अध्याय १५
सपना अपने ही घर में पूरी तरह से बेलिबास घोड़ी बनी हुई थी। सपना की गांड तेल से सरोबार थी।
तेल की वजह से उसकी गांड दिन की रोशनी में चमक रही थी। उधर उसका बेटा राजू अपने हाथों से विकराल लंड की मालिश कर रहा था। तभी राजू ने उस विकराल लंड को सपना की गांड के छेद पर टिका दिया।
उस विकराल लंड द्वारा इतना तेज झटका लगा कि सपना की चीख निकल गई। चीख इतनी तेज थी कि सपना हड़बड़ा के अपनी नींद की आग़ोश से बाहर आ गई। सपना की साँसे इतनी तेज चल रही थी जैसे मानो अभी कोई दौड़ लगाके आई हूं। उसके मन में कई सवाल थे।
सपना(मन में): हाय राम कैसा सपना था ये? इतना विकराल लंड? कौन हो सकता है ये? और ये राजू मेरे सपने में क्या कर रहा था?
कुछ सोचते हुए सपना के चेहरे पर मुस्कान आ गई और वो खुद ही अपने सवालों का जवाब देने लगी।
सपना (मन में): ऐसा विकराल लंड तो सिर्फ मेरे मालिक का ही हो सकता है और उन्होंने कहा था कि मुझे राजू के सामने उनसे चुदवाना होगा और उन्हें अपनी कुंवारी गांड भी देनी होगी और शायद ये सपना आज इस लिए आया क्योंकि मालिक आज शहर से आ गए है, तो कल पक्का अपनी रॉड की चूत मारने जरूर आयेंगे।
तभी सपना को एक आवाज़ दरवाजे के पास से आती सुनाई दी।
आवाज: क्या हुआ मा? इतनी तेज क्यों चिल्लाई?
सपना जैसे नींद से जागी हो, उसे दरवाजे की चौखट पे राजू खड़ा दिखाई दिया जो एक टक उसे घूरे जा रहा था। सपना ने राजू की नजरों का पीछा किया तो पाया उसकी खुद की हालत कितनी खराब हैं। उसका ब्लाउज सिर्फ दो बटनों पे टिका हुआ था जिसमें उसकी आधे से ज्यादा चूचियाँ दिख रही थी और उसका पेटीकोट बिल्कुल उसके पेट पे पड़ा हुआ था जिससे उसकी पेटी बिल्कुल साफ नजर आ रही थी।
चटाक की आवाज ने उस शांत वातावरण का मौन तोड़ दिया। सपना की चप्पल सीधे राजू के चेहरे पर उड़ती हुई पड़ी। राजू कुछ समझ पता या संभालता सपना तब तक बिल्कुल उसके करीब पहुंच गई थी। राजू के गाल पर सपना के भारी भरकम हाथ का तमाचा पड़ चुका था। उस तमाचे न रात के सन्नाटे का दिल चीर दिया और राजू केवल गाल मलता रह गया और वो अपनी माँ के हुस्न के मायाजाल से बाहर निकल पाया। राजू ने अब जब सपना को देखा तो वो किसी चंडी से कम नहीं लग रही थी। वो राजू को सबक सिखाने के लिए कोई ठोस चीज ढूंढ रही थी तभी राजू को अपनी गलती का एहसास हुआ और वो अपनी जान बचाने के लिए भागा। सपना ने जैसे ही उसे भागते हुए देखा वो भी उसके पीछे दौड़ी और शेरनी की तरह दहाड़ने लगी।
सपना: रुक जा, ठहर जा, कहां भागता है मादरचोद, हरामी, कुते के बीज, मुझे अपनी मां को नंगा को देखेगा। अभी तेरी सारी जवानी निकलती हूँ ।
राजू भागता हुआ तबेले के दरवाजे तक पहुंच गया और उसने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। सपना ने काफी देर दरवाजा पीटा पर राजू ने अपनी जान बचाने के लिए दरवाजा नहीं खोला तो सपना ने भी बाहर से सांकल चढ़ा दी और उसपे ताला लगा दिया।
सपना: अब देखती हूं कुते तू कब तक बाहर नहीं आएगा। न मार मार के तेरी गांड लाल कर दी तो मेरा नाम भी सपना नहीं ।
सपना फिर उसके बाद अपने घर के अंदर गई और अपने मालिक के स्वागत की तैयारी करने लगी। आज वो अपने मालिक के लिए रबड़ी वाले मालपूए बना रहा थी
सूरज का प्रकाश फैल चुका था और गांव में सभी लोग अपने दिनचर्या में मशगूल हो चुके थे पर सबसे बेखबर दो प्रेमी अभी भी एक दूसरे की बाहों में सिमटे हुए सो रहे थे। दोनों के चेहरे पर असीम संतुष्टि के भाव थे। तभी एक तेज आवाज के कारण सुधा की नींद टूटी। इस समय वो पूरी तरह से लल्लू पे लदी हुई थी।
लल्लू के एक हाथ पे उसका सिर था, लल्लू की छाती पे उसके जिस्म का आधे से ज्यादा ऊपरी हिस्सा था और उसकी एक टांग पूरी तरह से लल्लू की जांघों को जकड़े हुई थी। सुधा ने थोड़ा उठने की कोशिश करी तो उसको अपनी अवस्था का एहसास हुआ कि उसके जिस्म पे केवल एक पेटीकोट ही बचा है और उसकी आंखों के सामने रात का हर वो लम्हा जो उसने लल्लू के साथ बिताया था घूमने लगा, उसके चेहरे पे एक मुस्कान फैलती चली गई। वो लल्लू की कठोर छाती को सहलाने लगी और उसके स्पर्श मात्र से ही उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी।
इससे पहले वो कामवासन की गिरफ्त में पहुँचती, उसकी आँख के सामने दीवार पे लटकी हुई घड़ी पड़ गई जो इस समय आठ बजा रही थी। सुधा की सारी उत्तेजना काफूर हो गई और वो एक दम से उठ गई पलंग से और अपने कपड़े ढूंढने लगी। साड़ी तो उसे मिल गई परन्तु उसका ब्लाउज और ब्रा तो रात को फट चुके थे और उसकी पेटी पे लल्लू का अमृत रस पड़ा हुआ था। सुधा के पास अभी अपनी मिठाई चखने का समय नहीं था। उसने अपने फटे ब्लाउज और ब्रा को ऐसे संभालके रखा जैसे पहला प्यार का पहला खत लोग संभाल के रखते है। और अपनी मिठाई को भी संभाल के रख दिया बाद में खाने के लिए। तुरंत ही उसने दूसरी साड़ी, ब्लाउज और ब्रा निकाले और नीचे जाने ले लिये तैयार होने लगी। सुधा को आज अपनी चुचिया पहले की उपेक्षा आज ज्यादा बड़ी लग रही थी क्योंकि वो उसकी ब्रा का हुक बंद होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। सुधा असमंजस में थी और सोचने लगी।
सुधा (मन में) : एक ही रात में मेरा साइज भड़ा दिया इस कुते ने। कैसे वहशी की तरह मेरी चुचियो का मर्दन कर रहा था और भूखे भेड़िये की तरह मेरे चुचिया चूस रहा था। कैसे बिना कुछ करे ही उसने मुझे झाड़ दिया, हाय कितना मजा आया था। और अब कितना मासूम लग रहा है बल्कि पूरा का पूरा शैतान हैं। कैसे उस औरत के सारे कस बल निकल रहा था, लेकिन वो औरत थी कौन समझ में नहीं आ रहा।
तभी नीचे से आती हुई आवाजों ने सुधा को उसके मन से आ रही आवाज़ों से बाहर निकाला। सुधा ने जैसे तैसे अपनी ब्रा बंद करी और वो तुरंत कपड़े पहन कर नीचे जाने लगी। दरवाजा खोलने से पहले सुधा ने एक बार मुड़ कर लल्लू की तरफ देखा और उसकी मासूम सी सीरत को अपने मन में संजो लिया और दरवाजा खोल कर नीचे की तरफ चल दी। सुधा जैसे जैसे एक एक सीडी नीचे उतर रही थी उसके दिल की धड़कने बढ़ती जा रही थी, आखिर वो सबसे क्या बोलेगी कि इतनी देर उसे उठने में कैसे हो गई। जैसे ही सुधा ने नीचे आँगन में कदम रखा उसे माया देवी तबेले की तरफ से आती हुई दिखाई दी। माया देवी का पूरा जिस्म पसीने से भीगा हुआ था और वो उनके चेहरे पर गुस्से का कोई भाव नहीं था। जैसे ही माया देवी पास आई।
सुधा: दीदी, पता नहीं आज आँख कैसे नहीं खुली।
माया देवी: कोई बात नहीं सुधा, इसी बहाने से मैने भी आज थोड़ी कसरत कर ली। वैसे भी ठाकुर साहब बहुत शैतान हो गये है, इतनी जल्दी कहा सोने देते है।
और माया देवी के चेहरे पर एक रहस्मयी मुस्कान फैल गई, जिसे देख सुधा सकपका गई जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हों।
सुधा: ( अपने आप को संभालते हुए) मम्मतलब.........( सुधा के चेहरे पर एक प्रश्न चिह्न था)
माया देवी: ( बात को संभालते हुए) अरे मेरा मतलब था कभी कहानी सुनाओ, कभी ये गेम खेलो, ये ही सब तो करते है रात को। चल छोड़ मैं ज़रा चौपाल तक होके आती हूं, तू जरा रसोईघर देख ले।
इतना बोलकर माया देवी सुधा के सामने से होती हुई दरवाजे से बाहर चली गई और सुधा अपने आप को संभालते हुए रसोईघर की तरफ बढ़ने लगी। एक आवाज ने इसके मन के अंदर होती हलचल को और बड़ा दिया।
आवाज: क्या बात है मम्मी आज कल खूब लेट उठ रही हूं। ऐसे कौन सी मेहनत कर रही हो रात को आज कल।
सुधा के पैर ऐसी बात सुनकर वही जम गए उसके चेहरे की हवाइयां उड़ गई मानो जैसे किसी ने उसकी चोरी पकड़ ली हूं। वो अपने आप को संभालती हुई कमला की तरफ देखने लगी और अपने चेहरे पे बनावटी गुस्सा लाते हुए।
सुधा : ठहर कमला की बच्ची, अभी तुझे बताती हूं। मां की टांग खींचती है।
कमला झट से भाग कर बाथरूम में घुस गई और सुधा देखती रह गई। कमला के जाने के बाद सुधा के चेहरे पे एक शर्मीली मुस्कान फैल गई। और वो धीरे से अपनी मस्तानी चाल चलते हुए रसोईघर में घुस गई।
९:३० बजे है घड़ी में, तब लल्लू उर्फ पिशाच अपने बिस्तर से उठता है और आश्चर्य में रहता है कि वो आज इतनी गहरी और देर तक नींद कैसे हो गई। उसका जवाब उसे अपने अंदर से मिला " ये सब सुधा के निश्चल प्रेम के कारण हुआ, जिसने उसके अशांत मन को भी शांत कर दिया।" उसने मन में ठान लिया कि अब जब तक उसकी मंज़िल उसे नहीं मिल जाती वो सुधा से दूरी बनाके ही रखेगा।
लल्लू अब कमरे से बाहर निकला, उसने चारों तरफ से घर की स्थिति का जायजा लेने लगा। उसे बाहर चौपाल पे माया देवी नज़र आई। वो अपने रोज़ मार्राह के कामों में व्यस्त थी। रत्ना इसी समय पर पशुओं को चारा डाल रही और सुधा ने रसोघर को संभाल रखा था। उधर वही कमला जो अभी नहाके आई थी खुद खुद को केवल एक ब्रा और पेटी में शीशे के सामने निहार रही थी।
कमला खुद को शीशे में निहारते हुए अपनेआप से ही बाते कर रही थी।
कमला: हाय कमला कितनी सुंदर है तू, तेरे जिस्म का एक एक अंग कितनी खूबसूरती से तराशा हुआ है। तेरी ये नशीली आँखें, तेरे रस से भरे हुए होठ, तेरी सुराहीदार गर्दन, तेरा चौड़ा और उठा हुआ सीना जिसे किसी सहयता की जरूरत नहीं है, तेरी कटाव सी कमर जैसे इसी के बल पे नदी मुड़ती हो, तेरी साँचे में ढली हुई जांघे, तेरी उभरी हुई गांड और अंत में तेरी मक्खन सी चूत। कौन नसीबवाला होगा जो तेरे जिस्म का पहला भोग लगायेगा। कही वो लल्लू ही तो नहीं, पर वो तो मेरा भाई है, लेकिन है भी तो पूरा मुस्टंडा मर्द कैसे भरी दोपहरी में उसने मेरा पानी निकल दिया था और वो भी छत पर। (कमला शर्माने लगती है) और वैसे भी आज उसने मुझे तैयार रहने के लिए बोला है। कैसी ब्रा पेटी लाया है मेरे लिए जो छुपाती कम हैं और दिखाती ज्यादा है। (ये सब बड़बड़ाते हुए कमला की आँखें लाल हो जाती है और उसका जिस्म थरथराने लगता है) आऊच.............
कमला एक दम से चिंहुक उठती है। उसे अपने पेट पे किसी के हाथ महसूस करती है। उसे अच्छी तरह से याद था कि उसने अपने कमरे का दरवाजे बंद किया था तो फिर ये कौन हो सकता है। वो इंसान लगातार कमला के पेट को सहला रहा था। कमला जैसे ही चिल्लाने को होती है तभी उसे शीशे में एक अक्स दिखाई देता है और वो सब कुछ भूल जाती है। उसके जहन में सिर्फ एक ही नाम आता है।
कमला: लल्लू (और कमला की आँखें बंद हो जाती है)
लल्लू बिल्कुल अब कमला के करीब था और वो बिल्कुल कमला से सट जाता है । लल्लू का हमेशा रहने वाला उभार कमला की गांड से सट जाता है।
कमला इस मिलन से अपनी आँखें कस के बंद कर लेती है, और उसके मुँह से एक मादक सी सिसकारी निकलती है ।
कमला: आ आह आ
लल्लू कमला की सुराहीदार गर्दन पे अपने तपते हुए होठ रख देता है और उसकी गर्दन का रसपान करने लगता है। कमला बिन पानी की मछली की तरह तड़पने लगती है और अपने जिस्म का पूरा भार लल्लू के जिस्म पे डाल देती है। कमला को समर्पण मुद्रा में देख लल्लू उर्फ पिशाच के चेहरे पे एक कातिलाना मुस्कान फैल जाती जो कमला देख नहीं पाती क्योंकि उसके जिस्म पे लल्लू तीन तरफ से वार कर रहा था पहला उसके पेट को सहला रहा था, दूसरा अपने खूंटे को कमला की मखमली गांड में रगड़ रहा था, और तीसरा कमला की खुदसूरत गर्दन का रसपान कर रहा था। लल्लू उर्फ पिशाच कमला के कान के पास जाता हैं।
लल्लू: क्यों मुझे ही याद कर रही थी न मेरी जान।
जान शब्द सुनते ही कमला की आँखें खुल जाती है और वो पहली बार आइने के अक्स में से लल्लू की आंखों में झांकने लगती है। उसे अब भाई नहीं बल्कि जन्म जन्मान्तर का बिछड़ा हुआ प्रेमी नज़र आ रहा था। लल्लू तुरंत ही कमला को पलटाकर उसकी आंखों में झांकने लगता है। कमला को अजीब सा सम्मोहन महसूस होने लगा था लल्लू की आंखों में, एक वहशी कशिश। कमला लल्लू की आंखों में ही खोई हुई थी, उसे पता भी नहीं लगा कि कब लल्लू और उसके होठ आपस में गूथ चुके है। कमला लल्लू की आंखों के सम्मोहन में इतना खोई हुई थी कि उसका जिस्म अब उसके वश में नहीं था। कमला खुद लल्लू का साथ देने लगी और लल्लू के चूमने का भरपूर जवाब देने लगी।
कमला उस वहशी कशिश को और नहीं झेल पाई और उसने अपनी आँखें बंद कर ली लेकिन होठ से लल्लू को जवाब देती रही। रत्ना ने कई बार कमला के होठ चूसे थे पर लल्लू जितनी गहराई से चूस रहा था शायद रत्ना कभी जीवन भर में भी छू न सके। लल्लू और गहराई नापना चाहता था कि तभी नीचे से आती हुई आवाज ने दोनों की प्रतियोगिता में खलल डाल दिया। आवाज सुधा की थी।
सुधा: कमला ओ कमला, दिन भर कमरे में ही रहने का इरादा है क्या? नाश्ता बन गया है, नीचे आजा और लल्लू ( माया देवी की तरफ देखती है और अपनी गलती का एहसास होता है।)मेरा मतलब हैं ठाकुर साहब को भी उठा दे।
माया देवी ये देख के एक दम से खुश हो जाती है।
उधर कमरे में लल्लू और कमला अलग हो चुके थे पर अभी भी दोनों एक दूसरे की आंखों में डूबे हुए थे। लल्लू बिना आंखों के संपर्क तोड़े पीछे चलने लगता है और दरवाजे के पास पहुंच जाता है। सिटकनी की तरफ हाथ बढ़ाते हुए वो कमला को आंख मार देता है। कमला तो जैसे नींद से जागी हो और अपनी आँखें शर्म से बंद कर लेती है।
लल्लू: आज तेरे मेरे मिलन की रात है मेरी जान। आज के बाद तुझे कभी तड़पना नहीं पड़ेगा।
इतना बोलकर सिटकनी उतार कर कमरे से बाहर निकल जाता है। लल्लू के कमरे से बाहर जाते ही कमला दरवाजे की तरफ दौड़ती है सिटकनी चढ़ा कर दरवाजे की टेक लेकर अपनी साँसे दुरुस्त करने की कोशिश करती है। उसके चेहरे पर ग्लानि का कोई भाव नहीं था, थी तो केवल एक प्यासी मुस्कुराहट जो आज रात तृप्त होने वाली थी। तभी सुधा ने दूबारा आवाज लगाई कमला को , तो उसे सुध आयी की अभी उसे नीचे भी जाना है।
सुधा ने जैसे ही दुबारा आवाज लगाई तो उसे जीने पे से किसी के उतरने की आहट हुई। आंगन में खड़ी तीनों औरतों की निगाह जीने पर ही टिक गई। तभी लल्लू तीनों की आंखों के सामने प्रकट हुआ केवल एक शॉर्ट्स पहने। उसकी चौड़ी छाती और बलिष्ठ भुजाएं देख कर माया देवी, सुधा और रत्ना तीनों की एक साथ आह निकल गई। तीनों एक टक लल्लू को निहारने लगी। लल्लू की आवाज ने तीनों को नींद से जगा दिया।
लल्लू: मैं तो कब का उठ गया हूं माई, मै तो बस थोड़ी सी कसरत कर रहा था। ताई मां सुनो
माया देवी: जी ठाकुर साहब
लल्लू: वो मुझे आपसे एक काम है। जरा कमरे में चलो ने भीतर।
माया देवी: आप चलिये ठाकुर साहब, मैं अभी आती हूं।
लल्लू माया देवी के कमरे की तरफ चलने लगता है और माया देवी सुधा और रत्ना से कुछ बात करके अपने कमरे की तरफ चल देती है। माया देवी की गांड की थिरकन कुछ ज्यादा ही मादक थी, जैसे वो उन दोनों को चिड़ा रही हो कि अभी के लिए लल्लू सिर्फ मेरा है। सुधा के मन में आज पहली बार माया देवी से ईर्षा हुई। लेकिन वो अभी कर भी क्या सकती थी।
माया देवी जैसे ही दरवाजा बंद करके पलटी पिशाच ने उन्हें दबोच लिया और माया देवी के होठ चूसने लगा। माया देवी भी कहा पीछे रहती वो भी अपने मालिक का भरपूर साथ देने लगी।
पिशाच ब्लाउज के ऊपर से ही माया देवी की विशाल चुचियो को दबाने लगा। माया देवी की सिसकी उनके हलक में घुट के रह गई। कुछ ही मिनटों में माया देवी एक चुदासी कुतिया की तरह छटपटाने लगी। लल्लू ने चुंबन का अंत किया और माया देवी की गांड पे एक जोरदार चाटा जड़ दिया।
माया देवी चुदाई की खुमारी से बाहर निकली और लल्लू की तरफ बेबसी से देखने लगी।
पिशाच: बस कुछ दिन और मेरी रांड, फिर तुम सब को मैं इस घर में नंगा रखूंगा, फिर जिसको चाह उसको चोदूगां।
माया देवी: हाय मालिक वो दिन कब आएगा।
पिशाच: बहुत जल्द आयेगा, अभी के लिए अपना प्रसाद ग्रहण कर। और सुन मेरी रांड एक सिगरेट भी जला।
जैसे ही माया देवी सिगरेट जलाने की लिए पलटी पिशाच ने फिर से उनकी गांड पे एक जोरदार चाटा रसीद कर दिया। माया देवी कसमसा के रह गई। वो अपनी गांड सहलाने लगी। माया देवी ने सिगरेट जलाके पिशाच को दी और वो उसके सामने घुटने के बल बैठ गई। उसने पिशाच का पहना हुआ शॉर्ट्स नीचे किया और उनकी आंखों की चमक जैसे लौट आई। सामने था पिशाच का विकराल लंड जिसे देख कर माया देवी की जीभ लपलपाने लगी। पर पिशाच का आदेश पर माया देवी केवल अपना प्रसाद ग्रहण कर सकती थी। माया देवी ने तुरंत उस विकराल लंड को अपने हलक में उतार लिया। मूत्र की तेज धार सीधे माया देवी का गला तर करने लगी। जैसे जैसे मूत्र की धार माया देवी के हलक में उतरने लगी।
पिशाच के जिस्म में अत्यधिक ऊर्जा का संचार होने लगा। पिशाच के चेहरे की मुस्कुराहट बहुत ही डरावनी थी।
सब नाश्ता कर चुके थे और दोपहर के कामों में व्यस्त थे कि तभी लल्लू एक बैग उठाए हुए घर से बाहर जाने लगा। सुधा ने रसोईघर से ही देखा और वो सोच में पड़ गई आखिर इस समय झोला उठाए हुए कहा जा रहा हैं "मेरा लल्लू"।