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Incest रेखा, स्मिता और उसका बेटा : एक अनकहा रिश्ता

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Befriendmy

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अगर आप किसी के पास कहानी को आगे बढ़ाने के लिए स्लो बर्न आइडिया हो तो जरूर सुझाव दे।

किसी भी किरदार के साथ बिना जबरदस्ती, पूरी सहमति, बिना disrespect किए, बिना एक तरफा फायदा उठाए... ऐसा लगे जैसे प्यार से नेचुरली घटनाएं घट रही है।
 
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Mr happy

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दोस्तो, मैने हमेशा क्लीन पेज पर कहानियां पढ़नी पसंद की है, फोटो वगैरह होने से वो पेज हम हर किसी जगह खोलकर नहीं पढ़ सकते। मान लीजिए आप ट्रैवल कर रहे है, बोर हो रहे है, अगर बिना किसी फोटो के कहानी होगी तो आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट में भी बेझिझक पढ़ सकेंगे।
माफी चाहता हूं बिना फोटो के कहानी पोस्ट और जारी रखने के लिए। कहानी इसी तरह स्लो बर्न मोड़ में चलती रहेगी, देखते है और क्या क्या कल्पनाएं जन्म लेती है।
Koi baat nhi
Jaisi Apki Marji Sir
 
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Mr happy

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अगर आप किसी के पास कहानी को आगे बढ़ाने के लिए स्लो बर्न आइडिया हो तो जरूर सुझाव दे।

किसी भी किरदार के साथ बिना जबरदस्ती, पूरी सहमति, बिना disrespect किए, बिना एक तरफा फायदा उठाए... ऐसा लगे जैसे प्यार से नेचुरली घटनाएं घट रही है।
Smita ki Freind ya Neighbour ko add kar sakte ho....
Usko in dono pe shak ho aur fir apni icha se maa bete ke sath threesome ke liye Ready ho..
Ya beta ka dost ki maa ko
 
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Napster

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कल के उस अधूर, सुलगते हुए खेल के बाद सुबह अर्जुन अपने ऑफिस के काम से बाहर निकल गया था। घर में स्मिता अब अकेली थी, लेकिन उसके भीतर की कामुक नारी पूरी तरह से आज़ाद हो चुकी थी। उसने आज साड़ी नहीं पहनी। वह सुबह से ही अर्जुन की वही काले रंग की ढीली कॉटन टी-शर्ट और नीचे बिना किसी पैन्टी के, केवल अर्जुन के ही एक हल्के नीले रंग के जिम शॉर्ट्स में पूरे घर में घूम रही थी। अर्जुन के कपड़ों की वह मर्दाना गंध सीधे उसकी नंगी त्वचा को छू रही थी, जिससे उसकी योनि (pussy) के भीतर एक हल्की सी खुजली और गीलापन सुबह से ही बना हुआ था।

दोपहर के करीब एक बजे, घर की घंटी बजी। स्मिता ने जैसे ही दरवाजा खोला, सामने उसकी छोटी बहन, रेखा खड़ी थी। रेखा ने एक चुस्त, गहरे लाल रंग की शिफॉन साड़ी पहनी थी, जिसमें से उसकी कमर और पीठ का गोरा हिस्सा साफ़ झलक रहा था।
"अरे स्मिता दी..." रेखा घर के भीतर आते ही स्मिता के इस नए, बोल्ड रूप को देखकर चौंक गई। "यह क्या? आज साड़ी-पेटीकोट सब उतार फेंका? और यह अर्जुन के कपड़े पहनकर क्यों घूम रही हो?"

स्मिता के चेहरे पर एक हल्की सी लाली आई, पर अब वह पहले जैसी संकोची माँ नहीं थी। उसने दरवाजा बंद किया और सोफे पर बैठते हुए अपना पैर पर पैर चढ़ा लिया (crossed legs), जिससे अर्जुन का वह छोटा शॉर्ट्स उसकी जांघों पर और ऊपर चढ़ गया, और उसकी योनि का उभरा हुआ हिस्सा रेखा की नजरों के ठीक सामने आ गया।

"बस ऐसे ही रेखा... वैसे भी, घर में और है ही कौन," स्मिता ने अपनी आवाज को थोड़ा भारी करते हुए कहा।

रेखा मुस्कुराई और सीधे स्मिता के बगल में सोफे पर बैठ गई। दोनों बहनों के जिस्म जब पास आए, तो हवा में एक अलग ही औरत जात की खुशबू तैरने लगी। रेखा की नजरें सीधे स्मिता की टी-शर्ट के ऊपर बिना ब्रा के उभरे उन दोनों कड़े, बड़े काले निप्पलों (nipples) पर जम गई

"सच कहूँ दी... इन कपड़ों में तुम्हारे ये बूब्ज और तुम्हारी ये सुडौल जांघें किसी भी मर्द को पागल कर दें," रेखा ने अपनी आँखों में एक डर्टी चमक लाते हुए सीधे स्मिता की जांघ को अपनी हथेली से थपथपाया। "वैसे, अर्जुन घर पर नहीं है क्या?"

"नहीं, वह ऑफिस गया है," स्मिता ने रेखा के हाथ की छुअन को महसूस करते हुए कहा। फिर उसने अपनी आँखें थोड़ी छोटी कीं और सीधे रेखा की आँखों में झांका। "वैसे रेखा... तुम आज बहुत चमक रही हो। अर्जुन के बिना तुम्हारा मन लगता है या नहीं?"

यह सीधा हमला सुनकर रेखा पहले तो झेंपी, लेकिन फिर उसने एक गहरी, रसीला ठहाका लगाया। वह स्मिता के और करीब खिसक आई, यहाँ तक कि उसके भारी स्तन स्मिता के बाहुपाश से टकराने लगे।

"सच कहूँ दीदी.." रेखा ने अपनी आवाज को बेहद धीमा, रॉ और कामुक करते हुए सीधे स्मिता के कान के पास कहा। "तुम्हारा बेटा कोई मामूली मर्द नहीं है। उसका वो ६ इंच लंबा, मोटा और नस-नस उभरा हुआ औजार जब अंदर जाता है ना... तो रीढ़ की हड्डी तक पानी छूट जाता है। वो जिस बेरहमी से चोदता है, वैसी ताकत किसी पराये मर्द में नहीं है। मैं तो उसकी दीवानी हूँ।"

अपनी ही बहन के मुंह से अपने बेटे के उस कड़क अंग की ऐसी पाशविक तारीफ सुनकर स्मिता की योनि के भीतर जैसे बिजली दौड़ गई। उसकी पैन्टी-विहीन योनि से काम-रस का एक गाढ़ा कतरा रिसकर सीधे अर्जुन के उस नीले शॉर्ट्स को अंदर से भिगोने लगा।

"पर वो तुम्हारा बेटा है रेखा... वो मेरा जवान बेटा है," स्मिता ने हांफते हुए अपनी छाती को ऊपर-नीचे किया।

"तो क्या हुआ दी?" रेखा ने बहुत ही बेबाकी से कहा, उसका हाथ अब स्मिता की नंगी, गोरी जांघ के और ऊपर, जांघों के जोड़ों के पास रेंगने लगा था। "जिस्म की भूख सबको होती है। अगर तुम अर्जुन को अपने पास नहीं आने दोगी, तो इस उम्र में तुम्हारी इस भारी, रसीली देह को कौन शांत करेगा? कोई बाहर का पराया मर्द ढूंढोगी क्या?"

"नहीं... मुझे पराये मर्दों से डर लगता है। लोकलाज, बीमारियाँ..." स्मिता ने अपनी आँखें आधी बंद करते हुए कहा, उसकी जांघ रेखा की उंगलियों के नीचे कांप रही थी।

"बस! यही तो मैं कह रही हूँ दी," रेखा ने स्मिता के चेहरे को अपनी उंगलियों से अपनी तरफ घुमाया। "पराये मर्द पर भरोसा नहीं किया जा सकता। पर अर्जुन तो तुम्हारा अपना खून है। वो जितना मजबूत है, उतना ही वफादार है। जो सुख वो मुझे देता है, उस पर पहला हक तो तुम्हारा है। इस भरे हुए बदन को तपाना छोड़ो दी, उसे अपने भीतर ले लो।"

बातें अब शब्दों की सीमा पार कर चुकी थीं। कमरे के भीतर दोनों बहनों की हांफती सांसों का एक अजीब सा, डर्टी सन्नाटा पसर गया था। रेखा ने देखा कि स्मिता इस समय पूरी तरह से वासना के नशे में चूर हो चुकी है और उसकी योनि का पानी अर्जुन के शॉर्ट्स पर एक छोटा सा गीला दाग बना रहा है।

रेखा के भीतर की कामुक औरत भी इस माहौल में सुलग उठी थी। उसने बिना कुछ बोले, अपनी साड़ी का पल्लू अपने कंधे से नीचे गिरा दिया, जिससे उसका भारी ब्लाउज और उसकी गहरी क्लीवेज स्मिता के सामने नंगी हो गई।

वह धीरे से स्मिता के ऊपर झुक गई। "दी... तुम्हारी इस योनि की तड़प को मैं साफ़ देख सकती हूँ। चलो, आज मैं देखती हूँ तुम्हारे इस जिस्म में कितनी आग बची है..."

इससे पहले कि स्मिता कुछ समझ पाती, रेखा ने अपने होठ सीधे स्मिता के गले पर रख दिए। *उफ्फ...!* स्मिता के मुंह से एक तीखी सिसकी निकली जब रेखा की जीभ ने उसकी गर्दन के पसीने को चाटना शुरू किया। वह एक सगी बहन की छुअन थी, लेकिन उसमें शुद्ध, कच्ची कामुकता (raw lesbian touch) घुली हुई थी।

रेखा ने अपना दाहिना हाथ सीधे नीचे बढ़ाया और अर्जुन के उस ढीले जिम शॉर्ट्स के भीतर, सीधे स्मिता की नंगी, बिना पैन्टी वाली योनि (pussy) के ऊपर रख दिया।

"आअह... रेखा... उफ्फ... मत कर कमिनी.." स्मिता ने कमजोर हाथों से रेखा के कंधे को धकेलना चाहा, लेकिन उसकी जांघें खुद-ब-खुद और चौड़ी हो गईं।

रेखा की उंगलियां अब सीधे स्मिता की योनि के रसीले, मखमली होठों को चीरते हुए उसके भीतर तक धंस गईं। वहाँ का तापमान इतना गर्म और गीला था कि रेखा के मुंह से भी एक कराह निकल गई। रेखा ने अपनी उंगलियों को स्मिता के उस काम-दाने (clitoris) पर तेजी से रगड़ना शुरू कर दिया।

*घिस... घिस... पिच...*

उस शांत लिविंग रूम में दोनों बहनों के जिस्मों के टकराने और स्मिता की योनि से निकलते पानी की *पिच-पिच* की आवाज गूंजने लगी। रेखा स्मिता के होठों को अपने मुंह में भींचकर चूस रही थी, और नीचे उसकी उंगलियां स्मिता की ५४ साल की हल्के बालों वाली चुत को बेरहमी से मसल रही थीं।

"ओह... दी... तुम्हारी चुत तो पूरी तरह पानी छोड़ रही है... उफ्फ, कितना रस है इसमें..." रेखा ने उंगलियाँ हिलाते हुए स्मिता के कान में फुसफुसाया।

स्मिता का पूरा बदन सोफे पर अकड़ गया। उसकी आँखें पूरी तरह उलट गईं, उसके दोनों भारी स्तन बिना ब्रा के हवा में बुरी तरह उछल रहे थे। अपनी सगी बहन की उंगलियों पर खुद को चोदवाने का जो यह डर्टी और लेस्बियन नशा था, उसने स्मिता के भीतर की बची-खुची मर्यादा को पूरी तरह राख कर दिया। मात्र एक मिनट की उस पाशविक रगड़ के बाद, स्मिता की योनि ने पानी का एक बहुत बड़ा सैलाब छोड़ दिया, उसका पूरा जिस्म कांपा और वह सोफे पर पूरी तरह ढह गई।

रेखा ने अपनी उंगलियों को बाहर निकाला, जो स्मिता के गाढ़े, लसदार काम-रस से पूरी तरह लथपथ थीं। उसने उन उंगलियों को सीधे स्मिता के चेहरे के सामने किया और एक डर्टी मुस्कान के साथ बोली, "देख रही हो दी? तुम्हारी इस आग को सिर्फ उंगलियां शांत नहीं कर सकतीं। इसके भीतर जब आज रात अर्जुन का वो कड़क, मोटा लंड पड़ेगा ना... तब तुम्हें असली स्वर्ग मिलेगा। अब झिझक छोड़ो, और रात को अपने कमरे का दरवाजा पूरा खुला रखना।"

यह कहकर रेखा अपनी साड़ी संभालती हुई, स्मिता को उस सुलगती हुई कामुक तड़प के बीच छोड़कर चली गई। सोफे पर अकेली पड़ी स्मिता अपनी गीली योनि और अपनी बहन के दिए इस नए नशे के बीच हांफ रही थी। अब अर्जुन के ऑफिस

से लौटने का इंतजार उसके लिए मौत के समान होने वाला था।
बहुत ही गजब का गरमागरम कामुक और शानदार जबरदस्त मदमस्त अपडेट है भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 
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शाम के सात बज चुके थे। बाहर आसमान में काले कजरारे बादलों का डेरा था, जिससे पूरा मुंबई शहर एक धुंधली, भारी खामोशी में लिपटा हुआ था। उमस का आलम यह था कि पंखे के नीचे बैठने पर भी बदन से पसीने की महीन बूंदें रिस रही थीं। घर के भीतर का माहौल बाहर के मौसम से कहीं ज्यादा भारी, गर्म और सुलगता हुआ था। रेखा के जाने के बाद से स्मिता सोफे पर उसी हालत में बैठी थी। उसने अर्जुन की वह काले रंग की ढीली कॉटन टी-शर्ट और नीचे बिना पैन्टी के वही हल्का नीला जिम शॉर्ट्स पहन रखा था।

रेखा की उंगलियों ने उसकी उस हल्के बालों वाली योनि (pussy) को जिस बेरहमी और हवस के साथ मसला था, उसकी तपन अभी भी उसकी जांघों के जोड़ों में बिजली की तरह दौड़ रही थी। उसकी योनि से निकला गाढ़ा, लसदार काम-रस सूखकर उसके शॉर्ट्स के बीच वाले हिस्से को कड़ा कर चुका था, और उस सूती कपड़े से औरत जात के जिस्म की वह कच्ची, तीखी और तीक्ष्ण गंध उठ रही थी जो पूरे लिविंग रूम की हवा में मद्धम रूप से तैर रही थी।
तभी मुख्य दरवाजे पर चाबी घूमने की आवाज हुई। स्मिता का दिल झटके से उसकी छाती में धड़क उठा।

दरवाजा खुला और अर्जुन भीतर दाखिल हुआ। वह ऑफिस के काम से थका हुआ था, लेकिन उसकी गठीली, कसरती देह से एक मर्दाना रोब साफ झलक रहा था। उसने अपनी शर्ट के ऊपर के तीन बटन खोल रखे थे, जिससे उसकी चौड़ी छाती के घने बाल पसीने में भीगे हुए चमक रहे थे। उसने अपना बैग एक तरफ रखा और सीधे लिविंग रूम की तरफ बढ़ा। सोफे पर बैठी स्मिता ने अपनी नजरें नीचे नहीं कीं। आज उसकी आँखों में एक अजीब सी ढिठाई, एक भूखी औरत की बेबाकी और एक गहरी उलझन साफ दिख रही थी। उसने सोफे पर अपनी दोनों भारी, गोरी जांघों को थोड़ा फैला रखा था, जिससे उस नीले शॉर्ट्स के ऊपर आया वह गीला, काला पड़ा दाग अर्जुन की नजरों के ठीक सामने था।

अर्जुन सीधे आकर स्मिता के ठीक सामने वाले सोफे पर बैठ गया। उसने अपने दोनों हाथ अपनी जांघों पर रखे और सीधे अपनी माँ की आँखों में झांका। कमरे की मद्धम पीली रोशनी में दोनों के बीच एक ऐसा सन्नाटा पसर गया, जिसमें केवल उनकी तेज होती सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। बिना ब्रा के स्मिता के भारी, ३६-डी साइज के स्तन उसकी हर सांस के साथ टी-शर्ट के भीतर ऊपर-नीचे हो रहे थे, और उनके दोनों कड़े, काले निप्पल (nipples) कपड़े को अंदर से फाड़ देने की जिद पर अड़े थे।

"आज घर में एक अलग ही महक है, माँ..." अर्जुन ने अपनी आवाज को बेहद धीमा, भारी और मर्दाना करते हुए कहा। उसकी नजरें सीधे स्मिता की जांघों के बीच के उस सूखें हुए निशान पर जमी थीं।

स्मिता ने एक गहरी सांस ली। उसने अपने चेहरे पर बिखरी जुल्फों को कान के पीछे समेटा, जिससे उसकी गर्दन का गोरा, पसीने से भीगा हिस्सा पूरी तरह नंगा हो गया। "आज... आज रेखा आई थी यहाँ, अर्जुन।"

"मौसी आई थी?" अर्जुन के होठों पर एक गहरी, डर्टी मुस्कान आ गई। वह समझ गया कि यह महक और माँ के जिस्म का यह बिखराव कहाँ से आ रहा है। "फिर क्या बातें हुईं तुम दोनों के बीच?"

स्मिता थोड़ा और आगे की तरफ झुकी। इस हरकत से उसके स्तनों का भारी उभार टी-शर्ट के गले से लगभग बाहर आने को बेताब हो गया। "वो तुम्हारी बातें कर रही थी। और फिर से वही सब कि जब तुम दोनों बंद कमरे में होते हो... तो तुम उसके साथ क्या करते हो। उसने तुम्हारे... तुम्हारे उस अंग की, तुम्हारी उस मर्दानगी की ऐसी बातें कीं जिन्हें सुनकर एक माँ के कान पिघल जाएं।"

अर्जुन ने अपनी स्थिति नहीं बदली, लेकिन उसके लोअर के भीतर उसका वह ६ इंच लंबा, मोटा औजार झटके से पूरी तरह कड़ा होकर उसकी नाभि से सट गया। "वो सब ठीक है माँ पर क्या मौसी ने कुछ गलत कहा? क्या तुम्हें लगता है कि मौसी रेखा कोई बुरी औरत हैं?"

स्मिता एक पल के लिए रुकी। उसके मन के भीतर समाज, लोकलाज और मर्यादा का जो आखिरी पहरेदार था, वह इस सवाल के सामने खड़ा हो गया। "बुरी तो नहीं है वो अर्जुन... उसने हमेशा मेरा साथ दिया है। लेकिन... लेकिन जो तुम दोनों के बीच है, वो... वो इस समाज की नजरों में एक बहुत बड़ा पाप है। वो तुम्हारी मौसी है, मैं तुम्हारी माँ हूँ। मर्यादा कहती है कि..." वह 'लेकिन' (But) पर आकर रुक गई, उसके आगे उसके शब्द उसके हलक में ही सूख गए।

अर्जुन सोफे से उठा और धीरे-धीरे चलकर सीधे स्मिता वाले सोफे पर, उसके बिल्कुल करीब आकर बैठ गया। उसने कोई शारीरिक छुअन नहीं की, कोई हाथ नहीं बढ़ाया, लेकिन दोनों के जिस्मों के बीच बमुश्किल दो इंच का फासला था। अर्जुन के बदन की तेज मर्दाना गर्मी स्मिता की नंगी जांघों को सीधे महसूस हो रही थी।

"मर्यादा?" अर्जुन की आवाज में अब एक सम्मोहक, डर्टी और बेहद तार्किक धार थी। "माँ, मेरी बात बहुत ठंडे दिमाग से सुनो। मौसी रेखा ने आज तक अपनी जिंदगी में किसका दिल दुखाया है? क्या उन्होंने किसी के साथ कोई जबरदस्ती की? क्या उन्होंने किसी को धोखा दिया, या किसी का घर उजाड़ा?"

स्मिता ने मूक होकर अपनी कत्थई आँखें अर्जुन के चेहरे पर टिका दीं।

"नहीं ना?" अर्जुन ने अपनी सांसों की आंच सीधे स्मिता के होठों पर छोड़ते हुए कहा। "इस पूरी दुनिया में, इस बंद और मतलबी शहर में हर इंसान अंदर से अकेला है। मौसी ने बस अपने मन की, अपने जिस्म की उस सच्ची खुशी और भूख को, बिना किसी तीसरे इंसान को चोट पहुँचाए, खुलकर होने दिया। उन्होंने कुदरत के उस नियम को माना जो जिस्म को जिस्म से जोड़ता है। इसमें गलत क्या है माँ? जब दो वयस्क इंसान बंद दरवाजों के पीछे, पूरी सहमति से एक-दूसरे की तड़प को शांत करते हैं, एक-दूसरे को वो चरम सुख देते हैं जिसके लिए बदन तरसता है... तो वो पाप नहीं होता माँ, वो सबसे पवित्र इबादत बन जाती है।"

अर्जुन के ये शब्द स्मिता के कानों में पिघले हुए सैटिन की तरह उतर रहे थे। उसके मन के भीतर सालों से जमी समाज की वह बर्फ अर्जुन की इस मर्दाना दलील के सामने भाप बनकर उड़ने लगी।

"हमारी परिस्थितियां भी तो अलग नहीं हैं माँ..." अर्जुन ने अपनी आवाज को और गहरा, रॉ और डर्टी किया। "इस बड़े से घर में, हमारे अलावा और कौन है? जब तुम्हारी जांघें मेरी गोद में आकर रगड़ खाती हैं, जब तुम्हारी योनि का पानी मेरे कपड़ों को भिगोता है, तो क्या हम किसी का नुकसान कर रहे हैं? मुझे और तुम्हारी इस ५४ साल की रसीली, गदराई हुई देह को जिस सुख की तलाश है, वो सुख अगर तुम्हारा अपना बेटा, अपनी पूरी ताकत से तुम्हें दे... तो उसमें मर्यादा कहाँ से बीच में आ गई? जो हक रेखा मौसी का है, उससे कहीं बड़ा हक इस जिस्म पर तुम्हारा है, माँ।"

अर्जुन के इन सीधे, नंगे और कामुक शब्दों ने स्मिता के भीतर के आखिरी ताले को भी मरोड़कर तोड़ दिया था। रेखा की उंगलियों ने दोपहर में उसकी योनि में जो आग लगाई थी, अर्जुन की इन बातों ने उस आग पर सीधे पेट्रोल छिड़क दिया था।

स्मिता ने बिना कुछ बोले, एक लंबी, हांफती हुई सिसकी ली। उसने अपनी दोनों टांगों को सोफे पर और चौड़ा कर दिया, जिससे उसकी जांघों के जोड़ों का वह गोरापन और अर्जुन के शॉर्ट्स के आर-पार उसकी योनि की पूरी गोलाई अर्जुन के सामने पूरी तरह से सरेंडर मोड में आ गई। उसकी आँखों में अब कोई माँ नहीं थी; वहाँ केवल एक भूखी, प्यासी और पूरी तरह से पिघल चुकी मादा थी जो अपने ही जवान बेटे के उस कड़क औजार को अपने भीतर समाने के लिए तड़प रही थी।

"उफ्फ... अर्जुन..." स्मिता के होठों से एक डर्टी, भारी फुसफुसाहट निकली। उसकी योनि ने एक बार फिर पानी का एक ऐसा गर्म सैलाब छोड़ा कि उसका वह नीला शॉर्ट्स अंदर से पूरी तरह चिपचिपा हो गया। "तुम... तुम बहुत खतरनाक बातें करते हो..."

"मैं सिर्फ सच कह रहा हूँ, माँ," अर्जुन ने मुस्कुराते हुए अपनी नजरें उसकी छाती पर टिका दीं, जहाँ उसके निप्पल अब टी-शर्ट को फाड़ने पर उतारू थे। "अब झिझकना छोड़ो। आज रात का खेल पुराना नहीं होगा।"

स्मिता ने अपनी धड़कनों को संभालने की कोशिश की। बदन की उमस, पसीना और योनि से बहते उस रसीले पानी के कारण उसे अपना पूरा जिस्म भारी महसूस हो रहा था। उसने सोफे के हैंडल को पकड़कर खुद को उठाया। दोनों के बीच बची हुई मानसिक दूरी अब पूरी तरह भस्म हो चुकी थी।

"रात का खाना... रात का खाना तैयार है अर्जुन," स्मिता ने अपनी आवाज के भारीपन और कंपकंपी को छुपाते हुए, सीधे अर्जुन की आँखों में आँखें डालकर कहा। "मैं... मैं खाना परोसने से पहले जरा shower लेने जा रही हूँ। बदन बहुत चिपचिपा हो रहा है।"

स्मिता सीधे अपने बेडरूम से होते हुए बाथरूम के भीतर चली गई। उसने बाथरूम का दरवाजा बंद तो किया, लेकिन उसकी कुंडी (lock) नहीं लगाई; उसे बस हल्का सा टिका दिया। यह खेल का वह हिस्सा था जिसे अर्जुन अच्छी तरह समझता था।

बाथरूम के भीतर की पीली रोशनी में स्मिता आईने के सामने आकर खड़ी हो गई। उसने एक गहरी सांस ली और अपनी दोनों हथेलियों से अर्जुन की उस काले रंग की टी-शर्ट के निचले हिस्से को पकड़ा। उसने धीरे-धीरे टी-शर्ट को ऊपर उठाना शुरू किया।

जैसे-जैसे कपड़ा ऊपर सरक रहा था, उसका ५४ साल का वह कंचन जैसा गोरा, गदराया हुआ बदन आईने में नंगा होता जा रहा था। टी-शर्ट पूरी तरह उतरी और फर्श पर गिर गई। अब वह बिना ब्रा के, पूरी तरह नग्न छाती के साथ खड़ी थी। उसके ३६-डी साइज के भारी, रसीले स्तन अपनी पूरी गोलाई के साथ नीचे की तरफ ढलके हुए थे। उनके चारों तरफ का वह गहरा, कत्थई घेरा और उसके बीच में तने हुए कड़े, मोटे काले निप्पल इस समय ठंडक और उत्तेजना के मारे पूरी तरह से पत्थर की तरह कड़े हो चुके थे। उसने अपनी हथेलियों से अपने दोनों स्तनों को भींचा, उन्हें ऊपर की तरफ उठाया और आईने में अपनी ही कामुकता को देखकर उसकी सांसें और तेज हो गईं।

फिर उसने नीचे हाथ बढ़ाया और अर्जुन के उस नीले जिम शॉर्ट्स की डोरी को ढीला किया। शॉर्ट्स सरक कर पैरों के पास गिर गया।
अब स्मिता पूरी तरह से नग्न (stark naked) थी। ५४ साल की उम्र में भी उसके नितंबों (hips) का घेरा इतना विशाल, भारी और सुडौल था कि कोई भी जवान मर्द उन्हें देखते ही पागल हो जाए। उसकी दोनों भारी, गोरी जांघों के ठीक बीच में उसकी वह रसीली काम-दरार (pussy) थी, जिसके ऊपर के हल्के, महीन और बिखरे हुए काले बाल अभी भी रेखा के दोपहर के काम-रस से थोड़े चिपचिपे थे।
स्मिता ने शॉवर (shower) का नॉब घुमाया।

*छम... छम... छम...!*

शॉवर से गिरती पानी की ठंडी, महीन फुहारें सीधे स्मिता के तपते हुए, नंगे बदन पर गिरने लगीं। पानी की बूंदें जैसे ही उसके कड़े, काले निप्पलों से टकराकर नीचे की तरफ बहीं, उसके मुंह से एक तीखी, रसीली कराह निकल गई—"आअह... उफ्फ..."

वह शॉवर के नीचे खड़ी होकर अपने दोनों हाथों से पानी को अपने पूरे बदन पर मलने लगी। पानी उसकी गर्दन से होता हुआ उसके स्तनों की गहरी क्लीवेज में समा रहा था, और वहाँ से बहता हुआ उसके गोरे पेट, उसकी गहरी नाभि और सीधे नीचे उसकी टांगों के बीच की उस हल्के बालों वाली योनि की दरार को साफ़ कर रहा था। स्मिता ने अपनी उंगलियों को अपनी योनि के दोनों होठों पर फेरा, दोपहर के उस सूखे हुए रस को धोया, जिससे उसकी योनि का दाना (clitoris) पानी के स्पर्श से और ज्यादा संवेदनशील और कड़ा हो गया।

वह आईने में खुद को देख रही थी—पानी से भीगा हुआ उसका यह भारी, रसीला बदन, छाती पर हवा में लहराते उसके भारी स्तन और जांघों के बीच से बहता पानी। वह जानती थी कि बाहर खड़ा अर्जुन इस समय किस कशमकश से गुजर रहा है। यह शावर उसके जिस्म की आग को बुझा नहीं रहा था, बल्कि उसे रात के उस नंगे, पाशविक मुकाबले के लिए और ज्यादा चिकना, रसीला और बेकाबू बना रहा था। खेल अब उस मुकाम पर था जहाँ खाना परोसने के बाद,

मर्यादा का आखिरी कफ़न भी शायद हमेशा के लिए दफ़न होने वाला था।
 

Napster

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शाम के सात बज चुके थे। बाहर आसमान में काले कजरारे बादलों का डेरा था, जिससे पूरा मुंबई शहर एक धुंधली, भारी खामोशी में लिपटा हुआ था। उमस का आलम यह था कि पंखे के नीचे बैठने पर भी बदन से पसीने की महीन बूंदें रिस रही थीं। घर के भीतर का माहौल बाहर के मौसम से कहीं ज्यादा भारी, गर्म और सुलगता हुआ था। रेखा के जाने के बाद से स्मिता सोफे पर उसी हालत में बैठी थी। उसने अर्जुन की वह काले रंग की ढीली कॉटन टी-शर्ट और नीचे बिना पैन्टी के वही हल्का नीला जिम शॉर्ट्स पहन रखा था।

रेखा की उंगलियों ने उसकी उस हल्के बालों वाली योनि (pussy) को जिस बेरहमी और हवस के साथ मसला था, उसकी तपन अभी भी उसकी जांघों के जोड़ों में बिजली की तरह दौड़ रही थी। उसकी योनि से निकला गाढ़ा, लसदार काम-रस सूखकर उसके शॉर्ट्स के बीच वाले हिस्से को कड़ा कर चुका था, और उस सूती कपड़े से औरत जात के जिस्म की वह कच्ची, तीखी और तीक्ष्ण गंध उठ रही थी जो पूरे लिविंग रूम की हवा में मद्धम रूप से तैर रही थी।
तभी मुख्य दरवाजे पर चाबी घूमने की आवाज हुई। स्मिता का दिल झटके से उसकी छाती में धड़क उठा।

दरवाजा खुला और अर्जुन भीतर दाखिल हुआ। वह ऑफिस के काम से थका हुआ था, लेकिन उसकी गठीली, कसरती देह से एक मर्दाना रोब साफ झलक रहा था। उसने अपनी शर्ट के ऊपर के तीन बटन खोल रखे थे, जिससे उसकी चौड़ी छाती के घने बाल पसीने में भीगे हुए चमक रहे थे। उसने अपना बैग एक तरफ रखा और सीधे लिविंग रूम की तरफ बढ़ा। सोफे पर बैठी स्मिता ने अपनी नजरें नीचे नहीं कीं। आज उसकी आँखों में एक अजीब सी ढिठाई, एक भूखी औरत की बेबाकी और एक गहरी उलझन साफ दिख रही थी। उसने सोफे पर अपनी दोनों भारी, गोरी जांघों को थोड़ा फैला रखा था, जिससे उस नीले शॉर्ट्स के ऊपर आया वह गीला, काला पड़ा दाग अर्जुन की नजरों के ठीक सामने था।

अर्जुन सीधे आकर स्मिता के ठीक सामने वाले सोफे पर बैठ गया। उसने अपने दोनों हाथ अपनी जांघों पर रखे और सीधे अपनी माँ की आँखों में झांका। कमरे की मद्धम पीली रोशनी में दोनों के बीच एक ऐसा सन्नाटा पसर गया, जिसमें केवल उनकी तेज होती सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। बिना ब्रा के स्मिता के भारी, ३६-डी साइज के स्तन उसकी हर सांस के साथ टी-शर्ट के भीतर ऊपर-नीचे हो रहे थे, और उनके दोनों कड़े, काले निप्पल (nipples) कपड़े को अंदर से फाड़ देने की जिद पर अड़े थे।

"आज घर में एक अलग ही महक है, माँ..." अर्जुन ने अपनी आवाज को बेहद धीमा, भारी और मर्दाना करते हुए कहा। उसकी नजरें सीधे स्मिता की जांघों के बीच के उस सूखें हुए निशान पर जमी थीं।

स्मिता ने एक गहरी सांस ली। उसने अपने चेहरे पर बिखरी जुल्फों को कान के पीछे समेटा, जिससे उसकी गर्दन का गोरा, पसीने से भीगा हिस्सा पूरी तरह नंगा हो गया। "आज... आज रेखा आई थी यहाँ, अर्जुन।"

"मौसी आई थी?" अर्जुन के होठों पर एक गहरी, डर्टी मुस्कान आ गई। वह समझ गया कि यह महक और माँ के जिस्म का यह बिखराव कहाँ से आ रहा है। "फिर क्या बातें हुईं तुम दोनों के बीच?"

स्मिता थोड़ा और आगे की तरफ झुकी। इस हरकत से उसके स्तनों का भारी उभार टी-शर्ट के गले से लगभग बाहर आने को बेताब हो गया। "वो तुम्हारी बातें कर रही थी। और फिर से वही सब कि जब तुम दोनों बंद कमरे में होते हो... तो तुम उसके साथ क्या करते हो। उसने तुम्हारे... तुम्हारे उस अंग की, तुम्हारी उस मर्दानगी की ऐसी बातें कीं जिन्हें सुनकर एक माँ के कान पिघल जाएं।"

अर्जुन ने अपनी स्थिति नहीं बदली, लेकिन उसके लोअर के भीतर उसका वह ६ इंच लंबा, मोटा औजार झटके से पूरी तरह कड़ा होकर उसकी नाभि से सट गया। "वो सब ठीक है माँ पर क्या मौसी ने कुछ गलत कहा? क्या तुम्हें लगता है कि मौसी रेखा कोई बुरी औरत हैं?"

स्मिता एक पल के लिए रुकी। उसके मन के भीतर समाज, लोकलाज और मर्यादा का जो आखिरी पहरेदार था, वह इस सवाल के सामने खड़ा हो गया। "बुरी तो नहीं है वो अर्जुन... उसने हमेशा मेरा साथ दिया है। लेकिन... लेकिन जो तुम दोनों के बीच है, वो... वो इस समाज की नजरों में एक बहुत बड़ा पाप है। वो तुम्हारी मौसी है, मैं तुम्हारी माँ हूँ। मर्यादा कहती है कि..." वह 'लेकिन' (But) पर आकर रुक गई, उसके आगे उसके शब्द उसके हलक में ही सूख गए।

अर्जुन सोफे से उठा और धीरे-धीरे चलकर सीधे स्मिता वाले सोफे पर, उसके बिल्कुल करीब आकर बैठ गया। उसने कोई शारीरिक छुअन नहीं की, कोई हाथ नहीं बढ़ाया, लेकिन दोनों के जिस्मों के बीच बमुश्किल दो इंच का फासला था। अर्जुन के बदन की तेज मर्दाना गर्मी स्मिता की नंगी जांघों को सीधे महसूस हो रही थी।

"मर्यादा?" अर्जुन की आवाज में अब एक सम्मोहक, डर्टी और बेहद तार्किक धार थी। "माँ, मेरी बात बहुत ठंडे दिमाग से सुनो। मौसी रेखा ने आज तक अपनी जिंदगी में किसका दिल दुखाया है? क्या उन्होंने किसी के साथ कोई जबरदस्ती की? क्या उन्होंने किसी को धोखा दिया, या किसी का घर उजाड़ा?"

स्मिता ने मूक होकर अपनी कत्थई आँखें अर्जुन के चेहरे पर टिका दीं।

"नहीं ना?" अर्जुन ने अपनी सांसों की आंच सीधे स्मिता के होठों पर छोड़ते हुए कहा। "इस पूरी दुनिया में, इस बंद और मतलबी शहर में हर इंसान अंदर से अकेला है। मौसी ने बस अपने मन की, अपने जिस्म की उस सच्ची खुशी और भूख को, बिना किसी तीसरे इंसान को चोट पहुँचाए, खुलकर होने दिया। उन्होंने कुदरत के उस नियम को माना जो जिस्म को जिस्म से जोड़ता है। इसमें गलत क्या है माँ? जब दो वयस्क इंसान बंद दरवाजों के पीछे, पूरी सहमति से एक-दूसरे की तड़प को शांत करते हैं, एक-दूसरे को वो चरम सुख देते हैं जिसके लिए बदन तरसता है... तो वो पाप नहीं होता माँ, वो सबसे पवित्र इबादत बन जाती है।"

अर्जुन के ये शब्द स्मिता के कानों में पिघले हुए सैटिन की तरह उतर रहे थे। उसके मन के भीतर सालों से जमी समाज की वह बर्फ अर्जुन की इस मर्दाना दलील के सामने भाप बनकर उड़ने लगी।

"हमारी परिस्थितियां भी तो अलग नहीं हैं माँ..." अर्जुन ने अपनी आवाज को और गहरा, रॉ और डर्टी किया। "इस बड़े से घर में, हमारे अलावा और कौन है? जब तुम्हारी जांघें मेरी गोद में आकर रगड़ खाती हैं, जब तुम्हारी योनि का पानी मेरे कपड़ों को भिगोता है, तो क्या हम किसी का नुकसान कर रहे हैं? मुझे और तुम्हारी इस ५४ साल की रसीली, गदराई हुई देह को जिस सुख की तलाश है, वो सुख अगर तुम्हारा अपना बेटा, अपनी पूरी ताकत से तुम्हें दे... तो उसमें मर्यादा कहाँ से बीच में आ गई? जो हक रेखा मौसी का है, उससे कहीं बड़ा हक इस जिस्म पर तुम्हारा है, माँ।"

अर्जुन के इन सीधे, नंगे और कामुक शब्दों ने स्मिता के भीतर के आखिरी ताले को भी मरोड़कर तोड़ दिया था। रेखा की उंगलियों ने दोपहर में उसकी योनि में जो आग लगाई थी, अर्जुन की इन बातों ने उस आग पर सीधे पेट्रोल छिड़क दिया था।

स्मिता ने बिना कुछ बोले, एक लंबी, हांफती हुई सिसकी ली। उसने अपनी दोनों टांगों को सोफे पर और चौड़ा कर दिया, जिससे उसकी जांघों के जोड़ों का वह गोरापन और अर्जुन के शॉर्ट्स के आर-पार उसकी योनि की पूरी गोलाई अर्जुन के सामने पूरी तरह से सरेंडर मोड में आ गई। उसकी आँखों में अब कोई माँ नहीं थी; वहाँ केवल एक भूखी, प्यासी और पूरी तरह से पिघल चुकी मादा थी जो अपने ही जवान बेटे के उस कड़क औजार को अपने भीतर समाने के लिए तड़प रही थी।

"उफ्फ... अर्जुन..." स्मिता के होठों से एक डर्टी, भारी फुसफुसाहट निकली। उसकी योनि ने एक बार फिर पानी का एक ऐसा गर्म सैलाब छोड़ा कि उसका वह नीला शॉर्ट्स अंदर से पूरी तरह चिपचिपा हो गया। "तुम... तुम बहुत खतरनाक बातें करते हो..."

"मैं सिर्फ सच कह रहा हूँ, माँ," अर्जुन ने मुस्कुराते हुए अपनी नजरें उसकी छाती पर टिका दीं, जहाँ उसके निप्पल अब टी-शर्ट को फाड़ने पर उतारू थे। "अब झिझकना छोड़ो। आज रात का खेल पुराना नहीं होगा।"

स्मिता ने अपनी धड़कनों को संभालने की कोशिश की। बदन की उमस, पसीना और योनि से बहते उस रसीले पानी के कारण उसे अपना पूरा जिस्म भारी महसूस हो रहा था। उसने सोफे के हैंडल को पकड़कर खुद को उठाया। दोनों के बीच बची हुई मानसिक दूरी अब पूरी तरह भस्म हो चुकी थी।

"रात का खाना... रात का खाना तैयार है अर्जुन," स्मिता ने अपनी आवाज के भारीपन और कंपकंपी को छुपाते हुए, सीधे अर्जुन की आँखों में आँखें डालकर कहा। "मैं... मैं खाना परोसने से पहले जरा shower लेने जा रही हूँ। बदन बहुत चिपचिपा हो रहा है।"

स्मिता सीधे अपने बेडरूम से होते हुए बाथरूम के भीतर चली गई। उसने बाथरूम का दरवाजा बंद तो किया, लेकिन उसकी कुंडी (lock) नहीं लगाई; उसे बस हल्का सा टिका दिया। यह खेल का वह हिस्सा था जिसे अर्जुन अच्छी तरह समझता था।

बाथरूम के भीतर की पीली रोशनी में स्मिता आईने के सामने आकर खड़ी हो गई। उसने एक गहरी सांस ली और अपनी दोनों हथेलियों से अर्जुन की उस काले रंग की टी-शर्ट के निचले हिस्से को पकड़ा। उसने धीरे-धीरे टी-शर्ट को ऊपर उठाना शुरू किया।

जैसे-जैसे कपड़ा ऊपर सरक रहा था, उसका ५४ साल का वह कंचन जैसा गोरा, गदराया हुआ बदन आईने में नंगा होता जा रहा था। टी-शर्ट पूरी तरह उतरी और फर्श पर गिर गई। अब वह बिना ब्रा के, पूरी तरह नग्न छाती के साथ खड़ी थी। उसके ३६-डी साइज के भारी, रसीले स्तन अपनी पूरी गोलाई के साथ नीचे की तरफ ढलके हुए थे। उनके चारों तरफ का वह गहरा, कत्थई घेरा और उसके बीच में तने हुए कड़े, मोटे काले निप्पल इस समय ठंडक और उत्तेजना के मारे पूरी तरह से पत्थर की तरह कड़े हो चुके थे। उसने अपनी हथेलियों से अपने दोनों स्तनों को भींचा, उन्हें ऊपर की तरफ उठाया और आईने में अपनी ही कामुकता को देखकर उसकी सांसें और तेज हो गईं।

फिर उसने नीचे हाथ बढ़ाया और अर्जुन के उस नीले जिम शॉर्ट्स की डोरी को ढीला किया। शॉर्ट्स सरक कर पैरों के पास गिर गया।
अब स्मिता पूरी तरह से नग्न (stark naked) थी। ५४ साल की उम्र में भी उसके नितंबों (hips) का घेरा इतना विशाल, भारी और सुडौल था कि कोई भी जवान मर्द उन्हें देखते ही पागल हो जाए। उसकी दोनों भारी, गोरी जांघों के ठीक बीच में उसकी वह रसीली काम-दरार (pussy) थी, जिसके ऊपर के हल्के, महीन और बिखरे हुए काले बाल अभी भी रेखा के दोपहर के काम-रस से थोड़े चिपचिपे थे।
स्मिता ने शॉवर (shower) का नॉब घुमाया।

*छम... छम... छम...!*

शॉवर से गिरती पानी की ठंडी, महीन फुहारें सीधे स्मिता के तपते हुए, नंगे बदन पर गिरने लगीं। पानी की बूंदें जैसे ही उसके कड़े, काले निप्पलों से टकराकर नीचे की तरफ बहीं, उसके मुंह से एक तीखी, रसीली कराह निकल गई—"आअह... उफ्फ..."

वह शॉवर के नीचे खड़ी होकर अपने दोनों हाथों से पानी को अपने पूरे बदन पर मलने लगी। पानी उसकी गर्दन से होता हुआ उसके स्तनों की गहरी क्लीवेज में समा रहा था, और वहाँ से बहता हुआ उसके गोरे पेट, उसकी गहरी नाभि और सीधे नीचे उसकी टांगों के बीच की उस हल्के बालों वाली योनि की दरार को साफ़ कर रहा था। स्मिता ने अपनी उंगलियों को अपनी योनि के दोनों होठों पर फेरा, दोपहर के उस सूखे हुए रस को धोया, जिससे उसकी योनि का दाना (clitoris) पानी के स्पर्श से और ज्यादा संवेदनशील और कड़ा हो गया।

वह आईने में खुद को देख रही थी—पानी से भीगा हुआ उसका यह भारी, रसीला बदन, छाती पर हवा में लहराते उसके भारी स्तन और जांघों के बीच से बहता पानी। वह जानती थी कि बाहर खड़ा अर्जुन इस समय किस कशमकश से गुजर रहा है। यह शावर उसके जिस्म की आग को बुझा नहीं रहा था, बल्कि उसे रात के उस नंगे, पाशविक मुकाबले के लिए और ज्यादा चिकना, रसीला और बेकाबू बना रहा था। खेल अब उस मुकाम पर था जहाँ खाना परोसने के बाद,

मर्यादा का आखिरी कफ़न भी शायद हमेशा के लिए दफ़न होने वाला था।
बहुत ही जबरदस्त शानदार लाजवाब और अद्भुत रमणिय उन्मादक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 

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शॉवर से गिरते ठंडे पानी की फुहारों ने स्मिता के ५४ साल के गदराए, भारी बदन को बाहर से भले ही साफ़ कर दिया था, लेकिन उसके भीतर जो आग रेखा की उंगलियों और अर्जुन के शब्दों ने लगाई थी, वह अब और भड़क चुकी थी। बाथरूम की पीली रोशनी में जब उसने अपने बदन को तौलिये से पोंछा, तो उसकी गोरी त्वचा उत्तेजना और गर्म पानी की भाप से हल्की गुलाबी पड़ चुकी थी। उसने बिना पैन्टी और ब्रा के, सीधे उस गाढ़े जामुनी रंग की रेशमी शॉर्ट नाइटी को अपने बदन पर सरका लिया। वह रेशमी नाइटी केवल पतली पट्टियों के सहारे उसके कंधों पर टिकी थी, और उसका गहरा गला उसके भारी ३६-डी साइज के स्तनों की गोलाई को आधा नंगा छोड़ रहा था।

बाथरूम का दरवाजा खोलकर वह सीधे अपने बेडरूम में आई। कमरे में मद्धम रोशनी थी और खिड़की से बाहर हो रही मूसलाधार बारिश की आवाज सन्नाटे को और गहरा कर रही थी। स्मिता के लंबे, घने बाल पूरी तरह से भीगे हुए थे, जिनसे पानी की बूंदें टपककर उसकी नाइटी के रेशमी कपड़े को कंधों और पीठ के पास से भिगो रही थीं। वह ड्रेसिंग टेबल के बड़े से आईने के सामने एक छोटी स्टूल पर बैठ गई और अपने भीगे बालों को तौलिये से झटका देने लगी। हर झटके के साथ बिना ब्रा के उसके भारी स्तन नाइटी के भीतर बुरी तरह डोल रहे थे।

तभी कमरे के दरवाजे पर एक हल्का सा साया उभरा। अर्जुन बिना आहट किए कमरे के भीतर दाखिल हो चुका था। उसने पीछे से दरवाजा पूरा बंद नहीं किया, बस हल्का सा टिका दिया। वह इस समय बस एक बेहद ढीला, काले रंग का जिम लोअर पहने हुए था। उसकी चौड़ी, कसरती छाती पर पसीने की चमक अभी भी बाकी थी और उसके लोअर के ठीक बीचों-बीच उसका वह ६ इंच लंबा, मोटा और नस-नस उभरा हुआ औजार एक कड़े तीर की तरह सर उठाए खड़ा था।

स्मिता ने आईने के भीतर अपने जवान बेटे की इस सुलगती हुई कामुक देह को देखा। उसका दिल झटके से उसकी छाती में धड़क उठा, और उसकी पैन्टी-विहीन योनि (pussy) के मखमली होठों के बीच से काम-रस का एक और गर्म, चिपचिपा कतरा रिसकर उसकी जांघों की तरफ बढ़ गया।

अर्जुन बिना कुछ बोले, बहुत ही धीमी और भारी चाल से चलकर सीधे स्मिता के पीछे आकर खड़ा हो गया। आईने में दोनों की नजरें मिलीं। अर्जुन की आँखों में एक शुद्ध, भूखी वासना थी, जबकि स्मिता की आँखों में एक मीठी घबराहट और सामाजिक मर्यादा की आखिरी मूक पुकार थी।

"बाल अभी भी बहुत भीगे हैं, माँ..." अर्जुन ने अपनी आवाज को बेहद धीमा, भारी और मर्दाना करते हुए कहा। उसकी गर्म सांसें सीधे स्मिता की नंगी गर्दन और उसकी पीठ के भीगे हिस्से पर महसूस हो रही थीं।

उसने स्मिता के हाथों से वह सफ़ेद तौलिया बहुत ही सहजता से ले लिया। स्मिता ने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की, उसका पूरा बदन जैसे अर्जुन की इस नजदीकी से ही सुन्न होने लगा था। अर्जुन ने तौलिये को स्मिता के भीगे बालों पर रखा और बहुत ही धीमे, मखमली हाथों से उसके बालों को सुखाना शुरू कर दिया।

तौलिये की हर रगड़ के साथ स्मिता का सिर हल्का-हल्का आगे-पीछे हो रहा था। आईने में साफ दिख रहा था कि जब भी अर्जुन का हाथ उसकी गर्दन के पास से गुजरता, स्मिता की आँखें आधी बंद हो जाती थीं। बिना ब्रा के उसके भारी स्तनों के दोनों कड़े, काले निप्पल (nipples) जामुनी नाइटी के पतले सैटिन को अंदर से चीरते हुए साफ़ बाहर तने हुए थे।

अर्जुन बाल सुखाते-सुखाते थोड़ा और आगे झुका। अब उसकी नंगी, कसरती छाती के घने बाल स्मिता की पीठ के भीगे रेशम से पूरी तरह सट चुके थे। और सबसे डर्टी बात यह थी कि नीचे लोअर के भीतर तना हुआ अर्जुन का वह कड़क, गर्म औजार सीधे स्मिता के उन भारी, गोल नितंबों (hips) की गहरी दरार के ऊपर जाकर कपड़े के आर-पार पूरी तरह से टिक गया था।

जिस्म से जिस्म की इस पहली कड़क छुअन ने स्मिता के बदन में एक करंट दौड़ा दिया। उसने अपनी दोनों हथेलियों से ड्रेसिंग टेबल के किनारे को कसकर भींच लिया।

"अ-अर्जुन..." स्मिता के होठों से एक बेहद धीमी, कांपती हुई आवाज निकली। उसकी ना-ना केवल शब्दों में थी, उसके बदन का हर एक रोम इस छुअन के लिए तरस रहा था। "यह... यह क्या कर रहे हो बेटा? दूर हटो... मत कर मेरे साथ ऐसा..."

"क्यों माँ?" अर्जुन ने बाल सुखाना बंद नहीं किया, उसकी आवाज स्मिता के कान के बिल्कुल पास गूंज रही थी, जिससे उसके कान की लौ लाल होने लगी थी। "तुम्हारे बदन की खुशबू है कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। आईने में देखो खुद को... तुम कितनी रसीली और हॉट लग रही हो।"

स्मिता ने आईने में देखा। उसके ५४ साल के शरीर का वह गदराया हुआ रूप, उसके उभरे हुए कड़क निप्पल और पीछे खड़ा उसका अपना जवान बेटा, जो उसके नितंबों पर अपनी कड़कती मर्दानगी को दबाए हुए था। यह दृश्य देखकर उसकी योनि ने पानी का एक और सैलाब छोड़ दिया।

"नहीं अर्जुन... सुन मेरी बात," स्मिता ने अपनी आवाज में एक झूठी नाराजगी लाने की कोशिश की, लेकिन उसकी सांसें हांफ रही थीं। "तेरे पास... तेरे पास तेरी रेखा मौसी है ना? जा... तू अपनी मौसी के पास ही जाकर कर यह सब।"

अपनी माँ के मुंह से रेखा मौसी का यह उलाहना सुनकर अर्जुन के भीतर का मर्द और ज्यादा उग्र हो गया। उसने तौलिये को एक तरफ फेंक दिया। उसने अपने दोनों बड़े, तंदुरुस्त हाथ आगे बढ़ाए और उन्हें सीधे स्मिता के कंधों पर रख दिया। उसकी उंगलियों का दबाव स्मिता की गोरी त्वचा पर पड़ते ही स्मिता के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकली।

"मौसी रेखा अपनी जगह है, माँ... असली चाहत तो हमेशा से तुम ही हो, बस कभी हिम्मत नहीं हुई, आखिर मां जो हो" अर्जुन ने आईने में सीधे स्मिता की आँखों में आँखें डालकर बहुत ही बेबाकी और रॉ अंदाज़ में कहा। "वैसे मौसी के स्तन तुम्हारे जितने भारी और कड़े नहीं हैं। उनके कूल्हों में वो बात नहीं है जो तुम्हारी इस गदराई हुई देह में है।"

"अह... अर्जुन... चुप कर..." स्मिता ने अपने होठों को दांतों के बीच भींच लिया। "वो मेरी बहन है... उसका खेल अलग है। पर तू... तू मेरा बेटा है। मेरे साथ ऐसा मत कर... लोग क्या कहेंगे..."

अर्जुन ने उसकी एक नहीं सुनी। उसने अपनी मर्दानगी का पूरा दबाव स्मिता के भारी नितंबों पर पीछे से बढ़ा दिया। लोअर के कपड़े के भीतर से उसका वह ६ इंच लंबा, मोटा तोपा (head) स्मिता के नितंबों की दरार को बुरी तरह से कुचलने लगा। अर्जुन ने नीचे से अपनी कमर को हल्का सा आगे की तरफ झटका दिया।

*रगड़...!*

"उफ्फ... आअह... अर्जुन..." स्मिता की आँखें पूरी तरह उलट गईं। उसकी पीठ अर्जुन के सीने पर और कस गई।

अर्जुन ने अपने दोनों हाथों को स्मिता के कंधों से नीचे सरकाना शुरू किया। उसकी हथेलियाँ स्मिता के उन भारी, ३६-डी साइज के स्तनों पर आकर टिक गईं। उसने जामुनी नाइटी के ऊपर से ही उन दोनों रसीले, ढलके हुए गोलों को अपनी मुट्ठियों में दबोच लिया। जब उसकी उंगलियों ने उन कड़े, बड़े काले निप्पलों को बेरहमी से मरोड़ना शुरू किया, तो स्मिता का पूरा बदन स्टूल के ऊपर ही कांप उठा।

"देखो माँ... आईने में देखो," अर्जुन ने फुसफुसाते हुए कहा। "तुम्हारी ये ना-ना सिर्फ जुबान पर है। तुम्हारा ये बदन... तुम्हारी ये छाती मेरे हाथों में आने के लिए कैसे तड़प रही है।"

स्मिता ने आईने में देखा कि उसके अपने बेटे के कसरती, सांवले हाथ उसके गोरे, भारी स्तनों को किस तरह जंगली तरीके से भींच रहे थे। इस नजारे ने उसके दिमाग का बचा-कुचा कंट्रोल भी छीन लिया। वह पागलों की तरह अपने नितंबों को पीछे की तरफ अर्जुन के कड़क अंग पर रगड़ने लगी (backward dry humping)।

"आअह... अर्जुन... मेरी जान... मत कर... उफ्फ, मैं मर जाऊँगी..." वह शब्दों से मना कर रही थी, लेकिन उसके कूल्हे अर्जुन की मर्दानगी पर ज़ोर-ज़ोर से घिस रहे थे।

*घिस... घिस... घिस...!*

अर्जुन ने अपने दाहिने हाथ को उसके स्तनों से नीचे उतारा। उसका हाथ स्मिता के गोरे पेट, उसकी गहरी नाभि को सहलाता हुआ सीधे नीचे की तरफ बढ़ा। स्मिता ने अपनी जांघों को सिकोड़ने की कोशिश की, "नहीं अर्जुन... वहाँ नहीं... प्लीज... रेखा की तरह मत कर..."

लेकिन अर्जुन की ताकत के सामने उसकी यह कमजोर कोशिश नाकाम रही। अर्जुन ने जामुनी नाइटी के निचले घेरे को पीछे से पूरी तरह ऊपर उठा दिया, जिससे स्मिता के दोनों भारी, गोरे नितंब और उसकी जांघों के बीच का वह गुप्त हिस्सा पूरी तरह नंगा हो गया।
अर्जुन का बड़ा, गर्म हाथ सीधे स्मिता की उस पैन्टी-विहीन, नंगी योनि (pussy) के ऊपर जाकर टिक गया।

जैसे ही उसकी हथेलियों ने स्मिता की योनि के उस हल्के, बिखरे हुए और महीन बालों वाले हिस्से को सीधे छुआ, अर्जुन के मुंह से भी एक जंगली कराह निकल गई। स्मिता की योनि इस समय इतनी गर्म और काम-रस से इतनी लथपथ थी कि अर्जुन की पूरी उंगलियाँ उस गाढ़े, चिपचिपे पानी से तुरंत सन गईं।

"उफ्फ... माँ... तुम्हारी चुत तो पूरी तरह से उबल रही है..." अर्जुन ने हांफते हुए कहा, और उसने अपनी दो उंगलियों को उन हल्के बालों के बीच से सीधे स्मिता की योनि के रसीले, मोटे होठों के भीतर धंसा दिया।

"आअह... उफ्फ... अर्जुन... मेरी बच्चे... अआह...!" स्मिता के मुंह से एक इतनी तीखी और डर्टी सिसकी निकली कि उसकी आवाज बेडरूम की दीवारों से टकराकर गूंजने लगी। उसने अपने पैरों को पूरी तरह से फैला दिया और स्टूल पर ही अपनी कमर को आगे-पीछे मारना शुरू कर दिया।

अर्जुन की उंगलियां अब स्मिता की ५४ साल की फुली हुई मखमली योनि के भीतर पूरी रफ्तार से अंदर-बाहर हो रही थीं।

*पिच... पिच... पिच...*

उस शांत कमरे में बारिश की आवाज के साथ-साथ स्मिता की योनि से निकलते पानी और अर्जुन की उंगलियों की वह डर्टी, कामुक आवाज गूंजने लगी। अर्जुन ने अपनी उंगलियों की रफ्तार बढ़ाई और अपने अंगूठे से स्मिता के उस काम-दाने (clitoris) को उन हल्के, महीन बालों के ऊपर ही बेरहमी से मसलना शुरू कर दिया।
स्मिता का पूरा बदन आईने के सामने अकड़ चुका था। उसके स्तन हवा में बुरी तरह उछल रहे थे और उसकी गर्दन पूरी तरह पीछे की तरफ झुककर अर्जुन के कंधे पर आ टिकी थी। वह पागलों की तरह अपनी हल्के बालों वाली चुत को अर्जुन के हाथ पर रगड़ रही थी, मानो वह अर्जुन की उंगलियों को ही अपने भीतर पूरी तरह निगल जाना चाहती हो।

"अर्जुन... ओह मेरे भगवान... रेखा सच कहती थी... तेरा हाथ... तेरी उंगलियाँ... उफ्फ......!" स्मिता के मुंह से अब मर्यादा का आखरी कफ़न भी उतर चुका था। वह पूरी तरह से एक कामुक, भूखी मादा बन चुकी थी।

अर्जुन ने देखा कि स्मिता की योनि के रसीले होंठ अब उसकी उंगलियों के नीचे बुरी तरह कांप रहे हैं और उसका पूरा बदन झटके ले रहा है। उसने अपने अंगूठे का दबाव उस काम-दाने पर और कस दिया।

मात्र कुछ सेकंड की उस पाशविक, रॉ रगड़ के बाद, स्मिता के बदन में एक तीव्र सिहरन दौड़ी। उसकी आँखें पूरी तरह उलट गईं, उसने आईने के स्टैंड को अपनी उंगलियों से इतनी जोर से पकड़ा कि उसके नाखून सफेद पड़ गए, और उसकी योनि ने काम-रस का एक बहुत बड़ा, गाढ़ा और गर्म सैलाब छोड़ दिया। पानी की धार अर्जुन की पूरी हथेली को भिगोती हुई नीचे फर्श पर टपकने लगी। स्मिता का पूरा बदन बेजान होकर पीछे अर्जुन की छाती पर ढह गया। वह पागलों की तरह हांफ रही थी, उसकी नाइटी पसीने और पानी से पूरी तरह भीग चुकी थी।

अर्जुन ने अपनी उंगलियों को उसकी योनि से बाहर निकाला। वे उंगलियां स्मिता के गाढ़े, रसीले पानी से पूरी तरह सराबोर थीं। उसने उन उंगलियों को आईने के सामने स्मिता के होठों के पास किया। स्मिता ने पूरी तरह से मदहोश होकर, बिना किसी शर्म के, अपने ही जवान बेटे की उंगलियों पर लगे अपने उस काम-रस को अपनी जीभ से चाट लिया।

अर्जुन ने उसे पीछे से अपनी बाहों में और कस लिया। उसका अपना अंग अभी भी उसके लोअर के भीतर लोहे की रॉड की तरह कड़ा था और वीर्य छोड़ने के लिए तड़प रहा था। लेकिन वह जानता था कि असली पूर्ण मिलन का मजा इस तड़प को और बढ़ाने में है।

उसने स्मिता के कान के पास अपने होठ रखे और एक डर्टी, कामुक मुस्कान के साथ फुसफुसाया, "देखा माँ... तुम्हारी ना-ना का अंत कितना रसीला और सुखदायक हुआ।"

स्मिता ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखें बंद करके अर्जुन की मर्दाना छाती की तपन को अपने भीतर समेटती रही, यह जानते हुए कि अब इस घर में मर्यादा की कोई दीवार ढह चुकी है।

अर्जुन के उस आख़िरी सुलगते हुए जुमले और अपनी ही उंगलियों का वह रसीला नशा चखने के बाद, स्मिता के बदन की कंपकंपी तो धीरे-धीरे शांत हो रही थी, लेकिन उसके भीतर का जो 'माँ' का किरदार था, उसने लाज और झेंप का एक आख़िरी घूंघट ओढ़ने की कोशिश की। वह इस चरम सुख से अंदर तक तृप्त थी, पर एक जवान बेटे के सामने अपनी इस घुटने टेक चुकी नग्न वासना को स्वीकार करने की उसमें हिम्मत नहीं हो रही थी।

उसने आईने में अपनी बिखरी हुई सूरत और पानी से सनी जामुनी नाइटी को देखा। अचानक उसके चेहरे पर एक नकली, हल्की सी नाराज़गी और सूनापन छा गया—एक ऐसी एक्टिंग, जो औरतें अक्सर अपनी कमज़ोरी को छुपाने के लिए करती हैं।

उसने झटके से अर्जुन के कसरती कंधों पर रखे अपने हाथों को हटाया। अपनी जांघों को समेटते हुए, उसने अपनी नाइटी के घेरे को खींचकर नीचे किया, जो अर्जुन ने ऊपर उठा रखा था।

"तू... तू बहुत ढीठ हो गया है, अर्जुन..." स्मिता ने अपनी आवाज़ को जानबूझकर थोड़ा कड़क और रूखा करने की कोशिश की, लेकिन उसकी हांफती हुई सांसें उसकी इस झूठी नाराज़गी की पोल खोल रही थीं। उसने अर्जुन की आँखों में देखे बिना, आईने के स्टैंड को पकड़कर खुद को स्टूल से उठाया। "और तू भूल रहा है कि हम मां बेटे है। अपनी मौसी के साथ कर चुका है तो आगे जो मर्जी आए कर।"

अर्जुन वहीं खड़ा रहा। उसके होंठों पर एक गहरी, डर्टी और सब कुछ जान लेने वाली मर्दानी मुस्कान थी। वह साफ़ देख रहा था कि उसकी माँ की जांघों के बीच से अभी भी काम-रस की बूंदें रिस रही हैं, और उनके भारी स्तनों के निप्पल अभी भी उस जामुनी रेशम को अंदर से कुरेद रहे हैं।

स्मिता ने अपनी बिखरी जुल्फों को एक झटके से पीछे झटका, अपने कांपते पैरों को संभाला और बिना कोई दूसरा शब्द बोले, बिल्कुल चुपचाप (completely silent) कमरे से बाहर निकल गई। उसकी चाल में एक बनावटी कड़कपन था, लेकिन उसके नितंबों का वह भारी, धीमा मटकना अर्जुन को साफ़ बता रहा था कि यह नाराज़गी सिर्फ ऊपर की है।

वह सीधे किचन की तरफ बढ़ गई, जहाँ बर्तनों को उठाने और खाना लगाने की मूक आवाजें आने लगीं। कमरे में अकेला खड़ा अर्जुन अपने उस तपते, कड़े अंग को थामे मुस्कुरा रहा था, क्योंकि वह जानता था कि इस आख़िरी झूठी नाराज़गी का कफ़न भी आज रात की तन्हाई में हमेशा के लिए शायद फटने वाला है।
 
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