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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

Kala Nag

Mr. X
Prime
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Kala Nag

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👉एक सौ सत्ताइसवां अपडेट
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अंधेरा छटा नहीं था विश्व पहुँच गया था l चूंकि उसने रात को ही खबर कर दी थी इसलिए रात को ही सीलु गाँव से निकल कर यशपुर चला गया था l विश्व पहुँचने के बाद उमाकांत सर जी का घर देख कर हैरान हो गया था l उसने जितना भी बदलाव किया था सीलु ने उसके ऊपर अपना दिमाग लगा कर और भी खूबसूरत बना दिया था l विश्व इस वक़्त इतना खुश था कि अगर सीलु सामने होता तो उसे गले से लगा लेता l

टीलु - क्या देख रहे हो भाई...
विश्व - पिछले जनम में तुम सब से मेरा भाई वाला ही नाता था..
टीलु - हाँ वह तो है... जरूर एक ही माँ के पेट से होंगे...
विश्व - हाँ...
टीलु - पर कोई ना... अब हम सब एक ही दीदी के भाई है... क्यूँ है कि नहीं...
विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम सब बातों में माहिर हो...
टीलु - क्या... भाई... इसमें बात बनाने वाली बात कहाँ से आ गई...
विश्व - दीदी बमुश्किल से तुम्हें ही देखी है... उन तीनों से मिली भी नहीं है... और तुम...
टीलु - गलत... मैंने वक़्त निकाल कर सीलु को दीदी से मिलवा चुका हूँ..
विश्व - (चौंक कर) क्या...
टीलु - घबराने का नहीं... गाँव में सबकी नजरों से छुपाते हुए दीदी से मिलवाया...
विश्व - पर क्यूँ...
टीलु - क्यूंकि दीदी मिलना चाहती थी...
विश्व - ह्म्म्म्म... तब ठीक है...
टीलु - पर भाई तुमने पूछा नहीं... दीदी क्यूँ मिलना चाहती थी...
विश्व - नहीं...
टीलु - पर क्यूँ...
विश्व - दीदी सीलु से मिलना चाहती थी.. क्यूंकि कुछ दिनों के लिए ही सही... सीलु ने विशु की जगह ली थी... और वैसे भी... मेरी दीदी का दिल बहुत बड़ा है... और तुम सब उसके लिए उतना ही हो... जितना कि मैं... जब कोई भी मेरा नहीं था... तब तुम लोग मेरे साथ आए... वह भी बिना किसी लाग लपेट के...
टीलु - बस भाई बस... मुझे और सेंटी मत करो... कुछ देर बाद तुम्हारे नन्हें प्यारे प्यारे बंदर आयेंगे... उनको सम्भालो... दिलासा दो...
विश्व - ऐ... उन्हें बंदर क्यूँ कह रहे हो...
टीलु - (बिदक कर) और नहीं तो... वह सब इत्ते इत्ते से छछूंदर... मुझे चमगादड़ मामा कह रहे हैं... (टीलु जिस अंदाज से कहा विश्व जोर जोर से हँसने लगता है) हाँ हाँ हँस लो... तुम उसके मामा... और मैं उन सबका चमगादड़ मामा...
विश्व - (हँसी को दबाने की कोशिश करते हुए) अरे इसमें इतना बुरा मानने वाली बात कहाँ है...
टीलु - (मुहँ बना कर) तो इसमें खुशी से उछलने वाली बात भी कहाँ है...
विश्व - अच्छा यही बात तुमको अंग्रेज़ी में कही होती तो...
टीलु - अंग्रेजी में..
विश्व - हाँ बैट मेन अंकल... (कह कर विश्व हँसने लगता है) अब तो बुरा नहीं लगेगा ना...

विश्व के साथ साथ टीलु भी हँसने लगता है, तभी एक लड़का आ पहुँचता है l वह दोनों अपनी हँसी को रोक कर उस लड़के की ओर देखते हैं l वह लड़का खुशी के मारे अपनी आँखे बड़ी करते हुए उन्हें देख रहा होता है l विश्व को देखते ही वह लड़का पूछता है l

लड़का - अरे मामा तुम आ गए...
विश्व - मैं गया ही कब था... और तुम इतनी सुबह सुबह...
टीलु - इन बंदरों को नींद आती भी है या नहीं... यह पूछो...
लकड़ा - (अपना गाल फुला कर) हूँन्न्न्नन्...

विश्व एक बड़ा सा चॉकलेट निकाल कर लड़के के सामने लहराता है l लड़का चॉकलेट देख कर खुश हो जाता है और लेने के लिए हाथ बढ़ाता है तो विश्व चॉकलेट को अपने पीछे ले जाता है l लड़का मुहँ बनाता है l

विश्व - पहले यह बताओ... तुम्हारा नाम क्या है...
लड़का - अरुण...
विश्व - हाँ तो अरुण... इतनी सुबह सुबह...
अरुण - वह क्या है कि मामा... आज... (अपनी दो उंगली दिखा कर) लंदन से थोड़ा जल्दी बुलावा आ गया था... इसलिए...
टीलु - ऐ छछूंदर... संढास के लिए बाहर जाने को लंदन बोल रहा है...
अरुण - (टीलु को उंगली दिखा कर) ऐ चमगादड़ मामा... यह हमारा कोड वर्ड है... हम यहाँ नहर को... लंदन बोलते हैं...
टीलु - अबे तेरी तो... (विश्व उसे रोकता है)
विश्व - देखो अरुण... गलत बात... चमगादड़ नहीं...
अरुण - (मुहँ बना कर) सॉरी मामा...
विश्व - अच्छा यह बताओ... तुम इन्हें.. चमगादड़... क्यूँ कह रहे थे...
अरुण - यह हमें आप से मिलने ही नहीं दे रहे थे... जब देखो द्वार पर... लटके ही दिखे... इसलिए...
विश्व - ठीक है... पर चमगादड़ नहीं... हाँ उन्हें तुम सब... बैट मेन अंकल कह सकते हो...
अरुण - ठीक है... पर क्यों...
टीलु - (बड़े एटीट्यूड के साथ) इसलिए... क्यूंकि तुम्हारे इस बैट मेन अंकल... फोरैंन रिटर्न हैं...
अरुण - फोरैंन रिटर्न... मतलब लंदन से...
टीलु - हाँ... (फिर चिल्ला कर) नहीं... तुम्हारे वाली.. लंदन से नहीं... असली लंदन से...
अरुण - हाँ हाँ ठीक है... (विश्व से) अच्छा मामा... लाइब्रेरी बन गया...
विश्व - हाँ... बन गया...
अरुण - और हमारे लिए खिलौने भी लाए हो....
विश्व - हाँ हाँ लाया हूँ... तुम सब आज तैयार हो कर आना... और आज के बाद यहाँ जम कर उछलकूद करना... पढ़ना...
अरुण - (खुशी से उछलते हुए) अरे वाह... मैं अभी जाता हूँ अपने सारे दोस्तों से कहता हूँ...
विश्व - हाँ और यह भी... आज सब तुम सब दो पहर का खाना... अपने मामा के साथ खाओगे...
अरुण - ठीक है...

कह कर बिना पीछे मुड़े अरुण वहाँ से भाग जाता है l विश्व उसे जाते हुए देखता है l


टीलु - भाई... कोई लफड़ा तो नहीं होगा ना..
विश्व - कैसा लफड़ा...
टीलु - तुम जानते हो... यह गाँव वाले...
विश्व - टीलु... मेरे भाई... अगर यह बच्चे आकर इस श्रीनिवास लाइब्रेरी को जिंदा कर देंगे... तो समझ लो... इन मरे हुए गाँव वालों को भी जिंदा कर देंगे...
टीलु - वह कैसे...
विश्व - वह सब मैं बाद में बताऊँगा... पहले यह बताओ... उन न्यूज पेपर में... और क्या क्या मेसेज मिला है अब तक...
टीलु - अरे हाँ... एक मिनट... अभी लाया...


टीलु अंदर जाता है, कुछ न्यूज पेपर और हाथ में एक डायरी लेकर आता है l डायरी को विश्व के हाथ में देकर और न्यूज पेपर्स को विश्व के सामने रखते हुए


टीलु - यह लो... तुमने जैसा कहा था... मैंने बिल्कुल वैसा ही डीकोडिंग करते हुए... जो भी मेसेज बना.. मैंने इस डायरी में लिख दिया है... देखो...

विश्व डायरी में वह पन्ना देखता है जिसमें टीलु ने डीकोड कर वह संदेश इकट्ठा किया था l

"तुम अकेले नहीं हो, एक काफिला तैयार है, युद्ध जब अनिवार्य है, हमारा मिलना आवश्यक है"
"भ्रष्टाचार ही भ्रस्टाचार है, हर तंत्र सम्मिलित है, तुम अकेले क्या करोगे, चलो मिलकर बाजी जीते"


विश्व - सिर्फ दो संदेश... इतने दिनों में... सिर्फ दो संदेश...
टीलु - हाँ... एक दिन मैं यशपुर बहुत जल्दी चला गया था... उस दिन के बाद... और संदेशे मिले नहीं... (विश्व टीलु को घूर कर देखने लगता है) सच कहता हूँ भाई... मैं कोई जासूसी करने नहीं गया था... हाँ थोड़ी जल्दी जरूर गया था... और शायद उसी दिन से वह डर कर मेसेज देना बंद कर दिया... मुझे लगता है... यह राजा क्षेत्रपाल की कोई जाल था... पकड़े जाने के डर से... संदेशा नहीं दे रहा....

विश्व डायरी में लिखे मेसेज्स गौर से पढ़ने लगता है l फिर अपनी आँखे मूँद कर कुछ सोचने लगता है l

टीलु - क्या सोचने लगे भाई...
विश्व - मुझे लगता है... यह बंदा शायद यह जानने की कोशिश कर रहा है... मैं उसके संदेशे पढ़ रहा हूँ या नहीं...
टीलु - मतलब तुम्हें लगता है... इसके पीछे राजा साहब नहीं है...
विश्व - पता नहीं... पर मेरे अंदर की गट फिलिंग कह रही है... कोई बंदा... राजा साहब का सताया हुआ... जो मुझसे ज्यादा मुझको जानता है... मेरी मदत करना चाहता है...
टीलु - तो अब... क्या करने का प्लान है...
विश्व - सोचता हूँ...

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द हैल
डायनिंग टेबल पर चारों सदस्य बैठे हुए हैं l रुप वीर से नजरें चुरा रही थी और खुद को शुभ्रा के साथ बात चित में व्यस्त दिखा रही थी l विक्रम चुप चाप अपना नास्ता कर रहा था पर वीर खोया हुआ था l यह सब बातेँ शुभ्रा नोटिस कर लिया था l

शुभ्रा - क्या बात है वीर... किस सोच में खोए हुए हो...
वीर - (अपनी सोच से बाहर आते हुए) कुछ नहीं भाभी...
शुभ्रा - कुछ तो है... तुम थोड़े टेंशन में लग रहे हो... क्यूँ नंदिनी... तुम्हें क्या लगता है...
रुप - म.. म.. मुझे क्या लगता है... मुझे क्या लगेगा भाभी... वीर भैया ट.. ट.. ठीक ही लग रहे हैं...
शुभ्रा - हाँ हाँ ठीक है ठीक है... तुम ऐसे हकला क्यूँ रही हो..
रुप - कहाँ... कहाँ भाभी... मैं ठीक हुँ... वह मैं अपनी सब्जेक्ट याद कर रही थी... और अपने फ्यूचर के बारे में सोच रही थी...
विक्रम - कैसा सब्जेक्ट... कैसा फ्यूचर...
रुप - वह भैया... मैं सोच रही थी... के भाभी से कुछ टीप्स लूँ... गाइडेंस लूँ...
विक्रम - किस बात पर...
रुप - यही के... मैं समर वेकेशन में डॉक्टरी की एंट्रेंस की तैयारी करूँ...
विक्रम - क्या... पर क्यूँ... और दो साल बाद... वैसे भी.. तुम शादी करने वाली हो...
रुप - तो... तो क्या हुआ भैया.. मैं डॉक्टरी के बाद भी तो शादी कर सकती हूँ...
विक्रम - पागल हो गई हो... या बचपना दिखा रही हो... तुम अच्छी तरह से जानती हो... तुम यहाँ पढ़ाई के लिए आई हो... पर उसके पीछे की वज़ह और शर्तें भूलो मत... (रुप का चेहरा उतर जाता है)
शुभ्रा - ओ.. हो... मैंने कहाँ से शुरू किया था... और बात कहाँ पर आकर पहुँच गई... वीर... प्लीज तुम बताओ... क्या सोच रहे थे...
वीर - भाभी... मैं वह...
शुभ्रा - (हैरान हो कर छेड़ते हुए) वीर... तुम झिझक रहे हो...
वीर - हाँ.. वह मैं...

सब खाना खाते हुए रुक जाते हैं और सबकी नजर वीर पर रुक जाती है l वीर सब नजर घुमाने के बाद शुभ्रा को देखते हुए कहता है l

वीर - मैंने एक अहम फैसला किया है... आई मिन कर लिया है... अपने लिए... इस घर के लिए... हम सबके लिए... (रुक जाता है)
विक्रम - कैसा फैसला...
वीर - भैया... भाभी... नंदिनी... आप सब अनु को जानते हो... अनु आप सबको पसंद भी है...
विक्रम - साफ साफ कहो वीर...
वीर - मैं... मैंने अनु से जल्द से जल्द शादी करने का फैसला किया है...

यह सुन कर सब पहले शुन हो जाते हैं, उसके बाद

विक्रम - क्या...
शुभ्रा - वाव...
रुप - आह सच में..
विक्रम - होल्ड ऑन होल्ड ऑन.. यह तुमने फैसला किया है... आई मिन... जो कर लिया है... इसमें हमें कोई ऐतराज नहीं है... क्यूंकि हम जानते हैं... छोटी माँ का भी आशीर्वाद है... पर तुम भूल रहे हो... टीम बड़े... और हैं... बड़े राजा जी... राजा साहब और छोटे राजा जी... जिनकी मंजुरी बहुत जरूरी है...
वीर - नहीं भूला हूँ... मैं आप सबको अपनी बात बता देना चाहता था.... सो बता दिया...
विक्रम - ठीक है... पर अचानक ऑल ऑफ सडन... आई मिन तुम... कुछ दिन या महीने रुक भी सकते थे...
वीर - क्यूँ...
विक्रम - देखो... अभी हम सब किसी ना किसी वज़ह से डिस्टर्ब्ड हैं... ऐसे हालात में... तुम हमारे घर के बड़े... राजी भी होंगे... डाऊट है... (कुछ देर के लिए सभी चुप हो जाते हैं, फिर) वैसे भी... तुमने अचानक यह फैसला क्यों लिया...

वीर चुप रहता है l उसकी चुप्पी को शुभ्रा समझ जाती है l इतने में सबका खाना चूंकि ख़तम हो चुका था, इसलिये शुभ्रा रुप को इशारे से अपने साथ किचन की चलने के लिए कहती है l रुप और शुभ्रा दोनों किचन के अंदर चले जाते हैं l

विक्रम - तुमने बताया नहीं... क्यूँ...
वीर - भैया... मैं... खुद को... जब से सुधारने में लगा हुआ हूँ... तब से... हाँ तब से... कोई ना कोई मेरी कुंडली में उंगली कर रहा है... मेरे पिछली जिंदगी को... आज से छुड़ाने की कोशिश में हूँ... अपने अंदर की... पुराने वीर से छुटकारा पाने की कोशिश में हूँ... पर कोई है... जो मेरे अंदर के पुराने वीर को ललकारना चाहता है...
विक्रम - तो इससे तुम्हारी शादी का... क्या कनेक्शन है...
वीर - मैं... उस वीर को हमेशा हमेशा के लिए दफना देना चाहता हूँ... मैं दुनिया जहान से लड़ कर जब घर को लौट कर आऊँ... अनु का मुस्कराता हुआ चेहरा देख कर... मैं दुनिया जहान को भुला देना चाहता हूँ... ना किसी पर कोई गरज... ना किसी से कोई शिकायत... मैं दुनिया से थका हारा लौट कर आऊँ... उसके पहलु में... एक नई जिंदगी.. एक नई जीत को हासिल करूँ... बस इसलिए अनु से जल्द से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ...

इतना कह कर वीर चुप हो जाता है और विक्रम की ओर देखने लगता है l विक्रम भी उसकी बातेँ सुन मुहँ फाड़े देखे जा रहा था l

विक्रम - (उसी हैरानी के साथ) ओ... वीर... मैं हैरान हूँ... तुम दुनिया से इतनी जल्दी हारने लगे...
वीर - तभी तो जीत की चाहत में... अनु से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ... (विक्रम के हाथ को पकड़ लेता है) भैया... मैंने भले ही... तुम्हारे छोटे भाई का फर्ज ना उतार पाया... पर तुमने कभी भी इस बात पर मलाल नहीं की... पर आज एक छोटे भाई का हक माँग रहा हूँ... प्लीज... हमारे घर के बड़ो से मेरे लिए बात करोगे... प्लीज...
विक्रम - (वीर के हाथ पर अपना हाथ रख देता है) चल पागल... मैंने कभी भी... अपने मन में... तुम्हारे लिए कोई गाँठ नहीं बाँधा है... अगर बड़ों से बात करनी ही है... तो बस एक हफ्ता रुक जाओ...
वीर - (चौंक कर) एक हफ्ता...
विक्रम - हाँ.. एक हफ्ता...
वीर - यह अचानक एक हफ्ता... कहीं जाना है क्या...
विक्रम - हाँ कल राजा साहब ने फोन पर बताया कि हमारा ESS अभी तक अपने स्टेट में अनबीटेबल है... उसे अब आउट ऑफ स्टेट ले जाने का मौका आया है...
वीर - हाँ तो.. कौन सा स्टेट...
विक्रम - झारखंड... और बंगाल राँची में एक मीटिंग है... उसके बाद कलकत्ता... सेक्यूरिटी सर्विस में.. हमारा स्कोप कहाँ तक हो सकता है... वगैरह वगैरह...
वीर - पर तुम क्यूँ...
विक्रम - क्या बचकाना सवाल है... अगर महांती होता... तो मैं कहाँ जाता... अब चूँकि सब कुछ मैं देख रहा हूँ... इसलिए मुझे जाना होगा... हमें कॉन्ट्रैक्ट मिल जाएगा... क्यूंकि पार्टी राजा साहब के पहचान वाले हैं...

वीर चेहरे पर टेंशन लिए अपनी जगह से उठ खड़ा हो जाता है और कुछ सोच में पड़ जाता है l विक्रम उसकी हालत देख कर हैरान होता है l

विक्रम - तुम इतने टेंश क्यूँ हो गए....
वीर - मैंने अनु से दस दिन की मोहलत मांगी थी... उसमें से सात दिन तो जाया हो जाएंगे... और बाकी तीन दिन में क्या हो जाएगा...
विक्रम - इतनी जल्दी क्या है वीर... क्यूँ... तुम जल्दबाज़ी ऐसे दिखा रहे हो... जैसे.. अनु और तुम्हारे बीच रिश्ता हद से आगे बढ़ गया हो... (थोड़ा रुक कर) क्या तुम...
वीर - (एक बेज़ान सी मुस्कराहट के साथ) देखा भैया... मेरे अंदर तुम वही पुराने वीर को ढूँढ रहे हो... (फिर थोड़ी सीरियस हो कर) जब अपने ही मेरे बारे में ऐसी राय रखते हों... तो गैरों से क्या गिला रखना...

कह कर वीर वहाँ से निकल जाता है l वीर की कही बातेँ विक्रम के जेहन पर हथोड़े की तरह बरसने लगते हैं l वह वीर को आवाज देने की हिम्मत तक नहीं कर पाता l वह भी बुझे मन से बाहर की ओर चला जाता है l यह सब किचन से दोनों भाभी और देवरानी सुन रहे थे, उनका भी चेहरा बुझ जाता है l

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उदय टहलता हुआ रोणा के क्वार्टर के सामने पहुँचता है l उसे बाहर रोणा की पर्सनल जीप दिखता है तो वह बहुत खुश हो जाता है l वह भागते हुए जीप के पास पहुँचता है और अपने बालों को ठीक कर क्वार्टर के बाहर पहुँचता है और बंद दरवाज़े को हल्के से धक्का देता है l दरवाजा खुल जाता है l उदय धीरे धीरे अंदर जाने लगता है l देखता है बाथ रुम में रोणा के चेहरा सेविंग फ़ोम से पुता हुआ है और वह अपना दाढ़ी बना रहा है l आईने में रोणा उदय को देख लेता है l

रोणा - तु अंदर कैसे आया बे...
उदय - वह साहब दरवाजा खुला था...
रोणा - हाँ हाँ मालुम है... पुछ रहा हूँ सीधे अंदर कैसे आ गया...
उदय - साब जी... आपने ही तो कहा था... मुझे अंदर आने के लिए... कभी दरवाजा खटखटाना ना पड़े...

इतना सुनते ही वह अपना रेजर रख देता है और उदय के पास चलते हुए आता है l इससे पहले उदय कुछ समझ पाता तब तक उदय के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ चुका था l तमाचा मारने के बाद रोणा वापस जाकर अपना दाढ़ी बनाने लगता है l उदय थप्पड़ खा कर सोचने लगा उससे क्या गलती हो गई l यही सोचते सोचते वह बाहर की ओर जाने लगता है l

रोणा - अब कहाँ जा रहा है...
उदय - वह बाहर जाकर दरवाजा खटखटाने...
रोणा - अबे भोषड़ी... जब आ गया है... जो रोने आया था... वह रो कर जा यहाँ से...

उदय अपना सिर खुजाने लगता है, तब तक रोणा अपना दाढ़ी बना कर चेहरा टावल से पोंछ रहा था l जब चेहरा पोंछ कर उदय के सामने आता है, तो उदय उसे देख कर चौंक जाता है l क्यूंकि रोणा ने अपना मूँछें निकाल लिया था l उदय उसे हैरानी भरे नजर से देख रहा होता है l


रोणा - ऐसे मुहँ फाड़े क्या देख रहा है...
उदय - आज आप बहुत बदले बदले लग रहे हैं... चेहरे से भी... और... (अपने गाल पर हाथ फेरने लगता है)
रोणा - पहली बात... तुझे मैंने एक काम भी दिया था... क्या याद है तुझे...
उदय - जी है ना... मैं रोज विश्वा पर नजर गड़ाए हुए था... इतने दिनों तक वह घर के बरामदे से बाहर नहीं आ रहा था... सिर्फ काम ही काम कर रहा था... आज सुबह ही वह काम ख़तम कर बाहर दिखा...

इतना सुनते ही रोणा का चेहरा सख्त हो जाता है और उसका हाथ उठ कर चल जाता है पर ठीक उदय के गाल तक आ कर रुक जाता है और अपनी जबड़े भींचते हुए उदय के गाल को थपथपाने लगता है, फिर अचानक अपनी मुट्ठी में उदय के गाल को भींच लेता है l उदय दर्द के मारे चीखने लगता है l

रोणा - श्श्श.. श्श्श.. चिल्ला क्यूँ रहा है...
उदय - आ ह... आह...
रोणा - तेरा गाल ही तो खिंच रहा हूँ... कौनसा तेरा गांड मार रहा हूँ... हाँय...
उदय - मुझे माफ कर दीजिये... साब...
रोणा - क्यूँ... क्या ग़लती किया तुने... हाँ... बोल बोल...
उदय - नहीं जानता... आह...
रोणा - तो सुन भोषड़ी के सुन... विश्वा... गायब था... तब से... जब से मैं यहाँ नहीं था... और आज सुबह ही तेरी अम्मा चोद कर आया है... मादरचोद... इसपर तु कांस्टेबल बनेगा... ह्म्म्म्म... कांस्टेबल...
उदय - आह... आ आ ह... माँ कसम साब जी... मैंने उसे दुर से ही देखा था... कैसे पता करता के वह विश्वा नहीं है... आप ही ने तो दूरी बना कर नजर रखने के लिए कहा था...

रोणा उसके गाल को छोड़ देता है l उदय अपने गाल को सहलाने लगता है l दर्द इतना था कि उसके आँखे नम हो गईं थीं l इतने में उसके दरवाजे पर दस्तक होता है l

रोणा - कौन है...
भीमा - (अंदर आते हुए) भीमा...
रोणा - ओ... कहो भीमा... सुबह सुबह... कैसे...
भीमा - (उदय पर नजर डालते हुए) दरोगा बाबु पिछले दो दिनों से राजा साहब आपको याद कर रहे हैं... इसलिए मैं यहाँ दो बार आकर लौट चुका हूँ... पर यह क्या... आपने अपनी मूंछें क्यूँ मुंडवा ली...
रोणा - (जबड़े भींच कर) वह क्या है कि भीमा... जब से सस्पेंड हो कर राजगड़ से बाहर आया... तबसे कोई मर्द वाला काम किया नहीं ना... ऊपर से जब से आया हूँ... रंग महल भी सुना और विरान है... इसलिए... अब तो मूंछें तब रखूँगा... जब कोई मर्द वाला काम कर लूँ...
भीमा - ओ... लगता है समस्या विकट है...
रोणा - वह मेरी समस्या है... तुम बोलो.. अभी क्या करना है...
भीमा - पता नहीं क्यूँ... दो दिन पहले.. सरपंच से मिलने के बाद.. राजा साहब आपको खोज रहे हैं... उपर से मैंने कई बार फोन लगाया आपको... पर आपने उठाया ही नहीं...
रोणा - हाँ... वह काम में... बहुत व्यस्त था... इतना की अपना ही होश नहीं था... चलो चलें... देखें राजा साहब को मेरी क्या जरूरत आ पड़ रहा है...

तीनों बाहर आते हैं भीमा और रोणा भीमा के लाए गाड़ी में बैठ कर चले जाते हैं l पीछे उदय वैसे ही अपने गाल सहलाते रह जाता है और मन ही मन बड़बड़ाने लगता है l

" साला कुत्ता कहीं का... लगता है विश्वा ने ही इसकी जमकर ली है... तभी साला दर्द छुपाने के लिए मूँछ कटवा कर फिर रहा है... कुत्ता कहीं का... जब तेरे जैसे ढीठ को विश्वा चकमा दे सकता है... भुर्ता बना सकता है... मैं विश्वा के आगे क्या हूँ बे.. अंडे से निकला हुआ चूजा... रुक साले रुक... एक दिन मैंने तेरी ना ली... तो मैं भी उदय नहीं... "

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दरवाज़ा खोलते ही सामने वीर को देख कर दादी चौंक जाती है l

दादी - अरे दामाद जी आप... इस वक़्त... अनु तो अभी ऑफिस के लिए निकलने वाली थी...
वीर - क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...
दादी - ओ हो... मैं भी क्या बेवकूफ़ी कर रही हूँ... दामाद जी द्वार पर खड़े हैं... मैं द्वार पर ही खड़ा कर बात कर रही हूँ... आइए... अंदर आइए...

दादी दरवाजे से हटती है l वीर अंदर आकर एक चेयर पर बैठ जाता है l अनु भागते हुए हाथ में एक कॉफी की ग्लास लेकर वीर को देती है l पहले वीर हैरान हो कर अनु की ओर देखता है फिर मुस्कराते हुए कॉफी अनु के हाथ से लेकर चुस्की भरता है l

दादी - बड़ी खयाल रहती है तुझे राजकुमार की... कोई दुसरा आए तो ध्यान कभी नहीं देती...

अनु शर्मा कर वहाँ से अंदर की ओर भाग जाती है l वीर के होंठो पर मुस्कुराहट और भी गहरा जाता है l

दादी - दामाद जी... क्या आपका यहाँ आना पहले से तय था...
वीर - नहीं तो... क्यूँ क्या हुआ...
दादी - सच कह रही हूँ दामाद जी... रानी साहिबा आईं थीं... इस कमबख्त की हाथ माँगने... तब इसे मेहमान नवाजी समझाना पड़ा... पर आपकी बात और है... देखिए ना... आप को आए कितनी देर हुए... आपके लिए कॉफी तैयार कर दी उसने...
वीर - दादी... मेरा यहाँ आने का वज़ह भी यही है...
दादी - क्या मतलब...
वीर - मुझे अनु की आदत.. या यूँ कहूँ के... मुझे अनु की लत लग चुकी है... मेरा खयाल करने वाली... खयाल रखने वाली... अब सिर्फ ऑफिस में नहीं... बल्कि मुझे मेरे घर के आँगन में चाहिये...
दादी - ओ... (खुश हो कर) मतलब आप शादी की बात करने आए हैं...
वीर - हाँ... शादी की बात करने आया हूँ... आज सुबह ही अपने बड़े भैया... भाभी और छोटी बहन को बताया... माँ तो कब से तैयार बैठी है... इससे पहले कि मैं अपने घर के बुजुर्ग और मुख्य को अपना अभिप्राय बताऊँ... मैं आपसे शादी की इजाजत लेने आया हूँ...
दादी - दामाद जी... जब मैंने रानी साहिबा को पहले से ही बता चुकी हूँ... अनु आपकी है... जब आपको ठीक लगे... तब आप उसे मर्यादा के साथ डॉली में ले जाएं...
वीर - (अपनी जगह से उठ कर दादी की हाथ पकड़ लेता है) थैंक्यू दादी थैंक्यू... मतलब.. आपको कोई एतराज नहीं है ना...
दादी - मुझे क्यूँ कोई एतराज होने लगी... पर आपकी उतावलापन देख कर लगता है... जैसे शादी आपको कल ही करनी है..
वीर - कास के ऐसा हो पाता... वह क्या है कि... मेरे बड़े भाई यानी युवराज जी... मेरे पिताजी... यानी... छोटे राजा जी और हमारे क्षेत्रपाल परिवार के मुखिया... मिलकर किसी काम से बाहर हफ्ते दस दिन के लिए जा रहे हैं... जब वे लौटेंगे.. तब मैं उन लोगों से शादी की इजाजत ले लूँगा...
दादी - तो ठीक है...
वीर - पर...
दादी - पर क्या दामाद जी...
वीर - दादी.. मैं चाहता हूँ... अनु यह दस दिन घर पर रहे... मेरा मतलब है... वह ड्यूटी पर ना आकर... घर पर आराम करे...(अपनी जेब से एक क्रेडिट कार्ड निकाल कर दादी को देते हुए) और शादी की तैयारी वह अपनी तरफ से करे...
अनु - (कमरे से बाहर आकर दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है) नहीं... ऐसा नहीं हो सकता...
दादी - ठीक ही कह रहे हैं दामाद जी... शादी के पहले मिलने जुलने का रिवाज नहीं होता...
अनु - वह मैं कुछ नहीं जानती... मुझसे रानी माँ ने वादा लिया था... चाहे कुछ भी हो जाए... शादी से पहले... कभी ऑफिस जाना बंद ना करूँ... वैसे भी कौनसा शादी का दिन तय हो गया है....
दादी - दामाद जी मैं रसोई में जाकर थोड़ा देखती हूँ... आप अपनी अनु को समझाने की कोशिश कीजिए... (कह कर दादी वहाँ से चली जाती है)
वीर - अनु... तुम समझ क्यूँ नहीं रही हो...
अनु - प्लीज... कुछ दिनों से हालात जैसे हो रहे हैं... मैं घर पर रहूँगी तो हमेशा चिंता में रहूँगी... आप सामने रहोगे... तो मुझे चिंता नहीं रहेगी... प्लीज...
वीर - देखो अनु... भैया के बाहर जाने से... पूरा काम का बोझ मुझ पर पड़ेगा... आने जाने से लेकर खाने पीने तक का कोई ठिकाना ना रहेगा...
अनु - (धीरे से) झूठे
वीर - सुनाई नहीं दिया... पर समझ गया... तुम मुझे झूठा कह रही हो... किसलिए
अनु - इसीलिए की आप झूठ कह रहे हैं...
वीर - नहीं अनु... सिर्फ ऑफिस ही नहीं... पार्टी का काम देखने इधर उधर जाना पड़ सकता है...
अनु - तभी तो... मैं... आपके साथ रहना चाहती हूँ.. कम से कम ऑफिस के वक़्त...

अनु के इसतरह से अनुरोध करने पर वीर अपना हथियार डालते हुए अनु से कहता है

वीर - ठीक है... अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो.... पर मेरी भी एक शर्त है...
अनु - जी कहिए...
वीर - तुम्हें रोज मेरी गाड़ी से ऑफिस आना जाना करोगी... वह भी सिर्फ ऑफिस के वक़्त...
अनु - (खुशी के साथ शर्माते हुए) मतलब आप रोज मुझे ले जाने एयर छोड़ने आयेंगे..
वीर - नहीं...
अनु - (थोड़ी मायूस हो कर) तो..
वीर - सिर्फ आज ही... मैं तुम्हें ले जाऊँगा... पर कल से... मैं ड्राइवर का इंतजाम कर दूँगा... मेरी अपनी गाड़ी से वह तुम्हें रोज घर से ले जाएगा... ऑफिस आवर ख़तम होते ही वह छोड़ देगा... मैं इसी शर्त पर ही तुम्हें ऑफिस में आलाउ कर सकता हूँ...
अनु - (मायूसी के साथ, मुहँ फूला कर) ठीक... है...


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एक रोती हुई स्कुल जाती किशोरी लड़की की हाथ पकड़ कर वैदेही लक्ष्मी के घर पहुँचती है l घर में लक्ष्मी और हरिया के बीच किसी बात को लेकर कहा सुनी हो रही थी l जैसे ही वैदेही वहाँ पहुँची दोनों के दोनों चुप हो गए l

वैदेही - क्या बात है लक्ष्मी.. किस बात को लेकर तुम दोनों झगड़ रहे थे...

लक्ष्मी और हरिया दोनों एक दूसरे को देखते हैं फिर लक्ष्मी अपना सिर झुका लेती है l पर हरिया गुस्से भरे नज़र से वैदेही के साथ आई उस लड़की की ओर देखने लगता है l वह लड़की हरिया की नजर से बचने के लिए वैदेही के पीछे छुपने लगती है l


वैदेही - ऐ हरिया.. खबर दार जो मुन्नी पर गुस्सा किया या इसके साथ मार पीट की... मुझसे बुरा कोई ना होगा...
हरिया - तु क्यूँ हमेशा गाँव के हर घर के फटे में घुसने की ताक में रहती है...
वैदेही - तुम दारूबाज लंपटों से मैं बात तक करना पसंद नहीं करती.. पर इस गाँव के आँगन में पल रहे.. जी रहे हर इज़्ज़त को अपनी इज़्ज़त समझती हूँ... जब जब उन पर कोई आंच भी आई तो मैं उनके लिए उतरुंगी... आती रहूंगी...
हरिया - तेरी इज़्ज़त है ही क्या... जो मेरे घर की इज़्ज़त के लिए... आती रहेगी...
वैदेही - मेरी इज़्ज़त पर उंगली तब उठाना... जब तु खुद को मर्द कहलाने के लायक समझेगा.. तेरी मर्दानगी रोज शनिया और उसके कुत्तों के आगे... शराब की भट्टी में... एड़ी पर रेंगती रहती है... इसलिए तो... वह और उसके चट्टे बट्टे मौका ढूंढते रहते हैं... तेरे घर की इज़्ज़त और अमानत को तार तार करने के लिए...
हरिया - हूंह्ह्... तुझसे बात कर रहा हूँ देखो... मेरी ही गलती है...

इतना कह कर हरिया वहाँ से चला जाता है l उसके जाने के बाद लक्ष्मी सुबकते हुए बैठ जाती है l

वैदेही - लक्ष्मी... हरिया मुझसे कहेगा कुछ नहीं... पर तु बता... क्या हुआ है... और मुन्नी को तुने क्यूँ गाली दी... मारा भी...
लक्ष्मी - क्या कहूँ दीदी... आज सुबह शनिया सरपंच को लेकर आया था.. इन्होंने पता नहीं कितना कर्ज लिया है शनिया से... अब सब मिला कर पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - (चौंकते हुए) क्या पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - हाँ दीदी... हमने ठीक से कभी हजार रुपये भी नहीं देखें... पाँच लाख रुपये...
वैदेही - ऐसे कैसे पाँच लाख रुपये... शनिया ने कह दिया... और हरिया ने मान लिया...
लक्ष्मी - माने तो नहीं... मान ही नहीं पाए... पर..
वैदेही - पर क्या...
लक्ष्मी - पर हरिया के पास लिखा पढ़ी के कागजात थे... इन्होंने जितना दारु पीया था... सब सूद के साथ मिला कर... अब पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - क्या... दारू पी पी कर पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - सिर्फ इन्हीं के नहीं है दीदी... बल्लु.. सुकांत... नरेश... सब के सब... किसी के पाँच... किसी के सात...
वैदेही - यह लोग तो पैसे दे देते थे ना...
लक्ष्मी - हाँ फिर भी... कई सालों से पी पी कर इतना हो गया है....
वैदेही - ठीक है... बात मेरी समझ में आ गई... पर इसमें मुन्नी को क्यूँ कोस रही थी... हाथ भी उठाया तुमने आज इस पर... बड़ी हो रही है वह...
लक्ष्मी - मारु नहीं तो क्या करूँ... कर्मजली लड़की हो कर पैदा जो हुई है...
वैदेही - तो... लड़की हो कर पैदा हुई... तो इससे क्या पाप हो गया... अब तो राजा नहीं उठा जा रहा है...
लक्ष्मी - पर उसके पालतू भेड़िये तो ताक में हैं... जो मौका ढूंढ रहे हैं...
वैदेही - एक मिनट... कहीं इस पाँच लाख के बदले...
लक्ष्मी - हाँ दीदी हाँ... कर्ज को जल्दी चुकता करने के लिए... लड़की को घर बुला रहे हैं... और इस पर सरपंच भी उनका साथ दे रहा है...

वैदेही अपने दोनों हाथों से कान को ढकते हुए अपनी आँखे मिंज कर पास पड़े एक टुटे फूटे कुर्सी पर बैठ जाती है l थोड़ी देर बाद

वैदेही - सरपंच ऐसे कैसे उनका साथ दे सकता है... उन हरामीयों की बात को मनवाने के लिए... उनके साथ घर घर जा रहा है...
लक्ष्मी - वही तो... दीदी... यह सब जो कर्ज के जाल में उलझे हुए हैं... दो दिन बाद इस विषय में... पंचायत में निर्णय होने वाला है... सारे गाँव वालों के बीच...
वैदेही - ओ... अब समझी... गाँव वालों के सामने... इन कर्जदारों पर निर्णय नहीं होने वाला है... बल्कि हर घर की इज़्ज़त में सेंध लगाने की जुगत लगा रहे हैं...

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कुछ लोग तहसील ऑफिस से बाहर निकल कर रोड के उस पार मिलन टी स्टॉल पर जाते हैं l पर वहाँ पहुँचते ही देखते हैं मिलन अपना दुकान बंद कर रहा था l यह देख कर एक आदमी पूछता है

आदमी - क्या बात है मिलन... धंधे के टाइम पर दुकान क्यूँ बंद कर रहा है...
मिलन - आज थोड़ी गड़बड़ हो गई है...
दुसरा आदमी - गड़बड़... कैसी गड़बड़...
मिलन - सुबह सामान ठीक से चेक किया नहीं... इसलिए जितनी जरूरत थी... उससे कम सामान लाया था... और इत्तेफ़ाक से सुबह से ही भीड़ बहुत थी... जितना लाया था सब ख़तम हो गया...
आदमी - तो यहीँ कहीँ आसपास से मंगवा ले ना...
मिलन - सर जी... यहाँ सब दुध वाला चाय पीते हैं... और अभी दुध का पैकेट मिलने से रहा... पाउडर वाला चाय एक बार कोशिश की थी... बहुत गाली पड़े थे... उम्मीद है... आप समझ रहे हैं...
सारे लोग - ठीक है... आज तो तुझे माफ़ कर रहे हैं... पर कल से... शाम होने से पहले दुकान बंद किया तो... यहाँ से दुकान उखाड़ देंगे समझा...
मिलन - जी माई बाप...

वह लोग वापस जाने के बजाय वहीँ पड़े बेंच पर बैठ कर बातेँ करने लगते हैं l मिलन कुछ ही मिनट में अपना सारा सामान पैक कर चुका था l तभी एक ऑटो वहाँ पर आती है l मिलन उसे आवाज देता है l ऑटो रुक जाती है l उस ऑटो में पहले से ही दो सवार थे l मिलन अपना सामान पीछे लोड कर अंदर बैठ जाता है l ऑटो आगे बढ़ जाता है l थोड़ी देर बाद ऑटो यशपुर से निकल जाता है l यशपुर के बाहर एक सुनसान जगह पर ऑटो खराब हो जाता है l ऑटो ड्राइवर उतर जाता है और चारो तरफ नजर घुमाता है, वह ऑटो ड्राइवर और कोई नहीं था, वह शैलेंद्र उर्फ सीलु था l ऑटो में दो और लोग विश्व और जिलु थे l

सीलु - (विश्व से) भाई तुम ऑटो के अंदर ही बैठे रहो... (जिलु और मिलु से) तुम दोनों उतरो बे... ऑटो ठीक करने का सीन बनाना है...

जिलु और मिलु उतर कर ऑटो को एक तरफ उठा कर उसके नीचे एक डंडा लगा देते हैं l सीलु फटाफट स्टेफिनी निकाल कर टायर निकालने का ऐक्टिंग करने लगता है l

सीलु - भाई... इससे पहले के तुम कुछ पूछो.. मैं कुछ पूछूं...
विश्व - हाँ... पूछ लो...
सीलु - तुम्हारा बार काउंसिल वाला लाइसेंस कब आएगा...
विश्व - शायद दो या तीन दिन बाद... या फिर ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता...
जिलु - और जो तुमने आरटीआई में इंफॉर्मेशन माँगा था... उसका क्या हुआ...
विश्व - वह भी एक दो दिन में आ जायेगा.... क्यूँ तुम लोग इतने बेकरार क्यूँ हो...
सीलु - बुरा ना मानना भाई... पर मुझे नहीं लगता... पीआईएल दाखिल करने से... तुम्हें कोई फायदा होगा...
विश्व - ह्म्म्म्म... मतलब तुम लोगों ने बहुत कुछ छानबीन कर लिया है...
मिलु - हाँ लगभग...
विश्व - ह्म्म्म्म ठीक है... अब तुम लोग... मुझे बात को पुरी तरह से समझाओ...
सीलु - भाई... तुमने आरटीआई जैसे ही फाइल किया... इन्हीं पैंतीस चालीस दिनों में... जो भी कुछ हुआ है.. तुम्हारे उस रुप फाउंडेशन केस में कुछ भी मदत नहीं मिलने वाला है...
मिलु - पहली बात... तुम्हारे साथ जो भी... एक्वुस्ड थे... वह सारे के सारे मार दिए गए... ज्यादातर गवाह भी गायब कर दिए गए....
जिलु - और जिन लोगों को तुम गवाह बना सकते थे... मतलब... बैंक के तीन स्टाफ... रेवेन्यू ऑफिस के दो स्टाफ और तहसील ऑफिस के तीन पदाधिकारी... अपनी अपनी मेडिकल सर्टिफ़िकेट निकलवा कर... OSD... बन बैठे हैं...
मिलु - यह OSD मतलब...
विश्व - ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्युटी... वह कर्मचारी... जिन्हें नौकरी से निकालने के बजाय... उन्हें बिना किसी काम धाम के... मानवता के आधार पर नौकरी पर बनाए रखा जाता है....
जिलु - हाँ...
विश्व - और जाहिर सी बात है कि... वे सब... सिजोफेर्नीया की सर्टिफिकेट लाए होंगे...
सीलु - हाँ... बिल्कुल...
विश्व - मतलब... अब वह सारे लोग गवाह के तौर पर नाकारे हो चुके हैं...

तीनों अपना सिर हाँ में हिला कर चुप हो जाते हैं l विश्व अपनी आँखे बंद कर कुछ सोचते हुए हँसने लगता है l

सील - भाई... दुखी मत हो...
विश्व - मैं दुखी कहाँ हूँ... मैं तो हँस रहा हूँ...
मिलु - पर क्यों... क्या अब भी... तुम हाइकोर्ट में पीआईएल दाखिल करोगे...
विश्व - हाँ...
तीनों - (हैरान हो कर) क्या...
जिलु - पर उससे फायदा क्या होगा...
विश्व - देखो... मैंने जब आरटीआई दाख़िल किया था... मुझे तभी से ही अंदेशा था... ऐसा ही कुछ होगा... इस केस के ताल्लुक़ और तीन प्रमुख गवाह हैं... सी आई... अनिकेत रोणा... श्रीधर परीडा... और राजा भैरव सिंह...
सीलु - पर भाई तुम्हीं कहा करते थे... रोणा का इसमे उतना रोल नहीं है... जितना एसआईटी का चीफ श्रीधर परीडा का है...
विश्व - हाँ पर उन तीनों को गवाही के लिए कोर्ट लाना टेढ़ी खीर है...
मीलु - क्यूँ...
विश्व - केस फिर से खुलेगा... इस बीच सात साल गुजर चुके हैं... बहुत कुछ बदल चुका है... या बदल दिया गया है... इसलिए पहले मुझे पीआईएल फाइल तो करने दो... देखते हैं... क्या होता है...
जिलु - भाई... तुम बात को बहुत ही कैजुअल ले रहे हो...
विश्व - नहीं... गेम तो अभी शुरु होगा... जैसे ही मैंने आरटीआई फाइल की... उन्होंने गलतियाँ करनी शुरु कर दी... जब कि सच कहूँ तो मैं भी जानता हूँ... यह सात साल के पुराने केस में संभावना बहुत कम है...
तीनों - तो...
विश्व - देखो... करप्शन एक चस्का है... जो भी उसकी मलाई एक बार खाये... जब तक कोई खतरा ना हो... वह करता ही जाता है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... उन्होंने करप्शन करना छोड़ा नहीं होगा... बल्कि नए तरीके से... मजे से कर रहे होंगे...
जिलु - तो उस पुराने केस का क्या होगा...
विश्व - पीआईएल तो फाइल होगा... वह लोग अपने ना पकड़े जाने पर और अब तक किए करतूत पर निश्चिंत होंगे... पर फिर भी उनका ध्यान पुराने केस पर जमायेंगे... पर हम असल में उनके नए करप्शन को खोज निकाल कर उसे पुराने केस में जोड़ेंगे... तब जाकर कुछ ना कुछ रिजल्ट हम को मिलेगा...
सीलु - हाँ भाई... तुम्हारे इस बात पर... मैं सौ फीसद सहमत हूँ... अभी इन पाँच छह महीनों में... सारे प्रमुख सरकारी कार्यालय में... पदाधिकारी बदले हैं... सब नए हैं... तो तुम्हारे कहे हिसाब से... करप्शन हो रहा है... हम जान भी रहे हैं... पर शायद नए तरीके से...
विश्व - ठीक है... तो अब बताओ... इन छह महीनों में क्या क्या हुआ है...
सीलु - भाई... इन छह महीनों में... यशपुर को स्मार्ट सिटी... और राजगड़ को स्मार्ट विलेज बनाने की अप्रूवल मिल गया है... पाँच साल पहले... राजगड़ से बाहर... निरोग हस्पताल बनाया जा रहा था... बहुत ही बड़ा हस्पताल... पर यश वर्धन की मौत के बाद... वह हस्पताल की बिल्डिंग विरान पड़ी थी... छह महीने पहले... उसे... राजगड़ मल्टी पर्पस कोऑपरेटिव ऑफिस में कन्वर्ट किया गया है...
मिलु - इन्हीं पाँच छह महीनों में... यशपुर और राजगड़ विकास के लिए... बहुत से प्रोजेक्ट अप्रूव्ड हुए हैं... वह भी... मनरेगा के तहत... पर...
विश्व - पर...
मिलु - इस बार... कोई मुर्दा नहीं है... पता नहीं पैसे कैसे गायब हो रहे हैं...
विश्व - ह्म्म्म्म... लगता है... इस बाबत हमें कोई लिंक मिलने वाला है...
तीनों - कैसे... कौन देगा...
विश्व - वही... जो मुझसे... पेपर से... कॉन्टेक्ट करना चाहता है... मुझे लगता है... इसी करप्शन पर वह कोई रौशनी डाल सकता है...
जिलु - पर टीलु कह रहा था... वह कुछ दिनों से कॉन्टेक्ट नहीं कर रहा है...
विश्व - हाँ... कर तो नहीं रहा है... अच्छा मैं यहाँ से उतर कर पैदल ही चला जाता हूँ... तुम लोग आधे घंटे बाद... अपने अपने ठिकाने पर पहुँच जाओ...
जिलु - रुको ना भाई... छोड़ देते हैं तुम्हें...
विश्व - नहीं... मैं नहीं चाहता कोई भी हमें... इकट्ठा देखे...


इतना कह कर विश्व ऑटो से उतर कर चल देता है l चलते चलते इनके कही बातों को याद करने लगता है l उसे अंदाजा था, भैरव सिंह अपनी नाक बचाने के लिए बहुत कुछ करेगा l पर जिन अधिकारियों को गवाही के लिए बुलाया जा सकता था, उन्होंने ही अपने तरफ से पागलपन का सर्टिफिकेट लेकर अपनी जान और आने वाले कानूनी पचड़े से खुद को बचा लिया l असल में भैरव सिंह के बाद सिर्फ एक ही गवाह बचता हैं l श्रीधर परीडा एसआईटी का चीफ जिसे शायद तोड़ा जा सकता है l पर कहीं भैरव सिंह इससे पहले श्रीधर परीडा को कुछ ना कर दे l और इन छह महीनों में जो भी कुछ हुआ है पुराने कडियों को जोड़ने के लिए बहुत अहम है l पर जोड़े तो जोड़े कैसे l भैरव सिंह अपने पुराने गलतियों से सबक लेकर अब जो भी कर रहा होगा फुल प्रूफ ही होगा l
ऐसे सोच सोच कर विश्व उसी पेपर वाले के दुकान पर आ पहुँचता है जहां से वह रोज उसके लिए टीलु पेपर लेकर जाता है l उसके कदम अपने आप दुकान के अंदर पहुँच जाते हैं l

दुकानदार - बोलिए साहब.. क्या चाहिए...
विश्व - (समझ नहीं पाता क्या कहे)
दुकानदार - सर यहाँ हर तरह के अखबार... किताबें मिलती हैं... बोलिए आपको कौनसा चाहिए...
विश्व - मैं... वह... असल में... मैं थोड़ा कंफ्यूज हूँ...
दुकानदार - जब मन भटके... कोई राह ना दिखे तो... यह किताब पढ़ना चाहिए... (दुकानदार एक किताब निकाल कर दिखाता है जिसके कवर पर लिखा था "शुभ संदेश")
विश्व - नहीं... मैं...
दुकानदार - अरे सहाब ले लीजिए... यह आपके लिए ही है... घर जाकर पढ़ लीजिए... अगर आपको पसंद ना आए.. तो कल लाकर लौटा दीजिएगा...
विश्व - नहीं... मैं ऐसे कैसे...
दुकानदार - अरे सहाब... मैंने कहा ना... यह किताब आपके लिए ही है... मेरी मानिये... जरा एकबार घर जाकर पढ़ लीजिए... पैसा तभी दीजिएगा जब अंदर का विषय पसंद आए... अगर पसंद ना आए... तो लाकर वापस लौटा दीजिए...

विश्व हिचकिचाते हुए किताब लेता है l तभी उसका फोन बजने लगता है l फोन निकाल कर देखता है l स्क्रीन पर दीदी डिस्प्ले हो रहा था l

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रंगमहल से अपने सरकारी क्वार्टर पर रोणा लौट आता है l सिगरेट की धुआं उड़ाते हुए अपने क्वार्टर के अंदर दाखिल होता है l ड्रॉइंग रूम में सोफ़े के पास पड़े टी पोय पर क्लाथ को हटाता है l उस टी पोय के बोर्ड पर विश्व का बड़ा सा मगर एक पुरानी फोटो लगी हुई थी l उस फोटो को देखते ही उसकी आँखों के नीचे की पेशियों में थर्राहट होने लगती हैं l वह आज महल में हुए व्याक्या को याद करने लगता है l


आओ रोणा आओ... पहले गायब होते थे... तो पता रहता था... तुम कहाँ पर हो... पर इस बार तुम ऐसे छुपे जैसे अमावस में चाँद... क्या बात है... (यह सवाल था भैरव सिंह का रोणा से)

रोणा भीमा के साथ रंगमहल के उपरी प्रकोष्ठ में आया था l यह भैरव सिंह का खास कमरा था जहां वह लोगों को बुला कर बैठक किया करता था l भैरव सिंह एक बड़े से सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे रोणा का इस तरह से अभिवादन किया l रोणा के भीतर आते ही भैरव सिंह अपना हाथ उठा कर भीमा को इशारे से जाने को कहता है, भीमा अपना सिर झुका कर उल्टे पाँव लौट जाता है l भीमा के वहाँ से जाते ही

रोणा - ऐसा कुछ नहीं है राजा साहब... मैं भुवनेश्वर आपको बता कर ही गया था...
भैरव सिंह - हाँ... गए तो थे... (अचानक हैरान हो जाता है) एक मिनट... हम यह क्या देख रहे हैं... (लहजा सपाट व निरस हो जाता है) जो क्षेत्रपाल से जुड़े हों... वह लोग अपने मूंछें नहीं मुंडवाते... जानते हो ना...
रोणा - जी राजा साहब... पर इन दो महीनों में... मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ है... जो मुझे मूंछें रखने लायक छोड़ा नहीं है...
भैरव सिंह - (अपनी भवें सिकुड़ कर रोणा की ओर देखता है) ह्म्म्म्म... चोट बहुत गहरी लगी है... दिल पर भी और दिमाग पर भी... देने वाला कौन है...
रोणा - (जबड़े सख्त हो जाते हैं, आँखों में खुन उतर आती है) व... वि... विश्वा..
भैरव सिंह - विश्वा... क्या किया उसने इसबार तुम्हारे साथ....
रोणा - (अपनी दांतों को पिसते हुए) पहली बार... उसने साबित कर दिया... मैं कितना लाचार हूँ... मैं कितना मजबूर हूँ... उसने मुझे एहसास दिलाया... के मैं एक बेचारा हूँ...
भैरव सिंह - पर तुम इसबार एक लड़की के पीछे गए थे ना.... क्या उस लड़की का... कोई संबंध है विश्वा से... जैसा कि तुम अनुमान लगा रहे थे...
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए चुप रहता है, फिर अपना सिर ना में हिलाते हुए) नहीं... नहीं राजा साहब... नहीं...
भैरव सिंह - पर तुमने जो अनुमान लगाया था...
रोणा - हाँ... कुछ अनुमान सही साबित हुए और कुछ गलत... प्रधान बाबु सही कह रहे थे... विश्वा जैसे सजायाफ्ता मुजरिम से... जो जैल से छूटे कुछ ही दिन हुए हों.. उससे कैसे कोई इज़्ज़त दार घर की लड़की दिल लगा सकती है... वह मेरा वहम था... जो इस बार दूर हो गया...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... इसका मतलब उस लड़की से... अब बदला नहीं लोगे...
रोणा - जी बेशक लूँगा... (अपने गाल पर हाथ फेरते हुए) अपने अपमान का बदला कैसे ना लूँ... उसे अपने नीचे लाए वगैर.. मेरी तड़प कम नहीं होगी...
भैरव सिंह - हम्म्म बहुत अच्छे... (एक कुटील मुस्कान लेकर) तो अनिकेत रोणा तुमने उस लड़की को... इस रंग महल के लिए कभी नहीं सोचा... हूँ..
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए स्तब्ध हो जाता है, फिर लड़खड़ाती हुई आवाज में ) सो.. सोचा... था... पर... राजा साहब... वह इतनी खूबसूरत है नहीं कि... इस रंग महल की रंगत बन सके... (नजरें झुका लेता है)

भैरव सिंह का चेहरा थोड़ा सख्त हो जाता है l वह तेज नजरों से रोणा को घूर रहा था l रोणा उसके नजरों का सामना नहीं कर पा रहा था l

रोणा - राजा साहब.. मैं आपका नमक हलाल हूँ... आप हुकुम करेंगे तो... मैं उसे इस रंग महल की रंगत बनाने के लिए... जरूर कुछ करूँगा...
भैरव सिंह - अच्छा... बड़ी जल्दी तैयार हो गए...
रोणा - वह... बात दरअसल यह है कि... उस लड़की से... मैं अपनी निजी खुन्नस निकालना चाहता था...
भैरव सिंह - (हँसने लगता है) हा हा हा हा हा... हम तो तुम्हें जांच रहे थे... बस तुम्हारी वफादारी देख रहे थे... तुम्हारे अंदर की जुनून को परख रहे थे... क्यूंकि तुम्हें बिना मूँछ के देख कर... हमें लगा तुम्हारी काबिलियत पर कहीं सीलन ना पड़ गया हो... जंक तो नहीं लग गया...
रोणा - तो बोलिए... क्या हुकुम है राजा साहब... अगर आप कहेंगे तो लड़की को उठवाकर इस रंग महल में आपके सेवा में पेश कर दूँगा...
भैरव सिंह - सबास... रोणा उस लड़की का विश्वा से जब कोई संबंध नहीं है... तो उस लड़की पर हमारा इरादा खत्म हो गया... क्यूंकि भैरव सिंह उन कलियों और फूलों को मसलता... रौंदता है... जिनकी कांटे भैरव सिंह को चुभते हैं... हम रंग महल में उसे अपने नीचे लाते हैं... जिसपर अपना नफरत उतारना हो... खैर यह बताओ... विश्वा ने तुम्हारे साथ ऐसा क्या किया... जो तुमने अपना मूंछें निकलवा दी...

यह सवाल रोणा को अंदर से छटपटा देता है l उसके जबड़े भींच जाते हैं आँखों के नीचे की मांस पेशियां फड़फड़ाने लगती हैं l आँखे नम हो कर तैरने लगती है l

रोणा - (दुख और पीड़ा से आवाज जैसे जम गया हो) राजा साहब... कुछ ऐसा किया है... जो मेरे मर्द होने की अहम को कुचल कर रख दिया है...
भैरव सिंह - ठीक है... हम समझ गए... कुछ ऐसा हुआ है... जो तुम बता नहीं सकते... और यह भी समझ गए... वह तुम पर इस कदर खुन्नस खाए हुआ है... के तुम्हारे पीछे पीछे भुवनेश्वर पहुँचकर... तुम्हारी बजा कर वापस आ गया है...
रोणा - (अपने हुए अपमान को याद कर आँखे बंद कर लेता है) राजा साहब... आपने मुझे बुलाया है... कोई हुकुम...
भैरव सिंह - हाँ रोणा हाँ... हम आज शाम को... भुवनेश्वर जा रहे हैं... छोटे राजा... युवराज और प्रधान के साथ हफ्ते दस दिन के लिए... कलकत्ता और राँची जा कर कुछ बिजनैस डील फाइनल करने हैं... तो यह कुछ दिन... राजगड़ पुरी तरह से तुम्हारे हवाले किए जा रहे हैं...
रोणा - (हैरानी से भैरव सिंह की ओर देखते हुए) मैं समझा नहीं
भैरव सिंह - अभी समझ जाओगे...

भैरव सिंह एक बेल बजाता है l कुछ देर बाद उस कमरे में भीमा के साथ सरपंच, शनिया, सत्तू आते हैं l

भैरव सिंह - रोणा कल से लेकर हमारे वापस आने तक... तुम मौका बनाओ... उस कमज़र्फ विश्वा से... तुम्हें कैसे बदला लेना है...
रोणा - मैं अभी भी समझा नहीं...
भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता है) कुछ दिन हुए हम कुछ अफवाह सुन रहे थे... इस बाबत हमने इस शनिया से बात की... तो उसने हमें जो बताया... हमें वह सब नागवार गुज़रा... शनिया ने कहा कि... रात के अंधेरे में... यह लोग तैयार नहीं थे... पर विश्वा अपनी पुरी तैयारी में था... इसलिए वह कांड हो गया... जो कभी होना नहीं चाहिए था... पर दोबारा विश्वा के पास ऐसा मौका नहीं आना चाहिए...
रोणा - तो इसमें सरपंच की क्या भूमिका है..
सरपंच - है दरोगा बाबु है... पंचायत ऑफिस में... हमने दो साल पहले एक चिट फंड शुरु किया था...
रोणा - चिट फंड...
शनिया - जी दरोगा जी... और जो लोग हमसे कुछ भी लेते थे... उसके एवज में... हम सब उसे चिट फंड में जोड़ कर दिखा देते थे... और उसके बदले उनसे... खाली कागजात पर अँगूठा या दस्तखत रख लेते थे...
रोणा - ओ...
सरपंच - हाँ... दरोगा बाबु... आज हम घर घर जा कर सबको कल की पंचायत के लिए नोटिस थमा दिया है... सबका फैसला हम पंचायत में करेंगे... या तो पैसा.. या फिर... हमारे घर पर उनका कोई काम करने आएगा... और तब तक काम करेगा... जब तक उनका कर्ज उतर ना जाए...
रोणा - तो इसमें विश्वा कहाँ आ गया... वह गाँव वालों के.. किसी के भी फटे में घुसेगा नहीं...
शनिया - वह नहीं घुसेगा... पर उसकी दीदी... वह तो घुसेगी.. और जब उसकी दीदी घुसेगी.. तो विश्वा भी घुसेगा...
रोणा - (शनिया से) याद है.. तुझे वकील बाबु ने क्या कहा था... जहां कानूनी पचड़े होंगे... तुझे उनसे पूछ कर यह करना चाहिए था...
शनिया - पर वकील बाबु हैं नहीं... और गाँव में हमारी वह इज़्ज़त रही नहीं... इसलिए हमने सरपंच जी से मशविरा किया... और राजा साहब से इजाजत ले रहे हैं...
रोणा - तुम अब तक यह नहीं समझ पाये... जहां कानून की दाव पेच होगी... वहाँ विश्वा भी अपना कानूनी दिमाग लगाएगा... और तुम लोगों को गलत साबित करेगा... तब हम क्या कर पाएंगे... क्यूंकि ... चिट फंड अगर सरकारी ज्ञांत में और मंजूरी में ना हो तो वह गैर कानूनी होती है... और इससे लोग तुम्हारे ही खिलाफ हो जाएंगे...
शनिया - राजगड़ में राजा साहब ही तो सरकार हैं... और यहाँ लोग राजा साहब के खिलाफ तो जाएंगे नहीं...
रोणा - पर तुम लोग राजा साहब नहीं हो... राजा साहब के कारिंदे हो... गाँव में लोग राजा साहब के वज़ह से लोग तुमसे डरते हैं...
सत्तू - यह हम जानते हैं... पर लोग वहाँ हमारे खिलाफ नहीं होंगे... बल्कि विश्वा के खिलाफ हो जाएंगे...
रोणा - क्या...
शनिया - जी दरोगा बाबु... जैसे ही विश्वा इन मामलों में घुसेगा... भीड़ में से हमारे ही आदमी लोगों को भड़काने का काम करेंगे...
रोणा - ह्म्म्म्म.. तो तुम लोगों ने बहुत सोच समझकर कर यह प्लान बनाया है...
सब - हाँ दरोगा जी...
रोणा - तो इसमें मेरी भूमिका क्या होगी...
भैरव सिंह - तुम बस हवाओं के रुख को पलटने मत देना रोणा... मौका ढूंढना... जब हाथ तुम्हारे मौका आयेगा... तब अपना खुन्नस जैसे चाहे वैसे निकाल लेना... पंचायत में मामला गरम होता जाएगा... हो सकता है तु तु मैं मैं होते होते वहाँ पर दंगा हो... और जहां दंगा होगा... कुछ लोग दंगे के शिकार हो जाएंगे... तब तुम्हें कुछ ना कुछ कारवाई करनी होगी... कारवाई में कुछ भी हो सकता है... उसे कानूनी जामा पहनाने की जिम्मा हमारा होगा... धारा 144 जारी होगी... तहसील ऑफिस से ऑर्डर हम दिलवा देंगे...
रोणा - (आंखे चमकने लगते हैं) वाह राजा साहब वाह... आपने तो कुएं को प्यासे तक पहुँचा दिया... मैं सब समझ गया राजा साहब... मैं सब समझ गया... गाँव में दंगा होगा... दंगे के चपेट में कुछ लोग आयेंगे ज़रूर... और दंगा होने से लेकर दंगे के बाद की रिपोर्ट मैं ऐसा बनाऊँगा की बड़े बड़े कानून के सूरमाओं के सिर चकराने लगेंगे

रोणा अपने यादों से बाहर आता है, दांतों को पिसते हुए अपनी सिगरेट का आखिरी कस भरता है l फिर उस सिगरेट को विश्व के तस्वीर पर मसल कर बुझाने लगता है l

रोणा - (विश्वा की तस्वीर से) सोच रहा है ना... मैंने राजा को क्यूँ नहीं बताया... की उस लड़की का तेरे साथ क्या रिश्ता है... वह इसलिए मादरचोद... तुझे एक कुर्सी पर बाँध कर... तेरे ही आँखों के सामने... तेरी छमीया का ना सिर्फ बजाऊंगा... बल्कि ऐसा फाड़ुंगा... ऐसा फाड़ुंगा... कोई डॉक्टर भी सी नहीं पाएगा... तुझसे राजा का लाख खुन्नस सही... पर मेरी खुन्नस के आगे राजा का खुन्नस जीरो है... उसका खुन्नस तेरे लिए उसके जुती में है... पर मेरा खुन्नस तेरे लिए मेरी नाक से भी उपर है.... इसीलिए तेरी छमीया को रंगमहल की रंगत बनाने से बचाया... क्यूंकि... उसे ताउम्र मेरी रखैल बनाऊँगा... दो दिन बाद होने वाले पंचायत में तेरे खातिर जो दंगे होंगे... वहाँ पर तेरे साथ कुछ भी हो... पर तुझे मैं मरने नहीं दूँगा... क्यूँ की तुझे मैं वह ज़ख़्म दूँगा... जो तेरी जेहन को... आत्मा तक को मरते दम तक गलाती रहेगी....
 

Kala Nag

Mr. X
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👉एक सौ सत्ताइसवां अपडेट
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अंधेरा छटा नहीं था विश्व पहुँच गया था l चूंकि उसने रात को ही खबर कर दी थी इसलिए रात को ही सीलु गाँव से निकल कर यशपुर चला गया था l विश्व पहुँचने के बाद उमाकांत सर जी का घर देख कर हैरान हो गया था l उसने जितना भी बदलाव किया था सीलु ने उसके ऊपर अपना दिमाग लगा कर और भी खूबसूरत बना दिया था l विश्व इस वक़्त इतना खुश था कि अगर सीलु सामने होता तो उसे गले से लगा लेता l

टीलु - क्या देख रहे हो भाई...
विश्व - पिछले जनम में तुम सब से मेरा भाई वाला ही नाता था..
टीलु - हाँ वह तो है... जरूर एक ही माँ के पेट से होंगे...
विश्व - हाँ...
टीलु - पर कोई ना... अब हम सब एक ही दीदी के भाई है... क्यूँ है कि नहीं...
विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम सब बातों में माहिर हो...
टीलु - क्या... भाई... इसमें बात बनाने वाली बात कहाँ से आ गई...
विश्व - दीदी बमुश्किल से तुम्हें ही देखी है... उन तीनों से मिली भी नहीं है... और तुम...
टीलु - गलत... मैंने वक़्त निकाल कर सीलु को दीदी से मिलवा चुका हूँ..
विश्व - (चौंक कर) क्या...
टीलु - घबराने का नहीं... गाँव में सबकी नजरों से छुपाते हुए दीदी से मिलवाया...
विश्व - पर क्यूँ...
टीलु - क्यूंकि दीदी मिलना चाहती थी...
विश्व - ह्म्म्म्म... तब ठीक है...
टीलु - पर भाई तुमने पूछा नहीं... दीदी क्यूँ मिलना चाहती थी...
विश्व - नहीं...
टीलु - पर क्यूँ...
विश्व - दीदी सीलु से मिलना चाहती थी.. क्यूंकि कुछ दिनों के लिए ही सही... सीलु ने विशु की जगह ली थी... और वैसे भी... मेरी दीदी का दिल बहुत बड़ा है... और तुम सब उसके लिए उतना ही हो... जितना कि मैं... जब कोई भी मेरा नहीं था... तब तुम लोग मेरे साथ आए... वह भी बिना किसी लाग लपेट के...
टीलु - बस भाई बस... मुझे और सेंटी मत करो... कुछ देर बाद तुम्हारे नन्हें प्यारे प्यारे बंदर आयेंगे... उनको सम्भालो... दिलासा दो...
विश्व - ऐ... उन्हें बंदर क्यूँ कह रहे हो...
टीलु - (बिदक कर) और नहीं तो... वह सब इत्ते इत्ते से छछूंदर... मुझे चमगादड़ मामा कह रहे हैं... (टीलु जिस अंदाज से कहा विश्व जोर जोर से हँसने लगता है) हाँ हाँ हँस लो... तुम उसके मामा... और मैं उन सबका चमगादड़ मामा...
विश्व - (हँसी को दबाने की कोशिश करते हुए) अरे इसमें इतना बुरा मानने वाली बात कहाँ है...
टीलु - (मुहँ बना कर) तो इसमें खुशी से उछलने वाली बात भी कहाँ है...
विश्व - अच्छा यही बात तुमको अंग्रेज़ी में कही होती तो...
टीलु - अंग्रेजी में..
विश्व - हाँ बैट मेन अंकल... (कह कर विश्व हँसने लगता है) अब तो बुरा नहीं लगेगा ना...

विश्व के साथ साथ टीलु भी हँसने लगता है, तभी एक लड़का आ पहुँचता है l वह दोनों अपनी हँसी को रोक कर उस लड़के की ओर देखते हैं l वह लड़का खुशी के मारे अपनी आँखे बड़ी करते हुए उन्हें देख रहा होता है l विश्व को देखते ही वह लड़का पूछता है l

लड़का - अरे मामा तुम आ गए...
विश्व - मैं गया ही कब था... और तुम इतनी सुबह सुबह...
टीलु - इन बंदरों को नींद आती भी है या नहीं... यह पूछो...
लकड़ा - (अपना गाल फुला कर) हूँन्न्न्नन्...

विश्व एक बड़ा सा चॉकलेट निकाल कर लड़के के सामने लहराता है l लड़का चॉकलेट देख कर खुश हो जाता है और लेने के लिए हाथ बढ़ाता है तो विश्व चॉकलेट को अपने पीछे ले जाता है l लड़का मुहँ बनाता है l

विश्व - पहले यह बताओ... तुम्हारा नाम क्या है...
लड़का - अरुण...
विश्व - हाँ तो अरुण... इतनी सुबह सुबह...
अरुण - वह क्या है कि मामा... आज... (अपनी दो उंगली दिखा कर) लंदन से थोड़ा जल्दी बुलावा आ गया था... इसलिए...
टीलु - ऐ छछूंदर... संढास के लिए बाहर जाने को लंदन बोल रहा है...
अरुण - (टीलु को उंगली दिखा कर) ऐ चमगादड़ मामा... यह हमारा कोड वर्ड है... हम यहाँ नहर को... लंदन बोलते हैं...
टीलु - अबे तेरी तो... (विश्व उसे रोकता है)
विश्व - देखो अरुण... गलत बात... चमगादड़ नहीं...
अरुण - (मुहँ बना कर) सॉरी मामा...
विश्व - अच्छा यह बताओ... तुम इन्हें.. चमगादड़... क्यूँ कह रहे थे...
अरुण - यह हमें आप से मिलने ही नहीं दे रहे थे... जब देखो द्वार पर... लटके ही दिखे... इसलिए...
विश्व - ठीक है... पर चमगादड़ नहीं... हाँ उन्हें तुम सब... बैट मेन अंकल कह सकते हो...
अरुण - ठीक है... पर क्यों...
टीलु - (बड़े एटीट्यूड के साथ) इसलिए... क्यूंकि तुम्हारे इस बैट मेन अंकल... फोरैंन रिटर्न हैं...
अरुण - फोरैंन रिटर्न... मतलब लंदन से...
टीलु - हाँ... (फिर चिल्ला कर) नहीं... तुम्हारे वाली.. लंदन से नहीं... असली लंदन से...
अरुण - हाँ हाँ ठीक है... (विश्व से) अच्छा मामा... लाइब्रेरी बन गया...
विश्व - हाँ... बन गया...
अरुण - और हमारे लिए खिलौने भी लाए हो....
विश्व - हाँ हाँ लाया हूँ... तुम सब आज तैयार हो कर आना... और आज के बाद यहाँ जम कर उछलकूद करना... पढ़ना...
अरुण - (खुशी से उछलते हुए) अरे वाह... मैं अभी जाता हूँ अपने सारे दोस्तों से कहता हूँ...
विश्व - हाँ और यह भी... आज सब तुम सब दो पहर का खाना... अपने मामा के साथ खाओगे...
अरुण - ठीक है...

कह कर बिना पीछे मुड़े अरुण वहाँ से भाग जाता है l विश्व उसे जाते हुए देखता है l


टीलु - भाई... कोई लफड़ा तो नहीं होगा ना..
विश्व - कैसा लफड़ा...
टीलु - तुम जानते हो... यह गाँव वाले...
विश्व - टीलु... मेरे भाई... अगर यह बच्चे आकर इस श्रीनिवास लाइब्रेरी को जिंदा कर देंगे... तो समझ लो... इन मरे हुए गाँव वालों को भी जिंदा कर देंगे...
टीलु - वह कैसे...
विश्व - वह सब मैं बाद में बताऊँगा... पहले यह बताओ... उन न्यूज पेपर में... और क्या क्या मेसेज मिला है अब तक...
टीलु - अरे हाँ... एक मिनट... अभी लाया...


टीलु अंदर जाता है, कुछ न्यूज पेपर और हाथ में एक डायरी लेकर आता है l डायरी को विश्व के हाथ में देकर और न्यूज पेपर्स को विश्व के सामने रखते हुए


टीलु - यह लो... तुमने जैसा कहा था... मैंने बिल्कुल वैसा ही डीकोडिंग करते हुए... जो भी मेसेज बना.. मैंने इस डायरी में लिख दिया है... देखो...

विश्व डायरी में वह पन्ना देखता है जिसमें टीलु ने डीकोड कर वह संदेश इकट्ठा किया था l

"तुम अकेले नहीं हो, एक काफिला तैयार है, युद्ध जब अनिवार्य है, हमारा मिलना आवश्यक है"
"भ्रष्टाचार ही भ्रस्टाचार है, हर तंत्र सम्मिलित है, तुम अकेले क्या करोगे, चलो मिलकर बाजी जीते"


विश्व - सिर्फ दो संदेश... इतने दिनों में... सिर्फ दो संदेश...
टीलु - हाँ... एक दिन मैं यशपुर बहुत जल्दी चला गया था... उस दिन के बाद... और संदेशे मिले नहीं... (विश्व टीलु को घूर कर देखने लगता है) सच कहता हूँ भाई... मैं कोई जासूसी करने नहीं गया था... हाँ थोड़ी जल्दी जरूर गया था... और शायद उसी दिन से वह डर कर मेसेज देना बंद कर दिया... मुझे लगता है... यह राजा क्षेत्रपाल की कोई जाल था... पकड़े जाने के डर से... संदेशा नहीं दे रहा....

विश्व डायरी में लिखे मेसेज्स गौर से पढ़ने लगता है l फिर अपनी आँखे मूँद कर कुछ सोचने लगता है l

टीलु - क्या सोचने लगे भाई...
विश्व - मुझे लगता है... यह बंदा शायद यह जानने की कोशिश कर रहा है... मैं उसके संदेशे पढ़ रहा हूँ या नहीं...
टीलु - मतलब तुम्हें लगता है... इसके पीछे राजा साहब नहीं है...
विश्व - पता नहीं... पर मेरे अंदर की गट फिलिंग कह रही है... कोई बंदा... राजा साहब का सताया हुआ... जो मुझसे ज्यादा मुझको जानता है... मेरी मदत करना चाहता है...
टीलु - तो अब... क्या करने का प्लान है...
विश्व - सोचता हूँ...

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द हैल
डायनिंग टेबल पर चारों सदस्य बैठे हुए हैं l रुप वीर से नजरें चुरा रही थी और खुद को शुभ्रा के साथ बात चित में व्यस्त दिखा रही थी l विक्रम चुप चाप अपना नास्ता कर रहा था पर वीर खोया हुआ था l यह सब बातेँ शुभ्रा नोटिस कर लिया था l

शुभ्रा - क्या बात है वीर... किस सोच में खोए हुए हो...
वीर - (अपनी सोच से बाहर आते हुए) कुछ नहीं भाभी...
शुभ्रा - कुछ तो है... तुम थोड़े टेंशन में लग रहे हो... क्यूँ नंदिनी... तुम्हें क्या लगता है...
रुप - म.. म.. मुझे क्या लगता है... मुझे क्या लगेगा भाभी... वीर भैया ट.. ट.. ठीक ही लग रहे हैं...
शुभ्रा - हाँ हाँ ठीक है ठीक है... तुम ऐसे हकला क्यूँ रही हो..
रुप - कहाँ... कहाँ भाभी... मैं ठीक हुँ... वह मैं अपनी सब्जेक्ट याद कर रही थी... और अपने फ्यूचर के बारे में सोच रही थी...
विक्रम - कैसा सब्जेक्ट... कैसा फ्यूचर...
रुप - वह भैया... मैं सोच रही थी... के भाभी से कुछ टीप्स लूँ... गाइडेंस लूँ...
विक्रम - किस बात पर...
रुप - यही के... मैं समर वेकेशन में डॉक्टरी की एंट्रेंस की तैयारी करूँ...
विक्रम - क्या... पर क्यूँ... और दो साल बाद... वैसे भी.. तुम शादी करने वाली हो...
रुप - तो... तो क्या हुआ भैया.. मैं डॉक्टरी के बाद भी तो शादी कर सकती हूँ...
विक्रम - पागल हो गई हो... या बचपना दिखा रही हो... तुम अच्छी तरह से जानती हो... तुम यहाँ पढ़ाई के लिए आई हो... पर उसके पीछे की वज़ह और शर्तें भूलो मत... (रुप का चेहरा उतर जाता है)
शुभ्रा - ओ.. हो... मैंने कहाँ से शुरू किया था... और बात कहाँ पर आकर पहुँच गई... वीर... प्लीज तुम बताओ... क्या सोच रहे थे...
वीर - भाभी... मैं वह...
शुभ्रा - (हैरान हो कर छेड़ते हुए) वीर... तुम झिझक रहे हो...
वीर - हाँ.. वह मैं...

सब खाना खाते हुए रुक जाते हैं और सबकी नजर वीर पर रुक जाती है l वीर सब नजर घुमाने के बाद शुभ्रा को देखते हुए कहता है l

वीर - मैंने एक अहम फैसला किया है... आई मिन कर लिया है... अपने लिए... इस घर के लिए... हम सबके लिए... (रुक जाता है)
विक्रम - कैसा फैसला...
वीर - भैया... भाभी... नंदिनी... आप सब अनु को जानते हो... अनु आप सबको पसंद भी है...
विक्रम - साफ साफ कहो वीर...
वीर - मैं... मैंने अनु से जल्द से जल्द शादी करने का फैसला किया है...

यह सुन कर सब पहले शुन हो जाते हैं, उसके बाद

विक्रम - क्या...
शुभ्रा - वाव...
रुप - आह सच में..
विक्रम - होल्ड ऑन होल्ड ऑन.. यह तुमने फैसला किया है... आई मिन... जो कर लिया है... इसमें हमें कोई ऐतराज नहीं है... क्यूंकि हम जानते हैं... छोटी माँ का भी आशीर्वाद है... पर तुम भूल रहे हो... टीम बड़े... और हैं... बड़े राजा जी... राजा साहब और छोटे राजा जी... जिनकी मंजुरी बहुत जरूरी है...
वीर - नहीं भूला हूँ... मैं आप सबको अपनी बात बता देना चाहता था.... सो बता दिया...
विक्रम - ठीक है... पर अचानक ऑल ऑफ सडन... आई मिन तुम... कुछ दिन या महीने रुक भी सकते थे...
वीर - क्यूँ...
विक्रम - देखो... अभी हम सब किसी ना किसी वज़ह से डिस्टर्ब्ड हैं... ऐसे हालात में... तुम हमारे घर के बड़े... राजी भी होंगे... डाऊट है... (कुछ देर के लिए सभी चुप हो जाते हैं, फिर) वैसे भी... तुमने अचानक यह फैसला क्यों लिया...

वीर चुप रहता है l उसकी चुप्पी को शुभ्रा समझ जाती है l इतने में सबका खाना चूंकि ख़तम हो चुका था, इसलिये शुभ्रा रुप को इशारे से अपने साथ किचन की चलने के लिए कहती है l रुप और शुभ्रा दोनों किचन के अंदर चले जाते हैं l

विक्रम - तुमने बताया नहीं... क्यूँ...
वीर - भैया... मैं... खुद को... जब से सुधारने में लगा हुआ हूँ... तब से... हाँ तब से... कोई ना कोई मेरी कुंडली में उंगली कर रहा है... मेरे पिछली जिंदगी को... आज से छुड़ाने की कोशिश में हूँ... अपने अंदर की... पुराने वीर से छुटकारा पाने की कोशिश में हूँ... पर कोई है... जो मेरे अंदर के पुराने वीर को ललकारना चाहता है...
विक्रम - तो इससे तुम्हारी शादी का... क्या कनेक्शन है...
वीर - मैं... उस वीर को हमेशा हमेशा के लिए दफना देना चाहता हूँ... मैं दुनिया जहान से लड़ कर जब घर को लौट कर आऊँ... अनु का मुस्कराता हुआ चेहरा देख कर... मैं दुनिया जहान को भुला देना चाहता हूँ... ना किसी पर कोई गरज... ना किसी से कोई शिकायत... मैं दुनिया से थका हारा लौट कर आऊँ... उसके पहलु में... एक नई जिंदगी.. एक नई जीत को हासिल करूँ... बस इसलिए अनु से जल्द से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ...

इतना कह कर वीर चुप हो जाता है और विक्रम की ओर देखने लगता है l विक्रम भी उसकी बातेँ सुन मुहँ फाड़े देखे जा रहा था l

विक्रम - (उसी हैरानी के साथ) ओ... वीर... मैं हैरान हूँ... तुम दुनिया से इतनी जल्दी हारने लगे...
वीर - तभी तो जीत की चाहत में... अनु से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ... (विक्रम के हाथ को पकड़ लेता है) भैया... मैंने भले ही... तुम्हारे छोटे भाई का फर्ज ना उतार पाया... पर तुमने कभी भी इस बात पर मलाल नहीं की... पर आज एक छोटे भाई का हक माँग रहा हूँ... प्लीज... हमारे घर के बड़ो से मेरे लिए बात करोगे... प्लीज...
विक्रम - (वीर के हाथ पर अपना हाथ रख देता है) चल पागल... मैंने कभी भी... अपने मन में... तुम्हारे लिए कोई गाँठ नहीं बाँधा है... अगर बड़ों से बात करनी ही है... तो बस एक हफ्ता रुक जाओ...
वीर - (चौंक कर) एक हफ्ता...
विक्रम - हाँ.. एक हफ्ता...
वीर - यह अचानक एक हफ्ता... कहीं जाना है क्या...
विक्रम - हाँ कल राजा साहब ने फोन पर बताया कि हमारा ESS अभी तक अपने स्टेट में अनबीटेबल है... उसे अब आउट ऑफ स्टेट ले जाने का मौका आया है...
वीर - हाँ तो.. कौन सा स्टेट...
विक्रम - झारखंड... और बंगाल राँची में एक मीटिंग है... उसके बाद कलकत्ता... सेक्यूरिटी सर्विस में.. हमारा स्कोप कहाँ तक हो सकता है... वगैरह वगैरह...
वीर - पर तुम क्यूँ...
विक्रम - क्या बचकाना सवाल है... अगर महांती होता... तो मैं कहाँ जाता... अब चूँकि सब कुछ मैं देख रहा हूँ... इसलिए मुझे जाना होगा... हमें कॉन्ट्रैक्ट मिल जाएगा... क्यूंकि पार्टी राजा साहब के पहचान वाले हैं...

वीर चेहरे पर टेंशन लिए अपनी जगह से उठ खड़ा हो जाता है और कुछ सोच में पड़ जाता है l विक्रम उसकी हालत देख कर हैरान होता है l

विक्रम - तुम इतने टेंश क्यूँ हो गए....
वीर - मैंने अनु से दस दिन की मोहलत मांगी थी... उसमें से सात दिन तो जाया हो जाएंगे... और बाकी तीन दिन में क्या हो जाएगा...
विक्रम - इतनी जल्दी क्या है वीर... क्यूँ... तुम जल्दबाज़ी ऐसे दिखा रहे हो... जैसे.. अनु और तुम्हारे बीच रिश्ता हद से आगे बढ़ गया हो... (थोड़ा रुक कर) क्या तुम...
वीर - (एक बेज़ान सी मुस्कराहट के साथ) देखा भैया... मेरे अंदर तुम वही पुराने वीर को ढूँढ रहे हो... (फिर थोड़ी सीरियस हो कर) जब अपने ही मेरे बारे में ऐसी राय रखते हों... तो गैरों से क्या गिला रखना...

कह कर वीर वहाँ से निकल जाता है l वीर की कही बातेँ विक्रम के जेहन पर हथोड़े की तरह बरसने लगते हैं l वह वीर को आवाज देने की हिम्मत तक नहीं कर पाता l वह भी बुझे मन से बाहर की ओर चला जाता है l यह सब किचन से दोनों भाभी और देवरानी सुन रहे थे, उनका भी चेहरा बुझ जाता है l

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उदय टहलता हुआ रोणा के क्वार्टर के सामने पहुँचता है l उसे बाहर रोणा की पर्सनल जीप दिखता है तो वह बहुत खुश हो जाता है l वह भागते हुए जीप के पास पहुँचता है और अपने बालों को ठीक कर क्वार्टर के बाहर पहुँचता है और बंद दरवाज़े को हल्के से धक्का देता है l दरवाजा खुल जाता है l उदय धीरे धीरे अंदर जाने लगता है l देखता है बाथ रुम में रोणा के चेहरा सेविंग फ़ोम से पुता हुआ है और वह अपना दाढ़ी बना रहा है l आईने में रोणा उदय को देख लेता है l

रोणा - तु अंदर कैसे आया बे...
उदय - वह साहब दरवाजा खुला था...
रोणा - हाँ हाँ मालुम है... पुछ रहा हूँ सीधे अंदर कैसे आ गया...
उदय - साब जी... आपने ही तो कहा था... मुझे अंदर आने के लिए... कभी दरवाजा खटखटाना ना पड़े...

इतना सुनते ही वह अपना रेजर रख देता है और उदय के पास चलते हुए आता है l इससे पहले उदय कुछ समझ पाता तब तक उदय के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ चुका था l तमाचा मारने के बाद रोणा वापस जाकर अपना दाढ़ी बनाने लगता है l उदय थप्पड़ खा कर सोचने लगा उससे क्या गलती हो गई l यही सोचते सोचते वह बाहर की ओर जाने लगता है l

रोणा - अब कहाँ जा रहा है...
उदय - वह बाहर जाकर दरवाजा खटखटाने...
रोणा - अबे भोषड़ी... जब आ गया है... जो रोने आया था... वह रो कर जा यहाँ से...

उदय अपना सिर खुजाने लगता है, तब तक रोणा अपना दाढ़ी बना कर चेहरा टावल से पोंछ रहा था l जब चेहरा पोंछ कर उदय के सामने आता है, तो उदय उसे देख कर चौंक जाता है l क्यूंकि रोणा ने अपना मूँछें निकाल लिया था l उदय उसे हैरानी भरे नजर से देख रहा होता है l


रोणा - ऐसे मुहँ फाड़े क्या देख रहा है...
उदय - आज आप बहुत बदले बदले लग रहे हैं... चेहरे से भी... और... (अपने गाल पर हाथ फेरने लगता है)
रोणा - पहली बात... तुझे मैंने एक काम भी दिया था... क्या याद है तुझे...
उदय - जी है ना... मैं रोज विश्वा पर नजर गड़ाए हुए था... इतने दिनों तक वह घर के बरामदे से बाहर नहीं आ रहा था... सिर्फ काम ही काम कर रहा था... आज सुबह ही वह काम ख़तम कर बाहर दिखा...

इतना सुनते ही रोणा का चेहरा सख्त हो जाता है और उसका हाथ उठ कर चल जाता है पर ठीक उदय के गाल तक आ कर रुक जाता है और अपनी जबड़े भींचते हुए उदय के गाल को थपथपाने लगता है, फिर अचानक अपनी मुट्ठी में उदय के गाल को भींच लेता है l उदय दर्द के मारे चीखने लगता है l

रोणा - श्श्श.. श्श्श.. चिल्ला क्यूँ रहा है...
उदय - आ ह... आह...
रोणा - तेरा गाल ही तो खिंच रहा हूँ... कौनसा तेरा गांड मार रहा हूँ... हाँय...
उदय - मुझे माफ कर दीजिये... साब...
रोणा - क्यूँ... क्या ग़लती किया तुने... हाँ... बोल बोल...
उदय - नहीं जानता... आह...
रोणा - तो सुन भोषड़ी के सुन... विश्वा... गायब था... तब से... जब से मैं यहाँ नहीं था... और आज सुबह ही तेरी अम्मा चोद कर आया है... मादरचोद... इसपर तु कांस्टेबल बनेगा... ह्म्म्म्म... कांस्टेबल...
उदय - आह... आ आ ह... माँ कसम साब जी... मैंने उसे दुर से ही देखा था... कैसे पता करता के वह विश्वा नहीं है... आप ही ने तो दूरी बना कर नजर रखने के लिए कहा था...

रोणा उसके गाल को छोड़ देता है l उदय अपने गाल को सहलाने लगता है l दर्द इतना था कि उसके आँखे नम हो गईं थीं l इतने में उसके दरवाजे पर दस्तक होता है l

रोणा - कौन है...
भीमा - (अंदर आते हुए) भीमा...
रोणा - ओ... कहो भीमा... सुबह सुबह... कैसे...
भीमा - (उदय पर नजर डालते हुए) दरोगा बाबु पिछले दो दिनों से राजा साहब आपको याद कर रहे हैं... इसलिए मैं यहाँ दो बार आकर लौट चुका हूँ... पर यह क्या... आपने अपनी मूंछें क्यूँ मुंडवा ली...
रोणा - (जबड़े भींच कर) वह क्या है कि भीमा... जब से सस्पेंड हो कर राजगड़ से बाहर आया... तबसे कोई मर्द वाला काम किया नहीं ना... ऊपर से जब से आया हूँ... रंग महल भी सुना और विरान है... इसलिए... अब तो मूंछें तब रखूँगा... जब कोई मर्द वाला काम कर लूँ...
भीमा - ओ... लगता है समस्या विकट है...
रोणा - वह मेरी समस्या है... तुम बोलो.. अभी क्या करना है...
भीमा - पता नहीं क्यूँ... दो दिन पहले.. सरपंच से मिलने के बाद.. राजा साहब आपको खोज रहे हैं... उपर से मैंने कई बार फोन लगाया आपको... पर आपने उठाया ही नहीं...
रोणा - हाँ... वह काम में... बहुत व्यस्त था... इतना की अपना ही होश नहीं था... चलो चलें... देखें राजा साहब को मेरी क्या जरूरत आ पड़ रहा है...

तीनों बाहर आते हैं भीमा और रोणा भीमा के लाए गाड़ी में बैठ कर चले जाते हैं l पीछे उदय वैसे ही अपने गाल सहलाते रह जाता है और मन ही मन बड़बड़ाने लगता है l

" साला कुत्ता कहीं का... लगता है विश्वा ने ही इसकी जमकर ली है... तभी साला दर्द छुपाने के लिए मूँछ कटवा कर फिर रहा है... कुत्ता कहीं का... जब तेरे जैसे ढीठ को विश्वा चकमा दे सकता है... भुर्ता बना सकता है... मैं विश्वा के आगे क्या हूँ बे.. अंडे से निकला हुआ चूजा... रुक साले रुक... एक दिन मैंने तेरी ना ली... तो मैं भी उदय नहीं... "

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दरवाज़ा खोलते ही सामने वीर को देख कर दादी चौंक जाती है l

दादी - अरे दामाद जी आप... इस वक़्त... अनु तो अभी ऑफिस के लिए निकलने वाली थी...
वीर - क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...
दादी - ओ हो... मैं भी क्या बेवकूफ़ी कर रही हूँ... दामाद जी द्वार पर खड़े हैं... मैं द्वार पर ही खड़ा कर बात कर रही हूँ... आइए... अंदर आइए...

दादी दरवाजे से हटती है l वीर अंदर आकर एक चेयर पर बैठ जाता है l अनु भागते हुए हाथ में एक कॉफी की ग्लास लेकर वीर को देती है l पहले वीर हैरान हो कर अनु की ओर देखता है फिर मुस्कराते हुए कॉफी अनु के हाथ से लेकर चुस्की भरता है l

दादी - बड़ी खयाल रहती है तुझे राजकुमार की... कोई दुसरा आए तो ध्यान कभी नहीं देती...

अनु शर्मा कर वहाँ से अंदर की ओर भाग जाती है l वीर के होंठो पर मुस्कुराहट और भी गहरा जाता है l

दादी - दामाद जी... क्या आपका यहाँ आना पहले से तय था...
वीर - नहीं तो... क्यूँ क्या हुआ...
दादी - सच कह रही हूँ दामाद जी... रानी साहिबा आईं थीं... इस कमबख्त की हाथ माँगने... तब इसे मेहमान नवाजी समझाना पड़ा... पर आपकी बात और है... देखिए ना... आप को आए कितनी देर हुए... आपके लिए कॉफी तैयार कर दी उसने...
वीर - दादी... मेरा यहाँ आने का वज़ह भी यही है...
दादी - क्या मतलब...
वीर - मुझे अनु की आदत.. या यूँ कहूँ के... मुझे अनु की लत लग चुकी है... मेरा खयाल करने वाली... खयाल रखने वाली... अब सिर्फ ऑफिस में नहीं... बल्कि मुझे मेरे घर के आँगन में चाहिये...
दादी - ओ... (खुश हो कर) मतलब आप शादी की बात करने आए हैं...
वीर - हाँ... शादी की बात करने आया हूँ... आज सुबह ही अपने बड़े भैया... भाभी और छोटी बहन को बताया... माँ तो कब से तैयार बैठी है... इससे पहले कि मैं अपने घर के बुजुर्ग और मुख्य को अपना अभिप्राय बताऊँ... मैं आपसे शादी की इजाजत लेने आया हूँ...
दादी - दामाद जी... जब मैंने रानी साहिबा को पहले से ही बता चुकी हूँ... अनु आपकी है... जब आपको ठीक लगे... तब आप उसे मर्यादा के साथ डॉली में ले जाएं...
वीर - (अपनी जगह से उठ कर दादी की हाथ पकड़ लेता है) थैंक्यू दादी थैंक्यू... मतलब.. आपको कोई एतराज नहीं है ना...
दादी - मुझे क्यूँ कोई एतराज होने लगी... पर आपकी उतावलापन देख कर लगता है... जैसे शादी आपको कल ही करनी है..
वीर - कास के ऐसा हो पाता... वह क्या है कि... मेरे बड़े भाई यानी युवराज जी... मेरे पिताजी... यानी... छोटे राजा जी और हमारे क्षेत्रपाल परिवार के मुखिया... मिलकर किसी काम से बाहर हफ्ते दस दिन के लिए जा रहे हैं... जब वे लौटेंगे.. तब मैं उन लोगों से शादी की इजाजत ले लूँगा...
दादी - तो ठीक है...
वीर - पर...
दादी - पर क्या दामाद जी...
वीर - दादी.. मैं चाहता हूँ... अनु यह दस दिन घर पर रहे... मेरा मतलब है... वह ड्यूटी पर ना आकर... घर पर आराम करे...(अपनी जेब से एक क्रेडिट कार्ड निकाल कर दादी को देते हुए) और शादी की तैयारी वह अपनी तरफ से करे...
अनु - (कमरे से बाहर आकर दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है) नहीं... ऐसा नहीं हो सकता...
दादी - ठीक ही कह रहे हैं दामाद जी... शादी के पहले मिलने जुलने का रिवाज नहीं होता...
अनु - वह मैं कुछ नहीं जानती... मुझसे रानी माँ ने वादा लिया था... चाहे कुछ भी हो जाए... शादी से पहले... कभी ऑफिस जाना बंद ना करूँ... वैसे भी कौनसा शादी का दिन तय हो गया है....
दादी - दामाद जी मैं रसोई में जाकर थोड़ा देखती हूँ... आप अपनी अनु को समझाने की कोशिश कीजिए... (कह कर दादी वहाँ से चली जाती है)
वीर - अनु... तुम समझ क्यूँ नहीं रही हो...
अनु - प्लीज... कुछ दिनों से हालात जैसे हो रहे हैं... मैं घर पर रहूँगी तो हमेशा चिंता में रहूँगी... आप सामने रहोगे... तो मुझे चिंता नहीं रहेगी... प्लीज...
वीर - देखो अनु... भैया के बाहर जाने से... पूरा काम का बोझ मुझ पर पड़ेगा... आने जाने से लेकर खाने पीने तक का कोई ठिकाना ना रहेगा...
अनु - (धीरे से) झूठे
वीर - सुनाई नहीं दिया... पर समझ गया... तुम मुझे झूठा कह रही हो... किसलिए
अनु - इसीलिए की आप झूठ कह रहे हैं...
वीर - नहीं अनु... सिर्फ ऑफिस ही नहीं... पार्टी का काम देखने इधर उधर जाना पड़ सकता है...
अनु - तभी तो... मैं... आपके साथ रहना चाहती हूँ.. कम से कम ऑफिस के वक़्त...

अनु के इसतरह से अनुरोध करने पर वीर अपना हथियार डालते हुए अनु से कहता है

वीर - ठीक है... अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो.... पर मेरी भी एक शर्त है...
अनु - जी कहिए...
वीर - तुम्हें रोज मेरी गाड़ी से ऑफिस आना जाना करोगी... वह भी सिर्फ ऑफिस के वक़्त...
अनु - (खुशी के साथ शर्माते हुए) मतलब आप रोज मुझे ले जाने एयर छोड़ने आयेंगे..
वीर - नहीं...
अनु - (थोड़ी मायूस हो कर) तो..
वीर - सिर्फ आज ही... मैं तुम्हें ले जाऊँगा... पर कल से... मैं ड्राइवर का इंतजाम कर दूँगा... मेरी अपनी गाड़ी से वह तुम्हें रोज घर से ले जाएगा... ऑफिस आवर ख़तम होते ही वह छोड़ देगा... मैं इसी शर्त पर ही तुम्हें ऑफिस में आलाउ कर सकता हूँ...
अनु - (मायूसी के साथ, मुहँ फूला कर) ठीक... है...


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एक रोती हुई स्कुल जाती किशोरी लड़की की हाथ पकड़ कर वैदेही लक्ष्मी के घर पहुँचती है l घर में लक्ष्मी और हरिया के बीच किसी बात को लेकर कहा सुनी हो रही थी l जैसे ही वैदेही वहाँ पहुँची दोनों के दोनों चुप हो गए l

वैदेही - क्या बात है लक्ष्मी.. किस बात को लेकर तुम दोनों झगड़ रहे थे...

लक्ष्मी और हरिया दोनों एक दूसरे को देखते हैं फिर लक्ष्मी अपना सिर झुका लेती है l पर हरिया गुस्से भरे नज़र से वैदेही के साथ आई उस लड़की की ओर देखने लगता है l वह लड़की हरिया की नजर से बचने के लिए वैदेही के पीछे छुपने लगती है l


वैदेही - ऐ हरिया.. खबर दार जो मुन्नी पर गुस्सा किया या इसके साथ मार पीट की... मुझसे बुरा कोई ना होगा...
हरिया - तु क्यूँ हमेशा गाँव के हर घर के फटे में घुसने की ताक में रहती है...
वैदेही - तुम दारूबाज लंपटों से मैं बात तक करना पसंद नहीं करती.. पर इस गाँव के आँगन में पल रहे.. जी रहे हर इज़्ज़त को अपनी इज़्ज़त समझती हूँ... जब जब उन पर कोई आंच भी आई तो मैं उनके लिए उतरुंगी... आती रहूंगी...
हरिया - तेरी इज़्ज़त है ही क्या... जो मेरे घर की इज़्ज़त के लिए... आती रहेगी...
वैदेही - मेरी इज़्ज़त पर उंगली तब उठाना... जब तु खुद को मर्द कहलाने के लायक समझेगा.. तेरी मर्दानगी रोज शनिया और उसके कुत्तों के आगे... शराब की भट्टी में... एड़ी पर रेंगती रहती है... इसलिए तो... वह और उसके चट्टे बट्टे मौका ढूंढते रहते हैं... तेरे घर की इज़्ज़त और अमानत को तार तार करने के लिए...
हरिया - हूंह्ह्... तुझसे बात कर रहा हूँ देखो... मेरी ही गलती है...

इतना कह कर हरिया वहाँ से चला जाता है l उसके जाने के बाद लक्ष्मी सुबकते हुए बैठ जाती है l

वैदेही - लक्ष्मी... हरिया मुझसे कहेगा कुछ नहीं... पर तु बता... क्या हुआ है... और मुन्नी को तुने क्यूँ गाली दी... मारा भी...
लक्ष्मी - क्या कहूँ दीदी... आज सुबह शनिया सरपंच को लेकर आया था.. इन्होंने पता नहीं कितना कर्ज लिया है शनिया से... अब सब मिला कर पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - (चौंकते हुए) क्या पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - हाँ दीदी... हमने ठीक से कभी हजार रुपये भी नहीं देखें... पाँच लाख रुपये...
वैदेही - ऐसे कैसे पाँच लाख रुपये... शनिया ने कह दिया... और हरिया ने मान लिया...
लक्ष्मी - माने तो नहीं... मान ही नहीं पाए... पर..
वैदेही - पर क्या...
लक्ष्मी - पर हरिया के पास लिखा पढ़ी के कागजात थे... इन्होंने जितना दारु पीया था... सब सूद के साथ मिला कर... अब पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - क्या... दारू पी पी कर पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - सिर्फ इन्हीं के नहीं है दीदी... बल्लु.. सुकांत... नरेश... सब के सब... किसी के पाँच... किसी के सात...
वैदेही - यह लोग तो पैसे दे देते थे ना...
लक्ष्मी - हाँ फिर भी... कई सालों से पी पी कर इतना हो गया है....
वैदेही - ठीक है... बात मेरी समझ में आ गई... पर इसमें मुन्नी को क्यूँ कोस रही थी... हाथ भी उठाया तुमने आज इस पर... बड़ी हो रही है वह...
लक्ष्मी - मारु नहीं तो क्या करूँ... कर्मजली लड़की हो कर पैदा जो हुई है...
वैदेही - तो... लड़की हो कर पैदा हुई... तो इससे क्या पाप हो गया... अब तो राजा नहीं उठा जा रहा है...
लक्ष्मी - पर उसके पालतू भेड़िये तो ताक में हैं... जो मौका ढूंढ रहे हैं...
वैदेही - एक मिनट... कहीं इस पाँच लाख के बदले...
लक्ष्मी - हाँ दीदी हाँ... कर्ज को जल्दी चुकता करने के लिए... लड़की को घर बुला रहे हैं... और इस पर सरपंच भी उनका साथ दे रहा है...

वैदेही अपने दोनों हाथों से कान को ढकते हुए अपनी आँखे मिंज कर पास पड़े एक टुटे फूटे कुर्सी पर बैठ जाती है l थोड़ी देर बाद

वैदेही - सरपंच ऐसे कैसे उनका साथ दे सकता है... उन हरामीयों की बात को मनवाने के लिए... उनके साथ घर घर जा रहा है...
लक्ष्मी - वही तो... दीदी... यह सब जो कर्ज के जाल में उलझे हुए हैं... दो दिन बाद इस विषय में... पंचायत में निर्णय होने वाला है... सारे गाँव वालों के बीच...
वैदेही - ओ... अब समझी... गाँव वालों के सामने... इन कर्जदारों पर निर्णय नहीं होने वाला है... बल्कि हर घर की इज़्ज़त में सेंध लगाने की जुगत लगा रहे हैं...

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कुछ लोग तहसील ऑफिस से बाहर निकल कर रोड के उस पार मिलन टी स्टॉल पर जाते हैं l पर वहाँ पहुँचते ही देखते हैं मिलन अपना दुकान बंद कर रहा था l यह देख कर एक आदमी पूछता है

आदमी - क्या बात है मिलन... धंधे के टाइम पर दुकान क्यूँ बंद कर रहा है...
मिलन - आज थोड़ी गड़बड़ हो गई है...
दुसरा आदमी - गड़बड़... कैसी गड़बड़...
मिलन - सुबह सामान ठीक से चेक किया नहीं... इसलिए जितनी जरूरत थी... उससे कम सामान लाया था... और इत्तेफ़ाक से सुबह से ही भीड़ बहुत थी... जितना लाया था सब ख़तम हो गया...
आदमी - तो यहीँ कहीँ आसपास से मंगवा ले ना...
मिलन - सर जी... यहाँ सब दुध वाला चाय पीते हैं... और अभी दुध का पैकेट मिलने से रहा... पाउडर वाला चाय एक बार कोशिश की थी... बहुत गाली पड़े थे... उम्मीद है... आप समझ रहे हैं...
सारे लोग - ठीक है... आज तो तुझे माफ़ कर रहे हैं... पर कल से... शाम होने से पहले दुकान बंद किया तो... यहाँ से दुकान उखाड़ देंगे समझा...
मिलन - जी माई बाप...

वह लोग वापस जाने के बजाय वहीँ पड़े बेंच पर बैठ कर बातेँ करने लगते हैं l मिलन कुछ ही मिनट में अपना सारा सामान पैक कर चुका था l तभी एक ऑटो वहाँ पर आती है l मिलन उसे आवाज देता है l ऑटो रुक जाती है l उस ऑटो में पहले से ही दो सवार थे l मिलन अपना सामान पीछे लोड कर अंदर बैठ जाता है l ऑटो आगे बढ़ जाता है l थोड़ी देर बाद ऑटो यशपुर से निकल जाता है l यशपुर के बाहर एक सुनसान जगह पर ऑटो खराब हो जाता है l ऑटो ड्राइवर उतर जाता है और चारो तरफ नजर घुमाता है, वह ऑटो ड्राइवर और कोई नहीं था, वह शैलेंद्र उर्फ सीलु था l ऑटो में दो और लोग विश्व और जिलु थे l

सीलु - (विश्व से) भाई तुम ऑटो के अंदर ही बैठे रहो... (जिलु और मिलु से) तुम दोनों उतरो बे... ऑटो ठीक करने का सीन बनाना है...

जिलु और मिलु उतर कर ऑटो को एक तरफ उठा कर उसके नीचे एक डंडा लगा देते हैं l सीलु फटाफट स्टेफिनी निकाल कर टायर निकालने का ऐक्टिंग करने लगता है l

सीलु - भाई... इससे पहले के तुम कुछ पूछो.. मैं कुछ पूछूं...
विश्व - हाँ... पूछ लो...
सीलु - तुम्हारा बार काउंसिल वाला लाइसेंस कब आएगा...
विश्व - शायद दो या तीन दिन बाद... या फिर ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता...
जिलु - और जो तुमने आरटीआई में इंफॉर्मेशन माँगा था... उसका क्या हुआ...
विश्व - वह भी एक दो दिन में आ जायेगा.... क्यूँ तुम लोग इतने बेकरार क्यूँ हो...
सीलु - बुरा ना मानना भाई... पर मुझे नहीं लगता... पीआईएल दाखिल करने से... तुम्हें कोई फायदा होगा...
विश्व - ह्म्म्म्म... मतलब तुम लोगों ने बहुत कुछ छानबीन कर लिया है...
मिलु - हाँ लगभग...
विश्व - ह्म्म्म्म ठीक है... अब तुम लोग... मुझे बात को पुरी तरह से समझाओ...
सीलु - भाई... तुमने आरटीआई जैसे ही फाइल किया... इन्हीं पैंतीस चालीस दिनों में... जो भी कुछ हुआ है.. तुम्हारे उस रुप फाउंडेशन केस में कुछ भी मदत नहीं मिलने वाला है...
मिलु - पहली बात... तुम्हारे साथ जो भी... एक्वुस्ड थे... वह सारे के सारे मार दिए गए... ज्यादातर गवाह भी गायब कर दिए गए....
जिलु - और जिन लोगों को तुम गवाह बना सकते थे... मतलब... बैंक के तीन स्टाफ... रेवेन्यू ऑफिस के दो स्टाफ और तहसील ऑफिस के तीन पदाधिकारी... अपनी अपनी मेडिकल सर्टिफ़िकेट निकलवा कर... OSD... बन बैठे हैं...
मिलु - यह OSD मतलब...
विश्व - ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्युटी... वह कर्मचारी... जिन्हें नौकरी से निकालने के बजाय... उन्हें बिना किसी काम धाम के... मानवता के आधार पर नौकरी पर बनाए रखा जाता है....
जिलु - हाँ...
विश्व - और जाहिर सी बात है कि... वे सब... सिजोफेर्नीया की सर्टिफिकेट लाए होंगे...
सीलु - हाँ... बिल्कुल...
विश्व - मतलब... अब वह सारे लोग गवाह के तौर पर नाकारे हो चुके हैं...

तीनों अपना सिर हाँ में हिला कर चुप हो जाते हैं l विश्व अपनी आँखे बंद कर कुछ सोचते हुए हँसने लगता है l

सील - भाई... दुखी मत हो...
विश्व - मैं दुखी कहाँ हूँ... मैं तो हँस रहा हूँ...
मिलु - पर क्यों... क्या अब भी... तुम हाइकोर्ट में पीआईएल दाखिल करोगे...
विश्व - हाँ...
तीनों - (हैरान हो कर) क्या...
जिलु - पर उससे फायदा क्या होगा...
विश्व - देखो... मैंने जब आरटीआई दाख़िल किया था... मुझे तभी से ही अंदेशा था... ऐसा ही कुछ होगा... इस केस के ताल्लुक़ और तीन प्रमुख गवाह हैं... सी आई... अनिकेत रोणा... श्रीधर परीडा... और राजा भैरव सिंह...
सीलु - पर भाई तुम्हीं कहा करते थे... रोणा का इसमे उतना रोल नहीं है... जितना एसआईटी का चीफ श्रीधर परीडा का है...
विश्व - हाँ पर उन तीनों को गवाही के लिए कोर्ट लाना टेढ़ी खीर है...
मीलु - क्यूँ...
विश्व - केस फिर से खुलेगा... इस बीच सात साल गुजर चुके हैं... बहुत कुछ बदल चुका है... या बदल दिया गया है... इसलिए पहले मुझे पीआईएल फाइल तो करने दो... देखते हैं... क्या होता है...
जिलु - भाई... तुम बात को बहुत ही कैजुअल ले रहे हो...
विश्व - नहीं... गेम तो अभी शुरु होगा... जैसे ही मैंने आरटीआई फाइल की... उन्होंने गलतियाँ करनी शुरु कर दी... जब कि सच कहूँ तो मैं भी जानता हूँ... यह सात साल के पुराने केस में संभावना बहुत कम है...
तीनों - तो...
विश्व - देखो... करप्शन एक चस्का है... जो भी उसकी मलाई एक बार खाये... जब तक कोई खतरा ना हो... वह करता ही जाता है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... उन्होंने करप्शन करना छोड़ा नहीं होगा... बल्कि नए तरीके से... मजे से कर रहे होंगे...
जिलु - तो उस पुराने केस का क्या होगा...
विश्व - पीआईएल तो फाइल होगा... वह लोग अपने ना पकड़े जाने पर और अब तक किए करतूत पर निश्चिंत होंगे... पर फिर भी उनका ध्यान पुराने केस पर जमायेंगे... पर हम असल में उनके नए करप्शन को खोज निकाल कर उसे पुराने केस में जोड़ेंगे... तब जाकर कुछ ना कुछ रिजल्ट हम को मिलेगा...
सीलु - हाँ भाई... तुम्हारे इस बात पर... मैं सौ फीसद सहमत हूँ... अभी इन पाँच छह महीनों में... सारे प्रमुख सरकारी कार्यालय में... पदाधिकारी बदले हैं... सब नए हैं... तो तुम्हारे कहे हिसाब से... करप्शन हो रहा है... हम जान भी रहे हैं... पर शायद नए तरीके से...
विश्व - ठीक है... तो अब बताओ... इन छह महीनों में क्या क्या हुआ है...
सीलु - भाई... इन छह महीनों में... यशपुर को स्मार्ट सिटी... और राजगड़ को स्मार्ट विलेज बनाने की अप्रूवल मिल गया है... पाँच साल पहले... राजगड़ से बाहर... निरोग हस्पताल बनाया जा रहा था... बहुत ही बड़ा हस्पताल... पर यश वर्धन की मौत के बाद... वह हस्पताल की बिल्डिंग विरान पड़ी थी... छह महीने पहले... उसे... राजगड़ मल्टी पर्पस कोऑपरेटिव ऑफिस में कन्वर्ट किया गया है...
मिलु - इन्हीं पाँच छह महीनों में... यशपुर और राजगड़ विकास के लिए... बहुत से प्रोजेक्ट अप्रूव्ड हुए हैं... वह भी... मनरेगा के तहत... पर...
विश्व - पर...
मिलु - इस बार... कोई मुर्दा नहीं है... पता नहीं पैसे कैसे गायब हो रहे हैं...
विश्व - ह्म्म्म्म... लगता है... इस बाबत हमें कोई लिंक मिलने वाला है...
तीनों - कैसे... कौन देगा...
विश्व - वही... जो मुझसे... पेपर से... कॉन्टेक्ट करना चाहता है... मुझे लगता है... इसी करप्शन पर वह कोई रौशनी डाल सकता है...
जिलु - पर टीलु कह रहा था... वह कुछ दिनों से कॉन्टेक्ट नहीं कर रहा है...
विश्व - हाँ... कर तो नहीं रहा है... अच्छा मैं यहाँ से उतर कर पैदल ही चला जाता हूँ... तुम लोग आधे घंटे बाद... अपने अपने ठिकाने पर पहुँच जाओ...
जिलु - रुको ना भाई... छोड़ देते हैं तुम्हें...
विश्व - नहीं... मैं नहीं चाहता कोई भी हमें... इकट्ठा देखे...


इतना कह कर विश्व ऑटो से उतर कर चल देता है l चलते चलते इनके कही बातों को याद करने लगता है l उसे अंदाजा था, भैरव सिंह अपनी नाक बचाने के लिए बहुत कुछ करेगा l पर जिन अधिकारियों को गवाही के लिए बुलाया जा सकता था, उन्होंने ही अपने तरफ से पागलपन का सर्टिफिकेट लेकर अपनी जान और आने वाले कानूनी पचड़े से खुद को बचा लिया l असल में भैरव सिंह के बाद सिर्फ एक ही गवाह बचता हैं l श्रीधर परीडा एसआईटी का चीफ जिसे शायद तोड़ा जा सकता है l पर कहीं भैरव सिंह इससे पहले श्रीधर परीडा को कुछ ना कर दे l और इन छह महीनों में जो भी कुछ हुआ है पुराने कडियों को जोड़ने के लिए बहुत अहम है l पर जोड़े तो जोड़े कैसे l भैरव सिंह अपने पुराने गलतियों से सबक लेकर अब जो भी कर रहा होगा फुल प्रूफ ही होगा l
ऐसे सोच सोच कर विश्व उसी पेपर वाले के दुकान पर आ पहुँचता है जहां से वह रोज उसके लिए टीलु पेपर लेकर जाता है l उसके कदम अपने आप दुकान के अंदर पहुँच जाते हैं l

दुकानदार - बोलिए साहब.. क्या चाहिए...
विश्व - (समझ नहीं पाता क्या कहे)
दुकानदार - सर यहाँ हर तरह के अखबार... किताबें मिलती हैं... बोलिए आपको कौनसा चाहिए...
विश्व - मैं... वह... असल में... मैं थोड़ा कंफ्यूज हूँ...
दुकानदार - जब मन भटके... कोई राह ना दिखे तो... यह किताब पढ़ना चाहिए... (दुकानदार एक किताब निकाल कर दिखाता है जिसके कवर पर लिखा था "शुभ संदेश")
विश्व - नहीं... मैं...
दुकानदार - अरे सहाब ले लीजिए... यह आपके लिए ही है... घर जाकर पढ़ लीजिए... अगर आपको पसंद ना आए.. तो कल लाकर लौटा दीजिएगा...
विश्व - नहीं... मैं ऐसे कैसे...
दुकानदार - अरे सहाब... मैंने कहा ना... यह किताब आपके लिए ही है... मेरी मानिये... जरा एकबार घर जाकर पढ़ लीजिए... पैसा तभी दीजिएगा जब अंदर का विषय पसंद आए... अगर पसंद ना आए... तो लाकर वापस लौटा दीजिए...

विश्व हिचकिचाते हुए किताब लेता है l तभी उसका फोन बजने लगता है l फोन निकाल कर देखता है l स्क्रीन पर दीदी डिस्प्ले हो रहा था l

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रंगमहल से अपने सरकारी क्वार्टर पर रोणा लौट आता है l सिगरेट की धुआं उड़ाते हुए अपने क्वार्टर के अंदर दाखिल होता है l ड्रॉइंग रूम में सोफ़े के पास पड़े टी पोय पर क्लाथ को हटाता है l उस टी पोय के बोर्ड पर विश्व का बड़ा सा मगर एक पुरानी फोटो लगी हुई थी l उस फोटो को देखते ही उसकी आँखों के नीचे की पेशियों में थर्राहट होने लगती हैं l वह आज महल में हुए व्याक्या को याद करने लगता है l


आओ रोणा आओ... पहले गायब होते थे... तो पता रहता था... तुम कहाँ पर हो... पर इस बार तुम ऐसे छुपे जैसे अमावस में चाँद... क्या बात है... (यह सवाल था भैरव सिंह का रोणा से)

रोणा भीमा के साथ रंगमहल के उपरी प्रकोष्ठ में आया था l यह भैरव सिंह का खास कमरा था जहां वह लोगों को बुला कर बैठक किया करता था l भैरव सिंह एक बड़े से सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे रोणा का इस तरह से अभिवादन किया l रोणा के भीतर आते ही भैरव सिंह अपना हाथ उठा कर भीमा को इशारे से जाने को कहता है, भीमा अपना सिर झुका कर उल्टे पाँव लौट जाता है l भीमा के वहाँ से जाते ही

रोणा - ऐसा कुछ नहीं है राजा साहब... मैं भुवनेश्वर आपको बता कर ही गया था...
भैरव सिंह - हाँ... गए तो थे... (अचानक हैरान हो जाता है) एक मिनट... हम यह क्या देख रहे हैं... (लहजा सपाट व निरस हो जाता है) जो क्षेत्रपाल से जुड़े हों... वह लोग अपने मूंछें नहीं मुंडवाते... जानते हो ना...
रोणा - जी राजा साहब... पर इन दो महीनों में... मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ है... जो मुझे मूंछें रखने लायक छोड़ा नहीं है...
भैरव सिंह - (अपनी भवें सिकुड़ कर रोणा की ओर देखता है) ह्म्म्म्म... चोट बहुत गहरी लगी है... दिल पर भी और दिमाग पर भी... देने वाला कौन है...
रोणा - (जबड़े सख्त हो जाते हैं, आँखों में खुन उतर आती है) व... वि... विश्वा..
भैरव सिंह - विश्वा... क्या किया उसने इसबार तुम्हारे साथ....
रोणा - (अपनी दांतों को पिसते हुए) पहली बार... उसने साबित कर दिया... मैं कितना लाचार हूँ... मैं कितना मजबूर हूँ... उसने मुझे एहसास दिलाया... के मैं एक बेचारा हूँ...
भैरव सिंह - पर तुम इसबार एक लड़की के पीछे गए थे ना.... क्या उस लड़की का... कोई संबंध है विश्वा से... जैसा कि तुम अनुमान लगा रहे थे...
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए चुप रहता है, फिर अपना सिर ना में हिलाते हुए) नहीं... नहीं राजा साहब... नहीं...
भैरव सिंह - पर तुमने जो अनुमान लगाया था...
रोणा - हाँ... कुछ अनुमान सही साबित हुए और कुछ गलत... प्रधान बाबु सही कह रहे थे... विश्वा जैसे सजायाफ्ता मुजरिम से... जो जैल से छूटे कुछ ही दिन हुए हों.. उससे कैसे कोई इज़्ज़त दार घर की लड़की दिल लगा सकती है... वह मेरा वहम था... जो इस बार दूर हो गया...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... इसका मतलब उस लड़की से... अब बदला नहीं लोगे...
रोणा - जी बेशक लूँगा... (अपने गाल पर हाथ फेरते हुए) अपने अपमान का बदला कैसे ना लूँ... उसे अपने नीचे लाए वगैर.. मेरी तड़प कम नहीं होगी...
भैरव सिंह - हम्म्म बहुत अच्छे... (एक कुटील मुस्कान लेकर) तो अनिकेत रोणा तुमने उस लड़की को... इस रंग महल के लिए कभी नहीं सोचा... हूँ..
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए स्तब्ध हो जाता है, फिर लड़खड़ाती हुई आवाज में ) सो.. सोचा... था... पर... राजा साहब... वह इतनी खूबसूरत है नहीं कि... इस रंग महल की रंगत बन सके... (नजरें झुका लेता है)

भैरव सिंह का चेहरा थोड़ा सख्त हो जाता है l वह तेज नजरों से रोणा को घूर रहा था l रोणा उसके नजरों का सामना नहीं कर पा रहा था l

रोणा - राजा साहब.. मैं आपका नमक हलाल हूँ... आप हुकुम करेंगे तो... मैं उसे इस रंग महल की रंगत बनाने के लिए... जरूर कुछ करूँगा...
भैरव सिंह - अच्छा... बड़ी जल्दी तैयार हो गए...
रोणा - वह... बात दरअसल यह है कि... उस लड़की से... मैं अपनी निजी खुन्नस निकालना चाहता था...
भैरव सिंह - (हँसने लगता है) हा हा हा हा हा... हम तो तुम्हें जांच रहे थे... बस तुम्हारी वफादारी देख रहे थे... तुम्हारे अंदर की जुनून को परख रहे थे... क्यूंकि तुम्हें बिना मूँछ के देख कर... हमें लगा तुम्हारी काबिलियत पर कहीं सीलन ना पड़ गया हो... जंक तो नहीं लग गया...
रोणा - तो बोलिए... क्या हुकुम है राजा साहब... अगर आप कहेंगे तो लड़की को उठवाकर इस रंग महल में आपके सेवा में पेश कर दूँगा...
भैरव सिंह - सबास... रोणा उस लड़की का विश्वा से जब कोई संबंध नहीं है... तो उस लड़की पर हमारा इरादा खत्म हो गया... क्यूंकि भैरव सिंह उन कलियों और फूलों को मसलता... रौंदता है... जिनकी कांटे भैरव सिंह को चुभते हैं... हम रंग महल में उसे अपने नीचे लाते हैं... जिसपर अपना नफरत उतारना हो... खैर यह बताओ... विश्वा ने तुम्हारे साथ ऐसा क्या किया... जो तुमने अपना मूंछें निकलवा दी...

यह सवाल रोणा को अंदर से छटपटा देता है l उसके जबड़े भींच जाते हैं आँखों के नीचे की मांस पेशियां फड़फड़ाने लगती हैं l आँखे नम हो कर तैरने लगती है l

रोणा - (दुख और पीड़ा से आवाज जैसे जम गया हो) राजा साहब... कुछ ऐसा किया है... जो मेरे मर्द होने की अहम को कुचल कर रख दिया है...
भैरव सिंह - ठीक है... हम समझ गए... कुछ ऐसा हुआ है... जो तुम बता नहीं सकते... और यह भी समझ गए... वह तुम पर इस कदर खुन्नस खाए हुआ है... के तुम्हारे पीछे पीछे भुवनेश्वर पहुँचकर... तुम्हारी बजा कर वापस आ गया है...
रोणा - (अपने हुए अपमान को याद कर आँखे बंद कर लेता है) राजा साहब... आपने मुझे बुलाया है... कोई हुकुम...
भैरव सिंह - हाँ रोणा हाँ... हम आज शाम को... भुवनेश्वर जा रहे हैं... छोटे राजा... युवराज और प्रधान के साथ हफ्ते दस दिन के लिए... कलकत्ता और राँची जा कर कुछ बिजनैस डील फाइनल करने हैं... तो यह कुछ दिन... राजगड़ पुरी तरह से तुम्हारे हवाले किए जा रहे हैं...
रोणा - (हैरानी से भैरव सिंह की ओर देखते हुए) मैं समझा नहीं
भैरव सिंह - अभी समझ जाओगे...

भैरव सिंह एक बेल बजाता है l कुछ देर बाद उस कमरे में भीमा के साथ सरपंच, शनिया, सत्तू आते हैं l

भैरव सिंह - रोणा कल से लेकर हमारे वापस आने तक... तुम मौका बनाओ... उस कमज़र्फ विश्वा से... तुम्हें कैसे बदला लेना है...
रोणा - मैं अभी भी समझा नहीं...
भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता है) कुछ दिन हुए हम कुछ अफवाह सुन रहे थे... इस बाबत हमने इस शनिया से बात की... तो उसने हमें जो बताया... हमें वह सब नागवार गुज़रा... शनिया ने कहा कि... रात के अंधेरे में... यह लोग तैयार नहीं थे... पर विश्वा अपनी पुरी तैयारी में था... इसलिए वह कांड हो गया... जो कभी होना नहीं चाहिए था... पर दोबारा विश्वा के पास ऐसा मौका नहीं आना चाहिए...
रोणा - तो इसमें सरपंच की क्या भूमिका है..
सरपंच - है दरोगा बाबु है... पंचायत ऑफिस में... हमने दो साल पहले एक चिट फंड शुरु किया था...
रोणा - चिट फंड...
शनिया - जी दरोगा जी... और जो लोग हमसे कुछ भी लेते थे... उसके एवज में... हम सब उसे चिट फंड में जोड़ कर दिखा देते थे... और उसके बदले उनसे... खाली कागजात पर अँगूठा या दस्तखत रख लेते थे...
रोणा - ओ...
सरपंच - हाँ... दरोगा बाबु... आज हम घर घर जा कर सबको कल की पंचायत के लिए नोटिस थमा दिया है... सबका फैसला हम पंचायत में करेंगे... या तो पैसा.. या फिर... हमारे घर पर उनका कोई काम करने आएगा... और तब तक काम करेगा... जब तक उनका कर्ज उतर ना जाए...
रोणा - तो इसमें विश्वा कहाँ आ गया... वह गाँव वालों के.. किसी के भी फटे में घुसेगा नहीं...
शनिया - वह नहीं घुसेगा... पर उसकी दीदी... वह तो घुसेगी.. और जब उसकी दीदी घुसेगी.. तो विश्वा भी घुसेगा...
रोणा - (शनिया से) याद है.. तुझे वकील बाबु ने क्या कहा था... जहां कानूनी पचड़े होंगे... तुझे उनसे पूछ कर यह करना चाहिए था...
शनिया - पर वकील बाबु हैं नहीं... और गाँव में हमारी वह इज़्ज़त रही नहीं... इसलिए हमने सरपंच जी से मशविरा किया... और राजा साहब से इजाजत ले रहे हैं...
रोणा - तुम अब तक यह नहीं समझ पाये... जहां कानून की दाव पेच होगी... वहाँ विश्वा भी अपना कानूनी दिमाग लगाएगा... और तुम लोगों को गलत साबित करेगा... तब हम क्या कर पाएंगे... क्यूंकि ... चिट फंड अगर सरकारी ज्ञांत में और मंजूरी में ना हो तो वह गैर कानूनी होती है... और इससे लोग तुम्हारे ही खिलाफ हो जाएंगे...
शनिया - राजगड़ में राजा साहब ही तो सरकार हैं... और यहाँ लोग राजा साहब के खिलाफ तो जाएंगे नहीं...
रोणा - पर तुम लोग राजा साहब नहीं हो... राजा साहब के कारिंदे हो... गाँव में लोग राजा साहब के वज़ह से लोग तुमसे डरते हैं...
सत्तू - यह हम जानते हैं... पर लोग वहाँ हमारे खिलाफ नहीं होंगे... बल्कि विश्वा के खिलाफ हो जाएंगे...
रोणा - क्या...
शनिया - जी दरोगा बाबु... जैसे ही विश्वा इन मामलों में घुसेगा... भीड़ में से हमारे ही आदमी लोगों को भड़काने का काम करेंगे...
रोणा - ह्म्म्म्म.. तो तुम लोगों ने बहुत सोच समझकर कर यह प्लान बनाया है...
सब - हाँ दरोगा जी...
रोणा - तो इसमें मेरी भूमिका क्या होगी...
भैरव सिंह - तुम बस हवाओं के रुख को पलटने मत देना रोणा... मौका ढूंढना... जब हाथ तुम्हारे मौका आयेगा... तब अपना खुन्नस जैसे चाहे वैसे निकाल लेना... पंचायत में मामला गरम होता जाएगा... हो सकता है तु तु मैं मैं होते होते वहाँ पर दंगा हो... और जहां दंगा होगा... कुछ लोग दंगे के शिकार हो जाएंगे... तब तुम्हें कुछ ना कुछ कारवाई करनी होगी... कारवाई में कुछ भी हो सकता है... उसे कानूनी जामा पहनाने की जिम्मा हमारा होगा... धारा 144 जारी होगी... तहसील ऑफिस से ऑर्डर हम दिलवा देंगे...
रोणा - (आंखे चमकने लगते हैं) वाह राजा साहब वाह... आपने तो कुएं को प्यासे तक पहुँचा दिया... मैं सब समझ गया राजा साहब... मैं सब समझ गया... गाँव में दंगा होगा... दंगे के चपेट में कुछ लोग आयेंगे ज़रूर... और दंगा होने से लेकर दंगे के बाद की रिपोर्ट मैं ऐसा बनाऊँगा की बड़े बड़े कानून के सूरमाओं के सिर चकराने लगेंगे

रोणा अपने यादों से बाहर आता है, दांतों को पिसते हुए अपनी सिगरेट का आखिरी कस भरता है l फिर उस सिगरेट को विश्व के तस्वीर पर मसल कर बुझाने लगता है l

रोणा - (विश्वा की तस्वीर से) सोच रहा है ना... मैंने राजा को क्यूँ नहीं बताया... की उस लड़की का तेरे साथ क्या रिश्ता है... वह इसलिए मादरचोद... तुझे एक कुर्सी पर बाँध कर... तेरे ही आँखों के सामने... तेरी छमीया का ना सिर्फ बजाऊंगा... बल्कि ऐसा फाड़ुंगा... ऐसा फाड़ुंगा... कोई डॉक्टर भी सी नहीं पाएगा... तुझसे राजा का लाख खुन्नस सही... पर मेरी खुन्नस के आगे राजा का खुन्नस जीरो है... उसका खुन्नस तेरे लिए उसके जुती में है... पर मेरा खुन्नस तेरे लिए मेरी नाक से भी उपर है.... इसीलिए तेरी छमीया को रंगमहल की रंगत बनाने से बचाया... क्यूंकि... उसे ताउम्र मेरी रखैल बनाऊँगा... दो दिन बाद होने वाले पंचायत में तेरे खातिर जो दंगे होंगे... वहाँ पर तेरे साथ कुछ भी हो... पर तुझे मैं मरने नहीं दूँगा... क्यूँ की तुझे मैं वह ज़ख़्म दूँगा... जो तेरी जेहन को... आत्मा तक को मरते दम तक गलाती रहेगी....
 

Devilrudra

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👉एक सौ सत्ताइसवां अपडेट
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अंधेरा छटा नहीं था विश्व पहुँच गया था l चूंकि उसने रात को ही खबर कर दी थी इसलिए रात को ही सीलु गाँव से निकल कर यशपुर चला गया था l विश्व पहुँचने के बाद उमाकांत सर जी का घर देख कर हैरान हो गया था l उसने जितना भी बदलाव किया था सीलु ने उसके ऊपर अपना दिमाग लगा कर और भी खूबसूरत बना दिया था l विश्व इस वक़्त इतना खुश था कि अगर सीलु सामने होता तो उसे गले से लगा लेता l

टीलु - क्या देख रहे हो भाई...
विश्व - पिछले जनम में तुम सब से मेरा भाई वाला ही नाता था..
टीलु - हाँ वह तो है... जरूर एक ही माँ के पेट से होंगे...
विश्व - हाँ...
टीलु - पर कोई ना... अब हम सब एक ही दीदी के भाई है... क्यूँ है कि नहीं...
विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम सब बातों में माहिर हो...
टीलु - क्या... भाई... इसमें बात बनाने वाली बात कहाँ से आ गई...
विश्व - दीदी बमुश्किल से तुम्हें ही देखी है... उन तीनों से मिली भी नहीं है... और तुम...
टीलु - गलत... मैंने वक़्त निकाल कर सीलु को दीदी से मिलवा चुका हूँ..
विश्व - (चौंक कर) क्या...
टीलु - घबराने का नहीं... गाँव में सबकी नजरों से छुपाते हुए दीदी से मिलवाया...
विश्व - पर क्यूँ...
टीलु - क्यूंकि दीदी मिलना चाहती थी...
विश्व - ह्म्म्म्म... तब ठीक है...
टीलु - पर भाई तुमने पूछा नहीं... दीदी क्यूँ मिलना चाहती थी...
विश्व - नहीं...
टीलु - पर क्यूँ...
विश्व - दीदी सीलु से मिलना चाहती थी.. क्यूंकि कुछ दिनों के लिए ही सही... सीलु ने विशु की जगह ली थी... और वैसे भी... मेरी दीदी का दिल बहुत बड़ा है... और तुम सब उसके लिए उतना ही हो... जितना कि मैं... जब कोई भी मेरा नहीं था... तब तुम लोग मेरे साथ आए... वह भी बिना किसी लाग लपेट के...
टीलु - बस भाई बस... मुझे और सेंटी मत करो... कुछ देर बाद तुम्हारे नन्हें प्यारे प्यारे बंदर आयेंगे... उनको सम्भालो... दिलासा दो...
विश्व - ऐ... उन्हें बंदर क्यूँ कह रहे हो...
टीलु - (बिदक कर) और नहीं तो... वह सब इत्ते इत्ते से छछूंदर... मुझे चमगादड़ मामा कह रहे हैं... (टीलु जिस अंदाज से कहा विश्व जोर जोर से हँसने लगता है) हाँ हाँ हँस लो... तुम उसके मामा... और मैं उन सबका चमगादड़ मामा...
विश्व - (हँसी को दबाने की कोशिश करते हुए) अरे इसमें इतना बुरा मानने वाली बात कहाँ है...
टीलु - (मुहँ बना कर) तो इसमें खुशी से उछलने वाली बात भी कहाँ है...
विश्व - अच्छा यही बात तुमको अंग्रेज़ी में कही होती तो...
टीलु - अंग्रेजी में..
विश्व - हाँ बैट मेन अंकल... (कह कर विश्व हँसने लगता है) अब तो बुरा नहीं लगेगा ना...

विश्व के साथ साथ टीलु भी हँसने लगता है, तभी एक लड़का आ पहुँचता है l वह दोनों अपनी हँसी को रोक कर उस लड़के की ओर देखते हैं l वह लड़का खुशी के मारे अपनी आँखे बड़ी करते हुए उन्हें देख रहा होता है l विश्व को देखते ही वह लड़का पूछता है l

लड़का - अरे मामा तुम आ गए...
विश्व - मैं गया ही कब था... और तुम इतनी सुबह सुबह...
टीलु - इन बंदरों को नींद आती भी है या नहीं... यह पूछो...
लकड़ा - (अपना गाल फुला कर) हूँन्न्न्नन्...

विश्व एक बड़ा सा चॉकलेट निकाल कर लड़के के सामने लहराता है l लड़का चॉकलेट देख कर खुश हो जाता है और लेने के लिए हाथ बढ़ाता है तो विश्व चॉकलेट को अपने पीछे ले जाता है l लड़का मुहँ बनाता है l

विश्व - पहले यह बताओ... तुम्हारा नाम क्या है...
लड़का - अरुण...
विश्व - हाँ तो अरुण... इतनी सुबह सुबह...
अरुण - वह क्या है कि मामा... आज... (अपनी दो उंगली दिखा कर) लंदन से थोड़ा जल्दी बुलावा आ गया था... इसलिए...
टीलु - ऐ छछूंदर... संढास के लिए बाहर जाने को लंदन बोल रहा है...
अरुण - (टीलु को उंगली दिखा कर) ऐ चमगादड़ मामा... यह हमारा कोड वर्ड है... हम यहाँ नहर को... लंदन बोलते हैं...
टीलु - अबे तेरी तो... (विश्व उसे रोकता है)
विश्व - देखो अरुण... गलत बात... चमगादड़ नहीं...
अरुण - (मुहँ बना कर) सॉरी मामा...
विश्व - अच्छा यह बताओ... तुम इन्हें.. चमगादड़... क्यूँ कह रहे थे...
अरुण - यह हमें आप से मिलने ही नहीं दे रहे थे... जब देखो द्वार पर... लटके ही दिखे... इसलिए...
विश्व - ठीक है... पर चमगादड़ नहीं... हाँ उन्हें तुम सब... बैट मेन अंकल कह सकते हो...
अरुण - ठीक है... पर क्यों...
टीलु - (बड़े एटीट्यूड के साथ) इसलिए... क्यूंकि तुम्हारे इस बैट मेन अंकल... फोरैंन रिटर्न हैं...
अरुण - फोरैंन रिटर्न... मतलब लंदन से...
टीलु - हाँ... (फिर चिल्ला कर) नहीं... तुम्हारे वाली.. लंदन से नहीं... असली लंदन से...
अरुण - हाँ हाँ ठीक है... (विश्व से) अच्छा मामा... लाइब्रेरी बन गया...
विश्व - हाँ... बन गया...
अरुण - और हमारे लिए खिलौने भी लाए हो....
विश्व - हाँ हाँ लाया हूँ... तुम सब आज तैयार हो कर आना... और आज के बाद यहाँ जम कर उछलकूद करना... पढ़ना...
अरुण - (खुशी से उछलते हुए) अरे वाह... मैं अभी जाता हूँ अपने सारे दोस्तों से कहता हूँ...
विश्व - हाँ और यह भी... आज सब तुम सब दो पहर का खाना... अपने मामा के साथ खाओगे...
अरुण - ठीक है...

कह कर बिना पीछे मुड़े अरुण वहाँ से भाग जाता है l विश्व उसे जाते हुए देखता है l


टीलु - भाई... कोई लफड़ा तो नहीं होगा ना..
विश्व - कैसा लफड़ा...
टीलु - तुम जानते हो... यह गाँव वाले...
विश्व - टीलु... मेरे भाई... अगर यह बच्चे आकर इस श्रीनिवास लाइब्रेरी को जिंदा कर देंगे... तो समझ लो... इन मरे हुए गाँव वालों को भी जिंदा कर देंगे...
टीलु - वह कैसे...
विश्व - वह सब मैं बाद में बताऊँगा... पहले यह बताओ... उन न्यूज पेपर में... और क्या क्या मेसेज मिला है अब तक...
टीलु - अरे हाँ... एक मिनट... अभी लाया...


टीलु अंदर जाता है, कुछ न्यूज पेपर और हाथ में एक डायरी लेकर आता है l डायरी को विश्व के हाथ में देकर और न्यूज पेपर्स को विश्व के सामने रखते हुए


टीलु - यह लो... तुमने जैसा कहा था... मैंने बिल्कुल वैसा ही डीकोडिंग करते हुए... जो भी मेसेज बना.. मैंने इस डायरी में लिख दिया है... देखो...

विश्व डायरी में वह पन्ना देखता है जिसमें टीलु ने डीकोड कर वह संदेश इकट्ठा किया था l

"तुम अकेले नहीं हो, एक काफिला तैयार है, युद्ध जब अनिवार्य है, हमारा मिलना आवश्यक है"
"भ्रष्टाचार ही भ्रस्टाचार है, हर तंत्र सम्मिलित है, तुम अकेले क्या करोगे, चलो मिलकर बाजी जीते"


विश्व - सिर्फ दो संदेश... इतने दिनों में... सिर्फ दो संदेश...
टीलु - हाँ... एक दिन मैं यशपुर बहुत जल्दी चला गया था... उस दिन के बाद... और संदेशे मिले नहीं... (विश्व टीलु को घूर कर देखने लगता है) सच कहता हूँ भाई... मैं कोई जासूसी करने नहीं गया था... हाँ थोड़ी जल्दी जरूर गया था... और शायद उसी दिन से वह डर कर मेसेज देना बंद कर दिया... मुझे लगता है... यह राजा क्षेत्रपाल की कोई जाल था... पकड़े जाने के डर से... संदेशा नहीं दे रहा....

विश्व डायरी में लिखे मेसेज्स गौर से पढ़ने लगता है l फिर अपनी आँखे मूँद कर कुछ सोचने लगता है l

टीलु - क्या सोचने लगे भाई...
विश्व - मुझे लगता है... यह बंदा शायद यह जानने की कोशिश कर रहा है... मैं उसके संदेशे पढ़ रहा हूँ या नहीं...
टीलु - मतलब तुम्हें लगता है... इसके पीछे राजा साहब नहीं है...
विश्व - पता नहीं... पर मेरे अंदर की गट फिलिंग कह रही है... कोई बंदा... राजा साहब का सताया हुआ... जो मुझसे ज्यादा मुझको जानता है... मेरी मदत करना चाहता है...
टीलु - तो अब... क्या करने का प्लान है...
विश्व - सोचता हूँ...

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द हैल
डायनिंग टेबल पर चारों सदस्य बैठे हुए हैं l रुप वीर से नजरें चुरा रही थी और खुद को शुभ्रा के साथ बात चित में व्यस्त दिखा रही थी l विक्रम चुप चाप अपना नास्ता कर रहा था पर वीर खोया हुआ था l यह सब बातेँ शुभ्रा नोटिस कर लिया था l

शुभ्रा - क्या बात है वीर... किस सोच में खोए हुए हो...
वीर - (अपनी सोच से बाहर आते हुए) कुछ नहीं भाभी...
शुभ्रा - कुछ तो है... तुम थोड़े टेंशन में लग रहे हो... क्यूँ नंदिनी... तुम्हें क्या लगता है...
रुप - म.. म.. मुझे क्या लगता है... मुझे क्या लगेगा भाभी... वीर भैया ट.. ट.. ठीक ही लग रहे हैं...
शुभ्रा - हाँ हाँ ठीक है ठीक है... तुम ऐसे हकला क्यूँ रही हो..
रुप - कहाँ... कहाँ भाभी... मैं ठीक हुँ... वह मैं अपनी सब्जेक्ट याद कर रही थी... और अपने फ्यूचर के बारे में सोच रही थी...
विक्रम - कैसा सब्जेक्ट... कैसा फ्यूचर...
रुप - वह भैया... मैं सोच रही थी... के भाभी से कुछ टीप्स लूँ... गाइडेंस लूँ...
विक्रम - किस बात पर...
रुप - यही के... मैं समर वेकेशन में डॉक्टरी की एंट्रेंस की तैयारी करूँ...
विक्रम - क्या... पर क्यूँ... और दो साल बाद... वैसे भी.. तुम शादी करने वाली हो...
रुप - तो... तो क्या हुआ भैया.. मैं डॉक्टरी के बाद भी तो शादी कर सकती हूँ...
विक्रम - पागल हो गई हो... या बचपना दिखा रही हो... तुम अच्छी तरह से जानती हो... तुम यहाँ पढ़ाई के लिए आई हो... पर उसके पीछे की वज़ह और शर्तें भूलो मत... (रुप का चेहरा उतर जाता है)
शुभ्रा - ओ.. हो... मैंने कहाँ से शुरू किया था... और बात कहाँ पर आकर पहुँच गई... वीर... प्लीज तुम बताओ... क्या सोच रहे थे...
वीर - भाभी... मैं वह...
शुभ्रा - (हैरान हो कर छेड़ते हुए) वीर... तुम झिझक रहे हो...
वीर - हाँ.. वह मैं...

सब खाना खाते हुए रुक जाते हैं और सबकी नजर वीर पर रुक जाती है l वीर सब नजर घुमाने के बाद शुभ्रा को देखते हुए कहता है l

वीर - मैंने एक अहम फैसला किया है... आई मिन कर लिया है... अपने लिए... इस घर के लिए... हम सबके लिए... (रुक जाता है)
विक्रम - कैसा फैसला...
वीर - भैया... भाभी... नंदिनी... आप सब अनु को जानते हो... अनु आप सबको पसंद भी है...
विक्रम - साफ साफ कहो वीर...
वीर - मैं... मैंने अनु से जल्द से जल्द शादी करने का फैसला किया है...

यह सुन कर सब पहले शुन हो जाते हैं, उसके बाद

विक्रम - क्या...
शुभ्रा - वाव...
रुप - आह सच में..
विक्रम - होल्ड ऑन होल्ड ऑन.. यह तुमने फैसला किया है... आई मिन... जो कर लिया है... इसमें हमें कोई ऐतराज नहीं है... क्यूंकि हम जानते हैं... छोटी माँ का भी आशीर्वाद है... पर तुम भूल रहे हो... टीम बड़े... और हैं... बड़े राजा जी... राजा साहब और छोटे राजा जी... जिनकी मंजुरी बहुत जरूरी है...
वीर - नहीं भूला हूँ... मैं आप सबको अपनी बात बता देना चाहता था.... सो बता दिया...
विक्रम - ठीक है... पर अचानक ऑल ऑफ सडन... आई मिन तुम... कुछ दिन या महीने रुक भी सकते थे...
वीर - क्यूँ...
विक्रम - देखो... अभी हम सब किसी ना किसी वज़ह से डिस्टर्ब्ड हैं... ऐसे हालात में... तुम हमारे घर के बड़े... राजी भी होंगे... डाऊट है... (कुछ देर के लिए सभी चुप हो जाते हैं, फिर) वैसे भी... तुमने अचानक यह फैसला क्यों लिया...

वीर चुप रहता है l उसकी चुप्पी को शुभ्रा समझ जाती है l इतने में सबका खाना चूंकि ख़तम हो चुका था, इसलिये शुभ्रा रुप को इशारे से अपने साथ किचन की चलने के लिए कहती है l रुप और शुभ्रा दोनों किचन के अंदर चले जाते हैं l

विक्रम - तुमने बताया नहीं... क्यूँ...
वीर - भैया... मैं... खुद को... जब से सुधारने में लगा हुआ हूँ... तब से... हाँ तब से... कोई ना कोई मेरी कुंडली में उंगली कर रहा है... मेरे पिछली जिंदगी को... आज से छुड़ाने की कोशिश में हूँ... अपने अंदर की... पुराने वीर से छुटकारा पाने की कोशिश में हूँ... पर कोई है... जो मेरे अंदर के पुराने वीर को ललकारना चाहता है...
विक्रम - तो इससे तुम्हारी शादी का... क्या कनेक्शन है...
वीर - मैं... उस वीर को हमेशा हमेशा के लिए दफना देना चाहता हूँ... मैं दुनिया जहान से लड़ कर जब घर को लौट कर आऊँ... अनु का मुस्कराता हुआ चेहरा देख कर... मैं दुनिया जहान को भुला देना चाहता हूँ... ना किसी पर कोई गरज... ना किसी से कोई शिकायत... मैं दुनिया से थका हारा लौट कर आऊँ... उसके पहलु में... एक नई जिंदगी.. एक नई जीत को हासिल करूँ... बस इसलिए अनु से जल्द से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ...

इतना कह कर वीर चुप हो जाता है और विक्रम की ओर देखने लगता है l विक्रम भी उसकी बातेँ सुन मुहँ फाड़े देखे जा रहा था l

विक्रम - (उसी हैरानी के साथ) ओ... वीर... मैं हैरान हूँ... तुम दुनिया से इतनी जल्दी हारने लगे...
वीर - तभी तो जीत की चाहत में... अनु से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ... (विक्रम के हाथ को पकड़ लेता है) भैया... मैंने भले ही... तुम्हारे छोटे भाई का फर्ज ना उतार पाया... पर तुमने कभी भी इस बात पर मलाल नहीं की... पर आज एक छोटे भाई का हक माँग रहा हूँ... प्लीज... हमारे घर के बड़ो से मेरे लिए बात करोगे... प्लीज...
विक्रम - (वीर के हाथ पर अपना हाथ रख देता है) चल पागल... मैंने कभी भी... अपने मन में... तुम्हारे लिए कोई गाँठ नहीं बाँधा है... अगर बड़ों से बात करनी ही है... तो बस एक हफ्ता रुक जाओ...
वीर - (चौंक कर) एक हफ्ता...
विक्रम - हाँ.. एक हफ्ता...
वीर - यह अचानक एक हफ्ता... कहीं जाना है क्या...
विक्रम - हाँ कल राजा साहब ने फोन पर बताया कि हमारा ESS अभी तक अपने स्टेट में अनबीटेबल है... उसे अब आउट ऑफ स्टेट ले जाने का मौका आया है...
वीर - हाँ तो.. कौन सा स्टेट...
विक्रम - झारखंड... और बंगाल राँची में एक मीटिंग है... उसके बाद कलकत्ता... सेक्यूरिटी सर्विस में.. हमारा स्कोप कहाँ तक हो सकता है... वगैरह वगैरह...
वीर - पर तुम क्यूँ...
विक्रम - क्या बचकाना सवाल है... अगर महांती होता... तो मैं कहाँ जाता... अब चूँकि सब कुछ मैं देख रहा हूँ... इसलिए मुझे जाना होगा... हमें कॉन्ट्रैक्ट मिल जाएगा... क्यूंकि पार्टी राजा साहब के पहचान वाले हैं...

वीर चेहरे पर टेंशन लिए अपनी जगह से उठ खड़ा हो जाता है और कुछ सोच में पड़ जाता है l विक्रम उसकी हालत देख कर हैरान होता है l

विक्रम - तुम इतने टेंश क्यूँ हो गए....
वीर - मैंने अनु से दस दिन की मोहलत मांगी थी... उसमें से सात दिन तो जाया हो जाएंगे... और बाकी तीन दिन में क्या हो जाएगा...
विक्रम - इतनी जल्दी क्या है वीर... क्यूँ... तुम जल्दबाज़ी ऐसे दिखा रहे हो... जैसे.. अनु और तुम्हारे बीच रिश्ता हद से आगे बढ़ गया हो... (थोड़ा रुक कर) क्या तुम...
वीर - (एक बेज़ान सी मुस्कराहट के साथ) देखा भैया... मेरे अंदर तुम वही पुराने वीर को ढूँढ रहे हो... (फिर थोड़ी सीरियस हो कर) जब अपने ही मेरे बारे में ऐसी राय रखते हों... तो गैरों से क्या गिला रखना...

कह कर वीर वहाँ से निकल जाता है l वीर की कही बातेँ विक्रम के जेहन पर हथोड़े की तरह बरसने लगते हैं l वह वीर को आवाज देने की हिम्मत तक नहीं कर पाता l वह भी बुझे मन से बाहर की ओर चला जाता है l यह सब किचन से दोनों भाभी और देवरानी सुन रहे थे, उनका भी चेहरा बुझ जाता है l

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उदय टहलता हुआ रोणा के क्वार्टर के सामने पहुँचता है l उसे बाहर रोणा की पर्सनल जीप दिखता है तो वह बहुत खुश हो जाता है l वह भागते हुए जीप के पास पहुँचता है और अपने बालों को ठीक कर क्वार्टर के बाहर पहुँचता है और बंद दरवाज़े को हल्के से धक्का देता है l दरवाजा खुल जाता है l उदय धीरे धीरे अंदर जाने लगता है l देखता है बाथ रुम में रोणा के चेहरा सेविंग फ़ोम से पुता हुआ है और वह अपना दाढ़ी बना रहा है l आईने में रोणा उदय को देख लेता है l

रोणा - तु अंदर कैसे आया बे...
उदय - वह साहब दरवाजा खुला था...
रोणा - हाँ हाँ मालुम है... पुछ रहा हूँ सीधे अंदर कैसे आ गया...
उदय - साब जी... आपने ही तो कहा था... मुझे अंदर आने के लिए... कभी दरवाजा खटखटाना ना पड़े...

इतना सुनते ही वह अपना रेजर रख देता है और उदय के पास चलते हुए आता है l इससे पहले उदय कुछ समझ पाता तब तक उदय के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ चुका था l तमाचा मारने के बाद रोणा वापस जाकर अपना दाढ़ी बनाने लगता है l उदय थप्पड़ खा कर सोचने लगा उससे क्या गलती हो गई l यही सोचते सोचते वह बाहर की ओर जाने लगता है l

रोणा - अब कहाँ जा रहा है...
उदय - वह बाहर जाकर दरवाजा खटखटाने...
रोणा - अबे भोषड़ी... जब आ गया है... जो रोने आया था... वह रो कर जा यहाँ से...

उदय अपना सिर खुजाने लगता है, तब तक रोणा अपना दाढ़ी बना कर चेहरा टावल से पोंछ रहा था l जब चेहरा पोंछ कर उदय के सामने आता है, तो उदय उसे देख कर चौंक जाता है l क्यूंकि रोणा ने अपना मूँछें निकाल लिया था l उदय उसे हैरानी भरे नजर से देख रहा होता है l


रोणा - ऐसे मुहँ फाड़े क्या देख रहा है...
उदय - आज आप बहुत बदले बदले लग रहे हैं... चेहरे से भी... और... (अपने गाल पर हाथ फेरने लगता है)
रोणा - पहली बात... तुझे मैंने एक काम भी दिया था... क्या याद है तुझे...
उदय - जी है ना... मैं रोज विश्वा पर नजर गड़ाए हुए था... इतने दिनों तक वह घर के बरामदे से बाहर नहीं आ रहा था... सिर्फ काम ही काम कर रहा था... आज सुबह ही वह काम ख़तम कर बाहर दिखा...

इतना सुनते ही रोणा का चेहरा सख्त हो जाता है और उसका हाथ उठ कर चल जाता है पर ठीक उदय के गाल तक आ कर रुक जाता है और अपनी जबड़े भींचते हुए उदय के गाल को थपथपाने लगता है, फिर अचानक अपनी मुट्ठी में उदय के गाल को भींच लेता है l उदय दर्द के मारे चीखने लगता है l

रोणा - श्श्श.. श्श्श.. चिल्ला क्यूँ रहा है...
उदय - आ ह... आह...
रोणा - तेरा गाल ही तो खिंच रहा हूँ... कौनसा तेरा गांड मार रहा हूँ... हाँय...
उदय - मुझे माफ कर दीजिये... साब...
रोणा - क्यूँ... क्या ग़लती किया तुने... हाँ... बोल बोल...
उदय - नहीं जानता... आह...
रोणा - तो सुन भोषड़ी के सुन... विश्वा... गायब था... तब से... जब से मैं यहाँ नहीं था... और आज सुबह ही तेरी अम्मा चोद कर आया है... मादरचोद... इसपर तु कांस्टेबल बनेगा... ह्म्म्म्म... कांस्टेबल...
उदय - आह... आ आ ह... माँ कसम साब जी... मैंने उसे दुर से ही देखा था... कैसे पता करता के वह विश्वा नहीं है... आप ही ने तो दूरी बना कर नजर रखने के लिए कहा था...

रोणा उसके गाल को छोड़ देता है l उदय अपने गाल को सहलाने लगता है l दर्द इतना था कि उसके आँखे नम हो गईं थीं l इतने में उसके दरवाजे पर दस्तक होता है l

रोणा - कौन है...
भीमा - (अंदर आते हुए) भीमा...
रोणा - ओ... कहो भीमा... सुबह सुबह... कैसे...
भीमा - (उदय पर नजर डालते हुए) दरोगा बाबु पिछले दो दिनों से राजा साहब आपको याद कर रहे हैं... इसलिए मैं यहाँ दो बार आकर लौट चुका हूँ... पर यह क्या... आपने अपनी मूंछें क्यूँ मुंडवा ली...
रोणा - (जबड़े भींच कर) वह क्या है कि भीमा... जब से सस्पेंड हो कर राजगड़ से बाहर आया... तबसे कोई मर्द वाला काम किया नहीं ना... ऊपर से जब से आया हूँ... रंग महल भी सुना और विरान है... इसलिए... अब तो मूंछें तब रखूँगा... जब कोई मर्द वाला काम कर लूँ...
भीमा - ओ... लगता है समस्या विकट है...
रोणा - वह मेरी समस्या है... तुम बोलो.. अभी क्या करना है...
भीमा - पता नहीं क्यूँ... दो दिन पहले.. सरपंच से मिलने के बाद.. राजा साहब आपको खोज रहे हैं... उपर से मैंने कई बार फोन लगाया आपको... पर आपने उठाया ही नहीं...
रोणा - हाँ... वह काम में... बहुत व्यस्त था... इतना की अपना ही होश नहीं था... चलो चलें... देखें राजा साहब को मेरी क्या जरूरत आ पड़ रहा है...

तीनों बाहर आते हैं भीमा और रोणा भीमा के लाए गाड़ी में बैठ कर चले जाते हैं l पीछे उदय वैसे ही अपने गाल सहलाते रह जाता है और मन ही मन बड़बड़ाने लगता है l

" साला कुत्ता कहीं का... लगता है विश्वा ने ही इसकी जमकर ली है... तभी साला दर्द छुपाने के लिए मूँछ कटवा कर फिर रहा है... कुत्ता कहीं का... जब तेरे जैसे ढीठ को विश्वा चकमा दे सकता है... भुर्ता बना सकता है... मैं विश्वा के आगे क्या हूँ बे.. अंडे से निकला हुआ चूजा... रुक साले रुक... एक दिन मैंने तेरी ना ली... तो मैं भी उदय नहीं... "

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दरवाज़ा खोलते ही सामने वीर को देख कर दादी चौंक जाती है l

दादी - अरे दामाद जी आप... इस वक़्त... अनु तो अभी ऑफिस के लिए निकलने वाली थी...
वीर - क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...
दादी - ओ हो... मैं भी क्या बेवकूफ़ी कर रही हूँ... दामाद जी द्वार पर खड़े हैं... मैं द्वार पर ही खड़ा कर बात कर रही हूँ... आइए... अंदर आइए...

दादी दरवाजे से हटती है l वीर अंदर आकर एक चेयर पर बैठ जाता है l अनु भागते हुए हाथ में एक कॉफी की ग्लास लेकर वीर को देती है l पहले वीर हैरान हो कर अनु की ओर देखता है फिर मुस्कराते हुए कॉफी अनु के हाथ से लेकर चुस्की भरता है l

दादी - बड़ी खयाल रहती है तुझे राजकुमार की... कोई दुसरा आए तो ध्यान कभी नहीं देती...

अनु शर्मा कर वहाँ से अंदर की ओर भाग जाती है l वीर के होंठो पर मुस्कुराहट और भी गहरा जाता है l

दादी - दामाद जी... क्या आपका यहाँ आना पहले से तय था...
वीर - नहीं तो... क्यूँ क्या हुआ...
दादी - सच कह रही हूँ दामाद जी... रानी साहिबा आईं थीं... इस कमबख्त की हाथ माँगने... तब इसे मेहमान नवाजी समझाना पड़ा... पर आपकी बात और है... देखिए ना... आप को आए कितनी देर हुए... आपके लिए कॉफी तैयार कर दी उसने...
वीर - दादी... मेरा यहाँ आने का वज़ह भी यही है...
दादी - क्या मतलब...
वीर - मुझे अनु की आदत.. या यूँ कहूँ के... मुझे अनु की लत लग चुकी है... मेरा खयाल करने वाली... खयाल रखने वाली... अब सिर्फ ऑफिस में नहीं... बल्कि मुझे मेरे घर के आँगन में चाहिये...
दादी - ओ... (खुश हो कर) मतलब आप शादी की बात करने आए हैं...
वीर - हाँ... शादी की बात करने आया हूँ... आज सुबह ही अपने बड़े भैया... भाभी और छोटी बहन को बताया... माँ तो कब से तैयार बैठी है... इससे पहले कि मैं अपने घर के बुजुर्ग और मुख्य को अपना अभिप्राय बताऊँ... मैं आपसे शादी की इजाजत लेने आया हूँ...
दादी - दामाद जी... जब मैंने रानी साहिबा को पहले से ही बता चुकी हूँ... अनु आपकी है... जब आपको ठीक लगे... तब आप उसे मर्यादा के साथ डॉली में ले जाएं...
वीर - (अपनी जगह से उठ कर दादी की हाथ पकड़ लेता है) थैंक्यू दादी थैंक्यू... मतलब.. आपको कोई एतराज नहीं है ना...
दादी - मुझे क्यूँ कोई एतराज होने लगी... पर आपकी उतावलापन देख कर लगता है... जैसे शादी आपको कल ही करनी है..
वीर - कास के ऐसा हो पाता... वह क्या है कि... मेरे बड़े भाई यानी युवराज जी... मेरे पिताजी... यानी... छोटे राजा जी और हमारे क्षेत्रपाल परिवार के मुखिया... मिलकर किसी काम से बाहर हफ्ते दस दिन के लिए जा रहे हैं... जब वे लौटेंगे.. तब मैं उन लोगों से शादी की इजाजत ले लूँगा...
दादी - तो ठीक है...
वीर - पर...
दादी - पर क्या दामाद जी...
वीर - दादी.. मैं चाहता हूँ... अनु यह दस दिन घर पर रहे... मेरा मतलब है... वह ड्यूटी पर ना आकर... घर पर आराम करे...(अपनी जेब से एक क्रेडिट कार्ड निकाल कर दादी को देते हुए) और शादी की तैयारी वह अपनी तरफ से करे...
अनु - (कमरे से बाहर आकर दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है) नहीं... ऐसा नहीं हो सकता...
दादी - ठीक ही कह रहे हैं दामाद जी... शादी के पहले मिलने जुलने का रिवाज नहीं होता...
अनु - वह मैं कुछ नहीं जानती... मुझसे रानी माँ ने वादा लिया था... चाहे कुछ भी हो जाए... शादी से पहले... कभी ऑफिस जाना बंद ना करूँ... वैसे भी कौनसा शादी का दिन तय हो गया है....
दादी - दामाद जी मैं रसोई में जाकर थोड़ा देखती हूँ... आप अपनी अनु को समझाने की कोशिश कीजिए... (कह कर दादी वहाँ से चली जाती है)
वीर - अनु... तुम समझ क्यूँ नहीं रही हो...
अनु - प्लीज... कुछ दिनों से हालात जैसे हो रहे हैं... मैं घर पर रहूँगी तो हमेशा चिंता में रहूँगी... आप सामने रहोगे... तो मुझे चिंता नहीं रहेगी... प्लीज...
वीर - देखो अनु... भैया के बाहर जाने से... पूरा काम का बोझ मुझ पर पड़ेगा... आने जाने से लेकर खाने पीने तक का कोई ठिकाना ना रहेगा...
अनु - (धीरे से) झूठे
वीर - सुनाई नहीं दिया... पर समझ गया... तुम मुझे झूठा कह रही हो... किसलिए
अनु - इसीलिए की आप झूठ कह रहे हैं...
वीर - नहीं अनु... सिर्फ ऑफिस ही नहीं... पार्टी का काम देखने इधर उधर जाना पड़ सकता है...
अनु - तभी तो... मैं... आपके साथ रहना चाहती हूँ.. कम से कम ऑफिस के वक़्त...

अनु के इसतरह से अनुरोध करने पर वीर अपना हथियार डालते हुए अनु से कहता है

वीर - ठीक है... अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो.... पर मेरी भी एक शर्त है...
अनु - जी कहिए...
वीर - तुम्हें रोज मेरी गाड़ी से ऑफिस आना जाना करोगी... वह भी सिर्फ ऑफिस के वक़्त...
अनु - (खुशी के साथ शर्माते हुए) मतलब आप रोज मुझे ले जाने एयर छोड़ने आयेंगे..
वीर - नहीं...
अनु - (थोड़ी मायूस हो कर) तो..
वीर - सिर्फ आज ही... मैं तुम्हें ले जाऊँगा... पर कल से... मैं ड्राइवर का इंतजाम कर दूँगा... मेरी अपनी गाड़ी से वह तुम्हें रोज घर से ले जाएगा... ऑफिस आवर ख़तम होते ही वह छोड़ देगा... मैं इसी शर्त पर ही तुम्हें ऑफिस में आलाउ कर सकता हूँ...
अनु - (मायूसी के साथ, मुहँ फूला कर) ठीक... है...


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एक रोती हुई स्कुल जाती किशोरी लड़की की हाथ पकड़ कर वैदेही लक्ष्मी के घर पहुँचती है l घर में लक्ष्मी और हरिया के बीच किसी बात को लेकर कहा सुनी हो रही थी l जैसे ही वैदेही वहाँ पहुँची दोनों के दोनों चुप हो गए l

वैदेही - क्या बात है लक्ष्मी.. किस बात को लेकर तुम दोनों झगड़ रहे थे...

लक्ष्मी और हरिया दोनों एक दूसरे को देखते हैं फिर लक्ष्मी अपना सिर झुका लेती है l पर हरिया गुस्से भरे नज़र से वैदेही के साथ आई उस लड़की की ओर देखने लगता है l वह लड़की हरिया की नजर से बचने के लिए वैदेही के पीछे छुपने लगती है l


वैदेही - ऐ हरिया.. खबर दार जो मुन्नी पर गुस्सा किया या इसके साथ मार पीट की... मुझसे बुरा कोई ना होगा...
हरिया - तु क्यूँ हमेशा गाँव के हर घर के फटे में घुसने की ताक में रहती है...
वैदेही - तुम दारूबाज लंपटों से मैं बात तक करना पसंद नहीं करती.. पर इस गाँव के आँगन में पल रहे.. जी रहे हर इज़्ज़त को अपनी इज़्ज़त समझती हूँ... जब जब उन पर कोई आंच भी आई तो मैं उनके लिए उतरुंगी... आती रहूंगी...
हरिया - तेरी इज़्ज़त है ही क्या... जो मेरे घर की इज़्ज़त के लिए... आती रहेगी...
वैदेही - मेरी इज़्ज़त पर उंगली तब उठाना... जब तु खुद को मर्द कहलाने के लायक समझेगा.. तेरी मर्दानगी रोज शनिया और उसके कुत्तों के आगे... शराब की भट्टी में... एड़ी पर रेंगती रहती है... इसलिए तो... वह और उसके चट्टे बट्टे मौका ढूंढते रहते हैं... तेरे घर की इज़्ज़त और अमानत को तार तार करने के लिए...
हरिया - हूंह्ह्... तुझसे बात कर रहा हूँ देखो... मेरी ही गलती है...

इतना कह कर हरिया वहाँ से चला जाता है l उसके जाने के बाद लक्ष्मी सुबकते हुए बैठ जाती है l

वैदेही - लक्ष्मी... हरिया मुझसे कहेगा कुछ नहीं... पर तु बता... क्या हुआ है... और मुन्नी को तुने क्यूँ गाली दी... मारा भी...
लक्ष्मी - क्या कहूँ दीदी... आज सुबह शनिया सरपंच को लेकर आया था.. इन्होंने पता नहीं कितना कर्ज लिया है शनिया से... अब सब मिला कर पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - (चौंकते हुए) क्या पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - हाँ दीदी... हमने ठीक से कभी हजार रुपये भी नहीं देखें... पाँच लाख रुपये...
वैदेही - ऐसे कैसे पाँच लाख रुपये... शनिया ने कह दिया... और हरिया ने मान लिया...
लक्ष्मी - माने तो नहीं... मान ही नहीं पाए... पर..
वैदेही - पर क्या...
लक्ष्मी - पर हरिया के पास लिखा पढ़ी के कागजात थे... इन्होंने जितना दारु पीया था... सब सूद के साथ मिला कर... अब पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - क्या... दारू पी पी कर पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - सिर्फ इन्हीं के नहीं है दीदी... बल्लु.. सुकांत... नरेश... सब के सब... किसी के पाँच... किसी के सात...
वैदेही - यह लोग तो पैसे दे देते थे ना...
लक्ष्मी - हाँ फिर भी... कई सालों से पी पी कर इतना हो गया है....
वैदेही - ठीक है... बात मेरी समझ में आ गई... पर इसमें मुन्नी को क्यूँ कोस रही थी... हाथ भी उठाया तुमने आज इस पर... बड़ी हो रही है वह...
लक्ष्मी - मारु नहीं तो क्या करूँ... कर्मजली लड़की हो कर पैदा जो हुई है...
वैदेही - तो... लड़की हो कर पैदा हुई... तो इससे क्या पाप हो गया... अब तो राजा नहीं उठा जा रहा है...
लक्ष्मी - पर उसके पालतू भेड़िये तो ताक में हैं... जो मौका ढूंढ रहे हैं...
वैदेही - एक मिनट... कहीं इस पाँच लाख के बदले...
लक्ष्मी - हाँ दीदी हाँ... कर्ज को जल्दी चुकता करने के लिए... लड़की को घर बुला रहे हैं... और इस पर सरपंच भी उनका साथ दे रहा है...

वैदेही अपने दोनों हाथों से कान को ढकते हुए अपनी आँखे मिंज कर पास पड़े एक टुटे फूटे कुर्सी पर बैठ जाती है l थोड़ी देर बाद

वैदेही - सरपंच ऐसे कैसे उनका साथ दे सकता है... उन हरामीयों की बात को मनवाने के लिए... उनके साथ घर घर जा रहा है...
लक्ष्मी - वही तो... दीदी... यह सब जो कर्ज के जाल में उलझे हुए हैं... दो दिन बाद इस विषय में... पंचायत में निर्णय होने वाला है... सारे गाँव वालों के बीच...
वैदेही - ओ... अब समझी... गाँव वालों के सामने... इन कर्जदारों पर निर्णय नहीं होने वाला है... बल्कि हर घर की इज़्ज़त में सेंध लगाने की जुगत लगा रहे हैं...

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कुछ लोग तहसील ऑफिस से बाहर निकल कर रोड के उस पार मिलन टी स्टॉल पर जाते हैं l पर वहाँ पहुँचते ही देखते हैं मिलन अपना दुकान बंद कर रहा था l यह देख कर एक आदमी पूछता है

आदमी - क्या बात है मिलन... धंधे के टाइम पर दुकान क्यूँ बंद कर रहा है...
मिलन - आज थोड़ी गड़बड़ हो गई है...
दुसरा आदमी - गड़बड़... कैसी गड़बड़...
मिलन - सुबह सामान ठीक से चेक किया नहीं... इसलिए जितनी जरूरत थी... उससे कम सामान लाया था... और इत्तेफ़ाक से सुबह से ही भीड़ बहुत थी... जितना लाया था सब ख़तम हो गया...
आदमी - तो यहीँ कहीँ आसपास से मंगवा ले ना...
मिलन - सर जी... यहाँ सब दुध वाला चाय पीते हैं... और अभी दुध का पैकेट मिलने से रहा... पाउडर वाला चाय एक बार कोशिश की थी... बहुत गाली पड़े थे... उम्मीद है... आप समझ रहे हैं...
सारे लोग - ठीक है... आज तो तुझे माफ़ कर रहे हैं... पर कल से... शाम होने से पहले दुकान बंद किया तो... यहाँ से दुकान उखाड़ देंगे समझा...
मिलन - जी माई बाप...

वह लोग वापस जाने के बजाय वहीँ पड़े बेंच पर बैठ कर बातेँ करने लगते हैं l मिलन कुछ ही मिनट में अपना सारा सामान पैक कर चुका था l तभी एक ऑटो वहाँ पर आती है l मिलन उसे आवाज देता है l ऑटो रुक जाती है l उस ऑटो में पहले से ही दो सवार थे l मिलन अपना सामान पीछे लोड कर अंदर बैठ जाता है l ऑटो आगे बढ़ जाता है l थोड़ी देर बाद ऑटो यशपुर से निकल जाता है l यशपुर के बाहर एक सुनसान जगह पर ऑटो खराब हो जाता है l ऑटो ड्राइवर उतर जाता है और चारो तरफ नजर घुमाता है, वह ऑटो ड्राइवर और कोई नहीं था, वह शैलेंद्र उर्फ सीलु था l ऑटो में दो और लोग विश्व और जिलु थे l

सीलु - (विश्व से) भाई तुम ऑटो के अंदर ही बैठे रहो... (जिलु और मिलु से) तुम दोनों उतरो बे... ऑटो ठीक करने का सीन बनाना है...

जिलु और मिलु उतर कर ऑटो को एक तरफ उठा कर उसके नीचे एक डंडा लगा देते हैं l सीलु फटाफट स्टेफिनी निकाल कर टायर निकालने का ऐक्टिंग करने लगता है l

सीलु - भाई... इससे पहले के तुम कुछ पूछो.. मैं कुछ पूछूं...
विश्व - हाँ... पूछ लो...
सीलु - तुम्हारा बार काउंसिल वाला लाइसेंस कब आएगा...
विश्व - शायद दो या तीन दिन बाद... या फिर ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता...
जिलु - और जो तुमने आरटीआई में इंफॉर्मेशन माँगा था... उसका क्या हुआ...
विश्व - वह भी एक दो दिन में आ जायेगा.... क्यूँ तुम लोग इतने बेकरार क्यूँ हो...
सीलु - बुरा ना मानना भाई... पर मुझे नहीं लगता... पीआईएल दाखिल करने से... तुम्हें कोई फायदा होगा...
विश्व - ह्म्म्म्म... मतलब तुम लोगों ने बहुत कुछ छानबीन कर लिया है...
मिलु - हाँ लगभग...
विश्व - ह्म्म्म्म ठीक है... अब तुम लोग... मुझे बात को पुरी तरह से समझाओ...
सीलु - भाई... तुमने आरटीआई जैसे ही फाइल किया... इन्हीं पैंतीस चालीस दिनों में... जो भी कुछ हुआ है.. तुम्हारे उस रुप फाउंडेशन केस में कुछ भी मदत नहीं मिलने वाला है...
मिलु - पहली बात... तुम्हारे साथ जो भी... एक्वुस्ड थे... वह सारे के सारे मार दिए गए... ज्यादातर गवाह भी गायब कर दिए गए....
जिलु - और जिन लोगों को तुम गवाह बना सकते थे... मतलब... बैंक के तीन स्टाफ... रेवेन्यू ऑफिस के दो स्टाफ और तहसील ऑफिस के तीन पदाधिकारी... अपनी अपनी मेडिकल सर्टिफ़िकेट निकलवा कर... OSD... बन बैठे हैं...
मिलु - यह OSD मतलब...
विश्व - ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्युटी... वह कर्मचारी... जिन्हें नौकरी से निकालने के बजाय... उन्हें बिना किसी काम धाम के... मानवता के आधार पर नौकरी पर बनाए रखा जाता है....
जिलु - हाँ...
विश्व - और जाहिर सी बात है कि... वे सब... सिजोफेर्नीया की सर्टिफिकेट लाए होंगे...
सीलु - हाँ... बिल्कुल...
विश्व - मतलब... अब वह सारे लोग गवाह के तौर पर नाकारे हो चुके हैं...

तीनों अपना सिर हाँ में हिला कर चुप हो जाते हैं l विश्व अपनी आँखे बंद कर कुछ सोचते हुए हँसने लगता है l

सील - भाई... दुखी मत हो...
विश्व - मैं दुखी कहाँ हूँ... मैं तो हँस रहा हूँ...
मिलु - पर क्यों... क्या अब भी... तुम हाइकोर्ट में पीआईएल दाखिल करोगे...
विश्व - हाँ...
तीनों - (हैरान हो कर) क्या...
जिलु - पर उससे फायदा क्या होगा...
विश्व - देखो... मैंने जब आरटीआई दाख़िल किया था... मुझे तभी से ही अंदेशा था... ऐसा ही कुछ होगा... इस केस के ताल्लुक़ और तीन प्रमुख गवाह हैं... सी आई... अनिकेत रोणा... श्रीधर परीडा... और राजा भैरव सिंह...
सीलु - पर भाई तुम्हीं कहा करते थे... रोणा का इसमे उतना रोल नहीं है... जितना एसआईटी का चीफ श्रीधर परीडा का है...
विश्व - हाँ पर उन तीनों को गवाही के लिए कोर्ट लाना टेढ़ी खीर है...
मीलु - क्यूँ...
विश्व - केस फिर से खुलेगा... इस बीच सात साल गुजर चुके हैं... बहुत कुछ बदल चुका है... या बदल दिया गया है... इसलिए पहले मुझे पीआईएल फाइल तो करने दो... देखते हैं... क्या होता है...
जिलु - भाई... तुम बात को बहुत ही कैजुअल ले रहे हो...
विश्व - नहीं... गेम तो अभी शुरु होगा... जैसे ही मैंने आरटीआई फाइल की... उन्होंने गलतियाँ करनी शुरु कर दी... जब कि सच कहूँ तो मैं भी जानता हूँ... यह सात साल के पुराने केस में संभावना बहुत कम है...
तीनों - तो...
विश्व - देखो... करप्शन एक चस्का है... जो भी उसकी मलाई एक बार खाये... जब तक कोई खतरा ना हो... वह करता ही जाता है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... उन्होंने करप्शन करना छोड़ा नहीं होगा... बल्कि नए तरीके से... मजे से कर रहे होंगे...
जिलु - तो उस पुराने केस का क्या होगा...
विश्व - पीआईएल तो फाइल होगा... वह लोग अपने ना पकड़े जाने पर और अब तक किए करतूत पर निश्चिंत होंगे... पर फिर भी उनका ध्यान पुराने केस पर जमायेंगे... पर हम असल में उनके नए करप्शन को खोज निकाल कर उसे पुराने केस में जोड़ेंगे... तब जाकर कुछ ना कुछ रिजल्ट हम को मिलेगा...
सीलु - हाँ भाई... तुम्हारे इस बात पर... मैं सौ फीसद सहमत हूँ... अभी इन पाँच छह महीनों में... सारे प्रमुख सरकारी कार्यालय में... पदाधिकारी बदले हैं... सब नए हैं... तो तुम्हारे कहे हिसाब से... करप्शन हो रहा है... हम जान भी रहे हैं... पर शायद नए तरीके से...
विश्व - ठीक है... तो अब बताओ... इन छह महीनों में क्या क्या हुआ है...
सीलु - भाई... इन छह महीनों में... यशपुर को स्मार्ट सिटी... और राजगड़ को स्मार्ट विलेज बनाने की अप्रूवल मिल गया है... पाँच साल पहले... राजगड़ से बाहर... निरोग हस्पताल बनाया जा रहा था... बहुत ही बड़ा हस्पताल... पर यश वर्धन की मौत के बाद... वह हस्पताल की बिल्डिंग विरान पड़ी थी... छह महीने पहले... उसे... राजगड़ मल्टी पर्पस कोऑपरेटिव ऑफिस में कन्वर्ट किया गया है...
मिलु - इन्हीं पाँच छह महीनों में... यशपुर और राजगड़ विकास के लिए... बहुत से प्रोजेक्ट अप्रूव्ड हुए हैं... वह भी... मनरेगा के तहत... पर...
विश्व - पर...
मिलु - इस बार... कोई मुर्दा नहीं है... पता नहीं पैसे कैसे गायब हो रहे हैं...
विश्व - ह्म्म्म्म... लगता है... इस बाबत हमें कोई लिंक मिलने वाला है...
तीनों - कैसे... कौन देगा...
विश्व - वही... जो मुझसे... पेपर से... कॉन्टेक्ट करना चाहता है... मुझे लगता है... इसी करप्शन पर वह कोई रौशनी डाल सकता है...
जिलु - पर टीलु कह रहा था... वह कुछ दिनों से कॉन्टेक्ट नहीं कर रहा है...
विश्व - हाँ... कर तो नहीं रहा है... अच्छा मैं यहाँ से उतर कर पैदल ही चला जाता हूँ... तुम लोग आधे घंटे बाद... अपने अपने ठिकाने पर पहुँच जाओ...
जिलु - रुको ना भाई... छोड़ देते हैं तुम्हें...
विश्व - नहीं... मैं नहीं चाहता कोई भी हमें... इकट्ठा देखे...


इतना कह कर विश्व ऑटो से उतर कर चल देता है l चलते चलते इनके कही बातों को याद करने लगता है l उसे अंदाजा था, भैरव सिंह अपनी नाक बचाने के लिए बहुत कुछ करेगा l पर जिन अधिकारियों को गवाही के लिए बुलाया जा सकता था, उन्होंने ही अपने तरफ से पागलपन का सर्टिफिकेट लेकर अपनी जान और आने वाले कानूनी पचड़े से खुद को बचा लिया l असल में भैरव सिंह के बाद सिर्फ एक ही गवाह बचता हैं l श्रीधर परीडा एसआईटी का चीफ जिसे शायद तोड़ा जा सकता है l पर कहीं भैरव सिंह इससे पहले श्रीधर परीडा को कुछ ना कर दे l और इन छह महीनों में जो भी कुछ हुआ है पुराने कडियों को जोड़ने के लिए बहुत अहम है l पर जोड़े तो जोड़े कैसे l भैरव सिंह अपने पुराने गलतियों से सबक लेकर अब जो भी कर रहा होगा फुल प्रूफ ही होगा l
ऐसे सोच सोच कर विश्व उसी पेपर वाले के दुकान पर आ पहुँचता है जहां से वह रोज उसके लिए टीलु पेपर लेकर जाता है l उसके कदम अपने आप दुकान के अंदर पहुँच जाते हैं l

दुकानदार - बोलिए साहब.. क्या चाहिए...
विश्व - (समझ नहीं पाता क्या कहे)
दुकानदार - सर यहाँ हर तरह के अखबार... किताबें मिलती हैं... बोलिए आपको कौनसा चाहिए...
विश्व - मैं... वह... असल में... मैं थोड़ा कंफ्यूज हूँ...
दुकानदार - जब मन भटके... कोई राह ना दिखे तो... यह किताब पढ़ना चाहिए... (दुकानदार एक किताब निकाल कर दिखाता है जिसके कवर पर लिखा था "शुभ संदेश")
विश्व - नहीं... मैं...
दुकानदार - अरे सहाब ले लीजिए... यह आपके लिए ही है... घर जाकर पढ़ लीजिए... अगर आपको पसंद ना आए.. तो कल लाकर लौटा दीजिएगा...
विश्व - नहीं... मैं ऐसे कैसे...
दुकानदार - अरे सहाब... मैंने कहा ना... यह किताब आपके लिए ही है... मेरी मानिये... जरा एकबार घर जाकर पढ़ लीजिए... पैसा तभी दीजिएगा जब अंदर का विषय पसंद आए... अगर पसंद ना आए... तो लाकर वापस लौटा दीजिए...

विश्व हिचकिचाते हुए किताब लेता है l तभी उसका फोन बजने लगता है l फोन निकाल कर देखता है l स्क्रीन पर दीदी डिस्प्ले हो रहा था l

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रंगमहल से अपने सरकारी क्वार्टर पर रोणा लौट आता है l सिगरेट की धुआं उड़ाते हुए अपने क्वार्टर के अंदर दाखिल होता है l ड्रॉइंग रूम में सोफ़े के पास पड़े टी पोय पर क्लाथ को हटाता है l उस टी पोय के बोर्ड पर विश्व का बड़ा सा मगर एक पुरानी फोटो लगी हुई थी l उस फोटो को देखते ही उसकी आँखों के नीचे की पेशियों में थर्राहट होने लगती हैं l वह आज महल में हुए व्याक्या को याद करने लगता है l


आओ रोणा आओ... पहले गायब होते थे... तो पता रहता था... तुम कहाँ पर हो... पर इस बार तुम ऐसे छुपे जैसे अमावस में चाँद... क्या बात है... (यह सवाल था भैरव सिंह का रोणा से)

रोणा भीमा के साथ रंगमहल के उपरी प्रकोष्ठ में आया था l यह भैरव सिंह का खास कमरा था जहां वह लोगों को बुला कर बैठक किया करता था l भैरव सिंह एक बड़े से सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे रोणा का इस तरह से अभिवादन किया l रोणा के भीतर आते ही भैरव सिंह अपना हाथ उठा कर भीमा को इशारे से जाने को कहता है, भीमा अपना सिर झुका कर उल्टे पाँव लौट जाता है l भीमा के वहाँ से जाते ही

रोणा - ऐसा कुछ नहीं है राजा साहब... मैं भुवनेश्वर आपको बता कर ही गया था...
भैरव सिंह - हाँ... गए तो थे... (अचानक हैरान हो जाता है) एक मिनट... हम यह क्या देख रहे हैं... (लहजा सपाट व निरस हो जाता है) जो क्षेत्रपाल से जुड़े हों... वह लोग अपने मूंछें नहीं मुंडवाते... जानते हो ना...
रोणा - जी राजा साहब... पर इन दो महीनों में... मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ है... जो मुझे मूंछें रखने लायक छोड़ा नहीं है...
भैरव सिंह - (अपनी भवें सिकुड़ कर रोणा की ओर देखता है) ह्म्म्म्म... चोट बहुत गहरी लगी है... दिल पर भी और दिमाग पर भी... देने वाला कौन है...
रोणा - (जबड़े सख्त हो जाते हैं, आँखों में खुन उतर आती है) व... वि... विश्वा..
भैरव सिंह - विश्वा... क्या किया उसने इसबार तुम्हारे साथ....
रोणा - (अपनी दांतों को पिसते हुए) पहली बार... उसने साबित कर दिया... मैं कितना लाचार हूँ... मैं कितना मजबूर हूँ... उसने मुझे एहसास दिलाया... के मैं एक बेचारा हूँ...
भैरव सिंह - पर तुम इसबार एक लड़की के पीछे गए थे ना.... क्या उस लड़की का... कोई संबंध है विश्वा से... जैसा कि तुम अनुमान लगा रहे थे...
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए चुप रहता है, फिर अपना सिर ना में हिलाते हुए) नहीं... नहीं राजा साहब... नहीं...
भैरव सिंह - पर तुमने जो अनुमान लगाया था...
रोणा - हाँ... कुछ अनुमान सही साबित हुए और कुछ गलत... प्रधान बाबु सही कह रहे थे... विश्वा जैसे सजायाफ्ता मुजरिम से... जो जैल से छूटे कुछ ही दिन हुए हों.. उससे कैसे कोई इज़्ज़त दार घर की लड़की दिल लगा सकती है... वह मेरा वहम था... जो इस बार दूर हो गया...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... इसका मतलब उस लड़की से... अब बदला नहीं लोगे...
रोणा - जी बेशक लूँगा... (अपने गाल पर हाथ फेरते हुए) अपने अपमान का बदला कैसे ना लूँ... उसे अपने नीचे लाए वगैर.. मेरी तड़प कम नहीं होगी...
भैरव सिंह - हम्म्म बहुत अच्छे... (एक कुटील मुस्कान लेकर) तो अनिकेत रोणा तुमने उस लड़की को... इस रंग महल के लिए कभी नहीं सोचा... हूँ..
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए स्तब्ध हो जाता है, फिर लड़खड़ाती हुई आवाज में ) सो.. सोचा... था... पर... राजा साहब... वह इतनी खूबसूरत है नहीं कि... इस रंग महल की रंगत बन सके... (नजरें झुका लेता है)

भैरव सिंह का चेहरा थोड़ा सख्त हो जाता है l वह तेज नजरों से रोणा को घूर रहा था l रोणा उसके नजरों का सामना नहीं कर पा रहा था l

रोणा - राजा साहब.. मैं आपका नमक हलाल हूँ... आप हुकुम करेंगे तो... मैं उसे इस रंग महल की रंगत बनाने के लिए... जरूर कुछ करूँगा...
भैरव सिंह - अच्छा... बड़ी जल्दी तैयार हो गए...
रोणा - वह... बात दरअसल यह है कि... उस लड़की से... मैं अपनी निजी खुन्नस निकालना चाहता था...
भैरव सिंह - (हँसने लगता है) हा हा हा हा हा... हम तो तुम्हें जांच रहे थे... बस तुम्हारी वफादारी देख रहे थे... तुम्हारे अंदर की जुनून को परख रहे थे... क्यूंकि तुम्हें बिना मूँछ के देख कर... हमें लगा तुम्हारी काबिलियत पर कहीं सीलन ना पड़ गया हो... जंक तो नहीं लग गया...
रोणा - तो बोलिए... क्या हुकुम है राजा साहब... अगर आप कहेंगे तो लड़की को उठवाकर इस रंग महल में आपके सेवा में पेश कर दूँगा...
भैरव सिंह - सबास... रोणा उस लड़की का विश्वा से जब कोई संबंध नहीं है... तो उस लड़की पर हमारा इरादा खत्म हो गया... क्यूंकि भैरव सिंह उन कलियों और फूलों को मसलता... रौंदता है... जिनकी कांटे भैरव सिंह को चुभते हैं... हम रंग महल में उसे अपने नीचे लाते हैं... जिसपर अपना नफरत उतारना हो... खैर यह बताओ... विश्वा ने तुम्हारे साथ ऐसा क्या किया... जो तुमने अपना मूंछें निकलवा दी...

यह सवाल रोणा को अंदर से छटपटा देता है l उसके जबड़े भींच जाते हैं आँखों के नीचे की मांस पेशियां फड़फड़ाने लगती हैं l आँखे नम हो कर तैरने लगती है l

रोणा - (दुख और पीड़ा से आवाज जैसे जम गया हो) राजा साहब... कुछ ऐसा किया है... जो मेरे मर्द होने की अहम को कुचल कर रख दिया है...
भैरव सिंह - ठीक है... हम समझ गए... कुछ ऐसा हुआ है... जो तुम बता नहीं सकते... और यह भी समझ गए... वह तुम पर इस कदर खुन्नस खाए हुआ है... के तुम्हारे पीछे पीछे भुवनेश्वर पहुँचकर... तुम्हारी बजा कर वापस आ गया है...
रोणा - (अपने हुए अपमान को याद कर आँखे बंद कर लेता है) राजा साहब... आपने मुझे बुलाया है... कोई हुकुम...
भैरव सिंह - हाँ रोणा हाँ... हम आज शाम को... भुवनेश्वर जा रहे हैं... छोटे राजा... युवराज और प्रधान के साथ हफ्ते दस दिन के लिए... कलकत्ता और राँची जा कर कुछ बिजनैस डील फाइनल करने हैं... तो यह कुछ दिन... राजगड़ पुरी तरह से तुम्हारे हवाले किए जा रहे हैं...
रोणा - (हैरानी से भैरव सिंह की ओर देखते हुए) मैं समझा नहीं
भैरव सिंह - अभी समझ जाओगे...

भैरव सिंह एक बेल बजाता है l कुछ देर बाद उस कमरे में भीमा के साथ सरपंच, शनिया, सत्तू आते हैं l

भैरव सिंह - रोणा कल से लेकर हमारे वापस आने तक... तुम मौका बनाओ... उस कमज़र्फ विश्वा से... तुम्हें कैसे बदला लेना है...
रोणा - मैं अभी भी समझा नहीं...
भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता है) कुछ दिन हुए हम कुछ अफवाह सुन रहे थे... इस बाबत हमने इस शनिया से बात की... तो उसने हमें जो बताया... हमें वह सब नागवार गुज़रा... शनिया ने कहा कि... रात के अंधेरे में... यह लोग तैयार नहीं थे... पर विश्वा अपनी पुरी तैयारी में था... इसलिए वह कांड हो गया... जो कभी होना नहीं चाहिए था... पर दोबारा विश्वा के पास ऐसा मौका नहीं आना चाहिए...
रोणा - तो इसमें सरपंच की क्या भूमिका है..
सरपंच - है दरोगा बाबु है... पंचायत ऑफिस में... हमने दो साल पहले एक चिट फंड शुरु किया था...
रोणा - चिट फंड...
शनिया - जी दरोगा जी... और जो लोग हमसे कुछ भी लेते थे... उसके एवज में... हम सब उसे चिट फंड में जोड़ कर दिखा देते थे... और उसके बदले उनसे... खाली कागजात पर अँगूठा या दस्तखत रख लेते थे...
रोणा - ओ...
सरपंच - हाँ... दरोगा बाबु... आज हम घर घर जा कर सबको कल की पंचायत के लिए नोटिस थमा दिया है... सबका फैसला हम पंचायत में करेंगे... या तो पैसा.. या फिर... हमारे घर पर उनका कोई काम करने आएगा... और तब तक काम करेगा... जब तक उनका कर्ज उतर ना जाए...
रोणा - तो इसमें विश्वा कहाँ आ गया... वह गाँव वालों के.. किसी के भी फटे में घुसेगा नहीं...
शनिया - वह नहीं घुसेगा... पर उसकी दीदी... वह तो घुसेगी.. और जब उसकी दीदी घुसेगी.. तो विश्वा भी घुसेगा...
रोणा - (शनिया से) याद है.. तुझे वकील बाबु ने क्या कहा था... जहां कानूनी पचड़े होंगे... तुझे उनसे पूछ कर यह करना चाहिए था...
शनिया - पर वकील बाबु हैं नहीं... और गाँव में हमारी वह इज़्ज़त रही नहीं... इसलिए हमने सरपंच जी से मशविरा किया... और राजा साहब से इजाजत ले रहे हैं...
रोणा - तुम अब तक यह नहीं समझ पाये... जहां कानून की दाव पेच होगी... वहाँ विश्वा भी अपना कानूनी दिमाग लगाएगा... और तुम लोगों को गलत साबित करेगा... तब हम क्या कर पाएंगे... क्यूंकि ... चिट फंड अगर सरकारी ज्ञांत में और मंजूरी में ना हो तो वह गैर कानूनी होती है... और इससे लोग तुम्हारे ही खिलाफ हो जाएंगे...
शनिया - राजगड़ में राजा साहब ही तो सरकार हैं... और यहाँ लोग राजा साहब के खिलाफ तो जाएंगे नहीं...
रोणा - पर तुम लोग राजा साहब नहीं हो... राजा साहब के कारिंदे हो... गाँव में लोग राजा साहब के वज़ह से लोग तुमसे डरते हैं...
सत्तू - यह हम जानते हैं... पर लोग वहाँ हमारे खिलाफ नहीं होंगे... बल्कि विश्वा के खिलाफ हो जाएंगे...
रोणा - क्या...
शनिया - जी दरोगा बाबु... जैसे ही विश्वा इन मामलों में घुसेगा... भीड़ में से हमारे ही आदमी लोगों को भड़काने का काम करेंगे...
रोणा - ह्म्म्म्म.. तो तुम लोगों ने बहुत सोच समझकर कर यह प्लान बनाया है...
सब - हाँ दरोगा जी...
रोणा - तो इसमें मेरी भूमिका क्या होगी...
भैरव सिंह - तुम बस हवाओं के रुख को पलटने मत देना रोणा... मौका ढूंढना... जब हाथ तुम्हारे मौका आयेगा... तब अपना खुन्नस जैसे चाहे वैसे निकाल लेना... पंचायत में मामला गरम होता जाएगा... हो सकता है तु तु मैं मैं होते होते वहाँ पर दंगा हो... और जहां दंगा होगा... कुछ लोग दंगे के शिकार हो जाएंगे... तब तुम्हें कुछ ना कुछ कारवाई करनी होगी... कारवाई में कुछ भी हो सकता है... उसे कानूनी जामा पहनाने की जिम्मा हमारा होगा... धारा 144 जारी होगी... तहसील ऑफिस से ऑर्डर हम दिलवा देंगे...
रोणा - (आंखे चमकने लगते हैं) वाह राजा साहब वाह... आपने तो कुएं को प्यासे तक पहुँचा दिया... मैं सब समझ गया राजा साहब... मैं सब समझ गया... गाँव में दंगा होगा... दंगे के चपेट में कुछ लोग आयेंगे ज़रूर... और दंगा होने से लेकर दंगे के बाद की रिपोर्ट मैं ऐसा बनाऊँगा की बड़े बड़े कानून के सूरमाओं के सिर चकराने लगेंगे

रोणा अपने यादों से बाहर आता है, दांतों को पिसते हुए अपनी सिगरेट का आखिरी कस भरता है l फिर उस सिगरेट को विश्व के तस्वीर पर मसल कर बुझाने लगता है l

रोणा - (विश्वा की तस्वीर से) सोच रहा है ना... मैंने राजा को क्यूँ नहीं बताया... की उस लड़की का तेरे साथ क्या रिश्ता है... वह इसलिए मादरचोद... तुझे एक कुर्सी पर बाँध कर... तेरे ही आँखों के सामने... तेरी छमीया का ना सिर्फ बजाऊंगा... बल्कि ऐसा फाड़ुंगा... ऐसा फाड़ुंगा... कोई डॉक्टर भी सी नहीं पाएगा... तुझसे राजा का लाख खुन्नस सही... पर मेरी खुन्नस के आगे राजा का खुन्नस जीरो है... उसका खुन्नस तेरे लिए उसके जुती में है... पर मेरा खुन्नस तेरे लिए मेरी नाक से भी उपर है.... इसीलिए तेरी छमीया को रंगमहल की रंगत बनाने से बचाया... क्यूंकि... उसे ताउम्र मेरी रखैल बनाऊँगा... दो दिन बाद होने वाले पंचायत में तेरे खातिर जो दंगे होंगे... वहाँ पर तेरे साथ कुछ भी हो... पर तुझे मैं मरने नहीं दूँगा... क्यूँ की तुझे मैं वह ज़ख़्म दूँगा... जो तेरी जेहन को... आत्मा तक को मरते दम तक गलाती रहेगी....
Nice👍👍👍
 
  • Love
Reactions: Kala Nag

Luckyloda

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मित्रों छुट्टी पर था
इस शर्त पर के सिवाय अपने परिवार के और किसी दुसरे विषय पर ध्यान ना दूँगा
इसीलिए बहुत देर हो गया
अभी एक डेढ़ घंटे के भीतर नया अपडेट प्रस्तुत कर देता हूँ
Bhut shandaar......


Bas 1 gam h ki bta k chale jate to aapko msg karke disturb na karte
 

avsji

कुछ लिख लेता हूँ
Supreme
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अपडेट 127 पर कुछ ऑब्ज़र्वेशन्स :

अंततः दोनों पक्षों की लड़ाई मानस युद्ध से उतर कर धरातल पर आ ही गई!

एक पक्ष की तरफ़ से बिसातें बिछ गई हैं, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं लग रहा है कि दूसरे पक्ष को इस साजिश का अंदेशा भी है। विश्व एंड कं. का ध्यान फिलहाल भैरव एंड कं. की घोटालेबाजी पर ही केंद्रित दिख रहा है। ऐसा नहीं है कि वो उनकी नीचता के बारे में नहीं समझते, लेकिन फिलहाल उसका संज्ञान नहीं लगता उनको।

अपना काम साधने के लिए दंगेबाज़ी करवाना आज कल की राजनीति का ऐसा घिनौना पहलू है, जिसको जानते सभी हैं, लेकिन फिर भी स्वीकारते नहीं। लेकिन यहाँ तो अपना उल्लू सीधा करने के लिए ही दंगे करवाने की साजिश चल रही है। भैरव एंड कं. को वैदेही के चरित्र के बारे में अच्छी तरह से पता है। उनको मालूम है कि थोड़ा भी बदतमीज़ी करने से वो स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकेगी - और उसी कारण से विश्व भी उनके जाल में फंस सकता है। अच्छा समीकरण बैठाया है। देखते हैं, कि विश्व को कब इस साजिश का पता चलता है, और वो कैसे इसका तोड़ निकालता है।

वीर और अनु की प्रेम कहानी बेहद नाज़ुक मोड़ पर है। हम पाठक जानते हैं कि अनु की जान को खतरा है - वो भी उसकी होने वाली ससुराल से ही! उधर वीर उसको दस दिनों के भीतर ही अपना बना लेने का संकल्प लिए हुए है, जो इस समय खटाई में पड़ता दिख रहा है। मेरे ख़याल से उसको अपने पाँवों पर खड़ा हो जाना चाहिए, और उससे शादी कर लेनी चाहिए। लेकिन, वो अनु के लिए अपने परिवार से जिस तरह की स्वीकारोक्ति चाहता है, वो ऐसे गन्धर्व विवाह से संभव नहीं। मतलब, बड़ी कठिन डगर है।

विक्रम का अभी भी कुछ समझ नहीं आता। कुछ लोग काम को ले कर अपने परिवार से कुछ इस तरह से पलायन करते हैं कि समझ नहीं आता कि वो चाहते क्या हैं! शायद विक्रम अपने बाप को अपनी योग्यता दिखाना चाहता हो; शायद उसको भैरव से कोई अप्रूवल चाहिए हो। क्या पता। उसकी मनःस्थिति समझ नहीं आती। भाई - पत्नी - बहन - ऐसा लगता ही नहीं कि वो उनको ले कर अपनी जिम्मेदारी के लिए गंभीर है! सबसे कमज़ोर यही लगता है चरित्र में। कम से कम बाकी सभी के अपने अपने खूँटे हैं, विभिन्न विषयों को ले कर। बस, इसी का नहीं समझ आता। एक समय आएगा, जब ये कोई पक्ष पकड़ने को मजबूर हो ही जाएगा। तब इसका होगा क्या?

रोणा की उछल कूद और तड़प देख कर ऐसा लगता है कि उसका अंत निकट है। शायद यही वो व्यक्ति है, जिसकी मृत्यु होनी है। भैरव जैसों के लिए आजीवन कारावास, सामाजिक बेइज़्ज़ती, भर्त्सना इत्यादि अच्छा दण्ड है, लेकिन रोणा - जो कहने के लिए क़ानून का रक्षक है - जैसों के लिए मृत्यु दण्ड ही उचित है। पर मैं शायद गलत भी हो सकता हूँ।

अंततः - बहुत ही उम्दा अपडेट है Kala Nag भाई! आप वापस आ गए, और भी अच्छी बात है! :)
 

Parthh123

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👉एक सौ सत्ताइसवां अपडेट
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अंधेरा छटा नहीं था विश्व पहुँच गया था l चूंकि उसने रात को ही खबर कर दी थी इसलिए रात को ही सीलु गाँव से निकल कर यशपुर चला गया था l विश्व पहुँचने के बाद उमाकांत सर जी का घर देख कर हैरान हो गया था l उसने जितना भी बदलाव किया था सीलु ने उसके ऊपर अपना दिमाग लगा कर और भी खूबसूरत बना दिया था l विश्व इस वक़्त इतना खुश था कि अगर सीलु सामने होता तो उसे गले से लगा लेता l

टीलु - क्या देख रहे हो भाई...
विश्व - पिछले जनम में तुम सब से मेरा भाई वाला ही नाता था..
टीलु - हाँ वह तो है... जरूर एक ही माँ के पेट से होंगे...
विश्व - हाँ...
टीलु - पर कोई ना... अब हम सब एक ही दीदी के भाई है... क्यूँ है कि नहीं...
विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम सब बातों में माहिर हो...
टीलु - क्या... भाई... इसमें बात बनाने वाली बात कहाँ से आ गई...
विश्व - दीदी बमुश्किल से तुम्हें ही देखी है... उन तीनों से मिली भी नहीं है... और तुम...
टीलु - गलत... मैंने वक़्त निकाल कर सीलु को दीदी से मिलवा चुका हूँ..
विश्व - (चौंक कर) क्या...
टीलु - घबराने का नहीं... गाँव में सबकी नजरों से छुपाते हुए दीदी से मिलवाया...
विश्व - पर क्यूँ...
टीलु - क्यूंकि दीदी मिलना चाहती थी...
विश्व - ह्म्म्म्म... तब ठीक है...
टीलु - पर भाई तुमने पूछा नहीं... दीदी क्यूँ मिलना चाहती थी...
विश्व - नहीं...
टीलु - पर क्यूँ...
विश्व - दीदी सीलु से मिलना चाहती थी.. क्यूंकि कुछ दिनों के लिए ही सही... सीलु ने विशु की जगह ली थी... और वैसे भी... मेरी दीदी का दिल बहुत बड़ा है... और तुम सब उसके लिए उतना ही हो... जितना कि मैं... जब कोई भी मेरा नहीं था... तब तुम लोग मेरे साथ आए... वह भी बिना किसी लाग लपेट के...
टीलु - बस भाई बस... मुझे और सेंटी मत करो... कुछ देर बाद तुम्हारे नन्हें प्यारे प्यारे बंदर आयेंगे... उनको सम्भालो... दिलासा दो...
विश्व - ऐ... उन्हें बंदर क्यूँ कह रहे हो...
टीलु - (बिदक कर) और नहीं तो... वह सब इत्ते इत्ते से छछूंदर... मुझे चमगादड़ मामा कह रहे हैं... (टीलु जिस अंदाज से कहा विश्व जोर जोर से हँसने लगता है) हाँ हाँ हँस लो... तुम उसके मामा... और मैं उन सबका चमगादड़ मामा...
विश्व - (हँसी को दबाने की कोशिश करते हुए) अरे इसमें इतना बुरा मानने वाली बात कहाँ है...
टीलु - (मुहँ बना कर) तो इसमें खुशी से उछलने वाली बात भी कहाँ है...
विश्व - अच्छा यही बात तुमको अंग्रेज़ी में कही होती तो...
टीलु - अंग्रेजी में..
विश्व - हाँ बैट मेन अंकल... (कह कर विश्व हँसने लगता है) अब तो बुरा नहीं लगेगा ना...

विश्व के साथ साथ टीलु भी हँसने लगता है, तभी एक लड़का आ पहुँचता है l वह दोनों अपनी हँसी को रोक कर उस लड़के की ओर देखते हैं l वह लड़का खुशी के मारे अपनी आँखे बड़ी करते हुए उन्हें देख रहा होता है l विश्व को देखते ही वह लड़का पूछता है l

लड़का - अरे मामा तुम आ गए...
विश्व - मैं गया ही कब था... और तुम इतनी सुबह सुबह...
टीलु - इन बंदरों को नींद आती भी है या नहीं... यह पूछो...
लकड़ा - (अपना गाल फुला कर) हूँन्न्न्नन्...

विश्व एक बड़ा सा चॉकलेट निकाल कर लड़के के सामने लहराता है l लड़का चॉकलेट देख कर खुश हो जाता है और लेने के लिए हाथ बढ़ाता है तो विश्व चॉकलेट को अपने पीछे ले जाता है l लड़का मुहँ बनाता है l

विश्व - पहले यह बताओ... तुम्हारा नाम क्या है...
लड़का - अरुण...
विश्व - हाँ तो अरुण... इतनी सुबह सुबह...
अरुण - वह क्या है कि मामा... आज... (अपनी दो उंगली दिखा कर) लंदन से थोड़ा जल्दी बुलावा आ गया था... इसलिए...
टीलु - ऐ छछूंदर... संढास के लिए बाहर जाने को लंदन बोल रहा है...
अरुण - (टीलु को उंगली दिखा कर) ऐ चमगादड़ मामा... यह हमारा कोड वर्ड है... हम यहाँ नहर को... लंदन बोलते हैं...
टीलु - अबे तेरी तो... (विश्व उसे रोकता है)
विश्व - देखो अरुण... गलत बात... चमगादड़ नहीं...
अरुण - (मुहँ बना कर) सॉरी मामा...
विश्व - अच्छा यह बताओ... तुम इन्हें.. चमगादड़... क्यूँ कह रहे थे...
अरुण - यह हमें आप से मिलने ही नहीं दे रहे थे... जब देखो द्वार पर... लटके ही दिखे... इसलिए...
विश्व - ठीक है... पर चमगादड़ नहीं... हाँ उन्हें तुम सब... बैट मेन अंकल कह सकते हो...
अरुण - ठीक है... पर क्यों...
टीलु - (बड़े एटीट्यूड के साथ) इसलिए... क्यूंकि तुम्हारे इस बैट मेन अंकल... फोरैंन रिटर्न हैं...
अरुण - फोरैंन रिटर्न... मतलब लंदन से...
टीलु - हाँ... (फिर चिल्ला कर) नहीं... तुम्हारे वाली.. लंदन से नहीं... असली लंदन से...
अरुण - हाँ हाँ ठीक है... (विश्व से) अच्छा मामा... लाइब्रेरी बन गया...
विश्व - हाँ... बन गया...
अरुण - और हमारे लिए खिलौने भी लाए हो....
विश्व - हाँ हाँ लाया हूँ... तुम सब आज तैयार हो कर आना... और आज के बाद यहाँ जम कर उछलकूद करना... पढ़ना...
अरुण - (खुशी से उछलते हुए) अरे वाह... मैं अभी जाता हूँ अपने सारे दोस्तों से कहता हूँ...
विश्व - हाँ और यह भी... आज सब तुम सब दो पहर का खाना... अपने मामा के साथ खाओगे...
अरुण - ठीक है...

कह कर बिना पीछे मुड़े अरुण वहाँ से भाग जाता है l विश्व उसे जाते हुए देखता है l


टीलु - भाई... कोई लफड़ा तो नहीं होगा ना..
विश्व - कैसा लफड़ा...
टीलु - तुम जानते हो... यह गाँव वाले...
विश्व - टीलु... मेरे भाई... अगर यह बच्चे आकर इस श्रीनिवास लाइब्रेरी को जिंदा कर देंगे... तो समझ लो... इन मरे हुए गाँव वालों को भी जिंदा कर देंगे...
टीलु - वह कैसे...
विश्व - वह सब मैं बाद में बताऊँगा... पहले यह बताओ... उन न्यूज पेपर में... और क्या क्या मेसेज मिला है अब तक...
टीलु - अरे हाँ... एक मिनट... अभी लाया...


टीलु अंदर जाता है, कुछ न्यूज पेपर और हाथ में एक डायरी लेकर आता है l डायरी को विश्व के हाथ में देकर और न्यूज पेपर्स को विश्व के सामने रखते हुए


टीलु - यह लो... तुमने जैसा कहा था... मैंने बिल्कुल वैसा ही डीकोडिंग करते हुए... जो भी मेसेज बना.. मैंने इस डायरी में लिख दिया है... देखो...

विश्व डायरी में वह पन्ना देखता है जिसमें टीलु ने डीकोड कर वह संदेश इकट्ठा किया था l

"तुम अकेले नहीं हो, एक काफिला तैयार है, युद्ध जब अनिवार्य है, हमारा मिलना आवश्यक है"
"भ्रष्टाचार ही भ्रस्टाचार है, हर तंत्र सम्मिलित है, तुम अकेले क्या करोगे, चलो मिलकर बाजी जीते"


विश्व - सिर्फ दो संदेश... इतने दिनों में... सिर्फ दो संदेश...
टीलु - हाँ... एक दिन मैं यशपुर बहुत जल्दी चला गया था... उस दिन के बाद... और संदेशे मिले नहीं... (विश्व टीलु को घूर कर देखने लगता है) सच कहता हूँ भाई... मैं कोई जासूसी करने नहीं गया था... हाँ थोड़ी जल्दी जरूर गया था... और शायद उसी दिन से वह डर कर मेसेज देना बंद कर दिया... मुझे लगता है... यह राजा क्षेत्रपाल की कोई जाल था... पकड़े जाने के डर से... संदेशा नहीं दे रहा....

विश्व डायरी में लिखे मेसेज्स गौर से पढ़ने लगता है l फिर अपनी आँखे मूँद कर कुछ सोचने लगता है l

टीलु - क्या सोचने लगे भाई...
विश्व - मुझे लगता है... यह बंदा शायद यह जानने की कोशिश कर रहा है... मैं उसके संदेशे पढ़ रहा हूँ या नहीं...
टीलु - मतलब तुम्हें लगता है... इसके पीछे राजा साहब नहीं है...
विश्व - पता नहीं... पर मेरे अंदर की गट फिलिंग कह रही है... कोई बंदा... राजा साहब का सताया हुआ... जो मुझसे ज्यादा मुझको जानता है... मेरी मदत करना चाहता है...
टीलु - तो अब... क्या करने का प्लान है...
विश्व - सोचता हूँ...

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द हैल
डायनिंग टेबल पर चारों सदस्य बैठे हुए हैं l रुप वीर से नजरें चुरा रही थी और खुद को शुभ्रा के साथ बात चित में व्यस्त दिखा रही थी l विक्रम चुप चाप अपना नास्ता कर रहा था पर वीर खोया हुआ था l यह सब बातेँ शुभ्रा नोटिस कर लिया था l

शुभ्रा - क्या बात है वीर... किस सोच में खोए हुए हो...
वीर - (अपनी सोच से बाहर आते हुए) कुछ नहीं भाभी...
शुभ्रा - कुछ तो है... तुम थोड़े टेंशन में लग रहे हो... क्यूँ नंदिनी... तुम्हें क्या लगता है...
रुप - म.. म.. मुझे क्या लगता है... मुझे क्या लगेगा भाभी... वीर भैया ट.. ट.. ठीक ही लग रहे हैं...
शुभ्रा - हाँ हाँ ठीक है ठीक है... तुम ऐसे हकला क्यूँ रही हो..
रुप - कहाँ... कहाँ भाभी... मैं ठीक हुँ... वह मैं अपनी सब्जेक्ट याद कर रही थी... और अपने फ्यूचर के बारे में सोच रही थी...
विक्रम - कैसा सब्जेक्ट... कैसा फ्यूचर...
रुप - वह भैया... मैं सोच रही थी... के भाभी से कुछ टीप्स लूँ... गाइडेंस लूँ...
विक्रम - किस बात पर...
रुप - यही के... मैं समर वेकेशन में डॉक्टरी की एंट्रेंस की तैयारी करूँ...
विक्रम - क्या... पर क्यूँ... और दो साल बाद... वैसे भी.. तुम शादी करने वाली हो...
रुप - तो... तो क्या हुआ भैया.. मैं डॉक्टरी के बाद भी तो शादी कर सकती हूँ...
विक्रम - पागल हो गई हो... या बचपना दिखा रही हो... तुम अच्छी तरह से जानती हो... तुम यहाँ पढ़ाई के लिए आई हो... पर उसके पीछे की वज़ह और शर्तें भूलो मत... (रुप का चेहरा उतर जाता है)
शुभ्रा - ओ.. हो... मैंने कहाँ से शुरू किया था... और बात कहाँ पर आकर पहुँच गई... वीर... प्लीज तुम बताओ... क्या सोच रहे थे...
वीर - भाभी... मैं वह...
शुभ्रा - (हैरान हो कर छेड़ते हुए) वीर... तुम झिझक रहे हो...
वीर - हाँ.. वह मैं...

सब खाना खाते हुए रुक जाते हैं और सबकी नजर वीर पर रुक जाती है l वीर सब नजर घुमाने के बाद शुभ्रा को देखते हुए कहता है l

वीर - मैंने एक अहम फैसला किया है... आई मिन कर लिया है... अपने लिए... इस घर के लिए... हम सबके लिए... (रुक जाता है)
विक्रम - कैसा फैसला...
वीर - भैया... भाभी... नंदिनी... आप सब अनु को जानते हो... अनु आप सबको पसंद भी है...
विक्रम - साफ साफ कहो वीर...
वीर - मैं... मैंने अनु से जल्द से जल्द शादी करने का फैसला किया है...

यह सुन कर सब पहले शुन हो जाते हैं, उसके बाद

विक्रम - क्या...
शुभ्रा - वाव...
रुप - आह सच में..
विक्रम - होल्ड ऑन होल्ड ऑन.. यह तुमने फैसला किया है... आई मिन... जो कर लिया है... इसमें हमें कोई ऐतराज नहीं है... क्यूंकि हम जानते हैं... छोटी माँ का भी आशीर्वाद है... पर तुम भूल रहे हो... टीम बड़े... और हैं... बड़े राजा जी... राजा साहब और छोटे राजा जी... जिनकी मंजुरी बहुत जरूरी है...
वीर - नहीं भूला हूँ... मैं आप सबको अपनी बात बता देना चाहता था.... सो बता दिया...
विक्रम - ठीक है... पर अचानक ऑल ऑफ सडन... आई मिन तुम... कुछ दिन या महीने रुक भी सकते थे...
वीर - क्यूँ...
विक्रम - देखो... अभी हम सब किसी ना किसी वज़ह से डिस्टर्ब्ड हैं... ऐसे हालात में... तुम हमारे घर के बड़े... राजी भी होंगे... डाऊट है... (कुछ देर के लिए सभी चुप हो जाते हैं, फिर) वैसे भी... तुमने अचानक यह फैसला क्यों लिया...

वीर चुप रहता है l उसकी चुप्पी को शुभ्रा समझ जाती है l इतने में सबका खाना चूंकि ख़तम हो चुका था, इसलिये शुभ्रा रुप को इशारे से अपने साथ किचन की चलने के लिए कहती है l रुप और शुभ्रा दोनों किचन के अंदर चले जाते हैं l

विक्रम - तुमने बताया नहीं... क्यूँ...
वीर - भैया... मैं... खुद को... जब से सुधारने में लगा हुआ हूँ... तब से... हाँ तब से... कोई ना कोई मेरी कुंडली में उंगली कर रहा है... मेरे पिछली जिंदगी को... आज से छुड़ाने की कोशिश में हूँ... अपने अंदर की... पुराने वीर से छुटकारा पाने की कोशिश में हूँ... पर कोई है... जो मेरे अंदर के पुराने वीर को ललकारना चाहता है...
विक्रम - तो इससे तुम्हारी शादी का... क्या कनेक्शन है...
वीर - मैं... उस वीर को हमेशा हमेशा के लिए दफना देना चाहता हूँ... मैं दुनिया जहान से लड़ कर जब घर को लौट कर आऊँ... अनु का मुस्कराता हुआ चेहरा देख कर... मैं दुनिया जहान को भुला देना चाहता हूँ... ना किसी पर कोई गरज... ना किसी से कोई शिकायत... मैं दुनिया से थका हारा लौट कर आऊँ... उसके पहलु में... एक नई जिंदगी.. एक नई जीत को हासिल करूँ... बस इसलिए अनु से जल्द से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ...

इतना कह कर वीर चुप हो जाता है और विक्रम की ओर देखने लगता है l विक्रम भी उसकी बातेँ सुन मुहँ फाड़े देखे जा रहा था l

विक्रम - (उसी हैरानी के साथ) ओ... वीर... मैं हैरान हूँ... तुम दुनिया से इतनी जल्दी हारने लगे...
वीर - तभी तो जीत की चाहत में... अनु से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ... (विक्रम के हाथ को पकड़ लेता है) भैया... मैंने भले ही... तुम्हारे छोटे भाई का फर्ज ना उतार पाया... पर तुमने कभी भी इस बात पर मलाल नहीं की... पर आज एक छोटे भाई का हक माँग रहा हूँ... प्लीज... हमारे घर के बड़ो से मेरे लिए बात करोगे... प्लीज...
विक्रम - (वीर के हाथ पर अपना हाथ रख देता है) चल पागल... मैंने कभी भी... अपने मन में... तुम्हारे लिए कोई गाँठ नहीं बाँधा है... अगर बड़ों से बात करनी ही है... तो बस एक हफ्ता रुक जाओ...
वीर - (चौंक कर) एक हफ्ता...
विक्रम - हाँ.. एक हफ्ता...
वीर - यह अचानक एक हफ्ता... कहीं जाना है क्या...
विक्रम - हाँ कल राजा साहब ने फोन पर बताया कि हमारा ESS अभी तक अपने स्टेट में अनबीटेबल है... उसे अब आउट ऑफ स्टेट ले जाने का मौका आया है...
वीर - हाँ तो.. कौन सा स्टेट...
विक्रम - झारखंड... और बंगाल राँची में एक मीटिंग है... उसके बाद कलकत्ता... सेक्यूरिटी सर्विस में.. हमारा स्कोप कहाँ तक हो सकता है... वगैरह वगैरह...
वीर - पर तुम क्यूँ...
विक्रम - क्या बचकाना सवाल है... अगर महांती होता... तो मैं कहाँ जाता... अब चूँकि सब कुछ मैं देख रहा हूँ... इसलिए मुझे जाना होगा... हमें कॉन्ट्रैक्ट मिल जाएगा... क्यूंकि पार्टी राजा साहब के पहचान वाले हैं...

वीर चेहरे पर टेंशन लिए अपनी जगह से उठ खड़ा हो जाता है और कुछ सोच में पड़ जाता है l विक्रम उसकी हालत देख कर हैरान होता है l

विक्रम - तुम इतने टेंश क्यूँ हो गए....
वीर - मैंने अनु से दस दिन की मोहलत मांगी थी... उसमें से सात दिन तो जाया हो जाएंगे... और बाकी तीन दिन में क्या हो जाएगा...
विक्रम - इतनी जल्दी क्या है वीर... क्यूँ... तुम जल्दबाज़ी ऐसे दिखा रहे हो... जैसे.. अनु और तुम्हारे बीच रिश्ता हद से आगे बढ़ गया हो... (थोड़ा रुक कर) क्या तुम...
वीर - (एक बेज़ान सी मुस्कराहट के साथ) देखा भैया... मेरे अंदर तुम वही पुराने वीर को ढूँढ रहे हो... (फिर थोड़ी सीरियस हो कर) जब अपने ही मेरे बारे में ऐसी राय रखते हों... तो गैरों से क्या गिला रखना...

कह कर वीर वहाँ से निकल जाता है l वीर की कही बातेँ विक्रम के जेहन पर हथोड़े की तरह बरसने लगते हैं l वह वीर को आवाज देने की हिम्मत तक नहीं कर पाता l वह भी बुझे मन से बाहर की ओर चला जाता है l यह सब किचन से दोनों भाभी और देवरानी सुन रहे थे, उनका भी चेहरा बुझ जाता है l

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उदय टहलता हुआ रोणा के क्वार्टर के सामने पहुँचता है l उसे बाहर रोणा की पर्सनल जीप दिखता है तो वह बहुत खुश हो जाता है l वह भागते हुए जीप के पास पहुँचता है और अपने बालों को ठीक कर क्वार्टर के बाहर पहुँचता है और बंद दरवाज़े को हल्के से धक्का देता है l दरवाजा खुल जाता है l उदय धीरे धीरे अंदर जाने लगता है l देखता है बाथ रुम में रोणा के चेहरा सेविंग फ़ोम से पुता हुआ है और वह अपना दाढ़ी बना रहा है l आईने में रोणा उदय को देख लेता है l

रोणा - तु अंदर कैसे आया बे...
उदय - वह साहब दरवाजा खुला था...
रोणा - हाँ हाँ मालुम है... पुछ रहा हूँ सीधे अंदर कैसे आ गया...
उदय - साब जी... आपने ही तो कहा था... मुझे अंदर आने के लिए... कभी दरवाजा खटखटाना ना पड़े...

इतना सुनते ही वह अपना रेजर रख देता है और उदय के पास चलते हुए आता है l इससे पहले उदय कुछ समझ पाता तब तक उदय के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ चुका था l तमाचा मारने के बाद रोणा वापस जाकर अपना दाढ़ी बनाने लगता है l उदय थप्पड़ खा कर सोचने लगा उससे क्या गलती हो गई l यही सोचते सोचते वह बाहर की ओर जाने लगता है l

रोणा - अब कहाँ जा रहा है...
उदय - वह बाहर जाकर दरवाजा खटखटाने...
रोणा - अबे भोषड़ी... जब आ गया है... जो रोने आया था... वह रो कर जा यहाँ से...

उदय अपना सिर खुजाने लगता है, तब तक रोणा अपना दाढ़ी बना कर चेहरा टावल से पोंछ रहा था l जब चेहरा पोंछ कर उदय के सामने आता है, तो उदय उसे देख कर चौंक जाता है l क्यूंकि रोणा ने अपना मूँछें निकाल लिया था l उदय उसे हैरानी भरे नजर से देख रहा होता है l


रोणा - ऐसे मुहँ फाड़े क्या देख रहा है...
उदय - आज आप बहुत बदले बदले लग रहे हैं... चेहरे से भी... और... (अपने गाल पर हाथ फेरने लगता है)
रोणा - पहली बात... तुझे मैंने एक काम भी दिया था... क्या याद है तुझे...
उदय - जी है ना... मैं रोज विश्वा पर नजर गड़ाए हुए था... इतने दिनों तक वह घर के बरामदे से बाहर नहीं आ रहा था... सिर्फ काम ही काम कर रहा था... आज सुबह ही वह काम ख़तम कर बाहर दिखा...

इतना सुनते ही रोणा का चेहरा सख्त हो जाता है और उसका हाथ उठ कर चल जाता है पर ठीक उदय के गाल तक आ कर रुक जाता है और अपनी जबड़े भींचते हुए उदय के गाल को थपथपाने लगता है, फिर अचानक अपनी मुट्ठी में उदय के गाल को भींच लेता है l उदय दर्द के मारे चीखने लगता है l

रोणा - श्श्श.. श्श्श.. चिल्ला क्यूँ रहा है...
उदय - आ ह... आह...
रोणा - तेरा गाल ही तो खिंच रहा हूँ... कौनसा तेरा गांड मार रहा हूँ... हाँय...
उदय - मुझे माफ कर दीजिये... साब...
रोणा - क्यूँ... क्या ग़लती किया तुने... हाँ... बोल बोल...
उदय - नहीं जानता... आह...
रोणा - तो सुन भोषड़ी के सुन... विश्वा... गायब था... तब से... जब से मैं यहाँ नहीं था... और आज सुबह ही तेरी अम्मा चोद कर आया है... मादरचोद... इसपर तु कांस्टेबल बनेगा... ह्म्म्म्म... कांस्टेबल...
उदय - आह... आ आ ह... माँ कसम साब जी... मैंने उसे दुर से ही देखा था... कैसे पता करता के वह विश्वा नहीं है... आप ही ने तो दूरी बना कर नजर रखने के लिए कहा था...

रोणा उसके गाल को छोड़ देता है l उदय अपने गाल को सहलाने लगता है l दर्द इतना था कि उसके आँखे नम हो गईं थीं l इतने में उसके दरवाजे पर दस्तक होता है l

रोणा - कौन है...
भीमा - (अंदर आते हुए) भीमा...
रोणा - ओ... कहो भीमा... सुबह सुबह... कैसे...
भीमा - (उदय पर नजर डालते हुए) दरोगा बाबु पिछले दो दिनों से राजा साहब आपको याद कर रहे हैं... इसलिए मैं यहाँ दो बार आकर लौट चुका हूँ... पर यह क्या... आपने अपनी मूंछें क्यूँ मुंडवा ली...
रोणा - (जबड़े भींच कर) वह क्या है कि भीमा... जब से सस्पेंड हो कर राजगड़ से बाहर आया... तबसे कोई मर्द वाला काम किया नहीं ना... ऊपर से जब से आया हूँ... रंग महल भी सुना और विरान है... इसलिए... अब तो मूंछें तब रखूँगा... जब कोई मर्द वाला काम कर लूँ...
भीमा - ओ... लगता है समस्या विकट है...
रोणा - वह मेरी समस्या है... तुम बोलो.. अभी क्या करना है...
भीमा - पता नहीं क्यूँ... दो दिन पहले.. सरपंच से मिलने के बाद.. राजा साहब आपको खोज रहे हैं... उपर से मैंने कई बार फोन लगाया आपको... पर आपने उठाया ही नहीं...
रोणा - हाँ... वह काम में... बहुत व्यस्त था... इतना की अपना ही होश नहीं था... चलो चलें... देखें राजा साहब को मेरी क्या जरूरत आ पड़ रहा है...

तीनों बाहर आते हैं भीमा और रोणा भीमा के लाए गाड़ी में बैठ कर चले जाते हैं l पीछे उदय वैसे ही अपने गाल सहलाते रह जाता है और मन ही मन बड़बड़ाने लगता है l

" साला कुत्ता कहीं का... लगता है विश्वा ने ही इसकी जमकर ली है... तभी साला दर्द छुपाने के लिए मूँछ कटवा कर फिर रहा है... कुत्ता कहीं का... जब तेरे जैसे ढीठ को विश्वा चकमा दे सकता है... भुर्ता बना सकता है... मैं विश्वा के आगे क्या हूँ बे.. अंडे से निकला हुआ चूजा... रुक साले रुक... एक दिन मैंने तेरी ना ली... तो मैं भी उदय नहीं... "

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दरवाज़ा खोलते ही सामने वीर को देख कर दादी चौंक जाती है l

दादी - अरे दामाद जी आप... इस वक़्त... अनु तो अभी ऑफिस के लिए निकलने वाली थी...
वीर - क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...
दादी - ओ हो... मैं भी क्या बेवकूफ़ी कर रही हूँ... दामाद जी द्वार पर खड़े हैं... मैं द्वार पर ही खड़ा कर बात कर रही हूँ... आइए... अंदर आइए...

दादी दरवाजे से हटती है l वीर अंदर आकर एक चेयर पर बैठ जाता है l अनु भागते हुए हाथ में एक कॉफी की ग्लास लेकर वीर को देती है l पहले वीर हैरान हो कर अनु की ओर देखता है फिर मुस्कराते हुए कॉफी अनु के हाथ से लेकर चुस्की भरता है l

दादी - बड़ी खयाल रहती है तुझे राजकुमार की... कोई दुसरा आए तो ध्यान कभी नहीं देती...

अनु शर्मा कर वहाँ से अंदर की ओर भाग जाती है l वीर के होंठो पर मुस्कुराहट और भी गहरा जाता है l

दादी - दामाद जी... क्या आपका यहाँ आना पहले से तय था...
वीर - नहीं तो... क्यूँ क्या हुआ...
दादी - सच कह रही हूँ दामाद जी... रानी साहिबा आईं थीं... इस कमबख्त की हाथ माँगने... तब इसे मेहमान नवाजी समझाना पड़ा... पर आपकी बात और है... देखिए ना... आप को आए कितनी देर हुए... आपके लिए कॉफी तैयार कर दी उसने...
वीर - दादी... मेरा यहाँ आने का वज़ह भी यही है...
दादी - क्या मतलब...
वीर - मुझे अनु की आदत.. या यूँ कहूँ के... मुझे अनु की लत लग चुकी है... मेरा खयाल करने वाली... खयाल रखने वाली... अब सिर्फ ऑफिस में नहीं... बल्कि मुझे मेरे घर के आँगन में चाहिये...
दादी - ओ... (खुश हो कर) मतलब आप शादी की बात करने आए हैं...
वीर - हाँ... शादी की बात करने आया हूँ... आज सुबह ही अपने बड़े भैया... भाभी और छोटी बहन को बताया... माँ तो कब से तैयार बैठी है... इससे पहले कि मैं अपने घर के बुजुर्ग और मुख्य को अपना अभिप्राय बताऊँ... मैं आपसे शादी की इजाजत लेने आया हूँ...
दादी - दामाद जी... जब मैंने रानी साहिबा को पहले से ही बता चुकी हूँ... अनु आपकी है... जब आपको ठीक लगे... तब आप उसे मर्यादा के साथ डॉली में ले जाएं...
वीर - (अपनी जगह से उठ कर दादी की हाथ पकड़ लेता है) थैंक्यू दादी थैंक्यू... मतलब.. आपको कोई एतराज नहीं है ना...
दादी - मुझे क्यूँ कोई एतराज होने लगी... पर आपकी उतावलापन देख कर लगता है... जैसे शादी आपको कल ही करनी है..
वीर - कास के ऐसा हो पाता... वह क्या है कि... मेरे बड़े भाई यानी युवराज जी... मेरे पिताजी... यानी... छोटे राजा जी और हमारे क्षेत्रपाल परिवार के मुखिया... मिलकर किसी काम से बाहर हफ्ते दस दिन के लिए जा रहे हैं... जब वे लौटेंगे.. तब मैं उन लोगों से शादी की इजाजत ले लूँगा...
दादी - तो ठीक है...
वीर - पर...
दादी - पर क्या दामाद जी...
वीर - दादी.. मैं चाहता हूँ... अनु यह दस दिन घर पर रहे... मेरा मतलब है... वह ड्यूटी पर ना आकर... घर पर आराम करे...(अपनी जेब से एक क्रेडिट कार्ड निकाल कर दादी को देते हुए) और शादी की तैयारी वह अपनी तरफ से करे...
अनु - (कमरे से बाहर आकर दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है) नहीं... ऐसा नहीं हो सकता...
दादी - ठीक ही कह रहे हैं दामाद जी... शादी के पहले मिलने जुलने का रिवाज नहीं होता...
अनु - वह मैं कुछ नहीं जानती... मुझसे रानी माँ ने वादा लिया था... चाहे कुछ भी हो जाए... शादी से पहले... कभी ऑफिस जाना बंद ना करूँ... वैसे भी कौनसा शादी का दिन तय हो गया है....
दादी - दामाद जी मैं रसोई में जाकर थोड़ा देखती हूँ... आप अपनी अनु को समझाने की कोशिश कीजिए... (कह कर दादी वहाँ से चली जाती है)
वीर - अनु... तुम समझ क्यूँ नहीं रही हो...
अनु - प्लीज... कुछ दिनों से हालात जैसे हो रहे हैं... मैं घर पर रहूँगी तो हमेशा चिंता में रहूँगी... आप सामने रहोगे... तो मुझे चिंता नहीं रहेगी... प्लीज...
वीर - देखो अनु... भैया के बाहर जाने से... पूरा काम का बोझ मुझ पर पड़ेगा... आने जाने से लेकर खाने पीने तक का कोई ठिकाना ना रहेगा...
अनु - (धीरे से) झूठे
वीर - सुनाई नहीं दिया... पर समझ गया... तुम मुझे झूठा कह रही हो... किसलिए
अनु - इसीलिए की आप झूठ कह रहे हैं...
वीर - नहीं अनु... सिर्फ ऑफिस ही नहीं... पार्टी का काम देखने इधर उधर जाना पड़ सकता है...
अनु - तभी तो... मैं... आपके साथ रहना चाहती हूँ.. कम से कम ऑफिस के वक़्त...

अनु के इसतरह से अनुरोध करने पर वीर अपना हथियार डालते हुए अनु से कहता है

वीर - ठीक है... अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो.... पर मेरी भी एक शर्त है...
अनु - जी कहिए...
वीर - तुम्हें रोज मेरी गाड़ी से ऑफिस आना जाना करोगी... वह भी सिर्फ ऑफिस के वक़्त...
अनु - (खुशी के साथ शर्माते हुए) मतलब आप रोज मुझे ले जाने एयर छोड़ने आयेंगे..
वीर - नहीं...
अनु - (थोड़ी मायूस हो कर) तो..
वीर - सिर्फ आज ही... मैं तुम्हें ले जाऊँगा... पर कल से... मैं ड्राइवर का इंतजाम कर दूँगा... मेरी अपनी गाड़ी से वह तुम्हें रोज घर से ले जाएगा... ऑफिस आवर ख़तम होते ही वह छोड़ देगा... मैं इसी शर्त पर ही तुम्हें ऑफिस में आलाउ कर सकता हूँ...
अनु - (मायूसी के साथ, मुहँ फूला कर) ठीक... है...


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एक रोती हुई स्कुल जाती किशोरी लड़की की हाथ पकड़ कर वैदेही लक्ष्मी के घर पहुँचती है l घर में लक्ष्मी और हरिया के बीच किसी बात को लेकर कहा सुनी हो रही थी l जैसे ही वैदेही वहाँ पहुँची दोनों के दोनों चुप हो गए l

वैदेही - क्या बात है लक्ष्मी.. किस बात को लेकर तुम दोनों झगड़ रहे थे...

लक्ष्मी और हरिया दोनों एक दूसरे को देखते हैं फिर लक्ष्मी अपना सिर झुका लेती है l पर हरिया गुस्से भरे नज़र से वैदेही के साथ आई उस लड़की की ओर देखने लगता है l वह लड़की हरिया की नजर से बचने के लिए वैदेही के पीछे छुपने लगती है l


वैदेही - ऐ हरिया.. खबर दार जो मुन्नी पर गुस्सा किया या इसके साथ मार पीट की... मुझसे बुरा कोई ना होगा...
हरिया - तु क्यूँ हमेशा गाँव के हर घर के फटे में घुसने की ताक में रहती है...
वैदेही - तुम दारूबाज लंपटों से मैं बात तक करना पसंद नहीं करती.. पर इस गाँव के आँगन में पल रहे.. जी रहे हर इज़्ज़त को अपनी इज़्ज़त समझती हूँ... जब जब उन पर कोई आंच भी आई तो मैं उनके लिए उतरुंगी... आती रहूंगी...
हरिया - तेरी इज़्ज़त है ही क्या... जो मेरे घर की इज़्ज़त के लिए... आती रहेगी...
वैदेही - मेरी इज़्ज़त पर उंगली तब उठाना... जब तु खुद को मर्द कहलाने के लायक समझेगा.. तेरी मर्दानगी रोज शनिया और उसके कुत्तों के आगे... शराब की भट्टी में... एड़ी पर रेंगती रहती है... इसलिए तो... वह और उसके चट्टे बट्टे मौका ढूंढते रहते हैं... तेरे घर की इज़्ज़त और अमानत को तार तार करने के लिए...
हरिया - हूंह्ह्... तुझसे बात कर रहा हूँ देखो... मेरी ही गलती है...

इतना कह कर हरिया वहाँ से चला जाता है l उसके जाने के बाद लक्ष्मी सुबकते हुए बैठ जाती है l

वैदेही - लक्ष्मी... हरिया मुझसे कहेगा कुछ नहीं... पर तु बता... क्या हुआ है... और मुन्नी को तुने क्यूँ गाली दी... मारा भी...
लक्ष्मी - क्या कहूँ दीदी... आज सुबह शनिया सरपंच को लेकर आया था.. इन्होंने पता नहीं कितना कर्ज लिया है शनिया से... अब सब मिला कर पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - (चौंकते हुए) क्या पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - हाँ दीदी... हमने ठीक से कभी हजार रुपये भी नहीं देखें... पाँच लाख रुपये...
वैदेही - ऐसे कैसे पाँच लाख रुपये... शनिया ने कह दिया... और हरिया ने मान लिया...
लक्ष्मी - माने तो नहीं... मान ही नहीं पाए... पर..
वैदेही - पर क्या...
लक्ष्मी - पर हरिया के पास लिखा पढ़ी के कागजात थे... इन्होंने जितना दारु पीया था... सब सूद के साथ मिला कर... अब पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - क्या... दारू पी पी कर पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - सिर्फ इन्हीं के नहीं है दीदी... बल्लु.. सुकांत... नरेश... सब के सब... किसी के पाँच... किसी के सात...
वैदेही - यह लोग तो पैसे दे देते थे ना...
लक्ष्मी - हाँ फिर भी... कई सालों से पी पी कर इतना हो गया है....
वैदेही - ठीक है... बात मेरी समझ में आ गई... पर इसमें मुन्नी को क्यूँ कोस रही थी... हाथ भी उठाया तुमने आज इस पर... बड़ी हो रही है वह...
लक्ष्मी - मारु नहीं तो क्या करूँ... कर्मजली लड़की हो कर पैदा जो हुई है...
वैदेही - तो... लड़की हो कर पैदा हुई... तो इससे क्या पाप हो गया... अब तो राजा नहीं उठा जा रहा है...
लक्ष्मी - पर उसके पालतू भेड़िये तो ताक में हैं... जो मौका ढूंढ रहे हैं...
वैदेही - एक मिनट... कहीं इस पाँच लाख के बदले...
लक्ष्मी - हाँ दीदी हाँ... कर्ज को जल्दी चुकता करने के लिए... लड़की को घर बुला रहे हैं... और इस पर सरपंच भी उनका साथ दे रहा है...

वैदेही अपने दोनों हाथों से कान को ढकते हुए अपनी आँखे मिंज कर पास पड़े एक टुटे फूटे कुर्सी पर बैठ जाती है l थोड़ी देर बाद

वैदेही - सरपंच ऐसे कैसे उनका साथ दे सकता है... उन हरामीयों की बात को मनवाने के लिए... उनके साथ घर घर जा रहा है...
लक्ष्मी - वही तो... दीदी... यह सब जो कर्ज के जाल में उलझे हुए हैं... दो दिन बाद इस विषय में... पंचायत में निर्णय होने वाला है... सारे गाँव वालों के बीच...
वैदेही - ओ... अब समझी... गाँव वालों के सामने... इन कर्जदारों पर निर्णय नहीं होने वाला है... बल्कि हर घर की इज़्ज़त में सेंध लगाने की जुगत लगा रहे हैं...

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कुछ लोग तहसील ऑफिस से बाहर निकल कर रोड के उस पार मिलन टी स्टॉल पर जाते हैं l पर वहाँ पहुँचते ही देखते हैं मिलन अपना दुकान बंद कर रहा था l यह देख कर एक आदमी पूछता है

आदमी - क्या बात है मिलन... धंधे के टाइम पर दुकान क्यूँ बंद कर रहा है...
मिलन - आज थोड़ी गड़बड़ हो गई है...
दुसरा आदमी - गड़बड़... कैसी गड़बड़...
मिलन - सुबह सामान ठीक से चेक किया नहीं... इसलिए जितनी जरूरत थी... उससे कम सामान लाया था... और इत्तेफ़ाक से सुबह से ही भीड़ बहुत थी... जितना लाया था सब ख़तम हो गया...
आदमी - तो यहीँ कहीँ आसपास से मंगवा ले ना...
मिलन - सर जी... यहाँ सब दुध वाला चाय पीते हैं... और अभी दुध का पैकेट मिलने से रहा... पाउडर वाला चाय एक बार कोशिश की थी... बहुत गाली पड़े थे... उम्मीद है... आप समझ रहे हैं...
सारे लोग - ठीक है... आज तो तुझे माफ़ कर रहे हैं... पर कल से... शाम होने से पहले दुकान बंद किया तो... यहाँ से दुकान उखाड़ देंगे समझा...
मिलन - जी माई बाप...

वह लोग वापस जाने के बजाय वहीँ पड़े बेंच पर बैठ कर बातेँ करने लगते हैं l मिलन कुछ ही मिनट में अपना सारा सामान पैक कर चुका था l तभी एक ऑटो वहाँ पर आती है l मिलन उसे आवाज देता है l ऑटो रुक जाती है l उस ऑटो में पहले से ही दो सवार थे l मिलन अपना सामान पीछे लोड कर अंदर बैठ जाता है l ऑटो आगे बढ़ जाता है l थोड़ी देर बाद ऑटो यशपुर से निकल जाता है l यशपुर के बाहर एक सुनसान जगह पर ऑटो खराब हो जाता है l ऑटो ड्राइवर उतर जाता है और चारो तरफ नजर घुमाता है, वह ऑटो ड्राइवर और कोई नहीं था, वह शैलेंद्र उर्फ सीलु था l ऑटो में दो और लोग विश्व और जिलु थे l

सीलु - (विश्व से) भाई तुम ऑटो के अंदर ही बैठे रहो... (जिलु और मिलु से) तुम दोनों उतरो बे... ऑटो ठीक करने का सीन बनाना है...

जिलु और मिलु उतर कर ऑटो को एक तरफ उठा कर उसके नीचे एक डंडा लगा देते हैं l सीलु फटाफट स्टेफिनी निकाल कर टायर निकालने का ऐक्टिंग करने लगता है l

सीलु - भाई... इससे पहले के तुम कुछ पूछो.. मैं कुछ पूछूं...
विश्व - हाँ... पूछ लो...
सीलु - तुम्हारा बार काउंसिल वाला लाइसेंस कब आएगा...
विश्व - शायद दो या तीन दिन बाद... या फिर ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता...
जिलु - और जो तुमने आरटीआई में इंफॉर्मेशन माँगा था... उसका क्या हुआ...
विश्व - वह भी एक दो दिन में आ जायेगा.... क्यूँ तुम लोग इतने बेकरार क्यूँ हो...
सीलु - बुरा ना मानना भाई... पर मुझे नहीं लगता... पीआईएल दाखिल करने से... तुम्हें कोई फायदा होगा...
विश्व - ह्म्म्म्म... मतलब तुम लोगों ने बहुत कुछ छानबीन कर लिया है...
मिलु - हाँ लगभग...
विश्व - ह्म्म्म्म ठीक है... अब तुम लोग... मुझे बात को पुरी तरह से समझाओ...
सीलु - भाई... तुमने आरटीआई जैसे ही फाइल किया... इन्हीं पैंतीस चालीस दिनों में... जो भी कुछ हुआ है.. तुम्हारे उस रुप फाउंडेशन केस में कुछ भी मदत नहीं मिलने वाला है...
मिलु - पहली बात... तुम्हारे साथ जो भी... एक्वुस्ड थे... वह सारे के सारे मार दिए गए... ज्यादातर गवाह भी गायब कर दिए गए....
जिलु - और जिन लोगों को तुम गवाह बना सकते थे... मतलब... बैंक के तीन स्टाफ... रेवेन्यू ऑफिस के दो स्टाफ और तहसील ऑफिस के तीन पदाधिकारी... अपनी अपनी मेडिकल सर्टिफ़िकेट निकलवा कर... OSD... बन बैठे हैं...
मिलु - यह OSD मतलब...
विश्व - ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्युटी... वह कर्मचारी... जिन्हें नौकरी से निकालने के बजाय... उन्हें बिना किसी काम धाम के... मानवता के आधार पर नौकरी पर बनाए रखा जाता है....
जिलु - हाँ...
विश्व - और जाहिर सी बात है कि... वे सब... सिजोफेर्नीया की सर्टिफिकेट लाए होंगे...
सीलु - हाँ... बिल्कुल...
विश्व - मतलब... अब वह सारे लोग गवाह के तौर पर नाकारे हो चुके हैं...

तीनों अपना सिर हाँ में हिला कर चुप हो जाते हैं l विश्व अपनी आँखे बंद कर कुछ सोचते हुए हँसने लगता है l

सील - भाई... दुखी मत हो...
विश्व - मैं दुखी कहाँ हूँ... मैं तो हँस रहा हूँ...
मिलु - पर क्यों... क्या अब भी... तुम हाइकोर्ट में पीआईएल दाखिल करोगे...
विश्व - हाँ...
तीनों - (हैरान हो कर) क्या...
जिलु - पर उससे फायदा क्या होगा...
विश्व - देखो... मैंने जब आरटीआई दाख़िल किया था... मुझे तभी से ही अंदेशा था... ऐसा ही कुछ होगा... इस केस के ताल्लुक़ और तीन प्रमुख गवाह हैं... सी आई... अनिकेत रोणा... श्रीधर परीडा... और राजा भैरव सिंह...
सीलु - पर भाई तुम्हीं कहा करते थे... रोणा का इसमे उतना रोल नहीं है... जितना एसआईटी का चीफ श्रीधर परीडा का है...
विश्व - हाँ पर उन तीनों को गवाही के लिए कोर्ट लाना टेढ़ी खीर है...
मीलु - क्यूँ...
विश्व - केस फिर से खुलेगा... इस बीच सात साल गुजर चुके हैं... बहुत कुछ बदल चुका है... या बदल दिया गया है... इसलिए पहले मुझे पीआईएल फाइल तो करने दो... देखते हैं... क्या होता है...
जिलु - भाई... तुम बात को बहुत ही कैजुअल ले रहे हो...
विश्व - नहीं... गेम तो अभी शुरु होगा... जैसे ही मैंने आरटीआई फाइल की... उन्होंने गलतियाँ करनी शुरु कर दी... जब कि सच कहूँ तो मैं भी जानता हूँ... यह सात साल के पुराने केस में संभावना बहुत कम है...
तीनों - तो...
विश्व - देखो... करप्शन एक चस्का है... जो भी उसकी मलाई एक बार खाये... जब तक कोई खतरा ना हो... वह करता ही जाता है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... उन्होंने करप्शन करना छोड़ा नहीं होगा... बल्कि नए तरीके से... मजे से कर रहे होंगे...
जिलु - तो उस पुराने केस का क्या होगा...
विश्व - पीआईएल तो फाइल होगा... वह लोग अपने ना पकड़े जाने पर और अब तक किए करतूत पर निश्चिंत होंगे... पर फिर भी उनका ध्यान पुराने केस पर जमायेंगे... पर हम असल में उनके नए करप्शन को खोज निकाल कर उसे पुराने केस में जोड़ेंगे... तब जाकर कुछ ना कुछ रिजल्ट हम को मिलेगा...
सीलु - हाँ भाई... तुम्हारे इस बात पर... मैं सौ फीसद सहमत हूँ... अभी इन पाँच छह महीनों में... सारे प्रमुख सरकारी कार्यालय में... पदाधिकारी बदले हैं... सब नए हैं... तो तुम्हारे कहे हिसाब से... करप्शन हो रहा है... हम जान भी रहे हैं... पर शायद नए तरीके से...
विश्व - ठीक है... तो अब बताओ... इन छह महीनों में क्या क्या हुआ है...
सीलु - भाई... इन छह महीनों में... यशपुर को स्मार्ट सिटी... और राजगड़ को स्मार्ट विलेज बनाने की अप्रूवल मिल गया है... पाँच साल पहले... राजगड़ से बाहर... निरोग हस्पताल बनाया जा रहा था... बहुत ही बड़ा हस्पताल... पर यश वर्धन की मौत के बाद... वह हस्पताल की बिल्डिंग विरान पड़ी थी... छह महीने पहले... उसे... राजगड़ मल्टी पर्पस कोऑपरेटिव ऑफिस में कन्वर्ट किया गया है...
मिलु - इन्हीं पाँच छह महीनों में... यशपुर और राजगड़ विकास के लिए... बहुत से प्रोजेक्ट अप्रूव्ड हुए हैं... वह भी... मनरेगा के तहत... पर...
विश्व - पर...
मिलु - इस बार... कोई मुर्दा नहीं है... पता नहीं पैसे कैसे गायब हो रहे हैं...
विश्व - ह्म्म्म्म... लगता है... इस बाबत हमें कोई लिंक मिलने वाला है...
तीनों - कैसे... कौन देगा...
विश्व - वही... जो मुझसे... पेपर से... कॉन्टेक्ट करना चाहता है... मुझे लगता है... इसी करप्शन पर वह कोई रौशनी डाल सकता है...
जिलु - पर टीलु कह रहा था... वह कुछ दिनों से कॉन्टेक्ट नहीं कर रहा है...
विश्व - हाँ... कर तो नहीं रहा है... अच्छा मैं यहाँ से उतर कर पैदल ही चला जाता हूँ... तुम लोग आधे घंटे बाद... अपने अपने ठिकाने पर पहुँच जाओ...
जिलु - रुको ना भाई... छोड़ देते हैं तुम्हें...
विश्व - नहीं... मैं नहीं चाहता कोई भी हमें... इकट्ठा देखे...


इतना कह कर विश्व ऑटो से उतर कर चल देता है l चलते चलते इनके कही बातों को याद करने लगता है l उसे अंदाजा था, भैरव सिंह अपनी नाक बचाने के लिए बहुत कुछ करेगा l पर जिन अधिकारियों को गवाही के लिए बुलाया जा सकता था, उन्होंने ही अपने तरफ से पागलपन का सर्टिफिकेट लेकर अपनी जान और आने वाले कानूनी पचड़े से खुद को बचा लिया l असल में भैरव सिंह के बाद सिर्फ एक ही गवाह बचता हैं l श्रीधर परीडा एसआईटी का चीफ जिसे शायद तोड़ा जा सकता है l पर कहीं भैरव सिंह इससे पहले श्रीधर परीडा को कुछ ना कर दे l और इन छह महीनों में जो भी कुछ हुआ है पुराने कडियों को जोड़ने के लिए बहुत अहम है l पर जोड़े तो जोड़े कैसे l भैरव सिंह अपने पुराने गलतियों से सबक लेकर अब जो भी कर रहा होगा फुल प्रूफ ही होगा l
ऐसे सोच सोच कर विश्व उसी पेपर वाले के दुकान पर आ पहुँचता है जहां से वह रोज उसके लिए टीलु पेपर लेकर जाता है l उसके कदम अपने आप दुकान के अंदर पहुँच जाते हैं l

दुकानदार - बोलिए साहब.. क्या चाहिए...
विश्व - (समझ नहीं पाता क्या कहे)
दुकानदार - सर यहाँ हर तरह के अखबार... किताबें मिलती हैं... बोलिए आपको कौनसा चाहिए...
विश्व - मैं... वह... असल में... मैं थोड़ा कंफ्यूज हूँ...
दुकानदार - जब मन भटके... कोई राह ना दिखे तो... यह किताब पढ़ना चाहिए... (दुकानदार एक किताब निकाल कर दिखाता है जिसके कवर पर लिखा था "शुभ संदेश")
विश्व - नहीं... मैं...
दुकानदार - अरे सहाब ले लीजिए... यह आपके लिए ही है... घर जाकर पढ़ लीजिए... अगर आपको पसंद ना आए.. तो कल लाकर लौटा दीजिएगा...
विश्व - नहीं... मैं ऐसे कैसे...
दुकानदार - अरे सहाब... मैंने कहा ना... यह किताब आपके लिए ही है... मेरी मानिये... जरा एकबार घर जाकर पढ़ लीजिए... पैसा तभी दीजिएगा जब अंदर का विषय पसंद आए... अगर पसंद ना आए... तो लाकर वापस लौटा दीजिए...

विश्व हिचकिचाते हुए किताब लेता है l तभी उसका फोन बजने लगता है l फोन निकाल कर देखता है l स्क्रीन पर दीदी डिस्प्ले हो रहा था l

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रंगमहल से अपने सरकारी क्वार्टर पर रोणा लौट आता है l सिगरेट की धुआं उड़ाते हुए अपने क्वार्टर के अंदर दाखिल होता है l ड्रॉइंग रूम में सोफ़े के पास पड़े टी पोय पर क्लाथ को हटाता है l उस टी पोय के बोर्ड पर विश्व का बड़ा सा मगर एक पुरानी फोटो लगी हुई थी l उस फोटो को देखते ही उसकी आँखों के नीचे की पेशियों में थर्राहट होने लगती हैं l वह आज महल में हुए व्याक्या को याद करने लगता है l


आओ रोणा आओ... पहले गायब होते थे... तो पता रहता था... तुम कहाँ पर हो... पर इस बार तुम ऐसे छुपे जैसे अमावस में चाँद... क्या बात है... (यह सवाल था भैरव सिंह का रोणा से)

रोणा भीमा के साथ रंगमहल के उपरी प्रकोष्ठ में आया था l यह भैरव सिंह का खास कमरा था जहां वह लोगों को बुला कर बैठक किया करता था l भैरव सिंह एक बड़े से सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे रोणा का इस तरह से अभिवादन किया l रोणा के भीतर आते ही भैरव सिंह अपना हाथ उठा कर भीमा को इशारे से जाने को कहता है, भीमा अपना सिर झुका कर उल्टे पाँव लौट जाता है l भीमा के वहाँ से जाते ही

रोणा - ऐसा कुछ नहीं है राजा साहब... मैं भुवनेश्वर आपको बता कर ही गया था...
भैरव सिंह - हाँ... गए तो थे... (अचानक हैरान हो जाता है) एक मिनट... हम यह क्या देख रहे हैं... (लहजा सपाट व निरस हो जाता है) जो क्षेत्रपाल से जुड़े हों... वह लोग अपने मूंछें नहीं मुंडवाते... जानते हो ना...
रोणा - जी राजा साहब... पर इन दो महीनों में... मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ है... जो मुझे मूंछें रखने लायक छोड़ा नहीं है...
भैरव सिंह - (अपनी भवें सिकुड़ कर रोणा की ओर देखता है) ह्म्म्म्म... चोट बहुत गहरी लगी है... दिल पर भी और दिमाग पर भी... देने वाला कौन है...
रोणा - (जबड़े सख्त हो जाते हैं, आँखों में खुन उतर आती है) व... वि... विश्वा..
भैरव सिंह - विश्वा... क्या किया उसने इसबार तुम्हारे साथ....
रोणा - (अपनी दांतों को पिसते हुए) पहली बार... उसने साबित कर दिया... मैं कितना लाचार हूँ... मैं कितना मजबूर हूँ... उसने मुझे एहसास दिलाया... के मैं एक बेचारा हूँ...
भैरव सिंह - पर तुम इसबार एक लड़की के पीछे गए थे ना.... क्या उस लड़की का... कोई संबंध है विश्वा से... जैसा कि तुम अनुमान लगा रहे थे...
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए चुप रहता है, फिर अपना सिर ना में हिलाते हुए) नहीं... नहीं राजा साहब... नहीं...
भैरव सिंह - पर तुमने जो अनुमान लगाया था...
रोणा - हाँ... कुछ अनुमान सही साबित हुए और कुछ गलत... प्रधान बाबु सही कह रहे थे... विश्वा जैसे सजायाफ्ता मुजरिम से... जो जैल से छूटे कुछ ही दिन हुए हों.. उससे कैसे कोई इज़्ज़त दार घर की लड़की दिल लगा सकती है... वह मेरा वहम था... जो इस बार दूर हो गया...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... इसका मतलब उस लड़की से... अब बदला नहीं लोगे...
रोणा - जी बेशक लूँगा... (अपने गाल पर हाथ फेरते हुए) अपने अपमान का बदला कैसे ना लूँ... उसे अपने नीचे लाए वगैर.. मेरी तड़प कम नहीं होगी...
भैरव सिंह - हम्म्म बहुत अच्छे... (एक कुटील मुस्कान लेकर) तो अनिकेत रोणा तुमने उस लड़की को... इस रंग महल के लिए कभी नहीं सोचा... हूँ..
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए स्तब्ध हो जाता है, फिर लड़खड़ाती हुई आवाज में ) सो.. सोचा... था... पर... राजा साहब... वह इतनी खूबसूरत है नहीं कि... इस रंग महल की रंगत बन सके... (नजरें झुका लेता है)

भैरव सिंह का चेहरा थोड़ा सख्त हो जाता है l वह तेज नजरों से रोणा को घूर रहा था l रोणा उसके नजरों का सामना नहीं कर पा रहा था l

रोणा - राजा साहब.. मैं आपका नमक हलाल हूँ... आप हुकुम करेंगे तो... मैं उसे इस रंग महल की रंगत बनाने के लिए... जरूर कुछ करूँगा...
भैरव सिंह - अच्छा... बड़ी जल्दी तैयार हो गए...
रोणा - वह... बात दरअसल यह है कि... उस लड़की से... मैं अपनी निजी खुन्नस निकालना चाहता था...
भैरव सिंह - (हँसने लगता है) हा हा हा हा हा... हम तो तुम्हें जांच रहे थे... बस तुम्हारी वफादारी देख रहे थे... तुम्हारे अंदर की जुनून को परख रहे थे... क्यूंकि तुम्हें बिना मूँछ के देख कर... हमें लगा तुम्हारी काबिलियत पर कहीं सीलन ना पड़ गया हो... जंक तो नहीं लग गया...
रोणा - तो बोलिए... क्या हुकुम है राजा साहब... अगर आप कहेंगे तो लड़की को उठवाकर इस रंग महल में आपके सेवा में पेश कर दूँगा...
भैरव सिंह - सबास... रोणा उस लड़की का विश्वा से जब कोई संबंध नहीं है... तो उस लड़की पर हमारा इरादा खत्म हो गया... क्यूंकि भैरव सिंह उन कलियों और फूलों को मसलता... रौंदता है... जिनकी कांटे भैरव सिंह को चुभते हैं... हम रंग महल में उसे अपने नीचे लाते हैं... जिसपर अपना नफरत उतारना हो... खैर यह बताओ... विश्वा ने तुम्हारे साथ ऐसा क्या किया... जो तुमने अपना मूंछें निकलवा दी...

यह सवाल रोणा को अंदर से छटपटा देता है l उसके जबड़े भींच जाते हैं आँखों के नीचे की मांस पेशियां फड़फड़ाने लगती हैं l आँखे नम हो कर तैरने लगती है l

रोणा - (दुख और पीड़ा से आवाज जैसे जम गया हो) राजा साहब... कुछ ऐसा किया है... जो मेरे मर्द होने की अहम को कुचल कर रख दिया है...
भैरव सिंह - ठीक है... हम समझ गए... कुछ ऐसा हुआ है... जो तुम बता नहीं सकते... और यह भी समझ गए... वह तुम पर इस कदर खुन्नस खाए हुआ है... के तुम्हारे पीछे पीछे भुवनेश्वर पहुँचकर... तुम्हारी बजा कर वापस आ गया है...
रोणा - (अपने हुए अपमान को याद कर आँखे बंद कर लेता है) राजा साहब... आपने मुझे बुलाया है... कोई हुकुम...
भैरव सिंह - हाँ रोणा हाँ... हम आज शाम को... भुवनेश्वर जा रहे हैं... छोटे राजा... युवराज और प्रधान के साथ हफ्ते दस दिन के लिए... कलकत्ता और राँची जा कर कुछ बिजनैस डील फाइनल करने हैं... तो यह कुछ दिन... राजगड़ पुरी तरह से तुम्हारे हवाले किए जा रहे हैं...
रोणा - (हैरानी से भैरव सिंह की ओर देखते हुए) मैं समझा नहीं
भैरव सिंह - अभी समझ जाओगे...

भैरव सिंह एक बेल बजाता है l कुछ देर बाद उस कमरे में भीमा के साथ सरपंच, शनिया, सत्तू आते हैं l

भैरव सिंह - रोणा कल से लेकर हमारे वापस आने तक... तुम मौका बनाओ... उस कमज़र्फ विश्वा से... तुम्हें कैसे बदला लेना है...
रोणा - मैं अभी भी समझा नहीं...
भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता है) कुछ दिन हुए हम कुछ अफवाह सुन रहे थे... इस बाबत हमने इस शनिया से बात की... तो उसने हमें जो बताया... हमें वह सब नागवार गुज़रा... शनिया ने कहा कि... रात के अंधेरे में... यह लोग तैयार नहीं थे... पर विश्वा अपनी पुरी तैयारी में था... इसलिए वह कांड हो गया... जो कभी होना नहीं चाहिए था... पर दोबारा विश्वा के पास ऐसा मौका नहीं आना चाहिए...
रोणा - तो इसमें सरपंच की क्या भूमिका है..
सरपंच - है दरोगा बाबु है... पंचायत ऑफिस में... हमने दो साल पहले एक चिट फंड शुरु किया था...
रोणा - चिट फंड...
शनिया - जी दरोगा जी... और जो लोग हमसे कुछ भी लेते थे... उसके एवज में... हम सब उसे चिट फंड में जोड़ कर दिखा देते थे... और उसके बदले उनसे... खाली कागजात पर अँगूठा या दस्तखत रख लेते थे...
रोणा - ओ...
सरपंच - हाँ... दरोगा बाबु... आज हम घर घर जा कर सबको कल की पंचायत के लिए नोटिस थमा दिया है... सबका फैसला हम पंचायत में करेंगे... या तो पैसा.. या फिर... हमारे घर पर उनका कोई काम करने आएगा... और तब तक काम करेगा... जब तक उनका कर्ज उतर ना जाए...
रोणा - तो इसमें विश्वा कहाँ आ गया... वह गाँव वालों के.. किसी के भी फटे में घुसेगा नहीं...
शनिया - वह नहीं घुसेगा... पर उसकी दीदी... वह तो घुसेगी.. और जब उसकी दीदी घुसेगी.. तो विश्वा भी घुसेगा...
रोणा - (शनिया से) याद है.. तुझे वकील बाबु ने क्या कहा था... जहां कानूनी पचड़े होंगे... तुझे उनसे पूछ कर यह करना चाहिए था...
शनिया - पर वकील बाबु हैं नहीं... और गाँव में हमारी वह इज़्ज़त रही नहीं... इसलिए हमने सरपंच जी से मशविरा किया... और राजा साहब से इजाजत ले रहे हैं...
रोणा - तुम अब तक यह नहीं समझ पाये... जहां कानून की दाव पेच होगी... वहाँ विश्वा भी अपना कानूनी दिमाग लगाएगा... और तुम लोगों को गलत साबित करेगा... तब हम क्या कर पाएंगे... क्यूंकि ... चिट फंड अगर सरकारी ज्ञांत में और मंजूरी में ना हो तो वह गैर कानूनी होती है... और इससे लोग तुम्हारे ही खिलाफ हो जाएंगे...
शनिया - राजगड़ में राजा साहब ही तो सरकार हैं... और यहाँ लोग राजा साहब के खिलाफ तो जाएंगे नहीं...
रोणा - पर तुम लोग राजा साहब नहीं हो... राजा साहब के कारिंदे हो... गाँव में लोग राजा साहब के वज़ह से लोग तुमसे डरते हैं...
सत्तू - यह हम जानते हैं... पर लोग वहाँ हमारे खिलाफ नहीं होंगे... बल्कि विश्वा के खिलाफ हो जाएंगे...
रोणा - क्या...
शनिया - जी दरोगा बाबु... जैसे ही विश्वा इन मामलों में घुसेगा... भीड़ में से हमारे ही आदमी लोगों को भड़काने का काम करेंगे...
रोणा - ह्म्म्म्म.. तो तुम लोगों ने बहुत सोच समझकर कर यह प्लान बनाया है...
सब - हाँ दरोगा जी...
रोणा - तो इसमें मेरी भूमिका क्या होगी...
भैरव सिंह - तुम बस हवाओं के रुख को पलटने मत देना रोणा... मौका ढूंढना... जब हाथ तुम्हारे मौका आयेगा... तब अपना खुन्नस जैसे चाहे वैसे निकाल लेना... पंचायत में मामला गरम होता जाएगा... हो सकता है तु तु मैं मैं होते होते वहाँ पर दंगा हो... और जहां दंगा होगा... कुछ लोग दंगे के शिकार हो जाएंगे... तब तुम्हें कुछ ना कुछ कारवाई करनी होगी... कारवाई में कुछ भी हो सकता है... उसे कानूनी जामा पहनाने की जिम्मा हमारा होगा... धारा 144 जारी होगी... तहसील ऑफिस से ऑर्डर हम दिलवा देंगे...
रोणा - (आंखे चमकने लगते हैं) वाह राजा साहब वाह... आपने तो कुएं को प्यासे तक पहुँचा दिया... मैं सब समझ गया राजा साहब... मैं सब समझ गया... गाँव में दंगा होगा... दंगे के चपेट में कुछ लोग आयेंगे ज़रूर... और दंगा होने से लेकर दंगे के बाद की रिपोर्ट मैं ऐसा बनाऊँगा की बड़े बड़े कानून के सूरमाओं के सिर चकराने लगेंगे

रोणा अपने यादों से बाहर आता है, दांतों को पिसते हुए अपनी सिगरेट का आखिरी कस भरता है l फिर उस सिगरेट को विश्व के तस्वीर पर मसल कर बुझाने लगता है l

रोणा - (विश्वा की तस्वीर से) सोच रहा है ना... मैंने राजा को क्यूँ नहीं बताया... की उस लड़की का तेरे साथ क्या रिश्ता है... वह इसलिए मादरचोद... तुझे एक कुर्सी पर बाँध कर... तेरे ही आँखों के सामने... तेरी छमीया का ना सिर्फ बजाऊंगा... बल्कि ऐसा फाड़ुंगा... ऐसा फाड़ुंगा... कोई डॉक्टर भी सी नहीं पाएगा... तुझसे राजा का लाख खुन्नस सही... पर मेरी खुन्नस के आगे राजा का खुन्नस जीरो है... उसका खुन्नस तेरे लिए उसके जुती में है... पर मेरा खुन्नस तेरे लिए मेरी नाक से भी उपर है.... इसीलिए तेरी छमीया को रंगमहल की रंगत बनाने से बचाया... क्यूंकि... उसे ताउम्र मेरी रखैल बनाऊँगा... दो दिन बाद होने वाले पंचायत में तेरे खातिर जो दंगे होंगे... वहाँ पर तेरे साथ कुछ भी हो... पर तुझे मैं मरने नहीं दूँगा... क्यूँ की तुझे मैं वह ज़ख़्म दूँगा... जो तेरी जेहन को... आत्मा तक को मरते दम तक गलाती रहेगी....
Ekdm jabar update. Itne din ka intzar ke safal puri hone ki suruat ho gyi. Ummid hai updates ab regular timing se milenge. Thank u
 
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अंधेरा छटा नहीं था विश्व पहुँच गया था l चूंकि उसने रात को ही खबर कर दी थी इसलिए रात को ही सीलु गाँव से निकल कर यशपुर चला गया था l विश्व पहुँचने के बाद उमाकांत सर जी का घर देख कर हैरान हो गया था l उसने जितना भी बदलाव किया था सीलु ने उसके ऊपर अपना दिमाग लगा कर और भी खूबसूरत बना दिया था l विश्व इस वक़्त इतना खुश था कि अगर सीलु सामने होता तो उसे गले से लगा लेता l

टीलु - क्या देख रहे हो भाई...
विश्व - पिछले जनम में तुम सब से मेरा भाई वाला ही नाता था..
टीलु - हाँ वह तो है... जरूर एक ही माँ के पेट से होंगे...
विश्व - हाँ...
टीलु - पर कोई ना... अब हम सब एक ही दीदी के भाई है... क्यूँ है कि नहीं...
विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम सब बातों में माहिर हो...
टीलु - क्या... भाई... इसमें बात बनाने वाली बात कहाँ से आ गई...
विश्व - दीदी बमुश्किल से तुम्हें ही देखी है... उन तीनों से मिली भी नहीं है... और तुम...
टीलु - गलत... मैंने वक़्त निकाल कर सीलु को दीदी से मिलवा चुका हूँ..
विश्व - (चौंक कर) क्या...
टीलु - घबराने का नहीं... गाँव में सबकी नजरों से छुपाते हुए दीदी से मिलवाया...
विश्व - पर क्यूँ...
टीलु - क्यूंकि दीदी मिलना चाहती थी...
विश्व - ह्म्म्म्म... तब ठीक है...
टीलु - पर भाई तुमने पूछा नहीं... दीदी क्यूँ मिलना चाहती थी...
विश्व - नहीं...
टीलु - पर क्यूँ...
विश्व - दीदी सीलु से मिलना चाहती थी.. क्यूंकि कुछ दिनों के लिए ही सही... सीलु ने विशु की जगह ली थी... और वैसे भी... मेरी दीदी का दिल बहुत बड़ा है... और तुम सब उसके लिए उतना ही हो... जितना कि मैं... जब कोई भी मेरा नहीं था... तब तुम लोग मेरे साथ आए... वह भी बिना किसी लाग लपेट के...
टीलु - बस भाई बस... मुझे और सेंटी मत करो... कुछ देर बाद तुम्हारे नन्हें प्यारे प्यारे बंदर आयेंगे... उनको सम्भालो... दिलासा दो...
विश्व - ऐ... उन्हें बंदर क्यूँ कह रहे हो...
टीलु - (बिदक कर) और नहीं तो... वह सब इत्ते इत्ते से छछूंदर... मुझे चमगादड़ मामा कह रहे हैं... (टीलु जिस अंदाज से कहा विश्व जोर जोर से हँसने लगता है) हाँ हाँ हँस लो... तुम उसके मामा... और मैं उन सबका चमगादड़ मामा...
विश्व - (हँसी को दबाने की कोशिश करते हुए) अरे इसमें इतना बुरा मानने वाली बात कहाँ है...
टीलु - (मुहँ बना कर) तो इसमें खुशी से उछलने वाली बात भी कहाँ है...
विश्व - अच्छा यही बात तुमको अंग्रेज़ी में कही होती तो...
टीलु - अंग्रेजी में..
विश्व - हाँ बैट मेन अंकल... (कह कर विश्व हँसने लगता है) अब तो बुरा नहीं लगेगा ना...

विश्व के साथ साथ टीलु भी हँसने लगता है, तभी एक लड़का आ पहुँचता है l वह दोनों अपनी हँसी को रोक कर उस लड़के की ओर देखते हैं l वह लड़का खुशी के मारे अपनी आँखे बड़ी करते हुए उन्हें देख रहा होता है l विश्व को देखते ही वह लड़का पूछता है l

लड़का - अरे मामा तुम आ गए...
विश्व - मैं गया ही कब था... और तुम इतनी सुबह सुबह...
टीलु - इन बंदरों को नींद आती भी है या नहीं... यह पूछो...
लकड़ा - (अपना गाल फुला कर) हूँन्न्न्नन्...

विश्व एक बड़ा सा चॉकलेट निकाल कर लड़के के सामने लहराता है l लड़का चॉकलेट देख कर खुश हो जाता है और लेने के लिए हाथ बढ़ाता है तो विश्व चॉकलेट को अपने पीछे ले जाता है l लड़का मुहँ बनाता है l

विश्व - पहले यह बताओ... तुम्हारा नाम क्या है...
लड़का - अरुण...
विश्व - हाँ तो अरुण... इतनी सुबह सुबह...
अरुण - वह क्या है कि मामा... आज... (अपनी दो उंगली दिखा कर) लंदन से थोड़ा जल्दी बुलावा आ गया था... इसलिए...
टीलु - ऐ छछूंदर... संढास के लिए बाहर जाने को लंदन बोल रहा है...
अरुण - (टीलु को उंगली दिखा कर) ऐ चमगादड़ मामा... यह हमारा कोड वर्ड है... हम यहाँ नहर को... लंदन बोलते हैं...
टीलु - अबे तेरी तो... (विश्व उसे रोकता है)
विश्व - देखो अरुण... गलत बात... चमगादड़ नहीं...
अरुण - (मुहँ बना कर) सॉरी मामा...
विश्व - अच्छा यह बताओ... तुम इन्हें.. चमगादड़... क्यूँ कह रहे थे...
अरुण - यह हमें आप से मिलने ही नहीं दे रहे थे... जब देखो द्वार पर... लटके ही दिखे... इसलिए...
विश्व - ठीक है... पर चमगादड़ नहीं... हाँ उन्हें तुम सब... बैट मेन अंकल कह सकते हो...
अरुण - ठीक है... पर क्यों...
टीलु - (बड़े एटीट्यूड के साथ) इसलिए... क्यूंकि तुम्हारे इस बैट मेन अंकल... फोरैंन रिटर्न हैं...
अरुण - फोरैंन रिटर्न... मतलब लंदन से...
टीलु - हाँ... (फिर चिल्ला कर) नहीं... तुम्हारे वाली.. लंदन से नहीं... असली लंदन से...
अरुण - हाँ हाँ ठीक है... (विश्व से) अच्छा मामा... लाइब्रेरी बन गया...
विश्व - हाँ... बन गया...
अरुण - और हमारे लिए खिलौने भी लाए हो....
विश्व - हाँ हाँ लाया हूँ... तुम सब आज तैयार हो कर आना... और आज के बाद यहाँ जम कर उछलकूद करना... पढ़ना...
अरुण - (खुशी से उछलते हुए) अरे वाह... मैं अभी जाता हूँ अपने सारे दोस्तों से कहता हूँ...
विश्व - हाँ और यह भी... आज सब तुम सब दो पहर का खाना... अपने मामा के साथ खाओगे...
अरुण - ठीक है...

कह कर बिना पीछे मुड़े अरुण वहाँ से भाग जाता है l विश्व उसे जाते हुए देखता है l


टीलु - भाई... कोई लफड़ा तो नहीं होगा ना..
विश्व - कैसा लफड़ा...
टीलु - तुम जानते हो... यह गाँव वाले...
विश्व - टीलु... मेरे भाई... अगर यह बच्चे आकर इस श्रीनिवास लाइब्रेरी को जिंदा कर देंगे... तो समझ लो... इन मरे हुए गाँव वालों को भी जिंदा कर देंगे...
टीलु - वह कैसे...
विश्व - वह सब मैं बाद में बताऊँगा... पहले यह बताओ... उन न्यूज पेपर में... और क्या क्या मेसेज मिला है अब तक...
टीलु - अरे हाँ... एक मिनट... अभी लाया...


टीलु अंदर जाता है, कुछ न्यूज पेपर और हाथ में एक डायरी लेकर आता है l डायरी को विश्व के हाथ में देकर और न्यूज पेपर्स को विश्व के सामने रखते हुए


टीलु - यह लो... तुमने जैसा कहा था... मैंने बिल्कुल वैसा ही डीकोडिंग करते हुए... जो भी मेसेज बना.. मैंने इस डायरी में लिख दिया है... देखो...

विश्व डायरी में वह पन्ना देखता है जिसमें टीलु ने डीकोड कर वह संदेश इकट्ठा किया था l

"तुम अकेले नहीं हो, एक काफिला तैयार है, युद्ध जब अनिवार्य है, हमारा मिलना आवश्यक है"
"भ्रष्टाचार ही भ्रस्टाचार है, हर तंत्र सम्मिलित है, तुम अकेले क्या करोगे, चलो मिलकर बाजी जीते"


विश्व - सिर्फ दो संदेश... इतने दिनों में... सिर्फ दो संदेश...
टीलु - हाँ... एक दिन मैं यशपुर बहुत जल्दी चला गया था... उस दिन के बाद... और संदेशे मिले नहीं... (विश्व टीलु को घूर कर देखने लगता है) सच कहता हूँ भाई... मैं कोई जासूसी करने नहीं गया था... हाँ थोड़ी जल्दी जरूर गया था... और शायद उसी दिन से वह डर कर मेसेज देना बंद कर दिया... मुझे लगता है... यह राजा क्षेत्रपाल की कोई जाल था... पकड़े जाने के डर से... संदेशा नहीं दे रहा....

विश्व डायरी में लिखे मेसेज्स गौर से पढ़ने लगता है l फिर अपनी आँखे मूँद कर कुछ सोचने लगता है l

टीलु - क्या सोचने लगे भाई...
विश्व - मुझे लगता है... यह बंदा शायद यह जानने की कोशिश कर रहा है... मैं उसके संदेशे पढ़ रहा हूँ या नहीं...
टीलु - मतलब तुम्हें लगता है... इसके पीछे राजा साहब नहीं है...
विश्व - पता नहीं... पर मेरे अंदर की गट फिलिंग कह रही है... कोई बंदा... राजा साहब का सताया हुआ... जो मुझसे ज्यादा मुझको जानता है... मेरी मदत करना चाहता है...
टीलु - तो अब... क्या करने का प्लान है...
विश्व - सोचता हूँ...

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द हैल
डायनिंग टेबल पर चारों सदस्य बैठे हुए हैं l रुप वीर से नजरें चुरा रही थी और खुद को शुभ्रा के साथ बात चित में व्यस्त दिखा रही थी l विक्रम चुप चाप अपना नास्ता कर रहा था पर वीर खोया हुआ था l यह सब बातेँ शुभ्रा नोटिस कर लिया था l

शुभ्रा - क्या बात है वीर... किस सोच में खोए हुए हो...
वीर - (अपनी सोच से बाहर आते हुए) कुछ नहीं भाभी...
शुभ्रा - कुछ तो है... तुम थोड़े टेंशन में लग रहे हो... क्यूँ नंदिनी... तुम्हें क्या लगता है...
रुप - म.. म.. मुझे क्या लगता है... मुझे क्या लगेगा भाभी... वीर भैया ट.. ट.. ठीक ही लग रहे हैं...
शुभ्रा - हाँ हाँ ठीक है ठीक है... तुम ऐसे हकला क्यूँ रही हो..
रुप - कहाँ... कहाँ भाभी... मैं ठीक हुँ... वह मैं अपनी सब्जेक्ट याद कर रही थी... और अपने फ्यूचर के बारे में सोच रही थी...
विक्रम - कैसा सब्जेक्ट... कैसा फ्यूचर...
रुप - वह भैया... मैं सोच रही थी... के भाभी से कुछ टीप्स लूँ... गाइडेंस लूँ...
विक्रम - किस बात पर...
रुप - यही के... मैं समर वेकेशन में डॉक्टरी की एंट्रेंस की तैयारी करूँ...
विक्रम - क्या... पर क्यूँ... और दो साल बाद... वैसे भी.. तुम शादी करने वाली हो...
रुप - तो... तो क्या हुआ भैया.. मैं डॉक्टरी के बाद भी तो शादी कर सकती हूँ...
विक्रम - पागल हो गई हो... या बचपना दिखा रही हो... तुम अच्छी तरह से जानती हो... तुम यहाँ पढ़ाई के लिए आई हो... पर उसके पीछे की वज़ह और शर्तें भूलो मत... (रुप का चेहरा उतर जाता है)
शुभ्रा - ओ.. हो... मैंने कहाँ से शुरू किया था... और बात कहाँ पर आकर पहुँच गई... वीर... प्लीज तुम बताओ... क्या सोच रहे थे...
वीर - भाभी... मैं वह...
शुभ्रा - (हैरान हो कर छेड़ते हुए) वीर... तुम झिझक रहे हो...
वीर - हाँ.. वह मैं...

सब खाना खाते हुए रुक जाते हैं और सबकी नजर वीर पर रुक जाती है l वीर सब नजर घुमाने के बाद शुभ्रा को देखते हुए कहता है l

वीर - मैंने एक अहम फैसला किया है... आई मिन कर लिया है... अपने लिए... इस घर के लिए... हम सबके लिए... (रुक जाता है)
विक्रम - कैसा फैसला...
वीर - भैया... भाभी... नंदिनी... आप सब अनु को जानते हो... अनु आप सबको पसंद भी है...
विक्रम - साफ साफ कहो वीर...
वीर - मैं... मैंने अनु से जल्द से जल्द शादी करने का फैसला किया है...

यह सुन कर सब पहले शुन हो जाते हैं, उसके बाद

विक्रम - क्या...
शुभ्रा - वाव...
रुप - आह सच में..
विक्रम - होल्ड ऑन होल्ड ऑन.. यह तुमने फैसला किया है... आई मिन... जो कर लिया है... इसमें हमें कोई ऐतराज नहीं है... क्यूंकि हम जानते हैं... छोटी माँ का भी आशीर्वाद है... पर तुम भूल रहे हो... टीम बड़े... और हैं... बड़े राजा जी... राजा साहब और छोटे राजा जी... जिनकी मंजुरी बहुत जरूरी है...
वीर - नहीं भूला हूँ... मैं आप सबको अपनी बात बता देना चाहता था.... सो बता दिया...
विक्रम - ठीक है... पर अचानक ऑल ऑफ सडन... आई मिन तुम... कुछ दिन या महीने रुक भी सकते थे...
वीर - क्यूँ...
विक्रम - देखो... अभी हम सब किसी ना किसी वज़ह से डिस्टर्ब्ड हैं... ऐसे हालात में... तुम हमारे घर के बड़े... राजी भी होंगे... डाऊट है... (कुछ देर के लिए सभी चुप हो जाते हैं, फिर) वैसे भी... तुमने अचानक यह फैसला क्यों लिया...

वीर चुप रहता है l उसकी चुप्पी को शुभ्रा समझ जाती है l इतने में सबका खाना चूंकि ख़तम हो चुका था, इसलिये शुभ्रा रुप को इशारे से अपने साथ किचन की चलने के लिए कहती है l रुप और शुभ्रा दोनों किचन के अंदर चले जाते हैं l

विक्रम - तुमने बताया नहीं... क्यूँ...
वीर - भैया... मैं... खुद को... जब से सुधारने में लगा हुआ हूँ... तब से... हाँ तब से... कोई ना कोई मेरी कुंडली में उंगली कर रहा है... मेरे पिछली जिंदगी को... आज से छुड़ाने की कोशिश में हूँ... अपने अंदर की... पुराने वीर से छुटकारा पाने की कोशिश में हूँ... पर कोई है... जो मेरे अंदर के पुराने वीर को ललकारना चाहता है...
विक्रम - तो इससे तुम्हारी शादी का... क्या कनेक्शन है...
वीर - मैं... उस वीर को हमेशा हमेशा के लिए दफना देना चाहता हूँ... मैं दुनिया जहान से लड़ कर जब घर को लौट कर आऊँ... अनु का मुस्कराता हुआ चेहरा देख कर... मैं दुनिया जहान को भुला देना चाहता हूँ... ना किसी पर कोई गरज... ना किसी से कोई शिकायत... मैं दुनिया से थका हारा लौट कर आऊँ... उसके पहलु में... एक नई जिंदगी.. एक नई जीत को हासिल करूँ... बस इसलिए अनु से जल्द से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ...

इतना कह कर वीर चुप हो जाता है और विक्रम की ओर देखने लगता है l विक्रम भी उसकी बातेँ सुन मुहँ फाड़े देखे जा रहा था l

विक्रम - (उसी हैरानी के साथ) ओ... वीर... मैं हैरान हूँ... तुम दुनिया से इतनी जल्दी हारने लगे...
वीर - तभी तो जीत की चाहत में... अनु से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ... (विक्रम के हाथ को पकड़ लेता है) भैया... मैंने भले ही... तुम्हारे छोटे भाई का फर्ज ना उतार पाया... पर तुमने कभी भी इस बात पर मलाल नहीं की... पर आज एक छोटे भाई का हक माँग रहा हूँ... प्लीज... हमारे घर के बड़ो से मेरे लिए बात करोगे... प्लीज...
विक्रम - (वीर के हाथ पर अपना हाथ रख देता है) चल पागल... मैंने कभी भी... अपने मन में... तुम्हारे लिए कोई गाँठ नहीं बाँधा है... अगर बड़ों से बात करनी ही है... तो बस एक हफ्ता रुक जाओ...
वीर - (चौंक कर) एक हफ्ता...
विक्रम - हाँ.. एक हफ्ता...
वीर - यह अचानक एक हफ्ता... कहीं जाना है क्या...
विक्रम - हाँ कल राजा साहब ने फोन पर बताया कि हमारा ESS अभी तक अपने स्टेट में अनबीटेबल है... उसे अब आउट ऑफ स्टेट ले जाने का मौका आया है...
वीर - हाँ तो.. कौन सा स्टेट...
विक्रम - झारखंड... और बंगाल राँची में एक मीटिंग है... उसके बाद कलकत्ता... सेक्यूरिटी सर्विस में.. हमारा स्कोप कहाँ तक हो सकता है... वगैरह वगैरह...
वीर - पर तुम क्यूँ...
विक्रम - क्या बचकाना सवाल है... अगर महांती होता... तो मैं कहाँ जाता... अब चूँकि सब कुछ मैं देख रहा हूँ... इसलिए मुझे जाना होगा... हमें कॉन्ट्रैक्ट मिल जाएगा... क्यूंकि पार्टी राजा साहब के पहचान वाले हैं...

वीर चेहरे पर टेंशन लिए अपनी जगह से उठ खड़ा हो जाता है और कुछ सोच में पड़ जाता है l विक्रम उसकी हालत देख कर हैरान होता है l

विक्रम - तुम इतने टेंश क्यूँ हो गए....
वीर - मैंने अनु से दस दिन की मोहलत मांगी थी... उसमें से सात दिन तो जाया हो जाएंगे... और बाकी तीन दिन में क्या हो जाएगा...
विक्रम - इतनी जल्दी क्या है वीर... क्यूँ... तुम जल्दबाज़ी ऐसे दिखा रहे हो... जैसे.. अनु और तुम्हारे बीच रिश्ता हद से आगे बढ़ गया हो... (थोड़ा रुक कर) क्या तुम...
वीर - (एक बेज़ान सी मुस्कराहट के साथ) देखा भैया... मेरे अंदर तुम वही पुराने वीर को ढूँढ रहे हो... (फिर थोड़ी सीरियस हो कर) जब अपने ही मेरे बारे में ऐसी राय रखते हों... तो गैरों से क्या गिला रखना...

कह कर वीर वहाँ से निकल जाता है l वीर की कही बातेँ विक्रम के जेहन पर हथोड़े की तरह बरसने लगते हैं l वह वीर को आवाज देने की हिम्मत तक नहीं कर पाता l वह भी बुझे मन से बाहर की ओर चला जाता है l यह सब किचन से दोनों भाभी और देवरानी सुन रहे थे, उनका भी चेहरा बुझ जाता है l

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उदय टहलता हुआ रोणा के क्वार्टर के सामने पहुँचता है l उसे बाहर रोणा की पर्सनल जीप दिखता है तो वह बहुत खुश हो जाता है l वह भागते हुए जीप के पास पहुँचता है और अपने बालों को ठीक कर क्वार्टर के बाहर पहुँचता है और बंद दरवाज़े को हल्के से धक्का देता है l दरवाजा खुल जाता है l उदय धीरे धीरे अंदर जाने लगता है l देखता है बाथ रुम में रोणा के चेहरा सेविंग फ़ोम से पुता हुआ है और वह अपना दाढ़ी बना रहा है l आईने में रोणा उदय को देख लेता है l

रोणा - तु अंदर कैसे आया बे...
उदय - वह साहब दरवाजा खुला था...
रोणा - हाँ हाँ मालुम है... पुछ रहा हूँ सीधे अंदर कैसे आ गया...
उदय - साब जी... आपने ही तो कहा था... मुझे अंदर आने के लिए... कभी दरवाजा खटखटाना ना पड़े...

इतना सुनते ही वह अपना रेजर रख देता है और उदय के पास चलते हुए आता है l इससे पहले उदय कुछ समझ पाता तब तक उदय के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ चुका था l तमाचा मारने के बाद रोणा वापस जाकर अपना दाढ़ी बनाने लगता है l उदय थप्पड़ खा कर सोचने लगा उससे क्या गलती हो गई l यही सोचते सोचते वह बाहर की ओर जाने लगता है l

रोणा - अब कहाँ जा रहा है...
उदय - वह बाहर जाकर दरवाजा खटखटाने...
रोणा - अबे भोषड़ी... जब आ गया है... जो रोने आया था... वह रो कर जा यहाँ से...

उदय अपना सिर खुजाने लगता है, तब तक रोणा अपना दाढ़ी बना कर चेहरा टावल से पोंछ रहा था l जब चेहरा पोंछ कर उदय के सामने आता है, तो उदय उसे देख कर चौंक जाता है l क्यूंकि रोणा ने अपना मूँछें निकाल लिया था l उदय उसे हैरानी भरे नजर से देख रहा होता है l


रोणा - ऐसे मुहँ फाड़े क्या देख रहा है...
उदय - आज आप बहुत बदले बदले लग रहे हैं... चेहरे से भी... और... (अपने गाल पर हाथ फेरने लगता है)
रोणा - पहली बात... तुझे मैंने एक काम भी दिया था... क्या याद है तुझे...
उदय - जी है ना... मैं रोज विश्वा पर नजर गड़ाए हुए था... इतने दिनों तक वह घर के बरामदे से बाहर नहीं आ रहा था... सिर्फ काम ही काम कर रहा था... आज सुबह ही वह काम ख़तम कर बाहर दिखा...

इतना सुनते ही रोणा का चेहरा सख्त हो जाता है और उसका हाथ उठ कर चल जाता है पर ठीक उदय के गाल तक आ कर रुक जाता है और अपनी जबड़े भींचते हुए उदय के गाल को थपथपाने लगता है, फिर अचानक अपनी मुट्ठी में उदय के गाल को भींच लेता है l उदय दर्द के मारे चीखने लगता है l

रोणा - श्श्श.. श्श्श.. चिल्ला क्यूँ रहा है...
उदय - आ ह... आह...
रोणा - तेरा गाल ही तो खिंच रहा हूँ... कौनसा तेरा गांड मार रहा हूँ... हाँय...
उदय - मुझे माफ कर दीजिये... साब...
रोणा - क्यूँ... क्या ग़लती किया तुने... हाँ... बोल बोल...
उदय - नहीं जानता... आह...
रोणा - तो सुन भोषड़ी के सुन... विश्वा... गायब था... तब से... जब से मैं यहाँ नहीं था... और आज सुबह ही तेरी अम्मा चोद कर आया है... मादरचोद... इसपर तु कांस्टेबल बनेगा... ह्म्म्म्म... कांस्टेबल...
उदय - आह... आ आ ह... माँ कसम साब जी... मैंने उसे दुर से ही देखा था... कैसे पता करता के वह विश्वा नहीं है... आप ही ने तो दूरी बना कर नजर रखने के लिए कहा था...

रोणा उसके गाल को छोड़ देता है l उदय अपने गाल को सहलाने लगता है l दर्द इतना था कि उसके आँखे नम हो गईं थीं l इतने में उसके दरवाजे पर दस्तक होता है l

रोणा - कौन है...
भीमा - (अंदर आते हुए) भीमा...
रोणा - ओ... कहो भीमा... सुबह सुबह... कैसे...
भीमा - (उदय पर नजर डालते हुए) दरोगा बाबु पिछले दो दिनों से राजा साहब आपको याद कर रहे हैं... इसलिए मैं यहाँ दो बार आकर लौट चुका हूँ... पर यह क्या... आपने अपनी मूंछें क्यूँ मुंडवा ली...
रोणा - (जबड़े भींच कर) वह क्या है कि भीमा... जब से सस्पेंड हो कर राजगड़ से बाहर आया... तबसे कोई मर्द वाला काम किया नहीं ना... ऊपर से जब से आया हूँ... रंग महल भी सुना और विरान है... इसलिए... अब तो मूंछें तब रखूँगा... जब कोई मर्द वाला काम कर लूँ...
भीमा - ओ... लगता है समस्या विकट है...
रोणा - वह मेरी समस्या है... तुम बोलो.. अभी क्या करना है...
भीमा - पता नहीं क्यूँ... दो दिन पहले.. सरपंच से मिलने के बाद.. राजा साहब आपको खोज रहे हैं... उपर से मैंने कई बार फोन लगाया आपको... पर आपने उठाया ही नहीं...
रोणा - हाँ... वह काम में... बहुत व्यस्त था... इतना की अपना ही होश नहीं था... चलो चलें... देखें राजा साहब को मेरी क्या जरूरत आ पड़ रहा है...

तीनों बाहर आते हैं भीमा और रोणा भीमा के लाए गाड़ी में बैठ कर चले जाते हैं l पीछे उदय वैसे ही अपने गाल सहलाते रह जाता है और मन ही मन बड़बड़ाने लगता है l

" साला कुत्ता कहीं का... लगता है विश्वा ने ही इसकी जमकर ली है... तभी साला दर्द छुपाने के लिए मूँछ कटवा कर फिर रहा है... कुत्ता कहीं का... जब तेरे जैसे ढीठ को विश्वा चकमा दे सकता है... भुर्ता बना सकता है... मैं विश्वा के आगे क्या हूँ बे.. अंडे से निकला हुआ चूजा... रुक साले रुक... एक दिन मैंने तेरी ना ली... तो मैं भी उदय नहीं... "

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दरवाज़ा खोलते ही सामने वीर को देख कर दादी चौंक जाती है l

दादी - अरे दामाद जी आप... इस वक़्त... अनु तो अभी ऑफिस के लिए निकलने वाली थी...
वीर - क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...
दादी - ओ हो... मैं भी क्या बेवकूफ़ी कर रही हूँ... दामाद जी द्वार पर खड़े हैं... मैं द्वार पर ही खड़ा कर बात कर रही हूँ... आइए... अंदर आइए...

दादी दरवाजे से हटती है l वीर अंदर आकर एक चेयर पर बैठ जाता है l अनु भागते हुए हाथ में एक कॉफी की ग्लास लेकर वीर को देती है l पहले वीर हैरान हो कर अनु की ओर देखता है फिर मुस्कराते हुए कॉफी अनु के हाथ से लेकर चुस्की भरता है l

दादी - बड़ी खयाल रहती है तुझे राजकुमार की... कोई दुसरा आए तो ध्यान कभी नहीं देती...

अनु शर्मा कर वहाँ से अंदर की ओर भाग जाती है l वीर के होंठो पर मुस्कुराहट और भी गहरा जाता है l

दादी - दामाद जी... क्या आपका यहाँ आना पहले से तय था...
वीर - नहीं तो... क्यूँ क्या हुआ...
दादी - सच कह रही हूँ दामाद जी... रानी साहिबा आईं थीं... इस कमबख्त की हाथ माँगने... तब इसे मेहमान नवाजी समझाना पड़ा... पर आपकी बात और है... देखिए ना... आप को आए कितनी देर हुए... आपके लिए कॉफी तैयार कर दी उसने...
वीर - दादी... मेरा यहाँ आने का वज़ह भी यही है...
दादी - क्या मतलब...
वीर - मुझे अनु की आदत.. या यूँ कहूँ के... मुझे अनु की लत लग चुकी है... मेरा खयाल करने वाली... खयाल रखने वाली... अब सिर्फ ऑफिस में नहीं... बल्कि मुझे मेरे घर के आँगन में चाहिये...
दादी - ओ... (खुश हो कर) मतलब आप शादी की बात करने आए हैं...
वीर - हाँ... शादी की बात करने आया हूँ... आज सुबह ही अपने बड़े भैया... भाभी और छोटी बहन को बताया... माँ तो कब से तैयार बैठी है... इससे पहले कि मैं अपने घर के बुजुर्ग और मुख्य को अपना अभिप्राय बताऊँ... मैं आपसे शादी की इजाजत लेने आया हूँ...
दादी - दामाद जी... जब मैंने रानी साहिबा को पहले से ही बता चुकी हूँ... अनु आपकी है... जब आपको ठीक लगे... तब आप उसे मर्यादा के साथ डॉली में ले जाएं...
वीर - (अपनी जगह से उठ कर दादी की हाथ पकड़ लेता है) थैंक्यू दादी थैंक्यू... मतलब.. आपको कोई एतराज नहीं है ना...
दादी - मुझे क्यूँ कोई एतराज होने लगी... पर आपकी उतावलापन देख कर लगता है... जैसे शादी आपको कल ही करनी है..
वीर - कास के ऐसा हो पाता... वह क्या है कि... मेरे बड़े भाई यानी युवराज जी... मेरे पिताजी... यानी... छोटे राजा जी और हमारे क्षेत्रपाल परिवार के मुखिया... मिलकर किसी काम से बाहर हफ्ते दस दिन के लिए जा रहे हैं... जब वे लौटेंगे.. तब मैं उन लोगों से शादी की इजाजत ले लूँगा...
दादी - तो ठीक है...
वीर - पर...
दादी - पर क्या दामाद जी...
वीर - दादी.. मैं चाहता हूँ... अनु यह दस दिन घर पर रहे... मेरा मतलब है... वह ड्यूटी पर ना आकर... घर पर आराम करे...(अपनी जेब से एक क्रेडिट कार्ड निकाल कर दादी को देते हुए) और शादी की तैयारी वह अपनी तरफ से करे...
अनु - (कमरे से बाहर आकर दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है) नहीं... ऐसा नहीं हो सकता...
दादी - ठीक ही कह रहे हैं दामाद जी... शादी के पहले मिलने जुलने का रिवाज नहीं होता...
अनु - वह मैं कुछ नहीं जानती... मुझसे रानी माँ ने वादा लिया था... चाहे कुछ भी हो जाए... शादी से पहले... कभी ऑफिस जाना बंद ना करूँ... वैसे भी कौनसा शादी का दिन तय हो गया है....
दादी - दामाद जी मैं रसोई में जाकर थोड़ा देखती हूँ... आप अपनी अनु को समझाने की कोशिश कीजिए... (कह कर दादी वहाँ से चली जाती है)
वीर - अनु... तुम समझ क्यूँ नहीं रही हो...
अनु - प्लीज... कुछ दिनों से हालात जैसे हो रहे हैं... मैं घर पर रहूँगी तो हमेशा चिंता में रहूँगी... आप सामने रहोगे... तो मुझे चिंता नहीं रहेगी... प्लीज...
वीर - देखो अनु... भैया के बाहर जाने से... पूरा काम का बोझ मुझ पर पड़ेगा... आने जाने से लेकर खाने पीने तक का कोई ठिकाना ना रहेगा...
अनु - (धीरे से) झूठे
वीर - सुनाई नहीं दिया... पर समझ गया... तुम मुझे झूठा कह रही हो... किसलिए
अनु - इसीलिए की आप झूठ कह रहे हैं...
वीर - नहीं अनु... सिर्फ ऑफिस ही नहीं... पार्टी का काम देखने इधर उधर जाना पड़ सकता है...
अनु - तभी तो... मैं... आपके साथ रहना चाहती हूँ.. कम से कम ऑफिस के वक़्त...

अनु के इसतरह से अनुरोध करने पर वीर अपना हथियार डालते हुए अनु से कहता है

वीर - ठीक है... अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो.... पर मेरी भी एक शर्त है...
अनु - जी कहिए...
वीर - तुम्हें रोज मेरी गाड़ी से ऑफिस आना जाना करोगी... वह भी सिर्फ ऑफिस के वक़्त...
अनु - (खुशी के साथ शर्माते हुए) मतलब आप रोज मुझे ले जाने एयर छोड़ने आयेंगे..
वीर - नहीं...
अनु - (थोड़ी मायूस हो कर) तो..
वीर - सिर्फ आज ही... मैं तुम्हें ले जाऊँगा... पर कल से... मैं ड्राइवर का इंतजाम कर दूँगा... मेरी अपनी गाड़ी से वह तुम्हें रोज घर से ले जाएगा... ऑफिस आवर ख़तम होते ही वह छोड़ देगा... मैं इसी शर्त पर ही तुम्हें ऑफिस में आलाउ कर सकता हूँ...
अनु - (मायूसी के साथ, मुहँ फूला कर) ठीक... है...


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एक रोती हुई स्कुल जाती किशोरी लड़की की हाथ पकड़ कर वैदेही लक्ष्मी के घर पहुँचती है l घर में लक्ष्मी और हरिया के बीच किसी बात को लेकर कहा सुनी हो रही थी l जैसे ही वैदेही वहाँ पहुँची दोनों के दोनों चुप हो गए l

वैदेही - क्या बात है लक्ष्मी.. किस बात को लेकर तुम दोनों झगड़ रहे थे...

लक्ष्मी और हरिया दोनों एक दूसरे को देखते हैं फिर लक्ष्मी अपना सिर झुका लेती है l पर हरिया गुस्से भरे नज़र से वैदेही के साथ आई उस लड़की की ओर देखने लगता है l वह लड़की हरिया की नजर से बचने के लिए वैदेही के पीछे छुपने लगती है l


वैदेही - ऐ हरिया.. खबर दार जो मुन्नी पर गुस्सा किया या इसके साथ मार पीट की... मुझसे बुरा कोई ना होगा...
हरिया - तु क्यूँ हमेशा गाँव के हर घर के फटे में घुसने की ताक में रहती है...
वैदेही - तुम दारूबाज लंपटों से मैं बात तक करना पसंद नहीं करती.. पर इस गाँव के आँगन में पल रहे.. जी रहे हर इज़्ज़त को अपनी इज़्ज़त समझती हूँ... जब जब उन पर कोई आंच भी आई तो मैं उनके लिए उतरुंगी... आती रहूंगी...
हरिया - तेरी इज़्ज़त है ही क्या... जो मेरे घर की इज़्ज़त के लिए... आती रहेगी...
वैदेही - मेरी इज़्ज़त पर उंगली तब उठाना... जब तु खुद को मर्द कहलाने के लायक समझेगा.. तेरी मर्दानगी रोज शनिया और उसके कुत्तों के आगे... शराब की भट्टी में... एड़ी पर रेंगती रहती है... इसलिए तो... वह और उसके चट्टे बट्टे मौका ढूंढते रहते हैं... तेरे घर की इज़्ज़त और अमानत को तार तार करने के लिए...
हरिया - हूंह्ह्... तुझसे बात कर रहा हूँ देखो... मेरी ही गलती है...

इतना कह कर हरिया वहाँ से चला जाता है l उसके जाने के बाद लक्ष्मी सुबकते हुए बैठ जाती है l

वैदेही - लक्ष्मी... हरिया मुझसे कहेगा कुछ नहीं... पर तु बता... क्या हुआ है... और मुन्नी को तुने क्यूँ गाली दी... मारा भी...
लक्ष्मी - क्या कहूँ दीदी... आज सुबह शनिया सरपंच को लेकर आया था.. इन्होंने पता नहीं कितना कर्ज लिया है शनिया से... अब सब मिला कर पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - (चौंकते हुए) क्या पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - हाँ दीदी... हमने ठीक से कभी हजार रुपये भी नहीं देखें... पाँच लाख रुपये...
वैदेही - ऐसे कैसे पाँच लाख रुपये... शनिया ने कह दिया... और हरिया ने मान लिया...
लक्ष्मी - माने तो नहीं... मान ही नहीं पाए... पर..
वैदेही - पर क्या...
लक्ष्मी - पर हरिया के पास लिखा पढ़ी के कागजात थे... इन्होंने जितना दारु पीया था... सब सूद के साथ मिला कर... अब पाँच लाख रुपये हो गए हैं...
वैदेही - क्या... दारू पी पी कर पाँच लाख रुपये...
लक्ष्मी - सिर्फ इन्हीं के नहीं है दीदी... बल्लु.. सुकांत... नरेश... सब के सब... किसी के पाँच... किसी के सात...
वैदेही - यह लोग तो पैसे दे देते थे ना...
लक्ष्मी - हाँ फिर भी... कई सालों से पी पी कर इतना हो गया है....
वैदेही - ठीक है... बात मेरी समझ में आ गई... पर इसमें मुन्नी को क्यूँ कोस रही थी... हाथ भी उठाया तुमने आज इस पर... बड़ी हो रही है वह...
लक्ष्मी - मारु नहीं तो क्या करूँ... कर्मजली लड़की हो कर पैदा जो हुई है...
वैदेही - तो... लड़की हो कर पैदा हुई... तो इससे क्या पाप हो गया... अब तो राजा नहीं उठा जा रहा है...
लक्ष्मी - पर उसके पालतू भेड़िये तो ताक में हैं... जो मौका ढूंढ रहे हैं...
वैदेही - एक मिनट... कहीं इस पाँच लाख के बदले...
लक्ष्मी - हाँ दीदी हाँ... कर्ज को जल्दी चुकता करने के लिए... लड़की को घर बुला रहे हैं... और इस पर सरपंच भी उनका साथ दे रहा है...

वैदेही अपने दोनों हाथों से कान को ढकते हुए अपनी आँखे मिंज कर पास पड़े एक टुटे फूटे कुर्सी पर बैठ जाती है l थोड़ी देर बाद

वैदेही - सरपंच ऐसे कैसे उनका साथ दे सकता है... उन हरामीयों की बात को मनवाने के लिए... उनके साथ घर घर जा रहा है...
लक्ष्मी - वही तो... दीदी... यह सब जो कर्ज के जाल में उलझे हुए हैं... दो दिन बाद इस विषय में... पंचायत में निर्णय होने वाला है... सारे गाँव वालों के बीच...
वैदेही - ओ... अब समझी... गाँव वालों के सामने... इन कर्जदारों पर निर्णय नहीं होने वाला है... बल्कि हर घर की इज़्ज़त में सेंध लगाने की जुगत लगा रहे हैं...

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कुछ लोग तहसील ऑफिस से बाहर निकल कर रोड के उस पार मिलन टी स्टॉल पर जाते हैं l पर वहाँ पहुँचते ही देखते हैं मिलन अपना दुकान बंद कर रहा था l यह देख कर एक आदमी पूछता है

आदमी - क्या बात है मिलन... धंधे के टाइम पर दुकान क्यूँ बंद कर रहा है...
मिलन - आज थोड़ी गड़बड़ हो गई है...
दुसरा आदमी - गड़बड़... कैसी गड़बड़...
मिलन - सुबह सामान ठीक से चेक किया नहीं... इसलिए जितनी जरूरत थी... उससे कम सामान लाया था... और इत्तेफ़ाक से सुबह से ही भीड़ बहुत थी... जितना लाया था सब ख़तम हो गया...
आदमी - तो यहीँ कहीँ आसपास से मंगवा ले ना...
मिलन - सर जी... यहाँ सब दुध वाला चाय पीते हैं... और अभी दुध का पैकेट मिलने से रहा... पाउडर वाला चाय एक बार कोशिश की थी... बहुत गाली पड़े थे... उम्मीद है... आप समझ रहे हैं...
सारे लोग - ठीक है... आज तो तुझे माफ़ कर रहे हैं... पर कल से... शाम होने से पहले दुकान बंद किया तो... यहाँ से दुकान उखाड़ देंगे समझा...
मिलन - जी माई बाप...

वह लोग वापस जाने के बजाय वहीँ पड़े बेंच पर बैठ कर बातेँ करने लगते हैं l मिलन कुछ ही मिनट में अपना सारा सामान पैक कर चुका था l तभी एक ऑटो वहाँ पर आती है l मिलन उसे आवाज देता है l ऑटो रुक जाती है l उस ऑटो में पहले से ही दो सवार थे l मिलन अपना सामान पीछे लोड कर अंदर बैठ जाता है l ऑटो आगे बढ़ जाता है l थोड़ी देर बाद ऑटो यशपुर से निकल जाता है l यशपुर के बाहर एक सुनसान जगह पर ऑटो खराब हो जाता है l ऑटो ड्राइवर उतर जाता है और चारो तरफ नजर घुमाता है, वह ऑटो ड्राइवर और कोई नहीं था, वह शैलेंद्र उर्फ सीलु था l ऑटो में दो और लोग विश्व और जिलु थे l

सीलु - (विश्व से) भाई तुम ऑटो के अंदर ही बैठे रहो... (जिलु और मिलु से) तुम दोनों उतरो बे... ऑटो ठीक करने का सीन बनाना है...

जिलु और मिलु उतर कर ऑटो को एक तरफ उठा कर उसके नीचे एक डंडा लगा देते हैं l सीलु फटाफट स्टेफिनी निकाल कर टायर निकालने का ऐक्टिंग करने लगता है l

सीलु - भाई... इससे पहले के तुम कुछ पूछो.. मैं कुछ पूछूं...
विश्व - हाँ... पूछ लो...
सीलु - तुम्हारा बार काउंसिल वाला लाइसेंस कब आएगा...
विश्व - शायद दो या तीन दिन बाद... या फिर ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता...
जिलु - और जो तुमने आरटीआई में इंफॉर्मेशन माँगा था... उसका क्या हुआ...
विश्व - वह भी एक दो दिन में आ जायेगा.... क्यूँ तुम लोग इतने बेकरार क्यूँ हो...
सीलु - बुरा ना मानना भाई... पर मुझे नहीं लगता... पीआईएल दाखिल करने से... तुम्हें कोई फायदा होगा...
विश्व - ह्म्म्म्म... मतलब तुम लोगों ने बहुत कुछ छानबीन कर लिया है...
मिलु - हाँ लगभग...
विश्व - ह्म्म्म्म ठीक है... अब तुम लोग... मुझे बात को पुरी तरह से समझाओ...
सीलु - भाई... तुमने आरटीआई जैसे ही फाइल किया... इन्हीं पैंतीस चालीस दिनों में... जो भी कुछ हुआ है.. तुम्हारे उस रुप फाउंडेशन केस में कुछ भी मदत नहीं मिलने वाला है...
मिलु - पहली बात... तुम्हारे साथ जो भी... एक्वुस्ड थे... वह सारे के सारे मार दिए गए... ज्यादातर गवाह भी गायब कर दिए गए....
जिलु - और जिन लोगों को तुम गवाह बना सकते थे... मतलब... बैंक के तीन स्टाफ... रेवेन्यू ऑफिस के दो स्टाफ और तहसील ऑफिस के तीन पदाधिकारी... अपनी अपनी मेडिकल सर्टिफ़िकेट निकलवा कर... OSD... बन बैठे हैं...
मिलु - यह OSD मतलब...
विश्व - ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्युटी... वह कर्मचारी... जिन्हें नौकरी से निकालने के बजाय... उन्हें बिना किसी काम धाम के... मानवता के आधार पर नौकरी पर बनाए रखा जाता है....
जिलु - हाँ...
विश्व - और जाहिर सी बात है कि... वे सब... सिजोफेर्नीया की सर्टिफिकेट लाए होंगे...
सीलु - हाँ... बिल्कुल...
विश्व - मतलब... अब वह सारे लोग गवाह के तौर पर नाकारे हो चुके हैं...

तीनों अपना सिर हाँ में हिला कर चुप हो जाते हैं l विश्व अपनी आँखे बंद कर कुछ सोचते हुए हँसने लगता है l

सील - भाई... दुखी मत हो...
विश्व - मैं दुखी कहाँ हूँ... मैं तो हँस रहा हूँ...
मिलु - पर क्यों... क्या अब भी... तुम हाइकोर्ट में पीआईएल दाखिल करोगे...
विश्व - हाँ...
तीनों - (हैरान हो कर) क्या...
जिलु - पर उससे फायदा क्या होगा...
विश्व - देखो... मैंने जब आरटीआई दाख़िल किया था... मुझे तभी से ही अंदेशा था... ऐसा ही कुछ होगा... इस केस के ताल्लुक़ और तीन प्रमुख गवाह हैं... सी आई... अनिकेत रोणा... श्रीधर परीडा... और राजा भैरव सिंह...
सीलु - पर भाई तुम्हीं कहा करते थे... रोणा का इसमे उतना रोल नहीं है... जितना एसआईटी का चीफ श्रीधर परीडा का है...
विश्व - हाँ पर उन तीनों को गवाही के लिए कोर्ट लाना टेढ़ी खीर है...
मीलु - क्यूँ...
विश्व - केस फिर से खुलेगा... इस बीच सात साल गुजर चुके हैं... बहुत कुछ बदल चुका है... या बदल दिया गया है... इसलिए पहले मुझे पीआईएल फाइल तो करने दो... देखते हैं... क्या होता है...
जिलु - भाई... तुम बात को बहुत ही कैजुअल ले रहे हो...
विश्व - नहीं... गेम तो अभी शुरु होगा... जैसे ही मैंने आरटीआई फाइल की... उन्होंने गलतियाँ करनी शुरु कर दी... जब कि सच कहूँ तो मैं भी जानता हूँ... यह सात साल के पुराने केस में संभावना बहुत कम है...
तीनों - तो...
विश्व - देखो... करप्शन एक चस्का है... जो भी उसकी मलाई एक बार खाये... जब तक कोई खतरा ना हो... वह करता ही जाता है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... उन्होंने करप्शन करना छोड़ा नहीं होगा... बल्कि नए तरीके से... मजे से कर रहे होंगे...
जिलु - तो उस पुराने केस का क्या होगा...
विश्व - पीआईएल तो फाइल होगा... वह लोग अपने ना पकड़े जाने पर और अब तक किए करतूत पर निश्चिंत होंगे... पर फिर भी उनका ध्यान पुराने केस पर जमायेंगे... पर हम असल में उनके नए करप्शन को खोज निकाल कर उसे पुराने केस में जोड़ेंगे... तब जाकर कुछ ना कुछ रिजल्ट हम को मिलेगा...
सीलु - हाँ भाई... तुम्हारे इस बात पर... मैं सौ फीसद सहमत हूँ... अभी इन पाँच छह महीनों में... सारे प्रमुख सरकारी कार्यालय में... पदाधिकारी बदले हैं... सब नए हैं... तो तुम्हारे कहे हिसाब से... करप्शन हो रहा है... हम जान भी रहे हैं... पर शायद नए तरीके से...
विश्व - ठीक है... तो अब बताओ... इन छह महीनों में क्या क्या हुआ है...
सीलु - भाई... इन छह महीनों में... यशपुर को स्मार्ट सिटी... और राजगड़ को स्मार्ट विलेज बनाने की अप्रूवल मिल गया है... पाँच साल पहले... राजगड़ से बाहर... निरोग हस्पताल बनाया जा रहा था... बहुत ही बड़ा हस्पताल... पर यश वर्धन की मौत के बाद... वह हस्पताल की बिल्डिंग विरान पड़ी थी... छह महीने पहले... उसे... राजगड़ मल्टी पर्पस कोऑपरेटिव ऑफिस में कन्वर्ट किया गया है...
मिलु - इन्हीं पाँच छह महीनों में... यशपुर और राजगड़ विकास के लिए... बहुत से प्रोजेक्ट अप्रूव्ड हुए हैं... वह भी... मनरेगा के तहत... पर...
विश्व - पर...
मिलु - इस बार... कोई मुर्दा नहीं है... पता नहीं पैसे कैसे गायब हो रहे हैं...
विश्व - ह्म्म्म्म... लगता है... इस बाबत हमें कोई लिंक मिलने वाला है...
तीनों - कैसे... कौन देगा...
विश्व - वही... जो मुझसे... पेपर से... कॉन्टेक्ट करना चाहता है... मुझे लगता है... इसी करप्शन पर वह कोई रौशनी डाल सकता है...
जिलु - पर टीलु कह रहा था... वह कुछ दिनों से कॉन्टेक्ट नहीं कर रहा है...
विश्व - हाँ... कर तो नहीं रहा है... अच्छा मैं यहाँ से उतर कर पैदल ही चला जाता हूँ... तुम लोग आधे घंटे बाद... अपने अपने ठिकाने पर पहुँच जाओ...
जिलु - रुको ना भाई... छोड़ देते हैं तुम्हें...
विश्व - नहीं... मैं नहीं चाहता कोई भी हमें... इकट्ठा देखे...


इतना कह कर विश्व ऑटो से उतर कर चल देता है l चलते चलते इनके कही बातों को याद करने लगता है l उसे अंदाजा था, भैरव सिंह अपनी नाक बचाने के लिए बहुत कुछ करेगा l पर जिन अधिकारियों को गवाही के लिए बुलाया जा सकता था, उन्होंने ही अपने तरफ से पागलपन का सर्टिफिकेट लेकर अपनी जान और आने वाले कानूनी पचड़े से खुद को बचा लिया l असल में भैरव सिंह के बाद सिर्फ एक ही गवाह बचता हैं l श्रीधर परीडा एसआईटी का चीफ जिसे शायद तोड़ा जा सकता है l पर कहीं भैरव सिंह इससे पहले श्रीधर परीडा को कुछ ना कर दे l और इन छह महीनों में जो भी कुछ हुआ है पुराने कडियों को जोड़ने के लिए बहुत अहम है l पर जोड़े तो जोड़े कैसे l भैरव सिंह अपने पुराने गलतियों से सबक लेकर अब जो भी कर रहा होगा फुल प्रूफ ही होगा l
ऐसे सोच सोच कर विश्व उसी पेपर वाले के दुकान पर आ पहुँचता है जहां से वह रोज उसके लिए टीलु पेपर लेकर जाता है l उसके कदम अपने आप दुकान के अंदर पहुँच जाते हैं l

दुकानदार - बोलिए साहब.. क्या चाहिए...
विश्व - (समझ नहीं पाता क्या कहे)
दुकानदार - सर यहाँ हर तरह के अखबार... किताबें मिलती हैं... बोलिए आपको कौनसा चाहिए...
विश्व - मैं... वह... असल में... मैं थोड़ा कंफ्यूज हूँ...
दुकानदार - जब मन भटके... कोई राह ना दिखे तो... यह किताब पढ़ना चाहिए... (दुकानदार एक किताब निकाल कर दिखाता है जिसके कवर पर लिखा था "शुभ संदेश")
विश्व - नहीं... मैं...
दुकानदार - अरे सहाब ले लीजिए... यह आपके लिए ही है... घर जाकर पढ़ लीजिए... अगर आपको पसंद ना आए.. तो कल लाकर लौटा दीजिएगा...
विश्व - नहीं... मैं ऐसे कैसे...
दुकानदार - अरे सहाब... मैंने कहा ना... यह किताब आपके लिए ही है... मेरी मानिये... जरा एकबार घर जाकर पढ़ लीजिए... पैसा तभी दीजिएगा जब अंदर का विषय पसंद आए... अगर पसंद ना आए... तो लाकर वापस लौटा दीजिए...

विश्व हिचकिचाते हुए किताब लेता है l तभी उसका फोन बजने लगता है l फोन निकाल कर देखता है l स्क्रीन पर दीदी डिस्प्ले हो रहा था l

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रंगमहल से अपने सरकारी क्वार्टर पर रोणा लौट आता है l सिगरेट की धुआं उड़ाते हुए अपने क्वार्टर के अंदर दाखिल होता है l ड्रॉइंग रूम में सोफ़े के पास पड़े टी पोय पर क्लाथ को हटाता है l उस टी पोय के बोर्ड पर विश्व का बड़ा सा मगर एक पुरानी फोटो लगी हुई थी l उस फोटो को देखते ही उसकी आँखों के नीचे की पेशियों में थर्राहट होने लगती हैं l वह आज महल में हुए व्याक्या को याद करने लगता है l


आओ रोणा आओ... पहले गायब होते थे... तो पता रहता था... तुम कहाँ पर हो... पर इस बार तुम ऐसे छुपे जैसे अमावस में चाँद... क्या बात है... (यह सवाल था भैरव सिंह का रोणा से)

रोणा भीमा के साथ रंगमहल के उपरी प्रकोष्ठ में आया था l यह भैरव सिंह का खास कमरा था जहां वह लोगों को बुला कर बैठक किया करता था l भैरव सिंह एक बड़े से सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे रोणा का इस तरह से अभिवादन किया l रोणा के भीतर आते ही भैरव सिंह अपना हाथ उठा कर भीमा को इशारे से जाने को कहता है, भीमा अपना सिर झुका कर उल्टे पाँव लौट जाता है l भीमा के वहाँ से जाते ही

रोणा - ऐसा कुछ नहीं है राजा साहब... मैं भुवनेश्वर आपको बता कर ही गया था...
भैरव सिंह - हाँ... गए तो थे... (अचानक हैरान हो जाता है) एक मिनट... हम यह क्या देख रहे हैं... (लहजा सपाट व निरस हो जाता है) जो क्षेत्रपाल से जुड़े हों... वह लोग अपने मूंछें नहीं मुंडवाते... जानते हो ना...
रोणा - जी राजा साहब... पर इन दो महीनों में... मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ है... जो मुझे मूंछें रखने लायक छोड़ा नहीं है...
भैरव सिंह - (अपनी भवें सिकुड़ कर रोणा की ओर देखता है) ह्म्म्म्म... चोट बहुत गहरी लगी है... दिल पर भी और दिमाग पर भी... देने वाला कौन है...
रोणा - (जबड़े सख्त हो जाते हैं, आँखों में खुन उतर आती है) व... वि... विश्वा..
भैरव सिंह - विश्वा... क्या किया उसने इसबार तुम्हारे साथ....
रोणा - (अपनी दांतों को पिसते हुए) पहली बार... उसने साबित कर दिया... मैं कितना लाचार हूँ... मैं कितना मजबूर हूँ... उसने मुझे एहसास दिलाया... के मैं एक बेचारा हूँ...
भैरव सिंह - पर तुम इसबार एक लड़की के पीछे गए थे ना.... क्या उस लड़की का... कोई संबंध है विश्वा से... जैसा कि तुम अनुमान लगा रहे थे...
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए चुप रहता है, फिर अपना सिर ना में हिलाते हुए) नहीं... नहीं राजा साहब... नहीं...
भैरव सिंह - पर तुमने जो अनुमान लगाया था...
रोणा - हाँ... कुछ अनुमान सही साबित हुए और कुछ गलत... प्रधान बाबु सही कह रहे थे... विश्वा जैसे सजायाफ्ता मुजरिम से... जो जैल से छूटे कुछ ही दिन हुए हों.. उससे कैसे कोई इज़्ज़त दार घर की लड़की दिल लगा सकती है... वह मेरा वहम था... जो इस बार दूर हो गया...
भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... इसका मतलब उस लड़की से... अब बदला नहीं लोगे...
रोणा - जी बेशक लूँगा... (अपने गाल पर हाथ फेरते हुए) अपने अपमान का बदला कैसे ना लूँ... उसे अपने नीचे लाए वगैर.. मेरी तड़प कम नहीं होगी...
भैरव सिंह - हम्म्म बहुत अच्छे... (एक कुटील मुस्कान लेकर) तो अनिकेत रोणा तुमने उस लड़की को... इस रंग महल के लिए कभी नहीं सोचा... हूँ..
रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए स्तब्ध हो जाता है, फिर लड़खड़ाती हुई आवाज में ) सो.. सोचा... था... पर... राजा साहब... वह इतनी खूबसूरत है नहीं कि... इस रंग महल की रंगत बन सके... (नजरें झुका लेता है)

भैरव सिंह का चेहरा थोड़ा सख्त हो जाता है l वह तेज नजरों से रोणा को घूर रहा था l रोणा उसके नजरों का सामना नहीं कर पा रहा था l

रोणा - राजा साहब.. मैं आपका नमक हलाल हूँ... आप हुकुम करेंगे तो... मैं उसे इस रंग महल की रंगत बनाने के लिए... जरूर कुछ करूँगा...
भैरव सिंह - अच्छा... बड़ी जल्दी तैयार हो गए...
रोणा - वह... बात दरअसल यह है कि... उस लड़की से... मैं अपनी निजी खुन्नस निकालना चाहता था...
भैरव सिंह - (हँसने लगता है) हा हा हा हा हा... हम तो तुम्हें जांच रहे थे... बस तुम्हारी वफादारी देख रहे थे... तुम्हारे अंदर की जुनून को परख रहे थे... क्यूंकि तुम्हें बिना मूँछ के देख कर... हमें लगा तुम्हारी काबिलियत पर कहीं सीलन ना पड़ गया हो... जंक तो नहीं लग गया...
रोणा - तो बोलिए... क्या हुकुम है राजा साहब... अगर आप कहेंगे तो लड़की को उठवाकर इस रंग महल में आपके सेवा में पेश कर दूँगा...
भैरव सिंह - सबास... रोणा उस लड़की का विश्वा से जब कोई संबंध नहीं है... तो उस लड़की पर हमारा इरादा खत्म हो गया... क्यूंकि भैरव सिंह उन कलियों और फूलों को मसलता... रौंदता है... जिनकी कांटे भैरव सिंह को चुभते हैं... हम रंग महल में उसे अपने नीचे लाते हैं... जिसपर अपना नफरत उतारना हो... खैर यह बताओ... विश्वा ने तुम्हारे साथ ऐसा क्या किया... जो तुमने अपना मूंछें निकलवा दी...

यह सवाल रोणा को अंदर से छटपटा देता है l उसके जबड़े भींच जाते हैं आँखों के नीचे की मांस पेशियां फड़फड़ाने लगती हैं l आँखे नम हो कर तैरने लगती है l

रोणा - (दुख और पीड़ा से आवाज जैसे जम गया हो) राजा साहब... कुछ ऐसा किया है... जो मेरे मर्द होने की अहम को कुचल कर रख दिया है...
भैरव सिंह - ठीक है... हम समझ गए... कुछ ऐसा हुआ है... जो तुम बता नहीं सकते... और यह भी समझ गए... वह तुम पर इस कदर खुन्नस खाए हुआ है... के तुम्हारे पीछे पीछे भुवनेश्वर पहुँचकर... तुम्हारी बजा कर वापस आ गया है...
रोणा - (अपने हुए अपमान को याद कर आँखे बंद कर लेता है) राजा साहब... आपने मुझे बुलाया है... कोई हुकुम...
भैरव सिंह - हाँ रोणा हाँ... हम आज शाम को... भुवनेश्वर जा रहे हैं... छोटे राजा... युवराज और प्रधान के साथ हफ्ते दस दिन के लिए... कलकत्ता और राँची जा कर कुछ बिजनैस डील फाइनल करने हैं... तो यह कुछ दिन... राजगड़ पुरी तरह से तुम्हारे हवाले किए जा रहे हैं...
रोणा - (हैरानी से भैरव सिंह की ओर देखते हुए) मैं समझा नहीं
भैरव सिंह - अभी समझ जाओगे...

भैरव सिंह एक बेल बजाता है l कुछ देर बाद उस कमरे में भीमा के साथ सरपंच, शनिया, सत्तू आते हैं l

भैरव सिंह - रोणा कल से लेकर हमारे वापस आने तक... तुम मौका बनाओ... उस कमज़र्फ विश्वा से... तुम्हें कैसे बदला लेना है...
रोणा - मैं अभी भी समझा नहीं...
भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता है) कुछ दिन हुए हम कुछ अफवाह सुन रहे थे... इस बाबत हमने इस शनिया से बात की... तो उसने हमें जो बताया... हमें वह सब नागवार गुज़रा... शनिया ने कहा कि... रात के अंधेरे में... यह लोग तैयार नहीं थे... पर विश्वा अपनी पुरी तैयारी में था... इसलिए वह कांड हो गया... जो कभी होना नहीं चाहिए था... पर दोबारा विश्वा के पास ऐसा मौका नहीं आना चाहिए...
रोणा - तो इसमें सरपंच की क्या भूमिका है..
सरपंच - है दरोगा बाबु है... पंचायत ऑफिस में... हमने दो साल पहले एक चिट फंड शुरु किया था...
रोणा - चिट फंड...
शनिया - जी दरोगा जी... और जो लोग हमसे कुछ भी लेते थे... उसके एवज में... हम सब उसे चिट फंड में जोड़ कर दिखा देते थे... और उसके बदले उनसे... खाली कागजात पर अँगूठा या दस्तखत रख लेते थे...
रोणा - ओ...
सरपंच - हाँ... दरोगा बाबु... आज हम घर घर जा कर सबको कल की पंचायत के लिए नोटिस थमा दिया है... सबका फैसला हम पंचायत में करेंगे... या तो पैसा.. या फिर... हमारे घर पर उनका कोई काम करने आएगा... और तब तक काम करेगा... जब तक उनका कर्ज उतर ना जाए...
रोणा - तो इसमें विश्वा कहाँ आ गया... वह गाँव वालों के.. किसी के भी फटे में घुसेगा नहीं...
शनिया - वह नहीं घुसेगा... पर उसकी दीदी... वह तो घुसेगी.. और जब उसकी दीदी घुसेगी.. तो विश्वा भी घुसेगा...
रोणा - (शनिया से) याद है.. तुझे वकील बाबु ने क्या कहा था... जहां कानूनी पचड़े होंगे... तुझे उनसे पूछ कर यह करना चाहिए था...
शनिया - पर वकील बाबु हैं नहीं... और गाँव में हमारी वह इज़्ज़त रही नहीं... इसलिए हमने सरपंच जी से मशविरा किया... और राजा साहब से इजाजत ले रहे हैं...
रोणा - तुम अब तक यह नहीं समझ पाये... जहां कानून की दाव पेच होगी... वहाँ विश्वा भी अपना कानूनी दिमाग लगाएगा... और तुम लोगों को गलत साबित करेगा... तब हम क्या कर पाएंगे... क्यूंकि ... चिट फंड अगर सरकारी ज्ञांत में और मंजूरी में ना हो तो वह गैर कानूनी होती है... और इससे लोग तुम्हारे ही खिलाफ हो जाएंगे...
शनिया - राजगड़ में राजा साहब ही तो सरकार हैं... और यहाँ लोग राजा साहब के खिलाफ तो जाएंगे नहीं...
रोणा - पर तुम लोग राजा साहब नहीं हो... राजा साहब के कारिंदे हो... गाँव में लोग राजा साहब के वज़ह से लोग तुमसे डरते हैं...
सत्तू - यह हम जानते हैं... पर लोग वहाँ हमारे खिलाफ नहीं होंगे... बल्कि विश्वा के खिलाफ हो जाएंगे...
रोणा - क्या...
शनिया - जी दरोगा बाबु... जैसे ही विश्वा इन मामलों में घुसेगा... भीड़ में से हमारे ही आदमी लोगों को भड़काने का काम करेंगे...
रोणा - ह्म्म्म्म.. तो तुम लोगों ने बहुत सोच समझकर कर यह प्लान बनाया है...
सब - हाँ दरोगा जी...
रोणा - तो इसमें मेरी भूमिका क्या होगी...
भैरव सिंह - तुम बस हवाओं के रुख को पलटने मत देना रोणा... मौका ढूंढना... जब हाथ तुम्हारे मौका आयेगा... तब अपना खुन्नस जैसे चाहे वैसे निकाल लेना... पंचायत में मामला गरम होता जाएगा... हो सकता है तु तु मैं मैं होते होते वहाँ पर दंगा हो... और जहां दंगा होगा... कुछ लोग दंगे के शिकार हो जाएंगे... तब तुम्हें कुछ ना कुछ कारवाई करनी होगी... कारवाई में कुछ भी हो सकता है... उसे कानूनी जामा पहनाने की जिम्मा हमारा होगा... धारा 144 जारी होगी... तहसील ऑफिस से ऑर्डर हम दिलवा देंगे...
रोणा - (आंखे चमकने लगते हैं) वाह राजा साहब वाह... आपने तो कुएं को प्यासे तक पहुँचा दिया... मैं सब समझ गया राजा साहब... मैं सब समझ गया... गाँव में दंगा होगा... दंगे के चपेट में कुछ लोग आयेंगे ज़रूर... और दंगा होने से लेकर दंगे के बाद की रिपोर्ट मैं ऐसा बनाऊँगा की बड़े बड़े कानून के सूरमाओं के सिर चकराने लगेंगे

रोणा अपने यादों से बाहर आता है, दांतों को पिसते हुए अपनी सिगरेट का आखिरी कस भरता है l फिर उस सिगरेट को विश्व के तस्वीर पर मसल कर बुझाने लगता है l

रोणा - (विश्वा की तस्वीर से) सोच रहा है ना... मैंने राजा को क्यूँ नहीं बताया... की उस लड़की का तेरे साथ क्या रिश्ता है... वह इसलिए मादरचोद... तुझे एक कुर्सी पर बाँध कर... तेरे ही आँखों के सामने... तेरी छमीया का ना सिर्फ बजाऊंगा... बल्कि ऐसा फाड़ुंगा... ऐसा फाड़ुंगा... कोई डॉक्टर भी सी नहीं पाएगा... तुझसे राजा का लाख खुन्नस सही... पर मेरी खुन्नस के आगे राजा का खुन्नस जीरो है... उसका खुन्नस तेरे लिए उसके जुती में है... पर मेरा खुन्नस तेरे लिए मेरी नाक से भी उपर है.... इसीलिए तेरी छमीया को रंगमहल की रंगत बनाने से बचाया... क्यूंकि... उसे ताउम्र मेरी रखैल बनाऊँगा... दो दिन बाद होने वाले पंचायत में तेरे खातिर जो दंगे होंगे... वहाँ पर तेरे साथ कुछ भी हो... पर तुझे मैं मरने नहीं दूँगा... क्यूँ की तुझे मैं वह ज़ख़्म दूँगा... जो तेरी जेहन को... आत्मा तक को मरते दम तक गलाती रहेगी....
Bahut hi badhiya update diya hai Kala Nag bhai.....
Nice and beautiful update....
 
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nice update .teelu aur 2 saathi ke saath bhai wala rishta ban gaya hai vishw ka aur wo ek dusre ke liye jaan bhi de sakte hai 😍..
waise vishw apnw gang se mulakat mast karta hai auto ko puncture dikhake jisse kisi ko shak bhi na ho ,teeno se bahut si jaankari mili vishw ko aur usne apne aage ka plan bhi ready kar liya hai .

arun ka chamgadhad mama bulana majedar tha 🤣🤣 aur vishw ne teelu ko batman bana diya .

hell ki meeting me veer ne apni baat rakh di jisse vikram thoda pareshan ho gaya aur usse 10 din ka waqt maanga .kya wo sachme mana payega bhairav pinak ko shadi ke liye 🤔🤔..
rona ko planning samajha di hai aur ab wo dange ka sahara lekar vishw ko aade haath lena chahta hai par kaun success hoga ye dekhna dilchasp hoga ..
shaniya ki ladki aur kuch sharabiyo ke upar ka karz ko lekar panchayat bulayi gayi hai aur sarpanch bhi mila hua hai .
 
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