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Adultery दिलवाले

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#४९

मंजू- मसखरी मत कर और काम पे ध्यान दे

मैं- और कितने पेड़ काटू थक गया हु मैं

मंजू- लकडियो की बात नहीं कर रही मैं

मैं- क्या कह रही है फिर तू

मंजू- तू चुतिया ही रहेगा सदा. मैं सोच रही हु की तू कैसे मदद करेगा उस नीच जात वाली लड़की की

मैं- और इतनी देर से तुझसे क्या मदद मांग रहा था मैं

मंजू कुछ कहने वाली ही थी की उसकी नजर ताईजी पर पड़ी जो हमारी तरफ ही आ रही थी .

“चुप रहियो अब ” मंजू ने कहा

“ताईजी , आप यहाँ ” मैंने कहा

ताई- चाय -बिस्कुट लायी हु . सोचा थक गए होगे तुम लोग

मैं- ये बढ़िया किया.

मैंने और मंजू ने कप में चाय डाली और चुसकिया लेने लगे. ढलती धुप में चाय पीने का मजा ही आ गया.

“कुल्हाड़ी मुझे दे मैं मदद करती हु ” ताईजी ने कहा

मैं- नहीं , आप बैठो थोड़ी बहुत लकडिया और बाकी है मैं काट लूँगा.

वैसे तो मैं तंग था घरवालो के इन नाटको से पर फिर भी जिन्दगी का हिस्सा थे ये सब काम तो न चाहते हुए भी धक्का देना पड़ता था .

“भाई कब तक आएगा ट्रेक्टर लेके ” मैंने कहा

ताई- आने वाला ही होगा .

“थोडा बहुत काम-धंधा काजल से भी करवा लिया करो ताईजी ” मंजू ने पसीना पोंछते हुए कहा

ताई- अरे वो घर का काम कर ले वो ही बहुत है .

कुछ देर बाद भाई आ गया हमने लकडिया लादी और घर के लिए चल दिए. मैं थोडा थक गया था

“यार पानी तो गरम कर दिया होता , अभी क्या ठन्डे से नहाऊ मैं ” मैंने भाभी से कहा

“एक नौकर रख ले साहब के लिए तो कैसा रहे ” पास से जाती चाची ने कहा

मैं कुछ कहने ही वाला था की भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- बस थोड़ी देर

चोबारे में जाकर मैंने रेडियो चालू किया और गाना सुनने लगा तभी मुझे कुछ ध्यान आया और मैंने तकिये को हटाया चाची की जवानी किताब मैंने इधर ही रखी थी और फिर मैं कामो में उलझ गया . और हैरानी की बात ये थी की अभी वो किताब वहां नहीं थी , मैंने पूरा बिस्तर उल्ट पलट कर देख लिया पर किताब नहीं थी. अलमारी भी चेक कर ली पर ये सिर्फ तसल्ली की बात थी क्योंकि मुझे खूब याद था की किताब तकिये के निचे रखी थी .

“कबीर, नहा लो ” निचे से पानी की आवाज आई तो मैं तौलिया लेकर निचे आया.

मैं- भाभी चोबारे में कोई गया था क्या

भाभी- पता नहीं , क्या हुआ

मैं- कुछ नहीं कमरा थोडा अस्त व्यस्त था तो पुछा

मैंने बात घुमाई और नहाने बैठ गया पर दिमाग में सवाल घूम रहे थे . गर्म पानी बदन पर पड़ तो रहा था पर मजा आ नहीं रहा था खैर नहा कर मैं वापिस चोबारे में आया धीमी आवाज में बजते कुमार सानु के गाने सुनते हुए मैंने कपडे पहने और बिस्तर में घुस गया. थोड़ी गर्मी से राहत मिली और न जाने कब आँख लग गयी पर इस घर में चैन मिलना लगभग ना मुमकिन सा ही था .

“कबीर, उठ जाओ खाना खा लो और फिर खेतो में जाना है तुमको ” भाभी ने मुझे जगाते हुए कहा

मैं- कभी तो कोई अच्छी बात कह लिया करो . मैं नहीं जाने वाला खेतो पर आज मुझे सोना है . भैया से कह दो वो चले जायेगा आज और फिर चाचा तो जाता ही है

भाभी- माँ ने कहा है तुम्हे ही जाना है . चाचा की तबियत खराब है

मैं- उसको तो बस मौका चाहिए मुझे तंग करने का

भाभी- ऐसा नहीं है कबीर, मैं समझती हु की तुम नहीं जाना चाहते पर इसमें मैं क्या करू माँ ने कहा है . तुम माँ से बात कर लो . मैं कहूँगी तो दो बात मुझे भी सुननी पड़ेंगी.

मैं- छोड़ो , चले ही जाऊंगा .

मैंने खेस और रेडियो साइकिल पर लटकाया की मेरी नजर ताईजी पर पड़ी जो मुझे ही देख रही थी . एक पल को हमारी नजरे मिली और फिर मैं घर से बाहर निकल गया.

“बहनचोद इतनी सर्दी में मेरी गांड में डंडा दे रखा है इन घरवालो ने ” खुद को कोसते हुए मैं खेतो की तरफ जा रहा था . वहां पहुँच कर मैंने अलाव जलाई और खुद को तापने लगा.

“कौन जानवर माँ चुदाने आएगा इस ठण्ड में ,किसकी चोकिदारी करू ” झीखते हुए मैंने चारपाई सीधी की और रजाई ओढ़ कर सो गया. न जाने कितनी देर सोया होऊंगा की झटके से आँख खुल गयी, सरसराहट सी हुई थी. आँखे मलते हुए मैंने टोर्च जलाई और देखने लगा. नीलगायो का झुण्ड खेतो में घुसा हुआ था उनको भगाते हुए मैं कब थोडा आगे की तरफ निकल गया होश ही नहीं रहा. टपकती ओस मेरे खेस को भिगो रही थी , चेहरा ठण्ड से सुन्न पड़ा हुआ था की तभी मेरी नजर थोड़ी दूर रौशनी पर पड़ी, मैंने सोचा आंच ताप कर ही वापिस जाऊंगा.

वहां पहुंचा तो कोई नहीं था आंच सुनहरी जल रही थी तडक तडक लकडिया चटक रही थी , इधर उधर देखा कोई नहीं था . पास में एक लालटेन और किताब पड़ी थी . मैंने उस किताब को उठाया और आंच की रौशनी में देखा. पन्ने को पलटना चाहता ही था की अचानक से मैं कांप गया. किसी ने पीछे से छुआ मुझे . अँधेरी रात में मैं डर सा गया और पलट कर देखा, पलट कर देखा और देखता ही रह गया. चटकती आंच में उसका रूप ठीक वैसे ही चमक रहा था जैसे की सूरज की किरणों में देखा था उसे.

“तुम यहाँ ” मैंने सवाल किया

“मैं नहीं तो और कौन ”
बडा ही शानदार लाजवाब और अद्भुत मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 

parkas

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#४९

मंजू- मसखरी मत कर और काम पे ध्यान दे

मैं- और कितने पेड़ काटू थक गया हु मैं

मंजू- लकडियो की बात नहीं कर रही मैं

मैं- क्या कह रही है फिर तू

मंजू- तू चुतिया ही रहेगा सदा. मैं सोच रही हु की तू कैसे मदद करेगा उस नीच जात वाली लड़की की

मैं- और इतनी देर से तुझसे क्या मदद मांग रहा था मैं

मंजू कुछ कहने वाली ही थी की उसकी नजर ताईजी पर पड़ी जो हमारी तरफ ही आ रही थी .

“चुप रहियो अब ” मंजू ने कहा

“ताईजी , आप यहाँ ” मैंने कहा

ताई- चाय -बिस्कुट लायी हु . सोचा थक गए होगे तुम लोग

मैं- ये बढ़िया किया.

मैंने और मंजू ने कप में चाय डाली और चुसकिया लेने लगे. ढलती धुप में चाय पीने का मजा ही आ गया.

“कुल्हाड़ी मुझे दे मैं मदद करती हु ” ताईजी ने कहा

मैं- नहीं , आप बैठो थोड़ी बहुत लकडिया और बाकी है मैं काट लूँगा.

वैसे तो मैं तंग था घरवालो के इन नाटको से पर फिर भी जिन्दगी का हिस्सा थे ये सब काम तो न चाहते हुए भी धक्का देना पड़ता था .

“भाई कब तक आएगा ट्रेक्टर लेके ” मैंने कहा

ताई- आने वाला ही होगा .

“थोडा बहुत काम-धंधा काजल से भी करवा लिया करो ताईजी ” मंजू ने पसीना पोंछते हुए कहा

ताई- अरे वो घर का काम कर ले वो ही बहुत है .

कुछ देर बाद भाई आ गया हमने लकडिया लादी और घर के लिए चल दिए. मैं थोडा थक गया था

“यार पानी तो गरम कर दिया होता , अभी क्या ठन्डे से नहाऊ मैं ” मैंने भाभी से कहा

“एक नौकर रख ले साहब के लिए तो कैसा रहे ” पास से जाती चाची ने कहा

मैं कुछ कहने ही वाला था की भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- बस थोड़ी देर

चोबारे में जाकर मैंने रेडियो चालू किया और गाना सुनने लगा तभी मुझे कुछ ध्यान आया और मैंने तकिये को हटाया चाची की जवानी किताब मैंने इधर ही रखी थी और फिर मैं कामो में उलझ गया . और हैरानी की बात ये थी की अभी वो किताब वहां नहीं थी , मैंने पूरा बिस्तर उल्ट पलट कर देख लिया पर किताब नहीं थी. अलमारी भी चेक कर ली पर ये सिर्फ तसल्ली की बात थी क्योंकि मुझे खूब याद था की किताब तकिये के निचे रखी थी .

“कबीर, नहा लो ” निचे से पानी की आवाज आई तो मैं तौलिया लेकर निचे आया.

मैं- भाभी चोबारे में कोई गया था क्या

भाभी- पता नहीं , क्या हुआ

मैं- कुछ नहीं कमरा थोडा अस्त व्यस्त था तो पुछा

मैंने बात घुमाई और नहाने बैठ गया पर दिमाग में सवाल घूम रहे थे . गर्म पानी बदन पर पड़ तो रहा था पर मजा आ नहीं रहा था खैर नहा कर मैं वापिस चोबारे में आया धीमी आवाज में बजते कुमार सानु के गाने सुनते हुए मैंने कपडे पहने और बिस्तर में घुस गया. थोड़ी गर्मी से राहत मिली और न जाने कब आँख लग गयी पर इस घर में चैन मिलना लगभग ना मुमकिन सा ही था .

“कबीर, उठ जाओ खाना खा लो और फिर खेतो में जाना है तुमको ” भाभी ने मुझे जगाते हुए कहा

मैं- कभी तो कोई अच्छी बात कह लिया करो . मैं नहीं जाने वाला खेतो पर आज मुझे सोना है . भैया से कह दो वो चले जायेगा आज और फिर चाचा तो जाता ही है

भाभी- माँ ने कहा है तुम्हे ही जाना है . चाचा की तबियत खराब है

मैं- उसको तो बस मौका चाहिए मुझे तंग करने का

भाभी- ऐसा नहीं है कबीर, मैं समझती हु की तुम नहीं जाना चाहते पर इसमें मैं क्या करू माँ ने कहा है . तुम माँ से बात कर लो . मैं कहूँगी तो दो बात मुझे भी सुननी पड़ेंगी.

मैं- छोड़ो , चले ही जाऊंगा .

मैंने खेस और रेडियो साइकिल पर लटकाया की मेरी नजर ताईजी पर पड़ी जो मुझे ही देख रही थी . एक पल को हमारी नजरे मिली और फिर मैं घर से बाहर निकल गया.

“बहनचोद इतनी सर्दी में मेरी गांड में डंडा दे रखा है इन घरवालो ने ” खुद को कोसते हुए मैं खेतो की तरफ जा रहा था . वहां पहुँच कर मैंने अलाव जलाई और खुद को तापने लगा.

“कौन जानवर माँ चुदाने आएगा इस ठण्ड में ,किसकी चोकिदारी करू ” झीखते हुए मैंने चारपाई सीधी की और रजाई ओढ़ कर सो गया. न जाने कितनी देर सोया होऊंगा की झटके से आँख खुल गयी, सरसराहट सी हुई थी. आँखे मलते हुए मैंने टोर्च जलाई और देखने लगा. नीलगायो का झुण्ड खेतो में घुसा हुआ था उनको भगाते हुए मैं कब थोडा आगे की तरफ निकल गया होश ही नहीं रहा. टपकती ओस मेरे खेस को भिगो रही थी , चेहरा ठण्ड से सुन्न पड़ा हुआ था की तभी मेरी नजर थोड़ी दूर रौशनी पर पड़ी, मैंने सोचा आंच ताप कर ही वापिस जाऊंगा.

वहां पहुंचा तो कोई नहीं था आंच सुनहरी जल रही थी तडक तडक लकडिया चटक रही थी , इधर उधर देखा कोई नहीं था . पास में एक लालटेन और किताब पड़ी थी . मैंने उस किताब को उठाया और आंच की रौशनी में देखा. पन्ने को पलटना चाहता ही था की अचानक से मैं कांप गया. किसी ने पीछे से छुआ मुझे . अँधेरी रात में मैं डर सा गया और पलट कर देखा, पलट कर देखा और देखता ही रह गया. चटकती आंच में उसका रूप ठीक वैसे ही चमक रहा था जैसे की सूरज की किरणों में देखा था उसे.

“तुम यहाँ ” मैंने सवाल किया


“मैं नहीं तो और कौन ”
Bahut hi badhiya update diya hai HalfbludPrince bhai....
Nice and beautiful update....
 
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Sunli

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#४९

मंजू- मसखरी मत कर और काम पे ध्यान दे

मैं- और कितने पेड़ काटू थक गया हु मैं

मंजू- लकडियो की बात नहीं कर रही मैं

मैं- क्या कह रही है फिर तू

मंजू- तू चुतिया ही रहेगा सदा. मैं सोच रही हु की तू कैसे मदद करेगा उस नीच जात वाली लड़की की

मैं- और इतनी देर से तुझसे क्या मदद मांग रहा था मैं

मंजू कुछ कहने वाली ही थी की उसकी नजर ताईजी पर पड़ी जो हमारी तरफ ही आ रही थी .

“चुप रहियो अब ” मंजू ने कहा

“ताईजी , आप यहाँ ” मैंने कहा

ताई- चाय -बिस्कुट लायी हु . सोचा थक गए होगे तुम लोग

मैं- ये बढ़िया किया.

मैंने और मंजू ने कप में चाय डाली और चुसकिया लेने लगे. ढलती धुप में चाय पीने का मजा ही आ गया.

“कुल्हाड़ी मुझे दे मैं मदद करती हु ” ताईजी ने कहा

मैं- नहीं , आप बैठो थोड़ी बहुत लकडिया और बाकी है मैं काट लूँगा.

वैसे तो मैं तंग था घरवालो के इन नाटको से पर फिर भी जिन्दगी का हिस्सा थे ये सब काम तो न चाहते हुए भी धक्का देना पड़ता था .

“भाई कब तक आएगा ट्रेक्टर लेके ” मैंने कहा

ताई- आने वाला ही होगा .

“थोडा बहुत काम-धंधा काजल से भी करवा लिया करो ताईजी ” मंजू ने पसीना पोंछते हुए कहा

ताई- अरे वो घर का काम कर ले वो ही बहुत है .

कुछ देर बाद भाई आ गया हमने लकडिया लादी और घर के लिए चल दिए. मैं थोडा थक गया था

“यार पानी तो गरम कर दिया होता , अभी क्या ठन्डे से नहाऊ मैं ” मैंने भाभी से कहा

“एक नौकर रख ले साहब के लिए तो कैसा रहे ” पास से जाती चाची ने कहा

मैं कुछ कहने ही वाला था की भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- बस थोड़ी देर

चोबारे में जाकर मैंने रेडियो चालू किया और गाना सुनने लगा तभी मुझे कुछ ध्यान आया और मैंने तकिये को हटाया चाची की जवानी किताब मैंने इधर ही रखी थी और फिर मैं कामो में उलझ गया . और हैरानी की बात ये थी की अभी वो किताब वहां नहीं थी , मैंने पूरा बिस्तर उल्ट पलट कर देख लिया पर किताब नहीं थी. अलमारी भी चेक कर ली पर ये सिर्फ तसल्ली की बात थी क्योंकि मुझे खूब याद था की किताब तकिये के निचे रखी थी .

“कबीर, नहा लो ” निचे से पानी की आवाज आई तो मैं तौलिया लेकर निचे आया.

मैं- भाभी चोबारे में कोई गया था क्या

भाभी- पता नहीं , क्या हुआ

मैं- कुछ नहीं कमरा थोडा अस्त व्यस्त था तो पुछा

मैंने बात घुमाई और नहाने बैठ गया पर दिमाग में सवाल घूम रहे थे . गर्म पानी बदन पर पड़ तो रहा था पर मजा आ नहीं रहा था खैर नहा कर मैं वापिस चोबारे में आया धीमी आवाज में बजते कुमार सानु के गाने सुनते हुए मैंने कपडे पहने और बिस्तर में घुस गया. थोड़ी गर्मी से राहत मिली और न जाने कब आँख लग गयी पर इस घर में चैन मिलना लगभग ना मुमकिन सा ही था .

“कबीर, उठ जाओ खाना खा लो और फिर खेतो में जाना है तुमको ” भाभी ने मुझे जगाते हुए कहा

मैं- कभी तो कोई अच्छी बात कह लिया करो . मैं नहीं जाने वाला खेतो पर आज मुझे सोना है . भैया से कह दो वो चले जायेगा आज और फिर चाचा तो जाता ही है

भाभी- माँ ने कहा है तुम्हे ही जाना है . चाचा की तबियत खराब है

मैं- उसको तो बस मौका चाहिए मुझे तंग करने का

भाभी- ऐसा नहीं है कबीर, मैं समझती हु की तुम नहीं जाना चाहते पर इसमें मैं क्या करू माँ ने कहा है . तुम माँ से बात कर लो . मैं कहूँगी तो दो बात मुझे भी सुननी पड़ेंगी.

मैं- छोड़ो , चले ही जाऊंगा .

मैंने खेस और रेडियो साइकिल पर लटकाया की मेरी नजर ताईजी पर पड़ी जो मुझे ही देख रही थी . एक पल को हमारी नजरे मिली और फिर मैं घर से बाहर निकल गया.

“बहनचोद इतनी सर्दी में मेरी गांड में डंडा दे रखा है इन घरवालो ने ” खुद को कोसते हुए मैं खेतो की तरफ जा रहा था . वहां पहुँच कर मैंने अलाव जलाई और खुद को तापने लगा.

“कौन जानवर माँ चुदाने आएगा इस ठण्ड में ,किसकी चोकिदारी करू ” झीखते हुए मैंने चारपाई सीधी की और रजाई ओढ़ कर सो गया. न जाने कितनी देर सोया होऊंगा की झटके से आँख खुल गयी, सरसराहट सी हुई थी. आँखे मलते हुए मैंने टोर्च जलाई और देखने लगा. नीलगायो का झुण्ड खेतो में घुसा हुआ था उनको भगाते हुए मैं कब थोडा आगे की तरफ निकल गया होश ही नहीं रहा. टपकती ओस मेरे खेस को भिगो रही थी , चेहरा ठण्ड से सुन्न पड़ा हुआ था की तभी मेरी नजर थोड़ी दूर रौशनी पर पड़ी, मैंने सोचा आंच ताप कर ही वापिस जाऊंगा.

वहां पहुंचा तो कोई नहीं था आंच सुनहरी जल रही थी तडक तडक लकडिया चटक रही थी , इधर उधर देखा कोई नहीं था . पास में एक लालटेन और किताब पड़ी थी . मैंने उस किताब को उठाया और आंच की रौशनी में देखा. पन्ने को पलटना चाहता ही था की अचानक से मैं कांप गया. किसी ने पीछे से छुआ मुझे . अँधेरी रात में मैं डर सा गया और पलट कर देखा, पलट कर देखा और देखता ही रह गया. चटकती आंच में उसका रूप ठीक वैसे ही चमक रहा था जैसे की सूरज की किरणों में देखा था उसे.

“तुम यहाँ ” मैंने सवाल किया

“मैं नहीं तो और कौन ”
Bahut bahut hi shandar apdet bhai
 

kas1709

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#४९

मंजू- मसखरी मत कर और काम पे ध्यान दे

मैं- और कितने पेड़ काटू थक गया हु मैं

मंजू- लकडियो की बात नहीं कर रही मैं

मैं- क्या कह रही है फिर तू

मंजू- तू चुतिया ही रहेगा सदा. मैं सोच रही हु की तू कैसे मदद करेगा उस नीच जात वाली लड़की की

मैं- और इतनी देर से तुझसे क्या मदद मांग रहा था मैं

मंजू कुछ कहने वाली ही थी की उसकी नजर ताईजी पर पड़ी जो हमारी तरफ ही आ रही थी .

“चुप रहियो अब ” मंजू ने कहा

“ताईजी , आप यहाँ ” मैंने कहा

ताई- चाय -बिस्कुट लायी हु . सोचा थक गए होगे तुम लोग

मैं- ये बढ़िया किया.

मैंने और मंजू ने कप में चाय डाली और चुसकिया लेने लगे. ढलती धुप में चाय पीने का मजा ही आ गया.

“कुल्हाड़ी मुझे दे मैं मदद करती हु ” ताईजी ने कहा

मैं- नहीं , आप बैठो थोड़ी बहुत लकडिया और बाकी है मैं काट लूँगा.

वैसे तो मैं तंग था घरवालो के इन नाटको से पर फिर भी जिन्दगी का हिस्सा थे ये सब काम तो न चाहते हुए भी धक्का देना पड़ता था .

“भाई कब तक आएगा ट्रेक्टर लेके ” मैंने कहा

ताई- आने वाला ही होगा .

“थोडा बहुत काम-धंधा काजल से भी करवा लिया करो ताईजी ” मंजू ने पसीना पोंछते हुए कहा

ताई- अरे वो घर का काम कर ले वो ही बहुत है .

कुछ देर बाद भाई आ गया हमने लकडिया लादी और घर के लिए चल दिए. मैं थोडा थक गया था

“यार पानी तो गरम कर दिया होता , अभी क्या ठन्डे से नहाऊ मैं ” मैंने भाभी से कहा

“एक नौकर रख ले साहब के लिए तो कैसा रहे ” पास से जाती चाची ने कहा

मैं कुछ कहने ही वाला था की भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- बस थोड़ी देर

चोबारे में जाकर मैंने रेडियो चालू किया और गाना सुनने लगा तभी मुझे कुछ ध्यान आया और मैंने तकिये को हटाया चाची की जवानी किताब मैंने इधर ही रखी थी और फिर मैं कामो में उलझ गया . और हैरानी की बात ये थी की अभी वो किताब वहां नहीं थी , मैंने पूरा बिस्तर उल्ट पलट कर देख लिया पर किताब नहीं थी. अलमारी भी चेक कर ली पर ये सिर्फ तसल्ली की बात थी क्योंकि मुझे खूब याद था की किताब तकिये के निचे रखी थी .

“कबीर, नहा लो ” निचे से पानी की आवाज आई तो मैं तौलिया लेकर निचे आया.

मैं- भाभी चोबारे में कोई गया था क्या

भाभी- पता नहीं , क्या हुआ

मैं- कुछ नहीं कमरा थोडा अस्त व्यस्त था तो पुछा

मैंने बात घुमाई और नहाने बैठ गया पर दिमाग में सवाल घूम रहे थे . गर्म पानी बदन पर पड़ तो रहा था पर मजा आ नहीं रहा था खैर नहा कर मैं वापिस चोबारे में आया धीमी आवाज में बजते कुमार सानु के गाने सुनते हुए मैंने कपडे पहने और बिस्तर में घुस गया. थोड़ी गर्मी से राहत मिली और न जाने कब आँख लग गयी पर इस घर में चैन मिलना लगभग ना मुमकिन सा ही था .

“कबीर, उठ जाओ खाना खा लो और फिर खेतो में जाना है तुमको ” भाभी ने मुझे जगाते हुए कहा

मैं- कभी तो कोई अच्छी बात कह लिया करो . मैं नहीं जाने वाला खेतो पर आज मुझे सोना है . भैया से कह दो वो चले जायेगा आज और फिर चाचा तो जाता ही है

भाभी- माँ ने कहा है तुम्हे ही जाना है . चाचा की तबियत खराब है

मैं- उसको तो बस मौका चाहिए मुझे तंग करने का

भाभी- ऐसा नहीं है कबीर, मैं समझती हु की तुम नहीं जाना चाहते पर इसमें मैं क्या करू माँ ने कहा है . तुम माँ से बात कर लो . मैं कहूँगी तो दो बात मुझे भी सुननी पड़ेंगी.

मैं- छोड़ो , चले ही जाऊंगा .

मैंने खेस और रेडियो साइकिल पर लटकाया की मेरी नजर ताईजी पर पड़ी जो मुझे ही देख रही थी . एक पल को हमारी नजरे मिली और फिर मैं घर से बाहर निकल गया.

“बहनचोद इतनी सर्दी में मेरी गांड में डंडा दे रखा है इन घरवालो ने ” खुद को कोसते हुए मैं खेतो की तरफ जा रहा था . वहां पहुँच कर मैंने अलाव जलाई और खुद को तापने लगा.

“कौन जानवर माँ चुदाने आएगा इस ठण्ड में ,किसकी चोकिदारी करू ” झीखते हुए मैंने चारपाई सीधी की और रजाई ओढ़ कर सो गया. न जाने कितनी देर सोया होऊंगा की झटके से आँख खुल गयी, सरसराहट सी हुई थी. आँखे मलते हुए मैंने टोर्च जलाई और देखने लगा. नीलगायो का झुण्ड खेतो में घुसा हुआ था उनको भगाते हुए मैं कब थोडा आगे की तरफ निकल गया होश ही नहीं रहा. टपकती ओस मेरे खेस को भिगो रही थी , चेहरा ठण्ड से सुन्न पड़ा हुआ था की तभी मेरी नजर थोड़ी दूर रौशनी पर पड़ी, मैंने सोचा आंच ताप कर ही वापिस जाऊंगा.

वहां पहुंचा तो कोई नहीं था आंच सुनहरी जल रही थी तडक तडक लकडिया चटक रही थी , इधर उधर देखा कोई नहीं था . पास में एक लालटेन और किताब पड़ी थी . मैंने उस किताब को उठाया और आंच की रौशनी में देखा. पन्ने को पलटना चाहता ही था की अचानक से मैं कांप गया. किसी ने पीछे से छुआ मुझे . अँधेरी रात में मैं डर सा गया और पलट कर देखा, पलट कर देखा और देखता ही रह गया. चटकती आंच में उसका रूप ठीक वैसे ही चमक रहा था जैसे की सूरज की किरणों में देखा था उसे.

“तुम यहाँ ” मैंने सवाल किया


“मैं नहीं तो और कौन ”
Nice update....
 

Iron Man

Try and fail. But never give up trying
45,144
121,173
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#४९

मंजू- मसखरी मत कर और काम पे ध्यान दे

मैं- और कितने पेड़ काटू थक गया हु मैं

मंजू- लकडियो की बात नहीं कर रही मैं

मैं- क्या कह रही है फिर तू

मंजू- तू चुतिया ही रहेगा सदा. मैं सोच रही हु की तू कैसे मदद करेगा उस नीच जात वाली लड़की की

मैं- और इतनी देर से तुझसे क्या मदद मांग रहा था मैं

मंजू कुछ कहने वाली ही थी की उसकी नजर ताईजी पर पड़ी जो हमारी तरफ ही आ रही थी .

“चुप रहियो अब ” मंजू ने कहा

“ताईजी , आप यहाँ ” मैंने कहा

ताई- चाय -बिस्कुट लायी हु . सोचा थक गए होगे तुम लोग

मैं- ये बढ़िया किया.

मैंने और मंजू ने कप में चाय डाली और चुसकिया लेने लगे. ढलती धुप में चाय पीने का मजा ही आ गया.

“कुल्हाड़ी मुझे दे मैं मदद करती हु ” ताईजी ने कहा

मैं- नहीं , आप बैठो थोड़ी बहुत लकडिया और बाकी है मैं काट लूँगा.

वैसे तो मैं तंग था घरवालो के इन नाटको से पर फिर भी जिन्दगी का हिस्सा थे ये सब काम तो न चाहते हुए भी धक्का देना पड़ता था .

“भाई कब तक आएगा ट्रेक्टर लेके ” मैंने कहा

ताई- आने वाला ही होगा .

“थोडा बहुत काम-धंधा काजल से भी करवा लिया करो ताईजी ” मंजू ने पसीना पोंछते हुए कहा

ताई- अरे वो घर का काम कर ले वो ही बहुत है .

कुछ देर बाद भाई आ गया हमने लकडिया लादी और घर के लिए चल दिए. मैं थोडा थक गया था

“यार पानी तो गरम कर दिया होता , अभी क्या ठन्डे से नहाऊ मैं ” मैंने भाभी से कहा

“एक नौकर रख ले साहब के लिए तो कैसा रहे ” पास से जाती चाची ने कहा

मैं कुछ कहने ही वाला था की भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- बस थोड़ी देर

चोबारे में जाकर मैंने रेडियो चालू किया और गाना सुनने लगा तभी मुझे कुछ ध्यान आया और मैंने तकिये को हटाया चाची की जवानी किताब मैंने इधर ही रखी थी और फिर मैं कामो में उलझ गया . और हैरानी की बात ये थी की अभी वो किताब वहां नहीं थी , मैंने पूरा बिस्तर उल्ट पलट कर देख लिया पर किताब नहीं थी. अलमारी भी चेक कर ली पर ये सिर्फ तसल्ली की बात थी क्योंकि मुझे खूब याद था की किताब तकिये के निचे रखी थी .

“कबीर, नहा लो ” निचे से पानी की आवाज आई तो मैं तौलिया लेकर निचे आया.

मैं- भाभी चोबारे में कोई गया था क्या

भाभी- पता नहीं , क्या हुआ

मैं- कुछ नहीं कमरा थोडा अस्त व्यस्त था तो पुछा

मैंने बात घुमाई और नहाने बैठ गया पर दिमाग में सवाल घूम रहे थे . गर्म पानी बदन पर पड़ तो रहा था पर मजा आ नहीं रहा था खैर नहा कर मैं वापिस चोबारे में आया धीमी आवाज में बजते कुमार सानु के गाने सुनते हुए मैंने कपडे पहने और बिस्तर में घुस गया. थोड़ी गर्मी से राहत मिली और न जाने कब आँख लग गयी पर इस घर में चैन मिलना लगभग ना मुमकिन सा ही था .

“कबीर, उठ जाओ खाना खा लो और फिर खेतो में जाना है तुमको ” भाभी ने मुझे जगाते हुए कहा

मैं- कभी तो कोई अच्छी बात कह लिया करो . मैं नहीं जाने वाला खेतो पर आज मुझे सोना है . भैया से कह दो वो चले जायेगा आज और फिर चाचा तो जाता ही है

भाभी- माँ ने कहा है तुम्हे ही जाना है . चाचा की तबियत खराब है

मैं- उसको तो बस मौका चाहिए मुझे तंग करने का

भाभी- ऐसा नहीं है कबीर, मैं समझती हु की तुम नहीं जाना चाहते पर इसमें मैं क्या करू माँ ने कहा है . तुम माँ से बात कर लो . मैं कहूँगी तो दो बात मुझे भी सुननी पड़ेंगी.

मैं- छोड़ो , चले ही जाऊंगा .

मैंने खेस और रेडियो साइकिल पर लटकाया की मेरी नजर ताईजी पर पड़ी जो मुझे ही देख रही थी . एक पल को हमारी नजरे मिली और फिर मैं घर से बाहर निकल गया.

“बहनचोद इतनी सर्दी में मेरी गांड में डंडा दे रखा है इन घरवालो ने ” खुद को कोसते हुए मैं खेतो की तरफ जा रहा था . वहां पहुँच कर मैंने अलाव जलाई और खुद को तापने लगा.

“कौन जानवर माँ चुदाने आएगा इस ठण्ड में ,किसकी चोकिदारी करू ” झीखते हुए मैंने चारपाई सीधी की और रजाई ओढ़ कर सो गया. न जाने कितनी देर सोया होऊंगा की झटके से आँख खुल गयी, सरसराहट सी हुई थी. आँखे मलते हुए मैंने टोर्च जलाई और देखने लगा. नीलगायो का झुण्ड खेतो में घुसा हुआ था उनको भगाते हुए मैं कब थोडा आगे की तरफ निकल गया होश ही नहीं रहा. टपकती ओस मेरे खेस को भिगो रही थी , चेहरा ठण्ड से सुन्न पड़ा हुआ था की तभी मेरी नजर थोड़ी दूर रौशनी पर पड़ी, मैंने सोचा आंच ताप कर ही वापिस जाऊंगा.

वहां पहुंचा तो कोई नहीं था आंच सुनहरी जल रही थी तडक तडक लकडिया चटक रही थी , इधर उधर देखा कोई नहीं था . पास में एक लालटेन और किताब पड़ी थी . मैंने उस किताब को उठाया और आंच की रौशनी में देखा. पन्ने को पलटना चाहता ही था की अचानक से मैं कांप गया. किसी ने पीछे से छुआ मुझे . अँधेरी रात में मैं डर सा गया और पलट कर देखा, पलट कर देखा और देखता ही रह गया. चटकती आंच में उसका रूप ठीक वैसे ही चमक रहा था जैसे की सूरज की किरणों में देखा था उसे.

“तुम यहाँ ” मैंने सवाल किया


“मैं नहीं तो और कौन ”
Shaandar update
 

Ajju Landwalia

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#४९

मंजू- मसखरी मत कर और काम पे ध्यान दे

मैं- और कितने पेड़ काटू थक गया हु मैं

मंजू- लकडियो की बात नहीं कर रही मैं

मैं- क्या कह रही है फिर तू

मंजू- तू चुतिया ही रहेगा सदा. मैं सोच रही हु की तू कैसे मदद करेगा उस नीच जात वाली लड़की की

मैं- और इतनी देर से तुझसे क्या मदद मांग रहा था मैं

मंजू कुछ कहने वाली ही थी की उसकी नजर ताईजी पर पड़ी जो हमारी तरफ ही आ रही थी .

“चुप रहियो अब ” मंजू ने कहा

“ताईजी , आप यहाँ ” मैंने कहा

ताई- चाय -बिस्कुट लायी हु . सोचा थक गए होगे तुम लोग

मैं- ये बढ़िया किया.

मैंने और मंजू ने कप में चाय डाली और चुसकिया लेने लगे. ढलती धुप में चाय पीने का मजा ही आ गया.

“कुल्हाड़ी मुझे दे मैं मदद करती हु ” ताईजी ने कहा

मैं- नहीं , आप बैठो थोड़ी बहुत लकडिया और बाकी है मैं काट लूँगा.

वैसे तो मैं तंग था घरवालो के इन नाटको से पर फिर भी जिन्दगी का हिस्सा थे ये सब काम तो न चाहते हुए भी धक्का देना पड़ता था .

“भाई कब तक आएगा ट्रेक्टर लेके ” मैंने कहा

ताई- आने वाला ही होगा .

“थोडा बहुत काम-धंधा काजल से भी करवा लिया करो ताईजी ” मंजू ने पसीना पोंछते हुए कहा

ताई- अरे वो घर का काम कर ले वो ही बहुत है .

कुछ देर बाद भाई आ गया हमने लकडिया लादी और घर के लिए चल दिए. मैं थोडा थक गया था

“यार पानी तो गरम कर दिया होता , अभी क्या ठन्डे से नहाऊ मैं ” मैंने भाभी से कहा

“एक नौकर रख ले साहब के लिए तो कैसा रहे ” पास से जाती चाची ने कहा

मैं कुछ कहने ही वाला था की भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- बस थोड़ी देर

चोबारे में जाकर मैंने रेडियो चालू किया और गाना सुनने लगा तभी मुझे कुछ ध्यान आया और मैंने तकिये को हटाया चाची की जवानी किताब मैंने इधर ही रखी थी और फिर मैं कामो में उलझ गया . और हैरानी की बात ये थी की अभी वो किताब वहां नहीं थी , मैंने पूरा बिस्तर उल्ट पलट कर देख लिया पर किताब नहीं थी. अलमारी भी चेक कर ली पर ये सिर्फ तसल्ली की बात थी क्योंकि मुझे खूब याद था की किताब तकिये के निचे रखी थी .

“कबीर, नहा लो ” निचे से पानी की आवाज आई तो मैं तौलिया लेकर निचे आया.

मैं- भाभी चोबारे में कोई गया था क्या

भाभी- पता नहीं , क्या हुआ

मैं- कुछ नहीं कमरा थोडा अस्त व्यस्त था तो पुछा

मैंने बात घुमाई और नहाने बैठ गया पर दिमाग में सवाल घूम रहे थे . गर्म पानी बदन पर पड़ तो रहा था पर मजा आ नहीं रहा था खैर नहा कर मैं वापिस चोबारे में आया धीमी आवाज में बजते कुमार सानु के गाने सुनते हुए मैंने कपडे पहने और बिस्तर में घुस गया. थोड़ी गर्मी से राहत मिली और न जाने कब आँख लग गयी पर इस घर में चैन मिलना लगभग ना मुमकिन सा ही था .

“कबीर, उठ जाओ खाना खा लो और फिर खेतो में जाना है तुमको ” भाभी ने मुझे जगाते हुए कहा

मैं- कभी तो कोई अच्छी बात कह लिया करो . मैं नहीं जाने वाला खेतो पर आज मुझे सोना है . भैया से कह दो वो चले जायेगा आज और फिर चाचा तो जाता ही है

भाभी- माँ ने कहा है तुम्हे ही जाना है . चाचा की तबियत खराब है

मैं- उसको तो बस मौका चाहिए मुझे तंग करने का

भाभी- ऐसा नहीं है कबीर, मैं समझती हु की तुम नहीं जाना चाहते पर इसमें मैं क्या करू माँ ने कहा है . तुम माँ से बात कर लो . मैं कहूँगी तो दो बात मुझे भी सुननी पड़ेंगी.

मैं- छोड़ो , चले ही जाऊंगा .

मैंने खेस और रेडियो साइकिल पर लटकाया की मेरी नजर ताईजी पर पड़ी जो मुझे ही देख रही थी . एक पल को हमारी नजरे मिली और फिर मैं घर से बाहर निकल गया.

“बहनचोद इतनी सर्दी में मेरी गांड में डंडा दे रखा है इन घरवालो ने ” खुद को कोसते हुए मैं खेतो की तरफ जा रहा था . वहां पहुँच कर मैंने अलाव जलाई और खुद को तापने लगा.

“कौन जानवर माँ चुदाने आएगा इस ठण्ड में ,किसकी चोकिदारी करू ” झीखते हुए मैंने चारपाई सीधी की और रजाई ओढ़ कर सो गया. न जाने कितनी देर सोया होऊंगा की झटके से आँख खुल गयी, सरसराहट सी हुई थी. आँखे मलते हुए मैंने टोर्च जलाई और देखने लगा. नीलगायो का झुण्ड खेतो में घुसा हुआ था उनको भगाते हुए मैं कब थोडा आगे की तरफ निकल गया होश ही नहीं रहा. टपकती ओस मेरे खेस को भिगो रही थी , चेहरा ठण्ड से सुन्न पड़ा हुआ था की तभी मेरी नजर थोड़ी दूर रौशनी पर पड़ी, मैंने सोचा आंच ताप कर ही वापिस जाऊंगा.

वहां पहुंचा तो कोई नहीं था आंच सुनहरी जल रही थी तडक तडक लकडिया चटक रही थी , इधर उधर देखा कोई नहीं था . पास में एक लालटेन और किताब पड़ी थी . मैंने उस किताब को उठाया और आंच की रौशनी में देखा. पन्ने को पलटना चाहता ही था की अचानक से मैं कांप गया. किसी ने पीछे से छुआ मुझे . अँधेरी रात में मैं डर सा गया और पलट कर देखा, पलट कर देखा और देखता ही रह गया. चटकती आंच में उसका रूप ठीक वैसे ही चमक रहा था जैसे की सूरज की किरणों में देखा था उसे.

“तुम यहाँ ” मैंने सवाल किया


“मैं नहीं तो और कौन ”

Bahut hi shandar update he HalfbludPrince Fauji Bhai,

Abhi bhi kabir scooter aur shadi me lagne wale paiso ka intezam nahi kar paya he...........

Kitab ho na ho Chachi ki Jawani vali he.............

Ab ye khet me kaun aa gaya.........Shayad Chachi ya fir Bhabhi

Keep rocking Bro
 

dhparikh

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#४९

मंजू- मसखरी मत कर और काम पे ध्यान दे

मैं- और कितने पेड़ काटू थक गया हु मैं

मंजू- लकडियो की बात नहीं कर रही मैं

मैं- क्या कह रही है फिर तू

मंजू- तू चुतिया ही रहेगा सदा. मैं सोच रही हु की तू कैसे मदद करेगा उस नीच जात वाली लड़की की

मैं- और इतनी देर से तुझसे क्या मदद मांग रहा था मैं

मंजू कुछ कहने वाली ही थी की उसकी नजर ताईजी पर पड़ी जो हमारी तरफ ही आ रही थी .

“चुप रहियो अब ” मंजू ने कहा

“ताईजी , आप यहाँ ” मैंने कहा

ताई- चाय -बिस्कुट लायी हु . सोचा थक गए होगे तुम लोग

मैं- ये बढ़िया किया.

मैंने और मंजू ने कप में चाय डाली और चुसकिया लेने लगे. ढलती धुप में चाय पीने का मजा ही आ गया.

“कुल्हाड़ी मुझे दे मैं मदद करती हु ” ताईजी ने कहा

मैं- नहीं , आप बैठो थोड़ी बहुत लकडिया और बाकी है मैं काट लूँगा.

वैसे तो मैं तंग था घरवालो के इन नाटको से पर फिर भी जिन्दगी का हिस्सा थे ये सब काम तो न चाहते हुए भी धक्का देना पड़ता था .

“भाई कब तक आएगा ट्रेक्टर लेके ” मैंने कहा

ताई- आने वाला ही होगा .

“थोडा बहुत काम-धंधा काजल से भी करवा लिया करो ताईजी ” मंजू ने पसीना पोंछते हुए कहा

ताई- अरे वो घर का काम कर ले वो ही बहुत है .

कुछ देर बाद भाई आ गया हमने लकडिया लादी और घर के लिए चल दिए. मैं थोडा थक गया था

“यार पानी तो गरम कर दिया होता , अभी क्या ठन्डे से नहाऊ मैं ” मैंने भाभी से कहा

“एक नौकर रख ले साहब के लिए तो कैसा रहे ” पास से जाती चाची ने कहा

मैं कुछ कहने ही वाला था की भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- बस थोड़ी देर

चोबारे में जाकर मैंने रेडियो चालू किया और गाना सुनने लगा तभी मुझे कुछ ध्यान आया और मैंने तकिये को हटाया चाची की जवानी किताब मैंने इधर ही रखी थी और फिर मैं कामो में उलझ गया . और हैरानी की बात ये थी की अभी वो किताब वहां नहीं थी , मैंने पूरा बिस्तर उल्ट पलट कर देख लिया पर किताब नहीं थी. अलमारी भी चेक कर ली पर ये सिर्फ तसल्ली की बात थी क्योंकि मुझे खूब याद था की किताब तकिये के निचे रखी थी .

“कबीर, नहा लो ” निचे से पानी की आवाज आई तो मैं तौलिया लेकर निचे आया.

मैं- भाभी चोबारे में कोई गया था क्या

भाभी- पता नहीं , क्या हुआ

मैं- कुछ नहीं कमरा थोडा अस्त व्यस्त था तो पुछा

मैंने बात घुमाई और नहाने बैठ गया पर दिमाग में सवाल घूम रहे थे . गर्म पानी बदन पर पड़ तो रहा था पर मजा आ नहीं रहा था खैर नहा कर मैं वापिस चोबारे में आया धीमी आवाज में बजते कुमार सानु के गाने सुनते हुए मैंने कपडे पहने और बिस्तर में घुस गया. थोड़ी गर्मी से राहत मिली और न जाने कब आँख लग गयी पर इस घर में चैन मिलना लगभग ना मुमकिन सा ही था .

“कबीर, उठ जाओ खाना खा लो और फिर खेतो में जाना है तुमको ” भाभी ने मुझे जगाते हुए कहा

मैं- कभी तो कोई अच्छी बात कह लिया करो . मैं नहीं जाने वाला खेतो पर आज मुझे सोना है . भैया से कह दो वो चले जायेगा आज और फिर चाचा तो जाता ही है

भाभी- माँ ने कहा है तुम्हे ही जाना है . चाचा की तबियत खराब है

मैं- उसको तो बस मौका चाहिए मुझे तंग करने का

भाभी- ऐसा नहीं है कबीर, मैं समझती हु की तुम नहीं जाना चाहते पर इसमें मैं क्या करू माँ ने कहा है . तुम माँ से बात कर लो . मैं कहूँगी तो दो बात मुझे भी सुननी पड़ेंगी.

मैं- छोड़ो , चले ही जाऊंगा .

मैंने खेस और रेडियो साइकिल पर लटकाया की मेरी नजर ताईजी पर पड़ी जो मुझे ही देख रही थी . एक पल को हमारी नजरे मिली और फिर मैं घर से बाहर निकल गया.

“बहनचोद इतनी सर्दी में मेरी गांड में डंडा दे रखा है इन घरवालो ने ” खुद को कोसते हुए मैं खेतो की तरफ जा रहा था . वहां पहुँच कर मैंने अलाव जलाई और खुद को तापने लगा.

“कौन जानवर माँ चुदाने आएगा इस ठण्ड में ,किसकी चोकिदारी करू ” झीखते हुए मैंने चारपाई सीधी की और रजाई ओढ़ कर सो गया. न जाने कितनी देर सोया होऊंगा की झटके से आँख खुल गयी, सरसराहट सी हुई थी. आँखे मलते हुए मैंने टोर्च जलाई और देखने लगा. नीलगायो का झुण्ड खेतो में घुसा हुआ था उनको भगाते हुए मैं कब थोडा आगे की तरफ निकल गया होश ही नहीं रहा. टपकती ओस मेरे खेस को भिगो रही थी , चेहरा ठण्ड से सुन्न पड़ा हुआ था की तभी मेरी नजर थोड़ी दूर रौशनी पर पड़ी, मैंने सोचा आंच ताप कर ही वापिस जाऊंगा.

वहां पहुंचा तो कोई नहीं था आंच सुनहरी जल रही थी तडक तडक लकडिया चटक रही थी , इधर उधर देखा कोई नहीं था . पास में एक लालटेन और किताब पड़ी थी . मैंने उस किताब को उठाया और आंच की रौशनी में देखा. पन्ने को पलटना चाहता ही था की अचानक से मैं कांप गया. किसी ने पीछे से छुआ मुझे . अँधेरी रात में मैं डर सा गया और पलट कर देखा, पलट कर देखा और देखता ही रह गया. चटकती आंच में उसका रूप ठीक वैसे ही चमक रहा था जैसे की सूरज की किरणों में देखा था उसे.

“तुम यहाँ ” मैंने सवाल किया


“मैं नहीं तो और कौन ”
Nice update....
 

HalfbludPrince

मैं बादल हूं आवारा
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आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई. नया साल आपके जीवन में अनेकानेक सफलताएँ एवं अपार खुशियाँ लेकर आए. खूब तरक्की करो, खूब खाओ पियो ऐश करो.
 
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