Ajju Landwalia
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शुभा को एक विचित्र अनुभव ने जगाया। उसे लग रहा था जैसे उसके शरीर से खेलते हुए कोई उसे सुख के साथ साथ पीड़ा दे रहा था। शुभा ने पाया कि वह अपनी बाएं ओर लेटी हुई थी और उसका दाहिना पैर उसके पीछे से उठाया गया था। शुभा के यौन पुष्प को दीप की लंबी उंगलियों ने खोलकर दो उंगलियां उनकी संकरी सुरई में डुबकी लगाते हुए उसे संभोग का अनुभव करा रही थी जब दीप का अंगूठा उसी लय में यौन मोती को सहलाते हुए उसे यौन उत्तेजना के सर्वोच्च शिखर पर बनाए हुए था। पर पीड़ा…
पीड़ा शुभा की गुदा में से थी जहां कोई अंजान अंग अंदर बाहर करते हुए उसे एक अनोखे पीड़ादायक उत्तेजना से विवश कर रहा था।
माता!!…
दीप…
दीप का…
दीप का वो…
वो शुभा की गुदा के साथ मैथुन कर रहा था!
शुभा कराहते हुए, “दीप!!…”
दीप, “हां, शुभा।”
शुभा आह भरते हुए, “नहीं!!… गंदा…”
दीप ने शुभा के कान को चूमते हुए अपनी कमर हिलाना जारी रखा।
दीप, “कोई अंग गंदा नहीं होता। प्रश्न केवल यह है कि क्या यह अच्छा लगता है या नहीं?”
शुभा आहें भरते हुए, “मुझे नहीं पता दीप!!… आह!… यहां पीड़ा है पर… पर… करते रहो!… करो!!… और करो!!…”
दीप ने शुभा के सर के नीचे से अपने बाएं हाथ को नीचे लाते हुए शुभा के दाएं दूधिया गोले को हल्के से दबाते हुए उसके ऊपर की फूली हुई बेरी को दबाया।
शुभा ने जोर से आह भरी। गत एक माह में उसके गोले और फूलने लग गए थे और उसकी बेरियों का रंग और गहरा रहा था। दीप ने शुभा की गुदा में अपने धक्के तेज करते हुए उसे अपने सीने पर दबाया और शुभा के कान में उसकी प्रशंसा करते हुए शुभा के दूदू को दबाया।
शुभा इस बहुआयामी समागम से परास्त हो कर स्खलित होते हुए दीप की उंगलियों को मधु की वर्षा में भिगोने लगी जब दीप ने कराहते हुए शुभा की गुदा में अपने स्खलन को भर दिया।
शुभा दीप के आलिंगन में पूर्ण विश्वास से आंखें बंद कर सो गई।
प्रातः के बाद राजकुमारी शुभदा की नई दासी जो पहले गणिका का प्रसव करा चुकी थी वह चुपके से महामात्य ज्ञानदीप के घर में आई। गणिका के पास कार्य करते हुए उसे पता था कि कुछ पुरुषों को स्त्री वेदना से आनंद मिलता है। उसे नहीं लगा था कि ज्ञानदीप शास्त्री जैसा विद्वान ऐसी निम्न प्रकार के कार्य करेगा पर राज महल के सारे दासों ने रात भर राजकुमारी शुभदा की आहें सुनी थी। एक रात्रि की विधवा होने के अभिशाप से अगर राजकुमारी शुभदा न बचे तो सामान्य गण क्या अपेक्षा करे?
दासी ने स्नानगृह से कुछ छटपटाहट सुनी और द्वार के बाहर से अंदर की आवाजें सुनी।
स्त्री, “छोड़ो!!… हमने अभी अभी पुनः वस्त्र पहने हैं! हमें राज सभा से पहले मंदिर भी जाना है!”
पुरुष, “कह दो कि राजकुमारी शुभदा ने एकांत में लिंग का पूजन कर दिया है।”
स्त्री, “शू!!… किसी ने सुन लिया तो?… (हंस कर)अब मेरी कलाई छोड़ने का क्या लोगे?”
छटपटाहट के कुछ क्षणों के बाद स्त्री, “बहुत बुरे हो!… पहले ही हमें रात भर सोने नहीं दिया और प्रातः जो किया उसका परिणाम हमें पूर्ण दिन अपने अंदर रखना होगा! अब और यह क्या है?”
द्वार खुल गया और महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री और राजकुमारी शुभदा ने दासी को देखा। महामात्य ज्ञानदीप ने अपने चेहरे पर से शरारती मुस्कान मिटाते हुए शांत चेहरे से राजकुमारी शुभदा को देखा।
महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री, “हे राजश्री शुभदा, परंपरा है कि विवाह रात्रि के बाद पति पत्नी को उपहार देता है। उपहार अक्सर गले का हार होता है जो अन्य पुरुषों को बताता है कि यह स्त्री उस पुरुष की हो चुकी है। मैं आपको कुछ और देना चाहता हूं।”
महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के सामने झुककर एक सुवर्ण का कंगन प्रस्तुत किया। उस कंगन में तीन रत्न थे, मोर सा नीला नीलमणि, रक्त सा लाल माणिक और ओस सा स्वच्छ हीरा।
महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री, “इसे अपने दाएं हाथ में पहने। यह दर्शाता है कि आप के हाथ में ही मेरा परिवार है। जिस ओर यह हाथ बढ़ेगा मैं उसी ओर रहूंगा।”
राजश्री शुभदा ने दासी को मंदिर में पूजा की तैयारी करने को भेजा और दासी शर्माकर भाग गई। कुछ देर बाद महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री के घर का द्वार खुला और लोगों ने देखा कैसे महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री ने राजश्री शुभदा को नम्र अभिवादन किया। फिर नए दंपति मंदिर की ओर बढ़े तब भी महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री राजश्री शुभदा के दो कदम पीछे चल रहे थे।
दासी ने सोचा कि ज्ञानदीप शास्त्री तो विश्वास के परी ज्ञानी निकले। जो पुरुष एक स्त्री को… नहीं, राजसी स्त्री को पूर्ण रात्रि रतिक्रिडा में चीखने को मजबूर करे वह “नर विशेष” की उपाधि के योग्य है पर जो पति अपनी पत्नी के देह पर पूर्ण अधिपत्य प्राप्त कर के भी उसका दासत्व स्वीकार करे वह सच में “मर्यादा नरोत्तम” है।
Bahut hi umda update he Lefty69 Bro,
Gazab ki story chal rahi he.......
Keep rocking Bro