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इसने तो पीयूष की प्यास और बढ़ा दी
बहुत ही सुंदर लाजवाब और जबरदस्त अपडेट हैं भाई मजा आ गयापौने आठ बज चुके थे.. और आठ बजे तो सबको डाइनिंग रूम में इकठ्ठा होना था.. सब से पहले मौसम और फाल्गुनी पहुँच गए.. मौसम के चेहरे पर उत्तेजना का नशा अब भी दिख रहा था.. एक के बाद एक.. सब समय पर डाइनिंग हॉल में आने लगे..कविता और पीयूष भी अलग अलग आए थे.. कविता का ड्रेसिंग देखकर सबकी सांस गले में ही अटक गई..
सबसे पहले रेणुका ने कविता की तारीफ की "Wow..!! Kavita, you are looking absolutely gorgeous..!!कितनी जवान और खूबसूरत लग रही है तू इस ड्रेस में.. कौन कहेगा की तू शादी शुदा है !! अठारह से ऊपर एक साल की नही लग रही तू.. " उसकी कमर पर चिमटी काटते हुए उसने कहा .. अपनी तारीफ सुनकर कविता खुश हो गई
मौसम और फाल्गुनी भी कविता का ड्रेसिंग देखकर चकित रह गए "दीदी, गजब लग रही हो आप इस ड्रेस में.. एकदम कयामत!!" फाल्गुनी ने शरमाते हुए कहा "दीदी आप तो नोरा फतेही से भी ज्यादा हॉट लग रही हो!!" फिर नजदीक जाकर फाल्गुनी ने कविता के कान में कहा "अरे दीदी, आपने ब्रा क्यों नही पहनी?? आप जब चलती हो तो सब उछलता है"
फाल्गुनी की बात सुनकर कविता ने हँसकर उसे प्यार से गाल पर हल्की चपत लगाई और कहा "उछलने दे.. उछलने से क्या होता है.. !! बाहर तो नही निकल रहे है ना.. !!" कहते हुए वह बिंदास पीयूष के पास जाकर खड़ी हो गई.. पीयूष वैशाली के साथ बातों में उलझा हुआ था.. कविता को देखकर वैशाली के होश उड़ गए.. पीयूष ने एक नजर कविता की तरफ देखा.. और उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कविता ने ऐसे कपड़े पहनकर खानदान की इज्जत की माँ चोद दी हो..
गुस्से में पीयूष ने कहा "इससे अच्छा तो तू बिना कपड़ों के ही चली आती.. !!! लोगों को दिखाने का शौक हो तो पूरा ही दिखा दे एक बार में .. !! इतना भी छुपाकर क्यों रखा? मेरी इज्जत को डुबोने बैठी है तू.. !!"
"कोई कपड़ों से अपनी इज्जत की धज्जियां उड़ाता है तो कोई अपने बर्ताव से.. !!" कविता ने बेफिक्री से जवाब दिया..
लंबे डाइनिंग टेबल पर सब बैठने लगे.. कविता के साथ बैठने के बजाए पीयूष, पिंटू के साथ जाकर बैठा.. यह बात राजेश ने नोटिस की.. राजेश भी कविता के पिंक टॉप में से बिना ब्रा की दिख रही गोलाइयों को ताड़ रहा था.. सिर्फ राजेश ही नही.. हॉल में बैठे सभी मर्दों की नजर बार बार कविता पर चली जाती थी.. गुलाबी रंग के स्लीवलेस पतले टॉप के अंदर परफेक्ट साइज़ के स्तनों ने हाहाकार मचा दिया था..
खाना परोसा जाने लगा.. एक के बाद एक नई नई डिश आने लगी.. कविता तीरछी नज़रों से पीयूष का निरीक्षण कर रही थी.. की वो कितनी बार वैशाली की तरफ देखता है..
सब के सामने राजेश ने पीयूष से कहा "पीयूष, तेरे जितना मूर्ख आदमी इस पार्टी में और कोई नही है"
"क्यों? क्या हुआ सर?"
राजेश: "अरे भई, इतनी सुंदर.. मोम की पुतली जैसी पत्नी को छोड़कर तू पिंटू के साथ बैठ गया.. !!! ये तो अच्छा हुआ की कविता के बगल में मौसम बैठी है.. वरना उसके पास बैठने वालों की लाइन लग जाती.. "
कविता गर्व से पीयूष की ओर देख रही थी.. पीयूष नीचे देखने लगा.. मन ही मन वो कविता को.. इस स्थिति के लिए कोस रहा था..
राजेश: "जाओ पीयूष.. अपनी पत्नी के पास जाकर बैठो"
पीयूष: "नहीं.. मैं यहीं ठीक हूँ.. " राजेश की राय को ठुकराते हुए उसने कहा
"कोई बात नही सर.. अगर वो मेरे पास आकर नही बैठता.. तो मैं ही उसके पास चली जाती हूँ" कहते हुए कविता खड़ी हुई.. हाई हील के सैन्डल पहनकर अपने स्तनों को मटकाते हुए वो पिंटू और पीयूष के पास आई और बोली "पिंटू सर.. आप प्लीज जरा बगल वाली कुर्सी में शिफ्ट हो जाएंगे.. ??
पिंटू की तो जैसे लॉटरी ही लग गई.. "स्योर मैडम.. " कहते हुए एक कुर्सी छोड़कर बैठ गया.. और कविता, पीयूष और पिंटू के बीच में बैठ गई.. कविता के मन की मुराद भी पूरी हो गई.. एक तरफ पति था और दूसरी तरफ उसका प्रेमी.. बीच में कविता.. बैठते वक्त उसने पीयूष के पैरों पर जान बूझकर लात मारी और सब सुन सके ऐसी आवाज में कहा "हाई पीयूष.. कैसे हो? "जैसे वह किसी अनजान से बात कर रही हो.. हद तो तब हुई जब कविता ने बाउल से सब से पहले पिंटू की थाली में परोसा और फिर बची कूची सब्जी पीयूष के प्लेट में डाली.. पीयूष की इज्जत का कचरा कर दिया कविता ने.. डाइनिंग टेबल पर बैठे सब को यकीन हो गया की कविता और पीयूष के बीच कुछ अनबन थी..
मौसम को कविता का पीयूष के प्रति ये कठोर बर्ताव बिल्कुल अच्छा नही लगा.. पीयूष के लिए उसे बुरा लग रहा था.. पर वो कुछ कर नही सकती थी..इसलिए उसने अपना ध्यान खाना खाने पर केंद्रित किया.. सिल्क की भारी साड़ी में सजी हुई रेणुका खाना खाते हुए बार बार पीयूष की ओर देख रही थी और सोच रही थी की आखिर कविता ऐसा क्यों कर रही है ?? कविता ने खुद ही उसे अपने और पिंटू के प्रेम प्रकरण के बारे में बताया था.. अपने प्रेमी के संग डिनर कर रही कविता को देखकर रेणुका को भी पीयूष के साथ बैठने का दिल करने लगा था..
काफी देर तक डिनर चलता रहा.. उसके बाद राजेश अपने स्थान से उठा और सबको संबोधित करते हुए कहा
राजेश: "सबका डिनर हो चुका है.. हम सब एक घंटे के लिए रीलैक्स होंगे और फिर ग्रांड पार्टी के लिए दस बजे यहीं मिलेंगे.. आप सभी के रेणुका मैडम की बर्थडे मनाने.. !!" सब ने तालियों से इस बात का स्वागत किया.. धीरे धीरे सब खड़े होकर अपने कमरे की ओर जाने लगे.. मौसम और फाल्गुनी कोने में बैठकर बातें कर रही थी.. रेणुका और वैशाली.. पीयूष की दोनों प्रेमिकाएं आपस में कुछ गुफ्तगू कर रही थी.. पीयूष मौसम के खयालों में खोया हुआ था.. कविता और पिंटू बातें कर रहे थे.. राजेश ने जाते जाते कविता के पिंक टॉप से दिख रही गोलाइयों पर एक कामुक नजर डाली..
संबंधों की जटिलता बड़ी ही संकीर्ण होती है.. माउंट आबू की एक वैभवशाली आलीशान होटल के तीसरे माले पर बने विशाल डाइनिंग हॉल में खड़े पच्चीस लोग अपने दिल और दिमाग से सोच रहे थे.. वैशाली को अपने पति संजय की याद नही आ रही थी और पीयूष कविता को भूल चुका था.. सब को दूसरे की थाली में घी ज्यादा नजर आ रहा था.. कविता पिंटू में अपने जीवन का सुख ढूंढ रही थी.. और रेणुका पीयूष में.. ऐसा क्यों होता है की अपने सुख के लिए इंसान हमेशा दूसरों पर ही निर्भर होता है?? क्या हम अकेले ही सुखी नही हो सकते??.. जवाब है.. नही हो सकते.. हकीकत में इंसान अकेले रहने के लिए बना ही नही है.. उसका सुख और दुख.. दूसरे इंसानों की बदौलत ही होता है.. यही सब से बड़ी मुसीबत है..
अपनी तरफ देख रहे राजेश सर की ओर कविता ने पहली बार ध्यान से देखा.. राजेश की आँखों की हवस को उसने परख लिया.. राजेश रेणुका से बात करते हुए बार बार कविता की छातियों की ओर देख रहा था.. लेकिन कविता को इस बात का जरा भी बुरा नही लग रहा था.. उल्टा वो तो इस बात से खुश हो रही थी
पीयूष मौसम को पटाने और चोदने की तरकीबें सोच रहा था.. पर फाल्गुनी हमेशा मौसम के साथ ही होती थी.. ऐसी सूरत में मौसम से अकेले मिल पाना मुमकिन नही था.. अनजाने में ही फाल्गुनी कबाब में हड्डी बनी हुई थी.. शायद इसीलिए यह अंग्रेजी कहावत बनी होगी Two is a company but three is a crowd...
डेढ़ घंटे पहले पीयूष के साथ शॉर्ट इनिंग्स खेलकर फ्रेश हो चुकी वैशाली अकेले बैठी थी फिर भी उसके चेहरे पर अनोखा नूर था.. चुदाई की तृप्तता की चमक थी.. पीयूष की किस्मत बड़ी ही तगड़ी थी.. उसके पीछे वैशाली, रेणुका और मौसम.. तीन तीन चूतें पड़ी हुई थी.. और कविता पिंटू के पीछे पड़ी हुई थी.. कविता ये सोच रही थी की पीयूष के साथ ऐसा कब तक चलेगा? छोटी सी बात का उसने बतंगड बना दिया..?? क्या कभी समझौता होगा? पिंटू की तरफ देखकर उसने एक भारी सांस ली.. वो चलकर पिंटू के पास आई और बोली "क्यों अकेला खड़ा है? क्या सोच रहा है?"
"अकेला हूँ इसलिए अकेला खड़ा हूँ.. सब कपल में हैं और में सिंगल हूँ.. बिना कंपनी के बोर हो रहा हूँ.. और तुझे तो पता है.. मुझे भीड़भाड़ ज्यादा पसंद नही है.. वैसे इस ड्रेस में तू ग़ज़ब लग रही है कविता.. यार.. ऐसे दिखा दिखाकर क्यों तड़पा रही है!! मेरा हाल उस भक्त जैसा है जो भगवान को चढ़ाएं प्रसाद को सिर्फ देख सकता है.. चख नही सकता.. " पीयूष ने कहा
"तो चख ले ना.. रोक कौन रहा है तुझे.. और ये मंदिर का प्रसाद नही है.. तेरी थाली में परोसे जाने के लिए तैयार भोजन है" कविता ने झुककर अपने स्तनों के बीच की खाई दिखाकर पिंटू को उकसाया की इस खाई में कूदकर अपनी जान दे दें.. "पिंटू, तुझे मेरे स्तन बहोत पसंद है ना.. इसीलिए तो मैंने ऐसे कपड़े पहने है.. और खास तेरा पसंदीदा पिंक टॉप भी इसीलिए पहना आज.. आई लव यू पिंटू.. " पिंटू के कान में फुसफुसाई कविता
"आई लव यू टू कवि.. सच कहा तूने तेरे बबले मुझे बहोत पसंद है.. देखकर ही उन्हे मसलने का मन कर रहा है मुझे.. पिछली बार जब हम मिले थे तब याद है तुझे.. कितने दबाए थे मैंने!!!"
"हाँ यार.. मुझे भी अपनी आखिरी मीटिंग बहोत याद आ रही है.. यार पिंटू.. ऐसी जगह पर हम दोनों अकेले आए तो कितना मज़ा आएगा.. हैं ना.. !!" कविता खुली आँखों से सपना देख रही थी..
प्रेमिओ की दुनिया सपने में ही जन्म लेती है और सपनों में ही बिखर जाती है..
"कविता, हम दोनों नदी के दो किनारे है.. जो साथ साथ हजारों किलोमीटर तक सफर करते है.. सदियों तक साथ रहते है.. पर कभी एक नही हो सकते.. तू तेरे ससुराल में पीयूष के साथ खुश हो तो मैं तुझे देखकर ही खुश हो जाऊंगा.. मैं तो बस दूर बैठे तुझे देखता रहूँगा.. और तेरा ध्यान रखूँगा.. मरते दम तक.. !!" पिंटू भावुक हो गया
"उदास मत हो यार.. मैं शीला भाभी को बोलूँगी तो वो हम दोनों का यहाँ अकेले आने का कुछ न कुछ सेटिंग जरूर कर देगी.. शीला भाभी पर मुझे पूरा भरोसा है.. वो कोई तरकीब लगाकर हमारी ये ख्वाहिश पूरी करेगी.. शीला भाभी कुछ भी कर सकती है.. तुझे याद है न पिंटू.. कितनी चालाकी से उन्होंने उस दिन मूवी देखते वक्त हम दोनों का सेटिंग करवाया था??" कविता ने कहा
"हाँ कविता.. वो भी पीयूष की मौजूदगी में.. " उस यादगार लम्हे को याद करते हुए पिंटू खुश हो गया.. उसका उदास चेहरा खिल उठा..
अपने प्रेमी को खुश देखकर कविता धीमे से बोली "देख पिंटू.. आशा अमर है.. निराश मत हो.. अभी हम आबू में ही है.. तू पीयूष से मिलकर बात कर.. वो कहीं बाहर जाने वाला हो.. तो हम मिल सकते है.. मुझसे तो वो बात करता नही है.. पर मैं भी अपनी तरफ से कोशिश करती हूँ.. "
"लेकिन में पीयूष को ऐसा कैसे पूछूँ की वो कहाँ जाने वाला है और क्या करने वाला है?? उसे शक नही होगा?" पिंटू ने कहा
"देख पिंटू.. तुझे अगर मेरे बॉल दबाने है तो जोखिम उठाना पड़ेगा.. " कविता ने पिंटू के अंदर के मर्द को जगाने की कोशिश की
"ठीक है.. मैं कुछ करता हूँ.. " पिंटू वहाँ से चला गया..
कविता भी चलते चलते राजेश सर और रेणुका मैडम के पास गई..
मौसम से बात कर रहे पीयूष ने कहा "मौसम, देख तो.. कविता कैसे अपनी ब्रेस्ट सब को दिखाती फिर रही है??"
मौसम: "सब को दिखाने के लिए नही जीजू.. आपको दिखाने के लिए दीदी ने ऐसा ड्रेस पहना है.. नजदीक जाकर देखिए तो सही!!"
पीयूष: "मुझे उस में कुछ नही देखना.. मुझे जो देखना है वो तो मैं देख ही रहा हूँ.. " मौसम के उन्नत स्तनों की तरफ देखते हुए पीयूष बोला.. मौसम शरमाकर नीचे देखने लगी..
पीयूष: "जब तू शरमाती है तब और भी सेक्सी लगती है "
फाल्गुनी: "मर्दों को तो हर स्त्री या लड़की सेक्सी ही लगती है.. " फाल्गुनी ने पीयूष की पतंग हाथ में ही काट दी..
पीयूष: "ऐसा नही है फाल्गुनी.. सब का देखने का नजरिया अलग अलग लगता है.. पर हाँ.. वैसे तू भी मुझे बड़ी सेक्सी लगती है" पीयूष ने फाल्गुनी को भी दाने डाले
"जीजू, आपको मैं सेक्सी लगती हूँ या मौसम?" फाल्गुनी ने पूछा
"मुझे तो दोनों सेक्सी लगती हो" पीयूष ने कहा
मौसम: "ज्यादा सेक्सी कौन लगता है?" कठिन सवाल था पीयूष के लिए.. पीयूष उलझ गया
"मुझे तो दोनों सेक्सी लगती हो.. ज्यादा कम का मुझे पता नही है.. आप दोनों ऐसे सवाल करके मुझे कन्फ्यूज़ मत करो.. फाल्गुनी, तू मेरे साथ डेट पर चलेगी?" पीयूष ने सीधे सीधे पूछ लिया..
पीयूष के इस अचानक सवाल से एक पल के लिए तो स्तब्ध रह गई फाल्गुनी.. "आप पागल हो गए हो क्या, जीजू? मैं आपके साथ डेट पर गई तो कविता दीदी जान से मार देगी मुझे.. कितना प्यार करती है वो आपसे.. पता है!!"
फाल्गुनी ने अनजाने में कहे इस वाक्य ने मौसम के अंदर से हिला कर रख दिया.. कांप उठी मौसम.. मन ही मन वो सोच रही थी की ऐसा क्या कारण था जो उसे पीयूष की ओर खींचा जा रहा था?? मौसम के चेहरे का नूर उड़ गया.. अकथ्य पीड़ा से उसका मुख मुरझा गया.. कहीं उसके इस आकर्षण का पता कविता दीदी को चल गया तो क्या होगा.. इस बात की कल्पना करने से भी डर रही थी मौसम.. उसने निश्चय किया.. कुछ भी हो जाए.. अब जीजू से ज्यादा क्लोज नही होना है.. अपनी पसंदीदा व्यक्ति से दूर भागने की कोशिश करनी थी उसे.. पर प्रेम और आकर्षण ऐसी चीज है जो कभी किसी को चैन से जीने ही नही देती
पीयूष: "अरे, मैं तो मज़ाक कर रहा था फाल्गुनी.. चलो मैं चलता हूँ अपने दोस्तों के पास.. बाद में पार्टी में मिलेंगे" कहते हुए पीयूष ने मौसम की पीठ को सहलाया और चल दिया
अब मौसम और फाल्गुनी अकेले थे.. फाल्गुनी मौसम को चिढ़ने लगी
"मौसम, देख न.. दीदी ने आज कैसी ड्रेस पहनी है.. कितनी मस्त लग रही है वो!! मैं तो कहती हूँ तू भी ऐसा ड्रेस ट्राय कर एक बार"
मौसम: "क्या तू भी.. मैं ऐसा ड्रेस पहनूँगी तो सब टूट पड़ेंगे मेरे ऊपर.. रेप हो जाएगा मेरा!!"
फाल्गुनी: "बकवास मत कर.. ऐसे कोई कैसे रेप कर देगा.. !! पर हाँ.. कविता दीदी का ड्रेस कुछ ज्यादा ही एक्सपोज कर रहा है.. शायद जीजू को भी ये बात पसंद नही आई"
मौसम: "हाँ थोड़ा बोल्ड तो जरूर है.. पर दीदी बेचारी घर पर ऐसा ड्रेस पहन नही सकती.. ऐसे मौकों पर ही ट्राय कर सकती है.. लेकिन तेरे बात से मैं सहमत हूँ.. ड्रेस में से कुछ ज्यादा ही नजर आ रहा है.. फाल्गुनी, तूने एक बात नोटिस की? राजेश सर बार बार दीदी की छाती को ही देख रहे थे.. उनकी पत्नी बगल में खड़ी थी फिर भी वह देखते ही जा रहे थे.. उनको शर्म नही आती होगी ऐसा देखने में ?? अपनी पत्नी की मौजूदगी में कोई कैसे किसी ओर को गंदी नजर से देख सकता है!!"
फाल्गुनी: "सही बात है तेरी.. इन सारे मर्दों को बस एक ही चीज में इन्टरेस्ट होता है"
बहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजना से भरपूर कामोत्तेजक अपडेट है भाई मजा आ गयापीयूष अपने कमरे में आया और कपड़े बदलकर वापस ऊपर कान्फ्रन्स रूम में पहुँच गया.. सब लोगों अलग अलग तीन-चार के ग्रुप में खड़े खड़े गप्पे लड़ा रहे थे.. हॉल में शराब, सिगरेट और महंगे परफ्यूम के मिश्रण की गंध फैली हुई थी..
गुलाबी स्लीवलेस टॉप में अपनी तंदूरस्त जवानी को उछालते हुए कविता बातें कीये जा रही थी.. और सब का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी.. वो बार बार अलग ग्रुप में जाकर बातें कर रही थी.. अनजाने लोगों से भी हाई-हैलो कर रही थी.. वो जिस ग्रुप की ओर जाती उस ग्रुप के सारे मर्द उसे आते देख चुप हो जाते.. बस उसकी उन्नत छातियों को ताड़ते रहते.. सागर की लहरों की तरह उछल रहे उसके स्तनों की गोलाई, पतले से टॉप में इतनी आसानी से नजर आ रही थी की सब की नजर वहीं चिपकी रहती.. कोन्फ्रन्स हॉल का एसी थोड़ा सा तेज था.. वातावरण में फैली ठंडक के कारण कविता की निप्पल सख्त होकर टॉप के कपड़ों में अपना आकार बना रही थी.. एक दो पुरुष तो कविता को देखते ही अपना लंड ऐडजस्ट करने लगे.. कुछ मर्द टॉइलेट जाने का बहाना बनाकर अपना लंड हिलाकर लौटे..
राजेश सर कोने में किसी के साथ फोन पर बात कर रहे थे.. उन्हें भी जाकर हाई बोलकर आई कविता.. फिर वो चलते चलते रेणुका और वैशाली के पास आकर खड़ी हो गई..
"हाय मैडम, हैप्पी बर्थडे.. ढेर सारी शुभकामनाएं और विशिज.. ईश्वर आपको लंबी उम्र दे"
"ओह शुक्रिया कविता.. वैसे तू आज कमाल लग रही है.. क्या गजब का बोल्ड ड्रेस है तेरा.. राजेश तुझे देखने के बाद आज मेरी हालत खराब कर देगा!!"
सब कुछ जानते हुए भी कविता ने पूछा "अरे ऐसी भी क्या बात है रेणुका?"
रेणुका: "अरे, तेरे इस गरमागरम डिस्प्ले को देखकर राजेश मुझे बोल रहा था की चल रूम में चलते है"
कविता: "हाँ तो दिक्कत क्या है!!! जाकर आइए.. हम सब आपका वेइट करेंगे.. " हँसते हुए उसने कहा
वैशाली: "नही रे नही.. ऐसा थोड़े ही चलता है!! हम यहाँ बाहर खड़े खड़े तड़पे और आप अंदर मजे करो.. मैं नही जाने दूँगी आपको" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा
रेणुका: "तो तू भी चल मेरे साथ अंदर.. मुझे कोई दिक्कत नही है.. राजेश हम दोनों को एक साथ बिस्तर में संभालने के लिए काफी है.. हा हा हा हा हा.. !!"
वैशाली: "नही रे बाबा.. मैं कबाब में हड्डी बनना नही चाहती.. आप कविता को ले जाइए अगर उसकी इच्छा हो तो.." तभी मौसम ने वैशाली को आवाज दी.. "मैं अभी आती हूँ.. एक्स्क्यूज़ मी" कहते हुए वैशाली मौसम और फाल्गुनी की ओर चल पड़ी
रेणुका ने आँख मारते हुए कविता से कहा "क्यों कविता.. क्या खयाल है? चलना है अंदर मेरे साथ?"
कविता: "ना बाबा ना.. ऑफकोर्स मेरी इच्छा तो है पर वो आपके पति के साथ नही.. मेरी पसंद के पुरुष के साथ"
रेणुका: "तो बोल न.. तेरी पसंद के साथी के साथ मजे करने हो तो मैं अभी कुछ मेनेज कर दूँगी.. कौन पसंद है तुझे बता मुझे.. पर राजेश को छोड़कर"
कविता: "मेरी पसंद तो तुम्हें पता है ही.. दरअसल मैं तुम से वही कहने आई थी.. माउंट आबू के इस रोमेन्टीक माहोल में मैं पिंटू के साथ थोड़ा वक्त बिताने की बहोत इच्छा हो रही है.. पर चांस ही नही मिलता.. !! क्या करू? तुम मेरी कुछ मदद करो ना प्लीज!!"
रेणुका सोचने लगी.. फिर उसने कहा "चिंता मत कर.. मैं कुछ करती हूँ.. मेरे बर्थडे के दिन कोई उदास हो, ऐसा कैसे हो सकता है !!"
कविता: "पर ध्यान रखना.. पीयूष को पता नही लगना चाहिए.. वरना लेने के देने पड़ जाएंगे"
रेणुका: "डॉन्ट वरी.. मैं जब तुझे फोन करू तब तू आ जाना.. " कविता को आश्वासन देते हुए उसने कहा
अपने प्रेमी को अकेले में मिलने को बेकरार कविता के दिल को ठंडक मिली.. "और हाँ.. वैशाली को भी कुछ मत बताना.." वैशाली को अपनी ओर आते देख कविता ने रेणुका से कहा
रेणुका: "ओके बेबी डन.. और कविता.. हमारी ऑफिस में कंप्युटर ऑपरेटर की नौकरी के लिए तेरा नाम तय है.. बोल कब से जॉइन करेगी?" जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ रेणुका ने कहा.. उसका कहने का मतलब साफ था.. अगर कविता पिंटू से अकेले मिलना चाहती हो तो उसे रेणुका की बात माननी होगी..
कविता: "मुझे एक बार पीयूष से इस बारे में बात करनी होगी.. बाकी मुझे आप की कंपनी में जॉब करने में कोई आपत्ति नही है"
रेणुका: "वो सब तू मुझ पर छोड़ दे.. पीयूष को मैं मना लूँगी.. " तब तक वैशाली उनके करीब आ चुकी थी और रेणुका का आखिरी वाक्य उसने सुन लिया था.. उस वाक्य का दूसरा अर्थ भी निकलता था जो वैशाली समझ गई.. पर फिलहाल वो कुछ नही बोली.. समय आने पर ही बोलने में विश्वास रखती थी वैशाली..
नौकरी की ऑफर के बारे में गंभीरता से सोच रही थी कविता.. अगर वो हाँ कर दे तो पिंटू के साथ रहने का मौका मिल जाएगा.. वो रोज उसे कम से कम आठ घंटों के लिए देख पाएगी.. मिल पाएगी.. बात कर पाएगी.. और कंपनी का मालिक और उनकी पत्नी के साथ अब घर जैसे संबंध बन चुके थे.. कविता के दिल में.. उसके स्तन के साइज़ के लड्डू फूटने लगे.. समस्या बस एक ही थी.. पीयूष और अपने सास ससुर से नौकरी करने के लिए इजाजत लेनी थी.. अगर वह नही माने तो उसका सपना एक पल में चूर हो जाने वाला था.. कविता सोच रही थी की इस समस्या का समाधान कैसे करे.. !!
जब भी कविता का दिमाग काम करना बंद करे तब उसे शीला भाभी की याद आ जाती थी.. शीला के पास सारी समस्याओं का हल मिल जाता था.. घर जाते ही शीला भाभी को इस के बारे में बताती हूँ.. वो कुछ न कुछ तरीका ढूंढ निकालेगी.. मन में गांठ मार ली कविता ने
सब धीरे धीरे कोन्फ्रन्स रूम में इकठ्ठा होने लगे थे.. मौसम और फाल्गुनी.. दोनों चिड़िया की तरह चहचहा रही थी.. सब का ध्यान बार बार उनकी ओर चला जाता था.. चंचल परवाने जैसी मौसम और शांत गंभीर फाल्गुनी.. दोनों दिखने में बेहद सुंदर और आकर्षक..
"लेडिज एंड जेन्टलमेन.. माउंट आबू की इन हसीन वादियों में मेरी प्रियतमा पत्नी के ३५वे जन्मदिन की पार्टी में.. मैं और रेणुका आप सब का स्वागत करते है.. " माइक पर बोल रहे राजेश की आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी.. सब ने तालियों से सराहा.. शराब के नशे में काफी लोग मस्त थे.. मुक्त और मस्त वातावरण था.. और इस वातावरण का असर मौसम और फाल्गुनी पर भी धीरे धीरे होता जा रहा था
रेणुका केक काटने ही वाली थी तब राजेश ने उसे एक मिनट के लिए रोक लिया.. और पीयूष को आवाज लगाई..
"यस सर.. " पीयूष राजेश के करीब आया.. राजेश ने पीयूष के कान में गिफ्ट के बारे में पूछा.. "वो तो मेरे कमरे में है" पीयूष ने कहा
"अरे भई.. तो लेकर आओ जल्दी.. " राजेश ने कहा.. पीयूष अपने कमरे की ओर भागा
तभी रेणुका ने पिंटू को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा.. पिंटू ने जवाब में "स्योर मैडम" कहा और वो भी हॉल के बाहर चला गया.. अब रेणुका ने कविता को बुलाया.. और सब सुन सके उस तरह कहा "अरे कविता.. मेरा पर्स रूम पर भूल आई हूँ.. जरा लेकर आएगी प्लीज.. टेबल पर ही पड़ा है"
"अभी लेकर आती हूँ" अपने बॉल उछालते हुए कविता रेणुका के कमरे की तरफ दौड़ी
जाते जाते कविता को याद आया की वह कमरे की चाबी लेना तो भूल ही गई थी.. पर तब तक वो कमरे तक पहुँच गई थी.. उसने देखा की कमरा तो पहले से ही खुला हुआ था.. दरवाजा खोलकर उसने प्रवेश किया.. बेग के अंदर कुछ ढूंढ रहे पिंटू की पीठ देखकर वह चोंक उठी.. तभी कविता के मोबाइल की रिंग बजी.. पिंटू ने घबराकर पीछे देखा और आश्चर्य से पूछा "अरे कविता? तुम यहाँ? क्या बात है?"
पिंटू को बोलने से रोकने के लिए कविता ने अपने होंठ पर उंगली रखते हुए इशारा किया और फोन रिसीव किया "हैलो.. !!"
"ओके मैडम" एक ही सेकंड में उसने फोन काट दिया
कविता ने दरवाजा अंदर से लॉक कर दिया और पिंटू को अपनी बाहों में भरकर.. रेणुका-राजेश के बिस्तर पर गिरा दिया
पिंटू घबरा गया "ये क्या कर रही है पगली??" उसने कविता को धक्का देकर अपने आप को उससे दूर किया
"अरे पिंटू मेरी जान.. रेणुका मैडम ने जान बूझकर हम दोनों को यहाँ भेजा है.. अभी उनका ही फोन था.. डरने की कोई बात नही है.. हम एकदम सेफ है यहाँ.. आई लव यू पिंटू" कहते हुए वह पिंटू से लिपट पड़ी..
उसी वक्त.. पूरे माउंट आबू में एक साथ लाइट चली गई.. कहीं किसी ट्रैन्स्फॉर्मर में एक जबरदस्त धमाके की आवाज सब ने सुनी.. अंधेरा होते ही पीयूष का हाथ कविता के पतले टॉप के अंदर घुस गया और वह उसके दसहरी आम का रस निकालने लगा.. कविता के अद्भुत कामुक स्तनों को वो मसलने लगा.. कविता का हाथ सीधा पीयूष के लंड पर पहुँच गया.. पेंट के ऊपर से लंड को मालते हुए उसने अपने लिपस्टिक लगे होंठ पीयूष के होंठों पर रख दिए..
कविता के बिना ब्रा वाले स्तनों को हाथ में पकड़ते ही पिंटू की आह निकल गई.. कविता ने तुरंत अपना टॉप ऊपर कर लिया और पिंटू का चेहरा अपने दोनों स्तनों पर दबा दिया.. दोनों एक दूसरे में ऐसे खो गए.. जैसे धरती पर वो दो आखिरी इंसान हो.. पिंटू से ज्यादा भूख कविता की थी इसलिए वह काफी आक्रामक थी.. पीयूष की अवहेलना से परेशान कविता अपने प्रेमी के आगोश में आते ही उत्तेजित हो गई.. उसका जिस्म किसी मर्द को चाहता था.. क्योंकि पिछले काफी दिनों से पीयूष ने उसे हाथ भी नही लगाया था.. ऊपर से माउंट आबू आने के बाद उसकी इच्छाएं और उछलने लगी थी.. पिछले दो घंटों में.. अनगिनत मर्दों की भूखी नज़रों को अपने स्तन पर पड़ती हुई महसूस कर वह तड़पने लगी थी..
पिंटू भी अपने पहले प्यार को पा कर खुश हो गया था.. कविता के स्तनों की गर्माहट का मज़ा लेते हुए वह उसकी जांघों को सहलाने लगा.. जैसे जैसे पिंटू का हाथ उसकी जांघों पर आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे कविता अपनी टांगें चौड़ी करते हुए अपना राजद्वार खोल रही थी..पिंटू के हाथ के स्पर्श से वह सिहरते हुए उसने अपनी आँखें बंद कर ली.. चिकनी जांघों को सहलाते हुए पिंटू को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे संगेमरमर पर हाथ फेर रहा हो.. कविता का सहकार भी ऐसा मिल रहा था की कुछ ही सेकंड में पिंटू का हाथ उसकी चूत तक पहुँच गया..
पता नही.. ऐसा कौनसा जादू होता है स्त्री की योनि में..जिसे देखते ही पुरुष बेकाबु होकर जानवर की तरह टूट पड़ता है.. कविता ने अब पेंट की अंदर हाथ डालकर पिंटू का लंड पकड़ लिया था..
"कितना सख्त हो गया है यार" कविता को उसके लंड की गर्मी अपनी हथेली पर महसूस हो रही थी
"तुझे इस तरह देखने के बाद.. किसी का भी सख्त हो जाए.. क्या लग रही है तू कविता.. आह्ह.. " कविता की छाती को चूम चाटकर मदहोश कर दिया उसे पिंटू ने ..
उत्तेजनावश पिंटू के लंड पर कविता के हाथों की पकड़ और सख्त हो गई.. अपने स्तनों को और सख्ती से दबा दिया पिंटू के मुंह पर..
"अब मुझसे रहा नहीं जाता पिंटू.. कुछ कर ना जल्दी.. "
"ओह्ह कविता.. मेरी जान.. " कहते हुए पिंटू ने अपने पेंट की चैन खोलकर लंड बाहर निकाल लिया.. कविता बेचैन होकर पिंटू के लंड के टोपे को चूसने लगी.. कविता की इस हरकत से पिंटू भी अपना आपा खो बैठा.. कभी वो कविता की नंगी पीठ को सहलाता.. कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरता.. तो कभी उसके स्तन को दबाता
"जल्दी करना होगा कविता.. सब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे.. तू जल्दी उलटी लेट जा.. हमारी फेवरिट पोजीशन में करेंगे.. " पिंटू ने कहा
"नही यार.. मेरी बिना चाटे मैं तुझे छोड़ने वाली नही हूँ आज.. कितना वक्त हो गया.. आखिरी बार जब मेरे घर के पीछे की अंधेरी गली में मिले थे तब तूने चाटी थी मेरी.. वो रात मुझे बहोत याद आती है.. तेरी जीभ जब अंदर गई थी तब.. आह्ह इतना मज़ा आया था की क्या बताऊ.. प्लीज यार.. आज अपनी जीभ अंदर तक घुसेड़कर चाट दे एक बार"
"जो भी करवाना है जरा जल्दी कर यार" पिंटू ने कहा..
कविता ने तुरंत अपनी छोटी सी शॉर्ट्स और पेन्टी एक साथ उतार फेंकी.. पिंटू कविता की जांघों को चाटने लगा.. वो भी गरम हो चुका था.. कविता ने उसका सर पकड़ा और उसके मुंह को अपनी चिपचिपी बुर पर लगा दिया.. पिंटू की जीभ का अपनी चूत पर स्पर्श प्राप्त होते ही कविता स्वर्ग में पहुँच गई.. पिंटू के कामुक चुंबनों का असर इतनी तीव्रता से हुआ की एक ही पल में उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. उसके स्तन सख्त हो गए और निप्पल बंदूक की गोली जैसी टाइट हो गई.. पिंटू जैसे जैसे चाटता गया.. कविता की सिसकियों का वॉल्यूम बढ़ता गया.. अपने पसंदीदा पात्र के साथ संभोग करने से बेहतर मज़ा ओर कोई नही है..
पिंटू की जीभ ने कविता को उसके सारे गम भुला दिए.. कमर को उचक उचक कर वह अपनी चूत को पिंटू के मुंह से घिस रही थी.. कराहते हुए कविता का जिस्म एकदम सख्त और सीधा हो गया.. वह थरथराने लगी.. और एक छोटी सी चीख के साथ पिंटू के मुंह में झड़ गई.. स्खलित होते ही कविता का जिस्म एकदम हल्का हो गया.. दिमाग शांत हो गया.. मन तृप्त हो गया.. अपना काम खतम होते ही उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ..
अब लाइट भी आ चुकी थी
"अब हमे चलना चाहिए पिंटू.. बहोत देर हो गई" कविता ने कहा
"अच्छा?? तो फिर इस सख्त लोडे का क्या करू? ये अब ढीला होने नही वाला.. अब ईसे वापिस पेंट में डालना भी मुमकिन नही है.. क्या करू? तू बता" पिंटू ने थोड़े गुस्से से कहा..
कविता उठकर पिंटू के लंड को तेज गति से हिलाने लग गई.. पिंटू कविता के बॉल को पागलों की तरह दबाने लगा.. पिंटू को बिस्तर पर सुलाते हुए कविता उसके ऊपर चढ़ बैठी.. और अपने हाथ को नीचे ले गई.. पिंटू के कड़े लंड को अपनी चूत के सेंटर पर रखकर उसने दबाया.. पर लंड अंदर गया नही.. कविता ने अपनी हथेली पर थोड़ा सा थूक लेकर नीचे लंड पर लगाया.. और ऊपर वज़न देने लगी..
"उफ्फ़ पिंटू.. तेरा ज्यादा मोटा हो गया है क्या.. !! अंदर जा ही नही रहा.. दर्द हो रहा है मुझे.. ऊईई माँ.. !!" धीरे धीरे कविता की चूत लंड निगलती रही.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए कविता ऊपर नीचे होते हुए धक्के लगाने लगी..
अपना ऑर्गजम हो जाने के बावजूद.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए.. अपनी कामुक अदाओं से वह पिंटू को रिझाने लगी.. कविता की चूत के एकदम टाइट वर्टिकल होंठों की पकड़ इतनी मजबूत थी की पिंटू नीचे लैटे लैटे स्वर्ग का आनंद ले रहा था.. ऊपर नीचे करते हुए लय बनाकर कविता अपने स्तनों को उछाल रही थी.. अपनी चूत की गहराई में अंदर तक उसे लंड की गर्माहट का एहसास हो रहा था.. गति बढ़ाते हुए कविता चाहती थी पिंटू जल्दी से जल्दी झड़ जाए..
अपने स्तनों पर पिंटू की टाइट पकड़ महसूस करते हुए कविता को पता चल गया की पिंटू अब झड़ने के करीब था.. उसने अपनी उछलने की गति दोगुनी कर दी..
"ओह्ह गॉड.. फक मी.. लव यू मेरी जान.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे.. कितनी टाइट है तेरी चूत.. पीयूष डालता भी है या नही अंदर.. ओह्ह ओह!!" कविता की कमर पकड़कर उसे धक्के लगाने में मदद कर रहा था पिंटू
लंड के घर्षण से अभी अभी स्खलित हुई कविता फिर से गरम होने लगी.. अपनी चूत की मांसपेशियों को उसने इतना टाइट कर दिया जैसे पिंटू के लंड का गला घोंट देना चाहती हो.. लंड और चूत की लड़ाई में हम मानते है की आखिर में लंड जीता या चूत जीती.. पर हकीकत में चूत कभी हारती नही.. हार हमेशा लंड की ही होती है.. कभी चूत से बाहर निकले लंड के हाल देखें है!!! कोल्हू से निकले हुए गन्ने जैसी हालत होती है लंड की..
लंड पर दबाव बढ़ते ही पिंटू के लंड ने पिचकारी मार दी.. दोनों प्रेमी एक दूसरे से लिपट गए..
कुछ सेकंडों तक लिपटे रहने के बाद रीलैक्स होकर पिंटू के होंठों को चूमते हुए कविता ने कहा.. "अब मुझे जाना होगा पिंटू.. जाने का मन तो नही है पर क्या करें.. !! काश हम दोनों को साथ में एक रात गुजारने का मौका मिल जाएँ "
"फिलहाल तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन नही है.. तू अब कुंवारी नही है.. पीयूष की पत्नी है तू.. चल अब तू जल्दी जा.. मैं थोड़ी देर में आता हूँ वरना किसी को शक हो जाएगा"
"नही.. तू पहले निकल.. मैं यह बेड की चादर और मेरा मेकअप ठीक करके आती हूँ" पिंटू का चेहरा उसने अपने रुमाल से पोंछ कर उसके बाल ठीक कर दिए और उसे एक आखिर किस देकर जाने दिया.. उसके जाने के बाद कविता ने आईने में देखकर अपना मेकअप ठीक किया.. लिपस्टिक फिर से लगाई.. ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी रेणुका की डार्क ब्राउन शेड की लिपस्टिक होंठों पर लगाते हुए उसे पिंटू के सुपाड़े की याद आ गई.. कविता हंस पड़ी.. सोचने लगी.. दुनिया की सर्वश्रेष्ठ लिपस्टिक तो लंड ही है.. उससे होंठ गीले करने में जो मज़ा है वो बेजान लिपस्टिक में कहाँ!!! शायद इसी कारण सारी कंपनियां लिपस्टिक को लंड के आकार की ही बनाते है..
कविता ने फटाफट अपने बाल ठीक कीये.. बेड की चादर की सिलवटें दूर की.. और सब कुछ एक आखिरी बार चेक करते हुए रूम से बाहर निकली। हॉल में पहुंचते ही उसने देखा की सब पार्टी इन्जॉय कर रहे थे.. कविता के उछलते स्तनों की गैरमौजूदगी में सारा वातावरण शांत सा था.. पर जैसे आंधी आते ही सब अस्तव्यस्त हो जाता है.. वैसे ही कविता की पायलों की झंकार सुनते ही सब अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसे देखने लगे.. अपने हाथ के ग्लास में पड़ी दारू को भूलकर कविता के जोबन को पीने लगे.. मर्द तो मर्द.. सारी औरतें भी कविता के स्तन युग्म को देखती ही रह गई.. सब कविता को देख रहे थे.. एक पीयूष को छोड़कर.. पीयूष नाम का भँवरा.. मौसम नाम के ताजे खिले फूल का रस चूसने के लिए यहाँ वहाँ मंडरा रहा था..
Mast mast update.पीयूष अपने कमरे में आया और कपड़े बदलकर वापस ऊपर कान्फ्रन्स रूम में पहुँच गया.. सब लोगों अलग अलग तीन-चार के ग्रुप में खड़े खड़े गप्पे लड़ा रहे थे.. हॉल में शराब, सिगरेट और महंगे परफ्यूम के मिश्रण की गंध फैली हुई थी..
गुलाबी स्लीवलेस टॉप में अपनी तंदूरस्त जवानी को उछालते हुए कविता बातें कीये जा रही थी.. और सब का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी.. वो बार बार अलग ग्रुप में जाकर बातें कर रही थी.. अनजाने लोगों से भी हाई-हैलो कर रही थी.. वो जिस ग्रुप की ओर जाती उस ग्रुप के सारे मर्द उसे आते देख चुप हो जाते.. बस उसकी उन्नत छातियों को ताड़ते रहते.. सागर की लहरों की तरह उछल रहे उसके स्तनों की गोलाई, पतले से टॉप में इतनी आसानी से नजर आ रही थी की सब की नजर वहीं चिपकी रहती.. कोन्फ्रन्स हॉल का एसी थोड़ा सा तेज था.. वातावरण में फैली ठंडक के कारण कविता की निप्पल सख्त होकर टॉप के कपड़ों में अपना आकार बना रही थी.. एक दो पुरुष तो कविता को देखते ही अपना लंड ऐडजस्ट करने लगे.. कुछ मर्द टॉइलेट जाने का बहाना बनाकर अपना लंड हिलाकर लौटे..
राजेश सर कोने में किसी के साथ फोन पर बात कर रहे थे.. उन्हें भी जाकर हाई बोलकर आई कविता.. फिर वो चलते चलते रेणुका और वैशाली के पास आकर खड़ी हो गई..
"हाय मैडम, हैप्पी बर्थडे.. ढेर सारी शुभकामनाएं और विशिज.. ईश्वर आपको लंबी उम्र दे"
"ओह शुक्रिया कविता.. वैसे तू आज कमाल लग रही है.. क्या गजब का बोल्ड ड्रेस है तेरा.. राजेश तुझे देखने के बाद आज मेरी हालत खराब कर देगा!!"
सब कुछ जानते हुए भी कविता ने पूछा "अरे ऐसी भी क्या बात है रेणुका?"
रेणुका: "अरे, तेरे इस गरमागरम डिस्प्ले को देखकर राजेश मुझे बोल रहा था की चल रूम में चलते है"
कविता: "हाँ तो दिक्कत क्या है!!! जाकर आइए.. हम सब आपका वेइट करेंगे.. " हँसते हुए उसने कहा
वैशाली: "नही रे नही.. ऐसा थोड़े ही चलता है!! हम यहाँ बाहर खड़े खड़े तड़पे और आप अंदर मजे करो.. मैं नही जाने दूँगी आपको" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा
रेणुका: "तो तू भी चल मेरे साथ अंदर.. मुझे कोई दिक्कत नही है.. राजेश हम दोनों को एक साथ बिस्तर में संभालने के लिए काफी है.. हा हा हा हा हा.. !!"
वैशाली: "नही रे बाबा.. मैं कबाब में हड्डी बनना नही चाहती.. आप कविता को ले जाइए अगर उसकी इच्छा हो तो.." तभी मौसम ने वैशाली को आवाज दी.. "मैं अभी आती हूँ.. एक्स्क्यूज़ मी" कहते हुए वैशाली मौसम और फाल्गुनी की ओर चल पड़ी
रेणुका ने आँख मारते हुए कविता से कहा "क्यों कविता.. क्या खयाल है? चलना है अंदर मेरे साथ?"
कविता: "ना बाबा ना.. ऑफकोर्स मेरी इच्छा तो है पर वो आपके पति के साथ नही.. मेरी पसंद के पुरुष के साथ"
रेणुका: "तो बोल न.. तेरी पसंद के साथी के साथ मजे करने हो तो मैं अभी कुछ मेनेज कर दूँगी.. कौन पसंद है तुझे बता मुझे.. पर राजेश को छोड़कर"
कविता: "मेरी पसंद तो तुम्हें पता है ही.. दरअसल मैं तुम से वही कहने आई थी.. माउंट आबू के इस रोमेन्टीक माहोल में मैं पिंटू के साथ थोड़ा वक्त बिताने की बहोत इच्छा हो रही है.. पर चांस ही नही मिलता.. !! क्या करू? तुम मेरी कुछ मदद करो ना प्लीज!!"
रेणुका सोचने लगी.. फिर उसने कहा "चिंता मत कर.. मैं कुछ करती हूँ.. मेरे बर्थडे के दिन कोई उदास हो, ऐसा कैसे हो सकता है !!"
कविता: "पर ध्यान रखना.. पीयूष को पता नही लगना चाहिए.. वरना लेने के देने पड़ जाएंगे"
रेणुका: "डॉन्ट वरी.. मैं जब तुझे फोन करू तब तू आ जाना.. " कविता को आश्वासन देते हुए उसने कहा
अपने प्रेमी को अकेले में मिलने को बेकरार कविता के दिल को ठंडक मिली.. "और हाँ.. वैशाली को भी कुछ मत बताना.." वैशाली को अपनी ओर आते देख कविता ने रेणुका से कहा
रेणुका: "ओके बेबी डन.. और कविता.. हमारी ऑफिस में कंप्युटर ऑपरेटर की नौकरी के लिए तेरा नाम तय है.. बोल कब से जॉइन करेगी?" जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ रेणुका ने कहा.. उसका कहने का मतलब साफ था.. अगर कविता पिंटू से अकेले मिलना चाहती हो तो उसे रेणुका की बात माननी होगी..
कविता: "मुझे एक बार पीयूष से इस बारे में बात करनी होगी.. बाकी मुझे आप की कंपनी में जॉब करने में कोई आपत्ति नही है"
रेणुका: "वो सब तू मुझ पर छोड़ दे.. पीयूष को मैं मना लूँगी.. " तब तक वैशाली उनके करीब आ चुकी थी और रेणुका का आखिरी वाक्य उसने सुन लिया था.. उस वाक्य का दूसरा अर्थ भी निकलता था जो वैशाली समझ गई.. पर फिलहाल वो कुछ नही बोली.. समय आने पर ही बोलने में विश्वास रखती थी वैशाली..
नौकरी की ऑफर के बारे में गंभीरता से सोच रही थी कविता.. अगर वो हाँ कर दे तो पिंटू के साथ रहने का मौका मिल जाएगा.. वो रोज उसे कम से कम आठ घंटों के लिए देख पाएगी.. मिल पाएगी.. बात कर पाएगी.. और कंपनी का मालिक और उनकी पत्नी के साथ अब घर जैसे संबंध बन चुके थे.. कविता के दिल में.. उसके स्तन के साइज़ के लड्डू फूटने लगे.. समस्या बस एक ही थी.. पीयूष और अपने सास ससुर से नौकरी करने के लिए इजाजत लेनी थी.. अगर वह नही माने तो उसका सपना एक पल में चूर हो जाने वाला था.. कविता सोच रही थी की इस समस्या का समाधान कैसे करे.. !!
जब भी कविता का दिमाग काम करना बंद करे तब उसे शीला भाभी की याद आ जाती थी.. शीला के पास सारी समस्याओं का हल मिल जाता था.. घर जाते ही शीला भाभी को इस के बारे में बताती हूँ.. वो कुछ न कुछ तरीका ढूंढ निकालेगी.. मन में गांठ मार ली कविता ने
सब धीरे धीरे कोन्फ्रन्स रूम में इकठ्ठा होने लगे थे.. मौसम और फाल्गुनी.. दोनों चिड़िया की तरह चहचहा रही थी.. सब का ध्यान बार बार उनकी ओर चला जाता था.. चंचल परवाने जैसी मौसम और शांत गंभीर फाल्गुनी.. दोनों दिखने में बेहद सुंदर और आकर्षक..
"लेडिज एंड जेन्टलमेन.. माउंट आबू की इन हसीन वादियों में मेरी प्रियतमा पत्नी के ३५वे जन्मदिन की पार्टी में.. मैं और रेणुका आप सब का स्वागत करते है.. " माइक पर बोल रहे राजेश की आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी.. सब ने तालियों से सराहा.. शराब के नशे में काफी लोग मस्त थे.. मुक्त और मस्त वातावरण था.. और इस वातावरण का असर मौसम और फाल्गुनी पर भी धीरे धीरे होता जा रहा था
रेणुका केक काटने ही वाली थी तब राजेश ने उसे एक मिनट के लिए रोक लिया.. और पीयूष को आवाज लगाई..
"यस सर.. " पीयूष राजेश के करीब आया.. राजेश ने पीयूष के कान में गिफ्ट के बारे में पूछा.. "वो तो मेरे कमरे में है" पीयूष ने कहा
"अरे भई.. तो लेकर आओ जल्दी.. " राजेश ने कहा.. पीयूष अपने कमरे की ओर भागा
तभी रेणुका ने पिंटू को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा.. पिंटू ने जवाब में "स्योर मैडम" कहा और वो भी हॉल के बाहर चला गया.. अब रेणुका ने कविता को बुलाया.. और सब सुन सके उस तरह कहा "अरे कविता.. मेरा पर्स रूम पर भूल आई हूँ.. जरा लेकर आएगी प्लीज.. टेबल पर ही पड़ा है"
"अभी लेकर आती हूँ" अपने बॉल उछालते हुए कविता रेणुका के कमरे की तरफ दौड़ी
जाते जाते कविता को याद आया की वह कमरे की चाबी लेना तो भूल ही गई थी.. पर तब तक वो कमरे तक पहुँच गई थी.. उसने देखा की कमरा तो पहले से ही खुला हुआ था.. दरवाजा खोलकर उसने प्रवेश किया.. बेग के अंदर कुछ ढूंढ रहे पिंटू की पीठ देखकर वह चोंक उठी.. तभी कविता के मोबाइल की रिंग बजी.. पिंटू ने घबराकर पीछे देखा और आश्चर्य से पूछा "अरे कविता? तुम यहाँ? क्या बात है?"
पिंटू को बोलने से रोकने के लिए कविता ने अपने होंठ पर उंगली रखते हुए इशारा किया और फोन रिसीव किया "हैलो.. !!"
"ओके मैडम" एक ही सेकंड में उसने फोन काट दिया
कविता ने दरवाजा अंदर से लॉक कर दिया और पिंटू को अपनी बाहों में भरकर.. रेणुका-राजेश के बिस्तर पर गिरा दिया
पिंटू घबरा गया "ये क्या कर रही है पगली??" उसने कविता को धक्का देकर अपने आप को उससे दूर किया
"अरे पिंटू मेरी जान.. रेणुका मैडम ने जान बूझकर हम दोनों को यहाँ भेजा है.. अभी उनका ही फोन था.. डरने की कोई बात नही है.. हम एकदम सेफ है यहाँ.. आई लव यू पिंटू" कहते हुए वह पिंटू से लिपट पड़ी..
उसी वक्त.. पूरे माउंट आबू में एक साथ लाइट चली गई.. कहीं किसी ट्रैन्स्फॉर्मर में एक जबरदस्त धमाके की आवाज सब ने सुनी.. अंधेरा होते ही पीयूष का हाथ कविता के पतले टॉप के अंदर घुस गया और वह उसके दसहरी आम का रस निकालने लगा.. कविता के अद्भुत कामुक स्तनों को वो मसलने लगा.. कविता का हाथ सीधा पीयूष के लंड पर पहुँच गया.. पेंट के ऊपर से लंड को मालते हुए उसने अपने लिपस्टिक लगे होंठ पीयूष के होंठों पर रख दिए..
कविता के बिना ब्रा वाले स्तनों को हाथ में पकड़ते ही पिंटू की आह निकल गई.. कविता ने तुरंत अपना टॉप ऊपर कर लिया और पिंटू का चेहरा अपने दोनों स्तनों पर दबा दिया.. दोनों एक दूसरे में ऐसे खो गए.. जैसे धरती पर वो दो आखिरी इंसान हो.. पिंटू से ज्यादा भूख कविता की थी इसलिए वह काफी आक्रामक थी.. पीयूष की अवहेलना से परेशान कविता अपने प्रेमी के आगोश में आते ही उत्तेजित हो गई.. उसका जिस्म किसी मर्द को चाहता था.. क्योंकि पिछले काफी दिनों से पीयूष ने उसे हाथ भी नही लगाया था.. ऊपर से माउंट आबू आने के बाद उसकी इच्छाएं और उछलने लगी थी.. पिछले दो घंटों में.. अनगिनत मर्दों की भूखी नज़रों को अपने स्तन पर पड़ती हुई महसूस कर वह तड़पने लगी थी..
पिंटू भी अपने पहले प्यार को पा कर खुश हो गया था.. कविता के स्तनों की गर्माहट का मज़ा लेते हुए वह उसकी जांघों को सहलाने लगा.. जैसे जैसे पिंटू का हाथ उसकी जांघों पर आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे कविता अपनी टांगें चौड़ी करते हुए अपना राजद्वार खोल रही थी..पिंटू के हाथ के स्पर्श से वह सिहरते हुए उसने अपनी आँखें बंद कर ली.. चिकनी जांघों को सहलाते हुए पिंटू को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे संगेमरमर पर हाथ फेर रहा हो.. कविता का सहकार भी ऐसा मिल रहा था की कुछ ही सेकंड में पिंटू का हाथ उसकी चूत तक पहुँच गया..
पता नही.. ऐसा कौनसा जादू होता है स्त्री की योनि में..जिसे देखते ही पुरुष बेकाबु होकर जानवर की तरह टूट पड़ता है.. कविता ने अब पेंट की अंदर हाथ डालकर पिंटू का लंड पकड़ लिया था..
"कितना सख्त हो गया है यार" कविता को उसके लंड की गर्मी अपनी हथेली पर महसूस हो रही थी
"तुझे इस तरह देखने के बाद.. किसी का भी सख्त हो जाए.. क्या लग रही है तू कविता.. आह्ह.. " कविता की छाती को चूम चाटकर मदहोश कर दिया उसे पिंटू ने ..
उत्तेजनावश पिंटू के लंड पर कविता के हाथों की पकड़ और सख्त हो गई.. अपने स्तनों को और सख्ती से दबा दिया पिंटू के मुंह पर..
"अब मुझसे रहा नहीं जाता पिंटू.. कुछ कर ना जल्दी.. "
"ओह्ह कविता.. मेरी जान.. " कहते हुए पिंटू ने अपने पेंट की चैन खोलकर लंड बाहर निकाल लिया.. कविता बेचैन होकर पिंटू के लंड के टोपे को चूसने लगी.. कविता की इस हरकत से पिंटू भी अपना आपा खो बैठा.. कभी वो कविता की नंगी पीठ को सहलाता.. कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरता.. तो कभी उसके स्तन को दबाता
"जल्दी करना होगा कविता.. सब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे.. तू जल्दी उलटी लेट जा.. हमारी फेवरिट पोजीशन में करेंगे.. " पिंटू ने कहा
"नही यार.. मेरी बिना चाटे मैं तुझे छोड़ने वाली नही हूँ आज.. कितना वक्त हो गया.. आखिरी बार जब मेरे घर के पीछे की अंधेरी गली में मिले थे तब तूने चाटी थी मेरी.. वो रात मुझे बहोत याद आती है.. तेरी जीभ जब अंदर गई थी तब.. आह्ह इतना मज़ा आया था की क्या बताऊ.. प्लीज यार.. आज अपनी जीभ अंदर तक घुसेड़कर चाट दे एक बार"
"जो भी करवाना है जरा जल्दी कर यार" पिंटू ने कहा..
कविता ने तुरंत अपनी छोटी सी शॉर्ट्स और पेन्टी एक साथ उतार फेंकी.. पिंटू कविता की जांघों को चाटने लगा.. वो भी गरम हो चुका था.. कविता ने उसका सर पकड़ा और उसके मुंह को अपनी चिपचिपी बुर पर लगा दिया.. पिंटू की जीभ का अपनी चूत पर स्पर्श प्राप्त होते ही कविता स्वर्ग में पहुँच गई.. पिंटू के कामुक चुंबनों का असर इतनी तीव्रता से हुआ की एक ही पल में उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. उसके स्तन सख्त हो गए और निप्पल बंदूक की गोली जैसी टाइट हो गई.. पिंटू जैसे जैसे चाटता गया.. कविता की सिसकियों का वॉल्यूम बढ़ता गया.. अपने पसंदीदा पात्र के साथ संभोग करने से बेहतर मज़ा ओर कोई नही है..
पिंटू की जीभ ने कविता को उसके सारे गम भुला दिए.. कमर को उचक उचक कर वह अपनी चूत को पिंटू के मुंह से घिस रही थी.. कराहते हुए कविता का जिस्म एकदम सख्त और सीधा हो गया.. वह थरथराने लगी.. और एक छोटी सी चीख के साथ पिंटू के मुंह में झड़ गई.. स्खलित होते ही कविता का जिस्म एकदम हल्का हो गया.. दिमाग शांत हो गया.. मन तृप्त हो गया.. अपना काम खतम होते ही उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ..
अब लाइट भी आ चुकी थी
"अब हमे चलना चाहिए पिंटू.. बहोत देर हो गई" कविता ने कहा
"अच्छा?? तो फिर इस सख्त लोडे का क्या करू? ये अब ढीला होने नही वाला.. अब ईसे वापिस पेंट में डालना भी मुमकिन नही है.. क्या करू? तू बता" पिंटू ने थोड़े गुस्से से कहा..
कविता उठकर पिंटू के लंड को तेज गति से हिलाने लग गई.. पिंटू कविता के बॉल को पागलों की तरह दबाने लगा.. पिंटू को बिस्तर पर सुलाते हुए कविता उसके ऊपर चढ़ बैठी.. और अपने हाथ को नीचे ले गई.. पिंटू के कड़े लंड को अपनी चूत के सेंटर पर रखकर उसने दबाया.. पर लंड अंदर गया नही.. कविता ने अपनी हथेली पर थोड़ा सा थूक लेकर नीचे लंड पर लगाया.. और ऊपर वज़न देने लगी..
"उफ्फ़ पिंटू.. तेरा ज्यादा मोटा हो गया है क्या.. !! अंदर जा ही नही रहा.. दर्द हो रहा है मुझे.. ऊईई माँ.. !!" धीरे धीरे कविता की चूत लंड निगलती रही.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए कविता ऊपर नीचे होते हुए धक्के लगाने लगी..
अपना ऑर्गजम हो जाने के बावजूद.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए.. अपनी कामुक अदाओं से वह पिंटू को रिझाने लगी.. कविता की चूत के एकदम टाइट वर्टिकल होंठों की पकड़ इतनी मजबूत थी की पिंटू नीचे लैटे लैटे स्वर्ग का आनंद ले रहा था.. ऊपर नीचे करते हुए लय बनाकर कविता अपने स्तनों को उछाल रही थी.. अपनी चूत की गहराई में अंदर तक उसे लंड की गर्माहट का एहसास हो रहा था.. गति बढ़ाते हुए कविता चाहती थी पिंटू जल्दी से जल्दी झड़ जाए..
अपने स्तनों पर पिंटू की टाइट पकड़ महसूस करते हुए कविता को पता चल गया की पिंटू अब झड़ने के करीब था.. उसने अपनी उछलने की गति दोगुनी कर दी..
"ओह्ह गॉड.. फक मी.. लव यू मेरी जान.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे.. कितनी टाइट है तेरी चूत.. पीयूष डालता भी है या नही अंदर.. ओह्ह ओह!!" कविता की कमर पकड़कर उसे धक्के लगाने में मदद कर रहा था पिंटू
लंड के घर्षण से अभी अभी स्खलित हुई कविता फिर से गरम होने लगी.. अपनी चूत की मांसपेशियों को उसने इतना टाइट कर दिया जैसे पिंटू के लंड का गला घोंट देना चाहती हो.. लंड और चूत की लड़ाई में हम मानते है की आखिर में लंड जीता या चूत जीती.. पर हकीकत में चूत कभी हारती नही.. हार हमेशा लंड की ही होती है.. कभी चूत से बाहर निकले लंड के हाल देखें है!!! कोल्हू से निकले हुए गन्ने जैसी हालत होती है लंड की..
लंड पर दबाव बढ़ते ही पिंटू के लंड ने पिचकारी मार दी.. दोनों प्रेमी एक दूसरे से लिपट गए..
कुछ सेकंडों तक लिपटे रहने के बाद रीलैक्स होकर पिंटू के होंठों को चूमते हुए कविता ने कहा.. "अब मुझे जाना होगा पिंटू.. जाने का मन तो नही है पर क्या करें.. !! काश हम दोनों को साथ में एक रात गुजारने का मौका मिल जाएँ "
"फिलहाल तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन नही है.. तू अब कुंवारी नही है.. पीयूष की पत्नी है तू.. चल अब तू जल्दी जा.. मैं थोड़ी देर में आता हूँ वरना किसी को शक हो जाएगा"
"नही.. तू पहले निकल.. मैं यह बेड की चादर और मेरा मेकअप ठीक करके आती हूँ" पिंटू का चेहरा उसने अपने रुमाल से पोंछ कर उसके बाल ठीक कर दिए और उसे एक आखिर किस देकर जाने दिया.. उसके जाने के बाद कविता ने आईने में देखकर अपना मेकअप ठीक किया.. लिपस्टिक फिर से लगाई.. ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी रेणुका की डार्क ब्राउन शेड की लिपस्टिक होंठों पर लगाते हुए उसे पिंटू के सुपाड़े की याद आ गई.. कविता हंस पड़ी.. सोचने लगी.. दुनिया की सर्वश्रेष्ठ लिपस्टिक तो लंड ही है.. उससे होंठ गीले करने में जो मज़ा है वो बेजान लिपस्टिक में कहाँ!!! शायद इसी कारण सारी कंपनियां लिपस्टिक को लंड के आकार की ही बनाते है..
कविता ने फटाफट अपने बाल ठीक कीये.. बेड की चादर की सिलवटें दूर की.. और सब कुछ एक आखिरी बार चेक करते हुए रूम से बाहर निकली। हॉल में पहुंचते ही उसने देखा की सब पार्टी इन्जॉय कर रहे थे.. कविता के उछलते स्तनों की गैरमौजूदगी में सारा वातावरण शांत सा था.. पर जैसे आंधी आते ही सब अस्तव्यस्त हो जाता है.. वैसे ही कविता की पायलों की झंकार सुनते ही सब अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसे देखने लगे.. अपने हाथ के ग्लास में पड़ी दारू को भूलकर कविता के जोबन को पीने लगे.. मर्द तो मर्द.. सारी औरतें भी कविता के स्तन युग्म को देखती ही रह गई.. सब कविता को देख रहे थे.. एक पीयूष को छोड़कर.. पीयूष नाम का भँवरा.. मौसम नाम के ताजे खिले फूल का रस चूसने के लिए यहाँ वहाँ मंडरा रहा था..
क्या? अगले अपडेट की आवश्यकता है
बहुत बढ़िया वाखरिया भाई आखिर कविता ने पति के होते हुए अरमान पूरे कर लिए अब देखना हैं पियूष बीवी और साली के होते हुए किसकी लेगा रेणुका मैडम की या फिर वैशाली की या फिर नै नकोर साली ??? उधर शीला को भी दामाद घुमा रहा हैं भाई गोवा में शीला को कैसे भी हो बस चुदवाओ रघु जीवा के लौडो की कमी न महसूस हो गोवा के कैसिनो में नंगी नचवा दो उसे तो और जुए में ३-४ से चुदवा दो ?पीयूष अपने कमरे में आया और कपड़े बदलकर वापस ऊपर कान्फ्रन्स रूम में पहुँच गया.. सब लोगों अलग अलग तीन-चार के ग्रुप में खड़े खड़े गप्पे लड़ा रहे थे.. हॉल में शराब, सिगरेट और महंगे परफ्यूम के मिश्रण की गंध फैली हुई थी..
गुलाबी स्लीवलेस टॉप में अपनी तंदूरस्त जवानी को उछालते हुए कविता बातें कीये जा रही थी.. और सब का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी.. वो बार बार अलग ग्रुप में जाकर बातें कर रही थी.. अनजाने लोगों से भी हाई-हैलो कर रही थी.. वो जिस ग्रुप की ओर जाती उस ग्रुप के सारे मर्द उसे आते देख चुप हो जाते.. बस उसकी उन्नत छातियों को ताड़ते रहते.. सागर की लहरों की तरह उछल रहे उसके स्तनों की गोलाई, पतले से टॉप में इतनी आसानी से नजर आ रही थी की सब की नजर वहीं चिपकी रहती.. कोन्फ्रन्स हॉल का एसी थोड़ा सा तेज था.. वातावरण में फैली ठंडक के कारण कविता की निप्पल सख्त होकर टॉप के कपड़ों में अपना आकार बना रही थी.. एक दो पुरुष तो कविता को देखते ही अपना लंड ऐडजस्ट करने लगे.. कुछ मर्द टॉइलेट जाने का बहाना बनाकर अपना लंड हिलाकर लौटे..
राजेश सर कोने में किसी के साथ फोन पर बात कर रहे थे.. उन्हें भी जाकर हाई बोलकर आई कविता.. फिर वो चलते चलते रेणुका और वैशाली के पास आकर खड़ी हो गई..
"हाय मैडम, हैप्पी बर्थडे.. ढेर सारी शुभकामनाएं और विशिज.. ईश्वर आपको लंबी उम्र दे"
"ओह शुक्रिया कविता.. वैसे तू आज कमाल लग रही है.. क्या गजब का बोल्ड ड्रेस है तेरा.. राजेश तुझे देखने के बाद आज मेरी हालत खराब कर देगा!!"
सब कुछ जानते हुए भी कविता ने पूछा "अरे ऐसी भी क्या बात है रेणुका?"
रेणुका: "अरे, तेरे इस गरमागरम डिस्प्ले को देखकर राजेश मुझे बोल रहा था की चल रूम में चलते है"
कविता: "हाँ तो दिक्कत क्या है!!! जाकर आइए.. हम सब आपका वेइट करेंगे.. " हँसते हुए उसने कहा
वैशाली: "नही रे नही.. ऐसा थोड़े ही चलता है!! हम यहाँ बाहर खड़े खड़े तड़पे और आप अंदर मजे करो.. मैं नही जाने दूँगी आपको" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा
रेणुका: "तो तू भी चल मेरे साथ अंदर.. मुझे कोई दिक्कत नही है.. राजेश हम दोनों को एक साथ बिस्तर में संभालने के लिए काफी है.. हा हा हा हा हा.. !!"
वैशाली: "नही रे बाबा.. मैं कबाब में हड्डी बनना नही चाहती.. आप कविता को ले जाइए अगर उसकी इच्छा हो तो.." तभी मौसम ने वैशाली को आवाज दी.. "मैं अभी आती हूँ.. एक्स्क्यूज़ मी" कहते हुए वैशाली मौसम और फाल्गुनी की ओर चल पड़ी
रेणुका ने आँख मारते हुए कविता से कहा "क्यों कविता.. क्या खयाल है? चलना है अंदर मेरे साथ?"
कविता: "ना बाबा ना.. ऑफकोर्स मेरी इच्छा तो है पर वो आपके पति के साथ नही.. मेरी पसंद के पुरुष के साथ"
रेणुका: "तो बोल न.. तेरी पसंद के साथी के साथ मजे करने हो तो मैं अभी कुछ मेनेज कर दूँगी.. कौन पसंद है तुझे बता मुझे.. पर राजेश को छोड़कर"
कविता: "मेरी पसंद तो तुम्हें पता है ही.. दरअसल मैं तुम से वही कहने आई थी.. माउंट आबू के इस रोमेन्टीक माहोल में मैं पिंटू के साथ थोड़ा वक्त बिताने की बहोत इच्छा हो रही है.. पर चांस ही नही मिलता.. !! क्या करू? तुम मेरी कुछ मदद करो ना प्लीज!!"
रेणुका सोचने लगी.. फिर उसने कहा "चिंता मत कर.. मैं कुछ करती हूँ.. मेरे बर्थडे के दिन कोई उदास हो, ऐसा कैसे हो सकता है !!"
कविता: "पर ध्यान रखना.. पीयूष को पता नही लगना चाहिए.. वरना लेने के देने पड़ जाएंगे"
रेणुका: "डॉन्ट वरी.. मैं जब तुझे फोन करू तब तू आ जाना.. " कविता को आश्वासन देते हुए उसने कहा
अपने प्रेमी को अकेले में मिलने को बेकरार कविता के दिल को ठंडक मिली.. "और हाँ.. वैशाली को भी कुछ मत बताना.." वैशाली को अपनी ओर आते देख कविता ने रेणुका से कहा
रेणुका: "ओके बेबी डन.. और कविता.. हमारी ऑफिस में कंप्युटर ऑपरेटर की नौकरी के लिए तेरा नाम तय है.. बोल कब से जॉइन करेगी?" जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ रेणुका ने कहा.. उसका कहने का मतलब साफ था.. अगर कविता पिंटू से अकेले मिलना चाहती हो तो उसे रेणुका की बात माननी होगी..
कविता: "मुझे एक बार पीयूष से इस बारे में बात करनी होगी.. बाकी मुझे आप की कंपनी में जॉब करने में कोई आपत्ति नही है"
रेणुका: "वो सब तू मुझ पर छोड़ दे.. पीयूष को मैं मना लूँगी.. " तब तक वैशाली उनके करीब आ चुकी थी और रेणुका का आखिरी वाक्य उसने सुन लिया था.. उस वाक्य का दूसरा अर्थ भी निकलता था जो वैशाली समझ गई.. पर फिलहाल वो कुछ नही बोली.. समय आने पर ही बोलने में विश्वास रखती थी वैशाली..
नौकरी की ऑफर के बारे में गंभीरता से सोच रही थी कविता.. अगर वो हाँ कर दे तो पिंटू के साथ रहने का मौका मिल जाएगा.. वो रोज उसे कम से कम आठ घंटों के लिए देख पाएगी.. मिल पाएगी.. बात कर पाएगी.. और कंपनी का मालिक और उनकी पत्नी के साथ अब घर जैसे संबंध बन चुके थे.. कविता के दिल में.. उसके स्तन के साइज़ के लड्डू फूटने लगे.. समस्या बस एक ही थी.. पीयूष और अपने सास ससुर से नौकरी करने के लिए इजाजत लेनी थी.. अगर वह नही माने तो उसका सपना एक पल में चूर हो जाने वाला था.. कविता सोच रही थी की इस समस्या का समाधान कैसे करे.. !!
जब भी कविता का दिमाग काम करना बंद करे तब उसे शीला भाभी की याद आ जाती थी.. शीला के पास सारी समस्याओं का हल मिल जाता था.. घर जाते ही शीला भाभी को इस के बारे में बताती हूँ.. वो कुछ न कुछ तरीका ढूंढ निकालेगी.. मन में गांठ मार ली कविता ने
सब धीरे धीरे कोन्फ्रन्स रूम में इकठ्ठा होने लगे थे.. मौसम और फाल्गुनी.. दोनों चिड़िया की तरह चहचहा रही थी.. सब का ध्यान बार बार उनकी ओर चला जाता था.. चंचल परवाने जैसी मौसम और शांत गंभीर फाल्गुनी.. दोनों दिखने में बेहद सुंदर और आकर्षक..
"लेडिज एंड जेन्टलमेन.. माउंट आबू की इन हसीन वादियों में मेरी प्रियतमा पत्नी के ३५वे जन्मदिन की पार्टी में.. मैं और रेणुका आप सब का स्वागत करते है.. " माइक पर बोल रहे राजेश की आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी.. सब ने तालियों से सराहा.. शराब के नशे में काफी लोग मस्त थे.. मुक्त और मस्त वातावरण था.. और इस वातावरण का असर मौसम और फाल्गुनी पर भी धीरे धीरे होता जा रहा था
रेणुका केक काटने ही वाली थी तब राजेश ने उसे एक मिनट के लिए रोक लिया.. और पीयूष को आवाज लगाई..
"यस सर.. " पीयूष राजेश के करीब आया.. राजेश ने पीयूष के कान में गिफ्ट के बारे में पूछा.. "वो तो मेरे कमरे में है" पीयूष ने कहा
"अरे भई.. तो लेकर आओ जल्दी.. " राजेश ने कहा.. पीयूष अपने कमरे की ओर भागा
तभी रेणुका ने पिंटू को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा.. पिंटू ने जवाब में "स्योर मैडम" कहा और वो भी हॉल के बाहर चला गया.. अब रेणुका ने कविता को बुलाया.. और सब सुन सके उस तरह कहा "अरे कविता.. मेरा पर्स रूम पर भूल आई हूँ.. जरा लेकर आएगी प्लीज.. टेबल पर ही पड़ा है"
"अभी लेकर आती हूँ" अपने बॉल उछालते हुए कविता रेणुका के कमरे की तरफ दौड़ी
जाते जाते कविता को याद आया की वह कमरे की चाबी लेना तो भूल ही गई थी.. पर तब तक वो कमरे तक पहुँच गई थी.. उसने देखा की कमरा तो पहले से ही खुला हुआ था.. दरवाजा खोलकर उसने प्रवेश किया.. बेग के अंदर कुछ ढूंढ रहे पिंटू की पीठ देखकर वह चोंक उठी.. तभी कविता के मोबाइल की रिंग बजी.. पिंटू ने घबराकर पीछे देखा और आश्चर्य से पूछा "अरे कविता? तुम यहाँ? क्या बात है?"
पिंटू को बोलने से रोकने के लिए कविता ने अपने होंठ पर उंगली रखते हुए इशारा किया और फोन रिसीव किया "हैलो.. !!"
"ओके मैडम" एक ही सेकंड में उसने फोन काट दिया
कविता ने दरवाजा अंदर से लॉक कर दिया और पिंटू को अपनी बाहों में भरकर.. रेणुका-राजेश के बिस्तर पर गिरा दिया
पिंटू घबरा गया "ये क्या कर रही है पगली??" उसने कविता को धक्का देकर अपने आप को उससे दूर किया
"अरे पिंटू मेरी जान.. रेणुका मैडम ने जान बूझकर हम दोनों को यहाँ भेजा है.. अभी उनका ही फोन था.. डरने की कोई बात नही है.. हम एकदम सेफ है यहाँ.. आई लव यू पिंटू" कहते हुए वह पिंटू से लिपट पड़ी..
उसी वक्त.. पूरे माउंट आबू में एक साथ लाइट चली गई.. कहीं किसी ट्रैन्स्फॉर्मर में एक जबरदस्त धमाके की आवाज सब ने सुनी.. अंधेरा होते ही पीयूष का हाथ कविता के पतले टॉप के अंदर घुस गया और वह उसके दसहरी आम का रस निकालने लगा.. कविता के अद्भुत कामुक स्तनों को वो मसलने लगा.. कविता का हाथ सीधा पीयूष के लंड पर पहुँच गया.. पेंट के ऊपर से लंड को मालते हुए उसने अपने लिपस्टिक लगे होंठ पीयूष के होंठों पर रख दिए..
कविता के बिना ब्रा वाले स्तनों को हाथ में पकड़ते ही पिंटू की आह निकल गई.. कविता ने तुरंत अपना टॉप ऊपर कर लिया और पिंटू का चेहरा अपने दोनों स्तनों पर दबा दिया.. दोनों एक दूसरे में ऐसे खो गए.. जैसे धरती पर वो दो आखिरी इंसान हो.. पिंटू से ज्यादा भूख कविता की थी इसलिए वह काफी आक्रामक थी.. पीयूष की अवहेलना से परेशान कविता अपने प्रेमी के आगोश में आते ही उत्तेजित हो गई.. उसका जिस्म किसी मर्द को चाहता था.. क्योंकि पिछले काफी दिनों से पीयूष ने उसे हाथ भी नही लगाया था.. ऊपर से माउंट आबू आने के बाद उसकी इच्छाएं और उछलने लगी थी.. पिछले दो घंटों में.. अनगिनत मर्दों की भूखी नज़रों को अपने स्तन पर पड़ती हुई महसूस कर वह तड़पने लगी थी..
पिंटू भी अपने पहले प्यार को पा कर खुश हो गया था.. कविता के स्तनों की गर्माहट का मज़ा लेते हुए वह उसकी जांघों को सहलाने लगा.. जैसे जैसे पिंटू का हाथ उसकी जांघों पर आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे कविता अपनी टांगें चौड़ी करते हुए अपना राजद्वार खोल रही थी..पिंटू के हाथ के स्पर्श से वह सिहरते हुए उसने अपनी आँखें बंद कर ली.. चिकनी जांघों को सहलाते हुए पिंटू को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे संगेमरमर पर हाथ फेर रहा हो.. कविता का सहकार भी ऐसा मिल रहा था की कुछ ही सेकंड में पिंटू का हाथ उसकी चूत तक पहुँच गया..
पता नही.. ऐसा कौनसा जादू होता है स्त्री की योनि में..जिसे देखते ही पुरुष बेकाबु होकर जानवर की तरह टूट पड़ता है.. कविता ने अब पेंट की अंदर हाथ डालकर पिंटू का लंड पकड़ लिया था..
"कितना सख्त हो गया है यार" कविता को उसके लंड की गर्मी अपनी हथेली पर महसूस हो रही थी
"तुझे इस तरह देखने के बाद.. किसी का भी सख्त हो जाए.. क्या लग रही है तू कविता.. आह्ह.. " कविता की छाती को चूम चाटकर मदहोश कर दिया उसे पिंटू ने ..
उत्तेजनावश पिंटू के लंड पर कविता के हाथों की पकड़ और सख्त हो गई.. अपने स्तनों को और सख्ती से दबा दिया पिंटू के मुंह पर..
"अब मुझसे रहा नहीं जाता पिंटू.. कुछ कर ना जल्दी.. "
"ओह्ह कविता.. मेरी जान.. " कहते हुए पिंटू ने अपने पेंट की चैन खोलकर लंड बाहर निकाल लिया.. कविता बेचैन होकर पिंटू के लंड के टोपे को चूसने लगी.. कविता की इस हरकत से पिंटू भी अपना आपा खो बैठा.. कभी वो कविता की नंगी पीठ को सहलाता.. कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरता.. तो कभी उसके स्तन को दबाता
"जल्दी करना होगा कविता.. सब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे.. तू जल्दी उलटी लेट जा.. हमारी फेवरिट पोजीशन में करेंगे.. " पिंटू ने कहा
"नही यार.. मेरी बिना चाटे मैं तुझे छोड़ने वाली नही हूँ आज.. कितना वक्त हो गया.. आखिरी बार जब मेरे घर के पीछे की अंधेरी गली में मिले थे तब तूने चाटी थी मेरी.. वो रात मुझे बहोत याद आती है.. तेरी जीभ जब अंदर गई थी तब.. आह्ह इतना मज़ा आया था की क्या बताऊ.. प्लीज यार.. आज अपनी जीभ अंदर तक घुसेड़कर चाट दे एक बार"
"जो भी करवाना है जरा जल्दी कर यार" पिंटू ने कहा..
कविता ने तुरंत अपनी छोटी सी शॉर्ट्स और पेन्टी एक साथ उतार फेंकी.. पिंटू कविता की जांघों को चाटने लगा.. वो भी गरम हो चुका था.. कविता ने उसका सर पकड़ा और उसके मुंह को अपनी चिपचिपी बुर पर लगा दिया.. पिंटू की जीभ का अपनी चूत पर स्पर्श प्राप्त होते ही कविता स्वर्ग में पहुँच गई.. पिंटू के कामुक चुंबनों का असर इतनी तीव्रता से हुआ की एक ही पल में उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. उसके स्तन सख्त हो गए और निप्पल बंदूक की गोली जैसी टाइट हो गई.. पिंटू जैसे जैसे चाटता गया.. कविता की सिसकियों का वॉल्यूम बढ़ता गया.. अपने पसंदीदा पात्र के साथ संभोग करने से बेहतर मज़ा ओर कोई नही है..
पिंटू की जीभ ने कविता को उसके सारे गम भुला दिए.. कमर को उचक उचक कर वह अपनी चूत को पिंटू के मुंह से घिस रही थी.. कराहते हुए कविता का जिस्म एकदम सख्त और सीधा हो गया.. वह थरथराने लगी.. और एक छोटी सी चीख के साथ पिंटू के मुंह में झड़ गई.. स्खलित होते ही कविता का जिस्म एकदम हल्का हो गया.. दिमाग शांत हो गया.. मन तृप्त हो गया.. अपना काम खतम होते ही उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ..
अब लाइट भी आ चुकी थी
"अब हमे चलना चाहिए पिंटू.. बहोत देर हो गई" कविता ने कहा
"अच्छा?? तो फिर इस सख्त लोडे का क्या करू? ये अब ढीला होने नही वाला.. अब ईसे वापिस पेंट में डालना भी मुमकिन नही है.. क्या करू? तू बता" पिंटू ने थोड़े गुस्से से कहा..
कविता उठकर पिंटू के लंड को तेज गति से हिलाने लग गई.. पिंटू कविता के बॉल को पागलों की तरह दबाने लगा.. पिंटू को बिस्तर पर सुलाते हुए कविता उसके ऊपर चढ़ बैठी.. और अपने हाथ को नीचे ले गई.. पिंटू के कड़े लंड को अपनी चूत के सेंटर पर रखकर उसने दबाया.. पर लंड अंदर गया नही.. कविता ने अपनी हथेली पर थोड़ा सा थूक लेकर नीचे लंड पर लगाया.. और ऊपर वज़न देने लगी..
"उफ्फ़ पिंटू.. तेरा ज्यादा मोटा हो गया है क्या.. !! अंदर जा ही नही रहा.. दर्द हो रहा है मुझे.. ऊईई माँ.. !!" धीरे धीरे कविता की चूत लंड निगलती रही.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए कविता ऊपर नीचे होते हुए धक्के लगाने लगी..
अपना ऑर्गजम हो जाने के बावजूद.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए.. अपनी कामुक अदाओं से वह पिंटू को रिझाने लगी.. कविता की चूत के एकदम टाइट वर्टिकल होंठों की पकड़ इतनी मजबूत थी की पिंटू नीचे लैटे लैटे स्वर्ग का आनंद ले रहा था.. ऊपर नीचे करते हुए लय बनाकर कविता अपने स्तनों को उछाल रही थी.. अपनी चूत की गहराई में अंदर तक उसे लंड की गर्माहट का एहसास हो रहा था.. गति बढ़ाते हुए कविता चाहती थी पिंटू जल्दी से जल्दी झड़ जाए..
अपने स्तनों पर पिंटू की टाइट पकड़ महसूस करते हुए कविता को पता चल गया की पिंटू अब झड़ने के करीब था.. उसने अपनी उछलने की गति दोगुनी कर दी..
"ओह्ह गॉड.. फक मी.. लव यू मेरी जान.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे.. कितनी टाइट है तेरी चूत.. पीयूष डालता भी है या नही अंदर.. ओह्ह ओह!!" कविता की कमर पकड़कर उसे धक्के लगाने में मदद कर रहा था पिंटू
लंड के घर्षण से अभी अभी स्खलित हुई कविता फिर से गरम होने लगी.. अपनी चूत की मांसपेशियों को उसने इतना टाइट कर दिया जैसे पिंटू के लंड का गला घोंट देना चाहती हो.. लंड और चूत की लड़ाई में हम मानते है की आखिर में लंड जीता या चूत जीती.. पर हकीकत में चूत कभी हारती नही.. हार हमेशा लंड की ही होती है.. कभी चूत से बाहर निकले लंड के हाल देखें है!!! कोल्हू से निकले हुए गन्ने जैसी हालत होती है लंड की..
लंड पर दबाव बढ़ते ही पिंटू के लंड ने पिचकारी मार दी.. दोनों प्रेमी एक दूसरे से लिपट गए..
कुछ सेकंडों तक लिपटे रहने के बाद रीलैक्स होकर पिंटू के होंठों को चूमते हुए कविता ने कहा.. "अब मुझे जाना होगा पिंटू.. जाने का मन तो नही है पर क्या करें.. !! काश हम दोनों को साथ में एक रात गुजारने का मौका मिल जाएँ "
"फिलहाल तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन नही है.. तू अब कुंवारी नही है.. पीयूष की पत्नी है तू.. चल अब तू जल्दी जा.. मैं थोड़ी देर में आता हूँ वरना किसी को शक हो जाएगा"
"नही.. तू पहले निकल.. मैं यह बेड की चादर और मेरा मेकअप ठीक करके आती हूँ" पिंटू का चेहरा उसने अपने रुमाल से पोंछ कर उसके बाल ठीक कर दिए और उसे एक आखिर किस देकर जाने दिया.. उसके जाने के बाद कविता ने आईने में देखकर अपना मेकअप ठीक किया.. लिपस्टिक फिर से लगाई.. ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी रेणुका की डार्क ब्राउन शेड की लिपस्टिक होंठों पर लगाते हुए उसे पिंटू के सुपाड़े की याद आ गई.. कविता हंस पड़ी.. सोचने लगी.. दुनिया की सर्वश्रेष्ठ लिपस्टिक तो लंड ही है.. उससे होंठ गीले करने में जो मज़ा है वो बेजान लिपस्टिक में कहाँ!!! शायद इसी कारण सारी कंपनियां लिपस्टिक को लंड के आकार की ही बनाते है..
कविता ने फटाफट अपने बाल ठीक कीये.. बेड की चादर की सिलवटें दूर की.. और सब कुछ एक आखिरी बार चेक करते हुए रूम से बाहर निकली। हॉल में पहुंचते ही उसने देखा की सब पार्टी इन्जॉय कर रहे थे.. कविता के उछलते स्तनों की गैरमौजूदगी में सारा वातावरण शांत सा था.. पर जैसे आंधी आते ही सब अस्तव्यस्त हो जाता है.. वैसे ही कविता की पायलों की झंकार सुनते ही सब अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसे देखने लगे.. अपने हाथ के ग्लास में पड़ी दारू को भूलकर कविता के जोबन को पीने लगे.. मर्द तो मर्द.. सारी औरतें भी कविता के स्तन युग्म को देखती ही रह गई.. सब कविता को देख रहे थे.. एक पीयूष को छोड़कर.. पीयूष नाम का भँवरा.. मौसम नाम के ताजे खिले फूल का रस चूसने के लिए यहाँ वहाँ मंडरा रहा था..
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