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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

Kala Nag

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parkas

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👉एक सौ चालीसवां अपडेट
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आज की ताजा खबर,
जैसा कि आप को ज्ञात है रुप फाउंडेशन की भ्रष्टाचार में अपनी भुमिका सही ढंग से ना निभा पाने के कारण अदालत ने राजगड़ के पूर्व तत्कालीन पुर्व सरपंच विश्व प्रताप महापात्र को सात वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी और अदालत के द्वारा ने यह आदेश भी जारी किया गया था कि रुप फाउंडेशन की तहकीकात के लिए बनाई गई एसआईटी को सरकार बहाल रखे और तहकीकात को जारी रखे और उसकी रिपोर्ट तैयार कर अदालत में जमा करे, पर विश्व प्रताप के कानूनी सजा पुरी होने के बाद उन्होंने आरटीआई के द्वारा अब तक हुई तहकीकात की प्रगति के बारे में जानने की कोशिश की, पर आपको जान कर हैरानी होगी अदालत के आदेश के बावजूद एसआईटी की जाँच एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी थी l इस दौरान विश्व प्रताप महापात्र सरकार द्वारा स्वीकृत कॉलेज में डिस्टेंस एजूकेशन के जरिए अपनी स्नातक की डिग्री हासिल की और डिस्टेंस एजूकेशन के जरिए अपनी वकालत की डिग्री भी हासिल की l उन्हें बार काउंसिल की लाइसेंस मिलने के बाद अदालत में रुप फाउंडेशन की जाँच नए सिरे से शुरु करने और असली अपराधियों को ढूँढ कर उन पर कानूनी कार्रवाई करने के लिए पीआईएल दाखिल किया था l जिसे अदालत ने सहसा स्वीकर कर गृहमंत्रालय एवं मुख्यमंत्री कार्यालय को समन जारी किए l जिसके पश्चात मुख्यमंत्री कार्यालय तुरंत हरकत में आ गई l कल देर रात को पुराने एसआईटी को ख़तम कर नया एसआईटी का गठन किया गया है एसिपी सुभाष सतपती जी के नेतृत्व में l यह खबर बाहर आने के बाद हमारी सम्वाददाता पूर्व अधिकारी श्रीधर परीड़ा से संपर्क करने की कोशिश की, पर उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है यहाँ तक वे अपने घर में भी नहीं हैं, उनका घर कल से बंद है l आसपास के लोग उनके फरार होने की बात कर रहे हैं l इसके साथ मुझे आपकी सुप्रिया रथ को इजाजत दीजिए
फिर रहिए ना बेख़बर
यह था आज की ताजा खबर


ESS की ऑफिस
विक्रम अपने चेंबर पर बैठा यह न्यूज देख रहा था l न्यूज के समाप्त होते ही विक्रम टीवी की रिमोट हाथ में लेता है और टीवी को बंद कर देता है l कुछ देर के लिए अपनी आँखे बंद कर गहरी सोच में खो जाता है l फिर अचानक वह एक झटके के साथ अपनी आँखे खोलता है जैसे उसे कुछ याद आया हो l झट से फोन निकाल कर किसी को फोन मिलाता है l उधर से कॉल लिफ्ट होते ही

विक्रम - हैलो...
X - बोलिए सर...
विक्रम - वीर कैसा है...
X - सर सलामत हैं... और खुश भी हैं...
विक्रम - और... मेरे खास... वह लोग कैसे हैं...
X - अभी तक तो ठीक ही हैं... पर एक बात है सर... लगता है उन पर हमारे सिवा दो तीन ग्रुप और भी नजर रखे हुए हैं...
विक्रम - ह्म्म्म्म... तुम अपना काम करो... और मुझे पल पल की जानकारी दो...
X - जी सर... रूटीन से कुछ भी अलग होता है... मैं आपको खबर कर दूंगा...
विक्रम - हाँ... ठीक है

विक्रम फोन काट देता है l तभी उसकी इंटरकॉम पर सेक्रेटरी खबर करती है कि उससे मिलने पार्टी ऑफिस से कोई आया है l विक्रम उसे भेजने के लिए कहता है l कुछ देर बाद कमरे में पार्टी के युवा मोर्चा का सेक्रेटरी आता है l

विक्रम - आइए... सेक्रेटरी महोदय आइए... बैठिए...
सेक्रेटरी - जी युवराज... धन्यबाद... (कह कर सेक्रेटरी बैठ जाता है)
विक्रम - कहिये... कैसे आना हुआ...
सेक्रेटरी - युवराज जी... देखिए मेरी बातों को अन्यथा ना लीजिएगा... पार्टी के अध्यक्ष के कहने पर मैं आपसे मिलने आया हूँ...
विक्रम - सारे तक्कलुफ किनारे कीजिए... सीधे मुद्दे पर आइए...
सेक्रेटरी - अभी आपने युवामोर्चा का पद छोड़ कर अपने भाई राजकुमार वीर जी को सामने लाये... (कह कर चुप हो जाता है)
विक्रम - आगे बोलिए...
सेक्रेटरी - अब राजकुमार ने अपना इस्तीफा भेज दिया है... हम उन्हें मनाने की सोच रहे थे कि... तभी छोटे राजा जी की हुकुम आ गया... के पार्टी के तरफ़ से राजकुमार जी का किसी भी प्रकार से कोई संबंध ना रखा जाए... अब हम में से किसी की भी हिम्मत नहीं बन रही है... उनके हुकुम के खिलाफ जाने की... अब पार्टी की युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद रिक्त है... अब आप कोई मार्ग दर्शन कीजिए... क्यूँ के.. सभी एक मत से आपको चाह रहे हैं...
विक्रम - देखिए सेक्रेटरी जी... मैंने.. अपनी जगह वीर का नाम सुझाया था... जिसे पार्टी ने सहसा स्वीकार भी किया था... अब जब वीर नहीं है... तो बेहतर होगा... पार्टी कि अध्यक्ष ही कोई निर्णय लें... क्यूँकी... मैं अब राजनीति से फ़िलहाल दुर ही रहना चाहता हूँ... जब समय आएगा... तब मैं पार्टी से जुड़ुंगा...
सेक्रेटरी - तो अब...
विक्रम - देखिए... पार्टी में कोई और चेहरा भी हो सकता है... आप उन्हें सामने लाइये...
सेक्रेटरी - बात तो आपकी सही है... और बड़े विमर्ष के बाद एक चेहरा मिला है... पर उनके लिए वोट... मेरा मतलब है... (थोड़ी झिझक के साथ) आप अगर लोगों के पास जाकर उनके लिए वोट माँगे तो... (चुप हो जाता है)

विक्रम उसकी बातेँ सुन कर मुस्कराते हुए अपनी जगह से उठता है l विक्रम को उठते देख सेक्रेटरी भी उठ खड़ा होता है l विक्रम उसके पास आकर खड़े हो कर उस सेक्रेटरी के कंधे पर हाथ रखकर

विक्रम - (कड़क लहजे में) आइंदा कभी मिलो तो इतना याद रखो... मांगना हमारी फितरत नहीं है... छीनना या दे देना हमारी आदत है... समझे...

विक्रम ने जिस अंदाज से बात करी थी पार्टी सेक्रेटरी की फटके हाथ में आ गई थी l उसे ऐसा लग रहा था जैसे विक्रम के हर एक शब्द उसके हड्डियों में कड़ कड़ की कंपन पैदा कर रही थी l

विक्रम - वैसे... कौन है वह बंदा... जिसे इसबार पार्टी ने अपना युवा चेहरा बनाया है...
सेक्रेटरी - ज.. ज.. जी उसे साथ में लाया हूँ... ब ब ब बाहर खड़ा है...
विक्रम - कांप क्यूँ रहे हो... तो सब पहले से ही तय कर रखे हो... और हमारे मुहँ पर मारने आए हो... खैर कोई नहीं... बुलाओ उसको... हमसे थोड़ा परिचय करवाओ...
सेक्रेटरी - जीजीजी... अभी बुलाता हूँ....

सेक्रेटरी अपनी जगह से उठता है और बाहर जाकर एक बंदे को अंदर लाता है l उस बंदे को देखते ही विक्रम की आँखे बड़ी हो जाती हैं l गेरुए कपड़े में मृत्युंजय खड़ा था l हैरानी के मारे विक्रम का मुहँ खुला रह जाता है l मृत्युंजय अंदर आते ही विक्रम को हाथ जोड़ कर नमस्ते करता है l

मृत्युंजय - नमस्ते युवराज जी...
विक्रम - तुम...
मृत्युंजय - जी... मैं... मैं वापस आ गया...
विक्रम - क्या तुम्हें... पुष्पा का कातिल मिला...
मृत्युंजय - नहीं... नहीं मिला... इसीलिए... मैं एक दिन आत्महत्या करने जा रहा था... के एक साधु बाबा ने मुझे रोका... और अपने साथ उनके आश्रम में ले गए... वहीं पर उन्होंने मुझे जीवन के दर्शन समझाया... जब मुझे अपने कर्मों का बोध हुआ... तो मैं वापस आ गया... लोक सेवा के लिए... लोक कल्याण के लिए... मैं आप ही की पार्टी का एक साधारण कार्यकर्ता बन पार्टी को सेवा देता रहा... राजकुमार जी के प्रकरण के बाद... मुझे पार्टी के महा महीम ने इस पद को संभालने की जिम्मेदारी दी है... और इसबार आने वाले चुनाव में मुझे भाग लेने के लिए कहा है...

विक्रम का चेहरा सख्त होता जा रहा था l मुट्ठीयाँ भींचने लगी थी l पर उसके उलट मृत्युंजय बहुत ही शांत खड़ा था l मृत्युंजय अपने चेहरे पर एक मुस्कान लाकर फिर से कहना चालु करता है l

मृत्युंजय - युवराज जी... आप मेरे अन्नदाता रहे हैं... मेरे प्रथम मालिक... दीवंगत महांती जी मेरे गुरु रहे हैं... इसलिए चुनाव में हिस्सा लेने से पहले... मेरे इस नव जीवन प्रारम्भ करने से पहले... मुझे आपकी आशीर्वाद चाहिए... क्या मुझे मिलेगा...

इतना कह कर मृत्युंजय विक्रम के आगे घुटने पर बैठ जाता है l विक्रम बहुत असहज हो जाता है l विक्रम अपने भावनाओं पर काबु पाते हुए अपना सिर हिलाता है और

विक्रम - ठीक है... मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ है... अब जाओ तुम दोनों यहाँ से...

मृत्युंजय अपनी जगह से उठता है फिर पार्टी सेक्रेटरी के साथ बाहर चला जाता है l

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रुप कॉलेज में दाखिल होती है l गाड़ी को पार्किंग में लगा कर सीधे कैंटीन में जाति है पर उसे वहाँ पर उसके दोस्त नहीं दिखते हैं l वह छोटु से अपनी दोस्तों के बारे में पूछती है पर छोटु उसे कुछ कह नहीं पाता, तो रुप कैंटीन से बाहर निकल कर बॉटनीकल गार्डन की ओर जाती है l कुछ देर तक यहाँ वहाँ नजर दौड़ाने के बाद एक कोने में उसे सारे दोस्त नजर आ जाते हैं l वह उनके तरफ जाती है l जब उसके दोस्तों की नजर उसके ऊपर पड़ती है तो रुप हाथ उठा कर हाय का इशारा करती है l बदले में उसके सारे दोस्त भी उसे हाथ हिला कर हाय का इशारा करते हैं, पर रुप को महसूस होती है कि उन लोगों के चेहरे पर कोई हडबड़ी वाला एक्सप्रेसन दिखता है l उनके चेहरे पर आए हाव भाव देख कर रुप थोड़ी असहज होती है l उनके पास पहुँच कर

रुप - हैलो एवरी वन...
सब - हैलो...
रुप - क्या बात है... कोई सीरियस डिस्कशन चल रही थी क्या...
बनानी - अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं...
रुप - देखो झूठ मत बोलो... तुम्हारा जुबान कुछ कह रहा है... और तुम्हारा चेहरा कुछ कह रहा है...
इतिश्री - नहीं सच में... अब देखो... कुछ दिनों बाद शेषन ख़तम हो जायेंगी और होली के साथ छुट्टियाँ भी शुरु हो जाएंगी... तो हम लोग उसीकी डिस्कशन कर रहे थे...
रुप - वाव... वैसे कौन कहाँ जा रहा है इस बार...
इतिश्री - मैं तो अपने गाँव जा रही हूँ...
भाश्वती - मेरा तो घर ही भुवनेश्वर में है...
बनानी - हाँ... पर इस बार हम शायद बाहर जा रहे हैं...
तब्बसुम - मेरा तो बेड लक ही ख़राब है... ना रिवार्ड मिली... ना नाम...

रुप देखती है दीप्ति चुप बैठी है और अपने भीतर कुछ सोच रही है l रुप दीप्ति को बुलाती है

रुप - दीप्ति... ऐ..
दीप्ति - (चौंक कर) हाँ... कुछ कहा तुमने...
रुप - क्या सोच रही थी तुम...
दीप्ति - यही के... फर्स्ट सेमिस्टर एक्जाम के लिए... सर के पास जाकर.. हम क्यूँ ना कुछ टिप्स लें...

रुप की भवों पर सिलवटें पड़ जाती हैं l वह कनखियों से देखती है सब के सब दीप्ति को इशारे से कुछ समझाने की कोशिश कर रही हैं l

रुप - ओके... तो मेरे आने से पहले... कुछ ऐसा डिस्कशन हो रहा था... जो मुझे नहीं जानना चाहिए... है ना... (सबका चेहरा झुक जाता है) ओके देन... अब बेहतर होगा... तुम लोग मुझे साफ साफ सब बता दो...

सभी एक दूसरे को देखने लगते हैं l कुछ देर बाद दीप्ति अपने आप को तैयार करते हुए कहती है

दीप्ति - ठीक है... बात दरअसल यह है कि... हम तेरे और विश्व के बारे में डिस्कश कर रहे थे...
बनानी - दीप्ति... (बनानी दीप्ति को टोकती है)
रुप - अच्छा... मेरे और विश्व के बारे में... ऐसी कौनसी बात डिस्कशन कर रहे थे... जो मुझे देख कर चुप हो गए...
दीप्ति - देख... यह देख... (कह कर दीप्ति रुप को अपना मोबाइल पर न्यूज चला कर देती है, रुप न्यूज को पुरा सुनती है और दीप्ति को मोबाइल वापस लौटा कर पूछती है)
रुप - हाँ तो इसमें ऐसा क्या है... जो मैं और विश्व डिस्कशन में आ गए...
दीप्ति - क्या... इसमें ऐसा कुछ नहीं है... नंदिनी... तुम्हारा विश्व कानूनन सजायाफ्ता है...
रुप - हाँ.. तो क्या हुआ...

रुप की इस सवाल पर सब थोड़े असमंजस सा एक दुसरे को देखने लगते हैं l रुप उनकी नजरों की पीछा कर सबकी चेहरे को गौर से देखती है फिर कहना शुरु करती है l

रुप - ओह के... तो तुम लोगों की नज़र में पहले मेरी खानदान वाले सही नहीं थे... फिर धीरे धीरे मेरा भाई वीर कुछ ही दिन हुए हीरो बना... अब तुम लोगों की नज़र में विश्व एक क्रिमिनल है... जिससे मैं प्यार करती हूँ... है ना... (सब मौन रहते हैं, भाष्वती से) भाष्वती तु भी... (इस सवाल पर भाष्वती अपनी नजरें झुका लेती है) तु तो उसे अपना भाई मानती है ना... भुल गई... तुझे प्रताप ने कैसे बचाया था... खैर... और तु... तब्बसुम... अपने वालिद से पुछ लेना कभी फुर्सत में... कैसे आज तु कॉलेज आ पा रही है... (तब्बसुम इधर उधर देखने लगती है) वैल वैल.. तुम लोगों की नजर और कान शायद वही देखा... जो तुम्हारे मतलब कि थी... कोई नहीं... अगर यही वज़ह है... तो मुझे तुम लोगों से कोई शिकायत नहीं है... हाँ कास के... तुम सभी प्रताप के बारे में सब कुछ जान कर अपना ओपिनियन रखते तो अच्छा होता...
वह मेरा अनाम है... उसका नाम विश्व प्रताप महापात्र है... किसी और के गुनाह की सजा उसने अपने सिर लिया था... क्यूँकी जो भी हुआ था... उस अपराध के पीछे कहीं ना कहीं खुद को दोषी समझता था... जरा सोचो... कभी ऐसा हुआ है... की कोई वकील किसी मुजरिम की पैरवी करते करते उसे अपना बेटा समझने लगे... और अपनी जायदाद उसके नाम कर दे... एडवोकेट जयंत राउत... जो प्रताप का केस लड़ रहे थे... उन्होंने अपनी जायज कमाई प्रताप के नाम कर दी...

कुछ देर के लिए सन्नाटा छा जाती है l रुप एक गहरी साँस लेती है फिर कहना चालु रखती है l

रुप - एक वकील जो उसके खिलाफ लड़ी... वह आज उसे अपना बेटा मानती हैं... जो आज इस स्टेट के हर एक कामकाजी महिलाओं की आवाज बनी हुई हैं... प्रतिभा जी... याद है... या भूल गए...

फिर वही सन्नाटा थी l इस बार सभी ल़डकियां संकोच से सिर झुकाने लगे l

रुप - हम लोग दोस्त हैं... मैं समझती थी... के हम सब एक दुसरे को समझते हैं... पर आज तुम सब ने मुझे गलत साबित कर दिया... मेरे अनाम के लिए... मुझे किसी की सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है... मैं तुम लोगों से पूछती हूँ... कितने ऐसे लोग हैं... जो जैल में रह कर अपनी पढ़ाई पूरा कर पाते हैं... या करते हैं... अनाम ने ना सिर्फ वकालत की डिग्री हासिल की... बल्कि बार काउंसिल की लाइसेंस भी हासिल करी... अब बताओ... अगर वह क्रिमिनल होता... तो क्या उसे लाइसेंस मिलता... खैर... अब इस वक़्त तुम लोगों से बातेँ करना भी बेकार है... आई तो थी तुम लोगों के साथ कुछ गप्पे लड़ाने... पर... चलती हूँ... (रुप पलट कर जाने लगती है)
भाष्वती - (रुप को रोक कर) सॉरी यार... हमसे गलती हो गई... अब ऐसे जुते भिगो भिगो के मार मत...
रुप - नहीं... आज तुम लोगों ने मेरा दिल दुखाया है... इसलिए मैं अब जा रही हूँ... जब तक मैं अपने आप शांत ना हो जाऊँ... तुम लोग मुझे कॉन्टैक्ट मत करना...
भाष्वती - अरे सुन तो...
रुप - प्लीज...

इतना कह कर रुप गार्डन से बाहर आती है l तेजी से चलते हुए अपनी गाड़ी की डोर खोल कर बैठ जाती है l रुप को महसुस होती है कि उसकी आँखों में नमी छा रही थी l अपनी हाथों से आँखों से आँसू पोछते हुए गाड़ी स्टार्ट करती है और गाड़ी कॉलेज की सीमा से बाहर ले कर रास्ते पर दौड़ाने लगती है l कुछ देर बाद गाड़ी को एक जगह रोकती है और स्टीयरिंग पर अपना सिर रख कर बैठी रहती है l कुछ गहरी साँसे लेने के बाद गाड़ी से उतर कर देखती है कि वह निको पार्क के पास गाड़ी को रोकी है l निको पार्क को देखते ही उसे विश्व को याद आती है l अपना मोबाइल निकाल कर विश्व को कॉल लगाने ही वाली होती है कि एक आदमी आता है और रुप की मोबाइल छिन कर भागने लगता है l रुप पहले हैरान हो जाती है और जब संभलती है तब चोर चोर चिल्लाती है l आसपास के कुछ लोग और कुछ लड़के उस चोर के पीछे लग जाते हैं और थोड़ी देर बाद उसे घेर लेते हैं, वह चोर अपने को घिरा हुआ देख कर रुप के पास भागते हुए आता है और रुप के पैरों में गिर जाता है और रहम की भीख माँगते हुए रुप को मोबाइल लौटा देता है l कुछ लोग उसे पकड़ कर मारने को होते हैं, रुप उन लोगों को रोकती है और उस आदमी को छुड़ा कर चले जाने को कहती है l वह आदमी रुप को बहुत दुआयें देते हुए वहाँ से चला जाता है l कुछ लड़के रुप को इम्प्रेस करने के लिए अपनी अपनी बड़ी बड़ी हांकने लगते हैं l सिचुएशन को ऐसे देख कर रुप अपनी गाड़ी में वापस बैठ कर वहाँ से निकलने लगती है l थोड़ी दुर जाने के बाद रुप ब्लू टूथ से गाड़ी से कनेक्ट कर विश्व को कॉल लगाती है l

विश्व - हैलो जी... हुकुम जी... कहिए क्या करना है...
रुप - तुम जानते हो... अभी मेरे साथ क्या हुआ है...
विश्व - नहीं जी... बिल्कुल नहीं...
रुप - (खीज कर) आह... देखो... मैं मज़ाक के मुड़ में बिल्कुल नहीं हूँ...
विश्व - अरे बाप रे... ठीक है कहिए... क्या हुआ... आपके साथ...
रुप - क्यूँ तुम तो कह रहे थे... मेरे पास हवा भी अगर रुख बदलेगा... तो तुम्हें खबर हो जाएगी...
विश्व - हाँ कहा तो था... क्यूँ.. कोई शक़...
रुप - हाँ हो रहा है शक़...
विश्व - मत कीजिए... प्लीज...
रुप - क्यूँ न करूँ... बड़े बड़े डींगे जो हांक रहे थे...
विश्व - अरे अरे.. इतना गुस्सा... क्या हुआ... वह जो चोर... आपसे मोबाइल छिन कर भाग रहा था... पकड़ा गया... और आपका मोबाइल आपको मिल गया ना...

रुप अपनी गाड़ी में ब्रेक लगाती है l उसकी आँखे हैरानी से बड़े हो जाते हैं, वह गाड़ी रोक कर अपनी चारों तरफ देखती है l उसे कोई नहीं दिखता l लड़खड़ाती हुई आवाज में विश्व से पूछती है

रुप - तततत.. तुम हे कैसे मालुम हुआ...
विश्व - कहा था ना... हवा तक आपके पास करवट बदलेगा... तब भी मुझे भान हो जाएगा...
रुप - (एक टूटी हुई आवाज़ में) ओह...
विश्व - पर आज आपको हुआ क्या है... इस बात के लिए तो फोन नहीं किया आपने...
रुप - हाँ वैसे... बात कुछ और थी...
विश्व - क्या उस बात के लिए मुड़ उखड़ा हुआ था...
रुप - (थकी हुई आवाज में) हाँ...
विश्व - अरे... ऐसा क्या हो गया.. जो मेरी दिल की शहजादी को मायूस कर दिया...

फिर रुप कॉलेज में दोस्तों के साथ हुई बातचीत को ज्यादा कुछ नहीं बताती बस अपनी नाराजगी को संक्षिप्त कर बताती है l विश्व सब सुनने के बाद एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहता है
- ह्म्म्म्म...
रुप - जानते ही अनाम... मैं बनानी से दोस्ती के लिये क्या कुछ नहीं किया... रॉकी की प्लान में दीप्ति शामिल थी... यह जानने के बावजूद.. मैंने उसे माफ भी किया... और भाष्वती जरा देखो उसे... भाई कहती थी तुम्हें... तुम्हारे वज़ह से... अपनी कॉलोनी से कॉलेज... बिना डरे आ रही है... उसने भी... और आखिर में तब्बसुम... वह भी... जो आज तुम्हारे वज़ह से कॉलेज आ पा रही है... (विश्व कोई जवाब नहीं देता) क्या हुआ... ओ समझी... देखा तुम्हें भी बुरा लगा ना...
विश्व - नहीं... मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा...
रुप - व्हाट... तुम्हें बुरा.. नहीं लगा..
विश्व - नहीं...
रुप - क्यूँ...
विश्व - क्यूंकि अभी आप जो महसुस कर रही हैं... जो कुछ भी देख रही हैं... उन हालातों से मैं गुजर चुका हूँ...
रुप - ओ... फिर भी... वह लोग मेरे दोस्त हैं... कोई दुसरा होता तो... मुझे इतना बुरा ना लगता...
विश्व - वह लोग आम हैं... आप और मैं खास हैं... और जो लोग आम होते हैं... वे लोग खुद को... समाज के हर चीज़ से दुर रखते हैं... वे लोग चाहते हैं... समाज में बदलाव हो... पर बदलाव की दौर से वे लोग ना गुज़रे... वे चाहते हैं... कोई क्रांति हो... कोई क्रांतिकारी आए... पर उनके घर में नहीं... वे सोचते हैं... वोट दे दिया... सर्कार चुन लिया बस बात काम खत्म... सरकार अपना काम करे... पुलिस अपना काम करे और न्यायलय अपना काम... पर किसी भी पचड़े में खुद को देखना नहीं चाहते... वे लोग सिर्फ अपने और अपने परिवार के के सिवा... किसी और की सोचना भी नहीं चाहते... यह बहुत आम फितरत है... पर जब उन पर कुछ गुज़रती है... तब वे लोग अपनी चारों तरफ देखते हैं... उम्मीद करने लगते हैं... शिकायत करने लगते हैं... क्योंकि यह लोग... आम लोग होते हैं...
रुप - तो मुझे... क्या करना चाहिए...
विश्व - माफ कर दीजिए...
रुप - क्यूँ...
विश्व - क्यूँ की वे लोग आपके दोस्त हैं... एक दिन वे आपकी भावनाओं को समझेंगे और माफी मांगेंगे... (इस बार रुप कुछ नहीं कहती) क्या हुआ... आप खामोश हो गईं...
रुप - तो तुम कहना चाहते हो... मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए...
विश्व - जी बिल्कुल... क्यूँकी आप कोई आम नहीं हो... बहुत ही खास हो... (रुप फिर से खामोश हो जाती है) अब क्या हुआ..
रुप - मेरा मुड़ खराब है... ऐसे ठीक नहीं होगा...
विश्व - अच्छा तो फिर कैसे ठीक होगा...
रुप - तुम्हें मालुम है... क्यूँ भूल गए... मैंने कहा था... मैं रूठुंगी..
विश्व - और मैं मनाऊंगा...
रुप - तो मनाओ...
विश्व - पर आप तो मुझसे रूठी नहीं है...
रुप - तो इसका मतलब यह हुआ... तुम मुझे अभी नहीं मनाओगे...
विश्व - अरे मेरी ऐसी हस्ती कहाँ... बिसात कहाँ... आप हुकुम करें और हम तमिल ना करें... (रुप की चेहरे पर मुस्कान आ जाती है) बस इतने में ही आपकी चेहरे पर मुस्कान आ गई... (रुप फिर चौंकती है)
रुप - तुम्हें कैसे पता....
विश्व - आपकी अदाओं से मुझे एहसास हो जाता है...
रुप - पर तुमने कोई शायरी नहीं कही मेरे लिए...
विश्व - अभी किए देते हैं...

चेहरे पे मेरे जुल्फों को फैलाओ किसी दिन,

रोज गरजते हो बरस जाओ किसी दिन,

खुशबु की तरह गुजरो मेरी दिल की गली से,

फूलों की तरह मुझपे बिखर जाओ किसी दिन !
रुप - कमाल है... फर्माइश हमने किया है... ख्वाहिश आप फर्मा रहे हैं...
विश्व - वाह वाह क्या बात है... अजी हम हमेशा आपके फर्माबरदार रहे हैं... पर आपकी फर्माइश के लिए हमने सोच बहुत कुछ रखा है... बस आपकी आने का इंतजार है... (रुप की गाल शर्म से लाल हो जाते हैं)
रुप - तुम चाहते हो... मैं राजगड़ आऊँ...
विश्व - क्यूँ मैंने भी तो आपकी हुकुम बजाया था... आपकी घर आकर...
रुप - ह्म्म्म्म... ठीक है... तो हम ज़रूर आयेंगे...
विश्व - कब...
रुप - बता देंगे बता देंगे... अब से आप सब्र पालें...

कह कर रुप फोन काट देती है और मन ही मन मुस्कराते हुए अपना सिर स्टियरिंग पर रख देती है l तभी उसे पीछे से गाड़ियों की हार्न सुनाई देती है l रुप अपनी जीभ दांतों तले दबा कर गाड़ी स्टार्ट कर निकल जाती है

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एक कुर्सी पर विश्व फैला हुआ था, एक पैर जमीन पर और दुसरा पैर टेबल पर था l बात ख़तम होते ही मुस्कराते हुए कान से फोन निकाल कर टेबल पर रख देता है l तभी कमरे में मायूस चेहरे के साथ टीलु अंदर आता है l उसका लटका हुआ चेहरा देखकर विश्व उससे सवाल करता है

विश्व - क्या हुआ.. यह चेहरा क्यूँ लटका हुआ है...
टीलु - सात दिन हो गए...
विश्व - तो...
टीलु - जब से साले यह दो पुलिस वाले हमारे इर्द गिर्द भिनभिना रहे हैं... तब से बच्चे भी नहीं आ रहे हैं...
विश्व - पहली बात... वे छोटे रैंक के ईमानदार पुलिस वाले हैं... इसलिए उन्हें गाली मत दो...
टीलु - तुम्हें कैसे मालुम... के यह दोनों ईमानदार हैं...
विश्व - यह लोग पहले अर्दली थे... उसके बाद हेल्पर कांस्टेबल बने हैं... अभी प्रोवेशन में हैं... इसलिए सौ फीसदी ईमानदारी बरत रहे हैं...
टीलु - अच्छा... पर भाई यह बात कुछ हजम नहीं हुई... अनिकेत रोणा... हमारे लिए ईमानदार लोगों को लगाया है...
विश्व - क्यूंकि... रोणा को... बिकने वालों पर भरोसा नहीं है... हमारी सारी ख़बरें और जानकारी ईमानदारी से जो बता दे... उन्हीं को उसने ड्यूटी पर लगाया है...
टीलु - हाँ... तभी मैं सोचूँ... उनका नाम भी ईमानदारों वाला क्यूँ लग रहा है...
विश्व - नाम से भी ईमानदारी पहचानी जा सकती है... यह मैं नहीं जानता...
टीलु - हाँ भाई... एक का नाम हरिश्चंद्र बल है... और दुसरे का नाम जगन्नाथ महाकूड़ है... है ना ईमानदारी वाला नाम...

विश्व सब सुन कर अपना चेहरा घुमा लेता है l यह देख कर टीलु मुहँ बनाता है l टीलु बाहर जा कर थोड़ा झाँकता है फिर अंदर आकर विश्व से

टीलु - भाई...
विश्व - ह्म्म्म्म...
टीलु - हम सात दिनों से... एक तरह से नजर बंद हैं... कहीं जा भी नहीं पा रहे हैं...
विश्व - क्यूँ झूठ बोल रहे हो... रोज दीदी के यहाँ जा रहे हैं... गले तक ठूँस ठूँस कर आ रहे हैं...
टीलु - मैं राजगड़ अंदर की बात नहीं कर रहा हूँ...
विश्व - फ़िलहाल ऐसा कुछ सोचना भी नहीं... हमारी छोटी सी हरकत... दूसरों पर आफत बन सकती है... (बात घुमाने के लिए) वैसे... बच्चे कहाँ तक लाठी घुमाना सीखे...
टीलु - पूरा सीख लिए हैं... पर स्पीड नहीं है...
विश्व - कोई ना... अगली मुलाकात में देखना... उनकी लाठी घुमाना बहुत जबरदस्त हो चुका होगा...
टीलु - भाई... तुम बात टाल रहे हो... हमारा यश पुर जाने का टाइम नजदीक आ रहा है...
विश्व - (चेयर पर सीधा होकर बैठ जाता है) क्या मतलब...

टीलु अपनी अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाल कर विश्व को देता है l विश्व काग़ज़ को खोल कर उसमें लिखे शब्दों को पढ़ने लगता है l पढ़ते ही उसकी आँखों में एक चमक छा जाती है l फिर टीलु की ओर देखता है

टीलु - हाँ भाई... तुम तो जानते हो.. सात दिनों से मैं सुबह सुबह यशपुर में अपने दोस्तों की हालचाल जानने और दीदी की दुकान के लिए कुछ सामान लेने चला जाया करता था... पर तुम्हारे मना करने के बावजूद... मैं रोज न्यूज पेपर पढ़ कर... उस अंजान आदमी की मेसेज को डी कोड किया करता था... उसने इस बार तुमसे मिलने की इच्छा जतायी है... कैसे और कब लेटर में साफ लिखा है....
विश्व - मैं जानता था... तुम शांत बिल्कुल नहीं रह सकते थे... कुछ ना कुछ उल्टा सीधा करोगे...
टीलु - भरोसा रखो विश्वा भाई... मेरी इस हरकत के बारे में... रोणा जानता नहीं है... अब सवाल है... हम राजगड़ से निकल कर... यशपुर जाएं तो जाएं कैसे...

विश्व चेयर से उठ खड़ा होता है l कमरे में थोड़ा टहल लेने के बाद टीलु से कहता है

विश्व - यह दो सिपाही... हमारे साथ क्यूँ हैं...
टीलु - तुम्हारी हिफाज़त के लिए... और तुम्हारी हर पल की रिपोर्ट रोणा को देने के लिए...
विश्व - (कुछ देर के लिए सोच में पड़ जाता है) अच्छा क्या तुम दस बारह लोग... जुगाड़ कर सकते हो... अपने टाइप के... काम थोड़ा मुश्किल भरा हो सकता है...
टीलु - क्या... मेरा मतलब है.. कब तक...
विश्व - कल तक... परसों के लिए...
टीलु - हाँ... सीलु भाई आज रात तक... कुछ बंदों को बुला लेंगे...
विश्व - तो फिर चलो... हम रोणा तक खबर पहुँचा ही देते हैं...
टीलु - (चौंक कर) क्या... यह क्या कह रहे हो भाई... फिर तो वह अनजाना शख्स कौन है... और हमारी क्या मदत करना चाहता है... हम कभी जान नहीं पाएंगे...
विश्व - मैंने सिर्फ इतना कहा... रोणा जो जानना चाहता है... हम उस तक खबर इन्हीं कांस्टेबलों के जरिए पहुँचाएँगे...
टीलु - एक मिनट... तुम खुल कर समझाओ भाई...
विश्व - खबर कुछ ऐसे पहुँचाओ... के उन्हें लगे के उन लोगों ने कोई बड़ा तीर मार लिया हो... और पुरी खबर जानने या निकालने के लिए... रोणा हमें खुद यशपुर ले जाएगा... (टीलु की आँखे चमकने लगती है)
टीलु - समझ गया भाई... पर हमारे एक्शन के लिए... टेढ़े लोगों की जरूरत पड़ेगी... मतलब हमारी गैंग की...
विश्व - इसी लिए तो पुछा था
टीलु - ओ... फ़िकर नोट... बुला लेंगे...
विश्व - ठीक है... अब एक्शन के लिए... पहले हमारी गैंग को बुलावा भेजो... एक्शन के दिन से पहले पहुँच जाएंगे...
टीलु - ठीक है भाई... सब समझ गया... अभी जाता हूँ... उन दो कांस्टेबलों को शीशे में उतारता हूँ...

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रंग महल के परिसर के गोल्फ कोर्स में भैरव सिंह गोल्फ क्लब से एक स्ट्रोक लेता है l पास खड़े एक नौकर बॉल लाने के लिए भाग जाता है l भैरव सिंह आकर छत्री के नीचे लगे चेयर पर बैठ जाता है और पैरों को टी पोए पर टिका देता है l तभी भीमा आता है l

भीमा - हुकुम...
भैरव सिंह - भीमा... कोई आया है क्या...
भीमा - जी हुकुम.. दरोगा और वकील... आपसे मिलने की इजाज़त मांग रहे हैं...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... ठीक है भेज देना... (भीमा जाने लगता है) एक मिनट रुको... (भीमा रुक जाता है) भीमा...
भीमा - जी हुकुम...
भैरव सिंह - तुम्हारे लाव लश्कर... अब कहाँ हैं...
भीमा - हुकुम... अपना मुहँ छुपाये... छुपे हुए हैं...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... एक काम करो... उन्हें कहो... अखाड़े में फिर से लग जाएं... विश्वा से टकराने के बाद... उन्हें एहसास तो हो गया होगा... उनसे चूक कहाँ पर हुई है...
भीमा - जी हुकुम...
भैरव सिंह - अब उन्हें तैयार करो... एक जबरदस्त मुकाबले के लिए... और हाँ... उनकी बहुत जल्द... विश्वा से टकराव हो सकता है... उसके लिए तैयारी करने के लिए बोलो... क्यूँकी अगला मुठभेड़.... या तो उनके लिए... या फिर विश्व के लिए... आखिरी मुठभेड़ होनी चाहिए...
भीमा - जी... जी हुकुम...
भैरव सिंह - अब जाओ उन दोनों को भेजो...
भीमा - जी हुकुम..

कह कर भीमा वहाँ से चला जाता है l तब तक नौकर भागते हुए अपनी हाथ में गोल्फ बॉल लेकर पहुँचता है और ड्राइवर पर बॉल को सेट करता है l भैरव सिंह अपना क्लब निकाल कर शॉट लेने को होता है कि बल्लभ और रोणा पहुँचते हैं l भैरव सिंह रुक जाता है

भैरव सिंह - आओ... आओ... दरोगा... आओ... (रोणा और बल्लभ एक दुसरे को ताकने लगते हैं) आओ दरोगा... रुक क्यूँ गए... यह रहा बॉल... एक शॉट मेरे क्लब से मारो... (बेवक़ूफ़ की तरह रोणा कभी बल्लभ को कभी भैरव सिंह को देखने लगता है) ओह... कॉम ऑन... यह लो...

कह कर अपना क्लब रोणा की
बढ़ाता है, रोणा असमंजस सा भैरव सिंह के पास चलते हुए आता है, भैरव सिंह अपना गोल्फ क्लब को रोणा के हाथ में देता है l रोणा पोजीशन लेता है और एक शॉट खेलता है बॉल दुर जाकर गिरता है l भैरव सिंह चुटकी बजाता है तो नौकर बॉल को वापस लाने भाग जाता है l

भैरव सिंह - कप कहाँ है... तुम्हारा शॉट कहाँ है... सबसे ऊपर तुम्हारा ध्यान कहाँ है... (रोणा का सिर झुक जाता है) हम क्या समझे दरोगा... तुमसे हो पाएगा या नहीं...
रोणा - जी इसी विषय पर आपसे बात करने आए हैं...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... (अपनी जगह पर बैठ कर) क्या बात करने आए हो...

रोणा बल्लभ से एक न्यूज पेपर लेकर भैरव सिंह के सामने टी पोय पर रख देता है l भैरव सिंह पेपर उठा कर पेपर देखने लगता है l फिर पेपर को एक किनारे पर रख कर रोणा की ओर देख कर

भैरव सिंह - क्या मतलब है इसका...
रोणा - केस... के लिए... नया एसआईटी बनने वाला है...
भैरव सिंह - तो...
रोणा - श्रीधर परीड़ा... गायब है...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म तो...
बल्लभ - राजा साहब... मैं कुछ कहूँ...
भैरव सिंह - हाँ कहो...
बल्लभ - इस वक़्त अगर विश्व के खिलाफ कुछ किया गया... तो केस हमारे हाथ से निकल सकता है...
भैरव सिंह - सीधे सीधे बको... पहेलियाँ मत बुझाओ...
बल्लभ - राजा साहब... हर न्यूज में... विश्व को हीरो की तरह प्रेजेंट किया गया है... बहुत बढ़ा चढ़ा कर लिखा गया है... ऐसे में.. विश्व को कुछ हुआ तो...

भैरव सिंह अपनी जगह से उठता है और दोनों के सामने खड़ा होता है l बल्लभ का जबड़ा पकड़ कर गोल गोल घुमाते हुए

भैरव सिंह - हम राजा हैं... तुझे पाल इसलिए रहे हैं... के तु सोचे... अपना दिमाग खपाये... और इसे.. (रोणा की ओर देखते हुए) पाल इसलिए रहे हैं... यह कर गुजर जाए... (बल्लभ का जबड़ा छोड़कर) अब अगर तुम दोनों का काम हमें ही करना है... तो... जरा सोच के बताओ... हमें तुम दोनों की कोई जरूरत है भी या नहीं...

दोनों के चेहरे पर खौफ छा जाती है l डर के मारे दोनों के चेहरे सफेद हो जाता है l भैरव सिंह अपनी कुर्सी पर वापस बैठ कर

भैरव सिंह - हाँ तो क्षेत्रपाल रियासत के दो रत्न.. बताओ... तुम लोगों के काम... किसी और को दिया जाए... या...
रोणा - नहीं राजा साहब... आप ने जो काम दिया है... वह अब ख़तम कर ही वापस आयेंगे...
भैरव सिंह - बहुत अच्छे.. जल्दी से काम पर लग जाओ... ताकि हमें यह मालुम रहे की हमारे काम में तुम लोग मसरूफ हो... ताकि तुम्हारे काम को ना तो हमें अपनी हाथों में लेनी पड़े... ना ही किसी और को देनी पड़े...
बल्लभ - जी राजा साहब...
भैरव सिंह - अब जाओ यहाँ से...

बल्लभ और रोणा बिना पीछे देखे वापस चल देते हैं l दोनों बाहर आकर रोणा के जीप में बैठ जाते हैं l रोणा तेजी से गाड़ी मोड़ कर अपने क्वाटर की ओर जाने लगता है l


रोणा - कभी कभी लगता है... यह राजा साहब ही पागल है...
बल्लभ - वह नहीं... हम पागल हैं... और हाँ... राजा साहब पर गुस्सा इसी गाड़ी में ही रख कर... उतरते वक़्त थूक देना... वर्ना... यह राजगड़ है... हवाओं के कान होते हैं...


रोणा चुप हो जाता है, गाड़ी निरंतर चलाने के बाद अपनी क्वार्टर के पास गाड़ी रोकता है पर गाड़ी से उतरता नहीं है और अपनी हाथ को स्टीयरिंग पर दो तीन बार अपने हाथ से मारने लगता है l

बल्लभ - शांत... क्यूँ गुस्सा कर रहा है...
रोणा - सात दिन से... सिपाही लगाए हैं... पर विश्वा कहीं जाता नहीं है... क्या कर रहा है... कुछ मालुम भी नहीं हो रहा है... और ऊपर से... यह साले न्यूज वाले... उसे हीरो बना कर.. हमारा काम मुश्किल कर रहे हैं... और यह राजा साहब... बात की गहराई को समझने के लिए तैयार नहीं है... साले काले कोट वाले... तुझे साथ लेकर गया था... ताकि राजा साहब को तु समझा पाए... पर तेरे से वह भी नहीं हुआ...
बल्लभ - हाँ नहीं हुआ... (कह कर गाड़ी से उतर जाता है) पर राजा साहब ने गलत क्या कहा है बोल... हम उनके फेंके हुए टुकड़ों पर इसी लिए तो पल रहे हैं... ताकि उन्हें सोचना ना पड़े... और करना ना पड़े... सोचने के लिए... मुझे पैसे मिलते हैं... और कर गुजरने के लिए तुझे...
रोणा - (गाड़ी से उतर कर) खूब अच्छा सोचा है तुने... तेरे कहने पर... आदमी लगाए हैं... और वह साला हरामी... सात दिन से खा पी कर अजगर की तरह डकार मार रहा है... पर हिल नहीं रहा...
बल्लभ - पहले भी कहा था तुझे... सब्र कर... उतावला मत हो... विश्वा कोई ना कोई गलती करेगा... जरा सोच... अब तक तुने उसके हाथ पैर बाँध रखा है... जैसे ही हरकत करेगा... तब तु उसे ख़तम कर देना... और तब रिपोर्ट में लिख देना... भाग रहा था... पैर पर गोली चला रहा था... गलती से गोली... पीठ पर लग गई....

इतना सुनने के बाद रोणा थोड़ा शांत हो जाता है l बल्लभ की कही बातों को समझने के अंदाज में अपना सिर हिला कर सहमती देता है l

रोणा - ठीक कह रहा है... मैं थोड़ा उतावला हो जाता हूँ... अब तक किस्मत ने विश्व के साथ दिया है... पर कब तक... अपनी भी बारी आएगी... तब साले को कुत्ते की मौत मारूंगा... कसम से... गालियों में दौड़ा दौड़ा कर मरूंगा... (बल्लभ से) चल अंदर आजा... मिलकर कुछ सोचते हैं...

दोनों क्वार्टर के अंदर जाने लगते हैं कि तभी रोणा की मोबाइल बजने लगती है l अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर देखता है स्क्रीन पर टोनी डिस्प्ले हो रहा था l टोनी का नाम देखते ही रोणा की भवें तन जाती हैं l कमरे में सोफ़े पर बैठते हुए बल्लभ रोणा की हालत देखता है l

बल्लभ - क्या हुआ किसका फोन है...
रोणा - लगता है... किस्मत पलटने वाली है... अगर यह कॉल मेरे मतलब कि हुई... तो समझ लो... विश्वा की बर्बादी शुरु होने वाली है...
बल्लभ - अच्छा यह बात है... तो फिर कॉल को स्पीकर पर डाल... (रोणा वही करता और कॉल लिफ्ट करता है)
रोणा - हैलो...
टोनी - हैलो... रोणा सर...
रोणा - बोल टोनी... उर्फ लेनिन...
टोनी - लेनिन... मेरा पास्ट है... टोनी... मेरा प्रेजेंट... अब वक़्त आ गया है... टोनी को पास्ट करने का...
रोणा - ह्म्म्म्म... मतलब लड़की के बारे में... बहुत कुछ पता कर लिया है...
टोनी - नहीं... बहुत कुछ नहीं... पर तुम्हारे मतलब कि जितनी होनी चाहिए... पता कर लिया है...
रोणा - क्या पता किया है...
टोनी - इतनी जल्दी भी क्या है... पहले यह बताइए... मेरे काम का क्या हुआ... मेरी नई आइडेंटिटी...
रोणा - हो गया है... मैंने तुम्हारे लिए... नई आधार कार्ड... और वोटर आईडी कार्ड जुगाड़ कर दिया है...
टोनी - तो ठीक है... सुनिए... बहुत जल्द विश्व से मिलने वह नंदिनी... राजगड़ जाने वाली है.. और विश्व के दीदी के पास ठहरने वाली है...
रोणा - (इतना सुनते ही आँखे किसी शिकारी की तरह चमकने लगते हैं) कब...
टोनी - बहुत जल्द...
रोणा - मैं कैसे मान लूँ... तुझे यह सब कैसे मालुम हुआ...
टोनी - हा हा हा हा... रोणा बाबु... विश्वा चालाक सही... पर मैं भी कुछ कम नहीं... आज सुबह ही मेरे आदमी ने नंदिनी के मोबाइल फोन में... मेमोरी कार्ड वाली जगह पर बग फिक्स किया है... अब तोता मैना दोनों जो भी बातेँ करेंगे... मुझे मालुम हो जाएगा... बस इतना जान लीजिए... लड़की के इर्द-गिर्द विश्वा के आदमी बिछे हुए हैं...
रोणा - क्या बात कर रहा है... तुने तो बहुत बड़ा काम कर दिया है...
टोनी - तो बोलिए... अपना नया पहचान लेने कब आऊँ...
रोणा - जब लड़की मेरे हाथ लग जाएगी...
टोनी - ऐसी कोई डील नहीं हुई थी...
रोणा - देख टोनी... नया आईडी लेकर तु निकल गया... और कहीं मैं फंस गया.. तो... वैसे भी... अभी अभी जो तुने कहा है... क्या ग्यारंटी है... वह सब सच ही है...
टोनी - अभी रिकार्डिंग भेज देता हूँ...
रोणा - चल भेज...
टोनी - भेज दूँगा.. भेज दूँगा... पर आपकी डील पर... अपनी भी एक डील है...
रोणा - हाँ बोल...
टोनी - अगर लड़की सच में राजगड़ जाती है... तो उसे बीच रास्ते से मैं उठा लूँगा... आपको डायरेक्ट डेलिवेरी देकर अपनी नई पहचान ले लूँगा...
रोणा - यह हुई ना... कमीनों वाली डील... मंजुर है... एक हाथ लड़की देगा... दुसरे हाथ अपने लिए नई आईडी लेगा...
टोनी - डील...
रोणा - अब भेज वह कंवरसेशन...

टोनी फोन काट देता है और रुप और विश्व के बीच हुई बातचीत का रिकार्डिंग व्हाट्सएप पर भेज देता है l रोणा और बल्लभ दोनों वह कंवरसेशन सुनने लगते हैं l सब सुनने के बाद जहां रोणा बहुत खुश होता है वहीँ बल्लभ कुछ सोच में पड़ जाता है l

रोणा - देखा वकील... अब किस्मत हमारा साथ देने लगी है... और विश्वा की लेने लगी है... क्या सोचने लगा है वकील...
बल्लभ - पहली बात... जहां तक मुझे भान हो रहा है... वह लड़की कोई मामूली लड़की नहीं है... दुसरी बात... जैसा कि टोनी ने कहा... उस लड़की के चारों तरफ... विश्वा के आदमी बिछे हुए हैं... (कहते कहते चुप हो जाता है, फिर अचानक रोणा से कहता है) एक बात कहूँ...
रोणा - क्या...
बल्लभ - क्यूँ ना लड़की के बारे में... हम जितना जानते हैं... वह सब हम राजा साहब को बता दें... एक बार विश्व की कमजोरी राजा साहब के हाथ में आ गई... तो विश्वा कुत्ता बन कर राजा साहब के जुते चाटने आएगा... (रोणा चुप रहता है) क्या हुआ... मेरी बात तुझे पसंद नहीं आई...
रोणा - नहीं... नहीं आई पसंद..
बल्लभ - क्यूँ... क्या गलत कह दिया... मत भुल... उस लड़की को... मैंने राजकुमार की सगाई वाले दिन देखा था... मतलब वह कोई मामुली हस्ती की बेटी नहीं होगी... कुछ ऊँच नीच हो गई... तो फिर राजा साहब के पास भागना पड़ेगा...
रोणा - जो होना वह होगा... पर उस लड़की के बारे में... राजा साहब अभी नहीं... उसकी चुत में.. अपना लौड़ा गाड़ने के बाद हो खबर करूँगा... मुझे कोई मतलब नहीं है... वह लड़की कौन है.. किसकी है... (अपनी गाल पर हाथ फेरते हुए) मुझे बस इतना मालुम है... मुझे उसकी लेनी है... वह भी विश्वा के सामने...
बल्लभ - (गुस्से में खड़े होकर) राजा साहब को खबर करने से... तुझे प्रॉब्लम क्या है....
रोणा - (गुस्से में तमतमा कर खड़ा होता है) हाँ प्रॉब्लम है... राजा साहब को कह देने से.. वह लड़की को उठा लेंगे... अपनी रंडी बनाएंगे... फिर जब मन भर जाएगा... तब अपनी झूठन को हमारी ओर फेंक देंगे... इसे तो मैं अपनी पर्सनल रंडी बनाऊँगा... विश्वा को अंजाम तक पहुँचाने के बाद... राजा साहब मुझे रंग महल दे देंगे... मैं मरते दम तक... उस लड़की के साथ ऐस करता रहूँगा...
बल्लभ - पागल हो गया है तु...
रोणा - देख... राजा साहब को... विश्व को बर्बादी चाहिए... मैं वही कर रहा हूँ...
बल्लभ - ठीक है... तेरे इस प्लान में मैं नहीं हूँ... घबरा मत... तेरे इस प्लान के बारे में किसी से नहीं कहूँगा... क्यूँकी जब तेरा यह प्लान बैक फायर करेगा... तब तो तु मेरे पास आएगा ही... चलता हूँ... बेस्ट ऑफ लक...

इतना कह कर रोणा को वहीँ छोड़ कर बल्लभ चल देता है l रोणा अपने मन में बल्लभ को गालियाँ बकते हुए चेयर पर बैठ जाता है l बल्लभ के जाने के कुछ पल के बाद रोणा के क्वार्टर की डोर बेल बजती है, रोणा अपनी जगह से उठने के बजाय चिल्लाते हुए कहता है

- कौन है... अंदर आ जाओ...

कमरे में एक कांस्टेबल अंदर आता है, एक जोरदार सैल्यूट मारने के बाद कहता है

- कांस्टेबल जगन्नाथ महाकुड़ रिपोर्टिंग सर...
रोणा - अरे जगन्नाथ... तुम इस वक़्त... लगता है कोई जरूरी खबर है...
जगन्नाथ - जी... सर... एक बहुत ही खास खबर है सर... विश्व के बारे में... और उसके अगले मूवमेंट के बारे में...

इतना सुनते ही रोणा के कान खड़े हो जाते हैं, चेयर पर सीधा बैठ जाता है और जगन्नाथ से कहने के लिए कहता है l जगन्नाथ कहता है कि कोई यशपुर में है,जो विश्व को न्यूज पेपर के जरिए कुछ ना कुछ ख़बरें भेजता रहता है l उसके आधार पर विश्व अपने काम को अंजाम देता रहता है l अब शायद आगे कुछ खास करने वाले हैं इस लिए वह दो दिन बाद विश्व से मिलने के लिए कह दिया है l सब सुनने के बाद

रोणा - कैसे मिलेंगे... इस बाबत कोई जानकारी...
जगन्नाथ - जी नहीं सर...
रोणा - ठीक है... तुमने बहुत अच्छा काम किया है... जाओ इस पर तुम एक ऑफिसीयल रिपोर्ट बनाओ... और मेरे पास डीपोजीट करो...
जगन्नाथ - जी सर... (कह कर सैल्यूट मारता है, और वापस जाने को होता है कि फिर मुड़ कर) सर परसों हमे क्या करना होगा... अगर विश्व बाहर गए... तो क्या हम उनके साथ जाएंगे...
रोणा - (मुस्कराते हुए अपनी जगह से उठता है और जगन्नाथ के यूनीफॉर्म के बटन पर हाथ फेरते हुए) जगन्नाथ जी... आपको विश्व के घर के बाहर ड्यूटी लगाया गया है... आप बस उतना ही कीजिए... आगे क्या करना है... वह हम देख लेंगे... समझे कुछ...
जगन्नाथ - जी... जी सर..
रोणा - गुड... नाउ यु मे लिव...
Bahut hi badhiya update diya hai Kala Nag bhai.....
Nice and beautiful update....
 

Ajju Landwalia

Well-Known Member
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👉एक सौ चालीसवां अपडेट
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आज की ताजा खबर,
जैसा कि आप को ज्ञात है रुप फाउंडेशन की भ्रष्टाचार में अपनी भुमिका सही ढंग से ना निभा पाने के कारण अदालत ने राजगड़ के पूर्व तत्कालीन पुर्व सरपंच विश्व प्रताप महापात्र को सात वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी और अदालत के द्वारा ने यह आदेश भी जारी किया गया था कि रुप फाउंडेशन की तहकीकात के लिए बनाई गई एसआईटी को सरकार बहाल रखे और तहकीकात को जारी रखे और उसकी रिपोर्ट तैयार कर अदालत में जमा करे, पर विश्व प्रताप के कानूनी सजा पुरी होने के बाद उन्होंने आरटीआई के द्वारा अब तक हुई तहकीकात की प्रगति के बारे में जानने की कोशिश की, पर आपको जान कर हैरानी होगी अदालत के आदेश के बावजूद एसआईटी की जाँच एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी थी l इस दौरान विश्व प्रताप महापात्र सरकार द्वारा स्वीकृत कॉलेज में डिस्टेंस एजूकेशन के जरिए अपनी स्नातक की डिग्री हासिल की और डिस्टेंस एजूकेशन के जरिए अपनी वकालत की डिग्री भी हासिल की l उन्हें बार काउंसिल की लाइसेंस मिलने के बाद अदालत में रुप फाउंडेशन की जाँच नए सिरे से शुरु करने और असली अपराधियों को ढूँढ कर उन पर कानूनी कार्रवाई करने के लिए पीआईएल दाखिल किया था l जिसे अदालत ने सहसा स्वीकर कर गृहमंत्रालय एवं मुख्यमंत्री कार्यालय को समन जारी किए l जिसके पश्चात मुख्यमंत्री कार्यालय तुरंत हरकत में आ गई l कल देर रात को पुराने एसआईटी को ख़तम कर नया एसआईटी का गठन किया गया है एसिपी सुभाष सतपती जी के नेतृत्व में l यह खबर बाहर आने के बाद हमारी सम्वाददाता पूर्व अधिकारी श्रीधर परीड़ा से संपर्क करने की कोशिश की, पर उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है यहाँ तक वे अपने घर में भी नहीं हैं, उनका घर कल से बंद है l आसपास के लोग उनके फरार होने की बात कर रहे हैं l इसके साथ मुझे आपकी सुप्रिया रथ को इजाजत दीजिए
फिर रहिए ना बेख़बर
यह था आज की ताजा खबर


ESS की ऑफिस
विक्रम अपने चेंबर पर बैठा यह न्यूज देख रहा था l न्यूज के समाप्त होते ही विक्रम टीवी की रिमोट हाथ में लेता है और टीवी को बंद कर देता है l कुछ देर के लिए अपनी आँखे बंद कर गहरी सोच में खो जाता है l फिर अचानक वह एक झटके के साथ अपनी आँखे खोलता है जैसे उसे कुछ याद आया हो l झट से फोन निकाल कर किसी को फोन मिलाता है l उधर से कॉल लिफ्ट होते ही

विक्रम - हैलो...
X - बोलिए सर...
विक्रम - वीर कैसा है...
X - सर सलामत हैं... और खुश भी हैं...
विक्रम - और... मेरे खास... वह लोग कैसे हैं...
X - अभी तक तो ठीक ही हैं... पर एक बात है सर... लगता है उन पर हमारे सिवा दो तीन ग्रुप और भी नजर रखे हुए हैं...
विक्रम - ह्म्म्म्म... तुम अपना काम करो... और मुझे पल पल की जानकारी दो...
X - जी सर... रूटीन से कुछ भी अलग होता है... मैं आपको खबर कर दूंगा...
विक्रम - हाँ... ठीक है

विक्रम फोन काट देता है l तभी उसकी इंटरकॉम पर सेक्रेटरी खबर करती है कि उससे मिलने पार्टी ऑफिस से कोई आया है l विक्रम उसे भेजने के लिए कहता है l कुछ देर बाद कमरे में पार्टी के युवा मोर्चा का सेक्रेटरी आता है l

विक्रम - आइए... सेक्रेटरी महोदय आइए... बैठिए...
सेक्रेटरी - जी युवराज... धन्यबाद... (कह कर सेक्रेटरी बैठ जाता है)
विक्रम - कहिये... कैसे आना हुआ...
सेक्रेटरी - युवराज जी... देखिए मेरी बातों को अन्यथा ना लीजिएगा... पार्टी के अध्यक्ष के कहने पर मैं आपसे मिलने आया हूँ...
विक्रम - सारे तक्कलुफ किनारे कीजिए... सीधे मुद्दे पर आइए...
सेक्रेटरी - अभी आपने युवामोर्चा का पद छोड़ कर अपने भाई राजकुमार वीर जी को सामने लाये... (कह कर चुप हो जाता है)
विक्रम - आगे बोलिए...
सेक्रेटरी - अब राजकुमार ने अपना इस्तीफा भेज दिया है... हम उन्हें मनाने की सोच रहे थे कि... तभी छोटे राजा जी की हुकुम आ गया... के पार्टी के तरफ़ से राजकुमार जी का किसी भी प्रकार से कोई संबंध ना रखा जाए... अब हम में से किसी की भी हिम्मत नहीं बन रही है... उनके हुकुम के खिलाफ जाने की... अब पार्टी की युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद रिक्त है... अब आप कोई मार्ग दर्शन कीजिए... क्यूँ के.. सभी एक मत से आपको चाह रहे हैं...
विक्रम - देखिए सेक्रेटरी जी... मैंने.. अपनी जगह वीर का नाम सुझाया था... जिसे पार्टी ने सहसा स्वीकार भी किया था... अब जब वीर नहीं है... तो बेहतर होगा... पार्टी कि अध्यक्ष ही कोई निर्णय लें... क्यूँकी... मैं अब राजनीति से फ़िलहाल दुर ही रहना चाहता हूँ... जब समय आएगा... तब मैं पार्टी से जुड़ुंगा...
सेक्रेटरी - तो अब...
विक्रम - देखिए... पार्टी में कोई और चेहरा भी हो सकता है... आप उन्हें सामने लाइये...
सेक्रेटरी - बात तो आपकी सही है... और बड़े विमर्ष के बाद एक चेहरा मिला है... पर उनके लिए वोट... मेरा मतलब है... (थोड़ी झिझक के साथ) आप अगर लोगों के पास जाकर उनके लिए वोट माँगे तो... (चुप हो जाता है)

विक्रम उसकी बातेँ सुन कर मुस्कराते हुए अपनी जगह से उठता है l विक्रम को उठते देख सेक्रेटरी भी उठ खड़ा होता है l विक्रम उसके पास आकर खड़े हो कर उस सेक्रेटरी के कंधे पर हाथ रखकर

विक्रम - (कड़क लहजे में) आइंदा कभी मिलो तो इतना याद रखो... मांगना हमारी फितरत नहीं है... छीनना या दे देना हमारी आदत है... समझे...

विक्रम ने जिस अंदाज से बात करी थी पार्टी सेक्रेटरी की फटके हाथ में आ गई थी l उसे ऐसा लग रहा था जैसे विक्रम के हर एक शब्द उसके हड्डियों में कड़ कड़ की कंपन पैदा कर रही थी l

विक्रम - वैसे... कौन है वह बंदा... जिसे इसबार पार्टी ने अपना युवा चेहरा बनाया है...
सेक्रेटरी - ज.. ज.. जी उसे साथ में लाया हूँ... ब ब ब बाहर खड़ा है...
विक्रम - कांप क्यूँ रहे हो... तो सब पहले से ही तय कर रखे हो... और हमारे मुहँ पर मारने आए हो... खैर कोई नहीं... बुलाओ उसको... हमसे थोड़ा परिचय करवाओ...
सेक्रेटरी - जीजीजी... अभी बुलाता हूँ....

सेक्रेटरी अपनी जगह से उठता है और बाहर जाकर एक बंदे को अंदर लाता है l उस बंदे को देखते ही विक्रम की आँखे बड़ी हो जाती हैं l गेरुए कपड़े में मृत्युंजय खड़ा था l हैरानी के मारे विक्रम का मुहँ खुला रह जाता है l मृत्युंजय अंदर आते ही विक्रम को हाथ जोड़ कर नमस्ते करता है l

मृत्युंजय - नमस्ते युवराज जी...
विक्रम - तुम...
मृत्युंजय - जी... मैं... मैं वापस आ गया...
विक्रम - क्या तुम्हें... पुष्पा का कातिल मिला...
मृत्युंजय - नहीं... नहीं मिला... इसीलिए... मैं एक दिन आत्महत्या करने जा रहा था... के एक साधु बाबा ने मुझे रोका... और अपने साथ उनके आश्रम में ले गए... वहीं पर उन्होंने मुझे जीवन के दर्शन समझाया... जब मुझे अपने कर्मों का बोध हुआ... तो मैं वापस आ गया... लोक सेवा के लिए... लोक कल्याण के लिए... मैं आप ही की पार्टी का एक साधारण कार्यकर्ता बन पार्टी को सेवा देता रहा... राजकुमार जी के प्रकरण के बाद... मुझे पार्टी के महा महीम ने इस पद को संभालने की जिम्मेदारी दी है... और इसबार आने वाले चुनाव में मुझे भाग लेने के लिए कहा है...

विक्रम का चेहरा सख्त होता जा रहा था l मुट्ठीयाँ भींचने लगी थी l पर उसके उलट मृत्युंजय बहुत ही शांत खड़ा था l मृत्युंजय अपने चेहरे पर एक मुस्कान लाकर फिर से कहना चालु करता है l

मृत्युंजय - युवराज जी... आप मेरे अन्नदाता रहे हैं... मेरे प्रथम मालिक... दीवंगत महांती जी मेरे गुरु रहे हैं... इसलिए चुनाव में हिस्सा लेने से पहले... मेरे इस नव जीवन प्रारम्भ करने से पहले... मुझे आपकी आशीर्वाद चाहिए... क्या मुझे मिलेगा...

इतना कह कर मृत्युंजय विक्रम के आगे घुटने पर बैठ जाता है l विक्रम बहुत असहज हो जाता है l विक्रम अपने भावनाओं पर काबु पाते हुए अपना सिर हिलाता है और

विक्रम - ठीक है... मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ है... अब जाओ तुम दोनों यहाँ से...

मृत्युंजय अपनी जगह से उठता है फिर पार्टी सेक्रेटरी के साथ बाहर चला जाता है l

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×


रुप कॉलेज में दाखिल होती है l गाड़ी को पार्किंग में लगा कर सीधे कैंटीन में जाति है पर उसे वहाँ पर उसके दोस्त नहीं दिखते हैं l वह छोटु से अपनी दोस्तों के बारे में पूछती है पर छोटु उसे कुछ कह नहीं पाता, तो रुप कैंटीन से बाहर निकल कर बॉटनीकल गार्डन की ओर जाती है l कुछ देर तक यहाँ वहाँ नजर दौड़ाने के बाद एक कोने में उसे सारे दोस्त नजर आ जाते हैं l वह उनके तरफ जाती है l जब उसके दोस्तों की नजर उसके ऊपर पड़ती है तो रुप हाथ उठा कर हाय का इशारा करती है l बदले में उसके सारे दोस्त भी उसे हाथ हिला कर हाय का इशारा करते हैं, पर रुप को महसूस होती है कि उन लोगों के चेहरे पर कोई हडबड़ी वाला एक्सप्रेसन दिखता है l उनके चेहरे पर आए हाव भाव देख कर रुप थोड़ी असहज होती है l उनके पास पहुँच कर

रुप - हैलो एवरी वन...
सब - हैलो...
रुप - क्या बात है... कोई सीरियस डिस्कशन चल रही थी क्या...
बनानी - अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं...
रुप - देखो झूठ मत बोलो... तुम्हारा जुबान कुछ कह रहा है... और तुम्हारा चेहरा कुछ कह रहा है...
इतिश्री - नहीं सच में... अब देखो... कुछ दिनों बाद शेषन ख़तम हो जायेंगी और होली के साथ छुट्टियाँ भी शुरु हो जाएंगी... तो हम लोग उसीकी डिस्कशन कर रहे थे...
रुप - वाव... वैसे कौन कहाँ जा रहा है इस बार...
इतिश्री - मैं तो अपने गाँव जा रही हूँ...
भाश्वती - मेरा तो घर ही भुवनेश्वर में है...
बनानी - हाँ... पर इस बार हम शायद बाहर जा रहे हैं...
तब्बसुम - मेरा तो बेड लक ही ख़राब है... ना रिवार्ड मिली... ना नाम...

रुप देखती है दीप्ति चुप बैठी है और अपने भीतर कुछ सोच रही है l रुप दीप्ति को बुलाती है

रुप - दीप्ति... ऐ..
दीप्ति - (चौंक कर) हाँ... कुछ कहा तुमने...
रुप - क्या सोच रही थी तुम...
दीप्ति - यही के... फर्स्ट सेमिस्टर एक्जाम के लिए... सर के पास जाकर.. हम क्यूँ ना कुछ टिप्स लें...

रुप की भवों पर सिलवटें पड़ जाती हैं l वह कनखियों से देखती है सब के सब दीप्ति को इशारे से कुछ समझाने की कोशिश कर रही हैं l

रुप - ओके... तो मेरे आने से पहले... कुछ ऐसा डिस्कशन हो रहा था... जो मुझे नहीं जानना चाहिए... है ना... (सबका चेहरा झुक जाता है) ओके देन... अब बेहतर होगा... तुम लोग मुझे साफ साफ सब बता दो...

सभी एक दूसरे को देखने लगते हैं l कुछ देर बाद दीप्ति अपने आप को तैयार करते हुए कहती है

दीप्ति - ठीक है... बात दरअसल यह है कि... हम तेरे और विश्व के बारे में डिस्कश कर रहे थे...
बनानी - दीप्ति... (बनानी दीप्ति को टोकती है)
रुप - अच्छा... मेरे और विश्व के बारे में... ऐसी कौनसी बात डिस्कशन कर रहे थे... जो मुझे देख कर चुप हो गए...
दीप्ति - देख... यह देख... (कह कर दीप्ति रुप को अपना मोबाइल पर न्यूज चला कर देती है, रुप न्यूज को पुरा सुनती है और दीप्ति को मोबाइल वापस लौटा कर पूछती है)
रुप - हाँ तो इसमें ऐसा क्या है... जो मैं और विश्व डिस्कशन में आ गए...
दीप्ति - क्या... इसमें ऐसा कुछ नहीं है... नंदिनी... तुम्हारा विश्व कानूनन सजायाफ्ता है...
रुप - हाँ.. तो क्या हुआ...

रुप की इस सवाल पर सब थोड़े असमंजस सा एक दुसरे को देखने लगते हैं l रुप उनकी नजरों की पीछा कर सबकी चेहरे को गौर से देखती है फिर कहना शुरु करती है l

रुप - ओह के... तो तुम लोगों की नज़र में पहले मेरी खानदान वाले सही नहीं थे... फिर धीरे धीरे मेरा भाई वीर कुछ ही दिन हुए हीरो बना... अब तुम लोगों की नज़र में विश्व एक क्रिमिनल है... जिससे मैं प्यार करती हूँ... है ना... (सब मौन रहते हैं, भाष्वती से) भाष्वती तु भी... (इस सवाल पर भाष्वती अपनी नजरें झुका लेती है) तु तो उसे अपना भाई मानती है ना... भुल गई... तुझे प्रताप ने कैसे बचाया था... खैर... और तु... तब्बसुम... अपने वालिद से पुछ लेना कभी फुर्सत में... कैसे आज तु कॉलेज आ पा रही है... (तब्बसुम इधर उधर देखने लगती है) वैल वैल.. तुम लोगों की नजर और कान शायद वही देखा... जो तुम्हारे मतलब कि थी... कोई नहीं... अगर यही वज़ह है... तो मुझे तुम लोगों से कोई शिकायत नहीं है... हाँ कास के... तुम सभी प्रताप के बारे में सब कुछ जान कर अपना ओपिनियन रखते तो अच्छा होता...
वह मेरा अनाम है... उसका नाम विश्व प्रताप महापात्र है... किसी और के गुनाह की सजा उसने अपने सिर लिया था... क्यूँकी जो भी हुआ था... उस अपराध के पीछे कहीं ना कहीं खुद को दोषी समझता था... जरा सोचो... कभी ऐसा हुआ है... की कोई वकील किसी मुजरिम की पैरवी करते करते उसे अपना बेटा समझने लगे... और अपनी जायदाद उसके नाम कर दे... एडवोकेट जयंत राउत... जो प्रताप का केस लड़ रहे थे... उन्होंने अपनी जायज कमाई प्रताप के नाम कर दी...

कुछ देर के लिए सन्नाटा छा जाती है l रुप एक गहरी साँस लेती है फिर कहना चालु रखती है l

रुप - एक वकील जो उसके खिलाफ लड़ी... वह आज उसे अपना बेटा मानती हैं... जो आज इस स्टेट के हर एक कामकाजी महिलाओं की आवाज बनी हुई हैं... प्रतिभा जी... याद है... या भूल गए...

फिर वही सन्नाटा थी l इस बार सभी ल़डकियां संकोच से सिर झुकाने लगे l

रुप - हम लोग दोस्त हैं... मैं समझती थी... के हम सब एक दुसरे को समझते हैं... पर आज तुम सब ने मुझे गलत साबित कर दिया... मेरे अनाम के लिए... मुझे किसी की सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है... मैं तुम लोगों से पूछती हूँ... कितने ऐसे लोग हैं... जो जैल में रह कर अपनी पढ़ाई पूरा कर पाते हैं... या करते हैं... अनाम ने ना सिर्फ वकालत की डिग्री हासिल की... बल्कि बार काउंसिल की लाइसेंस भी हासिल करी... अब बताओ... अगर वह क्रिमिनल होता... तो क्या उसे लाइसेंस मिलता... खैर... अब इस वक़्त तुम लोगों से बातेँ करना भी बेकार है... आई तो थी तुम लोगों के साथ कुछ गप्पे लड़ाने... पर... चलती हूँ... (रुप पलट कर जाने लगती है)
भाष्वती - (रुप को रोक कर) सॉरी यार... हमसे गलती हो गई... अब ऐसे जुते भिगो भिगो के मार मत...
रुप - नहीं... आज तुम लोगों ने मेरा दिल दुखाया है... इसलिए मैं अब जा रही हूँ... जब तक मैं अपने आप शांत ना हो जाऊँ... तुम लोग मुझे कॉन्टैक्ट मत करना...
भाष्वती - अरे सुन तो...
रुप - प्लीज...

इतना कह कर रुप गार्डन से बाहर आती है l तेजी से चलते हुए अपनी गाड़ी की डोर खोल कर बैठ जाती है l रुप को महसुस होती है कि उसकी आँखों में नमी छा रही थी l अपनी हाथों से आँखों से आँसू पोछते हुए गाड़ी स्टार्ट करती है और गाड़ी कॉलेज की सीमा से बाहर ले कर रास्ते पर दौड़ाने लगती है l कुछ देर बाद गाड़ी को एक जगह रोकती है और स्टीयरिंग पर अपना सिर रख कर बैठी रहती है l कुछ गहरी साँसे लेने के बाद गाड़ी से उतर कर देखती है कि वह निको पार्क के पास गाड़ी को रोकी है l निको पार्क को देखते ही उसे विश्व को याद आती है l अपना मोबाइल निकाल कर विश्व को कॉल लगाने ही वाली होती है कि एक आदमी आता है और रुप की मोबाइल छिन कर भागने लगता है l रुप पहले हैरान हो जाती है और जब संभलती है तब चोर चोर चिल्लाती है l आसपास के कुछ लोग और कुछ लड़के उस चोर के पीछे लग जाते हैं और थोड़ी देर बाद उसे घेर लेते हैं, वह चोर अपने को घिरा हुआ देख कर रुप के पास भागते हुए आता है और रुप के पैरों में गिर जाता है और रहम की भीख माँगते हुए रुप को मोबाइल लौटा देता है l कुछ लोग उसे पकड़ कर मारने को होते हैं, रुप उन लोगों को रोकती है और उस आदमी को छुड़ा कर चले जाने को कहती है l वह आदमी रुप को बहुत दुआयें देते हुए वहाँ से चला जाता है l कुछ लड़के रुप को इम्प्रेस करने के लिए अपनी अपनी बड़ी बड़ी हांकने लगते हैं l सिचुएशन को ऐसे देख कर रुप अपनी गाड़ी में वापस बैठ कर वहाँ से निकलने लगती है l थोड़ी दुर जाने के बाद रुप ब्लू टूथ से गाड़ी से कनेक्ट कर विश्व को कॉल लगाती है l

विश्व - हैलो जी... हुकुम जी... कहिए क्या करना है...
रुप - तुम जानते हो... अभी मेरे साथ क्या हुआ है...
विश्व - नहीं जी... बिल्कुल नहीं...
रुप - (खीज कर) आह... देखो... मैं मज़ाक के मुड़ में बिल्कुल नहीं हूँ...
विश्व - अरे बाप रे... ठीक है कहिए... क्या हुआ... आपके साथ...
रुप - क्यूँ तुम तो कह रहे थे... मेरे पास हवा भी अगर रुख बदलेगा... तो तुम्हें खबर हो जाएगी...
विश्व - हाँ कहा तो था... क्यूँ.. कोई शक़...
रुप - हाँ हो रहा है शक़...
विश्व - मत कीजिए... प्लीज...
रुप - क्यूँ न करूँ... बड़े बड़े डींगे जो हांक रहे थे...
विश्व - अरे अरे.. इतना गुस्सा... क्या हुआ... वह जो चोर... आपसे मोबाइल छिन कर भाग रहा था... पकड़ा गया... और आपका मोबाइल आपको मिल गया ना...

रुप अपनी गाड़ी में ब्रेक लगाती है l उसकी आँखे हैरानी से बड़े हो जाते हैं, वह गाड़ी रोक कर अपनी चारों तरफ देखती है l उसे कोई नहीं दिखता l लड़खड़ाती हुई आवाज में विश्व से पूछती है

रुप - तततत.. तुम हे कैसे मालुम हुआ...
विश्व - कहा था ना... हवा तक आपके पास करवट बदलेगा... तब भी मुझे भान हो जाएगा...
रुप - (एक टूटी हुई आवाज़ में) ओह...
विश्व - पर आज आपको हुआ क्या है... इस बात के लिए तो फोन नहीं किया आपने...
रुप - हाँ वैसे... बात कुछ और थी...
विश्व - क्या उस बात के लिए मुड़ उखड़ा हुआ था...
रुप - (थकी हुई आवाज में) हाँ...
विश्व - अरे... ऐसा क्या हो गया.. जो मेरी दिल की शहजादी को मायूस कर दिया...

फिर रुप कॉलेज में दोस्तों के साथ हुई बातचीत को ज्यादा कुछ नहीं बताती बस अपनी नाराजगी को संक्षिप्त कर बताती है l विश्व सब सुनने के बाद एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहता है
- ह्म्म्म्म...
रुप - जानते ही अनाम... मैं बनानी से दोस्ती के लिये क्या कुछ नहीं किया... रॉकी की प्लान में दीप्ति शामिल थी... यह जानने के बावजूद.. मैंने उसे माफ भी किया... और भाष्वती जरा देखो उसे... भाई कहती थी तुम्हें... तुम्हारे वज़ह से... अपनी कॉलोनी से कॉलेज... बिना डरे आ रही है... उसने भी... और आखिर में तब्बसुम... वह भी... जो आज तुम्हारे वज़ह से कॉलेज आ पा रही है... (विश्व कोई जवाब नहीं देता) क्या हुआ... ओ समझी... देखा तुम्हें भी बुरा लगा ना...
विश्व - नहीं... मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा...
रुप - व्हाट... तुम्हें बुरा.. नहीं लगा..
विश्व - नहीं...
रुप - क्यूँ...
विश्व - क्यूंकि अभी आप जो महसुस कर रही हैं... जो कुछ भी देख रही हैं... उन हालातों से मैं गुजर चुका हूँ...
रुप - ओ... फिर भी... वह लोग मेरे दोस्त हैं... कोई दुसरा होता तो... मुझे इतना बुरा ना लगता...
विश्व - वह लोग आम हैं... आप और मैं खास हैं... और जो लोग आम होते हैं... वे लोग खुद को... समाज के हर चीज़ से दुर रखते हैं... वे लोग चाहते हैं... समाज में बदलाव हो... पर बदलाव की दौर से वे लोग ना गुज़रे... वे चाहते हैं... कोई क्रांति हो... कोई क्रांतिकारी आए... पर उनके घर में नहीं... वे सोचते हैं... वोट दे दिया... सर्कार चुन लिया बस बात काम खत्म... सरकार अपना काम करे... पुलिस अपना काम करे और न्यायलय अपना काम... पर किसी भी पचड़े में खुद को देखना नहीं चाहते... वे लोग सिर्फ अपने और अपने परिवार के के सिवा... किसी और की सोचना भी नहीं चाहते... यह बहुत आम फितरत है... पर जब उन पर कुछ गुज़रती है... तब वे लोग अपनी चारों तरफ देखते हैं... उम्मीद करने लगते हैं... शिकायत करने लगते हैं... क्योंकि यह लोग... आम लोग होते हैं...
रुप - तो मुझे... क्या करना चाहिए...
विश्व - माफ कर दीजिए...
रुप - क्यूँ...
विश्व - क्यूँ की वे लोग आपके दोस्त हैं... एक दिन वे आपकी भावनाओं को समझेंगे और माफी मांगेंगे... (इस बार रुप कुछ नहीं कहती) क्या हुआ... आप खामोश हो गईं...
रुप - तो तुम कहना चाहते हो... मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए...
विश्व - जी बिल्कुल... क्यूँकी आप कोई आम नहीं हो... बहुत ही खास हो... (रुप फिर से खामोश हो जाती है) अब क्या हुआ..
रुप - मेरा मुड़ खराब है... ऐसे ठीक नहीं होगा...
विश्व - अच्छा तो फिर कैसे ठीक होगा...
रुप - तुम्हें मालुम है... क्यूँ भूल गए... मैंने कहा था... मैं रूठुंगी..
विश्व - और मैं मनाऊंगा...
रुप - तो मनाओ...
विश्व - पर आप तो मुझसे रूठी नहीं है...
रुप - तो इसका मतलब यह हुआ... तुम मुझे अभी नहीं मनाओगे...
विश्व - अरे मेरी ऐसी हस्ती कहाँ... बिसात कहाँ... आप हुकुम करें और हम तमिल ना करें... (रुप की चेहरे पर मुस्कान आ जाती है) बस इतने में ही आपकी चेहरे पर मुस्कान आ गई... (रुप फिर चौंकती है)
रुप - तुम्हें कैसे पता....
विश्व - आपकी अदाओं से मुझे एहसास हो जाता है...
रुप - पर तुमने कोई शायरी नहीं कही मेरे लिए...
विश्व - अभी किए देते हैं...

चेहरे पे मेरे जुल्फों को फैलाओ किसी दिन,

रोज गरजते हो बरस जाओ किसी दिन,

खुशबु की तरह गुजरो मेरी दिल की गली से,

फूलों की तरह मुझपे बिखर जाओ किसी दिन !
रुप - कमाल है... फर्माइश हमने किया है... ख्वाहिश आप फर्मा रहे हैं...
विश्व - वाह वाह क्या बात है... अजी हम हमेशा आपके फर्माबरदार रहे हैं... पर आपकी फर्माइश के लिए हमने सोच बहुत कुछ रखा है... बस आपकी आने का इंतजार है... (रुप की गाल शर्म से लाल हो जाते हैं)
रुप - तुम चाहते हो... मैं राजगड़ आऊँ...
विश्व - क्यूँ मैंने भी तो आपकी हुकुम बजाया था... आपकी घर आकर...
रुप - ह्म्म्म्म... ठीक है... तो हम ज़रूर आयेंगे...
विश्व - कब...
रुप - बता देंगे बता देंगे... अब से आप सब्र पालें...

कह कर रुप फोन काट देती है और मन ही मन मुस्कराते हुए अपना सिर स्टियरिंग पर रख देती है l तभी उसे पीछे से गाड़ियों की हार्न सुनाई देती है l रुप अपनी जीभ दांतों तले दबा कर गाड़ी स्टार्ट कर निकल जाती है

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एक कुर्सी पर विश्व फैला हुआ था, एक पैर जमीन पर और दुसरा पैर टेबल पर था l बात ख़तम होते ही मुस्कराते हुए कान से फोन निकाल कर टेबल पर रख देता है l तभी कमरे में मायूस चेहरे के साथ टीलु अंदर आता है l उसका लटका हुआ चेहरा देखकर विश्व उससे सवाल करता है

विश्व - क्या हुआ.. यह चेहरा क्यूँ लटका हुआ है...
टीलु - सात दिन हो गए...
विश्व - तो...
टीलु - जब से साले यह दो पुलिस वाले हमारे इर्द गिर्द भिनभिना रहे हैं... तब से बच्चे भी नहीं आ रहे हैं...
विश्व - पहली बात... वे छोटे रैंक के ईमानदार पुलिस वाले हैं... इसलिए उन्हें गाली मत दो...
टीलु - तुम्हें कैसे मालुम... के यह दोनों ईमानदार हैं...
विश्व - यह लोग पहले अर्दली थे... उसके बाद हेल्पर कांस्टेबल बने हैं... अभी प्रोवेशन में हैं... इसलिए सौ फीसदी ईमानदारी बरत रहे हैं...
टीलु - अच्छा... पर भाई यह बात कुछ हजम नहीं हुई... अनिकेत रोणा... हमारे लिए ईमानदार लोगों को लगाया है...
विश्व - क्यूंकि... रोणा को... बिकने वालों पर भरोसा नहीं है... हमारी सारी ख़बरें और जानकारी ईमानदारी से जो बता दे... उन्हीं को उसने ड्यूटी पर लगाया है...
टीलु - हाँ... तभी मैं सोचूँ... उनका नाम भी ईमानदारों वाला क्यूँ लग रहा है...
विश्व - नाम से भी ईमानदारी पहचानी जा सकती है... यह मैं नहीं जानता...
टीलु - हाँ भाई... एक का नाम हरिश्चंद्र बल है... और दुसरे का नाम जगन्नाथ महाकूड़ है... है ना ईमानदारी वाला नाम...

विश्व सब सुन कर अपना चेहरा घुमा लेता है l यह देख कर टीलु मुहँ बनाता है l टीलु बाहर जा कर थोड़ा झाँकता है फिर अंदर आकर विश्व से

टीलु - भाई...
विश्व - ह्म्म्म्म...
टीलु - हम सात दिनों से... एक तरह से नजर बंद हैं... कहीं जा भी नहीं पा रहे हैं...
विश्व - क्यूँ झूठ बोल रहे हो... रोज दीदी के यहाँ जा रहे हैं... गले तक ठूँस ठूँस कर आ रहे हैं...
टीलु - मैं राजगड़ अंदर की बात नहीं कर रहा हूँ...
विश्व - फ़िलहाल ऐसा कुछ सोचना भी नहीं... हमारी छोटी सी हरकत... दूसरों पर आफत बन सकती है... (बात घुमाने के लिए) वैसे... बच्चे कहाँ तक लाठी घुमाना सीखे...
टीलु - पूरा सीख लिए हैं... पर स्पीड नहीं है...
विश्व - कोई ना... अगली मुलाकात में देखना... उनकी लाठी घुमाना बहुत जबरदस्त हो चुका होगा...
टीलु - भाई... तुम बात टाल रहे हो... हमारा यश पुर जाने का टाइम नजदीक आ रहा है...
विश्व - (चेयर पर सीधा होकर बैठ जाता है) क्या मतलब...

टीलु अपनी अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाल कर विश्व को देता है l विश्व काग़ज़ को खोल कर उसमें लिखे शब्दों को पढ़ने लगता है l पढ़ते ही उसकी आँखों में एक चमक छा जाती है l फिर टीलु की ओर देखता है

टीलु - हाँ भाई... तुम तो जानते हो.. सात दिनों से मैं सुबह सुबह यशपुर में अपने दोस्तों की हालचाल जानने और दीदी की दुकान के लिए कुछ सामान लेने चला जाया करता था... पर तुम्हारे मना करने के बावजूद... मैं रोज न्यूज पेपर पढ़ कर... उस अंजान आदमी की मेसेज को डी कोड किया करता था... उसने इस बार तुमसे मिलने की इच्छा जतायी है... कैसे और कब लेटर में साफ लिखा है....
विश्व - मैं जानता था... तुम शांत बिल्कुल नहीं रह सकते थे... कुछ ना कुछ उल्टा सीधा करोगे...
टीलु - भरोसा रखो विश्वा भाई... मेरी इस हरकत के बारे में... रोणा जानता नहीं है... अब सवाल है... हम राजगड़ से निकल कर... यशपुर जाएं तो जाएं कैसे...

विश्व चेयर से उठ खड़ा होता है l कमरे में थोड़ा टहल लेने के बाद टीलु से कहता है

विश्व - यह दो सिपाही... हमारे साथ क्यूँ हैं...
टीलु - तुम्हारी हिफाज़त के लिए... और तुम्हारी हर पल की रिपोर्ट रोणा को देने के लिए...
विश्व - (कुछ देर के लिए सोच में पड़ जाता है) अच्छा क्या तुम दस बारह लोग... जुगाड़ कर सकते हो... अपने टाइप के... काम थोड़ा मुश्किल भरा हो सकता है...
टीलु - क्या... मेरा मतलब है.. कब तक...
विश्व - कल तक... परसों के लिए...
टीलु - हाँ... सीलु भाई आज रात तक... कुछ बंदों को बुला लेंगे...
विश्व - तो फिर चलो... हम रोणा तक खबर पहुँचा ही देते हैं...
टीलु - (चौंक कर) क्या... यह क्या कह रहे हो भाई... फिर तो वह अनजाना शख्स कौन है... और हमारी क्या मदत करना चाहता है... हम कभी जान नहीं पाएंगे...
विश्व - मैंने सिर्फ इतना कहा... रोणा जो जानना चाहता है... हम उस तक खबर इन्हीं कांस्टेबलों के जरिए पहुँचाएँगे...
टीलु - एक मिनट... तुम खुल कर समझाओ भाई...
विश्व - खबर कुछ ऐसे पहुँचाओ... के उन्हें लगे के उन लोगों ने कोई बड़ा तीर मार लिया हो... और पुरी खबर जानने या निकालने के लिए... रोणा हमें खुद यशपुर ले जाएगा... (टीलु की आँखे चमकने लगती है)
टीलु - समझ गया भाई... पर हमारे एक्शन के लिए... टेढ़े लोगों की जरूरत पड़ेगी... मतलब हमारी गैंग की...
विश्व - इसी लिए तो पुछा था
टीलु - ओ... फ़िकर नोट... बुला लेंगे...
विश्व - ठीक है... अब एक्शन के लिए... पहले हमारी गैंग को बुलावा भेजो... एक्शन के दिन से पहले पहुँच जाएंगे...
टीलु - ठीक है भाई... सब समझ गया... अभी जाता हूँ... उन दो कांस्टेबलों को शीशे में उतारता हूँ...

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रंग महल के परिसर के गोल्फ कोर्स में भैरव सिंह गोल्फ क्लब से एक स्ट्रोक लेता है l पास खड़े एक नौकर बॉल लाने के लिए भाग जाता है l भैरव सिंह आकर छत्री के नीचे लगे चेयर पर बैठ जाता है और पैरों को टी पोए पर टिका देता है l तभी भीमा आता है l

भीमा - हुकुम...
भैरव सिंह - भीमा... कोई आया है क्या...
भीमा - जी हुकुम.. दरोगा और वकील... आपसे मिलने की इजाज़त मांग रहे हैं...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... ठीक है भेज देना... (भीमा जाने लगता है) एक मिनट रुको... (भीमा रुक जाता है) भीमा...
भीमा - जी हुकुम...
भैरव सिंह - तुम्हारे लाव लश्कर... अब कहाँ हैं...
भीमा - हुकुम... अपना मुहँ छुपाये... छुपे हुए हैं...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... एक काम करो... उन्हें कहो... अखाड़े में फिर से लग जाएं... विश्वा से टकराने के बाद... उन्हें एहसास तो हो गया होगा... उनसे चूक कहाँ पर हुई है...
भीमा - जी हुकुम...
भैरव सिंह - अब उन्हें तैयार करो... एक जबरदस्त मुकाबले के लिए... और हाँ... उनकी बहुत जल्द... विश्वा से टकराव हो सकता है... उसके लिए तैयारी करने के लिए बोलो... क्यूँकी अगला मुठभेड़.... या तो उनके लिए... या फिर विश्व के लिए... आखिरी मुठभेड़ होनी चाहिए...
भीमा - जी... जी हुकुम...
भैरव सिंह - अब जाओ उन दोनों को भेजो...
भीमा - जी हुकुम..

कह कर भीमा वहाँ से चला जाता है l तब तक नौकर भागते हुए अपनी हाथ में गोल्फ बॉल लेकर पहुँचता है और ड्राइवर पर बॉल को सेट करता है l भैरव सिंह अपना क्लब निकाल कर शॉट लेने को होता है कि बल्लभ और रोणा पहुँचते हैं l भैरव सिंह रुक जाता है

भैरव सिंह - आओ... आओ... दरोगा... आओ... (रोणा और बल्लभ एक दुसरे को ताकने लगते हैं) आओ दरोगा... रुक क्यूँ गए... यह रहा बॉल... एक शॉट मेरे क्लब से मारो... (बेवक़ूफ़ की तरह रोणा कभी बल्लभ को कभी भैरव सिंह को देखने लगता है) ओह... कॉम ऑन... यह लो...

कह कर अपना क्लब रोणा की
बढ़ाता है, रोणा असमंजस सा भैरव सिंह के पास चलते हुए आता है, भैरव सिंह अपना गोल्फ क्लब को रोणा के हाथ में देता है l रोणा पोजीशन लेता है और एक शॉट खेलता है बॉल दुर जाकर गिरता है l भैरव सिंह चुटकी बजाता है तो नौकर बॉल को वापस लाने भाग जाता है l

भैरव सिंह - कप कहाँ है... तुम्हारा शॉट कहाँ है... सबसे ऊपर तुम्हारा ध्यान कहाँ है... (रोणा का सिर झुक जाता है) हम क्या समझे दरोगा... तुमसे हो पाएगा या नहीं...
रोणा - जी इसी विषय पर आपसे बात करने आए हैं...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... (अपनी जगह पर बैठ कर) क्या बात करने आए हो...

रोणा बल्लभ से एक न्यूज पेपर लेकर भैरव सिंह के सामने टी पोय पर रख देता है l भैरव सिंह पेपर उठा कर पेपर देखने लगता है l फिर पेपर को एक किनारे पर रख कर रोणा की ओर देख कर

भैरव सिंह - क्या मतलब है इसका...
रोणा - केस... के लिए... नया एसआईटी बनने वाला है...
भैरव सिंह - तो...
रोणा - श्रीधर परीड़ा... गायब है...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म तो...
बल्लभ - राजा साहब... मैं कुछ कहूँ...
भैरव सिंह - हाँ कहो...
बल्लभ - इस वक़्त अगर विश्व के खिलाफ कुछ किया गया... तो केस हमारे हाथ से निकल सकता है...
भैरव सिंह - सीधे सीधे बको... पहेलियाँ मत बुझाओ...
बल्लभ - राजा साहब... हर न्यूज में... विश्व को हीरो की तरह प्रेजेंट किया गया है... बहुत बढ़ा चढ़ा कर लिखा गया है... ऐसे में.. विश्व को कुछ हुआ तो...

भैरव सिंह अपनी जगह से उठता है और दोनों के सामने खड़ा होता है l बल्लभ का जबड़ा पकड़ कर गोल गोल घुमाते हुए

भैरव सिंह - हम राजा हैं... तुझे पाल इसलिए रहे हैं... के तु सोचे... अपना दिमाग खपाये... और इसे.. (रोणा की ओर देखते हुए) पाल इसलिए रहे हैं... यह कर गुजर जाए... (बल्लभ का जबड़ा छोड़कर) अब अगर तुम दोनों का काम हमें ही करना है... तो... जरा सोच के बताओ... हमें तुम दोनों की कोई जरूरत है भी या नहीं...

दोनों के चेहरे पर खौफ छा जाती है l डर के मारे दोनों के चेहरे सफेद हो जाता है l भैरव सिंह अपनी कुर्सी पर वापस बैठ कर

भैरव सिंह - हाँ तो क्षेत्रपाल रियासत के दो रत्न.. बताओ... तुम लोगों के काम... किसी और को दिया जाए... या...
रोणा - नहीं राजा साहब... आप ने जो काम दिया है... वह अब ख़तम कर ही वापस आयेंगे...
भैरव सिंह - बहुत अच्छे.. जल्दी से काम पर लग जाओ... ताकि हमें यह मालुम रहे की हमारे काम में तुम लोग मसरूफ हो... ताकि तुम्हारे काम को ना तो हमें अपनी हाथों में लेनी पड़े... ना ही किसी और को देनी पड़े...
बल्लभ - जी राजा साहब...
भैरव सिंह - अब जाओ यहाँ से...

बल्लभ और रोणा बिना पीछे देखे वापस चल देते हैं l दोनों बाहर आकर रोणा के जीप में बैठ जाते हैं l रोणा तेजी से गाड़ी मोड़ कर अपने क्वाटर की ओर जाने लगता है l


रोणा - कभी कभी लगता है... यह राजा साहब ही पागल है...
बल्लभ - वह नहीं... हम पागल हैं... और हाँ... राजा साहब पर गुस्सा इसी गाड़ी में ही रख कर... उतरते वक़्त थूक देना... वर्ना... यह राजगड़ है... हवाओं के कान होते हैं...


रोणा चुप हो जाता है, गाड़ी निरंतर चलाने के बाद अपनी क्वार्टर के पास गाड़ी रोकता है पर गाड़ी से उतरता नहीं है और अपनी हाथ को स्टीयरिंग पर दो तीन बार अपने हाथ से मारने लगता है l

बल्लभ - शांत... क्यूँ गुस्सा कर रहा है...
रोणा - सात दिन से... सिपाही लगाए हैं... पर विश्वा कहीं जाता नहीं है... क्या कर रहा है... कुछ मालुम भी नहीं हो रहा है... और ऊपर से... यह साले न्यूज वाले... उसे हीरो बना कर.. हमारा काम मुश्किल कर रहे हैं... और यह राजा साहब... बात की गहराई को समझने के लिए तैयार नहीं है... साले काले कोट वाले... तुझे साथ लेकर गया था... ताकि राजा साहब को तु समझा पाए... पर तेरे से वह भी नहीं हुआ...
बल्लभ - हाँ नहीं हुआ... (कह कर गाड़ी से उतर जाता है) पर राजा साहब ने गलत क्या कहा है बोल... हम उनके फेंके हुए टुकड़ों पर इसी लिए तो पल रहे हैं... ताकि उन्हें सोचना ना पड़े... और करना ना पड़े... सोचने के लिए... मुझे पैसे मिलते हैं... और कर गुजरने के लिए तुझे...
रोणा - (गाड़ी से उतर कर) खूब अच्छा सोचा है तुने... तेरे कहने पर... आदमी लगाए हैं... और वह साला हरामी... सात दिन से खा पी कर अजगर की तरह डकार मार रहा है... पर हिल नहीं रहा...
बल्लभ - पहले भी कहा था तुझे... सब्र कर... उतावला मत हो... विश्वा कोई ना कोई गलती करेगा... जरा सोच... अब तक तुने उसके हाथ पैर बाँध रखा है... जैसे ही हरकत करेगा... तब तु उसे ख़तम कर देना... और तब रिपोर्ट में लिख देना... भाग रहा था... पैर पर गोली चला रहा था... गलती से गोली... पीठ पर लग गई....

इतना सुनने के बाद रोणा थोड़ा शांत हो जाता है l बल्लभ की कही बातों को समझने के अंदाज में अपना सिर हिला कर सहमती देता है l

रोणा - ठीक कह रहा है... मैं थोड़ा उतावला हो जाता हूँ... अब तक किस्मत ने विश्व के साथ दिया है... पर कब तक... अपनी भी बारी आएगी... तब साले को कुत्ते की मौत मारूंगा... कसम से... गालियों में दौड़ा दौड़ा कर मरूंगा... (बल्लभ से) चल अंदर आजा... मिलकर कुछ सोचते हैं...

दोनों क्वार्टर के अंदर जाने लगते हैं कि तभी रोणा की मोबाइल बजने लगती है l अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर देखता है स्क्रीन पर टोनी डिस्प्ले हो रहा था l टोनी का नाम देखते ही रोणा की भवें तन जाती हैं l कमरे में सोफ़े पर बैठते हुए बल्लभ रोणा की हालत देखता है l

बल्लभ - क्या हुआ किसका फोन है...
रोणा - लगता है... किस्मत पलटने वाली है... अगर यह कॉल मेरे मतलब कि हुई... तो समझ लो... विश्वा की बर्बादी शुरु होने वाली है...
बल्लभ - अच्छा यह बात है... तो फिर कॉल को स्पीकर पर डाल... (रोणा वही करता और कॉल लिफ्ट करता है)
रोणा - हैलो...
टोनी - हैलो... रोणा सर...
रोणा - बोल टोनी... उर्फ लेनिन...
टोनी - लेनिन... मेरा पास्ट है... टोनी... मेरा प्रेजेंट... अब वक़्त आ गया है... टोनी को पास्ट करने का...
रोणा - ह्म्म्म्म... मतलब लड़की के बारे में... बहुत कुछ पता कर लिया है...
टोनी - नहीं... बहुत कुछ नहीं... पर तुम्हारे मतलब कि जितनी होनी चाहिए... पता कर लिया है...
रोणा - क्या पता किया है...
टोनी - इतनी जल्दी भी क्या है... पहले यह बताइए... मेरे काम का क्या हुआ... मेरी नई आइडेंटिटी...
रोणा - हो गया है... मैंने तुम्हारे लिए... नई आधार कार्ड... और वोटर आईडी कार्ड जुगाड़ कर दिया है...
टोनी - तो ठीक है... सुनिए... बहुत जल्द विश्व से मिलने वह नंदिनी... राजगड़ जाने वाली है.. और विश्व के दीदी के पास ठहरने वाली है...
रोणा - (इतना सुनते ही आँखे किसी शिकारी की तरह चमकने लगते हैं) कब...
टोनी - बहुत जल्द...
रोणा - मैं कैसे मान लूँ... तुझे यह सब कैसे मालुम हुआ...
टोनी - हा हा हा हा... रोणा बाबु... विश्वा चालाक सही... पर मैं भी कुछ कम नहीं... आज सुबह ही मेरे आदमी ने नंदिनी के मोबाइल फोन में... मेमोरी कार्ड वाली जगह पर बग फिक्स किया है... अब तोता मैना दोनों जो भी बातेँ करेंगे... मुझे मालुम हो जाएगा... बस इतना जान लीजिए... लड़की के इर्द-गिर्द विश्वा के आदमी बिछे हुए हैं...
रोणा - क्या बात कर रहा है... तुने तो बहुत बड़ा काम कर दिया है...
टोनी - तो बोलिए... अपना नया पहचान लेने कब आऊँ...
रोणा - जब लड़की मेरे हाथ लग जाएगी...
टोनी - ऐसी कोई डील नहीं हुई थी...
रोणा - देख टोनी... नया आईडी लेकर तु निकल गया... और कहीं मैं फंस गया.. तो... वैसे भी... अभी अभी जो तुने कहा है... क्या ग्यारंटी है... वह सब सच ही है...
टोनी - अभी रिकार्डिंग भेज देता हूँ...
रोणा - चल भेज...
टोनी - भेज दूँगा.. भेज दूँगा... पर आपकी डील पर... अपनी भी एक डील है...
रोणा - हाँ बोल...
टोनी - अगर लड़की सच में राजगड़ जाती है... तो उसे बीच रास्ते से मैं उठा लूँगा... आपको डायरेक्ट डेलिवेरी देकर अपनी नई पहचान ले लूँगा...
रोणा - यह हुई ना... कमीनों वाली डील... मंजुर है... एक हाथ लड़की देगा... दुसरे हाथ अपने लिए नई आईडी लेगा...
टोनी - डील...
रोणा - अब भेज वह कंवरसेशन...

टोनी फोन काट देता है और रुप और विश्व के बीच हुई बातचीत का रिकार्डिंग व्हाट्सएप पर भेज देता है l रोणा और बल्लभ दोनों वह कंवरसेशन सुनने लगते हैं l सब सुनने के बाद जहां रोणा बहुत खुश होता है वहीँ बल्लभ कुछ सोच में पड़ जाता है l

रोणा - देखा वकील... अब किस्मत हमारा साथ देने लगी है... और विश्वा की लेने लगी है... क्या सोचने लगा है वकील...
बल्लभ - पहली बात... जहां तक मुझे भान हो रहा है... वह लड़की कोई मामूली लड़की नहीं है... दुसरी बात... जैसा कि टोनी ने कहा... उस लड़की के चारों तरफ... विश्वा के आदमी बिछे हुए हैं... (कहते कहते चुप हो जाता है, फिर अचानक रोणा से कहता है) एक बात कहूँ...
रोणा - क्या...
बल्लभ - क्यूँ ना लड़की के बारे में... हम जितना जानते हैं... वह सब हम राजा साहब को बता दें... एक बार विश्व की कमजोरी राजा साहब के हाथ में आ गई... तो विश्वा कुत्ता बन कर राजा साहब के जुते चाटने आएगा... (रोणा चुप रहता है) क्या हुआ... मेरी बात तुझे पसंद नहीं आई...
रोणा - नहीं... नहीं आई पसंद..
बल्लभ - क्यूँ... क्या गलत कह दिया... मत भुल... उस लड़की को... मैंने राजकुमार की सगाई वाले दिन देखा था... मतलब वह कोई मामुली हस्ती की बेटी नहीं होगी... कुछ ऊँच नीच हो गई... तो फिर राजा साहब के पास भागना पड़ेगा...
रोणा - जो होना वह होगा... पर उस लड़की के बारे में... राजा साहब अभी नहीं... उसकी चुत में.. अपना लौड़ा गाड़ने के बाद हो खबर करूँगा... मुझे कोई मतलब नहीं है... वह लड़की कौन है.. किसकी है... (अपनी गाल पर हाथ फेरते हुए) मुझे बस इतना मालुम है... मुझे उसकी लेनी है... वह भी विश्वा के सामने...
बल्लभ - (गुस्से में खड़े होकर) राजा साहब को खबर करने से... तुझे प्रॉब्लम क्या है....
रोणा - (गुस्से में तमतमा कर खड़ा होता है) हाँ प्रॉब्लम है... राजा साहब को कह देने से.. वह लड़की को उठा लेंगे... अपनी रंडी बनाएंगे... फिर जब मन भर जाएगा... तब अपनी झूठन को हमारी ओर फेंक देंगे... इसे तो मैं अपनी पर्सनल रंडी बनाऊँगा... विश्वा को अंजाम तक पहुँचाने के बाद... राजा साहब मुझे रंग महल दे देंगे... मैं मरते दम तक... उस लड़की के साथ ऐस करता रहूँगा...
बल्लभ - पागल हो गया है तु...
रोणा - देख... राजा साहब को... विश्व को बर्बादी चाहिए... मैं वही कर रहा हूँ...
बल्लभ - ठीक है... तेरे इस प्लान में मैं नहीं हूँ... घबरा मत... तेरे इस प्लान के बारे में किसी से नहीं कहूँगा... क्यूँकी जब तेरा यह प्लान बैक फायर करेगा... तब तो तु मेरे पास आएगा ही... चलता हूँ... बेस्ट ऑफ लक...

इतना कह कर रोणा को वहीँ छोड़ कर बल्लभ चल देता है l रोणा अपने मन में बल्लभ को गालियाँ बकते हुए चेयर पर बैठ जाता है l बल्लभ के जाने के कुछ पल के बाद रोणा के क्वार्टर की डोर बेल बजती है, रोणा अपनी जगह से उठने के बजाय चिल्लाते हुए कहता है

- कौन है... अंदर आ जाओ...

कमरे में एक कांस्टेबल अंदर आता है, एक जोरदार सैल्यूट मारने के बाद कहता है

- कांस्टेबल जगन्नाथ महाकुड़ रिपोर्टिंग सर...
रोणा - अरे जगन्नाथ... तुम इस वक़्त... लगता है कोई जरूरी खबर है...
जगन्नाथ - जी... सर... एक बहुत ही खास खबर है सर... विश्व के बारे में... और उसके अगले मूवमेंट के बारे में...

इतना सुनते ही रोणा के कान खड़े हो जाते हैं, चेयर पर सीधा बैठ जाता है और जगन्नाथ से कहने के लिए कहता है l जगन्नाथ कहता है कि कोई यशपुर में है,जो विश्व को न्यूज पेपर के जरिए कुछ ना कुछ ख़बरें भेजता रहता है l उसके आधार पर विश्व अपने काम को अंजाम देता रहता है l अब शायद आगे कुछ खास करने वाले हैं इस लिए वह दो दिन बाद विश्व से मिलने के लिए कह दिया है l सब सुनने के बाद

रोणा - कैसे मिलेंगे... इस बाबत कोई जानकारी...
जगन्नाथ - जी नहीं सर...
रोणा - ठीक है... तुमने बहुत अच्छा काम किया है... जाओ इस पर तुम एक ऑफिसीयल रिपोर्ट बनाओ... और मेरे पास डीपोजीट करो...
जगन्नाथ - जी सर... (कह कर सैल्यूट मारता है, और वापस जाने को होता है कि फिर मुड़ कर) सर परसों हमे क्या करना होगा... अगर विश्व बाहर गए... तो क्या हम उनके साथ जाएंगे...
रोणा - (मुस्कराते हुए अपनी जगह से उठता है और जगन्नाथ के यूनीफॉर्म के बटन पर हाथ फेरते हुए) जगन्नाथ जी... आपको विश्व के घर के बाहर ड्यूटी लगाया गया है... आप बस उतना ही कीजिए... आगे क्या करना है... वह हम देख लेंगे... समझे कुछ...
जगन्नाथ - जी... जी सर..
रोणा - गुड... नाउ यु मे लिव...


Gazab ki update he Kala Nag Bhai,

Vishwa ne nandini ke aaspas apne aadmi to plant kiye huye the....lekin is bar bazi lenin/toni ne maar li............nandini ke mobile me bug fix kar diya he.................

Ballabh kitna bhi samjha le Rona nahi manane wala he.......nandini ke bare me raja ko nahi batayega.....................vinash kale viprit budhdhi................... Rona jayada din ka mehman nahi he ab.....apne sath sath lenin/toni aur ballabh ki bhi bali chdwayega ye........

Keep posting Bhai
 

RAAZ

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👉एक सौ उनचालीसवां अपडेट
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दरवाजे पर बहुत जोर से दस्तक हो रही थी l ऐसा लग रहा था जैसे कोई दरवाजा तोड़ ही देगा l चिढ़ कर अपने बिस्तर पर बैठता है बल्लभ l रात भर ठीक से सोया नहीं था इसलिए चिल्लाता है

बल्लभ - आ.. आह... अबे कौन है बे... दरवाजा तोड़ना है क्या...

बेकार था बल्लभ का चिल्लाना, दरवाजे पर अभी भी दस्तक हो रहा था l चिढ़ कर अपना बिस्तर छोड़ कर तेजी से दरवाजे की ओर जाता है और दरवाजे को खोलता है l सामने रोणा खड़ा था l

बल्लभ - ओह... तु... बे हराम के ढक्कन... दरवाजा क्यूँ तोड़ रहा है.. यह.... (कॉलिंग बेल बजाते हुए) यह काम कर रहा है ना...
रोणा - साले... बेल बजा बजा कर... उंगली दुख गया है... दरवाजा तोड़ुँ नहीं तो क्या करूँ... कल रात को ही जब पहुँच गया था... तो खबर क्यूँ नहीं की... बड़ी देर तक जब दरवाजा नहीं खोला... तो सोचने लगा था... कहीं शर्म से... मर वर तो नहीं गया...
बल्लभ - ओह... नहीं.. ठीक है... बोल इतनी सुबह सुबह क्या करने आया है...
रोणा - अबे भुतनी के... दरवाजे पर खड़े खड़े पूछेगा क्या...
बल्लभ - ओह... सॉरी... आजा...

दरवाजे से हट जाता है l दोनों अंदर आते हैं और एल सोफ़े पर बैठ जाते हैं l बल्लभ को उबासी लेते देख रोणा बल्लभ से कहता है l


रोणा - चल जा... कम से कम मुहँ धो के आ... ताजा होले.. फिर बात करते हैं...

बल्लभ चला जाता है और अपना मुहँ पर पानी मार कर ग़मछे से चेहरा साफ करते हुए आता है, और रोणा के पास बैठ जाता है l रोणा अपनी जेब से एक रुमाल निकाल कर बल्लभ को देता है l बल्लभ हैरानी से रोणा की ओर देखता है तो रोणा अपना चेहरा थोड़ा सीरियस बना कर कहता है l

रोणा - ठीक से साफ कर... कालिख अभी भी नहीं धुला है..
बल्लभ - (उसी रुमाल को रोणा के उपर फेंकते हुए) साले हरामी... तु सुबह सुबह ताने मारने आया है...
रोणा - (हँसते हुए) देख मैं कई बार... विश्व से ठुका... पर तु कभी नहीं ठुका... आज तेरा यह चेहरा देखकर मुझे खुशी इस बात की हो रही है कि तु अब मेरे बराबर हो गया... हा हा हा...
बल्लभ - हाँ साले.. उड़ा ले.. मेरा मज़ाक.. आज तेरा टाइम है...
रोणा - पर तेरी यह गत बनेगी... राजा साहब को आभास हो गया था... कैसे... और राजा साहब तुझे वहाँ छोड़ कर क्यूँ आ गए...

बल्लभ का चेहरा थोड़ा सख्त हो जाता है, थोड़ी देर के लिए वह चुप हो जाता है फिर एक गहरी साँस छोड़ते हुए बल्लभ कहना शुरु करता है l

बल्लभ - जब राजा साहब को मालुम हुआ... विश्वा ने वकालत की डिग्री हासिल कर ली है... और तेरी अच्छे से बैंड बजाया है... तब राजा साहब को मालुम हो गया... विश्वा जरुर गड़े मुर्दे उखाड़ने की कोशिश करेगा... इसलिए उसकी काबिलियत परखने के लिए... राजा साहब ने यह सब किया...
पहली बात... केके की जगह वह निर्मल सामल को लाना चाहते थे... इस दौरान वह जोडार का... पिटीशन... जिससे ESS तो छूट गया... पर केके फंस गया... और इन सबके पीछे... अप्रत्यक्ष विश्वा ही था... क्यूँकी पारादीप शिप यार्ड गोडाउन की इंक्वायरी करने गया था... दुसरी बात... विश्वा जैल से रिहा होते ही... जोडार ग्रुप की लीगल एडवाइजर बन गया... और तीसरी बात... तु और मैं... हम दोनों... उसकी सच्चाइ निकालने में असमर्थ रहे...
रोणा - ह्म्म्म्म तो... तो इससे क्या जाहिर होता है...
बल्लभ - अबे बैल बुद्धि... जरा दिमाग पर जोर दे... विश्वा जितना दिखता है... उससे कहीं ज्यादा... वह छुपा हुआ है...
रोणा - क्या मतलब...
बल्लभ - जंग जितने के लिए... दुश्मन की... पूरी ताकत का अंदाजा होनी चाहिए... इस मामले में... हम सभी... अंधेरे में हैं... (रोणा चुप रहता है) मैं रात भर यही सोचता रहा... और यही समझ गया... विश्वा ने हमारे खिलाफ कई सालों पहले से ही... जाल बिछाया रखा है... यानी उसकी... इंफॉर्मेशन नेटवर्क... बहुत ही तगड़ी है... वह हम से जीत इसलिए पा रहा है... क्यूंकि हमारे खिलाफ उसकी तैयारी मुकम्मल है... और हमारी आधी अधुरी...

इतना कह कर बल्लभ चुप हो जाता है l रोणा भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देता l दोनों के बीच खामोशी का दौर कुछ पल के लिए चलता है, फिर अपना खामोशी तोड़ कर बल्लभ कहना शुरु करता है l

बल्लभ - राजा साहब के माथे पर आखिर शिकन ला कर विश्वा ने दिखा दिया... कोई तो है... जो राजा साहब की हुकूमत को ललकार सकता है...
रोणा - (भड़क कर) मैं जब कह रहा था... तब तो सालों मुझे रोक दिया... मारने नहीं दिया... अब जब चिड़िया खेत चुग रही है... हम सब दोनों हाथों को लंड पर रख कर बचाने के लिए इधर उधर भाग रहे हैं... कहीं चिड़िया लंड के साथ साथ गोटे ना ले उड़े...
बल्लभ - तु अपना यह पुराण बंद कर... तब हम सब सही थे... भूल मत.... अगर विश्वा गायब हो गया होता... तो जाँच का दायरा स्टेट के हाथ से निकल कर... सेंट्रल एजेंसी के हाथों में होती... हाँ इतना ज़रूर कह सकते हैं... परफेक्ट प्लान था... पर हमने आदमी गलत चुन लिया था... पर क्या करें... हालात भी कुछ ऐसे ही थे... (इस बार बल्लभ कुछ नहीं कहता) और एक गलती यह भी हुआ... जब विश्वा कुछ भी नहीं था... तब उसने राजगड़ में आवाज उठाई थी... इसलिए हमें उस पर नज़र रखनी चाहिए थी... जो कि हमने नहीं की... उसकी कीमत अब हम ऐसे भर रहे हैं...
रोणा - साले हरामी... मेरे सामने मेरी बजा कर लेने वाले की तारीफ कर रहा है...
बल्लभ - तारीफ नहीं... हकीकत... आज हकीकत को अगर हम स्वीकर कर लेंगे... तो उसे ख़तम करने की तैयारी कर सकेंगे...
रोणा - (बल्लभ का मज़ाक बनाते हुए) अच्छा... तो तु विश्वा को पढ़ रहा है...
बल्लभ - हाँ... अगर विश्वा को मैं पढ़ लूँगा... तब जाकर... उसे हरा पाऊँगा...
रोणा - अच्छा... क्या क्या पढ़ा तुने...
बल्लभ - यही की... फ़िलहाल वह हमसे बेहतर है... याद है... एक बार तुने ही मुझसे कहा था.. जहाँ हमारी सोच में फूल स्टॉप लगती है... विश्वा के लिए वह एक कॉमा होती है... विश्वा उसके आगे की सोचता है....(बल्लभ की इस बात पर रोणा थोड़ी सोच में पड़ जाता है) हाँ अनिकेत बाबु हाँ... मैं तुम्हारी उस बात को कंफर्म कर रहा हूँ... कानून के किताब की हर एक पन्ने पर... अपनी जीत को देख रहा था... पर उसने वह चाल चली की... कानून बेबस हो गया... आस्था के आगे हमेशा व्यवस्था हारती है... उसने मुझे हरा दिया... यह स्वीकारते हुए... मुझे कोई हिचक नहीं है... जरा सोच रोणा... जरा सोच... जब से वह जैल से निकला... हम उसे वही पुराना वाला विश्व समझ कर ढूंढने निकले थे... पर वह कितनी आसानी से हमे छका दिया... (यह सुनते ही रोणा की जबड़े सख्त हो जाते हैं, बल्लभ कहना चालू रखता है) सत्तर सालों में... किसीने राज परिवार पर आँख उठाने की जुर्रत नहीं की... हम सब इसी कंफर्ट जोन में रह कर सोचते रहे... विश्वा इसी सोच पर प्रहार किया... उसके पास एक परफेक्ट टीम है... नेटवर्क है... जो कि हमारे पास नहीं है... सच बात तो यह है कि... हमने बनाने की... कभी सोची ही नहीं... इसलिए वह हर बार... हम पर भारी पड़ा... विश्वा के खिलाफ हमारी हर कहानी में... हर करतूत में... हर हरकत में... बस एक किरदार बन कर रह गए... जबकि वह उस कहानी में खिलाड़ी बन गया... जो हर किरदार को अपने हिसाब से चलाया... मैंने और छोटे राजाजी ने हर तिकड़म आजमाए... राजकुमार जी की महबूबा को अगवा करवाया... पर विश्वा की सूझबूझ ने... लड़की को भुवनेश्वर से दुर भी ना ले जा सके... और जहां रखवाया था... वहाँ दिन के उजाले में... पुलिस तक नहीं जाती... विश्वा ने उसे रात की अंधेरे में ढूँढ निकाला... और तो और... शासन प्रशासन तक को खबर नहीं थी... की लड़की मिल चुकी है... ठीक पार्टी में लकड़ी सामने आई... और मजे की बात तो यह है... तब तक... उस बस्ती में... पुलिस घुसी तक नहीं थी सिवाय... घेरा बंदी के... कितना परफेक्ट है... वह अपने काम में की सिस्टम तक अंधेरे में रही...

इतना कह कर बल्लभ चुप हो गया l कहीं ना कहीं रोणा का बल्लभ की बातों का मूक समर्थन मिल रहा था l चुप्पी तोड़ते हुए रोणा कहता है l

रोणा - बहुत कड़वी बात कही है तुने... बहुत ही कड़वी बात... पर सच कहा... उसके टार्गेट में हम हैं... इसलिए प्लान उसकी... टीम उसकी... और रिजल्ट भी उसके मन माफिक... हमारे टार्गेट में भले ही विश्व है... पर हमने उसके खिलाफ कोई टीम वर्क नहीं किया... इसलिए हमेशा मुहँ की खाते रहे.... (बल्लभ की ओर देख कर) तो अब... क्या करें..
बल्लभ - विश्व को हराना है... तो विश्व की चाल को हमें भी आजमाना पड़ेगा... हमें... अपनी भी एक टीम बनानी पड़ेगी... हमारी एक इंफॉर्मेशन नेटवर्क तैयार करना पड़ेगा... तब जाकर उसके हर चाल पर हम काउंटर दे सकेंगे...
रोणा - ह्म्म्म्म... जरा खुल कर बताओ...
बल्लभ - देख... विश्वा हमारे सभी आदमियों को... ऑल मोस्ट सबको पहचानता है... इसलिए हमें अपनी टीम बदलनी पड़ेगी... और उसके ही जाल में... हम उसे फंसायेंगे... और इसकी शुरुवात तेरे थाने से कर...
रोणा - मसलन...
बल्लभ - मसलन... दोनों भाई बहन ने... जान का खतरा बता कर... हाइकोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है... तेरे पास तो ऑर्डर भी आ गया होगा...
रोणा - हाँ... है मेरे पास ऑर्डर...
बल्लभ - तो तेरे थाने में... एक नई कांस्टेबलों की टीम को... हेड क्वार्टर से मंगा... इन्हें सेक्यूरिटी देने के लिए... पर वह टीम तेरी भरोसे वाली होनी चाहिए... तु उनके इर्द गिर्द ऑफिसीयाली अपने आदमियों को रख सकता है... इससे आसानी से विश्वा की पास रह कर उसकी हर चाल व हरकत पर नजर रखी जा सकती है...
रोणा - (आँखे खुशी के मारे चमकने लगतीं है) वाह... क्या बात कही तुने... इससे हम पता लगा लेंगे... वह किससे मिलता है... उसके टीम में कौन कौन है... अगर वह छिपाने में कामयाब भी रहा.. तब भी... वह कुछ करने लायक रहेगा ही नहीं...
बल्लभ - हाँ... शतरंज में उसके हिस्से की चालें वह चल चुका... अब हम अपने मोहरों से उसकी घेरा बंदी करेंगे... पर एक बात और... तु हर बात में... उतावला बहुत हो जाता है... इसलिए फ़िलहाल कुछ दिनों के लिए... विश्वा और उसकी बहन वैदेही से दुर ही रह...
रोणा - ठीक कहा तुने... मुझे हर बार... मेरे उतावले पन और लापरवाही ने फंसाया है... अब ऐसा नहीं होगा... चालें उसके हिस्से की वह चल चुका है... अब बारी हमारी है....

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द हैल
डायनिंग टेबल पर विक्रम शुभ्रा और रुप बैठे हुए हैं पर तीनों अपने सामने वाली खाली कुर्सी की ओर देख रहे थे l वह कुर्सी जिस पर कभी वीर बैठता था l तीनों ही खामोश थे l अचानक खामोशी को तोड़ते हुए

शुभ्रा - सोचा था... इस टेबल पर एक सदस्य की बढ़ोतरी होगी... पर अफ़सोस...
रुप - हाँ भाभी... इतना बड़ा घर पर...
विक्रम - पर है तो यह हैल ही ना... इस बात की खुशी मनाओ... के वह दोनों... अपनी पैराडाइज में हैं... और उन दोनों के लिए दुआ करो...

इतने में एक नौकर अंदर आता है और "हुकुम" कह कर सिर झुका कर खड़ा हो जाता है l

विक्रम - क्या हुआ...
नौकर - हुकुम... छोटे राजा जी आए हैं..
विक्रम - हाँ तो... उन्हें अंदर आने से रोका किसने...
नौकर - किसी ने नहीं हुकुम... मैंने उन्हें अंदर जाने के लिए कहा... पर उन्होंने साफ मना कर दिया... और कहा आपको उनसे मिलने बैठक में जाना होगा...
विक्रम - क्या... (हैरानी से कभी शुभ्रा और रुप की देखते हुए) वह अंदर नहीं आयेंगे...

विक्रम अपना हाथ साफ करते हुए अपनी जगह से उठता है l शुभ्रा और रुप भी उठते हैं l तीनों नौकर के पीछे पीछे बैठक हॉल की ओर चले जाते हैं l तीनों जब बैठक में पहुँचते हैं तो देखते हैं दीवार पर लगी भैरव सिंह की एक आदम कद बड़ी सी फोटो के सामने पिनाक खड़ा हुआ था l

विक्रम - यह क्या बात हुई... छोटे राजा जी... आप किसी गैर की तरह... अंदर जाने से मना कर दिया...
पिनाक - (शुभ्रा और रुप को देख कर) युवराज... हम यहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ आपसे बात करने आए हैं... बेहतर होगा... इस घर की औरतें... इन मामलों से दुर रहें...
रुप - किन मामलों से...
शुभ्रा - (रुप की हाथ पकड़ कर) श्श्श्श... नंदिनी...
पिनाक - राजकुमारी... अपनी हद में रहिए... मर्दों की बातों के बीच आप ना आए तो बेहतर होगा...

शुभ्रा खिंच कर रुप को वहाँ से ले जाती है l रुप के और शुभ्रा के जाने के बाद विक्रम पिनाक की ओर देखता है l

विक्रम - कोई खास बात...
पिनाक - नहीं... आप वहाँ पर मौजूद थे... आप तो सब जानते हैं... (विक्रम चुप रहता है) अपना खुन पलट गया... दिल दुखा है... पर हमें वह लड़की... और उसके साथ वीर सिंह का रिश्ता मंजुर नहीं...
विक्रम - मैं समझ सकता हूँ...
पिनाक - हम यहाँ आपसे हमदर्दी बटोरने नहीं आए हैं...
विक्रम - (चुप हो जाता है और पिनाक की ओर असमंजस सा देखने लगता है)
पिनाक - अब जब... वीर ने अपने नाम के आगे क्षेत्रपाल निकाल फेंका है... तो क्षेत्रपाल वाली कोई भी सहुलतें मिलनी नहीं चाहिए...
विक्रम - मैं.. समझा नहीं...
पिनाक - इसमें ना समझने वाली कोई बात ही नहीं है... हम वीर को यह एहसास दिलाना चाहते हैं... बिना क्षेत्रपाल के वह एक फ्यूज बल्ब की फिलामेंट से ज्यादा कुछ नहीं है...
विक्रम - (दांत भींच लेता है)
पिनाक - हम जानते हैं... आपको बुरा लग रहा होगा... पर यह जरूरी है...
विक्रम - मुझे क्या करना होगा...
पिनाक - सबसे पहले... ESS से वीर को निकाल दीजिए... और उसे इस सहर तो क्या इस स्टेट में कहीं भी नौकरी ना मिले... वीर का इंकम एक दम से जीरो हो जाए... और कुछ दिनों बाद... भीख माँगने की नौबत आ जाए... (विक्रम की आँखे बंद हो जाती हैं कोई प्रतिक्रिया नहीं देता, चुप रहता है) आप चुप क्यूँ हैं युवराज...
विक्रम - कल ही वीर सिंह ने अपना इस्तीफा मेरे पास पहुँचा दिया था...
पिनाक - (हैरान होते हुए) क्या...
विक्रम - जी... पर उनके जीवन यापन में कोई प्रॉब्लम नहीं रहेगी...
पिनाक - कैसे...
विक्रम - आप तो जानते हैं... लगभग पचास कंपनियों के शेयरों में हमारी हिस्सेदारी है... मेरा मतलब है... ESS के जरिए... हमने अपना हिस्सेदारी बनाया है...
पिनाक - हाँ तो...
विक्रम - जब वह इक्कीस साल के हए थे... तभी मैंने अपनी आधे हिस्सेदारी उनके नाम कर दी थी... उन शेयरों की डीवीडेंड उन्हीं के अकाउंट में जमा होंगे... तो ख़र्चे पानी की कोई प्रॉब्लम उन्हें नहीं होगी...
पिनाक - क्या... यह आपने कब किया...
विक्रम - उनके इक्कीसवें जनम दिन पर...
पिनाक - तो आप अपने शेयर वापस ले लीजिए...
विक्रम - यह ना मुमकिन है... कानूनन अब उन शेयरों पर... वीर का ही मालिकाना हक है...
पिनाक - और उसके अकाउंट में... कितने पैसे होंगे...
विक्रम - नहीं पता... एक डेढ़ करोड़ हो सकते हैं...

पिनाक अपनी आँखे बंद कर एक सोफ़े पर धप कर बैठ जाता है l विक्रम 'छोटे राजा' कह कर आगे बढ़ता है पर पिनाक आँखे मूँदे हुए अपना हाथ उठा कर विक्रम को अपने पास आने से रोक देता है l थोड़ी देर बाद पिनाक उठता है और बाहर की ओर जाने लगता है l


विक्रम - छोटे राजा जी...
पिनाक - (बिना पीछे मुड़े ठिठक जाता है) हमें जो जानना था... हम जान गए...

कह कर पिनाक चला जाता है l उसके पीछे पीछे विक्रम बाहर तक आता है l पिनाक अपनी गाड़ी में बैठ जाता है l गाड़ी अपनी पीछे धुआं और पानी छोड़ते हुए हैल की गेट से निकल जाता है l पिनाक की गाड़ी विक्रम की आँखों से ओझल हो जाता है l कुछ गहरी सोच में डुबे विक्रम बैठक में वापस आता है तो देखता है शुभ्रा और रुप वहाँ पर विक्रम का इंतजार कर रहीं थीं l

विक्रम - मैं जानता हूँ... तुम दोनों हमारी बातेँ छुप कर सुन रहीं थीं..
रुप - हाँ हम सुन रहीं थीं... क्यूँकी बात वीर भैया की थी...
विक्रम - ठीक है... पर वीर है तो उनका बेटा ना...
शुभ्रा - हाँ वीर उनका बेटा है... पर यह क्या... अपने बेटे को दर दर ठोकर खाते हुए देखना चाहते हैं...
विक्रम - छोटे राजा... थोड़े गुस्से में हैं... थोड़ा इंतजार करो... गुस्सा ठंडा हो जाएगा...
शुभ्रा - क्या राजा साहब का गुस्सा ठंडा हो गया है... दिल से कहिये...
विक्रम - तो क्या हुआ... हमें स्वीकारा तो है ना... नकारा तो नहीं...
शुभ्रा - अगर स्वीकारे होते... तो आज तक... हमारे घर में... एक रात रुकने की बात छोड़िए... एक ग्लास पानी तक क्यूँ नहीं पी...

विक्रम कुछ जवाब दे नहीं पाता, क्या जवाब देता, शुभ्रा ने कुछ गलत पुछा ही नहीं था l

रुप - आप भाभी के सवाल का जवाब दीजिए भैया...
विक्रम - जो हमारे साथ हुआ या हो रहा है... वही वीर और अनु के साथ भी होगा...

विक्रम इतना कह कर वहाँ से चले जाना चाहता था, पर उसे जाने से शुभ्रा रोकती है l

विक्रम - यह आप क्या कर रही हैं...
शुभ्रा - क्या सच में... वीर ने इस्तीफा दे दिया है...
विक्रम - हाँ... कल शाम को ही मुझे इस्तीफा मिला...
शुभ्रा - और... क्या सच में... वीर के अकाउंट में...
विक्रम - हाँ... जिस दिन मुझे महांती से मालुम हुआ था... वीर अनु के प्यार में है... उसी दिन मैंने अपने डीमैट अकाउंट से आधे शेयर वीर के डीमैट अकाउंट में ट्रांसफ़र कर दिए थे... मुझे अंदेशा हो गया था... एक ना एक दिन वीर के साथ ऐसा ही कुछ होगा...
शुभ्रा - वाह... आपकी भाई प्रेम पर मैं वारी जाऊँ... पैराडाइज की चाबी देकर वीर और अनु को वहाँ ठहराने के लिए मेरे हाथों भेजा... और उधर... वीर को किसी भी तरह की कोई तकलीफ ना हो... आपने पहले से ही इंतजाम कर दिया था...

विक्रम अपनी आँखे चुराने लगता है l बड़ी झिझक के साथ अपनी नजरें उठा कर रुप और शुभ्रा की ओर देखता है l आज शुभ्रा और रुप की आँखों में विक्रम अपने लिए खूब इज़्ज़त देख पा रहा था l

रुप - वाह भैया वाह... सच कहा है किसीने... बड़े भाई... पिता समान होता है... आप भले ही हर जगह... खुद को दूर करते रहे... पर अंदर ही अंदर वीर भैया का खुब खयाल रखा... तो भैया... आपने फिर अनु के अगवा होने पर वीर भैया की मदत क्यूँ नहीं की...
विक्रम - नंदिनी... मेरी बहन... वीर के साथ... उसका दोस्त था... जो वीर के लिए किसी भी हद तक जा सकता था... और यह बात मैंने खुद... छोटे राजा जी से कह दिया था.... अनु को कुछ नहीं होगा...

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पिनाक की गाड़ी हैल से निकल कर सड़क पर दौड़ रही है लु राज भवन मार्ग पर गाड़ी एक सिग्नल क्रास करते हुए आगे निकल जाती है तो थोड़ी दुर पर कुछ ट्रैफ़िक पुलिस पिनाक की गाड़ी को रोकते हैं l पुलिस आकर पीछे की विंडो ग्लास पर दस्तक देता है l पिनाक ग्लास को नीचे करता है l

पुलिस - सर... प्लीज आपकी गाड़ी को थोड़ा पीछे ले जाने के लिए कहिये...
पिनाक - इंस्पेक्टर... गाड़ी के आगे लगे बोर्ड को देख कर बात करो... यह गाड़ी किस की है... यह जान कर ही बात कर रहे हो ना...
पुलिस - जी सर... आप मेयर हैं... पर सिर्फ पाँच मिनट के लिए... गाड़ी को पीछे ले जाइए... क्यूँकी अभी गवर्नर जी की कंवॉय गुजरेगा...

पिनाक - (जबड़े सख्त हो जाती हैं, अपना सिर हिलाते हुए) ड्राइवर गाड़ी को... वापस ले जाओ...
ड्राइवर - वापस मतलब...
पिनाक - (झल्लाहट के साथ) वापस मतलब... हमारी ऐश गाह में ले चलो...
पुलिस - सर मेरा यह मतलब नहीं था...
पिनाक - कोई नहीं ऑफिसर... जब शेर का बुरा वक़्त चल रहा हो... तो कुत्ता भी... शेर की गांड में उंगली कर लेता है... ड्राइवर... गाड़ी वापस ले चलो...

ड्राइवर गाड़ी को पीछे मोड़ कर दूसरी तरफ ले जाता है और बारंग रिसॉर्ट की ओर ले जाता है l बारंग रिसॉर्ट में पहुँच कर अपना मोबाइल को बेड पर फेंक देता है और धप कर एक सोफ़े पर बैठ जाता है l टाई थोड़ा ढीला करने के बाद शर्ट के बटन खोलता है l तभी उसके कमरे में एक सख्त आता है l पिनाक उसे देखते ही भड़क जाता है और तुरंत खड़े हो कर उस शख्स की गर्दन पकड़ कर दीवार की ओर धकेलते हुए दीवार से सटा देता है l

शख्स - राजा साहब राजा साहब... मेरा गला छोड़िए... मैं मर जाऊँगा...
पिनाक - साले... मेरी इज़्ज़त तेरी वज़ह से बीच बाजार में उतर गई... तुझे जीने का हक है भी...
शख्स - आपकी इज़्ज़त के लिए... मैंने अपनी जान की बाजी लगा दी... इज़्ज़त तो आपके बेटे ने उतारी...

यह सुन कर पिनाक उस शख्स की गर्दन को छोड़ देता है और दोबारा सोफ़े पर बैठ जाता है l शख्स अपनी गर्दन को चेक करते हुए कपड़े सही करता है और पिनाक के आगे आकर खड़ा हो जाता है l

पिनाक - कहाँ था तु... तेरे सारे आदमी एकदम नाकारे निकले... एक लड़की तक को गायब ना कर सके...
शख्स - सामने वाले की ताकत के हिसाब से... हमने आदमियों को काम में लगाया था... एक गलती आपकी ओर से भी तो हुई है...
पिनाक - क्या गलती... कैसी गलती...
शख्स - आपके बेटे की एक दोस्त है... जिसकी जुर्म की दुनिया में ताल्लुक रखने वालों के बीच खुब दबदबा है... मैंने जिसे काम सौंपा था... उसकी फट गई... जब बस्ती में... विश्वा नाम की उस आदमी को देखा... बस्ती में अपनी हस्ती को बरकरार रखने के लिए... विश्वा जैसा कहा... उसने वही किया...
पिनाक - हमें मालुम ही नहीं था... राजकुमार की दोस्ती... उस विश्वा से इतनी गहरी है... जो अभी तीन चार महीने हुए जैल से निकला है...
शख्स - (चौंकता है) क्या... तीन या चार महीने पहले जैल से निकला है...
पिनाक - हाँ... पर तुम इतने चौंके क्यूँ...
शख्स - बात तो है ही चौंकने वाली... एक शख्स... जो तीन या चार महीने पहले जैल से निकला है... वह शहर की घेराबंदी कर देता है... उस पुलिस से... जिस पुलिस को आप अपने हिसाब से कंट्रोल करने की बात कर रहे थे... सुबह तड़के लड़की को छुड़ा ले गया... मगर रात के पार्टी की वक़्त तक... ना पुलिस को खबर थी... ना एडमिनिस्ट्रेशन को... लड़की कहाँ है....

कुछ देर के लिए एक भयंकर चुप्पी छा जाती है दोनों के बीच l थोड़ी देर बाद वह शख्स पिनाक से पूछता है l

शख्स - अब मेरे लिए क्या हुकुम है...
पिनाक - अब तुम जाओ... कॉन्टैक्ट में रहना... हो सकता है... बहुत जल्द तुम्हारी जरूरत पड़े...
शख्स - ठीक है... पर एक बात है... अगली बार जब भी कुछ कराना हो... तो उस विश्वा को थोड़ा दुर रखिए... जैसे आपने युवराज विक्रम को दुर रखा...
पिनाक - ह्म्म्म्म... चलो... जाओ अभी...

पिनाक से इतना सुन कर वह शख्स ऐसे गायब हो जाता है जैसे गधे के सिर से सिंग l पिनाक बैठे बैठे गहरी सोच में डूब जाता है l तभी उसका फोन जो उससे दुर बज उठता है l बड़े अनचाहा मन से अपनी जगह से उठ कर बेड तक जाता है और चिढ़ते हुए मोबाइल को हाथ में उठाता है l मोबाइल स्क्रीन पर नाम देखते ही उसका होश उड़ जाता है l स्क्रीन पर राजा साहब डिस्प्ले हो रहा था l कुछ अनहोनी की आशंका कर बेड पर बैठ जाता है और बैठे बैठे पिनाक, कॉल उठाता है l

पिनाक - हे.. हैलो...
भैरव सिंह - आपकी आवाज़ में... यह हड़बड़ाहट क्यूँ है...
पिनाक - वह मैं.. मेरा मतलब है.. हम... वह... हम थोड़े खोए थे...
भैरव सिंह - (कड़क आवाज में) छोटे राजा जी...
पिनाक - जी... जी राजा साहब...
भैरव सिंह - अपने अंदर की राजा को जगाइए...
पिनाक - हम... समझे नहीं...
भैरव सिंह - उस दिन हमारी... आपकी और पुरे क्षेत्रपाल नाम की.... जो अपमान हुआ... उस अपमान की घटना में जो जो शख्स जुड़े हुए हैं... उन सबको एक एक कर सबक सिखाना है... उनसे निबटना है...

इतना सुनते ही पिनाक की आँखों में चमक आ जाती है l बिस्तर छोड़ कर उठ खड़ा होता है l

पिनाक - जी राजा साहब.. आप बिल्कुल सही कह रहे हैं.... हम भूले नहीं है... के हम क्षेत्रपाल हैं... बस औलाद के ग़म में... थोड़े मायूस से हो गए थे... पर हमने अपनी तैयारी करने के लिए... आपकी आज्ञा के प्रतीक्षा में थे...
भैरव सिंह - शाबाश.... अब समय आ गया है... सिर्फ लोगों को ही नहीं... अपनी औलादों को भी... असली क्षेत्रपाल से रुबरु कराने की.... एक पैगाम देने की... के क्षेत्रपाल बिजली का वह नंगी तार है... जो छुएगा... वह जान से जाएगा... जहान से जाएगा...
पिनाक - ठीक कहा आपने राजा साहब... अब समझने समझाने का वक़्त गया... अब देखने और दिखाने का वक़्त आ गया...
भैरव सिंह - तो अपनी दुश्मनों की फ़ेहरिस्त तैयार कीजिए... (दांत पिसते हुए) और एक एक कर... चुन चुन कर बदला लीजिए...
पिनाक - जी... राजा साहब... फ़ेहरिस्त तो मन में... बस युवराज के पास गए थे... वैसे उनसे हमने पुछा नहीं है... पर लगता है... उन्हें अगर सामिल कर लें... तो सटीक प्लान के तहत... एक एक से अपने तरीके से निबटेंगे...
भैरव सिंह - नहीं छोटे राजा जी... नहीं... इस मामले में... युवराज से जितनी दूरी हो सके... बरकरार रखिए...
पिनाक - (हैरानी से) क्यूँ... हम... समझे नहीं...
भैरव सिंह - कलकत्ता में... युवराज ने जिस लहजे में... राजकुमार के लिए पैरवी की थी... और हमसे जिस तरह से बात की... हमें सख्ते में डाल दिया था... इसलिए... आगे जो भी होगा... उसमें उन के लिए... सबक भी होनी चाहिए...
पिनाक - जी... हमारे मन में.. हमने तय कर लिया था... अब हम समझ गए...
भैरव - तो आपके लिए लोग... हम जुगाड़ करें या...
पिनाक - नहीं राजा साहब.... इस काम के लिए... लोग हम ही जुगाड़ेंगे...
भैरव सिंह - गुड... आप बस भुवनेश्वर को संभालीए... हम राजगड़ पर पंजा जमाये रखेंगे...
पिनाक - (अपनी भवें सिकुड़ कर) क्यूँ कुछ हुआ है क्या...
भैरव सिंह - हाँ कुछ हुआ तो है... अदालत ने होम मिनिस्ट्री से... रुप फाउंडेशन पर एसआईटी की तहकीकात आगे ना बढ़ने पर चीफ मिनिस्टर और होम मिनिस्टर को नोटिस जारी किया है...
पिनाक - तो इसमे क्या हो जाएगा... सारे पोलिटिकल पार्टी और उनके लीडर्स के छेदों को हमने ढ़की हुई हैं... हम जैसे नचाएंगे वैसे नाचेंगे...
भैरव सिंह - आप समझे नहीं... हमें पोलिटिकली कोई खतरा नहीं है... अगर होम मिनिस्ट्री ने कुछ नहीं किया... तो यह केस सीबीआई को चली जाएगी...
पिनाक - ओह... तो हम... अब क्या करें...
भैरव सिंह - आप उसकी चिंता ना करें... यह राजगड़ है... यहाँ हवाओं को भी अपनी रुख बदलने से पहले... हमसे इजाजत लेनी पड़ती है... रुप फाउंडेशन की आगे की तहकीकात... होगी... पर हम पर कोई आँच नहीं आएगी... उसका इंतजाम और तैयारी हम यहाँ कर रहे हैं... इस के पीछे जो शख्स है... उसके लिए भी हमने कुछ सोच रखा है... आपको बस... जो धाक कमी है भुवनेश्वर में... जो छींटा कसी हो रही है हमारी पीठ के पीछे... उसे बंद करना है...
पिनाक - सब समझ में आ गया हमारे... आप यहाँ की कारवाई पर निश्चिंत हो जाइए... हम एक एक कर के... सब को सबक सिखाएँगे...
भैरव सिंह - शाबाश...
पिनाक - खुश किस्मत रही... उस बदजात की बुढ़िया दादी... कमिनी बहुत जल्द चल बसी... पर अब अंजाम उस बदजात को मिलेगी... विश्व की मुहँ बोले माँ बाप को मिलेगी... सब को मिलेगी...
भैरव सिंह - बस... जल्दबाजी ना कीजिएगा...
पिनाक - हम थोड़े टुटे हुए थे... बिखरे पड़े थे... आपने हमें अब नई राह दिखाई है... ऊर्जा छा सी गई है तन बदन में... जल्दबाजी हम हरगिज नहीं करेंगे... पर बदला ऐसा लेंगे... जिसे दुनिया याद रखेगी....

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सुरज की किरणों की तेज ढल रही थी l शाम होने को थी l स्कुल की आखिरी घंटी सुनाई दी l यानी अब स्कुल से बच्चे घर की ओर निकलेंगे l हर रोज की तरह आज भी दुकान पर वैदेही को गौरी खाना बनाते हुए देख रही थी l उससे रहा नहीं जाता तो वह वैदेही से सवाल करती है l

गौरी - तु आज फिर से किसके लिए खाना बना रही है... हुँह्ह्.. विशु के जाने के बाद.... कोई आ तो नहीं रहा है... ना वह कमबख्त टीलु आ रहा है मुआ... और ना ही वह बच्चे... क्या नाम था उस छुटकु का..
वैदेही - अरुण...
गौरी - हाँ अरुण.. बड़े मासी और मामा बना रखे हुए थे... आखिर मामा बना गए ना...
वैदेही - (मुस्कराते हुए) आज आयेंगे काकी... आज जरुर आयेंगे...
गौरी - हाँ हाँ.. रोज तो खाना बनती है...
वैदेही - ओ हो... काकी.. दुकान है... ग्राहक का इंतजार तो करना ही होगा... इसलिए कुछ ना कुछ रोज बनाना ही होगा... वैसे कोई कोई आ भी तो रहे थे...
गौरी - हाँ हाँ आ रहे थे... पर पैसे खाते में लिखवाते थे... और जब से राजा साहब राजगड़ वापस आए हैं... तब से तो कोई मक्खी भी नहीं दिख रही है...
वैदेही - कोई ना काकी... आज तुम्हारे सारी शिकायतें दुर हो जायेंगी...
गौरी - हाँ हाँ देखेंगे... आज मुए कमबख्त टीलु को आने दे... ऐसी कान खिंचुगी... के... (गौरी की ऐसी खीज देख कर वैदेही हँसने लगती है) हाँ हाँ हँस ले...

- वैसे बुढ़िया कान खिंच कर करेगी क्या... (टीलु अंदर आते हुए कहता है) मैं तो तेरे हाथ लगने से रहा... और तु मेरे पीछे पीछे भाग कर पकड़ थोड़े ना सकती है...
वैदेही - (एक टफली टीलु के सिर पर मारते हुए) बड़ी है उम्र में... और मैं और विशु काकी कहते हैं...
टीलु - (अपना सिर सहलाते हुए) हाँ तो क्या हुआ... मेरी भी तो काकी... मासी... दादी... सब कुछ लगती है...

तब तक अपनी जगह से उठ कर गौरी आकर टीलु की कान मरोड़ देती है l

टीलु - आह आ आह आ आह... क्या मस्त मजा आ रहा है... वाह वाह वाह...
गौरी - (कान छोड़ कर अपनी दोनों हाथों से टीलु की पीठ पर मारने लगती है) कलमुए... मेरा मज़ाक उड़ाता है...
टीलु - आह.. वाह... क्या बात है... आज तो बदन की जबरदस्त चंपी हो रही है...

तभी अरुण और उसके साथी टोली सभी पहुँचते है l टीलु को गौरी की हाथों से मार खाते देख ताली मारते हुए उछलने लगते हैं l वैदेही टीलु और गौरी को अलग करती है और टीलु की कान को खुद पकड़ती है l

टीलु - आह दीदी...
वैदेही - दीदी के बच्चे... कितने दिन से आना बंद था तेरा... आज विशु आ रहा है... इसलिए आया है...
अरुण- (अपने हाथ कमर पर रख कर) मासी... छोड़ दो ना हमारे चमगादड़ मामा को...
वैदेही - ( टीलु की कान छोड़ कर अरुण की गाल पकड़ लेती है) ओ हो... तु कब से मामा का हिमायती बन गया रे..
गौरी - (हँसते हुए) जो भी कह.. बच्चे ने बड़ा अच्छा नाम चुना है... चमगादड़... हा हा हा..
अरुण - आह छोड़ो मासी...(वैदेही अरुण की गाल छोड़ देती है)

टीलु - मेरे दुश्मन... तु मुझे अभी भी चमगादड़ कहता है...
गौरी - क्यूँ तु मुझे बुढ़िया नहीं कहता...

बच्चे उछल उछल कर ताली बजाने लगते हैं l वैदेही और गौरी हँसने लगते हैं l इतने में एक ऑटो आकर गौरी की दुकान के आगे रुकती है l वैदेही देखती है ऑटो ड्राइवर बन कर सीलु आया था और बगल में जिलु और मिलु दिहाड़ी मजदूरों के लिबास में बैठे हुए थे l ऑटो से विश्व उतरता है l बच्चे विशु मामा कहते हुए विश्व के पास भागते हैं l विश्व सबको अंदर लाता है, पहले वैदेही के गले लग जाता है फिर गौरी की पैर छूता है, फिर सारे बच्चों को चाकलेट देने लगता है l मिलु ओर जिलु ऑटो से किराना सामान की बोरी और सब्जियों की बोरी लेकर अंदर आते हैं l तभी उनके होटल के आगे एक पुलिस की गाड़ी आकर रुकती है l गाड़ी से जाहिर है इंस्पेक्टर अनिकेत रोणा उतरता है l रोणा को देखते ही सारे बच्चे अपने अपने स्कुल बैग उठा कर भाग जाते हैं l रोणा चलते हुए आता है और अपनी स्टिक घुमाते हुए सब को गौर से देखने लगता है l सबसे पहले स्टिक को घुमाते हुए सीलु के पास रुक जाता है l

रोणा - कौन हो तुम...
सीलु - जी मेरा नाम शैलेन्द्र है... यशपुर में ऑटो चलाता हूँ...
रोणा - तो यहाँ क्या कर रहा है...
सीलु - (विश्व की ओर दिखाते हुए) यह साहब मेरे ऑटो पर सवारी लेकर आए हैं... मैं किराया लेने तक रुका हुआ हूँ...
रोणा - ओ... (जिलु के पास आकर) और तुम...
जिलु - जी मैं... जितेन्द्र... बोरियां वगैरह उठाता हूँ... दिहाड़ी मजदूर हूँ...
रोणा - ह्म्म्म्म.... (मिलु से) और तुम...
मिलु - जी मैं मिलन... कुछ किराने के सामान पहुँचाने थे... इसलिए... (जिलु को दिखाते हुए) इसे साथ लेकर आया हूँ...
विश्व - इतनी इंक्वायरी की वज़ह...
रोणा - (विश्व की ओर घूम कर) ओ... आप... एडवोकेट विश्व प्रताप महापात्र... यह सब आपके साथ हैं... तो पूछताछ तो करना ही पड़ेगा ना...
विश्व - किस बात की पूछताछ...
रोणा - कमाल करते हैं... एडवोकेट महोदय... अदालत में हलफनामा आप दाखिल करते हैं... और हम जब कारवाई पर आते हैं... आप सवाल करते हैं... (कह कर अपनी जेब से कुछ सरकारी काग़ज़ निकालता है) अदालत ने राजगड़ थाना के प्रभारी... यानी कि मुझे प्रेम पत्र भेजा है... के सुश्री वैदेही महापात्र और एडवोकेट विश्व प्रताप महापात्र जी सुरक्षा में कोई चुक नहीं होनी चाहिए... इसलिए मैं आप लोगों को यह आश्वस्त करने आया हूँ... अब मेरे होते हुए... कोई भी आपका बाल बाँका नहीं कर सकता... और यकीन मानिए... मैंने उसका बंदोबस्त भी कर रखा है...
विश्व - बंदोबस्त... कैसा बंदोबस्त...
रोणा - हा हा हा हा... (हँसने लगता है) कल से दो महिला कांस्टेबल सुश्री वैदेही जी के साथ रहेंगी... और दो पुरुष कांस्टेबल आपके साथ रहेंगे...
विश्व - व्हाट...
रोणा - जी घबराईये मत... मैं जानता हूँ... आपको मुझ पर या मेरे थाने की पुलिस सहकर्मियों पर भरोसा नहीं है... इसलिए.. मैंने देवगड़ जिला पुलिस कार्यालय से... चार कांस्टेबल दंपती को यहाँ डेपुटेशन पर बुलाया है... और विश्वास रखिए... जब तक रुप फाउंडेशन की सुनवाई पुरी नहीं हो जाती... वे लोग आपके साथ... आपके साये की तरह रहेंगे...

रोणा को लगा जैसे उसने कोई बड़ा धमाका कर दिया l कुछ देर के लिए वहाँ पर एक सन्नाटा पसर जाता है l रोणा एक कुटिल मुस्कान के साथ वैदेही और विश्व की चेहरे पर नजर दौड़ा रहा था पर दोनों ही नहीं किसी के के चेहरे पर कोई भाव नहीं था l रोणा का चेहरा उतर जाता है l विश्व उसके तरफ हाथ बढ़ाता है तो रोणा उसके तरफ हैरानी भरी नजर से देखता है l

विश्व - थैंक्यू इंस्पेक्टर साहब.. थैंक्यू वेरी मच... आप वाकई... आदर्श थाने के आदर्श अधिकारी हैं...

रोणा बिना कुछ कहे वहाँ से चल देता है l गाड़ी में बैठ कर जाते हुए सभी पर एक सरसरी नजर डालते हुए चला जाता है l उसके जाते ही विश्व सीलु मिलु और जिलु की ओर देख कर आँख के इशारे से चले जाने के लिए कहता है l वे लोग भी बिना कुछ कहे सीलु के ऑटो में बैठ कर चले जाते हैं l

वैदेही - ऐसा लगता है... बहुत दिनों बाद... इंस्पेक्टर ने क्या दिमाग चलाया है...
टीलु - विश्वा भाई... अब क्या करें... अब तो आना जाना किसीसे मिलना मुस्किल हो जाएगा...
विश्व - यह.... इस दरोगा की दिमाग की उपज नहीं है...
वैदेही - तो...
विश्व - इसकी दिमाग में सिर्फ भूसा भरा हुआ है... क्यूँकी ऐफिडेविट के कॉपी और कोर्ट ऑर्डर इसे कब का मिल चुका है...
वैदेही - अगर कब का मिल चुका है... तो उस पर अमल अभी क्यूँ कर रहा है...
विश्व - जाहिर है... किसी ने चाबी घुमाई है...
वैदेही - तभी... तभी मैं सोचूँ... यह बंदर नाच अभी क्यूँ नाच रहा है...
टीलु - इसका मतलब... यह ऑफिसीयली हम पर नजर रखेगा...
विश्व - हाँ...
टीलु - तब तो प्रॉब्लम हो जाएगी... भाई अब हम क्या करें... गाँव में आना जाना भी बहुत मुश्किल हो जाएगा...
विश्व - हाँ... वह तो होगा ही...
टीलु - अभी कुछ दिन हुए हैं... वह... जो हमें संदेशा भेजा करता था... तुम नहीं थे... तो उसने संदेशा देना बंद कर दिया था... अब जब फिर से वह संदेशा भेजेगा... तब...
विश्व - तब भी हम अपना काम... अपने तरीके से करेंगे... अब बस देखना है कि... वह जो लोग हमारे इर्द गिर्द रहेंगे... वाकई पुलिस वाले होंगे... या कोई औ
Shaitrapal ki team ne ek dam se aggressive tevar apna liye hai aur ek ke baad ek man to man marking and bisat ko ulatna shuru kar diya hai ab dekhna hoga ki apna Vishwa isko kaisay ulat ta hai plus apne aas pass ke logo ko jaisay Senapati family and Veer family ko kaisay save karta hain.
 
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Kala Nag

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Superb update 😍
शुक्रिया मेरे दोस्त
इसी तरह साथ बने रहें क्यूंकि अगला अंक बहुत ही ज़बरदस्त होगा
 

Kala Nag

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nice update
धन्यबाद लियोन भाई
..mrutyunjay to bahut dhit nikla jo vaapas aa gaya aur yuva party ka neta banne ko taiyar baitha hai .vikram ko kahani bhi mast sunayi sadhu baba wali .
kuch alag hi planning karke aaya hai wo vikram ko barbad karne ke liye .
हाँ मृत्युंजय का कुछ अतीत है
जो क्षेत्रपाल परिवार से जुड़ा हुआ है
बदला लेने वाला है अपने तरीके से
roop ko gussa aa gaya jab uske dosto ne pratap ke character par ungali uthayi ,
pratap ne sahi se samjhaya roop ko ki wo dono khas hai baaki sab aam janta .
हाँ यही तो कहानी का विशेष है
कहानी में यह लोग आम नहीं हैं
खास हैं
tony ne to roop ke mobile me bug laga diya aur ab wo vishw aur roop ki baate sun sakta hai ,kya vishw ko is baare me koi jaankari nahi 🤔. jab itni satik najar banaye huye hai roop par to bug wali baat chhut kaise gayi uski najar se .
यह शह और मात का खेल है
कभी बाजी इस तरफ़ कभी बाजी उस तरफ़
vallabh ne to apna palla jhad liya roop ko kidnap karne ke plan se ,rona andha ho gaya hai apni bejjati ko lekar aur usko kin kin cheejo ka saamna karna padega yahi dekhna hai jab wo roop par haath daalega .
वह अंजाम बहुत ही भयानक होगा
जिसकी कल्पना तक रोणा ने ना कि होगी
 

Kala Nag

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Gazab ki update he Kala Nag Bhai,
शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया
Vishwa ne nandini ke aaspas apne aadmi to plant kiye huye the....lekin is bar bazi lenin/toni ne maar li............nandini ke mobile me bug fix kar diya he.................
हाँ शह और मात का खेल है यह
जरूरी नहीं हर बाजी विश्व ही जीते
Ballabh kitna bhi samjha le Rona nahi manane wala he.......nandini ke bare me raja ko nahi batayega.....................vinash kale viprit budhdhi................... Rona jayada din ka mehman nahi he ab.....apne sath sath lenin/toni aur ballabh ki bhi bali chdwayega ye........

Keep posting Bhai
रोणा अब अपने अंत तक पहुँच गया है
बहुत जल्द उसे विश्व के हाथों मुक्ती मिलने वाली है
 

Kala Nag

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Shaitrapal ki team ne ek dam se aggressive tevar apna liye hai aur ek ke baad ek man to man marking and bisat ko ulatna shuru kar diya hai ab dekhna hoga ki apna Vishwa isko kaisay ulat ta hai plus apne aas pass ke logo ko jaisay Senapati family and Veer family ko kaisay save karta hain.
शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया
कहानी से जुड़े रहिए और अपना बहुमूल्य मत देते रहिए
 
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