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Romance पर्वतपुर का HERO

Ajju Landwalia

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शुभा को एक विचित्र अनुभव ने जगाया। उसे लग रहा था जैसे उसके शरीर से खेलते हुए कोई उसे सुख के साथ साथ पीड़ा दे रहा था। शुभा ने पाया कि वह अपनी बाएं ओर लेटी हुई थी और उसका दाहिना पैर उसके पीछे से उठाया गया था। शुभा के यौन पुष्प को दीप की लंबी उंगलियों ने खोलकर दो उंगलियां उनकी संकरी सुरई में डुबकी लगाते हुए उसे संभोग का अनुभव करा रही थी जब दीप का अंगूठा उसी लय में यौन मोती को सहलाते हुए उसे यौन उत्तेजना के सर्वोच्च शिखर पर बनाए हुए था। पर पीड़ा…


पीड़ा शुभा की गुदा में से थी जहां कोई अंजान अंग अंदर बाहर करते हुए उसे एक अनोखे पीड़ादायक उत्तेजना से विवश कर रहा था।



माता!!…

दीप…

दीप का…
दीप का वो…
वो शुभा की गुदा के साथ मैथुन कर रहा था!


शुभा कराहते हुए, “दीप!!…”


दीप, “हां, शुभा।”


शुभा आह भरते हुए, “नहीं!!… गंदा…”


दीप ने शुभा के कान को चूमते हुए अपनी कमर हिलाना जारी रखा।


दीप, “कोई अंग गंदा नहीं होता। प्रश्न केवल यह है कि क्या यह अच्छा लगता है या नहीं?”


शुभा आहें भरते हुए, “मुझे नहीं पता दीप!!… आह!… यहां पीड़ा है पर… पर… करते रहो!… करो!!… और करो!!…”


दीप ने शुभा के सर के नीचे से अपने बाएं हाथ को नीचे लाते हुए शुभा के दाएं दूधिया गोले को हल्के से दबाते हुए उसके ऊपर की फूली हुई बेरी को दबाया।


शुभा ने जोर से आह भरी। गत एक माह में उसके गोले और फूलने लग गए थे और उसकी बेरियों का रंग और गहरा रहा था। दीप ने शुभा की गुदा में अपने धक्के तेज करते हुए उसे अपने सीने पर दबाया और शुभा के कान में उसकी प्रशंसा करते हुए शुभा के दूदू को दबाया।


शुभा इस बहुआयामी समागम से परास्त हो कर स्खलित होते हुए दीप की उंगलियों को मधु की वर्षा में भिगोने लगी जब दीप ने कराहते हुए शुभा की गुदा में अपने स्खलन को भर दिया।


शुभा दीप के आलिंगन में पूर्ण विश्वास से आंखें बंद कर सो गई।


प्रातः के बाद राजकुमारी शुभदा की नई दासी जो पहले गणिका का प्रसव करा चुकी थी वह चुपके से महामात्य ज्ञानदीप के घर में आई। गणिका के पास कार्य करते हुए उसे पता था कि कुछ पुरुषों को स्त्री वेदना से आनंद मिलता है। उसे नहीं लगा था कि ज्ञानदीप शास्त्री जैसा विद्वान ऐसी निम्न प्रकार के कार्य करेगा पर राज महल के सारे दासों ने रात भर राजकुमारी शुभदा की आहें सुनी थी। एक रात्रि की विधवा होने के अभिशाप से अगर राजकुमारी शुभदा न बचे तो सामान्य गण क्या अपेक्षा करे?


दासी ने स्नानगृह से कुछ छटपटाहट सुनी और द्वार के बाहर से अंदर की आवाजें सुनी।


स्त्री, “छोड़ो!!… हमने अभी अभी पुनः वस्त्र पहने हैं! हमें राज सभा से पहले मंदिर भी जाना है!”


पुरुष, “कह दो कि राजकुमारी शुभदा ने एकांत में लिंग का पूजन कर दिया है।”


स्त्री, “शू!!… किसी ने सुन लिया तो?… (हंस कर)अब मेरी कलाई छोड़ने का क्या लोगे?”


छटपटाहट के कुछ क्षणों के बाद स्त्री, “बहुत बुरे हो!… पहले ही हमें रात भर सोने नहीं दिया और प्रातः जो किया उसका परिणाम हमें पूर्ण दिन अपने अंदर रखना होगा! अब और यह क्या है?”


द्वार खुल गया और महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री और राजकुमारी शुभदा ने दासी को देखा। महामात्य ज्ञानदीप ने अपने चेहरे पर से शरारती मुस्कान मिटाते हुए शांत चेहरे से राजकुमारी शुभदा को देखा।


महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री, “हे राजश्री शुभदा, परंपरा है कि विवाह रात्रि के बाद पति पत्नी को उपहार देता है। उपहार अक्सर गले का हार होता है जो अन्य पुरुषों को बताता है कि यह स्त्री उस पुरुष की हो चुकी है। मैं आपको कुछ और देना चाहता हूं।”


महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के सामने झुककर एक सुवर्ण का कंगन प्रस्तुत किया। उस कंगन में तीन रत्न थे, मोर सा नीला नीलमणि, रक्त सा लाल माणिक और ओस सा स्वच्छ हीरा।


महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री, “इसे अपने दाएं हाथ में पहने। यह दर्शाता है कि आप के हाथ में ही मेरा परिवार है। जिस ओर यह हाथ बढ़ेगा मैं उसी ओर रहूंगा।”


राजश्री शुभदा ने दासी को मंदिर में पूजा की तैयारी करने को भेजा और दासी शर्माकर भाग गई। कुछ देर बाद महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री के घर का द्वार खुला और लोगों ने देखा कैसे महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री ने राजश्री शुभदा को नम्र अभिवादन किया। फिर नए दंपति मंदिर की ओर बढ़े तब भी महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री राजश्री शुभदा के दो कदम पीछे चल रहे थे।


दासी ने सोचा कि ज्ञानदीप शास्त्री तो विश्वास के परी ज्ञानी निकले। जो पुरुष एक स्त्री को… नहीं, राजसी स्त्री को पूर्ण रात्रि रतिक्रिडा में चीखने को मजबूर करे वह “नर विशेष” की उपाधि के योग्य है पर जो पति अपनी पत्नी के देह पर पूर्ण अधिपत्य प्राप्त कर के भी उसका दासत्व स्वीकार करे वह सच में “मर्यादा नरोत्तम” है।

Bahut hi umda update he Lefty69 Bro,

Gazab ki story chal rahi he.......

Keep rocking Bro
 
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शुभा ने दीप के सीने पर सर रखकर अपनी उंगलियों को उसके सीने के काले और चांदी से बालों में घुमाया। दीप ने मुस्कुराकर शुभा के काले बालों में से बने कुछ चांदी के बालों पर लगाया।


शुभा सर उठाकर दीप की आंखों में देखते हुए, “आज हमारे विवाह को चौबीस वर्ष पूर्ण हुए। आज भी मैं हमारी प्रथमरात्री को स्मरण कर लज्जित हो जाती हूं।”


दीप ने शुभा को अपने आलिंगन में पकड़ कर उसे चूम कर, “प्रियतमा, हमारी प्रथमरात्री एक माह पहले चौबीस वर्ष पूर्ण कर चुकी है। भूल गई क्या?”


शुभा दीप के सीने पर हल्के से मुट्ठी मार कर, “कैसे भूलूंगी? उस दिन आप हमें नए रस्सी से पर्वत चढ़ने उतरने का रथ दिखाने ले गए और बीच आकाश में हमारे पीछे अपना प्रेम भर दिया।”


दो पुत्र और दो कन्या को जन्म देने के बाद राजसी दंपति ने और आपत्य न करने का निर्णय लिया क्योंकि वह छोटे घरों में अधिक बच्चों से होती समस्याएं देख रहे थे।


यथा राजा तथा प्रजा, जानकर उन्होंने केवल चार आपत्य रखने का निर्णय किया। शुभा ने केवल चार आपत्य को जन्म दिया था पर उसने बीस से अधिक बालकों की माता का कार्य किया था। नगर में अगर कोई स्त्री प्रसूति में मर जाती और उसका पति बालक को संभाल नहीं पाता तो राज परिवार उस शिशु को अपनाता। राज वंश के बालक भी समस्त नागरिकों की भांति पहले नगर गुरुकुल फिर नगर विद्यापीठ में पढ़े और अब राजकुमार वेदवीर और राजकुमारी सुवर्णकमला काशी विद्यापीठ से पढ़ कर लौटे थे।


राजकुमार वेदवीर ने बहुत कम आयु से अपने शौर्य और ज्ञान से सब को चकित कर दिया था। बचपन से ही अनेक गण उसे ज्ञानदीप शास्त्री के आशीर्वाद का फल कहते थे पर जैसे जैसे वह युवा हुआ गण यह चुपके से बोलने लगे कि राजश्री शुभदा ने ज्ञानदीप शास्त्री से नियोग कराकर इस पुत्र को पाया था। सेनापति अचलसेन का पुत्र पूर्णतः महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री का प्रतिबिंब था।


शुभा दीप के आलिंगन में पिघलते हुए, “ऐसा लगता है जैसे इतने वर्षों में अब हमारे बीच कोई रहस्य ही नहीं बचा। मेरी हर एक बात आप को पता है और आप का हर रहस्य मुझे ज्ञात है।”


दीप चुप रहा तो शुभा ने सर उठाकर दीप की आंखों में देखते हुए, “क्या आप का कोई ऐसा रहस्य है जो मुझे ज्ञात नहीं?”


दीप गहरी सांस लेकर, “एक। (शुभा ने अपनी एक भौं उठाकर पूछा तो दीप ने अपने हाथ उठाकर) अभय हो तो बताऊं।”


शुभा ने अपने नाखून दीप के सीने में हल्के से दबाकर, “कोई स्त्री?… (दीप ने अपने सर को हिलाकर ना कहा तो) अभय दिया!”


दीप मुस्कुराकर, “स्मरण है कैसे अचलसेन ने मेरा प्याला पिया और मुझे उसका प्याला पीने को विवश किया?”


शुभा शर्माकर, “हां और मुझे यह भी स्मरण है कैसे आप ने कामोद्दीपक औषधि से पूर्ण रात्रि मेरे कौमार्य को लूटकर मुझे चलने योग्य नहीं छोड़ा। (दीप के सीने पर हल्के से मुट्ठी मार कर) दो दिन मुझे चलने में पीड़ा रही!”


दीप शरारती मुस्कान से, “मेरा रहस्य यह है कि मैं पहले से जानता था कि सेनापति अचलसेन मुझसे घृणा करता है और वह कभी मेरी बात नहीं मानेगा। मैंने जानबूझकर कामोत्तेजक औषधि का पेय उसके सामने रखा और अपने सामने नींद की औषधि। मैं जानता था कि वह अविश्वास से मेरा प्याला खुद लेगा और मुझे अपना प्याला पिलाएगा!”


शुभा ने बैठ कर दीप की आंखों में देखते हुए, “तो उस रात्रि को आप मेरी सुरक्षा के लिए शयन कक्ष में नहीं आए थे?”


दीप सर हिलाकर ना कहते हुए, “उस रात्रि को मैं अपनी प्रथम रात्रि अपनी अप्सरा के साथ बिताने आया था। अगर मुझे वह अचलसेन अचेत नहीं मिलता तो मैं स्नानगृह में उसे अचेत कर के आप के आलिंगन में आता।”


राजश्री शुभदा चौबीस वर्ष में बदल गई थी। उसके बालों में चांदी के साथ चेहरे पर कुछ हल्की लकीरें आ गई थीं। उसके दूधिया गोले चार आपत्य के बाद अधिक बड़े पर नरम हो गए थे। राजश्री शुभदा के कसे हुए पेट पर अब गर्भ धारणा और प्रसव से निशान थे तो उसके पैर अब कुछ नरम हो गए थे।


लेकिन दीप के लिए शुभा आज उस राजकुमारी शुभदा से अनेक गुना सुंदर और आकर्षक थी क्योंकि उसे विश्वास ही नहीं पूर्ण ज्ञान था कि शुभा के मन और तन पर सिर्फ दीप का नाम और दीप की छाप थी।


शुभा ने दीप पर अपना गुस्सा ऐसे उतारा कि उनकी दासी को दरवाजा खटखटाकर बताना पड़ा कि राजकुमार की पत्नी को राजकुमार संग रात्रि बिताने में इन आवाजों से लज्जा हो रही है।


दो हजार वर्ष बीत गए हैं पर लोग अब भी कहते हैं कि एक दिन महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने कक्ष का द्वार प्रातः नहीं खोला तो सेवकों ने उनका द्वार खटखटाया। उत्तर न मिलने पर अंदर गए तो पाया कि राजश्री और महामात्य एक दूसरे के आलिंगन में सदैव निद्रा में सो गए थे। पर्वतपुर के शासक बदले पर शास्त्री राजवंश बना रहा। राजश्री ने गणराज्य बनाया पर ज्ञानदीप शास्त्री ने विज्ञान, गणित और शस्त्र का अनुसंधान चालू रखा। पर्वतपुर की सीमाएं अगली कुछ शताब्दियों में समुद्र तक पहुंची तो शास्त्री राजवंश ने राज्य के साथ व्यापार भी किया। जब गोरे लोगों ने भारत में व्यापार शुरू किया उस से पहले ही शास्त्री राजवंश ने गोरों के राज्य में व्यापार शुरू किया था। सुवर्ण और नीलमणि की खदाने तो कब की बंद हो गईं थी तो शास्त्री राजवंश ने गोरों से उनकी देश में जमीनें खरीदी और वहां की खदानों में से सोना, हीरे, प्लैटिनम और यूरेनियम तक की खदाने खोली। शास्त्री अनुसंधान ने देश ही नहीं विदेश में भी नए आयाम बनाते हुए पर्वतपुर से भारत तक को स्वस्थ रखने में मदद की। भारत की स्वतंत्रता से भारत के औद्योगिक विकास तक, हर कार्य में शास्त्री राज वंश का छुपा हाथ रहा है।


ऐसा नहीं कि यहां अड़चन नहीं आई। कई खराब टहनियों को छांटना पड़ा तो कई अच्छी टहनियों को इस महाकाय वृक्ष में जोड़ लिया गया। जैसे एक ऑस्ट्रेलियन इतिहास की संशोधक जो भारत का छुपा इतिहास खोज रही है।


माया ने अपने खुले मुंह पर हाथ रखा और फटी आंखों से अपने पति को देखने लगी।
माया Kendrick एक blond bombshell थी जो चौबीस साल केवल इस वजह से वर्जिन रही थी क्योंकि कोई मर्द उसे बहकाने में कामयाब नहीं हुआ था। फिर उसे अपने कॉलेज में एक कंस्ट्रक्शन वर्कर मिला जो इंडिया से स्टूडेंट visa पर आया था। सबने माया को बताया कि वह लड़का ऋग्वेद शास्त्री उसे ऑस्ट्रेलियन पासपोर्ट के लिए इस्तमाल कर रहा है पर ऋग्वेद के पास भारत के एक खुफिया राजघराने का नक्शा था। माया Kendrick, Indiana Jones की तरह इस लड़के की कहानियों में फंसती गई। इतना की माया ने ऋग्वेद शास्त्री जैसे कंगाल स्टूडेंट से शादी कर उनके इंडिया आने का इंतजाम भी किया।



ऋग्वेद कल उसे इस हिल स्टेशन पर बने हेरिटेज घर में लाया और बताने लगा कैसे हर सबसे बड़े शास्त्री के सबसे बड़े बेटे के नाम में वेद होता है।


“Holy Fucking Shit!! I have been scammed!!”

माया ने अपने सुनहरे बालों को पकड़ा तो वेद को उसके दांतों के निशान बने दूधिया मम्मे दिखे। नजर नीचे सरकी तो सपाट पेट से फैली हुई जांघों में खून सनी चूत दिखी। अपने बगल में सफेद चादर पर बना दाग देख वेद समझ गया क्यों ज्ञानदीप शास्त्री ने अपनी जान की बाजी लगाकर राजकुमारी शुभदा की इज्ज़त लूटी थी।



माया गहरी सांस लेकर, “So, what do you want? Australian citizenship and?… What are your terms for divorce? (खून के दाग की ओर इशारा कर) Annulment is now not possible.”


वेद, “तुम्हें लगता है कि यह कहानी झूठी है?”


माया गुस्से से, “History के लिए evidence चाहिए। क्या है evidence? एक पहाड़ पर बना एक पुराना घर? और तुम? तुम हो इस So Called शास्त्री वंश के वेद? (वेद के सीने पर अपने दाएं हाथ की तर्जनी गड़ाकर) तुम एक गरीब स्टूडेंट हो जो कंस्ट्रक्शन वर्कर का पार्ट टाइम जॉब करता है। न कि किसी So Called शास्त्री वंश का सीईओ जो दो हजार सालों के राजवंश का उत्तराधिकारी है।”


वेद ने माया का दायां हाथ पकड़कर उसे अपने सीने पर खींच लिया और दोनों में कुछ छटपटाहट हुई। जब माया ने अपने आप को वेद से दूर किया तो अपनी दाई कलाई को देखती रही। वहां एक सोने का मोटा कंगन था जिस में कबूतर के अंडे जितने बड़े sapphire, ruby और diamond चमक रहे थे।


माया स्तब्ध होकर, “The Royal Bangle! It's true!!”


________________________


THE END
 
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sunoanuj

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शुभा को एक विचित्र अनुभव ने जगाया। उसे लग रहा था जैसे उसके शरीर से खेलते हुए कोई उसे सुख के साथ साथ पीड़ा दे रहा था। शुभा ने पाया कि वह अपनी बाएं ओर लेटी हुई थी और उसका दाहिना पैर उसके पीछे से उठाया गया था। शुभा के यौन पुष्प को दीप की लंबी उंगलियों ने खोलकर दो उंगलियां उनकी संकरी सुरई में डुबकी लगाते हुए उसे संभोग का अनुभव करा रही थी जब दीप का अंगूठा उसी लय में यौन मोती को सहलाते हुए उसे यौन उत्तेजना के सर्वोच्च शिखर पर बनाए हुए था। पर पीड़ा…


पीड़ा शुभा की गुदा में से थी जहां कोई अंजान अंग अंदर बाहर करते हुए उसे एक अनोखे पीड़ादायक उत्तेजना से विवश कर रहा था।



माता!!…

दीप…

दीप का…
दीप का वो…
वो शुभा की गुदा के साथ मैथुन कर रहा था!


शुभा कराहते हुए, “दीप!!…”


दीप, “हां, शुभा।”


शुभा आह भरते हुए, “नहीं!!… गंदा…”


दीप ने शुभा के कान को चूमते हुए अपनी कमर हिलाना जारी रखा।


दीप, “कोई अंग गंदा नहीं होता। प्रश्न केवल यह है कि क्या यह अच्छा लगता है या नहीं?”


शुभा आहें भरते हुए, “मुझे नहीं पता दीप!!… आह!… यहां पीड़ा है पर… पर… करते रहो!… करो!!… और करो!!…”


दीप ने शुभा के सर के नीचे से अपने बाएं हाथ को नीचे लाते हुए शुभा के दाएं दूधिया गोले को हल्के से दबाते हुए उसके ऊपर की फूली हुई बेरी को दबाया।


शुभा ने जोर से आह भरी। गत एक माह में उसके गोले और फूलने लग गए थे और उसकी बेरियों का रंग और गहरा रहा था। दीप ने शुभा की गुदा में अपने धक्के तेज करते हुए उसे अपने सीने पर दबाया और शुभा के कान में उसकी प्रशंसा करते हुए शुभा के दूदू को दबाया।


शुभा इस बहुआयामी समागम से परास्त हो कर स्खलित होते हुए दीप की उंगलियों को मधु की वर्षा में भिगोने लगी जब दीप ने कराहते हुए शुभा की गुदा में अपने स्खलन को भर दिया।


शुभा दीप के आलिंगन में पूर्ण विश्वास से आंखें बंद कर सो गई।


प्रातः के बाद राजकुमारी शुभदा की नई दासी जो पहले गणिका का प्रसव करा चुकी थी वह चुपके से महामात्य ज्ञानदीप के घर में आई। गणिका के पास कार्य करते हुए उसे पता था कि कुछ पुरुषों को स्त्री वेदना से आनंद मिलता है। उसे नहीं लगा था कि ज्ञानदीप शास्त्री जैसा विद्वान ऐसी निम्न प्रकार के कार्य करेगा पर राज महल के सारे दासों ने रात भर राजकुमारी शुभदा की आहें सुनी थी। एक रात्रि की विधवा होने के अभिशाप से अगर राजकुमारी शुभदा न बचे तो सामान्य गण क्या अपेक्षा करे?


दासी ने स्नानगृह से कुछ छटपटाहट सुनी और द्वार के बाहर से अंदर की आवाजें सुनी।


स्त्री, “छोड़ो!!… हमने अभी अभी पुनः वस्त्र पहने हैं! हमें राज सभा से पहले मंदिर भी जाना है!”


पुरुष, “कह दो कि राजकुमारी शुभदा ने एकांत में लिंग का पूजन कर दिया है।”


स्त्री, “शू!!… किसी ने सुन लिया तो?… (हंस कर)अब मेरी कलाई छोड़ने का क्या लोगे?”


छटपटाहट के कुछ क्षणों के बाद स्त्री, “बहुत बुरे हो!… पहले ही हमें रात भर सोने नहीं दिया और प्रातः जो किया उसका परिणाम हमें पूर्ण दिन अपने अंदर रखना होगा! अब और यह क्या है?”


द्वार खुल गया और महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री और राजकुमारी शुभदा ने दासी को देखा। महामात्य ज्ञानदीप ने अपने चेहरे पर से शरारती मुस्कान मिटाते हुए शांत चेहरे से राजकुमारी शुभदा को देखा।


महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री, “हे राजश्री शुभदा, परंपरा है कि विवाह रात्रि के बाद पति पत्नी को उपहार देता है। उपहार अक्सर गले का हार होता है जो अन्य पुरुषों को बताता है कि यह स्त्री उस पुरुष की हो चुकी है। मैं आपको कुछ और देना चाहता हूं।”


महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के सामने झुककर एक सुवर्ण का कंगन प्रस्तुत किया। उस कंगन में तीन रत्न थे, मोर सा नीला नीलमणि, रक्त सा लाल माणिक और ओस सा स्वच्छ हीरा।


महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री, “इसे अपने दाएं हाथ में पहने। यह दर्शाता है कि आप के हाथ में ही मेरा परिवार है। जिस ओर यह हाथ बढ़ेगा मैं उसी ओर रहूंगा।”


राजश्री शुभदा ने दासी को मंदिर में पूजा की तैयारी करने को भेजा और दासी शर्माकर भाग गई। कुछ देर बाद महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री के घर का द्वार खुला और लोगों ने देखा कैसे महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री ने राजश्री शुभदा को नम्र अभिवादन किया। फिर नए दंपति मंदिर की ओर बढ़े तब भी महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री राजश्री शुभदा के दो कदम पीछे चल रहे थे।


दासी ने सोचा कि ज्ञानदीप शास्त्री तो विश्वास के परी ज्ञानी निकले। जो पुरुष एक स्त्री को… नहीं, राजसी स्त्री को पूर्ण रात्रि रतिक्रिडा में चीखने को मजबूर करे वह “नर विशेष” की उपाधि के योग्य है पर जो पति अपनी पत्नी के देह पर पूर्ण अधिपत्य प्राप्त कर के भी उसका दासत्व स्वीकार करे वह सच में “मर्यादा नरोत्तम” है।
Bahut hee adhbhut update hai !
 

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शुभा ने दीप के सीने पर सर रखकर अपनी उंगलियों को उसके सीने के काले और चांदी से बालों में घुमाया। दीप ने मुस्कुराकर शुभा के काले बालों में से बने कुछ चांदी के बालों पर लगाया।


शुभा सर उठाकर दीप की आंखों में देखते हुए, “आज हमारे विवाह को चौबीस वर्ष पूर्ण हुए। आज भी मैं हमारी प्रथमरात्री को स्मरण कर लज्जित हो जाती हूं।”


दीप ने शुभा को अपने आलिंगन में पकड़ कर उसे चूम कर, “प्रियतमा, हमारी प्रथमरात्री एक माह पहले चौबीस वर्ष पूर्ण कर चुकी है। भूल गई क्या?”


शुभा दीप के सीने पर हल्के से मुट्ठी मार कर, “कैसे भूलूंगी? उस दिन आप हमें नए रस्सी से पर्वत चढ़ने उतरने का रथ दिखाने ले गए और बीच आकाश में हमारे पीछे अपना प्रेम भर दिया।”


दो पुत्र और दो कन्या को जन्म देने के बाद राजसी दंपति ने और आपत्य न करने का निर्णय लिया क्योंकि वह छोटे घरों में अधिक बच्चों से होती समस्याएं देख रहे थे।


यथा राजा तथा प्रजा, जानकर उन्होंने केवल चार आपत्य रखने का निर्णय किया। शुभा ने केवल चार आपत्य को जन्म दिया था पर उसने बीस से अधिक बालकों की माता का कार्य किया था। नगर में अगर कोई स्त्री प्रसूति में मर जाती और उसका पति बालक को संभाल नहीं पाता तो राज परिवार उस शिशु को अपनाता। राज वंश के बालक भी समस्त नागरिकों की भांति पहले नगर गुरुकुल फिर नगर विद्यापीठ में पढ़े और अब राजकुमार वेदवीर और राजकुमारी सुवर्णकमला काशी विद्यापीठ से पढ़ कर लौटे थे।


राजकुमार वेदवीर ने बहुत कम आयु से अपने शौर्य और ज्ञान से सब को चकित कर दिया था। बचपन से ही अनेक गण उसे ज्ञानदीप शास्त्री के आशीर्वाद का फल कहते थे पर जैसे जैसे वह युवा हुआ गण यह चुपके से बोलने लगे कि राजश्री शुभदा ने ज्ञानदीप शास्त्री से नियोग कराकर इस पुत्र को पाया था। सेनापति अचलसेन का पुत्र पूर्णतः महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री का प्रतिबिंब था।


शुभा दीप के आलिंगन में पिघलते हुए, “ऐसा लगता है जैसे इतने वर्षों में अब हमारे बीच कोई रहस्य ही नहीं बचा। मेरी हर एक बात आप को पता है और आप का हर रहस्य मुझे ज्ञात है।”


दीप चुप रहा तो शुभा ने सर उठाकर दीप की आंखों में देखते हुए, “क्या आप का कोई ऐसा रहस्य है जो मुझे ज्ञात नहीं?”


दीप गहरी सांस लेकर, “एक। (शुभा ने अपनी एक भौं उठाकर पूछा तो दीप ने अपने हाथ उठाकर) अभय हो तो बताऊं।”


शुभा ने अपने नाखून दीप के सीने में हल्के से दबाकर, “कोई स्त्री?… (दीप ने अपने सर को हिलाकर ना कहा तो) अभय दिया!”


दीप मुस्कुराकर, “स्मरण है कैसे अचलसेन ने मेरा प्याला पिया और मुझे उसका प्याला पीने को विवश किया?”


शुभा शर्माकर, “हां और मुझे यह भी स्मरण है कैसे आप ने कामोद्दीपक औषधि से पूर्ण रात्रि मेरे कौमार्य को लूटकर मुझे चलने योग्य नहीं छोड़ा। (दीप के सीने पर हल्के से मुट्ठी मार कर) दो दिन मुझे चलने में पीड़ा रही!”


दीप शरारती मुस्कान से, “मेरा रहस्य यह है कि मैं पहले से जानता था कि सेनापति अचलसेन मुझसे घृणा करता है और वह कभी मेरी बात नहीं मानेगा। मैंने जानबूझकर कामोत्तेजक औषधि का पेय उसके सामने रखा और अपने सामने नींद की औषधि। मैं जानता था कि वह अविश्वास से मेरा प्याला खुद लेगा और मुझे अपना प्याला पिलाएगा!”


शुभा ने बैठ कर दीप की आंखों में देखते हुए, “तो उस रात्रि को आप मेरी सुरक्षा के लिए शयन कक्ष में नहीं आए थे?”


दीप सर हिलाकर ना कहते हुए, “उस रात्रि को मैं अपनी प्रथम रात्रि अपनी अप्सरा के साथ बिताने आया था। अगर मुझे वह अचलसेन अचेत नहीं मिलता तो मैं स्नानगृह में उसे अचेत कर के आप के आलिंगन में आता।”


राजश्री शुभदा चौबीस वर्ष में बदल गई थी। उसके बालों में चांदी के साथ चेहरे पर कुछ हल्की लकीरें आ गई थीं। उसके दूधिया गोले चार आपत्य के बाद अधिक बड़े पर नरम हो गए थे। राजश्री शुभदा के कसे हुए पेट पर अब गर्भ धारणा और प्रसव से निशान थे तो उसके पैर अब कुछ नरम हो गए थे।


लेकिन दीप के लिए शुभा आज उस राजकुमारी शुभदा से अनेक गुना सुंदर और आकर्षक थी क्योंकि उसे विश्वास ही नहीं पूर्ण ज्ञान था कि शुभा के मन और तन पर सिर्फ दीप का नाम और दीप की छाप थी।


शुभा ने दीप पर अपना गुस्सा ऐसे उतारा कि उनकी दासी को दरवाजा खटखटाकर बताना पड़ा कि राजकुमार की पत्नी को राजकुमार संग रात्रि बिताने में इन आवाजों से लज्जा हो रही है।


दो हजार वर्ष बीत गए हैं पर लोग अब भी कहते हैं कि एक दिन महामात्य ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने कक्ष का द्वार प्रातः नहीं खोला तो सेवकों ने उनका द्वार खटखटाया। उत्तर न मिलने पर अंदर गए तो पाया कि राजश्री और महामात्य एक दूसरे के आलिंगन में सदैव निद्रा में सो गए थे। पर्वतपुर के शासक बदले पर शास्त्री राजवंश बना रहा। राजश्री ने गणराज्य बनाया पर ज्ञानदीप शास्त्री ने विज्ञान, गणित और शस्त्र का अनुसंधान चालू रखा। पर्वतपुर की सीमाएं अगली कुछ शताब्दियों में समुद्र तक पहुंची तो शास्त्री राजवंश ने राज्य के साथ व्यापार भी किया। जब गोरे लोगों ने भारत में व्यापार शुरू किया उस से पहले ही शास्त्री राजवंश ने गोरों के राज्य में व्यापार शुरू किया था। सुवर्ण और नीलमणि की खदाने तो कब की बंद हो गईं थी तो शास्त्री राजवंश ने गोरों से उनकी देश में जमीनें खरीदी और वहां की खदानों में से सोना, हीरे, प्लैटिनम और यूरेनियम तक की खदाने खोली। शास्त्री अनुसंधान ने देश ही नहीं विदेश में भी नए आयाम बनाते हुए पर्वतपुर से भारत तक को स्वस्थ रखने में मदद की। भारत की स्वतंत्रता से भारत के औद्योगिक विकास तक, हर कार्य में शास्त्री राज वंश का छुपा हाथ रहा है।


ऐसा नहीं कि यहां अड़चन नहीं आई। कई खराब टहनियों को छांटना पड़ा तो कई अच्छी टहनियों को इस महाकाय वृक्ष में जोड़ लिया गया। जैसे एक ऑस्ट्रेलियन इतिहास की संशोधक जो भारत का छुपा इतिहास खोज रही है।


माया ने अपने खुले मुंह पर हाथ रखा और फटी आंखों से अपने पति को देखने लगी।
माया Kendrick एक blond bombshell थी जो चौबीस साल केवल इस वजह से वर्जिन रही थी क्योंकि कोई मर्द उसे बहकाने में कामयाब नहीं हुआ था। फिर उसे अपने कॉलेज में एक कंस्ट्रक्शन वर्कर मिला जो इंडिया से स्टूडेंट visa पर आया था। सबने माया को बताया कि वह लड़का ऋग्वेद शास्त्री उसे ऑस्ट्रेलियन पासपोर्ट के लिए इस्तमाल कर रहा है पर ऋग्वेद के पास भारत के एक खुफिया राजघराने का नक्शा था। माया Kendrick, Indiana Jones की तरह इस लड़के की कहानियों में फंसती गई। इतना की माया ने ऋग्वेद शास्त्री जैसे कंगाल स्टूडेंट से शादी कर उनके इंडिया आने का इंतजाम भी किया।



ऋग्वेद कल उसे इस हिल स्टेशन पर बने हेरिटेज घर में लाया और बताने लगा कैसे हर सबसे बड़े शास्त्री के सबसे बड़े बेटे के नाम में वेद होता है।


“Holy Fucking Shit!! I have been scammed!!”

माया ने अपने सुनहरे बालों को पकड़ा तो वेद को उसके दांतों के निशान बने दूधिया मम्मे दिखे। नजर नीचे सरकी तो सपाट पेट से फैली हुई जांघों में खून सनी चूत दिखी। अपने बगल में सफेद चादर पर बना दाग देख वेद समझ गया क्यों ज्ञानदीप शास्त्री ने अपनी जान की बाजी लगाकर राजकुमारी शुभदा की इज्ज़त लूटी थी।



माया गहरी सांस लेकर, “So, what do you want? Australian citizenship and?… What are your terms for divorce? (खून के दाग की ओर इशारा कर) Annulment is now not possible.”


वेद, “तुम्हें लगता है कि यह कहानी झूठी है?”


माया गुस्से से, “History के लिए evidence चाहिए। क्या है evidence? एक पहाड़ पर बना एक पुराना घर? और तुम? तुम हो इस So Called शास्त्री वंश के वेद? (वेद के सीने पर अपने दाएं हाथ की तर्जनी गड़ाकर) तुम एक गरीब स्टूडेंट हो जो कंस्ट्रक्शन वर्कर का पार्ट टाइम जॉब करता है। न कि किसी So Called शास्त्री वंश का सीईओ जो दो हजार सालों के राजवंश का उत्तराधिकारी है।”


वेद ने माया का दायां हाथ पकड़कर उसे अपने सीने पर खींच लिया और दोनों में कुछ छटपटाहट हुई। जब माया ने अपने आप को वेद से दूर किया तो अपनी दाई कलाई को देखती रही। वहां एक सोने का मोटा कंगन था जिस में कबूतर के अंडे जितने बड़े sapphire, ruby और diamond चमक रहे थे।


माया स्तब्ध होकर, “The Royal Bangle! It's true!!”


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THE END

Bahut hee badhiya or shandar khani thi !

Intezaar rahega aapki agli kahani ka
 
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