अध्याय -८
कमरे के बाहर हो रही बारिश की गड़गड़ाहट के बीच मानव ने नंदिनी आंटी के कमरे के दरवाजे पर हल्की सी दस्तक दी। मानव ने अपनी गेस्ट हाउस के स्टाफ को बोलकर डिनर सीधे आंटी के सुइट के डाइनिंग (area) में ही लगवा दिया था, ताकि आंटी के साथ इस एकांत का पूरा फायदा उठा सके। उसका दिल अभी भी तेजी से धड़क रहा था, क्योंकि कुछ देर पहले आईने के सामने देखा आंटी का वह भीगा और मांसल रूप उसके दिमाग से हट नहीं रहा था। तभी दरवाजा खुला और सामने खड़ी नंदिनी आंटी को देखकर मानव की तेज़ नज़रें उनके बदन पर टिक गईं। उन्होंने अब भीगी हुई आसमानी साड़ी उतारकर गहरे मैरून रंग का एक फिटिंग वाला चूड़ीदार सूट पहन रखा था। उस कसी हुई कुर्ती के ऊपर उन्होंने उसी रंग का एक बिल्कुल झीना, जालीदार दुपट्टा डाल रखा था। वह दुपट्टा इतना पारदर्शी था कि उसके आर-पार से नंदिनी के अधखुले, दूध जैसे गोरे और भारी गोलाकार वक्षों का ऊपरी हिस्सा और उनकी गहरी घाटी साफ अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही थी। जब वे सांस लेती थीं, तो उस झीने जालीदार कपड़े के नीचे से वक्षों का उतार-चढ़ाव मानव की आंखों के ठीक सामने एक मदहोश करने वाला नज़ारा पेश कर रहा था। सूट के नीचे उन्होंने काले रंग की टाइट लेगिंग्स पहनी हुई थी। लेगिंग्स के उस तंग और खिंचे हुए कपड़े ने नंदिनी के निचले बदन की कसावट को पूरी तरह उभार दिया था। उनके भारी-भरकम, गठीले और गोल मटोल कूल्हों का वो कसा हुआ घेराव और उनकी मांसल जांघों की गोलाई उस टाइट लेगिंग्स में इस कदर कसी हुई थी कि बदन का एक-एक घुमाव और मांसल उभार पूरी ताकत से बाहर की तरफ आकार ले रहा था। बिना किसी मेकअप के, मद्धम रोशनी में उनका यह मैच्योर और भरावदार बदन किसी कयामत से कम नहीं लग रहा था।
मानव ने अपनी नज़रें आंटी के चेहरे पर टिकने की नाकाम कोशिश करते हुए, अपनी आवाज़ को पूरी तरह नियंत्रित रखते हुए कहा, "आंटी... वो... मैंने स्टाफ से कहकर खाना यहीं अंदर ही लगवा दिया है। बाहर बहुत तेज बारिश है, तो नीचे डाइनिंग हॉल में जाना ठीक नहीं था।" वह अपनी शातिर नज़रों से आंटी के बदन के एक-एक हिस्से को भांप रहा था। नंदिनी ने ठंडी हवा के एक झोंके से सिहरते हुए अपने उस झीने, जालीदार दुपट्टे को दोनों हाथों से थोड़ा और सहेजने की कोशिश की, जिससे उनके वक्षों का उभार कुर्ती के भीतर और भी ज्यादा तन गया। उन्होंने बेहद धीमी और रेशमी आवाज में कहा, "तुमने बहुत अच्छा किया मानव बेटा। इस तूफानी मौसम में मेरा भी बाहर निकलने का मन नहीं था। आओ, अंदर आ जाओ।" दोनों सुइट के अंदर बने छोटे से डाइनिंग टेबल पर आमने-सामने बैठ गए। स्टाफ ने गरमा-गरम खाना सर्व कर दिया था। मानव ने प्लेट्स आगे बढ़ाईं, लेकिन उसने गौर किया कि नंदिनी आंटी का ध्यान खाने पर बिल्कुल नहीं था। वे बार-बार टेबल पर रखे अपने फोन को देख रही थीं।
मानव ने अपनी समझदारी भरी आवाज़ में कहा, "आंटी, आप कुछ सोच रही हैं? प्लीज खाना खाइए, ठंडा हो रहा है।" नंदिनी ने एक लंबी सांस ली और फोन को साइड में रखते हुए बोलीं, "क्या बताऊं मानव... मन बहुत बेचैन है। दिल्ली से यहां तक का सफर हो गया, रात होने को आई और अब तक निखिल का कुछ पता नहीं है। उसका फोन लगातार नॉट रीचेबल आ रहा है। वह अपनी मां को सरप्राइज देने के चक्कर में खुद ही गायब है। मुझे तो समझ नहीं आ रहा कि वो मुंबई में इस वक्त इस तूफानी बारिश में कहाँ होगा।" नंदिनी की आँखों में एक मां की सच्ची चिंता साफ दिख रही थी, जिससे उनके चेहरे का भोलापन और भी ज्यादा निखर कर आ रहा था। मानव ने अपने तेज़ और परिपक्व दिमाग का इस्तेमाल करते हुए बहुत ही सधे हुए लहजे में कहा, "आंटी, आप बेकार में परेशान हो रही हैं। निखिल कोई बच्चा नहीं है। और फिर मुंबई की बारिश का तो आपको पता ही है, यहां नेटवर्क की बहुत दिक्कत होती है। हो सकता है वह अपने कुछ दोस्तों के साथ सेरेमनी की किसी तैयारी में व्यस्त हो या कहीं रुक गया हो। आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए, जैसे ही उससे मेरे मैसेज का पता लगेगा उसका फोन आ जाएगा।"
नंदिनी ने मुस्कुराते हुए मानव की तरफ देखा, "तुम सच कह रहे हो शायद। कॉलेज का आखिरी साल है, तो दोस्तों के साथ ही होगा। वैसे... मुझे बहुत खुशी होती है तुम दोनों को साथ देखकर। तुम दोनों के बीच कभी कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं होता, बिल्कुल सगे भाइयों की तरह रहते हो। निखिल भी तुम्हारी बहुत इज्जत करता है।" मानव ने निवाला तोड़ते हुए कहा, "जी आंटी, निखिल के साथ मेरा कोई मनमुटाव नहीं है। वो बहुत अच्छा है। बस... उसका स्वभाव थोड़ा अलग है , वो कॉलेज में भी ज्यादा किसी से घुलता-milta नहीं है। निखिल को शुरू से ही अकेले रहना, अपनी ही दुनिया में खोए रहना बहुत पसंद है। वो ज़्यादातर समय अकेला ही बिताना पसंद करता है।" नंदिनी ने गहरी सांस लेते हुए सिर हिलाया, "हाँ मानव, तुम ठीक कह रहे हो। निखिल बचपन से ही थोड़ा अंतर्मुखी है। उसे अकेले रहने का एक अजीब सा शौक है, कभी-कभी तो मुझे भी चिंता होती है कि वो किसी से अपने दिल की बात नहीं कहता। लेकिन दूसरी तरफ तुम हो... पढ़ने-लिखने में इतने तेज़, हर चीज़ में अव्वल और इतने समझदार। मीरा सच में बहुत भाग्यशाली है कि उसे तुम्हारे जैसा बेटा मिला जो हर मामले में इतना आगे है।"
मानव ने आंटी की बात सुनकर एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर लाई। उसकी नज़रें अनजाने में टेबल के नीचे लेगिंग्स में कसी नंदिनी आंटी की उन भारी जांघों पर चली गईं जो सोफे की कुशन को दबा रही थीं। उसने धीमी आवाज में कहा, "आंटी, पढ़ाई में तेज़ होना तो ठीक है, लेकिन घर की और आपकी चिंता तो मुझे हमेशा रहती है। मैं जब भी दिल्ली से दूर रहता हूँ, तो बस घर के बारे में... आप लोगों के बारे में ही सोचता रहता हूँ। मुझे लगता है कि अपनों के बिना यह पढ़ाई और कामयाबी भी अधूरी है।" मानव की इस गहरी बात ने नंदिनी के दिल को अंदर तक छू लिया। एक इतना होनहार और पढ़ाई में तेज़ लड़का जब इस तरह की परिपक्व और जज्बाती बातें करता है, तो किसी भी महिला का दिल पिघल जाए। नंदिनी ने टेबल पर आगे झुकते हुए मानव के हाथ पर अपना गर्म और मखमली हाथ रख दिया। जैसे ही उनका स्पर्श मानव को मिला, दोनों के बीच एक करंट सा दौड़ गया। आगे झुकने की वजह से उनके जालीदार दुपट्टे के नीचे से उनके भारी वक्षों का ऊपरी हिस्सा कुर्ती के गले से बाहर की तरफ उभर रहा था। नंदिनी ने बेहद कोमल आवाज में कहा, "मानव... तुम सचमुच एक बहुत ही अनोखे लड़के हो। आज के जमाने में जहाँ बच्चे अपनी कामयाबी के नशे में चूर हो जाते हैं, तुम इतने तेज़ दिमाग होने के बावजूद अपनों के ख्यालों में खोए रहते हो।"
मानव ने आंटी के हाथ के उस गर्म स्पर्श को महसूस करते हुए अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि अपनी उंगलियों से उनके स्पर्श का रस लेने लगा। उसने कहा, "मैं कोशिश करता हूँ आंटी कि अपनी पढ़ाई का इस्तेमाल सही जगह करूँ। वैसे, मां तो चाहती हैं कि मैं कल ग्रेजुएट होने के बाद सीधे दिल्ली लौट आऊं और उनका कंस्ट्रक्शन का पूरा बिजनेस संभाल लूं। पर मेरा मन कुछ और कहता है।" नंदिनी ने अपनी प्लेट में थोड़ा सा खाना लेते हुए पूछा, "अच्छा? तुम्हारा खुद का क्या मन है?" मानव ने आंटी की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "मैं चाहता हूँ कि पहले मैं खुद के दम पर कुछ साल कॉर्पोरेट वर्ल्ड का एक्सपीरियंस लूं। मैं मुंबई या बेंगलुरु में किसी बड़ी फर्म के साथ शुरुआत करना चाहता हूँ। मैं नहीं चाहता कि लोग कहें कि मुझे सब कुछ अपनी मां की बदौलत पका-पकाया मिल गया। मैं अपनी बुद्धिमानी से खुद को साबित करना चाहता हूँ।"
नंदिनी की आँखों में मानव के लिए सम्मान और बढ़ गया। उन्होंने गर्व से सिर हिलाते हुए कहा, "बहुत सुंदर विचार हैं तुम्हारे। अपनी पहचान खुद बनाना ही एक सच्चे मर्द की निशानी है। मुझे पूरा यकीन है कि तुम अपनी इस तेज़ बुद्धि से जो भी करोगे, बहुत आगे जाओगे। और मैं मीरा से खुद बात करूंगी कि वो तुम्हें अपने पंख फैलाने की पूरी आज़ादी दे।" बातचीत का दौर अब काफी लंबा खिंच चुका था और दोनों के बीच की झिझक पूरी तरह पिघल चुकी थी। कमरे के भीतर की हवा अब उन दोनों के जिस्म की गर्मी से और भारी होने लगी थी। तभी मानव ने मुस्कुराते हुए पूछा, "जी आंटी, कल कॉलेज का टॉपर होने के नाते स्पीच भी मुझे ही देनी है। बस... थोड़ा सा नर्वस हूँ कि स्टेज पर सबके सामने कैसा परफॉर्म करूंगा।" यह सुनकर नंदिनी के होठों पर एक शरारती और थोड़ी गंभीर मुस्कान आ गई। उन्होंने अपने टाइट सूट के जालीदार दुपट्टे को थोड़ा और पीछे सरकाया, जिससे उनकी कसी हुई कुर्ती का गला और साफ दिखने लगा। उन्होंने अपनी पलकें झुकाकर और फिर अचानक मानव की आँखों में सीधे देखते हुए बेहद सधे और मखमली लहजे में कहा, "अरे! हमारा इतना हष्ट-पुष्ट, कॉलेज का टॉपर और समझदार बेटा भी स्टेज पर जाने से डरता है? मुझे तो लगा था कि तुम बड़े निडर हो।"
मानव ने अपनी लेगिंग्स में कसी उनकी भारी जांघों की तरफ से नजरें चुराते हुए थोड़ा शर्मा कर कहा, "आंटी... ऐसा कुछ नहीं है। स्टेज का डर तो बड़े-बड़ों को हो जाता है।" नंदिनी ने हल्के से खिलखिलाकर हंसते हुए अपनी कमर को थोड़ा और आगे झुकाया, जिससे कुर्ती का तनाव और बढ़ गया। लेकिन अचानक उनके चेहरे पर दोपहर की वो बात याद आ गई। उनकी मुस्कान थोड़ी गंभीर हो गई और उन्होंने मानव की आँखों में देखते हुए कहा, "वैसे मानव... निडर होना अच्छी बात है, लेकिन अपने दोस्तों की संगत पर थोड़ा ध्यान दो। आज दोपहर जब हम कॉलेज कैंपस में आ रहे थे, तो तुम्हारे उन दो बदतमीज दोस्तों ने मुझे जिस तरह घूरा और जो शब्द इस्तेमाल किया... मुझे अभी तक सोचकर घिन आ रही है।" मानव का शातिर दिमाग तुरंत सतर्क हो गया। उसे याद था कि दोपहर में कैसे उन लड़कों ने उसकी माँ की उम्र की इस अप्सरा को देखकर सीधे 'माल' कह दिया था, जिसे सुनकर नंदिनी आंटी का पारा चढ़ गया था और उन्होंने वहीं पर मानव को बुरी तरह डांट लगा दी थी।
नंदिनी ने अपनी बाहें सोफे पर कसते हुए थोड़े गुस्से और डांट वाले लहजे में आगे कहा, "मैंने तुम्हें दोपहर में भी डांटा था और अभी फिर कह रही हूँ... कैसे-कैसे आवारा दोस्त हैं तुम्हारे? एक महिला को, जो तुम्हारी माँ जैसी है, उसे देखकर कोई ऐसी घटिया भाषा कैसे इस्तेमाल कर सकता है? 'माल' कहा उन्होंने मुझे! क्या यही संस्कार हैं आजकल के लड़कों के? और तुम वहां चुपचाप खड़े रहे, तुमने उन्हें वहीं थप्पड़ क्यों नहीं मारा? क्या तुम्हें अच्छा लग रहा था कि तुम्हारे दोस्त मुझे उस नज़र से देख रहे थे? या फिर तुम खुद भी...?" यह बोलते-बोलते नंदिनी अचानक खुद रुक गईं। गुस्से और शर्म के घालमेल से उनका गोरा चेहरा और गर्दन पूरी तरह से लाल हो चुके थे। उस जालीदार दुपट्टे के पार से उनकी छाती की धड़कनें बहुत तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थीं, जिससे उनकी कुर्ती की कसावट और वक्षों का उभार मानव की आँखों के सामने बिल्कुल स्पष्ट होकर कांप रहा था।
मानव ने अपनी गहरी सांस को अंदर ही रोका। उसने टेबल पर रखे पानी के गिलास को उठाया, एक घूंट पिया और अपनी शातिर आँखों में एक गहरी संजीदगी और पछतावा लेकर सीधे नंदिनी की आँखों में झांका। उसने टेबल पर थोड़ा और आगे झुककर नंदिनी के करीब आते हुए कहा, "आंटी... प्लीज शांत हो जाइए। मुझे पता है कि दोपहर में उन दो जाहिलों ने जो कहा, वो माफ़ करने लायक नहीं है। सच तो यह है आंटी, कि जब उन्होंने आपको 'माल' कहा... तो मेरा खून खौल उठा था। मेरा मन किया कि मैं वहीं उनके दांत तोड़ दूँ। लेकिन आप खुद सोचिए, मैं कॉलेज का टॉपर हूँ, कल मुझे स्टेज पर गोल्ड मेडल और स्पीच देनी है। अगर मैं कैम्पस के बीचों-बीच उन गवारों से मारपीट करने लगता, तो बात कितनी बढ़ जाती? पुलिस केस होता, कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन बीच में आता... और सबसे बड़ी बात, आपकी बदनामी होती। लोग बातें बनाते कि एक लड़के की माँ के लिए कॉलेज के टॉपर ने मारपीट की।”
मानव की इस तेज़ और समझदारी भरी दलील को सुनकर नंदिनी का गुस्सा थोड़ा ठंडा होने लगा, लेकिन उनके चेहरे पर अभी भी झिझक थी। मानव ने मौके का फायदा उठाते हुए अपनी आवाज़ को और गहरा किया, "और आंटी... आपने मुझसे पूछा कि क्या मुझे अच्छा लग रहा था कि वो आपको उस नज़र से देख रहे थे? भगवान के लिए ऐसा मत कहिए। आपकी इज़्ज़त मेरी माँ मीरा जैसी है। बल्कि सच कहूँ तो... आपमें जो शालीनता और सौंदर्य है, वो उन आवारा लड़कों की समझ से बाहर है। वो तो गवार हैं जो किसी भी खूबसूरत महिला को देखकर अपनी औकात दिखा देते हैं। पर मेरी खामोशी डर नहीं थी आंटी... वो आपको उस तमाशे से बचाने की मेरी समझदारी थी। प्लीज मुझपर गुस्सा मत होइए, आपके इस गुस्से से मेरा दिल बैठ रहा है।”
खूबसूरत महिला' और 'दिल बैठ रहा है' जैसे शब्द जब मानव के मुंह से बेहद संजीदगी से निकले, तो नंदिनी आंटी के अंदर का गुस्सा पूरी तरह पिघल गया। मानव की शातिर बुद्धि ने अपनी कायरता को इतनी चतुराई से 'मर्यादा और सुरक्षा' का नाम दे दिया था कि संस्कारी नंदिनी उसकी मुरीद हो गईं। नंदिनी ने अपनी लेगिंग्स में कसी जांघों को थोड़ा ढीला किया और सोफे पर पीछे टिकते हुए एक लंबी, राहत की सांस ली। उनका जालीदार दुपट्टा उनके बदन पर थोड़ा और ढीला हो गया। उन्होंने मानव की तरफ एक बेहद शर्मीली और माफ़ी भरी नज़र से देखा और धीमी आवाज़ में बोलीं, "मुझे माफ़ कर देना मानव बेटा... मैं गुस्से में थोड़ा ज़्यादा बोल गई। मैंने यह नहीं सोचा था कि तुम मेरी बदनामी से डर रहे थे। तुम सचमुच बहुत समझदार और तेज़ हो। तुम्हारी माँ ने तुम्हें बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं
नंदिनी ने जब सोफे पर पीछे टिकते हुए मानव की तरफ देखा, तो कमरे की मद्धम पीली रोशनी सीधे उनके चेहरे और जालीदार दुपट्टे से छनकर उनके वक्षों पर पड़ रही थी। मानव की आँखें नंदिनी के माफ़ी मांगने के बाद भी उनके होठों और फिर नीचे कुर्ती की तंग कसावट पर टिकी रह गईं। वह चाहकर भी अपनी नज़रों को वहां से हटा नहीं पा रहा था। नंदिनी ने यह बात पूरी तरह नोटिस की। उन्हें साफ़ अहसास हो गया कि मानव जिस शालीनता से बात कर रहा है, उसकी नज़रें वैसी नहीं हैं। उसकी शातिर और जवान आँखें बार-बार उनके इस कसे हुए सूट और लेगिंग्स के उभारों का नाप ले रही थीं। एक संस्कारी महिला होने के नाते नंदिनी को तुरंत थोड़ा असहज होना चाहिए था, लेकिन अजीब बात यह थी कि इस तूफानी रात में, अपने अकेलेपन के बीच, एक इतने होनहार और खूबसूरत लड़के की इस दबी हुई दीवानगी से उनके बदन में एक मीठी सी सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी नजरें नीचे झुकाते हुए, बहुत ही नज़ाकत से अपने जालीदार दुपट्टे को थोड़ा और आगे खींचा ताकि छाती का वो हिस्सा छुप सके, पर इस हरकत से कुर्ती का कपड़ा उनके वक्षों पर और कस गया
नंदिनी ने अपनी नीचे के होठ को हल्के से दांतों तले दबाते हुए, बेहद धीमी और कांपती हुई आवाज़ में पूछा, "मानव बेटा... तुम... तुम मुझे इस तरह क्यों देख रहे हो?" उनकी आवाज़ में डांट नहीं, बल्कि एक शर्मीली झिझक थी। मानव एक पल के लिए पकड़ा गया, पर उसका दिमाग बहुत तेज़ था। उसने नज़रें चुराने के बजाय अपनी आवाज़ को और भारी किया, "माफ़ करना आंटी... पर आज दोपहर के बाद से जब भी मैं आपको देखता हूँ, मुझे बस यही लगता है कि दिल्ली की इस चकाचौंध से दूर आप इस सादगी में कितनी कयामत लगती हैं। यह सूट आप पर... बहुत फबता है।" 'कयामत लगती हैं' और 'सूट बहुत फबता है' सुनकर नंदिनी का पूरा बदन अंदर तक कांप गया। उन्होंने चाय का खाली कप हाथ में लेते हुए बात को मोड़ने की कोशिश की, "बदमाश... बहुत बातें बनाना सीख गए हो मुंबई आकर। अपनी मां की सहेली की ऐसी तारीफ करते हैं? चलो, अब खाना खाओ, बहुत रात हो रही है।”
डिनर टेबल की खामोशी अब बहुत गहरी हो चुकी थी। दोनों ने धीरे-धीरे खाना खत्म किया, लेकिन हवा में जो एक अनकहा तनाव था, वह कम नहीं हो रहा था। खाना खत्म होने के बाद मानव खड़ा हुआ और उसने बर्तन समेटने में आंटी की मदद की। जैसे ही वह टेबल साफ करने के लिए आगे बढ़ा, उसका हाथ अनजाने में नंदिनी की मखमली कलाई से छू गया। दोनों अपनी-अपनी जगह पर एक सेकंड के लिए ठहर गए। नंदिनी ने तुरंत अपना हाथ पीछे खींचा और खिड़की की तरफ मुड़ गईं, जहाँ बाहर अभी भी बारिश की बूंदें कांच से टकरा रही थीं। नंदिनी ने खिड़की के पास खड़े होकर, अपनी लेगिंग्स में कसी भारी काया को थोड़ा सा सिकोड़ते हुए कहा, "मानव... रात के 11 बज चुके हैं। निखिल का फोन अभी भी नहीं आया। मुझे सच में बहुत डर लग रहा है।" मानव उनके ठीक पीछे आकर खड़ा हो गया। उनके बीच सिर्फ दो इंच की दूरी थी। मानव को उनके भीगे बालों से आती मोगरे की महक साफ़ आ रही थी। उसने पीछे से ही बहुत ही सांत्वना भरी आवाज़ में कहा, "आंटी, मैंने आपसे कहा ना, आप चिंता मत कीजिए। मैं सुबह होते ही कॉलेज के एडमिनिस्ट्रेशन और उसके दोस्तों को फोन करूँगा। निखिल यहीं मुंबई में ही है, सुरक्षित होगा। आप बस अब आराम कीजिए, कल का दिन बहुत बड़ा है हमारे लिए।
नंदिनी ने मुड़कर मानव की आँखों में देखा। इस बार दूरी इतनी कम थी कि दोनों की सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। नंदिनी को मानव की चौड़ी छाती और उसका हष्ट-पुष्ट शरीर अपने बहुत करीब महसूस हो रहा था। नंदिनी ने अपनी शर्मीली आँखें ऊपर उठाते हुए कहा, "तुम ठीक कह रहे हो... शुक्रिया मानव, आज अगर तुम मेरे साथ न होते, तो मैं इस अनजान शहर में इस रात को अकेले पागल हो जाती।" मानव ने अपनी शातिर आँखों से सीधे उनके दिल में झांकते हुए कहा, "मैं हमेशा आपके साथ हूँ आंटी... हमेशा।" नंदिनी ने एक गहरी सांस ली, जो उनकी छाती को पूरी ताकत से उभार कर शांत हो गई। उन्होंने धीरे से कहा, "अच्छा... अब तुम भी अपने कमरे में जाओ और सो जाओ। शुभ रात्रि, मानव बेटा।" मानव ने मुस्कुराते हुए कहा, "शुभ रात्रि आंटी।" और बहुत ही शालीनता से कदम पीछे खींचते हुए कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजे पर पहुँचकर उसने एक आखिरी बार लेगिंग्स-सूट में खड़ी उस चालीस पार की अप्सरा को देखा, जिसने आज उसकी रातों की नींद छीन ली थी, और फिर दरवाजा धीरे से बंद करके अपने बगल वाले कमरे में चला गया।
कमरे का दरवाजा बंद होने के बाद, दोनों के बीच का वह अनकहा तनाव अब दीवार के आर-पार दो अलग-अलग कमरों में सिमट चुका था। मानव अपने कमरे में आया और उसने सीधे बेड पर खुद को गिरा दिया। कमरे की बत्ती बुझाने के बाद भी अंधेरे में उसकी आंखों के सामने सिर्फ और सिर्फ नंदिनी आंटी का वह मैरून सूट, उनकी लेगिंग्स की तंग कसावट और उस जालीदार दुपट्टे के पार से झलकती उनके गोरे जिस्म की मखमली चमक ही घूम रही थी। वह अपनी शातिर और तेज़ बुद्धि के लिए कॉलेज भर में जाना जाता था, जो हर मुश्किल सवाल का जवाब पल भर में ढूंढ लेता था, लेकिन आज रात वह खुद एक ऐसी पहेली में उलझ गया था जिसका कोई सिरा उसे नहीं मिल रहा था। जब उसने आंटी को 'खूबसूरत महिला' कहा था, तब उसकी आवाज़ में सिर्फ आदर नहीं था, बल्कि एक जवान मर्द की बेकाबू प्यास थी, जिसे नंदिनी आंटी ने भी साफ भांप लिया था। मानव ने करवट बदली, पर उसके बदन के भीतर जवानी का जो ज्वालामुखी आज दोपहर से सुलग रहा था, वह इस तूफानी रात की ठंडी हवाओं में और भी ज्यादा भड़क रहा था। उसने अपनी आँखें बंद कीं, तो उसे महसूस हुआ कि उसकी उंगलियां अभी भी अनजाने में छुई आंटी की उस गर्म और कोमल कलाई के स्पर्श से सुन्न थीं। वह समझ चुका था कि कल की ग्रेजुएशन सेरेमनी चाहे जो भी मोड़ ले, लेकिन दिल्ली लौटने तक वह इस अपनी दोस्त की अप्सरा जैसी माँ के जादू से कभी आजाद नहीं हो पाएगा।
उधर बगल के कमरे में, नंदिनी आंटी बेड पर लेटी हुई छत को निहार रही थीं, लेकिन उनका दिल किसी अशांत समंदर की तरह हिल रहा था। उन्होंने अपने बदन पर ओढ़ी हुई पतली चादर को थोड़ा और कस लिया, जैसे वह खुद को उस अनजाने अहसास की गर्मी से बचाना चाहती हों जो मानव उनके भीतर छोड़ गया था। चालीस पार की इस ढलती उम्र में, खुद को हमेशा संस्कारी और मर्यादा की प्रतिमूर्ति मानने वाली नंदिनी के लिए आज की रात एक बहुत बड़ा इम्तिहान थी। वे कोई नादान या कमज़ोर लड़की नहीं थीं; वे एक बेहद मैच्योर, समझदार और संस्कारी महिला थीं। उन्हें साफ याद था कि जब वे टेबल पर आगे झुकी थीं, तो मानव की भूखी और प्यासी नज़रें उनके जालीदार दुपट्टे के पार और लेगिंग्स में कसी उनकी भारी जांघों पर किस कदर डेरा डाले हुए थीं। मानव तो अभी नया-नया कॉलेज पास आउट हुआ जवान लड़का था, जिसके खून में उबाल था, लेकिन नंदिनी को अपनी सीमाओं का अच्छी तरह भान था। वे अंधेरे में गहरी सांस लेते हुए खुद को पूरी दृढ़ता से संभालने लगीं। उन्होंने मन ही मन फैसला किया कि कल सुबह से उन्हें मानव की इन सुलगती निगाहों और ऐसी तीखी तारीफों से हर हाल में बचना होगा। आखिर मानव उनकी सगे से बढ़कर सहेली मीरा का बेटा था, उनके अपने बच्चे जैसा था। इस पवित्र रिश्ते की मर्यादा को वे किसी भी हाल में आंच नहीं आने दे सकती थीं। उन्होंने अपने भीतर पनप रहे उस अनजाने, कामुक अहसास को पूरी तरह से कुचलकर खत्म करने की कसम खाई।
इसके बाद उनका ध्यान तुरंत अपने बेटे निखिल पर चला गया। दिल्ली से मुंबई तक का वो लंबा, उबाऊ और थका देने वाला ट्रेन का सफर और ऊपर से मुंबई पहुंचने के बाद से अब तक निखिल का कोई अता-पता न होना—इस चिंता ने उनके दिमाग को बुरी तरह थका दिया था। वे तो ट्रेन की मार झेलकर इतनी दूर सिर्फ इसलिए आई थीं ताकि कल अपने बेटे को स्टेज पर डिग्री लेते देख सकें और उसे एक मां का खूबसूरत सरप्राइज दे सकें, लेकिन अब तक उससे कोई संपर्क न हो पाना उनके दिल को डरा रहा था। ट्रेन के सफर की भयानक शारीरिक थकान और बेटे के लिए लगातार सताती इस गहरी मानसिक चिंता के दोहरे प्रभाव की वजह से उनकी पलकें लोहे की तरह भारी होने लगी थीं। कमरे की मद्धम रोशनी में, बाहर खिड़की के कांच पर गिरती पानी की बूंदों की थपकियों को सुनते-सुनते, नंदिनी आंटी का थका-हारा और बोझिल शरीर अब पूरी तरह बेदम हो चुका था। निखिल की फिक्र में डूबा उनका दिमाग धीरे-धीरे सुन्न होने लगा, और ट्रेन के सफर के अटूट दर्द और थकान के मारे वे बिना कोई दूसरी करवट बदले एक गहरी और भारी नींद के आगोश में समा गईं।