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Thank you, Kal ayegaa jabardast updateकाफी समय के बाद इतनी शानदार कहानी पढ़ी है जल्दी से अगला अपडेट दीजिए
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Nice update
नीतू के होंठों पर चुम्बन देकर वह बोला, "...नीतू, तुम पर पहला हक हरीश का है, उसके बाद मेरा। लेकिन मैं किसी भी कारण से हक नहीं जताऊँगा। तुमसे सिर्फ़ प्यार चाहता हूँ। हरीश से बात करने पर ही मुझे उसका स्वभाव समझ आ गया। वह भी तुम पर हक नहीं जताएगा। तुम्हारा कौमार्य मेरे लिए ज़रूरी नहीं है। मेरी नीतू मेरी बाहों में है, यही काफी है। मैं बहुत खुश हूँ। कल तुम्हारे गले में मंगलसूत्र बाँधने के बाद मैं पूर्ण हो जाऊँगा।"
अशोक के सीने पर सिर टिकाकर नीतू बोली, "...जी, मेरे दोनों पति बहुत अच्छे हैं। मुझ पर अपना हक जताने के बजाय मैं ही उन पर अधिकार जमा रही हूँ, है ना? लेकिन शादी के दिन तुम मेरे किस हिलते-डुलते अंग को देखकर मोहित हुए थे, उसे ही मैं तुम्हें उपहार में दूँगी। उस जगह पर मेरे पति ने भी अपना हक नहीं जताया। वह मौका मेरे दूसरे पति को देने के लिए, तुम्हारी इच्छा पूरी करने के लिए मैं हमेशा तैयार हूँ।"
नीतू की बात से बहुत खुश होकर अशोक बोला, "...थैंक्स, चिन्नू। कई बार मैंने खुद पूछना चाहा, लेकिन डर था कि तुम पीछे से करने को राज़ी होगी या नहीं। तुम जो दे रही हो, वह मेरे जीवन का सबसे अनमोल उपहार है। इसके बदले मैंने भी परसों कुछ सोचा था, अब बता रहा हूँ। जब तक रश्मि की पढ़ाई पूरी नहीं होती, वह अपनी पहली माँ के साथ रहेगी। इसके बाद वह अपनी दूसरी माँ के साथ जीवनभर रहे, यही मेरी इच्छा है।"
अशोक की बात समझ न आने पर नीतू बोली, "...यह क्या है, ठीक से समझाओ ना?"
नीतू के चेहरे को अपनी हथेलियों में लेकर अशोक बोला, "...मैंने गिरीश से रश्मि की शादी करने का फैसला किया है। इससे हमारे दोनों परिवार और करीब आएँगे, और तुम्हारी छत्रछाया में रश्मि भी सुरक्षित रहेगी।"
अशोक की बात सुनकर नीतू हैरानी से उसकी ओर देखते हुए बोली, "...तुम क्या कह रहे हो? रश्मि और गिरीश की शादी? यहाँ तुम उसकी माँ के शरीर का मज़ा ले रहे हो, उसकी माँ को मंगलसूत्र बाँधने की तैयारी कर रहे हो, और उसे रश्मि देकर शादी करवाओगे!!!"
नीतू के गालों को सहलाते हुए अशोक बोला, "...नीतू, हमारा रिश्ता सिर्फ़ हम दोनों का है। लेकिन अगर वे दोनों एक हो गए, तो वे जीवनभर खुश रहेंगे, यह मुझे समझ आ गया है। दोनों के मन में बड़ों के लिए सम्मान है, पढ़ाई के प्रति लगन है, और मन में ज़रा भी मैल नहीं है। अगर वे शादी करेंगे, तो बहुत आत्मीय दांपत्य जीवन जिएँगे, मुझे पूरा यकीन है। मान जाओ।"
अशोक के गाल को काटते हुए नीतू बोली, "...रश्मि मुझे भी बहुत पसंद है। लेकिन यह फैसला सिर्फ़ हम दोनों का लेना गलत होगा। मैं उसके पापा से और तुम अपनी पत्नी से बात करो। फिर सोचेंगे। दोनों अभी तो सिर्फ़ पहले पीयूसी में पढ़ रहे हैं। अभी पाँच-छह साल का समय है। लेकिन बड़ा चालाक हो तुम, कण्री! मुझे फँसाकर चार दिन से भोग रहे हो। अभी भी तुम्हारी कामदण्ड मुझे ठोकने के लिए सिर उठा रही है। साथ ही, हमारे बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित कर रहे हो। एक सवाल पूछूँ, लेकिन बुरा मत मानना।"
नीतू की जाँघों के बीच सिर डालकर उसके रति मंदिर को चाटते हुए अशोक बोला, "...तू कुछ भी पूछ, मुझे किसी भी कारण से बुरा नहीं लगेगा।"
अशोक के सिर को अपने रति मंदिर पर दबाते हुए नीतू बोली, "...जी, पहले से शादीशुदा होने के बावजूद मैं इस तरह तुम्हारे सामने पल्लू गिरा रही हूँ। क्या कभी तुम्हें लगा कि मैं चरित्रहीन औरत हूँ?"
नीतू के रति मंदिर में जितना मुमकिन था, उतनी जीभ डालकर चाटते हुए अशोक बोला, "...नीतू, अगर मेरे मन में तुम्हारे बारे में कभी कोई गलत विचार आया, तो वह मेरे जीवन का आखिरी दिन होगा। अगर पूरी दुनिया के पुरुष तुम्हारे शरीर का भोग करें, तब भी तुम मेरे लिए वही प्यारी नीतू रहोगी।"
अशोक के शब्दों में छिपे प्यार से अभिभूत होकर नीतू बोली, "...अगर मेरी जगह तुम्हारी पत्नी रजनी होती?"
अशोक ज़ोर से हँसते हुए बोला, "...नीतू, मैंने एक सोच रखी है—पत्नियों की अदला-बदली। यानी तुम्हारा पति रजनी के साथ और मैं तुम्हारे साथ। बेशक, कल हम दोनों शादी करके सती-पति बन जाएँगे, लेकिन समाज के सामने हरीश ही तुम्हारा पति है।"
अशोक की बात से हैरान होकर नीतू बोली, "...मेरे हरीश और रजनी के साथ? नो चांस, यह मुमकिन ही नहीं। छोड़ो। यह अदला-बदली का विचार क्यों? वैसे भी तुम तो मुझे भोग ही रहे हो। आगे भी मौका मिलने पर मुझे छोड़ोगे क्या?"
नीतू की चूत से टपकी तीन-चार बूँद अमृत को चाटते हुए अशोक बोला, "...हरीश की इतनी सुंदर पत्नी मुझे मिली है, तो बेचारे को मेरी पत्नी रजनी का शरीर मिल जाए, तो क्या गलत है? अब दशहरा है। तुम्हें अपने परिवार के साथ दीवाली पर हमारे घर ज़रूर आना है। तब मेरे कमरे का बिस्तर, जहाँ हमारा पहला मिलन हुआ था, कितना बड़ा है ना? उस पर एक तरफ हरीश मेरी पत्नी रजनी के साथ कामक्रीड़ा करेगा, और दूसरी तरफ हरीश के सामने मैं तुम्हारे रति मंदिर को भोगूँगा। यह पक्का होगा, गारंटी।"
नीतू हँसते हुए बोली, "...उस बिस्तर पर तुम सिर्फ़ मुझे ही भोग सकते हो। हरीश के बारे में मुझे पता है, वह कभी नहीं मानेगा। चाहो तो चैलेंज। अगर वह मान गया, तो मैं तुम्हारी एक सबसे नीच इच्छा पूरी करूँगी। मुझे पता है, हर पुरुष के मन की गहराई में कोई न कोई नीच, घिनौनी कल्पना होती है। तुम्हें सिर खुजाने की ज़रूरत नहीं। लेकिन अगर हरीश नहीं माना, तो तुम्हें जीवनभर मेरी बात माननी होगी।"
अशोक हँसते हुए बोला, "...यह एक शर्त है। तुम जीती या नहीं, मैं जीवनभर तुम्हारी बात मानूँगा, तुम्हारा दास हूँ। देख, मैंने तुम्हारे गले में मंगलसूत्र बाँधने की इच्छा पूरी करने के लिए कैसे योजना बनाई। अब दीवाली का धमाका कैसा होगा, यह देखना। अब बातें बहुत हो गईं, अपनी जाँघें चौड़ा कर।"
तीसरे दौर में नीतू के जन्म और पले-बढ़े घर के पूजा कक्ष को छोड़कर बाकी हर हिस्से में अशोक ने नीतू को गोद में उठाकर घुमाया। उसने उसे सोफे पर लिटाया, कुर्सी पर अपनी जाँघों पर बिठाया, खिड़की की ग्रिल पकड़कर झुकाकर खड़ा किया, रसोई की शेल्फ पर, पिछवाड़े के दरवाज़े पर टिकाकर, और हॉल के फर्श पर लिटाकर हर जगह नीतू के शरीर का भोग किया। नीतू ने भी उसकी हर हरकत में पूरी तरह सहयोग दिया और चुदवाया। एक ही थाली में अशोक की जाँघ पर नग्न बैठकर नीतू ने खाना खाया। उसने अशोक को उसकी उतारी हुई पैंटी पहनाई और उसकी चड्डी खुद पहनकर दिखाई। अशोक ने अपनी कामदण्ड पर शहद और घी लगाकर नीतू से चुसवाया, फिर उसके रति मंदिर में शहद डालकर खुद चाटा। इसके बाद उसने नीतू के सामने मूत्र विसर्जन किया और नीतू का मूत्र विसर्जन देखते हुए दोनों ने अपनी फंतासियों को पूरा किया। शाम तक चार बार नीतू के रति मंदिर में अपनी कामदण्ड डालकर चोदने के बाद अशोक ने उसके पाँच जोड़ी कपड़े लिए और उसे अपने घर ले गया।
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घर में कदम रखते ही दरवाज़े का कुंडा लगाने के बाद फिर से नग्न होने की बारी नीतू की थी। जिस सोफे पर नीतू पहले दिन रश्मि के साथ बैठी थी, उसी पर उसे नग्न लिटाकर अशोक ने 40 मिनट तक उसके शरीर का आनंद लिया। रात एक बजे तक दोनों ने चार बार कामक्रीड़ा की, फिर अशोक उसे नग्न अवस्था में घर की तीसरी मंजिल की छत पर ले गया। नीतू के जीवन में पहली बार इस तरह खुले स्थान पर नग्न खड़े होने से उसका पूरा शरीर रोमांचित हो गया। वहाँ ओवरहेड टैंक के लिए 15 फीट ऊँचा और 10 फीट चौड़ा एक प्लेटफॉर्म था, जिस पर सीढ़ियों से चढ़ाया गया।
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उस ऊँचे स्थान से नीतू को अपने जन्म और पले-बढ़े गाँव का हर कोना दिख रहा था। वह जगह पूरी तरह अंधेरी थी और आसपास के सभी घरों से ऊँची होने के कारण उनके नग्न होने का किसी को पता चलने की संभावना नहीं थी। वहाँ लगी ग्रिल को पकड़कर नीतू को झुकाकर खड़ा करने के बाद अशोक ने उसकी कमर पकड़ी और पीछे से अपनी कामदण्ड को उसके रति मंदिर में डालकर चोदना शुरू किया। नीतू को इस तरह पहली बार खुले आकाश के नीचे अपने रति मंदिर को चुदवाने का नया अनुभव बहुत पसंद आया, और उसने खुद को पूरी तरह अशोक को समर्पित कर दिया।
सोमवार सुबह 10 बजे से मध्यरात्रि 2 बजे तक लगातार चुदाई की थकान को दूर करने के लिए दोनों मंगलवार सुबह 9 बजे तक सोते रहे। अशोक के साथ अपनी रासलीला के बीच भी नीतू ने अपनी माँ की ज़िम्मेदारी नहीं भूली और अपने पति को 10 बार फोन करके बच्चों से बात की। उसने पति को बच्चों की सावधानी बरतने, दोनों की सेहत का ध्यान रखने, और खासकर शरारती सुरेश पर विशेष नज़र रखने की 50 से ज़्यादा बार हिदायत दी। हरीश बार-बार वही बात सुनकर तंग आ चुका था और बोला, "...मैं उनका पापा हूँ, यार। मुझे भी उनकी फिक्र है।" फिर भी नीतू वही बात दोहराती रही।
सुबह सबसे पहले नीतू जागी और अशोक को अपने सीने पर सिर रखकर नग्न अवस्था में गले लगाए सोते देखकर एक पल शरमा गई। बच्चों की याद आते ही उसने फोन उठाकर पति को कॉल किया और बच्चों से बात करके उनकी खबर ली। पति से बात करते समय अशोक ने उसे खींचकर बिस्तर पर लिटाया और उसके एक स्तन को मुँह में लेकर चूसना शुरू किया। नीतू के दोनों स्तनों को चूसने के बाद अशोक ने उसकी जाँघें चौड़ी कीं और सुबह की स्वाभाविक उत्तेजना से खड़ी अपनी कामदण्ड को उसके रति मंदिर में डालकर चोदना शुरू किया। पति से फोन पर बात करते हुए अशोक से अपने रति मंदिर को ठोकवाना नीतू को हर अनुभव से ज़्यादा सुखद लगा। वह पति से बात करते हुए अशोक को गले लगाकर अपने कूल्हों को उठाकर सहयोग देती हुई चुदवाती रही। फोन काटने के बाद अशोक ने भैंसे से भी ज़्यादा रफ्तार से ठोकना शुरू किया और 45 मिनट तक उसके शरीर का आनंद लिया।
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दोनों ने साथ में नहाकर तैयार होने तक अशोक ने पहले से ऑर्डर किया हुआ होटल का खाना घर के मुख्य दरवाज़े के पास लगे हुक पर टाँग दिया था। नहाने के बाद तौलिया लपेटकर बाल सुखाने के बाद नीतू ने हरी पैंटी और नीली ब्रा पहनी और चूड़ीदार पहनने लगी, तभी अशोक ने उसे रोका और अनुरोध किया कि जब तक वह यहाँ है, नग्न या सिर्फ़ ब्रा-पैंटी में रहे। उसकी बात सुनकर नीतू हँसते हुए बोली, "...मैं कपड़े पहनूँ तो भी तुम मुझे उतारकर नंगी खड़ा कर देते हो।" वह डाइनिंग के पास आई और अशोक की जाँघ पर कुर्सी पर बैठकर एक-दूसरे को खिलाते हुए नाश्ता किया।
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नीतू उसके होंठों पर चुम्बन देने के लिए झुकी, तभी उसका फोन बजा। कॉल रिसीव करने पर उसकी पत्नी रजनी बात कर रही थी। उसने पति की खबर ली और बताया कि उसके पिता की सेहत सुधर रही है। माँ से फोन लेकर रश्मि ने पापा से बात शुरू की, तो नीतू उठी और अशोक को भी खड़ा किया। अशोक पूरी तरह नग्न खड़ा था। नीतू ने उसके सामने घुटनों पर बैठकर उसकी कामदण्ड को मुँह में लिया और चूसना शुरू किया। अशोक अपनी बेटी से बात करते हुए अपनी होने वाली सास नीतू को कामदण्ड चुसवा रहा था। फोन काटने के बाद उसने नीतू को उठाकर एक कमरे में ले जाकर नीचे उतारा। नीतू ने चारों ओर देखा, तो दीवार पर रश्मि की तस्वीरें चमक रही थीं। अशोक के प्रस्ताव के बाद से नीतू ने भी रश्मि को अपनी बहू बनाने का मन बना लिया था।
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"हम अपनी होने वाली बहू के कमरे में क्यों आए?" नीतू ने पूछा। अशोक ने उसे गले लगाकर कहा, "...एक दिन अगर तुम्हारा बेटा मेरी बेटी को किसी बात पर डाँटेगा, तो मेरी बेटी उसे कहेगी, 'चुप रहो, मेरे पापा ने पहले तुम्हारी माँ को मेरे कमरे में चोदकर मज़ा लिया था।' इसलिए यहाँ आए हैं।" नीतू ने उसे घूरकर देखा और नकली गुस्से से उसके सीने पर चपत मारी।
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अशोक ने उसे उठाकर बिस्तर पर लिटाया और नीली ब्रा उतारे बिना उसके कप्स को नीचे सरकाकर स्तनों को बाहर निकाला और चूसते हुए मसलना शुरू किया। उसी समय शीला का फोन आया, तो नीतू ने उसे रिसीव करके बात शुरू की। नीतू की हरी पैंटी का अगला हिस्सा हटाकर रति मंदिर को उजागर करने के बाद अशोक ने अपनी कामदण्ड को उसमें डालकर चोदना शुरू किया। नीतू अपनी पक्की सहेली से बात करते हुए अपनी होने वाली बहू रश्मि के बिस्तर पर लेटकर उसके पापा से चुदवाने के अनुभव से रतिरस की गंगा बहा रही थी और अपने होने वाले ससुर अशोक की कामदण्ड का अभिषेक कर रही थी।
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शीला से बात करते समय नीतू की रुक-रुककर बोलने वाली आवाज़ और बीच-बीच में "...हाँ... म्म... आह..." जैसी कराहट की आवाज़ें सुनकर शीला ने ध्यान से सुनना शुरू किया। नीतू की भारी साँसों और "...हाँ... हाँ... आह..." जैसे स्वर सुनकर शीला को समझ आ गया कि उसकी सहेली किसी के साथ कामक्रीड़ा में तल्लीन है। नीतू ने फोन काटा, तो अपनी होने वाली बहू के बिस्तर पर अपने पापा को गले लगाकर कूल्हों को उठाकर चुदवाते हुए बोली, "...जी, मेरा बेटा भी तुम्हारी बेटी को ऐसे ही चोदेगा ना? उसकी सास बनने वाली मुझे उसके बिस्तर पर उठाकर भोग रहे हो... हाँ... अम्मा... आह... अशोक, और ज़ोर से फाड़ दो... आह... आह... कितना मज़ा आ रहा है, बता नहीं सकती... हाँ... हाँ... हाँ... आह... अशोक, ले लो, फिर से तुम्हारी कामदण्ड का मेरे रस से अभिषेक।" यह कहते हुए उसने फिर से स्खलन किया।
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45 मिनट तक रश्मि के बिस्तर पर नीतू के शरीर को लुढ़काकर उसके रति मंदिर को भोगकर चिथड़े करने के बाद अशोक ने उसके गर्भ में ज़बरदस्त रस की वर्षा की और उसके पास ही लुढ़क गया। नीतू के रति मंदिर से उसका रतिरस और अशोक का कामरस मिलकर बाहर टपक रहा था, जिसने अशोक द्वारा बिना उतारी हरी पैंटी को पूरी तरह गीला कर दिया था।
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फोन रखने के बाद शीला सोच में डूब गई। उसे याद आया कि नीतू अशोक के साथ उसके घर गई थी। यह बात दिमाग में आते ही उसने न अशोक को और न ही नीतू को फोन किया। लेकिन रजिस्ट्रेशन के दिन ज़मीन के परिचय से कुछ ही समय में बहुत आत्मीय हो चुकी अशोक की पत्नी रजनी ने फोन किया। कुछ देर आपसी कुशलक्षेम पूछने के बाद शीला बोली, "...आपके पति की मदद से मेरे बेटे को आपके अंकल के कॉलेज में सीट मिली, इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।" रजनी हँसते हुए बोली, "...अरे, इतनी छोटी सी बात के लिए धन्यवाद मत कहो। हम सब दोस्त हैं, तो इतना तो बनता है। मैं खुद तुम दोनों के घर आना चाहती थी, लेकिन उस दिन जब नीतू मेरी बेटी के साथ हमारे घर आई थी, तभी मेरे पिता की तबीयत खराब होने की खबर मिली और मुझे उसी पल बेटी के साथ मायके जाना पड़ा। गाँव लौटने के बाद हम सब ज़रूर मिलेंगे। नीतू को भी बता देना।" रजनी की बात से शीला का सिर घूम गया, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए कहा, "...हाँ, ज़रूर मिलेंगे। नीतू को भी बताऊँगी।
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वह अगले एक हफ्ते तक गाँव में ही रहेगी। मैंने जो फोन किया, वह आपके पति को मत बताना। पुरुषों की बात तो आपको पता ही है। मैंने आपके पति की जगह आपको फोन करके धन्यवाद दिया, अगर उन्हें पता चला, तो मेरे बारे में गलत राय बना सकते हैं।" शीला की बात पर रजनी हँसते हुए बोली, "...तुम ठीक कह रही हो। सभी पुरुष एक जैसे होते हैं। चिंता मत करो, मैं उन्हें यह बात नहीं बताऊँगी। लौटने के बाद मिलते हैं।" यह कहकर उसने फोन रख दिया।
रजनी की बात सुनकर शीला ने रजिस्ट्रेशन के बाद की घटनाओं पर विचार किया: "...नीतू को कार उपहार में देने वाला अशोक था, और यह बात रजनी को भी पता है। नीतू कार प्रैक्टिस के लिए दोपहर 3 बजे घर से निकलती थी और रात 8 बजे लौटती थी। उसने मुझसे कहा था कि वह मेरे साथ न जाकर अशोक की बेटी के साथ समय बिताएगी। उसने अपने पति के साथ बच्चों को भी भेज दिया। रजिस्ट्रेशन के अगले दिन से ही अशोक की पत्नी और बेटी गाँव में नहीं हैं। नीतू रश्मि के बहाने अशोक के घर गई थी। फोन पर नीतू की भारी साँसें और कराहट की आवाज़ मैंने खुद सुनी।" इन सभी बातों को जोड़कर सूक्ष्मता से सोचने और विश्लेषण करने के बाद शीला को एक बात पक्की हो गई थी—नीतू और अशोक के बीच संबंध बन गया है। अपनी सहेली के इस रास्ते पर चलने की बात पक्की होते ही शीला के हाथ-पैर काँपने लगे। उसे समझ नहीं आया कि क्या करे, और सिर घूमने से वह धम्म से बैठ गई।
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पिछले दिन जब रवि, उसकी पत्नी, बेटा, हरीश, और उसके बच्चे रेजिडेंशियल कॉलेज वाले गाँव पहुँचे, तो वहाँ के माहौल के बीच एक रिसॉर्ट में सभी के रहने की व्यवस्था की गई। जाने के समय अशोक ने इस रिसॉर्ट के बारे में बताया था और कहा था कि वहाँ रहना सुविधाजनक होगा। मंगलवार को सभी ने कॉलेज के प्रिंसिपल, अशोक के अंकल, से मुलाकात की। उन्होंने बहुत आत्मीयता से हँसते-हँसते बात की और रंगनाथ की मानसिक स्थिति व उसकी पढ़ाई की क्षमता का आकलन करने के लिए वहाँ के शिक्षकों को निर्देश दिए। कुछ देर वहाँ बिताने के बाद और कोई काम न होने के कारण हरीश अपने बच्चों के साथ रिसॉर्ट चला गया। रवि ने अपनी पत्नी शीला को भी उनके साथ भेज दिया और खुद कॉलेज में रहकर शाम को आने की बात कही। रिसॉर्ट लौटकर नीतू और रजनी से फोन पर बात करने के बाद शीला की हालत ऐसी थी कि वह बयान नहीं कर सकती थी। उसका मन गहरे भंवर में फँस गया था। अपनी आत्मीय सहेली के पति होते हुए भी परपुरुष के साथ अनैगांड संबंध की सोच से उसका सिर खराब हो गया था। वह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी होकर कॉफी पीते हुए बाहर का माहौल देख रही थी। बाहर स्विमिंग पूल के पास हरीश अपने दोनों बच्चों और दूसरों के साथ पानी में वॉलीबॉल खेल रहा था। यह दृश्य देखकर शीला के होंठों पर मुस्कान आ गई। पानी से बाहर निकले हरीश की ओर ध्यान से देखते हुए शीला ने उसके बलिष्ठ शरीर और छोटे बरमूडा में दिख रही उसकी कामदण्ड के आकार को देखा। उसका गला सूखने लगा, और उसकी जाँघों के बीच रस टपकने से हलचल मचने लगी। शीला ने अपने मन को जितना नियंत्रित करने की कोशिश की, उतना ही वह असफल रही। उसकी नज़र बार-बार हरीश के सीने और उसकी कामदण्ड की ओर मुड़ रही थी। शीला का मन विवेचना शक्ति खो चुका था और निश्चल हो गया था। अपने दिल की आवाज़ सुनकर वह स्विमिंग पूल की ओर कदम बढ़ा दी।
Very nice
नीतू के होंठों पर चुम्बन देकर वह बोला, "...नीतू, तुम पर पहला हक हरीश का है, उसके बाद मेरा। लेकिन मैं किसी भी कारण से हक नहीं जताऊँगा। तुमसे सिर्फ़ प्यार चाहता हूँ। हरीश से बात करने पर ही मुझे उसका स्वभाव समझ आ गया। वह भी तुम पर हक नहीं जताएगा। तुम्हारा कौमार्य मेरे लिए ज़रूरी नहीं है। मेरी नीतू मेरी बाहों में है, यही काफी है। मैं बहुत खुश हूँ। कल तुम्हारे गले में मंगलसूत्र बाँधने के बाद मैं पूर्ण हो जाऊँगा।"
अशोक के सीने पर सिर टिकाकर नीतू बोली, "...जी, मेरे दोनों पति बहुत अच्छे हैं। मुझ पर अपना हक जताने के बजाय मैं ही उन पर अधिकार जमा रही हूँ, है ना? लेकिन शादी के दिन तुम मेरे किस हिलते-डुलते अंग को देखकर मोहित हुए थे, उसे ही मैं तुम्हें उपहार में दूँगी। उस जगह पर मेरे पति ने भी अपना हक नहीं जताया। वह मौका मेरे दूसरे पति को देने के लिए, तुम्हारी इच्छा पूरी करने के लिए मैं हमेशा तैयार हूँ।"
नीतू की बात से बहुत खुश होकर अशोक बोला, "...थैंक्स, चिन्नू। कई बार मैंने खुद पूछना चाहा, लेकिन डर था कि तुम पीछे से करने को राज़ी होगी या नहीं। तुम जो दे रही हो, वह मेरे जीवन का सबसे अनमोल उपहार है। इसके बदले मैंने भी परसों कुछ सोचा था, अब बता रहा हूँ। जब तक रश्मि की पढ़ाई पूरी नहीं होती, वह अपनी पहली माँ के साथ रहेगी। इसके बाद वह अपनी दूसरी माँ के साथ जीवनभर रहे, यही मेरी इच्छा है।"
अशोक की बात समझ न आने पर नीतू बोली, "...यह क्या है, ठीक से समझाओ ना?"
नीतू के चेहरे को अपनी हथेलियों में लेकर अशोक बोला, "...मैंने गिरीश से रश्मि की शादी करने का फैसला किया है। इससे हमारे दोनों परिवार और करीब आएँगे, और तुम्हारी छत्रछाया में रश्मि भी सुरक्षित रहेगी।"
अशोक की बात सुनकर नीतू हैरानी से उसकी ओर देखते हुए बोली, "...तुम क्या कह रहे हो? रश्मि और गिरीश की शादी? यहाँ तुम उसकी माँ के शरीर का मज़ा ले रहे हो, उसकी माँ को मंगलसूत्र बाँधने की तैयारी कर रहे हो, और उसे रश्मि देकर शादी करवाओगे!!!"
नीतू के गालों को सहलाते हुए अशोक बोला, "...नीतू, हमारा रिश्ता सिर्फ़ हम दोनों का है। लेकिन अगर वे दोनों एक हो गए, तो वे जीवनभर खुश रहेंगे, यह मुझे समझ आ गया है। दोनों के मन में बड़ों के लिए सम्मान है, पढ़ाई के प्रति लगन है, और मन में ज़रा भी मैल नहीं है। अगर वे शादी करेंगे, तो बहुत आत्मीय दांपत्य जीवन जिएँगे, मुझे पूरा यकीन है। मान जाओ।"
अशोक के गाल को काटते हुए नीतू बोली, "...रश्मि मुझे भी बहुत पसंद है। लेकिन यह फैसला सिर्फ़ हम दोनों का लेना गलत होगा। मैं उसके पापा से और तुम अपनी पत्नी से बात करो। फिर सोचेंगे। दोनों अभी तो सिर्फ़ पहले पीयूसी में पढ़ रहे हैं। अभी पाँच-छह साल का समय है। लेकिन बड़ा चालाक हो तुम, कण्री! मुझे फँसाकर चार दिन से भोग रहे हो। अभी भी तुम्हारी कामदण्ड मुझे ठोकने के लिए सिर उठा रही है। साथ ही, हमारे बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित कर रहे हो। एक सवाल पूछूँ, लेकिन बुरा मत मानना।"
नीतू की जाँघों के बीच सिर डालकर उसके रति मंदिर को चाटते हुए अशोक बोला, "...तू कुछ भी पूछ, मुझे किसी भी कारण से बुरा नहीं लगेगा।"
अशोक के सिर को अपने रति मंदिर पर दबाते हुए नीतू बोली, "...जी, पहले से शादीशुदा होने के बावजूद मैं इस तरह तुम्हारे सामने पल्लू गिरा रही हूँ। क्या कभी तुम्हें लगा कि मैं चरित्रहीन औरत हूँ?"
नीतू के रति मंदिर में जितना मुमकिन था, उतनी जीभ डालकर चाटते हुए अशोक बोला, "...नीतू, अगर मेरे मन में तुम्हारे बारे में कभी कोई गलत विचार आया, तो वह मेरे जीवन का आखिरी दिन होगा। अगर पूरी दुनिया के पुरुष तुम्हारे शरीर का भोग करें, तब भी तुम मेरे लिए वही प्यारी नीतू रहोगी।"
अशोक के शब्दों में छिपे प्यार से अभिभूत होकर नीतू बोली, "...अगर मेरी जगह तुम्हारी पत्नी रजनी होती?"
अशोक ज़ोर से हँसते हुए बोला, "...नीतू, मैंने एक सोच रखी है—पत्नियों की अदला-बदली। यानी तुम्हारा पति रजनी के साथ और मैं तुम्हारे साथ। बेशक, कल हम दोनों शादी करके सती-पति बन जाएँगे, लेकिन समाज के सामने हरीश ही तुम्हारा पति है।"
अशोक की बात से हैरान होकर नीतू बोली, "...मेरे हरीश और रजनी के साथ? नो चांस, यह मुमकिन ही नहीं। छोड़ो। यह अदला-बदली का विचार क्यों? वैसे भी तुम तो मुझे भोग ही रहे हो। आगे भी मौका मिलने पर मुझे छोड़ोगे क्या?"
नीतू की चूत से टपकी तीन-चार बूँद अमृत को चाटते हुए अशोक बोला, "...हरीश की इतनी सुंदर पत्नी मुझे मिली है, तो बेचारे को मेरी पत्नी रजनी का शरीर मिल जाए, तो क्या गलत है? अब दशहरा है। तुम्हें अपने परिवार के साथ दीवाली पर हमारे घर ज़रूर आना है। तब मेरे कमरे का बिस्तर, जहाँ हमारा पहला मिलन हुआ था, कितना बड़ा है ना? उस पर एक तरफ हरीश मेरी पत्नी रजनी के साथ कामक्रीड़ा करेगा, और दूसरी तरफ हरीश के सामने मैं तुम्हारे रति मंदिर को भोगूँगा। यह पक्का होगा, गारंटी।"
नीतू हँसते हुए बोली, "...उस बिस्तर पर तुम सिर्फ़ मुझे ही भोग सकते हो। हरीश के बारे में मुझे पता है, वह कभी नहीं मानेगा। चाहो तो चैलेंज। अगर वह मान गया, तो मैं तुम्हारी एक सबसे नीच इच्छा पूरी करूँगी। मुझे पता है, हर पुरुष के मन की गहराई में कोई न कोई नीच, घिनौनी कल्पना होती है। तुम्हें सिर खुजाने की ज़रूरत नहीं। लेकिन अगर हरीश नहीं माना, तो तुम्हें जीवनभर मेरी बात माननी होगी।"
अशोक हँसते हुए बोला, "...यह एक शर्त है। तुम जीती या नहीं, मैं जीवनभर तुम्हारी बात मानूँगा, तुम्हारा दास हूँ। देख, मैंने तुम्हारे गले में मंगलसूत्र बाँधने की इच्छा पूरी करने के लिए कैसे योजना बनाई। अब दीवाली का धमाका कैसा होगा, यह देखना। अब बातें बहुत हो गईं, अपनी जाँघें चौड़ा कर।"
तीसरे दौर में नीतू के जन्म और पले-बढ़े घर के पूजा कक्ष को छोड़कर बाकी हर हिस्से में अशोक ने नीतू को गोद में उठाकर घुमाया। उसने उसे सोफे पर लिटाया, कुर्सी पर अपनी जाँघों पर बिठाया, खिड़की की ग्रिल पकड़कर झुकाकर खड़ा किया, रसोई की शेल्फ पर, पिछवाड़े के दरवाज़े पर टिकाकर, और हॉल के फर्श पर लिटाकर हर जगह नीतू के शरीर का भोग किया। नीतू ने भी उसकी हर हरकत में पूरी तरह सहयोग दिया और चुदवाया। एक ही थाली में अशोक की जाँघ पर नग्न बैठकर नीतू ने खाना खाया। उसने अशोक को उसकी उतारी हुई पैंटी पहनाई और उसकी चड्डी खुद पहनकर दिखाई। अशोक ने अपनी कामदण्ड पर शहद और घी लगाकर नीतू से चुसवाया, फिर उसके रति मंदिर में शहद डालकर खुद चाटा। इसके बाद उसने नीतू के सामने मूत्र विसर्जन किया और नीतू का मूत्र विसर्जन देखते हुए दोनों ने अपनी फंतासियों को पूरा किया। शाम तक चार बार नीतू के रति मंदिर में अपनी कामदण्ड डालकर चोदने के बाद अशोक ने उसके पाँच जोड़ी कपड़े लिए और उसे अपने घर ले गया।
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घर में कदम रखते ही दरवाज़े का कुंडा लगाने के बाद फिर से नग्न होने की बारी नीतू की थी। जिस सोफे पर नीतू पहले दिन रश्मि के साथ बैठी थी, उसी पर उसे नग्न लिटाकर अशोक ने 40 मिनट तक उसके शरीर का आनंद लिया। रात एक बजे तक दोनों ने चार बार कामक्रीड़ा की, फिर अशोक उसे नग्न अवस्था में घर की तीसरी मंजिल की छत पर ले गया। नीतू के जीवन में पहली बार इस तरह खुले स्थान पर नग्न खड़े होने से उसका पूरा शरीर रोमांचित हो गया। वहाँ ओवरहेड टैंक के लिए 15 फीट ऊँचा और 10 फीट चौड़ा एक प्लेटफॉर्म था, जिस पर सीढ़ियों से चढ़ाया गया।
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उस ऊँचे स्थान से नीतू को अपने जन्म और पले-बढ़े गाँव का हर कोना दिख रहा था। वह जगह पूरी तरह अंधेरी थी और आसपास के सभी घरों से ऊँची होने के कारण उनके नग्न होने का किसी को पता चलने की संभावना नहीं थी। वहाँ लगी ग्रिल को पकड़कर नीतू को झुकाकर खड़ा करने के बाद अशोक ने उसकी कमर पकड़ी और पीछे से अपनी कामदण्ड को उसके रति मंदिर में डालकर चोदना शुरू किया। नीतू को इस तरह पहली बार खुले आकाश के नीचे अपने रति मंदिर को चुदवाने का नया अनुभव बहुत पसंद आया, और उसने खुद को पूरी तरह अशोक को समर्पित कर दिया।
सोमवार सुबह 10 बजे से मध्यरात्रि 2 बजे तक लगातार चुदाई की थकान को दूर करने के लिए दोनों मंगलवार सुबह 9 बजे तक सोते रहे। अशोक के साथ अपनी रासलीला के बीच भी नीतू ने अपनी माँ की ज़िम्मेदारी नहीं भूली और अपने पति को 10 बार फोन करके बच्चों से बात की। उसने पति को बच्चों की सावधानी बरतने, दोनों की सेहत का ध्यान रखने, और खासकर शरारती सुरेश पर विशेष नज़र रखने की 50 से ज़्यादा बार हिदायत दी। हरीश बार-बार वही बात सुनकर तंग आ चुका था और बोला, "...मैं उनका पापा हूँ, यार। मुझे भी उनकी फिक्र है।" फिर भी नीतू वही बात दोहराती रही।
सुबह सबसे पहले नीतू जागी और अशोक को अपने सीने पर सिर रखकर नग्न अवस्था में गले लगाए सोते देखकर एक पल शरमा गई। बच्चों की याद आते ही उसने फोन उठाकर पति को कॉल किया और बच्चों से बात करके उनकी खबर ली। पति से बात करते समय अशोक ने उसे खींचकर बिस्तर पर लिटाया और उसके एक स्तन को मुँह में लेकर चूसना शुरू किया। नीतू के दोनों स्तनों को चूसने के बाद अशोक ने उसकी जाँघें चौड़ी कीं और सुबह की स्वाभाविक उत्तेजना से खड़ी अपनी कामदण्ड को उसके रति मंदिर में डालकर चोदना शुरू किया। पति से फोन पर बात करते हुए अशोक से अपने रति मंदिर को ठोकवाना नीतू को हर अनुभव से ज़्यादा सुखद लगा। वह पति से बात करते हुए अशोक को गले लगाकर अपने कूल्हों को उठाकर सहयोग देती हुई चुदवाती रही। फोन काटने के बाद अशोक ने भैंसे से भी ज़्यादा रफ्तार से ठोकना शुरू किया और 45 मिनट तक उसके शरीर का आनंद लिया।
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दोनों ने साथ में नहाकर तैयार होने तक अशोक ने पहले से ऑर्डर किया हुआ होटल का खाना घर के मुख्य दरवाज़े के पास लगे हुक पर टाँग दिया था। नहाने के बाद तौलिया लपेटकर बाल सुखाने के बाद नीतू ने हरी पैंटी और नीली ब्रा पहनी और चूड़ीदार पहनने लगी, तभी अशोक ने उसे रोका और अनुरोध किया कि जब तक वह यहाँ है, नग्न या सिर्फ़ ब्रा-पैंटी में रहे। उसकी बात सुनकर नीतू हँसते हुए बोली, "...मैं कपड़े पहनूँ तो भी तुम मुझे उतारकर नंगी खड़ा कर देते हो।" वह डाइनिंग के पास आई और अशोक की जाँघ पर कुर्सी पर बैठकर एक-दूसरे को खिलाते हुए नाश्ता किया।
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नीतू उसके होंठों पर चुम्बन देने के लिए झुकी, तभी उसका फोन बजा। कॉल रिसीव करने पर उसकी पत्नी रजनी बात कर रही थी। उसने पति की खबर ली और बताया कि उसके पिता की सेहत सुधर रही है। माँ से फोन लेकर रश्मि ने पापा से बात शुरू की, तो नीतू उठी और अशोक को भी खड़ा किया। अशोक पूरी तरह नग्न खड़ा था। नीतू ने उसके सामने घुटनों पर बैठकर उसकी कामदण्ड को मुँह में लिया और चूसना शुरू किया। अशोक अपनी बेटी से बात करते हुए अपनी होने वाली सास नीतू को कामदण्ड चुसवा रहा था। फोन काटने के बाद उसने नीतू को उठाकर एक कमरे में ले जाकर नीचे उतारा। नीतू ने चारों ओर देखा, तो दीवार पर रश्मि की तस्वीरें चमक रही थीं। अशोक के प्रस्ताव के बाद से नीतू ने भी रश्मि को अपनी बहू बनाने का मन बना लिया था।
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"हम अपनी होने वाली बहू के कमरे में क्यों आए?" नीतू ने पूछा। अशोक ने उसे गले लगाकर कहा, "...एक दिन अगर तुम्हारा बेटा मेरी बेटी को किसी बात पर डाँटेगा, तो मेरी बेटी उसे कहेगी, 'चुप रहो, मेरे पापा ने पहले तुम्हारी माँ को मेरे कमरे में चोदकर मज़ा लिया था।' इसलिए यहाँ आए हैं।" नीतू ने उसे घूरकर देखा और नकली गुस्से से उसके सीने पर चपत मारी।
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अशोक ने उसे उठाकर बिस्तर पर लिटाया और नीली ब्रा उतारे बिना उसके कप्स को नीचे सरकाकर स्तनों को बाहर निकाला और चूसते हुए मसलना शुरू किया। उसी समय शीला का फोन आया, तो नीतू ने उसे रिसीव करके बात शुरू की। नीतू की हरी पैंटी का अगला हिस्सा हटाकर रति मंदिर को उजागर करने के बाद अशोक ने अपनी कामदण्ड को उसमें डालकर चोदना शुरू किया। नीतू अपनी पक्की सहेली से बात करते हुए अपनी होने वाली बहू रश्मि के बिस्तर पर लेटकर उसके पापा से चुदवाने के अनुभव से रतिरस की गंगा बहा रही थी और अपने होने वाले ससुर अशोक की कामदण्ड का अभिषेक कर रही थी।
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शीला से बात करते समय नीतू की रुक-रुककर बोलने वाली आवाज़ और बीच-बीच में "...हाँ... म्म... आह..." जैसी कराहट की आवाज़ें सुनकर शीला ने ध्यान से सुनना शुरू किया। नीतू की भारी साँसों और "...हाँ... हाँ... आह..." जैसे स्वर सुनकर शीला को समझ आ गया कि उसकी सहेली किसी के साथ कामक्रीड़ा में तल्लीन है। नीतू ने फोन काटा, तो अपनी होने वाली बहू के बिस्तर पर अपने पापा को गले लगाकर कूल्हों को उठाकर चुदवाते हुए बोली, "...जी, मेरा बेटा भी तुम्हारी बेटी को ऐसे ही चोदेगा ना? उसकी सास बनने वाली मुझे उसके बिस्तर पर उठाकर भोग रहे हो... हाँ... अम्मा... आह... अशोक, और ज़ोर से फाड़ दो... आह... आह... कितना मज़ा आ रहा है, बता नहीं सकती... हाँ... हाँ... हाँ... आह... अशोक, ले लो, फिर से तुम्हारी कामदण्ड का मेरे रस से अभिषेक।" यह कहते हुए उसने फिर से स्खलन किया।
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45 मिनट तक रश्मि के बिस्तर पर नीतू के शरीर को लुढ़काकर उसके रति मंदिर को भोगकर चिथड़े करने के बाद अशोक ने उसके गर्भ में ज़बरदस्त रस की वर्षा की और उसके पास ही लुढ़क गया। नीतू के रति मंदिर से उसका रतिरस और अशोक का कामरस मिलकर बाहर टपक रहा था, जिसने अशोक द्वारा बिना उतारी हरी पैंटी को पूरी तरह गीला कर दिया था।
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फोन रखने के बाद शीला सोच में डूब गई। उसे याद आया कि नीतू अशोक के साथ उसके घर गई थी। यह बात दिमाग में आते ही उसने न अशोक को और न ही नीतू को फोन किया। लेकिन रजिस्ट्रेशन के दिन ज़मीन के परिचय से कुछ ही समय में बहुत आत्मीय हो चुकी अशोक की पत्नी रजनी ने फोन किया। कुछ देर आपसी कुशलक्षेम पूछने के बाद शीला बोली, "...आपके पति की मदद से मेरे बेटे को आपके अंकल के कॉलेज में सीट मिली, इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।" रजनी हँसते हुए बोली, "...अरे, इतनी छोटी सी बात के लिए धन्यवाद मत कहो। हम सब दोस्त हैं, तो इतना तो बनता है। मैं खुद तुम दोनों के घर आना चाहती थी, लेकिन उस दिन जब नीतू मेरी बेटी के साथ हमारे घर आई थी, तभी मेरे पिता की तबीयत खराब होने की खबर मिली और मुझे उसी पल बेटी के साथ मायके जाना पड़ा। गाँव लौटने के बाद हम सब ज़रूर मिलेंगे। नीतू को भी बता देना।" रजनी की बात से शीला का सिर घूम गया, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए कहा, "...हाँ, ज़रूर मिलेंगे। नीतू को भी बताऊँगी।
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वह अगले एक हफ्ते तक गाँव में ही रहेगी। मैंने जो फोन किया, वह आपके पति को मत बताना। पुरुषों की बात तो आपको पता ही है। मैंने आपके पति की जगह आपको फोन करके धन्यवाद दिया, अगर उन्हें पता चला, तो मेरे बारे में गलत राय बना सकते हैं।" शीला की बात पर रजनी हँसते हुए बोली, "...तुम ठीक कह रही हो। सभी पुरुष एक जैसे होते हैं। चिंता मत करो, मैं उन्हें यह बात नहीं बताऊँगी। लौटने के बाद मिलते हैं।" यह कहकर उसने फोन रख दिया।
रजनी की बात सुनकर शीला ने रजिस्ट्रेशन के बाद की घटनाओं पर विचार किया: "...नीतू को कार उपहार में देने वाला अशोक था, और यह बात रजनी को भी पता है। नीतू कार प्रैक्टिस के लिए दोपहर 3 बजे घर से निकलती थी और रात 8 बजे लौटती थी। उसने मुझसे कहा था कि वह मेरे साथ न जाकर अशोक की बेटी के साथ समय बिताएगी। उसने अपने पति के साथ बच्चों को भी भेज दिया। रजिस्ट्रेशन के अगले दिन से ही अशोक की पत्नी और बेटी गाँव में नहीं हैं। नीतू रश्मि के बहाने अशोक के घर गई थी। फोन पर नीतू की भारी साँसें और कराहट की आवाज़ मैंने खुद सुनी।" इन सभी बातों को जोड़कर सूक्ष्मता से सोचने और विश्लेषण करने के बाद शीला को एक बात पक्की हो गई थी—नीतू और अशोक के बीच संबंध बन गया है। अपनी सहेली के इस रास्ते पर चलने की बात पक्की होते ही शीला के हाथ-पैर काँपने लगे। उसे समझ नहीं आया कि क्या करे, और सिर घूमने से वह धम्म से बैठ गई।
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पिछले दिन जब रवि, उसकी पत्नी, बेटा, हरीश, और उसके बच्चे रेजिडेंशियल कॉलेज वाले गाँव पहुँचे, तो वहाँ के माहौल के बीच एक रिसॉर्ट में सभी के रहने की व्यवस्था की गई। जाने के समय अशोक ने इस रिसॉर्ट के बारे में बताया था और कहा था कि वहाँ रहना सुविधाजनक होगा। मंगलवार को सभी ने कॉलेज के प्रिंसिपल, अशोक के अंकल, से मुलाकात की। उन्होंने बहुत आत्मीयता से हँसते-हँसते बात की और रंगनाथ की मानसिक स्थिति व उसकी पढ़ाई की क्षमता का आकलन करने के लिए वहाँ के शिक्षकों को निर्देश दिए। कुछ देर वहाँ बिताने के बाद और कोई काम न होने के कारण हरीश अपने बच्चों के साथ रिसॉर्ट चला गया। रवि ने अपनी पत्नी शीला को भी उनके साथ भेज दिया और खुद कॉलेज में रहकर शाम को आने की बात कही। रिसॉर्ट लौटकर नीतू और रजनी से फोन पर बात करने के बाद शीला की हालत ऐसी थी कि वह बयान नहीं कर सकती थी। उसका मन गहरे भंवर में फँस गया था। अपनी आत्मीय सहेली के पति होते हुए भी परपुरुष के साथ अनैगांड संबंध की सोच से उसका सिर खराब हो गया था। वह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी होकर कॉफी पीते हुए बाहर का माहौल देख रही थी। बाहर स्विमिंग पूल के पास हरीश अपने दोनों बच्चों और दूसरों के साथ पानी में वॉलीबॉल खेल रहा था। यह दृश्य देखकर शीला के होंठों पर मुस्कान आ गई। पानी से बाहर निकले हरीश की ओर ध्यान से देखते हुए शीला ने उसके बलिष्ठ शरीर और छोटे बरमूडा में दिख रही उसकी कामदण्ड के आकार को देखा। उसका गला सूखने लगा, और उसकी जाँघों के बीच रस टपकने से हलचल मचने लगी। शीला ने अपने मन को जितना नियंत्रित करने की कोशिश की, उतना ही वह असफल रही। उसकी नज़र बार-बार हरीश के सीने और उसकी कामदण्ड की ओर मुड़ रही थी। शीला का मन विवेचना शक्ति खो चुका था और निश्चल हो गया था। अपने दिल की आवाज़ सुनकर वह स्विमिंग पूल की ओर कदम बढ़ा दी।