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Incest तलाश

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Update 01

आसमान में छाए घने काले बादलों ने सूरज की आखिरी किरण को भी निगल लिया था। हवा में एक अजीब सी नमी और खामोशी थी, जो किसी बड़े तूफान के आने का संकेत दे रही थी। फिर अचानक, मूसलाधार बारिश की थपेड़ों के साथ बादलों की कड़कड़ाहट शुरू हो गई। रात की उस घुप्प तीखी रंगत में सुल्तानपुरा कस्बे के बाहरी हिस्से से गुजरती रेलवे लाइन पर जीवन सामान्य रफ्तार से बढ़ रहा था। लेकिन तभी, काल बनकर आई एक तकनीकी खराबी ने सन्नाटे को चीर दिया।

तेज रफ्तार से दौड़ती ट्रेन की पटरियों से उतरने की गड़गड़ाहट और लोहे से लोहे के टकराने की चीख इतनी भयानक थी कि मील दूर तक पूरा गांव सिहर उठा। विशालकाय लोहे के डिब्बे खिलौनों की तरह एक-दूसरे पर चढ़ते चले गए। चीख-पुकार, कराहें, कांच के टूटने की आवाजें और बारिश की गिरती बूंदें—सब मिलकर एक खौफनाक मंजर रच रहे थे। कई यात्रियों की तो झटके में ही जीवन लीला समाप्त हो गई, जबकि कई जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए लोहे के मलबे में तड़प रहे थे।


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हादसे की खबर फैलते ही राहत बचाव दल और गांव वालों की भीड़ वहां उमड़ पड़ी। लोहे की चादरों को काटकर, बारिश की परवाह किए बिना घायलों को निकाला जा रहा था और सीधे सुल्तानपुरा के छोटे से सरकारी अस्पताल पहुंचाया जा रहा था।

इसी सुल्तानपुरा में एक शांत और साफ-सुथरी गली के मुहाने पर बसा था सुनीता का एक छोटा सा, सुंदर पक्का घर। कोई बड़ी हवेली नहीं, बल्कि दो कमरों का एक सादा आशियाना, जिसे उसने बड़े प्यार से सजाया था। आँगन में लगा तुलसी का पौधा, खिड़की पर टंगे पर्दे और घर में महकती अगरबत्ती की खुशबू उसकी सादगी की गवाही देते थे।

42 साल की उम्र में भी सुनीता की शारीरिक बनावट और खूबसूरती ऐसी थी कि कोई भी अपनी नजरें न हटा पाए। उसकी ढली हुई सुराहीदार गर्दन, संतुलित और गठीला बदन, और बिना किसी बनावट के दमकता चेहरा उसकी मदहोशी को पूरे गांव में चुपचाप बिखेरता रहता था। गांव के कई मर्दों ने उस पर डोरे डालने की कोशिशें कीं, लेकिन सुनीता का दिल चट्टान की तरह सख्त था।



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उसका मानना था कि मर्दों की नजर में औरत की रूह का कोई वजूद नहीं होता, उन्हें बस जिस्म की चाह होती है। आज तक उसे कोई ऐसा मर्द नहीं मिला था जो उसकी आत्मा से जुड़ सके, जो उसे वासना से परे सच्चा अपनापन दे सके। यही वजह थी कि उसने कभी किसी गैर मर्द को अपने करीब नहीं फटकने दिया।

इसी आत्म-नियंत्रण के चलते, 42 की उम्र में भी उसकी कौमार्यता पूरी तरह अक्षुण्ण थी। उसने आज तक खुद को भी पूरी तरह भटकने नहीं दिया था। कभी अगर उसके अंदर कामुकता की कोई लहर उठती भी, तो वह किसी को शामिल किए बिना, केवल कपड़ों के ऊपर से ही अपनी योनि को हल्का सा सहलाकर उस आग को दबा देती थी। उसकी उंगली तक ने आज तक उस कुंवारी दहलीज के भीतर कदम नहीं रखा था।

घर छोटा होने के कारण उसकी जरूरतें भी कम थीं। अकेलेपन को काटने के लिए वह कभी अपनी छोटी सी किताबों की अलमारी से कहानियां पढ़ती, कभी गली के छोटे बच्चों को अपने छोटे से आंगन में बिठाकर नि:शुल्क पढ़ाती, तो कभी पास के बुजुर्ग आश्रम में जाकर उनके कपड़े धोने या खाना परोसने में दिन बिता देती।

अगली सुबह जब बारिश थोड़ी हल्की हुई और धूप की हल्की किरणें निकलीं, तो अस्पताल में मची अफरा-तफरी की खबर सुनीता तक पहुंची। उसका दयालु दिल तड़प उठा। उसने अपनी सादी सूती साड़ी का पल्लू संभाला और घायलों की सेवा के लिए सीधे अस्पताल का रुख किया।

अस्पताल की इमारत छोटी थी और मरीजों तथा उनके रिश्तेदारों का हुजूम बहुत बड़ा। हर तरफ पट्टियां बांधते डॉक्टर, रोते-बिलखते परिजन और तड़पते हुए घायलों का शोर था। पुलिस अधिकारी कागजी कार्रवाई में जुटे थे, जो लोग ठीक स्थिति में थे उन्हें दवाइयां दिलाकर उनके घर भेजने की व्यवस्था कर रहे थे।

सुनीता ने बिना वक्त गंवाए एक कोने से शुरुआत की। वह किसी को पानी पिलाती, किसी के माथे से बहता पसीना पोंछती तो किसी रोती हुई मां को दिलासा देती। उसकी मौजूदगी से अस्पताल के उस तनावपूर्ण माहौल में एक अजीब सी ममता और ठंडक घुल रही थी।
काम करते-करते, जब वह मेल-वार्ड की तरफ बढ़ी, तो उसकी नजरें अचानक एक जगह थम गईं।

वॉर्ड के आखिरी कोने की एक लकड़ी की बेंच पर एक 22 साल का नवयुवक अकेला बैठा था— आरव।
हादसे की तमाम गर्द और चेहरे पर लगी हल्की खरोंचों के बावजूद, आरव की सुंदरता और उसका गठीला, सुगठित शरीर उस भीड़ में भी अलग ही चमक रहा था। उसके घने बाल बिखरे हुए थे, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली थीं उसकी गहरी आंखें—जिनमें एक अजीब सा सन्नाटा, खालीपन और मासूमियत बिखरी पड़ी थी।

दो पुलिस वाले उसके सामने खड़े होकर उसे हिला रहे थे और सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे—

"अरे भाई, नाम तो बताओ अपना?"

"कहां से आ रहे थे? कोई पहचान पत्र है तुम्हारे पास?"

"घर में किसी का फोन नंबर याद है?"

लेकिन आरव बिल्कुल बेसुध था। उसकी नजरें सीधे सामने वाली सफेद दीवार पर टिकी थीं। न तो उसके होंठों में कोई हरकत थी और न ही उसकी आंखों की पुतलियां हिल रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो उस भयानक ट्रेन दुर्घटना के खौफ ने उसकी सारी यादें, उसका मानसिक संतुलन पल भर में छीन लिया हो।

पुलिस वाले झल्लाकर अपनी फाइल बंद कर ही रहे थे कि सुनीता के कदम धीरे-धीरे आरव की ओर बढ़ने लगे।
जैसे-जैसे सुनीता उस बेसुध, खूबसूरत और मासूम लड़के के करीब पहुँच रही थी, उसके सीने के भीतर कुछ हलचल होने लगी। 42 साल की उम्र तक जिस दिल को किसी मर्द की मौजूदगी पिघला न सकी थी, उस दिल में आरव की उस लाचार हालत को देखकर एक अजीब सी मीठी सिहरन दौड़ गई—एक ऐसा अहसास, जो न केवल हमदर्दी का था, बल्कि किसी गहरे अपनेपन की पहली दस्तक भी।

सुनीता के भारी कदम धीरे-धीरे आरव की ओर बढ़ते चले गए। जैसे-जैसे वह उसके पास पहुँच रही थी, उसका दिल एक अजीब सी अज्ञात बेचैनी से धड़क रहा था। आरव की उन मासूम, खामोश और खाली आँखों ने सुनीता के मन के भीतर छिपी ममता और एक अनजाने खिंचाव को झकझोर कर रख दिया था।

सुनीता ने आगे बढ़कर आरव की ओर रुख किया और बेहद आत्मविश्वास के साथ दोनों पुलिस वालों की ओर देखकर झूठ बोल दिया— "साहब, यह मेरा बेटा है... दुर्घटना की वजह से गहरा सदमा लगा है इसे, इसलिए कुछ बोल नहीं पा रहा।"

दोनों पुलिस अधिकारियों ने एक पल के लिए हैरानी से सुनीता की तरफ देखा। 42 साल की ढली हुई, बेहद खूबसूरत और संयमित सुनीता के चेहरे पर एक अजीब सा तेज था। अस्पताल में फैली भारी भीड़, चीख-पुकार और काम के बेहिसाब दबाव के बीच पुलिस वाले ज्यादा तफ्तीश के मूड में नहीं थे। उन्होंने राहत की सांस ली कि चलो इस अनजान और शांत पड़े लड़के की जिम्मेदारी लेने वाला कोई तो आया। बिना कोई कागजी सवाल-जवाब किए, वे आरव को सुनीता के सुपुर्द करके भीड़ में आगे के मरीजों की तरफ बढ़ गए।

पुलिस वालों के जाते ही सुनीता वहीं बेंच पर आरव के ठीक बगल में बैठ गई। उसके शरीर से उठती भीनी-भीनी खुशबू हवा में घुल रही थी। सुनीता ने थोड़ा झिझकते और संकोच करते हुए अपना कोमल हाथ आरव के कंधे पर रखा। उसके स्पर्श में एक अद्भुत ठंडक थी।



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"बेटा... तुम्हारा नाम क्या है? कहाँ के रहने वाले हो तुम?" सुनीता ने बेहद मीठी और भर्राई आवाज में पूछा।
लेकिन आरव बिल्कुल मौन रहा। उसने एक बार अपनी गहरी, उदास आँखों से सुनीता के दमकते चेहरे को देखा, फिर अपनी नजरें नीचे झुका लीं। उसके होंठ फड़फड़ाए जरूर, पर मुँह से एक शब्द भी न निकला।

सुनीता के मन में आरव को लेकर अजीबोगरीब भाव उमड़-घुमड़ रहे थे। एक तरफ उसकी सुरक्षा की चिंता थी, तो दूसरी तरफ उसकी सुगठित काया, गठीले बदन और मासूमियत का एक अनजाना आकर्षण, जिसे सुनीता मन ही मन दबाने की कोशिश कर रही थी। उसने सोचा कि इस बदहवास हालत में इस खूबसूरत नवयुवक को अस्पताल के इस बेदर्द माहौल में अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा। मन में ख्याल आया—'आज रात इसे अपने घर ले चलती हूँ। जैसे ही इसकी दिमागी हालत थोड़ी ठीक होगी या यह अपने घर का पता बताएगा, इसे सुरक्षित भेज दूंगी... तब तक यह मेरे पास रह लेगा।'
शाम ढलते-ढलते आसमान पर नारंगी और सिंदूरी छटा बिखर गई थी। सुनीता आरव का हाथ थामकर उसे अपने छोटे से, शांत और साफ-सुथरे घर ले आई।

रसोई घर में पीली रोशनी का एक छोटा सा बल्ब जल रहा था। बाहर हल्की ठंडी हवा चल रही थी। सुनीता रात के खाने के लिए रोटियाँ बनाने में जुट गई। उसने अपनी सादी सूती साड़ी का पल्लू कमर में सलीके से खोंस रखा था, जिससे उसकी ढली हुई, पतली कमर और गठीले बदन की सुडौल बनावट साफ झलक रही थी।

आरव रसोई के मुहाने पर पड़ी एक छोटी सी लकड़ी की चौकी पर बैठा हुआ था। उसकी स्थिर नजरें सिर्फ और सिर्फ सुनीता पर टिकी थीं।

गर्मी और तवे की तपिश की वजह से सुनीता के गुलाबी गालों पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। उसकी रेशमी जुल्फों की एकाध लटें बार-बार सिमटकर उसके गालों पर झूल जातीं, जिन्हें वह अपने गोरे हाथों के पीछे से संवारती। जब भी सुनीता तवे पर रोटी पलटती, उसकी नजरें बरबस आरव की ओर उठ जातीं। वह हल्के से मुस्कुराती—एक ऐसी मुस्कान, जिसमें ममता भी थी और 42 साल के अकेलेपन के बाद किसी मर्द की मौजूदगी का एक अनजाना नशा भी।



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"भूख लगी है न तुम्हें? बस दो मिनट... रोटियाँ सिख रही हैं," सुनीता ने बड़ी कोमलता से कहा और अपनी लट को फिर से कान के पीछे सरकाया।

लेकिन आरव? आरव जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में खोया हुआ था। वह सुनीता के हर एक हिचकोले, उसके बदन की हरकत और उसके गुलाबी खिलते गालों को बिना पलक झपकाए देखे जा रहा था। उसकी खामोशी में एक ऐसा गहरा सन्नाटा था, जो सुनीता के कुंवारे और संयमित शरीर में अजीब सी सिहरन पैदा कर रहा था।

रात गहराने के साथ ही पूरे गांव पर सन्नाटे की चादर बिछ गई थी। गांव के चारों ओर दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेतों पर पूनम के चांद की शीतल, दूधिया रोशनी झिलमिला रही थी। हवा में पकी हुई फसलों और गीली मिट्टी की सोंधी महक घुली हुई थी। मौसम में उमस और गर्मी काफी बढ़ गई थी, और ठीक खाने के वक्त पूरे इलाके की बिजली गुल हो गई। कमरे के भीतर छाई घुटन में बैठना मुश्किल था।

सुनीता ने तवे से उतारी गर्म रोटियों की थाली संभाली, दूसरे हाथ में खजूर के पत्तों से बनी एक पुरानी चटाई उठाई और छत की ओर जाने वाली संकरी सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई। आरव, जो किसी मासूम साए की तरह उसके हर कदम का पीछा कर रहा था, खामोशी से उसके पीछे-पीछे छत पर चला आया।

खुली छत पर आते ही हल्की, ठंडी हवा के एक झोंके ने उनका स्वागत किया। चांद अपनी पूरी आबो-हवा के साथ चमक रहा था, जिससे छत पर इतना उजाला फैल गया था कि दीये या मोमबत्ती की कोई जरूरत ही नहीं थी। आसमान का वह निखरा हुआ उजाला सुनीता के दमकते चेहरे पर पड़ रहा था।

सुनीता ने छत के एक साफ कोने में चटाई बिछा दी और आरव को प्यार से बैठने का इशारा किया। उसकी सादी सूती साड़ी का पल्लू जब हवा में लहराया, तो चांदनी रात में उसके गठीले बदन की सुडौल बनावट और ढली हुई कमर की नजाकत बेहद खूबसूरत लग रही थी।

सुनीता खुद भी चटाई पर आरव के बिल्कुल सामने बैठ गई। दोनों के बीच फासला बहुत कम था। उसने कटोरी में दाल निकाली, रोटी का एक नरम कोर तोड़ा, उसे दाल में डुबोया और बड़ी कोमलता से आरव के होंठों के पास ले गई।

आरव ने एक पल के लिए अपनी गहरी, खामोश आंखों को उठाकर सुनीता के चेहरे को देखा—उस चेहरे को, जिस पर ममता, मिठास और एक अजीब सा अनजाना नशा तैर रहा था। फिर उसने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने होंठ खोले और सुनीता के हाथों से वह निवाला ले लिया।

अगले ही पल वह खामोशी से निवाला चबाने लगा, लेकिन उसकी नजरें सुनीता के चेहरे से नहीं हट रही थीं। वह एक पल भोजन का आनंद लेता और दूसरे ही पल सुनीता के गालों पर झूलती उन बिखरी जुल्फों को घूरने लगता, जो हवा के साथ उसके होंठों को छू रही थीं।

सुनीता उसे खाते हुए बड़े ही लाड और दुलार से देख रही थी। जब भी आरव का मुंह निवाले से भरता, सुनीता के होंठों पर एक संतोषभरी, मदहोश कर देने वाली मुस्कान खिल उठती। वह अपनी साड़ी के पल्लू के कोने से आरव के ठोड़ी पर लगी दाल की बूंद को पोंछ देती।

आज कई सालों बाद सुनीता का मन अंदर से पूरी तरह शांत, तृप्त और संतुष्ट था।

यूं तो सुनीता आए दिन बुजुर्गों के आश्रम में जाकर उनकी सेवा करती थी, छोटे बच्चों को प्यार से पढ़ाती थी और दूसरों के काम आकर आत्मिक खुशी पाती थी।

लेकिन आज की यह रात, यह चांदनी, और उसके सामने बैठा यह अनजान, बेबस पर बेहद खूबसूरत नवयुवक... उसके दिल में एक ऐसा अहसास जगा रहे थे जो उसने 42 सालों में कभी महसूस नहीं किया था। यह सिर्फ निस्वार्थ सेवा की खुशी नहीं थी; यह एक स्त्री के दिल की वह गहराई थी जो किसी अपने के करीब होने पर खुद-ब-खुद छलक उठती है।

खाना खिलाने के बाद सुनीता ने पानी का गिलास आरव के होंठों से लगाया। आरव ने धीरे-धीरे पानी पिया, लेकिन उसकी नजरें लगातार सुनीता के चेहरे पर ही टिकी रहीं—जैसे वह उस चेहरे में छुपे सुकून को पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।

सुनीता ने बर्तन एक तरफ रखे और चटाई पर ही थोड़ा पीछे हटकर बैठ गई। छत पर हल्की ठंडी हवा चलने लगी थी, जिसने रात की उमस को थोड़ा कम कर दिया था। दूर खेतों से झींगुरों की भिनभिनाहट और हवा से लहराते पत्तों की सरसराहट के अलावा हर तरफ गहरा सन्नाटा था।

सुनीता ने घुटनों को मोड़कर अपने बांहों के घेरे में ले लिया और सिर को घुटनों पर टिकाकर आसमान में चमकते चांद को देखने लगी। उसकी साड़ी का पल्लू हवा के हल्के झोंके से कंधे से सरककर नीचे गिर गया, जिससे उसकी सुराहीदार गर्दन और दमकती पीठ की बनावट चांदनी रात में और भी निखर उठी।

तभी, आरव ने अपनी खामोशी तोड़ी। उसकी आवाज बहुत ही धीमी, गहरी और थोड़ी भर्राई हुई थी—
"आप... कौन हैं?"

सुनीता ने चौंककर अपनी आंखें चांद से हटाईं और आरव की तरफ देखा। यह पहली बार था जब आरव ने अपने मुंह से कोई शब्द निकाला था। उसकी आवाज में एक अजीब सी मासूमियत और भटकन थी।

सुनीता के चेहरे पर एक मीठी मुस्कान तैर गई। उसने बहुत ही कोमलता से कहा, "मेरा नाम सुनीता है... और तुम मेरे घर पर हो। अस्पताल में तुम अकेले और बेसुध पड़े थे, इसलिए मैं तुम्हें यहाँ ले आई।"

आरव ने अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया, जैसे उसके दिमाग में पुरानी यादें और उस खौफनाक ट्रेन हादसे के मंजर टकरा रहे हों। उसकी सांसें थोड़ी तेज चलने लगीं और उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें छलक आईं।

सुनीता से उसका यह दर्द देखा नहीं गया। उसने बिना किसी झिझक के अपना हाथ आगे बढ़ाया और आरव के बिखरे बालों में अपनी उंगलियां फेरने लगी। उसका स्पर्श इतना शीतल और ममता से भरा था कि आरव की बेचैनी पल भर में शांत होने लगी। आरव ने धीरे से अपना सिर सुनीता की गोद में रख दिया।


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सुनीता का पूरा शरीर एक पल के लिए सिहर उठा। 42 सालों में पहली बार किसी पुरुष का यह स्पर्श, यह निर्भरता उसके कुंवारे जिस्म और रूह को भीतर तक झकझोर गई थी। उसने कोई एतराज नहीं किया। उसके गोरे हाथों की उंगलियां आरव के बालों को सहलाती रहीं।
"मुझे... कुछ याद नहीं आ रहा," आरव ने बंद आंखों से सुनीता की गोद में अपना चेहरा छिपाते हुए कहा, "बस इतना पता है कि यहाँ... आपके पास मुझे बहुत सुरक्षित महसूस हो रहा है।"

सुनीता की छाती में एक अजीब सा उफान उठा। उसके दिल का हर कोना आरव के इस भोलेपन और अपनापे से पिघलने लगा। उसने अपनी दूसरी हथेली आरव के गाल पर रखी। आरव की हल्की दाढ़ी की चुभन और उसकी गर्म सांसें सुनीता की जांघों पर महसूस हो रही थीं, जिसने सुनीता के भीतर सालों से सोई हुई एक अनजानी अग्नि को धीरे से सुलगा दिया।

"घबराओ मत," सुनीता ने उसकी ओर झुकते हुए बेहद नशीली आवाज में कहा, "जब तक सब कुछ याद नहीं आ जाता, तुम यहीं रहोगे... मेरे पास।"

झुकने की वजह से सुनीता का चेहरा आरव के चेहरे के ठीक ऊपर आ गया था। चांदनी की सीधी रोशनी सुनीता के गुलाबी गालों और थोड़े खुले हुए होंठों पर पड़ रही थी। आरव ने अपनी आंखें खोलीं। दोनों की नजरें एक-दूसरे में उलझ गईं। आरव की गहरी, मासूम आंखों में एक अजीब सी तड़प थी, और सुनीता की आंखों में 42 साल के अकेलेपन के बाद मिला एक ऐसा नशा, जो किसी भी सीमा को लांघने के लिए तैयार था।

आरव ने धीरे से अपना हाथ उठाकर सुनीता की उंगलियों को थाम लिया। हवा का एक तेज झोंका आया, और छत पर छाई उस चांदनी रात में दो खामोश रूहों के बीच का खिंचाव और भी गहरा हो गया।

आरव की उंगलियों की गर्माहट जैसे ही सुनीता की हथेलियों से टकराई, सुनीता के पूरे जिस्म में एक हल्की ककंपकंपी दौड़ गई। 42 बरसों का कठोर अनुशासन, मर्यादा की दीवारें और मर्दों के प्रति मन में बसा सालों पुराना अविश्वास—सब कुछ उस एक मासूम स्पर्श के सामने पल भर के लिए धुंधला पड़ गया।

दोनों के चेहरे एक-दूसरे के बेहद करीब आ चुके थे। सांसों की गर्माहट आपस में टकरा रही थी कि तभी अचानक—कड़कड़ाआआआम!

आसमान में एक भयानक कड़कड़ाहट के साथ बिजली चमकी। बिजली की उस तेज कौंध और गड़गड़ाहट से दोनों का ध्यान झटके से टूटा और वे होश में आए। हवा का रुख अचानक बदल गया था और ठंडी हवा के तेज थपेड़ों के साथ बादलों की उमड़-घुमड़ शुरू हो गई थी।
आरव ने अपने बिगड़े हुए होश संभाले और आसमान की तरफ देखकर धीमी आवाज में कहा, "लगता है बारिश आएगी... हमें नीचे चलना चाहिए।" उसने खिड़की की तरफ देखा तो नीचे कमरों में रोशनी लौट आई थी, "बिजली भी आ गई है।"

"हाँ... सही कह रहे हो तुम, चलो नीचे चलते हैं," सुनीता ने हड़बड़ाते हुए अपनी साड़ी का पल्लू संभाला।
दोनों चुपचाप सीढ़ियों से उतरकर नीचे आ गए। सुनीता आरव को दूसरे खाली पड़े कमरे में ले गई और उसके लिए बिस्तर सजाने लगी। उसने गद्दे पर साफ चादर बिछाई और तकिया सलीके से रखा।

इस पूरे क्रम में, आरव दरवाजे के पास खड़ा होकर खामोशी से सुनीता को निहारता रहा। कमरा रोशनी से जगमगा रहा था, जिसमें सुनीता की ढली हुई खूबसूरती और भी खिलकर सामने आ रही थी। झुक-झुककर चादर सही करते वक्त उसकी गोरी, सुराहीदार कमर चमक रही थी। उसकी सुडौल, गठीली छातियां (चूचियाँ) उसके हर कदम और झुकाव के साथ हल्की-हल्की हिल रही थीं, जिससे उसकी सूती साड़ी का पल्लू बार-बार ढलककर कंधे से नीचे गिर जाता था। सुनीता बार-बार अपनी ढीली लटों और पल्लू को संभालती, पर आरव की नजरें उसकी उस नजाकत पर ही टिकी रहीं।

कमरे का काम पूरा करके सुनीता सीधी खड़ी हुई। आरव को खुद को लगातार घूरते देख उसके होंठों पर एक मीठी, मदहोश कर देने वाली मुस्कान तैर गई।

सुनीता ने बेहद कोमलता से कहा, "अच्‍छा आरव, बाहर बारिश शुरू हो गई है। तुम अब आराम से सो जाओ... मैं जरा रसोई के बर्तन साफ कर लूँ।" उसने आरव की आंखों में देखा और हल्के से मुस्कुराते हुए आगे कहा, "अगर रात में कोई दिक्कत या डर लगे, तो मैं बगल वाले कमरे में ही हूँ... आ जाना।"

इतना कहकर सुनीता एक बार फिर मुस्कुराई, अपनी नशीली निगाहें उस पर डालीं और कमरे से बाहर निकलकर रसोई की तरफ चली गई। आरव वहीं खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा, जबकि बाहर मूसलाधार बारिश की बूंदें छत पर गिरना शुरू हो चुकी थीं।

सुल्तानपुर में अभी पौ भी नहीं फटी थी और चारों तरफ मद्धम सा अंधेरा छाया हुआ था। गांव के बुजुर्ग अपने-अपने ढोर-डंगरों को खूंटे से खोलकर बाहर बांधने में जुट गए थे, उनके आगे सानी-चारा डाला जा रहा था। गांव के लोगों का तो नियम ही ऐसा था—मुर्ग की पहली बांग के साथ जागना और लोटा उठाकर नदी और खेतों की तरफ निकल पड़ना। घर-घर में लैट्रिन बनने के बावजूद खुली हवा में जाने का जो पुराना चस्का था, वह आसानी से छूटने वाला नहीं था। औरतें भी तड़के ही झाड़ियों का रुख कर लेती थीं। सुनीता भी कभी-कभार ही सही, लेकिन मुंह अंधेरे उधर निकल जाया करती थी।

लेकिन आज की बात कुछ अलग थी। रात भर होती झिमझिम बारिश के बीच सुनीता की आंखों में नींद का एक कतरा तक नहीं आया था। वह करवटें बदलती रही और अपनी जिंदगी की परतों को टटोलती रही। एक वक्त था जब वह इसी बेमानी सी जिंदगी से भाग खड़ी हुई थी, इसे खत्म कर देना चाहती थी... पर आज, सालों बाद, उसके भीतर फिर से जीने की एक नई ललक जाग रही थी।

आसमान में भोर की लालिमा फूटते ही वह उठी, घर में झाड़ू-पोछा लगाया और सीधे नहाने चली गई।
नहाकर निकली तो उसके खुले गीले बाल गालों पर बिखरे हुए थे, जिन्हें उसने एक गमछे से हल्का सा बांध रखा था। भीगे बदन पर सादी सूती साड़ी लपेटे वह दबे पांव आरव के कमरे में दाखिल हुई। 42 साल की उम्र में यह पहला मौका था जब वह किसी मर्द को इतनी नजदीकी से सोते हुए देख रही थी। आरव के चेहरे पर बच्चों जैसी असीम मासूमियत छाई हुई थी। सुनीता न जाने कितनी देर टकटकी लगाए उस ढले हुए बदन और शांत चेहरे को निहारती रही। फिर न जाने मन में क्या आया, वह थोड़ा और नजदीक झुकी और बड़े दुलार से आरव के गठीले सीने पर अपना कोमल हाथ रखकर उसे उठाने लगी।

"आरव... उठो..."


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जैसे ही आरव ने अपनी आंखें खोलीं, भीगी लटों के बीच चमकता हुआ सुनीता का बेहद खूबसूरत और तरोताजा चेहरा ठीक उसके सामने था। आरव को लगा जैसे दिन की शुरुआत इससे हसीन हो ही नहीं सकती थी। उसके पूरे शरीर में एक कड़कड़ाती हुई सिहरन दौड़ गई। उसने एक प्यारी सी मुस्कान के साथ कहा— "गुड मॉर्निंग!"

सुनीता के होंठों पर भी हल्की सी लाली छा गई, "गुड मॉर्निंग! चलो, अब उठ भी जाओ... मैं रसोई में नाश्ता बनाती हूँ।"

सुनीता इतना कहकर मुड़ने ही वाली थी कि उसकी नजरें अनायास ही आरव के निचले हिस्से पर टिक गईं। पैंट के ऊपर एक पूरा तंबू बना हुआ था! सुनीता की आंखें फटी की फटी रह गईं—उस उभार को देखकर उसके मुंह से अनजाने में एक 'उफ़' निकल गया। किसी मर्द का इतना विशाल और कड़क रूप उसने अपनी जिंदगी में पहली बार देखा था। इससे पहले कि आरव उसकी इस हड़बड़ाहट को भांप पाता, सुनीता झटपट कमरे से बाहर भाग खड़ी हुई। उसका दिल धक-धक कर रहा था और गाल मारे शर्म के लाल हो चुके थे।

इधर आरव उठा और बाथरुम की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने अपने कपड़े उतारे, उसका 8 से 9 इंच का लोहे जैसा कड़ा और तना हुआ अंग बाहर छिटक आया। सुबह-सुबह का दबाव इतना था कि जब उसने मूतना शुरू किया तो पूरे 5 मिनट तक धार बहती रही। जब जाकर कहीं उसकी टंकी खाली हुई और उसका वह विशाल अंग थोड़ा शांत हुआ।

इसके बाद वह नहाने के लिए बाहर आंगन में लगे चापाकल (हैंडपंप) की तरफ आ गया। गांव में तो चापाकल से ही पानी खींचना पड़ता था। हालांकि घर में मोटर लगी थी, लेकिन इस वक्त लाइट गोल थी और छत की टंकी भी खाली पड़ी थी। आरव चापाकल चला-चलाकर नहाने में थोड़ा असहज महसूस कर रहा था। तभी सुनीता वहां आ पहुंची। आरव को चापाकल के साथ कुश्ती लड़ते देख उसने झट से अपनी कमर पर गमछा लपेट लिया।

सुनीता ने उसकी अकुलाहट देखी तो मुस्कुराते हुए बोली— "अरे रुको-रुको! तुम नहाओ, मैं पानी चला देती हूँ।"
सुनीता आगे बढ़ी और चापाकल की डंडी पकड़कर नीचे की तरफ झुक-झुककर चलाने लगी। भीगे कपड़ों में जब सुनीता पानी खींचने के लिए झुकती, तो आरव की नजरें उसके पूरे बदन पर टिक जातीं। सुनीता की ढली हुई कमर, सुराहीदार गर्दन और गठीले जिस्म का एक-एक घुमाव आरव की आंखों के सामने था। उसके पूरे बदन में एक अजीब सी सुरसुरी दौड़ने लगी।


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सुनीता भी इस बात से अनजान नहीं थी कि आरव की प्यासी नजरें उसी के बदन पर टिकी हैं। उसके चेहरे पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान तैर रही थी। जब बाल्टी भर गई तो सुनीता सीधी खड़ी हुई, अपनी लटों को पीछे झटका और अपनी नशीली आवाज में बोली— "अच्छा, अगर और कोई काम हो तो झट से बोलना... मैं किचन में हूँ।"

और इतना कहकर वह अपनी पतली कमर मटकाती हुई रसोई की तरफ बढ़ गई, जबकि आरव उसे पीछे से जाता हुआ बस निहारता ही रह गया।

आज इतना ही बाकि आगे.......।



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सुनीता की..... 😉
Jabardast update 👍❤️
 

netsunil

मैं काग़ज़ बेरंग.. तू रंगरेज़ मेरे अल्फ़ाज़ों का
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parkas

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Update 01

आसमान में छाए घने काले बादलों ने सूरज की आखिरी किरण को भी निगल लिया था। हवा में एक अजीब सी नमी और खामोशी थी, जो किसी बड़े तूफान के आने का संकेत दे रही थी। फिर अचानक, मूसलाधार बारिश की थपेड़ों के साथ बादलों की कड़कड़ाहट शुरू हो गई। रात की उस घुप्प तीखी रंगत में सुल्तानपुरा कस्बे के बाहरी हिस्से से गुजरती रेलवे लाइन पर जीवन सामान्य रफ्तार से बढ़ रहा था। लेकिन तभी, काल बनकर आई एक तकनीकी खराबी ने सन्नाटे को चीर दिया।

तेज रफ्तार से दौड़ती ट्रेन की पटरियों से उतरने की गड़गड़ाहट और लोहे से लोहे के टकराने की चीख इतनी भयानक थी कि मील दूर तक पूरा गांव सिहर उठा। विशालकाय लोहे के डिब्बे खिलौनों की तरह एक-दूसरे पर चढ़ते चले गए। चीख-पुकार, कराहें, कांच के टूटने की आवाजें और बारिश की गिरती बूंदें—सब मिलकर एक खौफनाक मंजर रच रहे थे। कई यात्रियों की तो झटके में ही जीवन लीला समाप्त हो गई, जबकि कई जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए लोहे के मलबे में तड़प रहे थे।


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हादसे की खबर फैलते ही राहत बचाव दल और गांव वालों की भीड़ वहां उमड़ पड़ी। लोहे की चादरों को काटकर, बारिश की परवाह किए बिना घायलों को निकाला जा रहा था और सीधे सुल्तानपुरा के छोटे से सरकारी अस्पताल पहुंचाया जा रहा था।

इसी सुल्तानपुरा में एक शांत और साफ-सुथरी गली के मुहाने पर बसा था सुनीता का एक छोटा सा, सुंदर पक्का घर। कोई बड़ी हवेली नहीं, बल्कि दो कमरों का एक सादा आशियाना, जिसे उसने बड़े प्यार से सजाया था। आँगन में लगा तुलसी का पौधा, खिड़की पर टंगे पर्दे और घर में महकती अगरबत्ती की खुशबू उसकी सादगी की गवाही देते थे।

42 साल की उम्र में भी सुनीता की शारीरिक बनावट और खूबसूरती ऐसी थी कि कोई भी अपनी नजरें न हटा पाए। उसकी ढली हुई सुराहीदार गर्दन, संतुलित और गठीला बदन, और बिना किसी बनावट के दमकता चेहरा उसकी मदहोशी को पूरे गांव में चुपचाप बिखेरता रहता था। गांव के कई मर्दों ने उस पर डोरे डालने की कोशिशें कीं, लेकिन सुनीता का दिल चट्टान की तरह सख्त था।



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उसका मानना था कि मर्दों की नजर में औरत की रूह का कोई वजूद नहीं होता, उन्हें बस जिस्म की चाह होती है। आज तक उसे कोई ऐसा मर्द नहीं मिला था जो उसकी आत्मा से जुड़ सके, जो उसे वासना से परे सच्चा अपनापन दे सके। यही वजह थी कि उसने कभी किसी गैर मर्द को अपने करीब नहीं फटकने दिया।

इसी आत्म-नियंत्रण के चलते, 42 की उम्र में भी उसकी कौमार्यता पूरी तरह अक्षुण्ण थी। उसने आज तक खुद को भी पूरी तरह भटकने नहीं दिया था। कभी अगर उसके अंदर कामुकता की कोई लहर उठती भी, तो वह किसी को शामिल किए बिना, केवल कपड़ों के ऊपर से ही अपनी योनि को हल्का सा सहलाकर उस आग को दबा देती थी। उसकी उंगली तक ने आज तक उस कुंवारी दहलीज के भीतर कदम नहीं रखा था।

घर छोटा होने के कारण उसकी जरूरतें भी कम थीं। अकेलेपन को काटने के लिए वह कभी अपनी छोटी सी किताबों की अलमारी से कहानियां पढ़ती, कभी गली के छोटे बच्चों को अपने छोटे से आंगन में बिठाकर नि:शुल्क पढ़ाती, तो कभी पास के बुजुर्ग आश्रम में जाकर उनके कपड़े धोने या खाना परोसने में दिन बिता देती।

अगली सुबह जब बारिश थोड़ी हल्की हुई और धूप की हल्की किरणें निकलीं, तो अस्पताल में मची अफरा-तफरी की खबर सुनीता तक पहुंची। उसका दयालु दिल तड़प उठा। उसने अपनी सादी सूती साड़ी का पल्लू संभाला और घायलों की सेवा के लिए सीधे अस्पताल का रुख किया।

अस्पताल की इमारत छोटी थी और मरीजों तथा उनके रिश्तेदारों का हुजूम बहुत बड़ा। हर तरफ पट्टियां बांधते डॉक्टर, रोते-बिलखते परिजन और तड़पते हुए घायलों का शोर था। पुलिस अधिकारी कागजी कार्रवाई में जुटे थे, जो लोग ठीक स्थिति में थे उन्हें दवाइयां दिलाकर उनके घर भेजने की व्यवस्था कर रहे थे।

सुनीता ने बिना वक्त गंवाए एक कोने से शुरुआत की। वह किसी को पानी पिलाती, किसी के माथे से बहता पसीना पोंछती तो किसी रोती हुई मां को दिलासा देती। उसकी मौजूदगी से अस्पताल के उस तनावपूर्ण माहौल में एक अजीब सी ममता और ठंडक घुल रही थी।
काम करते-करते, जब वह मेल-वार्ड की तरफ बढ़ी, तो उसकी नजरें अचानक एक जगह थम गईं।

वॉर्ड के आखिरी कोने की एक लकड़ी की बेंच पर एक 22 साल का नवयुवक अकेला बैठा था— आरव।
हादसे की तमाम गर्द और चेहरे पर लगी हल्की खरोंचों के बावजूद, आरव की सुंदरता और उसका गठीला, सुगठित शरीर उस भीड़ में भी अलग ही चमक रहा था। उसके घने बाल बिखरे हुए थे, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली थीं उसकी गहरी आंखें—जिनमें एक अजीब सा सन्नाटा, खालीपन और मासूमियत बिखरी पड़ी थी।

दो पुलिस वाले उसके सामने खड़े होकर उसे हिला रहे थे और सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे—

"अरे भाई, नाम तो बताओ अपना?"

"कहां से आ रहे थे? कोई पहचान पत्र है तुम्हारे पास?"

"घर में किसी का फोन नंबर याद है?"

लेकिन आरव बिल्कुल बेसुध था। उसकी नजरें सीधे सामने वाली सफेद दीवार पर टिकी थीं। न तो उसके होंठों में कोई हरकत थी और न ही उसकी आंखों की पुतलियां हिल रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो उस भयानक ट्रेन दुर्घटना के खौफ ने उसकी सारी यादें, उसका मानसिक संतुलन पल भर में छीन लिया हो।

पुलिस वाले झल्लाकर अपनी फाइल बंद कर ही रहे थे कि सुनीता के कदम धीरे-धीरे आरव की ओर बढ़ने लगे।
जैसे-जैसे सुनीता उस बेसुध, खूबसूरत और मासूम लड़के के करीब पहुँच रही थी, उसके सीने के भीतर कुछ हलचल होने लगी। 42 साल की उम्र तक जिस दिल को किसी मर्द की मौजूदगी पिघला न सकी थी, उस दिल में आरव की उस लाचार हालत को देखकर एक अजीब सी मीठी सिहरन दौड़ गई—एक ऐसा अहसास, जो न केवल हमदर्दी का था, बल्कि किसी गहरे अपनेपन की पहली दस्तक भी।

सुनीता के भारी कदम धीरे-धीरे आरव की ओर बढ़ते चले गए। जैसे-जैसे वह उसके पास पहुँच रही थी, उसका दिल एक अजीब सी अज्ञात बेचैनी से धड़क रहा था। आरव की उन मासूम, खामोश और खाली आँखों ने सुनीता के मन के भीतर छिपी ममता और एक अनजाने खिंचाव को झकझोर कर रख दिया था।

सुनीता ने आगे बढ़कर आरव की ओर रुख किया और बेहद आत्मविश्वास के साथ दोनों पुलिस वालों की ओर देखकर झूठ बोल दिया— "साहब, यह मेरा बेटा है... दुर्घटना की वजह से गहरा सदमा लगा है इसे, इसलिए कुछ बोल नहीं पा रहा।"

दोनों पुलिस अधिकारियों ने एक पल के लिए हैरानी से सुनीता की तरफ देखा। 42 साल की ढली हुई, बेहद खूबसूरत और संयमित सुनीता के चेहरे पर एक अजीब सा तेज था। अस्पताल में फैली भारी भीड़, चीख-पुकार और काम के बेहिसाब दबाव के बीच पुलिस वाले ज्यादा तफ्तीश के मूड में नहीं थे। उन्होंने राहत की सांस ली कि चलो इस अनजान और शांत पड़े लड़के की जिम्मेदारी लेने वाला कोई तो आया। बिना कोई कागजी सवाल-जवाब किए, वे आरव को सुनीता के सुपुर्द करके भीड़ में आगे के मरीजों की तरफ बढ़ गए।

पुलिस वालों के जाते ही सुनीता वहीं बेंच पर आरव के ठीक बगल में बैठ गई। उसके शरीर से उठती भीनी-भीनी खुशबू हवा में घुल रही थी। सुनीता ने थोड़ा झिझकते और संकोच करते हुए अपना कोमल हाथ आरव के कंधे पर रखा। उसके स्पर्श में एक अद्भुत ठंडक थी।



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"बेटा... तुम्हारा नाम क्या है? कहाँ के रहने वाले हो तुम?" सुनीता ने बेहद मीठी और भर्राई आवाज में पूछा।
लेकिन आरव बिल्कुल मौन रहा। उसने एक बार अपनी गहरी, उदास आँखों से सुनीता के दमकते चेहरे को देखा, फिर अपनी नजरें नीचे झुका लीं। उसके होंठ फड़फड़ाए जरूर, पर मुँह से एक शब्द भी न निकला।

सुनीता के मन में आरव को लेकर अजीबोगरीब भाव उमड़-घुमड़ रहे थे। एक तरफ उसकी सुरक्षा की चिंता थी, तो दूसरी तरफ उसकी सुगठित काया, गठीले बदन और मासूमियत का एक अनजाना आकर्षण, जिसे सुनीता मन ही मन दबाने की कोशिश कर रही थी। उसने सोचा कि इस बदहवास हालत में इस खूबसूरत नवयुवक को अस्पताल के इस बेदर्द माहौल में अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा। मन में ख्याल आया—'आज रात इसे अपने घर ले चलती हूँ। जैसे ही इसकी दिमागी हालत थोड़ी ठीक होगी या यह अपने घर का पता बताएगा, इसे सुरक्षित भेज दूंगी... तब तक यह मेरे पास रह लेगा।'
शाम ढलते-ढलते आसमान पर नारंगी और सिंदूरी छटा बिखर गई थी। सुनीता आरव का हाथ थामकर उसे अपने छोटे से, शांत और साफ-सुथरे घर ले आई।

रसोई घर में पीली रोशनी का एक छोटा सा बल्ब जल रहा था। बाहर हल्की ठंडी हवा चल रही थी। सुनीता रात के खाने के लिए रोटियाँ बनाने में जुट गई। उसने अपनी सादी सूती साड़ी का पल्लू कमर में सलीके से खोंस रखा था, जिससे उसकी ढली हुई, पतली कमर और गठीले बदन की सुडौल बनावट साफ झलक रही थी।

आरव रसोई के मुहाने पर पड़ी एक छोटी सी लकड़ी की चौकी पर बैठा हुआ था। उसकी स्थिर नजरें सिर्फ और सिर्फ सुनीता पर टिकी थीं।

गर्मी और तवे की तपिश की वजह से सुनीता के गुलाबी गालों पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। उसकी रेशमी जुल्फों की एकाध लटें बार-बार सिमटकर उसके गालों पर झूल जातीं, जिन्हें वह अपने गोरे हाथों के पीछे से संवारती। जब भी सुनीता तवे पर रोटी पलटती, उसकी नजरें बरबस आरव की ओर उठ जातीं। वह हल्के से मुस्कुराती—एक ऐसी मुस्कान, जिसमें ममता भी थी और 42 साल के अकेलेपन के बाद किसी मर्द की मौजूदगी का एक अनजाना नशा भी।



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"भूख लगी है न तुम्हें? बस दो मिनट... रोटियाँ सिख रही हैं," सुनीता ने बड़ी कोमलता से कहा और अपनी लट को फिर से कान के पीछे सरकाया।

लेकिन आरव? आरव जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में खोया हुआ था। वह सुनीता के हर एक हिचकोले, उसके बदन की हरकत और उसके गुलाबी खिलते गालों को बिना पलक झपकाए देखे जा रहा था। उसकी खामोशी में एक ऐसा गहरा सन्नाटा था, जो सुनीता के कुंवारे और संयमित शरीर में अजीब सी सिहरन पैदा कर रहा था।

रात गहराने के साथ ही पूरे गांव पर सन्नाटे की चादर बिछ गई थी। गांव के चारों ओर दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेतों पर पूनम के चांद की शीतल, दूधिया रोशनी झिलमिला रही थी। हवा में पकी हुई फसलों और गीली मिट्टी की सोंधी महक घुली हुई थी। मौसम में उमस और गर्मी काफी बढ़ गई थी, और ठीक खाने के वक्त पूरे इलाके की बिजली गुल हो गई। कमरे के भीतर छाई घुटन में बैठना मुश्किल था।

सुनीता ने तवे से उतारी गर्म रोटियों की थाली संभाली, दूसरे हाथ में खजूर के पत्तों से बनी एक पुरानी चटाई उठाई और छत की ओर जाने वाली संकरी सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई। आरव, जो किसी मासूम साए की तरह उसके हर कदम का पीछा कर रहा था, खामोशी से उसके पीछे-पीछे छत पर चला आया।

खुली छत पर आते ही हल्की, ठंडी हवा के एक झोंके ने उनका स्वागत किया। चांद अपनी पूरी आबो-हवा के साथ चमक रहा था, जिससे छत पर इतना उजाला फैल गया था कि दीये या मोमबत्ती की कोई जरूरत ही नहीं थी। आसमान का वह निखरा हुआ उजाला सुनीता के दमकते चेहरे पर पड़ रहा था।

सुनीता ने छत के एक साफ कोने में चटाई बिछा दी और आरव को प्यार से बैठने का इशारा किया। उसकी सादी सूती साड़ी का पल्लू जब हवा में लहराया, तो चांदनी रात में उसके गठीले बदन की सुडौल बनावट और ढली हुई कमर की नजाकत बेहद खूबसूरत लग रही थी।

सुनीता खुद भी चटाई पर आरव के बिल्कुल सामने बैठ गई। दोनों के बीच फासला बहुत कम था। उसने कटोरी में दाल निकाली, रोटी का एक नरम कोर तोड़ा, उसे दाल में डुबोया और बड़ी कोमलता से आरव के होंठों के पास ले गई।

आरव ने एक पल के लिए अपनी गहरी, खामोश आंखों को उठाकर सुनीता के चेहरे को देखा—उस चेहरे को, जिस पर ममता, मिठास और एक अजीब सा अनजाना नशा तैर रहा था। फिर उसने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने होंठ खोले और सुनीता के हाथों से वह निवाला ले लिया।

अगले ही पल वह खामोशी से निवाला चबाने लगा, लेकिन उसकी नजरें सुनीता के चेहरे से नहीं हट रही थीं। वह एक पल भोजन का आनंद लेता और दूसरे ही पल सुनीता के गालों पर झूलती उन बिखरी जुल्फों को घूरने लगता, जो हवा के साथ उसके होंठों को छू रही थीं।

सुनीता उसे खाते हुए बड़े ही लाड और दुलार से देख रही थी। जब भी आरव का मुंह निवाले से भरता, सुनीता के होंठों पर एक संतोषभरी, मदहोश कर देने वाली मुस्कान खिल उठती। वह अपनी साड़ी के पल्लू के कोने से आरव के ठोड़ी पर लगी दाल की बूंद को पोंछ देती।

आज कई सालों बाद सुनीता का मन अंदर से पूरी तरह शांत, तृप्त और संतुष्ट था।

यूं तो सुनीता आए दिन बुजुर्गों के आश्रम में जाकर उनकी सेवा करती थी, छोटे बच्चों को प्यार से पढ़ाती थी और दूसरों के काम आकर आत्मिक खुशी पाती थी।

लेकिन आज की यह रात, यह चांदनी, और उसके सामने बैठा यह अनजान, बेबस पर बेहद खूबसूरत नवयुवक... उसके दिल में एक ऐसा अहसास जगा रहे थे जो उसने 42 सालों में कभी महसूस नहीं किया था। यह सिर्फ निस्वार्थ सेवा की खुशी नहीं थी; यह एक स्त्री के दिल की वह गहराई थी जो किसी अपने के करीब होने पर खुद-ब-खुद छलक उठती है।

खाना खिलाने के बाद सुनीता ने पानी का गिलास आरव के होंठों से लगाया। आरव ने धीरे-धीरे पानी पिया, लेकिन उसकी नजरें लगातार सुनीता के चेहरे पर ही टिकी रहीं—जैसे वह उस चेहरे में छुपे सुकून को पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।

सुनीता ने बर्तन एक तरफ रखे और चटाई पर ही थोड़ा पीछे हटकर बैठ गई। छत पर हल्की ठंडी हवा चलने लगी थी, जिसने रात की उमस को थोड़ा कम कर दिया था। दूर खेतों से झींगुरों की भिनभिनाहट और हवा से लहराते पत्तों की सरसराहट के अलावा हर तरफ गहरा सन्नाटा था।

सुनीता ने घुटनों को मोड़कर अपने बांहों के घेरे में ले लिया और सिर को घुटनों पर टिकाकर आसमान में चमकते चांद को देखने लगी। उसकी साड़ी का पल्लू हवा के हल्के झोंके से कंधे से सरककर नीचे गिर गया, जिससे उसकी सुराहीदार गर्दन और दमकती पीठ की बनावट चांदनी रात में और भी निखर उठी।

तभी, आरव ने अपनी खामोशी तोड़ी। उसकी आवाज बहुत ही धीमी, गहरी और थोड़ी भर्राई हुई थी—
"आप... कौन हैं?"

सुनीता ने चौंककर अपनी आंखें चांद से हटाईं और आरव की तरफ देखा। यह पहली बार था जब आरव ने अपने मुंह से कोई शब्द निकाला था। उसकी आवाज में एक अजीब सी मासूमियत और भटकन थी।

सुनीता के चेहरे पर एक मीठी मुस्कान तैर गई। उसने बहुत ही कोमलता से कहा, "मेरा नाम सुनीता है... और तुम मेरे घर पर हो। अस्पताल में तुम अकेले और बेसुध पड़े थे, इसलिए मैं तुम्हें यहाँ ले आई।"

आरव ने अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया, जैसे उसके दिमाग में पुरानी यादें और उस खौफनाक ट्रेन हादसे के मंजर टकरा रहे हों। उसकी सांसें थोड़ी तेज चलने लगीं और उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें छलक आईं।

सुनीता से उसका यह दर्द देखा नहीं गया। उसने बिना किसी झिझक के अपना हाथ आगे बढ़ाया और आरव के बिखरे बालों में अपनी उंगलियां फेरने लगी। उसका स्पर्श इतना शीतल और ममता से भरा था कि आरव की बेचैनी पल भर में शांत होने लगी। आरव ने धीरे से अपना सिर सुनीता की गोद में रख दिया।


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सुनीता का पूरा शरीर एक पल के लिए सिहर उठा। 42 सालों में पहली बार किसी पुरुष का यह स्पर्श, यह निर्भरता उसके कुंवारे जिस्म और रूह को भीतर तक झकझोर गई थी। उसने कोई एतराज नहीं किया। उसके गोरे हाथों की उंगलियां आरव के बालों को सहलाती रहीं।
"मुझे... कुछ याद नहीं आ रहा," आरव ने बंद आंखों से सुनीता की गोद में अपना चेहरा छिपाते हुए कहा, "बस इतना पता है कि यहाँ... आपके पास मुझे बहुत सुरक्षित महसूस हो रहा है।"

सुनीता की छाती में एक अजीब सा उफान उठा। उसके दिल का हर कोना आरव के इस भोलेपन और अपनापे से पिघलने लगा। उसने अपनी दूसरी हथेली आरव के गाल पर रखी। आरव की हल्की दाढ़ी की चुभन और उसकी गर्म सांसें सुनीता की जांघों पर महसूस हो रही थीं, जिसने सुनीता के भीतर सालों से सोई हुई एक अनजानी अग्नि को धीरे से सुलगा दिया।

"घबराओ मत," सुनीता ने उसकी ओर झुकते हुए बेहद नशीली आवाज में कहा, "जब तक सब कुछ याद नहीं आ जाता, तुम यहीं रहोगे... मेरे पास।"

झुकने की वजह से सुनीता का चेहरा आरव के चेहरे के ठीक ऊपर आ गया था। चांदनी की सीधी रोशनी सुनीता के गुलाबी गालों और थोड़े खुले हुए होंठों पर पड़ रही थी। आरव ने अपनी आंखें खोलीं। दोनों की नजरें एक-दूसरे में उलझ गईं। आरव की गहरी, मासूम आंखों में एक अजीब सी तड़प थी, और सुनीता की आंखों में 42 साल के अकेलेपन के बाद मिला एक ऐसा नशा, जो किसी भी सीमा को लांघने के लिए तैयार था।

आरव ने धीरे से अपना हाथ उठाकर सुनीता की उंगलियों को थाम लिया। हवा का एक तेज झोंका आया, और छत पर छाई उस चांदनी रात में दो खामोश रूहों के बीच का खिंचाव और भी गहरा हो गया।

आरव की उंगलियों की गर्माहट जैसे ही सुनीता की हथेलियों से टकराई, सुनीता के पूरे जिस्म में एक हल्की ककंपकंपी दौड़ गई। 42 बरसों का कठोर अनुशासन, मर्यादा की दीवारें और मर्दों के प्रति मन में बसा सालों पुराना अविश्वास—सब कुछ उस एक मासूम स्पर्श के सामने पल भर के लिए धुंधला पड़ गया।

दोनों के चेहरे एक-दूसरे के बेहद करीब आ चुके थे। सांसों की गर्माहट आपस में टकरा रही थी कि तभी अचानक—कड़कड़ाआआआम!

आसमान में एक भयानक कड़कड़ाहट के साथ बिजली चमकी। बिजली की उस तेज कौंध और गड़गड़ाहट से दोनों का ध्यान झटके से टूटा और वे होश में आए। हवा का रुख अचानक बदल गया था और ठंडी हवा के तेज थपेड़ों के साथ बादलों की उमड़-घुमड़ शुरू हो गई थी।
आरव ने अपने बिगड़े हुए होश संभाले और आसमान की तरफ देखकर धीमी आवाज में कहा, "लगता है बारिश आएगी... हमें नीचे चलना चाहिए।" उसने खिड़की की तरफ देखा तो नीचे कमरों में रोशनी लौट आई थी, "बिजली भी आ गई है।"

"हाँ... सही कह रहे हो तुम, चलो नीचे चलते हैं," सुनीता ने हड़बड़ाते हुए अपनी साड़ी का पल्लू संभाला।
दोनों चुपचाप सीढ़ियों से उतरकर नीचे आ गए। सुनीता आरव को दूसरे खाली पड़े कमरे में ले गई और उसके लिए बिस्तर सजाने लगी। उसने गद्दे पर साफ चादर बिछाई और तकिया सलीके से रखा।

इस पूरे क्रम में, आरव दरवाजे के पास खड़ा होकर खामोशी से सुनीता को निहारता रहा। कमरा रोशनी से जगमगा रहा था, जिसमें सुनीता की ढली हुई खूबसूरती और भी खिलकर सामने आ रही थी। झुक-झुककर चादर सही करते वक्त उसकी गोरी, सुराहीदार कमर चमक रही थी। उसकी सुडौल, गठीली छातियां (चूचियाँ) उसके हर कदम और झुकाव के साथ हल्की-हल्की हिल रही थीं, जिससे उसकी सूती साड़ी का पल्लू बार-बार ढलककर कंधे से नीचे गिर जाता था। सुनीता बार-बार अपनी ढीली लटों और पल्लू को संभालती, पर आरव की नजरें उसकी उस नजाकत पर ही टिकी रहीं।

कमरे का काम पूरा करके सुनीता सीधी खड़ी हुई। आरव को खुद को लगातार घूरते देख उसके होंठों पर एक मीठी, मदहोश कर देने वाली मुस्कान तैर गई।

सुनीता ने बेहद कोमलता से कहा, "अच्‍छा आरव, बाहर बारिश शुरू हो गई है। तुम अब आराम से सो जाओ... मैं जरा रसोई के बर्तन साफ कर लूँ।" उसने आरव की आंखों में देखा और हल्के से मुस्कुराते हुए आगे कहा, "अगर रात में कोई दिक्कत या डर लगे, तो मैं बगल वाले कमरे में ही हूँ... आ जाना।"

इतना कहकर सुनीता एक बार फिर मुस्कुराई, अपनी नशीली निगाहें उस पर डालीं और कमरे से बाहर निकलकर रसोई की तरफ चली गई। आरव वहीं खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा, जबकि बाहर मूसलाधार बारिश की बूंदें छत पर गिरना शुरू हो चुकी थीं।

सुल्तानपुर में अभी पौ भी नहीं फटी थी और चारों तरफ मद्धम सा अंधेरा छाया हुआ था। गांव के बुजुर्ग अपने-अपने ढोर-डंगरों को खूंटे से खोलकर बाहर बांधने में जुट गए थे, उनके आगे सानी-चारा डाला जा रहा था। गांव के लोगों का तो नियम ही ऐसा था—मुर्ग की पहली बांग के साथ जागना और लोटा उठाकर नदी और खेतों की तरफ निकल पड़ना। घर-घर में लैट्रिन बनने के बावजूद खुली हवा में जाने का जो पुराना चस्का था, वह आसानी से छूटने वाला नहीं था। औरतें भी तड़के ही झाड़ियों का रुख कर लेती थीं। सुनीता भी कभी-कभार ही सही, लेकिन मुंह अंधेरे उधर निकल जाया करती थी।

लेकिन आज की बात कुछ अलग थी। रात भर होती झिमझिम बारिश के बीच सुनीता की आंखों में नींद का एक कतरा तक नहीं आया था। वह करवटें बदलती रही और अपनी जिंदगी की परतों को टटोलती रही। एक वक्त था जब वह इसी बेमानी सी जिंदगी से भाग खड़ी हुई थी, इसे खत्म कर देना चाहती थी... पर आज, सालों बाद, उसके भीतर फिर से जीने की एक नई ललक जाग रही थी।

आसमान में भोर की लालिमा फूटते ही वह उठी, घर में झाड़ू-पोछा लगाया और सीधे नहाने चली गई।
नहाकर निकली तो उसके खुले गीले बाल गालों पर बिखरे हुए थे, जिन्हें उसने एक गमछे से हल्का सा बांध रखा था। भीगे बदन पर सादी सूती साड़ी लपेटे वह दबे पांव आरव के कमरे में दाखिल हुई। 42 साल की उम्र में यह पहला मौका था जब वह किसी मर्द को इतनी नजदीकी से सोते हुए देख रही थी। आरव के चेहरे पर बच्चों जैसी असीम मासूमियत छाई हुई थी। सुनीता न जाने कितनी देर टकटकी लगाए उस ढले हुए बदन और शांत चेहरे को निहारती रही। फिर न जाने मन में क्या आया, वह थोड़ा और नजदीक झुकी और बड़े दुलार से आरव के गठीले सीने पर अपना कोमल हाथ रखकर उसे उठाने लगी।

"आरव... उठो..."


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जैसे ही आरव ने अपनी आंखें खोलीं, भीगी लटों के बीच चमकता हुआ सुनीता का बेहद खूबसूरत और तरोताजा चेहरा ठीक उसके सामने था। आरव को लगा जैसे दिन की शुरुआत इससे हसीन हो ही नहीं सकती थी। उसके पूरे शरीर में एक कड़कड़ाती हुई सिहरन दौड़ गई। उसने एक प्यारी सी मुस्कान के साथ कहा— "गुड मॉर्निंग!"

सुनीता के होंठों पर भी हल्की सी लाली छा गई, "गुड मॉर्निंग! चलो, अब उठ भी जाओ... मैं रसोई में नाश्ता बनाती हूँ।"

सुनीता इतना कहकर मुड़ने ही वाली थी कि उसकी नजरें अनायास ही आरव के निचले हिस्से पर टिक गईं। पैंट के ऊपर एक पूरा तंबू बना हुआ था! सुनीता की आंखें फटी की फटी रह गईं—उस उभार को देखकर उसके मुंह से अनजाने में एक 'उफ़' निकल गया। किसी मर्द का इतना विशाल और कड़क रूप उसने अपनी जिंदगी में पहली बार देखा था। इससे पहले कि आरव उसकी इस हड़बड़ाहट को भांप पाता, सुनीता झटपट कमरे से बाहर भाग खड़ी हुई। उसका दिल धक-धक कर रहा था और गाल मारे शर्म के लाल हो चुके थे।

इधर आरव उठा और बाथरुम की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने अपने कपड़े उतारे, उसका 8 से 9 इंच का लोहे जैसा कड़ा और तना हुआ अंग बाहर छिटक आया। सुबह-सुबह का दबाव इतना था कि जब उसने मूतना शुरू किया तो पूरे 5 मिनट तक धार बहती रही। जब जाकर कहीं उसकी टंकी खाली हुई और उसका वह विशाल अंग थोड़ा शांत हुआ।

इसके बाद वह नहाने के लिए बाहर आंगन में लगे चापाकल (हैंडपंप) की तरफ आ गया। गांव में तो चापाकल से ही पानी खींचना पड़ता था। हालांकि घर में मोटर लगी थी, लेकिन इस वक्त लाइट गोल थी और छत की टंकी भी खाली पड़ी थी। आरव चापाकल चला-चलाकर नहाने में थोड़ा असहज महसूस कर रहा था। तभी सुनीता वहां आ पहुंची। आरव को चापाकल के साथ कुश्ती लड़ते देख उसने झट से अपनी कमर पर गमछा लपेट लिया।

सुनीता ने उसकी अकुलाहट देखी तो मुस्कुराते हुए बोली— "अरे रुको-रुको! तुम नहाओ, मैं पानी चला देती हूँ।"
सुनीता आगे बढ़ी और चापाकल की डंडी पकड़कर नीचे की तरफ झुक-झुककर चलाने लगी। भीगे कपड़ों में जब सुनीता पानी खींचने के लिए झुकती, तो आरव की नजरें उसके पूरे बदन पर टिक जातीं। सुनीता की ढली हुई कमर, सुराहीदार गर्दन और गठीले जिस्म का एक-एक घुमाव आरव की आंखों के सामने था। उसके पूरे बदन में एक अजीब सी सुरसुरी दौड़ने लगी।


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सुनीता भी इस बात से अनजान नहीं थी कि आरव की प्यासी नजरें उसी के बदन पर टिकी हैं। उसके चेहरे पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान तैर रही थी। जब बाल्टी भर गई तो सुनीता सीधी खड़ी हुई, अपनी लटों को पीछे झटका और अपनी नशीली आवाज में बोली— "अच्छा, अगर और कोई काम हो तो झट से बोलना... मैं किचन में हूँ।"

और इतना कहकर वह अपनी पतली कमर मटकाती हुई रसोई की तरफ बढ़ गई, जबकि आरव उसे पीछे से जाता हुआ बस निहारता ही रह गया।

आज इतना ही बाकि आगे.......।



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सुनीता की..... 😉
Nice and beautiful update....
 
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Pirate100

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बहुत बढ़िया शुरुआत है. अगले अपडेट का इंतज़ार रहेगा. 👍
 
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Mamta Mishra

Sweet wife and Mom
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Update 02

रसोई से निकलती गर्म-गर्म पराठों और चाय की मनभावन खुशबू ने पूरे घर को अपनी आगोश में ले रखा था। सुनीता करीने से लकड़ी की मेज पर नाश्ते की थालियाँ सजा रही थी। सुबह की सुनहरी धूप खिड़की के रास्ते उसकी सादी सूती साड़ी पर पड़ रही थी, जिससे उसके गोरे रंग में एक अलग ही निखार आ रहा था।

तभी आरव नहाकर कमरे से बाहर निकला। सिर के भीगे बालों से पानी की कुछ बूंदें ढलककर उसकी चौड़ी गर्दन और गठीले सीने पर फिसल रही थीं। कल रात वाले वही पुराने कपड़े पहने होने के बावजूद उसकी कद-काठी और मर्दाना आकर्षण देखते ही बनता था।

सुनीता ने जैसे ही नजरें उठाकर उसे देखा, उसके होंठों पर एक बेहद मीठी और रसीली मुस्कान तैर गई। उसकी नजरें एक पल के लिए आरव के चौड़े कांधों पर ठहरीं।
"नहा लिया?" सुनीता ने प्यार से पूछा और प्लेट में पराठा रखते हुए आगे बोली, "कल रात तो जैसे-तैसे कट गई, लेकिन आज शाम को हम दोनों पास वाले बाजार चलेंगे। तुम्हारे लिए कुछ अच्छे और नाप के कपड़े ले आऊंगी। ऐसे कब तक दूसरों के कपड़ों में रहोगे?"

आरव ने सुनीता के इस अधिकार और अपनेपन को चुपचाप महसूस किया। वह बिना कुछ कहे शांति से मेज के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सा संकोच और एक अनजाना सुकून दोनों साथ तैर रहे थे।

सुनीता उसके लिए गरमा-गरम नाश्ता परोसने लगी। उसकी उंगलियाँ जब-जब थाली के पास आरव के हाथों को छू जातीं, तो दोनों के बदन में एक मद्धम सी सिहरन दौड़ जाती।

पराठे पर मक्खन की टिकिया रखते हुए सुनीता अचानक रुक गई, जैसे उसे कुछ याद आया हो। वह आरव की ओर देखते हुए चहकती हुई बोली—
"वैसे... आज से मेरी छुट्टियाँ खत्म हो रही हैं। मुझे स्कूल जाना ही पड़ेगा। पर फिर मैंने सोचा, तुम दिन भर यहाँ इस अकेले घर में बैठकर क्या करोगे? बोर हो जाओगे और न जाने क्या-क्या अनाप-शनाप सोचोगे... इसलिए बेहतर यही होगा कि तुम भी मेरे साथ ही स्कूल चलो!"

सुनीता की यह बात सुनकर आरव के हाथ में उठा निवाला वहीं थम गया। उसने अपनी गहरी और मासूम आँखों से सुनीता की तरफ देखा। उसकी आवाज़ में थोड़ा झिझक और संकोच साफ झलक रहा था—
"स्कूल? लेकिन... मैं वहाँ जाकर क्या करूँगा, सुनीता? सारे बच्चे और मास्टर मुझे अजीब नजरों से देखेंगे। मैं तो..."

"अरे! तो इसमें इतना सोचने और घबराने की क्या बात है?" सुनीता ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए बेहद आत्मीयता से कहा। उसने अपने कोमल हाथ से आरव के कंधे को धीरे से सहलाया, "वहाँ बड़ा सा स्टाफ रूम है, ढेर सारी किताबें हैं। तुम आराम से वहाँ बैठना, चाय पीना और किताबें पढ़ना। और वैसे भी... मेरी नजरों के सामने रहोगे, तो मुझे भी तुम्हारी चिंता नहीं रहेगी। समझे?"

सुनीता की आँखों में छुपा वह बेपनाह अपनापन देखकर आरव इंकार न कर सका। वह बस खामोशी से सिर हिलाकर मुस्कुरा दिया, जबकि सुनीता का दिल उसे अपने साथ ले जाने की खुशी में किसी नवविवाहिता की तरह उछल रहा था।

सुनीता ने गर्म-गर्म आलू का पराठा आरव की थाली में रखा और फिर खुद भी ठीक उसके सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठ गई। मेज छोटी थी, इसलिए जब सुनीता आगे को झुकी, तो उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया, जिससे उसकी ढली हुई सुराहीदार गर्दन और दमकती छाती का ऊपरी हिस्सा चांदनी की तरह चमक उठा। आरव की नजरें एक पल के लिए वहीं अटक गईं, पर उसने तुरंत अपनी पलकें झुका लीं।

सुनीता ने उसकी इस चोरी को भांप लिया था। उसके गुलाबी गालों पर एक हल्की सी लाली छा गई, लेकिन उसने बात का सिलसिला जारी रखा।

"अच्छा सुनो," सुनीता ने चाय की थर्मामीटर जैसी गर्म चुस्की लेते हुए कहा, उसकी नशीली आंखें सीधे आरव के चेहरे में झांक रही थीं, "तुम खाने में कोई नखरे तो नहीं करते न? आज तो मैंने आलू के पराठे बना दिए हैं, लेकिन तुम्हें क्या-क्या पसंद है, मुझे बता देना। मैं वही सब बनाऊंगी।"

आरव ने पराठे का एक निवाला तोड़ा, उसे दही में डुबोया और अपने मुंह में रखा। सुनीता के हाथ के खाने का स्वाद इतना लाजवाब था कि उसके मुंह से अनजाने में ही निकला, "बहुत स्वादिष्ट है... मैंने शायद बहुत समय से इतना अच्छा खाना नहीं खाया।"

आरव की यह बात सुनकर सुनीता का सीना चौड़ा हो गया। एक औरत के लिए इससे बड़ी तारीफ क्या हो सकती थी कि कोई पुरुष उसके हाथ के बने खाने की इतनी आत्मीयता से सराहना करे। वह खुशी से झूम उठी और अपनी पतली उंगलियों से अपने बालों की लट को कान के पीछे सरकाते हुए बोली, "बस, फिर तो रोज मेरे ही हाथ का खाना खाना पड़ेगा तुम्हें। अब से तुम्हारी पसंद-नापसंद का ख्याल रखना मेरी जिम्मेदारी है।"

आरव ने चाय का कुल्हड़ उठाया और बहुत धीरे से पूछा, "सुनीता... आप अकेली रहती हैं इस बड़े से घर में? कोई और नहीं है आपके साथ?"

यह सवाल सुनते ही सुनीता की आंखों में एक पल के लिए अतीत की कोई पुरानी, काली परछाईं लहराई, लेकिन उसने तुरंत मुस्कान से उसे ढक लिया। उसने अपनी ढली हुई कमर को कुर्सी की पीठ से टिकाया, जिससे उसकी सुडौल छाती और अधिक उभर आई।
"कोई नहीं है आरव..." सुनीता की आवाज में थोड़ा सा अकेलापन और बहुत सारा ठहराव था, "सालों से यह घर ऐसा ही शांत था। लेकिन आज... आज पहली बार मुझे इस मेज पर किसी के साथ बैठकर नाश्ता करने का अहसास इतना खूबसूरत लग रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे इस वीरान घर में कोई रोनक लौट आई हो।"

आरव सुनीता के शब्दों में छुपी उस प्यास और अकेलेपन की गहराई को महसूस कर सकता था। उसने अपनी मेज पर रखी हथेली को थोड़ा आगे बढ़ाया और सुनीता की उंगलियों को हल्के से छू दिया।

"अब आप अकेली नहीं हैं," आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा।

सुनीता का दिल उस जरा से स्पर्श से धक से रह गया। उसके जिस्म में एक ककंपकंपी दौड़ गई। उसने अपनी थर्मामीटर सी गर्म हथेली से आरव का हाथ थाम लिया।
"इसीलिए कह रही हूँ," सुनीता ने अपने होंठों को थोड़ा काटकर नशीले अंदाज में कहा, "आज तुम मेरे साथ ही स्कूल चल रहे हो। मैं तुम्हें इस घर में अकेला छोड़कर एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठ पाऊंगी। वहां मेरे कमरे में बैठना, जब मुझे छुट्टी मिलेगी, मैं आकर तुम्हारे पास बैठूंगी... मंजूर है?"

आरव ने सुनीता के इस मीठे अधिकार और उसकी आंखों में उमड़ती अनजानी वासना व अपनापे को देखा। वह चाहकर भी मना नहीं कर पाया। उसने हल्के से सिर हिला दिया, और सुनीता के चेहरे पर एक ऐसी दिलकश मुस्कान खिल उठी जिसने पूरे कमरे को एक अलग ही मदहोश कर देने वाले अहसास से भर दिया।


रसोई में बनी उस छोटी सी लकड़ी की मेज पर धूप की सुहानी सुनहरी किरणें खिड़की की जाली से छनकर आ रही थीं। धूप की वे लकीरें सीधे सुनीता के सादे, मगर बेहद सलीके से पहने गए कपड़ों पर पड़ रही थीं।
सुनीता के होंठों पर वही नशीली, मद्धम सी मुस्कान तैर रही थी। उसने पराठे का एक छोटा सा, नरम टुकड़ा तोड़ा, उसे गाढ़े दही में हल्का सा डुबोया और बड़े नजाकत से अपने गुलाबी होंठों के बीच रख लिया। चबाते हुए उसने अपनी गहरी, कजरारी आंखों से नटखट अंदाज में आरव की तरफ देखा—

"वैसे... रात में नींद कैसी आई तुम्हें?"

आरव ने चाय का कुल्हड़ मेज पर वापस रखा। उसके भीगे बालों की एकाध बूंदें अब भी उसकी सुडौल गर्दन पर ठहरी हुई थीं। उसने थोड़ा संकोच करते हुए अपनी नजरें झुका लीं, "अब... रात को थोड़ा नींद देर से आई, इसलिए शायद सुबह इतनी देर तक सोता ही रह गया।"
सुनीता यह सुनकर अपनी सुराहीदार गर्दन थोड़ा पीछे करके खिलखिलाकर मुस्कुरा पड़ी। उसकी हंसी में एक अजीब सी खनक थी, जैसे शांत रात में कोई जलतरंग बज उठा हो। वह हंसी सीधे आरव के सीने में उतर गई।
"वैसे, नींद तो कल रात मुझे भी ठीक से नहीं आ रही थी," सुनीता ने अपनी नशीली निगाहों को आरव के गठीले कांधों पर टिकाते हुए कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी गर्माहट और अनजाना सा खिंचाव था।
फिर अचानक उसकी आवाज थोड़ी गंभीर और संजीदा हो गई। उसने आरव के चेहरे की रेखाओं को ध्यान से पढ़ा और बोली, "वैसे आरव... क्या तुम्हें अपने बारे में कुछ भी याद आया? अपने घर, अपनी पढ़ाई या परिवार के बारे में कोई छोटा सा धागा भी दिमाग में पकड़ाया?"
यह सवाल सुनते ही आरव का थोड़ी देर पहले खिलता हुआ चेहरा अचानक बुझ सा गया। उसकी आंखों में वही पुराना खौफनाक सन्नाटा और खालीपन लौट आया। उसकी उंगलियां मेज पर रखे कपड़े को कसकर भींचने लगीं।

सुनीता से आरव की यह बेबसी और लाचारी बर्दाश्त नहीं हुई। 42 बरसों से जिस दिल में सिर्फ अनुशासन की सख्ती थी, वहां इस वक्त सिर्फ और सिर्फ आरव के लिए तड़प उमड़ पड़ी थी। उसने बिना एक पल गंवाए मेज पर रखा आरव का मजबूत, गठीला हाथ अपने दोनों कोमल, थर्मामीटर से गर्म हाथों में थाम लिया। सुनीता की मखमली हथेलियों का वह स्पर्श आरव के भीतर तक ठंडक पहुंचा गया।

"नहीं... मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा," आरव ने एक भारी और लंबी सांस खींचते हुए कहा। उसकी उंगलियां खुद-ब-खुद सुनीता की हथेली की गर्माहट में खो जाने लगीं, "बस वो काली खौफनाक रात... बारिश का शोर... और लोहे के टकराने के साथ चीखते हुए लोगों की आवाजें ही दिमाग में किसी खौफनाक सपने की तरह गूंज रही हैं।"

"कोई बात नहीं आरव... तुम परेशान मत हो," सुनीता ने बेहद आत्मीयता से उसकी उंगलियों को सहलाते हुए दिलासा दिया। उसके स्पर्श में एक मां का दुलार भी था और एक स्त्री का अनजाना समर्पण भी।

"धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। हमें एक बार पुलिस स्टेशन में भी खबर करनी होगी, ताकि अगर तुम्हारे परिवार वाले तुम्हें ढूंढ रहे हों तो उन्हें कम से कम इतना पता चल सके कि तुम सुरक्षित हो। और हां, किसी अच्छे शहर के डॉक्टर को भी दिखाएंगे ताकि तुम्हारी याददाश्त जल्दी वापस आ सके। लेकिन..." सुनीता ने आरव की आंखों में आंखें डालते हुए अपनी पकड़ थोड़ी मजबूत की, "जब तक तुम पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते या तुम्हें सब याद नहीं आ जाता, तुम बेफिक्र होकर मेरे पास रहो। यह तुम्हारा ही घर है... समझे?"

आरव ने सुनीता के इस बेपनाह और निस्वार्थ दुलार को देखा। उसके वीरान पड़े जीवन में यह औरत किसी फरिश्ते की तरह आई थी। फिर उसके मन में एक व्यावहारिक दुविधा कौंधी। उसने थोड़ा झिझकते हुए, संकोच भरे अंदाज में पूछा—

"अच्छा... अगर हम बाहर जा रहे हैं, स्कूल जा रहे हैं... तो मैं सबके सामने आपको क्या कहूंगा? दीदी??"

'दीदी' शब्द सुनते ही सुनीता जोर से हंस पड़ी। उसकी साड़ी का पल्लू एक बार फिर उसके सुडौल कंधे से ढलक कर नीचे गिर गया, और उसकी छाती का ढला हुआ उभार चांदनी सा दमक उठा। रसोई की दीवारें उसकी हंसी की गूंज से महक उठीं।

"अरे बुद्धू! मेरी उम्र अब दीदी कहलाने की नहीं रही," सुनीता ने अपने गालों पर झूलती लट को बड़े नजाकत से कान के पीछे सरकाते हुए कहा।

आरव ने सचमुच चौंककर उसे सर से पांव तक देखा। सुबह की उस निखरी धूप में सुनीता का दमकता गोरा रंग, उसकी सुराहीदार गर्दन, ढली हुई पतली कमर और गठीला, आकर्षक बदन कहीं से भी ढलती उम्र की चुगली नहीं कर रहा था। उसकी एक-एक हरकत में किसी नवयौवना सी ताजगी बिखरी पड़ी थी।

"अरे क्या बात करती हैं आप!" आरव की नजरें सुनीता की सुडौल काया पर जम कर रह गईं, "आप तो अभी मुझसे बस थोड़ी सी ही बड़ी लगती हैं। अगर मेरी कोई सगी बड़ी बहन होती, तो कसम से बिल्कुल आपके जैसी ही खूबसूरत और हसीन होती!"

सुनीता ने अपनी पलकें झुका लीं। उसके गालों पर एकदम से हया की लाली दौड़ गई। 42 साल की उम्र तक जिसने कभी किसी मर्द की तारीफ का एक लफ़्ज़ अपने करीब नहीं आने दिया था, आज एक 22 साल के गठीले, खूबसूरत युवा मर्द के मुंह से अपने हुस्न का ऐसा कसीदा सुनकर उसका कुंवारा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसके सीने की गति तेज हो गई।

उसने अपनी छाती पर पल्लू को दोबारा संभालते हुए और अपनी रंगत छुपाते हुए कहा, "बड़े छांट हो तुम तो! बातों में फंसाना अच्छी तरह जानते हो... अच्छा बताओ, फिर क्या बोलोगे मुझे?"

आरव थोड़ा गंभीर होकर सोचने लगा। उसने अपनी ठोड़ी पर हाथ रखा, "अम्म... 'मां' तो मैं आपको बोल नहीं सकता क्योंकि वो बहुत अलग अहसास होता है... और 'आंटी' कहना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। आंटी शब्द बहुत पराया और सूखा सा लगता है।"
सुनीता ने अपनी चाय का आखिरी घूंट लिया और अपनी नशीली आंखों से उसे देखते हुए एक बहुत ही व्यावहारिक सुझाव दिया—

"एक काम करो... फिलहाल तुम मुझे 'मौसी' बोलना। मैं गांव वालों और स्कूल के बाकी मास्टरों को बता दूंगी कि तुम मेरी दूर की बहन के बेटे हो, जो शहर से मेरे पास कुछ दिन रहने आया है। इससे कोई फालतू के सवाल भी नहीं उठाएगा और हमारा रिश्ता भी सबको साफ रहेगा।"

आरव के मासूम चेहरे पर एक गहरी राहत भरी मुस्कान बिखर गई। उसने सिर हिलाया, "हां! यह बिल्कुल सही रहेगा... मौसी।"

'मौसी' शब्द जब आरव के होंठों से निकला, तो सुनीता के भीतर एक अजीब सी मीठी गुदगुदी हुई। उसने मन ही मन सोचा—रिश्ता चाहे जो भी नाम ले ले, लेकिन इस घर की फिजाओं में जो अनजाना नशा घुल चुका था, उसे रोक पाना अब शायद किसी के बस में नहीं था।


सुनीता ने घर के मुख्य दरवाजे पर पीतल का भारी ताला लगाया और उसकी चाबी अपनी साड़ी के पल्लू के छोर में नजाकत से बांध ली। सुबह की गुनगुनी धूप अब थोड़ी तीखी होने लगी थी, और रात की बारिश के बाद गांव की सोंधी मिट्टी की महक चारों तरफ महक रही थी।
सुनीता आगे-आगे चल रही थी और आरव उसके पीछे। सुनीता का हर कदम उसकी चाल में एक अनजानी लचक पैदा कर रहा था। उसकी सूती साड़ी के पल्लू से झलकती सुराहीदार पीठ और ढली हुई कमर धूप में और भी निखर रही थी। आरव की नजरें चुपचाप उसकी उसी कुदरती खूबसूरती पर टिकी थीं। जब भी रास्ते में कोई गड्ढा या कीचड़ आता, सुनीता रुक जाती और मुड़कर आरव का हाथ थाम लेती।

तभी, गांव की मुख्य सड़क से गुजरते वक्त रास्ते में एक नया मोड़ आया।

सड़क किनारे बनी एक पुरानी चाय की दुकान के पास गांव के कुछ रसूखदार और शोहदे किस्म के लोग बैठे थे। उनमें से एक था राकेश—गांव के पूर्व सरपंच का बेटा, जो सालों से सुनीता पर गंदी नजर रखता आया था। सुनीता ने हमेशा उसे दुत्कार कर भगाया था।

आज जब उसने सुनीता को 42 साल की उम्र में किसी 22 साल के नौजवान का हाथ थामे, इस तरह मुस्कुराते हुए चलते देखा, तो उसकी आंखों में जलन और हवस का एक खौफनाक तूफान उठ खड़ा हुआ।

राकेश ने चाय का कुल्हड़ नीचे पटका और जानबूझकर बीच रास्ते में आकर खड़ा हो गया। उसके साथ उसके दो गुर्गे भी थे।

"अरे वाह, मैडम जी!" राकेश ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए गंदी मुस्कान के साथ कहा, "आज सूरज किधर से निकला है? जो औरत आज तक किसी मर्द की परछाईं से भी दूर भागती थी, वो आज इस चीकने लौंडे का हाथ थामकर सड़क पर निकल रही है? कौन है यह चिकना, सुनीता जी? कहीं शहर से नया शौक तो नहीं पाल लिया?"

राकेश के गुर्गे जोर-जोर से हंसने लगे। रास्ते पर चलते गांव वाले भी रुककर देखने लगे।
सुनीता का खून खौल उठा। उसके गाल गुस्से से लाल हो गए, लेकिन उसने संयम बनाए रखा। वह आरव को किसी मुसीबत में नहीं डालना चाहती थी।

"राकेश! अपनी जबान को लगाम दो और हमारा रास्ता छोड़ो," सुनीता ने कड़क आवाज में कहा, "यह मेरी बहन का बेटा आरव है, शहर से मेरे पास आया है।"

"ओहो! बहन का बेटा?" राकेश ने एक कदम और आगे बढ़ाकर आरव को नीच नजरों से घूरा, "झांसा किसे दे रही हो सुनीता? हमें तो कुछ और ही चक्कर लग रहा है। इस उम्र में इतनी जवानी चढ़ी है कि अब घर में..."

राकेश अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि अचानक आरव की आंखें एकदम बदल गईं।
आरव, जो अब तक बेहद शांत, मासूम और गुमसुम लग रहा था, उसकी आंखों में एक खौफनाक और अजनबी आक्रामकता उतर आई। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके भीतर सोए हुए एक ताकतवर और खतरनाक इंसान को जगा दिया हो।

बिना एक पल की देरी किए, आरव ने राकेश की गर्दन अपने गठीले और मजबूत हाथ से दबोच ली!
आरव की पकड़ इतनी खौफनाक और कसकर थी कि राकेश की आंखें बाहर आने लगीं और उसकी आवाज हलक में ही अटक गई। राकेश के दोनों गुर्गे डर के मारे दो कदम पीछे हट गए। आरव के शरीर की मांसपेशियां तन गई थीं और उसका पूरा बदन एक शिकारी की तरह कड़क हो गया था।

"अगर दोबारा इसके लिए एक भी गलत शब्द बोला... तो यहीं मिट्टी में गाड़ दूंगा," आरव की आवाज में एक ऐसी कड़क और खौफनाक भारीपन था जो इससे पहले सुनीता ने भी कभी नहीं सुनी थी।


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सुनीता हक्की-बक्की रह गई। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही मासूम लड़का है जो सुबह तक उसकी गोद में सिर रखकर रो रहा था। लेकिन आरव के इस खतरनाक तेवर को देखकर सुनीता का दिल एक अजीब से अहसास और सुकून से भर गया—सालों बाद किसी मर्द ने उसके सम्मान के लिए इस तरह ढाल बनकर खड़े होने की हिम्मत दिखाई थी।

सुनीता ने घबराकर तुरंत आरव की चौड़ी बांह को थाम लिया, "आरव! छोड़ो उसे... छोड़ो आरव, हमें देर हो रही है!"

सुनीता की आवाज सुनते ही, आरव का गुस्सा पल भर में गायब हो गया। उसने राकेश को झटके से पीछे धकेला, जिससे राकेश सीधा रास्ते के कीचड़ में जा गिरा। आरव ने फिर से वही मासूम नजरें सुनीता की तरफ घुमाईं, जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो।
राकेश खौफ और अपमान से कांपता हुआ जमीन से उठा और दूर हटकर चीखा, "याद रखना सुनीता! इस लौंडे का गुरूर मैं बहुत जल्द तोड़ूँगा!"

आरव ने राकेश की धमकी पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने आहिस्ते से सुनीता का कांपता हुआ हाथ अपने हाथ में ले लिया और बेहद प्यार से बोला, "चलिए मौसी... स्कूल चलते हैं।"

सुनीता ने आरव के उस मजबूत और सुगठित शरीर को देखा। उसके मन में एक बड़ा सवाल कौंध गया— आखिर कौन है यह आरव? इस मासूमियत के पीछे कौन सा खौफनाक और ताकतवर अतीत छिपा है, जो अचानक एक पल में बाहर आ जाता है?


राकेश को कीचड़ में धकेलने के बाद जब आरव ने दोबारा सुनीता का हाथ थामा, तो सुनीता की उंगलियां हल्की सी कांप रही थीं। दोनों पगडंडी पर आगे बढ़ने लगे, लेकिन सुनीता का ध्यान अब रास्ते पर कम और अपने बगल में चल रहे इस 22 साल के नौजवान पर ज्यादा था।

सुबह का वह मासूम, बेबस आरव जो उसकी गोद में सिर छुपाकर सुकून ढूंढ रहा था... और अभी कुछ ही मिनट पहले राकेश की गर्दन दबोचने वाला वह खौफनाक, आक्रामक मर्द—दोनों एक ही इंसान थे! सुनीता के कुंवारे और संयमित दिल में आरव के इस मर्दाना तेवर ने एक अजीब सी सिहरन और गहरा कौतूहल भर दिया था।

थोड़ी दूर आगे जाकर जब गांव की चहल-पहल थोड़ी कम हुई और नीम के घने पेड़ों की छांव आई, तो सुनीता के कदम खुद-ब-खुद थम गए। उसने झटके से आरव का हाथ छोड़ा और उसके ठीक सामने आकर खड़ी हो गई।
सुबह की गुनगुनी धूप नीम के पत्तों से छनकर सुनीता के दमकते चेहरे और उसकी सुराहीदार गर्दन पर पड़ रही थी। उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसने अपनी कजरारी, नशीली आंखों से सीधे आरव की गहरी आंखों में झांका।

"आरव..." सुनीता की आवाज में आश्चर्य, चिंता और एक अनजाना खिंचाव मिला हुआ था, "अभी तुमने जो किया... वो क्या था?"

आरव ने बिल्कुल बच्चों जैसी मासूमियत से अपनी पलकें झपकाईं। उसकी आंखों से वह खौफनाक गुस्सा पल भर में गायब हो चुका था, जैसे वह कोई सपना रहा हो।

"क्या हुआ मौसी?" आरव ने बड़े सीधेपन से पूछा।
"क्या हुआ? तुम पूछ रहे हो क्या हुआ?" सुनीता ने एक कदम और करीब आते हुए बेहद धीमी लेकिन कड़क आवाज में कहा, "तुमने देखा कि तुमने राकेश को कैसे पकड़ा था? तुम्हारी पकड़, तुम्हारा वो रूप... आरव, कोई आम लड़का किसी तगड़े मर्द की गर्दन इतनी आसानी से एक हाथ से नहीं दबोच सकता। ऐसा लग रहा था जैसे तुम्हें किसी को नुकसान पहुंचाने की, लड़ने की बहुत गहरी ट्रेनिंग मिली हो!"

सुनीता ने अपनी उंगलियां आरव के गठीले, कड़क सीने पर रखीं—जहाँ अभी भी उसकी मांसपेशियों का कसाव साफ महसूस हो रहा था।

"आरव, सच-सच बताओ... क्या तुम्हें सचमुच कुछ याद नहीं है? जब तुमने उस गुंडे की गर्दन पकड़ी थी, तब तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा था? क्या तुम्हें अपनी पुरानी जिंदगी का कोई हिस्सा, कोई धुंधली सी तस्वीर नजर आई?" सुनीता ने तड़पकर पूछा, उसकी उंगलियां आरव के सीने पर और कस गईं।

आरव ने अपना सिर झुका लिया। उसने अपने दोनों हाथों से अपने सिर को दबाया, जैसे उसके दिमाग में कोई भारी हलचल हो रही हो। उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें छलक आईं।

"मुझे... मुझे कुछ याद नहीं आ रहा मौसी," आरव की आवाज फिर से भररा गई, "लेकिन जब उस आदमी ने आपके लिए वो गंदे शब्द बोले... तो मेरे अंदर कुछ फटा। मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मेरी सबसे कीमती चीज को छीन रहा हो। मुझे बस इतना पता था कि मुझे आपको बचाना है... चाहे उसके लिए मुझे किसी की जान ही क्यों न लेनी पड़े।"


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आरव ने अचानक अपनी नजरें उठाईं और सीधे सुनीता की आंखों में देखा। उसकी नजरों में जो बेपनाह दीवानगी और रक्षा करने का जुनून था, उसने सुनीता के पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया।

42 साल की उम्र तक सुनीता ने हमेशा मर्दों को अपनी हवस पूरी करने के लिए करीब आते देखा था। लेकिन आज... आज पहली बार किसी मर्द ने उसकी रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाने का वह खौफनाक रूप दिखाया था। आरव के उन शब्दों ने सुनीता के भीतर सालों से दबे स्त्रीत्व को जागृत कर दिया।

सुनीता का गुस्सा पल भर में पिघलकर एक बेपनाह दुलार में बदल गया। उसने अपने दोनों कोमल हाथ आरव के गालों पर रख दिए। उसकी उंगलियों की ठंडक आरव के माथे के पसीने को सहलाने लगी।

"पगले..." सुनीता ने बेहद नशीली और कांपती हुई आवाज में कहा, उसके होंठ आरव के चेहरे के बेहद करीब थे, "तुम्हें अंदाजा भी है कि तुम मेरे लिए क्या करने जा रहे थे? अगर उस गुंडे को कुछ हो जाता तो?"
"आपके लिए कुछ भी मौसी," आरव ने बिना किसी झिझक के सुनीता की पतली कमर पर अपने मजबूत हाथ रख दिए।

चांदनी रात की तरह, दिन के उजाले में भी उन दोनों के जिस्म एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए थे। सुनीता के गालों पर हया की गहरी लाली छा गई, लेकिन उसने आरव को खुद से दूर नहीं किया। आरव की मजबूत बांहों का वह स्पर्श उसे एक अजीब सी सुरक्षा और सिहरन का अहसास करा रहा था।

"अच्छा बाबा ठीक है," सुनीता ने अपनी नशीली पलकें झुकाते हुए मुस्कुराकर कहा, "अब चलो... स्कूल के लिए देर हो रही है। पर याद रखना, जब तक हम तुम्हारा सच नहीं जान लेते, तुम्हें अपने इस गुस्से पर थोड़ा काबू रखना होगा... समझे?"

आरव ने मासूमियत से सिर हिला दिया। सुनीता ने उसकी उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसाईं और दोनों एक बार फिर स्कूल की पगडंडी पर आगे बढ़ गए, जबकि सुनीता के दिल में आरव के इस रहस्यमयी और ताकतवर अतीत का सवाल और गहरा हो चुका था।

 
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रसोई से निकलती गर्म-गर्म पराठों और चाय की मनभावन खुशबू ने पूरे घर को अपनी आगोश में ले रखा था। सुनीता करीने से लकड़ी की मेज पर नाश्ते की थालियाँ सजा रही थी। सुबह की सुनहरी धूप खिड़की के रास्ते उसकी सादी सूती साड़ी पर पड़ रही थी, जिससे उसके गोरे रंग में एक अलग ही निखार आ रहा था।

तभी आरव नहाकर कमरे से बाहर निकला। सिर के भीगे बालों से पानी की कुछ बूंदें ढलककर उसकी चौड़ी गर्दन और गठीले सीने पर फिसल रही थीं। कल रात वाले वही पुराने कपड़े पहने होने के बावजूद उसकी कद-काठी और मर्दाना आकर्षण देखते ही बनता था।

सुनीता ने जैसे ही नजरें उठाकर उसे देखा, उसके होंठों पर एक बेहद मीठी और रसीली मुस्कान तैर गई। उसकी नजरें एक पल के लिए आरव के चौड़े कांधों पर ठहरीं।
"नहा लिया?" सुनीता ने प्यार से पूछा और प्लेट में पराठा रखते हुए आगे बोली, "कल रात तो जैसे-तैसे कट गई, लेकिन आज शाम को हम दोनों पास वाले बाजार चलेंगे। तुम्हारे लिए कुछ अच्छे और नाप के कपड़े ले आऊंगी। ऐसे कब तक दूसरों के कपड़ों में रहोगे?"

आरव ने सुनीता के इस अधिकार और अपनेपन को चुपचाप महसूस किया। वह बिना कुछ कहे शांति से मेज के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सा संकोच और एक अनजाना सुकून दोनों साथ तैर रहे थे।

सुनीता उसके लिए गरमा-गरम नाश्ता परोसने लगी। उसकी उंगलियाँ जब-जब थाली के पास आरव के हाथों को छू जातीं, तो दोनों के बदन में एक मद्धम सी सिहरन दौड़ जाती।

पराठे पर मक्खन की टिकिया रखते हुए सुनीता अचानक रुक गई, जैसे उसे कुछ याद आया हो। वह आरव की ओर देखते हुए चहकती हुई बोली—
"वैसे... आज से मेरी छुट्टियाँ खत्म हो रही हैं। मुझे स्कूल जाना ही पड़ेगा। पर फिर मैंने सोचा, तुम दिन भर यहाँ इस अकेले घर में बैठकर क्या करोगे? बोर हो जाओगे और न जाने क्या-क्या अनाप-शनाप सोचोगे... इसलिए बेहतर यही होगा कि तुम भी मेरे साथ ही स्कूल चलो!"

सुनीता की यह बात सुनकर आरव के हाथ में उठा निवाला वहीं थम गया। उसने अपनी गहरी और मासूम आँखों से सुनीता की तरफ देखा। उसकी आवाज़ में थोड़ा झिझक और संकोच साफ झलक रहा था—
"स्कूल? लेकिन... मैं वहाँ जाकर क्या करूँगा, सुनीता? सारे बच्चे और मास्टर मुझे अजीब नजरों से देखेंगे। मैं तो..."

"अरे! तो इसमें इतना सोचने और घबराने की क्या बात है?" सुनीता ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए बेहद आत्मीयता से कहा। उसने अपने कोमल हाथ से आरव के कंधे को धीरे से सहलाया, "वहाँ बड़ा सा स्टाफ रूम है, ढेर सारी किताबें हैं। तुम आराम से वहाँ बैठना, चाय पीना और किताबें पढ़ना। और वैसे भी... मेरी नजरों के सामने रहोगे, तो मुझे भी तुम्हारी चिंता नहीं रहेगी। समझे?"

सुनीता की आँखों में छुपा वह बेपनाह अपनापन देखकर आरव इंकार न कर सका। वह बस खामोशी से सिर हिलाकर मुस्कुरा दिया, जबकि सुनीता का दिल उसे अपने साथ ले जाने की खुशी में किसी नवविवाहिता की तरह उछल रहा था।

सुनीता ने गर्म-गर्म आलू का पराठा आरव की थाली में रखा और फिर खुद भी ठीक उसके सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठ गई। मेज छोटी थी, इसलिए जब सुनीता आगे को झुकी, तो उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया, जिससे उसकी ढली हुई सुराहीदार गर्दन और दमकती छाती का ऊपरी हिस्सा चांदनी की तरह चमक उठा। आरव की नजरें एक पल के लिए वहीं अटक गईं, पर उसने तुरंत अपनी पलकें झुका लीं।

सुनीता ने उसकी इस चोरी को भांप लिया था। उसके गुलाबी गालों पर एक हल्की सी लाली छा गई, लेकिन उसने बात का सिलसिला जारी रखा।

"अच्छा सुनो," सुनीता ने चाय की थर्मामीटर जैसी गर्म चुस्की लेते हुए कहा, उसकी नशीली आंखें सीधे आरव के चेहरे में झांक रही थीं, "तुम खाने में कोई नखरे तो नहीं करते न? आज तो मैंने आलू के पराठे बना दिए हैं, लेकिन तुम्हें क्या-क्या पसंद है, मुझे बता देना। मैं वही सब बनाऊंगी।"

आरव ने पराठे का एक निवाला तोड़ा, उसे दही में डुबोया और अपने मुंह में रखा। सुनीता के हाथ के खाने का स्वाद इतना लाजवाब था कि उसके मुंह से अनजाने में ही निकला, "बहुत स्वादिष्ट है... मैंने शायद बहुत समय से इतना अच्छा खाना नहीं खाया।"

आरव की यह बात सुनकर सुनीता का सीना चौड़ा हो गया। एक औरत के लिए इससे बड़ी तारीफ क्या हो सकती थी कि कोई पुरुष उसके हाथ के बने खाने की इतनी आत्मीयता से सराहना करे। वह खुशी से झूम उठी और अपनी पतली उंगलियों से अपने बालों की लट को कान के पीछे सरकाते हुए बोली, "बस, फिर तो रोज मेरे ही हाथ का खाना खाना पड़ेगा तुम्हें। अब से तुम्हारी पसंद-नापसंद का ख्याल रखना मेरी जिम्मेदारी है।"

आरव ने चाय का कुल्हड़ उठाया और बहुत धीरे से पूछा, "सुनीता... आप अकेली रहती हैं इस बड़े से घर में? कोई और नहीं है आपके साथ?"

यह सवाल सुनते ही सुनीता की आंखों में एक पल के लिए अतीत की कोई पुरानी, काली परछाईं लहराई, लेकिन उसने तुरंत मुस्कान से उसे ढक लिया। उसने अपनी ढली हुई कमर को कुर्सी की पीठ से टिकाया, जिससे उसकी सुडौल छाती और अधिक उभर आई।
"कोई नहीं है आरव..." सुनीता की आवाज में थोड़ा सा अकेलापन और बहुत सारा ठहराव था, "सालों से यह घर ऐसा ही शांत था। लेकिन आज... आज पहली बार मुझे इस मेज पर किसी के साथ बैठकर नाश्ता करने का अहसास इतना खूबसूरत लग रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे इस वीरान घर में कोई रोनक लौट आई हो।"

आरव सुनीता के शब्दों में छुपी उस प्यास और अकेलेपन की गहराई को महसूस कर सकता था। उसने अपनी मेज पर रखी हथेली को थोड़ा आगे बढ़ाया और सुनीता की उंगलियों को हल्के से छू दिया।

"अब आप अकेली नहीं हैं," आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा।

सुनीता का दिल उस जरा से स्पर्श से धक से रह गया। उसके जिस्म में एक ककंपकंपी दौड़ गई। उसने अपनी थर्मामीटर सी गर्म हथेली से आरव का हाथ थाम लिया।
"इसीलिए कह रही हूँ," सुनीता ने अपने होंठों को थोड़ा काटकर नशीले अंदाज में कहा, "आज तुम मेरे साथ ही स्कूल चल रहे हो। मैं तुम्हें इस घर में अकेला छोड़कर एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठ पाऊंगी। वहां मेरे कमरे में बैठना, जब मुझे छुट्टी मिलेगी, मैं आकर तुम्हारे पास बैठूंगी... मंजूर है?"

आरव ने सुनीता के इस मीठे अधिकार और उसकी आंखों में उमड़ती अनजानी वासना व अपनापे को देखा। वह चाहकर भी मना नहीं कर पाया। उसने हल्के से सिर हिला दिया, और सुनीता के चेहरे पर एक ऐसी दिलकश मुस्कान खिल उठी जिसने पूरे कमरे को एक अलग ही मदहोश कर देने वाले अहसास से भर दिया।


रसोई में बनी उस छोटी सी लकड़ी की मेज पर धूप की सुहानी सुनहरी किरणें खिड़की की जाली से छनकर आ रही थीं। धूप की वे लकीरें सीधे सुनीता के सादे, मगर बेहद सलीके से पहने गए कपड़ों पर पड़ रही थीं।
सुनीता के होंठों पर वही नशीली, मद्धम सी मुस्कान तैर रही थी। उसने पराठे का एक छोटा सा, नरम टुकड़ा तोड़ा, उसे गाढ़े दही में हल्का सा डुबोया और बड़े नजाकत से अपने गुलाबी होंठों के बीच रख लिया। चबाते हुए उसने अपनी गहरी, कजरारी आंखों से नटखट अंदाज में आरव की तरफ देखा—

"वैसे... रात में नींद कैसी आई तुम्हें?"

आरव ने चाय का कुल्हड़ मेज पर वापस रखा। उसके भीगे बालों की एकाध बूंदें अब भी उसकी सुडौल गर्दन पर ठहरी हुई थीं। उसने थोड़ा संकोच करते हुए अपनी नजरें झुका लीं, "अब... रात को थोड़ा नींद देर से आई, इसलिए शायद सुबह इतनी देर तक सोता ही रह गया।"
सुनीता यह सुनकर अपनी सुराहीदार गर्दन थोड़ा पीछे करके खिलखिलाकर मुस्कुरा पड़ी। उसकी हंसी में एक अजीब सी खनक थी, जैसे शांत रात में कोई जलतरंग बज उठा हो। वह हंसी सीधे आरव के सीने में उतर गई।
"वैसे, नींद तो कल रात मुझे भी ठीक से नहीं आ रही थी," सुनीता ने अपनी नशीली निगाहों को आरव के गठीले कांधों पर टिकाते हुए कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी गर्माहट और अनजाना सा खिंचाव था।
फिर अचानक उसकी आवाज थोड़ी गंभीर और संजीदा हो गई। उसने आरव के चेहरे की रेखाओं को ध्यान से पढ़ा और बोली, "वैसे आरव... क्या तुम्हें अपने बारे में कुछ भी याद आया? अपने घर, अपनी पढ़ाई या परिवार के बारे में कोई छोटा सा धागा भी दिमाग में पकड़ाया?"
यह सवाल सुनते ही आरव का थोड़ी देर पहले खिलता हुआ चेहरा अचानक बुझ सा गया। उसकी आंखों में वही पुराना खौफनाक सन्नाटा और खालीपन लौट आया। उसकी उंगलियां मेज पर रखे कपड़े को कसकर भींचने लगीं।

सुनीता से आरव की यह बेबसी और लाचारी बर्दाश्त नहीं हुई। 42 बरसों से जिस दिल में सिर्फ अनुशासन की सख्ती थी, वहां इस वक्त सिर्फ और सिर्फ आरव के लिए तड़प उमड़ पड़ी थी। उसने बिना एक पल गंवाए मेज पर रखा आरव का मजबूत, गठीला हाथ अपने दोनों कोमल, थर्मामीटर से गर्म हाथों में थाम लिया। सुनीता की मखमली हथेलियों का वह स्पर्श आरव के भीतर तक ठंडक पहुंचा गया।

"नहीं... मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा," आरव ने एक भारी और लंबी सांस खींचते हुए कहा। उसकी उंगलियां खुद-ब-खुद सुनीता की हथेली की गर्माहट में खो जाने लगीं, "बस वो काली खौफनाक रात... बारिश का शोर... और लोहे के टकराने के साथ चीखते हुए लोगों की आवाजें ही दिमाग में किसी खौफनाक सपने की तरह गूंज रही हैं।"

"कोई बात नहीं आरव... तुम परेशान मत हो," सुनीता ने बेहद आत्मीयता से उसकी उंगलियों को सहलाते हुए दिलासा दिया। उसके स्पर्श में एक मां का दुलार भी था और एक स्त्री का अनजाना समर्पण भी।

"धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। हमें एक बार पुलिस स्टेशन में भी खबर करनी होगी, ताकि अगर तुम्हारे परिवार वाले तुम्हें ढूंढ रहे हों तो उन्हें कम से कम इतना पता चल सके कि तुम सुरक्षित हो। और हां, किसी अच्छे शहर के डॉक्टर को भी दिखाएंगे ताकि तुम्हारी याददाश्त जल्दी वापस आ सके। लेकिन..." सुनीता ने आरव की आंखों में आंखें डालते हुए अपनी पकड़ थोड़ी मजबूत की, "जब तक तुम पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते या तुम्हें सब याद नहीं आ जाता, तुम बेफिक्र होकर मेरे पास रहो। यह तुम्हारा ही घर है... समझे?"

आरव ने सुनीता के इस बेपनाह और निस्वार्थ दुलार को देखा। उसके वीरान पड़े जीवन में यह औरत किसी फरिश्ते की तरह आई थी। फिर उसके मन में एक व्यावहारिक दुविधा कौंधी। उसने थोड़ा झिझकते हुए, संकोच भरे अंदाज में पूछा—

"अच्छा... अगर हम बाहर जा रहे हैं, स्कूल जा रहे हैं... तो मैं सबके सामने आपको क्या कहूंगा? दीदी??"

'दीदी' शब्द सुनते ही सुनीता जोर से हंस पड़ी। उसकी साड़ी का पल्लू एक बार फिर उसके सुडौल कंधे से ढलक कर नीचे गिर गया, और उसकी छाती का ढला हुआ उभार चांदनी सा दमक उठा। रसोई की दीवारें उसकी हंसी की गूंज से महक उठीं।

"अरे बुद्धू! मेरी उम्र अब दीदी कहलाने की नहीं रही," सुनीता ने अपने गालों पर झूलती लट को बड़े नजाकत से कान के पीछे सरकाते हुए कहा।

आरव ने सचमुच चौंककर उसे सर से पांव तक देखा। सुबह की उस निखरी धूप में सुनीता का दमकता गोरा रंग, उसकी सुराहीदार गर्दन, ढली हुई पतली कमर और गठीला, आकर्षक बदन कहीं से भी ढलती उम्र की चुगली नहीं कर रहा था। उसकी एक-एक हरकत में किसी नवयौवना सी ताजगी बिखरी पड़ी थी।

"अरे क्या बात करती हैं आप!" आरव की नजरें सुनीता की सुडौल काया पर जम कर रह गईं, "आप तो अभी मुझसे बस थोड़ी सी ही बड़ी लगती हैं। अगर मेरी कोई सगी बड़ी बहन होती, तो कसम से बिल्कुल आपके जैसी ही खूबसूरत और हसीन होती!"

सुनीता ने अपनी पलकें झुका लीं। उसके गालों पर एकदम से हया की लाली दौड़ गई। 42 साल की उम्र तक जिसने कभी किसी मर्द की तारीफ का एक लफ़्ज़ अपने करीब नहीं आने दिया था, आज एक 22 साल के गठीले, खूबसूरत युवा मर्द के मुंह से अपने हुस्न का ऐसा कसीदा सुनकर उसका कुंवारा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसके सीने की गति तेज हो गई।

उसने अपनी छाती पर पल्लू को दोबारा संभालते हुए और अपनी रंगत छुपाते हुए कहा, "बड़े छांट हो तुम तो! बातों में फंसाना अच्छी तरह जानते हो... अच्छा बताओ, फिर क्या बोलोगे मुझे?"

आरव थोड़ा गंभीर होकर सोचने लगा। उसने अपनी ठोड़ी पर हाथ रखा, "अम्म... 'मां' तो मैं आपको बोल नहीं सकता क्योंकि वो बहुत अलग अहसास होता है... और 'आंटी' कहना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। आंटी शब्द बहुत पराया और सूखा सा लगता है।"
सुनीता ने अपनी चाय का आखिरी घूंट लिया और अपनी नशीली आंखों से उसे देखते हुए एक बहुत ही व्यावहारिक सुझाव दिया—

"एक काम करो... फिलहाल तुम मुझे 'मौसी' बोलना। मैं गांव वालों और स्कूल के बाकी मास्टरों को बता दूंगी कि तुम मेरी दूर की बहन के बेटे हो, जो शहर से मेरे पास कुछ दिन रहने आया है। इससे कोई फालतू के सवाल भी नहीं उठाएगा और हमारा रिश्ता भी सबको साफ रहेगा।"

आरव के मासूम चेहरे पर एक गहरी राहत भरी मुस्कान बिखर गई। उसने सिर हिलाया, "हां! यह बिल्कुल सही रहेगा... मौसी।"

'मौसी' शब्द जब आरव के होंठों से निकला, तो सुनीता के भीतर एक अजीब सी मीठी गुदगुदी हुई। उसने मन ही मन सोचा—रिश्ता चाहे जो भी नाम ले ले, लेकिन इस घर की फिजाओं में जो अनजाना नशा घुल चुका था, उसे रोक पाना अब शायद किसी के बस में नहीं था।


सुनीता ने घर के मुख्य दरवाजे पर पीतल का भारी ताला लगाया और उसकी चाबी अपनी साड़ी के पल्लू के छोर में नजाकत से बांध ली। सुबह की गुनगुनी धूप अब थोड़ी तीखी होने लगी थी, और रात की बारिश के बाद गांव की सोंधी मिट्टी की महक चारों तरफ महक रही थी।
सुनीता आगे-आगे चल रही थी और आरव उसके पीछे। सुनीता का हर कदम उसकी चाल में एक अनजानी लचक पैदा कर रहा था। उसकी सूती साड़ी के पल्लू से झलकती सुराहीदार पीठ और ढली हुई कमर धूप में और भी निखर रही थी। आरव की नजरें चुपचाप उसकी उसी कुदरती खूबसूरती पर टिकी थीं। जब भी रास्ते में कोई गड्ढा या कीचड़ आता, सुनीता रुक जाती और मुड़कर आरव का हाथ थाम लेती।

तभी, गांव की मुख्य सड़क से गुजरते वक्त रास्ते में एक नया मोड़ आया।

सड़क किनारे बनी एक पुरानी चाय की दुकान के पास गांव के कुछ रसूखदार और शोहदे किस्म के लोग बैठे थे। उनमें से एक था राकेश—गांव के पूर्व सरपंच का बेटा, जो सालों से सुनीता पर गंदी नजर रखता आया था। सुनीता ने हमेशा उसे दुत्कार कर भगाया था।

आज जब उसने सुनीता को 42 साल की उम्र में किसी 22 साल के नौजवान का हाथ थामे, इस तरह मुस्कुराते हुए चलते देखा, तो उसकी आंखों में जलन और हवस का एक खौफनाक तूफान उठ खड़ा हुआ।

राकेश ने चाय का कुल्हड़ नीचे पटका और जानबूझकर बीच रास्ते में आकर खड़ा हो गया। उसके साथ उसके दो गुर्गे भी थे।

"अरे वाह, मैडम जी!" राकेश ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए गंदी मुस्कान के साथ कहा, "आज सूरज किधर से निकला है? जो औरत आज तक किसी मर्द की परछाईं से भी दूर भागती थी, वो आज इस चीकने लौंडे का हाथ थामकर सड़क पर निकल रही है? कौन है यह चिकना, सुनीता जी? कहीं शहर से नया शौक तो नहीं पाल लिया?"

राकेश के गुर्गे जोर-जोर से हंसने लगे। रास्ते पर चलते गांव वाले भी रुककर देखने लगे।
सुनीता का खून खौल उठा। उसके गाल गुस्से से लाल हो गए, लेकिन उसने संयम बनाए रखा। वह आरव को किसी मुसीबत में नहीं डालना चाहती थी।

"राकेश! अपनी जबान को लगाम दो और हमारा रास्ता छोड़ो," सुनीता ने कड़क आवाज में कहा, "यह मेरी बहन का बेटा आरव है, शहर से मेरे पास आया है।"

"ओहो! बहन का बेटा?" राकेश ने एक कदम और आगे बढ़ाकर आरव को नीच नजरों से घूरा, "झांसा किसे दे रही हो सुनीता? हमें तो कुछ और ही चक्कर लग रहा है। इस उम्र में इतनी जवानी चढ़ी है कि अब घर में..."

राकेश अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि अचानक आरव की आंखें एकदम बदल गईं।
आरव, जो अब तक बेहद शांत, मासूम और गुमसुम लग रहा था, उसकी आंखों में एक खौफनाक और अजनबी आक्रामकता उतर आई। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके भीतर सोए हुए एक ताकतवर और खतरनाक इंसान को जगा दिया हो।

बिना एक पल की देरी किए, आरव ने राकेश की गर्दन अपने गठीले और मजबूत हाथ से दबोच ली!
आरव की पकड़ इतनी खौफनाक और कसकर थी कि राकेश की आंखें बाहर आने लगीं और उसकी आवाज हलक में ही अटक गई। राकेश के दोनों गुर्गे डर के मारे दो कदम पीछे हट गए। आरव के शरीर की मांसपेशियां तन गई थीं और उसका पूरा बदन एक शिकारी की तरह कड़क हो गया था।

"अगर दोबारा इसके लिए एक भी गलत शब्द बोला... तो यहीं मिट्टी में गाड़ दूंगा," आरव की आवाज में एक ऐसी कड़क और खौफनाक भारीपन था जो इससे पहले सुनीता ने भी कभी नहीं सुनी थी।


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सुनीता हक्की-बक्की रह गई। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही मासूम लड़का है जो सुबह तक उसकी गोद में सिर रखकर रो रहा था। लेकिन आरव के इस खतरनाक तेवर को देखकर सुनीता का दिल एक अजीब से अहसास और सुकून से भर गया—सालों बाद किसी मर्द ने उसके सम्मान के लिए इस तरह ढाल बनकर खड़े होने की हिम्मत दिखाई थी।

सुनीता ने घबराकर तुरंत आरव की चौड़ी बांह को थाम लिया, "आरव! छोड़ो उसे... छोड़ो आरव, हमें देर हो रही है!"

सुनीता की आवाज सुनते ही, आरव का गुस्सा पल भर में गायब हो गया। उसने राकेश को झटके से पीछे धकेला, जिससे राकेश सीधा रास्ते के कीचड़ में जा गिरा। आरव ने फिर से वही मासूम नजरें सुनीता की तरफ घुमाईं, जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो।
राकेश खौफ और अपमान से कांपता हुआ जमीन से उठा और दूर हटकर चीखा, "याद रखना सुनीता! इस लौंडे का गुरूर मैं बहुत जल्द तोड़ूँगा!"

आरव ने राकेश की धमकी पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने आहिस्ते से सुनीता का कांपता हुआ हाथ अपने हाथ में ले लिया और बेहद प्यार से बोला, "चलिए मौसी... स्कूल चलते हैं।"

सुनीता ने आरव के उस मजबूत और सुगठित शरीर को देखा। उसके मन में एक बड़ा सवाल कौंध गया— आखिर कौन है यह आरव? इस मासूमियत के पीछे कौन सा खौफनाक और ताकतवर अतीत छिपा है, जो अचानक एक पल में बाहर आ जाता है?


राकेश को कीचड़ में धकेलने के बाद जब आरव ने दोबारा सुनीता का हाथ थामा, तो सुनीता की उंगलियां हल्की सी कांप रही थीं। दोनों पगडंडी पर आगे बढ़ने लगे, लेकिन सुनीता का ध्यान अब रास्ते पर कम और अपने बगल में चल रहे इस 22 साल के नौजवान पर ज्यादा था।

सुबह का वह मासूम, बेबस आरव जो उसकी गोद में सिर छुपाकर सुकून ढूंढ रहा था... और अभी कुछ ही मिनट पहले राकेश की गर्दन दबोचने वाला वह खौफनाक, आक्रामक मर्द—दोनों एक ही इंसान थे! सुनीता के कुंवारे और संयमित दिल में आरव के इस मर्दाना तेवर ने एक अजीब सी सिहरन और गहरा कौतूहल भर दिया था।

थोड़ी दूर आगे जाकर जब गांव की चहल-पहल थोड़ी कम हुई और नीम के घने पेड़ों की छांव आई, तो सुनीता के कदम खुद-ब-खुद थम गए। उसने झटके से आरव का हाथ छोड़ा और उसके ठीक सामने आकर खड़ी हो गई।
सुबह की गुनगुनी धूप नीम के पत्तों से छनकर सुनीता के दमकते चेहरे और उसकी सुराहीदार गर्दन पर पड़ रही थी। उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसने अपनी कजरारी, नशीली आंखों से सीधे आरव की गहरी आंखों में झांका।

"आरव..." सुनीता की आवाज में आश्चर्य, चिंता और एक अनजाना खिंचाव मिला हुआ था, "अभी तुमने जो किया... वो क्या था?"

आरव ने बिल्कुल बच्चों जैसी मासूमियत से अपनी पलकें झपकाईं। उसकी आंखों से वह खौफनाक गुस्सा पल भर में गायब हो चुका था, जैसे वह कोई सपना रहा हो।

"क्या हुआ मौसी?" आरव ने बड़े सीधेपन से पूछा।
"क्या हुआ? तुम पूछ रहे हो क्या हुआ?" सुनीता ने एक कदम और करीब आते हुए बेहद धीमी लेकिन कड़क आवाज में कहा, "तुमने देखा कि तुमने राकेश को कैसे पकड़ा था? तुम्हारी पकड़, तुम्हारा वो रूप... आरव, कोई आम लड़का किसी तगड़े मर्द की गर्दन इतनी आसानी से एक हाथ से नहीं दबोच सकता। ऐसा लग रहा था जैसे तुम्हें किसी को नुकसान पहुंचाने की, लड़ने की बहुत गहरी ट्रेनिंग मिली हो!"

सुनीता ने अपनी उंगलियां आरव के गठीले, कड़क सीने पर रखीं—जहाँ अभी भी उसकी मांसपेशियों का कसाव साफ महसूस हो रहा था।

"आरव, सच-सच बताओ... क्या तुम्हें सचमुच कुछ याद नहीं है? जब तुमने उस गुंडे की गर्दन पकड़ी थी, तब तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा था? क्या तुम्हें अपनी पुरानी जिंदगी का कोई हिस्सा, कोई धुंधली सी तस्वीर नजर आई?" सुनीता ने तड़पकर पूछा, उसकी उंगलियां आरव के सीने पर और कस गईं।

आरव ने अपना सिर झुका लिया। उसने अपने दोनों हाथों से अपने सिर को दबाया, जैसे उसके दिमाग में कोई भारी हलचल हो रही हो। उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें छलक आईं।

"मुझे... मुझे कुछ याद नहीं आ रहा मौसी," आरव की आवाज फिर से भररा गई, "लेकिन जब उस आदमी ने आपके लिए वो गंदे शब्द बोले... तो मेरे अंदर कुछ फटा। मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मेरी सबसे कीमती चीज को छीन रहा हो। मुझे बस इतना पता था कि मुझे आपको बचाना है... चाहे उसके लिए मुझे किसी की जान ही क्यों न लेनी पड़े।"


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आरव ने अचानक अपनी नजरें उठाईं और सीधे सुनीता की आंखों में देखा। उसकी नजरों में जो बेपनाह दीवानगी और रक्षा करने का जुनून था, उसने सुनीता के पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया।

42 साल की उम्र तक सुनीता ने हमेशा मर्दों को अपनी हवस पूरी करने के लिए करीब आते देखा था। लेकिन आज... आज पहली बार किसी मर्द ने उसकी रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाने का वह खौफनाक रूप दिखाया था। आरव के उन शब्दों ने सुनीता के भीतर सालों से दबे स्त्रीत्व को जागृत कर दिया।

सुनीता का गुस्सा पल भर में पिघलकर एक बेपनाह दुलार में बदल गया। उसने अपने दोनों कोमल हाथ आरव के गालों पर रख दिए। उसकी उंगलियों की ठंडक आरव के माथे के पसीने को सहलाने लगी।

"पगले..." सुनीता ने बेहद नशीली और कांपती हुई आवाज में कहा, उसके होंठ आरव के चेहरे के बेहद करीब थे, "तुम्हें अंदाजा भी है कि तुम मेरे लिए क्या करने जा रहे थे? अगर उस गुंडे को कुछ हो जाता तो?"
"आपके लिए कुछ भी मौसी," आरव ने बिना किसी झिझक के सुनीता की पतली कमर पर अपने मजबूत हाथ रख दिए।

चांदनी रात की तरह, दिन के उजाले में भी उन दोनों के जिस्म एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए थे। सुनीता के गालों पर हया की गहरी लाली छा गई, लेकिन उसने आरव को खुद से दूर नहीं किया। आरव की मजबूत बांहों का वह स्पर्श उसे एक अजीब सी सुरक्षा और सिहरन का अहसास करा रहा था।

"अच्छा बाबा ठीक है," सुनीता ने अपनी नशीली पलकें झुकाते हुए मुस्कुराकर कहा, "अब चलो... स्कूल के लिए देर हो रही है। पर याद रखना, जब तक हम तुम्हारा सच नहीं जान लेते, तुम्हें अपने इस गुस्से पर थोड़ा काबू रखना होगा... समझे?"

आरव ने मासूमियत से सिर हिला दिया। सुनीता ने उसकी उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसाईं और दोनों एक बार फिर स्कूल की पगडंडी पर आगे बढ़ गए, जबकि सुनीता के दिल में आरव के इस रहस्यमयी और ताकतवर अतीत का सवाल और गहरा हो चुका था।
Nice and superb update....
 
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