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Romance बीवी ने पी शराब. माहौल हुआ लराब (Biwi ne pi sharab. Mahol huaa kharab) हिंदी & Roman

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Shetan

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दोस्तों यह कहानी हिंदी और Roman दोनों भाषाओ मे है. ऐसा समजिये की यह कहानी कोमर्य का 2nd पार्ट है. जिन्होंने मेरी स्टोरी कोमर्य नहीं पढ़ी. वो भी पढ़ ले. वो भी हिंदी और Roman दोनों भाषाओ मे है.


Doston, yeh kahani Hindi aur Roman dono language mein hai. Aisa samajhiye ki yeh kahani Komarya ka 2nd part hai. Jinhone meri story Komarya nahi padhi, woh bhi padh lein. Woh bhi Hindi aur Roman dono language
mein hai.
कोमर्य (komary) हिंदी & Roman
 
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Shetan

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बीवी ने पी शराब. माहौल हुआ लराब
हिंदी भाषा भोजपुरी टोन


घर का काम करते कविता की नजर बार बार घर के लेंडलाइन फोन पर जाती. घर की डोरबैल बजी और तुरंत कविता ने भाग कर फोन उठाया.


कविता : (एक्साइड) हेलो... कहा पहोचे???


पर सामने से कोई रिप्लाई नही. फिर भी बैल की आवाज लगातार सुनाई दे रही थी. कविता ने डोर की तरफ देखा. तब जाकर खयाल आया की यह तो घर के डोरबैल की आवाज है. कविता को जैसे गुस्सा आ रहा हो. वो तेज़ी से डोर की तरफ बढ़ी और झटके से डोर खोला. सामने पोस्टमैन था.


कविता : (झल्ला कर) क्या है. क्यों इतनी बार बार घंटी बजाए जा रहे हो???


पोस्टमैन : अरे मैईडम(मैडम) अपना डाक तो ले लीजिये. कब से बजा रहे है. कोई खोल है नही रहा था.


कविता : लाइए. दीजिये.


कविता ने डाक ली. और खोल के देखा तो LIC की किस्त भारी. उसकी रसीद थी. जो पोस्ट के जरिये आई थी.


पोस्टमैन भी एटीट्यूड दिखाते कविता को देखते चले गया. कविता ने जैसे ही डोर क्लोज किया. उसी वक्त लैंडलाइन फोन पर घंटी बजी. कविता एकदम चहक कर फोन की तरफ भागी. और लपक कर फोन उठा लिया.


कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हेलो.... कहा पहोचे???


कविता और वीर की शादी को 8 साल हो गए थे. दोनों की मुलाक़ात ट्रैन मे हुई थी. दोनों मे कुछ ऐसी केमिस्ट्री बैठी की बात शादी तक पहोच गई. वैसे शादी तो लवमैरिज थी. पर कई जुगाड़ लगाने के बाद उसे अरेंज मैरिज मे तब्दील किया गया. शादी की पहेली रात मे ही दोनों ने एक दूसरे को अपना कोमर्य सौंपा.

और एक ही साल मे बेटे आरव ने जन्म ले लिया. जी हा. कविता और वीर की एक लौती औलाद आरव पांडे. जो अब 7 साल का हो चूका था. कविता के पिता दायशंकर शुक्ला PWD मे कार्यरत अब रिटायर होने की कगार पर थे. माँ सरिता सुल्ला ग्रुहिणी थी.

कविता की माँ सरिता शुक्ला थोड़े पुराने खयालात की थी. बेटी बहु को अनुसासन मे रखना उन्हें ज्यादा पसंद था. बेटा कोई था नही तो बहु भी नही. पर बेटी कविता कभी उसके काबू मे नही आई. वह अपने चंचल चित्तवन से उड़ती ही रही. वही वीर की माँ उर्मिला उसके बचपन मे ही चल बसी थी. वही पिता सतेंदर पांडे की मृत्यु कुछ 6 साल पहले हुई थी. कविता बार बार टेलीफोन को इसी लिए ताक रही थी. क्यों की जनाब वीर छुट्टी के लिए निकल चुके थे.

कविता ने वीर को सख्त हिदायत दी थी की वो कहा पहोचे. पल पल रिपोर्ट देते रहे. ट्रैन मे रात मोबाइल की बैटरी कम होने की वजह से वीर ने आखरी कॉल बीती रात 9 बजे किया था. बाद मे फोन स्विच ऑफ कर दिया. पर सुबह 11बजे के आस पास वीर अपने स्टेशन पर उतर गया. घर आने के लिए वीर बस मे बैठ गया.

रस्ता कुछ एक डेढ़ घंटा लम्बा था. एक फौजी जब घर आता है. तब उसके जज्बात अलग ही होते है. दिल मे बेचैनी और घर पहोचने का उतावलापन. बस मे बैठे वीर को भी यही सब महसूस हो रहा था. चुप चाप बैठे वीर को अलग अलग रंगीन खयाल आ रहे थे. बैठे बैठे वो मुस्कुरा रहा था.

वीर से रहा नही गया. और जेब से अपना कीपैड वाला मोबाइल निकाला और स्विच ऑन कर फोन लगा देता है. बस दो बार ही घंटी बजी. और तुरंत कविता ने फोन उठा लिया.


कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हेलो.... कहा पहोचे???


वीर : अरे यार अभी एक घंटा लगेगा. बस अभी ही चला है (भोजपुरी टोन)


कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हमरे लिए एक ठो काला कुत्ता लिए हो ना. (ब्लैक डॉग विस्की)


वीर : अरे यार का तुम भी. हा लिए है.


कविता : अरे कमाल करते हो पांडेजी. तुमहाई तो बोले थे. एक बार हम दुनो साथ मिलकर पिएंगे. अब कहे फट रहा है. यहा नही. आपन ससुराल मा चलिहो. उहा रंग जमाएंगे दुनो.


वीर : अरे बाप रे. उहा तो हरगिज नही.


कविता : हम पूछ नही रहे. बता रहे है. अब चुप रहिये. कविता शुक्ला है हम.


वीर : अब पांडे भी.


कविता : हा मतलब कविता शुक्ला पांडे अब.


वीर ससुराल मे कोई भी प्लान बनाने से इस लिए घबरा रहा था. क्यों की कुछ दो साल पहले कविता के मायके वीर के ससुराल मे दोनों ने एक सेक्सुअल गेम खेला था. जिसमे कविता ने अपने ऊपर वाले कमरे मे वीर को बांध रखा था. वीर सोले फ़िल्म की बसंती की तरह सिर्फ अपने कच्चे मे बंधे हुए थे. और कविता ने कैट मास्क वाला फुल स्किन टाइट कॉस्टयूम पहना हुआ था.

कविता के हाथ एक चबूक भी थी. बडा ही जोशीला और कामुख खेल चल ही रहा था की अचानक धड़ाम से दरवाजा खुला. वीर की सास सरिता शुक्ला अंदर आ गई. और एकदम गुस्से मे झल्लाते हुए उन दोनों को देखने लगी. वो तो पहले से ही पुराने खयालात की थी.

खूब घर मे कविता और उसकी माँ के बिच हंगामा हुआ. पर तब से वीर अपने ससुराल जाने से कतराने लगे. पर बीवी के आगे कौनसे मर्द की चलती है. वीर ने बात बदल दी.


वीर : अच्छा ठीक है. आरव तो घर पर ही होगा. (स्माइल एक्साइटेड) अभी कुछ होगा की नही???


कविता समझ गई की उसका पति किस बारे मे पूछ रहा है. पति के पूछने पर तो वो भी चहक गई.


कविता : (शर्माना, स्माइल, एक्साइटेड) अभी दिन मा. आरव ईस्कूल से अभी आने वाला होगा. रात होने दीजिये पांडेजी.


वीर : (स्माइल, एक्साइटेड) जानती हो कोमलजी. हमरी फौज मा एक चुटकुला बहोत फेमस है.


कविता : (स्माइल, शरारत) तो सुनाइए ना.


वीर : (स्माइल, एक्साइटेड) एक बार फौजी साहब छुट्टी आए. रास्ते मे उन्हेंने कुछ सोच कर एक किलो मूम्फ़ली खरीद ली. वो घर पहोचे तो उसके दोनों बच्चे गुड्डी और मुन्ना पापा पापा करते चिमट गए. फौजीसाहब ने सारी मूम्फ़ली आंगन मे बिखेर दी.


फौजी साहब : लो बच्चो मूम्फ़ली खाओ. मगर एक बार मे सिर्फ एक ही मूम्फ़ली उठाना. वरना गाड़िया मे डंडा डाल देंगे. समझो.


बच्चे बिचारे लग गए एक एक मूम्फ़ली खाने. और फौजी साहब पहोच गए अपनी मैडम के पास. खूब खेल चला. पर मुन्ना बडा शैतान. उसने सोचा पापा कहा गए. वो खिड़की से झाकने लगा. और तुरंत पीछे मुड़कर गुड्डी के पास आया.


मुन्ना : गुड्डी गुड्डी... एक एक उठा. अम्मा ने सायद दो मूम्फ़ली उठाई होंगी. देख पापा कैसे गाड़िया मे डंडा डाल रहे है.


वीर के चुटकुले पर कविता जोरो से खिल खिलाकर हसने लगी. पर मज़ाक मस्ती मे कविता कौनसी पीछे थी.


कविता : (स्माइल, शरारत ) तब तो आप भी मूम्फ़ली ले लीजिये. हम तो दो मूम्फ़ली उठाने वाले है.


वीर कविता के मजाकिया जवाब से एकदम गदगदा गया. की तभि फोन डिस होकर स्विचॉफ हो गया. बेचारे वीर का बहोत जबरदस्त मूड बना था. पर मोबाइल मे बैटरी खतम हो गई. कविता की हसीं रुक ही नही रही थी. फोन कट चूका था. अब उसे पति की याद ज्यादा सताने लगी. वो सोचने लगी की पति के बिना इतना लम्बा वक्त कैसे कटा. सिर्फ पति की यादो के सहारे.

वो साथ बिताए पल. वो किस्से जिनहे याद आते ही चहेरे पर अपने आप स्माइल आ जाती. ऐसे ही कविता हस्ते हुए खामोश हुई. और उन बीते पलों को याद करने लगी. कैसे कविता के साथ रह रह कर वीर भी शरारती हो गया. जब आरव बोलना सिख गया था. वो थोड़ा तुतलाकर बोलता था. जैसे आम बच्चे बोलते है.

कविता किचन से बाप बेटे की बाते सुन रही थी. वीर भी जान बुचकर कविता सुने वैसे बेटे से कुछ ना कुछ बुलवा रहा था.


वीर : सबसे अच्छे पापा किसके है.


आरव : मेले....


वीर : सबसे अच्छा बेटा कौन है??


आराम : मै......


वीर : सबसे सुंदर मम्मी किस की है???


यह सुनते कविता किचन से बहार आई. और अपनी कमर पर हाथ रखे मुस्कुराते बाप बेटों को देखने लगी.


आरव : मेली......


वीर : (शरारत, स्माइल) बड़े दूध वाली मम्मी किसकी है???


बच्चे को क्या पता. उसने तुरंत लम्बी आवाज मे बोला.


आरव : मेली......


आरव का बोलना और कविता का आगे बढ़ना. और उसी वक्त वीर का सीधा वहां से खिसकना. कविता वीर को पकड़ने भागने लगी. यह किस्सा याद आते कविता अकेले अकेले ही खिल खिलाकर जोरो से हसने लगी. तभि डोरबैल बजी. कविता को लगा की सायद वीर पहोच चूका है. और उसे सप्राइस देने वाला है.

वो झट से डोर की तरफ बढ़ी. और डोर खोला तो सामने उसका बेटा आरव खड़ा था. 7 साल का आरव स्कूल ड्रेस पहने हुए. उसकी निक्कर तो घुटने को भी पार कर रही थी. और छोटासा आरव अपनी माँ को गुस्से से घूरने लगा. गुस्से से उसके नाक के नाथूने फूल रहे थे. ऐसे नादान रूप मे वो बहोत प्यारा लग रहा था.


कविता : अंदर आओ. बहार कहे खड़े हो बे.


आरव : (गुस्सा) दहेज़ चाहि तुका. फोरबिलर( फोर व्हीलर) गाड़ी. लालची हो तुम. लालची.


बोल कर आरव अपनी माँ के हाथ के निचे से ही अंदर आ गया. अपने बेटे के प्यारे नाटक को देख कर कविता को हसीं आने लगी. दरसल आरव ने अपनी क्लास टीचर को ही प्रपोज़ कर दिया. और सीधा सादी के लिए पूछ लिया. उसकी क्लास टीचर आरती कविता की बहोत अच्छी दोस्त बन गई थी. अपनी सहेली के बेटे की ऐसी प्यारी हरकत देख कर आरती को गुस्सा नही आया.

बल्की उसे और ज्यादा प्यार आने लगा. आरती ने भी आरव से कहे दिया की पहले अपनी माँ से पूछ ले की वो मुझे अपने घर की बहु बनाएगी?? फिर क्या था. आरव ने अपनी मम्मी कविता से भी जिद्द की के वो अपनी बहु को देखने स्कूल आए. जब कविता को पता चला की उसके बेटे ने उसकी बेस्टफ्रेंड को ही प्रपोज़ कर दिया तो वो बहोत हसीं. और आरव के साथ उसके स्कूल चल दी.
आरती और कविता दोनों मिले. और आरव के सामने एक नया नाटक किया.


कविता : अच्छा.. तो तुम मेरी बहु बनोगी. पर मेरा तो एक ही बेटा है. मै तो दहेज़ लुंगी. एक फोर व्हीलर कार, घर का सारा सामान और 11 लाख नकद.


आरती एक्टिंग करती हुई मुँह लटका लेती है.


आरती : माफ करना... हम बहोत गरीब है. यह सब हम नही दे पाएंगे.


कविता : हम्म्म्म फिर तो मुश्किल है. यह रिस्ता नही हो सकता.


कविता के बोलते ही आरव गुस्से से अपना पाऊ पटकते हुए स्कूल के अंदर चले गया. उसके जाते ही कविता और आरती बहोत हसे. फिर आरती ने कविता से भी बहोत मज़ाक किया.


आरती : चलो बाप ने नही तो बेटे ने तो प्रपोज़ किया. उफ्फ्फ्फ़.


कविता : (स्माइल ) चुप कर साली. जब देखो मेरे पति पर लाइन मरती रहती है. गंडिया फाड़ देंगे हम कह रहे है.


आरती : (स्माइल) अरे तुह से नही. हम तो आपन जीजू से फाड़वाएंगे अपनी गंडिया. का चिक्कन जीजू है हमरे.


कविता हस्ते हुए आरती को दबोचने लगी. ऐसे दोनों मे हसीं मज़ाक हुआ. वही कविता ने डोर क्लोज किया और आरव के सामने खड़ी हो गई.


कविता : इ मुँह काहे फुलाए हुए हो बे. जाओ... जाकर हाथ गॉड धोकर खाना खा लो.


आरव : (गुस्सा) आने दो हमरे बाबा को. तोहर उहि देखिहे.


कविता : जा बे. आपन बाप का धमकी किसी और को देना.


आरव गुस्से से दूसरे रूम मे चले गया. और बहोत जोर से दरवाजा पटक कर बंद कर देता है. कविता उसे देख कर मुस्कुरा रही थी. कुछ मिनट बाद उसके रूम से स्पीकर साउंड की आवाज आई. और गाना बज रहा था. जब दिल ही टूट गया. हम जी के क्या करें.

कविता ने जब गाने के बोल सुने तो वो अकेले अकेले बहोत जोरो से हसीं. कविता ने वीर के लिए बहोत तैयारी कर रखी थी. पर अब उसके पास बस एक ही काम बचा था. इंतजार करना. वो सोच रही थी की कब डोरबैल बजे. और वो झट से दरवाजा खोले. पर अब उस से बर्दास नही हो रहा था. वो खुद ही डोर ओपन कर के देखने लगी.

घर के सामने रोड पर चहल पहल थी. पर वीर नही दिख रहा था. तभि ऑटो रीक्षा घर के पास रुकी. और अंदर से वीर निकला. कविता की आँखों मे चमक आ गई. वो एक बेग टांगे और एक बेग ऑटो से उतरते दिखा. सायद दो दिन के रास्ते मे वीर ने शेव नही की होंगी.

इसी लिए हलकी काली दाढ़ी जैसे नजर लगने से बचा रही हो. ऑटो का रवाना होना. और वीर का कविता की तरफ देख कर मुस्कुराना. पर तभि आरव की लम्बी चीख.


आरव : बाबा........


कविता तो डोर पर ही थी. पर कब आरव वहा आया. कविता को पता ही नही चला. कविता और वीर दोनों ने आपस मे अपने अपने मन मे यह प्लान बना लिया था की बेटे के देखने से पहले दोनों एक जबरदस्त झप्पी और पप्पी. मतलब की किश कर लेंगे. क्यों की आरव के आने के बाद वो सब रात को ही मिल पाएगा.

लेकिन आरव ने सब चौपट कर दिया. वो पहले ही भाग कर अपने बाप की बाहो मे पहोच गया. वीर भी अपने बेटे से मिलकर बहोत खुश हुआ. अपने बेटे को गोद मे लिए वीर कविता को देखता है. कविता और वीर दोनों की आँखों मे एक अजीब सी प्यास थी.

जैसे अब भी प्यास बाकि है. मिल तो गए. पर मिलन अब भी बाकि है. वीर के करीब आते ही तुरंत कविता ने उसके पाऊ छुए. घर के अंदर जाते ही डोर क्लोज.


कविता : (स्माइल, प्यास ) मै आप के लिए चाय बनती हु.


कविता का बोलना एकदम धीमी आवाज. जैसे इरादा छुपा रही हो. अपनी प्यास अपना प्यार जताने से खुद को रोक रही हो. बस नजरों से नजरों ने ही एक दूसरे को भाप लिया. वो किचन मे अंदर गई. वीर अपने बेटे को लेकर सोफे पर बैठा. आरव ने शिकायत का पोटला खोलना शुरू किया.


आरव : बाबा आप चले गए. पर कविता ने मुझे बहोत तंग किया.


जिस तरह कविता अपने पिता को कभी उनके टाइटल से तो कभी नाम से बुलाती. वैसे ही आरव भी अपनी माँ को नाम से पुकरता. पर यह बत्तमीजी नही दोस्ताना व्यवहार था.


वीर : अच्छा... क्या तंग किया आप को???


आरव : बाबा कविता हेना (सोचते हुए ) मेरा होमवर्क नही करके देती. और मुझे कार्टून भी नही देखने दी. और जबरदस्ती रोज टूसन(ट्यूशन) भेजी है यह. चाकलेट(चॉकलेट) तो हमको भुला ही दी है.


तभि कविता वीर के लिए पानी लेकर आई.


कविता : अच्छा बचवा. हमारी शिकायत कर रहे हो. टांगे तोड़ दूंगी तुम्हरी.


वीर : अच्छा... तुम मेरे आरव की टांगे तोड़ोगी. हटना आरव बेटा. इस कविता की बच्ची को तो मै देखता हु.


आरव साइड हटा. उसे अब मझा आने लगा. की अब बाप उसका बदला लेगा.


आरव : अब पता चलेगा.....


कविता अपने पति की चाल समझ गई. वो खड़ी खड़ी मंद मंद मुस्कुराने लगी. वीर खड़ा हुआ और कविता का हाथ पकड़ कर दूसरे रूम मे लेजाने लगा. पर अब आरव को ही डर लगने लगा. अब उसकी मम्मी की पिटाई होने वाली है. जैसे ही डोर बंद हुआ. आरव डोर नॉक करने लगा.


आरव : अरे रहे दा बाबा. अरे हमरी मम्मी है. बाबा.... बाबा..


पर अब क्या फायदा. उसके पापा उसकी मम्मी को दूसरे रूम मे ले गए. ऐसा पहले भी हो चूका था. कविता रूम से आआ आआ की आवाज करती. और बाद मे रोने की तथा उस से रूठ जाने की एक्टिंग करती. आरव गिल्टी फील करने लगा. वो तुरंत विंडो के पास भगा.

छोटे छोटे कदमो से बड़ी मुश्किल से आरव ऊपर उठ पाया. विंडो को धकेला. पर विंडो बस थोडीसी खुली. आरव ने अंदर देखा तो वह हैरान रहे गया. दरसल वैसे तो अंदर का माहौल रंगीन था. कविता अपने पति पर सावर थी. और ऊपर निचे हो रही थी. पर आरव को कुछ और ही समझ आया.


आरव : अरे...... ई का हो रहा है. बाबा तो बड़े शेर बन रहे थे. अब हमरी अम्मा से ही पिट गए.


दरसल आरव को सिर्फ शैडो दिखाई दे रही थी. क्यों की दिन का वक्त था. और आरव कविता और उसके पीछे भी एक और विंडो थी. जो बहार की तरफ थी. हलाकि वो भी बंद थी. पर ग्लास के उस पार से सफ़ेद उजाला आ रहा था. इसी लिए आरव को सिर्फ आकर समझ आ रहा था. जब कविता अपने दोनों हाथ अपने पति की घने बालो वाली छाती पर टिकाए मस्त होकर अप डाउन हो रही थी.

आरव को लगा उसकी माँ ने अपने दोनों हाथो से वीर का गला दबाया है. और कविता जोरो से वीर को दबोचे हुए है. आरव टेंशन मे आ गया. वो अब अपने बाप के बचाव मे बोलने लगा.


आरव : एएएए.... कविता. अरे छोड़ छोड़. हमरे बाबा को छोड़. अरे गला मत दाब. मर जईहे.


कविता रुक तो गई. पर अब उसे बहोत तेज हसीं आने लगी. वीर भी हसने लगा. पर दोनों ने मुँह से आवाज नही निकली. कविता और वीर दोनों ही समझ गए की उसका बेटा आरव क्या समझ रहा है.


कविता : (स्माइल शरारत ) आज तेरे बाप को नही छोडूंगी. समझता क्या है अपने आप को.


आरव बेचारा अपनी माँ से अपने बाप को छोड़ देने की मिन्नत करने लगा.


आरव : एएए कविता. देख छोड़ दे हमरे बाबा को. देख अब से होमवर्क हम खुदई करेंगे. अरे ऐसे मत कुछ. पेट फट जाएगा हमरे बाबा का.


वीर बेचारा मंद मंद मुस्कुराता अफ़सोस करने लगा. क्या हो रहा है. और बेटा क्या समझ रहा है. कविता को तो बहोत ज्यादा हसीं आ रही थी.


कविता : (स्माइल, शरारत ) अब तो नही छोडूंगी. देख तेरे बाबा का सारा खून पी जाउंगी.


कविता बोलकर अपना सर निचे झूकाती है. और वीर के गले को चुम कर काट लिया.


वीर : (धीमी आवाज ) अरे मत सता उसे. (चीख ) आआह ससससस...


कविता ने काटने के बाद अपने होठो से वीर के होठो को लॉक कर दिया. आरव को लगा की सही मे उसकी माँ उसके बाप का खून पी रही है. जैसे वैंपायर किसी इंसान का खून पीते है.


आरव : ए ए ए देख कविता ऐसा मत कर. अरे मर जाएगा मेरा बाबा. देख छोड़ दे नही त हम नाना के सर पत्थर मार फोड़ देब.


आरव ने अपने बाप को बचाने अपनी माँ को धमकी दे दी. छोड़ दे. नही तो पत्थर मार कर तेरे बाप का सर फोड़ दूंगा. वहा किश करते हुए दोनों ने अपना काम खतम कर दिया था. उन दोनो को जो चाहियेथा. वो मिल गया.


कविता : अच्छा अच्छा. तू रो रहा है. इस लिए हम अभी छोड़ रहे है. पर याद रखना तुम दोनों बाप बेटे. अगर कोई शैतानी करी तो हम तुम्हे छोड़ेंगे नही. बूझे का???


आरव : अरे हा हा. अब छोड़ उका.


कविता : (स्माइल शरारत ) ठीक है ठीक है. अब जाओ. हमरे लिए एक ग्लास पानी लाओ.


आरव बेचारा चुप चाप पानी लेने चले गया. कविता और वीर ने अपने आप को दुरुस्त किया. वीर उस रूम से पहले निकला. और कविता बाद मे. जब कविता रूम से निकली. उसी वक्त आरव पानी का ग्लास लेकर पहोंचा. आरव ने देखा. उसकी माँ के होठो पर लाल लाल निशान है. पुरे लिप्स बिगड़े हुए है. दरसल वो लिपस्टिक कविता के होठो पर फेल गई थी. पर आरव उसे खून समझ रहा था.


आरव : (गुस्सा ) हमरे बाबा का खून पी गई. खुनी खुनी हो तुम.


कविता को इतनी जोर से हसीं आई की वो अपने आप को रोक नही पाई. जिस से आरव और ज्यादा चिड गया. वो गुस्से मे अपने बाप के पास जाकर खड़ा हो गया. दोनों हाथ कमर पर और घूरते हुए हाफ पैंट मे आरव बहोत प्यारा लग रहा था. जैसे उसने अपने बाप की चोरी पकड़ ली हो.


आरव : (गुस्सा) पिटा गए. बहुत शेर बन रहे थे. अब रोज हमरे हिस्से का दूध तुम पिओगे.


वीर बेचारा अपनी मुस्कान छुपाए दए बाए देख रहा था. जैसे उसे शर्म आ रही हो. जब आरव ने दूध का बोला तो वीर ने सीधा सामने खड़ी अपनी पत्नी के जोबन की तरफ देखा. तभि फोन की घंटी बजी.


कविता : (आरव से ) नही... अब तुम दोनों बाप बेटों को रोज डबल दूध पीना पड़ेगा. अब जाओ जाकर फोन उठाओ.


आरव फोन तक जाते जाते गुस्से से अपने बाप को देखता है.


आरव : (गुस्सा ) अब तुम्हरे चक्कर मा हमे दुइ(2) गिलास(ग्लास) पीना पड़ेगा. हम्म्म्म


वीर और कविता मंद मंद मुस्कुराते. उन्हें अब भी बहोत हसीं आ रही थी. वो जाकर फोन उठाता है.


आरव : हेलो...... हा प्रणाम बुआ जी.


कविता एकदम तेजी से फोन तक पहोच कर लपक लेती है. कही अपनी ननंद बबिता के सामने आरव घर की पोल ना खोल दे. वीरू से 4 साल छोटी बबिता की शादी वीरू की शादी के 5 साल बाद ही हो गई थी. वीरू की उम्र के सूरज मिश्रा के साथ. जो रहने वाले तो गोरखपुर के थे. पर वह लखनऊ मे सिफ्ट हो चूके थे. सूरज लखनऊ पुलिस दरोगा थे.


कविता : (स्माइल, शरारत) हा ननंद रानी. का नन्दोईजी तुहार पेट फुलाई दिये का. जो आ नही रही हो.


कविता : (स्माइल) अच्छा भैया तुम्हारे. हा हा आ गए है. तभि.... कोई बात नही. आइये आइये. हम तो तुहार कुछ लागत नइखे. आवा आवा.


आरव और वीर दोनों बस कविता को ही देख रहे थे. उन्हें बबिता की आवाज नही सुनाई दे रही थी. कविता और बबिता दोनों ननद भौजाई दोनों आपस मे सहेलियां की तरह रहते थे. दोनों मे बहोत प्यार था. और दोनों ही एक दूसरे से हसीं मज़ाक करते रहते.


कविता : (स्माइल) अरे भैया से मिलने के लिए ही सही. आओ तो.


कविता : (स्माइल) अच्छा ओके ओके.


कविता ने फोन रख दिया. और वीर की तरफ देखा.


कविता : (स्माइल, शरतत) ननद नन्दोईजी आ रहे है. मै तैयारी कर लेती हु.


कविता किचन मे चली गई. वीर आरव के साथ खेलता रहा. कुछ एक घंटे बाद डोरबैल बजी. और आरव ने भाग कर डोर खोला.


आरव : (स्माइल एक्साइटेड) बुआ.....


आवाज सुनकर कविता भाग कर आई. ननंद और नन्दोई का खूब स्वागत हुआ. और सारे हॉल मे ही जमा हो गए.


बबिता : भैया मै आरव को कुछ दिन लेजाऊ??? उसके बिना मेरा मन नही लग रहा???


बबिता अक्सर आरव को सैटरडे संडे अपने घर लेजाती. पर कुछ हफ्तों से वो आ नही पा रही थी. क्यों की आरव की परीक्षा थी. पर कविता ने कुछ और प्लान बना रखा था.


कविता : पर कल तो हम उसके नाना के यहा जा रहे है. बहोत टाइम हो गया पापा से मिले.


तभि कविता और वीर का भांडा फूटने वाला था.


आरव : अरे बुआ..... पापा से कहे पूछ रहे हो. मम्मी से पूछा.


बबिता समझ गई. जरूर दाल मे कुछ काला है. उसने देखा कविता के चहेरे पर स्माइल के साथ थोड़ी शर्म और शरारत है. वो तुरंत कविता को बाहो मे जकड़ लेती है.


बबिता : (स्माइल, शरारत) अरे रुका भौजी. ऐसे कैसे....


ननंद के जैसे नन्दोई सूरज भी मज़ाक मस्ती मे खुद आगे थे. वो आगे बढ़कर आरव को गोदी मे उठा लेते है.


सूरज : (स्माइल) वो क्यों बेटा.


कविता ज्यादा शर्माने लगी. वीर मुस्कुराते हुए अपने माथे पर हाथ रख देता है. और आरव ने भांडा फोडा.


आरव : अरे फूफाजी.... बाबा की चलती कहा है आज के तो कविता ने बाबा को खूब पीटा है.


सभी हसने लगे.


आरव : जरा हमे निचे उतारिये.


सूरज ने आरव को गोद से उतरा. आरव निचे जमीन पर बैठ के कूदने लगा. वो कविता की पोजीशन बता रहा था. जो उसने जो देखा और समझा.


आरव : अइसन कुद्दे रही कविता. हमरे बाबा पे. और एक बार तो हमरे बाबा के खून भी पी है.


सूरज और बबिता तुरंत पोजीसन देख कर समझ गए की क्या हो रहा होगा. वो आरव की एक्टिंग देख कर बहोत जोरो से हसे. कविता तो शर्म के मारे लाल हो गई.


बबिता : (स्माइल, शरारत) बहुत जोर के कुदी होंगी तेरी अम्मा ना???


आरव भी समझ से अनजान. वो भी मिर्च मसाला भर के बता रहा था.


आरव : अरे...... बहुत जोर के. बाबा का तो आवाजे नही निकाल पा रहा था. सांस फुले रही. पर कविता के तो बिलकुल कोई दया भाव नाही.


सारे और ज्यादा जोर से हसे. कविता की तो हालत ही खराब हो गई. ननंद नन्दोई के सामने. सूरज ने भी अपने सीधे सादे साले वीर की खूब खिचाई की. सबने खाना खाया. और हस्ते खेलते काफ़ी वक्त साथ बिताया. आरव अपनी नानी को पसंद नही करता था.

उसे अपनी बुआ से बहोत प्यार था. इसी लिए उसने जिद्द की और वो बबिता और सूरज के साथ दो दिन के लिए चले गया. उनके जाते माहौल एक बार फिर रंगीन हो गया. उन्हें तो बस मौका ही चाहिये था. अब तो दोनो ही घर मे अकेले थे. पर इस बार कविता ने खुद मानो कामदेवी का रूप धारण कर लिया हो.

जब तक डोर बंद ना हुआ तब तक कोई जल्दबाज़ी नही. अपनी नन्द के प्यारे मिठे तनो को सुनती रही. पर जैसे वो गई. उसने डोर क्लोज किया. एकदम झटके से पलटी.


कविता : (स्माइल, शरारत) अच्छा... गुनाह तुहु करा. और सजा हमका. अबके तोहे नाही छोड़ब.


पिछली बार पहल वीर ने की. तो इस बार कविता ने मानो अटैक ही कर दिया. वीर सोफे पर बैठा वो भी डोर बंद होने का इंतजार कर रहा था. पर कविता तो डोर बंद करते उसपर हमला ही बोल दी. भाग कर वीर पर कूद गई. सीधा उसकी गोदी मे. वीर के चहेरे को दोनों हाथो से थाम होठो से होंठ जोड़ दिए. जैसे चुम्बन से ही जीत हार का फैसला होगा. शादी के बाद दोनों मे ही काफ़ी बदलाव आया था.

वीर शादी के वक्त और ज्यादा बलिस्ट हो गया था. हाइट बॉडी दोनों ही और ज्यादा बढ़ गई. चहेरा भरावदार हुआ तो और ज्यादा स्मार्ट हैंडसम हो गया था. वही कविता किशोरी से सम्पूर्ण नारी बन चुकी थी. जोबन भारी हो चूका था. कविता तो पहले से सुंदर थी. अब और ज्यादा निखार आ चूका था. दोनों मे पहले से ज्यादा बडा दंगल हुआ.

इस बार बैडरूम तक जाने का दोनों मे से किसी को मौका नही मिला. शरीर की गर्माहट ने बड़ी तपस का रूप ले लिया. पर तूफान थम जाता है. वो भी थम गए. दोनों एक दूसरे की बाहो मे. नग्न शरीर दोनों सोफे पर ही एक दूसरे को जकड़े हुए. कविता इस बार भी ऊपर थी. जो की हर बीवी टॉप पर ही होती है. माहौल कुछ पल शांत हुआ.


वीरू : एकठो बात बोले.


कविता : अरे एक का सौ बोला. हम सुन रहे है.


वीर : पता है.... जब किसी जोड़े का शादी होता है. वो सुहागरात मानते है.


कविता : हा हमरा भी हुआ था. भूल गए. हम तुमको अपना भरजीनीटी(virginity) दिए थे.


वीर : अरे उ तो हम भी दिए थे. बात ऊ नाही है. बात यह है की एक फौजी हर साल जब भी छुट्टी आता है. हर बार सुहागरात मनाता है.


कविता वीरू की छाती पर सर टिकाए हुए थी. वो सर ऊपर उठाकर वीरू की आँखों मे देखती है.


कविता : बिलकुल सही कहे हो. हमे कोई फूल माला ग़द्दा बिछोने का जरुरत नाही. बस हम एक दूसरे से मिल जाए. हर बार पहले मिलन का एहसास. सही कहे ना???


वीर : (स्माइल) बिलकुल. अरे समजदार हो. तभि तो हमे मिली हो.


कविता : (स्माइल) अरे कविता शुक्ला नाम है हमरा.


वीर : पांडे.


कविता : हा मतलब अब कविता शुक्ला पांडे. पर इ बाल बहोत चुबता है. दाढ़ी कहे नही बनाए.


वीर : अरे दो दिन रास्ते मा. अब कहे बनाए.


कविता : तब का ससुराल ऐसे जाओगे. कोनो साली देखेगा तो का कहेगा. अब हम बनाएँगे तुम्हे चिक्कन. कहा है तुम्हरा रेजर??


वीर हसने लगा.


वीर : (स्माइल) हमरे बेगमा है. सेविंग किट. जाओ ले आओ.


दोनों पूरी तरह से नग्न थे. कविता वीर के बैग से सेविंग किट ले आई और वीरू के सामने खड़ी हो गई. पत्नी देवी एक बार फिर साक्षात काम देवी का रूप ले चुकी थी. पास मे आधा ग्लास पानी पड़ा ही हुआ था. उसी से वीरू का चहेरा गिला किया. और ब्रश की बजाय अपने हाथो से ही मलके क्रीम लगाई. फिर रेजर उठाया.


वीरू : अरे देखना. लग ना जाए.


कविता : (स्माइल, शरारत) अरे बाबू तुम्हरी गोद मा बैठ कर बनाएँगे. कहे घबरा रहे हो.


वीरू बस हँसा. कविता वैसी ही पोजीशन मे वीरू की गोद मे बैठ गई. कविता चहेरे के करीब बड़े प्यार से रेजर चलाती है. पर थोड़ा फिसल रही थी.


वीरू : (स्माइल) अरे फिसल रही हो. जब तक खुटे से गईया बंधेगी नहीं. एक जगह टिकेगी नहीं


मतलब आप समझ ही गए होंगे. कविता वैसे ही सावर हो गई. दोनों को मौसम बनाते टाइम कहा लगता है.


कविता : ससससस ला. ई ला त.


कविता सरक तो अब भी रही थी. पर अब ऊपर खिसकने मे मझा ज्यादा आ रहा था. धीरे धीरे पूरी शेविंग हो गई.


कविता : (स्माइल,शरारत) अब बने हो. एकदम चिक्कन.


दोनों ने अधूरा काम तीसरी बार पूरा किया. रात दोनों ने साथ बिताई. और सुबह होते जल्द ही बस पकड़ ली. कविता के मायके और वीर के ससुराल के लिए. कुछ दो तीन घंटे का सफर था. सुबह 8 बजे तक दोनों कविता के मायके पहोच गए. वैसे तो कविता का मायका इलाहबाद के बाहरी हिस्से मे था. हाइवे से उतारकर कविता के मायके जाने वाले रास्ते के इर्द गिर्द सुबह 10 बजे तक सब्जी मंडी लगती. वीर और कविता बस से उतारकर उसी रास्ते पर चल दिये.

कविता बस थोड़ासा आगे चल रही थी. उसके हाथमे शूटकेस था. वही वीर पीछे उसके पास भारी बेग था. वीर ने देखा की एक दो ठेले से दो तीन बुढ़िया अपना ठेला छोड़ कविता की तरफ तेजी से आई. और कविता को इर्द गिर्द घेरकर नाचने लगी. जैसे कविता को ताना मार रही हो.


बुढ़िया 1 : हम्म्म्म पहले बड़ी कुदत रही. बडा फुदकती थी. अब का हुआ. कहे एकदमे शांत हो गई.


वीर ने देखा की कविता मुस्कुराती एकदम शांत निचे देखते हुए धीरे धीरे चल रही थी. वीरू को यह समझ आ गया की कविता सब की पहले भी फेवरेट थी. वो दो तीन बुढ़िया कविता के मजे लेती रही.


बुढ़िया 2 : (स्माइल) अरे गईया अब खुटे से जो बंध गई. अब देखो. कैसे शर्मा रही है.


बोलते हुए उस बुढ़िया ने कविता की थोड़ी पकड़ ली. कविता ने धीरे से कहा. वो पीछे है. तो वो तीन बुढ़िया पहले वीर को देखती है. उनके देखने से ही वीर को अंदाजा लग गया की उनकी नजरें थोड़ी कमजोर है. वो तीनो बुढ़िया मुस्कुराई और वीर के पास आई.


बुढ़िया 3 : वह बडा सुंदर है. नजर ना लगे हमरी.


वो तीनो बुढ़िया वीर की नजर उतरने लगी. कविता घूम कर उनकी तरफ देखती है. वीर ने भी गरीबसी दिखने वाली तीनो बुढ़िया के पाऊ छुए. यह कविता के लिए दिल जीत लेने वाला नजारा था. तभि मोटरसाइकिल की आवाजे आई. बुढ़िया और कविता ने उस तरफ देखा. दो मोटरसाइकिल पर 4 लड़के रेस दे देकर सब को परेशान कर रहे थे. तभि एक लड़के की नजर कविता पर गई.


लड़का : अबे झांसी की रानी. भाग भाग.


उन लड़को ने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल घुमा ली. कविता अपना सूटकेस वही सडक पर छोड़ दो तीन कदम आगे आई. और जैसे धमकी देने लगी.


कविता : अबे कविता शुक्ला नाम है हमारा.


तभि कविता को याद आया की उसका पति पीछे है. वो घूम कर देखती है. वीर बस मुस्कुरा रहा था. कविता हाथ हिलाते हुए बाकि लाइन बोलती है.


कविता : और पांडे भी. (स्माइल) साले स्कूल मा हमरे जूनियर थे. फालतू मे यहां बदमासी करते है.


वीर को बड़ी जोर से हसीं आई. कविता शर्मा गई. कुछ बोली नहीं. बस सूटकेस उठकार तेजी से चलने लगी. वीरू समझ गया की कविता का आतंक स्कूल मे भी रहा होगा. वो लड़के मंडी मे सबको परेशान करते होंगे. और कविता से डरते होंगे. कुछ दूर चलते रोड पर गेट आया. जिसपर वीर के ससुर के नाम की नेमप्लेट लगी हुई थी. दयाशंकर शुक्ल PWD. वो दोनों गेट से अंदर घुसे. और कविता ने आवाज लगाई.


कविता : एएए दायशंकर. अबे कहा हो बे.


वीर जानता था की कविता अपने बाप को कभी शुक्ला तो कभी उनके नाम से बुलाती. दोनों बाप बेटी दोस्त की तरह रहते थे. दयाशंकर को पता था की बेटी और दामाद आ रहे है. इस लिए उन्होंने छुट्टी ले ली थी. वो आए. कविता और दायशंकर दोस्त की तरह ही मिले.

वही वीर ने अपने ससुर और सास का आशीर्वाद लिया. उसकी सास कविता की माँ को पहले की तरह ही कविता का रवैया पसंद नहीं आया. और वो कविता को डांटाती गई. पर कविता नजर अंदाज़ करती गई. वीर के भारी बैग से सब के लिए तोफे थे. जो दे दिए गए. दिन बहोत अच्छा गया. पर कविता को तो शाम का इंतजार था. वही वीरू शाम के लिए ही डर रहा था.

एक बार तो वो शर्मिंदा हो चूका था. अब कोई नया कांड ना हो जाए उसका डर था. कविता के मायके ऊपर टेरेस पर एक रूम बना हुआ था. जिसमे कविता और वीर दोनों को रुकना था. और कविता ने वही खुले आष्मान के निचे ही प्रोग्राम करने का सोचा था.

शाम हुई और धीरे धीरे रात. कविता की माँ सरिता देवी ने कविता और दामाद को भोजन करने पुकारा. पर कविता ने मना कर दिया. और कहा की उन्हें लेट खाने की आदत है. वीरू बेचारा कविता को घूर के देखता है. और सोचता है की यह इस कांड का बिल भी उसके सर ही फाड़ने वाली है. अगर सब शांति से ना हुआ तो.

वैसे कविता ने कभी ड्रिंक नहीं किया था. उसका पहेली बार था. वीर सोच रहा था की अगर बड़बोली कविता को चढ़ गई तो क्या होगा. वो पहले से ही बड़बोली है. पिने के बाद क्या क्या करेंगी. वही कविता बहोत एक्साईटेड थी. वो दोनों ऊपर वाले रूम मे थे.


कविता : (स्माइल एक्साइटेड) एए... निकालो ना काला कुत्ता.


कविता ब्लैकडॉग दारू की बोतल निकालने को कहे रही थी. और वीर का डर बढ़ने लगा. क्यों की बीवी मान ने वाली तो थी नहीं.


वीर : अरे का बोतल से मुँह लगाकर सीधा पिओगी का. गिलास(ग्लास) वगेरा कुछ तो नहीं है.


कविता सिर्फ शरारत से मुस्कुराई. और उसने उसी रूम से ग्लास का पूरा सेट निकाला. जिसमे पुरे 6 ग्लास थे. इतना ही नहीं 3 बाउल निकले. एक मे भुने काजू बादाम, दूसरे मे भुने चने और तीसरे मे सलाद था.


कविता : (स्माइल, शरारत) का बुडबक समझे हो का. अब चला बहार.


कविता सब सामान लेकर रूम से बहार टेरेस पर आ गई. वीरू बेचारा बोतल लेकर बहार आया. पर बहार का नजारा बहोत अच्छा था. आष्मान साफ था. तारे टीम टीमा रहे थे. बहोत बढ़िया हवा चल रही थी. वीर टेरिस के किनारे आया. और दीवार पर हाथ रखते निचे देखा. उसके ससुर दायशंकर घर के बहार छोटे से गार्डन मे चेयर डालकर बैठे थे.


कविता : अरे इहा आवा ना. उहा क्या कर रहे हो.



वीर बेचारा कविता के पास आया. कविता ने टेरेस पर निचे ही दरी बिछा दी. दोनों बैठ गए. वीरू कविता को देखते रहा. कविता से बरदास नहीं हुआ.


कविता : अरे बनाओ यार. हमे थोड़े ना आता है.


वीरू ने सोचा. चलो जो होगा देखा जाएगा. वीर ने बोतल खोली. भोग लगाए. और बिलकुल लाइट लाइट दो पैग बनाए.


वीर : उठाओ. आज पहेली बार पत्नी देवी के साथ. चीयर्स.


कविता खुश हो गई. उसकी बस एक फैंटासी थी. की एक बार अपने पति के साथ वो शराब पिएगी. और खूब नाटक करेंगी. जो की पूरी भी हो रही थी. दोनों ने अपना अपना पैग खतम किया. फौजी कितनी भी बढ़िया शराब हो. वो एक ही बार मे पीते है. वीर ने वैसा ही किया. पर कविता भी पूरा खींच गई. ब्लैकडॉग होने के बावजूद उसने अपना मुँह बिगाड़ा.


कविता : ओओहोक एह का चीज है बे. साला दवाई जैसा लग रहा है.


वीर कुछ बोला नहीं. बस हँसा.


कविता : बनाओ एक और.


वीर कविता को घूर के देखता है. कविता हसने लगी. पर वीरू ने दूसरा पैग बना दिया. वीरू ने काजू उठाया और खाने ही लगा की कविता ने उसके हाथ का काजू खींच लिया.


कविता : का लगता है. ई चढ़ेगी???


वीरू : हम्म्म्म पता नहीं.


कविता : तो चढ़ाओ. हमे नशा नहीं हो रहा.


वीर बेचारा चुप रहा. पर कविता दूसरा भी पैग खींच गई. वीर ने जानबुचकर तीसरा नहीं बनाया. हलाकि उसने दोनों पैग बहोत ज्यादा लाइट बनाए थे.


कविता : एए... देखो. यह हमरा सपना था. तुम डरना नहीं ठीक है. (स्माइल) मेरा डार्लिग...


कविता वीरू का गाल चुम लेती है. अब वीरू को विस्वास हो गया की कविता को चढ़ रही है. क्यों की कविता ने हमेशा एजी ओजी, आरव के पापा कहकर ही पुकारा था. कविता ने वीर को पहेली बार डार्लिग कहा. अब उसे कविता का वो रूप देखना था. उसे भी मझा आने लगा. उसने एक रेगुलर पैग बनाया. हलाकि उसका दूसरा खतम नहीं हुआ था.


कविता : अच्छा... एक ठो बात बताए...


वीरू : हम्म्म्म...


कविता : (स्माइल, नशा ) तुम ना... माल हो. एकदम चिक्कन. साला मेरा क्या मेरी दोस्त का भी तुम्हे देख कर नियत बदल जाता है.


वीरू मुस्कुराने लगा. उसकी बीवी खुलके उसकी तारीफ कर रही थी.


कविता : तुम जानते हो..... अगर हम कविता ना होते ना. तो हम तुम्हरे लिए कविता का ही मर्डर कर देते. (स्माइल) पर तुम.... तुम सच मे माल हो.


वीर के फेस पर स्माइल आ गई. उसने अपना पैग खतम किया और अपना तीसरा पैग बनाने लगा. कविता ने अपना ग्लास उठाया. और आगे कर दिया. वीर ने कविता को घूर के देखा.


वीर : नहीं.. अब नहीं. बस तुम्हारा हो गया.


कविता झूमने लगी थी.


कविता : अबे यार दो ना यार. अभी तो हमने थोडीसी भी बकवास शुरू नहीं की. बहुत बोलना है हमे तुमसे.


वीरू हस पड़ा. तो कविता भी हस्ते हुए अपना सर वीरू के कंधे पर टिका लेती है.


वीर : बोलो... क्या बकवास करनी है???


कविता : अममम... तुम हेना.... अमममम माल हो माल.


इस बार वीरू ने माथा पीटा. वो समझ गया की अब यही रिकॉर्डिंग चलेगी. तभि उन्हें कविता की माँ सरिता की आवाज सुनाई दी. जो सायद कविता के बाप को डांटा रही थी.


सरिता : बस उहहा बैठे रहिएगा. कुछ पूछियेगा नहीं की समस्या का है.


अपनी माँ की आवाज सुनकर कविता खड़ी हुई. उसे वीर ने सहारा देने की कोसिस की. पर कविता उस से पहले ही खड़ी हो गई. वो टेरेस के किनारे खड़ी होकर निचे अपने बाप को देखती है.


कविता : एएए... दायशंकर.


उन्होंने पहले दए बाए देखा. फिर ऊपर. देखा बेटी मस्त मौला बनी उन्हें ऊपर आने का हिसारा कर रही है. कविता की माँ ने भी यह घर के अंदर से सुना. और वो जोरो से कविता की बुराई करना शुरू कर देती है. पर कविता और उसके पापा दोनों की ही आदत थी सब नजर अंदाज कर देते. वो नजर चुराते ऊपर आने लगे. कविता वीरू के पास आई.


कविता : ए सुनो. हमरे बाबा आ रहे है. उन्हें एक दो घुट पीला देते है. हम जो भी बोलेंगे. तुम बस हमरा साथ देना.


वीरू सोच मे पड गया. कविता करना क्या चाहती है. तभि कविता के पापा ऊपर आए. और महफ़िल देख कर थोड़े हैरान हुए.


कविता : (मदहोश, स्माइल, बिंदास) अरे आवा आवा शुक्लाजी आवा आवा. बैठा...


दायशंकर बैठ गए. कविता ने वीर को सर झटक कर ऐसे हिसारा किया. जैसे वीर कविता का फोल्डर या राइट हेंड हो. वीर ने पैग बना दिया.


दायशंकर : अरे नहीं नहीं दामादजी. हमे आदत नहीं.


कविता ने खुद ही बोतल खींची और अपने ग्लास मे डालने लगी.


कविता : (स्माइल, बिंदास) अरे ऐसे कैसे.... आज ही तो मौका है. शेर जगाने का.


वीरू ने कविता का हाथ पकड़ लिया. उसे ज्यादा नहीं लेने दिया. इन सब मे वो खुद पीना भूल गया. दायशंकर कभी कभी चुपकेसे एक दो पैग पी लेते थे.


कविता : चलो उठाओ...


दायशंकर ने पहले दामाद को देखा. और फिर पैग उठा लिया. और जल्दबाजी मे एक ही बार मे बिना पानी के पी गए. कविता की असली बकवास शुरू हुई.


कविता : हा तो हम क्या कहे रहे थे दायशंकर...


दयाशंकर : हम्म क्या???


कविता : (बिंदास) यार..... ये..... बीवियों को हेना. काबू मे रखना चाहिये.


दायशंकर समझ गए की उनका दामाद क्या झेल रहा है. वो वापस वीर को देखते है. और फिर कविता को. कविता बोलते हुए झंगो पर ताल भी ठोकने लगी.


कविता : अब हमे ही देख लीजिये. हमारी हिम्मत है की हम इनके सामने कुछ बोल जाए.


कविता अपने पापा की तरफ थोड़ा झूकी. और अपना हाथ दिखाने लगी. जैसे बहोत खास खुलासा कर रही हो.


कविता : एक ही थप्पड़ मे हमरा मुँह घुमा देते है.


कविता के पापा ने वीरू की तरफ देखा. जैसे दोनो हिसारो मे बाते कर रहे हो. वीर हलका सा ना मे सर हिलता है. दायशंकर वीरू की हालत पर थोड़ा मुस्कुराए. जैसे कहना चाहते हो. मेने तो अपनी सरदर्दी तुझे थमा दी. अब भुगत. कविता वीर की झंाग पर हाथ मरती है. वीरू जैसे होश मे आया हो.


वीरू : अममम बिलकुल... बिलकुल.


कविता : (वीरू की तरफ) अबे तुम रहने दो यार. तुम्हारा कच्छा तक तो हम खरीद कर लाते है.


कविता ने अपना फेस अपने बाप की तरफ किया.


कविता : हा तो हम क्या कहे रहे थे???


दायशंकर : बीवी को काबू मे रखना चाहिये.


कविता : (आंखे बंद, मस्त, स्माइल) बीवी को काबू मे रखना चाहियेयेये....


कविता ने फिर वीर की तरफ देख कर हिसारा किया. जैसे कहना चाहती हो की एक और पैग बनाओ. अभी ही मौका है. पर हिसारा भी ऐसा की उसका बाप सब देख कर समझ जाए. वीर ने इस बार तीनो के पैग बनाए. और एक खुद बिना पानी के गटक गया.

दायशंकर ने वीर की पिठ थप थापाई. और अपना पैग एक झटके से खींचकर खड़े हो गए. वो तुरंत निचे चले गए.वीर ने भी अपना पैग खतम कर दिया. तभि निचे से कविता की माँ और उसके पापा के झगड़े की आवाज आने लगी. वीर कविता को छोड़कर नहीं जाना चाहता था.

पर कविता खुद उठकर निचे जाने लगी तो वीर को भी उसके पीछे जाना पड़ा. कविता को देख कर उसकी माँ सरिता ज्यादा भड़क गई. वो सुना कविता को रही थी. पर बोल अपने पति को रही थी.


सरिता : (गुस्सा चिल्लाकर) कल तक इस घर मे सिगरेट आई. आज शराब आ गई. अब कल जुआ भी खेलने लगोगे. अब बस रंडीखाना खोलना बाकि..


सरिता के मुँह से यह सब सुन कर दायशंकर को गुस्सा आ गया. और अपने जीवन मे पहेली बार अपनी पत्नी पर हाथ उठा दिया. चटक करते आवाज पुरे रूम मे गूंज उठी. कविता और वीर तो एकदम सॉक हो गए. पुरे रूम मे सन्नाटा छा गया. सरिता अपने गाल पर हाथ रखे हैरानी से अपने पति को देख रही थी. और दायशंकर अपनी नजरें घुमाकर स्तब्ध खड़े ही रहे गए. कविता को नशा हो गया था.

पर क्या हुआ उसे यह समझ आ रहा था. वो मुँह खोले जैसे समझने की कोसिस कर रही हो. कुछ पल शांति के बाद सरिता तेज़ी से अपने रूम की तरफ जाने लगी.


सरिता : (गुस्सा ) अब हम इस घर मे नहीं रहेंगे. जा रहे है हम.


वो कुछ ही पल मे एक झोला तैयार कर के आ गई. पर उसे दायशंकर ने रोक लिया.


दायशंकर : रुको सरिता... मेरी बात सुनो..


सरिता : (गुस्सा) हटो मेरे रास्ते से. जिंदगी मे पहेली बार आज आप ने मुझपर हाथ उठाया है. (कविता की तरफ हाथ दिखाते) वो भी ऐसी चरित्रहीन औलाद की वजह से.


पहेली बार झगड़े मे वीर ने मुँह खोला.


वीर : आप कैसे कविता को चरित्रहीन बोल सकती हो??? सिर्फ उसने सिगरेट और शराब पी. इस वजह से???


सरिता : देखो दामाद जी. लड़कियों को यह सब सोभा नहीं देता.


वीर : और लड़को पर तो यह सब जचता होगा. वाह... आप एक औरत होकर यह क्यों नहीं समझ रही की लड़का लड़की दोनों मे कोई भेद नहीं. और सिगरेट पीना शराब पीना बुरी आदत हो सकती है. बुरा चरित्र नहीं. चाहे वो लड़का हो या लड़की.


एक पल के लिए वहा फिर शांति छा गई. कविता मुँह खोले पागल के जैसे धीरे कदम से वीर की तरफ आई. और वीर की नजर उतार ली.


कविता : (फुल नशा ) मस्त बोला हम्म्म्म.. बहुते बहुते मस्त.


कविता की ठीक से आंख भी नहीं खुल रही थी. पर उसके ऐसे वक्त मे ऐसी हरकत देख कर वीर को हसीं आ गई. उसने कविता को बाहो मे भर लिया.


वीर : कविता को मुझसे मिलने से पहले पापा पर भरोसा था. उनके भरोसे कविता ने जीवन मे पहेली बार सिगरेट पी. वो हलाकि अब भी पीती नहीं है. फिर उसकी जिंदगी मे मै आया. और उसने मेरे भरोसे जीवन मे पहेली बार शराब पी. क्यों की उसे पता है. उसके पिता और पति उसे कुछ होने नहीं देंगे. उसे जो भी करना हो. वो करेंगी. उसके साथ मै हु. हर वक्त.


सरिता को अपनी गलती भी समझ आई. उसकी सोच पर उसे अफ़सोस हुआ. वो खामोश थी. तभि कविता धीरे धीरे उसके पास पहोची. और ऐसे बोली जैसे वो गुप्त ज्ञान दे रही हो. लेकिन उसे सबने ही सुन लिया.


कविता : (नशा) ए... एए सरिता. पति को कभी जाने की धमकी नहीं देना. वरना वो खुश हो जाएगा. पति को जो हेना.... ससससस.. खींच के रखना चाहिये. एकदम काबू मे.


कविता की बात सुनकर सभी बहोत जोरो से हस पड़े.

The End











 
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Shetan

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Biwi ne pi sharab. Mahol huaa kharab

Ghar ka kaam karte Kavita ki nazar baar-baar ghar ke landline phone par jaati. Ghar ki doorbell baji aur turant Kavita ne bhaag kar phone uthaya.

Kavita: (excited) Hello... kahan pahunche???

Par saamne se koi reply nahin. Phir bhi bell ki awaaz lagataar sunaai de rahi thi. Kavita ne door ki taraf dekha. Tab jaakar khayaal aaya ki yeh to ghar ki doorbell ki awaaz hai. Kavita ko jaise gussa aa raha ho. Woh tezi se door ki taraf badhi aur jhatke se door khola. Saamne postman tha.

Kavita: (jhalla kar) Kya hai? Kyon itni baar-baar ghanti bajaye ja rahe ho???

Postman: Arre madam, apna daak to le lijiye. Kab se baja rahe hain. Koi khol hi nahin raha tha.

Kavita: Laiye, dijiye.

Kavita ne daak li aur khol kar dekha to LIC ki kisht bharne ki rasid thi, jo post ke zariye aayi thi.

Postman bhi attitude dikhate hue Kavita ko dekhte chala gaya. Kavita ne jaise hi door close kiya, usi waqt landline phone par ghanti baji. Kavita ekdum chahak kar phone ki taraf bhaagi aur lapak kar phone utha liya.

Kavita: (smile, excited) Hello... kahan pahunche???

Kavita aur Veer ki shaadi ko 8 saal ho gaye the. Dono ki mulaaqaat train mein hui thi. Dono mein kuch aisi chemistry baithi ki baat shaadi tak pahunch gayi. Waise shaadi to love marriage thi, par kai jugaad lagane ke baad use arrange marriage mein tabdeel kiya gaya. Shaadi ki pehli raat mein hi dono ne ek doosre ko apna kaumarya saunp diya.

Aur ek hi saal mein bete Aarav ne janm le liya. Ji haan, Kavita aur Veer ki eklauti aulaad Aarav Pandey, jo ab 7 saal ka ho chuka tha. Kavita ke pita Dayashankar Shukla PWD mein karyarat the aur ab retire hone ki kagaar par the. Maa Sarita Shukla grihini thi.

Kavita ki maa Sarita Shukla thode puraane khayaalaat ki thi. Beti-bahu ko anushaasan mein rakhna unhe zyada pasand tha. Beta koi tha nahin, to bahu bhi nahin. Par beti Kavita kabhi unke kaabu mein nahin aayi. Wah apni chanchal chittavan se udti hi rahi. Wahin Veer ki maa Urmila uske bachpan mein hi chal basi thi. Aur pita Satender Pandey ki mrityu kuch 6 saal pehle hui thi. Kavita baar-baar telephone ko isi liye taak rahi thi, kyunki janaab Veer chhutti ke liye nikal chuke the.

Kavita ne Veer ko sakht hidayat di thi ki woh kahan pahunche, pal-pal report dete rahein. Train mein raat ko mobile ki battery kam hone ki wajah se Veer ne aakhri call beeti raat 9 baje kiya tha. Baad mein phone switch off kar diya. Par subah 11 baje ke aas-paas Veer apne station par utar gaya. Ghar aane ke liye Veer bus mein baith gaya.

Rasta kuch ek dedh ghanta lamba tha. Ek fauji jab ghar aata hai, tab uske jazbaat alag hi hote hain. Dil mein bechaini aur ghar pahunchne ka utavalapan. Bus mein baithe Veer ko bhi yahi sab mehsoos ho raha tha. Chup-chaap baithe Veer ko alag-alag rangeen khayal aa rahe the. Baithe-baithe woh muskura raha tha.

Veer se raha nahi gaya, aur jeb se apna keypad wala mobile nikala aur switch on karke phone laga deta hai. Bas do baar hi ghanti baji, aur turant Kavita ne phone utha liya.

Kavita: (smile, excited) Hello.... kahan pahunche???

Veer: Are yaar, abhi ek ghanta lagega. Bus abhi hi chali hai. (Bhojpuri tone)

Kavita: (smile, excited) Hamre liye ek tho kala kutta liye ho na. (Black Dog whisky)

Veer: Are yaar ka tum bhi. Haan liye hai.

Kavita: Are kamaal karte ho Pandeyji. Tumhai to bole the. Ek baar hum dono saath milkar piyenge. Ab kahe phat raha hai. Yaha nahi. Aapan sasuraal ma chalihho. Uhaa rang jamaayenge dono.

Veer: Are baap re. Uhaa to hargiz nahi.

Kavita: Hum poochh nahi rahe. Bata rahe hai. Ab chup rahiye. Kavita Shukla hai hum.

Veer: Ab Pandey bhi.

Kavita: Haan matlab Kavita Shukla Pandey ab.

Veer sasuraal me koi bhi plan banane se is liye ghabra raha tha, kyon ki kuch do saal pehle Kavita ke maayke, Veer ke sasuraal me, dono ne ek sexual game khela tha. Jisme Kavita ne apne upar wale kamre me Veer ko baandh rakha tha. Veer Sholay film ki Basanti ki tarah sirf apne kacche me bandhe hue the. Aur Kavita ne cat mask wala full skin-tight costume pehna hua tha.

Kavita ke haath ek chabuk bhi thi. Bada hi joshila aur kamuk khel chal hi raha tha ki achanak dhadaam se darwaza khula. Veer ki saas Sarita Shukla andar aa gayi. Aur ekdam gusse mein jhallate hue un dono ko dekhne lagi. Woh to pehle se hi purane khayalaat ki thi.

Khoob ghar mein Kavita aur uski maa ke beech hungama hua. Par tab se Veer apne sasuraal jaane se katarane lage. Par biwi ke aage kaunse mard ki chalti hai. Veer ne baat badal di.

Veer: Achha theek hai. Aarav to ghar par hi hoga. (smile, excited) Abhi kuch hoga ki nahi???

Kavita samajh gayi ki uska pati kis baare mein poochh raha hai. Pati ke poochhne par to woh bhi chahak gayi.

Kavita: (sharmana, smile, excited) Abhi din mein. Aarav school se abhi aane wala hoga. Raat hone dijiye Pandey ji.

Veer: (smile, excited) Jaanti ho Komal ji, hamri fauj ma ek chutkula bahot famous hai.
Kavita: (smile, shararat) To sunaiye na.

Veer: (smile, excited) Ek baar fauji sahab chhutti aaye. Raaste me unhone kuch soch kar ek kilo moomfali kharid li. Wo ghar pahunche to unke dono bachche Guddi aur Munna "Papa Papa" karte chipat gaye. Fauji sahab ne saari moomfali aangan me bikher di.

Fauji Sahab: Lo bachcho, moomfali khao. Magar ek baar me sirf ek hi moomfali uthana. Warna gaadiya me danda daal denge. Samjhe?

Bachche bichare lag gaye ek-ek moomfali khane. Aur Fauji sahab pahunch gaye apni madam ke paas. Khoob khel chala. Par Munna bada shaitaan tha. Usne socha Papa kahan gaye. Wo khidki se jhaankne laga aur turant peeche mudkar Guddi ke paas aaya.

Munna: Guddi Guddi... ek-ek uthana. Amma ne shayad do moomfali uthai hongi. Dekh, Papa kaise gaadiya me danda daal rahe hain.

Veer ke chutkule par Kavita zor se khilkhilakar hansne lagi. Par mazaak-masti me Kavita kaunsi peeche thi.

Kavita: (smile, shararat) Tab to aap bhi moomfali le lijiye. Hum to do moomfali uthane wale hain.

Veer, Kavita ke mazakia jawab se ekdam gadgada gaya. Ki tabhi phone disconnect hokar switch off ho gaya. Bechare Veer ka bahot zabardast mood bana tha, par mobile me battery khatam ho gayi. Kavita ki hansi ruk hi nahi rahi thi. Phone kat chuka tha. Ab use pati ki yaad zyada satane lagi. Wo sochne lagi ki pati ke bina itna lamba waqt kaise kata, sirf pati ki yaadon ke sahare.

Wo saath bitaaye pal. Wo kisse jinhe yaad aate hi chehre par apne aap smile aa jaati. Aise hi Kavita haste hue khamosh hui. Aur un beete palon ko yaad karne lagi. Kaise Kavita ke saath reh reh kar Veer bhi shararati ho gaya. Jab Aarav bolna seekh gaya tha. Wo thoda tutla kar bolta tha, jaise aam bachche bolte hain.
Kavita kitchen se baap-bete ki baatein sun rahi thi. Veer bhi jaan-bujhkar Kavita sune waise bete se kuch na kuch bulwa raha tha.

Veer: Sabse acche papa kiske hain?

Aarav: Mele....

Veer: Sabse accha beta kaun hai??

Aaram: Main......

Veer: Sabse sundar mummy kis ki hai???
Yeh sunte Kavita kitchen se bahar aayi. Aur apni kamar par haath rakhe muskurate baap beton ko dekhne lagi.

Aarav: Meli......

Veer: (shararat, smile) Bade doodh wali mummy kiski hai???

Bachche ko kya pata. Usne turant lambi awaaz mein bola.

Aarav: Meli......

Aarav ka bolna aur Kavita ka aage badhna, aur usi waqt Veer ka seedha wahan se khisakna. Kavita Veer ko pakadne bhaagne lagi. Yeh kissa yaad aate hi Kavita akele akele hi khilkhilakar zor se hansne lagi. Tabhi doorbell baji. Kavita ko laga ki shayad Veer pahunch chuka hai aur use surprise dene wala hai.

Woh jhat se door ki taraf badhi. Aur door khola to saamne uska beta Aarav khada tha. 7 saal ka Aarav school dress pehne hue. Uski nikkar to ghutne ko bhi paar kar rahi thi. Aur chhota sa Aarav apni maa ko gusse se ghoorne laga. Gusse se uske naak ke naathune phool rahe the. Aise nadaan roop mein woh bahut pyara lag raha tha.

Kavita: Andar aao. Bahar kahe khade ho be.

Aarav: (gusse mein) Dahej chahi tuka. Forbilar (four wheeler) gaadi. Laalchi ho tum. Laalchi.

Bolkar Aarav apni maa ke haath ke niche se hi andar aa gaya. Apne bete ke pyare natak ko dekh kar Kavita ko hansi aane lagi. Darasal Aarav ne apni class teacher ko hi propose kar diya aur seedha shaadi ke liye poochh liya. Uski class teacher Aarti, Kavita ki bahut achchhi dost ban gayi thi. Apni saheli ke bete ki aisi pyari harkat dekh kar Aarti ko gussa nahin aaya.
Balki use aur zyada pyaar aane laga. Aarti ne bhi Aarav se keh diya ki pehle apni maa se poochh le ki woh mujhe apne ghar ki bahu banayegi? Phir kya tha. Aarav ne apni mummy Kavita se bhi zidd ki ki woh apni bahu ko dekhne school aaye. Jab Kavita ko pata chala ki uske bete ne uski best friend ko hi propose kar diya, to woh bahut hansi. Aur Aarav ke saath uske school chal di.

Aarti aur Kavita dono mile, aur Aarav ke saamne ek naya natak kiya.

Kavita: Accha.. to tum meri bahu banogi. Par mera to ek hi beta hai. Main to dahej lungi. Ek four-wheeler car, ghar ka saara samaan aur 11 lakh nakad.

Aarti acting karti hui munh latka leti hai.
Aarti: Maaf karna... hum bahut gareeb hain. Yeh sab hum nahi de payenge.

Kavita: Hmmmm phir to mushkil hai. Yeh rishta nahi ho sakta.

Kavita ke bolte hi Aarav gusse se apna paon patakte hue school ke andar chala gaya. Uske jaate hi Kavita aur Aarti bahut hansi. Phir Aarti ne Kavita se bhi bahut mazaak kiya.

Aarti: Chalo baap ne nahi to bete ne to propose kiya. Ufffff.

Kavita: (Smile) Chup kar saali. Jab dekho mere pati par line maarti rehti hai. Gandiya phaad denge hum, keh rahe hain.

Aarti: (Smile) Are tujh se nahi. Hum to apan jiju se phadwaayenge apni gandiya. Ka chikkan jiju hai hamre.

Kavita hanste hue Aarti ko dabochne lagi. Aise dono mein hansi-mazaak hua. Wahi Kavita ne door close kiya aur Aarav ke saamne khadi ho gayi.

Kavita: Ee munh kaahe phulaye hue ho be. Jao... jaakar haath-god dho kar khana kha lo.

Aarav: (Gussa) Aane do hamre baba ko. Tohar uhi dekhihen.

Kavita: Ja be. Aapan baap ka dhamki kisi aur ko dena.

Aarav gusse se doosre room me chale gaya. Aur bahot zor se darwaza patak kar band kar deta hai. Kavita use dekh kar muskura rahi thi. Kuch minute baad uske room se speaker sound ki awaaz aayi. Aur gaana baj raha tha: "Jab dil hi toot gaya, hum jee ke kya karenge."

Kavita ne jab gaane ke bol sune to wo akele akele bahot zor se hansi. Kavita ne Veer ke liye bahot taiyari kar rakhi thi. Par ab uske paas bas ek hi kaam bacha tha — intezaar karna. Wo soch rahi thi ki kab doorbell baje aur wo jhat se darwaza khole. Par ab usse bardasht nahi ho raha tha. Wo khud hi door open karke dekhne lagi.

Ghar ke saamne road par chahal-pahal thi, par Veer nahi dikh raha tha. Tabhi auto-rickshaw ghar ke paas ruki aur andar se Veer nikla. Kavita ki aankhon me chamak aa gayi. Wo ek bag taange aur ek bag auto se utarte dikha. Shayad do din ke raste me Veer ne shave nahi ki hogi.
Isi liye halki kaali daadhi jaise nazar lagne se bacha rahi ho. Auto ka rawana hona aur Veer ka Kavita ki taraf dekh kar muskurana. Par tabhi Aarav ki lambi cheekh...

Aarav: Baba........

Kavita to door par hi thi, par kab Aarav waha aaya, Kavita ko pata hi nahi chala. Kavita aur Veer dono ne apne-apne mann me yeh plan bana liya tha ki bete ke dekhne se pehle dono ek zabardast jhappi aur pappi, matlab ki kiss kar lenge. Kyunki Aarav ke aane ke baad wo sab raat ko hi mil paayega.

Lekin Aarav ne sab chaupat kar diya. Woh pehle hi bhaag kar apne baap ki baahon mein pahunch gaya. Veer bhi apne bete se milkar bahut khush hua. Apne bete ko god mein liye Veer Kavita ko dekhta hai. Kavita aur Veer dono ki aankhon mein ek ajeeb si pyaas thi. Jaise ab bhi pyaas baaki hai. Mil to gaye, par milan ab bhi baaki hai. Veer ke kareeb aate hi turant Kavita ne uske paon chhuye. Ghar ke andar jaate hi door close.

Kavita: (smile, pyaas) Main aap ke liye chai banati hoon.

Kavita ka bolna ekdum dheemi awaaz mein tha. Jaise iraada chhupa rahi ho. Apni pyaas, apna pyaar jataane se khud ko rok rahi ho. Bas nazron se nazron ne hi ek doosre ko bhaap liya. Woh kitchen mein andar gayi. Veer apne bete ko lekar sofa par baitha. Aarav ne shikayat ka potla kholna shuru kiya.

Aarav: Baba, aap chale gaye, par Kavita ne mujhe bahut tang kiya.

Jis tarah Kavita apne pita ko kabhi unke title se to kabhi naam se bulaati thi, waise hi Aarav bhi apni maa ko naam se pukarta tha. Par yeh battameezi nahi, dostana vyavahaar tha.

Veer: Achha... kya tang kiya aap ko???

Aarav: Baba, Kavita hai na... (sochte hue) mera homework nahi karke deti. Aur mujhe cartoon bhi nahi dekhne diya. Aur zabardasti roz tuition bheja hai yeh. Chocolate to humko bhula hi di hai.

Tabhi Kavita Veer ke liye paani lekar aayi.

Kavita: Achha bachwa, humaari shikayat kar rahe ho. Taange tod doongi tumhaari.

Veer: Achha... tum mere Aarav ki taange todogi. Hatna Aarav beta, is Kavita ki bachchi ko to main dekhta hoon.

Aarav side hata. Use ab maza aane laga ki ab baap uska badla lega.

Aarav: Ab pata chalega.....

Kavita apne pati ki chaal samajh gayi. Woh khadi khadi mand-mand muskuraane lagi. Veer khada hua aur Kavita ka haath pakad kar doosre room mein le jaane laga. Par ab Aarav ko hi darr lagne laga. Ab uski mummy ki pitai hone wali hai. Jaise hi door band hua, Aarav door knock karne laga.

Aarav: Are rehne do Baba. Are humaari mummy hai. Baba... Baba...

Par ab kya faayda. Uske papa uski mummy ko doosre room mein le gaye. Aisa pehle bhi ho chuka tha. Kavita room se "aa aa aa aa" ki awaaz karti, aur baad mein rone tatha usse rooth jaane ki acting karti. Aarav guilty feel karne laga. Woh turant window ke paas bhaaga.

Chhote chhote kadamo se badi mushkil se Aarav upar uth paaya. Window ko dhakela. Par window bas thodisi khuli. Aarav ne andar dekha to vah hairaan reh gaya. Darasal waise to andar ka mahaul rangeen tha. Kavita apne pati par sawar thi. Aur upar niche ho rahi thi. Par Aarav ko kuch aur hi samajh aaya.

Aarav: "Are...... ee ka ho raha hai. Baba to bade sher ban rahe the. Ab hamri amma se hi pit gaye.

Darasal Aarav ko sirf shadow dikhai de rahi thi. Kyon ki din ka waqt tha. Aur Aarav, Kavita aur uske pichhe bhi ek aur window thi. Jo bahar ki taraf thi. Halaanki vo bhi band thi. Par glass ke us paar se safed ujala aa raha tha. Isi liye Aarav ko sirf aakaar samajh aa raha tha. Jab Kavita apne dono haath apne pati ki ghane baalo wali chhaati par tikaaye mast hokar up down ho rahi thi.

Aarav ko laga uski maa ne apne dono haathon se Veer ka gala dabaya hai. Aur Kavita zoron se Veer ko daboche hue hai. Aarav tension mein aa gaya. Wo ab apne baap ke bachav mein bolne laga.

Aarav: "Eeeee... Kavita. Are chhod chhod. Hamre Baba ko chhod. Are gala mat daba. Mar jaihen.

Kavita ruk to gayi. Par ab use bahut tez hansi aane lagi. Veer bhi hansne laga. Par dono ne munh se awaaz nahi nikali. Kavita aur Veer dono hi samajh gaye ki unka beta Aarav kya samajh raha hai.

Kavita: "(Smile, shararat) Aaj tere baap ko nahi chhodungi. Samajhta kya hai apne aap ko."
Aarav bechara apni maa se apne baap ko chhod dene ki minnat karne laga.

Aarav: "Eee Kavita. Dekh chhod de hamre Baba ko. Dekh ab se homework hum khudai karenge. Are aise mat kuch. Pet phat jayega hamre Baba ka.

Veer bechara mand-mand muskurata afsos karne laga. Kya ho raha hai, aur beta kya samajh raha hai. Kavita ko to bahut zyada hansi aa rahi thi.

Kavita: "(Smile, shararat) Ab to nahi chhodungi. Dekh tere Baba ka saara khoon pee jaungi."
Kavita bolkar apna sar neeche jhukati hai aur Veer ke gale ko chum kar kaat liya.

Veer: "(Dheemi awaaz) Are mat sata use. (Cheekh) Aaah sssss..."

Kavita ne kaatne ke baad apne hothon se Veer ke hothon ko lock kar diya. Aarav ko laga ki sach mein uski maa uske baap ka khoon pee rahi hai, jaise vampire kisi insaan ka khoon peete hain.

Aarav: "E e e dekh Kavita aisa mat kar. Are mar jayega mera Baba. Dekh chhod de nahi ta hum Nana ke sar patthar maar phod deb.

Aarav ne apne baap ko bachane ke liye apni maa ko dhamki de di. Chhod de, nahi to patthar maar kar tere baap ka sar phod dunga. Wahan kiss karte hue dono ne apna kaam khatam kar diya tha. Un dono ko jo chahiye tha, wo mil gaya.

Kavita: "Achha achha. Tu ro raha hai. Isliye hum abhi chhod rahe hain. Par yaad rakhna tum dono baap-bete, agar koi shaitani kari to hum tumhe chhodenge nahi. Boojhe ka???"

Aarav: "Are haan haan. Ab chhod uka.

Kavita: "(Smile, shararat) Theek hai theek hai. Ab jao. Hamre liye ek glass paani lao.

Aarav bechara chup-chaap paani lene chala gaya. Kavita aur Veer ne apne aap ko durust kiya. Veer us room se pehle nikla aur Kavita baad mein. Jab Kavita room se nikli, usi waqt Aarav paani ka glass lekar pahunch gaya. Aarav ne dekha ki uski maa ke hothon par laal-laal nishaan hain. Pure lips bigde hue hain. Darasal wo lipstick Kavita ke hothon par phail gayi thi, par Aarav use khoon samajh raha tha.

Aarav: (gussa) Hamre baba ka khoon pee gayi. Khooni khooni ho tum.

Kavita ko itni zor se hansi aayi ki wo apne aap ko rok nahi paayi, jis se Aarav aur zyada chid gaya. Wo gusse me apne baap ke paas jaakar khada ho gaya. Dono haath kamar par aur ghoorte hue half pant me Aarav bahut pyara lag raha tha. Jaise usne apne baap ki chori pakad li ho.

Aarav: (gussa) Pita gaye. Bahut sher ban rahe the. Ab roz hamre hisse ka doodh tum piyoge.

Veer bechara apni muskaan chhupaye daaye-baaye dekh raha tha, jaise use sharm aa rahi ho. Jab Aarav ne doodh ka bola to Veer ne seedha saamne khadi apni patni ke joban ki taraf dekha. Tabhi phone ki ghanti baji.

Kavita: (Aarav se) Nahi... ab tum dono baap beton ko roz double doodh peena padega. Ab jao jaakar phone uthao.

Aarav phone tak jaate-jaate gusse se apne baap ko dekhta hai.

Aarav: (gussa) Ab tumhre chakkar ma hame dui (2) gilaas (glass) peena padega. Hummmmm.
Veer aur Kavita mand-mand muskurate. Unhe ab bhi bahut hansi aa rahi thi. Wo jaakar phone uthata hai.

Aarav: Hello... haa pranaam Bua ji.

Kavita ekdam tezi se phone tak pahunch kar lapak leti hai. Kahin apni nanad Babita ke saamne Aarav ghar ki pol na khol de. Veeru se 4 saal chhoti Babita ki shaadi Veeru ki shaadi ke 5 saal baad hi ho gayi thi. Veeru ki umr ke Suraj Mishra ke saath, jo rehne wale to Gorakhpur ke the, par wah Lucknow me shift ho chuke the. Suraj Lucknow police daroga the.

Kavita: (smile, shararat) Haa nanad rani. Ka nandoi ji tuhaar pet phulai diye ka, jo aa nahi rahi ho.

Kavita: (smile) Achha bhaiya tumhare. Haa haa aa gaye hai. Tabhi... koi baat nahi. Aaiye aaiye. Hum to tuhaar kuch lagat naikhe. Aawa aawa.

Aarav aur Veer dono bas Kavita ko hi dekh rahe the. Unhe Babita ki awaaz nahi sunai de rahi thi. Kavita aur Babita dono nanad-bhaujai aapas me saheliyon ki tarah rehte the. Dono me bahut pyaar tha aur dono hi ek doosre se hansi mazaak karte rehte.

Kavita: (smile) Are bhaiya se milne ke liye hi sahi, aao to.

Kavita: (smile) Achha oke oke.

Kavita ne phone rakh diya aur Veer ki taraf dekha.

Kavita: (smile, shararat) Nanad-nandoi ji aa rahe hai. Main taiyari kar leti hoon.

Kavita kitchen me chali gayi. Veer Aarav ke saath khelta raha. Kuch ek ghante baad doorbell baji aur Aarav ne bhaag kar door khola.

Aarav: (smile, excited) Bua.....

Aawaaz sunkar Kavita bhaag kar aayi. Nanad aur nandoi ka khoob swagat hua aur saare hall me hi jama ho gaye.

Babita: Bhaiya, main Aarav ko kuch din le jaaun??? Uske bina mera man nahi lag raha???

Babita aksar Aarav ko Saturday-Sunday apne ghar le jaati. Par kuch hafton se wo aa nahi pa rahi thi, kyunki Aarav ki pariksha thi. Par Kavita ne kuch aur plan bana rakha tha.

Kavita: Par kal to hum uske nana ke yahan ja rahe hai. Bahut time ho gaya Papa se mile.

Tabhi Kavita aur Veer ka bhaanda phootne wala tha.

Aarav: Are Bua... Papa se kahe poochh rahi ho. Mummy se poochho.

Babita samajh gayi. Zaroor daal me kuch kaala hai. Usne dekha Kavita ke chehre par smile ke saath thodi sharm aur shararat hai. Wo turant Kavita ko baahon me jakad leti hai.

Babita: (smile, shararat) Are ruka bhauji. Aise kaise....

Nanand ke jaise nandoi Suraj bhi mazaak masti mein khud aage the. Wo aage badhkar Aarav ko godi mein utha lete hain.

Suraj: (smile) Wo kyon beta.

Kavita zyada sharmaane lagi. Veer muskuraate hue apne maathe par haath rakh deta hai. Aur Aarav ne bhaanda phoda.

Aarav: Are phuphaji.... Baba ki chalti kahan hai, aaj to Kavita ne Baba ko khoob peeta hai.
Sabhi hansne lage.

Aarav: Zara hame neeche utaariye.

Suraj ne Aarav ko god se utaara. Aarav neeche zameen par baith ke koodne laga. Wo Kavita ki position bata raha tha, jo usne dekha aur samjha.

Aarav: Aisan kudde rahi Kavita. Hamre Baba pe. Aur ek baar to hamre Baba ke khoon bhi pee hai.

Sooraj aur Babita turant position dekh kar samajh gaye ki kya ho raha hoga. Wo Aarav ki acting dekh kar bahot joro se hase. Kavita to sharm ke maare laal ho gayi.

Babita : (smile, shararat) Bahut zor ke kudi hongi teri amma na???

Aarav bhi samajh se anjaan. Wo bhi mirch masala bhar ke bata raha tha.

Aarav : Are...... bahut zor ke. Baba ka to awaaze nahi nikal pa raha tha. Saans phule rahi. Par Kavita ke to bilkul koi daya bhaav nahi.

Saare aur zyada zor se hase. Kavita ki to haalat hi kharab ho gayi. Nanand nandoi ke saamne. Sooraj ne bhi apne seedhe saadhe saale Veer ki khoob khichai ki. Sabne khana khaya. Aur haste khelte kaafi waqt saath bitaya. Aarav apni naani ko pasand nahi karta tha.

Use apni bua se bahot pyaar tha. Isi liye usne zidd ki aur wo Babita aur Sooraj ke saath do din ke liye chale gaya. Unke jaate mahaul ek baar phir rangeen ho gaya. Unhe to bas mauka hi chahiye tha. Ab to dono hi ghar me akele the. Par is baar Kavita ne khud maano Kaamdevi ka roop dhaaran kar liya ho.

Jab tak door band na hua tab tak koi jaldbaazi nahi. Apni nand ke pyaare meethe tano ko sunti rahi. Par jaise wo gayi, usne door close kiya. Ekdam jhatke se palti.

Kavita : (smile, shararat) Achha... gunaah tuhu kara. Aur saza humka. Abke tohe naahi chhodab.

Pichhli baar pahal Veer ne ki. To is baar Kavita ne maano attack hi kar diya. Veer sofa par baitha wo bhi door band hone ka intezaar kar raha tha. Par Kavita to door band karte uspar hamla hi bol di. Bhaag kar Veer par kood gayi. Seedha uski godi me. Veer ke chehre ko dono haathon se thaam hothon se honth jod diye. Jaise chumban se hi jeet haar ka faisla hoga. Shaadi ke baad dono me hi kaafi badlaav aaya tha.

Veer shaadi ke waqt aur zyada balisht ho gaya tha. Height body dono hi aur zyada badh gayi. Chehra bharavdaar hua to aur zyada smart handsome ho gaya tha. Wahi Kavita kishori se sampoorn naari ban chuki thi. Joban bhaari ho chuka tha. Kavita to pehle se sundar thi. Ab aur zyada nikhaar aa chuka tha. Dono me pehle se zyada bada dangal hua.

Is baar bedroom tak jaane ka dono me se kisi ko mauka nahi mila. Shareer ki garmahat ne badi tapas ka roop le liya. Par toofaan tham jaata hai. Wo bhi tham gaye. Dono ek doosre ki baahon me. Nagn shareer dono sofa par hi ek doosre ko jakde hue. Kavita is baar bhi upar thi. Jo ki har biwi top par hi hoti hai. Mahaul kuch pal shaant hua.

Veeru : Ektho baat bole.

Kavita : Are ek ka sau bola. Hum sun rahe hai.

Veer : Pata hai.... jab kisi jode ka shaadi hota hai. Wo suhagraat maante hai.

Kavita : Haa hamra bhi hua tha. Bhool gaye. Hum tumko apna bharjinity (virginity) diye the.

Veer : Are u to hum bhi diye the. Baat oo naahi hai. Baat yeh hai ki ek fauji har saal jab bhi chhutti aata hai. Har baar suhagraat manaata hai.

Kavita Veeru ki chaati par sar tikaaye hue thi. Wo sar upar uthaakar Veeru ki aankhon me dekhti hai.

Kavita : Bilkul sahi kahe ho. Hume koi phool mala gadda bichhone ka zarurat naahi. Bas hum ek doosre se mil jaaye. Har baar pehle milan ka ehsaas. Sahi kahe na???

Veer : (smile) Bilkul. Are samajhdaar ho. Tabhi to hume mili ho.

Kavita : (smile) Are Kavita Shukla naam hai hamra.

Veer : Pandey.

Kavita : Haa matlab ab Kavita Shukla Pandey. Par ii baal bahot chubta hai. Daadhi kahe nahi banaaye.

Veer : Are do din raaste ma. Ab kahe banaaye.

Kavita : Tab ka sasuraal aise jaaoge. Kono saali dekhega to ka kahega. Ab hum banaayenge tumhe chikkan. Kaha hai tumhra razor??

Veer hasne laga.

Veer : (smile) Hamre bagma hai. Shaving kit. Jao le aao.

Dono poori tarah se nagn the. Kavita Veer ke bag se shaving kit le aayi aur Veeru ke saamne khadi ho gayi. Patni devi ek baar phir saakshaat Kaam Devi ka roop le chuki thi. Paas me aadha glass paani pada hi hua tha. Usi se Veeru ka chehra geela kiya. Aur brush ki bajay apne haathon se hi malke cream lagaai. Phir razor uthaaya.

Veeru : Are dekhna. Lag na jaaye.

Kavita : (smile, shararat) Are babu tumhri god ma baith kar banaayenge. Kahe ghabra rahe ho.

Veeru bas hansa. Kavita waisi hi position me Veeru ki god me baith gayi. Kavita chehre ke kareeb bade pyaar se razor chalaati hai. Par thoda phisal rahi thi.

Veeru : (smile) Are phisal rahi ho. Jab tak khute se gaiya bandhegi nahi. Ek jagah tikegi nahi.

Matlab aap samajh hi gaye honge. Kavita waise hi saavar ho gayi. Dono ko mausam banaate time kaha lagta hai.

Kavita : Sssssss la. Ee la ta.

Kavita sarak to ab bhi rahi thi. Par ab upar khisakne me maza zyada aa raha tha. Dheere dheere poori shaving ho gayi.

Kavita : (smile, shararat) Ab bane ho. Ekdam chikkan.

Dono ne adhoora kaam teesri baar poora kiya. Raat dono ne saath bitaai. Aur subah hote jald hi bus pakad li. Kavita ke mayke aur Veer ke sasuraal ke liye. Kuch do teen ghante ka safar tha. Subah 8 baje tak dono Kavita ke mayke pahoch gaye. Waise to Kavita ka mayka Allahabad ke baahari hisse me tha. Highway se utaarkar Kavita ke mayke jaane wale raaste ke ird gird subah 10 baje tak sabzi mandi lagti. Veer aur Kavita bus se utaarkar usi raaste par chal diye.

Kavita bas thodasa aage chal rahi thi. Uske haath me suitcase tha. Wahi Veer peeche uske paas bhaari bag tha. Veer ne dekha ki ek do thele se do teen budhiya apna thela chhod Kavita ki taraf tezi se aayi. Aur Kavita ko ird gird gherkar naachne lagi. Jaise Kavita ko taana maar rahi ho.

Budhiya 1 : Hmmmm pehle badi kudat rahi. Bada fudakti thi. Ab ka hua. Kahe ekdame shaant ho gayi.


Veer ne dekha ki Kavita muskurati, ekdam shaant, niche dekhte hue dheere-dheere chal rahi thi. Veeru ko yeh samajh aa gaya ki Kavita sab ki pehle bhi favorite thi. Woh do-teen budhiya Kavita ke maze leti rahi.

Budhiya 2: (Smile) Are gaiya ab khute se jo bandh gayi. Ab dekho, kaise sharma rahi hai.
Bolte hue us budhiya ne Kavita ki thodi pakad li. Kavita ne dheere se kaha, "Woh pichhe hai." To woh teen budhiya pehle Veer ko dekhti hain. Unke dekhne se hi Veer ko andaza lag gaya ki unki nazrein thodi kamzor hain. Woh teeno budhiya muskurayin aur Veer ke paas aayin.

Budhiya 3: Wah bada sundar hai. Nazar na lage hamri.

Woh teeno budhiya Veer ki nazar utarne lagi. Kavita ghoom kar unki taraf dekhti hai. Veer ne bhi gareeb-si dikhne wali teeno budhiya ke paon chhue. Yeh Kavita ke liye dil jeet lene wala nazara tha. Tabhi motorcycle ki awaazein aayin. Budhiya aur Kavita ne us taraf dekha. Do motorcycles par 4 ladke race de-dekar sab ko pareshan kar rahe the. Tabhi ek ladke ki nazar Kavita par gayi.

Ladka: Abe Jhansi ki Rani, bhaag bhaag....

Un ladkon ne turant apni motorcycles ghuma li. Kavita apna suitcase wahi sadak par chhod do-teen kadam aage aayi aur jaise dhamki dene lagi.

Kavita: Abe Kavita Shukla naam hai hamara.

Tabhi Kavita ko yaad aaya ki uska pati pichhe hai. Woh ghoom kar dekhti hai. Veer bas muskurra raha tha. Kavita haath hilate hue baaki line bolti hai.

Kavita: Aur Pandey bhi.
(Smile) Saale school ma hamre junior the. Faltu mein yahan badmaashi karte hain.

Veer ko badi zor se hansi aayi. Kavita sharma gayi. Kuch boli nahin. Bas suitcase uthakar tezi se chalne lagi. Veeru samajh gaya ki Kavita ka aatank school mein bhi raha hoga. Woh ladke mandi mein sabko pareshan karte honge aur Kavita se darte honge. Kuch door chalne par road par gate aaya, jis par Veer ke sasur ke naam ki nameplate lagi hui thi: Dayashankar Shukla, PWD. Woh dono gate se andar ghuse aur Kavita ne awaaz lagayi.

Kavita: Eee Dayashankar! Abe kahan ho be!

Veer jaanta tha ki Kavita apne baap ko kabhi Shukla to kabhi unke naam se bulati thi. Dono baap-beti dost ki tarah rehte the. Dayashankar ko pata tha ki beti aur damaad aa rahe hain, isliye unhone chhutti le li thi. Woh aaye. Kavita aur Dayashankar dost ki tarah hi mile.

Wahi Veer ne apne sasur aur saas ka aashirvaad liya. Uski saas Kavita ki maa ko pehle ki tarah hi Kavita ka ravayya pasand nahin aaya. Aur woh Kavita ko daantati gayi. Par Kavita nazarandaaz karti gayi. Veer ke bhaari bag se sab ke liye tohfe the, jo de diye gaye. Din bahut achha gaya. Par Kavita ko to shaam ka intezaar tha. Wahi Veeru shaam ke liye hi darr raha tha.

Ek baar to woh sharminda ho chuka tha. Ab koi naya kaand na ho jaaye, uska darr tha. Kavita ke mayke upar terrace par ek room bana hua tha, jisme Kavita aur Veer dono ko rukna tha. Aur Kavita ne wahi khule aasmaan ke neeche hi program karne ka socha tha.

Shaam hui aur dheere dheere raat. Kavita ki maa Sarita Devi ne Kavita aur damaad ko bhojan karne pukara. Par Kavita ne mana kar diya aur kaha ki unhe late khane ki aadat hai. Veeru bechara Kavita ko ghoor ke dekhta hai aur sochta hai ki yeh is kaand ka bill bhi uske sar hi phaadne wali hai, agar sab shaanti se na hua to.
Waise Kavita ne kabhi drink nahin kiya tha. Uska pehli baar tha. Veer soch raha tha ki agar badboli Kavita ko chadh gayi to kya hoga. Woh pehle se hi badboli hai. Peene ke baad kya kya karegi. Wahi Kavita bahut excited thi. Woh dono upar wale room mein the.

Kavita: (smile, excited) Ayee... nikalo na kala kutta.

Kavita Black Dog daaru ki bottle nikalne ko keh rahi thi. Aur Veer ka darr badhne laga, kyunki biwi maan ne wali to thi nahin.

Veer: Are ka bottle se muh lagakar seedha piyogi ka. Glass vagairah kuch to nahin hai.

Kavita sirf shararat se muskurayi. Aur usne usi room se glass ka poora set nikala, jisme poore 6 glass the. Itna hi nahin, 3 bowl nikle. Ek mein bhune kaju badaam, doosre mein bhune chane aur teesre mein salad tha.

Kavita: (smile, shararat) Ka bud bak samjhe ho ka. Ab chala bahar.

Kavita sab samaan lekar room se bahar terrace par aa gayi. Veeru bechara bottle lekar bahar aaya. Par bahar ka nazaara bahut achha tha. Aasmaan saaf tha. Taare timtima rahe the. Bahut badhiya hawa chal rahi thi. Veer terrace ke kinaare aaya aur deewaar par haath rakhte hue neeche dekha. Uske sasur Dayashankar ghar ke bahar chhote se garden mein chair daalkar baithe the.

Kavita: Are iha aawa na. Uha kya kar rahe ho.

Veer bechara Kavita ke paas aaya. Kavita ne terrace par niche hi dari bichha di. Dono baith gaye. Veeru Kavita ko dekhte raha. Kavita se bardas nahi hua.

Kavita: Are banao yaar. Hame thode na aata hai.

Veeru ne socha, chalo jo hoga dekha jayega. Veer ne botal kholi, bhog lagaye aur bilkul light-light do peg banaye.

Veer: Uthao. Aaj pahli baar patni devi ke saath. Cheers.

Kavita khush ho gayi. Uski bas ek fantasy thi ki ek baar apne pati ke saath wo sharab piyegi aur khoob natak karegi, jo ki poori bhi ho rahi thi. Dono ne apna-apna peg khatam kiya. Fauji kitni bhi badhiya sharab ho, wo ek hi baar mein peete hain. Veer ne waisa hi kiya, par Kavita bhi poora kheench gayi. Black Dog hone ke bawajood usne apna muh bigaada.

Kavita: Ooohoook, eh ka cheez hai be. Saala dawaai jaisa lag raha hai.

Veer kuch bola nahi, bas hansa.

Kavita: Banao ek aur.

Veer Kavita ko ghoor ke dekhta hai. Kavita hansne lagi. Par Veeru ne doosra peg bana diya. Veeru ne kaju uthaya aur khane hi laga ki Kavita ne uske haath ka kaju kheench liya.

Kavita: Ka lagta hai, ee chadhegi???

Veeru: Hmmmm, pata nahi.

Kavita: To chadhao. Hame nasha nahi ho raha.

Veer bechara chup raha. Par Kavita doosra bhi peg kheench gayi. Veer ne jaan-boojhkar teesra nahi banaya, halaanki usne dono peg bahut zyada light banaye the.

Kavita: Ae... dekho. Yeh hamra sapna tha. Tum darna nahi, theek hai. (Smile) Mera darling...

Kavita Veeru ka gaal chum leti hai. Ab Veeru ko vishwas ho gaya ki Kavita ko chadh rahi hai, kyunki Kavita ne hamesha "Aji Oji", "Aarav ke Papa" kahkar hi pukara tha. Kavita ne Veer ko pahli baar darling kaha. Ab use Kavita ka wo roop dekhna tha. Use bhi maza aane laga. Usne ek regular peg banaya, halaanki uska doosra khatam nahi hua tha.

Kavita: Achha... ek tho baat bataye...

Veeru: Hmmmm...

Kavita: (Smile, nasha) Tum na... maal ho. Ekdam chikkan. Saala mera kya, meri dost ka bhi tumhe dekh kar niyat badal jaata hai.

Veeru muskurane laga. Uski biwi khulke uski tareef kar rahi thi.

Kavita: Tum jaante ho..... agar hum Kavita na hote na, to hum tumhare liye Kavita ka hi murder kar dete. (Smile) Par tum.... tum sach me maal ho.

Veer ke face par smile aa gayi. Usne apna peg khatam kiya aur apna teesra peg banane laga. Kavita ne apna glass uthaya aur aage kar diya. Veer ne Kavita ko ghoor ke dekha.

Veer: Nahin.. ab nahin. Bas tumhara ho gaya.

Kavita jhoomne lagi thi.

Kavita: Abe yaar do na yaar. Abhi to humne thodisi bhi bakwaas shuru nahin ki. Bahut bolna hai hume tumse.

Veeru hans pada, to Kavita bhi hanste hue apna sar Veeru ke kandhe par tika leti hai.

Veer: Bolo... kya bakwaas karni hai???

Kavita: Ammm... tum hena.... ammmm maal ho maal.

Is baar Veeru ne maatha peeta. Wo samajh gaya ki ab yahi recording chalegi. Tabhi unhen Kavita ki maa Sarita ki awaaz sunaai di, jo shayad Kavita ke baap ko daant rahi thi.

Sarita: Bas uhaha baithe rahiyega. Kuch poochhiyega nahin ki samasya ka hai.

Apni maa ki awaaz sunkar Kavita khadi hui. Use Veer ne sahara dene ki koshish ki. Par Kavita us se pehle hi khadi ho gayi. Wo terrace ke kinare khadi hokar niche apne baap ko dekhti hai.

Kavita: Aeee... Dayashankar.

Unhone pehle daae baae dekha. Phir upar. Dekha beti mast maula bani unhe upar aane ka ishaara kar rahi hai. Kavita ki maa ne bhi yeh ghar ke andar se suna. Aur wo zoron se Kavita ki burai karna shuru kar deti hai. Par Kavita aur uske papa dono ki hi aadat thi sab nazarandaaz kar dete. Wo nazar churaate upar aane lage. Kavita Veeru ke paas aayi.

Kavita: Ae suno. Hamre baba aa rahe hain. Unhe ek do ghunt pila dete hain. Hum jo bhi bolenge, tum bas hamra saath dena.

Veeru soch mein pad gaya. Kavita karna kya chahti hai. Tabhi Kavita ke papa upar aaye. Aur mehfil dekh kar thode hairaan hue.

Kavita: (Madhosh, smile, bindass) Are aawa aawa Shuklaji aawa aawa. Baitha...

Dayashankar baith gaye. Kavita ne Veer ko sar jhatak kar aise ishaara kiya, jaise Veer Kavita ka follower ya right hand ho. Veer ne peg bana diya.

Dayashankar: Are nahin nahin damaadji. Hume aadat nahin.

Kavita ne khud hi botal kheenchhi aur apne glass mein daalne lagi.

Kavita: (Smile, bindass) Are aise kaise.... Aaj hi to mauka hai. Sher jagane ka.

Veeru ne Kavita ka haath pakad liya. Use zyada nahin lene diya. In sab mein wo khud peena bhool gaya. Dayashankar kabhi kabhi chupke se ek do peg pee lete the.

Kavita: Chalo uthao...

Dayashankar ne pehle damaad ko dekha. Aur phir peg utha liya. Aur jaldbaazi mein ek hi baar mein bina paani ke pee gaye. Kavita ki asli bakwaas shuru hui.

Kavita: Haan to hum kya kahe rahe the Dayashankar...

Dayashankar: Hmm kya???

Kavita: (Bindass) Yaar..... ye..... biwiyon ko haina, kaabu mein rakhna chahiye.

Dayashankar samajh gaye ki unka damaad kya jhel raha hai. Wo wapas Veer ko dekhte hain, aur phir Kavita ko. Kavita bolte hue janghon par taal bhi thokne lagi.

Kavita: Ab hume hi dekh lijiye. Hamari himmat hai ki hum inke saamne kuch bol jaayein.

Kavita apne papa ki taraf thoda jhuki aur apna haath dikhane lagi, jaise bahut khaas khulasa kar rahi ho.

Kavita: Ek hi thappad mein hamra munh ghuma dete hain.

Kavita ke papa ne Veeru ki taraf dekha, jaise dono ishaaron mein baatein kar rahe hon. Veer halka sa naa mein sar hilaata hai. Dayashankar Veeru ki haalat par thoda muskuraaye, jaise kehna chahte hon — maine to apni sardardi tujhe thama di, ab bhugat. Kavita Veer ki jangh par haath maarti hai. Veeru jaise hosh mein aaya ho.
Veeru: Ammm bilkul... bilkul.

Kavita: (Veeru ki taraf) Abe tum rehne do yaar. Tumhara kaccha tak to hum kharid kar laate hain.

Kavita ne apna face apne baap ki taraf kiya.

Kavita: Haan to hum kya kahe rahe the???
Dayashankar: Biwi ko kaabu mein rakhna chahiye.

Kavita: (Aankhen band, mast, smile) Biwi ko kaabu mein rakhna chahiyeyeye....

Kavita ne phir Veer ki taraf dekh kar ishaara kiya, jaise kehna chahti ho ki ek aur peg banao. Abhi hi mauka hai. Par ishaara bhi aisa ki uska baap sab dekh kar samajh jaaye. Veer ne is baar teeno ke peg banaaye aur ek khud bina paani ke gatak gaya.

Dayashankar ne Veer ki peeth thapthapaayi aur apna peg ek jhatke se kheenchkar khade ho gaye. Wo turant niche chale gaye. Veer ne bhi apna peg khatam kar diya. Tabhi niche se Kavita ki maa aur uske papa ke jhagde ki awaaz aane lagi. Veer Kavita ko chhodkar nahin jaana chahta tha.

Par Kavita khud uthkar niche jaane lagi to Veer ko bhi uske peeche jaana pada. Kavita ko dekh kar uski maa Sarita zyada bhadak gayi. Wo suna Kavita ko rahi thi, par bol apne pati ko rahi thi.

Sarita: (Gussa chillaakar) Kal tak is ghar mein cigarette aayi. Aaj sharaab aa gayi. Ab kal jua bhi khelne lagoge. Ab bas randikhana kholna baaki...

Sarita ke munh se yeh sab sunkar Dayashankar ko gussa aa gaya aur apne jeevan mein pehli baar apni patni par haath utha diya. Chatak karti awaaz poore room mein goonj uthi. Kavita aur Veer to ekdam shock ho gaye. Poore room mein sannata chha gaya. Sarita apne gaal par haath rakhe hairani se apne pati ko dekh rahi thi, aur Dayashankar apni nazrein ghumaakar stabdh khade hi reh gaye. Kavita ko nasha ho gaya tha.
Par kya hua use yeh samajh aa raha tha. Wo munh khole jaise samajhne ki koshish kar rahi ho. Kuch pal shaanti ke baad Sarita tezi se apne room ki taraf jaane lagi.

Sarita: (Gussa) Ab hum is ghar mein nahin rahenge. Ja rahe hain hum.

Wo kuch hi pal mein ek jhola tayyar karke aa gayi. Par use Dayashankar ne rok liya.
Dayashankar: Ruko Sarita... meri baat suno..

Sarita: (Gussa) Hato mere raste se. Zindagi mein pehli baar aaj aap ne mujhpar haath uthaya hai. (Kavita ki taraf haath dikhate) Wo bhi aisi charitraheen aulaad ki wajah se.
Pehli baar jhagde mein Veer ne munh khola.

Veer: Aap kaise Kavita ko charitraheen bol sakti ho??? Sirf usne cigarette aur sharaab pi. Is wajah se???

Sarita: Dekho damaad ji. Ladkiyon ko yeh sab shobha nahin deta.

Veer: Aur ladkon par to yeh sab jachta hoga. Waah... Aap ek aurat hokar yeh kyon nahin samajh rahi ki ladka ladki dono mein koi bhed nahin. Aur cigarette peena, sharaab peena buri aadat ho sakti hai. Bura charitra nahin. Chahe wo ladka ho ya ladki.

Ek pal ke liye wahan phir shaanti chha gayi. Kavita munh khole paagal ke jaise dheere kadam se Veer ki taraf aayi aur Veer ki nazar utaar li.

Kavita: (Full nasha) Mast bola hummmmm.. bahute bahute mast.

Kavita ki theek se aankh bhi nahin khul rahi thi. Par uske aise waqt mein aisi harkat dekh kar Veer ko hansi aa gayi. Usne Kavita ko baahon mein bhar liya.

Veer: Kavita ko mujhse milne se pehle papa par bharosa tha. Unke bharose Kavita ne jeevan mein pehli baar cigarette pi. Wo halaanki ab bhi peeti nahin hai. Phir uski zindagi mein main aaya aur usne mere bharose jeevan mein pehli baar sharaab pi. Kyonki use pata hai uske pita aur pati use kuch hone nahin denge. Use jo bhi karna ho, wo karegi. Uske saath main hoon. Har waqt.

Sarita ko apni galti bhi samajh aayi. Uski soch par use afsos hua. Wo khamosh thi. Tabhi Kavita dheere dheere uske paas pahunchi aur aise boli jaise wo gupt gyaan de rahi ho, lekin use sabne hi sun liya.

Kavita: (Nasha) Ae... Aee Sarita. Pati ko kabhi jaane ki dhamki nahin dena. Warna wo khush ho jaayega. Pati ko jo haina.... sssssss.. kheench ke rakhna chahiye. Ekdam kaabu mein.

Kavita ki baat sunkar sabhi bahut zor se hans pade.


The End
 
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rhyme_boy

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बीवी ने पी शराब. माहौल हुआ लराब
हिंदी भाषा भोजपुरी टोन


घर का काम करते कविता की नजर बार बार घर के लेंडलाइन फोन पर जाती. घर की डोरबैल बजी और तुरंत कविता ने भाग कर फोन उठाया.


कविता : (एक्साइड) हेलो... कहा पहोचे???


पर सामने से कोई रिप्लाई नही. फिर भी बैल की आवाज लगातार सुनाई दे रही थी. कविता ने डोर की तरफ देखा. तब जाकर खयाल आया की यह तो घर के डोरबैल की आवाज है. कविता को जैसे गुस्सा आ रहा हो. वो तेज़ी से डोर की तरफ बढ़ी और झटके से डोर खोला. सामने पोस्टमैन था.


कविता : (झल्ला कर) क्या है. क्यों इतनी बार बार घंटी बजाए जा रहे हो???


पोस्टमैन : अरे मैईडम(मैडम) अपना डाक तो ले लीजिये. कब से बजा रहे है. कोई खोल है नही रहा था.


कविता : लाइए. दीजिये.


कविता ने डाक ली. और खोल के देखा तो LIC की किस्त भारी. उसकी रसीद थी. जो पोस्ट के जरिये आई थी.


पोस्टमैन भी एटीट्यूड दिखाते कविता को देखते चले गया. कविता ने जैसे ही डोर क्लोज किया. उसी वक्त लैंडलाइन फोन पर घंटी बजी. कविता एकदम चहक कर फोन की तरफ भागी. और लपक कर फोन उठा लिया.


कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हेलो.... कहा पहोचे???


कविता और वीर की शादी को 8 साल हो गए थे. दोनों की मुलाक़ात ट्रैन मे हुई थी. दोनों मे कुछ ऐसी केमिस्ट्री बैठी की बात शादी तक पहोच गई. वैसे शादी तो लवमैरिज थी. पर कई जुगाड़ लगाने के बाद उसे अरेंज मैरिज मे तब्दील किया गया. शादी की पहेली रात मे ही दोनों ने एक दूसरे को अपना कोमर्य सौंपा.

और एक ही साल मे बेटे आरव ने जन्म ले लिया. जी हा. कविता और वीर की एक लौती औलाद आरव पांडे. जो अब 7 साल का हो चूका था. कविता के पिता दायशंकर शुक्ला PWD मे कार्यरत अब रिटायर होने की कगार पर थे. माँ सरिता सुल्ला ग्रुहिणी थी.

कविता की माँ सरिता शुक्ला थोड़े पुराने खयालात की थी. बेटी बहु को अनुसासन मे रखना उन्हें ज्यादा पसंद था. बेटा कोई था नही तो बहु भी नही. पर बेटी कविता कभी उसके काबू मे नही आई. वह अपने चंचल चित्तवन से उड़ती ही रही. वही वीर की माँ उर्मिला उसके बचपन मे ही चल बसी थी. वही पिता सतेंदर पांडे की मृत्यु कुछ 6 साल पहले हुई थी. कविता बार बार टेलीफोन को इसी लिए ताक रही थी. क्यों की जनाब वीर छुट्टी के लिए निकल चुके थे.

कविता ने वीर को सख्त हिदायत दी थी की वो कहा पहोचे. पल पल रिपोर्ट देते रहे. ट्रैन मे रात मोबाइल की बैटरी कम होने की वजह से वीर ने आखरी कॉल बीती रात 9 बजे किया था. बाद मे फोन स्विच ऑफ कर दिया. पर सुबह 11बजे के आस पास वीर अपने स्टेशन पर उतर गया. घर आने के लिए वीर बस मे बैठ गया.

रस्ता कुछ एक डेढ़ घंटा लम्बा था. एक फौजी जब घर आता है. तब उसके जज्बात अलग ही होते है. दिल मे बेचैनी और घर पहोचने का उतावलापन. बस मे बैठे वीर को भी यही सब महसूस हो रहा था. चुप चाप बैठे वीर को अलग अलग रंगीन खयाल आ रहे थे. बैठे बैठे वो मुस्कुरा रहा था.

वीर से रहा नही गया. और जेब से अपना कीपैड वाला मोबाइल निकाला और स्विच ऑन कर फोन लगा देता है. बस दो बार ही घंटी बजी. और तुरंत कविता ने फोन उठा लिया.


कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हेलो.... कहा पहोचे???


वीर : अरे यार अभी एक घंटा लगेगा. बस अभी ही चला है (भोजपुरी टोन)


कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हमरे लिए एक ठो काला कुत्ता लिए हो ना. (ब्लैक डॉग विस्की)


वीर : अरे यार का तुम भी. हा लिए है.


कविता : अरे कमाल करते हो पांडेजी. तुमहाई तो बोले थे. एक बार हम दुनो साथ मिलकर पिएंगे. अब कहे फट रहा है. यहा नही. आपन ससुराल मा चलिहो. उहा रंग जमाएंगे दुनो.


वीर : अरे बाप रे. उहा तो हरगिज नही.


कविता : हम पूछ नही रहे. बता रहे है. अब चुप रहिये. कविता शुक्ला है हम.


वीर : अब पांडे भी.


कविता : हा मतलब कविता शुक्ला पांडे अब.


वीर ससुराल मे कोई भी प्लान बनाने से इस लिए घबरा रहा था. क्यों की कुछ दो साल पहले कविता के मायके वीर के ससुराल मे दोनों ने एक सेक्सुअल गेम खेला था. जिसमे कविता ने अपने ऊपर वाले कमरे मे वीर को बांध रखा था. वीर सोले फ़िल्म की बसंती की तरह सिर्फ अपने कच्चे मे बंधे हुए थे. और कविता ने कैट मास्क वाला फुल स्किन टाइट कॉस्टयूम पहना हुआ था.

कविता के हाथ एक चबूक भी थी. बडा ही जोशीला और कामुख खेल चल ही रहा था की अचानक धड़ाम से दरवाजा खुला. वीर की सास सरिता शुक्ला अंदर आ गई. और एकदम गुस्से मे झल्लाते हुए उन दोनों को देखने लगी. वो तो पहले से ही पुराने खयालात की थी.

खूब घर मे कविता और उसकी माँ के बिच हंगामा हुआ. पर तब से वीर अपने ससुराल जाने से कतराने लगे. पर बीवी के आगे कौनसे मर्द की चलती है. वीर ने बात बदल दी.


वीर : अच्छा ठीक है. आरव तो घर पर ही होगा. (स्माइल एक्साइटेड) अभी कुछ होगा की नही???


कविता समझ गई की उसका पति किस बारे मे पूछ रहा है. पति के पूछने पर तो वो भी चहक गई.


कविता : (शर्माना, स्माइल, एक्साइटेड) अभी दिन मा. आरव ईस्कूल से अभी आने वाला होगा. रात होने दीजिये पांडेजी.


वीर : (स्माइल, एक्साइटेड) जानती हो कोमलजी. हमरी फौज मा एक चुटकुला बहोत फेमस है.


कविता : (स्माइल, शरारत) तो सुनाइए ना.


वीर : (स्माइल, एक्साइटेड) एक बार फौजी साहब छुट्टी आए. रास्ते मे उन्हेंने कुछ सोच कर एक किलो मूम्फ़ली खरीद ली. वो घर पहोचे तो उसके दोनों बच्चे गुड्डी और मुन्ना पापा पापा करते चिमट गए. फौजीसाहब ने सारी मूम्फ़ली आंगन मे बिखेर दी.


फौजी साहब : लो बच्चो मूम्फ़ली खाओ. मगर एक बार मे सिर्फ एक ही मूम्फ़ली उठाना. वरना गाड़िया मे डंडा डाल देंगे. समझो.


बच्चे बिचारे लग गए एक एक मूम्फ़ली खाने. और फौजी साहब पहोच गए अपनी मैडम के पास. खूब खेल चला. पर मुन्ना बडा शैतान. उसने सोचा पापा कहा गए. वो खिड़की से झाकने लगा. और तुरंत पीछे मुड़कर गुड्डी के पास आया.


मुन्ना : गुड्डी गुड्डी... एक एक उठा. अम्मा ने सायद दो मूम्फ़ली उठाई होंगी. देख पापा कैसे गाड़िया मे डंडा डाल रहे है.


वीर के चुटकुले पर कविता जोरो से खिल खिलाकर हसने लगी. पर मज़ाक मस्ती मे कविता कौनसी पीछे थी.


कविता : (स्माइल, शरारत ) तब तो आप भी मूम्फ़ली ले लीजिये. हम तो दो मूम्फ़ली उठाने वाले है.


वीर कविता के मजाकिया जवाब से एकदम गदगदा गया. की तभि फोन डिस होकर स्विचॉफ हो गया. बेचारे वीर का बहोत जबरदस्त मूड बना था. पर मोबाइल मे बैटरी खतम हो गई. कविता की हसीं रुक ही नही रही थी. फोन कट चूका था. अब उसे पति की याद ज्यादा सताने लगी. वो सोचने लगी की पति के बिना इतना लम्बा वक्त कैसे कटा. सिर्फ पति की यादो के सहारे.

वो साथ बिताए पल. वो किस्से जिनहे याद आते ही चहेरे पर अपने आप स्माइल आ जाती. ऐसे ही कविता हस्ते हुए खामोश हुई. और उन बीते पलों को याद करने लगी. कैसे कविता के साथ रह रह कर वीर भी शरारती हो गया. जब आरव बोलना सिख गया था. वो थोड़ा तुतलाकर बोलता था. जैसे आम बच्चे बोलते है.

कविता किचन से बाप बेटे की बाते सुन रही थी. वीर भी जान बुचकर कविता सुने वैसे बेटे से कुछ ना कुछ बुलवा रहा था.


वीर : सबसे अच्छे पापा किसके है.


आरव : मेले....


वीर : सबसे अच्छा बेटा कौन है??


आराम : मै......


वीर : सबसे सुंदर मम्मी किस की है???


यह सुनते कविता किचन से बहार आई. और अपनी कमर पर हाथ रखे मुस्कुराते बाप बेटों को देखने लगी.


आरव : मेली......


वीर : (शरारत, स्माइल) बड़े दूध वाली मम्मी किसकी है???


बच्चे को क्या पता. उसने तुरंत लम्बी आवाज मे बोला.


आरव : मेली......


आरव का बोलना और कविता का आगे बढ़ना. और उसी वक्त वीर का सीधा वहां से खिसकना. कविता वीर को पकड़ने भागने लगी. यह किस्सा याद आते कविता अकेले अकेले ही खिल खिलाकर जोरो से हसने लगी. तभि डोरबैल बजी. कविता को लगा की सायद वीर पहोच चूका है. और उसे सप्राइस देने वाला है.

वो झट से डोर की तरफ बढ़ी. और डोर खोला तो सामने उसका बेटा आरव खड़ा था. 7 साल का आरव स्कूल ड्रेस पहने हुए. उसकी निक्कर तो घुटने को भी पार कर रही थी. और छोटासा आरव अपनी माँ को गुस्से से घूरने लगा. गुस्से से उसके नाक के नाथूने फूल रहे थे. ऐसे नादान रूप मे वो बहोत प्यारा लग रहा था.


कविता : अंदर आओ. बहार कहे खड़े हो बे.


आरव : (गुस्सा) दहेज़ चाहि तुका. फोरबिलर( फोर व्हीलर) गाड़ी. लालची हो तुम. लालची.


बोल कर आरव अपनी माँ के हाथ के निचे से ही अंदर आ गया. अपने बेटे के प्यारे नाटक को देख कर कविता को हसीं आने लगी. दरसल आरव ने अपनी क्लास टीचर को ही प्रपोज़ कर दिया. और सीधा सादी के लिए पूछ लिया. उसकी क्लास टीचर आरती कविता की बहोत अच्छी दोस्त बन गई थी. अपनी सहेली के बेटे की ऐसी प्यारी हरकत देख कर आरती को गुस्सा नही आया.

बल्की उसे और ज्यादा प्यार आने लगा. आरती ने भी आरव से कहे दिया की पहले अपनी माँ से पूछ ले की वो मुझे अपने घर की बहु बनाएगी?? फिर क्या था. आरव ने अपनी मम्मी कविता से भी जिद्द की के वो अपनी बहु को देखने स्कूल आए. जब कविता को पता चला की उसके बेटे ने उसकी बेस्टफ्रेंड को ही प्रपोज़ कर दिया तो वो बहोत हसीं. और आरव के साथ उसके स्कूल चल दी.
आरती और कविता दोनों मिले. और आरव के सामने एक नया नाटक किया.


कविता : अच्छा.. तो तुम मेरी बहु बनोगी. पर मेरा तो एक ही बेटा है. मै तो दहेज़ लुंगी. एक फोर व्हीलर कार, घर का सारा सामान और 11 लाख नकद.


आरती एक्टिंग करती हुई मुँह लटका लेती है.


आरती : माफ करना... हम बहोत गरीब है. यह सब हम नही दे पाएंगे.


कविता : हम्म्म्म फिर तो मुश्किल है. यह रिस्ता नही हो सकता.


कविता के बोलते ही आरव गुस्से से अपना पाऊ पटकते हुए स्कूल के अंदर चले गया. उसके जाते ही कविता और आरती बहोत हसे. फिर आरती ने कविता से भी बहोत मज़ाक किया.


आरती : चलो बाप ने नही तो बेटे ने तो प्रपोज़ किया. उफ्फ्फ्फ़.


कविता : (स्माइल ) चुप कर साली. जब देखो मेरे पति पर लाइन मरती रहती है. गंडिया फाड़ देंगे हम कह रहे है.


आरती : (स्माइल) अरे तुह से नही. हम तो आपन जीजू से फाड़वाएंगे अपनी गंडिया. का चिक्कन जीजू है हमरे.


कविता हस्ते हुए आरती को दबोचने लगी. ऐसे दोनों मे हसीं मज़ाक हुआ. वही कविता ने डोर क्लोज किया और आरव के सामने खड़ी हो गई.


कविता : इ मुँह काहे फुलाए हुए हो बे. जाओ... जाकर हाथ गॉड धोकर खाना खा लो.


आरव : (गुस्सा) आने दो हमरे बाबा को. तोहर उहि देखिहे.


कविता : जा बे. आपन बाप का धमकी किसी और को देना.


आरव गुस्से से दूसरे रूम मे चले गया. और बहोत जोर से दरवाजा पटक कर बंद कर देता है. कविता उसे देख कर मुस्कुरा रही थी. कुछ मिनट बाद उसके रूम से स्पीकर साउंड की आवाज आई. और गाना बज रहा था. जब दिल ही टूट गया. हम जी के क्या करें.

कविता ने जब गाने के बोल सुने तो वो अकेले अकेले बहोत जोरो से हसीं. कविता ने वीर के लिए बहोत तैयारी कर रखी थी. पर अब उसके पास बस एक ही काम बचा था. इंतजार करना. वो सोच रही थी की कब डोरबैल बजे. और वो झट से दरवाजा खोले. पर अब उस से बर्दास नही हो रहा था. वो खुद ही डोर ओपन कर के देखने लगी.

घर के सामने रोड पर चहल पहल थी. पर वीर नही दिख रहा था. तभि ऑटो रीक्षा घर के पास रुकी. और अंदर से वीर निकला. कविता की आँखों मे चमक आ गई. वो एक बेग टांगे और एक बेग ऑटो से उतरते दिखा. सायद दो दिन के रास्ते मे वीर ने शेव नही की होंगी.

इसी लिए हलकी काली दाढ़ी जैसे नजर लगने से बचा रही हो. ऑटो का रवाना होना. और वीर का कविता की तरफ देख कर मुस्कुराना. पर तभि आरव की लम्बी चीख.


आरव : बाबा........


कविता तो डोर पर ही थी. पर कब आरव वहा आया. कविता को पता ही नही चला. कविता और वीर दोनों ने आपस मे अपने अपने मन मे यह प्लान बना लिया था की बेटे के देखने से पहले दोनों एक जबरदस्त झप्पी और पप्पी. मतलब की किश कर लेंगे. क्यों की आरव के आने के बाद वो सब रात को ही मिल पाएगा.

लेकिन आरव ने सब चौपट कर दिया. वो पहले ही भाग कर अपने बाप की बाहो मे पहोच गया. वीर भी अपने बेटे से मिलकर बहोत खुश हुआ. अपने बेटे को गोद मे लिए वीर कविता को देखता है. कविता और वीर दोनों की आँखों मे एक अजीब सी प्यास थी.

जैसे अब भी प्यास बाकि है. मिल तो गए. पर मिलन अब भी बाकि है. वीर के करीब आते ही तुरंत कविता ने उसके पाऊ छुए. घर के अंदर जाते ही डोर क्लोज.


कविता : (स्माइल, प्यास ) मै आप के लिए चाय बनती हु.


कविता का बोलना एकदम धीमी आवाज. जैसे इरादा छुपा रही हो. अपनी प्यास अपना प्यार जताने से खुद को रोक रही हो. बस नजरों से नजरों ने ही एक दूसरे को भाप लिया. वो किचन मे अंदर गई. वीर अपने बेटे को लेकर सोफे पर बैठा. आरव ने शिकायत का पोटला खोलना शुरू किया.


आरव : बाबा आप चले गए. पर कविता ने मुझे बहोत तंग किया.


जिस तरह कविता अपने पिता को कभी उनके टाइटल से तो कभी नाम से बुलाती. वैसे ही आरव भी अपनी माँ को नाम से पुकरता. पर यह बत्तमीजी नही दोस्ताना व्यवहार था.


वीर : अच्छा... क्या तंग किया आप को???


आरव : बाबा कविता हेना (सोचते हुए ) मेरा होमवर्क नही करके देती. और मुझे कार्टून भी नही देखने दी. और जबरदस्ती रोज टूसन(ट्यूशन) भेजी है यह. चाकलेट(चॉकलेट) तो हमको भुला ही दी है.


तभि कविता वीर के लिए पानी लेकर आई.


कविता : अच्छा बचवा. हमारी शिकायत कर रहे हो. टांगे तोड़ दूंगी तुम्हरी.


वीर : अच्छा... तुम मेरे आरव की टांगे तोड़ोगी. हटना आरव बेटा. इस कविता की बच्ची को तो मै देखता हु.


आरव साइड हटा. उसे अब मझा आने लगा. की अब बाप उसका बदला लेगा.


आरव : अब पता चलेगा.....


कविता अपने पति की चाल समझ गई. वो खड़ी खड़ी मंद मंद मुस्कुराने लगी. वीर खड़ा हुआ और कविता का हाथ पकड़ कर दूसरे रूम मे लेजाने लगा. पर अब आरव को ही डर लगने लगा. अब उसकी मम्मी की पिटाई होने वाली है. जैसे ही डोर बंद हुआ. आरव डोर नॉक करने लगा.


आरव : अरे रहे दा बाबा. अरे हमरी मम्मी है. बाबा.... बाबा..


पर अब क्या फायदा. उसके पापा उसकी मम्मी को दूसरे रूम मे ले गए. ऐसा पहले भी हो चूका था. कविता रूम से आआ आआ की आवाज करती. और बाद मे रोने की तथा उस से रूठ जाने की एक्टिंग करती. आरव गिल्टी फील करने लगा. वो तुरंत विंडो के पास भगा.

छोटे छोटे कदमो से बड़ी मुश्किल से आरव ऊपर उठ पाया. विंडो को धकेला. पर विंडो बस थोडीसी खुली. आरव ने अंदर देखा तो वह हैरान रहे गया. दरसल वैसे तो अंदर का माहौल रंगीन था. कविता अपने पति पर सावर थी. और ऊपर निचे हो रही थी. पर आरव को कुछ और ही समझ आया.


आरव : अरे...... ई का हो रहा है. बाबा तो बड़े शेर बन रहे थे. अब हमरी अम्मा से ही पिट गए.


दरसल आरव को सिर्फ शैडो दिखाई दे रही थी. क्यों की दिन का वक्त था. और आरव कविता और उसके पीछे भी एक और विंडो थी. जो बहार की तरफ थी. हलाकि वो भी बंद थी. पर ग्लास के उस पार से सफ़ेद उजाला आ रहा था. इसी लिए आरव को सिर्फ आकर समझ आ रहा था. जब कविता अपने दोनों हाथ अपने पति की घने बालो वाली छाती पर टिकाए मस्त होकर अप डाउन हो रही थी.

आरव को लगा उसकी माँ ने अपने दोनों हाथो से वीर का गला दबाया है. और कविता जोरो से वीर को दबोचे हुए है. आरव टेंशन मे आ गया. वो अब अपने बाप के बचाव मे बोलने लगा.


आरव : एएएए.... कविता. अरे छोड़ छोड़. हमरे बाबा को छोड़. अरे गला मत दाब. मर जईहे.


कविता रुक तो गई. पर अब उसे बहोत तेज हसीं आने लगी. वीर भी हसने लगा. पर दोनों ने मुँह से आवाज नही निकली. कविता और वीर दोनों ही समझ गए की उसका बेटा आरव क्या समझ रहा है.


कविता : (स्माइल शरारत ) आज तेरे बाप को नही छोडूंगी. समझता क्या है अपने आप को.


आरव बेचारा अपनी माँ से अपने बाप को छोड़ देने की मिन्नत करने लगा.


आरव : एएए कविता. देख छोड़ दे हमरे बाबा को. देख अब से होमवर्क हम खुदई करेंगे. अरे ऐसे मत कुछ. पेट फट जाएगा हमरे बाबा का.


वीर बेचारा मंद मंद मुस्कुराता अफ़सोस करने लगा. क्या हो रहा है. और बेटा क्या समझ रहा है. कविता को तो बहोत ज्यादा हसीं आ रही थी.


कविता : (स्माइल, शरारत ) अब तो नही छोडूंगी. देख तेरे बाबा का सारा खून पी जाउंगी.


कविता बोलकर अपना सर निचे झूकाती है. और वीर के गले को चुम कर काट लिया.


वीर : (धीमी आवाज ) अरे मत सता उसे. (चीख ) आआह ससससस...


कविता ने काटने के बाद अपने होठो से वीर के होठो को लॉक कर दिया. आरव को लगा की सही मे उसकी माँ उसके बाप का खून पी रही है. जैसे वैंपायर किसी इंसान का खून पीते है.


आरव : ए ए ए देख कविता ऐसा मत कर. अरे मर जाएगा मेरा बाबा. देख छोड़ दे नही त हम नाना के सर पत्थर मार फोड़ देब.


आरव ने अपने बाप को बचाने अपनी माँ को धमकी दे दी. छोड़ दे. नही तो पत्थर मार कर तेरे बाप का सर फोड़ दूंगा. वहा किश करते हुए दोनों ने अपना काम खतम कर दिया था. उन दोनो को जो चाहियेथा. वो मिल गया.


कविता : अच्छा अच्छा. तू रो रहा है. इस लिए हम अभी छोड़ रहे है. पर याद रखना तुम दोनों बाप बेटे. अगर कोई शैतानी करी तो हम तुम्हे छोड़ेंगे नही. बूझे का???


आरव : अरे हा हा. अब छोड़ उका.


कविता : (स्माइल शरारत ) ठीक है ठीक है. अब जाओ. हमरे लिए एक ग्लास पानी लाओ.


आरव बेचारा चुप चाप पानी लेने चले गया. कविता और वीर ने अपने आप को दुरुस्त किया. वीर उस रूम से पहले निकला. और कविता बाद मे. जब कविता रूम से निकली. उसी वक्त आरव पानी का ग्लास लेकर पहोंचा. आरव ने देखा. उसकी माँ के होठो पर लाल लाल निशान है. पुरे लिप्स बिगड़े हुए है. दरसल वो लिपस्टिक कविता के होठो पर फेल गई थी. पर आरव उसे खून समझ रहा था.


आरव : (गुस्सा ) हमरे बाबा का खून पी गई. खुनी खुनी हो तुम.


कविता को इतनी जोर से हसीं आई की वो अपने आप को रोक नही पाई. जिस से आरव और ज्यादा चिड गया. वो गुस्से मे अपने बाप के पास जाकर खड़ा हो गया. दोनों हाथ कमर पर और घूरते हुए हाफ पैंट मे आरव बहोत प्यारा लग रहा था. जैसे उसने अपने बाप की चोरी पकड़ ली हो.


आरव : (गुस्सा) पिटा गए. बहुत शेर बन रहे थे. अब रोज हमरे हिस्से का दूध तुम पिओगे.


वीर बेचारा अपनी मुस्कान छुपाए दए बाए देख रहा था. जैसे उसे शर्म आ रही हो. जब आरव ने दूध का बोला तो वीर ने सीधा सामने खड़ी अपनी पत्नी के जोबन की तरफ देखा. तभि फोन की घंटी बजी.


कविता : (आरव से ) नही... अब तुम दोनों बाप बेटों को रोज डबल दूध पीना पड़ेगा. अब जाओ जाकर फोन उठाओ.


आरव फोन तक जाते जाते गुस्से से अपने बाप को देखता है.


आरव : (गुस्सा ) अब तुम्हरे चक्कर मा हमे दुइ(2) गिलास(ग्लास) पीना पड़ेगा. हम्म्म्म


वीर और कविता मंद मंद मुस्कुराते. उन्हें अब भी बहोत हसीं आ रही थी. वो जाकर फोन उठाता है.


आरव : हेलो...... हा प्रणाम बुआ जी.


कविता एकदम तेजी से फोन तक पहोच कर लपक लेती है. कही अपनी ननंद बबिता के सामने आरव घर की पोल ना खोल दे. वीरू से 4 साल छोटी बबिता की शादी वीरू की शादी के 5 साल बाद ही हो गई थी. वीरू की उम्र के सूरज मिश्रा के साथ. जो रहने वाले तो गोरखपुर के थे. पर वह लखनऊ मे सिफ्ट हो चूके थे. सूरज लखनऊ पुलिस दरोगा थे.


कविता : (स्माइल, शरारत) हा ननंद रानी. का नन्दोईजी तुहार पेट फुलाई दिये का. जो आ नही रही हो.


कविता : (स्माइल) अच्छा भैया तुम्हारे. हा हा आ गए है. तभि.... कोई बात नही. आइये आइये. हम तो तुहार कुछ लागत नइखे. आवा आवा.


आरव और वीर दोनों बस कविता को ही देख रहे थे. उन्हें बबिता की आवाज नही सुनाई दे रही थी. कविता और बबिता दोनों ननद भौजाई दोनों आपस मे सहेलियां की तरह रहते थे. दोनों मे बहोत प्यार था. और दोनों ही एक दूसरे से हसीं मज़ाक करते रहते.


कविता : (स्माइल) अरे भैया से मिलने के लिए ही सही. आओ तो.


कविता : (स्माइल) अच्छा ओके ओके.


कविता ने फोन रख दिया. और वीर की तरफ देखा.


कविता : (स्माइल, शरतत) ननद नन्दोईजी आ रहे है. मै तैयारी कर लेती हु.


कविता किचन मे चली गई. वीर आरव के साथ खेलता रहा. कुछ एक घंटे बाद डोरबैल बजी. और आरव ने भाग कर डोर खोला.


आरव : (स्माइल एक्साइटेड) बुआ.....


आवाज सुनकर कविता भाग कर आई. ननंद और नन्दोई का खूब स्वागत हुआ. और सारे हॉल मे ही जमा हो गए.


बबिता : भैया मै आरव को कुछ दिन लेजाऊ??? उसके बिना मेरा मन नही लग रहा???


बबिता अक्सर आरव को सैटरडे संडे अपने घर लेजाती. पर कुछ हफ्तों से वो आ नही पा रही थी. क्यों की आरव की परीक्षा थी. पर कविता ने कुछ और प्लान बना रखा था.


कविता : पर कल तो हम उसके नाना के यहा जा रहे है. बहोत टाइम हो गया पापा से मिले.


तभि कविता और वीर का भांडा फूटने वाला था.


आरव : अरे बुआ..... पापा से कहे पूछ रहे हो. मम्मी से पूछा.


बबिता समझ गई. जरूर दाल मे कुछ काला है. उसने देखा कविता के चहेरे पर स्माइल के साथ थोड़ी शर्म और शरारत है. वो तुरंत कविता को बाहो मे जकड़ लेती है.


बबिता : (स्माइल, शरारत) अरे रुका भौजी. ऐसे कैसे....


ननंद के जैसे नन्दोई सूरज भी मज़ाक मस्ती मे खुद आगे थे. वो आगे बढ़कर आरव को गोदी मे उठा लेते है.


सूरज : (स्माइल) वो क्यों बेटा.


कविता ज्यादा शर्माने लगी. वीर मुस्कुराते हुए अपने माथे पर हाथ रख देता है. और आरव ने भांडा फोडा.


आरव : अरे फूफाजी.... बाबा की चलती कहा है आज के तो कविता ने बाबा को खूब पीटा है.


सभी हसने लगे.


आरव : जरा हमे निचे उतारिये.


सूरज ने आरव को गोद से उतरा. आरव निचे जमीन पर बैठ के कूदने लगा. वो कविता की पोजीशन बता रहा था. जो उसने जो देखा और समझा.


आरव : अइसन कुद्दे रही कविता. हमरे बाबा पे. और एक बार तो हमरे बाबा के खून भी पी है.


सूरज और बबिता तुरंत पोजीसन देख कर समझ गए की क्या हो रहा होगा. वो आरव की एक्टिंग देख कर बहोत जोरो से हसे. कविता तो शर्म के मारे लाल हो गई.


बबिता : (स्माइल, शरारत) बहुत जोर के कुदी होंगी तेरी अम्मा ना???


आरव भी समझ से अनजान. वो भी मिर्च मसाला भर के बता रहा था.


आरव : अरे...... बहुत जोर के. बाबा का तो आवाजे नही निकाल पा रहा था. सांस फुले रही. पर कविता के तो बिलकुल कोई दया भाव नाही.


सारे और ज्यादा जोर से हसे. कविता की तो हालत ही खराब हो गई. ननंद नन्दोई के सामने. सूरज ने भी अपने सीधे सादे साले वीर की खूब खिचाई की. सबने खाना खाया. और हस्ते खेलते काफ़ी वक्त साथ बिताया. आरव अपनी नानी को पसंद नही करता था.

उसे अपनी बुआ से बहोत प्यार था. इसी लिए उसने जिद्द की और वो बबिता और सूरज के साथ दो दिन के लिए चले गया. उनके जाते माहौल एक बार फिर रंगीन हो गया. उन्हें तो बस मौका ही चाहिये था. अब तो दोनो ही घर मे अकेले थे. पर इस बार कविता ने खुद मानो कामदेवी का रूप धारण कर लिया हो.

जब तक डोर बंद ना हुआ तब तक कोई जल्दबाज़ी नही. अपनी नन्द के प्यारे मिठे तनो को सुनती रही. पर जैसे वो गई. उसने डोर क्लोज किया. एकदम झटके से पलटी.


कविता : (स्माइल, शरारत) अच्छा... गुनाह तुहु करा. और सजा हमका. अबके तोहे नाही छोड़ब.


पिछली बार पहल वीर ने की. तो इस बार कविता ने मानो अटैक ही कर दिया. वीर सोफे पर बैठा वो भी डोर बंद होने का इंतजार कर रहा था. पर कविता तो डोर बंद करते उसपर हमला ही बोल दी. भाग कर वीर पर कूद गई. सीधा उसकी गोदी मे. वीर के चहेरे को दोनों हाथो से थाम होठो से होंठ जोड़ दिए. जैसे चुम्बन से ही जीत हार का फैसला होगा. शादी के बाद दोनों मे ही काफ़ी बदलाव आया था.

वीर शादी के वक्त और ज्यादा बलिस्ट हो गया था. हाइट बॉडी दोनों ही और ज्यादा बढ़ गई. चहेरा भरावदार हुआ तो और ज्यादा स्मार्ट हैंडसम हो गया था. वही कविता किशोरी से सम्पूर्ण नारी बन चुकी थी. जोबन भारी हो चूका था. कविता तो पहले से सुंदर थी. अब और ज्यादा निखार आ चूका था. दोनों मे पहले से ज्यादा बडा दंगल हुआ.

इस बार बैडरूम तक जाने का दोनों मे से किसी को मौका नही मिला. शरीर की गर्माहट ने बड़ी तपस का रूप ले लिया. पर तूफान थम जाता है. वो भी थम गए. दोनों एक दूसरे की बाहो मे. नग्न शरीर दोनों सोफे पर ही एक दूसरे को जकड़े हुए. कविता इस बार भी ऊपर थी. जो की हर बीवी टॉप पर ही होती है. माहौल कुछ पल शांत हुआ.


वीरू : एकठो बात बोले.


कविता : अरे एक का सौ बोला. हम सुन रहे है.


वीर : पता है.... जब किसी जोड़े का शादी होता है. वो सुहागरात मानते है.


कविता : हा हमरा भी हुआ था. भूल गए. हम तुमको अपना भरजीनीटी(virginity) दिए थे.


वीर : अरे उ तो हम भी दिए थे. बात ऊ नाही है. बात यह है की एक फौजी हर साल जब भी छुट्टी आता है. हर बार सुहागरात मनाता है.


कविता वीरू की छाती पर सर टिकाए हुए थी. वो सर ऊपर उठाकर वीरू की आँखों मे देखती है.


कविता : बिलकुल सही कहे हो. हमे कोई फूल माला ग़द्दा बिछोने का जरुरत नाही. बस हम एक दूसरे से मिल जाए. हर बार पहले मिलन का एहसास. सही कहे ना???


वीर : (स्माइल) बिलकुल. अरे समजदार हो. तभि तो हमे मिली हो.


कविता : (स्माइल) अरे कविता शुक्ला नाम है हमरा.


वीर : पांडे.


कविता : हा मतलब अब कविता शुक्ला पांडे. पर इ बाल बहोत चुबता है. दाढ़ी कहे नही बनाए.


वीर : अरे दो दिन रास्ते मा. अब कहे बनाए.


कविता : तब का ससुराल ऐसे जाओगे. कोनो साली देखेगा तो का कहेगा. अब हम बनाएँगे तुम्हे चिक्कन. कहा है तुम्हरा रेजर??


वीर हसने लगा.


वीर : (स्माइल) हमरे बेगमा है. सेविंग किट. जाओ ले आओ.


दोनों पूरी तरह से नग्न थे. कविता वीर के बैग से सेविंग किट ले आई और वीरू के सामने खड़ी हो गई. पत्नी देवी एक बार फिर साक्षात काम देवी का रूप ले चुकी थी. पास मे आधा ग्लास पानी पड़ा ही हुआ था. उसी से वीरू का चहेरा गिला किया. और ब्रश की बजाय अपने हाथो से ही मलके क्रीम लगाई. फिर रेजर उठाया.


वीरू : अरे देखना. लग ना जाए.


कविता : (स्माइल, शरारत) अरे बाबू तुम्हरी गोद मा बैठ कर बनाएँगे. कहे घबरा रहे हो.


वीरू बस हँसा. कविता वैसी ही पोजीशन मे वीरू की गोद मे बैठ गई. कविता चहेरे के करीब बड़े प्यार से रेजर चलाती है. पर थोड़ा फिसल रही थी.


वीरू : (स्माइल) अरे फिसल रही हो. जब तक खुटे से गईया बंधेगी नहीं. एक जगह टिकेगी नहीं


मतलब आप समझ ही गए होंगे. कविता वैसे ही सावर हो गई. दोनों को मौसम बनाते टाइम कहा लगता है.


कविता : ससससस ला. ई ला त.


कविता सरक तो अब भी रही थी. पर अब ऊपर खिसकने मे मझा ज्यादा आ रहा था. धीरे धीरे पूरी शेविंग हो गई.


कविता : (स्माइल,शरारत) अब बने हो. एकदम चिक्कन.


दोनों ने अधूरा काम तीसरी बार पूरा किया. रात दोनों ने साथ बिताई. और सुबह होते जल्द ही बस पकड़ ली. कविता के मायके और वीर के ससुराल के लिए. कुछ दो तीन घंटे का सफर था. सुबह 8 बजे तक दोनों कविता के मायके पहोच गए. वैसे तो कविता का मायका इलाहबाद के बाहरी हिस्से मे था. हाइवे से उतारकर कविता के मायके जाने वाले रास्ते के इर्द गिर्द सुबह 10 बजे तक सब्जी मंडी लगती. वीर और कविता बस से उतारकर उसी रास्ते पर चल दिये.

कविता बस थोड़ासा आगे चल रही थी. उसके हाथमे शूटकेस था. वही वीर पीछे उसके पास भारी बेग था. वीर ने देखा की एक दो ठेले से दो तीन बुढ़िया अपना ठेला छोड़ कविता की तरफ तेजी से आई. और कविता को इर्द गिर्द घेरकर नाचने लगी. जैसे कविता को ताना मार रही हो.


बुढ़िया 1 : हम्म्म्म पहले बड़ी कुदत रही. बडा फुदकती थी. अब का हुआ. कहे एकदमे शांत हो गई.


वीर ने देखा की कविता मुस्कुराती एकदम शांत निचे देखते हुए धीरे धीरे चल रही थी. वीरू को यह समझ आ गया की कविता सब की पहले भी फेवरेट थी. वो दो तीन बुढ़िया कविता के मजे लेती रही.


बुढ़िया 2 : (स्माइल) अरे गईया अब खुटे से जो बंध गई. अब देखो. कैसे शर्मा रही है.


बोलते हुए उस बुढ़िया ने कविता की थोड़ी पकड़ ली. कविता ने धीरे से कहा. वो पीछे है. तो वो तीन बुढ़िया पहले वीर को देखती है. उनके देखने से ही वीर को अंदाजा लग गया की उनकी नजरें थोड़ी कमजोर है. वो तीनो बुढ़िया मुस्कुराई और वीर के पास आई.


बुढ़िया 3 : वह बडा सुंदर है. नजर ना लगे हमरी.


वो तीनो बुढ़िया वीर की नजर उतरने लगी. कविता घूम कर उनकी तरफ देखती है. वीर ने भी गरीबसी दिखने वाली तीनो बुढ़िया के पाऊ छुए. यह कविता के लिए दिल जीत लेने वाला नजारा था. तभि मोटरसाइकिल की आवाजे आई. बुढ़िया और कविता ने उस तरफ देखा. दो मोटरसाइकिल पर 4 लड़के रेस दे देकर सब को परेशान कर रहे थे. तभि एक लड़के की नजर कविता पर गई.


लड़का : अबे झांसी की रानी. भाग भाग.


उन लड़को ने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल घुमा ली. कविता अपना सूटकेस वही सडक पर छोड़ दो तीन कदम आगे आई. और जैसे धमकी देने लगी.


कविता : अबे कविता शुक्ला नाम है हमारा.


तभि कविता को याद आया की उसका पति पीछे है. वो घूम कर देखती है. वीर बस मुस्कुरा रहा था. कविता हाथ हिलाते हुए बाकि लाइन बोलती है.


कविता : और पांडे भी. (स्माइल) साले स्कूल मा हमरे जूनियर थे. फालतू मे यहां बदमासी करते है.


वीर को बड़ी जोर से हसीं आई. कविता शर्मा गई. कुछ बोली नहीं. बस सूटकेस उठकार तेजी से चलने लगी. वीरू समझ गया की कविता का आतंक स्कूल मे भी रहा होगा. वो लड़के मंडी मे सबको परेशान करते होंगे. और कविता से डरते होंगे. कुछ दूर चलते रोड पर गेट आया. जिसपर वीर के ससुर के नाम की नेमप्लेट लगी हुई थी. दयाशंकर शुक्ल PWD. वो दोनों गेट से अंदर घुसे. और कविता ने आवाज लगाई.


कविता : एएए दायशंकर. अबे कहा हो बे.


वीर जानता था की कविता अपने बाप को कभी शुक्ला तो कभी उनके नाम से बुलाती. दोनों बाप बेटी दोस्त की तरह रहते थे. दयाशंकर को पता था की बेटी और दामाद आ रहे है. इस लिए उन्होंने छुट्टी ले ली थी. वो आए. कविता और दायशंकर दोस्त की तरह ही मिले.

वही वीर ने अपने ससुर और सास का आशीर्वाद लिया. उसकी सास कविता की माँ को पहले की तरह ही कविता का रवैया पसंद नहीं आया. और वो कविता को डांटाती गई. पर कविता नजर अंदाज़ करती गई. वीर के भारी बैग से सब के लिए तोफे थे. जो दे दिए गए. दिन बहोत अच्छा गया. पर कविता को तो शाम का इंतजार था. वही वीरू शाम के लिए ही डर रहा था.

एक बार तो वो शर्मिंदा हो चूका था. अब कोई नया कांड ना हो जाए उसका डर था. कविता के मायके ऊपर टेरेस पर एक रूम बना हुआ था. जिसमे कविता और वीर दोनों को रुकना था. और कविता ने वही खुले आष्मान के निचे ही प्रोग्राम करने का सोचा था.

शाम हुई और धीरे धीरे रात. कविता की माँ सरिता देवी ने कविता और दामाद को भोजन करने पुकारा. पर कविता ने मना कर दिया. और कहा की उन्हें लेट खाने की आदत है. वीरू बेचारा कविता को घूर के देखता है. और सोचता है की यह इस कांड का बिल भी उसके सर ही फाड़ने वाली है. अगर सब शांति से ना हुआ तो.

वैसे कविता ने कभी ड्रिंक नहीं किया था. उसका पहेली बार था. वीर सोच रहा था की अगर बड़बोली कविता को चढ़ गई तो क्या होगा. वो पहले से ही बड़बोली है. पिने के बाद क्या क्या करेंगी. वही कविता बहोत एक्साईटेड थी. वो दोनों ऊपर वाले रूम मे थे.


कविता : (स्माइल एक्साइटेड) एए... निकालो ना काला कुत्ता.


कविता ब्लैकडॉग दारू की बोतल निकालने को कहे रही थी. और वीर का डर बढ़ने लगा. क्यों की बीवी मान ने वाली तो थी नहीं.


वीर : अरे का बोतल से मुँह लगाकर सीधा पिओगी का. गिलास(ग्लास) वगेरा कुछ तो नहीं है.


कविता सिर्फ शरारत से मुस्कुराई. और उसने उसी रूम से ग्लास का पूरा सेट निकाला. जिसमे पुरे 6 ग्लास थे. इतना ही नहीं 3 बाउल निकले. एक मे भुने काजू बादाम, दूसरे मे भुने चने और तीसरे मे सलाद था.


कविता : (स्माइल, शरारत) का बुडबक समझे हो का. अब चला बहार.


कविता सब सामान लेकर रूम से बहार टेरेस पर आ गई. वीरू बेचारा बोतल लेकर बहार आया. पर बहार का नजारा बहोत अच्छा था. आष्मान साफ था. तारे टीम टीमा रहे थे. बहोत बढ़िया हवा चल रही थी. वीर टेरिस के किनारे आया. और दीवार पर हाथ रखते निचे देखा. उसके ससुर दायशंकर घर के बहार छोटे से गार्डन मे चेयर डालकर बैठे थे.


कविता : अरे इहा आवा ना. उहा क्या कर रहे हो.



वीर बेचारा कविता के पास आया. कविता ने टेरेस पर निचे ही दरी बिछा दी. दोनों बैठ गए. वीरू कविता को देखते रहा. कविता से बरदास नहीं हुआ.


कविता : अरे बनाओ यार. हमे थोड़े ना आता है.


वीरू ने सोचा. चलो जो होगा देखा जाएगा. वीर ने बोतल खोली. भोग लगाए. और बिलकुल लाइट लाइट दो पैग बनाए.


वीर : उठाओ. आज पहेली बार पत्नी देवी के साथ. चीयर्स.


कविता खुश हो गई. उसकी बस एक फैंटासी थी. की एक बार अपने पति के साथ वो शराब पिएगी. और खूब नाटक करेंगी. जो की पूरी भी हो रही थी. दोनों ने अपना अपना पैग खतम किया. फौजी कितनी भी बढ़िया शराब हो. वो एक ही बार मे पीते है. वीर ने वैसा ही किया. पर कविता भी पूरा खींच गई. ब्लैकडॉग होने के बावजूद उसने अपना मुँह बिगाड़ा.


कविता : ओओहोक एह का चीज है बे. साला दवाई जैसा लग रहा है.


वीर कुछ बोला नहीं. बस हँसा.


कविता : बनाओ एक और.


वीर कविता को घूर के देखता है. कविता हसने लगी. पर वीरू ने दूसरा पैग बना दिया. वीरू ने काजू उठाया और खाने ही लगा की कविता ने उसके हाथ का काजू खींच लिया.


कविता : का लगता है. ई चढ़ेगी???


वीरू : हम्म्म्म पता नहीं.


कविता : तो चढ़ाओ. हमे नशा नहीं हो रहा.


वीर बेचारा चुप रहा. पर कविता दूसरा भी पैग खींच गई. वीर ने जानबुचकर तीसरा नहीं बनाया. हलाकि उसने दोनों पैग बहोत ज्यादा लाइट बनाए थे.


कविता : एए... देखो. यह हमरा सपना था. तुम डरना नहीं ठीक है. (स्माइल) मेरा डार्लिग...


कविता वीरू का गाल चुम लेती है. अब वीरू को विस्वास हो गया की कविता को चढ़ रही है. क्यों की कविता ने हमेशा एजी ओजी, आरव के पापा कहकर ही पुकारा था. कविता ने वीर को पहेली बार डार्लिग कहा. अब उसे कविता का वो रूप देखना था. उसे भी मझा आने लगा. उसने एक रेगुलर पैग बनाया. हलाकि उसका दूसरा खतम नहीं हुआ था.


कविता : अच्छा... एक ठो बात बताए...


वीरू : हम्म्म्म...


कविता : (स्माइल, नशा ) तुम ना... माल हो. एकदम चिक्कन. साला मेरा क्या मेरी दोस्त का भी तुम्हे देख कर नियत बदल जाता है.


वीरू मुस्कुराने लगा. उसकी बीवी खुलके उसकी तारीफ कर रही थी.


कविता : तुम जानते हो..... अगर हम कविता ना होते ना. तो हम तुम्हरे लिए कविता का ही मर्डर कर देते. (स्माइल) पर तुम.... तुम सच मे माल हो.


वीर के फेस पर स्माइल आ गई. उसने अपना पैग खतम किया और अपना तीसरा पैग बनाने लगा. कविता ने अपना ग्लास उठाया. और आगे कर दिया. वीर ने कविता को घूर के देखा.


वीर : नहीं.. अब नहीं. बस तुम्हारा हो गया.


कविता झूमने लगी थी.


कविता : अबे यार दो ना यार. अभी तो हमने थोडीसी भी बकवास शुरू नहीं की. बहुत बोलना है हमे तुमसे.


वीरू हस पड़ा. तो कविता भी हस्ते हुए अपना सर वीरू के कंधे पर टिका लेती है.


वीर : बोलो... क्या बकवास करनी है???


कविता : अममम... तुम हेना.... अमममम माल हो माल.


इस बार वीरू ने माथा पीटा. वो समझ गया की अब यही रिकॉर्डिंग चलेगी. तभि उन्हें कविता की माँ सरिता की आवाज सुनाई दी. जो सायद कविता के बाप को डांटा रही थी.


सरिता : बस उहहा बैठे रहिएगा. कुछ पूछियेगा नहीं की समस्या का है.


अपनी माँ की आवाज सुनकर कविता खड़ी हुई. उसे वीर ने सहारा देने की कोसिस की. पर कविता उस से पहले ही खड़ी हो गई. वो टेरेस के किनारे खड़ी होकर निचे अपने बाप को देखती है.


कविता : एएए... दायशंकर.


उन्होंने पहले दए बाए देखा. फिर ऊपर. देखा बेटी मस्त मौला बनी उन्हें ऊपर आने का हिसारा कर रही है. कविता की माँ ने भी यह घर के अंदर से सुना. और वो जोरो से कविता की बुराई करना शुरू कर देती है. पर कविता और उसके पापा दोनों की ही आदत थी सब नजर अंदाज कर देते. वो नजर चुराते ऊपर आने लगे. कविता वीरू के पास आई.


कविता : ए सुनो. हमरे बाबा आ रहे है. उन्हें एक दो घुट पीला देते है. हम जो भी बोलेंगे. तुम बस हमरा साथ देना.


वीरू सोच मे पड गया. कविता करना क्या चाहती है. तभि कविता के पापा ऊपर आए. और महफ़िल देख कर थोड़े हैरान हुए.


कविता : (मदहोश, स्माइल, बिंदास) अरे आवा आवा शुक्लाजी आवा आवा. बैठा...


दायशंकर बैठ गए. कविता ने वीर को सर झटक कर ऐसे हिसारा किया. जैसे वीर कविता का फोल्डर या राइट हेंड हो. वीर ने पैग बना दिया.


दायशंकर : अरे नहीं नहीं दामादजी. हमे आदत नहीं.


कविता ने खुद ही बोतल खींची और अपने ग्लास मे डालने लगी.


कविता : (स्माइल, बिंदास) अरे ऐसे कैसे.... आज ही तो मौका है. शेर जगाने का.


वीरू ने कविता का हाथ पकड़ लिया. उसे ज्यादा नहीं लेने दिया. इन सब मे वो खुद पीना भूल गया. दायशंकर कभी कभी चुपकेसे एक दो पैग पी लेते थे.


कविता : चलो उठाओ...


दायशंकर ने पहले दामाद को देखा. और फिर पैग उठा लिया. और जल्दबाजी मे एक ही बार मे बिना पानी के पी गए. कविता की असली बकवास शुरू हुई.


कविता : हा तो हम क्या कहे रहे थे दायशंकर...


दयाशंकर : हम्म क्या???


कविता : (बिंदास) यार..... ये..... बीवियों को हेना. काबू मे रखना चाहिये.


दायशंकर समझ गए की उनका दामाद क्या झेल रहा है. वो वापस वीर को देखते है. और फिर कविता को. कविता बोलते हुए झंगो पर ताल भी ठोकने लगी.


कविता : अब हमे ही देख लीजिये. हमारी हिम्मत है की हम इनके सामने कुछ बोल जाए.


कविता अपने पापा की तरफ थोड़ा झूकी. और अपना हाथ दिखाने लगी. जैसे बहोत खास खुलासा कर रही हो.


कविता : एक ही थप्पड़ मे हमरा मुँह घुमा देते है.


कविता के पापा ने वीरू की तरफ देखा. जैसे दोनो हिसारो मे बाते कर रहे हो. वीर हलका सा ना मे सर हिलता है. दायशंकर वीरू की हालत पर थोड़ा मुस्कुराए. जैसे कहना चाहते हो. मेने तो अपनी सरदर्दी तुझे थमा दी. अब भुगत. कविता वीर की झंाग पर हाथ मरती है. वीरू जैसे होश मे आया हो.


वीरू : अममम बिलकुल... बिलकुल.


कविता : (वीरू की तरफ) अबे तुम रहने दो यार. तुम्हारा कच्छा तक तो हम खरीद कर लाते है.


कविता ने अपना फेस अपने बाप की तरफ किया.


कविता : हा तो हम क्या कहे रहे थे???


दायशंकर : बीवी को काबू मे रखना चाहिये.


कविता : (आंखे बंद, मस्त, स्माइल) बीवी को काबू मे रखना चाहियेयेये....


कविता ने फिर वीर की तरफ देख कर हिसारा किया. जैसे कहना चाहती हो की एक और पैग बनाओ. अभी ही मौका है. पर हिसारा भी ऐसा की उसका बाप सब देख कर समझ जाए. वीर ने इस बार तीनो के पैग बनाए. और एक खुद बिना पानी के गटक गया.

दायशंकर ने वीर की पिठ थप थापाई. और अपना पैग एक झटके से खींचकर खड़े हो गए. वो तुरंत निचे चले गए.वीर ने भी अपना पैग खतम कर दिया. तभि निचे से कविता की माँ और उसके पापा के झगड़े की आवाज आने लगी. वीर कविता को छोड़कर नहीं जाना चाहता था.

पर कविता खुद उठकर निचे जाने लगी तो वीर को भी उसके पीछे जाना पड़ा. कविता को देख कर उसकी माँ सरिता ज्यादा भड़क गई. वो सुना कविता को रही थी. पर बोल अपने पति को रही थी.


सरिता : (गुस्सा चिल्लाकर) कल तक इस घर मे सिगरेट आई. आज शराब आ गई. अब कल जुआ भी खेलने लगोगे. अब बस रंडीखाना खोलना बाकि..


सरिता के मुँह से यह सब सुन कर दायशंकर को गुस्सा आ गया. और अपने जीवन मे पहेली बार अपनी पत्नी पर हाथ उठा दिया. चटक करते आवाज पुरे रूम मे गूंज उठी. कविता और वीर तो एकदम सॉक हो गए. पुरे रूम मे सन्नाटा छा गया. सरिता अपने गाल पर हाथ रखे हैरानी से अपने पति को देख रही थी. और दायशंकर अपनी नजरें घुमाकर स्तब्ध खड़े ही रहे गए. कविता को नशा हो गया था.

पर क्या हुआ उसे यह समझ आ रहा था. वो मुँह खोले जैसे समझने की कोसिस कर रही हो. कुछ पल शांति के बाद सरिता तेज़ी से अपने रूम की तरफ जाने लगी.


सरिता : (गुस्सा ) अब हम इस घर मे नहीं रहेंगे. जा रहे है हम.


वो कुछ ही पल मे एक झोला तैयार कर के आ गई. पर उसे दायशंकर ने रोक लिया.


दायशंकर : रुको सरिता... मेरी बात सुनो..


सरिता : (गुस्सा) हटो मेरे रास्ते से. जिंदगी मे पहेली बार आज आप ने मुझपर हाथ उठाया है. (कविता की तरफ हाथ दिखाते) वो भी ऐसी चरित्रहीन औलाद की वजह से.


पहेली बार झगड़े मे वीर ने मुँह खोला.


वीर : आप कैसे कविता को चरित्रहीन बोल सकती हो??? सिर्फ उसने सिगरेट और शराब पी. इस वजह से???


सरिता : देखो दामाद जी. लड़कियों को यह सब सोभा नहीं देता.


वीर : और लड़को पर तो यह सब जचता होगा. वाह... आप एक औरत होकर यह क्यों नहीं समझ रही की लड़का लड़की दोनों मे कोई भेद नहीं. और सिगरेट पीना शराब पीना बुरी आदत हो सकती है. बुरा चरित्र नहीं. चाहे वो लड़का हो या लड़की.


एक पल के लिए वहा फिर शांति छा गई. कविता मुँह खोले पागल के जैसे धीरे कदम से वीर की तरफ आई. और वीर की नजर उतार ली.


कविता : (फुल नशा ) मस्त बोला हम्म्म्म.. बहुते बहुते मस्त.


कविता की ठीक से आंख भी नहीं खुल रही थी. पर उसके ऐसे वक्त मे ऐसी हरकत देख कर वीर को हसीं आ गई. उसने कविता को बाहो मे भर लिया.


वीर : कविता को मुझसे मिलने से पहले पापा पर भरोसा था. उनके भरोसे कविता ने जीवन मे पहेली बार सिगरेट पी. वो हलाकि अब भी पीती नहीं है. फिर उसकी जिंदगी मे मै आया. और उसने मेरे भरोसे जीवन मे पहेली बार शराब पी. क्यों की उसे पता है. उसके पिता और पति उसे कुछ होने नहीं देंगे. उसे जो भी करना हो. वो करेंगी. उसके साथ मै हु. हर वक्त.


सरिता को अपनी गलती भी समझ आई. उसकी सोच पर उसे अफ़सोस हुआ. वो खामोश थी. तभि कविता धीरे धीरे उसके पास पहोची. और ऐसे बोली जैसे वो गुप्त ज्ञान दे रही हो. लेकिन उसे सबने ही सुन लिया.


कविता : (नशा) ए... एए सरिता. पति को कभी जाने की धमकी नहीं देना. वरना वो खुश हो जाएगा. पति को जो हेना.... ससससस.. खींच के रखना चाहिये. एकदम काबू मे.


कविता की बात सुनकर सभी बहोत जोरो से हस पड़े.

The End











Yaar Shetan aap ka jawab nahi aisi stories likhne mein..

Short, crisp, natkhat, ek message dene wali story.
 
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Shetan

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Yaar Shetan aap ka jawab nahi aisi stories likhne mein..

Short, crisp, natkhat, ek message dene wali story.
Thank you so much aap se Tarif Mil Gai matlab story hit hai
 
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Shetan

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Kesi baatein krti ho Shetan aap yar..

Aisa kuch nahi hai...

I mean story hit hai already....

Maine to bas apna tuchh sa comment kiya hai
यार आप बहोत पुराने रीडर हो. कई स्टोरी पढ़ी चुके हो. तो एक्सपीरियंस के बेस पर बोला.
 
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