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Adultery परिवार कैसा है

सबसे गरम किरदार

  • रमा

  • खुशबू

  • राधा

  • सोभा


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mentalslut

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स्कूल की घंटी बज चुकी थी, बच्चे बाहर निकल रहे थे। लेकिन प्रिंसिपल वर्मा के ऑफिस में सन्नाटा – सिर्फ दो आदमी, उमेश और व र्मा, कुर्सियों पर। टेबल पर चाय के कप, लेकिन हवा में वो गंदी गंध। व र्मा ने चश्मा उतारा, मुस्कुराया, "उमेश... चुट्टी हो गई, लेकिन तेरी बेटी खुशबू... वो तो अभी क्लास में होंगी । सोच रहा हूँ , आज ऑफिस में बुला लूं? कल होटल वाला सीन... आह, उसके चुचे मसलते ही... कितना रस टपका था ।"

उमेश का चेहरा लाल हो गया, लेकिन लंड सख्त। वो जानता था, ये ककौल्ड गेम चल रहा। "वर्मा साहब... हाँ, खुशबू... वो रंडी बनी जा रही।आज फिर... प्लान बनाएं? ऑफिस में ही... ताला लगाकर। मैं देखूंगा।" उमेश ने चाय का घूंट लिया, लेकिन हाथ कांप रहा था । व र्मा हंस पड़ा, "प्लान? हाहा, तू तो ककौल्ड किंग। ठीक, बुला ले। कहना... 'पापा बुला रहे'। फिर मैं... उसके मुंह में ठूंसेगा। तेरी बेटी की चूत... बालों वाली, गीली। चोदूंगा बेरहमी से। तू बाहर खड़ा सुनना चीखे।"

दोनों की आंखें चमक रही थी – गंदी बातें उछलने लगीं। "वर्मा साहब... खुशबू के निप्पल... गुलाबी, काटने लायक। आप चूसना, मैं... फोटो खींच लूंगा।" उमेश बोला, पैंट में हाथ सरकाया। वर्मा ने सहमति में सिर हिलाया, "हाँ... और थप्पड़ मारूंगा। 'रंडी स्टूडेंट... पापा के सामने चुद साली '। आह... सोचकर ही... निकलने वाला है। चल, फोन कर।" उमेश ने मोबाइल निकाला, कांपते हाथों से खुशबू को कॉल किया। "बेटी... ऑफिस में आ। पापा इंतज़ार कर रहे है । स्पेशल क्लास है ।"

खुशबू ने फोन रखा, सिहर गई। क्लास खत्म हो गया था , लेकिन वो जानती थी – पापा का 'स्पेशल' मतलब। साड़ी समेटी, ऑफिस की तरफ। दरवाजा खुला था , अंदर घुसते ही वर्मा की नजर – भूखी। "आ गई मेरी प्यारी स्टूडेंट? खुशबू... देख, तेरी साड़ी... कितनी ट्रांसपेरेंट। अंदर क्या.पहना है .. पैंटी?" व र्मा ने खड़ा होकर करीब खींचा, उमेश के सामने। खुशबू ने उमेश की तरफ देखा, "पापा... सर... क्या ये?" लेकिन व र्मा ने पल्लू खींच लिया। "चुप रंडी! तेरे पापा देख रहे।

खुशबू शरमा गई, लेकिन नीचे गीलापन आ गया । "सर... हाँ... अच्छा लगा। लेकिन पापा के सामने..." व र्मा ने हंसकर ब्लाउज में हाथ डाला – स्तन पकड़ लिए, जोर से मसला। "पापा देखें या ना, तू तो मेरी कुतिया है । ले... ये चुचे... कितने भरे। उमेश, देख... तेरी बेटी के निप्पल... सख्त हो गए।" वो निचोड़ रहा था, बेदर्दी से – निप्पल पिंच, थप्पड़ के साथ । "आह... सर... दर्द... हल्के से।" खुशबू सिसकी, लेकिन कमर हिली । उमेश कुर्सी पर बैठा, हिलाने लगा। "खुशबू... सह ले। सर... एंजॉय कर रहे है ।"

व र्मा ने कुर्सी पर बिठाया, साड़ी ऊपर सरका दी। पैंटी फाड़ी। "देख उमेश... तेरी बेटी की चूत... गीली। रंडी है।" वो अपना लंड बाहर निकाला – मोटा, चश्मा चढ़ाए। खुशबू के मुंह में ठूंसा। "चूस पहले, कुतिया। तेरे पापा देखेंगे ।" खुशबू चूसी, "उम्म... सर... धीरे ।" व र्मा ने बाल पकड़े, धक्के मारे। फिर खड़ा किया, टेबल पर झुकाया। "अब चोदूंगा... बेरहमी से।" लंड चूत में घुसेड़ा – जोरदार झटका मारा "ले रंडी! फाड़ दूंगा। चीख... पापा सुनें।" धक्के तेज़ – चट-चट, थप्पड़ों की बौछार कर दी गांड पर । स्तनों पर, गांड पर। "चटक! ले कुतिया... तेरी चूत... मेरी। उमेश... देख, कैसे कमर हिला रही।"

खुशबू चीख रही, "आह सर... हाँ... फाड़ो... पापा... देखो... कितना मजा आ रहा !" उमेश हिलाता रहा, "हाँ बेटी... एंजॉय। सर... और तेज़।" व र्मा ने 10-15 मिनट मारा – फिर बाहर निकाला, खुशबू को घुटनों पर किया । "मुंह खोल रंडी... ले वीर्य!" झटके मारे, सारा मुंह में गिरा – गर्म, चिपचिपा। "निगल... लेकिन कुछ बचा रख। तेरे पापा के लिए।" खुशबू ने आधा निगला, मुंह भरा रह गया।

स्कूल से निकलते हुए गलियारे में सन्नाटा था । उमेश ने खुशबू को दीवार से सटा लिया। "बेटी... आ... सर का वीर्य... चख लूं।" वो उसके होंठों पर मुंह चिपका दिया – जीभ अंदर कर लिया दोनों ने एक दूसरे का । थूक और वीर्य का मिश्रण । "उम्म... खुशबू... सर का स्वाद... तेरे मुंह में। रंडी बेटी... कितना गंदा..है . लेकिन मजा आ रहा है ।" खुशबू ने जवाब दिया, जीभ लड़ाते। "पापा... हाँ... चाटो... सब... सर का... हमारा। आह... " दोनों चूमते रहे – वीर्य चाटा, निगला।

उमेश ने सांस लेते कहा, "घर चल... आज शाम... तुझे चोदूंगा। । तू तैयार है ?" खुशबू ने मुस्कुराया, होंठ चाटते। "हाँ पापा... घर पर... बेरहमी से। रंडी बेटी... तुम्हारी। लेकिन... मम्मी को मत बताना... या बताना?" दोनों हंस पड़े, हाथ पकड़े घर की तरफ निकल गए
 
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शाम की ठंडी हवा छत पर बह रही थी, लेकिन उमेश और हरि के बीच गर्मी सुलग रही थी । दोनों जीजा-साले पुराने तख्त पर लेटे, बोतल और ग्लास फैले। हरि ने तीसरा ग्लास थामा, "उमेश... आज स्कूल कैसा रहा? तेरी खुशबू... वो तो स्टार बनी हुई ना?" उमेश ने घूंट लिया, नशा चढ़ रहा था – स्कूल का सीन याद आया, व र्मा का वो बेरहम धक्का। "हरि... आज तो... वाह। प्रिंसिपल व र्मा ने ऑफिस में बुलाया। 'स्पेशल क्लास'। वो आई, और..."

हरि की आंखें चमक गईं, ग्लास रुक गया। "और? बोल ना जीजा... क्या हुआ? तेरी रंडी बेटी को चोदा?" उमेश ने हंसकर सिर हिलाया, नशे में जीभ लड़खड़ाई। "व र्मा ने... उसके चुचे मसले, मेरे सामने। 'रंडी स्टूडेंट' कहकर थप्पड़ मारे। फिर टेबल पर झुकाया, चूत फाड़ दी। बेरहमी से धक्के मार मार के चोद रहा था – चीख रही थी खुशबू, 'सर... हाँ... फाड़ो'। मैं देखता रहा, हिलाता रहा। आखिर में मुंह में वीर्य गिराया... सारा। बाहर आते ही मैंने उसके होंठ चूसे – व र्मा का रस चखा। स्वाद... गंदा था लेकिन मज़ा आ गया भाई
हरि पागल हो गया। ग्लास पटक दिया, सांस तेज़ हो गयी । "क्या? तेरी बेटी... व र्मा की कुतिया बनी? उसके मुंह में वीर्य... और तू चूसा उसको ? उमेश... तू ककौल्ड तो साला किंग है! आह... सोचकर ही... मेरा लंड सख्त हो गया यार। खुशबू की चूत... वो तो कुतिया बनेगी मेरे काले लंड पर। कल मैं भी स्कूल जाऊंगा... शेयर करेगा?" हरि का चेहरा लाल, हाथ पैंट पर – सहलाने लगा। उमेश हंस पड़ा, "शेयर? हाँ भाई... लेकिन पहले तू राधा का कुछ कर .. रात को छत पर देखा ना? तेरी मासूम बेटी... मेरे लंड पर चूस रही।" दोनों ठहाके लगाने , गालियां उछालने लगे – नशा चढ़ने लगा धीरे धीररे

तभी सीढ़ियों से कदमों की आहट हुई । राधा ऊपर आई – सलवार-कमीज में, बाल खुले, खाने का थाली लिए। "पापा... अंकल... खाना तैयार है । बुआ बुला रही है । नीचे आ जाओ।" वो बोली, मासूम मुस्कान के साथ । लेकिन हरि की हालत – पागलपन, उत्तेजना अपने चरम पर थी । वो उठा, राधा को इशारा किया। "बेटी... आ मेरे पास। पहले पापा को... हग दे।" राधा करीब आई, लेकिन हरि ने झपटकर उसे गोद में उठा लिया – उल्टा, पेट नीचे। "पापा... क्या? छोड़ो!" राधा चिल्लाई, लेकिन हंस रही।

हरि ने सलवार नीचे सरका दी – नंगी गांड बाहर आ गयी । "चुप रंडी बेटी! खाना बाद में... पहले सजा ले ।" वो दे-दन-दन थप्पड़ मारने लगा – नंगी गांड पर, जोरदार। "चटक! चटक! ले कुतिया... तेरी गांड... लाल कर दूंगा। अंकल के सामने... शरम आ रही मादरचोद?" राधा चीखी, "आह पापा... दर्द... रुको! अंकल... बचाओ!" गांड लाल हो गई उसकी निशान पड़ गए।

उमेश चौंका, उठा। "हरि... रुह भाई... वो तेरी बेटी है । हल्के से... शाम है, लोग सुन लेंगे।" वो हरि का हाथ पकड़ने लगा। लेकिन हरि पागल हो गया था नशा, उत्तेजना से । "चुप उमेश! तू अपनी बेटी को व र्मा से चुदवाता है, मैं अपनी को थप्पड़ मारूंगा तो क्या? ये रंडी है... । ले बेटी... और थप्पड़ मारने लगा !" वो नहीं रुका, 10-12 थप्पड़ – राधा की चीखें, निकल गयी लेकिन सिहरन भी होने लगी । "पापा... आह... दर्द हो रहा ... लेकिन... गर्म लग रहा। रुको मत... लेकिन अंकल देख रहे।"

हरि ने उसे छोड़ा, लेकिन घोड़ी बना दिया – हाथ-पैरों पर, गांड ऊपर। "अब सजा पूरी हुई तेरी कुतिया । तेरी चूत... फाड़ दूंगा।" पैंट गिराई और काला लंड बाहर निकाला – सख्त। थूक लगाकर चूत पर रगड़ा। "ले रंडी बेटी... पापा का लंड... अंदर!" एक झटके में घुसेड़ा – टाइट चूत फट गयी । राधा चिल्लाई, "आह पापा... बड़ा...है आपका फाड़ दिया!" हरि दे-दन-दन धक्के मारने लगा – जोरदार, गांड पकड़कर। "ले कुतिया! चीख... तेरी चूत... मेरी। रंडी बेटी... अंकल देख रहे, शरम आ रही तुझे ? चूत फाड़ दूंगा!" थप्पड़ों की बौछार कर दी – गांड पर, पीठ पर। "चटक! ले... तेरी गांड लाल हो गयी चूत गीली।"

राधा कराह रही, "पापा... हाँ... फाड़ो... तेज़... आह... अंकल... मत देखो... या देखो... मजा आ रहा!" उमेश सिहर गया, लेकिन हिलाने लगा। "हरि... तू पागल... लेकिन... हॉट लग रहा। राधा... सह ले।" , "निकल रहा बेटी... ले अंदर!" वीर्य गिराया, राधा कांप गयी – "आह पापा...

हरि थककर लेट गया, राधा रो रही लेकिन मुस्कुराती हुई । उमेश ने फोन निकाला, नशे में। "खुशबू... ऊपर आ। पापा बुला रहे।" नीचे से खुशबू आई – होंठ अभी भी चिपचिपे, व र्मा का वीर्य सूखा लेकिन बाकी। "पापा... क्या? राधा दीदी... ये?" लेकिन उमेश ने उसे खींचा, होंठ चूसने लगा – जोरदार, जीभ अंदर तक ले ली उसकी । "उम्म... बेटी... सर का वीर्य... चख लूं फिर से। गंदा..है . लेकिन तेरा स्वाद।" खुशबू सिहर गई, जवाब दिया – जीभ लड़ाते, वीर्य चाटते। "पापा... हाँ... चूसो... व र्मा सर का... हमारा राज़। आह... तेरी जीभ... गर्म है रे कुतिया " दोनों उत्तेजित हो गए – हाथ नीचे, हरि देखता रहा, "वाह जीजा... तेरी बेटी... रंडी नंबर वन।"
 
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रात गहरा चुकी थी। गाँव में सन्नाटा पसर गया था—सिर्फ दूर कहीं मेंढक की आवाजें आ रही थी और हवा में मिट्टी की ठंडी सोंधी। रसोई का चूल्हा बुझ चुका था, लेकिन थोड़ी सी लालिमा दीवारों पर बाकी थी, जैसे कोई अधजली आग अभी भी सुलग रही हो। रमा खड़ी थी सिंक के पास—सिर्फ पतला सा पेटीकोट और ढीला ब्लाउज पहने, साड़ी उतार दी थी गर्मी से। पेटीकोट गीला हो गया था बर्तन धोते-धोते, जांघों से चिपक गया, कूल्हों की गोलाई साफ झलक रही थी । ब्लाउज के हुक ढीले, चूचियाँ ऊपर से उभरी हुईं—भारी, मोटी, पसीने से चिपचिपी। हाथों में साबुन का झाग, वो बर्तनों को रगड़ रही थी, मन में दिन भर की थकान और वो मीठी बेचैनी—'उफ्फ... ये सब क्या हो रहा है? उमेश सो रहा है अंदर, और मैं... ये हालत में। लेकिन रवि... मेरा बच्चा, कितना भूखा लगता है।'

पीछे से हल्की सी चरमराहट हुई —रवि चुपके से आया, खेलने से लौटा था लेकिन नींद न आई थी । लंड अभी भी सेमि-हार्ड, पैंट में दर्द कर रहा था —माँ की वो चूचियाँ, नदी का रस, सब घूम रहा था दिमाग में। वो रुका, साँसें रोकीं। रमा की पीठ नंगी, पेटीकोट की नॉट नीचे लटक रही। दिल धड़कने लगा, लेकिन कदम आगे—हाथ बढ़ाया, पेटीकोट की नॉट पकड़ी, एक झटके में ऊपर सरका दिया। रमा की गांड नंगी हो गई—सफेद, गोल, लेकिन पसीने से चमकती, बीच में गहरी दरार। रवि झुका, घुटनों पर—जैसे कोई कुत्ता हो , जीभ बाहर की , सीधा गांड पर चाटा। गर्म, नमकीन स्वाद—पसीना, मिट्टी का हल्का, और नीचे चूत की वो मीठी महक। "उम्म... मम्मी... तेरी गांड... कितनी गर्म है ..." जीभ दरार में घुसाई, चाटता रहा—ऊपर-नीचे, कुत्ते की तरह लार टपकाते हुए।

रमा का शरीर काँप गया, बर्तन हाथ से गिर गया —धड़ाम की आवाज रसोई में गूँजी। वो मुड़ी, लेकिन रवि ने कमर पकड़ ली—पीछे से दबा दिया। "रवि... बेटा... क्या कर रहा तू? आह... जीभ... अंदर... उफ्फ, रुक जा... कोई सुन लेगा!" आवाज काँप रही थी, डर भरी लेकिन सिसकी के साथ—गांड की सिहरन सीधी चूत तक जा रही थी , गीलापन बढ़ा। रवि न रुका, जीभ और गहरा घुसाई—चाटते हुए सिसका, "मम्मी... चुप साली... तेरी गांड चाट रहा हूँ, कुत्ते की तरह। दिन भर सोचता रहा, तेरी ये गोल गांड... चाटूँगा, चूसूँगा। लंड खड़ा हो गया देखकर, .. रंडी की तरह धो रही बर्तन।" जीभ बाहर निकाली, फिर थूक गिराया दरार पर—गीला करके चाटा, हाथ जांघों पर, फैलाया। रमा की कमर झुक गई, हाथ सिंक पर टिका—'आह... बेटा... गंदा... लेकिन... जीभ तेरी... कितनी गर्म। रुक मत... चाट ले... लेकिन धीरे... पापा जाग गए तो?' —गांड ऊपर की, रवि को और जगह दी।

रवि उठा, साँसें तेज थी उसकी —हाथ ब्लाउज पर, एक झटके में फाड़ दिया। हुक उखड़ गए, चूचियाँ बाहर कूद आईं—मोटी, भरी हुई, निप्पल्स तने हुए, पसीने से चमकते। वो दोनों हाथों से पकड़ा, जोर से मसला—उंगलियाँ दबाईं, निप्पल्स मरोड़े। "उफ्फ मम्मी... तेरी ये मोटे-मोटे दूध... कितने भारी! दूध निकालूँगा साली। देख... लटक रही हैं, रंडी के जैसे। बोल... 'बेटा... मसल ले, मम्मी के दूध तेरे हैँ।'" चूचियाँ लहराने लगीं उसके हाथों में, लाल निशान उभर आए—दर्द की मीठी लहर। रमा सिसकी भरी, पीछे मुड़कर रवि को देखा—आँखें लाल, चेहरा पसीने से तर। "रवि... आह... दर्द हो रहा बेटा... लेकिन... हाँ, मसल... तेरी मम्मी के दूध... तेरे लिए ही तो बने हैँ । साली कहता है... तू जानवर हो गया हैँ अब। लेकिन तेरी उंगलियाँ... उफ्फ, निप्पल्स मरोड़... चूत गीली हो गई। बोल बेटा... क्या करेगा अब? लंड... बाहर निकाल ले ना... मम्मी देखे कितना सख्त हो गया।"

रवि ने पैंट नीचे सरका दी, लंड बाहर निकाला —मोटा, नसें फूलीं, सुपारा चमक रहा। पीछे से रमा की कमर पकड़ी, लंड रगड़ा गांड पर—फिर चूत के होंठों पर। "मम्मी... देख साली... तेरा बेटा का लंड... तेरी गांड चाटकर खड़ा हो गया। अब चोदूँगा... जोर से, रसोई में ही। बोल... 'हाँ बेटा... चोद अपनी मम्मी को... चूत फाड़ दे... गंदी रंडी हूँ तेरी।'" धक्का मारा—आधा अंदर, रमा चीखी लेकिन दबा ली, "आह... रवि... मोटा... धीरे... आह... हाँ, फाड़ दे... तेरी मम्मी रंडी बनी तेरे लिए। धक्के दे... जोर से... चूचियाँ मसलते रह... उफ्फ, तेरी गांड चाटने वाली जीभ... अब लंड... कितना गर्म!" रवि ने स्पीड बढ़ाई—धक्के जोरदार हुए , रसोई में ठप-ठप की आवाजें, चूचियाँ मसलते हुए। "ले मम्मी... ले रंडी... तेरी चूत... कस रही लंड को। गंदी बातें... बोल साली... 'बेटा... तेरी मम्मी की चूत... तेरे लंड की गुलाम। थप्पड़ मार गांड पर... चोदते हुए।'" रवि ने हाथ उठाया, चटाक—गांड पर थप्पड़। रमा काँपी, "हाँ... मार... थप्पड़ खाते हुए चुदाई... उफ्फ, आ रही हूँ बेटा... रस दे... भर दे!"

धक्के तेज हो गए पसीना दोनों पर—रवि सिसका, "मम्मी... ले... भर दिया... तेरी चूत में!" झटके के साथ फूटा, वीर्य गर्म बहा। रमा भी काँप गयी —दोनों हाँफे, लिपटे। लेकिन जोश अभी बाकी था —रवि मुड़ा, माँ का चेहरा पकड़ा, आँखों में देखा। "मम्मी... तू... मेरी हो। ले... ये भी।" मुंह खोला, थूक जमा किया—फिर रमा के मुंह में थप्पड़ की तरह थूक गिराया, गर्म, चिपचिपा। रमा सिहरी, लेकिन गटक लिया—हँसी हल्की, "रवि... तू... गंदा... लेकिन अपना। थूक तेरी... मीठा लग रहा।" वो लिपट गई, चूचियाँ दबाईं रवि की छाती पर। रसोई में सन्नाटा लौटा, लेकिन आग बुझी
 
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दोपहर की गर्मी हड्डियाँ चबा रही थी—सूरज आकाश में लाल गोला सा चमक रहा, हवा में धूल उड़ रही, और खेतों में पसीने की नमकीन महक घुली हुई थी । सोभा झुककर काम कर रही थी—हल चला रही, मिट्टी को काटते हुए, साड़ी पसीने से चिपक गई थी उसके बदन से। पेटीकोट गीला, ब्लाउज पारदर्शी हो चुका—चूचियाँ साफ झलक रही थी , निप्पल्स तने हुए पसीने की बूंदों से चमकते। कमर पर पसीना बह रहा था, पीठ नंगी-सी, गांड की गोलाई साड़ी में उभरी। 'उफ्फ... ये गर्मी... पसीना टपक रहा हर जगह। लेकिन काम तो करना है, पापा कहते हैं ना।' सोभा ने साड़ी का पल्लू पोंछा, लेकिन ज्यादा फैल गया—चूचियाँ आधी नंगी। साँसें तेज हो गयी, बदन चमक रहा था, जैसे तेल लगाया हो।

तभी दूर से कदमों की आहट हुई —राजन और उमाकांत आ रहे थे, दारू की बोतलें थामे, दोपहर का नशा चढ़ा था। राजन ने पहले देखा—सोभा झुकी हुई, पसीने से तरबतर। 'उफ्फ... साली रंडी... देख उमाकांत, हमारी सोभा... पसीने में नहाई हुई है। चूचियाँ चमक रही थी, गांड लहरा रही। लंड तो फट जाएगा! बोल साले... चूत देखकर कितना रस टपक रहा होगा, कुतिया!' राजन की आँखें लाल, लंड पैंट में दर्द करने लगा था। उमाकांत ने बोतल फेंकी, सिसका—'भाई... साली हरामी कुतिया... पसीना चाटने को जी चाहे इसकी। देख... वो बालों वाली चूत गीली हो गई गर्मी से, रंडी की तरह बह रही। चल, पकड़ लें—फाड़ देंगे आज खेत में ही!' दोनों भागे, पागलों की तरह—सोभा को कमर से पकड़ लिया। 'पापा? चाचा? अरे... क्या कर रहे... गर्मी में... आह! . छोड़ो, कोई देख लेगा!' सोभा हिली, लेकिन दोनों ने घसीटा—खेत के कोने में बने पुराने शेड में, जहां भूसा ढेर था, छाया।

शेड में घुसते ही राजन ने साड़ी खींच ली—एक झटके में। 'चुप रंडी बेटी... तेरी ये गीली साड़ी... उतार दूँगा साली हरामी। देख... पेटीकोट भी भिगा, चूत की महक आ रही। बोल कुतिया... 'उतार लो पापा... नंगी कर दो रंडी को!' पेटीकोट नीचे सरका दिया, ब्लाउज फाड़ा—चूचियाँ बाहर कूद आईं, पसीने की बूंदें टपक रही। सोभा नंगी हो गई—बॉडी चमकती, पसीना हर कोने में। 'पापा... चाचा... यहाँ? कोई देख लेगा... आह... गर्मी! साले कुत्ते... क्या करोगे अब?' लेकिन आँखों में शरारत, बॉडी सिहर रही थी। उमाकांत झुका, कुत्ते की तरह—जीभ बाहर, सोभा की जांघ पर चाटा। नमकीन स्वाद, पसीना चूसते हुए। 'उम्म... साली रंडी... तेरा पसीना... कितना गंदा स्वादिष्ट है। चाटूँगा पूरा बदन... तेरी जांघें... चूत तक चूसूँगा, बाल चखूँगा हरामी! बोल... 'चाट चाचा... कुत्ते की तरह चाट मेरी गंदी चूत!' जीभ ऊपर, चूत पर—होंठ चूसे, बाल चुभे लेकिन चाटता रहा। 'उफ्फ... तेरी चूत का पसीना... रस मिश्रित, चूस रहा चाचा... गंदी कुतिया, खेत में पसीना बहाती रंडी बुरचोदी!'

राजन भी झुका, पीठ पर—पसीना चाटा, कंधे से कमर तक। 'हाँ कुतिया बेटी... पापा चाट रहा तेरा पसीना... गर्म, नमकीन, तेरी गांड की दरार तक। ले... चूचियाँ साली!' चूचियों पर जीभ लगाई, निप्पल चूसा—पसीना चूसते हुए मसला। 'उफ्फ... तेरी चूचियाँ... पसीने से गीली, दूध जैसी मटन। चाटूँगा सारी... निप्पल काटूँगा रंडी! बोल हरामी... 'चूसो पापा... मेरे मोटे दूध चूसो, कुतिया के जैसे दबाओ!'' सोभा सिसकी भरी, पैर फैलाए—'हाँ... चाटो साले हरामी... पसीना पी लो कुत्तों की तरह... चूत तक जीभ डालो, बाल चबाओ... आह, तेरी जीभें गंदी लग रही लेकिन चूत तड़पा रही!' उमाकांत ने चूत चाटी, जीभ अंदर—'तेरी चूत का पसीना... रस बहा रही साली, चूस रहा चाचा... गंदी बुरचोदी कुतिया, खेत में लंड माँग रही? थूक दूँ तेरी चूत में, गीला करके चाटूँ!' थूक गिराया, फिर चाटा। राजन ने गांड पर जीभ लगाई, दरार चाटी—'पापा की जीभ तेरी गांड में घुस रही... पसीना चूसूँगा, तेरी गंदी दरार साफ कर दूँगा रंडी! बोल... 'चाटो पापा... गांड की गंदगी चूसो, कुतिया बना दो!''

दोनों कुत्तों की तरह चाटते रहे—जांघें, पेट, बगलें, पैर, चूचियाँ, चूत, गांड—हर बूंद चूसी, थूक मिलाकर। सोभा तड़प रही थी 'आह... पागल हो गए साले... चाटो जोर से कुत्तों की तरह... चूत गीली हो गई, बाल चुभ रहे थे तेरी जीभ में... उफ्फ, रस टपक रहा!' फिर राजन ने पैंट गिराई, लंड बाहर किया —सोभा को भूसे पर लिटाया। 'अब चोदेंगे रंडी बेटी... जब तक थक न जाए साली हरामी। ले... पापा का मोटा लंड तेरी बालों वाली चूत में!' धकेला जोरदार—'फाड़ दिया कुतिया... ले धक्के, तेरी चूत कस रही लंड को!' धक्के शुरू, पसीने से फिसलते, ठप-ठप। उमाकांत ने मुंह में ठूंस दिया—'चूस चाचा का काला लंड... गला फाड़ रंडी! बोल... 'चूस रही हूँ चाचा... मुंह की चूत बना दो!'' सोभा चूसी, चिल्लाई—'हाँ... चोदो दोनों साले बुरचोद... रंडी को भर दो रस से... चूचियाँ मसलो, थप्पड़ मारो!' बारी-बारी—राजन चूत में, उमाकांत मुंह में; फिर उल्टा, गांड में। 'ले गांड में चाचा... फाड़ दूँगा तेरी गंदी दरार!' थप्पड़ बरसे—चटाक-चटाक! चूचियों पर, गांड पर, गाल पर। 'कुतिया हरामी... ले धक्के खेत में... चीख रंडी, गाँव सुने तेरी चुदाई को!' राजन ने चूचियाँ मसलीं—'तेरी मोटी चूचियाँ... दबा रहा पापा, निप्पल मरोड़ूँगा साली!' उमाकांत ने गांड थप्पड़—'फड़क रही तेरी गांड... ले और, कुतिया!'

सोभा चरम पर कई बार—'आह... थक गई साले... लेकिन न रुको... फाड़ो चूत-गांड... रस दो गंदे कुत्तों!' घंटों चली चुदाई—धक्के जोरदार, सोभा थककर लेट गई, हाँफती—बॉडी काँप रही थी चूत-गांड लाल, रस बह रहा। 'पापा... चाचा... बस... थक गई रंडी... साली हरामी... चोद लिया पूरा।' दोनों हँसे, लंड बाहर किया —फिर जोश में, सोभा के ऊपर पेशाब किया। राजन पहले—गर्म धार उसके चूचियों पर, पेट पर, चूत तक। 'ले रंडी बेटी... पापा का गर्म पेशाब... नहा ले साली, तेरी गंदी चूचियाँ साफ कर!' उमाकांत ने गांड पर, मुंह के पास—'चाचा का पेशाब... पी ले कुतिया, तेरी रंडी वाली गांड गीली कर दूँ!' सोभा सिहरी, लेकिन मुस्कुराई—'उफ्फ... गर्म... गंदा पेशाब... लेकिन अपना लग रहा साले... चाटूँ क्या?' पेशाब बहा, मिट्टी में मिला, बदन चमक उठा। दोनों संतुष्ट हो गए बोतल उठाई—'शाम को फिर गंजा पीकर ठोकेंगे रंडी... तेरी चूत हमारी मशीन है!
 

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सुबह की धूप अभी भी ताजा थी, लेकिन शाम ढलते ही शहर का वो पुराना पार्क सन्नाटे में डूब गया था। पेड़ों की छाँव में बेंचें खाली पड़ीं, और हवा में हल्की ठंडक घुल रही थी – वो ठंडक जो गर्माहट की तलाश कराती है। उमेश ने खुशबू का हाथ थामा था, लेकिन वो हाथ महज सपोर्ट नहीं था; उँगलियाँ उसके कलाई पर दब रही थीं, जैसे चेतावनी हो – "आज शाम तेरी है, बेटी।" हरि, उमेश का साला, बगल में चल रहा था, उसकी आँखें खुशबू की छोटी सी स्कर्ट पर टिकीं थी – वो स्कर्ट जो हवा में हल्का सा लहरा रही थी, जांघों को चैन से न छोड़ते हुए।

खुशबू की साँसें तेज थीं। कल रात की यादें अभी ताजा थीं – वर्मा सर की चोटियाँ, छत पर हरि की रफनेस – लेकिन आज कुछ अलग था। पापा की आँखों में वो चमक थी, जो डराती भी थी और गुदगुदाती भी। "पापा... पार्क क्यों? घर पर ही..." वो बुदबुदाई, लेकिन उमेश ने उसकी कमर पर हाथ फेरा, धीरे से दबाते हुए। "चुप रंडी। कल रात तूने तो मजा लिया था न? आज थोड़ा अलग मज़ा ले साली । हरि भी हैं, डर किसका?"

वे एक सुनसान कोने में पहुँचे, जहाँ झाड़ियाँ घनी थीं और कोई राहगीर नजर न आता। हरि ने सबसे पहले हाथ बढ़ाया। खुशबू को बेंच पर बिठाया, और सीधे उसके ऊपर झुक गया। "देख रे उमेश, तेरी बेटी कितनी मस्त है...उसके हाथ खुशबू की जांघों पर सरक गए, स्कर्ट ऊपर सरका दी। खुशबू सिहर उठी, लेकिन विरोध न किया – बल्कि पैर थोड़े फैला दिए। "मामा ... यहाँ? कोई देख लेगा..." उसकी आवाज काँप रही थी, लेकिन आँखों में वो चमक थी जो कह रही थी, 'और करो।'

उमेश हँसा, लेकिन हँसी में वो जलन थी जो एक्साइटमेंट बन जाती है। "देख ले तो देख ले, खुशबू। तू तो कल वर्मा सर के सामने रंडी बनी थी। आज पार्क की रानी बनेगी।" वो भी झुक गया, खुशबू के ब्लाउज के बटन खोलने लगा। निप्पल्स कड़े हो चुके थे, ठंड से या उत्साह से। हरि ने एक निप्पल पकड़ा, मसलने लगा – नरम लेकिन दर्द भरी मसल, जैसे आटा गूंध रहा हो। "आह... मामा .. हल्के... पापा, देखो न..." खुशबू की चीख हल्की थी, लेकिन पार्क की खामोशी में गूंजी। उमेश ने दूसरा निप्पल मुंह में लिया, चूसते हुए कहा, "देख रहा हूँ, बेटी। तेरा शरीर तो हमारा है। कल से ही सोच रहा था, पार्क में इसे खोल दूँ।"

हरि की उँगलियाँ अब नीचे सरक गईं – पैंटी के ऊपर से चूत पर दबाव बनाया गीला था पहले से। "साली, पहले से ही रस टपक रही है। उमेश, तेरी बेटी तो असली कुतिया है। कल रात छत पर चीखी थी, आज पार्क में गिड़गिड़ाएगी।" खुशबू का सिर पीछे झुक गया, साँसें तेज हो गयी । "हाँ मामा .. मसलो... लेकिन धीरे... आह!" उमेश ने उसके होंठ चूसे, जीभ अंदर डालकर। "धीरे क्या? तू तो कल 'फाड़ दो' कह रही थी। आज भी वही बोल।"

तभी, झाड़ियों से सरसराहट हुई। खुशबू चौंक गई, लेकिन हरि ने हाथ न हटाया। "कौन?" उमेश ने सिर उठाया, और फिर मुस्कुरा दिया। राजन और उमाकांत वहाँ खड़े थे – राजन का चेहरा शरारती मुस्कान से भरा, उमाकांत की आँखें भूखी। "अरे उमेश भाई! क्या बात है? पार्क में फैमिली पिकनिक चल रही है?" राजन हँसा, लेकिन आँखें खुशबू के खुले ब्लाउज पर। उमाकांत ने सीधे कहा, "पिकनिक नहीं लग रही। चुदाई का प्री-राउंड लग रहा।

हरि ने हाथ हटाया, लेकिन खुशबू को गले लगा लिया – "राजन दादा, उमाकांत चाचा... तुम कैसे? लेकिन हाँ, कल रात वाली बात सही। खुशबू को थोड़ा मसल रहे थे। जॉइन करोगे?" उमेश ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आवाज में हिचक थी। "भाई, ये तो... पार्क है। लेकिन..." राजन ने कदम बढ़ाया, खुशबू के पास आकर उसके बालों में हाथ फेरा। "पार्क ही क्या? कल रात तो छत पर सबने सुना था। 'आह पापा... मामा.' – वो चीखें तो पार्क से भी तेज थीं। उमाकांत, तू बोल, क्या ये रंडी को छोड़ें?"

उमाकांत ने हँसते हुए खुशबू का चेहरा पकड़ा, जबड़े को दबाया। "छोड़ें क्यों? कल सोभा ने तो हमारा पेशाब भी पिया। ये तो ताजा माल है। खुशबू बेटी, बोल न – चाचा को मसलने दे?" खुशबू की आँखें नीची हुई , लेकिन होंठ काँपे। "चाचा... हाँ... लेकिन सब मिलकर... न डराओ।" राजन ने ताली बजाई। "बस इतना? तो चलो, चारों मिलकर। उमेश, तू पीछे से, हरि बगल से, हम आगे।"

बातचीत छोटी थी, लेकिन आग लगा देने वाली। चारों ने खुशबू को घेर लिया। राजन ने ब्लाउज पूरी तरह उतार दिया, निप्पल्स पर थप्पड़ मारे – चटक! "ले रंडी, ये पार्क की हवा में चूचियाँ लाल कर दूँ।" उमाकांत ने स्कर्ट ऊपर सरका दी, पैंटी फाड़ दी एक झटके में। "गीली चूत... कल रात से ही सोच रहा था। हरि, तू मसल, मैं उँगलियाँ डालूँ।" हरि ने जांघें मसलीं, नाखून गड़ाए। "हाँ चाचा, ये तो रस की नदी है। उमेश भाई, तू क्या कर रहा? बस देख?" उमेश ने आखिरकार हाथ बढ़ाया, चूत पर दबाया – गीला, गर्म। "नहीं... मसल रहा हूँ। बेटी, तेरा पापा भी शामिल है। बोल, मजा आ रहा?"

खुशबू की चीखें अब पार्क भर गईं। "आह... सब मसलो... राजन दादा... थप्पड़... हाँ... उमाकांत चाचा... उँगली अंदर... मामा ... जांघें चाटो... पापा... दबाओ!" चारों के हाथ, मुंह – सब उस पर। राजन चूस रहा था निप्पल, उमाकांत दो उँगलियाँ चूत में, हरि जांघों पर दांत गड़ा रहा, उमेश गले पर किस। पार्क की ठंडक में उनका पसीना, खुशबू का रस – सब मिक्स हो गया। "साली, तू तो चारों की हो गई," राजन ने हाँफते हुए कहा। "अब रूम चलें? यहाँ तो मजा अधूरा है ।"

वे जल्दी से पार्क से निकले – खुशबू को बीच में, आधी नंगी, लेकिन स्कर्ट से ढककर। पास का ही एक छोटा सा गेस्टहाउस था । रूम में घुसते ही दरवाजा बंद। लाइट डिम, बेड बड़ा। चारों ने मिलकर खुशबू को नंगा कर दिया। "अब असली खेल होगा ," उमाकांत ने कहा, अपनी पैंट उतारते हुए। लंड बाहर – कठोर, नसें फूलीं हुई ।

चुदाई का तूफान शुरू हुआ। पहले राजन ने लिया – खुशबू को बेड पर लिटाया, पैर फैलाए। "ले रंडी, दादा का लंड। ।" धक्का! खुशबू चीखी, "आह दादा... मोटा...है बहुत " उमाकांत ने मुंह में डाला, "चूस कुतिया, चाचा का।" हरि पीछे से गांड पर थप्पड़ मारा , "मेरा बाद में, भैया का इंतजार मत करा।" उमेश देख रहा था, लंड हिलाते हुए – जलन, लेकिन उत्तेजना भी हो रही थी अपनी बेटी को ऐसे देखकर

हरि ने चूत में डाला, लम्बे लम्बे धक्के मारने लगा । "कल छत पर अधूरा था, आज पूरा। चीख रंडी!" राजन मुंह में, उमाकांत निप्पल्स मसलता रहा । "हाँ मामा ... फाड़ो... सबका लंड... आह!" उमेश आखिर में शामिल हुआ – खुशबू के हाथ में लंड पकड़वाया। फिर उमाकांत ने पोज चेंज की : डॉगी स्टाइल में। "चल रंडी, चाचा की बारी। गांड ऊपर कर !" धक्का गांड में – दर्द भरा, लेकिन खुशबू ने कमर झुकाई। "चाचा... हाँ... गहरा... सब देखो!" राजन और हरि बारी-बारी मुंह और चूत। उमेश अब पीछे – "बेटी... पापा का... ले।" धीरे शुरू, लेकिन तेज हो गया।

रूम गूंजा चीखों से, धक्कों की थाप से। "फाड़ दो... सबका रस... अंदर!" खुशबू चरम पर पहुँची, बॉडी काँपती हुई । चारों ने एक-एक कर रिलीज किया – राजन मुंह में, उमाकांत चूत में, हरि गांड पर, उमेश पेट पर। गर्म वीर्य कहीं न कहीं – चिपचिपा, गंदा।

थकान में लिपटा रूम था । खुशबू बेड पर लेटी, बॉडी चमकती – पसीने, रस, वीर्य से। उमेश उसके पास आया, आँखों में वो प्यार था । "बेटी... सबने लिया... लेकिन तू मेरी है।" वो झुका, होंठों पर किस किया – लेकिन गंदा। खुशबू के मुंह से राजन का वीर्य चाटा, अपनी जीभ से मिक्स किया। "उम्म... पापा... गंदा... सबका स्वाद... चूसो।" उमेश ने चूसा, वीर्य निगला – मीठा-नमकीन मिक्स। फिर खुशबू ने उमेश के होंठ चाटे, पेट पर फैला वीर्य (हरि का) उँगलियों से लगाया। "पापा... देखो, मामा का भी... चूमो।" किस गहरा हो गया – जीभें लिपटीं, वीर्य का आदान-प्रदान हुआ । "रंडी बेटी... तेरा मुंह... सबका कचरा.।" उमेश हाँफा, फिर से सख्त। खुशबू मुस्कुराई, "फिर से पापा... सबके वीर्य से चिकना हो गया।"

रूम में हँसी गूंजी रही थी – चारों देख रहे थे, लेकिन ये मोमेंट उनका नहीं, पिता-पुत्री का। मज़ा ये था कि गंदगी में ही उनका बॉन्ड गहरा हो गया।
 

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घर में शाम की खामोशी थी – सब बाहर थे। उमेश, हरि और खुशबू पार्क घूमने गए थे, रमा बाजार में । सिर्फ राधा घर पर अकेली थी, 18 साल की मासूम सी लड़की, लेकिन आँखों में वो जंगली चमक जो छिपी न रहती। आंगन में धूप अब हल्की पड़ रही थी, फव्वारे की बूँदें चमक रही थीं, और हवा में गुलाब की महक। राधा ने पुरानी साड़ी पहनी थी – पतली, जो उसके कर्व्स को हल्का सा चिपकाए हुए – और वो आंगन की दहलीज पर बैठी चाय पी रही थी। तभी दरवाजे पर खटखटाहट हुई । एक भिखारी आया – 50 का गंदा सा आदमी, फटी धोती में, दाढ़ी उलझी, आँखें भूखी। "बेटी... दो रुपया दे दो... भूख लगी है।"

राधा ने मुस्कुराया, वो शरारती मुस्कान के साथ। "रुपया? अंकल, रुपया तो नहीं, लेकिन कुछ और दे सकती हूँ। अंदर आओ, आंगन में। कोई नहीं देखेगा।" भिखारी चौंका, लेकिन अंदर आ गया – आंगन का कोना, जहाँ दीवारें छिपा रही थीं। राधा ने उसे बिठाया, लेकिन हाथ पहले ही उसकी धोती पर। "अंकल... भूख तो मुझे भी लगी है। दिखाओ न, क्या है?" भिखारी हिचकिचाया, "बेटी... ये क्या... मैं तो भिखारी हूँ।" लेकिन राधा ने धोती खींची – लंड बाहर, गंदा लेकिन सख्त। "वाह अंकल... गंदा लेकिन मोटा। । बस चुप रहना।" वो झुकी, मुंह में लिया – जीभ घुमाई, चूसने लगी। "उम्म... अंकल का स्वाद... नमकीन है । हाँ... सख्त हो गया है आपका । चूसूँ और?" भिखारी हाँफा, "आह बेटी... रंडी है तू... ले, चूस। मजा आ रहा है।"

राधा की साड़ी सरक गई, चूचियाँ आधी बाहर हो गयी । वो चूस रही थी, हाथ से सहला रही – आंगन में सिर्फ चूसने की आवाजें आ रही थी। "अंकल... तेरा लंड... कितना गर्म है। रस निकलेगा न? राधा पी लेगी।" भिखारी का सिर पीछे, "हाँ रंडी... पी ले... तेरी जीभ... आग लगा दी तूने।"

तभी, दरवाजा खुला। उमेश, हरि और खुशबू पार्क से लौटे – हँसते-बातें करते। "पापा, आज पार्क में कितना मजा आया!" खुशबू चहक रही थी। लेकिन आंगन में वो सीन – राधा घुटनों पर, भिखारी का लंड मुंह में। तीनों रुक गए। उमेश की आँखें फैल गयी, लेकिन चमक आई। हरि का चेहरा लाल – गुस्सा से , लेकिन लंड सख्त हो गया । खुशबू किकनी, लेकिन मुस्कुराई। "राधा दी... ये क्या? भिखारी का लंड चूस रही?

भिखारी घबरा गया, लंड छिपाने लगा। "अ... अरे साहब... ये... मैं तो..." हरि ने गरजकर कहा, "भाग यहाँ से हरामी! तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी को छूने की?" उमेश ने भिखारी का कॉलर पकड़ा, धक्का देकर बाहर फेंका। "चल साला, भाग जा! वरना तेरी गांड फाड़ दूँगा।" भिखारी भागा, धोती लटकाती। आंगन अब खाली था , लेकिन हवा में गंदगी की बू। राधा खड़ी हो गई, साड़ी सम्हाली, लेकिन होंठ चमक रहे थे – भिखारी के रस से। "प... पापा... ... दी... मैं... बस मजा ले रही थी।"

हरि का गुस्सा फूट गया, लेकिन आँखों में वो मजा जो गंदा था। वो राधा के पास पहुँचा, गाल पर जोरदार थप्पड़ – चटक! "रंडी ! तेरी हिम्मत? घर पर भिखारी को बुला लिया? तेरी चूत फाड़ूँगा आज!" राधा सिहरी, गाल लाल हो गए , लेकिन आँखें नीची – उत्साह से। "आह पापा... दर्द... लेकिन... गलती हो गई। मारो न, सजा दो।" हरि ने दूसरा थप्पड़ मारा, कमर पर – चटक! "सजा? तू तो कुतिया है। पार्क में हम मजा ले रहे, तू घर पर रंडी बनी हुई है साली ? बोल, कितना चूसा उसका लंड?" राधा काँपी, लेकिन मुस्कुराई, "पापा... पूरा मुंह में... स्वाद आया। लेकिन अब... तुम्हारा लंड चाहिए।" उमेश हँसा, लंड हिलाते हुए। "हरि, तेरी बेटी तो कमाल है। गुस्सा मत कर, एंजॉय कर। खुशबू, तू देख।" खुशबू ने साड़ी सरकाई, "हाँ.. राधा दी रंडी बन गयी , मैं भी गरम हो गई हूँ ।"

हरि ने राधा के बाल पकड़े, आंगन में ही बिठा दिया – घुटनों पर। "एंजॉय? पहले सजा। थप्पड़ ले रंडी!" तीसरा थप्पड़ – गांड पर, साड़ी ऊपर सरका दी। चटक! राधा चीखी, "आह पापा... हाँ... मारो... तेरी बेटी गंदी है। भिखारी का रस मुँह में है, चाट लो।" उमेश आगे आया, पैंट खोली – लंड बाहर। "हरि, जीजा की बारी। तेरी बेटी को रंडी बनाते हैं। खुशबू, तू मसल।" खुशबू ने राधा के ब्लाउज खोला, निप्पल्स पकड़े – मसला। "दी... तेरी चूचियाँ लाल हो गयी है । भिखारी ने छुईं?

हरि ने राधा को पटक दिया – आंगन की ठंडी ईंटों पर। साड़ी फाड़ दी, चूत नंगी हो गयी । "ले रंडी बेटी... पापा का लंड। भिखारी का चूसा, अब मेरा ले।" धक्का मारने लगा जोर से ! राधा चीखी, "आह पापा... मोटा है बहुत ... फाड़ दिया ! हाँ... चोदो... सजा दो।" हरि धक्के मारने लगा – रफ, गुस्से वाले। "चीख रंडी! आंगन में सब सुनें। तेरी चूत... गीली क्यों हो गयी ? भिखारी से गरम हुई?" राधा कमर झुकाई, "हाँ पापा... लेकिन तेरा लंड... राजा। तेज... आह!" उमेश बगल में, राधा के मुंह में लंड ठूँसा। "ले बेटी... चूस। भिखारी का स्वाद मिट गया ।" राधा चूसी, "उम्म... .. गंदा... लेकिन मजा आ रहा । पापा देखो, मैं चूस रही।"

खुशबू ने राधा की जांघें मसलीं, "दी... तू रंडी बनी, मैं तेरी चूत चाटूँ?" लेकिन हरि ने धक्का रोका, "नहीं बेटी... पहले हम चोदें। उमेश, तू पीछे से।" उमेश ने पोज चेंज किया – राधा को डॉगी बनाया। गांड ऊपर की । "हरि, तेरी बेटी की गांड... तंग है । ले मेरा लंड।" धक्का गांड में मारने लगा ! राधा चीखी जोर से, "आह.. दर्द हो रहा है ... लेकिन हाँ... फाड़ो! पापा... तू चूत में।" हरि ने चूत में डाला – दोनों साले-जीजा मिलकर धक्के। आंगन गूंजा – थाप-थाप, चीखें। "रंडी बेटी... दो लंड ले... भिखारी को भूल जा!" हरि हाँफा। राधा काँप गयी , "हाँ पापा... .. सब ले लूँगी... रस दो... आंगन में ही!"

उमेश ने थप्पड़ मारा – गांड पर। "चीख... तेरी दीदी खुशबू देख रही। बोल, मजा आ रहा रंडी?" राधा हाँफी, "मजा... आह... तेज... दोनों फाड़ो!" खुशबू हँसी, "पापा... राधा दी चरम पर है । मैं भी जॉइन करूँ?" लेकिन हरि ने रिलीज किया – चूत में रस। "ले रंडी... पापा का!" उमेश ने गांड में। "!" राधा चरम पर आ गयी – बॉडी काँपती, रस बहता हुआ । "आह... सबका... गंदा आंगन... लेकिन अपना।"

हरि ने राधा को गले लगाया, थप्पड़ के निशान चूमे। "रंडी बेटी... अगली बार भिखारी मत बुलाना। हम हैं न।" उमेश हँसा, "हाँ हरि...।।" आंगन में हँसी गूंजी – गंदी, लेकिन बॉन्ड वाली। शाम अब गहरा रही थी...
 

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शाम के सात बजे। गाँव का वो तंग गली – जहाँ कचरा सड़ता रहता है, कुत्ते घूमते हैं। खुशबू, 24 साल की वो चुलबुली स्टूडेंट, आज साड़ी में नहीं – एक पुरानी फटी कुर्ता-पायजामा, जो बाजार से चुराई हुई लग रही है । चूचियाँ आधी बाहर झाँक रही, गांड पर पसीने की चमक। वो जानबूझकर गली में घुसी। "पापा... आज तेरी बेटी का गन्दा रूप देखोगे " वो मन ही मन बुदबुदाई, उमेश की कल की नजर याद आते ही चूत गीली हो गई।

उमेश घर से निकला था "पार्क घूमने"। लेकिन वो पार्क नहीं गया – गली के मोड़ पर छिपा, नीम के पेड़ के पीछे। बेटी को फॉलो किया था, चुपके से। उसका लंड पहले से ही सख्त था पैंट में दबा। "खुशबू... क्या कर रही बेटा?" वो सोचता रहा, लेकिन आँखें न हटाईं।

गली के बीच में, दो आवारे – बिंदा और मिंदा, वही बाजार वाले बदमाश, जो रमा की चूचियाँ दबा चुके थे। वो शराब के नशे में, धोती लटकाए, लंड बाहर लहराते आ रहे थे । "अरे रंडी... तू यहाँ क्या कर रही है ?" बिंदा ने हँसते हुए कहा, खुशबू को दीवार से सटा दिया। मिंदा ने पीछे से गांड पकड़ी – जोर से मसला, "गांड गर्म है साली... भाई, आज तो फाड़ेंगे।"

खुशबू सिहर गयी , लेकिन मुस्कुराई – शरारत से। "हाँ भैया... फाड़ो। लेकिन गंदा करो... गली की कुतिया बना दो।" उसने कुर्ता ऊपर किया – चूचियाँ नंगी हो गयी , गुलाबी निप्पल्स सख्त। बिंदा ने मुंह में एक चूची ठूँस दी – चूसने लगा, दांत से काटा। "आह... कुतिया... तेरी चूचियाँ कितनी मोटी है !" थूक गिराया, चूची पर। मिंदा ने पायजामा नीचे सरका दिया – चूत नंगी हो गयी बाल गीले। "देख भाई... रस टपक रही है । रंडी तैयार है।"

उमेश की साँस रुक गई। वो देख रहा था – अपनी आँखों से। बेटी की चूत, जो कल वो कल्पना में चाट रहा था, अब दो अजनबी मर्दों के बीच। लंड फटने को , लेकिन वो हिला नहीं – बस देखता रहा, हाथ पैंट में डाल, धीरे-धीरे सहलाने लगा। "खुशबू... मेरी राजकुमारी... कुतिया?"

बिंदा ने खुशबू को घुटनों पर बिठा दिया – गली के गंदे कचरे पर। "चूस रंडी... हमारा लंड साफ कर।" दोनों ने लंड बाहर किया – गंदे, पेशाब की बू, पसीने से चिपचिपे। खुशबू ने एक लिया मुंह में – जीभ घुमाई, चूसी जोर से। "उम्म... भैया का स्वाद... गंदा... लेकिन मजा आ रहा है ।" दूसरा हाथ से सहलाया, थूक लगाया। बिंदा ने बाल पकड़े – सिर दबाया, गले तक ठूँस दिया । "गले में ले कुतिया... " खुशबू खाँसी, आँखें लाल हो गयी लेकिन रुकी नहीं। थूक-रस मिला हुआ मुंह से टपक रहा था चूचियों पर गिरा धीरे धीरे ।

मिंदा पीछे गया – गांड फैलाई, जीभ अंदर डाली। "गांड का माल... चाटूँ।" जीभ चाटी, थूक डाला – गीला कर दिया। "अब लंड... ले गंदी कुतिया !" धक्का मारा – आधा अंदर। खुशबू चीखी, "आह... फट गई... और जोर से!" बिंदा ने मुंह से निकाला, चूचियों पर थप्पड़ मारा – चटाक! चटाक! "लाल हो गयीं रंडी... तेरी मम्मी वाली चूचियाँ।" (रमा को याद किया।)

उमेश अब कांप रहा – लंड से रस टपकने लगा। "ये... मेरी बेटी... गली में... दो लंडों पर?" लेकिन रोक न सका। वो निकला छिपने से – थोड़ा आगे, लेकिन अंधेरे में। देखता रहा, सहलाता रहा । कल्पना नहीं, रियल – बेटी की चीखें गूँज रही गली में।

अब पीक: बिंदा ने खुशबू को दीवार से सटाया – खड़ी करके चूत में धक्का। मिंदा गांड में। डबल – जोरदार। "ले कुतिया... भर दिया!" । खुशबू की बॉडी काँपती रही "हाँ... फाड़ो... गंदा रस डालो... गली में बह जाए!" थप्पड़ बरसे – गांड पर, चूचियों पर, गाल पर। चटाक! चटाक! निशान लाल। कचरा चिपका बॉडी पर – मिट्टी, थूक, पसीना। एक कुत्ता भी आया, भौंका – लेकिन वो रुकी नहीं। "भौंको... मैं कुतिया हूँ!"

खुशबू गिर पड़ी – हाँफती, मुस्कुराती। "मजा आया भैया... अगली बार तीन लाओ।" बिंदा-मिंदा हँसे, चूचियाँ चूमा, चले गए।

उमेश अब बाहर आया – काँपते कदमों से। खुशबू ने देखा – आँखों में चमक आ गयी । "पापा... देख लिया? तेरी बेटी... गली की रानी।" वो उठी, गंदी बॉडी से लिपटी – चूचियाँ दबाईं उमेश की छाती पर। "अब तू... साफ कर पापा । चाट ले... गंदा रस।" उमेश टूट गया – घुटनों पर, जीभ निकाली। चूत चाटने लगा – नमकीन, गंदा। "बेटा... तू टीचर की बेटी है मेरी कुतिया।" लंड बाहर निकला धक्का मारा – तुरंत। गली में ही, कुत्ते भौंके, लेकिन वो लिपटे रहे।

रात गहरा गयी । घर लौटे – गंदे, लेकिन खुशी से..
 

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घर पहुँचते ही दोनों थके हुए लेकिन अंदर से उत्तेजित थे। शाम के सात बज चुके थे, और घर में मम्मी अभी बाजार गई हुई थीं—कम से कम आधा घंटा तो लगना था। उमेश ने दरवाजा बंद किया, चाबी घुमाई, और सीधे ड्राइंग रूम की सोफे पर धम्म से बैठ गए। उनकी सांसें अभी भी तेज थीं, शर्ट पर गली की गंदगी चिपकी हुई थी, और लंड अभी भी आधा तना हुआ था। खुशबू ने अपना फटा कुर्ता ठीक करने की कोशिश भी नहीं की—स्तन अभी भी आधे नंगे झांक रहे थे, पजामा नीचे सरका हुआ, चूत पर भिखमंगों का रस सूखने लगा था। वो मुस्कुराती हुई उमेश के बगल में बैठ गई, अपनी जांघ उनकी जांघ से सटा ली।

उमेश ने सिर झुकाकर सांस ली, फिर गहरी सांस छोड़ते हुए बोले, "खुशबू... बेटा, ये सब क्या हो गया आज? मैं... मैं तेरी वो हालत देखकर पागल हो गया था। लेकिन सोच, तू एक टीचर की बेटी है। मैं स्कूल में बच्चों को नैतिकता सिखाता हूँ, समाज को सही-गलत का फर्क बताता हूँ। घर में जो भी हो, वो हमारा निजी मामला है—मैं तेरी मम्मी को भी धोखा दे रहा हूँ, ये तो मैं जानता हूँ, लेकिन बाहर? गली में? वो भिखमंगे... वो सब अगर किसी को पता चल गया तो? तेरी बदनामी होगी, मेरी नौकरी जाएगी। लोग कहेंगे, उमेश का घर एक रंडीखाना है। तू इतनी जवान है, तेरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। कल से वादा कर, बेटा, घर से बाहर कभी ऐसा कुछ मत करना। हम घर में ही... जो भी करना है, करेंगे। लेकिन बाहर नहीं। समझी?"

खुशबू ने उनकी तरफ देखा, आँखों में शरारत भरी चमक थी। वो धीरे से हँसी, अपना हाथ उमेश की जांघ पर रख दिया, उँगलियों से धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरकाने लगी। "पापा... आप कितने क्यूट हो जब लेक्चर देते हो। टीचर की बेटी... हाँ, मैं जानती हूँ। स्कूल में सब मुझे देखते हैं—'अरे, सर की बेटी है, कितनी शरमीली, कितनी पढ़ाकू।' लेकिन पापा, आपने आज देखा ना? वो गंदी गली में, कचरे पर लेटी हुई, दो भिखारियों के लंडों से ठुकी जा रही थी... और मैं कितना मजा ले रही थी। वो बदनामी ही तो है जो मुझे उत्तेजित करती है। घर में तो सेफ है लेकिन बोरिंग। लेकिन बाहर... वो डर, वो शर्म, वो गंदगी... उफ्फ, सोचकर ही चूत गीली हो जाती है। वैसे, पापा, आपकी बात मान लूँगी... लेकिन पहले ये बताओ, आज गली में छिपे हुए देखते रहे ना? मेरा मुंह भरा हुआ था उन लंडों से, गांड फटी हुई... और आपका लंड तना हुआ था। क्या सोच रहे थे? की अपनी बेटी को कुतिया बना दो?"

उमेश ने सिर झटका, लेकिन उनकी नजर खुशबू के आधे नंगे स्तनों पर अटक गई। वो निगल लीं, हाथ से अपना चेहरा ढक लिया। "खुशबू, चुप रह... ये सब गलत है। मैं तेरा पिता हूँ। आज तक मैंने जो किया, वो पागलपन था। लेकिन तू... तू मेरी जान है। मैं तुझे रोकना चाहता हूँ, क्योंकि मैं तुझे खोना नहीं चाहता। कल से हम नॉर्मल रहेंगे। तू पढ़ाई पर ध्यान दे, मैं... मैं कोशिश करूँगा भूलने की। लेकिन तू वादा कर।"

खुशबू ने अब खुलकर हँस दी, और अचानक अपना पजामा और नीचे की चड्ढी एक साथ सरका दी। उसकी बालों वाली चूत खुली हवा में चमक रही थी—भिखमंगों का रस अभी भी चिपका हुआ, थोड़ा गीला। वो अपनी दो उँगलियाँ चूत में डाल लीं, अंदर-बाहर करने लगीं। "पापा... देखो ना, अभी भी गीली है। वो भिखारियों का रस मिक्स हो गया है मेरे पानी से। आओ, चख लो।" वो उँगलियाँ निकालीं—चमकदार, रसीली—और उमेश के होंठों पर मल दीं। उमेश ने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन खुशबू ने उनका चेहरा पकड़ लिया। "चाटो पापा... अपनी बेटी की गंदी चूत का रस। ये वही है जो आज दो लंडों ने भरा। कल्पना करो, अगर मम्मी को पता चल जाए तो..

उमेश की साँसें तेज हो गईं। वो विरोध करने लगे, लेकिन खुशबू की उँगली उनके मुँह में सरक गई। स्वाद—नमकीन, गंदा, उत्तेजक—उनके दिमाग को चूर कर गया। वो चूसने लगे, आँखें बंद करके। "खुशबू... ये... ये पाप है। लेकिन... उफ्फ, तेरा स्वाद... इतना गंदा, इतना मीठा। तू मुझे पागल बना रही है।"

खुशबू ने उँगली निकाली, लेकिन अब अपनी हथेली चाटवाई। फिर वो सोफे पर पीछे सरक गई, पैर फैला दिए। "पापा, अब सुनो मेरी फैंटसी। घर में ही कर लो ना। कल्पना करो... मैं स्कूल से आऊँ, यूनिफॉर्म में। आप क्लास ले रहे हो, लेकिन अंदर से तड़प रहे हो। मैं पीछे से आऊँ, आपकी कुर्सी के नीचे छिप जाऊँ, और आपका लंड निकालकर चूसूँ। क्लास चल रही हो, बच्चे हँस रहे हों, और आपका लंड मेरे गले में। या फिर... मम्मी के साथ डिनर पर। टेबल के नीचे मैं अपना पैर फैलाऊँ, आपकी गोद में अपना पैर रखूँ, और चूत पर मसलूँ। मम्मी बात कर रही हो, और आप चुपके से मेरी चूत में उँगली डाल रहे हो। या और गंदा... रविवार को पूजा। मंदिर में, भगवान के सामने, मैं आपको कहूँ—'पापा, मेरी गांड चाटो।' और आप चाटोगे, क्योंकि आपका लंड तन जाएगा। देखा? घर में भी तो रिस्क है... लेकिन मजा दोगुना। अब आओ, चाटो। पहले मेरी चूत।"

उमेश अब टूट चुके थे। वो घुटनों पर आ गए, सोफे के सामने। खुशबू ने अपना एक पैर उठाया, तलवा उनके मुँह के पास ला दिया। "नहीं पापा, पहले पैर। टीचर साहब, मेरे गंदे तलवे चाटो। आज गली में कीचड़ लगा है।" उमेश ने हिचकिचाते हुए जीभ निकाली, तलवे पर चाटना शुरू किया। स्वाद—मिट्टी, पसीना—लेकिन उत्तेजना ने उन्हें कुत्ता बना दिया। वो चाटते गए, पैर की उँगलियाँ मुंह में भर लीं। खुशबू इठला रही थी, सिर पीछे करके। "हाँ पापा... ऐसे। देखो, स्कूल के टीचर साहब मेरे पैर चाट रहे हैं। कितने गुलाम लग रहे हो। अब दूसरा पैर। चूसो उँगलियाँ, जैसे लंड चूसती हूँ मैं।"

उमेश ने दूसरा पैर भी चाटा, अब उनकी शर्ट उतर चुकी थी। खुशबू ने उन्हें ऊपर खींचा, चूत उनके मुँह के ठीक सामने। "अब चूत। जीभ अंदर डालो। साफ करो भिखारियों का रस।" उमेश ने जीभ फैलाई, चूत पर चाटना शुरू किया। बालों में उलझती जीभ, रस चूसते हुए। खुशबू की सिसकारियाँ निकलने लगीं। "आह... पापा, कितनी अच्छी चाटते हो। अब... अब थूक।" वो खुद झुकी, उमेश के मुँह में धीरे-धीरे थूक दिया—गाढ़ा, गर्म। उमेश ने निगल लिया, आँखों में आंसू थे, लेकिन लंड पूरी तरह तना हुआ।

"अब पीछे मुड़ो," खुशबू ने आदेश दिया। वो सोफे पर घूम गई, गांड ऊपर करके। "गांड चाटो पापा। जीभ अंदर करके । आज वो भिखारियों ने फाड़ दी है।" उमेश ने हाथों से गांड के नरम गाल फैलाए, जीभ डाली। खुशबू चीखी मजा से, लेकिन पीछे धकेल दिया। "हाँ... कुत्ते जैसे। देखो खुद को पापा—टीचर, जो ब्लैकबोर्ड पर लिखते हो, अब मेरी गांड चाट रहे हो। कितना मजा आ रहा है? तुम्हारी बेटी तुम्हें कंट्रोल कर रही है। अब थूक दो मेरी गांड में।"

उमेश ने थूक दिया, चाटते रहे। खुशबू अब पलटी, उमेश को सोफे पर लिटा दिया। "अब मैं थूकूँगी।" वो उनके मुँह पर झुकी, धीरे-धीरे, एक-एक बूंद थूक गिराया। उमेश चाटते रहे, हाथों से खुद का लंड सहलाने लगे। "खुशबू... तू... तू देवी है। गंदी देवी। मैं तेरा गुलाम।"

खुशबू हँसी, "हाँ पापा, मेरे गुलाम। लेकिन याद रखो, कल स्कूल में नॉर्मल रहना। घर में ही... ये सब।" वो उनके लंड पर सवार हो गई, लेकिन अभी चोदने से पहले रुक गई। "अभी तो बस चाटना था। रात को मम्मी सो जाएँ, तब चोदना।" दोनों हाँफते हुए लेटे रहे, हवा में गंदगी की खुशबू फैल गयी ।
 
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शाम ढल रही थी, सूरज की लालिमा खिड़की से झाँक रही थी, और घर में चूल्हे की आग की गर्मी ने हवा को और भारी कर दिया था। सोभा रसोई में खड़ी थी, साड़ी की कमर पर बंधी हुई, लेकिन दोपहर की चुदाई के बाद अभी भी बॉडी में वो सिहरन बाकी थी—चूत और गांड में हल्का दर्द, लेकिन मीठा सा। वो आटे को गूंथ रही थी, हाथों में आटा चिपका, साड़ी का पल्लू कंधे से सरक गया था, ब्लाउज से चूचियाँ आधी झांक रही थीं—पसीने से गीली, निप्पल्स अभी भी तने हुए। 'उफ्फ... दोपहर की याद... पापा और चाचा के लंड... रस बहा दिया था। लेकिन अब खाना बनाना है, वरना डांटेंगे साले।' सोभा ने हल्के से मुस्कुराई, आटे की लोई को मसलते हुए अपनी जांघों को रगड़ा—चूत अभी भी गीली महसूस हो रही थी।

तभी दरवाजा खुला, और राजन व उमाकांत अंदर घुसे—दोनों के चेहरे लाल, आँखें चमकतीं, गांजे का नशा चढ़ा हुआ। बोतलें थामे, कपड़े गंदे, लेकिन लंड पैंट में तने हुए—दोपहर की चुदाई की याद ने फिर से जोश जगा दिया था। वो सीधे रसोई की तरफ बढ़े, और सोभा को देखा—झुकी हुई, गांड साड़ी में लहराती, चूचियाँ हिलतीं। राजन ने उमाकांत को कोहनी मारी, फुसफुसाया, "देख भाई... हमारी रंडी बेटी... आटा गूंथ रही है, लेकिन चूचियाँ तो बाहर झांक रही हैं साली की । दोपहर में खेत में फाड़ी थी, अब रसोई में लंड माँग रही लगती है। उफ्फ... वो निप्पल्स... चूसने को जी चाहे, कुतिया हरामी!"

उमाकांत ने हँसते हुए सिर हिलाया, नशे में आवाज भारी हो गयी — "हाँ राजन भाई... साली सोभा... देख, कमर झुकाई है, गांड ऊपर की तरफ। कल्पना कर, अगर अभी पीछे से लंड घुसा दें... चूल्हे की आग के सामने चोदें। 'आह पापा... गर्मी में चोदो!' बोलेगी हरामी। दोपहर का पेशाब अभी भी उसके बदन पर सूखा होगा, गंध आ रही है। बोल साले... चूत चाटूँ क्या अभी? बाल चबाऊँ, रस चूसूँ?" दोनों ठहाका लगाकर हँसे, लेकिन नजरें सोभा पर टिकीं थी । सोभा ने कान से सुना, लेकिन मुस्कुराई—बिना पलटे, आटे को और मसला, साड़ी नीचे सरकने दी, गांड की दरार झलकने लगी। "पापा... चाचा... हँस रहे हो क्या? खाना बन रहा है, चुपचाप बैठो। गांजा पी लिया? नशा चढ़ा तो गंदी बातें शुरू कर दी ।"

राजन ने पास आकर सोभा के कंधे पर हाथ रखा, लेकिन झुककर उसके कान में फुसफुसाया, "बेटी रंडी है तू साली ... तू खाना बना रही है, लेकिन तेरी ये चूचियाँ... आटा लग गया लगता है। मसल दूँ क्या? अभी भी तनी हुईं। बोल... 'हाँ पापा, मसलो अपनी कुतिया बेटी की चूचियाँ!' उमाकांत भाई देख रहा है, जल रहा होगा साला।" उमाकांत ने भी पास सरक लिया, पीछे से सोभा की कमर पर हाथ फेरा—साड़ी के ऊपर से गांड मसली। "सोभा कुतिया... तेरी गांड... दोपहर में फाड़ी थी चाचा ने, अभी भी लाल होगी ना? थप्पड़ मारूँ क्या? चटाक-चटाक! बोल हरामी... 'मारो चाचा, रंडी की गांड फाड़ दो!' खाना बनाते हुए चोद दूँ क्या? तू चिल्लाएगी तो पड़ोसी सुन लेंगे—'चाचा, लंड घुसाओ!'

सोभा ने आटे के हाथ साफ किए, लेकिन बॉडी सिहर गई—दोनों की गंदी बातों से चूत गीली हो रही थी। वो पलटी, कामुक नजरों से दोनों को देखा—होंठ चाटे, आँखें नीची करके लेकिन मुस्कान आ गयी चेहरे पर। "पापा... चाचा... इतनी गंदी बातें? मैं तो बस खाना बना रही हूँ। लेकिन तुम्हें देखकर... उफ्फ, दोपहर की याद आ गई। ठीक है, गंदे कुत्तों... क्या चाहिए? खाना या... कुछ और?" राजन और उमाकांत ने एक-दूसरे को देखा, नशे में सिर घुमाने लगे—गांजे की चरम सीमा हो गयी । तभी राजन ने गले से खरखराहट निकाली, "बेटी... प्यास लगी है साली। पानी दो... लेकिन साफ पानी नहीं। तेरी तरह गंदा।

सोभा की आँखें चमक उठीं—वो जानती थी, ये नशे का कमाल है। धीरे-धीरे वो दोनों के पास आई, साड़ी का पल्लू और सरका दिया—अब चूचियाँ पूरी तरह झांक रही थीं, निप्पल्स कड़े। उसके चेहरे पर कामुक लुक—होंठों पर उंगली रखी, आँखें आधी बंद। "पापा... चाचा... प्यास लगी है ? बेटी का पानी माँग रहे हो? आओ... लेकिन सही से माँगो। मुंह खोलो, जैसे कुत्ते खोलते हैं। धीरे-धीरे दूँगी... जब तक संतुष्ट न हो जाओ।" राजन ने तुरंत मुंह खोला, जीभ बाहर की —नशे में काँपते हुए। "हाँ बेटी रंडी... खोल दिया पापा ने। उमाकांत भी—मुंह फैलाया, आँखें सोभा के चुचोँ पर। "चाचा का मुंह खुल गया
सोभा ने राजन के पास झुकी, होंठों से थूक इकट्ठा किया—धीरे-धीरे, एक लंबी डोर बनाकर उसके मुंह में टपकाया। गाढ़ा, गर्म थूक—राजन ने निगला, सिसकी भरी। "उम्म... बेटी का थूक... कितना मीठा-गंदा है । और दो रंडी... पापा की प्यास बुझा दो !" सोभा ने फिर थूक दिया—दूसरी बूंद, तीसरी—धीरे-धीरे, जैसे अमृत चढ़ा रही हो। "पापा... पी लो... अपनी बेटी का गंदा पानी। देखो, कितना गाढ़ा है... चूत का रस मिला है। तृप्त हो गए हो ?" राजन ने सिर हिलाया, लेकिन आँखें पागल सी —नशे में "नहीं बेटी... और... पागल कर दिया तूने!" अब उमाकांत की बारी—सोभा ने उसके मुंह में झुकी, थूक की धार गिराई—एक-एक बूंद, लंबे समय तक। "चाचा... ले... बेटी का थूक... पी लो कुत्ते की तरह। गर्म लग रहा है कुत्ते? गांजे के साथ मिक्स हो गया ना?" उमाकांत ने चूसा, जीभ फैलाकर—"आह... हरामी... तेरी थूक... चूत जैसी है । और दो... चाचा तड़प रहा!" सोभा ने पांच-छह बार थूक दिया दोनों को बारी-बारी—धीरे-धीरे, होंठ चूसते हुए। दोनों के चेहरे गीले हो गए नशे में पागल—आँखें लाल, लंड फटने को तैयार। "उफ्फ सोभा... तू... तू रानी है अपनी ! पागल हो गए हम... चोद डालेंगे तुझे!" राजन चिल्लाया, उमाकांत ने सोभा की कमर पकड़ ली।

सोभा ने हँसकर दोनों को पीछे धकेला, लेकिन साड़ी सरका दी—अब नीचे से नंगी, चूत के बाल चमकते हुए । "रुको पागलों... पहले चाटो। पहले मेरे पैर... तलवे चाटो, कुत्तों।" वो स्टूल पर बैठ गई, पैर फैलाए। राजन घुटनों पर गिर पड़ा, नशे में सोभा का पैर पकड़ा—तलवा चाटने लगा, जीभ से मिट्टी-पसीना चूसते। उमाकांत दूसरे पैर पर— " सोभा इठलाई, पैरों को दबाया उनके मुंहों में—"हाँ... चाटो साले... मेरे पैर कुत्तों की तरह साफ करो। अब ऊपर... जांघें चाटो।" दोनों ने जांघों पर जीभ लगाई—अंदर की तरफ, पसीने चाटते, चूत के पास पहुँचते हुए। "उम्म... तेरी जांघें... रस टपक रही सोभा!"

फिर सोभा उठी, स्टूल पर झुक गई—गांड ऊपर की । "अब चूत... चाटो मेरी बालों वाली चूत। जीभ अंदर डालो!" राजन ने पहले चूत पर जीभ फैलाई—बाल चखते, रस चूसते। "आह बेटी... तेरी चूत... दोपहर का रस बाकी है इसमें ... चूस रहा पापा... गंदा, गीला!" धीरे-धीरे जीभ अंदर-बाहर करने लगा । उमाकांत ने बारी ली—"चाचा की जीभ... तेरी चूत में घुस रही बेटा ... बाल चबा रहा हरामी... बोल... 'चूसो चाचा, रस पी लो!'" सोभा सिसकी भरी—"हाँ... चाटो दोनों... चूत साफ करो थूक से!" अब गांड की बारी—सोभा ने गांड फैलाई। "गांड चाटो... दरार साफ करो कुत्तो!" राजन ने जीभ डाली... उमाकांत ने थूक डाला पहले—"गीला करके चाटूँगा... तेरी गंदी दरार!" दोनों बारी-बारी चाटते रहे—चूत-गांड पर जीभें नाचतीं, सोभा तड़प रही थी —"आह... पागल कुत्तों... चाटो जोर से... चूत गीली हो गई!"

आखिर में सोभा ने दोनों को खड़ा किया, घुटनों पर बिठाया। "अब लंड... बारी-बारी चूसूँगी। सारा रस... मेरी चूचियों पर मलूँगी।" पहले राजन का पैंट सरकाया—लंड बाहर, तना हुआ, नशे से काँपता। सोभा झुकी, मुंह में लिया—धीरे-धीरे चूसी, जीभ से घुमाई। "उम्म पापा... तेरा लंड... कितना मोटा... चूस रही तेरी कुतिया बेटी... गला तक!" राजन सिसका—"आह रंडी... चूस... पापा झड़ने वाला है !" सोभा ने तेज चूसी—हाथ से सहलाते, गेंदें चाटी। राजन झड़ गया—गर्म रस मुंह में चला गया । सोभा ने आधा निगला, आधा निकाला—अपनी चूचियों पर मला, निप्पल्स पर रगड़ा। "देखो पापा... तेरा रस... मेरी चूचियों पर... चमक रहा है !"

अब उमाकांत—लंड काला, मोटा। सोभा ने चूसा—"चाचा... तेरा लंड... गंदा स्वाद है ... चूस रही तेरी कुतिया!" जीभ से चाटा, मुंह में ठूंस लिया। उमाकांत ने बाल पकड़े—"चूस हरामी... चाचा का रस ले!" तेज धक्के मुंह में, सोभा गले तक। झड़ गया—रस बहा बहुत सारा । सोभा ने चूचियों पर मला—चूचियाँ चिपचिपी हो गयी । "उफ्फ... भरा दिया... चूचियाँ गीली हो गयी !" तीनों हाँफते लेटे, रसोई में गंदगी की खुशबू। सोभा हँसी—"अब खाना खाओ... वरना ठंडा हो जाएगा। लेकिन रात को... बेड पर।" दोनों मुस्कुराए, नशे में—"हाँ रानी... तेरी चूत हमारी!"
 
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