शॉवर से गिरते ठंडे पानी की फुहारों ने स्मिता के ५४ साल के गदराए, भारी बदन को बाहर से भले ही साफ़ कर दिया था, लेकिन उसके भीतर जो आग रेखा की उंगलियों और अर्जुन के शब्दों ने लगाई थी, वह अब और भड़क चुकी थी। बाथरूम की पीली रोशनी में जब उसने अपने बदन को तौलिये से पोंछा, तो उसकी गोरी त्वचा उत्तेजना और गर्म पानी की भाप से हल्की गुलाबी पड़ चुकी थी। उसने बिना पैन्टी और ब्रा के, सीधे उस गाढ़े जामुनी रंग की रेशमी शॉर्ट नाइटी को अपने बदन पर सरका लिया। वह रेशमी नाइटी केवल पतली पट्टियों के सहारे उसके कंधों पर टिकी थी, और उसका गहरा गला उसके भारी ३६-डी साइज के स्तनों की गोलाई को आधा नंगा छोड़ रहा था।
बाथरूम का दरवाजा खोलकर वह सीधे अपने बेडरूम में आई। कमरे में मद्धम रोशनी थी और खिड़की से बाहर हो रही मूसलाधार बारिश की आवाज सन्नाटे को और गहरा कर रही थी। स्मिता के लंबे, घने बाल पूरी तरह से भीगे हुए थे, जिनसे पानी की बूंदें टपककर उसकी नाइटी के रेशमी कपड़े को कंधों और पीठ के पास से भिगो रही थीं। वह ड्रेसिंग टेबल के बड़े से आईने के सामने एक छोटी स्टूल पर बैठ गई और अपने भीगे बालों को तौलिये से झटका देने लगी। हर झटके के साथ बिना ब्रा के उसके भारी स्तन नाइटी के भीतर बुरी तरह डोल रहे थे।
तभी कमरे के दरवाजे पर एक हल्का सा साया उभरा। अर्जुन बिना आहट किए कमरे के भीतर दाखिल हो चुका था। उसने पीछे से दरवाजा पूरा बंद नहीं किया, बस हल्का सा टिका दिया। वह इस समय बस एक बेहद ढीला, काले रंग का जिम लोअर पहने हुए था। उसकी चौड़ी, कसरती छाती पर पसीने की चमक अभी भी बाकी थी और उसके लोअर के ठीक बीचों-बीच उसका वह ६ इंच लंबा, मोटा और नस-नस उभरा हुआ औजार एक कड़े तीर की तरह सर उठाए खड़ा था।
स्मिता ने आईने के भीतर अपने जवान बेटे की इस सुलगती हुई कामुक देह को देखा। उसका दिल झटके से उसकी छाती में धड़क उठा, और उसकी पैन्टी-विहीन योनि (pussy) के मखमली होठों के बीच से काम-रस का एक और गर्म, चिपचिपा कतरा रिसकर उसकी जांघों की तरफ बढ़ गया।
अर्जुन बिना कुछ बोले, बहुत ही धीमी और भारी चाल से चलकर सीधे स्मिता के पीछे आकर खड़ा हो गया। आईने में दोनों की नजरें मिलीं। अर्जुन की आँखों में एक शुद्ध, भूखी वासना थी, जबकि स्मिता की आँखों में एक मीठी घबराहट और सामाजिक मर्यादा की आखिरी मूक पुकार थी।
"बाल अभी भी बहुत भीगे हैं, माँ..." अर्जुन ने अपनी आवाज को बेहद धीमा, भारी और मर्दाना करते हुए कहा। उसकी गर्म सांसें सीधे स्मिता की नंगी गर्दन और उसकी पीठ के भीगे हिस्से पर महसूस हो रही थीं।
उसने स्मिता के हाथों से वह सफ़ेद तौलिया बहुत ही सहजता से ले लिया। स्मिता ने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की, उसका पूरा बदन जैसे अर्जुन की इस नजदीकी से ही सुन्न होने लगा था। अर्जुन ने तौलिये को स्मिता के भीगे बालों पर रखा और बहुत ही धीमे, मखमली हाथों से उसके बालों को सुखाना शुरू कर दिया।
तौलिये की हर रगड़ के साथ स्मिता का सिर हल्का-हल्का आगे-पीछे हो रहा था। आईने में साफ दिख रहा था कि जब भी अर्जुन का हाथ उसकी गर्दन के पास से गुजरता, स्मिता की आँखें आधी बंद हो जाती थीं। बिना ब्रा के उसके भारी स्तनों के दोनों कड़े, काले निप्पल (nipples) जामुनी नाइटी के पतले सैटिन को अंदर से चीरते हुए साफ़ बाहर तने हुए थे।
अर्जुन बाल सुखाते-सुखाते थोड़ा और आगे झुका। अब उसकी नंगी, कसरती छाती के घने बाल स्मिता की पीठ के भीगे रेशम से पूरी तरह सट चुके थे। और सबसे डर्टी बात यह थी कि नीचे लोअर के भीतर तना हुआ अर्जुन का वह कड़क, गर्म औजार सीधे स्मिता के उन भारी, गोल नितंबों (hips) की गहरी दरार के ऊपर जाकर कपड़े के आर-पार पूरी तरह से टिक गया था।
जिस्म से जिस्म की इस पहली कड़क छुअन ने स्मिता के बदन में एक करंट दौड़ा दिया। उसने अपनी दोनों हथेलियों से ड्रेसिंग टेबल के किनारे को कसकर भींच लिया।
"अ-अर्जुन..." स्मिता के होठों से एक बेहद धीमी, कांपती हुई आवाज निकली। उसकी ना-ना केवल शब्दों में थी, उसके बदन का हर एक रोम इस छुअन के लिए तरस रहा था। "यह... यह क्या कर रहे हो बेटा? दूर हटो... मत कर मेरे साथ ऐसा..."
"क्यों माँ?" अर्जुन ने बाल सुखाना बंद नहीं किया, उसकी आवाज स्मिता के कान के बिल्कुल पास गूंज रही थी, जिससे उसके कान की लौ लाल होने लगी थी। "तुम्हारे बदन की खुशबू है कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। आईने में देखो खुद को... तुम कितनी रसीली और हॉट लग रही हो।"
स्मिता ने आईने में देखा। उसके ५४ साल के शरीर का वह गदराया हुआ रूप, उसके उभरे हुए कड़क निप्पल और पीछे खड़ा उसका अपना जवान बेटा, जो उसके नितंबों पर अपनी कड़कती मर्दानगी को दबाए हुए था। यह दृश्य देखकर उसकी योनि ने पानी का एक और सैलाब छोड़ दिया।
"नहीं अर्जुन... सुन मेरी बात," स्मिता ने अपनी आवाज में एक झूठी नाराजगी लाने की कोशिश की, लेकिन उसकी सांसें हांफ रही थीं। "तेरे पास... तेरे पास तेरी रेखा मौसी है ना? जा... तू अपनी मौसी के पास ही जाकर कर यह सब।"
अपनी माँ के मुंह से रेखा मौसी का यह उलाहना सुनकर अर्जुन के भीतर का मर्द और ज्यादा उग्र हो गया। उसने तौलिये को एक तरफ फेंक दिया। उसने अपने दोनों बड़े, तंदुरुस्त हाथ आगे बढ़ाए और उन्हें सीधे स्मिता के कंधों पर रख दिया। उसकी उंगलियों का दबाव स्मिता की गोरी त्वचा पर पड़ते ही स्मिता के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकली।
"मौसी रेखा अपनी जगह है, माँ... असली चाहत तो हमेशा से तुम ही हो, बस कभी हिम्मत नहीं हुई, आखिर मां जो हो" अर्जुन ने आईने में सीधे स्मिता की आँखों में आँखें डालकर बहुत ही बेबाकी और रॉ अंदाज़ में कहा। "वैसे मौसी के स्तन तुम्हारे जितने भारी और कड़े नहीं हैं। उनके कूल्हों में वो बात नहीं है जो तुम्हारी इस गदराई हुई देह में है।"
"अह... अर्जुन... चुप कर..." स्मिता ने अपने होठों को दांतों के बीच भींच लिया। "वो मेरी बहन है... उसका खेल अलग है। पर तू... तू मेरा बेटा है। मेरे साथ ऐसा मत कर... लोग क्या कहेंगे..."
अर्जुन ने उसकी एक नहीं सुनी। उसने अपनी मर्दानगी का पूरा दबाव स्मिता के भारी नितंबों पर पीछे से बढ़ा दिया। लोअर के कपड़े के भीतर से उसका वह ६ इंच लंबा, मोटा तोपा (head) स्मिता के नितंबों की दरार को बुरी तरह से कुचलने लगा। अर्जुन ने नीचे से अपनी कमर को हल्का सा आगे की तरफ झटका दिया।
*रगड़...!*
"उफ्फ... आअह... अर्जुन..." स्मिता की आँखें पूरी तरह उलट गईं। उसकी पीठ अर्जुन के सीने पर और कस गई।
अर्जुन ने अपने दोनों हाथों को स्मिता के कंधों से नीचे सरकाना शुरू किया। उसकी हथेलियाँ स्मिता के उन भारी, ३६-डी साइज के स्तनों पर आकर टिक गईं। उसने जामुनी नाइटी के ऊपर से ही उन दोनों रसीले, ढलके हुए गोलों को अपनी मुट्ठियों में दबोच लिया। जब उसकी उंगलियों ने उन कड़े, बड़े काले निप्पलों को बेरहमी से मरोड़ना शुरू किया, तो स्मिता का पूरा बदन स्टूल के ऊपर ही कांप उठा।
"देखो माँ... आईने में देखो," अर्जुन ने फुसफुसाते हुए कहा। "तुम्हारी ये ना-ना सिर्फ जुबान पर है। तुम्हारा ये बदन... तुम्हारी ये छाती मेरे हाथों में आने के लिए कैसे तड़प रही है।"
स्मिता ने आईने में देखा कि उसके अपने बेटे के कसरती, सांवले हाथ उसके गोरे, भारी स्तनों को किस तरह जंगली तरीके से भींच रहे थे। इस नजारे ने उसके दिमाग का बचा-कुचा कंट्रोल भी छीन लिया। वह पागलों की तरह अपने नितंबों को पीछे की तरफ अर्जुन के कड़क अंग पर रगड़ने लगी (backward dry humping)।
"आअह... अर्जुन... मेरी जान... मत कर... उफ्फ, मैं मर जाऊँगी..." वह शब्दों से मना कर रही थी, लेकिन उसके कूल्हे अर्जुन की मर्दानगी पर ज़ोर-ज़ोर से घिस रहे थे।
*घिस... घिस... घिस...!*
अर्जुन ने अपने दाहिने हाथ को उसके स्तनों से नीचे उतारा। उसका हाथ स्मिता के गोरे पेट, उसकी गहरी नाभि को सहलाता हुआ सीधे नीचे की तरफ बढ़ा। स्मिता ने अपनी जांघों को सिकोड़ने की कोशिश की, "नहीं अर्जुन... वहाँ नहीं... प्लीज... रेखा की तरह मत कर..."
लेकिन अर्जुन की ताकत के सामने उसकी यह कमजोर कोशिश नाकाम रही। अर्जुन ने जामुनी नाइटी के निचले घेरे को पीछे से पूरी तरह ऊपर उठा दिया, जिससे स्मिता के दोनों भारी, गोरे नितंब और उसकी जांघों के बीच का वह गुप्त हिस्सा पूरी तरह नंगा हो गया।
अर्जुन का बड़ा, गर्म हाथ सीधे स्मिता की उस पैन्टी-विहीन, नंगी योनि (pussy) के ऊपर जाकर टिक गया।
जैसे ही उसकी हथेलियों ने स्मिता की योनि के उस हल्के, बिखरे हुए और महीन बालों वाले हिस्से को सीधे छुआ, अर्जुन के मुंह से भी एक जंगली कराह निकल गई। स्मिता की योनि इस समय इतनी गर्म और काम-रस से इतनी लथपथ थी कि अर्जुन की पूरी उंगलियाँ उस गाढ़े, चिपचिपे पानी से तुरंत सन गईं।
"उफ्फ... माँ... तुम्हारी चुत तो पूरी तरह से उबल रही है..." अर्जुन ने हांफते हुए कहा, और उसने अपनी दो उंगलियों को उन हल्के बालों के बीच से सीधे स्मिता की योनि के रसीले, मोटे होठों के भीतर धंसा दिया।
"आअह... उफ्फ... अर्जुन... मेरी बच्चे... अआह...!" स्मिता के मुंह से एक इतनी तीखी और डर्टी सिसकी निकली कि उसकी आवाज बेडरूम की दीवारों से टकराकर गूंजने लगी। उसने अपने पैरों को पूरी तरह से फैला दिया और स्टूल पर ही अपनी कमर को आगे-पीछे मारना शुरू कर दिया।
अर्जुन की उंगलियां अब स्मिता की ५४ साल की फुली हुई मखमली योनि के भीतर पूरी रफ्तार से अंदर-बाहर हो रही थीं।
*पिच... पिच... पिच...*
उस शांत कमरे में बारिश की आवाज के साथ-साथ स्मिता की योनि से निकलते पानी और अर्जुन की उंगलियों की वह डर्टी, कामुक आवाज गूंजने लगी। अर्जुन ने अपनी उंगलियों की रफ्तार बढ़ाई और अपने अंगूठे से स्मिता के उस काम-दाने (clitoris) को उन हल्के, महीन बालों के ऊपर ही बेरहमी से मसलना शुरू कर दिया।
स्मिता का पूरा बदन आईने के सामने अकड़ चुका था। उसके स्तन हवा में बुरी तरह उछल रहे थे और उसकी गर्दन पूरी तरह पीछे की तरफ झुककर अर्जुन के कंधे पर आ टिकी थी। वह पागलों की तरह अपनी हल्के बालों वाली चुत को अर्जुन के हाथ पर रगड़ रही थी, मानो वह अर्जुन की उंगलियों को ही अपने भीतर पूरी तरह निगल जाना चाहती हो।
"अर्जुन... ओह मेरे भगवान... रेखा सच कहती थी... तेरा हाथ... तेरी उंगलियाँ... उफ्फ......!" स्मिता के मुंह से अब मर्यादा का आखरी कफ़न भी उतर चुका था। वह पूरी तरह से एक कामुक, भूखी मादा बन चुकी थी।
अर्जुन ने देखा कि स्मिता की योनि के रसीले होंठ अब उसकी उंगलियों के नीचे बुरी तरह कांप रहे हैं और उसका पूरा बदन झटके ले रहा है। उसने अपने अंगूठे का दबाव उस काम-दाने पर और कस दिया।
मात्र कुछ सेकंड की उस पाशविक, रॉ रगड़ के बाद, स्मिता के बदन में एक तीव्र सिहरन दौड़ी। उसकी आँखें पूरी तरह उलट गईं, उसने आईने के स्टैंड को अपनी उंगलियों से इतनी जोर से पकड़ा कि उसके नाखून सफेद पड़ गए, और उसकी योनि ने काम-रस का एक बहुत बड़ा, गाढ़ा और गर्म सैलाब छोड़ दिया। पानी की धार अर्जुन की पूरी हथेली को भिगोती हुई नीचे फर्श पर टपकने लगी। स्मिता का पूरा बदन बेजान होकर पीछे अर्जुन की छाती पर ढह गया। वह पागलों की तरह हांफ रही थी, उसकी नाइटी पसीने और पानी से पूरी तरह भीग चुकी थी।
अर्जुन ने अपनी उंगलियों को उसकी योनि से बाहर निकाला। वे उंगलियां स्मिता के गाढ़े, रसीले पानी से पूरी तरह सराबोर थीं। उसने उन उंगलियों को आईने के सामने स्मिता के होठों के पास किया। स्मिता ने पूरी तरह से मदहोश होकर, बिना किसी शर्म के, अपने ही जवान बेटे की उंगलियों पर लगे अपने उस काम-रस को अपनी जीभ से चाट लिया।
अर्जुन ने उसे पीछे से अपनी बाहों में और कस लिया। उसका अपना अंग अभी भी उसके लोअर के भीतर लोहे की रॉड की तरह कड़ा था और वीर्य छोड़ने के लिए तड़प रहा था। लेकिन वह जानता था कि असली पूर्ण मिलन का मजा इस तड़प को और बढ़ाने में है।
उसने स्मिता के कान के पास अपने होठ रखे और एक डर्टी, कामुक मुस्कान के साथ फुसफुसाया, "देखा माँ... तुम्हारी ना-ना का अंत कितना रसीला और सुखदायक हुआ।"
स्मिता ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखें बंद करके अर्जुन की मर्दाना छाती की तपन को अपने भीतर समेटती रही, यह जानते हुए कि अब इस घर में मर्यादा की कोई दीवार ढह चुकी है।
अर्जुन के उस आख़िरी सुलगते हुए जुमले और अपनी ही उंगलियों का वह रसीला नशा चखने के बाद, स्मिता के बदन की कंपकंपी तो धीरे-धीरे शांत हो रही थी, लेकिन उसके भीतर का जो 'माँ' का किरदार था, उसने लाज और झेंप का एक आख़िरी घूंघट ओढ़ने की कोशिश की। वह इस चरम सुख से अंदर तक तृप्त थी, पर एक जवान बेटे के सामने अपनी इस घुटने टेक चुकी नग्न वासना को स्वीकार करने की उसमें हिम्मत नहीं हो रही थी।
उसने आईने में अपनी बिखरी हुई सूरत और पानी से सनी जामुनी नाइटी को देखा। अचानक उसके चेहरे पर एक नकली, हल्की सी नाराज़गी और सूनापन छा गया—एक ऐसी एक्टिंग, जो औरतें अक्सर अपनी कमज़ोरी को छुपाने के लिए करती हैं।
उसने झटके से अर्जुन के कसरती कंधों पर रखे अपने हाथों को हटाया। अपनी जांघों को समेटते हुए, उसने अपनी नाइटी के घेरे को खींचकर नीचे किया, जो अर्जुन ने ऊपर उठा रखा था।
"तू... तू बहुत ढीठ हो गया है, अर्जुन..." स्मिता ने अपनी आवाज़ को जानबूझकर थोड़ा कड़क और रूखा करने की कोशिश की, लेकिन उसकी हांफती हुई सांसें उसकी इस झूठी नाराज़गी की पोल खोल रही थीं। उसने अर्जुन की आँखों में देखे बिना, आईने के स्टैंड को पकड़कर खुद को स्टूल से उठाया। "और तू भूल रहा है कि हम मां बेटे है। अपनी मौसी के साथ कर चुका है तो आगे जो मर्जी आए कर।"
अर्जुन वहीं खड़ा रहा। उसके होंठों पर एक गहरी, डर्टी और सब कुछ जान लेने वाली मर्दानी मुस्कान थी। वह साफ़ देख रहा था कि उसकी माँ की जांघों के बीच से अभी भी काम-रस की बूंदें रिस रही हैं, और उनके भारी स्तनों के निप्पल अभी भी उस जामुनी रेशम को अंदर से कुरेद रहे हैं।
स्मिता ने अपनी बिखरी जुल्फों को एक झटके से पीछे झटका, अपने कांपते पैरों को संभाला और बिना कोई दूसरा शब्द बोले, बिल्कुल चुपचाप (completely silent) कमरे से बाहर निकल गई। उसकी चाल में एक बनावटी कड़कपन था, लेकिन उसके नितंबों का वह भारी, धीमा मटकना अर्जुन को साफ़ बता रहा था कि यह नाराज़गी सिर्फ ऊपर की है।
वह सीधे किचन की तरफ बढ़ गई, जहाँ बर्तनों को उठाने और खाना लगाने की मूक आवाजें आने लगीं। कमरे में अकेला खड़ा अर्जुन अपने उस तपते, कड़े अंग को थामे मुस्कुरा रहा था, क्योंकि वह जानता था कि इस आख़िरी झूठी नाराज़गी का कफ़न भी आज रात की तन्हाई में हमेशा के लिए शायद फटने वाला है।