सुबह की धूप अभी भी ताजा थी, लेकिन शाम ढलते ही शहर का वो पुराना पार्क सन्नाटे में डूब गया था। पेड़ों की छाँव में बेंचें खाली पड़ीं, और हवा में हल्की ठंडक घुल रही थी – वो ठंडक जो गर्माहट की तलाश कराती है। उमेश ने खुशबू का हाथ थामा था, लेकिन वो हाथ महज सपोर्ट नहीं था; उँगलियाँ उसके कलाई पर दब रही थीं, जैसे चेतावनी हो – "आज शाम तेरी है, बेटी।" हरि, उमेश का साला, बगल में चल रहा था, उसकी आँखें खुशबू की छोटी सी स्कर्ट पर टिकीं थी – वो स्कर्ट जो हवा में हल्का सा लहरा रही थी, जांघों को चैन से न छोड़ते हुए।
खुशबू की साँसें तेज थीं। कल रात की यादें अभी ताजा थीं – वर्मा सर की चोटियाँ, छत पर हरि की रफनेस – लेकिन आज कुछ अलग था। पापा की आँखों में वो चमक थी, जो डराती भी थी और गुदगुदाती भी। "पापा... पार्क क्यों? घर पर ही..." वो बुदबुदाई, लेकिन उमेश ने उसकी कमर पर हाथ फेरा, धीरे से दबाते हुए। "चुप रंडी। कल रात तूने तो मजा लिया था न? आज थोड़ा अलग मज़ा ले साली । हरि भी हैं, डर किसका?"
वे एक सुनसान कोने में पहुँचे, जहाँ झाड़ियाँ घनी थीं और कोई राहगीर नजर न आता। हरि ने सबसे पहले हाथ बढ़ाया। खुशबू को बेंच पर बिठाया, और सीधे उसके ऊपर झुक गया। "देख रे उमेश, तेरी बेटी कितनी मस्त है...उसके हाथ खुशबू की जांघों पर सरक गए, स्कर्ट ऊपर सरका दी। खुशबू सिहर उठी, लेकिन विरोध न किया – बल्कि पैर थोड़े फैला दिए। "मामा ... यहाँ? कोई देख लेगा..." उसकी आवाज काँप रही थी, लेकिन आँखों में वो चमक थी जो कह रही थी, 'और करो।'
उमेश हँसा, लेकिन हँसी में वो जलन थी जो एक्साइटमेंट बन जाती है। "देख ले तो देख ले, खुशबू। तू तो कल वर्मा सर के सामने रंडी बनी थी। आज पार्क की रानी बनेगी।" वो भी झुक गया, खुशबू के ब्लाउज के बटन खोलने लगा। निप्पल्स कड़े हो चुके थे, ठंड से या उत्साह से। हरि ने एक निप्पल पकड़ा, मसलने लगा – नरम लेकिन दर्द भरी मसल, जैसे आटा गूंध रहा हो। "आह... मामा .. हल्के... पापा, देखो न..." खुशबू की चीख हल्की थी, लेकिन पार्क की खामोशी में गूंजी। उमेश ने दूसरा निप्पल मुंह में लिया, चूसते हुए कहा, "देख रहा हूँ, बेटी। तेरा शरीर तो हमारा है। कल से ही सोच रहा था, पार्क में इसे खोल दूँ।"
हरि की उँगलियाँ अब नीचे सरक गईं – पैंटी के ऊपर से चूत पर दबाव बनाया गीला था पहले से। "साली, पहले से ही रस टपक रही है। उमेश, तेरी बेटी तो असली कुतिया है। कल रात छत पर चीखी थी, आज पार्क में गिड़गिड़ाएगी।" खुशबू का सिर पीछे झुक गया, साँसें तेज हो गयी । "हाँ मामा .. मसलो... लेकिन धीरे... आह!" उमेश ने उसके होंठ चूसे, जीभ अंदर डालकर। "धीरे क्या? तू तो कल 'फाड़ दो' कह रही थी। आज भी वही बोल।"
तभी, झाड़ियों से सरसराहट हुई। खुशबू चौंक गई, लेकिन हरि ने हाथ न हटाया। "कौन?" उमेश ने सिर उठाया, और फिर मुस्कुरा दिया। राजन और उमाकांत वहाँ खड़े थे – राजन का चेहरा शरारती मुस्कान से भरा, उमाकांत की आँखें भूखी। "अरे उमेश भाई! क्या बात है? पार्क में फैमिली पिकनिक चल रही है?" राजन हँसा, लेकिन आँखें खुशबू के खुले ब्लाउज पर। उमाकांत ने सीधे कहा, "पिकनिक नहीं लग रही। चुदाई का प्री-राउंड लग रहा।
हरि ने हाथ हटाया, लेकिन खुशबू को गले लगा लिया – "राजन दादा, उमाकांत चाचा... तुम कैसे? लेकिन हाँ, कल रात वाली बात सही। खुशबू को थोड़ा मसल रहे थे। जॉइन करोगे?" उमेश ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आवाज में हिचक थी। "भाई, ये तो... पार्क है। लेकिन..." राजन ने कदम बढ़ाया, खुशबू के पास आकर उसके बालों में हाथ फेरा। "पार्क ही क्या? कल रात तो छत पर सबने सुना था। 'आह पापा... मामा.' – वो चीखें तो पार्क से भी तेज थीं। उमाकांत, तू बोल, क्या ये रंडी को छोड़ें?"
उमाकांत ने हँसते हुए खुशबू का चेहरा पकड़ा, जबड़े को दबाया। "छोड़ें क्यों? कल सोभा ने तो हमारा पेशाब भी पिया। ये तो ताजा माल है। खुशबू बेटी, बोल न – चाचा को मसलने दे?" खुशबू की आँखें नीची हुई , लेकिन होंठ काँपे। "चाचा... हाँ... लेकिन सब मिलकर... न डराओ।" राजन ने ताली बजाई। "बस इतना? तो चलो, चारों मिलकर। उमेश, तू पीछे से, हरि बगल से, हम आगे।"
बातचीत छोटी थी, लेकिन आग लगा देने वाली। चारों ने खुशबू को घेर लिया। राजन ने ब्लाउज पूरी तरह उतार दिया, निप्पल्स पर थप्पड़ मारे – चटक! "ले रंडी, ये पार्क की हवा में चूचियाँ लाल कर दूँ।" उमाकांत ने स्कर्ट ऊपर सरका दी, पैंटी फाड़ दी एक झटके में। "गीली चूत... कल रात से ही सोच रहा था। हरि, तू मसल, मैं उँगलियाँ डालूँ।" हरि ने जांघें मसलीं, नाखून गड़ाए। "हाँ चाचा, ये तो रस की नदी है। उमेश भाई, तू क्या कर रहा? बस देख?" उमेश ने आखिरकार हाथ बढ़ाया, चूत पर दबाया – गीला, गर्म। "नहीं... मसल रहा हूँ। बेटी, तेरा पापा भी शामिल है। बोल, मजा आ रहा?"
खुशबू की चीखें अब पार्क भर गईं। "आह... सब मसलो... राजन दादा... थप्पड़... हाँ... उमाकांत चाचा... उँगली अंदर... मामा ... जांघें चाटो... पापा... दबाओ!" चारों के हाथ, मुंह – सब उस पर। राजन चूस रहा था निप्पल, उमाकांत दो उँगलियाँ चूत में, हरि जांघों पर दांत गड़ा रहा, उमेश गले पर किस। पार्क की ठंडक में उनका पसीना, खुशबू का रस – सब मिक्स हो गया। "साली, तू तो चारों की हो गई," राजन ने हाँफते हुए कहा। "अब रूम चलें? यहाँ तो मजा अधूरा है ।"
वे जल्दी से पार्क से निकले – खुशबू को बीच में, आधी नंगी, लेकिन स्कर्ट से ढककर। पास का ही एक छोटा सा गेस्टहाउस था । रूम में घुसते ही दरवाजा बंद। लाइट डिम, बेड बड़ा। चारों ने मिलकर खुशबू को नंगा कर दिया। "अब असली खेल होगा ," उमाकांत ने कहा, अपनी पैंट उतारते हुए। लंड बाहर – कठोर, नसें फूलीं हुई ।
चुदाई का तूफान शुरू हुआ। पहले राजन ने लिया – खुशबू को बेड पर लिटाया, पैर फैलाए। "ले रंडी, दादा का लंड। ।" धक्का! खुशबू चीखी, "आह दादा... मोटा...है बहुत " उमाकांत ने मुंह में डाला, "चूस कुतिया, चाचा का।" हरि पीछे से गांड पर थप्पड़ मारा , "मेरा बाद में, भैया का इंतजार मत करा।" उमेश देख रहा था, लंड हिलाते हुए – जलन, लेकिन उत्तेजना भी हो रही थी अपनी बेटी को ऐसे देखकर
हरि ने चूत में डाला, लम्बे लम्बे धक्के मारने लगा । "कल छत पर अधूरा था, आज पूरा। चीख रंडी!" राजन मुंह में, उमाकांत निप्पल्स मसलता रहा । "हाँ मामा ... फाड़ो... सबका लंड... आह!" उमेश आखिर में शामिल हुआ – खुशबू के हाथ में लंड पकड़वाया। फिर उमाकांत ने पोज चेंज की : डॉगी स्टाइल में। "चल रंडी, चाचा की बारी। गांड ऊपर कर !" धक्का गांड में – दर्द भरा, लेकिन खुशबू ने कमर झुकाई। "चाचा... हाँ... गहरा... सब देखो!" राजन और हरि बारी-बारी मुंह और चूत। उमेश अब पीछे – "बेटी... पापा का... ले।" धीरे शुरू, लेकिन तेज हो गया।
रूम गूंजा चीखों से, धक्कों की थाप से। "फाड़ दो... सबका रस... अंदर!" खुशबू चरम पर पहुँची, बॉडी काँपती हुई । चारों ने एक-एक कर रिलीज किया – राजन मुंह में, उमाकांत चूत में, हरि गांड पर, उमेश पेट पर। गर्म वीर्य कहीं न कहीं – चिपचिपा, गंदा।
थकान में लिपटा रूम था । खुशबू बेड पर लेटी, बॉडी चमकती – पसीने, रस, वीर्य से। उमेश उसके पास आया, आँखों में वो प्यार था । "बेटी... सबने लिया... लेकिन तू मेरी है।" वो झुका, होंठों पर किस किया – लेकिन गंदा। खुशबू के मुंह से राजन का वीर्य चाटा, अपनी जीभ से मिक्स किया। "उम्म... पापा... गंदा... सबका स्वाद... चूसो।" उमेश ने चूसा, वीर्य निगला – मीठा-नमकीन मिक्स। फिर खुशबू ने उमेश के होंठ चाटे, पेट पर फैला वीर्य (हरि का) उँगलियों से लगाया। "पापा... देखो, मामा का भी... चूमो।" किस गहरा हो गया – जीभें लिपटीं, वीर्य का आदान-प्रदान हुआ । "रंडी बेटी... तेरा मुंह... सबका कचरा.।" उमेश हाँफा, फिर से सख्त। खुशबू मुस्कुराई, "फिर से पापा... सबके वीर्य से चिकना हो गया।"
रूम में हँसी गूंजी रही थी – चारों देख रहे थे, लेकिन ये मोमेंट उनका नहीं, पिता-पुत्री का। मज़ा ये था कि गंदगी में ही उनका बॉन्ड गहरा हो गया।