भाग 17
दिन हफ़्तों में और हफ़्ते महीनों में बदलने लगे थे। इस बड़े और खाली घर में वक्त जैसे बहुत धीमा हो गया था। बापू के बिना और छोटू की चहचहाहट के बिना, इन कमरों की दीवारें अब और भी ऊँची और शांत लगने लगी थीं। इस पूरे एकांत में माँ का संसार धीरे-धीरे सुकड़कर बस इस घर की दहलीज और मेरे चेहरे तक ही सीमित हो गया था। मेरा उनके प्रति अगाध प्रेम ही था कि मैं उन्हें दुनिया की किसी भी परेशानी या भाग-दौड़ की आँच तक नहीं आने देना चाहता था। मैं चाहता था कि उनकी हर छोटी से छोटी ख़्वाहिश, बिना उनके माँगे ही पूरी हो जाए।
अब घर का हर एक छोटा-बड़ा काम मेरे ही हाथों से होकर गुज़रता था। रसोई के राशन से लेकर, बिजली के बिल, घर की देखरेख और यहाँ तक कि बापू के सुधार केंद्र की हर महीने की मँहगी रसीदें भी मैं खुद ही संभालता था। माँ को अब बटुआ खोलने की या पैसों के बारे में सोचने की कोई ज़रूरत नहीं रह गई थी।
एक दोपहर, जब मैं ऑफिस से कुछ फाइलें लेने घर आया, तो माँ बैठक में बैठी पुरानी डायरी में कुछ हिसाब लिख रही थीं। उनके चेहरे पर वही पुराना, गंभीर और घरेलू भोलापन था।
मैंने उनके पास जाकर आहिस्ते से कहा, "माँ, आप यह सब क्या कर रही हैं?"
माँ ने चौंककर ऊपर देखा, "कुछ नहीं रवि, बस सोच रही थी कि इस महीने दूध वाले का और धोबी का हिसाब..."
"मैंने सुबह ही उन सबका पूरे साल का एडवांस पेमेंट कर दिया है माँ," मैंने मुस्कुराते हुए उनके हाथ से वह पेन ले लिया, "आप इन सब छोटी-बातों के लिए अपना सिर क्यों दुखाती हैं? बापू की दवाइयों से लेकर छोटू की हॉस्टल की फीस तक, सब कुछ सही वक़्त पर अपनी जगह पहुँच जाता है। आपको बस इस घर में आराम से रहना है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सा सूनापन और असमंजस था। वह कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन उनके पास कहने को कोई शब्द नहीं थे। इतने सालों तक जिस औरत ने पूरे घर का ताना-बाना अपने हिसाब से बुना था, आज अचानक उसके हाथों से सारी ज़िम्मेदारियाँ इतनी सहजता से छूट चुकी थीं कि वह खुद को बिल्कुल खाली महसूस करने लगी थीं।
वह चौबीसों घंटे सिर्फ़ मेरा ही चेहरा देखती थीं। सुबह चाय के वक़्त मेरा उनके सामने बैठना, दोपहर में उनकी तबियत पूछने के लिए मेरा फोन आना, और शाम को सूरज ढलते ही मेरा सब काम छोड़कर उनके पास लौट आना। उनके जीवन का हर एक कोना अब मेरे वजूद और मेरे कमाए पैसों की परछाई से घिर चुका था।
एक दिन जब मैं शाम को वापस आया, तो वह खिड़की के पास बैठी अपनी उँगलियाँ चटका रही थीं। टीवी रूम का सन्नाटा उन्हें अंदर ही अंदर भारी लग रहा था। जब इंसान के पास करने को कोई काम न हो और बात करने के लिए दुनिया में सिर्फ़ एक ही इंसान बचा हो, तो वह अकेलापन अंदर से इंसान को तोड़ने लगता है। माँ के साथ भी यही हो रहा था; वह मानसिक रूप से इस मुकम्मल अकेलेपन और मेरी अत्यधिक परवाह के नीचे धीरे-धीरे थकने लगी थीं।
"रवि..." माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में मुझे पुकारा, जब मैं उनके लिए लाकर रखी हुई ताज़ा फलों की टोकरी टेबल पर रख रहा था।
"हाँ माँ? कुछ चाहिए आपको?" मैंने उनके करीब जाकर पूछा।
"नहीं बेटा, सब कुछ तो है। तुम इतना सब ले आते हो कि मुझे अब किसी चीज़ की कमी ही नहीं लगती," उन्होंने एक थकी हुई, असहाय सांस ली और मेरी आँखों में देखा, "पर कभी-कभी इस खाली घर में... मुझे डर लगने लगता है।"
उनकी आँखों में वही मातृसुलभ भोलापन और एक गहरी विवशता थी। उनके लिए मैं आज भी सिर्फ़ उनका वही बेटा था जो उनकी परवाह कर रहा था, लेकिन इस मुकम्मल अकेलेपन ने उनके भीतर यह बात गहरे से बैठा दी थी कि मेरे बिना उनका अस्तित्व अब मुमकिन नहीं है।
मैंने उनके कमज़ोर होते जा रहे हाथों को अपने मज़बूत हाथों में लिया और बेहद कोमलता से कहा, "मेरे होते हुए मेरी माँ को डरने की क्या जरूरत? इस घर में और इस दुनिया में, मैं हमेशा आपके साथ रहूँगा, आपकी हर शर्त पर, आपकी हर ख़ुशी के लिए।"
माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह इस कड़वी हकीकत और अपने इस बेटे के अत्यधिक, अटूट समर्पण के आगे खुद को पूरी तरह शांत कर चुकी थीं। इस सूने घर की दीवारों और मुकम्मल निर्भरता ने माँ को धीरे-धीरे मेरी दुनिया के नियमों के अनुसार जीने के लिए मानसिक रूप से तैयार करना शुरू कर दिया था।
दिन हफ़्तों में और हफ़्ते महीनों में बदलने लगे थे। इस बड़े और खाली घर में वक्त जैसे बहुत धीमा हो गया था। बापू के बिना और छोटू की चहचहाहट के बिना, इन कमरों की दीवारें अब और भी ऊँची और शांत लगने लगी थीं। इस पूरे एकांत में माँ का संसार धीरे-धीरे सुकड़कर बस इस घर की दहलीज और मेरे चेहरे तक ही सीमित हो गया था। मेरा उनके प्रति अगाध प्रेम ही था कि मैं उन्हें दुनिया की किसी भी परेशानी या भाग-दौड़ की आँच तक नहीं आने देना चाहता था। मैं चाहता था कि उनकी हर छोटी से छोटी ख़्वाहिश, बिना उनके माँगे ही पूरी हो जाए।
अब घर का हर एक छोटा-बड़ा काम मेरे ही हाथों से होकर गुज़रता था। रसोई के राशन से लेकर, बिजली के बिल, घर की देखरेख और यहाँ तक कि बापू के सुधार केंद्र की हर महीने की मँहगी रसीदें भी मैं खुद ही संभालता था। माँ को अब बटुआ खोलने की या पैसों के बारे में सोचने की कोई ज़रूरत नहीं रह गई थी।
एक दोपहर, जब मैं ऑफिस से कुछ फाइलें लेने घर आया, तो माँ बैठक में बैठी पुरानी डायरी में कुछ हिसाब लिख रही थीं। उनके चेहरे पर वही पुराना, गंभीर और घरेलू भोलापन था।
मैंने उनके पास जाकर आहिस्ते से कहा, "माँ, आप यह सब क्या कर रही हैं?"
माँ ने चौंककर ऊपर देखा, "कुछ नहीं रवि, बस सोच रही थी कि इस महीने दूध वाले का और धोबी का हिसाब..."
"मैंने सुबह ही उन सबका पूरे साल का एडवांस पेमेंट कर दिया है माँ," मैंने मुस्कुराते हुए उनके हाथ से वह पेन ले लिया, "आप इन सब छोटी-बातों के लिए अपना सिर क्यों दुखाती हैं? बापू की दवाइयों से लेकर छोटू की हॉस्टल की फीस तक, सब कुछ सही वक़्त पर अपनी जगह पहुँच जाता है। आपको बस इस घर में आराम से रहना है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सा सूनापन और असमंजस था। वह कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन उनके पास कहने को कोई शब्द नहीं थे। इतने सालों तक जिस औरत ने पूरे घर का ताना-बाना अपने हिसाब से बुना था, आज अचानक उसके हाथों से सारी ज़िम्मेदारियाँ इतनी सहजता से छूट चुकी थीं कि वह खुद को बिल्कुल खाली महसूस करने लगी थीं।
वह चौबीसों घंटे सिर्फ़ मेरा ही चेहरा देखती थीं। सुबह चाय के वक़्त मेरा उनके सामने बैठना, दोपहर में उनकी तबियत पूछने के लिए मेरा फोन आना, और शाम को सूरज ढलते ही मेरा सब काम छोड़कर उनके पास लौट आना। उनके जीवन का हर एक कोना अब मेरे वजूद और मेरे कमाए पैसों की परछाई से घिर चुका था।
एक दिन जब मैं शाम को वापस आया, तो वह खिड़की के पास बैठी अपनी उँगलियाँ चटका रही थीं। टीवी रूम का सन्नाटा उन्हें अंदर ही अंदर भारी लग रहा था। जब इंसान के पास करने को कोई काम न हो और बात करने के लिए दुनिया में सिर्फ़ एक ही इंसान बचा हो, तो वह अकेलापन अंदर से इंसान को तोड़ने लगता है। माँ के साथ भी यही हो रहा था; वह मानसिक रूप से इस मुकम्मल अकेलेपन और मेरी अत्यधिक परवाह के नीचे धीरे-धीरे थकने लगी थीं।
"रवि..." माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में मुझे पुकारा, जब मैं उनके लिए लाकर रखी हुई ताज़ा फलों की टोकरी टेबल पर रख रहा था।
"हाँ माँ? कुछ चाहिए आपको?" मैंने उनके करीब जाकर पूछा।
"नहीं बेटा, सब कुछ तो है। तुम इतना सब ले आते हो कि मुझे अब किसी चीज़ की कमी ही नहीं लगती," उन्होंने एक थकी हुई, असहाय सांस ली और मेरी आँखों में देखा, "पर कभी-कभी इस खाली घर में... मुझे डर लगने लगता है।"
उनकी आँखों में वही मातृसुलभ भोलापन और एक गहरी विवशता थी। उनके लिए मैं आज भी सिर्फ़ उनका वही बेटा था जो उनकी परवाह कर रहा था, लेकिन इस मुकम्मल अकेलेपन ने उनके भीतर यह बात गहरे से बैठा दी थी कि मेरे बिना उनका अस्तित्व अब मुमकिन नहीं है।
मैंने उनके कमज़ोर होते जा रहे हाथों को अपने मज़बूत हाथों में लिया और बेहद कोमलता से कहा, "मेरे होते हुए मेरी माँ को डरने की क्या जरूरत? इस घर में और इस दुनिया में, मैं हमेशा आपके साथ रहूँगा, आपकी हर शर्त पर, आपकी हर ख़ुशी के लिए।"
माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह इस कड़वी हकीकत और अपने इस बेटे के अत्यधिक, अटूट समर्पण के आगे खुद को पूरी तरह शांत कर चुकी थीं। इस सूने घर की दीवारों और मुकम्मल निर्भरता ने माँ को धीरे-धीरे मेरी दुनिया के नियमों के अनुसार जीने के लिए मानसिक रूप से तैयार करना शुरू कर दिया था।
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