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पता नहीं अभी तक वो स्टोरी नहीं पढ़ी है, लेकिन गांव wali aur कुछ स्टोरी पढ़ी थी तो उसके जैसा बनाने की कोशिश की है हलाकि कहानी बिलकुल अलग रखी है, एक दम नया है ये।
सुल्तानपुर की गलियों में ढोल-नगाड़ों की थाप और रंग-बिरंगी झालरों की झिलमिलाहट बता रही थी कि मेले और ऐतिहासिक दंगल का रंग जमने लगा है। चारों तरफ हलवाइयों की दुकानों से उठती भीनी-भीनी खुशबू, गुब्बारों और खिलौनों की रेहड़ियां, और अखाड़े की खोदी जा रही मिट्टी की सोंध—सुल्तानपुर की आबो-हवा में एक अलग ही उमंग और उत्साह भर रही थी।
आरव के लिए यह सब कुछ बिल्कुल नया था। अजनबी सा अतीत और भूल चुकी यादों के बीच यह पहली बार था जब वह किसी गांव के इतने बड़े उत्सव को इतने करीब से देख रहा था। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि पहली ही बार में उसके कंधों पर सुल्तानपुर के सबसे प्रतिष्ठित मेले और दंगल की कमान थी।
सुबह सुनीता के हाथों माथे पर लगा वो लाल सिंदूर का तिलक सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि आरव के लिए एक सुरक्षा-कवच और हौसले का अहसास था। सुनीता की फिक्र और उसके हाथों का स्पर्श आरव के दिल में एक अनजानी ताकत भर चुका था।
घर से निकलकर आरव सीधा हवेली पहुँचा। सिया देवी दालान में बैठीं गांव के पंचों और बड़े-बुजुर्गों के साथ मेले की रूपरेखा पर चर्चा कर रही थीं।
"प्रणाम अम्मा जी," आरव ने हवेली की देहरी पर पहुंचकर बड़े अदब से सिर झुकाया।
सिया देवी ने चश्मे के ऊपर से आरव को देखा। उसकी चौड़ी छाती, नीले कुर्ते की सादगी और माथे पर चमकता सुनीता का दिया हुआ तिलक देखकर सिया देवी की आंखों में एक गहरा संतोष तैर गया।
"आ गए आरव?" सिया देवी ने अपनी लाठी को सीधा करते हुए कहा, "आज से मेले का हर एक काम तुम्हारी निगरानी में होगा। व्यापारी कहाँ बैठेंगे, दंगल के पहलवानों का ठहराव कहाँ होगा और सुरक्षा का इंतजाम कैसा रहेगा—सब तुम्हें संभालना है।"
आरव ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, "जी अम्मा जी, जैसा आप कहें। आप बस मार्गदर्शन दीजिए, कमी कोई नहीं छूटेगी।"
दिन चढ़ते-चढ़ते आरव ने अपनी मेहनत और समझदारी से पूरे गांव को हैरत में डाल दिया। उसे भले ही अपना अतीत याद न हो, लेकिन उसमें फैसले लेने का जो नेतृत्व और गंभीरता थी, वह किसी मंजे हुए रसूखदार से कम नहीं थी। उसने अखाड़े की मिट्टी को खुद फावड़ा चलाकर सही करवाया, बाहरी पहलवानों के रहने के लिए धर्मशाला की व्यवस्था देखी और दुकानदारों को बिना किसी उगाही के शांति से दुकानें लगाने का भरोसा दिया।
सालों से गांव वाले राकेश के गुंडों की बदतमीजी, अवैध वसूली और धमकी से तंग आ चुके थे। लेकिन आरव का स्वभाव बिल्कुल अलग था—कम बोलने वाला, काम में निष्ठा रखने वाला और हर छोटे-बड़े से अदब से बात करने वाला।
दोपहर होते-होते अखाड़े के पास जुटी भीड़ में बातें होने लगीं—
"अरे भाई! यह लड़का तो सोने जैसी नीयत का है। कहाँ राकेश की वो गुंडागर्दी और कहाँ आरव का यह सलीका!"
"सिया देवी अम्मा ने बहुत सोच-समझकर मेले की चाबी इसके हाथ में दी है। इस बार मेला सही मायनों में पूरे गांव का मेला लग रहा है।"
हवेली की अट्टालिका से खड़ी सिया देवी भी दूर से आरव को हाड़-तोड़ मेहनत करते और पूरे अनुशासन के साथ व्यवस्था संभालते देख रही थीं। उनके चेहरे पर एक हल्की सी गर्व भरी मुस्कान थी—उन्हें अपनी पसंद और अपने फैसले पर पूरा भरोसा हो गया था।
लेकिन गाँव के दूसरे कोने में, अपने अहाते में बैठा राकेश जब अखाड़े से आ रही आरव की तारीफों की खबरें सुन रहा था, तो उसकी आँखों में नफ़रत की ज्वाला और गहरी होती जा रही थी।
सिया देवी ने बड़ी चालाकी से गांव की शांति और हवेली की साख दोनों को बचा लिया था। वह जानती थीं कि अगर राकेश को बिल्कुल दरकिनार कर दिया गया, तो वह अखाड़े में जाकर आरव के काम में अड़ंगा डालेगा और उपद्रव मचाएगा। इसलिए उन्होंने दंगल की कमान तो आरव को सौंपी, लेकिन इस बार मेले के सबसे खास और प्रतिष्ठित मेहमान के स्वागत की जिम्मेदारी सीधे राकेश के कंधों पर डाल दी।
वह मेहमान कोई साधारण शख्सियत नहीं थे—राजस्थान के मारवाड़ इलाके से आने वाले हुकुमतदार जमींदार वीरदेव राणा।
महज 32 साल की उम्र में वीरदेव राणा की हनक और रसूख का डंका पूरे राजपूताने में बजता था। ऊँचा-पूरा कसरती कद, रौबदार मूछें, आंखों में राजपूती ठाट की तेजी और चाल में एक अनजाना ही गुमान—वीरदेव राणा की गिनती उत्तर भारत के सबसे बड़े रियासतदारों और कुश्ती के कद्रदानों में होती थी। सुल्तानपुर का दंगल उनके दादा के जमाने से प्रसिद्ध था, और इस बार सिया देवी के खास निमंत्रण पर वीरदेव खुद सुल्तानपुर आ रहे थे।
जब सिया देवी ने राकेश को यह जिम्मेदारी सौंपी, तो राकेश का उबलता हुआ गुस्सा कुछ हद तक शांत हुआ। उसने इसे अपनी खोई हुई साख वापस पाने का एक बड़ा जरिया मान लिया। वह जानता था कि अगर उसने वीरदेव राणा जैसे बड़े जमींदार को अपना कायल बना लिया, तो गांव में उसका दबदबा अपने आप लौट आएगा।
राकेश ने वीरदेव राणा के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी।
हवेली के सबसे भव्य मेहमानखाने को खास राजस्थानी गालिचों और इत्र की महक से सजाया गया। सुल्तानपुर की सीमा पर जब वीरदेव राणा की काली गाड़ियों का काफिला पहुँचा, तो ढोल-नगाड़ों और तोपों की सलामी जैसी आतिशबाजी के साथ खुद राकेश ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया।
"पधारो हुकुम! सुल्तानपुर की धरती पर आपका स्वागत है," राकेश ने पूरी खातिरदारी दिखाते हुए गले में भारी गेंदे की माला पहनाई।
32 साल के वीरदेव राणा अपनी काली थार से नीचे उतरे। सिर पर राजपूती साफा, आंखों पर काला चश्मा और चाल में एक ऐसा रौब था जिसे देखकर रास्ते में खड़े गांव वाले खुद-ब-खुद पीछे हट गए।
वीरदेव ने अपनी गहरी आवाज में मुस्कुराते हुए कहा, "सुना है इस बार सुल्तानपुर के दंगल का मिजाज बदला हुआ है, राकेश भाई? सिया देवी जी ने हवेली की कमान किसी नए हाथ में सौंपी है?"
यह सवाल सुनते ही राकेश के चेहरे पर एक पल के लिए कड़वाहट छा गई, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभालते हुए मुस्कुराकर कहा, "अम्मा की अपनी सोच है हुकुम... पर आप हमारे मेहमान हैं। आपके स्वागत में कोई कमी रह जाए, तो राकेश नाम भूल जाइएगा। आइए, हवेली में आपका विश्राम स्थल तैयार है।"
वीरदेव राणा की पारखी नजरों से राकेश की वो झिझक छुपी नहीं रही। वीरदेव यह भली-भांति समझ गए थे कि सुल्तानपुर की हवेली और इस मेले के पीछे कोई बहुत बड़ा अंदरूनी तूफान सुलग रहा है—और इस तूफान के केंद्र में है वह नया नौजवान 'आरव', जिसके चर्चे रास्ते भर उन्हें सुनने को मिले थे।
वीरदेव राणा के सुल्तानपुर कदम रखते ही हवा में एक अजीब सा खौफ और दबाव तैरने लगा था। 32 साल की उम्र में ही वीरदेव ने जो रुतबा हासिल किया था, उसके पीछे खून और बारूद का एक बहुत काला इतिहास था।
उसके बाप धीरदेव राणा ने सालों पहले अपने ही सगे भाई की पीठ में छुरा घोंपकर, पूरी रियासत और खानदानी हवेली पर अवैध कब्जा कर लिया था। धीरदेव को लगा था कि उसने दुनिया जीत ली है, लेकिन वह भूल गया था कि उसी के खून से जन्मा उसका अपना बेटा वीरदेव उससे भी बड़ा दरिंदा निकलेगा। वीरदेव ने जैसे ही जवानी में कदम रखा, उसने बिना किसी रहम के अपने ही बाप धीरदेव को रास्ते से हटा दिया और पूरी जागीर का इकलौता मालिक बन बैठा।
वीरदेव के लिए कानून, रिश्ता और नैतिकता—ये सब बेमानी शब्द थे। उसे सिर्फ दो ही चीजों का जुनून था: अंधा पैसा व बेहिसाब ताकत, और औरतों की बेमिसाल खूबसूरती। वह औरतों के हुस्न और उनकी नशीली अदाओं का बेहद शौकीन था। उसके अहाते में राजपूताने की कितनी ही मजबूर और बेहद खूबसूरत औरतें उसकी हवस का शिकार हो चुकी थीं।
सुल्तानपुर आने के पीछे वीरदेव का मकसद सिर्फ कुश्ती का दंगल देखना नहीं था। यहाँ उसकी और उसकी कंपनियों की कई बेनामी संपत्तियां और ईंट-भट्ठों के बड़े प्रोजेक्ट चल रहे थे। वह सुल्तानपुर की जमीन पर अपना कारोबार फैलाने और अपनी हनक की धाक जमाने आया था। वह सिया देवी और राकेश को यह दिखाना चाहता था कि इस पूरे इलाके का असल सरपरस्त वही है।
हवेली के शाही मेहमानखाने में जब वीरदेव राणा ने कदम रखा, तो उसकी नजरें चारों तरफ घूम रही थीं। राकेश उसके आगे-आगे पानी की तरह पैसा पानी बहाकर खातिरदारी कर रहा था, पर वीरदेव की पारखी और हैवानियत से भरी नजरें कुछ और तलाश रही थीं।
"राकेश भाई..." वीरदेव ने अपनी काली मूंछों पर ताव देते हुए, रेशमी गद्दे पर बैठकर सिगार का धुआँ हवा में उछाला, "सुल्तानपुर सुना तो बहुत था कि यहाँ की आबो-हवा में खूबसूरती बिखरी पड़ी है... पर अभी तक मुझे इस गाँव में कोई ऐसी सूरत नहीं दिखी जो राणा के मिजाज को भा जाए।"
राकेश ने अपने होंठों पर एक कड़वी और शातिर मुस्कान सजाई। उसे तुरंत समझ आ गया कि वीरदेव की दुखती रग कहाँ है।
"हुकुम..." राकेश ने थोड़ा करीब झुककर नशीली फुसफुसाहट में कहा, "गाँव की आम औरतों की बात छोड़िए। यहाँ एक ऐसी हुस्न की मल्लिका है, जिसकी खूबसूरती के आगे राजपूताने की बड़ी-बड़ी रानियां भी पानी भरें। नाम है उसका सुनीता... 42 साल की ढलती उम्र में भी उसका रूप ऐसा रसीला है कि देखने वाले का ईमान डगमगा जाए।"
'सुनीता' का नाम सुनते ही वीरदेव राणा की भूरी, खूंखार आंखों में एक अजीब सी चमक दौड़ गई। सिगार की लौ में उसका चेहरा और भी खौफनाक दिखने लगा।
"42 साल?" वीरदेव के चेहरे पर एक नशीली, हवस भरी मुस्कान बिखर गई, "राकेश भाई... पकी हुई फसल का मज़ा ही कुछ और होता है। अगर तुम्हारी बात में दम निकला, तो समझो सुल्तानपुर का यह पूरा बिजनेस और हमारी ताकत सिर्फ तुम्हारे नाम होगी।"
राकेश के दिल में जैसे ठंडक पड़ गई। उसने सोचा कि अब आरव को कुचलने और सुनीता को वीरदेव के हाथों तबाह करवाने का सबसे बड़ा मोहरा खुद वीरदेव राणा बनेगा।
शाम ढलते-ढलते सुल्तानपुर का मेला ढोल की थाप और पीली लाइटों से जगमगाने लगा था। दिनभर अखाड़े की मिट्टी सही करवाने, पंडाल के लट्ठे गाड़ने और गांव के पंचों के साथ दौड़-भाग करने के बाद आरव जब घर की देहरी पर पहुँचा, तो उसकी सांसों में थकान जरूर थी, पर आंखों में एक अजीब सा ठहराव था।
अंदर कदम रखते ही उसकी नाक से ताजी सिकती रोटियों और देसी घी की सोंधी महक टकराई। रसोई के मद्धम दीये की रोशनी में सुनीता मिट्टी के चूल्हे के पास बैठी थी। जैसे ही उसने आरव के भारी कदमों की आहट सुनी, उसने झटके से अपना मुंह घुमाया।
पूरे दिन भर सुनीता का दिल एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठा था। घर के कोने-कोने में, कपड़ों की तह में, यहाँ तक कि चूल्हे से उठती आंच में भी उसे सिर्फ आरव का वो मासूम और कसरती चेहरा ही नजर आ रहा था। आरव को सही-सलामत सामने देखते ही उसके गुलाबी होंठों पर एक ऐसी दिलकश मुस्कान बिखर गई, जैसे तपते दिन के बाद पहली फुहार पड़ी हो।
"आ गए?" सुनीता ने अपनी कजरारी आंखों से उसे ऊपर से नीचे तक निहारते हुए कहा, "चलो, जल्दी से नल पर हाथ-मुंह धोकर आओ और बैठो... गर्म-गर्म रोटियां सेक दी हैं, तुरंत खा लो।"
आरव ने अपने नीले कुर्ते की आस्तीनें ऊपर चढ़ाते हुए सुनीता को देखा। चूल्हे की लाल आंच सीधे सुनीता के निखरे हुए, पसीने से चमचमाते चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी सूती साड़ी का पल्लू कांधे से थोड़ा ढलक गया था, जिससे उसकी गर्दन और सुराहीदार गले का निखार इस मद्धम उजाले में और भी रसीला लग रहा था।
आरव मुस्कुराया और आंगन में लगे हैंडपंप की तरफ बढ़ते हुए बहुत नशीली और धीमी आवाज में बोला, "अभी आया... वैसे मौसी, जिंदगी में कुछ चीजें जितनी गर्म हों, उन्हें चखने का मज़ा उतना ही ज्यादा आता है।"
यह सुनते ही सुनीता के हाथ में रखी कांसी की परात की थपकी एक पल को थम गई। उसके गालों पर मारे हया के लालिमा दौड़ गई और उसके रसीले होंठ अपने आप भिंच गए। उसने घबराकर चौखट की तरफ देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा, फिर आंखें चमकाते हुए मुस्कुराई।
"अरे... बड़ा बेशर्म हो गया है तू!" सुनीता ने अपनी कांपती उंगलियों से पल्लू संभाला और चिमटे से रोटी पलटते हुए झूठी डांट पिलाई, "चुपचाप हाथ-मुंह धोकर आ, वरना एक भी गरम रोटी नहीं मिलेगी तुझे।"
आरव ठंडे पानी से मुंह धोकर सीधे रसोई की देहरी पर आ बैठा। पानी की कुछ बूंदें उसके चौड़े माथे और गर्दन से रिसकर कुर्ते के कॉलर में जज्ब हो रही थीं। उसने सुनीता के बिल्कुल करीब बैठकर अपनी कसरती टांगें मोड़ लीं। उसकी देह से आ रही मर्दानामूलक गर्माहट और पानी की सोंधी महक सीधे सुनीता के नथुनों से टकराई।
सुनीता ने थाली में दो फूली हुई, घी से चुपड़ी रोटियां और सब्जी रखकर आरव के सामने सरकाई। लेकिन आरव ने थाली की तरफ हाथ बढ़ाने के बजाय सीधे सुनीता के हाथ को अपनी हथेलियों में समेट लिया।
"अपने हाथ से खिलाओ न..." आरव ने बच्चों जैसी बेताबी और अपनी नीली आंखों में बेपनाह प्यार समेटकर कहा, "दिनभर अखाड़े में बहुत काम किया है, अब हाथ उठ ही नहीं रहे।"
"नौटंकी बंद कर!" सुनीता ने हंसते हुए अपने हाथ छुड़ाने की नाकाम कोशिश की, पर आरव की मजबूत उंगलियों की पकड़ में एक अनजाना समर्पण था।
सुनीता का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने एक छोटी सी नीकी तोड़ी, उसे सब्जी में डुबोया और आरव के होंठों के पास ले गई। आरव ने अपनी नजरें सुनीता की कजरारी आंखों से हटाए बिना उस निवाले को मुंह में ले लिया। निवाला चबाते वक्त उसके होंठ सुनीता की उंगलियों की पोरों को छू गए।
सुनीता के वजूद में एक हल्की सी सिहरन दौड़ गई। उसकी सांसें थोड़ी भारी हो गईं।
"कैसी बनी है?" सुनीता ने अपने कांपते होंठों को दबाते हुए मद्धम आवाज में पूछा।
"रोटी तो बहुत मीठी है..." आरव ने थोड़ा और करीब झुककर सुनीता की आंख में झांका, उसकी सांसों की गर्माहट सुनीता के गालों को झुलसाने लगी, "...लेकिन इसे पकाने वाली के होंठों की मिठास से कम ही है।"
सुनीता की सांसें अटक गईं। उसने आरव के कसरती कांधे पर एक हल्का सा थप्पड़ मारा, पर उसकी उंगलियां आरव के कुर्ते को कसकर भींच गईं।
"आरव... तू सुधरेगा नहीं न?" सुनीता की आवाज में हया, दुलार और एक गहरी औरत की तड़प पूरी तरह घुल चुकी थी।
"आपके पास आकर कोई कैसे सुधर सकता है मौसी?" आरव ने मुस्कुराते हुए सुनीता के चेहरे पर आई भीगी लट को आहिस्ते से पीछे सरकाया और उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया, "आज रात फिर मुझे आपकी बाहों में सोना है... उस सुकून के बिना अब यह आरव जिंदा नहीं रह सकता।"
सुनीता ने शरमाते हुए अपनी आंखें मूंद लीं और अपना सिर आरव के चौड़े सीने से टिका दिया। रसोई में पसरा सन्नाटा, चूल्हे की मद्धम आंच और उन दोनों के दिलों की बेकाबू धड़कनें गवाही दे रही थीं कि बाहर चाहे कोई भी तूफान पक रहा हो, इस छोटे से घर में दोनों एक-दूसरे की मोहब्बत में पूरी तरह डूब चुके थे।
सुनीता ने कहा "चलो अब जाकर रूम मे आराम करो मै काम निपटा कर तेल गर्म करके लती हु अपने पहलवान के लिए।"
सुनीता की यह बात सुनते ही आरव के चेहरे पर एक दिलकश और जानलेवा मुस्कान तैर गई। उसने अपनी नीली आंखों में शरारत भरते हुए सुनीता की तरफ देखा।
"अपने पहलवान के लिए...?" आरव ने बेहद मद्धम और नशीली आवाज में दोहराया। वह अपनी जगह से उठा और सुनीता के एकदम करीब जाकर खड़ा हो गया, "फिर तो यह पहलवान तब तक कमरे में एक पल भी आराम नहीं कर पाएगा मौसी... जब तक उसके शरीर को आपकी इन उंगलियों का स्पर्श नहीं मिल जाता।"
सुनीता का दिल इस नज़दीकी से धक से रह गया। उसने हया से अपनी नजरें झुका लीं और आरव के चौड़े सीने पर हल्की सी थपकी मारी, "अरे हट भी अब! मुझे रसोई समेटने दे... बर्तन धोकर, दीया बुझाकर आती हूँ। तू जाकर तख्त पर लेट।"
आरव ने मुस्कुराते हुए सुनीता के माथे को अपने होंठों से छुआ और भारी कदमों से कमरे की तरफ बढ़ गया।
रसोई का सारा काम निपटाने के बाद, सुनीता ने पीतल की छोटी कटोरी में सरसों का शुद्ध तेल लिया और उसमें हल्की सी अजवाइन और लहसुन डालकर चूल्हे की मद्धम आंच पर गुनगुना किया। तेल की सोंधी महक पूरे घर की आबो-हवा में उतरने लगी। उसने रसोई का दीया धीमा किया, किवाड़ अंदर से सड़काया और तेल की कटोरी थामे दबे पांव कमरे में दाखिल हुई।
कमरे में सिर्फ कोने में जल रहे दीये की पीली रोशनी तैर रही थी।
आरव तख्त पर लेटा हुआ था—उसने अपना कुर्ता उतारकर एक तरफ रख दिया था। दीये की मद्धम रोशनी में उसका कसरती, गठीला और चौड़ा बदन चमक रहा था। दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद उसकी मांसपेशियों में हल्की सी थकान साफ दिख रही थी।
सुनीता ने कमरे का लकड़ी का दरवाजा सड़का दिया और कुंडी चढ़ा दी। सांकल की वो हल्की सी 'खट' की आवाज रात के उस सन्नाटे में दोनों के दिलों की धड़कन तेज कर गई।
सुनीता आहिस्ते से कदम बढ़ाती हुई तख्त के पास आई और किनारे पर बैठ गई।
"सो गया क्या?" सुनीता ने बहुत रसीली और कांपती आवाज में पूछा।
आरव ने तुरंत अपनी आंखें खोलीं। सुनीता को अपने इतने पास देखकर उसकी नीली आंखों में बेपनाह चाहत का उफान आ गया। सुनीता ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में सलीके से खोस लिया था, जिससे उसकी सुराहीदार कमर और गर्दन का निखार दीये की रोशनी में और भी दमक रहा था।
"आप जब तक न आओ... यह पहलवान सो कैसे सकता है?" आरव ने मुस्कुराकर कहा।
सुनीता ने अपनी उंगलियां गुनगुने तेल में डुबोईं और कांपते हाथों से आरव के चौड़े, मजबूत कांधों पर रख दीं।
जैसे ही तेल की गर्माहट और सुनीता की उंगलियों का कोमल स्पर्श आरव के जिस्म से टकराया, आरव के मुंह से एक धीमी, संतोष भरी आह निकल गई। सुनीता की उंगलियां आरव की पीठ, कांधों और सीने की मांसपेशियों को बहुत ही नजाकत और दुलार से सहलाने लगीं।
"दिनभर बहुत भागदौड़ की है न तूने..." सुनीता ने आरव के बालों को पीछे सरकाते हुए बहुत मीठे लहजे में कहा, "अखाड़े की मिट्टी में शरीर टूट गया होगा।"
"जब मालिश करने वाली इतनी हसीन हो..." आरव ने आहिस्ते से उठकर सुनीता की पतली कमर के गिर्द अपनी बांहें लपेट लीं और अपना चेहरा उसकी भीगी गर्दन और छाती के पास टिका दिया, "...तो सारा दर्द और थकान एक पल में कपूर बनकर उड़ जाती है।"
सुनीता की सांसें उखड़ गईं। उसने तेल से सने अपने हाथों को आरव के बालों में फंसा दिया और आरव को अपने सीने से और कसकर भींच लिया।
"आरव..." सुनीता की आवाज में बेबसी, हया और औरत की बेपनाह चाहत घुली हुई थी, "तू मुझे किस रास्ते पर ले आया है... अब तेरे बिना यह सुनीता एक पल भी नहीं जी सकती।"
"तो जीना भी मत मौसी..." आरव ने ऊपर देखते हुए सुनीता के कांपते, रसीले होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वह चुंबन किसी जल्दबाजी का नहीं था—उसमें एक-दूसरे को पाने का सुकून, बीते कल का डर और आने वाले हर तूफान से लड़ने का एक अटूट वादा था। रात का सन्नाटा गहराता गया और उस छोटे से कमरे में दो रूहें दीये की मद्धम रोशनी में एक-दूसरे की गर्माहट में पूरी तरह खो गईं।
सुनीता की रेशमी, कांपती उंगलियों ने आरव के कसरती कांधों पर हल्का सा दबाव बनाया और उसे पीछे की तरफ धकेलते हुए तख्त पर दोबारा लेटने का इशारा किया। उसकी कजरारी आंखों में हया की सुर्खी और एक मिठास भरा दुलार छलक रहा था।
"ठहर जा नटखट..." सुनीता ने अपनी सांसों को संभालते हुए, बहुत ही रसीली फुसफुसाहट में कहा, "पहले अपनी इस मालिश को तो पूरा होने दे। दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जब तक मेरे पहलवान की थकावट नहीं उतरेगी, तब तक उसके शरीर में वो बिजली जैसी ताकत कैसे लौटेगी?"
आरव ने एक मासूम सी मुस्कान के साथ अपने दोनों हाथ सर के पीछे फैला लिए और तख्त पर सीधा लेट गया। दीये की मद्धम पीली रोशनी में उसका चौड़ा सीना और सुडौल नसें दमक रही थीं।
सुनीता ने अपनी हथेलियों में कटोरी से थोड़ा और गुनगुना सरसों का तेल उड़ेला। तेल की सोंधी महक और लहसुन-अजवाइन की गर्माहट कमरे की आबो-हवा में घुलने लगी। सुनीता ने अपनी दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर गरम किया और फिर बहुत ही नजाकत से उन्हें आरव के चौड़े सीने पर टिका दिया।
स्पर्श होते ही आरव के मुंह से एक मद्धम, संतोष भरी सिसकी निकली।
सुनीता की उंगलियां आरव के कसरती सीने की मांसपेशियों पर धीरे-धीरे गोल-गोल घूमने लगीं। उसकी हथेलियों का हर एक मोड़ आरव की देह से उठती गर्माहट को सोख रहा था। सुनीता ने अपनी पोरों से आरव की गर्दन की नसों से लेकर उसके कांधों तक के तनाव को सहलाया। उसका पल्लू कांधे से ढलककर कमर पर आ टिका था, और जब भी वह आरव के सीने पर झुकती, उसकी सूती साड़ी की सरसराहट और उसकी सांसों की महक सीधे आरव के चेहरे से टकराती।
"अरे... यहाँ तो बहुत दर्द है तुझे," सुनीता ने आरव की बांह की मांसपेशियों को अपनी उंगलियों से सहलाते हुए कहा। उसकी आवाज में एक मां का दुलार और एक प्रेयसी की बेपनाह चाहत दोनों एक साथ पिरोई हुई थीं।
"दर्द कहाँ है मौसी..." आरव ने अपनी नीली आंखें अधमुंदी करते हुए कहा, उसकी आवाज बेहद नशीली लग रही थी, "...आपकी इन उंगलियों के छुअन में तो ऐसा जादू है कि लग रहा है मैं हवा में तैर रहा हूँ।"
सुनीता मुस्कुराई और तख्त पर थोड़ी और सरककर आरव के बिल्कुल करीब आ बैठी। उसने अपनी दोनों हथेलियों को तेल में दोबारा भिगोया और आरव के पेट की मजबूत पसलियों से लेकर उसकी पसलियों के निचले हिस्से तक हल्के-हल्के दबाव के साथ हाथ फेरने लगी।
सुनीता के भीगे हाथों का फिसलना आरव के पूरे वजूद में बिजली की तरह सरसरा गया। आरव ने आहिस्ते से अपना एक हाथ उठाकर सुनीता की पतली, सुराहीदार कमर पर रख दिया।
सुनीता का हाथ एक पल को थमा, उसकी सांसें भारी हो गईं। पर उसने आरव का हाथ हटाया नहीं, बल्कि अपनी उंगलियों को आरव के सीने के बीचों-बीच ले जाकर बहुत ही नजाकत से सहलाती रही।
"अब बता..." सुनीता ने आहिस्ते से झुककर आरव की कनपटी पर बिखरी लटों को पीछे सरकाया, उसके होंठ आरव के कान की लौ को लगभग छू रहे थे, "...उतर गई मेरे पहलवान की पूरी थकान? या अभी भी कोई कसर बाकी है?"
आरव ने झटके से अपनी आंखें खोलीं और सुनीता के उस रूप को देखा—पसीने की नन्हीं बूंदों से चमकती उसकी सुराहीदार गर्दन, कांपते गुलाबी होंठ और आंखों में बेपनाह प्यार। आरव ने बिना एक पल गंवाए सुनीता की कमर पर अपनी पकड़ थोड़ी कसी और उसे अपने चौड़े सीने पर गिरा लिया।
तेल की सोंधी महक, दीये की टिमटिमाती लौ और दोनों के दिलों की बेकाबू धड़कनें उस रात के सन्नाटे में एक नया इतिहास लिखने को तैयार थीं।
सुनीता का सुडौल वजूद जैसे ही आरव के सीने से आकर टकराया, कमरे में पसरा सन्नाटा और भी गहरा हो गया। तेल से सनी उसकी हथेलियां आरव के चौड़े कांधों पर टिकी थीं, और दोनों की आंखें दीये की मद्धम पीली रोशनी में एक-दूसरे से आ मिलीं।
सुनीता की सांसें उखड़ रही थीं। आरव के सीने की तेज़ धड़कनें उसकी छाती में सीधे उतर रही थीं।
"अरे... छोड़ नटखट," सुनीता ने कांपती आवाज में एक बहुत ही नाजुक और झूठी कोशिश की, पर उसकी अपनी उंगलियां आरव के मजबूत बालों में उलझ चुकी थीं, "तेल सान दिया तूने मेरे कपड़ों पर भी।"
"सन जाने दीजिए," आरव की आवाज में गहरा ठहराव और एक अटूट आत्मीयता थी। उसने अपने दोनों हाथों का गर्म और मजबूत घेरा सुनीता की पतली कमर के गिर्द कस लिया। "आज इस दुनिया की कोई बंदिश मुझे आपसे दूर नहीं कर सकती मौसी... या सुनीता। मुझे बस आपकी छांव में रहना है।"
'सुनीता' का नाम आरव के मुंह से सुनते ही सुनीता के भीतर का हर डर, हर सामाजिक झिझक और उम्र का हर फासला पल भर में ढह गया। उसकी आंखों की कोर से खुशी और भावुकता का एक आंसू छलककर सीधे आरव के सीने पर आ गिरा।
"तू बहुत भोला है आरव..." सुनीता का गला भर आया। उसने अपनी हथेलियों से आरव के गालों को सहलाया, "यह जमाना बहुत निर्दयी है। जब इसे हमारे इस रिश्ते की खबर लगेगी, तो यह हमें जीने नहीं देगा।"
आरव ने सुनीता के गाल से बहते आंसू को अपनी उंगली से बहुत सलीके से पोंछा और फिर झुककर उसके होंठों पर अपने होंठ टिका दिए।
यह चुंबन किसी हवस या उतावलेपन का नहीं था। इसमें एक-दूसरे को संभालने का अनकहा वादा था, तन्हाई का मरहम था और सदियों पुरानी प्यास का ठहराव था। सुनीता के होंठों की मिठास में आरव पूरी तरह डूब गया। सुनीता ने भी अपनी आंखें मूंद लीं और आरव के इस प्यार को अपने भीतर समेटती चली गई। उसकी बांहें आरव के गले में कसती गईं।
कुछ देर बाद, जब दोनों की सांसें थोड़ी शांत हुईं, आरव ने सुनीता को बहुत सहूलियत से अपने बगल में तख्त पर लिटा लिया। उसने सुनीता के सिर को अपनी कसरती बांह पर टिकाया और अपनी दूसरी बांह से उसे अपनी छाती से सटा लिया।
सुनीता ने अपना चेहरा आरव की गर्दन की सुराहीदार मोड़ में छिपा लिया। आरव की देह से आ रही तेल और पसीने की सोंधी महक में सुनीता को दुनिया का सबसे महफूज कोना मिल गया था। आरव की उंगलियां आहिस्ते-आहिस्ते सुनीता की पीठ पर सरकती रहीं, जैसे किसी अनमोल खजाने को सहला रही हों।
"आरव..." सुनीता ने बहुत मद्धम फुसफुसाहट में कहा।
"हूँ?"
"अगर कभी तेरी याददाश्त वापस आ गई... और तू मुझे छोड़कर चला गया तो?"
आरव ने सुनीता की ठुड्डी को ऊपर उठाया और उसकी कजरारी आंखों में झांका, "अतीत में मैं कौन था, मुझे नहीं मालूम। लेकिन मेरा वर्तमान और मेरा भविष्य—सब कुछ सिर्फ आप पर खत्म होता है। अगर आरव जिंदा रहेगा, तो सिर्फ सुनीता का बनकर।"
सुनीता के होंठों पर एक बहुत ही सुकून भरी मुस्कान बिखर गई। उसने आरव के सीने पर एक गहरा चुंबन जड़ा और अपनी आंखें बंद कर लीं।
बाहर रात का आखिरी पहर बीत रहा था, हवा में भोर की ठंडक उतरने लगी थी, पर उस छोटे से कमरे में दो रूहें एक-दूसरे के आगोश में सिमटकर, दुनिया के हर आने वाले तूफान से बेखबर, सुकून की नींद सो चुकी थीं।
आरव की उंगलियां सुनीता की पीठ को सहलाते-सहलाते धीरे-धीरे नीचे सरकने लगीं। कमरे में पसरी खामोशी में सिर्फ उन दोनों की भारी सांसों और दीये की मद्धम लौ की थिरकन का अहसास था।
"मौसी..." आरव ने सुनीता के माथे पर अपने होंठ टिकाते हुए बेहद नशीली आवाज में कहा, "आज लग रहा है जैसे जिंदगी में पहली बार मुझे मेरा असली घर मिला है।"
सुनीता ने आरव के सीने में अपना चेहरा और गहरा छुपा लिया। उसके होंठों पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई, "तू बहुत मीठी बातें करने लगा है आरव... कभी सोचा न था कि मेरी जिंदगी का यह ढलता पड़ाव इतना खूबसूरत हो जाएगा।"
"यह ढलता पड़ाव नहीं है सुनीता," आरव ने पहली बार बिना किसी हिचकिचाहट के उसका नाम लिया, उसकी आवाज में एक मर्द का गहरा गुमान था, "यह हमारी नई शुरुआत है। जब तक आरव सांस ले रहा है, तुम्हारी आंखों में आंसू नहीं आने देगा।"
सुनीता ने अपनी बांहें आरव के गले में और कस लीं। दोनों एक-दूसरे की गर्माहट में खोए हुए धीरे-धीरे नींद के आगोश में समाने लगे।
आधी रात के करीब, जब हवा में भोर की हल्की ठंडक उतर आई थी, आरव नींद में ही थोड़ा करवट बदलने लगा। उसका भारी, कसरती हाथ अनजाने में ही सुनीता की पतली कमर से फिसलता हुआ उसके पेट के निचले हिस्से की तरफ सरक गया।
सुनीता की सूती साड़ी का पल्लू नींद में थोड़ा हट चुका था।
आरव की उंगलियों की पोरों ने जैसे ही सुनीता के पेट की नाभि से ठीक नीचे की त्वचा को छुआ, उसे एक अजीब सा उभार और सख्त अहसास हुआ। वह कोई मामूली स्पर्श नहीं था—वह एक लंबा, गहरा और पुराना कटा हुआ निशान था।
आरव की नींद एक झटके में उचट गई।
उसने आहिस्ते से अपनी आंखें खोलीं और दीये की टिमटिमाती रोशनी में नीचे देखा। उसकी उंगलियां उस निशान को सहला रही थीं। वह करीब चार-पांच इंच लंबा एक पुराना टांकों का निशान था, जिसे देखकर साफ लग रहा था कि सालों पहले कोई बड़ा ऑपरेशन हुआ हो।
आरव का दिल अचानक तेज़ी से धड़कने लगा। उसने सुनीता के चेहरे की तरफ देखा। सुनीता गहरी नींद में थी, लेकिन जैसे ही आरव की उंगलियों का दबाव उस निशान पर थोड़ा बढ़ा, उसके माथे पर शिकन आ गई और उसने नींद में ही एक हल्की सी सिसकी ली।
आरव का दिमाग सन्न रह गया। वह मन ही मन सोचने लगा—यह निशान कैसा है? क्या कोई बड़ा हादसा हुआ था? या कोई ऐसा सच है जो सुनीता ने आज तक मुझसे छुपाया है?
उसने सुनीता को जगाना चाहा, उसके होंठ हिले भी, "सुनीता...?"
लेकिन सुनीता गहरी नींद और दिनभर की थकान के कारण कुछ बोल न सकी। उसने केवल नींद में ही करवट बदली और आरव के हाथ को अपने पेट पर से हटाकर अपने सीने के पास भींच लिया।
आरव ceiling की तरफ टकतकी लगाए लेटा रहा। उसके दिमाग में सवाल कौंधने लगे थे कि आखिर इस साधारण सी देहाती औरत के अतीत में ऐसा कौन सा दर्दनाक सच दफन है, जो इस निशान के जरिए बाहर आने को बेताब था।
रात भर की थकान और आत्मीयता के बाद आरव को इतनी गहरी नींद आई कि रात के उस निशान वाला सवाल उसके दिमाग से पूरी तरह धुल गया।
सुबह जब सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की से छनकर तख्त पर पड़ीं, तो आरव अब भी बेफिक्र होकर सो रहा था। उसकी घनी जुल्फें माथे पर बिखरी हुई थीं और चेहरे पर एक मासूम सा सुकून था।
सुनीता पहले ही उठ चुकी थी। वह नहा-धोकर, लाल बॉर्डर वाली सूती साड़ी पहने, तैयार होकर कमरे में दाखिल हुई। उसके गीले बालों से चमेली के तेल और पानी की भीनी-भीनी महक पूरे कमरे में महक रही थी।
आरव को यूँ बच्चों की तरह सोता देखकर सुनीता के होंठों पर एक बहुत ही रसीली और मीठी मुस्कान तैर गई। वह आहिस्ते से तख्त के पास आई और किनारे पर बैठ गई। उसने अपने भीगे बालों को एक तरफ झटका, जिससे पानी की कुछ ठंडी बूंदें सीधे आरव के गरम गालों और सीने पर जा गिरीं।
आरव ने नींद में ही थोड़ा कुनमुनाते हुए अपनी आंखें झपकाईं।
"अरे उठो भी मेरे पहलवान..." सुनीता ने बहुत नजाकत से झुककर आरव की कनपटी पर अपने होंठ टिका दिए, "सूरज सिर पर चढ़ आया है। आज मेले का पहला दिन है और तू अभी तक सपनों की दुनिया में खोया है?"
आरव ने जैसे ही आंखें खोलीं, सामने निखरी हुई सुनीता को देखकर उसकी सारी सुस्ती उड़ गई। उसने मुस्कुराते हुए झटके से सुनीता की कलाई पकड़ी और उसे अपनी तरफ खींच लिया।
"अरे-अरे! यह क्या कर रहे हो?" सुनीता हंसते हुए उसके सीने पर आ गिरी।
"सुबह-सुबह इतना हसीन नज़ारा देखकर कोई कैसे उठ सकता है मौसी?" आरव ने बेहद नशीली आवाज में कहा और सुनीता के गाल पर एक गहरा चुंबन जड़ दिया।
"छोड़ो भी नटखट! मुझे स्कूल जाने के लिए देर हो रही है और तुम्हें मेले का काम देखना है," सुनीता ने शरमाते हुए अपना चेहरा छुड़ाया और उसे प्यार से धकेला।
आरव भी हंसते हुए तख्त से उठा। दोनों ने जल्दी-जल्दी सुबह की दिनचर्या पूरी की। आरव ने सुनीता के हाथों से चाय का कुल्हड़ लिया, उसके माथे को छुआ और फिर मेले की तैयारियों के लिए अखाड़े की तरफ दौड़ लगा दी। सुनीता भी अपने चेहरे पर एक अनजानी खुशी समेटे बच्चों को पढ़ाने के लिए गाँव के प्राइमरी स्कूल की तरफ निकल पड़ी।
सुल्तानपुर का मेला परिसर...
मेले में आज चहल-पहल अपने चरम पर थी। रंग-बिरंगे झूलों की सरसराहट, चाट-पकौड़ों की दुकानें और अखाड़े के चारों तरफ जमी भारी भीड़ मेले के रंग को जमा रही थी।
आरव मैदान में पहुँचकर पूरी तत्परता से काम में जुट गया। उसने दुकानदारों की बैठने की जगह सही करवाई, अखाड़े की मिट्टी पर पानी छिड़कवाया और आने-जाने वाले रास्तों पर सुरक्षा का जायजा लिया। उसकी मेहनत, तल्लीनता और हर किसी से तमीज से बात करने के अंदाज़ को देखकर गाँव के बड़े-बुजुर्ग उसकी तारीफ करते नहीं थक रहे थे।
पूरा गाँव आरव के इस व्यवस्थित रूप को देखकर खुश था, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि हवेली से काली गाड़ियों का काफिला अखाड़े की तरफ बढ़ रहा था, जिसमें वीरदेव राणा और राकेश दोनों सवार थे।
अखाड़े के पास धूल उड़ाती हुई काली थार और उसके पीछे चलती सुरक्षा गाड़ियों की कतार आकर रुकी। गाड़ियों का दरवाजा खुलते ही ढोल वालों ने ताल ठोकनी शुरू कर दी, लेकिन माहौल में उत्साह से ज्यादा एक खौफनाक सन्नाटा छा गया।
काली ऐनक लगाए, सिर पर राजपूती साफा बांधे और गले में सोने की मोटी चेन पहने वीरदेव राणा गाड़ी से नीचे उतरा। उसकी मूंछों का ताव और आँखों में अकड़ साफ बता रही थी कि वह यहाँ सिर्फ मेहमान बनकर नहीं, बल्कि अपनी सल्तनत का मुआयना करने आया है। उसके ठीक पीछे राकेश चेहरे पर एक शातिर और कड़वी मुस्कान लिए चल रहा था।
"यही है वो अखाड़ा हुकुम, जहाँ पूरे सुल्तानपुर का दंगल होना है," राकेश ने चापलूसी भरे लहजे में कहा और उंगली से मैदान के बीचों-बीच इशारा किया।
मैदान के बीचों-बीच आरव अपने कुर्ते की आस्तीनें कोहनी तक चढ़ाए, अखाड़े की मिट्टी की नमी जांच रहा था। उसकी कसरती पीठ और चौड़े कांधे धूप में चमक रहे थे। शोर सुनकर आरव ने मुड़कर देखा।
दोनों की नज़रें जब पहली बार आपस में टकराईं, तो हवा में मानो बिजली सी कौंध गई।
वीरदेव राणा की पारखी और हैवानियत से भरी आँखें आरव पर टिक गईं। 32 साल की उम्र में दुनिया भर के सूरमाओं को अपने पैरों तले रौंदने वाले वीरदेव को आरव की आंखों में रत्ती भर भी खौफ या झिझक नजर नहीं आई। आरव की नीली आँखों में एक अजीब सा ठहराव, स्वाभिमान और बेबाकी थी, जो वीरदेव के अहंकार को सीधे चुभ गई।
"राकेश भाई..." वीरदेव ने अपनी भारी आवाज में कहा, आँखों से चश्मा हटाते हुए, "यह नौजवान कौन है? इसकी चाल में तो गाँव के किसी आम देहाती से ज्यादा किसी खानदानी रियासतदार का गुरूर नजर आ रहा है।"
"हुकुम, यही है वो 'आरव'... जिसे अम्मा ने सिर पर चढ़ाकर मेले की चाबी सौंप दी है," राकेश ने आग में घी डालते हुए कड़वाहट से कहा।
वीरदेव राणा धीमी चाल से चलता हुआ आरव के बिल्कुल करीब आ गया। उसके दोनों बॉडीगार्ड पीछे तानकर खड़े हो गए। पूरा गाँव सांस रोके इस पहले सामने को देख रहा था।
"तो तुम हो आरव?" वीरदेव ने अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए एक तिरछी मुस्कान के साथ कहा, "सुना है बिना अतीत और बिना पहचान के सीधे सुल्तानपुर की गद्दी पर दावेदारी ठोक दी तुमने?"
आरव ने बहुत ही संजीदगी और ठंडे दिमाग से वीरदेव की आँखों में आँखें डालकर देखा। न कोई गुस्सा, न कोई डर।
"अतीत चाहे जो रहा हो राणा जी," आरव ने बहुत ही साफ और भारी आवाज में जवाब दिया, "वर्तमान यह है कि अम्मा जी ने मुझे इस दंगल की जिम्मेदारी दी है। और जब तक यह मेला चल रहा है, यहाँ की मर्यादा और अनुशासन बनाए रखना मेरी पहली जिम्मेदारी है।"
वीरदेव राणा की मुस्कान एक पल के लिए गायब हो गई। आरव के बोलने के अंदाज़ और उसकी बेबाक आवाज़ ने अखाड़े में खड़े गाँव वालों के सीने चौड़े कर दिए।
"अनुशासन...?" वीरदेव ने एक कदम और आगे बढ़ाया, उसकी सांसों की गर्माहट आरव के चेहरे से टकराने लगी, "राणा जहाँ कदम रखता है, वहाँ नियम और अनुशासन राणा के हुक्म से तय होते हैं, लड़के। तुम्हारी यह अकड़ मुझे भा भी सकती है... और अगर मिजाज बिगड़ गया, तो इसी अखाड़े की मिट्टी में दफन भी हो सकती है।"
अखाड़े में सन्नाटा इतना गहरा गया कि हवा की सरसराहट भी साफ सुनाई दे रही थी।
आरव के होंठों पर एक हल्की, लेकिन बेहद जानलेवा मुस्कान उभरी। उसने बिना पीछे हटे, बहुत ही सहजता से कहा, "मिट्टी तो सबको एक दिन अपने में मिला ही लेती है राणा जी... बस देखना यह होता है कि कौन सी मिट्टी किसको कब नसीब होती है। फिलहाल, आपका सुल्तानपुर के अखाड़े में स्वागत है।"
वीरदेव राणा की आँखों में खून उतर आया। सालों बाद किसी मामूली से लड़के ने उसके सामने खड़े होकर आँख में आँख डालकर बात की थी। लेकिन उससे पहले कि माहौल और बिगड़ता, वीरदेव ने खुद पर काबू पाया और एक खौफनाक ठहाका लगाया।
"बहुत खूब!" वीरदेव ने आरव के कांधे पर थपकी दी—वो थपकी कम और अपनी ताकत का अहसास कराने का दबाव ज्यादा था, "दंगल देखने का मज़ा अब आएगा। देखना यह है कि तुम इस दंगल को पार लगा पाते हो... या बीच मैदान में ही चित्त हो जाते हो।"
वीरदेव मुड़कर आगे बढ़ गया, लेकिन उसकी नज़रें अब आरव को एक आम रुकावट नहीं, बल्कि अपना सबसे बड़ा शिकार मान चुकी थीं। राकेश पीछे खड़ा यह सब देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था—तूफान की शुरुआत हो चुकी थी।
वीरदेव का ठहाका अखाड़े की खामोशी को चीरता हुआ गूँज उठा। उसने आरव के चौड़े कांधे पर फिर से हाथ थपथपाया—इस बार उसमें कोई दबाव या अकड़ नहीं, बल्कि एक अजीब सा सम्मान और खुशी झलक रही थी।
"अरे वाह! बहुत खूब भाई!" वीरदेव की भूरी आँखों में एक अलग ही चमक आ गई। "राकेश भाई, तुम तो कह रहे थे कि लड़का ज़बान चलाता है... पर इसके लहज़े में जो बेबाकी और दम है, वो मुझे बहुत भा गया! राणा को अकड़ दिखाने वाले पसंद नहीं, पर मर्द की आँखों में आँखें डालकर बात करने वालों का राणा दिल से मुरीद होता है।"
वीरदेव ने आरव की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "आरव भाई, तुम्हारी यह निडरता मुझे पसंद आई। इस दंगल का इंतज़ाम तुम्हारे ही हाथों में ठीक है।"
राकेश का मुँह उतर गया। वह जो आग लगाने आया था, वीरदेव के इस रुख से उस पर पानी फिर चुका था।
लेकिन आरव का ध्यान अब वीरदेव राणा की बातों पर बिल्कुल नहीं था।
वीरदेव के ठीक पीछे, गाड़ियों के काफिले की आगोश में खड़ा एक शख्स... जो राजस्थानी लिबास पहने, काले चश्मे के पीछे से अखाड़े का मुआयना कर रहा था, आरव की नज़रें उस पर जाकर टिक गईं।
जैसे ही उस शख्स ने अपना चश्मा हटाकर अपनी मूँछों पर हाथ फेरा, आरव के दिमाग के अंदर एक ज़बरदस्त बिजली सी कौंधी। उसके सीने में एक अनजाना खिंचाव और दिल में अजीब सी हलचल शुरू हो गई।
वह अधेड़ उम्र का आदमी, उसके चेहरे की वो पुरानी छिलन का निशान, उसकी आँखों की खौफनाक रंगत... आरव को लगा जैसे इस इंसान को उसने आज से पहले कहीं बहुत गहराई में देखा है।
यह कौन है? मैं इसे कहाँ से जानता हूँ? आरव के दिमाग की नसें फटने लगीं।
अतीत की ढूँढली परछाइयाँ उसके ज़हन में बहुत तेज़ रफ़्तार से घूमने लगीं—कहीं कोई चीख, कहीं गोलियों की आवाज़, तो कहीं जलते हुए अहाते की तस्वीरें... लेकिन सब कुछ इतना धुंधला था कि वह किसी एक धागे को भी पकड़ नहीं पा रहा था। आरव का माथा पसीने से भीग गया और उसकी नीली आँखें उस शख्स पर ही टिकी रह गईं।
उस शख्स को भी शायद अपने ऊपर किसी की लगातार गड़ी हुई नज़रों का अहसास हुआ। उसने मुड़कर सीधे आरव की तरफ देखा। दोनों की नज़रें मिलीं, और उस अजनबी के चेहरे के भाव अचानक सख्त हो गए—जैसे उसने भी आरव के चेहरे में कोई पुरानी परछाई ढूँढ ली हो।
वीरदेव ने आरव को यूँ खोया हुआ देखकर उसके कांधे को हिलाया, "क्या हुआ आरव भाई? कहाँ ध्यान खो गया तुम्हारा?"
आरव ने झटके से अपनी आँखें झपकाईं और खुद को संभाला। उसने अपनी कांपती सांसों को काबू में करते हुए बहुत मद्धम आवाज़ में पूछा, "राणा जी... आपके पीछे जो वो सज्जन खड़े हैं, वो कौन हैं?"
वीरदेव ने पीछे मुड़कर देखा और बेपरवाही से हँसते हुए बोला, "ओह वो! वो हमारे चाचा धीरदेव का सबसे खास वफ़ादार है—माधव सिंह। हमारे खानदान का पुराना सिपहसालार है, हर छोटे-बड़े बिज़नेस और कानूनी-गैरकानूनी काम की फाइल इसी के पास रहती है। क्यों, क्या हुआ?"
"कुछ नहीं..." आरव ने अपने चेहरे पर एक झूठी शांति लाते हुए कहा, "बस यूँ ही लगा जैसे इन्हें पहले कभी देखा हो।"
"देखा होगा भाई, राजपूताने से लेकर दिल्ली तक हमारा कारोबार फैला है," वीरदेव ने हँसकर कहा और अखाड़े की तरफ बढ़ गया।
लेकिन आरव की धड़कनें अब भी बेकाबू थीं। वह जान चुका था कि यह सिर्फ कोई इत्तेफाक नहीं था। उस 'माधव सिंह' का सुल्तानपुर के दंगल में आना और आरव के सोए हुए अतीत का यूँ अचानक जाग उठना—यह इशारा था कि उसकी खोई हुई याददाश्त और उसके अतीत का काला पन्ना अब बहुत जल्द खुलने वाला है।
शाम ढलते ही ईंट-भट्ठे के विशाल अहाते पर पीली लाइटों का धुंधला उजाला और भट्ठियों से उठती गर्माहट छाने लगी थी। मेले का मुख्य शोर काफी पीछे छूट चुका था, और यहाँ सिर्फ दूर बजती ढोलक की थाप, जलती लकड़ियों की चटकन और हवा की मद्धम सरसराहट थी।
राकेश और वीरदेव राणा भट्ठे के परिसर में बने एक खास, आलीशान कमरे में मौजूद थे। मेज पर महंगी राजस्थानी शराब की बोतलें सजी थीं। कमरे के बीचों-बीच रंग-बिरंगे गद्दे और तकिए लगे थे, और माहौल में इत्र तथा मुश्क की भीनी-भीनी महक तैर रही थी।
राकेश ने मारवाड़ से खास बुलवाई गई एक बेहद खूबसूरत और कमसिन बार डांसर का इंतजाम किया था। रेशमी घाघरा-चोली में सजी, घुंघराले बालों और सुराहीदार गर्दन वाली उस नृत्यांगना की कजरारी आंखों में एक अजीब सा नशा था। उसके पैरों में बंधे घुंघरुओं की छम-छम से पूरा कमरा गूंज उठने लगा।
"हक की लड़ाई और ताकत का नशा..." वीरदेव राणा ने मखमली सोफे पर टेक लगाते हुए अपने जाम से एक घूंट भरा, उसकी भूरी आँखों में सुरूर उतर आया था, "...सुल्तानपुर की यह शाम सचमुच बहुत रंगीन है, राकेश भाई।"
डांसर की लचकती कमर और उसकी सुराहीदार अदाओं पर वीरदेव राणा का दिल फिदा हो रहा था। उसने एक भारी नोट की गड्डी मेज पर फेंकी और डांसर को अपनी तरफ आने का इशारा किया।
डांसर आहिस्ते से अपने कदमों की छनछनाहट बढ़ाती हुई वीरदेव के बिल्कुल करीब आई और उसके पैरों के पास बैठकर अपनी नशीली निगाहों से उसे निहारने लगी। वीरदेव ने बिना देर किए उसकी सुराहीदार कलाई थाम ली और उसे खींचकर अपने बगल में सोफे पर बिठा लिया। डांसर की भीगी सांसें और उसके जिस्म से उठती इत्र की महक सीधे वीरदेव की सांसों में घुलने लगी।
"हुकुम... आपकी यह खातिरदारी तो बस शुरुआत है," राकेश ने जाम में थोड़ा और पैग उड़ेलते हुए एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा।
राकेश भी डांसर के करीब सरक आया। डांसर ने अपनी एक बांह वीरदेव के चौड़े कांधे पर लपेटी और दूसरी हथेली से राकेश को शराब का जाम थमाया। कमरे का तापमान धीरे-धीरे चढ़ने लगा था। डांसर की नजाकत भरी अदाएं, उसके होंठों की मिठास और दोनों मर्दों की बेकाबू हवस उस मद्धम रोशनी में पूरी शिदत के साथ तैर रही थी।
वीरदेव ने डांसर की सुराहीदार गर्दन पर अपने होंठ टिका दिए, जबकि डांसर की उंगलियां राकेश के बालों में उलझी हुई थीं। भट्ठे की आंच और उस कमरे में सुलगती वासना की गर्माहट एक हो चुकी थी।
बाहर सन्नाटा और गहराता जा रहा था, पर कमरे के भीतर जाम की खनक, घुंघरुओं की झंकार और ताकतवर मर्दों के बीच ढलती उस नशीली रात का रंग अपने चरम पर पहुँच रहा था।
कमरे में उबलती वासना और शराब के भारी सुरूर ने सुल्तानपुर की उस भट्ठे वाली हवेली का माहौल पूरी तरह से मदहोश कर दिया था।
चिलमन के पीछे जलती पीली लालटेनों की धीमी लौ डांसर के भीगे हुए, पसीने से चमकते बदन पर आड़ी-तिरछी परछाइयां बना रही थी। घाघरे की हर एक छनक और कंचुकी के ढीले पड़ते बंद कमरे की आबो-हवा में कामुकता का जहर घोल रहे थे।
"आइए न हुकुम... सुल्तानपुर की महफिल का असली मज़ा तो आपके आगोश में ही है," डांसर ने अपनी रसीली, कांपती आवाज में फुसफुसाते हुए कहा। उसकी उंगलियां वीरदेव की कसरती गर्दन की नसों पर आहिस्ता-आहिस्ता रेंग रही थीं।
वीरदेव राणा की भूरी, खूंखार आंखों में हवस की सुरखी चढ़ चुकी थी। उसने अपनी मजबूत, गठीली बांह डांसर की पतली कमर के गिर्द कस ली और उसे खींचकर सीधे अपनी गोद में बिठा लिया। डांसर की सुराहीदार छाती की धड़कनें सीधे वीरदेव के चौड़े सीने से जा टकराईं।
वीरदेव ने अपने एक हाथ से उसके रेशमी बालों के जूड़े को झटके से खोल दिया, जिससे काले घुंघराले नागिन जैसे बाल डांसर की गोरी पीठ और कांधों पर बिखर गए। वीरदेव ने अपना मुंह उसकी सुराहीदार गर्दन के मोड़ में छिपा लिया और उसके रसीले जिस्म को अपनी भारी बांहों में भींचने लगा।
"अरे वाह राणा हुकुम! आज तो लग रहा है जैसे राजपूताने की पूरी रंगीनियत इसी भट्ठे में उतर आई है," राकेश ने जाम की चुस्की लेते हुए एक भारी ठहाका लगाया।
"राकेश भाई..." वीरदेव ने डांसर की भीगी गर्दन पर अपने होंठ रगड़ते हुए बेहद भारी और नशीली आवाज में कहा, "...जो मर्द जाम और हुस्न की लज्जत नहीं जानता, वो ताकत का असली मज़ा क्या समझेगा?"
डांसर ने वीरदेव की इस दरिंदगी भरी चाहत में खुद को पूरी तरह सौंप दिया था। उसने एक हाथ से वीरदेव के गालों को सहलाया और अपनी दूसरी कलाई से राकेश का हाथ पकड़कर अपनी सुराहीदार कमर पर टिका दिया।
राकेश की उंगलियां डांसर की मखमली त्वचा से टकराते ही बेकाबू हो गईं। उसने अपने कांसी के गिलास को मेज पर पटका और डांसर के गालों पर अपनी सांसों की गर्माहट छोड़ते हुए उसके होंठों के करीब अपना चेहरा ले आया। डांसर ने अपनी आँखें आधी मूँद लीं और दोनों मर्दों की बेकाबू बांहों के बीच एक खिलौने की तरह लचकने लगी।
कमरे की हवा में अब सिर्फ घुंघरुओं की धीमी, कांपती झंकार, सांसों का उतावलापन और महंगे इत्र की सोंधी महक तैर रही थी।
वीरदेव ने मेज पर रखी शराब की आधी बोतल उठाई और डांसर के गले से लेकर उसकी सुराहीदार नाभि तक शराब की कुछ धार ढाल दी। डांसर के मुंह से एक सिसकी निकल गई। वीरदेव ने बिना एक पल गंवाए अपने होंठ उसकी नाभि पर टिका दिए और उस शराब की बूंदों को चखने लगा, जबकि राकेश पीछे से उसके घाघरे के ढीले पड़े नाड़े को अपनी उंगलियों में उलझा रहा था।
ताकत, पैसे और नंगई का यह वो रंग था जहाँ वीरदेव और राकेश अपनी तमाम रंजिशें भुलाकर सिर्फ अपनी हवस के समंदर में डुबकियां लगा रहे थे। भट्ठी से उठती चिंगारियां खिड़की से साफ दिख रही थीं, लेकिन कमरे के भीतर सुलग रही हवस की आग बाहर की भट्ठी से कहीं ज्यादा खौफनाक और गहरी थी।
रात का तीसरा पहर बीत चुका था। शराब की खाली बोतलें फर्श पर लुढ़क रही थीं, और उस आलीशान कमरे में तीनों का जिस्म एक-दूसरे की गर्माहट और बेहोशी में पूरी तरह सिमटकर ढह चुका था।
रात का दूसरा पहर ढल रहा था। हवेली और अखाड़े की तमाम भागदौड़ के बाद जब आरव घर लौटा, तो पूरे गांव पर सन्नाटा छा चुका था। घर के अंदर मिट्टी के दीये की मद्धम पीली रोशनी फैल रही थी, जिसकी आंच में कमरे का माहौल बेहद रूमानी और गर्माहट भरा लग रहा था।
सुनीता ने पहले ही आरव के लिए कांसी की थाली सजा रखी थी। गरम-गरम रोटियां, देसी घी में तैरती दाल और घर के बने अचार की सोंधी महक से रसोई महक रही थी। आरव जैसे ही अपने कसरती बदन से कुर्ते को उतारकर तख्त के किनारे बैठा, सुनीता उसके पास थाली लेकर आ गई।
"दिनभर की भागदौड़ के बाद अब फुर्सत मिली है मेरे पहलवान को?" सुनीता ने अपनी कजरारी आंखों से आरव को निहारते हुए कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी नशीली मिठास थी।
आरव ने मुस्कुराकर सुनीता का हाथ थाम लिया, जिससे थाली हल्की सी खनक उठी।
"जब तक आपकी इन उंगलियों से पहला निवाला मुंह में न जाए, तब तक थकावट कहाँ उतरती है मौसी?" आरव ने बेहद मद्धम और गहरी आवाज में कहा। उसकी नीली आंखों में बेपनाह चाहत का समंदर हिलोरे ले रहा था।
सुनीता का दिल इस नज़दीकी से तेज़ी से धड़क उठा। उसके गालों पर हया की लालिमा दौड़ गई। उसने साड़ी का पल्लू संभाला और मुस्कुराते हुए तख्त पर आरव के बिल्कुल सटकर बैठ गई।
"बड़ा लच्छेदार बोलने लगा है तू आजकल," सुनीता ने प्यार से डांटते हुए एक छोटा सा निवाला तोड़ा, उसे दाल में डुबोया और आरव के होंठों के पास ले गई।
आरव ने सुनीता की कजरारी आंखों से नजरें हटाए बिना निवाला मुंह में लिया। निवाला चबाते वक्त उसके होंठ अनजाने में ही सुनीता की भीगी उंगलियों को छू गए। सुनीता के पूरे वजूद में एक बिजली सी सिहरन दौड़ गई। उसकी सांसें थोड़ी भारी हो गईं।
"राकेश और वो बाहरी जमींदार... वीरदेव राणा, दोनों आज अखाड़े में थे न?" सुनीता ने आरव के माथे पर बिखरी बालों की लटों को पीछे सरकाते हुए धीमी फुसफुसाहट में पूछा, उसकी आवाज में आरव के लिए अनकही फिक्र छिपी थी।
"कोई भी हो सुनीता..." आरव ने पहली बार अधिकार भरे लहजे में उसका नाम लिया और उसकी पतली, सुराहीदार कमर के गिर्द अपनी मजबूत बांह लपेट ली, "...जब तक आपका यह दुलार मेरे साथ है, दुनिया का कोई भी राणा या राकेश मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"
'सुनीता' नाम सुनते ही सुनीता की सांसें अटक गईं। उसने आरव की नीली आंखों में उस सच्चे समर्पण को देखा, जहाँ उसके लिए न कोई उम्र की दीवार थी, न समाज का खौफ।
"आरव..." सुनीता ने अपने कांपते हाथों को आरव के सीने पर टिका दिया, जहाँ उसके दिल की धड़कनें साफ महसूस हो रही थीं, "तू मेरी इस ढलती उम्र की वो रोशनी बन गया है, जिसके बिना अब मेरी हर रात अंधेरी है।"
"तो इस रोशनी को कभी बुझने मत देना," आरव ने थोड़ा और करीब झुककर सुनीता की सुराहीदार गर्दन के मोड़ पर अपने होंठ टिका दिए।
सुनीता के मुंह से एक धीमी, रसीली आह निकल गई। उसने अपनी आंखें मूंद लीं और अपना सिर आरव के चौड़े कांधे पर ढका दिया। बाहर भोर की हवा बह रही थी, पर कमरे के भीतर दोनों एक-दूसरे की गर्माहट और मोहब्बत के रस में पूरी तरह डूबे हुए थे।
सुनीता का यह जुमला उस मद्धम रोशनी वाले कमरे में किसी मीठे मखमली मरहम की तरह तैर गया। उसके होंठों की यह ख्वाहिश आरव के सीने पर किसी मोहर की तरह लग गई थी।
आरव ने सुनीता की कजरारी आँखों में झांका, जहाँ हया और हक़ का एक अटूट अहसास चमक रहा था। उसने सुनीता के माथे पर एक गहरा, सुकून भरा चुंबन जड़ा और बहुत ही नशीली फुसफुसाहट में कहा, "जब इस दिल पर सिर्फ तुम्हारा राज है... तो जुबान पर भी सिर्फ तुम्हारा ही नाम रहेगा, सुनीता।"
'सुनीता' नाम सुनते ही सुनीता के पूरे जिस्म में एक भीनी सी सिहरन दौड़ गई। उसने दीये की टिमटिमाती लौ पर फूंक मारी और कमरे में एक सुकून भरा मद्धम अंधेरा छा गया।
दोनों तख्त पर बिछे सूती बिस्तर पर आ लेटे। आरव ने बिना एक पल गंवाए अपनी कसरती बांह फैला दी और सुनीता को खींचकर सीधे अपने सीने से लगा लिया। सुनीता ने भी बिना किसी झिझक के अपना चेहरा आरव की गर्दन के सुराहीदार मोड़ में छिपा लिया और अपनी पतली उंगलियां आरव की मजबूत पीठ पर कस लीं।
बाहर सुल्तानपुर के अखाड़े और मेले का शोर थम चुका था। रात की ठंडी हवा खिड़की की दरारों से सरसराती हुई अंदर आ रही थी, पर उस बिस्तर पर दोनों के जिस्म की गर्माहट एक-दूसरे को दुनिया के हर डर, हर सामाजिक पाबंदी और आने वाले हर तूफान से बेखबर कर रही थी। आरव की सांसें सुनीता के बालों की चमेली वाली महक में उलझी थीं, और सुनीता को आरव के सीने की तेज़ धड़कनों में अपनी पूरी कायनात नजर आ रही थी।
एक-दूसरे की बाहों के मजबूत घेरे में लिपटे हुए, वे दोनों मोहब्बत के उस अटूट सुकून में नींद की गहरी आगोश में समा गए।
सुबह की सुनहरी धूप जब सुल्तानपुर के मेले पर बिखरी, तो चारों तरफ एक अलग ही रौनक तैर रही थी। बच्चों की खिलखिलाहट, जलेबियों की सोंधी महक और रंग-बिरंगे झूलों की सरसराहट से पूरा मैदान सराबोर था। आरव मेले के एक-एक कोने का बारीकी से निरीक्षण कर रहा था। दुकानदार अपनी जगहों से खुश थे और गांव के लोग व्यवस्था की सराहना करते नहीं थक रहे थे।
दंगल शुरू होने में अभी 3 दिन बाकी थे। आरव जानता था कि आखिरी दिन होने वाले इस भव्य दंगल को बेमिसाल बनाने के लिए हर छोटी-बड़ी तैयारी को पुख्ता करना होगा, ताकि सुल्तानपुर का यह मेला इतिहास बन जाए।
लेकिन इस चहल-पहल के बीच भी आरव का मन अंदर ही अंदर किसी गहरे भंवर में उलझा हुआ था।
कल अखाड़े में देखा गया वह चेहरा—माधव सिंह।
उस अधेड़ राजस्थानी सिपहसालार की खूंखार आँखें और चेहरे का वो पुराना निशान आरव के ज़हन में रह-रहकर कौंध रहा था। आरव के दिमाग की नसें फटने लगतीं जब भी वह सोचने की कोशिश करता कि उसने माधव सिंह को कहाँ देखा है। क्या उसकी खोई हुई पहचान, उसका भुला हुआ अतीत इसी शख्स की परछाइयों से जुड़ा है?
जैसे ही वह अपनी याददाश्त पर दबाव डालता, उसके कानों में अचानक लोहे के टकराने की चीख, पटरियों का खौफनाक शोर और एक भयावह ट्रेन हादसे की गूँज उठती। उस दर्दनाक हादसे की आवाज के अलावा उसे अपने अतीत का एक भी पन्ना याद नहीं आ रहा था।
और इसी उधेड़बुन में, आरव एक और अहम बात पूरी तरह भूल चुका था—सुनीता के पेट पर, नाभि के ठीक नीचे बना वह लंबा, गहरा टांकों का निशान। रात की उस आत्मीयता और उलझन में वह सुनीता से उस निशान का सच पूछना ही भूल गया था।
सब कुछ बिल्कुल ठीक चल रहा था कि तभी गाँव का एक लड़का बदहवास भागता हुआ आरव के पास आया।
"आरव भैया! जल्दी चलिए... आपको सिया अम्मा ने तुरंत हवेली बुलाया है!"
आरव ने अखाड़े का काम वहीं रोका और तुरंत हवेली की तरफ निकल पड़ा। जब वह हवेली के मुख्य कक्ष में पहुँचा, तो वहाँ का माहौल बेहद भारी और तनावपूर्ण था।
कमरे के तख्त पर राकेश अधमरा पड़ा था, उसके सिर और पसलियों पर पट्टियाँ बंधी थीं और वह दर्द से कराह रहा था। पास ही वीरदेव राणा अपने शाही तेवर में बैठा हुआ था, जिसकी भूरी आँखों में गुस्सा तैर रहा था।
सिया देवी ने आरव को देखते ही बोलना शुरू किया, "आरव बेटा... कल रात भट्ठे पर कुछ नकाबपोशों ने हमला कर दिया और राकेश का यह हाल कर दिया।"
आरव ने बेहद शांत होकर राकेश के घायल बदन को देखा और फिर सिया देवी की तरफ मुड़ा, "पर अम्मा... कोई भला भट्ठे पर इस तरह हमला क्यों करेगा?"
"हो सकता है किसी ने पुरानी दुश्मनी निकाली हो," सिया देवी के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं।
आरव ने अपनी नीली, तीखी नज़रें वीरदेव राणा पर टिकाईं, "जब यह सब हुआ... तब राणा जी आप कहाँ थे?"
वीरदेव राणा ने अपनी सोने की गिल्ट वाली चेन को सहलाया और एक भारी सांस छोड़ते हुए बोला, "अरे आरव, मैं तो कल रात भट्ठे वाले कमरे में ज्यादा शराब पीकर बेसुध सो रहा था... मुझे तो सुबह पता चला। लेकिन जिन्होंने भी यह जुर्रत की है, उनकी अब खैर नहीं।"
सिया देवी ने गहरी सांस ली, "हां आरव, अब हमें कुछ सख्त कदम उठाना ही होगा। गाँव में हमारी हनक कम नहीं होनी चाहिए।"
आरव ने एक पल के लिए कमरे में मौजूद हर शख्स के चेहरे को पढ़ा, और फिर बहुत ही निडर होकर सिया देवी से कहा, "अम्मा... सियासत सिर्फ डर और ताकत से नहीं चलती, जनता के प्यार और विश्वास से चलती है। अगर आपके बेटे की नीयत इस गाँव की जनता के प्रति सही होती, तो आज उसका यह हाल कभी नहीं होता।"
आरव की यह बात सुनते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।
वीरदेव राणा सन्न रह गया। पूरे मारवाड़ और राजपूताने में आज तक किसी की इतनी हिम्मत नहीं हुई थी कि वह सिया देवी के मुंह पर उनके बेटे की औकात याद दिला दे। आरव की इस बेबाकी, सीधेपन और उसकी मर्दानगी का वीरदेव मन ही मन और भी मुरीद हो गया।
सिया देवी को भी अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। आज तक पूरे सुल्तानपुर में किसी की मजाल नहीं हुई थी कि उनके सामने इस तेवर में बात करे। मगर सिया देवी अंदर से जानती थीं कि राकेश भट्ठे और मेले के नाम पर गैर-कानूनी काम और अयाशी करता है।
आरव की काबिलियत और उसके दिमाग का इम्तिहान लेने के इरादे से सिया देवी ने अपनी तीखी नजरें उस पर गाड़ दीं और एक सवाल पूछा, "आरव... तुम इतने यकीन से कैसे कह सकते हो कि यह काम किसी बाहरी दुश्मन का नहीं, बल्कि हमारे अपने ही लोगों की नफरत का नतीजा है?"
आरव ने बिना एक पल गंवाए, अपनी गरजती और खरी आवाज में जवाब दिया, "अम्मा... अगर हमला करने वाले वाकई खानदानी दुश्मन होते, तो राकेश अब तक जिंदा नहीं बचता। और उन्हें इस तरह छिपकर हमला करने की साजिश रचने की जरूरत भी नहीं पड़ती।"
यह सुनते ही कमरे में बैठे हर शख्स के तोते उड़ गए। वीरदेव राणा, सिया देवी और यहाँ तक कि तख्त पर पड़ा राकेश भी सन्न रह गए। आरव के तर्क में ऐसा कड़वा सच था कि कोई भी उसकी बात को काट नहीं सका।
सिया देवी ने माहौल की नजाकत को समझा और बात को आगे बढ़ाना ठीक नहीं समझा। उन्होंने आरव की तरफ देखा, फिर अपनी कड़क आवाज में राकेश को सख्त हिदायत दी, "राकेश... अब भी वक्त है, अपनी हरकतों से सुधर जाओ। वरना अगली बार तुम्हें बचाने मैं भी नहीं आऊंगी।"
सिया देवी के इस कड़े रुख के बाद कमरे में कुछ देर के लिए ऐसा सन्नाटा छा गया कि घड़ी की सुइयों की टिक-टिक भी साफ सुनाई दे रही थी। राकेश ने अपनी कराह दबाते हुए अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया, जबकि वीरदेव राणा के होंठों पर एक गहरी, रहस्यमयी मुस्कान आ गई।
आरव ने अम्मा जी को प्रणाम किया और बिना कोई और सफाई दिए हवेली से बाहर निकल आया।
जैसे ही आरव हवेली की ड्योढ़ी पार कर मैदान की तरफ बढ़ा, पीछे से भारी कदमों की आहट सुनाई दी। आरव ने मुड़कर देखा—वीरदेव राणा अपनी रोबदार चाल से चलता हुआ उसी की तरफ आ रहा था।
"ठहरो आरव !" वीरदेव ने पास आकर आरव के मजबूत कांधे पर हाथ रखा। उसकी भूरी आंखों में आरव के लिए एक अजीब सा गुमान और खिंचाव था। "आज तुमने अम्मा जी के सामने जो कलेजा दिखाया है न... उसने राणा का दिल जीत लिया। सुल्तानपुर में तो क्या, पूरे मारवाड़ में किसी माई के लाल की हिम्मत नहीं हुई जो सिया देवी की आंखों में आंखें डालकर ऐसा कड़वा सच बोल सके।"
आरव ने बहुत सहजता से वीरदेव का हाथ कांधे से हटाया और शांत आवाज में कहा, "राणा जी, मैं सच बोलने से नहीं डरता। और रही बात अखाड़े की, तो वहां सिर्फ मेहनत और नियम चलते हैं—धोखा नहीं।"
"इसी बात के तो हम कायल हो गए हैं!" वीरदेव ने अपनी मूंछों पर ताव दिया। "दंगल की जिम्मेदारी तुम्हारे हाथों में देकर अम्मा ने बिल्कुल सही फैसला किया है। लेकिन एक बात याद रखना आरव... सुल्तानपुर में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पीठ पीछे वार करने में माहिर हैं। अपनी नजरें चौकस रखना।"
वीरदेव की बात सुनकर आरव के जेहन में एक बार फिर उस माधव सिंह का चेहरा कौंध गया, जो कुछ दूरी पर खड़ा गाड़ियों के पास ही खड़ा था।
आरव ने वीरदेव की आंखों में झांका, "सलाह का शुक्रिया राणा जी। पर मैं सामने से आने वाले तूफान से भी नहीं डरता, तो पीठ पीछे की साजिशें मेरा क्या बिगाड़ेंगी?"
वीरदेव ने एक जोरदार ठहाका लगाया और आरव की निडरता की तारीफ करते हुए अपनी गाड़ियों के काफिले की तरफ बढ़ गया।
शाम ढलने को आई थी। आरव मेले की बची-खुची व्यवस्थाएं पूरी करके जब घर की तरफ लौट रहा था, तो रास्ते में गाँव के प्राइमरी स्कूल का पीपल वाला मोड़ पड़ा।
दूर से ही उसे लाल बॉर्डर वाली सूती साड़ी में सुनीता आती हुई दिखाई दी। बच्चों को पढ़ाकर लौट रही सुनीता के चेहरे पर थकान जरूर थी, लेकिन आरव को देखते ही उसकी आंखों में एक नई चमक आ गई। आरव के दिल का सारा बोझ सुनीता की एक मुस्कान देखते ही हल्का हो गया।
आरव ने आसपास देखा—सड़क सुनसान थी। उसने आहिस्ते से अपने कदम सुनीता की तरफ बढ़ा दिए।
"आज बड़ी देर कर दी मेरे पहलवान ने?" सुनीता ने अपने भीगे पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए बहुत ही मीठी फुसफुसाहट में पूछा। उसकी कजरारी आंखों में आरव के लिए बेपनाह प्यार छलक रहा था।
"हवेली में थोड़ा बवंडर खड़ा हो गया था सुनीता..." आरव ने आसपास किसी के न होने का फायदा उठाते हुए सुनीता की पतली कलाई को अपनी उंगलियों में ले लिया, "...पर तुम्हारी एक झलक देख ली, तो लगा दिनभर की सारी थकान पल भर में छूमंतर हो गई।"
'सुनीता' नाम सुनते ही सुनीता का पूरा वजूद शरमा कर लाल हो गया। उसने अपनी कलाई छुड़ाने की हल्की सी कोशिश की, पर आरव की पकड़ में अधिकार और सुरक्षा का अहसास था।
"अरे... रास्ते में तो छोड़ो! कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?" सुनीता ने घबराकर चारों तरफ देखा, पर उसके चेहरे पर फैली मुस्कान उसकी खुशी बयां कर रही थी।
"देखने दो," आरव ने थोड़ा झुककर सुनीता के कान के पास नशीली आवाज में कहा, "घर चलो... आज रात मुझे तुमसे कई बातें करनी हैं।"
सुनीता का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने अपनी नजरें झुका लीं और आरव के साथ धीरे-धीरे घर की ओर कदम बढ़ा दिए।
हवेली का तनाव और दिनभर की भागदौड़ घर की चौखट के बाहर ही छूट गई।
रात का खाना निपटाने के बाद सुनीता ने रसोई बुझाई और कमरे में आ गई। दीये की मद्धम पीली रोशनी में पूरा कमरा एक अलग ही गर्माहट से नहाया हुआ था। आरव तख्त पर बैठा हुआ था—उसने अपना कुर्ता उतारकर एक तरफ रख दिया था। दीये की रोशनी में उसका सुडौल और कसरती बदन दमक रहा था।
सुनीता ने दरवाजा अंदर से बंद किया और सांकल चढ़ा दी। कुंडी लगने की हल्की सी 'खट' की आवाज रात के सन्नाटे में दोनों के दिलों की धड़कन तेज कर गई।
सुनीता आहिस्ते से कदम बढ़ाती हुई तख्त के पास आई। उसने अपने गीले बालों का जूड़ा ढीला किया, जिससे उसके काले नागिन जैसे बाल उसकी गोरी पीठ और कांधों पर बिखर गए। आरव ने बिना एक पल गंवाए सुनीता की पतली कमर में अपनी मजबूत बांहें लपेटीं और उसे खींचकर सीधे अपनी गोद में बिठा लिया।
"अरे... नटखट! यह क्या कर रहे हो?" सुनीता ने हया से अपनी नजरें झुकाते हुए आरव के चौड़े सीने पर हाथ रख दिया, पर उसकी अपनी उंगलियां आरव के मजबूत बालों में उलझ गईं।
"अपनी सुनीता को अपने पास ला रहा हूँ..." आरव ने बेहद नशीली और भारी आवाज में कहा। उसने अपनी उंगलियों से सुनीता की ठुड्डी को थोड़ा ऊपर उठाया और उसकी कजरारी आंखों में झांका, "आज हवेली में बहुत बवंडर था, पर इस दिल को शांत करने के लिए सिर्फ तुम्हारा यह रूप चाहिए था।"
सुनीता की सांसें भारी होने लगीं। आरव के मुंह से अपना नाम सुनकर उसके भीतर की सारी झिझक पिघल चुकी थी। उसने आहिस्ते से अपने दोनों हाथ आरव की गर्दन में डाल दिए और अपना चेहरा आरव के सीने पर टिका दिया।
"आरव..." सुनीता का गला थोड़ा भर आया, उसकी आवाज में गहरा भावुकपन था, "मैं हर पल यही दुआ करती हूँ कि दंगल का यह मेला बिना किसी अनहोनी के निपट जाए। वीरदेव राणा और राकेश की नीयत मुझे ठीक नहीं लगती... मुझे सिर्फ तेरी फिक्र रहती है।"
आरव ने सुनीता के गाल पर अपनी सांसों की गर्माहट छोड़ते हुए बहुत दुलार से कहा, "जब तक तुम मेरे साथ हो सुनीता, कोई मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकता। तुम मेरी ताकत हो।"
यह कहते हुए आरव ने सुनीता के होंठों पर अपने होंठ टिका दिए।
वह चुंबन गहरा, रसीला और बेपनाह मोहब्बत से भरा हुआ था। सुनीता ने भी अपनी आंखें मूंद लीं और खुद को पूरी तरह आरव के आगोश में सौंप दिया। कमरे में पसरे सन्नाटे में दोनों की भारी सांसें और दीये की लौ की थिरकन एक हो रही थी।
आरव की उंगलियां सुनीता की पीठ पर बिखरें बालों को सहलाती रहीं, और सुनीता उसके सीने की गर्माहट में दुनिया का हर गम भूलकर सिमटती चली गई। रात की ठंडक बढ़ती जा रही थी, लेकिन उस छोटे से कमरे में दोनों रूहें एक-दूसरे की मोहब्बत में पूरी तरह डूबी हुई थीं।
कमरे के सन्नाटे में मिट्टी के दीये की लौ हल्की सी लहराई, जिससे दीवार पर दोनों की परछाइयां धीमी गति से थिरकने लगीं। हवेली की राजनीति और गाँव की तनातनी का शोर अब इस बंद कमरे की चौखट को पार नहीं कर सकता था। यहाँ सिर्फ दो रूहों का सुलगता हुआ ठहराव था।
सुनीता के पैरों में पड़ी चांदी की पायल की हल्की सी छनक ने कमरे की खामोशी को छुआ। वह तख्त के किनारे खड़ी होकर अपनी सूती साड़ी का पल्लू ठीक कर ही रही थी कि आरव ने बहुत आहिस्ता से उसकी कलाई थाम ली।
उसकी उंगलियों का स्पर्श इतना धीमा, इतना संवेदनशील था कि सुनीता के जिस्म में सिरहन की एक बारीक लहर दौड़ गई। आरव ने झटका नहीं दिया; उसने बस बहुत सहलाते हुए सुनीता को अपनी तरफ आकर्षित किया।
"आरव..." सुनीता की आवाज इतनी मद्धम थी जैसे कोई रेशम सरक रहा हो। उसने अपनी कजरारी पलकें झुका लीं, लेकिन कलाई छुड़ाने का कोई यत्न नहीं किया।
आरव ने उसे अपनी गोद के पास बिठाया और अपनी दोनों हाथों की हथेलियों में सुनीता का चेहरा थाम लिया। दीये की पीली रोशनी सुनीता की गोरी रंगत और उसकी सुराहीदार गर्दन पर एक सुनहरी परत चढ़ा रही थी। आरव की नीली आँखें उसकी आँखों में गहराई तक उतरने लगीं।
"आज पूरा दिन... अखाड़े की धूल और हवेली के सच के बीच, सिर्फ एक ही अहसास मुझे संभाले हुए था," आरव ने बहुत भारी और नशीली फुसफुसाहट में कहा। उसकी अंगूठे की पोर सुनीता के गालों की नर्म त्वचा को आहिस्ता-आहिस्ता सहलाने लगी।
"कौन सा अहसास?" सुनीता की सांसें थोड़ी अनियंत्रित होने लगी थीं। उसकी हथेली खुद-ब-खुद आरव के नंगे, चौड़े सीने पर जा टिकी, जहाँ आरव के दिल की एक-एक धड़कन साफ महसूस हो रही थी।
"यह..." आरव ने थोड़ा झुककर अपने होंठ सुनीता की कनपटी पर टिका दिए। एक लंबा, नम और गहरा स्पर्श। फिर उसके होंठ आहिस्ता से सरकते हुए सुनीता के गाल की हड्डी से होते हुए उसके कान की लौ तक पहुँचे।
सुनीता का गला सूखने लगा। उसने आहिस्ते से अपनी आँखें मूँद लीं। उसकी उंगलियां आरव के कसरती कांधों पर कसती चली गईं।
"आरव... तू मुझे इस कदर अपनी आगोश में समेट लेता है कि मुझे लगता है मेरा अपना कोई वजूद ही नहीं बचा," सुनीता की आवाज में हया और बेपनाह समर्पण की मिठास घुली हुई थी।
"तुम्हारा वजूद ही तो मेरा घर है, सुनीता," आरव ने पहली बार उसके कान के पास बहुत आहिस्ते से फुसफुसाया। उस नाम का उच्चारण इतना आत्मीय था कि सुनीता का पूरा वजूद कांप उठा।
आरव की उंगलियां अब सुनीता की पीठ पर बिखरे गीले बालों में उलझने लगी थीं। वह एक-एक लट को बड़े जतन से पीछे सरका रहा था, जैसे किसी कीमती शै को सहेज रहा हो। उसके होंठ अब सुनीता की सुराहीदार गर्दन के मोड़ पर जा ठहरे। वहाँ की त्वचा बेहद संवेदनशील थी। आरव ने बहुत धीरे से अपनी सांसों की गर्माहट वहाँ छोड़ी और फिर एक लंबा, धीमा चुंबन अंकित कर दिया।
सुनीता के मुंह से एक दबी हुई, रसीली सिसकी निकल गई। उसने अपना सिर आरव के कांधे पर ढका दिया और आरव की गर्दन में अपनी बांहें पूरी तरह लपेट लीं।
कोई जल्दबाजी नहीं थी, न ही हवस का कोई उतावलापन। वहाँ सिर्फ दो इंसानों का एक-दूसरे में धीरे-धीरे पिघलना था। आरव ने सुनीता को अपनी मजबूत बांहों में उठाया और बहुत नजाकत से तख्त पर लेटा दिया।
बिस्तर पर आते ही आरव उसके ऊपर झुक गया, लेकिन अपना पूरा वजन उस पर न डालते हुए अपनी कोहनियों के सहारे टिका रहा। सुनीता की कजरारी आँखें अधखुली थीं, जिनमें प्यार का एक समंदर छलक रहा था। उसने अपने कांपते हाथों से आरव के चेहरे की रेखाओं को छुआ—उसके माथे, उसकी तीखी नाक और उसके होंठों को।
"आरव... मुझे डर लगता है कि कहीं यह हसीन ख्वाब टूट न जाए," सुनीता की आँखों के कोने में एक नम बूंद चमक उठी।
आरव ने झुककर अपनी जीभ की नोक से उस आंसू की बूंद को पी लिया। "यह ख्वाब नहीं है सुनीता... यह हमारी सच्चाई है। जब तक यह सांसे चलेंगी, यह आगोश सिर्फ तुम्हारा रहेगा।"
आरव के होंठ आहिस्ता से सुनीता के होंठों से जा मिले। वह चुंबन इतना धीमा, इतना गहरा और इतना रसपूर्ण था कि दोनों की आत्माएं जैसे एक-दूसरे में लीन हो गईं। सुनीता ने अपने होंठों की मिठास पूरी तरह आरव को सौंप दी।
आरव का हर स्पर्श सुनीता के जिस्म पर एक मखमली आंच की तरह बिखर रहा था। उसकी सांसों की गर्माहट सुनीता की सुराहीदार गर्दन पर जब पड़ी, तो सुनीता के मुंह से एक सिसकी फिसल गई, "उफ़्फ़ आरव..."
आरव ने बहुत आहिस्ता से अपने होंठों का दायरा बढ़ाना शुरू किया। वह गर्दन के संवेदनशील मोड़ पर हल्के-हल्के चुंबन अंकित करता हुआ और नीचे सरकने लगा। सुनीता ने बेकाबू होकर अपनी आंखें बंद कर लीं और अपने निचले होंठ को दांतों में भींच लिया।
जब आरव की गर्म, कसरती हथेली सुनीता के उभरे हुए मुलायम वक्ष पर टिकी, तो कमरे का तापमान एक झटके में चढ़ गया। आरव ने बहुत नजाकत और जुनून के उस खूबसूरत तालमेल के साथ दबाव बढ़ाना शुरू किया। सुनीता के सूती ब्लाउज के बंद ढीले पड़ने लगे थे।
आरव की उंगलियों की लचक और सुनीता की कांपती हुई सांसें उस मद्धम रोशनी वाले कमरे में एक मदहोश कर देने वाली लय बुन रही थीं। सुनीता का पूरा जिस्म आरव की बांहों की गर्माहट में लचक रहा था। उसने अपने दोनों हाथ आरव के घने बालों में उलझा लिए और उसे अपने और करीब खींच लिया।
मोहब्बत का यह धीमा नशा अब अपनी चरम सीमा को छूने लगा था। कोई उतावलापन नहीं था, सिर्फ एक-दूसरे के वजूद को पूरी गहराई से महसूस करने की तड़प थी। आरव के होंठ और हाथ मिलकर सुनीता के हर अंग को अपनी चाहत से सजा रहे थे, और सुनीता उस रसीले अहसास में पूरी तरह पिघलकर आरव में ही कहीं खोती जा रही थी।
दीये की मंद लौ में उन दोनों के साए आपस में ऐसे उलझ गए थे जैसे दो नदियां एक-दूसरे के मुहाने पर आकर मिल गई हों। कमरे में हवा जैसे ठहर सी गई थी, और उसमें सिर्फ दो तपे हुए बदन की सोंधी महक और सुलगती सांसों की गर्माहट तैर रही थी।
आरव के हाथों की छुअन में अब एक ऐसा बेबाक जुनून था जिसने सुनीता के भीतर सालों से दबे एकांत को पिघलाकर रख दिया। आरव ने अपनी उंगलियों की नरमी से सुनीता के ब्लाउज की डोरी को आहिस्ता से ढीला किया। सूती कपड़े के हटते ही दीये की पीली रोशनी में सुनीता का सुराहीदार बदन दमक उठा। उसके गोरे कांधों और वक्ष की ढलान पर छांव और रोशनी का एक ऐसा खेल चल रहा था जिसने आरव की नीली आँखों को मदहोश कर दिया।
"आरव..." सुनीता की आवाज अब किसी कांपती हुई लकीर जैसी रह गई थी। उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी, और उसके पेट पर सांसों की लहर साफ दिखाई दे रही थी।
आरव ने सुनीता के गाल पर अपने होंठ टिकाते हुए अपने कांपते हाथों से उसकी सुडौल छाती के मुलायम उभारों को पूरी शिद्दत से सहलाना शुरू किया। उसकी मजबूत हथेलियों के दबाव से सुनीता का बदन धनुष की तरह ऐंठ गया। उसने बेकाबू होकर अपनी बांहें आरव के कांधों के गिर्द और कस लीं। आरव की उंगलियों की पोरों का वह रसीला दबाव सुनीता के रोएं-रोएं में बिजली बनकर दौड़ रहा था।
आरव धीरे-धीरे और नीचे झुका। उसके होंठ सुनीता के गालों से फिसलते हुए उसकी सुराहीदार गर्दन, हंसुली की हड्डी और फिर उसके वक्ष के ऊपरी मोड़ पर ठहर गए। आरव ने वहाँ एक गहरा, नम और सुलगता हुआ चुंबन जड़ा। सुनीता के मुंह से एक दबी हुई, कामुक सिसकी फूट पड़ी। उसकी उंगलियां आरव के बालों को भींचने लगीं, जैसे वह इस सुखद दर्द और अहसास की दुनिया में खुद को पूरी तरह से खो देना चाहती हो।
"सुनीता... तुम मेरी हो, सिर्फ मेरी," आरव ने उसकी सांसों की आंच में अपने होंठ मिलाते हुए बहुत भारी और नशीली आवाज में कहा।
"हाँ आरव... पूरी की पूरी तेरी..." सुनीता ने अधखुली आँखों से उसे निहारा, जिनमें वासना का सुरूर और मोहब्बत का समर्पण एक साथ छलक रहा था।
आरव ने अपनी हथेली को सुनीता की सुराहीदार कमर से नीचे सरकाते हुए उसकी साड़ी की सिलवटों को ढीला कर दिया। दोनों के नंगे जिस्म जब एक-दूसरे की गर्माहट से टकराए, तो बिस्तर पर जैसे आग सी सुलग उठी।
कमरे में हवा अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुके दो नंगे जिस्मों की सुलगती सांसों और हवा में तैरती इत्र-पसीने की सोंधी महक से भारी हो चुकी थी।
आरव की मजबूत उंगलियों का दबाव और उसके होंठों की नमी सुनीता के बदन के एक-एक हिस्से पर आग लगा रही थी। आरव सुनीता के जिस्म के हर मोड़ को इस कदर जुनूनियत और शिद्दत से चूम रहा था कि सुनीता अपनी सुध-बुध पूरी तरह खो चुकी थी। उसका पूरा बदन कामुकता की उस चरम सीमा पर पहुँच चुका था जहाँ जिस्म का रोआं-रोआं अकड़ने लगता है।
सुनीता की सांसें उखड़ रही थीं, उसकी जांघें बेकाबू होकर कांप रही थीं और तख्त की बिछावन पर उसका बदन बार-बार धनुष की तरह ऐंठ जाता।
आरव अपने होंठों को उसकी सुराहीदार नाभि से उठाकर वापस ऊपर ले आया। उसने सुनीता के दमकते हुए, कड़े स्तन को अपने मुंह की गर्माहट में भर लिया। जैसे ही आरव ने अपनी जीभ से उसके उभरे हुए मुहाने को सहलाते हुए चूसना शुरू किया, सुनीता का जिस्म एक बार फिर से बुरी तरह अकड़ गया।
"अहहह... आरव!"
सुनीता के हलक से एक तीखी, रसीली चीख निकली। उसकी उंगलियाँ आरव के बालों को भींचते हुए बिस्तर में धंस गईं। उसी पल उसके भीतर दबा सुलगता हुआ तूफ़ान फूट पड़ा और उसकी योनि से कामाग्नि का रस झर-झर कर बह निकला। सुनीता का पूरा वजूद उस चरम सुख के समंदर में पूरी तरह ढह गया।
वह तख्त पर सीधी पड़ गई और उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे होती हुई हाँफने लगी। उसके चेहरे पर एक असीम तृप्ति और सुकून की लालिमा छा गई थी।
आरव भी इस सुलगती जंग में पूरी तरह पसीने से तर-बतर और थका हुआ था। उसके बदन में अब भी गर्म खून उबाल मार रहा था और उसका पूरा कड़क लिंग सुनीता के योनि में समाने को बेताब था। मगर उसने अपनी तड़प से ऊपर सुनीता की थकावट और उसके हाँफते हुए वजूद को देखा। आरव ने अपनी चाहत पर काबू पाया और बेहद दुलार से सुनीता के भीगे हुए माथे पर अपने होंठ टिका दिए।
रस के बह जाने के बाद सुनीता खुद को बहुत हल्का, शांत और सुकून से भरा महसूस कर रही थी। सालों से उसके भीतर दबा अकेलापन और तनाव जैसे पल भर में बहकर खत्म हो चुका था।
आरव ने सुनीता को बहुत आहिस्ता से अपनी चौड़ी बांहों के घेरे में खींच लिया और अपने सीने से लगा लिया। सुनीता ने भी अपना चेहरा आरव की गर्दन के मोड़ में छिपाया और बेफिक्र होकर अपनी आँखें मूँद लीं। उस ठंडी रात के आखिरी पहर में, दोनों एक-दूसरे की गर्माहट और बांहों के मजबूत शिकंजे में गहरी नींद की आगोश में सो गए।