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Thriller The cold night (वो सर्द रात) (completed)

Ajju Landwalia

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# 20

रोमेश ने सात जनवरी को पुन: जे.एन. को फोन किया।

"जनार्दन नागा रेड्डी, तुम्हें पता लग ही चुका होगा कि मैं दस तारीख को मुम्बई से बाहर रहूँगा। लेकिन तुम्हारे लिए यह कोई खुश होने की बात नहीं है। मैं चाहे दूर रहूँ या करीब, मौत तो तुम्हारी आनी ही है। दो दिन और काट लो, फिर सब खत्म हो जायेगा।"


"तेरे को मैं दस तारीख के बाद पागलखाने भिजवाऊंगा।" जे.एन. बोला,

"इतनी बकवास करने पर भी तू जिन्दा है, यह शुक्र कर।"

"तू सावंत का हत्यारा है।"


"तू सावंत का मामा लगता है या कोई रिश्ते नाते वाला ?"

"तूने और भी न जाने कितने लोगों को मरवाया होगा ?"


"तू बस अपनी खैर मना, अभी तो तू मुझे चेतावनी देता फिर रहा है, मैंने अगर आँख भी घुमा दी न तेरी तरफ, तो तू दुनिया में नहीं रहेगा। बस बहुत हो गया, अब मेरे को फोन मत करना, वरना मेरा पारा सिर से गुजर जायेगा।" जे.एन. ने फोन काट दिया।

"साला मुझे मारेगा, पागल हो गया है।" जे. एन. ने अपने चारों सरकारी कमाण्डो को बुलाया,

"यहाँ तुम चारों का क्या काम है?"

"दस तारीख की रात तक आपकी हिफाजत करना।" कमाण्डो में से एक बोला।

"हाँ , हिफाजत करना। मगर यह मत समझना कि सिर्फ तुम चार ही मेरी हिफाजत पर हो। तुम्हारे पीछे मेरे आदमी भी रहेंगे और अगर मुझे कुछ हो गया, तो मेरे आदमी तुम चारों को भूनकर रख देंगे, समझे कि नहीं ?"


"अपनी जान बचानी है, तो मैं सलामत रहूं। हमेशा साये की तरह मेरे साथ लगे रहना।"

"ओ.के. सर ! हमारे रहते परिन्दा भी आपको पर नहीं मार सकता।"

"हूँ।" जे.एन. आगे बढ़ गया और फिर सीधा अपने बैडरूम में चला गया। आठ तारीख को वह एकदम तरो ताजा था। चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उसके बैडरूम के बाहर दो कमाण्डो चौकसी करते रहे। सुबह सोने वाले पहरेदार उठ गये और रात वाले सो गये।

यूँ तो जे.एन. के बंगले में जबरदस्त सिक्योरिटी थी। उसके प्राइवेट गार्ड्स भी थे, बंगले में किसी का घुसना एकदम असम्भव था। फोन रोमेश ने आठ जनवरी को भी किया, लेकिन जे.एन. अब उसके फोनों को ज्यादा ध्यान नहीं देता था।

नौ तारीख को जरुर उसके दिमाग में हलचल थी, कहीं सचमुच उस वकील ने कोई प्लान तो नहीं बना रखा है।

"वह अपने हाथों से मेरा कत्ल करेगा। क्या यह सम्भव है?"अपने आपसे जे.एन. ने सवाल किया,

"वह भी तारीख बता कर, नामुमकिन। इतना बड़ा बेवकूफ तो नहीं था वो।"

"मगर वह तो नौ को ही दिल्ली जाने वाला है।" जे.एन. के मन ने उत्तर दिया। जनार्दन नागा रेड्डी ने फैसला किया कि वह रोमेश को मुम्बई से बाहर जाते हुए जरूर देखेगा।
अतः वह राजधानी के समय मुम्बई सेन्ट्रल पहुंच गया। राजधानी एक्सप्रेस कुल चार स्टेशनों पर रुकती थी। अठारह घंटे बाद वह दिल्ली पहुंच जाती थी। ग्यारह-बारह बजे दिल्ली पहुंचेगा, फिर रात को चित्रा क्लब में अपनी बीवी से मिलेगा। नामुमकिन! फिर वह मुम्बई कैसे पहुंच सकता था? और अगर वह मुम्बई में होगा भी, तो क्या बिगाड़ लेगा? जे.एन. खुद रिवॉल्वर रखता था और अच्छा निशानेबाज भी था।

रेलवे स्टेशन पर वैशाली और विजय, रोमेश को विदा करने आये थे। राजधानी प्लेटफार्म पर आ गई थी और यात्री चढ़ रहे थे। रोमेश भी अपनी सीट पर जा बैठा। रस्मी बातें होती रही।

"कुछ भी हो, मैं तुम दोनों की शादी में जरूर शामिल होऊंगा।" रोमेश काफी खुश था। दूर खड़ा जे.एन. यह सब देख रहा था । जे.एन. के पास ही माया दास भी खड़ा था और उनके गार्ड्स भी मौजूद थे। रोमेश की दृष्टि प्लेटफार्म पर दूर तक दौड़ती चली गई। फिर उसकी निगाह जे.एन. पर ठहर गई।

"अपना ख्याल रखना" ट्रेन का ग्रीन सिग्नल होते ही विजय ने कहा।


"हाँ , तुम भी मेरी बातों का ध्यान रखना। हमेशा एक ईमानदार होनहार पुलिस ऑफिसर की तरह काम करना। अगर कभी मुझे कत्ल के जुर्म में गिरफ्तार करना पड़े, तो संकोच मत करना। कर्तव्य के आगे रिश्ते नातों का कोई महत्व नहीं रहता।" रोमेश ने उस पर एक अजीब-सी मुस्कराहट डाली।

गाड़ी चल पड़ी। रोमेश ने हाथ हिलाया, गाड़ी सरकती हुई आहिस्ता-आहिस्ता उस तरफ बढ़ी, जिधर जे.एन. खड़ा था। रोमेश ने हाथ हिला कर उसे भी बाय किया और फिर ए.सी . डोर में दाखिल हो गया। गाड़ी धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ती जा रही थी। विजय ने गहरी सांस ली और फिर सीधा जे.एन. के पास पहुँचा।

"सब ठीक है ?" विजय ने कहा।

"गुड !" जे.एन. की बजाय मायादास ने उत्तर दिया और फिर वह लोग मुड़ गये। राजधानी ने तब तक पूरी रफ्तार पकड़ ली थी।

“दस जनवरी, शनिवार का दिन।“

यह वह दिन था, जो बहुत से लोगों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण था। सबसे अधिक महत्वपूर्ण दिन था जनार्दन नागा रेड्डी के लिए। जो सवेरे-सवेरे मन्दिर इसलिये गया था, ताकि उसके ऊपर जो शनि की ग्रह दशा चढ़ी हुई है, वह शांत रहे। शनि ने उसे अब तक कई झटके दे दिये थे, उसे मुख्यमंत्री पद से हटवाया था, सावंत की हत्या करवाई थी और अब एक शख्स ने उसे शनिवार को ही मार डालने का ऐलान कर दिया था।

जनार्दन नागा रेड्डी वैसे तो हर कार्य अपने तांत्रिक गुरु से पूछकर ही किया करता था। तांत्रिक गुरु स्वामी करुणानन्द ने ही उस पर शनि की दशा बताई थी और ग्रह को शांत करने के लिए उपाय भी बताए थे।

जे.एन. इन उपायों को निरंतर करता रहा था। इसके अतिरिक्त स्वयं तांत्रिक भी ग्रह शांत करने के लिए अनुष्ठान कर रहा था। मन्दिर से लौटते हुये भी जे.एन. के दिलो-दिमाग से यह बात नहीं निकल पा रही थी कि आज शनिवार का दिन है। घर पहुंच कर उसने माया-दास को बुलाया। मायादास तुरन्त हाजिर हो गया।


"मायादास जी, जरा देखना तो हमें आज किस-किससे मिलना है?" जे.एन. ने पूछा। माया-दास ने मिलने वालों की सूची बना दी।


"ऐसा करिये, सारी मुलाकातें कैंसिल कर दीजिये।" जे.एन. बोला।

"क्यों श्री मान जी? " मायादास ने हैरानी से पूछा।

"भई आपको कम से कम यह तो देख लेना चाहिये था कि आज शनिवार है।"

"तो शनिवार होने से क्या फर्क पड़ता है ?"

"क्या आपको मालूम नहीं कि हम पर शनि की दशा सवार है?"

"लेकि….न उससे इन मुलाकातों पर क्या असर पड़ता है, यह सारे लोग तो आपके पूर्व परिचित हैं। साथ में आपको फायदा भी पहुंचाने वाले हैं।"

"कुछ भी हो, हम आज किसी से नहीं मिलेंगे।"


"जैसी आपकी मर्जी।" मायादास ने कहा,

"वैसे आपकी तबियत तो ठीक है?"

"बैठो, यहाँ हमारे पास बैठो।" जे.एन. बोला। मायादास पास बैठ गया।

"देखो मायादास जी, तुम्हें याद है कि पिछले कई शनिवारों से हमें तगड़े झटके लगे हैं। जिस दिन सावन्त का चार्ज हमारे आदमी पर लगा, वह भी शनिवार का दिन था। जिस दिन मैंने सी .एम. की सीट छोड़ी, वह भी शनिवार का दिन था। और इस रोमेश के बच्चे ने भी मुझे मारने का दिन शनिवार ही चुना।"

"ओह, तो यह टेंशन है आपके दिमाग में। लेकिन मुझे यकीन है, यह टेंशन कल तक दूर हो जायेगी। अब आप चाहें तो दिन भर आराम कर सकते हैं। मैं आप तक किसी का टेलीफोन भी नहीं पहुंचने दूँगा। कोई खास फोन हुआ, तो बात अलग है। वरना मैं कोड वाले फोन भी नहीं पहुंचने दूँगा।"


"हाँ, ठीक है। मुझे आराम करना चाहिये।" जे.एन. अपने बैडरूम में चला गया, लेकिन आराम कहाँ ? बन्द कमरे में तो उसकी बैचेनी और बढ़ ही रही थी। बार-बार रोमेश की धमकी का ख्याल आता।



जारी रहेगा.......✍️✍️

Bahut hi umda update he Raj_sharma Bhai,

Kuch bhi kaho JN ki faad ke rakhi huyi he romy ne...............shaniwar ke apne sare kisse yaad aa gaye JN ko.........

Romy train me batih to gaya......lekin JN ko nipatayega jarur.........

Agli dhamakedar update ke intezar rahega Bhai
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Bahut hi umda update he Raj_sharma Bhai,

Kuch bhi kaho JN ki faad ke rakhi huyi he romy ne...............shaniwar ke apne sare kisse yaad aa gaye JN ko.........

Romy train me batih to gaya......lekin JN ko nipatayega jarur.........

Agli dhamakedar update ke intezar rahega Bhai
Thanks brother, jaise aapko lagta hai, mujhe bhi wahi lag raha hai, Romi promise ka pakka aadmi hai, jo bola hai wo karta jaroor hai👍 ab J.N. ke maamle me aisa ho pata hai ya nahi ye dekhne wali baat hogi👍 waise uski fati hui to hai :D
 

parkas

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# 20

रोमेश ने सात जनवरी को पुन: जे.एन. को फोन किया।

"जनार्दन नागा रेड्डी, तुम्हें पता लग ही चुका होगा कि मैं दस तारीख को मुम्बई से बाहर रहूँगा। लेकिन तुम्हारे लिए यह कोई खुश होने की बात नहीं है। मैं चाहे दूर रहूँ या करीब, मौत तो तुम्हारी आनी ही है। दो दिन और काट लो, फिर सब खत्म हो जायेगा।"


"तेरे को मैं दस तारीख के बाद पागलखाने भिजवाऊंगा।" जे.एन. बोला,

"इतनी बकवास करने पर भी तू जिन्दा है, यह शुक्र कर।"

"तू सावंत का हत्यारा है।"


"तू सावंत का मामा लगता है या कोई रिश्ते नाते वाला ?"

"तूने और भी न जाने कितने लोगों को मरवाया होगा ?"


"तू बस अपनी खैर मना, अभी तो तू मुझे चेतावनी देता फिर रहा है, मैंने अगर आँख भी घुमा दी न तेरी तरफ, तो तू दुनिया में नहीं रहेगा। बस बहुत हो गया, अब मेरे को फोन मत करना, वरना मेरा पारा सिर से गुजर जायेगा।" जे.एन. ने फोन काट दिया।

"साला मुझे मारेगा, पागल हो गया है।" जे. एन. ने अपने चारों सरकारी कमाण्डो को बुलाया,

"यहाँ तुम चारों का क्या काम है?"

"दस तारीख की रात तक आपकी हिफाजत करना।" कमाण्डो में से एक बोला।

"हाँ , हिफाजत करना। मगर यह मत समझना कि सिर्फ तुम चार ही मेरी हिफाजत पर हो। तुम्हारे पीछे मेरे आदमी भी रहेंगे और अगर मुझे कुछ हो गया, तो मेरे आदमी तुम चारों को भूनकर रख देंगे, समझे कि नहीं ?"


"अपनी जान बचानी है, तो मैं सलामत रहूं। हमेशा साये की तरह मेरे साथ लगे रहना।"

"ओ.के. सर ! हमारे रहते परिन्दा भी आपको पर नहीं मार सकता।"

"हूँ।" जे.एन. आगे बढ़ गया और फिर सीधा अपने बैडरूम में चला गया। आठ तारीख को वह एकदम तरो ताजा था। चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उसके बैडरूम के बाहर दो कमाण्डो चौकसी करते रहे। सुबह सोने वाले पहरेदार उठ गये और रात वाले सो गये।

यूँ तो जे.एन. के बंगले में जबरदस्त सिक्योरिटी थी। उसके प्राइवेट गार्ड्स भी थे, बंगले में किसी का घुसना एकदम असम्भव था। फोन रोमेश ने आठ जनवरी को भी किया, लेकिन जे.एन. अब उसके फोनों को ज्यादा ध्यान नहीं देता था।

नौ तारीख को जरुर उसके दिमाग में हलचल थी, कहीं सचमुच उस वकील ने कोई प्लान तो नहीं बना रखा है।

"वह अपने हाथों से मेरा कत्ल करेगा। क्या यह सम्भव है?"अपने आपसे जे.एन. ने सवाल किया,

"वह भी तारीख बता कर, नामुमकिन। इतना बड़ा बेवकूफ तो नहीं था वो।"

"मगर वह तो नौ को ही दिल्ली जाने वाला है।" जे.एन. के मन ने उत्तर दिया। जनार्दन नागा रेड्डी ने फैसला किया कि वह रोमेश को मुम्बई से बाहर जाते हुए जरूर देखेगा।
अतः वह राजधानी के समय मुम्बई सेन्ट्रल पहुंच गया। राजधानी एक्सप्रेस कुल चार स्टेशनों पर रुकती थी। अठारह घंटे बाद वह दिल्ली पहुंच जाती थी। ग्यारह-बारह बजे दिल्ली पहुंचेगा, फिर रात को चित्रा क्लब में अपनी बीवी से मिलेगा। नामुमकिन! फिर वह मुम्बई कैसे पहुंच सकता था? और अगर वह मुम्बई में होगा भी, तो क्या बिगाड़ लेगा? जे.एन. खुद रिवॉल्वर रखता था और अच्छा निशानेबाज भी था।

रेलवे स्टेशन पर वैशाली और विजय, रोमेश को विदा करने आये थे। राजधानी प्लेटफार्म पर आ गई थी और यात्री चढ़ रहे थे। रोमेश भी अपनी सीट पर जा बैठा। रस्मी बातें होती रही।

"कुछ भी हो, मैं तुम दोनों की शादी में जरूर शामिल होऊंगा।" रोमेश काफी खुश था। दूर खड़ा जे.एन. यह सब देख रहा था । जे.एन. के पास ही माया दास भी खड़ा था और उनके गार्ड्स भी मौजूद थे। रोमेश की दृष्टि प्लेटफार्म पर दूर तक दौड़ती चली गई। फिर उसकी निगाह जे.एन. पर ठहर गई।

"अपना ख्याल रखना" ट्रेन का ग्रीन सिग्नल होते ही विजय ने कहा।


"हाँ , तुम भी मेरी बातों का ध्यान रखना। हमेशा एक ईमानदार होनहार पुलिस ऑफिसर की तरह काम करना। अगर कभी मुझे कत्ल के जुर्म में गिरफ्तार करना पड़े, तो संकोच मत करना। कर्तव्य के आगे रिश्ते नातों का कोई महत्व नहीं रहता।" रोमेश ने उस पर एक अजीब-सी मुस्कराहट डाली।

गाड़ी चल पड़ी। रोमेश ने हाथ हिलाया, गाड़ी सरकती हुई आहिस्ता-आहिस्ता उस तरफ बढ़ी, जिधर जे.एन. खड़ा था। रोमेश ने हाथ हिला कर उसे भी बाय किया और फिर ए.सी . डोर में दाखिल हो गया। गाड़ी धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ती जा रही थी। विजय ने गहरी सांस ली और फिर सीधा जे.एन. के पास पहुँचा।

"सब ठीक है ?" विजय ने कहा।

"गुड !" जे.एन. की बजाय मायादास ने उत्तर दिया और फिर वह लोग मुड़ गये। राजधानी ने तब तक पूरी रफ्तार पकड़ ली थी।

“दस जनवरी, शनिवार का दिन।“

यह वह दिन था, जो बहुत से लोगों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण था। सबसे अधिक महत्वपूर्ण दिन था जनार्दन नागा रेड्डी के लिए। जो सवेरे-सवेरे मन्दिर इसलिये गया था, ताकि उसके ऊपर जो शनि की ग्रह दशा चढ़ी हुई है, वह शांत रहे। शनि ने उसे अब तक कई झटके दे दिये थे, उसे मुख्यमंत्री पद से हटवाया था, सावंत की हत्या करवाई थी और अब एक शख्स ने उसे शनिवार को ही मार डालने का ऐलान कर दिया था।

जनार्दन नागा रेड्डी वैसे तो हर कार्य अपने तांत्रिक गुरु से पूछकर ही किया करता था। तांत्रिक गुरु स्वामी करुणानन्द ने ही उस पर शनि की दशा बताई थी और ग्रह को शांत करने के लिए उपाय भी बताए थे।

जे.एन. इन उपायों को निरंतर करता रहा था। इसके अतिरिक्त स्वयं तांत्रिक भी ग्रह शांत करने के लिए अनुष्ठान कर रहा था। मन्दिर से लौटते हुये भी जे.एन. के दिलो-दिमाग से यह बात नहीं निकल पा रही थी कि आज शनिवार का दिन है। घर पहुंच कर उसने माया-दास को बुलाया। मायादास तुरन्त हाजिर हो गया।


"मायादास जी, जरा देखना तो हमें आज किस-किससे मिलना है?" जे.एन. ने पूछा। माया-दास ने मिलने वालों की सूची बना दी।


"ऐसा करिये, सारी मुलाकातें कैंसिल कर दीजिये।" जे.एन. बोला।

"क्यों श्री मान जी? " मायादास ने हैरानी से पूछा।

"भई आपको कम से कम यह तो देख लेना चाहिये था कि आज शनिवार है।"

"तो शनिवार होने से क्या फर्क पड़ता है ?"

"क्या आपको मालूम नहीं कि हम पर शनि की दशा सवार है?"

"लेकि….न उससे इन मुलाकातों पर क्या असर पड़ता है, यह सारे लोग तो आपके पूर्व परिचित हैं। साथ में आपको फायदा भी पहुंचाने वाले हैं।"

"कुछ भी हो, हम आज किसी से नहीं मिलेंगे।"


"जैसी आपकी मर्जी।" मायादास ने कहा,

"वैसे आपकी तबियत तो ठीक है?"

"बैठो, यहाँ हमारे पास बैठो।" जे.एन. बोला। मायादास पास बैठ गया।

"देखो मायादास जी, तुम्हें याद है कि पिछले कई शनिवारों से हमें तगड़े झटके लगे हैं। जिस दिन सावन्त का चार्ज हमारे आदमी पर लगा, वह भी शनिवार का दिन था। जिस दिन मैंने सी .एम. की सीट छोड़ी, वह भी शनिवार का दिन था। और इस रोमेश के बच्चे ने भी मुझे मारने का दिन शनिवार ही चुना।"

"ओह, तो यह टेंशन है आपके दिमाग में। लेकिन मुझे यकीन है, यह टेंशन कल तक दूर हो जायेगी। अब आप चाहें तो दिन भर आराम कर सकते हैं। मैं आप तक किसी का टेलीफोन भी नहीं पहुंचने दूँगा। कोई खास फोन हुआ, तो बात अलग है। वरना मैं कोड वाले फोन भी नहीं पहुंचने दूँगा।"


"हाँ, ठीक है। मुझे आराम करना चाहिये।" जे.एन. अपने बैडरूम में चला गया, लेकिन आराम कहाँ ? बन्द कमरे में तो उसकी बैचेनी और बढ़ ही रही थी। बार-बार रोमेश की धमकी का ख्याल आता।



जारी रहेगा.......✍️✍️
Bahut hi shaanadar update diya hai Raj_sharma bhai....
Nice and lovely update....
 

dhparikh

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# 20

रोमेश ने सात जनवरी को पुन: जे.एन. को फोन किया।

"जनार्दन नागा रेड्डी, तुम्हें पता लग ही चुका होगा कि मैं दस तारीख को मुम्बई से बाहर रहूँगा। लेकिन तुम्हारे लिए यह कोई खुश होने की बात नहीं है। मैं चाहे दूर रहूँ या करीब, मौत तो तुम्हारी आनी ही है। दो दिन और काट लो, फिर सब खत्म हो जायेगा।"


"तेरे को मैं दस तारीख के बाद पागलखाने भिजवाऊंगा।" जे.एन. बोला,

"इतनी बकवास करने पर भी तू जिन्दा है, यह शुक्र कर।"

"तू सावंत का हत्यारा है।"


"तू सावंत का मामा लगता है या कोई रिश्ते नाते वाला ?"

"तूने और भी न जाने कितने लोगों को मरवाया होगा ?"


"तू बस अपनी खैर मना, अभी तो तू मुझे चेतावनी देता फिर रहा है, मैंने अगर आँख भी घुमा दी न तेरी तरफ, तो तू दुनिया में नहीं रहेगा। बस बहुत हो गया, अब मेरे को फोन मत करना, वरना मेरा पारा सिर से गुजर जायेगा।" जे.एन. ने फोन काट दिया।

"साला मुझे मारेगा, पागल हो गया है।" जे. एन. ने अपने चारों सरकारी कमाण्डो को बुलाया,

"यहाँ तुम चारों का क्या काम है?"

"दस तारीख की रात तक आपकी हिफाजत करना।" कमाण्डो में से एक बोला।

"हाँ , हिफाजत करना। मगर यह मत समझना कि सिर्फ तुम चार ही मेरी हिफाजत पर हो। तुम्हारे पीछे मेरे आदमी भी रहेंगे और अगर मुझे कुछ हो गया, तो मेरे आदमी तुम चारों को भूनकर रख देंगे, समझे कि नहीं ?"


"अपनी जान बचानी है, तो मैं सलामत रहूं। हमेशा साये की तरह मेरे साथ लगे रहना।"

"ओ.के. सर ! हमारे रहते परिन्दा भी आपको पर नहीं मार सकता।"

"हूँ।" जे.एन. आगे बढ़ गया और फिर सीधा अपने बैडरूम में चला गया। आठ तारीख को वह एकदम तरो ताजा था। चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उसके बैडरूम के बाहर दो कमाण्डो चौकसी करते रहे। सुबह सोने वाले पहरेदार उठ गये और रात वाले सो गये।

यूँ तो जे.एन. के बंगले में जबरदस्त सिक्योरिटी थी। उसके प्राइवेट गार्ड्स भी थे, बंगले में किसी का घुसना एकदम असम्भव था। फोन रोमेश ने आठ जनवरी को भी किया, लेकिन जे.एन. अब उसके फोनों को ज्यादा ध्यान नहीं देता था।

नौ तारीख को जरुर उसके दिमाग में हलचल थी, कहीं सचमुच उस वकील ने कोई प्लान तो नहीं बना रखा है।

"वह अपने हाथों से मेरा कत्ल करेगा। क्या यह सम्भव है?"अपने आपसे जे.एन. ने सवाल किया,

"वह भी तारीख बता कर, नामुमकिन। इतना बड़ा बेवकूफ तो नहीं था वो।"

"मगर वह तो नौ को ही दिल्ली जाने वाला है।" जे.एन. के मन ने उत्तर दिया। जनार्दन नागा रेड्डी ने फैसला किया कि वह रोमेश को मुम्बई से बाहर जाते हुए जरूर देखेगा।
अतः वह राजधानी के समय मुम्बई सेन्ट्रल पहुंच गया। राजधानी एक्सप्रेस कुल चार स्टेशनों पर रुकती थी। अठारह घंटे बाद वह दिल्ली पहुंच जाती थी। ग्यारह-बारह बजे दिल्ली पहुंचेगा, फिर रात को चित्रा क्लब में अपनी बीवी से मिलेगा। नामुमकिन! फिर वह मुम्बई कैसे पहुंच सकता था? और अगर वह मुम्बई में होगा भी, तो क्या बिगाड़ लेगा? जे.एन. खुद रिवॉल्वर रखता था और अच्छा निशानेबाज भी था।

रेलवे स्टेशन पर वैशाली और विजय, रोमेश को विदा करने आये थे। राजधानी प्लेटफार्म पर आ गई थी और यात्री चढ़ रहे थे। रोमेश भी अपनी सीट पर जा बैठा। रस्मी बातें होती रही।

"कुछ भी हो, मैं तुम दोनों की शादी में जरूर शामिल होऊंगा।" रोमेश काफी खुश था। दूर खड़ा जे.एन. यह सब देख रहा था । जे.एन. के पास ही माया दास भी खड़ा था और उनके गार्ड्स भी मौजूद थे। रोमेश की दृष्टि प्लेटफार्म पर दूर तक दौड़ती चली गई। फिर उसकी निगाह जे.एन. पर ठहर गई।

"अपना ख्याल रखना" ट्रेन का ग्रीन सिग्नल होते ही विजय ने कहा।


"हाँ , तुम भी मेरी बातों का ध्यान रखना। हमेशा एक ईमानदार होनहार पुलिस ऑफिसर की तरह काम करना। अगर कभी मुझे कत्ल के जुर्म में गिरफ्तार करना पड़े, तो संकोच मत करना। कर्तव्य के आगे रिश्ते नातों का कोई महत्व नहीं रहता।" रोमेश ने उस पर एक अजीब-सी मुस्कराहट डाली।

गाड़ी चल पड़ी। रोमेश ने हाथ हिलाया, गाड़ी सरकती हुई आहिस्ता-आहिस्ता उस तरफ बढ़ी, जिधर जे.एन. खड़ा था। रोमेश ने हाथ हिला कर उसे भी बाय किया और फिर ए.सी . डोर में दाखिल हो गया। गाड़ी धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ती जा रही थी। विजय ने गहरी सांस ली और फिर सीधा जे.एन. के पास पहुँचा।

"सब ठीक है ?" विजय ने कहा।

"गुड !" जे.एन. की बजाय मायादास ने उत्तर दिया और फिर वह लोग मुड़ गये। राजधानी ने तब तक पूरी रफ्तार पकड़ ली थी।

“दस जनवरी, शनिवार का दिन।“

यह वह दिन था, जो बहुत से लोगों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण था। सबसे अधिक महत्वपूर्ण दिन था जनार्दन नागा रेड्डी के लिए। जो सवेरे-सवेरे मन्दिर इसलिये गया था, ताकि उसके ऊपर जो शनि की ग्रह दशा चढ़ी हुई है, वह शांत रहे। शनि ने उसे अब तक कई झटके दे दिये थे, उसे मुख्यमंत्री पद से हटवाया था, सावंत की हत्या करवाई थी और अब एक शख्स ने उसे शनिवार को ही मार डालने का ऐलान कर दिया था।

जनार्दन नागा रेड्डी वैसे तो हर कार्य अपने तांत्रिक गुरु से पूछकर ही किया करता था। तांत्रिक गुरु स्वामी करुणानन्द ने ही उस पर शनि की दशा बताई थी और ग्रह को शांत करने के लिए उपाय भी बताए थे।

जे.एन. इन उपायों को निरंतर करता रहा था। इसके अतिरिक्त स्वयं तांत्रिक भी ग्रह शांत करने के लिए अनुष्ठान कर रहा था। मन्दिर से लौटते हुये भी जे.एन. के दिलो-दिमाग से यह बात नहीं निकल पा रही थी कि आज शनिवार का दिन है। घर पहुंच कर उसने माया-दास को बुलाया। मायादास तुरन्त हाजिर हो गया।


"मायादास जी, जरा देखना तो हमें आज किस-किससे मिलना है?" जे.एन. ने पूछा। माया-दास ने मिलने वालों की सूची बना दी।


"ऐसा करिये, सारी मुलाकातें कैंसिल कर दीजिये।" जे.एन. बोला।

"क्यों श्री मान जी? " मायादास ने हैरानी से पूछा।

"भई आपको कम से कम यह तो देख लेना चाहिये था कि आज शनिवार है।"

"तो शनिवार होने से क्या फर्क पड़ता है ?"

"क्या आपको मालूम नहीं कि हम पर शनि की दशा सवार है?"

"लेकि….न उससे इन मुलाकातों पर क्या असर पड़ता है, यह सारे लोग तो आपके पूर्व परिचित हैं। साथ में आपको फायदा भी पहुंचाने वाले हैं।"

"कुछ भी हो, हम आज किसी से नहीं मिलेंगे।"


"जैसी आपकी मर्जी।" मायादास ने कहा,

"वैसे आपकी तबियत तो ठीक है?"

"बैठो, यहाँ हमारे पास बैठो।" जे.एन. बोला। मायादास पास बैठ गया।

"देखो मायादास जी, तुम्हें याद है कि पिछले कई शनिवारों से हमें तगड़े झटके लगे हैं। जिस दिन सावन्त का चार्ज हमारे आदमी पर लगा, वह भी शनिवार का दिन था। जिस दिन मैंने सी .एम. की सीट छोड़ी, वह भी शनिवार का दिन था। और इस रोमेश के बच्चे ने भी मुझे मारने का दिन शनिवार ही चुना।"

"ओह, तो यह टेंशन है आपके दिमाग में। लेकिन मुझे यकीन है, यह टेंशन कल तक दूर हो जायेगी। अब आप चाहें तो दिन भर आराम कर सकते हैं। मैं आप तक किसी का टेलीफोन भी नहीं पहुंचने दूँगा। कोई खास फोन हुआ, तो बात अलग है। वरना मैं कोड वाले फोन भी नहीं पहुंचने दूँगा।"


"हाँ, ठीक है। मुझे आराम करना चाहिये।" जे.एन. अपने बैडरूम में चला गया, लेकिन आराम कहाँ ? बन्द कमरे में तो उसकी बैचेनी और बढ़ ही रही थी। बार-बार रोमेश की धमकी का ख्याल आता।



जारी रहेगा.......✍️✍️
Nice update....
 

Raj_sharma

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Raj_sharma

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DEVIL MAXIMUM

"सर्वेभ्यः सर्वभावेभ्यः सर्वात्मना नमः।"
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204
# 17

जनार्दन नागा रेड्डी के सामने बटाला खड़ा था।

"चप्पे-चप्पे पर अपने आदमी फैला दो, दूर के स्टेशनों के बूथ और दूसरे बूथों के आस पास रात के वक्त तुम्हारे आदमी होने चाहिये। जैसे भी हो इस आदमी का पता लगाओ कि यह है कौन? इसे हमारे कोड्स का पता कैसे लग गया? यह मेरे गुप्त ठिकानों के बारे में कैसे जानता है ? वैसे तो इस काम में पुलिस भी जुट गई है. लेकिन तुम्हें अपने ढंग से पता लगाना है।"

"यस सर ! आप समझ लें, दो दिन में हम उसका पता लगा लेगा और साले को खलास कर देगा।"

"जाओ काम पर लग जाओ।" बटाला सलाम मारकर चला बना।

जे.एन.आज इसलिये फिक्रमंद था, क्यों कि विगत रात माया के फ्लैट पर उसे अज्ञात आदमी का फोन आया था। यह बात उसे कैसे पता थी कि उस वक्त जे.एन. माया रानी के फ्लैट पर होगा ?
उसने पुलिस कमिश्नर को फोन मिलाया। थोड़ी देर तक उधर बात करता रहा। पुलिस की तरफ से पूरी सुरक्षा की गारंटी दी जा रही थी। वैसे तो सिक्योरिटी गार्ड्स अभी भी उसकी सेफ्टी के लिए थे।

"चार स्पेशल कमांडो आपके साथ हर समय रहेंगे।" कमिश्नर ने कहा,

"वैसे लगता तो यही है कि कोई सिरफिरा आदमी आपको बेकार में तंग कर रहा है, फिर भी हम पूरे मामले पर नजर रखे हैं।"

"थैंक्यू कमिश्नर।" जनार्दन नागा रेड्डी ने फोन के बाद अपने पी .ए. को बुलाया।

"यस सर।" मायादास हाज़िर हो गया, "क्या हुक्म है ?"

"मायादास जी, आप मेरे सबसे नजदीकी आदमी हैं। मैं चाहता हूँ कि फ़िलहाल अब कुछ वक्त मुम्बई से बाहर गुजार लिया जाये, कौन सी जगह बेहतर रहेगी ?"

"मेरे ख्याल से आप दूर न जायें, तो बेहतर है। हम आपको अपनी सुरक्षा टीम के दायरे से बाहर नहीं भेजना चाहते।"

"क्या सचमुच मुझे कोई खतरा हो सकता है ? पुलिस कमिश्नर तो कह रहा था कि यह किसी सिरफिरे का काम है, बस दिमाग में कुछ टेंशन सी रहती है, इसलि ये जाना चाहता हूँ।"

"सुनो आप खंडाला चले जाइए, वहाँ आपकी एक विला तो है ही। हमारे लोग वहाँ उसकी हिफाजत भी करते रहेंगे। बात ये भी तो है कि कभी भी आपको दिल्ली बुलाया जा सकता है, इसलिये मुम्बई से ज्यादा दूर रहना तो वैसे भी आपके लिए ठीक नहीं होगा।"

"आप ठीक कहते हैं, मैं खंडाला चला जाता हूँ। किसी को मत बताना, कोई ख़ास बात हो, तो मुझे फोन कर देना।"

"ठीक है।"

"मैं वहाँ बिलकुल अकेला रहना चाहता हूँ, समझ गये ना।"

"बेशक।"

जनार्दन नागा रेड्डी उसी दिन खंडाला के लिए रवाना हो गया। शाम तक वह विला में पहुँच गया। उसके पहुंचने से पहले वहाँ दो स्टेनगन धारी कमांडो चौकसी पर लग चुके थे, उन्होंने जे.एन. को सैल्यूट किया। जे.एन. विला में चला गया।


विला में खाने-पीने का सब सामान मौजूद था। रात को नौ बजेणमायादास का फ़ोन आया, उसने कुशल पूछी और थोड़ी देर तक औपचारिक बातों के बाद फोन बंद कर दिया। जे.एन.बियर पीता रहा, फिर वह कुछ पत्रिकायें पलटता रहा। इसी तरह रात के ग्यारह बज गये। वह सोने की तैयारी करने लगा।

अचानक फोन की घंटी बजने लगी। अभी वह बिस्तर पर पूरी तरह लेट भी नहीं पाया था कि चिहुंककर उठ बैठा। वह फोन को घूरने लगा। क्या मायादास का फोन हो सकता है? किन्तु मायादास तो फोन कर चुका है, वह दोबारा तो तभी फोन करेगा जब कोई ख़ास बात हो।

रात के ग्यारह और बारह के बीच तो उसी कातिल का फोन आता है। तो क्या उसी का फोन है ? घंटी बजती रही। आखिर जे.एन. को फोन का रिसीवर उठाना ही पड़ा। किन्तु वह कुछ बोला नहीं, वह तब तक बोलना ही नहीं चाहता था, जब तक मायादास की आवाज न सुन ले। किन्तु दूसरी तरफ से बोलने वाला मायादास नहीं था।

"मैं तेरा होने वाला कातिल बोल रहा हूँ बे ! क्यों अब बोलती भी बंद हो गई, अभी तो छ: दिन बाकी है। यहाँ खंडाला क्या करने आ गया तू, वैसे तेरा कत्ल करने के लिए इससे बेहतर जगह तो कोई हो भी नहीं सकती।" जे.एन. ने फोन पर कोई जवाब नहीं दिया और रिसीवर क्रेडिल पर रख कर फ़ोन काट दिया। दोबारा फोन की घंटी न बजे इसलिये उसने रिसीवर क्रेडिल से उठा कर एक तरफ रख दिया। इतनी सी देर में उसके माथे पर पसीना भरभरा आया था।

पहली बार जे.एन. को खतरे का अहसास हुआ। उसे लगा वह कोई सिरफिरा नहीं है। या तो कोई शख्स उसे भयभीत कर रहा है या फिर सचमुच कोई हत्यारा उसके पीछे लग गया है। लेकिन कोई हत्यारा इस तरह चैलेंज करके तो कत्ल नहीं करता। अगली सुबह ही जनार्दन नागा रेड्डी ने खंडाला की विला भी छोड़ दी और वह वापिस अपनी कोठी पर आ गया। जनार्दन ने अंधेरी में एक नया बंगला बना या था, वह सरकारी आवास की बजाय इस बंगले में आ गया। मायादास को भी उसने वहीं बुला लिया।
शाम को इंस्पेक्टर विजय उससे मिलने आया। उसके साथ चार कमांडो भी थे।

"कमिश्नर साहब ने आपकी हिफाजत के लिए मेरी ड्यूटी लगाई है।" विजय ने कहा,

"यह चार शानदार कमांडो हर समय आपके साथ रहेंगे। हमारी कौशिश यह भी है कि हम उस अज्ञात व्यक्ति का पता लगायें, इसके लिए हमने टेलीफोन एक्सचेंज से मदद ली है। जिन-जिन फोन नम्बरों पर आप उपलब्ध रहते हैं, वह सब हमें नोट करा दें, वैसे तो यह शख्स कोई सिरफिरा है जो…।"

"नहीं वह सिरफिरा नहीं है इंस्पेक्टर! वह मेरे इर्द-गिर्द जाल कसता जा रहा है। तुम फौरन उसका पता लगाओ। मैं तुम्हें अपने फोन नम्बर नोट करवा देता हूँ और अगर मैं कहीं बाहर गया, तो वह नंबर भी तुम्हें नोट करवा दूँगा।"

इस पहली मुलाकात में न तो मायादास ने विजय का नाम पूछा, न जे.एन. ने! संयोग से दोनों ने इंस्पेक्टर विजय का नाम तो सुना था, परन्तु आमना-सामना कभी नहीं हुआ था। उस रात रोमेश ने एक सिनेमा हॉल के बाहर बूथ से जे.एन. को फोन किया। उस वक्त नाईट शो का इंटरवल चल रहा था। पास ही पान सिगरेट की एक दुकान थी। फोन करने के बाद रोमेश उसी तरफ बढ़ गया, मोटर साइकिल पार्किंग पर खड़ी थी।

"अरे साहब, फ़िल्म वाला साहब आप।" पान की दुकान पर डिपार्टमेंटल स्टोर का सेल्समैन खड़ा था,

"क्या नाम बताया था, ध्यान से उतर गया ?"

"रोमेश सक्सेना।" तभी एक और ग्राहक ने पलटकर कहा ।

"एडवोकेट रोमेश सक्सेना।" यह दूसरा शख्स राजा था। राजा ने अगला सवाल दागा ,

"वह कत्ल हुआ की नहीं ?"

"अभी नहीं , दस जनवरी की रात होना है।"

"मेरे कू अदालत वाला डायलॉग अभी तक याद है, बोल के दिखाऊं।" चन्दू ने कहा।

"पर यह तो बताइये जनाब कि आखिर आप किसका खून करना चाहते हैं ?" राजा ने मजाकिया अंदाज में कहा। आसपास कुछ लोग भी जमा हो गये थे। चर्चा ही ऐसी थी।

"अब तुम लोग जानना ही चाहते हो तो …।"

"मैं बताता हूँ।" रोमेश की बात किसी ने बीच में ही काट दी। पीछे से जो शख्सियत सामने आई, वह कासिम खान था। संयोग से तीनों ही फ़िल्म देखने आये थे, नई फ़िल्म थी और हिट जा रही थी। हाउसफुल चल रहा था। इंटरवल होने के कारण बाहर भीड़ थी।

"यह जनाब जिस शख्स का कत्ल करने वाले हैं, उसका नाम जनार्दन नागा रेड्डी है।"

"जनार्दन नागा रेड्डी।" चन्दू उछल पड़ा,

"क्या बोलता है बे ? वो चीफ मिनिस्टर तो नहीं अरे ? अपना लीडर जे.एन.?"

"कासिम ठीक कह रहा है, बात उसी जे.एन.की है। और यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं है, एक दिन तुम अख़बार में उसके कत्ल की खबर पढ़ लेना। ग्यारह जनवरी को छप जायेगी।" रोमेश इतना कहकर आगे बढ़ गया।

भीड़ में से एक व्यक्ति तीर की तरह निकला और टेलीफोन बूथ में घुस गया। वह बटाला को फोन मिला रहा था।


"हैलो।" फोन मिलते ही उसने कहा,

"उस आदमी का पता चल गया है, जो जे.एन.साहब को फोन पर धमकी देता है।"

"कौन है ? " बटाला ने पूछा।

"उसका नाम रोमेश सक्सेना है, एडवोकेट रोमेश सक्सेना।"

"ओह, तो यह बात है। रस्सी जल गई, मगर बल अभी बाकी है, ठीक है।" दूसरी तरफ से बिना किसी निर्देश के फोन कट गया। उसी वक्त बटाला का फोन जे.एन.को भी पहुँच गया।



जारी रहेगा…..✍️✍️
Ohhhooo to Janardan reddy ko pata chl Gaya call kon ker rha hai use
Lekin kya ye ittefaq hai ki Vijay samne aagya Janardan ki suraksha ke leye
Ab kya krega Janardan
 

Raj_sharma

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Ohhhooo to Janardan reddy ko pata chl Gaya call kon ker rha hai use
Lekin kya ye ittefaq hai ki Vijay samne aagya Janardan ki suraksha ke leye
Ab kya krega Janardan
Ye to tumkq bhi pata hi hai ke wo kya karne wala hai, 😅 story discuss hua hai apna, baki abhi tum 17 ve update pe hi ho???

Thank you so much for your valuable review and support ❣️
 
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