी मजबूत थी की पिंटू नीचे लैटे लैटे स्वर्ग का आनंद ले रहा था.. ऊपर नीचे करते हुए लय बनाकर कविता अपने स्तनों को उछाल रही थी.. अपनी चूत की गहराई में अंदर तक उसे लंड की गर्माहट का एहसास हो रहा था.. गति बढ़ाते हुए कविता चाहती थी पिंटू जल्दी से जल्दी झड़ जाए..
अपने स्तनों पर पिंटू की टाइट पकड़ महसूस करते हुए कविता को पता चल गया की पिंटू अब झड़ने के करीब था.. उसने अपनी उछलने की गति दोगुनी कर दी..
"ओह्ह गॉड.. फक मी.. लव यू मेरी जान.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे.. कितनी टाइट है तेरी चूत.. पीयूष डालता भी है या नही अंदर.. ओह्ह ओह!!" कविता की कमर पकड़कर उसे धक्के लगाने में मदद कर रहा था पिंटू
लंड के घर्षण से अभी अभी स्खलित हुई कविता फिर से गरम होने लगी.. अपनी चूत की मांसपेशियों को उसने इतना टाइट कर दिया जैसे पिंटू के लंड का गला घोंट देना चाहती हो.. लंड और चूत की लड़ाई में हम मानते है की आखिर में लंड जीता या चूत जीती.. पर हकीकत में चूत कभी हारती नही.. हार हमेशा लंड की ही होती है.. कभी चूत से बाहर निकले लंड के हाल देखें है!!! कोल्हू से निकले हुए गन्ने जैसी हालत होती है लंड की..
लंड पर दबाव बढ़ते ही पिंटू के लंड ने पिचकारी मार दी.. दोनों प्रेमी एक दूसरे से लिपट गए..
कुछ सेकंडों तक लिपटे रहने के बाद रीलैक्स होकर पिंटू के होंठों को चूमते हुए कविता ने कहा.. "अब मुझे जाना होगा पिंटू.. जाने का मन तो नही है पर क्या करें.. !! काश हम दोनों को साथ में एक रात गुजारने का मौका मिल जाएँ "
"फिलहाल तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन नही है.. तू अब कुंवारी नही है.. पीयूष की पत्नी है तू.. चल अब तू जल्दी जा.. मैं थोड़ी देर में आता हूँ वरना किसी को शक हो जाएगा"
"नही.. तू पहले निकल.. मैं यह बेड की चादर और मेरा मेकअप ठीक करके आती हूँ" पिंटू का चेहरा उसने अपने रुमाल से पोंछ कर उसके बाल ठीक कर दिए और उसे एक आखिर किस देकर जाने दिया.. उसके जाने के बाद कविता ने आईने में देखकर अपना मेकअप ठीक किया.. लिपस्टिक फिर से लगाई.. ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी रेणुका की डार्क ब्राउन शेड की लिपस्टिक होंठों पर लगाते हुए उसे पिंटू के सुपाड़े की याद आ गई.. कविता हंस पड़ी.. सोचने लगी.. दुनिया की सर्वश्रेष्ठ लिपस्टिक तो लंड ही है.. उससे होंठ गीले करने में जो मज़ा है वो बेजान लिपस्टिक में कहाँ!!! शायद इसी कारण सारी कंपनियां लिपस्टिक को लंड के आकार की ही बनाते है..
कविता ने फटाफट अपने बाल ठीक कीये.. बेड की चादर की सिलवटें दूर की.. और सब कुछ एक आखिरी बार चेक करते हुए रूम से बाहर निकली। हॉल में पहुंचते ही उसने देखा की सब पार्टी इन्जॉय कर रहे थे.. कविता के उछलते स्तनों की गैरमौजूदगी में सारा वातावरण शांत सा था.. पर जैसे आंधी आते ही सब अस्तव्यस्त हो जाता है.. वैसे ही कविता की पायलों की झंकार सुनते ही सब अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसे देखने लगे.. अपने हाथ के ग्लास में पड़ी दारू को भूलकर कविता के जोबन को पीने लगे.. मर्द तो मर्द.. सारी औरतें भी कविता के स्तन युग्म को देखती ही रह गई.. सब कविता को देख रहे थे.. एक पीयूष को छोड़कर.. पीयूष नाम का भँवरा.. मौसम नाम के ताजे खिले फूल का रस चूसने के लिए यहाँ वहाँ मंडरा रहा था..
Thanks Ek number bhaiBehtreen update
Thanks sunoanuj bhaiSuperb update ekdam jhakaash….