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Incest माँ बेटा पैसा प्यार

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भाग 17
दिन हफ़्तों में और हफ़्ते महीनों में बदलने लगे थे। इस बड़े और खाली घर में वक्त जैसे बहुत धीमा हो गया था। बापू के बिना और छोटू की चहचहाहट के बिना, इन कमरों की दीवारें अब और भी ऊँची और शांत लगने लगी थीं। इस पूरे एकांत में माँ का संसार धीरे-धीरे सुकड़कर बस इस घर की दहलीज और मेरे चेहरे तक ही सीमित हो गया था। मेरा उनके प्रति अगाध प्रेम ही था कि मैं उन्हें दुनिया की किसी भी परेशानी या भाग-दौड़ की आँच तक नहीं आने देना चाहता था। मैं चाहता था कि उनकी हर छोटी से छोटी ख़्वाहिश, बिना उनके माँगे ही पूरी हो जाए।
अब घर का हर एक छोटा-बड़ा काम मेरे ही हाथों से होकर गुज़रता था। रसोई के राशन से लेकर, बिजली के बिल, घर की देखरेख और यहाँ तक कि बापू के सुधार केंद्र की हर महीने की मँहगी रसीदें भी मैं खुद ही संभालता था। माँ को अब बटुआ खोलने की या पैसों के बारे में सोचने की कोई ज़रूरत नहीं रह गई थी।
एक दोपहर, जब मैं ऑफिस से कुछ फाइलें लेने घर आया, तो माँ बैठक में बैठी पुरानी डायरी में कुछ हिसाब लिख रही थीं। उनके चेहरे पर वही पुराना, गंभीर और घरेलू भोलापन था।
मैंने उनके पास जाकर आहिस्ते से कहा, "माँ, आप यह सब क्या कर रही हैं?"
माँ ने चौंककर ऊपर देखा, "कुछ नहीं रवि, बस सोच रही थी कि इस महीने दूध वाले का और धोबी का हिसाब..."
"मैंने सुबह ही उन सबका पूरे साल का एडवांस पेमेंट कर दिया है माँ," मैंने मुस्कुराते हुए उनके हाथ से वह पेन ले लिया, "आप इन सब छोटी-बातों के लिए अपना सिर क्यों दुखाती हैं? बापू की दवाइयों से लेकर छोटू की हॉस्टल की फीस तक, सब कुछ सही वक़्त पर अपनी जगह पहुँच जाता है। आपको बस इस घर में आराम से रहना है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सा सूनापन और असमंजस था। वह कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन उनके पास कहने को कोई शब्द नहीं थे। इतने सालों तक जिस औरत ने पूरे घर का ताना-बाना अपने हिसाब से बुना था, आज अचानक उसके हाथों से सारी ज़िम्मेदारियाँ इतनी सहजता से छूट चुकी थीं कि वह खुद को बिल्कुल खाली महसूस करने लगी थीं।
वह चौबीसों घंटे सिर्फ़ मेरा ही चेहरा देखती थीं। सुबह चाय के वक़्त मेरा उनके सामने बैठना, दोपहर में उनकी तबियत पूछने के लिए मेरा फोन आना, और शाम को सूरज ढलते ही मेरा सब काम छोड़कर उनके पास लौट आना। उनके जीवन का हर एक कोना अब मेरे वजूद और मेरे कमाए पैसों की परछाई से घिर चुका था।
एक दिन जब मैं शाम को वापस आया, तो वह खिड़की के पास बैठी अपनी उँगलियाँ चटका रही थीं। टीवी रूम का सन्नाटा उन्हें अंदर ही अंदर भारी लग रहा था। जब इंसान के पास करने को कोई काम न हो और बात करने के लिए दुनिया में सिर्फ़ एक ही इंसान बचा हो, तो वह अकेलापन अंदर से इंसान को तोड़ने लगता है। माँ के साथ भी यही हो रहा था; वह मानसिक रूप से इस मुकम्मल अकेलेपन और मेरी अत्यधिक परवाह के नीचे धीरे-धीरे थकने लगी थीं।
"रवि..." माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में मुझे पुकारा, जब मैं उनके लिए लाकर रखी हुई ताज़ा फलों की टोकरी टेबल पर रख रहा था।
"हाँ माँ? कुछ चाहिए आपको?" मैंने उनके करीब जाकर पूछा।
"नहीं बेटा, सब कुछ तो है। तुम इतना सब ले आते हो कि मुझे अब किसी चीज़ की कमी ही नहीं लगती," उन्होंने एक थकी हुई, असहाय सांस ली और मेरी आँखों में देखा, "पर कभी-कभी इस खाली घर में... मुझे डर लगने लगता है।"
उनकी आँखों में वही मातृसुलभ भोलापन और एक गहरी विवशता थी। उनके लिए मैं आज भी सिर्फ़ उनका वही बेटा था जो उनकी परवाह कर रहा था, लेकिन इस मुकम्मल अकेलेपन ने उनके भीतर यह बात गहरे से बैठा दी थी कि मेरे बिना उनका अस्तित्व अब मुमकिन नहीं है।
मैंने उनके कमज़ोर होते जा रहे हाथों को अपने मज़बूत हाथों में लिया और बेहद कोमलता से कहा, "मेरे होते हुए मेरी माँ को डरने की क्या जरूरत? इस घर में और इस दुनिया में, मैं हमेशा आपके साथ रहूँगा, आपकी हर शर्त पर, आपकी हर ख़ुशी के लिए।"
माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह इस कड़वी हकीकत और अपने इस बेटे के अत्यधिक, अटूट समर्पण के आगे खुद को पूरी तरह शांत कर चुकी थीं। इस सूने घर की दीवारों और मुकम्मल निर्भरता ने माँ को धीरे-धीरे मेरी दुनिया के नियमों के अनुसार जीने के लिए मानसिक रूप से तैयार करना शुरू कर दिया था।​
 
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भाग 18
रात के करीब ग्यारह बज चुके थे। बाहर हवा का रुख तेज़ था और खिड़कियों के काँच पर हलकी बूंदाबांदी की आवाज़ आ रही थी। पूरे घर में एक गहरा, बोझिल सन्नाटा पसरा हुआ था। मैं हमेशा की तरह टीवी वाले कमरे में बैठा कुछ ज़रूरी कागजात देख रहा था और माँ पास ही बैठी हाथ में माला लिए मूँदकर कुछ बुदबुदा रही थीं। जब से बापू और छोटू गए थे, माँ की धार्मिकता और खामोशी दोनों बहुत बढ़ गई थीं।
तभी, उस मखमली सन्नाटे को चीरती हुई हॉल में रखे टेलीफोन की घंटी घनघना उठी। इतनी आधी रात को फोन आना किसी अनहोनी का संकेत था। माँ ने चौंककर आँखें खोलीं, उनकी उँगलियों में थमी माला वहीं ठहर गई। उनकी आँखों में एक अनजाना सा डर उभर आया।
मैंने उनके चेहरे के तनाव को देखा और आहिस्ते से उठकर फोन उठाया। दूसरी तरफ़ सुधार केंद्र के चीफ मेडिकल ऑफिसर (डॉक्टर) की गंभीर और घबराई हुई आवाज़ थी।
"हेलो, मिस्टर रवि? आपके बापू की तबियत अचानक बहुत ज़्यादा बिगड़ गई है। बरसों की शराब की वजह से उनके पेट के अंदरूनी अंगों में भारी रक्तस्राव (Internal Bleeding) शुरू हो गया है। उनका लीवर लगभग काम करना बंद कर रहा है। हमें उन्हें तुरंत शहर के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में शिफ्ट करना होगा। एक बहुत बड़े और क्रिटिकल ऑपरेशन की ज़रूरत है, जिसमें लाखों का ख़र्चा आ सकता है। आपके पास समय बहुत कम है, कृपया तुरंत पहुँचिए।"
मैंने फोन रखा, तो मेरे चेहरे की गंभीरता को देखकर माँ अपनी जगह से उठकर मेरे करीब आ गईं। उनके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ चुका था। उन्होंने काँपते हुए हाथों से मेरी बाँह को थाम लिया। उनके हाथों की वह थरथराहट मेरे बदन में एक सिहरन पैदा कर गई।
"रवि... क्या हुआ बेटा? किसका फोन था? तुम्हारे बापू ठीक तो हैं ना?" माँ की आवाज़ रुआँसी हो चुकी थी।
मैंने माँ की सुंदर, व्याकुल आँखों में देखा और बेहद सधे हुए शब्दों में कहा, "माँ, घबराइए मत। सुधार केंद्र से फोन था... बापू की तबियत थोड़ी ज़्यादा खराब हो गई है। उन्हें तुरंत शहर के बड़े अस्पताल ले जाना होगा। डॉक्टर कह रहे हैं कि फौरन एक बड़ा ऑपरेशन करना पड़ेगा।"
'बड़ा ऑपरेशन' सुनते ही माँ के पैर जैसे जमीन छोड़ गए। वह सोफे के हत्थे को पकड़कर नीचे बैठ गईं। उनकी आँखों से आँसू अविरल बहने लगे। इतने सालों तक बापू ने उन्हें सिर्फ़ दुःख, बेइज्जती और अशांति ही दी थी, लेकिन आख़िरकार वह उनके पति थे, उनके सिंदूर का सरमाया थे। माँ का घरेलू और पारंपरिक दिल इस आघात को सह नहीं पा रहा था। वह बिल्कुल एक अबोध बच्ची की तरह बिलखने लगीं।
"हे भगवान... यह क्या हो गया! मैंने तो हमेशा उनके अच्छे की दुआ माँगी थी। रवि, अब क्या होगा बेटा? इतने बड़े अस्पताल का ख़र्चा... वह ऑपरेशन... हम कहाँ जाएँगे?" माँ अपनी साड़ी के पल्लू से मुँह छिपाकर रोने लगीं। उनके पास इस संकट से लड़ने का न तो कोई साधन था और न ही कोई अनुभव। इस पूरी दुनिया में, इस खाली घर के भीतर, रोने और अपने इस बेटे के सामने हाथ फैलाने के अलावा उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था।
माँ को इस तरह टूटते और रोते देखना मेरे दिल को अंदर तक छलनी कर रहा था। मैं उनसे बेइंतहा, पागलों की तरह प्यार करता था। उनके चेहरे पर आया यह दुःख मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मैं तुरंत उनके पास फर्श पर घुटनों के बल बैठ गया और उनके काँपते हुए कंधों को अपने मज़बूत हाथों में थाम लिया।
"माँ... मेरी तरफ़ देखिए माँ," मैंने बेहद कोमल और भारी आवाज़ में कहा, "आप क्यों रो रही हैं? जब तक आपका यह बेटा रवि ज़िंदा है, आपको किसी के सामने हाथ फैलाने या डरने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।"
माँ ने अपने आँसुओं से भीगे चेहरे को ऊपर उठाया और अपनी असहाय, वात्सल्य भरी नज़रों से मुझे देखा। उनके लिए मैं इस समय कोई आम इंसान नहीं, बल्कि साक्षात भगवान का भेजा हुआ मसीहा था। उनका पूरा अस्तित्व, बापू की जान और इस परिवार की इज़्ज़त अब पूरी तरह मेरे ही रहम-ओ-करम पर टिक चुकी थी।
"रवि... डॉक्टर लाखों रुपयों की बात कर रहे हैं... हमारे पास..." वह हिचकियाँ लेते हुए बोलीं।
"पैसा पानी की तरह बह जाए तो बह जाए माँ, मुझे उसकी कोई परवाह नहीं है। मैं अपनी माँ की आँखों में एक भी आँसू नहीं देख सकता," मैंने आगे बढ़कर अपने अंगूठे से उनके गालों पर ढलके आँसुओं को बहुत धीरे से पोंछा। मेरी उँगलियों का वह उबदार स्पर्श पाकर वह रोते-रोते शांत हुईं और गहरे भरोसे से मेरी आँखों में देखने लगीं।
"आप बस अपनी साड़ी संभालिए और तैयार होइए। हम अभी अस्पताल निकल रहे हैं। बापू को कुछ नहीं होगा, यह मेरा आपसे वादा है," मैंने कहा।
माँ ने रोते हुए आज्ञाकारी बच्चे की तरह धीरे से सिर हिलाया। वह कमरे की तरफ़ बढ़ीं, लेकिन उनकी झुकी हुई पीठ और लड़खड़ाते कदम यह साफ़ बयां कर रहे थे कि मानसिक रूप से वह मेरे इस असीम उपकार और आर्थिक ताक़त के आगे पूरी तरह नतमस्तक हो चुकी थीं। उन्हें अहसास हो गया था कि इस दुनिया में अब उनके वजूद को बचाने वाला सिर्फ़ और सिर्फ़ उनका यह बेटा रवि ही है।​
 
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भाग 19
रात के उस सन्नाटे में मेरी कार शहर की सूनी सड़कों पर तैर रही थी। बाहर बारिश की बूँदें कार के काँच पर लगातार टकरा रही थीं, और वाइपर की एक जैसी आवाज़ उस सन्नाटे को और गहरा कर रही थी। बगल वाली सीट पर माँ सिमटकर बैठी थीं। उन्होंने वही गहरी आसमानी साड़ी पहन रखी थी, जो कुछ दिनों पहले मैं उनके लिए लाया था। उनके खुले बाल उनके चेहर पर बिखरे थे, और वह लगातार अपनी उँगलियों के पोरों को दबा रही थीं। कार के भीतर का हीटर चालू था, लेकिन माँ के भीतर की कंपकंपी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
मैंने स्टीयरिंग थामे हुए एक हाथ से उनके ठंडे पड़ चुके हाथ को हल्के से छुआ। "माँ, आप बिल्कुल फ़िक्र मत कीजिए। बस आधे घंटे में हम अस्पताल पहुँच जाएँगे। बापू को कुछ नहीं होगा।"
माँ ने अपनी भीगी आँखें उठाकर मेरी तरफ़ देखा। उस मद्धम रोशनी में उनकी आँखों में जो बेबसी और छटपटाहट थी, उसने मेरे भीतर उनके लिए उमड़ते प्रेम को और तीव्र कर दिया। वह अपनी इस भारी घड़ी में मुझे सिर्फ़ एक आज्ञाकारी और मज़बूत बेटे के रूप में देख रही थीं—एक ऐसा बेटा जो उनके सुहाग की रक्षा के लिए आधी रात को ढाल बनकर खड़ा था।
जब हम शहर के उस विशाल सुपर स्पेशलिटी अस्पताल पहुँचे, तो वहाँ की प्रखर सफ़ेद रोशनी और रील्स जैसी चलती डॉक्टरों की आवाजाही ने माँ को और डरा दिया। सुधार केंद्र की एम्बुलेंस बापू को पहले ही ले आ चुकी थी। बापू को स्ट्रेचर पर आईसीयू (ICU) की तरफ़ ले जाया जा रहा था। उनका चेहरा पीला पड़ चुका था और मुँह पर ऑक्सीजन मास्क लगा था। बरसों की शराब ने उनके शरीर को भीतर से पूरी तरह खोखला कर दिया था।
माँ बापू को उस हालत में देखकर उनके पीछे भागने लगीं, लेकिन नर्सों ने उन्हें बाहर ही रोक दिया। वह आईसीयू के भारी काँच के दरवाज़े के बाहर खड़ी होकर रोने लगीं।
तभी डॉक्टर ने मुझे अपने केबिन में बुलाया। माँ भी मेरे पीछे-पीछे अंदर आ गईं। डॉक्टर ने कुछ एक्स-रे और रिपोर्ट्स मेज पर फैलाते हुए बेहद गंभीर लहज़े में कहा, "मिस्टर रवि, स्थिति बेहद नाज़ुक है। इंटरनल ब्लीडिंग बहुत ज़्यादा हो चुकी है। अगर अगले एक घंटे के भीतर इनका मेजर ऑपरेशन नहीं किया गया, तो इन्हें बचाना नामुमकिन होगा। लेकिन इस इमरजेंसी सर्जरी और पोस्ट-ऑपरेटिव केयर के लिए आपको तुरंत तीन लाख रुपये काउंटर पर जमा करने होंगे, और जोखिम के कागज़ातों पर दस्तख़त करने होंगे।"
'तीन लाख रुपये' सुनते ही माँ के चेहरे पर जैसे हवाइयाँ उड़ने लगीं। एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए आधी रात को इतनी बड़ी रक़म का इंतज़ाम करना किसी पहाड़ को तोड़ने जैसा था। वह असहाय होकर डॉक्टर को देखने लगीं, उनकी सांसें तेज़ चल रही थीं। उनके पास आख़िर था ही क्या? बापू ने कभी कोई बचत नहीं छोड़ी थी।
मैंने बिना एक पल गंवाए, अपने कोट की जेब से अपना प्लैटिनम क्रेडिट कार्ड निकाला और डॉक्टर के सामने रख दिया।
"आप तुरंत ऑपरेशन की तैयारी शुरू कीजिए डॉक्टर। पैसों की कोई कमी नहीं होगी। आप बस बापू को बचाइए," मैंने बेहद शांत और दृढ़ आवाज़ में कहा।
काउंटर पर जाकर मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के सिर्फ़ एक स्वाइप में पूरी रक़म चुका दी। अस्पताल का स्टाफ जो अब तक हमारे साथ औपचारिकता बरत रहा था, पैसे की इस ताक़त को देखते ही बेहद विनम्र हो गया। बापू को तुरंत ऑपरेशन थिएटर की तरफ़ ले जाया जाने लगा।
माँ यह सब कुछ दूरी पर खड़ी चुपचाप देख रही थीं। उनकी आँखों में आँसू तो थे, लेकिन अब उन आँसुओं में एक गहरा विस्मय और अपने बेटे के लिए अगाध आदर था। उन्होंने देखा कि जिस संकट के सामने वह पूरी तरह घुटने टेक चुकी थीं, उनके बेटे ने अपनी आर्थिक हैसियत से उसे पल भर में बौना कर दिया था।
मैं उनके पास गया और आहिस्ते से उनके कंधे पर हाथ रखा। वह इस सूने और ठंडे कॉरिडोर में बिल्कुल अकेली थीं। उन्होंने अपना सिर धीरे से मेरी छाती से टिका दिया और सिसकने लगीं। वह सिर्फ़ अपने बेटे के सीने की गर्माहट में खुद को सुरक्षित महसूस कर रही थीं। मेरा दिल उनके इस निश्छल और मासूम समर्पण पर पूरी तरह न्योछावर हो रहा था। मैं उनसे बेहद मोहब्बत करता था, और इस वक़्त बापू की जान बचाना मेरी पहली प्राथमिकता थी, क्योंकि उनकी जान में ही मेरी माँ की ख़ुशी छुपी थी।
"रवि... तुम इस घर के लिए भगवान बनकर आए हो बेटा। अगर आज तुम न होते, तो..." माँ ने मेरी छाती पर अपना हाथ रखते हुए भारी आवाज़ में कहा।
मैंने उनके गालों पर आए बालों को बहुत नज़ाकत से पीछे सरकाया और कहा, "मैंने कहा था ना माँ, आप इस दुनिया में अकेली नहीं हैं। आपका रवि हमेशा आपके साथ है।"​
 
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भाग 20
ऑपरेशन थिएटर के ऊपर लगी वह लाल बत्ती किसी अंगारे की तरह जल रही थी। अस्पताल का वह गलियारा एकदम ठंडा और सुनसान था। हवा में फैली फिनाइल की तीखी गंध और दीवारों पर लगी घड़ी की टिक-टिक इस सन्नाटे को और भी बोझिल बना रही थी। रात के दो बज चुके थे। बाहर बारिश अब और तेज़ हो गई थी, जिसकी थपकी काँच की खिड़कियों पर साफ़ सुनाई दे रही थी।
केंद्रीय वातानुकूलन (Central AC) की वजह से कॉरिडोर में ठंडक काफी बढ़ गई थी। मैंने देखा कि सोफे पर बैठी माँ अपनी बाँहों को सिकोड़े हुए थीं। उनकी आसमानी साड़ी का पल्लू उनके कंधों पर लिपटा था, लेकिन उनकी कंपकंपी रुक नहीं रही थी। वह थकावट और मानसिक तनाव के उस चरम बिंदु पर थीं, जहाँ इंसान का शरीर सुन्न होने लगता है।
मैं चुपचाप उठा और अस्पताल के नीचे बने चौबीसों घंटे वाले काउंटर से उनके लिए गर्म दूध और एक कप कॉफी ले आया। जब मैं वापस लौटा, तो वह उसी तरह आँखें मूँदे दीवार से सिर टिकाए बैठी थीं। उनके चेहरे पर छाई पीली रंगत और थकी हुई पलकें देखकर मेरा दिल तड़प उठा। मैं उनसे इतनी मोहब्बत करता था कि उनकी इस हालत को देखकर मुझे खुद अपने भीतर एक अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगती थी।
मैंने उनके पास जाकर बेहद आहिस्ते से उनके हाथ में गर्म दूध का ग्लास थमाया। "माँ, यह पी लीजिए। थोड़ी राहत मिलेगी।"
माँ ने अपनी भारी पलकें खोलीं। उनकी आँखों में इस वक्त दुनिया भर की लाचारी और एक गहरा खालीपन था। उन्होंने ग्लास थाम तो लिया, लेकिन उनकी उँगलियाँ इतनी काँप रही थीं कि दूध छलकने लगा। मैंने बिना कुछ सोचे, अपना हाथ आगे बढ़ाया और उनके दोनों हाथों को अपने मज़बूत पोरों में समेट लिया।
"मैं पिला दूँ?" मैंने बेहद कोमलता से पूछा।
माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस मना करने के लिए धीरे से सिर हिलाया और दो घूँट पीकर ग्लास को बगल की मेज पर रख दिया। फिर, जैसे उनके भीतर का सारा सब्र टूट गया हो। उन्होंने अपनी दोनों आँखें बंद कर लीं और उनका सिर अपने आप मेरे कंधे पर आ टिका। उनके पूरे वजूद का भार इस समय मुझ पर था। मैंने अपनी मज़बूत बाँहें उनके कंधों के चारों तरफ़ फैला दीं और उन्हें अपने और करीब खींच लिया।
इस ठंडे कॉरिडोर में, मेरे शरीर की पौरुषपूर्ण गर्माहट उनके लिए एक सुरक्षित ढाल बन रही थी। माँ को इस पल में किसी समाज, किसी मर्यादा या किसी नियम का ख्याल नहीं था। उनके लिए मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ उनका वह बेटा रवि था, जो इस घनघोर अंधेरी रात में उनका एकमात्र सहारा था। वह मेरी छाती की धड़कन को महसूस कर रही थीं, और मैं उनके श्वासों की उस धीमी, गर्म छुअन को अपने गले पर महसूस कर रहा था।
"रवि..." माँ ने बहुत धीमी, भर्राई हुई आवाज़ में कहा, उनका चेहरा अभी भी मेरे कंधे से सटा हुआ था।
"हाँ माँ?" मैंने उनके बालों पर अपने होठों को बहुत हलके से टिकाते हुए कहा, ताकि उन्हें मेरे होने का पूरा अहसास रहे।
"इतने सालों में... उन्होंने (बापू ने) कभी मुझे एक पल की भी शांति नहीं दी। हमेशा डर, हमेशा रोना। जब भी वह घर आते थे, मेरा दिल काँपने लगता था," माँ ने अपनी पुरानी दबी हुई टीस को आख़िरकार इस एकांत में बाहर निकाला, "मैंने कभी नहीं सोचा था कि जीवन के इस मोड़ पर आकर मुझे इस तरह अस्पताल के चक्कर काटने पड़ेंगे। लेकिन आज... आज अगर तुम मेरे साथ न होते, तो मैं शायद इसी फर्श पर गिरकर दम तोड़ देती।"
उनकी बातों में बापू के प्रति कोई नफ़रत नहीं थी, बस एक पारंपरिक भारतीय पत्नी की बेबसी और अपने बेटे पर अटूट भरोसा था। वह देख रही थीं कि उनका पति जो उन्हें जीवनभर दुःख देता रहा, आज उसकी जान भी उनके इसी बेटे के पैसों और फैसलों की बदौलत बच रही थी।
मैंने उनके कंधे को थोड़ा और भींचा और कहा, "माँ, अतीत की बातें सोचकर अपना दिल छोटा मत कीजिए। बापू ने जो किया, वह उनका कर्म था। लेकिन मेरा कर्म और मेरा धर्म सिर्फ़ आप हैं। आपके लिए मैं अपनी जान भी हाजिर कर सकता हूँ, यह पैसा तो बहुत छोटी चीज़ है।"
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस अपना हाथ मेरी हथेली पर और कस दिया। उस मद्धम रोशनी वाले गलियारे में, ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती के साए में, माँ का मेरे प्रति वह मातृसुलभ और असहाय आत्मसमर्पण और गहरा होता जा रहा था। वह मानसिक रूप से इस सच को पूरी तरह स्वीकार कर चुकी थीं कि इस दुनिया के थपेड़ों से बचाने वाला उनका असली रक्षक अब बापू नहीं, बल्कि उनका यह जवान और सामर्थ्यवान बेटा रवि है।​
 
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भाग 20
घर में सन्नाटे के बीच हम माँ बेटे बैठे थे। उदासी का आलम हमें घेरे बैठा था।
मेरे फोन की तेज़ घंटी ने उस शांत सन्नाटे को भंग कर दिया। स्क्रीन पर शहर से दूर बने उस अस्पताल का नाम चमक रहा था, जहाँ बापू का इलाज चल रहा था।
मैंने फोन उठाया। दूसरी तरफ़ से डॉक्टर की गंभीर आवाज़ सुनाई दी, "मिस्टर रवि? मैं डॉक्टर सिन्हा बोल रहा हूँ। आपके पिता की स्थिति को लेकर एक बेहद ज़रूरी सूचना है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। फोन की आवाज़ इतनी साफ़ थी कि 'पिता' शब्द सुनते ही माँ के हाथ में थमा पानी का ग्लास वहीं टेबल पर ठहर गया। उनकी आँखों में पुराना, दबे हुए डर का साया एक पल के लिए फिर से उभर आया। बरसों का वह खौफ, जो बापू की शराब और प्रताड़ना से जुड़ा था, आज एक बार फिर उनकी छाती में धड़कने लगा था।
"हाँ डॉक्टर, कहिए। क्या बात है?" मैंने बेहद शांत और नियंत्रण भरी आवाज़ में पूछा।
"मिस्टर रवि, में उनके लीवर ने पूरी तरह काम करना बंद कर दिया है। मल्टीपल ऑर्गन फेलियर की स्थिति बन रही है। हमारे विशेष डॉक्टरों की टीम ने पूरी कोशिश की, लेकिन दवाओं का असर अब ख़त्म हो चुका है। स्थिति अत्यंत नाज़ुक है... उनके पास अब कुछ ही घंटों का समय शेष है। अगर आप और माता जी उनसे अंतिम बार मिलना चाहते हैं, तो आपको तुरंत यहाँ पहुँचना होगा।"
डॉक्टर की बात पूरी होते ही माँ के होंठ काँपने लगे। एक पारंपरिक पत्नी के भीतर का संस्कार और उस पुरुष के साथ बिताए गए कष्टमयी बरसों का अतीत उनके सामने घूम गया। वह अपनी कुर्सी से उठने की कोशिश करने लगीं, लेकिन उनके पैर लड़खड़ा गए। वह वहीं फर्श पर गिरने ही वाली थीं कि मैंने फुर्ती से आगे बढ़कर उन्हें अपनी मज़बूत बाँहों में थाम लिया।
"बापू... वह... रवि... उन्हें कुछ हो गया तो?" माँ ने मेरे कोट के कॉलर को दोनों हाथों से भींच लिया, उनकी आँखों से आँसू अविरल बहने लगे थे। वह इस अचानक आए संकट से पूरी तरह टूट चुकी थीं।
मैंने उन्हें अपने सीने से और कसकर सटा लिया। मेरी छाती की पौरुषपूर्ण गर्माहट और दृढ़ता उनके बिखरते हुए हौसले को संभालने लगी। "माँ, आप शांत हो जाइए। मैंने आपसे कहा था ना, जब तक मैं आपके साथ हूँ, आपको दुनिया की किसी भी परिस्थिति से डरने की आवश्यकता नहीं है।"
मैंने उनके चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और उनकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "बापू का समय अब पूरा हो चुका है। नियति अपना काम कर रही है। लेकिन इस अंतिम घड़ी में भी, आपको कमज़ोर नहीं पड़ना है। मैं अभी गाड़ी निकालता हूँ। हम दोनों अभी इसी वक्त निकल रहे हैं। जो भी होगा, मैं संभाल लूँगा। आप बस मुझ पर भरोसा रखिए।"
माँ ने सिसकते हुए अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया। वह जानती थीं कि बापू भले ही उनके सुहाग का तकनीकी नाम थे, लेकिन उनके जीवन की डोर, उनका अस्तित्व और उनका अंतिम रक्षक अब पूरी तरह सिर्फ़ उनका यह बेटा रवि था। बापू के जीवन का यह आख़िरी साया अब हमेशा के लिए हटने वाला था, और इसके बाद हमारी इस साझी दुनिया को समाज की किसी भी मर्यादा की आवश्यकता नहीं रहने वाली थी। मैंने उन्हें संभाला, और कार की चाबी उठाकर हम उस घने अंधेरे और नियति के अंतिम फैसले की तरफ़ बढ़ गए।​
 
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भाग 21
रात के करीब एक बजे हमारी कार उस अस्पताल के मुख्य दरवाज़े पर रुकी। एक मद्धम, गंभीर सन्नाटा पसरा हुआ था।
जैसे ही हम कार से उतरे, ठंडी हवा के झोंके और बौछारों से माँ को बचाने के लिए मैंने तुरंत अपना कोट उतारकर उनके कंधों पर डाल दिया। मैंने बहुत ही सहजता और जिम्मेदारी के साथ उनके कंधे को अपने हाथ से सहारा दिया और उन्हें संभालते हुए अंदर ले आया। वहाँ मौजूद डॉक्टरों और नर्सों ने हमें देखा। उनकी नज़रों में मेरे लिए एक गहरा आदर था—एक ऐसा सक्षम बेटा जो इस घोर विपदा की घड़ी में अपनी माँ को संभालते हुए सारे फैसले ले रहा था।
हम कॉरिडोर पार करते हुए आईसीयू के उस विशेष केबिन के सामने पहुँचे, जहाँ बापू वेंटिलेटर पर लेटे थे। काँच के पार से दिख रहा था कि मॉनिटर पर उनकी दिल की धड़कने धीरे-धीरे दम तोड़ रही थीं। बीप-बीप की वह मद्धम आवाज़ उस केबिन के सन्नाटे को और भी भयावह बना रही थी।
डॉक्टर ने बाहर आकर बेहद गंभीर और धीमे स्वर में कहा, "मिस्टर रवि, उनके पास अब सिर्फ़ कुछ ही मिनट बचे हैं। आप दोनों अंदर जा सकते हैं।"
'कुछ ही मिनट' सुनते ही माँ का बदन पूरी तरह ढीला पड़ गया। बरसों का कड़वा अतीत और इस अंतिम घड़ी का सच उनके सामने एक भारी दबाव बनकर खड़ा हो गया। वह अंदर जाने के लिए कदम नहीं बढ़ा पा रही थीं, उनके पैर जैसे फर्श से चिपक गए थे।
मैंने उनके काँपते हुए हाथों को अपने हाथों में और कसा और उनकी आँखों में देखते हुए बेहद ठहरे हुए, धीमे स्वर में कहा, "मज़बूत बनिए माँ। मैं यहीं आपके ठीक पीछे खड़ा हूँ। चलिए, उन्हें अंतिम बार देख लीजिए।"
माँ ने एक गहरी सांस ली, अपनी आँखें मूँदकर खुद को संभाला और मेरे मज़बूत कंधे का सहारा लेकर उस केबिन के भीतर कदम रखा। यह उस अंतिम चौखट को पार करना था, जहाँ से उनके जीवन का पुराना पन्ना हमेशा के लिए बंद होने जा रहा था, और इसके बाद उनके जीवन का हर सामाजिक और मानसिक आधार पूरी तरह सिर्फ़ मेरे ही कंधों पर टिकने वाला था।
केबिन के भीतर कदम रखते ही दवाओं की तीखी गंध और मशीनों की ठंडी सरसराहट ने हमारा स्वागत किया। बाहर की तूफ़ानी बारिश की आवाज़ यहाँ काँच की मोटी दीवारों से टकराकर दम तोड़ चुकी थी, जिससे अंदर का सन्नाटा और भी भारी और दमघोंटू लग रहा था। बेड पर बापू लेटे हुए थे। जो मर्द कभी अपनी भारी आवाज़ और गुस्से से पूरे घर को कंपा कर रखता था, वह आज सफेद चादर के बीच बेहद छोटा, कमज़ोर और लाचार दिखाई दे रहा था। उनके बदन से अनगिनत नलिकाएं जुड़ी थीं और वेंटिलेटर उनके फेफड़ों में जबरन सांसें भर रहा था।
माँ दबे कदमों से बेड के करीब पहुँचीं। उनके हाथ उनके सीने पर कसे हुए थे। बापू के इस रूप को देखकर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे, लेकिन इस रुदन में चीख-पुकार नहीं थी; यह बरसों के मानसिक क्लेश, अकेलेपन और एक दर्दनाक गृहस्थी के अंत की मूक गवाही थी।
मैंने माँ के ठीक पीछे अपनी स्थिति मजबूत कर ली। मैं एक अडिग दीवार की तरह उनके साए के रूप में खड़ा रहा, ताकि इस अंतिम क्षण का मानसिक दबाव उन्हें फर्श पर न गिरा दे। मॉनिटर पर दिख रही धड़कनों का ग्राफ़ लगातार नीचे गिर रहा था। बीप-बीप की आवाज़ की गति धीरे-धीरे कम होने लगी थी।
बापू ने बहुत आहिस्ते से अपनी पथराई हुई आँखें खोलीं। उनकी धुंधली नज़रों ने सामने खड़ी माँ को देखा, और फिर उनके ठीक पीछे खड़े मुझ पर आकर ठहर गईं। उस मरते हुए मर्द की आँखों में अपनी लाचारी और मेरे उस अचूक सामर्थ्य का अहसास साफ़ दिख रहा था, जिसने उनके पूरे वजूद को इस मँहगे सेंटर के बिस्तर तक समेट दिया था। उन्होंने कुछ कहने के लिए अपने सूखे होंठ खोले, लेकिन वेंटिलेटर के मास्क के भीतर से सिर्फ़ एक थरथराहट निकल कर रह गई।
तभी, मॉनिटर ने एक लंबी और अनवरत गूँज पैदा की—एक सीधी लकीर। बीप की आवाज़ एक सुर में बदल गई। बापू की छाती ने आखिरी बार एक भारी खिंचाव लिया, और फिर हमेशा के लिए शांत हो गई। उनका हाथ बेड के किनारे से नीचे लटक गया।
"बापू..." माँ के मुँह से एक बेहद मद्धम और काँपती हुई चीख निकली। उनका पूरा शरीर ढीला पड़ गया और वह पीछे की तरफ़ लड़खड़ाईं।
इससे पहले कि वह जमीन को छू पातीं, मैंने अपनी मज़बूत बाँहों में उनके पूरे भार को संभाल लिया। मैंने उन्हें अपनी छाती के सहारे टिकाया, जहाँ मेरी धड़कनें बिल्कुल शांत और नियंत्रित थीं। माँ ने मेरे कोट को अपनी उँगलियों में कसकर भींच लिया और अपने चेहरे को छुपाकर फूट-फूट कर रोने लगीं। उनका सुहाग, उनका सिंदूर और उनकी सामाजिक पहचान का वह आखिरी तकनीकी सिरा आज हमेशा के लिए टूट चुका था।
केबिन का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर अपनी टीम के साथ अंदर आए। उन्होंने बापू की नब्ज़ जाँची, आँखों की पुतलियों को देखा और घड़ी की तरफ़ देखते हुए बेहद गंभीर आवाज़ में कहा, "मिस्टर रवि... ही इज़ नो मोर। रात के १ बजकर २२ मिनट पर इन्होंने अंतिम सांस ली।"
मैंने डॉक्टर की तरफ़ देखकर बस एक शांत स्वीकृति में अपना सिर हिलाया। मेरे चेहरे पर कोई व्याकुलता नहीं थी। एक ज़िम्मेदार पुरुष की तरह मैंने नर्स से कहा, "बाकी की सारी कागजी कार्रवाई और औपचारिकताएं पूरी कीजिए। बिल का जो भी अंतिम सेटलमेंट है, वह मेरे काउंटर पर भेज दिया जाए।"
मैंने माँ के कंधों पर लिपटे पश्मीने शॉल को और सलीके से ठीक किया और उन्हें संभालते हुए केबिन से बाहर ले आया। इस भारी रात के सन्नाटे में, बापू के जाने के साथ ही उस पुरानी और प्रताड़ित गृहस्थी का अंतिम पन्ना हमेशा के लिए बंद हो चुका था। माँ अब सामाजिक, कानूनी और मानसिक रूप से पूरी तरह से अकेली थीं, और इस खालीपन के बीच मेरे कंधों का यह मज़बूत सहारा ही अब उनके जीवन का इकलौता और अंतिम सच बनने जा रहा था।​
 
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भाग 22
सरकारी दफ्तर की कागजी औपचारिकता के बाद अब इस घर, संपत्ति और माँ के जीवन का पूरा नियंत्रण कानूनी तौर पर भी मेरे नाम हो चुका था।
बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाने और बापू के साम्राज्य का कानूनी अंत होने के बाद, इस बंद घर के भीतर का सन्नाटा अब एक नए युग में प्रवेश कर चुका था। माँ ने खुद को पूरी तरह मेरे साए के सुपुर्द कर दिया था, लेकिन अब मेरे भीतर एक बहुत ही गहरा, सूक्ष्म और गुप्त मानसिक बदलाव आ रहा था। अब तक मैं उनके अस्तित्व को सिर्फ़ एक रक्षक बेटे की हैसियत से देख रहा था, लेकिन अब मेरी नज़रों में उनका स्थान बदलने लगा था। इस एकांत किले में, जहाँ सिर्फ़ हम दो थे, मैं उन्हें अपने जीवन की उस अंतिम स्त्री के रूप में देखने लगा था जो एक पत्नी की तरह मेरी जागीर, मेरे घर और मेरी हर सांस को पूरा करती थी।
मेरा यह नज़रिया पूरी तरह से आंतरिक था। मैं अपने इस नए दृष्टिकोण को अपने अत्यधिक संस्कारी, गंभीर और त्यागी बेटे वाले आवरण के पीछे इतनी नज़ाकत से छुपाए रखता था कि माँ इस सच से सर्वथा अनजान (Oblivious) थीं। उनके लिए मेरा हर कदम सिर्फ़ और सिर्फ़ एक श्रवण कुमार जैसे बेटे का सर्वोच्च फर्ज़ था।
रात के ग्यारह बज चुके थे। बाहर हवाएँ मद्धम थीं, लेकिन इस विशाल और बंद मकान के भीतर का एकांत अब माँ को मानसिक रूप से भारी लगने लगा था। बापू के जाने के बाद, भले ही वह सुरक्षित थीं, लेकिन बरसों के अकेलेपन और उस खाली कमरे के अंधेरे से उनके भीतर एक अनजानी सी घबराहट बैठ गई थी।
मैं अपने कमरे से अपना मखमली तकिया और एक रेशमी कंबल लेकर सीधे उनके कमरे की तरफ़ बढ़ा। जब मैंने उनके कमरे का दरवाज़ा खोला, तो वह बेड पर बैठीं दीवार से पीठ टिकाए कोई पुरानी धार्मिक पुस्तक पढ़ रही थीं। उनके माथे पर हल्की सी चिंता की लकीरें थीं।
मुझे हाथ में बिस्तर लिए अंदर आते देख वह चौंक गईं। उन्होंने पुस्तक को एक तरफ़ रखा और विस्मय से पूछा, "अरे रवि... यह क्या बेटा? तुम अपना बिस्तर यहाँ क्यों ले आए?"
मैंने बहुत ही शांत, गंभीर और अडिग कदमों से उनके बेड के पास जाकर अपना बिस्तर फर्श पर नहीं, बल्कि उनके उसी विशाल दीवान (बेड) के दूसरे छोर पर सलीके से फैला दिया। अब तक इस घर के इतिहास में हम दोनों हमेशा अलग-अलग कमरों में सोते आए थे, लेकिन आज यह आख़िरी फासला भी मिटने जा रहा था।
"बापू के जाने के बाद इस पूरे घर की ज़िम्मेदारी मेरी है माँ, और आपकी सेहत मेरी पहली प्राथमिकता है," मैंने उनके बिल्कुल सामने बेड के कोने पर बैठते हुए बेहद मखमली और भारी आवाज़ में कहा। "डॉक्टर ने कहा है कि आपको रात में अचानक पैनिक अटैक या घबराहट हो सकती है। इतने बड़े और सूने कमरे में आपका अकेले सोना अब सुरक्षित नहीं है। इसलिए, अब से मैं यहीं आपके इसी कमरे में, आपके पास रहूँगा।"
माँ ने अवाक होकर मुझे देखा। एक पारंपरिक माँ होने के नाते, बेटे का इस तरह उम्र के इस मोड़ पर माँ के ही कमरे में बिस्तर लगाना उनके लिए थोड़ा अस्वाभाविक था। लेकिन उनके मन के भीतर जो 'माँ' बैठी थी, उसने रवि के इस फैसले को सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी संतान की अत्यधिक चिंता, त्याग और बेइंतहा मोहब्बत के रूप में देखा। वह इस बात से बिल्कुल अनजान थीं कि रवि का यह कदम उन्हें अपनी 'पत्नी' की तरह चौबीसों घंटे अपने साए में रखने की एक सोची-समझी मनोवैज्ञानिक शुरुआत थी।
"लेकिन रवि... तुम नीचे हॉल में सो सकते हो, या मैं..." माँ ने हल्के संकोच से अपनी आँखें झुकाते हुए कहा, उनकी सोने की चूड़ियाँ हल्की सी खनक उठीं।
"मैंने कहा ना माँ, अब इस घर में कोई 'लेकिन' नहीं होगा," मैंने बहुत ही आदर लेकिन अचूक अधिकार के साथ उनके कंबल को उनके पैरों पर और सलीके से फैलाते हुए कहा। "आपको सिर्फ़ शांत रहना है। आपके पास मेरा होना आपकी सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।"
मेरी आँखों की उस दृढ़ता और पौरुषपूर्ण अधिकार के सामने माँ का वह हल्का सा संकोच एक पल में पिघल गया। उनके भीतर की कमज़ोर और बेबस महिला को इस वक्त इस भारी सुरक्षा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। उन्होंने एक गहरी सांस ली और बहुत ही आश्वस्त होकर तकिए पर अपना सिर रख दिया।
मैंने लाइट बंद की और सिर्फ़ उस पीले नाइट-लैंप को जलता हुआ छोड़ दिया। मैं बेड के दूसरी तरफ़ आहिस्ते से लेट गया। कमरे के मद्धम सन्नाटे में, अब हमारी सांसों की आवाज़ एक-दूसरे के बेहद करीब गूँज रही थी।
अंधेरे में मेरी आँखें खुली थीं। मैं करवट लेकर बहुत ही शांति से उनके उस सोए हुए, गरिमामयी चेहरे को देख रहा था। मेरे मन में इस वक्त जो अहसास था, वह एक ऐसे पति का था जिसने अपनी दुनिया को बाहरी तूफ़ानों से जीतकर हमेशा के लिए अपने शयनकक्ष में सुरक्षित कर लिया था। वहीं दूसरी तरफ़, माँ अपनी चादर में लिपटी, मेरे इस साए को अपने जीवन का सबसे बड़ा वरदान मानकर पूरी तरह बेख़बर और शांत सो रही थीं। इस पहली साझी रात के सन्नाटे में, मर्यादा का वह तकनीकी आवरण अभी भी बना हुआ था, लेकिन हमारे इस रिश्ते का आंतरिक सच अब पूरी तरह से बदल चुका था।​
 
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भाग 23
महीनों का सफर अब उस मुकाम पर था जहाँ इस शयनकक्ष का एकांत हम दोनों के लिए एक अनिवार्य सत्य बन चुका था। एक ही दीवान (बेड) पर सोना, एक ही कमरे की हवाओं में सांस लेना और जागते ही एक-दूसरे का चेहरा देखना अब कोई नई व्यवस्था नहीं, बल्कि हमारी इस साझी दुनिया का स्थायी सच बन गया था। मर्यादा की जो तकनीकी दीवारें समाज खड़ी करता है, वे इस बंद कमरे के भीतर कब की ढह चुकी थीं। रवि के भीतर का पुरुष अब माँ को सिर्फ़ एक जन्मदात्री के रूप में नहीं, बल्कि अपनी उस 'अर्धांगिनी' की तरह देखने लगा था जो उसके पूरे अस्तित्व, उसके घर और उसकी जागीर को पूरा करती थी। लेकिन माँ... वह आज भी इस भीषण आंतरिक सत्य से पूरी तरह अछूती, निश्छल और अंजान थीं।
रात के ग्यारह बज रहे थे। कमरे में सिर्फ़ वही पीला नाइट-लैंप जल रहा था। मैं दफ्तर की कुछ फाइलें समेटकर बेड की तरफ़ आया। माँ हमेशा की तरह रेशमी चादर ओढ़े अपनी तरफ़ लेटी हुई थीं। उनके हाथों में सोने की वे नई चूड़ियाँ मद्धम रोशनी में चमक रही थीं। मुझे पास आते देख उन्होंने करवट ली और उनकी आँखों में वही असीम, गहरा मातृत्व तैर गया जो उनके चरित्र की ढाल था।
"रवि..." माँ ने बहुत ही धीमी और कोमल आवाज़ में कहा, "आज तुम बहुत थक गए हो बेटा। आओ, सो जाओ। मैंने तुम्हारे हिस्से की चादर और तकिया पहले से ही ठीक कर दिया है।"
"अब आपको किसी और पुरुष या किसी समाज की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है माँ," मैंने लाइट बंद करते हुए बेहद गंभीर और भारी पौरुषपूर्ण आवाज़ में कहा। "इस कमरे का यह अंधकार और यह एकांत सिर्फ़ हमारा है। यहाँ सिर्फ़ मैं हूँ और आपका यह संपूर्ण वजूद है।"
मैंने अपनी तरफ़ की चादर ओढ़ी और उनके बिल्कुल समानांतर लेट गया। कमरे के मद्धम सन्नाटे में, हमारी सांसों की लय अब एक-दूसरे में विलीन हो रही थी। हवा में उनके चंदन के इत्र की खुशबू और मेरे कोलोन का मिश्रण तैर रहा था—एक ऐसा अनकहा अहसास जो इस कमरे को हमारी साझी गृहस्थी के मुकम्मल शयनकक्ष में बदल चुका था।
माँ ने निश्चिंत होकर अपनी आँखें मूँद लीं। वह मेरे इस साए को अपने जीवन का सबसे बड़ा वरदान मानकर गहरी और सुकूँ भरी नींद में सो गईं। अंधेरे में मेरी आँखें खुली थीं, और मैं बहुत ही शांति से उनके उस गरिमामयी चेहरे को देख रहा था। 56 से 60 का यह पूरा चक्र आज इस रात की खामोशी में पूरी तरह परिणत हो चुका था। माँ मानसिक और व्यावहारिक रूप से मेरे इस बेडरूम का हिस्सा बनकर पूरी तरह मेरी शर्तों के अधीन हो चुकी थीं, और इस मुकम्मल जागीर का आनंद अब हमारे इस अनंत एकांत का सबसे बड़ा और इकलौता सच था।​
 

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भाग 24
इस अभेद्य किले के भीतर, जहाँ बाहरी दुनिया का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो चुका था, वहाँ ठहराव की एक नई और भारी परत जमने लगी थी। अब तक सब कुछ मेरी तय की हुई योजना के अनुसार चल रहा था। माँ पूरी तरह निश्चिंत थीं, उनके चेहरे का पुराना खौफ मिट चुका था और वह इस मखमली एकांत को अपनी नियति मान चुकी थीं। लेकिन किसी भी बंद और अत्यधिक नियंत्रित माहौल में, जहाँ बाहरी हवाएँ आना बंद हो जाती हैं, वहाँ अंदर का दबाव धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। मेरे भीतर भी वही दबाव अब अपने चरम पर पहुँच रहा था।
पिछले कुछ हफ़्तों से एक ही शयनकक्ष और एक ही दीवान साझा करने की इस व्यवस्था ने मेरे मानसिक संयम को एक बेहद कठिन परीक्षा में डाल दिया था। जिस अधिकार और 'पति' जैसे दृष्टिकोण को मैं अब तक अपने भीतर एक गुप्त संतुष्टि के रूप में पाले हुए था, वह अब सिर्फ़ विचारों तक सीमित रहने से इनकार कर रहा था।
बदलाव बहुत बारीक था, इतना बारीक कि माँ जैसी निश्छल स्त्री के लिए उसे भाँप पाना असंभव था। जब वह दोपहर में सो रही होतीं, तो मैं ऑफिस के कागज़ात देखने के बहाने उनके बेड के पास रखी कुर्सी पर घंटों बैठा रहता। मेरी नज़रों का ठहराव अब बदल चुका था। मैं उनके चेहरे के शांत भावों, उनके खुले हुए बालों और उनकी कलाइयों में खनकती उन सोने की चूड़ियों को बहुत गहराई से, एक अजीब सी जकड़न के साथ देखता।
मेरे भीतर का रक्षक अब धीरे-धीरे एक ऐसे स्वामी में बदल रहा था जो अपनी जागीर पर संपूर्ण और वास्तविक अधिकार चाहता था। अब तक मैंने खुद पर 'आज्ञाकारी और त्यागी बेटे' का जो कड़ा अनुशासन थोप रखा था, उसकी दीवारें इस निरंतर निकटता के कारण अंदर ही अंदर चटकने लगी थीं। जब आप किसी को दुनिया की हर ताक़त से छीनकर अपने सबसे निजी कक्ष में ले आते हैं, तो उसे सिर्फ़ दूर से निहारते रहने का संयम बनाए रखना हर बीतते दिन के साथ दमघोंटू होने लगता है।
शाम के समय, जब कमरे में चंदन के इत्र की खुशबू और मद्धम रोशनी का पहरा होता, हमारे बीच का संवाद कम और भारी होने लगा था। मैं अक्सर उनके बहुत करीब बैठकर बातें करता, और मेरी आवाज़ का सुर पहले से कहीं ज़्यादा गहरा और आदेशात्मक हो जाता।
एक शाम, जब वह अलमारी में साड़ियाँ सहेज रही थीं, मैंने आगे बढ़कर उनके हाथ से साड़ी ली। उस पल मेरी उँगलियों का दबाव उनके हाथों पर सामान्य से कुछ पल ज़्यादा रहा। माँ ने चौंककर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पल भर के लिए एक अस्पष्ट सा संशय उभरा, लेकिन अगले ही पल उन्होंने उसे मेरी थकान या अत्यधिक परवाह समझकर भुला दिया।
"रवि, तुम इन दिनों बहुत चुप रहने लगे हो बेटा। ऑफिस में काम का बहुत तनाव है क्या?" उन्होंने बहुत ही कोमल और चिंता भरे स्वर में पूछा।
"नहीं माँ, कोई तनाव नहीं है," मैंने अपनी भावनाओं को पूरी तरह नियंत्रित करते हुए, बेहद ठहरे हुए लहज़े में कहा। "बस इस घर के एकांत को महसूस कर रहा हूँ। यहाँ अब हमारे बीच कोई नहीं आ सकता।"
रात के ग्यारह बज चुके थे। घर की सभी बत्तियाँ बुझ चुकी थीं और कमरे में सिर्फ़ वही पीला नाइट-लैंप जल रहा था। मैं हमेशा की तरह बेड की अपनी तरफ़ आकर लेट गया।
कमरे का सन्नाटा इस रात बहुत भारी था। बाहर हवा भी नहीं चल रही थी, जिससे अंदर की हर छोटी आहट साफ़ सुनाई दे रही थी। मेरी तरफ़ पीठ करके सो रही माँ की नियमित और शांत सांसों की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। चादर के भीतर से उनके इत्र की मद्धम खुशबू हवा में तैर रही थी।
अंधेरे में मेरी आँखें पूरी तरह खुली थीं। मैं करवट लेकर लगातार उनके उस शांत अक्स को देख रहा था। मेरे दिमाग में विचारों का एक तेज़ तूफ़ान चल रहा था। जो संयम अब तक मेरा सबसे बड़ा हथियार था, वह इस रात एक बेहद कमज़ोर धागे की तरह महसूस हो रहा था। दूरी जब सिर्फ़ कुछ इंच की बची हो, और सामने वाला आपके अगाध विश्वास की ओट में पूरी तरह बेख़बर सोया हो, तो उस विश्वास की मर्यादा को बनाए रखना मेरे भीतर के पुरुष के लिए एक असहनीय बोझ बनता जा रहा था। तूफ़ान के आने से पहले का यह सन्नाटा अपनी अंतिम सीमा पर था, जहाँ एक बहुत ही महीन लकीर इस मुकम्मल व्यवस्था को हमेशा के लिए बदलने का इंतज़ार कर रही थी।​
 
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