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Adultery कुसुम और सुलगती रातें 🔥

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Gorgeous Ridhimaa

रिद्धिमा ✨
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यह जो दास्तान मैं आपको सुनाने जा रही हूँ, यह पूरी तरह से एक ख़ूबसूरत कल्पना है। इसका हकीकत की दुनिया से कोई वास्ता नहीं है। तो मेरी इस कहानी को सिर्फ़ मजे के तौर पर ही पढ़िएगा और यहीं तक रखिएगा।
 

Gorgeous Ridhimaa

रिद्धिमा ✨
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Update 01


रातों का वह गहरा सन्नाटा अब पूरी तरह से शहनाइयों की गूंज और ढोल-नगाड़ों की थाप में कहीं खो चुका था। रात काफी ढल चुकी थी, लेकिन शादी वाले इस घर की रौनक और जगमगाहट देखकर ऐसा लग रहा था मानो दिन की शुरुआत अभी-अभी हुई हो। चारों तरफ सजी रंग-बिरंगी लाइटें और वह शानदार सजावट पूरे घर को किसी आलीशान महल की तरह चमका रही थी। बारात मुख्य दरवाज़े पर दस्तक दे चुकी थी और दूल्हे के स्वागत के लिए सबसे आगे खड़ी थीं मैं और मेरी सबसे पक्की सहेली, नेहा।

नेहा की बड़ी बहन की शादी थी, इसलिए उसकी खुशी का तो जैसे कोई ठिकाना ही नहीं था। वहीं मैं, जो नेहा के दिल का टुकड़ा और उसकी सबसे पक्की सहेली हूँ, इस शादी को पूरी ज़िंदगी के लिए यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। हम दोनों सहेलियों ने महफिल में अपनी जवानी की आग लगाने के इरादे से बेहद खूबसूरत, बोल्ड और बैकलेस ब्लाउज और चोली पहनी हुई थी।

हम दोनों की खूबसूरती और बदन की बनावट एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा, लेकिन बेहद आकर्षक थी। नेहा का रंग थोड़ा सा सांवला था, पर उसका बदन काफी भरा हुआ, कसीला और सुडौल था। उसकी चोली के गहरे गले से उसके पुष्ट और उभरे हुए स्तनों का उभार साफ-साफ झलक रहा था, जो वहाँ से गुज़रने वाले हर मर्द की नज़रों को अपनी तरफ खींच रहा था। दूसरी तरफ, मेरा जिस्म काफी पतला, छरहरा और नाज़ुक था। मेरा रंग दूध जैसा गोरा-चिट्टा था। वैसे तो मेरे स्तनों का कोई बहुत भारी उभार नहीं था, लेकिन मैंने जो डीप-नेक यानी गहरे गले का ब्लाउज पहना था, उसमें से मेरी गोरी, मखमली त्वचा और कॉलर-बोन साफ झलक रही थी, जो मेरी सादगी में भी एक तीखा कशिश पैदा कर रही थी।

बारात में जितने भी जवान लड़के आए थे, वे शादी के बाकी तमाशों और रस्मों को छोड़कर बस हम दोनों सहेलियों को ही एकटक घूरे जा रहे थे। पूरी शादी में जितनी भी मेहमान औरतें और लड़कियां आई थीं, उन सबमें सबसे ज़्यादा खुले और आकर्षक कपड़े मैंने और नेहा ने ही पहने थे, जो हमारी जवानी की बेबाकी और अल्हड़पन को बयां कर रहे थे।

तभी बारात के स्वागत के बाद अचानक स्टेज पर अनाउंसमेंट हुई और डांस करने के लिए मेरा नाम पुकारा गया। जैसे ही मैंने धड़कते दिल के साथ स्टेज पर अपना पहला कदम रखा, वहाँ मौजूद हर एक मर्द के दिल की धड़कन एक दम से रुक गई। मेरे गोरे बदन में एक ऐसा जादुई खिंचाव था कि बज रहा संगीत भी लोगों को फीका लगने लगा। ऐसा नहीं था कि मैं बहुत भारी बदन वाली लड़की थी, लेकिन मेरी वह पतली, लचीली कमर, मेरा दूध जैसा गोरा रंग और चांद सा चमकता हुआ चेहरा जब स्टेज की पीली रोशनी के नीचे आया, तो सामने देखने वाले अपनी सुध-बुध खो बैठे।


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पिंक और सिल्वर रंग के उस चमकीले लहंगे और उस छोटे से बैकलेस ब्लाउज में मैंने जैसे ही ढोल की थाप पर अपनी पतली कमर को मटकाना शुरू किया, मेरी अदाएं देखकर सामने खड़े लड़कों की सांसें थम गईं। डांस करते हुए मैं अपनी आँखों से कुछ ऐसा कातिलाना जादू चला रही थी कि हर कोई बस मेरी जवानी के इस खूबसूरत मंजर में पूरी तरह खो जाना चाहता था।

डांस खत्म होने के बाद जब मैं स्टेज से नीचे उतरी, तो मेरी सांसें काफी तेज़ चल रही थीं और मेरा सीना तेज़ी से ऊपर-नेचे हो रहा था। मेरे मखमली और गोरे बदन पर पसीने की नन्हीं बूंदें स्टेज की रोशनी में मोतियों की तरह चमक रही थीं। डांस की उस मस्ती में मेरे रेशमी बाल बिखरकर मेरे चेहरे, गले और नंगे कंधों पर आ गए थे। चलते हुए जब मैं अपनी उंगलियों से उन बिखरे बालों को पीछे समेट रही थी, तो मेरी यह बेबाक और कातिलाना अदा सामने खड़े मर्दों के दिलों को और ज़्यादा ज़ख्मी कर रही थी। हर कोई बस मेरी जवानी के इस जादुई रूप को एकटक निहारे जा रहा था।

तभी अचानक फर्श पर बिछे लाइट के एक खुल तार में मेरा पैर उलझ गया। मेरा संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया और मैं औंधे मुंह पीछे की तरफ गिरने ही वाली थी कि तभी वहाँ एक अप्रत्याशित और चौंकाने वाला मोड़ आया।

नेहा के पापा, जो पास ही एक चेयर पर बैठे सब देख रहे थे, एकदम फुर्ती से अपनी जगह से उठे। उन्होंने बिजली की तेज़ी से अपनी मजबूत बाहों को आगे बढ़ाया और मुझे नीचे गिरने से ऐन वक्त पर संभाल लिया।

इस अचानक हुई हलचल में, नेहा के पापा का एक भारी हाथ मेरे पसीने से भीगे, चिकने और पूरी तरह से खुले पेट पर आकर टिका था, जिससे मेरी उस पतली, कांपती कमर को एक बहुत मजबूत सहारा मिला। वहीं दूसरी तरफ, उन्होंने अपने दूसरे हाथ से मेरी नाज़ुक कलाई को बेहद कसकर थाम लिया था।


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उनके उस अचानक, भारी और मजबूत मर्दाना स्पर्श के मेरे खुले बदन से टकराते ही, मैं जैसे किसी गहरे और अनजाने अहसास में खो गई। ऐसा अनोखा, तीखा और सिहरा देने वाला अनुभव मुझे अपनी 19 साल की ज़िंदगी में पहले कभी नहीं हुआ था। नेहा के पापा के उस मजबूत मर्दाना दबाव से मेरा पूरा मासूम बदन एकदम से अंदर तक कांप उठा। मेरे भीतर एक अजीब सी सिहरन और अनोखी गर्मी दौड़ गई। मैं अभी कॉलेज के पहले साल में थी और इस उम्र में मैंने पुरुषों के इस रूप को, उनकी इस कड़क खुशबू और ताकत को कभी इतने करीब से महसूस नहीं किया था।

नेहा के पापा ने मुझे धीरे से सीधा खड़ा किया और मेरी आँखों में देखते हुए बड़ी फिक्रमंदी से पूछा, "तुम ठीक तो हो ना, कुसुम?"

उनका यह पूछना था कि मेरा पूरा चेहरा शर्म, हया और घबराहट से एकदम टमाटर की तरह गुलाबी हो गया। मैंने अपनी नज़रें झुकाते हुए लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, "जी... जी हाँ अंकल, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। थैंक यू अंकल।"

लेकिन नेहा के पापा के हाथों का वह जादुई और भारी स्पर्श अब भी मेरे पेट की त्वचा और मेरी कलाई पर गहराई से छपा हुआ महसूस हो रहा था। नेहा के पापा की उम्र भले ही 50 साल के आसपास रही होगी, लेकिन अपनी गठीली कद-काठी, चौड़ी छाती और रोबीले व्यक्तित्व की वजह से वे दिखने में काफी जवान और आकर्षक लगते थे। उनकी वह परिपक्व काया और उनके हाथों का वह सख्त मर्दाना अहसास मेरे दिल को अंदर तक झकझोर गया था। कॉलेज के आम लड़कों के कच्चे और बचकाने स्पर्श से यह पूरी तरह अलग था; इसमें एक अजीब सी राजसी ताकत और जादुई कशिश थी, जिसने मेरे दिमाग में एक नई उथल-पुथल शुरू कर दी थी।
 
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Update 02

नेहा के पापा की उन गठीली और फौलादी बाहों का वह अचानक मिला स्पर्श मेरे भीतर एक ऐसा तूफ़ान उठा गया था जिसे शांत कर पाना मेरे बस में नहीं था। फंक्शन के शोर-शराबे और बजते हुए गानों के बीच भी, मुझे अपनी कलाई और कमर के उस हिस्से पर अंकल की उँगलियों की तपिश साफ़ महसूस हो रही थी। मेरा 19 साल का कुँआरा बदन उस अनोखे अहसास से बार-बार सिहर उठता। तभी सहेलियों के बीच खड़े-खड़े मेरा ध्यान गया कि उस अचानक हुई खींचतान की वजह से मेरे डीप-नेक वाले ब्लाउज़ का पीछे का सबसे ऊपर का हुक ढीला होकर खुल गया था, और भारी लहंगे के वज़न से वह थोड़ा नीचे सरक रहा था।

अपनी इस उलझन को छुपाने के लिए, मैं चुपके से भीड़ से कटी और सीढ़ियाँ चढ़कर घर के ऊपर वाले हिस्से में बने एक सूने, शांत कमरे की तरफ बढ़ गई। वहाँ हल्की मद्धम रोशनी थी और खिड़की से बाहर हो रही बारिश की ठंडी हवा अंदर आ रही थी। मैं कमरे में लगे बड़े से आदमकद आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई। आईने में जब मैंने खुद को देखा, तो मेरे गाल अंकल के ख्यालों से पहले ही गुलाबी हो रहे थे। मैंने अपने रेशमी बालों को समेटकर आगे की तरफ किया और दोनों हाथों को पीछे ले जाकर उस खुले हुए हुक को लगाने की नाकाम कोशिश करने लगी। मेरे हाथ वहाँ तक ठीक से पहुँच नहीं पा रहे थे, और मेरी नाजुक उँगलियाँ बार-बार फिसल रही थीं।

तभी कमरे के दरवाज़े पर एक बेहद हल्की सी आहट हुई। मैंने चौंककर आईने में देखा, और मेरा दिल जैसे एक पल के लिए धड़कना ही भूल गया।

दरवाज़े पर कोई और नहीं, बल्कि वही गठीले और रौबीले व्यक्तित्व वाले नेहा के पापा खड़े थे। शायद वे शादी का कुछ सामान रखने ऊपर आए थे, लेकिन कमरे में मुझे इस हालत में देखकर उनके कदम वहीं ठहर गए। आईने के ज़रिए हमारी नज़रें एक-दूसरे से टकराईं। अंकल की उन गहरी, तजुर्बेकार आँखों में इस वक्त एक अजीब सी कशिश और धीमा सम्मोहन था, जिसने मुझे अपनी जगह पर जैसे ज़ंजीरों से जकड़ दिया। लाज के मारे मेरी पलकें झुक गईं, लेकिन मैंने कमरे से बाहर जाने की कोई कोशिश नहीं की।

"क्या हुआ कुसुम? कोई परेशानी है?" अंकल की वह भारी, गंभीर और मर्दाना आवाज़ इस शांत कमरे के सन्नाटे में सीधे मेरी रूह तक उतर गई।

"वो... वो अंकल, पीछे का हुक खुल गया है... लग नहीं रहा," मैंने बेहद धीमी, कांपती हुई आवाज़ में आईने की तरफ देखते हुए कहा। मेरे चेहरे पर आई उस मासूम बेबसी ने जैसे उनके भीतर के मर्द को पूरी तरह जगा दिया था।

अंकल ने कुछ नहीं कहा। वे बहुत ही धीमे और नपे-तुले कदमों से चलते हुए मेरे ठीक पीछे आकर खड़े हो गए। आईने में हमारी जोड़ी अद्भुत लग रही थी.... कहाँ वे 50 साल के मैच्योर, चौड़े कंधों वाले रौबीले पुरुष और कहाँ मैं उनके सामने एक नाजुक, गोरी और छरहरी कली जैसी। अंकल ने बिना एक पल गंवाए अपने दोनों बड़े और मजबूत हाथों को आगे बढ़ाया। जैसे ही उनकी पौरुषमयी, गर्म उँगलियों के पोरों ने मेरी नंगी और मखमली पीठ की त्वचा को छुआ, मेरे मुँह से एक बेहद नाज़ुक और दबी हुई 'आह...' निकल गई। ठंड के मौसम में भी उनका वह स्पर्श किसी जलते हुए अंगारे जैसा तीखा था।

"शशश... घबराओ मत, मैं लगा देता हूँ," उन्होंने बहुत ही धीरे से, सीधे मेरे कान के पास झुककर फुसफुसाया। उनकी गर्म साँसें जब मेरी गर्दन के पिछले हिस्से पर बिखरीं, तो मेरे पैरों की उँगलियाँ फर्श पर कस गईं।

अंकल की उँगलियाँ बहुत ही तसल्ली से और धीरे-धीरे ब्लाउज़ के उस रेशमी कपड़े को समेटते हुए हुक को फंसाने लगीं। लेकिन हुक लगाने के बहाने उनका वह भारी मर्दाना हाथ जानबूझकर मेरी रीढ़ की हड्डी से होते हुए नीचे कमर के उस नाजुक उतार-चढ़ाव को सहला रहा था। आईने में साफ़ दिख रहा था कि अंकल की आँखें पूरी तरह से मेरी इस गोरी काया के सम्मोहन में डूब चुकी थीं। कॉलेज के लड़कों के कच्चे और बचकाने आकर्षण से यह पूरी तरह अलग था; इस छुअन में एक गहरा ठहराव, सुरक्षा और असीम प्यार था जिसने मुझे अंदर तक पिघला दिया।

हुक बंद करने के बाद भी अंकल के हाथ मेरी पीठ से हटे नहीं। उन्होंने अपनी मजबूत हथेलियों को मेरे दोनों कंधों पर जमाया और मुझे आईने में देखते हुए बेहद शिद्दत से अपनी तरफ थोड़ा खींचा। मेरा पूरा बदन पीछे मुड़कर सीधे उनके चौड़े और गठीले सीने से जा टकराया। हमारी धड़कनें इस वक्त एक हो चुकी थीं, और बाहर होती बारिश के शोर के बीच इस सूने कमरे में हम दोनों एक खूबसूरत, अनजाने और पवित्र प्रेम की गहराइयों में उतरते जा रहे थे।

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अंकल के उस चौड़े और फौलादी सीने से टिकते ही मेरे भीतर की सारी हिचकिचाहट जैसे कपूर बनकर उड़ गई। आईने में हमारी नजरें मिली हुई थीं। कहाँ वे इतने गंभीर और रौबीले, और कहाँ मैं अपनी धुन में रहने वाली चुलबुली लड़की। अपनी उसी नटखट आदत के चलते, मैंने आईने में ही उन्हें देखकर अपनी एक आँख धीरे से दबाई और मुस्कुराते हुए थोड़ा सा मचल कर कहा, "अंकल... हुक तो लग गया, पर आपकी उँगलियाँ अभी भी मेरी पीठ पर ही जमी हुई हैं। कहीं आपका इरादा इसे फिर से खोलने का तो नहीं?"

मेरी इस चुलबुली और बेबाक बात को सुनकर अंकल के गंभीर चेहरे पर एक बेहद खूबसूरत और दिलकश मुस्कान तैर गई। उनके चौड़े कंधे थोड़े ढीले पड़े और उन्होंने अपनी पकड़ को मेरे कंधों पर और भी सहलाते हुए मजबूत कर लिया।

वे धीरे से और आगे झुके, जिससे उनका रोबीला चेहरा सीधे मेरी गर्दन और गाल के बिल्कुल करीब आ गया। अपनी भारी और मखमली आवाज़ में वे बोले, "बदमाश हो तुम कुसुम... इतनी बड़ी आफत से अभी-अभी बची हो, और तुम्हारी ये नौटंकी अभी भी बंद नहीं हुई?"

"आफत से कहाँ बची हूँ अंकल..." मैंने घूमकर अपना रुख पूरी तरह उनकी तरफ कर लिया। अब मेरा नाजुक बदन सीधे उनके सामने था। मैंने अपने दोनों हाथ बेहद अल्हड़पन से उनके गठीले सूट के कॉलर्स पर टिका दिए और अपनी पलकें उठाकर सीधे उनकी गहरी आँखों में झांकते हुए कहा, "नीचे तो सिर्फ लाइट का तार था जिससे मैं गिर रही थी... पर यहाँ ऊपर तो आपकी इन आँखों का जादू है, जिनसे मैं चाहकर भी खुद को संभाल नहीं पा रही हूँ।"

मेरी इस मासूम और तीखी स्वीकारोक्ति ने जैसे अंकल के संयम का आखिरी बांध भी तोड़ दिया। उनकी आँखों में मेरे लिए छुपा हुआ असीम स्नेह और एक जवां मर्द का तीखा आकर्षण साफ-साफ उभर आया। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने बड़े और गर्म हाथों से मेरे चेहरे को दोनों तरफ से अपनी हथेलियों के घेरे में ले लिया। उनके हाथों की वह छुअन इतनी सुरक्षित और मखमली थी कि मैंने मदहोशी में अपनी आँखें बंद कर लीं।

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"कुसुम... तुम नहीं जानतीं कि तुम इस बूढ़े दिल के साथ क्या कर रही हो..." उन्होंने बहुत ही भावुक होकर फुसफुसाया।

"आप बूढ़े नहीं हैं अंकल... आप तो सही मायनो में मर्द हैं।" मैंने आँखें खोलकर हठ करते हुए कहा।

अंकल ने कुछ नहीं कहा, बस उनकी सांसें और भारी हो गईं। वे और नीचे झुके। उनके होठों की पहली छुअन सीधे मेरे माथे के ठीक बीचों-बीच, मेरी बिंदी के पास पड़ी। वह चुंबन वासना से परे, असीम सुरक्षा, गहरे प्यार और अपना बनाने के वादे से भरा हुआ था। माथे को चूमने के बाद, वे धीरे से नीचे उतरे और उनके होंठ बहुत ही नाज़ुक अंदाज़ में मेरे दोनों गुलाबी होते गालों को छू गए।



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उनके होठों की उस गीली और तपती हुई छुअन ने लहंगे के भीतर मेरे पूरे 19 साल के कुँआरे बदन में एक ऐसा मीठा मीठा करंट दौड़ा दिया कि मैं पूरी तरह से उनके सीने में सिमट गई। बाहर बारिश की बूंदें अब और तेज हो चुकी थीं, और इस सूने कमरे में हमारी धड़कनें एक नया इतिहास लिख रही थीं।

कमरे के उस प्यारे और अजीब से अहसास के बाद, मैं खुद को संभालकर वापस नीचे शादी के फंक्शन में आ गई। लेकिन शादी खत्म होने और मेरे अपने घर वापस आ जाने के बाद भी, मेरा दिमाग वहीं अटका हुआ था। दिन हो या रात, सोते-जागते मेरी आँखों के सामने बस नेहा के पापा का वह रौबीला चेहरा, उनके चौड़े कंधे और उनकी उँगलियों का वह छूना ही घूमता रहता था। उनकी यादें मुझे इस कदर बेचैन कर रही थीं कि मुझसे और सब्र नहीं हुआ।

आखिरकार एक रात, जब पूरा घर सो चुका था, मैंने बहुत तेज़ी से धड़कते दिल और कांपते हाथों से सीधे अंकल का नंबर मिला दिया। फोन की हर एक घंटी के साथ मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था, मानो छाती से बाहर आ जाएगा।

दो-तीन घंटी जाने के बाद, उधर से उनकी भारी और गंभीर आवाज़ आई, "हेलो..."

"हेलो, अंकल..." मेरी आवाज़ थोड़ी कांप रही थी।

अंकल ने जैसे ही मेरी आवाज़ पहचानी, वे हमेशा की तरह नॉर्मल होते हुए बोले, "अरे कुसुम! इतनी रात को फोन? सब ठीक-ठाक तो है ना? रुको, मैं नेहा को फोन देता हूँ, वह सो रही होगी तो उठाता हूँ..."

यह सुनते ही मेरे चेहरे पर एक नटखट और शरारती मुस्कान आ गई। मैंने तुरंत उनकी बात काटते हुए बहुत ही चुलबुले अंदाज़ में कहा, "अरे अंकल! नेहा को फोन देने की कोई ज़रूरत नहीं है। मुझे नेहा से बात करनी होती, तो मैं इतनी रात को उसे फोन करती ना, आपको क्यों करती?"

अपनी बात कहकर मैं धीरे-धीरे हंसने लगी। मेरी उस हल्की सी हंसी की आवाज़ देर रात के उस सन्नाटे में सीधे अंकल के दिल पर जा लगी। फोन के उस पार अचानक बिल्कुल शांति छा गई, और मुझे साफ़ महसूस हो रहा था कि अंकल भी अब मेरी इस बेबाक बात से थोड़े हैरान और बेचैन होने लगे थे।

फोन के उस पार जो सन्नाटा छाया था, उसे अंकल की एक हल्की सी खांसने की आवाज़ ने तोड़ा। वे थोड़े असहज हुए, लेकिन फिर अपनी भारी आवाज़ को थोड़ा धीमा करते हुए बोले, "कुसुम, तुम सच में बहुत नटखट होती जा रही हो। इतनी रात को अपनी सहेली के पापा से ऐसी बातें करते हुए तुम्हें डर नहीं लगता?"

उनकी इस बात ने मेरे भीतर की शरारत को और बढ़ा दिया। मैंने तकिए को अपनी बाहों में थोड़ा और कसा और बेड पर करवट लेते हुए चुलबुले अंदाज़ में कहा, "डर कैसा अंकल? नीचे जब मैं गिर रही थी, तब तो आपने बड़े हक से मुझे अपनी मजबूत बाहों में थाम लिया था। तब तो आपको डर नहीं लगा, तो अब मुझे क्यों लगेगा?"

मेरी यह बात सुनकर अंकल मुस्कुरा दिए, उनके हंसने की हल्की सी आवाज़ फोन में साफ़ सुनाई दी। वे बोले, "वह तो तुम्हें गिरने से बचाने के लिए था कुसुम। लेकिन तुम तो बहुत तेज निकलीं, हुक लगाने के बहाने भी मुझे ही डांट रही थीं।"

"डांट नहीं रही थी अंकल, वह तो मेरा प्यार था," मैंने बिना सोचे बहुत ही सीधे और मासूम अंदाज़ में कह दिया। मेरी यह बात सुनते ही फोन के दोनों तरफ एक बहुत ही प्यारा और मीठा सन्नाटा छा गया। दोनों तरफ धड़कनें तेज़ थीं।

अंकल ने एक गहरी सांस ली और बहुत ही शांति से बोले, "कुसुम, तुम अभी बहुत छोटी हो, कॉलेज के पहले साल में हो। और मैं..."

मैंने तुरंत उनकी बात बीच में ही काट दी, "और आप मेरे सबसे प्यारे अंकल हैं, जो मेरे दिल के राजा बन चुके हैं। मुझे उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता।"

अंकल मेरी इस दीवानगी और साफ़ बात के सामने पूरी तरह निरुत्तर हो गए। वे समझ गए कि यह नटखट लड़की अब उनके काबू से बाहर हो चुकी है और खुद उनका दिल भी अब कुसुम के बिना नहीं मान रहा था। उन्होंने थोड़ी देर सोचा और फिर बहुत ही दबी और गंभीर आवाज़ में कहा, "अच्छा बाबा, हार गया मैं तुमसे। फोन पर ये बातें करना ठीक नहीं है। कल दोपहर को कॉलेज खत्म होने के बाद क्या तुम मुझसे मिल सकती हो? शहर के बाहर जो पुराना गार्डन है, मैं वहाँ तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।"

अंकल के मुँह से मिलने की बात सुनते ही खुशी के मारे मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से उछलने लगा। मैंने झट से कहा, "हाँ अंकल, मैं बिल्कुल आऊँगी! आप बस वक्त पर पहुँच जाना।" फोन रखने के बाद भी मेरे चेहरे की मुस्कान गायब नहीं हुई, और मैं कल दोपहर की मुलाकात के हसीन ख्यालों में खो गई।
 
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Rajizexy

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रातों का वह गहरा सन्नाटा अब पूरी तरह से शहनाइयों की गूंज और ढोल-नगाड़ों की थाप में कहीं खो चुका था। रात काफी ढल चुकी थी, लेकिन शादी वाले इस घर की रौनक और जगमगाहट देखकर ऐसा लग रहा था मानो दिन की शुरुआत अभी-अभी हुई हो। चारों तरफ सजी रंग-बिरंगी लाइटें और वह शानदार सजावट पूरे घर को किसी आलीशान महल की तरह चमका रही थी। बारात मुख्य दरवाज़े पर दस्तक दे चुकी थी और दूल्हे के स्वागत के लिए सबसे आगे खड़ी थीं मैं और मेरी सबसे पक्की सहेली, नेहा।

नेहा की बड़ी बहन की शादी थी, इसलिए उसकी खुशी का तो जैसे कोई ठिकाना ही नहीं था। वहीं मैं, जो नेहा के दिल का टुकड़ा और उसकी सबसे पक्की सहेली हूँ, इस शादी को पूरी ज़िंदगी के लिए यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। हम दोनों सहेलियों ने महफिल में अपनी जवानी की आग लगाने के इरादे से बेहद खूबसूरत, बोल्ड और बैकलेस ब्लाउज और चोली पहनी हुई थी।

हम दोनों की खूबसूरती और बदन की बनावट एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा, लेकिन बेहद आकर्षक थी। नेहा का रंग थोड़ा सा सांवला था, पर उसका बदन काफी भरा हुआ, कसीला और सुडौल था। उसकी चोली के गहरे गले से उसके पुष्ट और उभरे हुए स्तनों का उभार साफ-साफ झलक रहा था, जो वहाँ से गुज़रने वाले हर मर्द की नज़रों को अपनी तरफ खींच रहा था। दूसरी तरफ, मेरा जिस्म काफी पतला, छरहरा और नाज़ुक था। मेरा रंग दूध जैसा गोरा-चिट्टा था। वैसे तो मेरे स्तनों का कोई बहुत भारी उभार नहीं था, लेकिन मैंने जो डीप-नेक यानी गहरे गले का ब्लाउज पहना था, उसमें से मेरी गोरी, मखमली त्वचा और कॉलर-बोन साफ झलक रही थी, जो मेरी सादगी में भी एक तीखा कशिश पैदा कर रही थी।

बारात में जितने भी जवान लड़के आए थे, वे शादी के बाकी तमाशों और रस्मों को छोड़कर बस हम दोनों सहेलियों को ही एकटक घूरे जा रहे थे। पूरी शादी में जितनी भी मेहमान औरतें और लड़कियां आई थीं, उन सबमें सबसे ज़्यादा खुले और आकर्षक कपड़े मैंने और नेहा ने ही पहने थे, जो हमारी जवानी की बेबाकी और अल्हड़पन को बयां कर रहे थे।

तभी बारात के स्वागत के बाद अचानक स्टेज पर अनाउंसमेंट हुई और डांस करने के लिए मेरा नाम पुकारा गया। जैसे ही मैंने धड़कते दिल के साथ स्टेज पर अपना पहला कदम रखा, वहाँ मौजूद हर एक मर्द के दिल की धड़कन एक दम से रुक गई। मेरे गोरे बदन में एक ऐसा जादुई खिंचाव था कि बज रहा संगीत भी लोगों को फीका लगने लगा। ऐसा नहीं था कि मैं बहुत भारी बदन वाली लड़की थी, लेकिन मेरी वह पतली, लचीली कमर, मेरा दूध जैसा गोरा रंग और चांद सा चमकता हुआ चेहरा जब स्टेज की पीली रोशनी के नीचे आया, तो सामने देखने वाले अपनी सुध-बुध खो बैठे।


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पिंक और सिल्वर रंग के उस चमकीले लहंगे और उस छोटे से बैकलेस ब्लाउज में मैंने जैसे ही ढोल की थाप पर अपनी पतली कमर को मटकाना शुरू किया, मेरी अदाएं देखकर सामने खड़े लड़कों की सांसें थम गईं। डांस करते हुए मैं अपनी आँखों से कुछ ऐसा कातिलाना जादू चला रही थी कि हर कोई बस मेरी जवानी के इस खूबसूरत मंजर में पूरी तरह खो जाना चाहता था।

डांस खत्म होने के बाद जब मैं स्टेज से नीचे उतरी, तो मेरी सांसें काफी तेज़ चल रही थीं और मेरा सीना तेज़ी से ऊपर-नेचे हो रहा था। मेरे मखमली और गोरे बदन पर पसीने की नन्हीं बूंदें स्टेज की रोशनी में मोतियों की तरह चमक रही थीं। डांस की उस मस्ती में मेरे रेशमी बाल बिखरकर मेरे चेहरे, गले और नंगे कंधों पर आ गए थे। चलते हुए जब मैं अपनी उंगलियों से उन बिखरे बालों को पीछे समेट रही थी, तो मेरी यह बेबाक और कातिलाना अदा सामने खड़े मर्दों के दिलों को और ज़्यादा ज़ख्मी कर रही थी। हर कोई बस मेरी जवानी के इस जादुई रूप को एकटक निहारे जा रहा था।

तभी अचानक फर्श पर बिछे लाइट के एक खुल तार में मेरा पैर उलझ गया। मेरा संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया और मैं औंधे मुंह पीछे की तरफ गिरने ही वाली थी कि तभी वहाँ एक अप्रत्याशित और चौंकाने वाला मोड़ आया।

नेहा के पापा, जो पास ही एक चेयर पर बैठे सब देख रहे थे, एकदम फुर्ती से अपनी जगह से उठे। उन्होंने बिजली की तेज़ी से अपनी मजबूत बाहों को आगे बढ़ाया और मुझे नीचे गिरने से ऐन वक्त पर संभाल लिया।

इस अचानक हुई हलचल में, नेहा के पापा का एक भारी हाथ मेरे पसीने से भीगे, चिकने और पूरी तरह से खुले पेट पर आकर टिका था, जिससे मेरी उस पतली, कांपती कमर को एक बहुत मजबूत सहारा मिला। वहीं दूसरी तरफ, उन्होंने अपने दूसरे हाथ से मेरी नाज़ुक कलाई को बेहद कसकर थाम लिया था।


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उनके उस अचानक, भारी और मजबूत मर्दाना स्पर्श के मेरे खुले बदन से टकराते ही, मैं जैसे किसी गहरे और अनजाने अहसास में खो गई। ऐसा अनोखा, तीखा और सिहरा देने वाला अनुभव मुझे अपनी 19 साल की ज़िंदगी में पहले कभी नहीं हुआ था। नेहा के पापा के उस मजबूत मर्दाना दबाव से मेरा पूरा मासूम बदन एकदम से अंदर तक कांप उठा। मेरे भीतर एक अजीब सी सिहरन और अनोखी गर्मी दौड़ गई। मैं अभी कॉलेज के पहले साल में थी और इस उम्र में मैंने पुरुषों के इस रूप को, उनकी इस कड़क खुशबू और ताकत को कभी इतने करीब से महसूस नहीं किया था।

नेहा के पापा ने मुझे धीरे से सीधा खड़ा किया और मेरी आँखों में देखते हुए बड़ी फिक्रमंदी से पूछा, "तुम ठीक तो हो ना, कुसुम?"

उनका यह पूछना था कि मेरा पूरा चेहरा शर्म, हया और घबराहट से एकदम टमाटर की तरह गुलाबी हो गया। मैंने अपनी नज़रें झुकाते हुए लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, "जी... जी हाँ अंकल, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। थैंक यू अंकल।"

लेकिन नेहा के पापा के हाथों का वह जादुई और भारी स्पर्श अब भी मेरे पेट की त्वचा और मेरी कलाई पर गहराई से छपा हुआ महसूस हो रहा था। नेहा के पापा की उम्र भले ही 50 साल के आसपास रही होगी, लेकिन अपनी गठीली कद-काठी, चौड़ी छाती और रोबीले व्यक्तित्व की वजह से वे दिखने में काफी जवान और आकर्षक लगते थे। उनकी वह परिपक्व काया और उनके हाथों का वह सख्त मर्दाना अहसास मेरे दिल को अंदर तक झकझोर गया था। कॉलेज के आम लड़कों के कच्चे और बचकाने स्पर्श से यह पूरी तरह अलग था; इसमें एक अजीब सी राजसी ताकत और जादुई कशिश थी, जिसने मेरे दिमाग में एक नई उथल-पुथल शुरू कर दी थी।
Well begun 👌👌👌🫟🫟💋
 
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नेहा के पापा की उन गठीली और फौलादी बाहों का वह अचानक मिला स्पर्श मेरे भीतर एक ऐसा तूफ़ान उठा गया था जिसे शांत कर पाना मेरे बस में नहीं था। फंक्शन के शोर-शराबे और बजते हुए गानों के बीच भी, मुझे अपनी कलाई और कमर के उस हिस्से पर अंकल की उँगलियों की तपिश साफ़ महसूस हो रही थी। मेरा 19 साल का कुँआरा बदन उस अनोखे अहसास से बार-बार सिहर उठता। तभी सहेलियों के बीच खड़े-खड़े मेरा ध्यान गया कि उस अचानक हुई खींचतान की वजह से मेरे डीप-नेक वाले ब्लाउज़ का पीछे का सबसे ऊपर का हुक ढीला होकर खुल गया था, और भारी लहंगे के वज़न से वह थोड़ा नीचे सरक रहा था।

अपनी इस उलझन को छुपाने के लिए, मैं चुपके से भीड़ से कटी और सीढ़ियाँ चढ़कर घर के ऊपर वाले हिस्से में बने एक सूने, शांत कमरे की तरफ बढ़ गई। वहाँ हल्की मद्धम रोशनी थी और खिड़की से बाहर हो रही बारिश की ठंडी हवा अंदर आ रही थी। मैं कमरे में लगे बड़े से आदमकद आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई। आईने में जब मैंने खुद को देखा, तो मेरे गाल अंकल के ख्यालों से पहले ही गुलाबी हो रहे थे। मैंने अपने रेशमी बालों को समेटकर आगे की तरफ किया और दोनों हाथों को पीछे ले जाकर उस खुले हुए हुक को लगाने की नाकाम कोशिश करने लगी। मेरे हाथ वहाँ तक ठीक से पहुँच नहीं पा रहे थे, और मेरी नाजुक उँगलियाँ बार-बार फिसल रही थीं।

तभी कमरे के दरवाज़े पर एक बेहद हल्की सी आहट हुई। मैंने चौंककर आईने में देखा, और मेरा दिल जैसे एक पल के लिए धड़कना ही भूल गया।

दरवाज़े पर कोई और नहीं, बल्कि वही गठीले और रौबीले व्यक्तित्व वाले नेहा के पापा खड़े थे। शायद वे शादी का कुछ सामान रखने ऊपर आए थे, लेकिन कमरे में मुझे इस हालत में देखकर उनके कदम वहीं ठहर गए। आईने के ज़रिए हमारी नज़रें एक-दूसरे से टकराईं। अंकल की उन गहरी, तजुर्बेकार आँखों में इस वक्त एक अजीब सी कशिश और धीमा सम्मोहन था, जिसने मुझे अपनी जगह पर जैसे ज़ंजीरों से जकड़ दिया। लाज के मारे मेरी पलकें झुक गईं, लेकिन मैंने कमरे से बाहर जाने की कोई कोशिश नहीं की।

"क्या हुआ कुसुम? कोई परेशानी है?" अंकल की वह भारी, गंभीर और मर्दाना आवाज़ इस शांत कमरे के सन्नाटे में सीधे मेरी रूह तक उतर गई।

"वो... वो अंकल, पीछे का हुक खुल गया है... लग नहीं रहा," मैंने बेहद धीमी, कांपती हुई आवाज़ में आईने की तरफ देखते हुए कहा। मेरे चेहरे पर आई उस मासूम बेबसी ने जैसे उनके भीतर के मर्द को पूरी तरह जगा दिया था।

अंकल ने कुछ नहीं कहा। वे बहुत ही धीमे और नपे-तुले कदमों से चलते हुए मेरे ठीक पीछे आकर खड़े हो गए। आईने में हमारी जोड़ी अद्भुत लग रही थी.... कहाँ वे 50 साल के मैच्योर, चौड़े कंधों वाले रौबीले पुरुष और कहाँ मैं उनके सामने एक नाजुक, गोरी और छरहरी कली जैसी। अंकल ने बिना एक पल गंवाए अपने दोनों बड़े और मजबूत हाथों को आगे बढ़ाया। जैसे ही उनकी पौरुषमयी, गर्म उँगलियों के पोरों ने मेरी नंगी और मखमली पीठ की त्वचा को छुआ, मेरे मुँह से एक बेहद नाज़ुक और दबी हुई 'आह...' निकल गई। ठंड के मौसम में भी उनका वह स्पर्श किसी जलते हुए अंगारे जैसा तीखा था।

"शशश... घबराओ मत, मैं लगा देता हूँ," उन्होंने बहुत ही धीरे से, सीधे मेरे कान के पास झुककर फुसफुसाया। उनकी गर्म साँसें जब मेरी गर्दन के पिछले हिस्से पर बिखरीं, तो मेरे पैरों की उँगलियाँ फर्श पर कस गईं।

अंकल की उँगलियाँ बहुत ही तसल्ली से और धीरे-धीरे ब्लाउज़ के उस रेशमी कपड़े को समेटते हुए हुक को फंसाने लगीं। लेकिन हुक लगाने के बहाने उनका वह भारी मर्दाना हाथ जानबूझकर मेरी रीढ़ की हड्डी से होते हुए नीचे कमर के उस नाजुक उतार-चढ़ाव को सहला रहा था। आईने में साफ़ दिख रहा था कि अंकल की आँखें पूरी तरह से मेरी इस गोरी काया के सम्मोहन में डूब चुकी थीं। कॉलेज के लड़कों के कच्चे और बचकाने आकर्षण से यह पूरी तरह अलग था; इस छुअन में एक गहरा ठहराव, सुरक्षा और असीम प्यार था जिसने मुझे अंदर तक पिघला दिया।

हुक बंद करने के बाद भी अंकल के हाथ मेरी पीठ से हटे नहीं। उन्होंने अपनी मजबूत हथेलियों को मेरे दोनों कंधों पर जमाया और मुझे आईने में देखते हुए बेहद शिद्दत से अपनी तरफ थोड़ा खींचा। मेरा पूरा बदन पीछे मुड़कर सीधे उनके चौड़े और गठीले सीने से जा टकराया। हमारी धड़कनें इस वक्त एक हो चुकी थीं, और बाहर होती बारिश के शोर के बीच इस सूने कमरे में हम दोनों एक खूबसूरत, अनजाने और पवित्र प्रेम की गहराइयों में उतरते जा रहे थे।

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अंकल के उस चौड़े और फौलादी सीने से टिकते ही मेरे भीतर की सारी हिचकिचाहट जैसे कपूर बनकर उड़ गई। आईने में हमारी नजरें मिली हुई थीं। कहाँ वे इतने गंभीर और रौबीले, और कहाँ मैं अपनी धुन में रहने वाली चुलबुली लड़की। अपनी उसी नटखट आदत के चलते, मैंने आईने में ही उन्हें देखकर अपनी एक आँख धीरे से दबाई और मुस्कुराते हुए थोड़ा सा मचल कर कहा, "अंकल... हुक तो लग गया, पर आपकी उँगलियाँ अभी भी मेरी पीठ पर ही जमी हुई हैं। कहीं आपका इरादा इसे फिर से खोलने का तो नहीं?"

मेरी इस चुलबुली और बेबाक बात को सुनकर अंकल के गंभीर चेहरे पर एक बेहद खूबसूरत और दिलकश मुस्कान तैर गई। उनके चौड़े कंधे थोड़े ढीले पड़े और उन्होंने अपनी पकड़ को मेरे कंधों पर और भी सहलाते हुए मजबूत कर लिया।

वे धीरे से और आगे झुके, जिससे उनका रोबीला चेहरा सीधे मेरी गर्दन और गाल के बिल्कुल करीब आ गया। अपनी भारी और मखमली आवाज़ में वे बोले, "बदमाश हो तुम कुसुम... इतनी बड़ी आफत से अभी-अभी बची हो, और तुम्हारी ये नौटंकी अभी भी बंद नहीं हुई?"

"आफत से कहाँ बची हूँ अंकल..." मैंने घूमकर अपना रुख पूरी तरह उनकी तरफ कर लिया। अब मेरा नाजुक बदन सीधे उनके सामने था। मैंने अपने दोनों हाथ बेहद अल्हड़पन से उनके गठीले सूट के कॉलर्स पर टिका दिए और अपनी पलकें उठाकर सीधे उनकी गहरी आँखों में झांकते हुए कहा, "नीचे तो सिर्फ लाइट का तार था जिससे मैं गिर रही थी... पर यहाँ ऊपर तो आपकी इन आँखों का जादू है, जिनसे मैं चाहकर भी खुद को संभाल नहीं पा रही हूँ।"

मेरी इस मासूम और तीखी स्वीकारोक्ति ने जैसे अंकल के संयम का आखिरी बांध भी तोड़ दिया। उनकी आँखों में मेरे लिए छुपा हुआ असीम स्नेह और एक जवां मर्द का तीखा आकर्षण साफ-साफ उभर आया। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने बड़े और गर्म हाथों से मेरे चेहरे को दोनों तरफ से अपनी हथेलियों के घेरे में ले लिया। उनके हाथों की वह छुअन इतनी सुरक्षित और मखमली थी कि मैंने मदहोशी में अपनी आँखें बंद कर लीं।

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"कुसुम... तुम नहीं जानतीं कि तुम इस बूढ़े दिल के साथ क्या कर रही हो..." उन्होंने बहुत ही भावुक होकर फुसफुसाया।

"आप बूढ़े नहीं हैं अंकल... आप तो सही मायनो में मर्द हैं।" मैंने आँखें खोलकर हठ करते हुए कहा।

अंकल ने कुछ नहीं कहा, बस उनकी सांसें और भारी हो गईं। वे और नीचे झुके। उनके होठों की पहली छुअन सीधे मेरे माथे के ठीक बीचों-बीच, मेरी बिंदी के पास पड़ी। वह चुंबन वासना से परे, असीम सुरक्षा, गहरे प्यार और अपना बनाने के वादे से भरा हुआ था। माथे को चूमने के बाद, वे धीरे से नीचे उतरे और उनके होंठ बहुत ही नाज़ुक अंदाज़ में मेरे दोनों गुलाबी होते गालों को छू गए।



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उनके होठों की उस गीली और तपती हुई छुअन ने लहंगे के भीतर मेरे पूरे 19 साल के कुँआरे बदन में एक ऐसा मीठा मीठा करंट दौड़ा दिया कि मैं पूरी तरह से उनके सीने में सिमट गई। बाहर बारिश की बूंदें अब और तेज हो चुकी थीं, और इस सूने कमरे में हमारी धड़कनें एक नया इतिहास लिख रही थीं।

कमरे के उस प्यारे और अजीब से अहसास के बाद, मैं खुद को संभालकर वापस नीचे शादी के फंक्शन में आ गई। लेकिन शादी खत्म होने और मेरे अपने घर वापस आ जाने के बाद भी, मेरा दिमाग वहीं अटका हुआ था। दिन हो या रात, सोते-जागते मेरी आँखों के सामने बस नेहा के पापा का वह रौबीला चेहरा, उनके चौड़े कंधे और उनकी उँगलियों का वह छूना ही घूमता रहता था। उनकी यादें मुझे इस कदर बेचैन कर रही थीं कि मुझसे और सब्र नहीं हुआ।

आखिरकार एक रात, जब पूरा घर सो चुका था, मैंने बहुत तेज़ी से धड़कते दिल और कांपते हाथों से सीधे अंकल का नंबर मिला दिया। फोन की हर एक घंटी के साथ मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था, मानो छाती से बाहर आ जाएगा।

दो-तीन घंटी जाने के बाद, उधर से उनकी भारी और गंभीर आवाज़ आई, "हेलो..."

"हेलो, अंकल..." मेरी आवाज़ थोड़ी कांप रही थी।

अंकल ने जैसे ही मेरी आवाज़ पहचानी, वे हमेशा की तरह नॉर्मल होते हुए बोले, "अरे कुसुम! इतनी रात को फोन? सब ठीक-ठाक तो है ना? रुको, मैं नेहा को फोन देता हूँ, वह सो रही होगी तो उठाता हूँ..."

यह सुनते ही मेरे चेहरे पर एक नटखट और शरारती मुस्कान आ गई। मैंने तुरंत उनकी बात काटते हुए बहुत ही चुलबुले अंदाज़ में कहा, "अरे अंकल! नेहा को फोन देने की कोई ज़रूरत नहीं है। मुझे नेहा से बात करनी होती, तो मैं इतनी रात को उसे फोन करती ना, आपको क्यों करती?"

अपनी बात कहकर मैं धीरे-धीरे हंसने लगी। मेरी उस हल्की सी हंसी की आवाज़ देर रात के उस सन्नाटे में सीधे अंकल के दिल पर जा लगी। फोन के उस पार अचानक बिल्कुल शांति छा गई, और मुझे साफ़ महसूस हो रहा था कि अंकल भी अब मेरी इस बेबाक बात से थोड़े हैरान और बेचैन होने लगे थे।

फोन के उस पार जो सन्नाटा छाया था, उसे अंकल की एक हल्की सी खांसने की आवाज़ ने तोड़ा। वे थोड़े असहज हुए, लेकिन फिर अपनी भारी आवाज़ को थोड़ा धीमा करते हुए बोले, "कुसुम, तुम सच में बहुत नटखट होती जा रही हो। इतनी रात को अपनी सहेली के पापा से ऐसी बातें करते हुए तुम्हें डर नहीं लगता?"

उनकी इस बात ने मेरे भीतर की शरारत को और बढ़ा दिया। मैंने तकिए को अपनी बाहों में थोड़ा और कसा और बेड पर करवट लेते हुए चुलबुले अंदाज़ में कहा, "डर कैसा अंकल? नीचे जब मैं गिर रही थी, तब तो आपने बड़े हक से मुझे अपनी मजबूत बाहों में थाम लिया था। तब तो आपको डर नहीं लगा, तो अब मुझे क्यों लगेगा?"

मेरी यह बात सुनकर अंकल मुस्कुरा दिए, उनके हंसने की हल्की सी आवाज़ फोन में साफ़ सुनाई दी। वे बोले, "वह तो तुम्हें गिरने से बचाने के लिए था कुसुम। लेकिन तुम तो बहुत तेज निकलीं, हुक लगाने के बहाने भी मुझे ही डांट रही थीं।"

"डांट नहीं रही थी अंकल, वह तो मेरा प्यार था," मैंने बिना सोचे बहुत ही सीधे और मासूम अंदाज़ में कह दिया। मेरी यह बात सुनते ही फोन के दोनों तरफ एक बहुत ही प्यारा और मीठा सन्नाटा छा गया। दोनों तरफ धड़कनें तेज़ थीं।

अंकल ने एक गहरी सांस ली और बहुत ही शांति से बोले, "कुसुम, तुम अभी बहुत छोटी हो, कॉलेज के पहले साल में हो। और मैं..."

मैंने तुरंत उनकी बात बीच में ही काट दी, "और आप मेरे सबसे प्यारे अंकल हैं, जो मेरे दिल के राजा बन चुके हैं। मुझे उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता।"

अंकल मेरी इस दीवानगी और साफ़ बात के सामने पूरी तरह निरुत्तर हो गए। वे समझ गए कि यह नटखट लड़की अब उनके काबू से बाहर हो चुकी है और खुद उनका दिल भी अब कुसुम के बिना नहीं मान रहा था। उन्होंने थोड़ी देर सोचा और फिर बहुत ही दबी और गंभीर आवाज़ में कहा, "अच्छा बाबा, हार गया मैं तुमसे। फोन पर ये बातें करना ठीक नहीं है। कल दोपहर को कॉलेज खत्म होने के बाद क्या तुम मुझसे मिल सकती हो? शहर के बाहर जो पुराना गार्डन है, मैं वहाँ तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।"

अंकल के मुँह से मिलने की बात सुनते ही खुशी के मारे मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से उछलने लगा। मैंने झट से कहा, "हाँ अंकल, मैं बिल्कुल आऊँगी! आप बस वक्त पर पहुँच जाना।" फोन रखने के बाद भी मेरे चेहरे की मुस्कान गायब नहीं हुई, और मैं कल दोपहर की मुलाकात के हसीन ख्यालों में खो गई।
Bhut hi kamuk aur hot update, please post continue
 
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