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Incest तलाश

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Pirate100

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Update 13

चरम सुख और मोहब्बत की उस खुशनुमा सुबह के बाद कमरे का माहौल किसी अनूठे सुकून से भर चुका था। सुनीता के चेहरे पर एक ऐसी अलौकिक चमक और हया छाई हुई थी, जो उसके बरसों के अकेलेपन को धो चुकी थी। वह अपने भीगे होंठों पर एक मंद मुस्कान सजाए, दिल में बेपनाह खुशी लिए हवेली के पिछले हिस्से में बने स्नानघर की तरफ चली गई।

दूसरी तरफ, आरव बिस्तर से उठकर पहले ही तरोताज़ा हो चुका था। उसने अपनी कसरती देह पर धोती-कुर्ता कसा और मेले के मैदान की तरफ निकल पड़ा। आज दंगल से ठीक एक दिन पहले अखाड़े की अंतिम तैयारियों का मुआयना करना बेहद ज़रूरी था। इसके साथ ही उसे सियादेवी से भी काम के सिलसिले में अहम मुलाकात करनी थी, ताकि कल के विशाल आयोजन की हर बारीक रणनीति को अंतिम रूप दिया जा सके।

जब आरव मेले के मैदान में पहुँचा, तो वहाँ हलचल चरम पर थी। मिट्टी की सुगंध, अखाड़े की छांव और चारों तरफ घूमते पहलवानों के बीच आरव हर व्यवस्था को बहुत गहराई से परख रहा था।

लेकिन सुल्तानपुर की इस शांत दिखती फिज़ा के पीछे, एक बहुत खौफ़नाक बवंडर आकार ले रहा था।

राकेश ने अपने बदले की आग को ठंढा नहीं होने दिया था। उसने आरव को हमेशा-हमेशा के लिए रास्ते से हटाने का 'फुल प्लान' तैयार कर लिया था—एक ऐसी साजिश, जिसकी भनक न तो आरव को थी, न सियादेवी को, और न ही गाँव के किसी अन्य शख्स को। राकेश की यह योजना इतनी सटीक और गुप्त थी कि अखाड़े की पावन मिट्टी कल खून से लाल होने वाली थी।

उधर, ज़मींदार वीरदेव राणा का जो भी स्वार्थ या राजनीतिक दांव-पेच था, उसका काम अब पूरी तरह मुकम्मल हो चुका था। राणा को अब गाँव की राजनीति से ज़्यादा दंगल के उस खूनी अंजाम का इंतज़ार था। वह बेफ़िक्री से अपने हुक्के की घूंट खींचते हुए बस उस कल के ऐतिहासिक दंगल की घड़ी का इंतज़ार कर रहा था, जहाँ मोहरे सेट हो चुके थे और बिसात पूरी तरह बिछ चुकी थी।


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मेले का विशाल मैदान दंगल की पूर्व संध्या पर ढोल की थाप, लाउडस्पीकरों के शोर और पहलवानों की चहल-पहल से पूरी तरह से गूँज रहा था। मिट्टी के अखाड़े की धूप में तैरती सोंधी महक के बीच आरव हर एक इंतज़ाम पर पैनी नज़र रखे हुए था।

अखाड़े के मुख्य मंच के पास सियादेवी अपने समर्थकों और आयोजकों के साथ खड़ी तैयारियों की समीक्षा कर रही थीं। आरव को अपनी ओर आते देख उनके चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान तैर गई।

"आरव, अखाड़े की मिट्टी की ढलाई और सुरक्षा के सारे इंतज़ाम मुकम्मल हो चुके हैं," सियादेवी ने अपनी गंभीर, प्रभावशाली आवाज़ में कहा। "कल का दंगल सिर्फ कुश्ती का मुकाबला नहीं है, यह सुल्तानपुर के स्वाभिमान और हमारे वर्चस्व की लड़ाई है। गाँव की जनता की निगाहें तुम पर हैं।"

आरव ने धीर-गंभीर अंदाज़ में सिर हिलाया, "सियादेवी जी, मैदान की तैयारी में कोई कमी नहीं रहेगी। अखाड़े की पावन मिट्टी पर जो भी पहलवान उतरेगा, उसे नियम और सम्मान के साथ ही लड़ना होगा। आप निश्चिंत रहें, कल का दिन सुल्तानपुर याद रखेगा।"

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दोनों के बीच आयोजन के नियमों, अतिथियों की सुरक्षा और पहलवानों के रहने-खाने की व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा हो ही रही थी कि आरव की तेज़, पारखी नज़रों ने मैदान के दूर स्थित एक अंधेरे कोने में हलचल भांप ली।
अखाड़े के पिछले हिस्से में, जहाँ दंगल के पारंपरिक औजार और भारी गदाएँ रखी हुई थीं, राकेश अपने दो भरोसेमंद गुर्गों के साथ बहुत गुप्त अंदाज़ में फुसफुसा रहा था। राकेश के चेहरे पर एक कुटिल, जहरीली मुस्कान थी और उसके इशारे सीधे उस मुख्य अखाड़े की ओर थे जहाँ कल आरव को उतरना था।

राकेश ने अपने कुरते की ओट से एक छोटी, कांच की शीशी निकाली—जिसमें एक गाढ़ा, जहरीला रसायन चमक रहा था। उसने अपने गुर्गे को इशारा करते हुए उस शीशी को पहलवानों के मालिश वाले तेल और अखाड़े की एक खास कोने की मिट्टी में मिलाने का निर्देश दिया, ताकि मुकाबले के दौरान आरव के शरीर पर लगते ही उसकी आँखों और त्वचा में असहनीय जलन होने लगे और वह मुकाबले के लायक न रहे। अंततः यदि सारे प्लान फेल हो जाये तो कुछ गुंडे रहेंगे।

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सियादेवी का ध्यान भले ही कागज़ी तैयारियों पर था, लेकिन आरव ने राकेश और उसके गुर्गों की उस संदिग्ध गतिविधि को दूर से ही ताड़ लिया था। भले ही उसे पूरी साज़िश का सटीक विवरण नहीं पता था, पर राकेश की आँखों की वह खूनी चमक यह साफ़ बयाँ कर रही थी कि कल का दंगल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक जानलेवा बिसात बनने जा रहा है।

वीरदेव राणा अपनी रोबीली चाल के साथ आरव की तरफ बढ़ा। उसके चेहरे पर हमेशा रहने वाला जमींदारिया बड़प्पन और शांति थी। आरव के पास पहुँचकर राणा ने उसकी चौड़ी छाती और मजबूत कांधों को बड़े गौर से देखा, फिर हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी जेब से एक चमकदार विजिटिंग कार्ड निकाला।
"तुम बहुत मेहनती और कड़े मिजाज के बंदे हो, आरव," राणा ने भारी आवाज़ में कार्ड आरव की तरफ बढ़ाते हुए कहा। "जिंदगी में कभी भी तुम्हें लगे कि मेरी जरूरत है, या सुल्तानपुर से बाहर अपनी ताकत की सही कीमत चाहिए, तो ये रही मेरी कंपनी का कार्ड। सीधे राजस्थान आ जाना, तुम्हारे लिए दरवाजे हमेशा खुले रहेंगे।"

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आरव ने धीर-गंभीर मुस्कान के साथ कार्ड थाम लिया और बहुत अदब से सिर झुकाकर उसे स्वीकार किया।
राणा ने आरव के कंधे पर अपना भारी हाथ थपथपाते हुए आगे जोड़ा, "हो सकता है मैं कल की कुश्ती शुरू होने से पहले ही यहाँ से निकल जाऊं। राजस्थान में कुछ बेहद जरूरी और अर्जेंट काम आ गया है, इसलिए सोचा कि आज ही तुमसे तसल्ली से मिल लूँ।"

इतना कहकर राणा मुड़ा और अखाड़े की सुरक्षा व व्यवस्था के सिलसिले में खड़ी सियादेवी से बात करने आगे बढ़ गया। आरव कार्ड अपनी जेब में रखकर दोबारा मेले के काम-काज देखने में लग गया।

अभी आरव कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि अखाड़े की पुरानी बाउंड्री की ओट में उसे माधव सिंह का जाना-पहचाना चेहरा नज़र आया।

आरव ने बिना कोई शोर किए अपने कदमों की आहट दबाई और चुपके से उस दीवार और पेड़ों के झुरमुट की ओट में पहुँच गया।

आरव अपनी भारी चाल से दीवार की ओट लांघकर सीधे माधव सिंह के ऐन सामने आ खड़ा हुआ। उसके अचानक इस तरह सामने आने से माधव सिंह के कदम ठिठक गए।

"मैं तुम्हें जानता हूँ..." आरव ने अपनी तीखी नीली आँखों को माधव सिंह के चेहरे पर टिकाते हुए बेहद सख्त और भारी आवाज़ में कहा।

माधव सिंह के चेहरे पर पहले तो एक पल के लिए घबराहट की परत उभरी, लेकिन अगले ही पल उसने अपनी उस घबराहट को एक चालाक और बेफ़िक्र हँसी के पीछे छिपा लिया। वह ठहाका लगाते हुए बोला, "अच्छा? कैसे जानते हो मुझे? सुल्तानपुर में तो हर कोई माधव सिंह को जानता है, पर तुम जैसे गुमनाम बंदे से मेरी कोई पहचान हो... ऐसा तो मुझे याद नहीं आता।"

आरव के दिमाग में एक तीखी कौंध उठी। उसकी कनपटी की नसें तिन गईं। सच तो यह था कि आरव को खुद भी याद नहीं आ रहा था कि वह माधव सिंह को कहाँ से और कैसे जानता है। उसका अतीत अब भी घने कोहरे में लिपटा हुआ था, लेकिन माधव सिंह का यह शातिर चेहरा उसके दिलो-दिमाग पर किसी पुरानी, कड़वी याद की तरह दस्तक दे रहा था।

अपनी इस उलझन को छिपाते हुए आरव ने ज़रा भी ढील नहीं दी। वह एक कदम और आगे बढ़ा और माधव सिंह की आँखों में आँखें डालकर बोला, "देखो, तुम मुझे कितना भी गुमराह करने की कोशिश कर लो... लेकिन मैं बहुत जल्द अपनी पूरी याददाश्त और सच्चाई के साथ वापस आऊँगा।"

माधव सिंह के चेहरे की हँसी एक पल को रुकी, फिर उसने कुटिलता से मुस्कुराते हुए आरव के कंधे को घूरा और बिना कुछ और कहे हँसते हुए आगे निकल गया।
आरव वहीं खड़ा रहा। उसका मन गहराइयों में गोते लगा रहा था। वह बुरी तरह से उलझन (कंफ्यूज) में था—आखिर माधव सिंह का यह चेहरा उसे इतना जाना-पहचाना क्यों लग रहा था? क्या उसका खोया हुआ अतीत सुल्तानपुर के इसी बवंडर और माधव सिंह के काले कारनामों से जुड़ा हुआ था? सवाल बहुत थे, लेकिन जवाब पाने के लिए कल का दंगल ही एकमात्र ज़रिया बनने वाला था।

आरव अपनी धड़कनों को शांत करने की कोशिश करते हुए देर तक उसी जगह खड़ा रहा। दिमाग की नसों में रह-रहकर एक तीखा दर्द उठ रहा था—जैसे बंद दरवाजों के पीछे कोई भूला-बिसरा सच दस्तक दे रहा हो। माधव सिंह की वह बेफ़िक्र हँसी और उसकी शातिर आँखों की चमक साफ़ बता रही थी कि आरव का अतीत सिर्फ खोया हुआ नहीं था, बल्कि उसे जानबूझकर छिपाया गया था।

"आरव!"

पीछे से आई एक जानी-पहचानी, मखमली आवाज़ ने उसकी उलझन की लड़ी को तोड़ा। आरव ने मुड़कर देखा, सुनीता मेले के काम-काज के बहाने उसके पास खिंची चली आई थी। नहाकर आने के बाद उसके चेहरे पर सुबह के उस बेबाक प्यार और तृप्ति का निखार अब भी दमक रहा था। भीगे बालों की एक लट उसके गाल को छू रही थी और आँखों में आरव के लिए बेपनाह फिक्र थी।


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"तुम यहाँ इस तरह उदास क्यों खड़े हो? क्या बात है आरव?" सुनीता ने उसके कसरती हाथ पर अपनी कांपती हथेली रखते हुए धीमे से पूछा।

आरव ने एक गहरी सांस ली और अपनी तीखी नीली आँखों में तैरते सवालों को छिपाते हुए सुनीता के चेहरे को देखा। उसने बहुत नरमी से सुनीता की उंगलियों को अपनी मजबूत मुट्ठी में भींच लिया।

"कुछ नहीं सुनीता... बस इस मेले की भीड़ में कुछ चेहरे ऐसे हैं जो मुझे याद दिलाते हैं कि मैं कौन हूँ, लेकिन नाम और वजह तक पहुँचने नहीं देते।" आरव ने भारी आवाज़ में कहा।

सुनीता ने उसकी छाती पर सिर टिकाया और हौसले से बोली, "अतीत चाहे जो भी हो आरव, आज तुम मेरे हो। और कल का दंगल तुम्हारे नाम होगा। किसी साजिश को अपने रास्ते में मत आने देना।"

आरव ने सिर हिलाया। उसने अपनी जेब में रखे वीरदेव राणा के उस विजिटिंग कार्ड को महसूस किया, फिर दूर दिखते उस अखाड़े की मिट्टी की तरफ देखा जिसे राकेश और माधव सिंह ने ज़हरीली साजिशों से दूषित करने का प्लान बनाया था।

सूरज ढलने लगा था और सुल्तानपुर पर दंगल की पूर्व संध्या का आखिरी सन्नाटा छा रहा था। आरव को यह अहसास हो चुका था कि कल का मुकाबला सिर्फ कुश्ती जीतने का नहीं, बल्कि राकेश की साजिश को नाकाम करने और अपने खोए हुए अतीत के दरवाजों को उखाड़ फेंकने का खूनी युद्ध बनने वाला था।

संध्या की ढलती लाली के साथ ही घर के रसोईघर में चूल्हे की आग सुलग उठी थी। बाहर सुल्तानपुर में छा रहा सन्नाटा, दंगल की खौफ़नाक साजिशें और अतीत के उलझे हुए सवाल—आरव जैसे ही सुनीता के करीब पहुँचता, सब कुछ एक झटके में धुंधला पड़ जाता। सुनीता की मौजूदगी उसके लिए किसी ऐसे सुकून की तरह थी, जहाँ दुनिया का हर तनाव दूर हो जाता था।

रसोई में मिट्टी का चूल्हा जल रहा था, जिसकी धीमी-धीमी आंच कमरे में एक हल्की गर्माहट फैला रही थी। सुनीता चूल्हे के पास बैठी बहुत सादगी और फुर्ती से रोटियाँ बेल रही थी। उसकी नीली साड़ी का पल्लू कमर में खुंसा हुआ था और ढीले-ढाले ब्लाउज में ढकी उसकी दोनों भारी चूचियाँ (स्तन) बेलन की हर लयबद्ध आवाज़ के साथ आहिस्ते-आहिस्ते ढुलक रही थीं।


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चूल्हे की आग का लाल-सुनहरा प्रकाश उसके गोरे गालों पर पड़ रहा था, जिससे उसकी रंगत और निखर आई थी। उसकी कनपटी से खुली बालों की एकाध रेशमी लट बार-बार हवा और उसकी हरकतों के साथ खिसककर उसके लाल-गुलाबी गालों को चूम जाती।

आरव चौखट से टिका खड़ा होकर अपनी तीखी नीली आँखों से अपनी प्रेमिका के इस रूपवती और मनमोहक दृश्य को एकटक ताक रहा था। चूल्हे की आंच, रोटी बेलने की वह लचक और सुनीता की यह अनगढ़ सादगी उसके भीतर सोए कामदेव को जगाने के लिए काफी थी।

सुनीता की यह खूबसूरती देखते ही आरव की नसों में खून का बहाव उफान मारने लगा। उसकी सूती पैंट के कड़े कपड़े के नीचे से उसका विशाल, 8 इंच का कड़ा और प्रचंड लंड फिर से पूरी ताकत के साथ तनकर खड़ा हो गया। पैंट के ऊपर उभार इतना साफ़ और सख्त था कि कपड़े में खिंचाव आ चुका था।

सुनीता ने तवे पर रोटी डालते हुए जैसे ही नज़रें उठाईं, उसने आरव को इस तरह अपनी तरफ एकटक निहारते पाया। आरव की आँखों का वह नशीला और कामुक अंदाज़ देखकर सुनीता के गाल मारे शर्म के चूल्हे की आंच से भी ज्यादा लाल हो गए।

और फिर उसकी नज़र आरव के नाभि से नीचे सूती पैंट में तने हुए उस 8 इंच के विशाल कड़े उभार पर पड़ी। सुबह के बेबाक प्यार की यादें एक झटके में उसकी देह में ताज़ा हो गईं और उसकी पूरी सुराहीदार काया में एक मीठी सिरहन दौड़ गई।


सुनीता ने जैसे ही अपनी कजरारी नज़रें उठाकर आरव के पैंट में उभरे उस विशाल और कड़े तनाव को देखा, उसके हाथ में पकड़ा बेलन एक पल के लिए थम गया। उसके होंठों पर हया और कामुकता से भरी एक मद्धम मुस्कान तैर गई।

"अरे... ऐसे क्या घूर रहे हैं? रोटी जल जाएगी..." सुनीता ने अपनी कांपती आवाज़ में हया समेटते हुए कहा, पर उसकी आँखें आरव के उस बेबाक उभार से हट नहीं पा रही थीं।

आरव बिना एक शब्द बोले चौखट से हटा और अपनी भारी, रोबीली चाल से चलकर सीधे चूल्हे के पास आ बैठा। उसने पीछे से सुनीता को अपनी चौड़ी, कसरती बांहों के घेरे में भींच लिया। उसकी गर्म छाती सुनीता की नग्न पीठ और ब्लाउज की डोरी से आ सटी।


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"रोटी जलती है तो जलने दो, सुनीता... पर तुम्हें इस रूप में देखकर मेरा सब्र जल रहा है," आरव ने उसकी सुराहीदार गर्दन के मोड़ पर अपने गर्म होंठ टिकाते हुए बेहद भारी, नशीली आवाज़ में फुसफुसाया।

"उफ़्फ़... आरव... छोड़िए भी, अभी कोई आ जाएगा..."
सुनीता के हलक से एक कांपती हुई, रसीली सिसकी निकली। लेकिन उसका पूरा बदन आरव के इस आलिंगन में मोम की तरह पिघलने लगा था। आरव की सांसों की तपन जब उसकी गर्दन पर पड़ी, तो सुनीता ने अपनी आँखें मूँद लीं। उसकी बालों की लट जो बार-बार उसके गाल को चूम रही थी, आरव ने अपनी उंगलियों से हटाकर उसके कान के पीछे खिसका दी और अपने होंठ सीधे सुनीता के गुलाबी गालों पर जड़ दिए।

आरव का एक हाथ सुनीता की पतली कमर से खिसकता हुआ ऊपर आया और उसने साड़ी के आंचल को हटाकर उसके ब्लाउज में ढके भारी और उफ़नते वक्ष को अपनी मुट्ठी में थाम लिया। बेलन चलाने की वजह से सुनीता के वक्ष पहले से ही कड़े और गर्म थे। आरव ने मखमली अंदाज़ में उस कड़े उभार को दबाना शुरू किया, जिससे सुनीता के हाथ से अटा आटा वहीं छूट गया।

"अह्ह... आरव... यह रसोईघर है..." सुनीता ने पीछे मुड़कर आरव के कंधे को पकड़ने की कोशिश की, पर उसकी उंगलियाँ आरव के गठे हुए बदन को कसकर भींचने लगीं।

आरव ने सुनीता का रुख अपनी तरफ घुमाया। सुनीता की जांघें खुद-ब-खुद आरव के पैरों के गिर्द फैल गईं। आरव का वह विशाल, 8 इंच का कड़ा लंड अब सीधे सुनीता के पेटिकोट की सरहद से आ सटा था। उस प्रचंड गर्माहट को अपनी जांघों के बीच महसूस करते ही सुनीता की सांसें उखड़ गईं।

आरव ने सुनीता की सुराहीदार ठुड्डी को ऊपर उठाया और अपने गर्म होंठ सीधे उसके रसीले, कांपते होंठों पर टिका दिए। दोनों के होंठों की यह चुंबन इतनी बेबाक और गहरी थी कि चूल्हे पर रखी रोटी तवे पर सिंकती रही और दोनों एक-दूसरे की सांसों और वासना की उस मीठी आंच में पूरी तरह जलते रहे।

चूल्हे की लाल-सुनहरी आग में नहाया वह रसोईघर उस ढलती शाम में दोनों के अनूठे प्यार, समर्पण और कामुक मिलन का सबसे खूबसूरत गवाह बन रहा था।

आरव के उस नशीले चुंबन और बेबाक स्पर्श से जब सुनीता की धड़कनें बेकाबू होने लगीं, तो उसने बड़ी मुश्किल से अपनी सांसों को संभाला। चूल्हे पर रखी रोटी से उठती हल्की महक ने उसे याद दिलाया कि खाना जल सकता है।

सुनीता ने हया से लाल पड़ चुके चेहरे के साथ आरव के कसरती सीने पर अपनी दोनों मखमली हथेलियाँ टिकाईं और उसे आहिस्ते से पीछे धकेल दिया।

"अरे हटिए भी... रोटी जल जाएगी तो क्या खाएंगे?" सुनीता ने अपनी उखड़ी सांसों को संभालते हुए, नखरे भरी मिठास में कहा। "थोड़ा सब्र रखिए, पहले पेट पूजा फिर आपकी यह मनमर्जियां।"

आरव ने एक मंद, नशीली मुस्कान के साथ पीछे हटकर अपनी पैंट के तंग उभार को संभाला। सुनीता ने जल्दी से फुर्ती दिखाते हुए गरम-गरम रोटियाँ सेंकी और कांसे की थालियों में देशी घी से चुपड़ी रोटियाँ, तीखी चटनी और गाढ़ी दाल परोसकर आरव के सामने सजा दी।

रसोई के एक कोने में दोनों लकड़ी के पाटे पर आमने-सामने बैठ गए। लेकिन जो आग चूल्हे में बुझ चुकी थी, वह उन दोनों की निगाहों में अब भी जल रही थी।

खाना खाते वक्त भी रोमांस का यह सिलसिला थमा नहीं। आरव ने पहला निवाला तोड़ा, पर उसे अपने मुँह में डालने के बजाय सुनीता के होंठों के पास ले गया। सुनीता ने कजरारी नज़रों से आरव को देखा और बड़े दुलार से अपनी सुराहीदार गर्दन आगे बढ़ाकर वह निवाला आरव के हाथों से खा लिया। निवाला चबाते हुए उसकी उंगलियाँ जानबूझकर आरव की हथेली को छू गईं।

"अपने हाथ से भी तो खिलाइए..." आरव ने भारी, रसीली आवाज़ में हुक्म जताया।

सुनीता ने शरमाते हुए निवाला बनाया और आरव के मुँह में दिया। जैसे ही आरव ने निवाला अपने मुँह में लिया, उसने सुनीता की गोरी, मखमली उंगलियों को भी अपने होंठों के बीच में दबाकर हल्का सा चूस लिया।

"उफ़्फ़... आरव, उंगलियाँ तो छोड़िए!" सुनीता के हलक से एक रसीली सिसकी निकली, पर उसने अपना हाथ छुड़ाने की कोई खास कोशिश नहीं की।

पाटे पर बैठे-बैठे ही सुनीता ने नीचे से अपने नंगे पैर की उंगलियाँ आगे बढ़ाईं और आरव की -पैंट के ऊपर से उसकी कसरती पिंडली पर रगड़ना शुरू कर दिया। आरव की नीली आँखों में कामदेव का नशा और गहरा गया। आरव ने अपनी टांगों के बीच सुनीता के उस गोरे पैर को कस लिया और ऊपर से अपना हाथ सुनीता की साड़ी के नीचे खिसकाकर उसकी सुराहीदार जांघ की ढलान को आहिस्ते से सहलाने लगा।

रात के उस शांत माहौल में, दीये की मद्धम लौ के सामने गरम-गरम खाना खाते हुए एक-दूसरे को अपने हाथों से निवाले खिलाना, पैरों से अठखेलियां करना और जांघों पर हाथों की नशीली सरसराहट—उन दोनों के इस भोजन के समय को एक बेबाक और मनमोहक रूमानी अनुभव में बदल रहा था।


खाना खत्म होते ही दोनों ने हाथ धोए और घर की पुरानी सीढ़ियों से होते हुए खुली छत की ओर बढ़ गए। रात का सन्नाटा गहरा चुका था और आसमान में नीलम जैसे नीले बादलों के बीच चांद अपनी पूरी रंगत के साथ दमक रहा था। हल्की, ठंडी हवा के झोंके हवेली के कोने-कोने को सहला रहे थे।

आरव ने छत की मुंडेर के पास पहुँचकर सुनीता को पीछे से अपनी आगोश में भर लिया। उसकी चौड़ी छाती सुनीता की नग्न पीठ से सट गई और उसकी दोनों बांहें सुनीता की पतली कमर पर कस गईं। सुनीता ने बिना किसी झिझक के अपना सिर आरव के कंधे पर टिका दिया और अपनी उंगलियों को आरव की हथेलियों में पिरो लिया।

"चांद तो आज बहुत खूबसूरत दिख रहा है..." सुनीता ने ठंडी हवा का लुत्फ लेते हुए मंद आवाज़ में कहा।
आरव ने अपनी ठुड्डी सुनीता के कांपते कंधे पर टिकाई और उसके कान के पास फुसफुसाया, "मुझे तो मुंडेर पर खड़ी मेरी चांदनी के आगे आसमान का चांद भी फीका लग रहा है।"


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सुनीता के गालों पर हया की सुरखी दौड़ गई। उसने अपनी सुराहीदार गर्दन थोड़ा पीछे मोड़कर आरव की तीखी नीली आँखों में झांका, "बातें तो बड़ी मीठी बनाने लगे हो आरव... कल दंगल है, और तुम्हारा ध्यान इस वक्त भी सिर्फ़ मुझ पर ही अटका हुआ है?"

आरव ने सुनीता को अपनी तरफ घुमाया और उसकी कजरारी आँखों में आँखें डालकर गंभीरता से बोला, "सुनीता, अखाड़े की मिट्टी में उतरने की ताकत मुझे इसी चेहरे और इस मोहब्बत से मिलती है। दुनिया सोचती है कि मैं सिर्फ दंगल जीतने लड़ रहा हूँ, पर सच तो यह है कि मैं हर बाज़ी सिर्फ तुम्हें अपने पास महफ़ूज़ रखने के लिए जीतना चाहता हूँ।"

इन शब्दों में छिपे बेपनाह आत्मीय भाव को महसूस करते ही सुनीता की आँखें भर आईं। उसने आरव के कसरती सीने पर अपना चेहरा छिपा लिया और उसकी पीठ को भींचते हुए बोली, "मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए आरव... बस तुम सही-सलामत मेरे पास लौट आना। कल की साजिशों और अखाड़े की कड़वाहट से परे, मेरी हर सांस सिर्फ़ तुम्हारी सलामती की दुआ मांगती है।"
आरव ने सुनीता की ठुड्डी को ऊपर उठाया और हवा में उड़ती उसके बालों की रेशमी लटों को सहलाते हुए उसके होंठों पर एक लंबा, धीर-गंभीर और प्यार से भरा चुंबन अंकित कर दिया।

चांदनी रात की उस ठंडी हवा में, हवेली की छत पर एक-दूसरे की बांहों में सिमटे अपनी मोहब्बत और वफ़ा के हसीन नगमे गुनगुना रहे थे।

पूरी रात अभी बाकि है.....
Comingsoon
बहुत ही अच्छा अपडेट. देखते हैं कल दंगल में क्या होता है. क्या आरव राकेश की साजिश को नाकाम कर पाएगा? अगले अपडेट का इंतजार रहेगा. 👍
 
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