एक सौ चालीसवां अपडेट
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आज की ताजा खबर,
जैसा कि आप को ज्ञात है रुप फाउंडेशन की भ्रष्टाचार में अपनी भुमिका सही ढंग से ना निभा पाने के कारण अदालत ने राजगड़ के पूर्व तत्कालीन पुर्व सरपंच विश्व प्रताप महापात्र को सात वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी और अदालत के द्वारा ने यह आदेश भी जारी किया गया था कि रुप फाउंडेशन की तहकीकात के लिए बनाई गई एसआईटी को सरकार बहाल रखे और तहकीकात को जारी रखे और उसकी रिपोर्ट तैयार कर अदालत में जमा करे, पर विश्व प्रताप के कानूनी सजा पुरी होने के बाद उन्होंने आरटीआई के द्वारा अब तक हुई तहकीकात की प्रगति के बारे में जानने की कोशिश की, पर आपको जान कर हैरानी होगी अदालत के आदेश के बावजूद एसआईटी की जाँच एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी थी l इस दौरान विश्व प्रताप महापात्र सरकार द्वारा स्वीकृत कॉलेज में डिस्टेंस एजूकेशन के जरिए अपनी स्नातक की डिग्री हासिल की और डिस्टेंस एजूकेशन के जरिए अपनी वकालत की डिग्री भी हासिल की l उन्हें बार काउंसिल की लाइसेंस मिलने के बाद अदालत में रुप फाउंडेशन की जाँच नए सिरे से शुरु करने और असली अपराधियों को ढूँढ कर उन पर कानूनी कार्रवाई करने के लिए पीआईएल दाखिल किया था l जिसे अदालत ने सहसा स्वीकर कर गृहमंत्रालय एवं मुख्यमंत्री कार्यालय को समन जारी किए l जिसके पश्चात मुख्यमंत्री कार्यालय तुरंत हरकत में आ गई l कल देर रात को पुराने एसआईटी को ख़तम कर नया एसआईटी का गठन किया गया है एसिपी सुभाष सतपती जी के नेतृत्व में l यह खबर बाहर आने के बाद हमारी सम्वाददाता पूर्व अधिकारी श्रीधर परीड़ा से संपर्क करने की कोशिश की, पर उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है यहाँ तक वे अपने घर में भी नहीं हैं, उनका घर कल से बंद है l आसपास के लोग उनके फरार होने की बात कर रहे हैं l इसके साथ मुझे आपकी सुप्रिया रथ को इजाजत दीजिए
फिर रहिए ना बेख़बर
यह था आज की ताजा खबर
ESS की ऑफिस
विक्रम अपने चेंबर पर बैठा यह न्यूज देख रहा था l न्यूज के समाप्त होते ही विक्रम टीवी की रिमोट हाथ में लेता है और टीवी को बंद कर देता है l कुछ देर के लिए अपनी आँखे बंद कर गहरी सोच में खो जाता है l फिर अचानक वह एक झटके के साथ अपनी आँखे खोलता है जैसे उसे कुछ याद आया हो l झट से फोन निकाल कर किसी को फोन मिलाता है l उधर से कॉल लिफ्ट होते ही
विक्रम - हैलो...
X - बोलिए सर...
विक्रम - वीर कैसा है...
X - सर सलामत हैं... और खुश भी हैं...
विक्रम - और... मेरे खास... वह लोग कैसे हैं...
X - अभी तक तो ठीक ही हैं... पर एक बात है सर... लगता है उन पर हमारे सिवा दो तीन ग्रुप और भी नजर रखे हुए हैं...
विक्रम - ह्म्म्म्म... तुम अपना काम करो... और मुझे पल पल की जानकारी दो...
X - जी सर... रूटीन से कुछ भी अलग होता है... मैं आपको खबर कर दूंगा...
विक्रम - हाँ... ठीक है
विक्रम फोन काट देता है l तभी उसकी इंटरकॉम पर सेक्रेटरी खबर करती है कि उससे मिलने पार्टी ऑफिस से कोई आया है l विक्रम उसे भेजने के लिए कहता है l कुछ देर बाद कमरे में पार्टी के युवा मोर्चा का सेक्रेटरी आता है l
विक्रम - आइए... सेक्रेटरी महोदय आइए... बैठिए...
सेक्रेटरी - जी युवराज... धन्यबाद... (कह कर सेक्रेटरी बैठ जाता है)
विक्रम - कहिये... कैसे आना हुआ...
सेक्रेटरी - युवराज जी... देखिए मेरी बातों को अन्यथा ना लीजिएगा... पार्टी के अध्यक्ष के कहने पर मैं आपसे मिलने आया हूँ...
विक्रम - सारे तक्कलुफ किनारे कीजिए... सीधे मुद्दे पर आइए...
सेक्रेटरी - अभी आपने युवामोर्चा का पद छोड़ कर अपने भाई राजकुमार वीर जी को सामने लाये... (कह कर चुप हो जाता है)
विक्रम - आगे बोलिए...
सेक्रेटरी - अब राजकुमार ने अपना इस्तीफा भेज दिया है... हम उन्हें मनाने की सोच रहे थे कि... तभी छोटे राजा जी की हुकुम आ गया... के पार्टी के तरफ़ से राजकुमार जी का किसी भी प्रकार से कोई संबंध ना रखा जाए... अब हम में से किसी की भी हिम्मत नहीं बन रही है... उनके हुकुम के खिलाफ जाने की... अब पार्टी की युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद रिक्त है... अब आप कोई मार्ग दर्शन कीजिए... क्यूँ के.. सभी एक मत से आपको चाह रहे हैं...
विक्रम - देखिए सेक्रेटरी जी... मैंने.. अपनी जगह वीर का नाम सुझाया था... जिसे पार्टी ने सहसा स्वीकार भी किया था... अब जब वीर नहीं है... तो बेहतर होगा... पार्टी कि अध्यक्ष ही कोई निर्णय लें... क्यूँकी... मैं अब राजनीति से फ़िलहाल दुर ही रहना चाहता हूँ... जब समय आएगा... तब मैं पार्टी से जुड़ुंगा...
सेक्रेटरी - तो अब...
विक्रम - देखिए... पार्टी में कोई और चेहरा भी हो सकता है... आप उन्हें सामने लाइये...
सेक्रेटरी - बात तो आपकी सही है... और बड़े विमर्ष के बाद एक चेहरा मिला है... पर उनके लिए वोट... मेरा मतलब है... (थोड़ी झिझक के साथ) आप अगर लोगों के पास जाकर उनके लिए वोट माँगे तो... (चुप हो जाता है)
विक्रम उसकी बातेँ सुन कर मुस्कराते हुए अपनी जगह से उठता है l विक्रम को उठते देख सेक्रेटरी भी उठ खड़ा होता है l विक्रम उसके पास आकर खड़े हो कर उस सेक्रेटरी के कंधे पर हाथ रखकर
विक्रम - (कड़क लहजे में) आइंदा कभी मिलो तो इतना याद रखो... मांगना हमारी फितरत नहीं है... छीनना या दे देना हमारी आदत है... समझे...
विक्रम ने जिस अंदाज से बात करी थी पार्टी सेक्रेटरी की फटके हाथ में आ गई थी l उसे ऐसा लग रहा था जैसे विक्रम के हर एक शब्द उसके हड्डियों में कड़ कड़ की कंपन पैदा कर रही थी l
विक्रम - वैसे... कौन है वह बंदा... जिसे इसबार पार्टी ने अपना युवा चेहरा बनाया है...
सेक्रेटरी - ज.. ज.. जी उसे साथ में लाया हूँ... ब ब ब बाहर खड़ा है...
विक्रम - कांप क्यूँ रहे हो... तो सब पहले से ही तय कर रखे हो... और हमारे मुहँ पर मारने आए हो... खैर कोई नहीं... बुलाओ उसको... हमसे थोड़ा परिचय करवाओ...
सेक्रेटरी - जीजीजी... अभी बुलाता हूँ....
सेक्रेटरी अपनी जगह से उठता है और बाहर जाकर एक बंदे को अंदर लाता है l उस बंदे को देखते ही विक्रम की आँखे बड़ी हो जाती हैं l गेरुए कपड़े में मृत्युंजय खड़ा था l हैरानी के मारे विक्रम का मुहँ खुला रह जाता है l मृत्युंजय अंदर आते ही विक्रम को हाथ जोड़ कर नमस्ते करता है l
मृत्युंजय - नमस्ते युवराज जी...
विक्रम - तुम...
मृत्युंजय - जी... मैं... मैं वापस आ गया...
विक्रम - क्या तुम्हें... पुष्पा का कातिल मिला...
मृत्युंजय - नहीं... नहीं मिला... इसीलिए... मैं एक दिन आत्महत्या करने जा रहा था... के एक साधु बाबा ने मुझे रोका... और अपने साथ उनके आश्रम में ले गए... वहीं पर उन्होंने मुझे जीवन के दर्शन समझाया... जब मुझे अपने कर्मों का बोध हुआ... तो मैं वापस आ गया... लोक सेवा के लिए... लोक कल्याण के लिए... मैं आप ही की पार्टी का एक साधारण कार्यकर्ता बन पार्टी को सेवा देता रहा... राजकुमार जी के प्रकरण के बाद... मुझे पार्टी के महा महीम ने इस पद को संभालने की जिम्मेदारी दी है... और इसबार आने वाले चुनाव में मुझे भाग लेने के लिए कहा है...
विक्रम का चेहरा सख्त होता जा रहा था l मुट्ठीयाँ भींचने लगी थी l पर उसके उलट मृत्युंजय बहुत ही शांत खड़ा था l मृत्युंजय अपने चेहरे पर एक मुस्कान लाकर फिर से कहना चालु करता है l
मृत्युंजय - युवराज जी... आप मेरे अन्नदाता रहे हैं... मेरे प्रथम मालिक... दीवंगत महांती जी मेरे गुरु रहे हैं... इसलिए चुनाव में हिस्सा लेने से पहले... मेरे इस नव जीवन प्रारम्भ करने से पहले... मुझे आपकी आशीर्वाद चाहिए... क्या मुझे मिलेगा...
इतना कह कर मृत्युंजय विक्रम के आगे घुटने पर बैठ जाता है l विक्रम बहुत असहज हो जाता है l विक्रम अपने भावनाओं पर काबु पाते हुए अपना सिर हिलाता है और
विक्रम - ठीक है... मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ है... अब जाओ तुम दोनों यहाँ से...
मृत्युंजय अपनी जगह से उठता है फिर पार्टी सेक्रेटरी के साथ बाहर चला जाता है l
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रुप कॉलेज में दाखिल होती है l गाड़ी को पार्किंग में लगा कर सीधे कैंटीन में जाति है पर उसे वहाँ पर उसके दोस्त नहीं दिखते हैं l वह छोटु से अपनी दोस्तों के बारे में पूछती है पर छोटु उसे कुछ कह नहीं पाता, तो रुप कैंटीन से बाहर निकल कर बॉटनीकल गार्डन की ओर जाती है l कुछ देर तक यहाँ वहाँ नजर दौड़ाने के बाद एक कोने में उसे सारे दोस्त नजर आ जाते हैं l वह उनके तरफ जाती है l जब उसके दोस्तों की नजर उसके ऊपर पड़ती है तो रुप हाथ उठा कर हाय का इशारा करती है l बदले में उसके सारे दोस्त भी उसे हाथ हिला कर हाय का इशारा करते हैं, पर रुप को महसूस होती है कि उन लोगों के चेहरे पर कोई हडबड़ी वाला एक्सप्रेसन दिखता है l उनके चेहरे पर आए हाव भाव देख कर रुप थोड़ी असहज होती है l उनके पास पहुँच कर
रुप - हैलो एवरी वन...
सब - हैलो...
रुप - क्या बात है... कोई सीरियस डिस्कशन चल रही थी क्या...
बनानी - अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं...
रुप - देखो झूठ मत बोलो... तुम्हारा जुबान कुछ कह रहा है... और तुम्हारा चेहरा कुछ कह रहा है...
इतिश्री - नहीं सच में... अब देखो... कुछ दिनों बाद शेषन ख़तम हो जायेंगी और होली के साथ छुट्टियाँ भी शुरु हो जाएंगी... तो हम लोग उसीकी डिस्कशन कर रहे थे...
रुप - वाव... वैसे कौन कहाँ जा रहा है इस बार...
इतिश्री - मैं तो अपने गाँव जा रही हूँ...
भाश्वती - मेरा तो घर ही भुवनेश्वर में है...
बनानी - हाँ... पर इस बार हम शायद बाहर जा रहे हैं...
तब्बसुम - मेरा तो बेड लक ही ख़राब है... ना रिवार्ड मिली... ना नाम...
रुप देखती है दीप्ति चुप बैठी है और अपने भीतर कुछ सोच रही है l रुप दीप्ति को बुलाती है
रुप - दीप्ति... ऐ..
दीप्ति - (चौंक कर) हाँ... कुछ कहा तुमने...
रुप - क्या सोच रही थी तुम...
दीप्ति - यही के... फर्स्ट सेमिस्टर एक्जाम के लिए... सर के पास जाकर.. हम क्यूँ ना कुछ टिप्स लें...
रुप की भवों पर सिलवटें पड़ जाती हैं l वह कनखियों से देखती है सब के सब दीप्ति को इशारे से कुछ समझाने की कोशिश कर रही हैं l
रुप - ओके... तो मेरे आने से पहले... कुछ ऐसा डिस्कशन हो रहा था... जो मुझे नहीं जानना चाहिए... है ना... (सबका चेहरा झुक जाता है) ओके देन... अब बेहतर होगा... तुम लोग मुझे साफ साफ सब बता दो...
सभी एक दूसरे को देखने लगते हैं l कुछ देर बाद दीप्ति अपने आप को तैयार करते हुए कहती है
दीप्ति - ठीक है... बात दरअसल यह है कि... हम तेरे और विश्व के बारे में डिस्कश कर रहे थे...
बनानी - दीप्ति... (बनानी दीप्ति को टोकती है)
रुप - अच्छा... मेरे और विश्व के बारे में... ऐसी कौनसी बात डिस्कशन कर रहे थे... जो मुझे देख कर चुप हो गए...
दीप्ति - देख... यह देख... (कह कर दीप्ति रुप को अपना मोबाइल पर न्यूज चला कर देती है, रुप न्यूज को पुरा सुनती है और दीप्ति को मोबाइल वापस लौटा कर पूछती है)
रुप - हाँ तो इसमें ऐसा क्या है... जो मैं और विश्व डिस्कशन में आ गए...
दीप्ति - क्या... इसमें ऐसा कुछ नहीं है... नंदिनी... तुम्हारा विश्व कानूनन सजायाफ्ता है...
रुप - हाँ.. तो क्या हुआ...
रुप की इस सवाल पर सब थोड़े असमंजस सा एक दुसरे को देखने लगते हैं l रुप उनकी नजरों की पीछा कर सबकी चेहरे को गौर से देखती है फिर कहना शुरु करती है l
रुप - ओह के... तो तुम लोगों की नज़र में पहले मेरी खानदान वाले सही नहीं थे... फिर धीरे धीरे मेरा भाई वीर कुछ ही दिन हुए हीरो बना... अब तुम लोगों की नज़र में विश्व एक क्रिमिनल है... जिससे मैं प्यार करती हूँ... है ना... (सब मौन रहते हैं, भाष्वती से) भाष्वती तु भी... (इस सवाल पर भाष्वती अपनी नजरें झुका लेती है) तु तो उसे अपना भाई मानती है ना... भुल गई... तुझे प्रताप ने कैसे बचाया था... खैर... और तु... तब्बसुम... अपने वालिद से पुछ लेना कभी फुर्सत में... कैसे आज तु कॉलेज आ पा रही है... (तब्बसुम इधर उधर देखने लगती है) वैल वैल.. तुम लोगों की नजर और कान शायद वही देखा... जो तुम्हारे मतलब कि थी... कोई नहीं... अगर यही वज़ह है... तो मुझे तुम लोगों से कोई शिकायत नहीं है... हाँ कास के... तुम सभी प्रताप के बारे में सब कुछ जान कर अपना ओपिनियन रखते तो अच्छा होता...
वह मेरा अनाम है... उसका नाम विश्व प्रताप महापात्र है... किसी और के गुनाह की सजा उसने अपने सिर लिया था... क्यूँकी जो भी हुआ था... उस अपराध के पीछे कहीं ना कहीं खुद को दोषी समझता था... जरा सोचो... कभी ऐसा हुआ है... की कोई वकील किसी मुजरिम की पैरवी करते करते उसे अपना बेटा समझने लगे... और अपनी जायदाद उसके नाम कर दे... एडवोकेट जयंत राउत... जो प्रताप का केस लड़ रहे थे... उन्होंने अपनी जायज कमाई प्रताप के नाम कर दी...
कुछ देर के लिए सन्नाटा छा जाती है l रुप एक गहरी साँस लेती है फिर कहना चालु रखती है l
रुप - एक वकील जो उसके खिलाफ लड़ी... वह आज उसे अपना बेटा मानती हैं... जो आज इस स्टेट के हर एक कामकाजी महिलाओं की आवाज बनी हुई हैं... प्रतिभा जी... याद है... या भूल गए...
फिर वही सन्नाटा थी l इस बार सभी ल़डकियां संकोच से सिर झुकाने लगे l
रुप - हम लोग दोस्त हैं... मैं समझती थी... के हम सब एक दुसरे को समझते हैं... पर आज तुम सब ने मुझे गलत साबित कर दिया... मेरे अनाम के लिए... मुझे किसी की सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है... मैं तुम लोगों से पूछती हूँ... कितने ऐसे लोग हैं... जो जैल में रह कर अपनी पढ़ाई पूरा कर पाते हैं... या करते हैं... अनाम ने ना सिर्फ वकालत की डिग्री हासिल की... बल्कि बार काउंसिल की लाइसेंस भी हासिल करी... अब बताओ... अगर वह क्रिमिनल होता... तो क्या उसे लाइसेंस मिलता... खैर... अब इस वक़्त तुम लोगों से बातेँ करना भी बेकार है... आई तो थी तुम लोगों के साथ कुछ गप्पे लड़ाने... पर... चलती हूँ... (रुप पलट कर जाने लगती है)
भाष्वती - (रुप को रोक कर) सॉरी यार... हमसे गलती हो गई... अब ऐसे जुते भिगो भिगो के मार मत...
रुप - नहीं... आज तुम लोगों ने मेरा दिल दुखाया है... इसलिए मैं अब जा रही हूँ... जब तक मैं अपने आप शांत ना हो जाऊँ... तुम लोग मुझे कॉन्टैक्ट मत करना...
भाष्वती - अरे सुन तो...
रुप - प्लीज...
इतना कह कर रुप गार्डन से बाहर आती है l तेजी से चलते हुए अपनी गाड़ी की डोर खोल कर बैठ जाती है l रुप को महसुस होती है कि उसकी आँखों में नमी छा रही थी l अपनी हाथों से आँखों से आँसू पोछते हुए गाड़ी स्टार्ट करती है और गाड़ी कॉलेज की सीमा से बाहर ले कर रास्ते पर दौड़ाने लगती है l कुछ देर बाद गाड़ी को एक जगह रोकती है और स्टीयरिंग पर अपना सिर रख कर बैठी रहती है l कुछ गहरी साँसे लेने के बाद गाड़ी से उतर कर देखती है कि वह निको पार्क के पास गाड़ी को रोकी है l निको पार्क को देखते ही उसे विश्व को याद आती है l अपना मोबाइल निकाल कर विश्व को कॉल लगाने ही वाली होती है कि एक आदमी आता है और रुप की मोबाइल छिन कर भागने लगता है l रुप पहले हैरान हो जाती है और जब संभलती है तब चोर चोर चिल्लाती है l आसपास के कुछ लोग और कुछ लड़के उस चोर के पीछे लग जाते हैं और थोड़ी देर बाद उसे घेर लेते हैं, वह चोर अपने को घिरा हुआ देख कर रुप के पास भागते हुए आता है और रुप के पैरों में गिर जाता है और रहम की भीख माँगते हुए रुप को मोबाइल लौटा देता है l कुछ लोग उसे पकड़ कर मारने को होते हैं, रुप उन लोगों को रोकती है और उस आदमी को छुड़ा कर चले जाने को कहती है l वह आदमी रुप को बहुत दुआयें देते हुए वहाँ से चला जाता है l कुछ लड़के रुप को इम्प्रेस करने के लिए अपनी अपनी बड़ी बड़ी हांकने लगते हैं l सिचुएशन को ऐसे देख कर रुप अपनी गाड़ी में वापस बैठ कर वहाँ से निकलने लगती है l थोड़ी दुर जाने के बाद रुप ब्लू टूथ से गाड़ी से कनेक्ट कर विश्व को कॉल लगाती है l
विश्व - हैलो जी... हुकुम जी... कहिए क्या करना है...
रुप - तुम जानते हो... अभी मेरे साथ क्या हुआ है...
विश्व - नहीं जी... बिल्कुल नहीं...
रुप - (खीज कर) आह... देखो... मैं मज़ाक के मुड़ में बिल्कुल नहीं हूँ...
विश्व - अरे बाप रे... ठीक है कहिए... क्या हुआ... आपके साथ...
रुप - क्यूँ तुम तो कह रहे थे... मेरे पास हवा भी अगर रुख बदलेगा... तो तुम्हें खबर हो जाएगी...
विश्व - हाँ कहा तो था... क्यूँ.. कोई शक़...
रुप - हाँ हो रहा है शक़...
विश्व - मत कीजिए... प्लीज...
रुप - क्यूँ न करूँ... बड़े बड़े डींगे जो हांक रहे थे...
विश्व - अरे अरे.. इतना गुस्सा... क्या हुआ... वह जो चोर... आपसे मोबाइल छिन कर भाग रहा था... पकड़ा गया... और आपका मोबाइल आपको मिल गया ना...
रुप अपनी गाड़ी में ब्रेक लगाती है l उसकी आँखे हैरानी से बड़े हो जाते हैं, वह गाड़ी रोक कर अपनी चारों तरफ देखती है l उसे कोई नहीं दिखता l लड़खड़ाती हुई आवाज में विश्व से पूछती है
रुप - तततत.. तुम हे कैसे मालुम हुआ...
विश्व - कहा था ना... हवा तक आपके पास करवट बदलेगा... तब भी मुझे भान हो जाएगा...
रुप - (एक टूटी हुई आवाज़ में) ओह...
विश्व - पर आज आपको हुआ क्या है... इस बात के लिए तो फोन नहीं किया आपने...
रुप - हाँ वैसे... बात कुछ और थी...
विश्व - क्या उस बात के लिए मुड़ उखड़ा हुआ था...
रुप - (थकी हुई आवाज में) हाँ...
विश्व - अरे... ऐसा क्या हो गया.. जो मेरी दिल की शहजादी को मायूस कर दिया...
फिर रुप कॉलेज में दोस्तों के साथ हुई बातचीत को ज्यादा कुछ नहीं बताती बस अपनी नाराजगी को संक्षिप्त कर बताती है l विश्व सब सुनने के बाद एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहता है
- ह्म्म्म्म...
रुप - जानते ही अनाम... मैं बनानी से दोस्ती के लिये क्या कुछ नहीं किया... रॉकी की प्लान में दीप्ति शामिल थी... यह जानने के बावजूद.. मैंने उसे माफ भी किया... और भाष्वती जरा देखो उसे... भाई कहती थी तुम्हें... तुम्हारे वज़ह से... अपनी कॉलोनी से कॉलेज... बिना डरे आ रही है... उसने भी... और आखिर में तब्बसुम... वह भी... जो आज तुम्हारे वज़ह से कॉलेज आ पा रही है... (विश्व कोई जवाब नहीं देता) क्या हुआ... ओ समझी... देखा तुम्हें भी बुरा लगा ना...
विश्व - नहीं... मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा...
रुप - व्हाट... तुम्हें बुरा.. नहीं लगा..
विश्व - नहीं...
रुप - क्यूँ...
विश्व - क्यूंकि अभी आप जो महसुस कर रही हैं... जो कुछ भी देख रही हैं... उन हालातों से मैं गुजर चुका हूँ...
रुप - ओ... फिर भी... वह लोग मेरे दोस्त हैं... कोई दुसरा होता तो... मुझे इतना बुरा ना लगता...
विश्व - वह लोग आम हैं... आप और मैं खास हैं... और जो लोग आम होते हैं... वे लोग खुद को... समाज के हर चीज़ से दुर रखते हैं... वे लोग चाहते हैं... समाज में बदलाव हो... पर बदलाव की दौर से वे लोग ना गुज़रे... वे चाहते हैं... कोई क्रांति हो... कोई क्रांतिकारी आए... पर उनके घर में नहीं... वे सोचते हैं... वोट दे दिया... सर्कार चुन लिया बस बात काम खत्म... सरकार अपना काम करे... पुलिस अपना काम करे और न्यायलय अपना काम... पर किसी भी पचड़े में खुद को देखना नहीं चाहते... वे लोग सिर्फ अपने और अपने परिवार के के सिवा... किसी और की सोचना भी नहीं चाहते... यह बहुत आम फितरत है... पर जब उन पर कुछ गुज़रती है... तब वे लोग अपनी चारों तरफ देखते हैं... उम्मीद करने लगते हैं... शिकायत करने लगते हैं... क्योंकि यह लोग... आम लोग होते हैं...
रुप - तो मुझे... क्या करना चाहिए...
विश्व - माफ कर दीजिए...
रुप - क्यूँ...
विश्व - क्यूँ की वे लोग आपके दोस्त हैं... एक दिन वे आपकी भावनाओं को समझेंगे और माफी मांगेंगे... (इस बार रुप कुछ नहीं कहती) क्या हुआ... आप खामोश हो गईं...
रुप - तो तुम कहना चाहते हो... मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए...
विश्व - जी बिल्कुल... क्यूँकी आप कोई आम नहीं हो... बहुत ही खास हो... (रुप फिर से खामोश हो जाती है) अब क्या हुआ..
रुप - मेरा मुड़ खराब है... ऐसे ठीक नहीं होगा...
विश्व - अच्छा तो फिर कैसे ठीक होगा...
रुप - तुम्हें मालुम है... क्यूँ भूल गए... मैंने कहा था... मैं रूठुंगी..
विश्व - और मैं मनाऊंगा...
रुप - तो मनाओ...
विश्व - पर आप तो मुझसे रूठी नहीं है...
रुप - तो इसका मतलब यह हुआ... तुम मुझे अभी नहीं मनाओगे...
विश्व - अरे मेरी ऐसी हस्ती कहाँ... बिसात कहाँ... आप हुकुम करें और हम तमिल ना करें... (रुप की चेहरे पर मुस्कान आ जाती है) बस इतने में ही आपकी चेहरे पर मुस्कान आ गई... (रुप फिर चौंकती है)
रुप - तुम्हें कैसे पता....
विश्व - आपकी अदाओं से मुझे एहसास हो जाता है...
रुप - पर तुमने कोई शायरी नहीं कही मेरे लिए...
विश्व - अभी किए देते हैं...
चेहरे पे मेरे जुल्फों को फैलाओ किसी दिन,
रोज गरजते हो बरस जाओ किसी दिन,
खुशबु की तरह गुजरो मेरी दिल की गली से,
फूलों की तरह मुझपे बिखर जाओ किसी दिन !
रुप - कमाल है... फर्माइश हमने किया है... ख्वाहिश आप फर्मा रहे हैं...
विश्व - वाह वाह क्या बात है... अजी हम हमेशा आपके फर्माबरदार रहे हैं... पर आपकी फर्माइश के लिए हमने सोच बहुत कुछ रखा है... बस आपकी आने का इंतजार है... (रुप की गाल शर्म से लाल हो जाते हैं)
रुप - तुम चाहते हो... मैं राजगड़ आऊँ...
विश्व - क्यूँ मैंने भी तो आपकी हुकुम बजाया था... आपकी घर आकर...
रुप - ह्म्म्म्म... ठीक है... तो हम ज़रूर आयेंगे...
विश्व - कब...
रुप - बता देंगे बता देंगे... अब से आप सब्र पालें...
कह कर रुप फोन काट देती है और मन ही मन मुस्कराते हुए अपना सिर स्टियरिंग पर रख देती है l तभी उसे पीछे से गाड़ियों की हार्न सुनाई देती है l रुप अपनी जीभ दांतों तले दबा कर गाड़ी स्टार्ट कर निकल जाती है
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एक कुर्सी पर विश्व फैला हुआ था, एक पैर जमीन पर और दुसरा पैर टेबल पर था l बात ख़तम होते ही मुस्कराते हुए कान से फोन निकाल कर टेबल पर रख देता है l तभी कमरे में मायूस चेहरे के साथ टीलु अंदर आता है l उसका लटका हुआ चेहरा देखकर विश्व उससे सवाल करता है
विश्व - क्या हुआ.. यह चेहरा क्यूँ लटका हुआ है...
टीलु - सात दिन हो गए...
विश्व - तो...
टीलु - जब से साले यह दो पुलिस वाले हमारे इर्द गिर्द भिनभिना रहे हैं... तब से बच्चे भी नहीं आ रहे हैं...
विश्व - पहली बात... वे छोटे रैंक के ईमानदार पुलिस वाले हैं... इसलिए उन्हें गाली मत दो...
टीलु - तुम्हें कैसे मालुम... के यह दोनों ईमानदार हैं...
विश्व - यह लोग पहले अर्दली थे... उसके बाद हेल्पर कांस्टेबल बने हैं... अभी प्रोवेशन में हैं... इसलिए सौ फीसदी ईमानदारी बरत रहे हैं...
टीलु - अच्छा... पर भाई यह बात कुछ हजम नहीं हुई... अनिकेत रोणा... हमारे लिए ईमानदार लोगों को लगाया है...
विश्व - क्यूंकि... रोणा को... बिकने वालों पर भरोसा नहीं है... हमारी सारी ख़बरें और जानकारी ईमानदारी से जो बता दे... उन्हीं को उसने ड्यूटी पर लगाया है...
टीलु - हाँ... तभी मैं सोचूँ... उनका नाम भी ईमानदारों वाला क्यूँ लग रहा है...
विश्व - नाम से भी ईमानदारी पहचानी जा सकती है... यह मैं नहीं जानता...
टीलु - हाँ भाई... एक का नाम हरिश्चंद्र बल है... और दुसरे का नाम जगन्नाथ महाकूड़ है... है ना ईमानदारी वाला नाम...
विश्व सब सुन कर अपना चेहरा घुमा लेता है l यह देख कर टीलु मुहँ बनाता है l टीलु बाहर जा कर थोड़ा झाँकता है फिर अंदर आकर विश्व से
टीलु - भाई...
विश्व - ह्म्म्म्म...
टीलु - हम सात दिनों से... एक तरह से नजर बंद हैं... कहीं जा भी नहीं पा रहे हैं...
विश्व - क्यूँ झूठ बोल रहे हो... रोज दीदी के यहाँ जा रहे हैं... गले तक ठूँस ठूँस कर आ रहे हैं...
टीलु - मैं राजगड़ अंदर की बात नहीं कर रहा हूँ...
विश्व - फ़िलहाल ऐसा कुछ सोचना भी नहीं... हमारी छोटी सी हरकत... दूसरों पर आफत बन सकती है... (बात घुमाने के लिए) वैसे... बच्चे कहाँ तक लाठी घुमाना सीखे...
टीलु - पूरा सीख लिए हैं... पर स्पीड नहीं है...
विश्व - कोई ना... अगली मुलाकात में देखना... उनकी लाठी घुमाना बहुत जबरदस्त हो चुका होगा...
टीलु - भाई... तुम बात टाल रहे हो... हमारा यश पुर जाने का टाइम नजदीक आ रहा है...
विश्व - (चेयर पर सीधा होकर बैठ जाता है) क्या मतलब...
टीलु अपनी अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाल कर विश्व को देता है l विश्व काग़ज़ को खोल कर उसमें लिखे शब्दों को पढ़ने लगता है l पढ़ते ही उसकी आँखों में एक चमक छा जाती है l फिर टीलु की ओर देखता है
टीलु - हाँ भाई... तुम तो जानते हो.. सात दिनों से मैं सुबह सुबह यशपुर में अपने दोस्तों की हालचाल जानने और दीदी की दुकान के लिए कुछ सामान लेने चला जाया करता था... पर तुम्हारे मना करने के बावजूद... मैं रोज न्यूज पेपर पढ़ कर... उस अंजान आदमी की मेसेज को डी कोड किया करता था... उसने इस बार तुमसे मिलने की इच्छा जतायी है... कैसे और कब लेटर में साफ लिखा है....
विश्व - मैं जानता था... तुम शांत बिल्कुल नहीं रह सकते थे... कुछ ना कुछ उल्टा सीधा करोगे...
टीलु - भरोसा रखो विश्वा भाई... मेरी इस हरकत के बारे में... रोणा जानता नहीं है... अब सवाल है... हम राजगड़ से निकल कर... यशपुर जाएं तो जाएं कैसे...
विश्व चेयर से उठ खड़ा होता है l कमरे में थोड़ा टहल लेने के बाद टीलु से कहता है
विश्व - यह दो सिपाही... हमारे साथ क्यूँ हैं...
टीलु - तुम्हारी हिफाज़त के लिए... और तुम्हारी हर पल की रिपोर्ट रोणा को देने के लिए...
विश्व - (कुछ देर के लिए सोच में पड़ जाता है) अच्छा क्या तुम दस बारह लोग... जुगाड़ कर सकते हो... अपने टाइप के... काम थोड़ा मुश्किल भरा हो सकता है...
टीलु - क्या... मेरा मतलब है.. कब तक...
विश्व - कल तक... परसों के लिए...
टीलु - हाँ... सीलु भाई आज रात तक... कुछ बंदों को बुला लेंगे...
विश्व - तो फिर चलो... हम रोणा तक खबर पहुँचा ही देते हैं...
टीलु - (चौंक कर) क्या... यह क्या कह रहे हो भाई... फिर तो वह अनजाना शख्स कौन है... और हमारी क्या मदत करना चाहता है... हम कभी जान नहीं पाएंगे...
विश्व - मैंने सिर्फ इतना कहा... रोणा जो जानना चाहता है... हम उस तक खबर इन्हीं कांस्टेबलों के जरिए पहुँचाएँगे...
टीलु - एक मिनट... तुम खुल कर समझाओ भाई...
विश्व - खबर कुछ ऐसे पहुँचाओ... के उन्हें लगे के उन लोगों ने कोई बड़ा तीर मार लिया हो... और पुरी खबर जानने या निकालने के लिए... रोणा हमें खुद यशपुर ले जाएगा... (टीलु की आँखे चमकने लगती है)
टीलु - समझ गया भाई... पर हमारे एक्शन के लिए... टेढ़े लोगों की जरूरत पड़ेगी... मतलब हमारी गैंग की...
विश्व - इसी लिए तो पुछा था
टीलु - ओ... फ़िकर नोट... बुला लेंगे...
विश्व - ठीक है... अब एक्शन के लिए... पहले हमारी गैंग को बुलावा भेजो... एक्शन के दिन से पहले पहुँच जाएंगे...
टीलु - ठीक है भाई... सब समझ गया... अभी जाता हूँ... उन दो कांस्टेबलों को शीशे में उतारता हूँ...
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रंग महल के परिसर के गोल्फ कोर्स में भैरव सिंह गोल्फ क्लब से एक स्ट्रोक लेता है l पास खड़े एक नौकर बॉल लाने के लिए भाग जाता है l भैरव सिंह आकर छत्री के नीचे लगे चेयर पर बैठ जाता है और पैरों को टी पोए पर टिका देता है l तभी भीमा आता है l
भीमा - हुकुम...
भैरव सिंह - भीमा... कोई आया है क्या...
भीमा - जी हुकुम.. दरोगा और वकील... आपसे मिलने की इजाज़त मांग रहे हैं...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... ठीक है भेज देना... (भीमा जाने लगता है) एक मिनट रुको... (भीमा रुक जाता है) भीमा...
भीमा - जी हुकुम...
भैरव सिंह - तुम्हारे लाव लश्कर... अब कहाँ हैं...
भीमा - हुकुम... अपना मुहँ छुपाये... छुपे हुए हैं...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... एक काम करो... उन्हें कहो... अखाड़े में फिर से लग जाएं... विश्वा से टकराने के बाद... उन्हें एहसास तो हो गया होगा... उनसे चूक कहाँ पर हुई है...
भीमा - जी हुकुम...
भैरव सिंह - अब उन्हें तैयार करो... एक जबरदस्त मुकाबले के लिए... और हाँ... उनकी बहुत जल्द... विश्वा से टकराव हो सकता है... उसके लिए तैयारी करने के लिए बोलो... क्यूँकी अगला मुठभेड़.... या तो उनके लिए... या फिर विश्व के लिए... आखिरी मुठभेड़ होनी चाहिए...
भीमा - जी... जी हुकुम...
भैरव सिंह - अब जाओ उन दोनों को भेजो...
भीमा - जी हुकुम..
कह कर भीमा वहाँ से चला जाता है l तब तक नौकर भागते हुए अपनी हाथ में गोल्फ बॉल लेकर पहुँचता है और ड्राइवर पर बॉल को सेट करता है l भैरव सिंह अपना क्लब निकाल कर शॉट लेने को होता है कि बल्लभ और रोणा पहुँचते हैं l भैरव सिंह रुक जाता है
भैरव सिंह - आओ... आओ... दरोगा... आओ... (रोणा और बल्लभ एक दुसरे को ताकने लगते हैं) आओ दरोगा... रुक क्यूँ गए... यह रहा बॉल... एक शॉट मेरे क्लब से मारो... (बेवक़ूफ़ की तरह रोणा कभी बल्लभ को कभी भैरव सिंह को देखने लगता है) ओह... कॉम ऑन... यह लो...
कह कर अपना क्लब रोणा की
बढ़ाता है, रोणा असमंजस सा भैरव सिंह के पास चलते हुए आता है, भैरव सिंह अपना गोल्फ क्लब को रोणा के हाथ में देता है l रोणा पोजीशन लेता है और एक शॉट खेलता है बॉल दुर जाकर गिरता है l भैरव सिंह चुटकी बजाता है तो नौकर बॉल को वापस लाने भाग जाता है l
भैरव सिंह - कप कहाँ है... तुम्हारा शॉट कहाँ है... सबसे ऊपर तुम्हारा ध्यान कहाँ है... (रोणा का सिर झुक जाता है) हम क्या समझे दरोगा... तुमसे हो पाएगा या नहीं...
रोणा - जी इसी विषय पर आपसे बात करने आए हैं...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... (अपनी जगह पर बैठ कर) क्या बात करने आए हो...
रोणा बल्लभ से एक न्यूज पेपर लेकर भैरव सिंह के सामने टी पोय पर रख देता है l भैरव सिंह पेपर उठा कर पेपर देखने लगता है l फिर पेपर को एक किनारे पर रख कर रोणा की ओर देख कर
भैरव सिंह - क्या मतलब है इसका...
रोणा - केस... के लिए... नया एसआईटी बनने वाला है...
भैरव सिंह - तो...
रोणा - श्रीधर परीड़ा... गायब है...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म तो...
बल्लभ - राजा साहब... मैं कुछ कहूँ...
भैरव सिंह - हाँ कहो...
बल्लभ - इस वक़्त अगर विश्व के खिलाफ कुछ किया गया... तो केस हमारे हाथ से निकल सकता है...
भैरव सिंह - सीधे सीधे बको... पहेलियाँ मत बुझाओ...
बल्लभ - राजा साहब... हर न्यूज में... विश्व को हीरो की तरह प्रेजेंट किया गया है... बहुत बढ़ा चढ़ा कर लिखा गया है... ऐसे में.. विश्व को कुछ हुआ तो...
भैरव सिंह अपनी जगह से उठता है और दोनों के सामने खड़ा होता है l बल्लभ का जबड़ा पकड़ कर गोल गोल घुमाते हुए
भैरव सिंह - हम राजा हैं... तुझे पाल इसलिए रहे हैं... के तु सोचे... अपना दिमाग खपाये... और इसे.. (रोणा की ओर देखते हुए) पाल इसलिए रहे हैं... यह कर गुजर जाए... (बल्लभ का जबड़ा छोड़कर) अब अगर तुम दोनों का काम हमें ही करना है... तो... जरा सोच के बताओ... हमें तुम दोनों की कोई जरूरत है भी या नहीं...
दोनों के चेहरे पर खौफ छा जाती है l डर के मारे दोनों के चेहरे सफेद हो जाता है l भैरव सिंह अपनी कुर्सी पर वापस बैठ कर
भैरव सिंह - हाँ तो क्षेत्रपाल रियासत के दो रत्न.. बताओ... तुम लोगों के काम... किसी और को दिया जाए... या...
रोणा - नहीं राजा साहब... आप ने जो काम दिया है... वह अब ख़तम कर ही वापस आयेंगे...
भैरव सिंह - बहुत अच्छे.. जल्दी से काम पर लग जाओ... ताकि हमें यह मालुम रहे की हमारे काम में तुम लोग मसरूफ हो... ताकि तुम्हारे काम को ना तो हमें अपनी हाथों में लेनी पड़े... ना ही किसी और को देनी पड़े...
बल्लभ - जी राजा साहब...
भैरव सिंह - अब जाओ यहाँ से...
बल्लभ और रोणा बिना पीछे देखे वापस चल देते हैं l दोनों बाहर आकर रोणा के जीप में बैठ जाते हैं l रोणा तेजी से गाड़ी मोड़ कर अपने क्वाटर की ओर जाने लगता है l
रोणा - कभी कभी लगता है... यह राजा साहब ही पागल है...
बल्लभ - वह नहीं... हम पागल हैं... और हाँ... राजा साहब पर गुस्सा इसी गाड़ी में ही रख कर... उतरते वक़्त थूक देना... वर्ना... यह राजगड़ है... हवाओं के कान होते हैं...
रोणा चुप हो जाता है, गाड़ी निरंतर चलाने के बाद अपनी क्वार्टर के पास गाड़ी रोकता है पर गाड़ी से उतरता नहीं है और अपनी हाथ को स्टीयरिंग पर दो तीन बार अपने हाथ से मारने लगता है l
बल्लभ - शांत... क्यूँ गुस्सा कर रहा है...
रोणा - सात दिन से... सिपाही लगाए हैं... पर विश्वा कहीं जाता नहीं है... क्या कर रहा है... कुछ मालुम भी नहीं हो रहा है... और ऊपर से... यह साले न्यूज वाले... उसे हीरो बना कर.. हमारा काम मुश्किल कर रहे हैं... और यह राजा साहब... बात की गहराई को समझने के लिए तैयार नहीं है... साले काले कोट वाले... तुझे साथ लेकर गया था... ताकि राजा साहब को तु समझा पाए... पर तेरे से वह भी नहीं हुआ...
बल्लभ - हाँ नहीं हुआ... (कह कर गाड़ी से उतर जाता है) पर राजा साहब ने गलत क्या कहा है बोल... हम उनके फेंके हुए टुकड़ों पर इसी लिए तो पल रहे हैं... ताकि उन्हें सोचना ना पड़े... और करना ना पड़े... सोचने के लिए... मुझे पैसे मिलते हैं... और कर गुजरने के लिए तुझे...
रोणा - (गाड़ी से उतर कर) खूब अच्छा सोचा है तुने... तेरे कहने पर... आदमी लगाए हैं... और वह साला हरामी... सात दिन से खा पी कर अजगर की तरह डकार मार रहा है... पर हिल नहीं रहा...
बल्लभ - पहले भी कहा था तुझे... सब्र कर... उतावला मत हो... विश्वा कोई ना कोई गलती करेगा... जरा सोच... अब तक तुने उसके हाथ पैर बाँध रखा है... जैसे ही हरकत करेगा... तब तु उसे ख़तम कर देना... और तब रिपोर्ट में लिख देना... भाग रहा था... पैर पर गोली चला रहा था... गलती से गोली... पीठ पर लग गई....
इतना सुनने के बाद रोणा थोड़ा शांत हो जाता है l बल्लभ की कही बातों को समझने के अंदाज में अपना सिर हिला कर सहमती देता है l
रोणा - ठीक कह रहा है... मैं थोड़ा उतावला हो जाता हूँ... अब तक किस्मत ने विश्व के साथ दिया है... पर कब तक... अपनी भी बारी आएगी... तब साले को कुत्ते की मौत मारूंगा... कसम से... गालियों में दौड़ा दौड़ा कर मरूंगा... (बल्लभ से) चल अंदर आजा... मिलकर कुछ सोचते हैं...
दोनों क्वार्टर के अंदर जाने लगते हैं कि तभी रोणा की मोबाइल बजने लगती है l अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर देखता है स्क्रीन पर टोनी डिस्प्ले हो रहा था l टोनी का नाम देखते ही रोणा की भवें तन जाती हैं l कमरे में सोफ़े पर बैठते हुए बल्लभ रोणा की हालत देखता है l
बल्लभ - क्या हुआ किसका फोन है...
रोणा - लगता है... किस्मत पलटने वाली है... अगर यह कॉल मेरे मतलब कि हुई... तो समझ लो... विश्वा की बर्बादी शुरु होने वाली है...
बल्लभ - अच्छा यह बात है... तो फिर कॉल को स्पीकर पर डाल... (रोणा वही करता और कॉल लिफ्ट करता है)
रोणा - हैलो...
टोनी - हैलो... रोणा सर...
रोणा - बोल टोनी... उर्फ लेनिन...
टोनी - लेनिन... मेरा पास्ट है... टोनी... मेरा प्रेजेंट... अब वक़्त आ गया है... टोनी को पास्ट करने का...
रोणा - ह्म्म्म्म... मतलब लड़की के बारे में... बहुत कुछ पता कर लिया है...
टोनी - नहीं... बहुत कुछ नहीं... पर तुम्हारे मतलब कि जितनी होनी चाहिए... पता कर लिया है...
रोणा - क्या पता किया है...
टोनी - इतनी जल्दी भी क्या है... पहले यह बताइए... मेरे काम का क्या हुआ... मेरी नई आइडेंटिटी...
रोणा - हो गया है... मैंने तुम्हारे लिए... नई आधार कार्ड... और वोटर आईडी कार्ड जुगाड़ कर दिया है...
टोनी - तो ठीक है... सुनिए... बहुत जल्द विश्व से मिलने वह नंदिनी... राजगड़ जाने वाली है.. और विश्व के दीदी के पास ठहरने वाली है...
रोणा - (इतना सुनते ही आँखे किसी शिकारी की तरह चमकने लगते हैं) कब...
टोनी - बहुत जल्द...
रोणा - मैं कैसे मान लूँ... तुझे यह सब कैसे मालुम हुआ...
टोनी - हा हा हा हा... रोणा बाबु... विश्वा चालाक सही... पर मैं भी कुछ कम नहीं... आज सुबह ही मेरे आदमी ने नंदिनी के मोबाइल फोन में... मेमोरी कार्ड वाली जगह पर बग फिक्स किया है... अब तोता मैना दोनों जो भी बातेँ करेंगे... मुझे मालुम हो जाएगा... बस इतना जान लीजिए... लड़की के इर्द-गिर्द विश्वा के आदमी बिछे हुए हैं...
रोणा - क्या बात कर रहा है... तुने तो बहुत बड़ा काम कर दिया है...
टोनी - तो बोलिए... अपना नया पहचान लेने कब आऊँ...
रोणा - जब लड़की मेरे हाथ लग जाएगी...
टोनी - ऐसी कोई डील नहीं हुई थी...
रोणा - देख टोनी... नया आईडी लेकर तु निकल गया... और कहीं मैं फंस गया.. तो... वैसे भी... अभी अभी जो तुने कहा है... क्या ग्यारंटी है... वह सब सच ही है...
टोनी - अभी रिकार्डिंग भेज देता हूँ...
रोणा - चल भेज...
टोनी - भेज दूँगा.. भेज दूँगा... पर आपकी डील पर... अपनी भी एक डील है...
रोणा - हाँ बोल...
टोनी - अगर लड़की सच में राजगड़ जाती है... तो उसे बीच रास्ते से मैं उठा लूँगा... आपको डायरेक्ट डेलिवेरी देकर अपनी नई पहचान ले लूँगा...
रोणा - यह हुई ना... कमीनों वाली डील... मंजुर है... एक हाथ लड़की देगा... दुसरे हाथ अपने लिए नई आईडी लेगा...
टोनी - डील...
रोणा - अब भेज वह कंवरसेशन...
टोनी फोन काट देता है और रुप और विश्व के बीच हुई बातचीत का रिकार्डिंग व्हाट्सएप पर भेज देता है l रोणा और बल्लभ दोनों वह कंवरसेशन सुनने लगते हैं l सब सुनने के बाद जहां रोणा बहुत खुश होता है वहीँ बल्लभ कुछ सोच में पड़ जाता है l
रोणा - देखा वकील... अब किस्मत हमारा साथ देने लगी है... और विश्वा की लेने लगी है... क्या सोचने लगा है वकील...
बल्लभ - पहली बात... जहां तक मुझे भान हो रहा है... वह लड़की कोई मामूली लड़की नहीं है... दुसरी बात... जैसा कि टोनी ने कहा... उस लड़की के चारों तरफ... विश्वा के आदमी बिछे हुए हैं... (कहते कहते चुप हो जाता है, फिर अचानक रोणा से कहता है) एक बात कहूँ...
रोणा - क्या...
बल्लभ - क्यूँ ना लड़की के बारे में... हम जितना जानते हैं... वह सब हम राजा साहब को बता दें... एक बार विश्व की कमजोरी राजा साहब के हाथ में आ गई... तो विश्वा कुत्ता बन कर राजा साहब के जुते चाटने आएगा... (रोणा चुप रहता है) क्या हुआ... मेरी बात तुझे पसंद नहीं आई...
रोणा - नहीं... नहीं आई पसंद..
बल्लभ - क्यूँ... क्या गलत कह दिया... मत भुल... उस लड़की को... मैंने राजकुमार की सगाई वाले दिन देखा था... मतलब वह कोई मामुली हस्ती की बेटी नहीं होगी... कुछ ऊँच नीच हो गई... तो फिर राजा साहब के पास भागना पड़ेगा...
रोणा - जो होना वह होगा... पर उस लड़की के बारे में... राजा साहब अभी नहीं... उसकी चुत में.. अपना लौड़ा गाड़ने के बाद हो खबर करूँगा... मुझे कोई मतलब नहीं है... वह लड़की कौन है.. किसकी है... (अपनी गाल पर हाथ फेरते हुए) मुझे बस इतना मालुम है... मुझे उसकी लेनी है... वह भी विश्वा के सामने...
बल्लभ - (गुस्से में खड़े होकर) राजा साहब को खबर करने से... तुझे प्रॉब्लम क्या है....
रोणा - (गुस्से में तमतमा कर खड़ा होता है) हाँ प्रॉब्लम है... राजा साहब को कह देने से.. वह लड़की को उठा लेंगे... अपनी रंडी बनाएंगे... फिर जब मन भर जाएगा... तब अपनी झूठन को हमारी ओर फेंक देंगे... इसे तो मैं अपनी पर्सनल रंडी बनाऊँगा... विश्वा को अंजाम तक पहुँचाने के बाद... राजा साहब मुझे रंग महल दे देंगे... मैं मरते दम तक... उस लड़की के साथ ऐस करता रहूँगा...
बल्लभ - पागल हो गया है तु...
रोणा - देख... राजा साहब को... विश्व को बर्बादी चाहिए... मैं वही कर रहा हूँ...
बल्लभ - ठीक है... तेरे इस प्लान में मैं नहीं हूँ... घबरा मत... तेरे इस प्लान के बारे में किसी से नहीं कहूँगा... क्यूँकी जब तेरा यह प्लान बैक फायर करेगा... तब तो तु मेरे पास आएगा ही... चलता हूँ... बेस्ट ऑफ लक...
इतना कह कर रोणा को वहीँ छोड़ कर बल्लभ चल देता है l रोणा अपने मन में बल्लभ को गालियाँ बकते हुए चेयर पर बैठ जाता है l बल्लभ के जाने के कुछ पल के बाद रोणा के क्वार्टर की डोर बेल बजती है, रोणा अपनी जगह से उठने के बजाय चिल्लाते हुए कहता है
- कौन है... अंदर आ जाओ...
कमरे में एक कांस्टेबल अंदर आता है, एक जोरदार सैल्यूट मारने के बाद कहता है
- कांस्टेबल जगन्नाथ महाकुड़ रिपोर्टिंग सर...
रोणा - अरे जगन्नाथ... तुम इस वक़्त... लगता है कोई जरूरी खबर है...
जगन्नाथ - जी... सर... एक बहुत ही खास खबर है सर... विश्व के बारे में... और उसके अगले मूवमेंट के बारे में...
इतना सुनते ही रोणा के कान खड़े हो जाते हैं, चेयर पर सीधा बैठ जाता है और जगन्नाथ से कहने के लिए कहता है l जगन्नाथ कहता है कि कोई यशपुर में है,जो विश्व को न्यूज पेपर के जरिए कुछ ना कुछ ख़बरें भेजता रहता है l उसके आधार पर विश्व अपने काम को अंजाम देता रहता है l अब शायद आगे कुछ खास करने वाले हैं इस लिए वह दो दिन बाद विश्व से मिलने के लिए कह दिया है l सब सुनने के बाद
रोणा - कैसे मिलेंगे... इस बाबत कोई जानकारी...
जगन्नाथ - जी नहीं सर...
रोणा - ठीक है... तुमने बहुत अच्छा काम किया है... जाओ इस पर तुम एक ऑफिसीयल रिपोर्ट बनाओ... और मेरे पास डीपोजीट करो...
जगन्नाथ - जी सर... (कह कर सैल्यूट मारता है, और वापस जाने को होता है कि फिर मुड़ कर) सर परसों हमे क्या करना होगा... अगर विश्व बाहर गए... तो क्या हम उनके साथ जाएंगे...
रोणा - (मुस्कराते हुए अपनी जगह से उठता है और जगन्नाथ के यूनीफॉर्म के बटन पर हाथ फेरते हुए) जगन्नाथ जी... आपको विश्व के घर के बाहर ड्यूटी लगाया गया है... आप बस उतना ही कीजिए... आगे क्या करना है... वह हम देख लेंगे... समझे कुछ...
जगन्नाथ - जी... जी सर..
रोणा - गुड... नाउ यु मे लिव...
Gazab ki update he
Kala Nag Bhai,
Vishwa ne nandini ke aaspas apne aadmi to plant kiye huye the....lekin is bar bazi lenin/toni ne maar li............nandini ke mobile me bug fix kar diya he.................
Ballabh kitna bhi samjha le Rona nahi manane wala he.......nandini ke bare me raja ko nahi batayega.....................vinash kale viprit budhdhi................... Rona jayada din ka mehman nahi he ab.....apne sath sath lenin/toni aur ballabh ki bhi bali chdwayega ye........
Keep posting Bhai