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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

Kala Nag

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Sidd19

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👉एक सौ अट्ठाइसवां अपडेट
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वीर अपने केबिन में आता है l आज पहली बार था ऑफिस में वह अकेला था l आज विक्रम आया नहीं था l चूंकि विक्रम को भैरव और पिनाक के साथ कलकत्ता जाना था l केबिन में आकर वह अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है l रिसेप्शन से कह कर वह सुपरवाइजर को बुलवाता है l उसी से मालूम होता है कि ऑपरेशन इनचार्ज और इंटेलिजंस इनचार्ज दोनों भी क्षेत्रपाल टीम के साथ कलकत्ता गए हैं, मतलब कुछ भुवनेश्वर में गड़बड़ हुआ तो वीर को प्रॉब्लम सम्भालना मुस्किल हो जाएगा l वीर थोड़ी सोच में पड़ जाता है l तभी वह सुपरवाइजर वीर को एक फाइल देता है l वीर उसे सवालिया नजर से देखता है l

सुपरवाइजर - राजकुमार जी... कल रात को युवराज जाने से पहले यह फाइल आपको देने के लिए कह गए थे.
वीर - (फाइल लेकर) ठीक है.. जाओ तुम यहाँ से..

सुपरवाइजर के जाने के बाद वीर फाइल खोलता है l फाइल में वीर के नाम कंप्यूटर प्रिंटेड एक चिट्ठी था l चिट्ठी हाथ में लिए वीर हैरानी के साथ पढ़ने लगता है

" वीर मेरे भाई
हम भाई से ज्यादा दोस्त बन कर जिए हैं l कभी ऐसा हुआ नहीं है कि मैंने अपनी दिल की हालत तुमसे कहा नहीं या तुमने अपने दिल की हालत मुझसे कहा नहीं l हाँ यह बात और है तुमने कभी अपनी नाराजगी मुझसे छुपाई नहीं और मैं तुमसे कभी नाराज़ हुआ ही नहीं
तुम मेरी तरह पहले प्यार और उसके बाद शादी करना चाहते हो l पर तुम्हारी राह कतई आसान नहीं होने वाली मेरे भाई l मेरे समय में मेरी शादी की बात तक किसीसे चलाई नहीं गई थी l पर यहाँ हालत जुदा है l तुमारी शादी राजा साहब ने सुंदरगड़ के सबसे बड़े इंडस्ट्रीयलीस्ट निर्मल सामल की बेटी से तय कर दिया है, और छोटे राजाजी ने मंजुरी भी दे दी है l इसलिए तुम्हारा रास्ता मुश्किल है, ऐसा मुझे लगता है

मुझे आसार कुछ ठीक लग नहीं रहे हैं l क्यूंकि कभी ऐसा हुआ नहीं है कि हमारे किसी नेगोसिएशन के लिए ऑपरेशन इनचार्ज, कम्युनिकेशन इनचार्ज और इंटेलिजंस इनचार्ज को उनके टीम के साथ बाहर ले जाया जा रहा है l शायद इसीलिए की आउट ऑफ स्टेट यह एक मेगा डील होने वाली है

इसलिये यहाँ पर तुम सावधान रहना l उम्मीद है कि यह सात दिन हमारे सर्विस को कोई प्रॉब्लम नहीं आएगी l बाकी तुम्हारी सिक्स्थ सेंस मुझसे हमेशा आगे रहा है l मेरी बात जानते हो l बड़े राजा जी की बात मैं कभी काट नहीं सकता था l इसलिये मैं जा रहा हूँ l तुम कभी अकेले नहीं रहे पर अब यह हफ्ता दस दिन तुमको अकेले ही संभालना होगा

बस इतना ही l तुमको आगाह करते हुए, तुम्हारा बड़ा भाई l विक्रम

चिट्ठी पढ़ते ही वीर की भंवे सिकुड़ जाते हैं l वह एक गहरी साँस छोड़ते हुए चिट्ठी की मर्म को समझने की कोशिश कर रहा होता है कि उसके टेबल पर पड़ा लैंड लाइन घन घना उठता है l वीर क्रेडल पर से रिसीवर उठाता है

वीर - हैलो.
@ - (मजाकिया लहजे में) हैलो वीर... आई आम बैक...
वीर - तुम...
@ - ओ हो हो... तो पहचान गए...
वीर - (चेहरा सख्त हो जाता है और जबड़े भींच जाती है) तुम... तुमने फोन क्यूँ किया...
@ - वाव... क्या बात है वीर... मेरी आवाज़ से पहचान लिया तुमने... यानी मैं तुम्हारे दिल में हूँ...
वीर - शट अप...
@ - ओ कॉम ऑन वीर... फोन पर आवाज वही लोग पहचान सकते हैं... जो उसके दिल में रहता हो... या तो वह दिलबर हो... या फिर दुश्मन...
वीर - तु मेरा दुश्मन है...
@ - ओलेलेए... मैं तेरा दुश्मन.... अब तु अपनी दिलबर की सोचना शुरू कर दे...
वीर - (गुर्राते हुए) क्या कहा...
@ - मैंने कहा... अब तु अनु के लिए रोने की तैयारी कर ले..
वीर - अनु... अनु ने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा...
@ - बिगाड़ा तो अनु ने नहीं है... पर वह क्या है कि... तुम क्षेत्रपालों को मैं खुश नहीं देख सकता ना... इसलिए अनु का मरना बहुत जरूरी है...
वीर - (चिल्लाते हुए) यु बास्टर्ड.. सामने आ कर बात कर
@ - क्यूँ... आऊँ सामने...
वीर - साले हरामी... छुप कर अपने आप को बड़ा मर्द समझता है...
@ - अरे कहाँ... मैं तो खुद को छोटा मर्द समझता हूँ... बड़े मर्द तो तुम क्षेत्रपाल हो... जो अपने नाम के आड़ में किसी के भी बिस्तर पर चढ़ जाते हो... या किसी को भी अपने बिस्तर पर ले लेते हो...
वीर - (थोड़ा नर्म पड़ते हुए) देखो अनु ऐसी वैसी लड़की नहीं है... वह.. वह बहुत अच्छी है...
@ - हाँ जानता हूँ...
वीर - उसे कुछ मत करो प्लीज...
@ - अब तुम इतना गिड़गिड़ा रहे हो... तो मैं अनु को बहुत जल्द तुम्हारी आँखों के सामने ही मार दूँगा... वादा रहा... (फोन कट चुका था)
वीर - हैलो.. हेलो... यु बास्टर्ड... हैलो...

फोन से कुं कुं की आवाज़ आ रही थी l वीर क्रेडल पर रिसीवर को पटक देता है और तुरंत अपना मोबाइल निकाल कर अनु को कॉल लगाता है l फोन बजती रहती है पर अनु फोन नहीं उठा रही थी l फोन कट जाती है पर अनु फोन नहीं उठाती l वीर फिर से कॉल करता है l इसबार अनु फोन उठाती है

अनु - हैलो.
वीर - कहाँ हो तुम..
अनु - आप ही ने तो गाड़ी भेजा था... अभी ऑफिस के कैम्पस में पहुँची हूँ..
वीर - तो तुमने फोन क्यूँ नहीं उठाया..
अनु - वह फोन पर्स में थी..
वीर - ठीक है... जल्दी मेरे केबिन में आओ..

अनु फोन काट कर वीर के केबिन में पहुँचती है l जैसे ही अनु अंदर आती है वीर उसके पास पहुँच कर उसे खिंच कर अपने सीने से लगा लेता है और बड़ी आवेग से अनु को अपने सीने में भींच लेता है l थोड़ी देर बाद अनु को खुद से अलग करता है l अनु उसे हैरानी भरे नजरों से देखती है l वीर झेंप कर अपनी नजर दुसरी ओर कर लेता है

अनु - क्या हुआ..
वीर - क्या.. क्या हुआ... कुछ नहीं... क्या होगा....
अनु - आज आपको क्या हो गया है...
वीर - तुम्हें क्यूँ लग रहा है... मुझे कुछ हो गया है...
अनु - आप खुद से पूछिये... रोज खुद बाहें फैला देते थे... मैं आपके बाहों में समा जाती थी... पर आज आपने मुझे मेरे समझने से पहले ही बाहों में ले लिया... कितना आवेग भरा आलिंगन था...

वीर कुछ नहीं कहता है l मुड़ कर सीधे अपनी कुर्सी की ओर जाता है और वहाँ पर बैठ जाता है l अनु उसके टेबल के सामने आ कर खड़ी होती है और वीर की आँखों में झांकने की कोशिश करती है

वीर - (मस्ती में, गाते हुए
ऐसे ना मुझे तुम देखो सीने से लगा लूँगा...
तुमको मैं चुरा लूँगा तुमसे दिल में बसा लूँगा...
अनु - झूठे...
वीर - (सीरियस हो कर) क्या झूठ बोला तुमसे...
अनु - अगर बताना नहीं चाहते तो मत बताइए... मैं आपको ऐसे डरते हुए नहीं देख सकती... (वीर इस बार अनु की आँखों में देखने लगता है) आप ज़रूर किसी बात से डर गए हैं... बोलिए ना... किस बात से डर गए...

वीर थोड़ी देर के लिए किसी बुत की तरह स्तब्ध रह जाता है, एक गहरी साँस छोड़ते हुए अपना सिर हिला कर इशारे से अपने पास बुलाता है l अनु वीर के पास आकर खड़ी होती है l वीर अनु की हाथ पकड़ कर अनु को अपने गोद में बिठाता है और अपना सिर अनु के सीने पर रख देता है l अनु भी वीर के सिर को अपने सीने से लगा कर वीर की सिर पर अपना सिर रख देती है

वीर - अनु... मैं सिर्फ कहने के लिए राज कुमार हूँ... रईसी को जीता हूँ... पर असल में... यह मेरी बदनसीबी है... क्यूंकि मैं हमेशा अपनी कार की खिड़की से झाँक कर बाहर की दुनिया यानी तुम लोगों की दुनिया को देखा करता था... तुम लोगों की दुनिया में... हर खुशी... हर एहसास.. हर बात... हर ज़ज्बात... मेरी दुनिया के मुकाबले असली लगती थी... मुझे यह बार बार एहसास होता था... के तुम्हारी दुनिया में... मेरी खोखली दुनिया से... बेहतर कुछ तो है... मुझे जलन होती थी... तुम्हारी दुनिया से... धीरे धीरे वह जलन... नफ़रत में बदल गई... इसलिए जो मन में आता था... उसे नफरत की बैसाखी के सहारे दुनिया के उपर अपनी दिल की भड़ास उतारता था... उससे मुझे कोई खुशी भले ही ना मिलता हो... पर मेरी जलन को.. मेरे अंदर की नफरत को सुकून मिलता था.
ऐसे में एक दिन तुम मुझे मिली... मेरी सांसो में... एहसासों में... दिल में... मेरी रूह में उतरती चली गई... मैं खुद को अब दुनिया से बेहतर समझने लगा... तुम्हारा मेरे पास होने से... मुझे हमेशा लगने लगा कि... मेरी दुनिया अब उन लोगों की दुनिया से बेहतर लगने लगी... साथ साथ यह भी महसुस होने लगी... के तुम्हारे दुनिया के लोगों को... मुझसे जलन हो रही है... तुमको मुझसे छीनने की साजिश करने लगे हैं... मेरी दुनिया के लोग भी... तुम्हारी दुनिया के लोग भी... मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता... क्यूंकि मेरी दुनिया... मेरी सोच... मेरी नजर... सिर्फ तुममें... तुम्हारे आसपास.. तुम्हारे इर्दगिर्द सिमट चुका है... इसलिए अब मैं डरा डरा सा रहता हूँ... हर किसी पर शक करने लगा हूँ..

वीर बड़ी ईमानदारी के साथ अपनी जज्बातों को अनु के सामने जाहिर कर रहा था l वीर के हर एक शब्द अनु के दिल में शहद की तरह उतर रही थी l वह अंदर से थर्रा जा रही थी, वह खुशी के मारे वीर को अपने सीने में भींच रही थी

वीर - अनु.
अनु - हूँ...
वीर - कुछ कहोगी नहीं..
अनु - क्या कहूँ..
वीर - मुझे तुमसे... एक भी पल की दूरी बर्दास्त नहीं होती..
अनु - राजकुमार जी..
वीर - हूँ..
अनु - क्या आपको... इस बात का डर है... के मैं आपसे खो जाऊँगी.. या छिन जाऊँगी..
वीर - (अपना मुहँ को अनु के सीने में अंदर की ओर करते हुए हाँ में सिर हिलाता है
अनु - राजकुमार जी... मैं आपकी हूँ... आपकी ही हूँ... आप जैसे हैं... मुझे आप बहुत पसंद हैं... इतना की आपकी खुशी के लिए... अपनी वज़ूद तक मिटा सकती हूँ... (वीर की चेहरे को अपने सीने से अलग कर अपने चेहरे के सामने लाती है) मुझे आपसे... आप ही अलग कर सकते हैं... दुनिया की कोई ताकत मुझे आपसे अलग नहीं कर सकती... और अगर कभी ऐसा हुआ भी... तो वादा करती हूँ... आह तक नहीं करुँगी..
वीर - (अनु की हाथों को अपने चेहरे से हटाते हुए) है... यह तुने कैसे सोच लिया... मैं तुझको... खुद से अलग करूँगा... जी नहीं पाऊँगा..
अनु - तो फिर आप डर किससे रहे हैं..
वीर - (अनु की हाथ को अपने हाथ में लेकर चूमते हुए) अपनी किस्मत से.... मुझे तेरी कसम है अनु... कोई तुझे मुझसे अलग करने की कोशिश भी की... तो वह वीर का वह रुप देखेगा... जो उसकी रूह तक को... कपा जाएगा... मौत से दुआ मांगेगा... अपने साथ ले जाने के लिए... जिंदगी उसकी इतनी खौफनाक बना दूँगा..

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"तो क्या करने का सोचा है तुने"

यह सवाल था वैदेही का उसके दुकान में नास्ता करने आए विश्व से पूछा था l विश्व वैदेही की सवाल को अनसुना कर नास्ता खा रहा था


वैदेही - तु सुन भी रहा है... क्या पुछ रही हूँ.
विश्व - वाह दीदी... क्या पुड़ी सब्जी बनाया है... तुम्हारे हाथ में तो जादू है... क्या बढ़िया खाना बनाया है तुमने... उम्म्म्... उँगलियाँ चाटने से भी... स्वाद नहीं छूट रहा..
वैदेही - (गुस्से में मुस्कराते हुए) ले और थोड़ा सब्जी ले... (कह कर चूल्हे से सब्जी वाली कढ़ाई उठा कर विश्व की प्लेट में थोड़ी सब्जी डाल देती है
टीलु - यह क्या दीदी... मैं भी बैठा हूँ यहाँ... भाई तो मुझे कम प्यार करता है... तुम भी..
वैदेही - वह क्यूँ तुझसे कम प्यार करने लगा...
टीलु - हाँ दीदी... कल मुझे घर में काम में फ़ंसा कर यशपुर चले गए थे...
वैदेही - अच्छा तुझे भी प्यार चाहए... ले फिर... (टीलु के प्लेट पर सब्जी डालते हुए)

विश्व और टीलु पुड़ी सब्जी खाने लगते हैं l अचानक टीलु आह आह कर चिल्लाने लगता है l पर विश्व बड़ी चाव से खाना खा रहा था l उसे ऐसे आराम से खाते देख वैदेही हैरानी से विश्व को देखने लगती है

वैदेही - (तुझे विश्व से) तुझे तीखा नहीं लग रहा... मैंने बाद में... दुबारा जान बुझ कर मुट्ठी भर मिर्च डाल दिया था..
विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम्हारे हाथों में... जहर भी अमृत बन जाए... मैंने देख लिया था... तुम को गुस्से में मिर्च डालते हुए... यह तो सिर्फ मिर्च है...
टीलु - आह आह... ओह.. उह... दीदी... चीनी.. चीनी...

वैदेही जैसे ही चीनी की कप वहाँ रखती है टीलु झपट कर कप को अपने मुहँ में उड़ेल देता है l वैदेही टीलु से माफी मांगते हुए कहती

वैदेही - माफ करना टीलु.. मैं तो विशु को यह एहसास दिलाना चाहती थी... के मैं उससे नाराज हूँ... मेरी बात का ना जवाब दे रहा है... ना ही मेरी सुन रहा है... सॉरी.. हाँ..
टीलु - ऐसा ना कहो दीदी... स्वाद तो बहुत था खाने में... पर यह दुसरी बार जब डलवाया... तो नानी याद आ रही है....
गौरी - कोई ना मेरे बच्चे... जब खाना ख़तम हो जाए... तो मुहँ में और थोड़ी चीनी उड़ेल लेना...
टीलु - आह... चुप कर बुढ़िया...
गौरी - नाशपिटे तेरी नानी बन कर दिलासा दे रही थी...
टीलु - दिलासा के बदले चीनी दे देती... तो नानी दादी सब कह देता...
गौरी - चुप... नासपिटे...

विश्व अपना खाना ख़तम कर हाथ धोने चला जाता है l टीलु भी उसके पीछे पीछे उठ कर चला जाता है l विश्व के साथ साथ अपना हाथ मुहँ धो कर दोनों वैदेही के पास आते हैं l वैदेही मुहँ फुला कर मुहँ फ़ेर लेती है l विश्व मुस्कराते हुए वैदेही की आँचल से अपना हाथ और मुहँ पोंछता है l विश्व के बाद टीलु भी वही दोहराता है l विश्व एक कुर्सी खिंच कर वैदेही के सामने बैठ जाता है

विश्व - दीदी... गुस्सा थूक दो ना
वैदेही - क्यों..
विश्व - गैरों के लिए... अपनों पर गुस्सा करना ठीक है क्या...
वैदेही - गैर... किन्हें गैर कह रहा है तु..
विश्व - वही... जिनके लिए... तुम अपने भाई पर मुहँ फुलाए हुए हो..
वैदेही - (थोड़ी इमोशनल हो कर, विश्व की हाथ पकड़ कर) वे सब हमारे आसपास पड़ोस वाले ही नहीं... हमारे गाँव वाले हैं... तेरे दिल में... क्या उनके लिए कोई दर्द नहीं है..
विश्व - (गंभीर हो कर) नहीं..
वैदेही - (विश्व की हाथ झिड़क देती है) इतने दिन तु गाँव से दुर क्या रहा... तु इतना बेदर्द... निर्मोही कैसे हो गया..
विश्व - किसी से मोह... किसी के लिए दर्द... जिंदा लोगों के लिए पाला जाता है दीदी... मुर्दों के लिए नहीं..
वैदेही - ठीक है... इन गाँव वालों के लिए ना सही... पर उन बच्चों की तो सोच... जिनका तु मामा बना बैठा है..
विश्व - दीदी... इन बे ग़ैरत गाँव वालों के लिए... बहुत सोच रही हो तुम... इतने सालों में... तुमने हर घर की चौखट में जाकर... शनिया और उसके जैसों के मुहँ पर पैसे मार मार कर... कितने घरों की इज़्ज़त पर दाग लगने से बचाया है... बदले में किसीसे पैसे वापस भी नहीं लिये... यहाँ तुम्हारे दुकान पर जो नास्ता खा कर भी पैसे देने लायक नहीं थे... फिर भी उन सबकी घर की लाज बचाया है... पर बदले में क्या मिला... मौका पाते ही... तुम्हारे नाम पर... तुम्हारे ही मुहँ पर फब्तीयाँ कसते हैं..
वैदेही - तो तु उन सब बातों का इस वक़्त बदला ले रहा है..
विश्व - हाँ... ऐसा सोच सकती हो... मेरे गुरु ने कहा था... मदत उसीकी करो... जो मदत मांगे... बिन मांगे किसी को कुछ भी दो... वह उस चीज़ की कदर नहीं करते... जैसे की तुम्हारा... तुमने उन सबकी इतने मदत किए... क्या कदर कर रहे हैं यह लोग...
वैदेही - जो भी हैं... जैसे भी हैं... वे सब हमारे अपने हैं... कोई बहन है... कोई भाई है... कोई मौसा है.. कई मौसी.. कई काका काकी...
विश्व - हाँ हाँ... कोई चाचा... कोई चाची... सब हैं तुम्हारे... पर जैसे ही भैरव सिंह का हुकुम आया... मेरे हुक्का पानी बंद करने की... सब ने तुमसे किनारा कर लिया...
वैदेही - वह लोग डरे हुए हैं...
विश्व - तो... उनका डर उनका अपना है... उन्हें अपने डर से जितना होगा... तब वह अपने किस्मत से लड़ सकेंगे... ना तुम उनके लिए कुछ कर पाओगी... ना ही मैं...
वैदेही - इसका मतलब... तु... परसों पंचायत में नहीं आएगा...
विश्व - नहीं... पंचायत मेरे लिए थोड़ी ना बुलाया गया है..
वैदेही - पर मैं जाऊँगी...
विश्व - ठीक है जाओ फिर...
वैदेही - क्यूँ... तु मेरे साथ नहीं आएगा...
विश्व - दीदी... बात अगर तुम्हारी होती तो मैं कहीं भी जा सकता हूँ.... पर जिनके लिए मेरा हुक्का पानी बंद है... मैं उनके लिए खड़ा नहीं हो सकता...

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कॉलेज की बॅटनीकल गार्डन में छटी गैंग के सदस्य बनानी और तब्बसुम को छोड़ बाकी सभी बैठे हुए हैं

भाश्वती - जिसे देखो सब अपनी अपनी जगह मशगूल हैं.
इतिश्री - कौन कहाँ..
दीप्ति - दुनिया मशगूल है... तो तुझे क्या परेशानी है..
भाश्वती - क्यूँ नहीं होगी... जब से बनानी का राकेश के साथ टांका भीड़ा है... तब से उसकी अटेंडेंस हमारे यहाँ कम हो गई है... और (रुप की ओर इशारा करते हुए) इन मोहतरमा को देखो... जब से ड्राइविंग स्कुल से नैन मक्का हुआ है... तब से हमारे पास हो कर भी... मेरे भैया के ख़यालों में हमेशा खोई रहती हैं..
इतिश्री - इनकी तो ठीक है... पर तब्बसुम कहाँ है..
दीप्ति - वैसे मानना पड़ेगा... जब नंदिनी पहली बार आई थी तब वह मुरझाई मुरझाई या फिर सीरियस रहती थी... अब देखो मन ही मन मुस्करा रही है... हम सब देखो इसके पास बैठे हैं... मगर इसे तो हमारा होश ही नहीं है... अपने में खोई हुई है..
भाश्वती - हाँ यार... देख ना... हम कबसे बतीआ रहे हैं... वह भी इसीके बारे में... पर इस कमबख्त को होश ही नहीं है..
दीप्ति - प्यार का चक्कर है... भाश्वती प्यार का चक्कर है... यह इश्क नहीं आशां बस इतना समझ लीजिए... जिसे यह रोग लग जाये... उसे अंधे बहरे होने से कौन रोक पाए..
इतिश्री - वाह वाह वाह वाह... पर हमारे गैंग में सबसे पहले... तुझे यह रोग लगा था ना... फिर तुने कौनसा एंटी डोड लिया था... के तु प्यार में तो है... पर अंधी बहरी नहीं है..
भाश्वती - ओवर डोज इतिश्री ओवर डोज... प्यार का ओवर डोज..

तीनों लड़कियाँ हँसने लगती हैं l पर इन सब बातों का रुप पर कोई असर नहीं पड़ता l वह इनके पास होते हुए भी अपने में खोई हुई थी l तभी तब्बसुम पार्क में आती है

तब्बसुम - हैलो दोस्तों.
सब - हाय..
तब्बसुम - हे नंदिनी..
सब - श्श्श्श्श्..
तब्बसुम - क्या हुआ..
इतिश्री - यह बेचारी..
भाश्वती - दिल से हारी..
दीप्ति - प्यार की मारी..
इतिश्री - राज दुलारी..
भाश्वती - कर रही है, मेरी भाभी बनने की तैयारी... (सब हँस देते हैं
तब्बसुम - तो अभी इसे होश में लाना है जरूरी.
सब - क्यूँ...
तब्बसुम - यह और (भाश्वती से) तेरे भाई ने मिलकर मेरी वाट लगा दी है...
भाश्वती - क्या...
तब्बसुम - हाँ... (रुप को हिलाती है) ऐ नंदिनी...
रुप - (चौंक कर जागते हुए) क्या... क्या हुआ...
भाश्वती - हमने कुछ नहीं किया...
दीप्ति - हाँ... तेरी प्रताप के साथ हसीन सफर वाली गाड़ी को... तब्बसुम ने ठोक दिया...

रुप बुरी तरह झेंप जाती है l शर्माते हुए अपनी किताबें चेहरे के सामने ले जाती है l तब्बसुम तेजी से किताबों को उसके हाथ से ले लेती है

रुप - किताबें क्यूँ ले ली तुमने..
दीप्ति - हाय कितने लाल लाल गाल हैं... उफ़ उस पर यह शर्म की रंगत... लड़का होती... तो कसम से.. चबा कर खा गई होती...
भाश्वती - इसीलिए तो तो लड़की है... (एक गहरी साँस छोडकर) इन एप्पल जैसे गालों को तो मेरा भाई चबा कर खाएगा...
तब्बसुम - ओ हो... बंद करो यह मज़ाक...
दीप्ति - ऐ... तेरी क्यूँ जल रही है... मज़ाक तो हम
इतिश्री, दीप्ति और भाश्वती - राजकुमारी के साथ कर रहे हैं...
रुप - ऐ... खबर दार जो मुझे राजकुमारी कहा तो...
तब्बसुम - प्लीज... तुम लोग थोड़े शांत रहोगे... नंदिनी... तुमने और प्रताप ने यह क्या किया...
रुप - क्या... हमने क्या किया...

तब्बसुम एक काग़ज़ निकाल कर रुप को दिखाती है l उसमें लिखा था 'सब ए मुशायरा', तारीख xxxx देर शाम xxxx बजे

रुप - इसमें... मेरा क्या वास्ता..
तब्बसुम - अबु ने कहा... यह आइडिया... उन्हें प्रताप ने दिया था... उस दिन जो तुम दोनों मुझे ढूंढते हुए... खुर्दा आए थे....
रुप - व्हाट... तु शायद भूल रही है... उस दिन सिर्फ प्रताप ही... रहमान अंकल से बात कर रहे थे... मैं तो सारा वक़्त तुम्हारे साथ थी... क्या यह प्रोग्राम प्रताप ओर्गानाइज कर रहा है...
तब्बसुम - नहीं... पर प्रताप ने अबु को सलाह दी है कि... इस मुशायरे में... मुझे हर हाल में... पार्टीसिपेट करना चाहिए...
भाश्वती - यानी प्रताप भैया को भी मालुम है... तु चिल्लर छाप शायरी करती है... (रुप को छोड़ सब हँसने लगते हैं)
तब्बसुम - (बिदक कर) शटअप..
रुप - देख तेरे अबु कोई छोटे बच्चे तो नहीं हैं... और... प्रताप ने कुछ सुझाये हैं तो... बात कुछ गहरी ही होगी... मत भूलो... प्रताप.. एक एडवोकेट भी हैं... एडवाइज भी देते रहते हैं... और मैं तो सलाह दूँगी के तु हिस्सा ले... क्यूंकि ना सिर्फ यह टैलेंट हंट है... बल्कि देख इनाम भी बहुत तगड़ा है...
तब्बसुम - यही तो वज़ह है... की मैं बहुत नर्वस हूँ... जैसे मैं कोई मुशायरा में सामिल होने नहीं जा रही हूँ... बल्कि कौन बनेगा करोड़पति में हिस्सा लेने जा रही हूँ...
इतिश्री - वाव... तब तो बहुत मज़ा आयेगा...
तब्बसुम - क्या मजा आयेगा... वह मुशायरे का दिन जितना करीब आता जाएगा... मेरी तो हालात खराब होती जाएगी...
दीप्ति - कोई नहीं... हम सब उस दिन तेरा परफॉर्मेंस देखने आयेंगे...
भाश्वती - ना ना... स्मॉल करेक्शन... उस रात...

सभी तब्बसुम को उस मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए कहते हैं l चूँकि यह एक टैलेंट हंट था और इनाम भी बहुत जबरदस्त था l इतने में बनानी गार्डन में आती है और इनके पास आकर बैठ जाती है

बनानी - किस बात पर बहस चल रही है... (सब चुप हो जाते हैं
भाश्वती - ऐ तु हमारे बीच में मत पड़... तुझे जो पूछना है वह सब नंदिनी से पूछ...
बनानी - क्यूँ...
इतिश्री - यह बता... राकेश ने तुझे कितने बजे छोड़ा..
बनानी - अभी अभी... (फिर चौंक कर) क्या... क्या कहा... वह मैं बस से आई... बस थोड़ी लेट थी...
दीप्ति - ऐ चल चल... हमसे बात छुपा रही है... जबकि पुरे ब्रह्मांड को पता है... रॉकी ने नई नई गाड़ी तेरे लिए ही ली है... रोज तेरा ड्राइवर बन कर तुझे छोड़ने और ले जाने का काम करता है...
बनानी - ऐ खबर दार जो राकेश को ड्राइवर कहा...
भाश्वती - मतलब... तुझे रॉकी ने यहाँ छोड़ कर गया है...
बनानी - (मुहँ बनाते हुए)हाँ...
रुप - जैसा कि दीप्ति ने कहा... जब पुरे ब्रह्मांड को पता है... तो छुपाती क्यूँ है...
बनानी - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) अरे... ऐसी बातों को छुपाने में भी अपना मजा है...
भाश्वती - वाह वाह वाह वाह... मुझे लगता है.. बनानी को भी... मुशायरे में एक बार ट्राय करनी चाहिए...
बनानी - मुशायरा... कैसा मुशायरा...

भाश्वती उसे सब बातेँ बताती है l सब सुन कर बनानी भी तब्बसुम से हिस्सा लेने के लिए कहती है l फिर अचानक अपने सिर पर हाथ मारते हु

बनानी - ऑफ ओ... मैं क्या कहने आई थी... बातों बातों में भूल गई..
रुप - क्या हुआ... क्या भूल गई...
बनानी - अरे हाँ... वह भाश्वती की... विंटेज फिएट की... लगता है बहुत डिमांड है...
भाश्वती - क्या मतलब...
बनानी - अब कार पार्किंग में... ठीक भाश्वती की कार के बगल में... राकेश ने अपनी गाड़ी पार्क की... एज यु ऑल नो... राकेश की गाड़ी नई है... पर मजे की बात जानते हो... कुछ देर बाद... चार पाँच बंदे आए... वह सब... राकेश की कार के बजाय भाश्वती की कार को देखने लगे...
इतिश्री - क्या...
बनानी - हाँ... जानते हो... इस बात पर राकेश को थोड़ा जलन भी हुई...
दीप्ति - हाँ हाँ क्यूँ नहीं... भाश्वती की गाड़ी फिएट पद्मिनी जो है... एकदम एंटीक...

सब हँसने लगते हैं पर रुप नहीं हँसती l वह थोड़ी सोच में पड़ जाती है और अपनी छटी गैंग से "एक्स क्युज मी... तुम लोग क्लास चलो मैं वॉशरुम हो कर आई" कह कर वहाँ से निकल जाती है

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विश्व एक कुर्सी पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था l कमरे में विश्व अकेला ही था l कुछ देर बाद टीलु अपना मुहँ लटकाये अंदर आता है l विश्व उसे देखता है और पूछता

विश्व - क्या हुआ... तुम्हारा मुहँ यूँ क्यूँ उतरा हुआ है..
टीलु - (उसके पास बैठ कर) आज दीदी का मन तुम्हारे वज़ह से दुखा है...
विश्व - (थोडे खामोशी के साथ टीलु को देखता है फिर) वह मेरी दीदी है... मेरी माँ है... उसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ... रही उसे दुख पहुँचाने की बात... तो उसके लिए मुझे कोई अफ़सोस नहीं है... (कह कर अखबार पढ़ना चालू करता है)
टीलु - भाई वैसे दीदी ने क्या गलत कहा...
विश्व - अब तुम मुझसे इस बात पर बहस करना चाहते हो...
टीलु - बहस नहीं... तुमको समझना चाहता हूँ...
विश्व - क्यूँ... तुम्हें लगता है मैं गलत हूँ...
टीलु - नहीं... नहीं तुम गलत नहीं हो सकते... पर दीदी भी कहाँ गलत है...
विश्व - (अखबार एक किनारे रख देता है) याद है... इसी घर के बाहर... एक रात हमें मारने कुछ लोग आए थे...
टीलु - हाँ...
विश्व - अब यह वही लोग हैं... जो लोगों के बीच में घुल कर हमारे लिए... पत्ते बिछा रहे हैं...
टीलु - (हैरानी के साथ) क्या... (फिर उसे कुछ याद आता है) हाँ हाँ... तुमने कहा था... दुसरा हमला... यह लोग... भीड़ के आड़ में करेंगे... मतलब...
विश्व - (मुस्कराता है)
टीलु - पर भाई... यह बात दीदी को समझ में क्यूँ नहीं आ रही...
विश्व - याद है... तुम्हीं कहा करते हो... मेरी दीदी साक्षात अन्नपूर्णा है...
टीलु - हाँ...
विश्व - तो इस गाँव के हर चौखट में पलने वाली जिंदगी के लिए फिक्र तो करेगी ही...
टीलु - इसका मतलब वह पंचायत के सभा में जाएगी...
विश्व - बेशक जाएगी....
टीलु - ओह... कहीं दीदी पर कोई खतरा तो नहीं...
विश्व - देखो टीलु... उन लोगों को अच्छी तरह से मालूम है... चूंकि मेरा हुक्का पानी बंद है... इसलिए गाँव वाले मुझसे तो मदत पूछेंगे नहीं... गाँव के हर बच्चे बूढ़े को मालुम है... जहां औरत... छोटे बच्चे आयेंगे... मेरी दीदी वहाँ कुदेगी... और मेरी दीदी जहां पर होगी... मैं वहाँ पर होउंगा ही...
टीलु - मतलब तुम दोनों पर हमला हो सकता है....
विश्व - यह कोई छोटी प्लान नहीं है... किसी शातिर का दिमाग होगा इसके पीछे...


यह सब सुनने के बाद टीलु का सिर चकरा जाता है l वह कुछ सोचता है फिर वह रसोई में घुस कर कुछ ढूंढने लगता है l कुछ बर्तन गिरने की आवाज से विश्व का ध्यान रसोई के तरफ जाता है l टीलु बाहर आता है और विश्व को देखे वगैर बाहर चला जाता है l विश्व थोड़ा हैरान होता है और अपने भवें सिकुड़ कर कुछ सोचने लगता है और थोड़ी देर बाद खुदको नॉर्मल कर फिर से अखबार उठा कर पढ़ने लगता है l तभी विश्व की मोबाइल पर रिंग बजने लगती है l विश्व स्क्रीन पर नकचढ़ी देखता है l मुस्कराते हुए विश्व फोन उठाता है

विश्व - (छेड़ने के अंदाज में) हैलो
रुप - (थोड़ी सीरियसनेस के साथ) कहाँ हो..
विश्व - (उसी शरारती अंदाज में) आप ही बताइए... मुझे कहाँ होना चाहिए..
रुप - एक बात पूछूं..
विश्व - सिर्फ एक बात... सौ पूछिये..
रुप - तुम मुझे हमेशा... भाश्वती की गाड़ी लेकर आने के लिए क्यूँ कहते थे..
विश्व - (रुप की आवाज में उसे सीरियसनेस का अनुभव होता है) क्या हुआ...
रुप - मुझे पहले यह बताओ... तुम जब भी मुझे मिलने बुलाते थे... भाश्वती की गाड़ी में आने के लिए क्यूँ कहते थे...
विश्व - ताकि आप किसी की नजरों ना आयें... वर्ना आपका मुझसे मिलना... आपके परिवार वालों को पता चल जाता... क्यूँ क्या हुआ...
रुप - पता नहीं पर... मुझे लगता है... मैं अगर भाभी की गाड़ी में आती... तो शायद ठीक रहता...
विश्व - ऐसा सोचने की कोई वज़ह...
रुप - वज़ह है... वज़ह है... याद है उस कमीने को... जिसकी तुमने किन्नरों से जिल्लत करायी थी...
विश्व - हाँ...
रुप - मुझे लगता है... उसके आदमी... उस गाड़ी का पीछा करते हुए... यहाँ तक पहुँच गए हैं...
विश्व - अच्छा... ऐसा लगने की वज़ह...
रुप - (बनानी की पार्किंग वाली बात कह देती है)
विश्व - ह्म्म्म्म... तो इस बात से डर गई मेरी नकचढ़ी...
रुप - देखो... मैं इस वक़्त मज़ाक के मुड़ में नहीं हूँ... मुझे कुछ हो जाए तो वह मुझे मंजुर है... पर मेरी गलत फहमी में मेरी दोस्त को कुछ हो जाए... यह मुझे कतई मंजुर नहीं...
विश्व - तो नकचढ़ी जी... आप यह क्यूँ भूल रही हैं... भाश्वती आपकी दोस्त है... तो मेरी बहन भी तो है...
रुप - हाँ जानती हूँ... पर पता नहीं क्यूँ... मुझे डर सा महसुस हुआ आज भाश्वती के लिए...
विश्व - ओह देवा... क्या हो गया... मैं जिस नकचढ़ी को जानता हूँ... उसे तो दूसरों को डराते हुए देखा है... यह उल्टी गंगा कैसे बहने लगी...
रुप - देखो... मुझे अभी गुस्सा आ रहा है... तुम मेरी बात का सीरियसनेस को समझ नहीं रहे हो....
विश्व - मैं तो यही चाहता हूँ... के आप जब भी मुझसे बात करें... गुस्से को अपनी नाक पर बिठा कर बातेँ करें... कम से कम मुझे लगे तो सही... के मुझसे बात करने वाली मेरी नकचढ़ी है...


रुप शर्मा कर चुपके से हँस देती है और दुसरे हाथ से अपना चेहरा छुपा लेती है, विश्व को उसकी हरकत का एहसास हो जाता है

विश्व - शब-ए-वस्ल क्या जाने क्या याद आया

वो कुछ आप ही आप शर्मा रहे
रुप - (हैरान हो जाती है) क्या तुम मेरे आस-पास हो...
विश्व - पलकें बंद कर महसुस करो मैं हूँ
आपके ख़यालों में... ख्वाबों में... तसबुर में... एहसासों में... साँसों में...
मैं ही मैं हूँ...
रुप - मैं क्या पुछ रही थी... तुम तो शेरों शायरी ले बैठ गए... अरे हाँ याद आया... पहले यह बताओ... क्या मैं भाश्वती के लिए बेफिक्र हो जाऊँ...
विश्व - बेशक... क्यूंकि जो चीज़ हो या शख्स... आपसे जुड़ी हुई हो... उनकी हिफाजत मेरे जिम्मे.... खैर वह बात बताइए... जो अभी आपको याद आया...
रुप - क्या तुमने रहमान अंकल को तब्बसुम का नाम... मुशायरे के लिए सुझाया था...
विश्व - हाँ...
रुप - क्यूँ...
विश्व - आप उनके दोस्त हैं... पर उनके हुनर की कद्रदान नहीं हैं... जब मुझे उनकी हुनर की जानकारी मिली तो लगे हाथ सलाह दे डाली... तब्बसुम जी को सब ए नज्म मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए....
रुप - हूँह्ह्ह्... बड़े आए.. हुनर पहचानने वाले... किसी की दिल की बातों को समझते भी हो...
विश्व - क्या करूँ... मुझसे पहले दिल की बात किसी और ने समझ ली... हम से तो देर बहुत हो गई... जब भी एहसास पुछा... बस एक ही जवाब आई... इट्स अ गर्ल थिंग...
रुप - ही ही ही... (खिल खिला कर हँस देती है) बेवक़ूफ़...
विश्व - और कुछ... आपकी पेश ए खिदमत में बंदा हाजिर है..
रुप - ठीक है... अब राज कुमारी जी... तुम्हें कल फोन पर सुबह संदेश भेजेंगे... बाय...

कह कर रुप फोन काट देती है l विश्व भी मुस्कुराते हुए फोन रखता है कि अचानक रुप की कही अंतिम शब्द उसके मुहँ पर आ जाते हैं

विश्व - सुबह को संदेश... शुभ संदेश..

विश्व फौरन उठता है और किताब की दुकान से लाए शुभ संदेश किताब निकाल कर अच्छे से जाँच करने लगता है l ज्यों ज्यों पन्ने पर पन्ने पलटने लगते हैं उसकी आँखे चौड़ी होने लगती हैं l वह तुरंत अपनी जगह से उठाता है, एक डायरि और पेन लेकर आता है और हर पन्नों से शब्द छान कर लिखने लगता है l कुछ देर बाद उसके सामने एक बड़ा सा संदेश था l विश्व उसे पढ़ने लगता है

" अगर तुम यह संदेश पढ़ रहे हो, मतलब तुम इससे पहले भी अखबारों में मेरे द्वारा भेजे गए संक्षिप्त संदेशों को पढ़ा होगा l तुम्हारे बारे में मुझे उस दिन मालुम हुआ जिस दिन राजा क्षेत्रपाल के महफ़िल में तुम्हारे बारे में चर्चा हो रही थी l कुछ सरकारी अधिकारी थे जिन्होंने राजा क्षेत्रपाल को यह संदेश दिया के जैल से निकल कर राजगड़ का पुर्व सरपंच विश्व प्रताप महापात्र रुप फाउंडेशन स्कैम पर एसआईटी की तहकीकात पर आरटीआई दाखिल किया है l यह समाचार बहुत से लोगों की आँखों की नींद उड़ा रखी है l तुम अपने जगह सही थे पर तुम्हारे आरटीआई दाख़िल करने से उन्हें अपनी भूल को सुधारने का मौका दे दिया तुमने l पुराने केस पर तुम्हें कामयाबी शायद ही मिले पर अब जितने भी नए आर्थिक अपराध हुए हैं या हो रहे हैं l मैं हर एक अपराध का सबसे अहम और प्रमुख गवाह हूँ l अपराध की हर कहानी मैं तुम्हें बता दूँगा पर साक्ष्य तुम्हें ढूँढना होगा l पर इन सब के लिए हमें एक बार आमने सामने हो कर मिलना होगा l तुम बाकायदा अखबार लाते रहना l मैं तुम्हें संदेश के जरिए ही मिलने का दिन और जगह बताऊँगा
तुम्हारा एक शुभ चिंतक

यह संदेश पढ़ कर विश्व डायरि को बंद करता है l तभी कमरे में टीलु आता है

टीलु - भाई... एक खबर है..

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×


शाम का समय, अखाड़े के एक कोने में शनिया और उसके पट्ठे रेत में भिड़े हुए हैं l सब के सब दाव पर दाव लगाते हुए एक दुसरे को पछाड़ने की कोशिश कर रहे थे l अखाड़े के सामने रोणा अपनी जीप को रोकता है l शनिया मुड़ कर देखता है रोणा जीप से उतर कर उन्हीं के तरफ आ रहा था l रोणा जैसे ही शनिया के सामने खड़ा होता है, शनिया उसे एक जोरदार सलाम टोकता है l रोणा उन सबकी तैयारी देख कर

रोणा - बड़े उतावले लग रहे हो... इस हड्डी तोड़ तैयारी की क्या जरूरत है...
शनिया - दरोगा बाबु... एक बात तो हमें अच्छे से समझ आ गई... दिमाग उसका प्रधान बाबु के जैसा है... ताकत में किसी अड़ियल सांढ के जैसा है... ऐसे दुश्मन से... दिमाग से ही निपटाया जा सकता है... और किसी भी प्रकार से संभलने का मौका देना नहीं चाहिए...
रोणा - ह्म्म्म्म... दुश्मनी बहुत गहरी है... क्यूँ...
शनिया - यह हराम का जना... कुत्ता था... हमारे झुटन पर पलता था... हमारा थूक चाटता था...
रोणा - था... था शनिया था... वह इतिहास है शनिया... अब कि बार उसने तुम सबकी भूगोल बदल कर रख दिया है...
शनिया - मगर इस बार भूगोल उसका बदलेगा... उसे हमेशा हमेशा के लिए इतिहास हम बना देंगे...
रोणा - हूँ... कैसे... क्या करोगे... तुम भुल रहे हो... गाँव में उसका हुक्का पानी बंद है... वह गाँव वालों के झमेले में क्यूँ पड़ेगा...
शनिया - क्या... दरोगा बाबु... बताया तो था आपको... वह भी राजा साहब के सामने...
रोणा - हाँ... तुमने कहा तो है... पर...
शनिया - पर आप पुष्टि कर लेना चाहते हैं... ऐतिहात बरतने के लिए क्यूँ...
रोणा - हाँ... ऐसा समझ सकते हो... फिर भी... तुम लोगों का प्लान क्या है...
शनिया - हमारे पचासों आदमी भीड़ में बिखरे रहेंगे... वह भी हथियारों के साथ...
रोणा - बे भोषड़ी के... तुम लोग ऐसा क्या करोगे के विश्वा बहस में कुदेगा....
शनिया - अरे साब... हम छह सात दिनों से... पत्ते बिछा रहे हैं... विश्वा जब अपने घर में बंद अपने काम में मसरूफ था... हम कर्ज की बात बता कर... सबके घर में मियाँ बीवी के बीच झगड़ा सुलगा चुके थे... कल ही सबके घरों में... कर्ज वाली काग़ज़ और रसीद पहुँचा दिए... और कर्ज माफी के लिए शर्त यह रखा है... की उनके घर की लड़कियों को... हमारे अड्डे पर या घरों पर एक साल तक काम करना होगा...
रोणा - क्या... यह सब भी काग़ज़ों में लिख कर दिए हो...
शनिया - क्या बात कर रहे हैं दरोगा बाबु... ऐसी बेवक़ूफ़ी... वह भी लिखावट में... हमने तो मुहँ जुबानी कह रखा है... जिसे पंचायत में मोहर लगवाएंगे...
विश्व - तो विश्व इस मामले में क्यूँ कर कुदेगा...
शनिया - अरे साब आप तो कभी कभी राजगड़ आते थे... वह भी बुलावे पर... इन कुछ सालों में... वैदेही ही लोगों की छुट मुट खर्च उतार रही थी... और उनको बचा भी रही थी... इस बार भी वैसा ही होगा... वैदेही इन हराम खोरों के लिए पंचायत में हमसे और सरपंच से पक्का लड़ जाएगी... आज भी गाँव के कुछ मर्दों की नजर में वैदेही एक रंडी है... वह लोग नफरत करते हैं वैदेही से... उन लोगों के करीब रह कर मेरे आदमी उनको उकसायेंगे... जैसे ही बहस बढ़ेगी... वैसे ही वैदेही की जिल्लत बढ़ेगी... आखिर भाई है वह... कब तक शांत रहेगा... वह भी मैदान में उतरेगा... तब हम गाँव वालों के तरफ से विश्वा पर हमले के लिए बुलवा देंगे... फिर हर तरफ़ से हथियारों के साथ विश्वा पर टुट पड़ेंगे...
रोणा - ह्म्म्म्म... प्लान तो बढ़िया है... पर हथियार क्यूँ... लाठी डंडो से क्यूँ नहीं...
शनिया - (एक सरसरी भरी साँस छोड़ते हुए) पिछली बार हम समझ गए... इस बार विश्वा को जिंदा नहीं छोड़ना है... आइए दिखाता हूँ...

शनिया अखाड़े के दुसरे किनारे पर रोणा को ले जाता है l रोणा देखता है वहाँ पर एक भट्टी लगा हुआ है जहां कुछ लोहार तरह तरह के हथियार बना रहे हैं l रोणा देखता है दरांती, खुखरी, कुल्हाड़ी, करणी, कुदाल, बेलचा बना रहे हैं l

रोणा - क्या मज़ाक है... तुम विश्वा पर इन से हमला करोगे...
शनिया - हाँ दरोगा बाबु... क्यूंकि आपको रिपोर्ट बनाना है... विश्वा पर हमला गाँव के आम किसानो ने किया... जब लोग इन हथियारों से विश्वा पर टुट पड़ेंगे... तब...

रोणा देखता है शनिया के चेहरे पर शैतानी चमक आ जाती है, शनिया जाकर एक ढाई फिट लंबा तलवार निकालता है l जो भट्टी में जल रही आग की रौशनी से चमक रही थी l

शनिया - यह मैं अपने साथ छुपा कर पंचायत में लेकर जाऊँगा... इसीसे उस हरामजादे को टुकड़ों में काट डालूंगा...
रोणा - नहीं... तुम ऐसा नहीं करोगे...
शनिया - (हैरान हो कर) क्यूँ... ओ समझा... आप उसे गोली मारना चाहते हो...
रोणा - नहीं... तुम्हें वह करना है... जिससे राजा साहब तुम पर बहुत खुश होंगे...
शनिया - अच्छा... राजा साहब विश्वा को जिंदा छोड़ने पर खुश होंगे...
रोणा - जानते हो... मैं भी सात साल पहले विश्वा को गोली मार सकता था... पर मारा नहीं... क्यूंकि राजा साहब चाहते थे... विश्वा जब जैल से छूटे... गली गली रेंगते हुए भीख मांगे... इसलिए उसे जान से मारने के बजाय.. (लहजा बदल जाता है) लंगड़ा लूला टौंटा बना कर छोड़ना.. ताकि वह जिंदगी भर एक जगह बुत की तरह बैठा रहे... हो सके तो उसकी जुबान भी काट देना... पर अंधा मत करना... उसे बहुत कुछ देखना है... मरते दम तक... उसे सिर्फ देखते ही जीना है... ना कुछ कह पाए... ना कुछ कर पाए... सिर्फ देखता रहे... (अचानक एक चुप्पी छा जाती है दोनों के बीच, कुछ देर की चुप्पी के बाद) क्या तुम... तुम्हारे लोग कर पाओगे... विश्वा से उलझ चुके हो तुम लोग... अगर उसने पलटवार किया तो...
शनिया - हाँ दारोगा बाबु हाँ... हम विश्वा के आँखों में मिर्ची झोकेंगे... फिर उसका काम तमाम करेंगे...
रोणा - इतना कुछ सोच रखा है... क्या मेरा वहाँ होना जरूरी है...
शनिया - सरपंच ने कहा था... आपका वहाँ होना... जरूरी है... आप विश्वा को ना सिर्फ पलटवार करने से रोकेंगे... बल्कि उन लोगों को भी रोकेंगे... जो लोग गलती से विश्वा के लिए आगे आयेंगे....
रोणा - ह्म्म्म्म... बहुत खूब... और यह सब तुमने राजा साहब से कही...
शनिया - जी नहीं... यह सब... सरपंच और भीमा ने मिलकर तब कही थी.... जब राजा साहब ने हमारी मार खाने की बात... हमसे ही उगलवा ली थी...
रोणा - ठीक है फिर... परसों मैं पंचायत भवन पहुँच जाऊँगा... तब तक ना तो तुम लोग मुझसे मिलों... ना ही मैं तुम लोगों से मिलूंगा...
शनिया - ठीक है साब... जैसा आप कहें...

रोणा वहाँ से निकल जाता है l शनिया वहाँ खड़ा हो कर रोणा को जाते हुए देख रहा था l तभी उसके पास शुकरा आता है l

शुकरा - क्या बात है शनिया भाई... क्या कह रहा था दरोगा...
शनिया - कुछ नहीं... बोल रहा था... विश्वा को जान से ना मारने के लिए...
शुकरा - क्या... पर क्यूँ...
शनिया - हमें क्या... (शैतानी चमक उसके आँखों में नाचने लगती है) हम तो विश्वा को एक कुत्ते की मौत मारेंगे... उसके इतने टुकड़े करेंगे... के वैदेही बटोरते बटोरते बुढ़ी हो जाएगी... हा हा हा हा...

उधर रोणा की जीप उसके क्वार्टर के सामने रुकती है l वह उतर कर अपने क्वार्टर के दरवाजे के सामने खड़ा होता है l जेब से सिगरेट पैकेट निकाल कर एक सिगरेट मुहँ में लेकर लाइटर ढूंढता जलाने के लिए पर उसे लाइटर नहीं मिलता तो चिढ़ कर सिगरेट जेब में वापस रख देता है l फिर क्वार्टर का दरवाजा खोल कर अंदर आता है l अंदर आते ही लाइट जलाता है उसके बाद कॉबोर्ड से एक शराब की बोतल निकलता है और ढक्कन खोल कर सीधे गटकने लगता है l आधी बोतल ख़तम करने के बाद बोतल डायनिंग टेबल पर रख देता है l उसे डायनिंग टेबल पर लाइटर दिख जाती है l वह जेब से सिगरेट निकाल कर लाइटर से जलाता है l कुछ कस खिंचने के बाद एक शैतानी मुस्कान उसके होंठो पर नाचने लगती है l वह सोफ़े के पास आता है और टी पोए के उपर से चादर खिंच कर हटाता है और अपना सिगरेट को टी पोए पर मसलने वाला होता है कि रुक जाता है l क्यूंकि कल तक उस टी पोए के सन माइका पर विश्व का फोटो था, पर आज उसका फोटो है l यह देख कर उसका नशा उतर जाता है l वह सिगरेट की आँच को अपने हाथ पर लगाता है l

'आह' उसके मुहँ से निकल जाता है l उसे समझ में आता है ना तो वह नींद में है ना ही नशे में l ठीक उसी वक़्त उसके कानों में आवाज पड़ती है
"कैसे हो मेरे राजा"
वह तुरंत उस आवाज के दिशा में मुड़ जाता है l देखता है टीवी पर उस किन्नर की चलती वीडियो पॉज हुआ प़डा है l बड़ी मुश्किल से अपना थूक निगलता है l उसके मुहँ से निकल जाता है

- विश्वा...
विश्व - वाव वाव... क्या बात है... मैं यहाँ हूँ... तुने पता कर लिया...
रोणा - (होलस्टर से गन निकाल कर विश्व पर तानते हुए) यहाँ क्यूँ आए हो...
विश्व - जानता है... किसी की मौजूदगी का यूँ एहसास कौन कर लेता है... या तो वह दिलबर हो... या फिर दुश्मन...
रोणा - मैं तेरा दुश्मन...
विश्व - क्या दुश्मन... चल हट... तु कभी किसीके प्यार की काबिल हो नहीं सकता... और दुश्मनी की लायक है नहीं... पर क्या करें... कुत्ता पागल हो जाए... तो किया क्या जा सकता है...
रोणा - क्या करने आए हो...
विश्व - गन हटा बे... (रोणा गन को विश्व के चेहरे पर ले आता है, तभी उसके कानों में फिर सुनाई देता है "कैसा है मेरे राजा" l यह सुनते ही रोणा गन को नीचे कर लेता है) सुन बे घन चक्कर... जब तु भुवनेश्वर में ही मुझ पर गोली नहीं चला सका... तो यहाँ क्या उखाड़ लेगा बे...
रोणा - तु मुझे ब्लैक मेल कर बड़ा मर्द बन रहा है... इस वीडियो के आड़ में... वर्ना...
विश्व - हाँ वर्ना... वर्ना क्या... तु तो बड़ा मर्द है ना...सुन बे भोषड़ी वाले... तेरे बदन पर वर्दी और सिर पर क्षेत्रपाल का हाथ के आड़ में तुने बड़े मर्दाना काम किया है... है ना... कभी यह वर्दी उतार कर... क्षेत्रपाल का ढाल छोड़ कर... किसी आम आदमी से भीड़ के देख... यकीन मान.. जितनी भी मर्द होने की गुमान है... वह एक पल में दुर हो जाएगी... (रोणा फिर से गन तान देता है) यह बार बार क्या ड्रामा कर रहा है बे... इसे सीने पर खाने के लिए जो जिगर चाहिए... वह मेरे अंदर है... पर इसे चलाने के लिए जो कलेजा चाहिए... वह कलेजा दुर... तुझमें दिल गुर्दा फेफड़ा तक नहीं है... तु खोखला है अंदर से... अगर तुझ में जिगर होता... तो तु मेरी तस्वीर को सिगरेट से जलाने के लिए... चादर के नीचे ढक कर नहीं रखता... (अखबार निकाल कर उसे देते हुए) यह ले इसे पहले पढ़...

रोणा उस पेपर में देखता है कि नभ वाणी न्यूज चैनल वालों ने इनाम की घोषणा उन के लिए की है जो भी ट्रैफ़िक पर हुए किन्नर समावेश में हुए उस आदमी के बारे में सटीक जानकारी देगा l यह न्यूज देख कर रोणा पुरा का पुरा पसीना पसीना हो जाता है l उसके हाथ पैर कांपने लगते हैं l

विश्व - जरा सोच यह खबर जब टेलीकास्ट होगी... तब पुरे ब्रह्मांड को तेरे विषय में मालुम पड़ेगा... कितना फेमस हो जाएगा...
रोणा - (गले से मुश्किल से आवाज़ निकालते हुए) क्यूँ आए हो यहाँ... क्या.. क्या चाहते हो मुझसे...
विश्व - बस इतना.. तु.. या तेरे थाने का कोई भी... पंचायत भवन तो दुर... उसके आसपास नजर नहीं आने चाहिए... (रोणा की आंखे फैल जाते हैं) हाँ कुत्ते हाँ... तु या तेरे कोई भी आदमी मुझे उस दिन पंचायत भवन में नजर नहीं आने चाहिए... और सुन जब तक तु मेरे बातों पर चलता रहेगा... तेरे राज... राज ही रहेंगे... जिस दिन तुने अपनी कुत्ता गिरी के चलते मुझ पर भौंकने की कोशिश भी की... उसी दिन पुरी दुनिया के सामने... तेरा राज खुल जाएगी...
रोणा - सरपंच ने... लिखित में... पुलिस की मौजूदगी मांगी है...
विश्व - फिर भी तु या तेरे थाने का कोई मुझे वहाँ पर दिखने नहीं चाहिए...

कह कर विश्व टीवी के पास जाता है और पीछे से पेन ड्राइव निकाल कर चला जाता है l विश्व के जाने के बाद रोणा धप कर सोफ़े पर बैठ जाता है l

रोणा - एक मौका... सिर्फ एक मौका... तुझे अगर इन राजगड़ के गालियों में पेट के बल रेंगने को और मौत मांगने को मजबूर ना कर दिया... तो मेरा नाम अनिकेत रोणा नहीं....


तभी उसका मोबाइल बजने लगती है l वह निरस मन से मोबाइल निकाल कर देखता है स्क्रीन पर टोनी डिस्प्ले हो रहा था l टोनी का नाम देख कर उसके आँखों में एक चमक उभर जाती है l वह झट से कॉल उठाता है l

रोणा - हैलो...
टोनी - रोणा सर...
रोणा - हाँ क्या खबर निकाला तुमने...
टोनी - आपने जिस गाड़ी की मॉडल और नंबर दिया था... उस गाड़ी का पता चल गया है... पर
रोणा - पर क्या...
टोनी - वह गाड़ी जिस लड़की का है... उसका नाम नंदिनी नहीं है... बल्कि भाश्वती है... और वह xxxx कॉलेज में साईंस फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट है... और भाश्वती वह लड़की नहीं है... जिसकी फोटो आपने मुझे दी थी...
रोणा - (चिल्लाते हुए) क्या बकते हो... (उठ खड़ा होता है)
टोनी - सच कह रहा हूँ रोणा बाबु...
रोणा - तो उस लड़की की बहन या कोई रिश्तेदार भी तो हो सकती है...
टोनी - जी मैंने... सब छान लिया है... भाश्वती के माँ के नाम पर वह गाड़ी है... वह अपनी माँ बाप की इकलौती बेटी है... हमने सोचा शायद नंदिनी भी उसी कॉलेज में पढ़ती हो... पर नंदिनी की फोटो कॉलेज में किसी ने भी नहीं पहचाना...
रोणा - (गुस्से से पुरा जिस्म थर्राने लगता है, बड़ी मुश्किल से पूछता है) ह्म्म्म्म... और...
टोनी - वह... मेरे नए आइडेंटिटी के बारे में...
रोणा - सुन बे हरामी... जिस दिन उस लड़की की पता ढूंढ निकालेगा.... उस दिन मुझे फोन करना... और हाँ जल्दी करना... मेरी सब्र टूटने से पहले तक... वर्ना उसके बाद.....

रोणा फोन काट देता है, और गुस्से से छटपटाते हुए मोबाइल को फर्श पर पटक देता है l और बालों को नोचते हुए सोफ़े पर फैल जाता है

Los Angeles Dodgers Clapping GIF by MLB
 

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👉एक सौ अट्ठाइसवां अपडेट
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वीर अपने केबिन में आता है l आज पहली बार था ऑफिस में वह अकेला था l आज विक्रम आया नहीं था l चूंकि विक्रम को भैरव और पिनाक के साथ कलकत्ता जाना था l केबिन में आकर वह अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है l रिसेप्शन से कह कर वह सुपरवाइजर को बुलवाता है l उसी से मालूम होता है कि ऑपरेशन इनचार्ज और इंटेलिजंस इनचार्ज दोनों भी क्षेत्रपाल टीम के साथ कलकत्ता गए हैं, मतलब कुछ भुवनेश्वर में गड़बड़ हुआ तो वीर को प्रॉब्लम सम्भालना मुस्किल हो जाएगा l वीर थोड़ी सोच में पड़ जाता है l तभी वह सुपरवाइजर वीर को एक फाइल देता है l वीर उसे सवालिया नजर से देखता है l

सुपरवाइजर - राजकुमार जी... कल रात को युवराज जाने से पहले यह फाइल आपको देने के लिए कह गए थे.
वीर - (फाइल लेकर) ठीक है.. जाओ तुम यहाँ से..

सुपरवाइजर के जाने के बाद वीर फाइल खोलता है l फाइल में वीर के नाम कंप्यूटर प्रिंटेड एक चिट्ठी था l चिट्ठी हाथ में लिए वीर हैरानी के साथ पढ़ने लगता है

" वीर मेरे भाई
हम भाई से ज्यादा दोस्त बन कर जिए हैं l कभी ऐसा हुआ नहीं है कि मैंने अपनी दिल की हालत तुमसे कहा नहीं या तुमने अपने दिल की हालत मुझसे कहा नहीं l हाँ यह बात और है तुमने कभी अपनी नाराजगी मुझसे छुपाई नहीं और मैं तुमसे कभी नाराज़ हुआ ही नहीं
तुम मेरी तरह पहले प्यार और उसके बाद शादी करना चाहते हो l पर तुम्हारी राह कतई आसान नहीं होने वाली मेरे भाई l मेरे समय में मेरी शादी की बात तक किसीसे चलाई नहीं गई थी l पर यहाँ हालत जुदा है l तुमारी शादी राजा साहब ने सुंदरगड़ के सबसे बड़े इंडस्ट्रीयलीस्ट निर्मल सामल की बेटी से तय कर दिया है, और छोटे राजाजी ने मंजुरी भी दे दी है l इसलिए तुम्हारा रास्ता मुश्किल है, ऐसा मुझे लगता है

मुझे आसार कुछ ठीक लग नहीं रहे हैं l क्यूंकि कभी ऐसा हुआ नहीं है कि हमारे किसी नेगोसिएशन के लिए ऑपरेशन इनचार्ज, कम्युनिकेशन इनचार्ज और इंटेलिजंस इनचार्ज को उनके टीम के साथ बाहर ले जाया जा रहा है l शायद इसीलिए की आउट ऑफ स्टेट यह एक मेगा डील होने वाली है

इसलिये यहाँ पर तुम सावधान रहना l उम्मीद है कि यह सात दिन हमारे सर्विस को कोई प्रॉब्लम नहीं आएगी l बाकी तुम्हारी सिक्स्थ सेंस मुझसे हमेशा आगे रहा है l मेरी बात जानते हो l बड़े राजा जी की बात मैं कभी काट नहीं सकता था l इसलिये मैं जा रहा हूँ l तुम कभी अकेले नहीं रहे पर अब यह हफ्ता दस दिन तुमको अकेले ही संभालना होगा

बस इतना ही l तुमको आगाह करते हुए, तुम्हारा बड़ा भाई l विक्रम

चिट्ठी पढ़ते ही वीर की भंवे सिकुड़ जाते हैं l वह एक गहरी साँस छोड़ते हुए चिट्ठी की मर्म को समझने की कोशिश कर रहा होता है कि उसके टेबल पर पड़ा लैंड लाइन घन घना उठता है l वीर क्रेडल पर से रिसीवर उठाता है

वीर - हैलो.
@ - (मजाकिया लहजे में) हैलो वीर... आई आम बैक...
वीर - तुम...
@ - ओ हो हो... तो पहचान गए...
वीर - (चेहरा सख्त हो जाता है और जबड़े भींच जाती है) तुम... तुमने फोन क्यूँ किया...
@ - वाव... क्या बात है वीर... मेरी आवाज़ से पहचान लिया तुमने... यानी मैं तुम्हारे दिल में हूँ...
वीर - शट अप...
@ - ओ कॉम ऑन वीर... फोन पर आवाज वही लोग पहचान सकते हैं... जो उसके दिल में रहता हो... या तो वह दिलबर हो... या फिर दुश्मन...
वीर - तु मेरा दुश्मन है...
@ - ओलेलेए... मैं तेरा दुश्मन.... अब तु अपनी दिलबर की सोचना शुरू कर दे...
वीर - (गुर्राते हुए) क्या कहा...
@ - मैंने कहा... अब तु अनु के लिए रोने की तैयारी कर ले..
वीर - अनु... अनु ने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा...
@ - बिगाड़ा तो अनु ने नहीं है... पर वह क्या है कि... तुम क्षेत्रपालों को मैं खुश नहीं देख सकता ना... इसलिए अनु का मरना बहुत जरूरी है...
वीर - (चिल्लाते हुए) यु बास्टर्ड.. सामने आ कर बात कर
@ - क्यूँ... आऊँ सामने...
वीर - साले हरामी... छुप कर अपने आप को बड़ा मर्द समझता है...
@ - अरे कहाँ... मैं तो खुद को छोटा मर्द समझता हूँ... बड़े मर्द तो तुम क्षेत्रपाल हो... जो अपने नाम के आड़ में किसी के भी बिस्तर पर चढ़ जाते हो... या किसी को भी अपने बिस्तर पर ले लेते हो...
वीर - (थोड़ा नर्म पड़ते हुए) देखो अनु ऐसी वैसी लड़की नहीं है... वह.. वह बहुत अच्छी है...
@ - हाँ जानता हूँ...
वीर - उसे कुछ मत करो प्लीज...
@ - अब तुम इतना गिड़गिड़ा रहे हो... तो मैं अनु को बहुत जल्द तुम्हारी आँखों के सामने ही मार दूँगा... वादा रहा... (फोन कट चुका था)
वीर - हैलो.. हेलो... यु बास्टर्ड... हैलो...

फोन से कुं कुं की आवाज़ आ रही थी l वीर क्रेडल पर रिसीवर को पटक देता है और तुरंत अपना मोबाइल निकाल कर अनु को कॉल लगाता है l फोन बजती रहती है पर अनु फोन नहीं उठा रही थी l फोन कट जाती है पर अनु फोन नहीं उठाती l वीर फिर से कॉल करता है l इसबार अनु फोन उठाती है

अनु - हैलो.
वीर - कहाँ हो तुम..
अनु - आप ही ने तो गाड़ी भेजा था... अभी ऑफिस के कैम्पस में पहुँची हूँ..
वीर - तो तुमने फोन क्यूँ नहीं उठाया..
अनु - वह फोन पर्स में थी..
वीर - ठीक है... जल्दी मेरे केबिन में आओ..

अनु फोन काट कर वीर के केबिन में पहुँचती है l जैसे ही अनु अंदर आती है वीर उसके पास पहुँच कर उसे खिंच कर अपने सीने से लगा लेता है और बड़ी आवेग से अनु को अपने सीने में भींच लेता है l थोड़ी देर बाद अनु को खुद से अलग करता है l अनु उसे हैरानी भरे नजरों से देखती है l वीर झेंप कर अपनी नजर दुसरी ओर कर लेता है

अनु - क्या हुआ..
वीर - क्या.. क्या हुआ... कुछ नहीं... क्या होगा....
अनु - आज आपको क्या हो गया है...
वीर - तुम्हें क्यूँ लग रहा है... मुझे कुछ हो गया है...
अनु - आप खुद से पूछिये... रोज खुद बाहें फैला देते थे... मैं आपके बाहों में समा जाती थी... पर आज आपने मुझे मेरे समझने से पहले ही बाहों में ले लिया... कितना आवेग भरा आलिंगन था...

वीर कुछ नहीं कहता है l मुड़ कर सीधे अपनी कुर्सी की ओर जाता है और वहाँ पर बैठ जाता है l अनु उसके टेबल के सामने आ कर खड़ी होती है और वीर की आँखों में झांकने की कोशिश करती है

वीर - (मस्ती में, गाते हुए
ऐसे ना मुझे तुम देखो सीने से लगा लूँगा...
तुमको मैं चुरा लूँगा तुमसे दिल में बसा लूँगा...
अनु - झूठे...
वीर - (सीरियस हो कर) क्या झूठ बोला तुमसे...
अनु - अगर बताना नहीं चाहते तो मत बताइए... मैं आपको ऐसे डरते हुए नहीं देख सकती... (वीर इस बार अनु की आँखों में देखने लगता है) आप ज़रूर किसी बात से डर गए हैं... बोलिए ना... किस बात से डर गए...

वीर थोड़ी देर के लिए किसी बुत की तरह स्तब्ध रह जाता है, एक गहरी साँस छोड़ते हुए अपना सिर हिला कर इशारे से अपने पास बुलाता है l अनु वीर के पास आकर खड़ी होती है l वीर अनु की हाथ पकड़ कर अनु को अपने गोद में बिठाता है और अपना सिर अनु के सीने पर रख देता है l अनु भी वीर के सिर को अपने सीने से लगा कर वीर की सिर पर अपना सिर रख देती है

वीर - अनु... मैं सिर्फ कहने के लिए राज कुमार हूँ... रईसी को जीता हूँ... पर असल में... यह मेरी बदनसीबी है... क्यूंकि मैं हमेशा अपनी कार की खिड़की से झाँक कर बाहर की दुनिया यानी तुम लोगों की दुनिया को देखा करता था... तुम लोगों की दुनिया में... हर खुशी... हर एहसास.. हर बात... हर ज़ज्बात... मेरी दुनिया के मुकाबले असली लगती थी... मुझे यह बार बार एहसास होता था... के तुम्हारी दुनिया में... मेरी खोखली दुनिया से... बेहतर कुछ तो है... मुझे जलन होती थी... तुम्हारी दुनिया से... धीरे धीरे वह जलन... नफ़रत में बदल गई... इसलिए जो मन में आता था... उसे नफरत की बैसाखी के सहारे दुनिया के उपर अपनी दिल की भड़ास उतारता था... उससे मुझे कोई खुशी भले ही ना मिलता हो... पर मेरी जलन को.. मेरे अंदर की नफरत को सुकून मिलता था.
ऐसे में एक दिन तुम मुझे मिली... मेरी सांसो में... एहसासों में... दिल में... मेरी रूह में उतरती चली गई... मैं खुद को अब दुनिया से बेहतर समझने लगा... तुम्हारा मेरे पास होने से... मुझे हमेशा लगने लगा कि... मेरी दुनिया अब उन लोगों की दुनिया से बेहतर लगने लगी... साथ साथ यह भी महसुस होने लगी... के तुम्हारे दुनिया के लोगों को... मुझसे जलन हो रही है... तुमको मुझसे छीनने की साजिश करने लगे हैं... मेरी दुनिया के लोग भी... तुम्हारी दुनिया के लोग भी... मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता... क्यूंकि मेरी दुनिया... मेरी सोच... मेरी नजर... सिर्फ तुममें... तुम्हारे आसपास.. तुम्हारे इर्दगिर्द सिमट चुका है... इसलिए अब मैं डरा डरा सा रहता हूँ... हर किसी पर शक करने लगा हूँ..

वीर बड़ी ईमानदारी के साथ अपनी जज्बातों को अनु के सामने जाहिर कर रहा था l वीर के हर एक शब्द अनु के दिल में शहद की तरह उतर रही थी l वह अंदर से थर्रा जा रही थी, वह खुशी के मारे वीर को अपने सीने में भींच रही थी

वीर - अनु.
अनु - हूँ...
वीर - कुछ कहोगी नहीं..
अनु - क्या कहूँ..
वीर - मुझे तुमसे... एक भी पल की दूरी बर्दास्त नहीं होती..
अनु - राजकुमार जी..
वीर - हूँ..
अनु - क्या आपको... इस बात का डर है... के मैं आपसे खो जाऊँगी.. या छिन जाऊँगी..
वीर - (अपना मुहँ को अनु के सीने में अंदर की ओर करते हुए हाँ में सिर हिलाता है
अनु - राजकुमार जी... मैं आपकी हूँ... आपकी ही हूँ... आप जैसे हैं... मुझे आप बहुत पसंद हैं... इतना की आपकी खुशी के लिए... अपनी वज़ूद तक मिटा सकती हूँ... (वीर की चेहरे को अपने सीने से अलग कर अपने चेहरे के सामने लाती है) मुझे आपसे... आप ही अलग कर सकते हैं... दुनिया की कोई ताकत मुझे आपसे अलग नहीं कर सकती... और अगर कभी ऐसा हुआ भी... तो वादा करती हूँ... आह तक नहीं करुँगी..
वीर - (अनु की हाथों को अपने चेहरे से हटाते हुए) है... यह तुने कैसे सोच लिया... मैं तुझको... खुद से अलग करूँगा... जी नहीं पाऊँगा..
अनु - तो फिर आप डर किससे रहे हैं..
वीर - (अनु की हाथ को अपने हाथ में लेकर चूमते हुए) अपनी किस्मत से.... मुझे तेरी कसम है अनु... कोई तुझे मुझसे अलग करने की कोशिश भी की... तो वह वीर का वह रुप देखेगा... जो उसकी रूह तक को... कपा जाएगा... मौत से दुआ मांगेगा... अपने साथ ले जाने के लिए... जिंदगी उसकी इतनी खौफनाक बना दूँगा..

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"तो क्या करने का सोचा है तुने"

यह सवाल था वैदेही का उसके दुकान में नास्ता करने आए विश्व से पूछा था l विश्व वैदेही की सवाल को अनसुना कर नास्ता खा रहा था


वैदेही - तु सुन भी रहा है... क्या पुछ रही हूँ.
विश्व - वाह दीदी... क्या पुड़ी सब्जी बनाया है... तुम्हारे हाथ में तो जादू है... क्या बढ़िया खाना बनाया है तुमने... उम्म्म्... उँगलियाँ चाटने से भी... स्वाद नहीं छूट रहा..
वैदेही - (गुस्से में मुस्कराते हुए) ले और थोड़ा सब्जी ले... (कह कर चूल्हे से सब्जी वाली कढ़ाई उठा कर विश्व की प्लेट में थोड़ी सब्जी डाल देती है
टीलु - यह क्या दीदी... मैं भी बैठा हूँ यहाँ... भाई तो मुझे कम प्यार करता है... तुम भी..
वैदेही - वह क्यूँ तुझसे कम प्यार करने लगा...
टीलु - हाँ दीदी... कल मुझे घर में काम में फ़ंसा कर यशपुर चले गए थे...
वैदेही - अच्छा तुझे भी प्यार चाहए... ले फिर... (टीलु के प्लेट पर सब्जी डालते हुए)

विश्व और टीलु पुड़ी सब्जी खाने लगते हैं l अचानक टीलु आह आह कर चिल्लाने लगता है l पर विश्व बड़ी चाव से खाना खा रहा था l उसे ऐसे आराम से खाते देख वैदेही हैरानी से विश्व को देखने लगती है

वैदेही - (तुझे विश्व से) तुझे तीखा नहीं लग रहा... मैंने बाद में... दुबारा जान बुझ कर मुट्ठी भर मिर्च डाल दिया था..
विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम्हारे हाथों में... जहर भी अमृत बन जाए... मैंने देख लिया था... तुम को गुस्से में मिर्च डालते हुए... यह तो सिर्फ मिर्च है...
टीलु - आह आह... ओह.. उह... दीदी... चीनी.. चीनी...

वैदेही जैसे ही चीनी की कप वहाँ रखती है टीलु झपट कर कप को अपने मुहँ में उड़ेल देता है l वैदेही टीलु से माफी मांगते हुए कहती

वैदेही - माफ करना टीलु.. मैं तो विशु को यह एहसास दिलाना चाहती थी... के मैं उससे नाराज हूँ... मेरी बात का ना जवाब दे रहा है... ना ही मेरी सुन रहा है... सॉरी.. हाँ..
टीलु - ऐसा ना कहो दीदी... स्वाद तो बहुत था खाने में... पर यह दुसरी बार जब डलवाया... तो नानी याद आ रही है....
गौरी - कोई ना मेरे बच्चे... जब खाना ख़तम हो जाए... तो मुहँ में और थोड़ी चीनी उड़ेल लेना...
टीलु - आह... चुप कर बुढ़िया...
गौरी - नाशपिटे तेरी नानी बन कर दिलासा दे रही थी...
टीलु - दिलासा के बदले चीनी दे देती... तो नानी दादी सब कह देता...
गौरी - चुप... नासपिटे...

विश्व अपना खाना ख़तम कर हाथ धोने चला जाता है l टीलु भी उसके पीछे पीछे उठ कर चला जाता है l विश्व के साथ साथ अपना हाथ मुहँ धो कर दोनों वैदेही के पास आते हैं l वैदेही मुहँ फुला कर मुहँ फ़ेर लेती है l विश्व मुस्कराते हुए वैदेही की आँचल से अपना हाथ और मुहँ पोंछता है l विश्व के बाद टीलु भी वही दोहराता है l विश्व एक कुर्सी खिंच कर वैदेही के सामने बैठ जाता है

विश्व - दीदी... गुस्सा थूक दो ना
वैदेही - क्यों..
विश्व - गैरों के लिए... अपनों पर गुस्सा करना ठीक है क्या...
वैदेही - गैर... किन्हें गैर कह रहा है तु..
विश्व - वही... जिनके लिए... तुम अपने भाई पर मुहँ फुलाए हुए हो..
वैदेही - (थोड़ी इमोशनल हो कर, विश्व की हाथ पकड़ कर) वे सब हमारे आसपास पड़ोस वाले ही नहीं... हमारे गाँव वाले हैं... तेरे दिल में... क्या उनके लिए कोई दर्द नहीं है..
विश्व - (गंभीर हो कर) नहीं..
वैदेही - (विश्व की हाथ झिड़क देती है) इतने दिन तु गाँव से दुर क्या रहा... तु इतना बेदर्द... निर्मोही कैसे हो गया..
विश्व - किसी से मोह... किसी के लिए दर्द... जिंदा लोगों के लिए पाला जाता है दीदी... मुर्दों के लिए नहीं..
वैदेही - ठीक है... इन गाँव वालों के लिए ना सही... पर उन बच्चों की तो सोच... जिनका तु मामा बना बैठा है..
विश्व - दीदी... इन बे ग़ैरत गाँव वालों के लिए... बहुत सोच रही हो तुम... इतने सालों में... तुमने हर घर की चौखट में जाकर... शनिया और उसके जैसों के मुहँ पर पैसे मार मार कर... कितने घरों की इज़्ज़त पर दाग लगने से बचाया है... बदले में किसीसे पैसे वापस भी नहीं लिये... यहाँ तुम्हारे दुकान पर जो नास्ता खा कर भी पैसे देने लायक नहीं थे... फिर भी उन सबकी घर की लाज बचाया है... पर बदले में क्या मिला... मौका पाते ही... तुम्हारे नाम पर... तुम्हारे ही मुहँ पर फब्तीयाँ कसते हैं..
वैदेही - तो तु उन सब बातों का इस वक़्त बदला ले रहा है..
विश्व - हाँ... ऐसा सोच सकती हो... मेरे गुरु ने कहा था... मदत उसीकी करो... जो मदत मांगे... बिन मांगे किसी को कुछ भी दो... वह उस चीज़ की कदर नहीं करते... जैसे की तुम्हारा... तुमने उन सबकी इतने मदत किए... क्या कदर कर रहे हैं यह लोग...
वैदेही - जो भी हैं... जैसे भी हैं... वे सब हमारे अपने हैं... कोई बहन है... कोई भाई है... कोई मौसा है.. कई मौसी.. कई काका काकी...
विश्व - हाँ हाँ... कोई चाचा... कोई चाची... सब हैं तुम्हारे... पर जैसे ही भैरव सिंह का हुकुम आया... मेरे हुक्का पानी बंद करने की... सब ने तुमसे किनारा कर लिया...
वैदेही - वह लोग डरे हुए हैं...
विश्व - तो... उनका डर उनका अपना है... उन्हें अपने डर से जितना होगा... तब वह अपने किस्मत से लड़ सकेंगे... ना तुम उनके लिए कुछ कर पाओगी... ना ही मैं...
वैदेही - इसका मतलब... तु... परसों पंचायत में नहीं आएगा...
विश्व - नहीं... पंचायत मेरे लिए थोड़ी ना बुलाया गया है..
वैदेही - पर मैं जाऊँगी...
विश्व - ठीक है जाओ फिर...
वैदेही - क्यूँ... तु मेरे साथ नहीं आएगा...
विश्व - दीदी... बात अगर तुम्हारी होती तो मैं कहीं भी जा सकता हूँ.... पर जिनके लिए मेरा हुक्का पानी बंद है... मैं उनके लिए खड़ा नहीं हो सकता...

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कॉलेज की बॅटनीकल गार्डन में छटी गैंग के सदस्य बनानी और तब्बसुम को छोड़ बाकी सभी बैठे हुए हैं

भाश्वती - जिसे देखो सब अपनी अपनी जगह मशगूल हैं.
इतिश्री - कौन कहाँ..
दीप्ति - दुनिया मशगूल है... तो तुझे क्या परेशानी है..
भाश्वती - क्यूँ नहीं होगी... जब से बनानी का राकेश के साथ टांका भीड़ा है... तब से उसकी अटेंडेंस हमारे यहाँ कम हो गई है... और (रुप की ओर इशारा करते हुए) इन मोहतरमा को देखो... जब से ड्राइविंग स्कुल से नैन मक्का हुआ है... तब से हमारे पास हो कर भी... मेरे भैया के ख़यालों में हमेशा खोई रहती हैं..
इतिश्री - इनकी तो ठीक है... पर तब्बसुम कहाँ है..
दीप्ति - वैसे मानना पड़ेगा... जब नंदिनी पहली बार आई थी तब वह मुरझाई मुरझाई या फिर सीरियस रहती थी... अब देखो मन ही मन मुस्करा रही है... हम सब देखो इसके पास बैठे हैं... मगर इसे तो हमारा होश ही नहीं है... अपने में खोई हुई है..
भाश्वती - हाँ यार... देख ना... हम कबसे बतीआ रहे हैं... वह भी इसीके बारे में... पर इस कमबख्त को होश ही नहीं है..
दीप्ति - प्यार का चक्कर है... भाश्वती प्यार का चक्कर है... यह इश्क नहीं आशां बस इतना समझ लीजिए... जिसे यह रोग लग जाये... उसे अंधे बहरे होने से कौन रोक पाए..
इतिश्री - वाह वाह वाह वाह... पर हमारे गैंग में सबसे पहले... तुझे यह रोग लगा था ना... फिर तुने कौनसा एंटी डोड लिया था... के तु प्यार में तो है... पर अंधी बहरी नहीं है..
भाश्वती - ओवर डोज इतिश्री ओवर डोज... प्यार का ओवर डोज..

तीनों लड़कियाँ हँसने लगती हैं l पर इन सब बातों का रुप पर कोई असर नहीं पड़ता l वह इनके पास होते हुए भी अपने में खोई हुई थी l तभी तब्बसुम पार्क में आती है

तब्बसुम - हैलो दोस्तों.
सब - हाय..
तब्बसुम - हे नंदिनी..
सब - श्श्श्श्श्..
तब्बसुम - क्या हुआ..
इतिश्री - यह बेचारी..
भाश्वती - दिल से हारी..
दीप्ति - प्यार की मारी..
इतिश्री - राज दुलारी..
भाश्वती - कर रही है, मेरी भाभी बनने की तैयारी... (सब हँस देते हैं
तब्बसुम - तो अभी इसे होश में लाना है जरूरी.
सब - क्यूँ...
तब्बसुम - यह और (भाश्वती से) तेरे भाई ने मिलकर मेरी वाट लगा दी है...
भाश्वती - क्या...
तब्बसुम - हाँ... (रुप को हिलाती है) ऐ नंदिनी...
रुप - (चौंक कर जागते हुए) क्या... क्या हुआ...
भाश्वती - हमने कुछ नहीं किया...
दीप्ति - हाँ... तेरी प्रताप के साथ हसीन सफर वाली गाड़ी को... तब्बसुम ने ठोक दिया...

रुप बुरी तरह झेंप जाती है l शर्माते हुए अपनी किताबें चेहरे के सामने ले जाती है l तब्बसुम तेजी से किताबों को उसके हाथ से ले लेती है

रुप - किताबें क्यूँ ले ली तुमने..
दीप्ति - हाय कितने लाल लाल गाल हैं... उफ़ उस पर यह शर्म की रंगत... लड़का होती... तो कसम से.. चबा कर खा गई होती...
भाश्वती - इसीलिए तो तो लड़की है... (एक गहरी साँस छोडकर) इन एप्पल जैसे गालों को तो मेरा भाई चबा कर खाएगा...
तब्बसुम - ओ हो... बंद करो यह मज़ाक...
दीप्ति - ऐ... तेरी क्यूँ जल रही है... मज़ाक तो हम
इतिश्री, दीप्ति और भाश्वती - राजकुमारी के साथ कर रहे हैं...
रुप - ऐ... खबर दार जो मुझे राजकुमारी कहा तो...
तब्बसुम - प्लीज... तुम लोग थोड़े शांत रहोगे... नंदिनी... तुमने और प्रताप ने यह क्या किया...
रुप - क्या... हमने क्या किया...

तब्बसुम एक काग़ज़ निकाल कर रुप को दिखाती है l उसमें लिखा था 'सब ए मुशायरा', तारीख xxxx देर शाम xxxx बजे

रुप - इसमें... मेरा क्या वास्ता..
तब्बसुम - अबु ने कहा... यह आइडिया... उन्हें प्रताप ने दिया था... उस दिन जो तुम दोनों मुझे ढूंढते हुए... खुर्दा आए थे....
रुप - व्हाट... तु शायद भूल रही है... उस दिन सिर्फ प्रताप ही... रहमान अंकल से बात कर रहे थे... मैं तो सारा वक़्त तुम्हारे साथ थी... क्या यह प्रोग्राम प्रताप ओर्गानाइज कर रहा है...
तब्बसुम - नहीं... पर प्रताप ने अबु को सलाह दी है कि... इस मुशायरे में... मुझे हर हाल में... पार्टीसिपेट करना चाहिए...
भाश्वती - यानी प्रताप भैया को भी मालुम है... तु चिल्लर छाप शायरी करती है... (रुप को छोड़ सब हँसने लगते हैं)
तब्बसुम - (बिदक कर) शटअप..
रुप - देख तेरे अबु कोई छोटे बच्चे तो नहीं हैं... और... प्रताप ने कुछ सुझाये हैं तो... बात कुछ गहरी ही होगी... मत भूलो... प्रताप.. एक एडवोकेट भी हैं... एडवाइज भी देते रहते हैं... और मैं तो सलाह दूँगी के तु हिस्सा ले... क्यूंकि ना सिर्फ यह टैलेंट हंट है... बल्कि देख इनाम भी बहुत तगड़ा है...
तब्बसुम - यही तो वज़ह है... की मैं बहुत नर्वस हूँ... जैसे मैं कोई मुशायरा में सामिल होने नहीं जा रही हूँ... बल्कि कौन बनेगा करोड़पति में हिस्सा लेने जा रही हूँ...
इतिश्री - वाव... तब तो बहुत मज़ा आयेगा...
तब्बसुम - क्या मजा आयेगा... वह मुशायरे का दिन जितना करीब आता जाएगा... मेरी तो हालात खराब होती जाएगी...
दीप्ति - कोई नहीं... हम सब उस दिन तेरा परफॉर्मेंस देखने आयेंगे...
भाश्वती - ना ना... स्मॉल करेक्शन... उस रात...

सभी तब्बसुम को उस मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए कहते हैं l चूँकि यह एक टैलेंट हंट था और इनाम भी बहुत जबरदस्त था l इतने में बनानी गार्डन में आती है और इनके पास आकर बैठ जाती है

बनानी - किस बात पर बहस चल रही है... (सब चुप हो जाते हैं
भाश्वती - ऐ तु हमारे बीच में मत पड़... तुझे जो पूछना है वह सब नंदिनी से पूछ...
बनानी - क्यूँ...
इतिश्री - यह बता... राकेश ने तुझे कितने बजे छोड़ा..
बनानी - अभी अभी... (फिर चौंक कर) क्या... क्या कहा... वह मैं बस से आई... बस थोड़ी लेट थी...
दीप्ति - ऐ चल चल... हमसे बात छुपा रही है... जबकि पुरे ब्रह्मांड को पता है... रॉकी ने नई नई गाड़ी तेरे लिए ही ली है... रोज तेरा ड्राइवर बन कर तुझे छोड़ने और ले जाने का काम करता है...
बनानी - ऐ खबर दार जो राकेश को ड्राइवर कहा...
भाश्वती - मतलब... तुझे रॉकी ने यहाँ छोड़ कर गया है...
बनानी - (मुहँ बनाते हुए)हाँ...
रुप - जैसा कि दीप्ति ने कहा... जब पुरे ब्रह्मांड को पता है... तो छुपाती क्यूँ है...
बनानी - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) अरे... ऐसी बातों को छुपाने में भी अपना मजा है...
भाश्वती - वाह वाह वाह वाह... मुझे लगता है.. बनानी को भी... मुशायरे में एक बार ट्राय करनी चाहिए...
बनानी - मुशायरा... कैसा मुशायरा...

भाश्वती उसे सब बातेँ बताती है l सब सुन कर बनानी भी तब्बसुम से हिस्सा लेने के लिए कहती है l फिर अचानक अपने सिर पर हाथ मारते हु

बनानी - ऑफ ओ... मैं क्या कहने आई थी... बातों बातों में भूल गई..
रुप - क्या हुआ... क्या भूल गई...
बनानी - अरे हाँ... वह भाश्वती की... विंटेज फिएट की... लगता है बहुत डिमांड है...
भाश्वती - क्या मतलब...
बनानी - अब कार पार्किंग में... ठीक भाश्वती की कार के बगल में... राकेश ने अपनी गाड़ी पार्क की... एज यु ऑल नो... राकेश की गाड़ी नई है... पर मजे की बात जानते हो... कुछ देर बाद... चार पाँच बंदे आए... वह सब... राकेश की कार के बजाय भाश्वती की कार को देखने लगे...
इतिश्री - क्या...
बनानी - हाँ... जानते हो... इस बात पर राकेश को थोड़ा जलन भी हुई...
दीप्ति - हाँ हाँ क्यूँ नहीं... भाश्वती की गाड़ी फिएट पद्मिनी जो है... एकदम एंटीक...

सब हँसने लगते हैं पर रुप नहीं हँसती l वह थोड़ी सोच में पड़ जाती है और अपनी छटी गैंग से "एक्स क्युज मी... तुम लोग क्लास चलो मैं वॉशरुम हो कर आई" कह कर वहाँ से निकल जाती है

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विश्व एक कुर्सी पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था l कमरे में विश्व अकेला ही था l कुछ देर बाद टीलु अपना मुहँ लटकाये अंदर आता है l विश्व उसे देखता है और पूछता

विश्व - क्या हुआ... तुम्हारा मुहँ यूँ क्यूँ उतरा हुआ है..
टीलु - (उसके पास बैठ कर) आज दीदी का मन तुम्हारे वज़ह से दुखा है...
विश्व - (थोडे खामोशी के साथ टीलु को देखता है फिर) वह मेरी दीदी है... मेरी माँ है... उसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ... रही उसे दुख पहुँचाने की बात... तो उसके लिए मुझे कोई अफ़सोस नहीं है... (कह कर अखबार पढ़ना चालू करता है)
टीलु - भाई वैसे दीदी ने क्या गलत कहा...
विश्व - अब तुम मुझसे इस बात पर बहस करना चाहते हो...
टीलु - बहस नहीं... तुमको समझना चाहता हूँ...
विश्व - क्यूँ... तुम्हें लगता है मैं गलत हूँ...
टीलु - नहीं... नहीं तुम गलत नहीं हो सकते... पर दीदी भी कहाँ गलत है...
विश्व - (अखबार एक किनारे रख देता है) याद है... इसी घर के बाहर... एक रात हमें मारने कुछ लोग आए थे...
टीलु - हाँ...
विश्व - अब यह वही लोग हैं... जो लोगों के बीच में घुल कर हमारे लिए... पत्ते बिछा रहे हैं...
टीलु - (हैरानी के साथ) क्या... (फिर उसे कुछ याद आता है) हाँ हाँ... तुमने कहा था... दुसरा हमला... यह लोग... भीड़ के आड़ में करेंगे... मतलब...
विश्व - (मुस्कराता है)
टीलु - पर भाई... यह बात दीदी को समझ में क्यूँ नहीं आ रही...
विश्व - याद है... तुम्हीं कहा करते हो... मेरी दीदी साक्षात अन्नपूर्णा है...
टीलु - हाँ...
विश्व - तो इस गाँव के हर चौखट में पलने वाली जिंदगी के लिए फिक्र तो करेगी ही...
टीलु - इसका मतलब वह पंचायत के सभा में जाएगी...
विश्व - बेशक जाएगी....
टीलु - ओह... कहीं दीदी पर कोई खतरा तो नहीं...
विश्व - देखो टीलु... उन लोगों को अच्छी तरह से मालूम है... चूंकि मेरा हुक्का पानी बंद है... इसलिए गाँव वाले मुझसे तो मदत पूछेंगे नहीं... गाँव के हर बच्चे बूढ़े को मालुम है... जहां औरत... छोटे बच्चे आयेंगे... मेरी दीदी वहाँ कुदेगी... और मेरी दीदी जहां पर होगी... मैं वहाँ पर होउंगा ही...
टीलु - मतलब तुम दोनों पर हमला हो सकता है....
विश्व - यह कोई छोटी प्लान नहीं है... किसी शातिर का दिमाग होगा इसके पीछे...


यह सब सुनने के बाद टीलु का सिर चकरा जाता है l वह कुछ सोचता है फिर वह रसोई में घुस कर कुछ ढूंढने लगता है l कुछ बर्तन गिरने की आवाज से विश्व का ध्यान रसोई के तरफ जाता है l टीलु बाहर आता है और विश्व को देखे वगैर बाहर चला जाता है l विश्व थोड़ा हैरान होता है और अपने भवें सिकुड़ कर कुछ सोचने लगता है और थोड़ी देर बाद खुदको नॉर्मल कर फिर से अखबार उठा कर पढ़ने लगता है l तभी विश्व की मोबाइल पर रिंग बजने लगती है l विश्व स्क्रीन पर नकचढ़ी देखता है l मुस्कराते हुए विश्व फोन उठाता है

विश्व - (छेड़ने के अंदाज में) हैलो
रुप - (थोड़ी सीरियसनेस के साथ) कहाँ हो..
विश्व - (उसी शरारती अंदाज में) आप ही बताइए... मुझे कहाँ होना चाहिए..
रुप - एक बात पूछूं..
विश्व - सिर्फ एक बात... सौ पूछिये..
रुप - तुम मुझे हमेशा... भाश्वती की गाड़ी लेकर आने के लिए क्यूँ कहते थे..
विश्व - (रुप की आवाज में उसे सीरियसनेस का अनुभव होता है) क्या हुआ...
रुप - मुझे पहले यह बताओ... तुम जब भी मुझे मिलने बुलाते थे... भाश्वती की गाड़ी में आने के लिए क्यूँ कहते थे...
विश्व - ताकि आप किसी की नजरों ना आयें... वर्ना आपका मुझसे मिलना... आपके परिवार वालों को पता चल जाता... क्यूँ क्या हुआ...
रुप - पता नहीं पर... मुझे लगता है... मैं अगर भाभी की गाड़ी में आती... तो शायद ठीक रहता...
विश्व - ऐसा सोचने की कोई वज़ह...
रुप - वज़ह है... वज़ह है... याद है उस कमीने को... जिसकी तुमने किन्नरों से जिल्लत करायी थी...
विश्व - हाँ...
रुप - मुझे लगता है... उसके आदमी... उस गाड़ी का पीछा करते हुए... यहाँ तक पहुँच गए हैं...
विश्व - अच्छा... ऐसा लगने की वज़ह...
रुप - (बनानी की पार्किंग वाली बात कह देती है)
विश्व - ह्म्म्म्म... तो इस बात से डर गई मेरी नकचढ़ी...
रुप - देखो... मैं इस वक़्त मज़ाक के मुड़ में नहीं हूँ... मुझे कुछ हो जाए तो वह मुझे मंजुर है... पर मेरी गलत फहमी में मेरी दोस्त को कुछ हो जाए... यह मुझे कतई मंजुर नहीं...
विश्व - तो नकचढ़ी जी... आप यह क्यूँ भूल रही हैं... भाश्वती आपकी दोस्त है... तो मेरी बहन भी तो है...
रुप - हाँ जानती हूँ... पर पता नहीं क्यूँ... मुझे डर सा महसुस हुआ आज भाश्वती के लिए...
विश्व - ओह देवा... क्या हो गया... मैं जिस नकचढ़ी को जानता हूँ... उसे तो दूसरों को डराते हुए देखा है... यह उल्टी गंगा कैसे बहने लगी...
रुप - देखो... मुझे अभी गुस्सा आ रहा है... तुम मेरी बात का सीरियसनेस को समझ नहीं रहे हो....
विश्व - मैं तो यही चाहता हूँ... के आप जब भी मुझसे बात करें... गुस्से को अपनी नाक पर बिठा कर बातेँ करें... कम से कम मुझे लगे तो सही... के मुझसे बात करने वाली मेरी नकचढ़ी है...


रुप शर्मा कर चुपके से हँस देती है और दुसरे हाथ से अपना चेहरा छुपा लेती है, विश्व को उसकी हरकत का एहसास हो जाता है

विश्व - शब-ए-वस्ल क्या जाने क्या याद आया

वो कुछ आप ही आप शर्मा रहे
रुप - (हैरान हो जाती है) क्या तुम मेरे आस-पास हो...
विश्व - पलकें बंद कर महसुस करो मैं हूँ
आपके ख़यालों में... ख्वाबों में... तसबुर में... एहसासों में... साँसों में...
मैं ही मैं हूँ...
रुप - मैं क्या पुछ रही थी... तुम तो शेरों शायरी ले बैठ गए... अरे हाँ याद आया... पहले यह बताओ... क्या मैं भाश्वती के लिए बेफिक्र हो जाऊँ...
विश्व - बेशक... क्यूंकि जो चीज़ हो या शख्स... आपसे जुड़ी हुई हो... उनकी हिफाजत मेरे जिम्मे.... खैर वह बात बताइए... जो अभी आपको याद आया...
रुप - क्या तुमने रहमान अंकल को तब्बसुम का नाम... मुशायरे के लिए सुझाया था...
विश्व - हाँ...
रुप - क्यूँ...
विश्व - आप उनके दोस्त हैं... पर उनके हुनर की कद्रदान नहीं हैं... जब मुझे उनकी हुनर की जानकारी मिली तो लगे हाथ सलाह दे डाली... तब्बसुम जी को सब ए नज्म मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए....
रुप - हूँह्ह्ह्... बड़े आए.. हुनर पहचानने वाले... किसी की दिल की बातों को समझते भी हो...
विश्व - क्या करूँ... मुझसे पहले दिल की बात किसी और ने समझ ली... हम से तो देर बहुत हो गई... जब भी एहसास पुछा... बस एक ही जवाब आई... इट्स अ गर्ल थिंग...
रुप - ही ही ही... (खिल खिला कर हँस देती है) बेवक़ूफ़...
विश्व - और कुछ... आपकी पेश ए खिदमत में बंदा हाजिर है..
रुप - ठीक है... अब राज कुमारी जी... तुम्हें कल फोन पर सुबह संदेश भेजेंगे... बाय...

कह कर रुप फोन काट देती है l विश्व भी मुस्कुराते हुए फोन रखता है कि अचानक रुप की कही अंतिम शब्द उसके मुहँ पर आ जाते हैं

विश्व - सुबह को संदेश... शुभ संदेश..

विश्व फौरन उठता है और किताब की दुकान से लाए शुभ संदेश किताब निकाल कर अच्छे से जाँच करने लगता है l ज्यों ज्यों पन्ने पर पन्ने पलटने लगते हैं उसकी आँखे चौड़ी होने लगती हैं l वह तुरंत अपनी जगह से उठाता है, एक डायरि और पेन लेकर आता है और हर पन्नों से शब्द छान कर लिखने लगता है l कुछ देर बाद उसके सामने एक बड़ा सा संदेश था l विश्व उसे पढ़ने लगता है

" अगर तुम यह संदेश पढ़ रहे हो, मतलब तुम इससे पहले भी अखबारों में मेरे द्वारा भेजे गए संक्षिप्त संदेशों को पढ़ा होगा l तुम्हारे बारे में मुझे उस दिन मालुम हुआ जिस दिन राजा क्षेत्रपाल के महफ़िल में तुम्हारे बारे में चर्चा हो रही थी l कुछ सरकारी अधिकारी थे जिन्होंने राजा क्षेत्रपाल को यह संदेश दिया के जैल से निकल कर राजगड़ का पुर्व सरपंच विश्व प्रताप महापात्र रुप फाउंडेशन स्कैम पर एसआईटी की तहकीकात पर आरटीआई दाखिल किया है l यह समाचार बहुत से लोगों की आँखों की नींद उड़ा रखी है l तुम अपने जगह सही थे पर तुम्हारे आरटीआई दाख़िल करने से उन्हें अपनी भूल को सुधारने का मौका दे दिया तुमने l पुराने केस पर तुम्हें कामयाबी शायद ही मिले पर अब जितने भी नए आर्थिक अपराध हुए हैं या हो रहे हैं l मैं हर एक अपराध का सबसे अहम और प्रमुख गवाह हूँ l अपराध की हर कहानी मैं तुम्हें बता दूँगा पर साक्ष्य तुम्हें ढूँढना होगा l पर इन सब के लिए हमें एक बार आमने सामने हो कर मिलना होगा l तुम बाकायदा अखबार लाते रहना l मैं तुम्हें संदेश के जरिए ही मिलने का दिन और जगह बताऊँगा
तुम्हारा एक शुभ चिंतक

यह संदेश पढ़ कर विश्व डायरि को बंद करता है l तभी कमरे में टीलु आता है

टीलु - भाई... एक खबर है..

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×


शाम का समय, अखाड़े के एक कोने में शनिया और उसके पट्ठे रेत में भिड़े हुए हैं l सब के सब दाव पर दाव लगाते हुए एक दुसरे को पछाड़ने की कोशिश कर रहे थे l अखाड़े के सामने रोणा अपनी जीप को रोकता है l शनिया मुड़ कर देखता है रोणा जीप से उतर कर उन्हीं के तरफ आ रहा था l रोणा जैसे ही शनिया के सामने खड़ा होता है, शनिया उसे एक जोरदार सलाम टोकता है l रोणा उन सबकी तैयारी देख कर

रोणा - बड़े उतावले लग रहे हो... इस हड्डी तोड़ तैयारी की क्या जरूरत है...
शनिया - दरोगा बाबु... एक बात तो हमें अच्छे से समझ आ गई... दिमाग उसका प्रधान बाबु के जैसा है... ताकत में किसी अड़ियल सांढ के जैसा है... ऐसे दुश्मन से... दिमाग से ही निपटाया जा सकता है... और किसी भी प्रकार से संभलने का मौका देना नहीं चाहिए...
रोणा - ह्म्म्म्म... दुश्मनी बहुत गहरी है... क्यूँ...
शनिया - यह हराम का जना... कुत्ता था... हमारे झुटन पर पलता था... हमारा थूक चाटता था...
रोणा - था... था शनिया था... वह इतिहास है शनिया... अब कि बार उसने तुम सबकी भूगोल बदल कर रख दिया है...
शनिया - मगर इस बार भूगोल उसका बदलेगा... उसे हमेशा हमेशा के लिए इतिहास हम बना देंगे...
रोणा - हूँ... कैसे... क्या करोगे... तुम भुल रहे हो... गाँव में उसका हुक्का पानी बंद है... वह गाँव वालों के झमेले में क्यूँ पड़ेगा...
शनिया - क्या... दरोगा बाबु... बताया तो था आपको... वह भी राजा साहब के सामने...
रोणा - हाँ... तुमने कहा तो है... पर...
शनिया - पर आप पुष्टि कर लेना चाहते हैं... ऐतिहात बरतने के लिए क्यूँ...
रोणा - हाँ... ऐसा समझ सकते हो... फिर भी... तुम लोगों का प्लान क्या है...
शनिया - हमारे पचासों आदमी भीड़ में बिखरे रहेंगे... वह भी हथियारों के साथ...
रोणा - बे भोषड़ी के... तुम लोग ऐसा क्या करोगे के विश्वा बहस में कुदेगा....
शनिया - अरे साब... हम छह सात दिनों से... पत्ते बिछा रहे हैं... विश्वा जब अपने घर में बंद अपने काम में मसरूफ था... हम कर्ज की बात बता कर... सबके घर में मियाँ बीवी के बीच झगड़ा सुलगा चुके थे... कल ही सबके घरों में... कर्ज वाली काग़ज़ और रसीद पहुँचा दिए... और कर्ज माफी के लिए शर्त यह रखा है... की उनके घर की लड़कियों को... हमारे अड्डे पर या घरों पर एक साल तक काम करना होगा...
रोणा - क्या... यह सब भी काग़ज़ों में लिख कर दिए हो...
शनिया - क्या बात कर रहे हैं दरोगा बाबु... ऐसी बेवक़ूफ़ी... वह भी लिखावट में... हमने तो मुहँ जुबानी कह रखा है... जिसे पंचायत में मोहर लगवाएंगे...
विश्व - तो विश्व इस मामले में क्यूँ कर कुदेगा...
शनिया - अरे साब आप तो कभी कभी राजगड़ आते थे... वह भी बुलावे पर... इन कुछ सालों में... वैदेही ही लोगों की छुट मुट खर्च उतार रही थी... और उनको बचा भी रही थी... इस बार भी वैसा ही होगा... वैदेही इन हराम खोरों के लिए पंचायत में हमसे और सरपंच से पक्का लड़ जाएगी... आज भी गाँव के कुछ मर्दों की नजर में वैदेही एक रंडी है... वह लोग नफरत करते हैं वैदेही से... उन लोगों के करीब रह कर मेरे आदमी उनको उकसायेंगे... जैसे ही बहस बढ़ेगी... वैसे ही वैदेही की जिल्लत बढ़ेगी... आखिर भाई है वह... कब तक शांत रहेगा... वह भी मैदान में उतरेगा... तब हम गाँव वालों के तरफ से विश्वा पर हमले के लिए बुलवा देंगे... फिर हर तरफ़ से हथियारों के साथ विश्वा पर टुट पड़ेंगे...
रोणा - ह्म्म्म्म... प्लान तो बढ़िया है... पर हथियार क्यूँ... लाठी डंडो से क्यूँ नहीं...
शनिया - (एक सरसरी भरी साँस छोड़ते हुए) पिछली बार हम समझ गए... इस बार विश्वा को जिंदा नहीं छोड़ना है... आइए दिखाता हूँ...

शनिया अखाड़े के दुसरे किनारे पर रोणा को ले जाता है l रोणा देखता है वहाँ पर एक भट्टी लगा हुआ है जहां कुछ लोहार तरह तरह के हथियार बना रहे हैं l रोणा देखता है दरांती, खुखरी, कुल्हाड़ी, करणी, कुदाल, बेलचा बना रहे हैं l

रोणा - क्या मज़ाक है... तुम विश्वा पर इन से हमला करोगे...
शनिया - हाँ दरोगा बाबु... क्यूंकि आपको रिपोर्ट बनाना है... विश्वा पर हमला गाँव के आम किसानो ने किया... जब लोग इन हथियारों से विश्वा पर टुट पड़ेंगे... तब...

रोणा देखता है शनिया के चेहरे पर शैतानी चमक आ जाती है, शनिया जाकर एक ढाई फिट लंबा तलवार निकालता है l जो भट्टी में जल रही आग की रौशनी से चमक रही थी l

शनिया - यह मैं अपने साथ छुपा कर पंचायत में लेकर जाऊँगा... इसीसे उस हरामजादे को टुकड़ों में काट डालूंगा...
रोणा - नहीं... तुम ऐसा नहीं करोगे...
शनिया - (हैरान हो कर) क्यूँ... ओ समझा... आप उसे गोली मारना चाहते हो...
रोणा - नहीं... तुम्हें वह करना है... जिससे राजा साहब तुम पर बहुत खुश होंगे...
शनिया - अच्छा... राजा साहब विश्वा को जिंदा छोड़ने पर खुश होंगे...
रोणा - जानते हो... मैं भी सात साल पहले विश्वा को गोली मार सकता था... पर मारा नहीं... क्यूंकि राजा साहब चाहते थे... विश्वा जब जैल से छूटे... गली गली रेंगते हुए भीख मांगे... इसलिए उसे जान से मारने के बजाय.. (लहजा बदल जाता है) लंगड़ा लूला टौंटा बना कर छोड़ना.. ताकि वह जिंदगी भर एक जगह बुत की तरह बैठा रहे... हो सके तो उसकी जुबान भी काट देना... पर अंधा मत करना... उसे बहुत कुछ देखना है... मरते दम तक... उसे सिर्फ देखते ही जीना है... ना कुछ कह पाए... ना कुछ कर पाए... सिर्फ देखता रहे... (अचानक एक चुप्पी छा जाती है दोनों के बीच, कुछ देर की चुप्पी के बाद) क्या तुम... तुम्हारे लोग कर पाओगे... विश्वा से उलझ चुके हो तुम लोग... अगर उसने पलटवार किया तो...
शनिया - हाँ दारोगा बाबु हाँ... हम विश्वा के आँखों में मिर्ची झोकेंगे... फिर उसका काम तमाम करेंगे...
रोणा - इतना कुछ सोच रखा है... क्या मेरा वहाँ होना जरूरी है...
शनिया - सरपंच ने कहा था... आपका वहाँ होना... जरूरी है... आप विश्वा को ना सिर्फ पलटवार करने से रोकेंगे... बल्कि उन लोगों को भी रोकेंगे... जो लोग गलती से विश्वा के लिए आगे आयेंगे....
रोणा - ह्म्म्म्म... बहुत खूब... और यह सब तुमने राजा साहब से कही...
शनिया - जी नहीं... यह सब... सरपंच और भीमा ने मिलकर तब कही थी.... जब राजा साहब ने हमारी मार खाने की बात... हमसे ही उगलवा ली थी...
रोणा - ठीक है फिर... परसों मैं पंचायत भवन पहुँच जाऊँगा... तब तक ना तो तुम लोग मुझसे मिलों... ना ही मैं तुम लोगों से मिलूंगा...
शनिया - ठीक है साब... जैसा आप कहें...

रोणा वहाँ से निकल जाता है l शनिया वहाँ खड़ा हो कर रोणा को जाते हुए देख रहा था l तभी उसके पास शुकरा आता है l

शुकरा - क्या बात है शनिया भाई... क्या कह रहा था दरोगा...
शनिया - कुछ नहीं... बोल रहा था... विश्वा को जान से ना मारने के लिए...
शुकरा - क्या... पर क्यूँ...
शनिया - हमें क्या... (शैतानी चमक उसके आँखों में नाचने लगती है) हम तो विश्वा को एक कुत्ते की मौत मारेंगे... उसके इतने टुकड़े करेंगे... के वैदेही बटोरते बटोरते बुढ़ी हो जाएगी... हा हा हा हा...

उधर रोणा की जीप उसके क्वार्टर के सामने रुकती है l वह उतर कर अपने क्वार्टर के दरवाजे के सामने खड़ा होता है l जेब से सिगरेट पैकेट निकाल कर एक सिगरेट मुहँ में लेकर लाइटर ढूंढता जलाने के लिए पर उसे लाइटर नहीं मिलता तो चिढ़ कर सिगरेट जेब में वापस रख देता है l फिर क्वार्टर का दरवाजा खोल कर अंदर आता है l अंदर आते ही लाइट जलाता है उसके बाद कॉबोर्ड से एक शराब की बोतल निकलता है और ढक्कन खोल कर सीधे गटकने लगता है l आधी बोतल ख़तम करने के बाद बोतल डायनिंग टेबल पर रख देता है l उसे डायनिंग टेबल पर लाइटर दिख जाती है l वह जेब से सिगरेट निकाल कर लाइटर से जलाता है l कुछ कस खिंचने के बाद एक शैतानी मुस्कान उसके होंठो पर नाचने लगती है l वह सोफ़े के पास आता है और टी पोए के उपर से चादर खिंच कर हटाता है और अपना सिगरेट को टी पोए पर मसलने वाला होता है कि रुक जाता है l क्यूंकि कल तक उस टी पोए के सन माइका पर विश्व का फोटो था, पर आज उसका फोटो है l यह देख कर उसका नशा उतर जाता है l वह सिगरेट की आँच को अपने हाथ पर लगाता है l

'आह' उसके मुहँ से निकल जाता है l उसे समझ में आता है ना तो वह नींद में है ना ही नशे में l ठीक उसी वक़्त उसके कानों में आवाज पड़ती है
"कैसे हो मेरे राजा"
वह तुरंत उस आवाज के दिशा में मुड़ जाता है l देखता है टीवी पर उस किन्नर की चलती वीडियो पॉज हुआ प़डा है l बड़ी मुश्किल से अपना थूक निगलता है l उसके मुहँ से निकल जाता है

- विश्वा...
विश्व - वाव वाव... क्या बात है... मैं यहाँ हूँ... तुने पता कर लिया...
रोणा - (होलस्टर से गन निकाल कर विश्व पर तानते हुए) यहाँ क्यूँ आए हो...
विश्व - जानता है... किसी की मौजूदगी का यूँ एहसास कौन कर लेता है... या तो वह दिलबर हो... या फिर दुश्मन...
रोणा - मैं तेरा दुश्मन...
विश्व - क्या दुश्मन... चल हट... तु कभी किसीके प्यार की काबिल हो नहीं सकता... और दुश्मनी की लायक है नहीं... पर क्या करें... कुत्ता पागल हो जाए... तो किया क्या जा सकता है...
रोणा - क्या करने आए हो...
विश्व - गन हटा बे... (रोणा गन को विश्व के चेहरे पर ले आता है, तभी उसके कानों में फिर सुनाई देता है "कैसा है मेरे राजा" l यह सुनते ही रोणा गन को नीचे कर लेता है) सुन बे घन चक्कर... जब तु भुवनेश्वर में ही मुझ पर गोली नहीं चला सका... तो यहाँ क्या उखाड़ लेगा बे...
रोणा - तु मुझे ब्लैक मेल कर बड़ा मर्द बन रहा है... इस वीडियो के आड़ में... वर्ना...
विश्व - हाँ वर्ना... वर्ना क्या... तु तो बड़ा मर्द है ना...सुन बे भोषड़ी वाले... तेरे बदन पर वर्दी और सिर पर क्षेत्रपाल का हाथ के आड़ में तुने बड़े मर्दाना काम किया है... है ना... कभी यह वर्दी उतार कर... क्षेत्रपाल का ढाल छोड़ कर... किसी आम आदमी से भीड़ के देख... यकीन मान.. जितनी भी मर्द होने की गुमान है... वह एक पल में दुर हो जाएगी... (रोणा फिर से गन तान देता है) यह बार बार क्या ड्रामा कर रहा है बे... इसे सीने पर खाने के लिए जो जिगर चाहिए... वह मेरे अंदर है... पर इसे चलाने के लिए जो कलेजा चाहिए... वह कलेजा दुर... तुझमें दिल गुर्दा फेफड़ा तक नहीं है... तु खोखला है अंदर से... अगर तुझ में जिगर होता... तो तु मेरी तस्वीर को सिगरेट से जलाने के लिए... चादर के नीचे ढक कर नहीं रखता... (अखबार निकाल कर उसे देते हुए) यह ले इसे पहले पढ़...

रोणा उस पेपर में देखता है कि नभ वाणी न्यूज चैनल वालों ने इनाम की घोषणा उन के लिए की है जो भी ट्रैफ़िक पर हुए किन्नर समावेश में हुए उस आदमी के बारे में सटीक जानकारी देगा l यह न्यूज देख कर रोणा पुरा का पुरा पसीना पसीना हो जाता है l उसके हाथ पैर कांपने लगते हैं l

विश्व - जरा सोच यह खबर जब टेलीकास्ट होगी... तब पुरे ब्रह्मांड को तेरे विषय में मालुम पड़ेगा... कितना फेमस हो जाएगा...
रोणा - (गले से मुश्किल से आवाज़ निकालते हुए) क्यूँ आए हो यहाँ... क्या.. क्या चाहते हो मुझसे...
विश्व - बस इतना.. तु.. या तेरे थाने का कोई भी... पंचायत भवन तो दुर... उसके आसपास नजर नहीं आने चाहिए... (रोणा की आंखे फैल जाते हैं) हाँ कुत्ते हाँ... तु या तेरे कोई भी आदमी मुझे उस दिन पंचायत भवन में नजर नहीं आने चाहिए... और सुन जब तक तु मेरे बातों पर चलता रहेगा... तेरे राज... राज ही रहेंगे... जिस दिन तुने अपनी कुत्ता गिरी के चलते मुझ पर भौंकने की कोशिश भी की... उसी दिन पुरी दुनिया के सामने... तेरा राज खुल जाएगी...
रोणा - सरपंच ने... लिखित में... पुलिस की मौजूदगी मांगी है...
विश्व - फिर भी तु या तेरे थाने का कोई मुझे वहाँ पर दिखने नहीं चाहिए...

कह कर विश्व टीवी के पास जाता है और पीछे से पेन ड्राइव निकाल कर चला जाता है l विश्व के जाने के बाद रोणा धप कर सोफ़े पर बैठ जाता है l

रोणा - एक मौका... सिर्फ एक मौका... तुझे अगर इन राजगड़ के गालियों में पेट के बल रेंगने को और मौत मांगने को मजबूर ना कर दिया... तो मेरा नाम अनिकेत रोणा नहीं....


तभी उसका मोबाइल बजने लगती है l वह निरस मन से मोबाइल निकाल कर देखता है स्क्रीन पर टोनी डिस्प्ले हो रहा था l टोनी का नाम देख कर उसके आँखों में एक चमक उभर जाती है l वह झट से कॉल उठाता है l

रोणा - हैलो...
टोनी - रोणा सर...
रोणा - हाँ क्या खबर निकाला तुमने...
टोनी - आपने जिस गाड़ी की मॉडल और नंबर दिया था... उस गाड़ी का पता चल गया है... पर
रोणा - पर क्या...
टोनी - वह गाड़ी जिस लड़की का है... उसका नाम नंदिनी नहीं है... बल्कि भाश्वती है... और वह xxxx कॉलेज में साईंस फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट है... और भाश्वती वह लड़की नहीं है... जिसकी फोटो आपने मुझे दी थी...
रोणा - (चिल्लाते हुए) क्या बकते हो... (उठ खड़ा होता है)
टोनी - सच कह रहा हूँ रोणा बाबु...
रोणा - तो उस लड़की की बहन या कोई रिश्तेदार भी तो हो सकती है...
टोनी - जी मैंने... सब छान लिया है... भाश्वती के माँ के नाम पर वह गाड़ी है... वह अपनी माँ बाप की इकलौती बेटी है... हमने सोचा शायद नंदिनी भी उसी कॉलेज में पढ़ती हो... पर नंदिनी की फोटो कॉलेज में किसी ने भी नहीं पहचाना...
रोणा - (गुस्से से पुरा जिस्म थर्राने लगता है, बड़ी मुश्किल से पूछता है) ह्म्म्म्म... और...
टोनी - वह... मेरे नए आइडेंटिटी के बारे में...
रोणा - सुन बे हरामी... जिस दिन उस लड़की की पता ढूंढ निकालेगा.... उस दिन मुझे फोन करना... और हाँ जल्दी करना... मेरी सब्र टूटने से पहले तक... वर्ना उसके बाद.....

रोणा फोन काट देता है, और गुस्से से छटपटाते हुए मोबाइल को फर्श पर पटक देता है l और बालों को नोचते हुए सोफ़े पर फैल जाता है
Bahut hi badhiya update diya hai Kala Nag bhai....
Nice and beautiful update....
 

Devilrudra

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👉एक सौ अट्ठाइसवां अपडेट
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वीर अपने केबिन में आता है l आज पहली बार था ऑफिस में वह अकेला था l आज विक्रम आया नहीं था l चूंकि विक्रम को भैरव और पिनाक के साथ कलकत्ता जाना था l केबिन में आकर वह अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है l रिसेप्शन से कह कर वह सुपरवाइजर को बुलवाता है l उसी से मालूम होता है कि ऑपरेशन इनचार्ज और इंटेलिजंस इनचार्ज दोनों भी क्षेत्रपाल टीम के साथ कलकत्ता गए हैं, मतलब कुछ भुवनेश्वर में गड़बड़ हुआ तो वीर को प्रॉब्लम सम्भालना मुस्किल हो जाएगा l वीर थोड़ी सोच में पड़ जाता है l तभी वह सुपरवाइजर वीर को एक फाइल देता है l वीर उसे सवालिया नजर से देखता है l

सुपरवाइजर - राजकुमार जी... कल रात को युवराज जाने से पहले यह फाइल आपको देने के लिए कह गए थे.
वीर - (फाइल लेकर) ठीक है.. जाओ तुम यहाँ से..

सुपरवाइजर के जाने के बाद वीर फाइल खोलता है l फाइल में वीर के नाम कंप्यूटर प्रिंटेड एक चिट्ठी था l चिट्ठी हाथ में लिए वीर हैरानी के साथ पढ़ने लगता है

" वीर मेरे भाई
हम भाई से ज्यादा दोस्त बन कर जिए हैं l कभी ऐसा हुआ नहीं है कि मैंने अपनी दिल की हालत तुमसे कहा नहीं या तुमने अपने दिल की हालत मुझसे कहा नहीं l हाँ यह बात और है तुमने कभी अपनी नाराजगी मुझसे छुपाई नहीं और मैं तुमसे कभी नाराज़ हुआ ही नहीं
तुम मेरी तरह पहले प्यार और उसके बाद शादी करना चाहते हो l पर तुम्हारी राह कतई आसान नहीं होने वाली मेरे भाई l मेरे समय में मेरी शादी की बात तक किसीसे चलाई नहीं गई थी l पर यहाँ हालत जुदा है l तुमारी शादी राजा साहब ने सुंदरगड़ के सबसे बड़े इंडस्ट्रीयलीस्ट निर्मल सामल की बेटी से तय कर दिया है, और छोटे राजाजी ने मंजुरी भी दे दी है l इसलिए तुम्हारा रास्ता मुश्किल है, ऐसा मुझे लगता है

मुझे आसार कुछ ठीक लग नहीं रहे हैं l क्यूंकि कभी ऐसा हुआ नहीं है कि हमारे किसी नेगोसिएशन के लिए ऑपरेशन इनचार्ज, कम्युनिकेशन इनचार्ज और इंटेलिजंस इनचार्ज को उनके टीम के साथ बाहर ले जाया जा रहा है l शायद इसीलिए की आउट ऑफ स्टेट यह एक मेगा डील होने वाली है

इसलिये यहाँ पर तुम सावधान रहना l उम्मीद है कि यह सात दिन हमारे सर्विस को कोई प्रॉब्लम नहीं आएगी l बाकी तुम्हारी सिक्स्थ सेंस मुझसे हमेशा आगे रहा है l मेरी बात जानते हो l बड़े राजा जी की बात मैं कभी काट नहीं सकता था l इसलिये मैं जा रहा हूँ l तुम कभी अकेले नहीं रहे पर अब यह हफ्ता दस दिन तुमको अकेले ही संभालना होगा

बस इतना ही l तुमको आगाह करते हुए, तुम्हारा बड़ा भाई l विक्रम

चिट्ठी पढ़ते ही वीर की भंवे सिकुड़ जाते हैं l वह एक गहरी साँस छोड़ते हुए चिट्ठी की मर्म को समझने की कोशिश कर रहा होता है कि उसके टेबल पर पड़ा लैंड लाइन घन घना उठता है l वीर क्रेडल पर से रिसीवर उठाता है

वीर - हैलो.
@ - (मजाकिया लहजे में) हैलो वीर... आई आम बैक...
वीर - तुम...
@ - ओ हो हो... तो पहचान गए...
वीर - (चेहरा सख्त हो जाता है और जबड़े भींच जाती है) तुम... तुमने फोन क्यूँ किया...
@ - वाव... क्या बात है वीर... मेरी आवाज़ से पहचान लिया तुमने... यानी मैं तुम्हारे दिल में हूँ...
वीर - शट अप...
@ - ओ कॉम ऑन वीर... फोन पर आवाज वही लोग पहचान सकते हैं... जो उसके दिल में रहता हो... या तो वह दिलबर हो... या फिर दुश्मन...
वीर - तु मेरा दुश्मन है...
@ - ओलेलेए... मैं तेरा दुश्मन.... अब तु अपनी दिलबर की सोचना शुरू कर दे...
वीर - (गुर्राते हुए) क्या कहा...
@ - मैंने कहा... अब तु अनु के लिए रोने की तैयारी कर ले..
वीर - अनु... अनु ने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा...
@ - बिगाड़ा तो अनु ने नहीं है... पर वह क्या है कि... तुम क्षेत्रपालों को मैं खुश नहीं देख सकता ना... इसलिए अनु का मरना बहुत जरूरी है...
वीर - (चिल्लाते हुए) यु बास्टर्ड.. सामने आ कर बात कर
@ - क्यूँ... आऊँ सामने...
वीर - साले हरामी... छुप कर अपने आप को बड़ा मर्द समझता है...
@ - अरे कहाँ... मैं तो खुद को छोटा मर्द समझता हूँ... बड़े मर्द तो तुम क्षेत्रपाल हो... जो अपने नाम के आड़ में किसी के भी बिस्तर पर चढ़ जाते हो... या किसी को भी अपने बिस्तर पर ले लेते हो...
वीर - (थोड़ा नर्म पड़ते हुए) देखो अनु ऐसी वैसी लड़की नहीं है... वह.. वह बहुत अच्छी है...
@ - हाँ जानता हूँ...
वीर - उसे कुछ मत करो प्लीज...
@ - अब तुम इतना गिड़गिड़ा रहे हो... तो मैं अनु को बहुत जल्द तुम्हारी आँखों के सामने ही मार दूँगा... वादा रहा... (फोन कट चुका था)
वीर - हैलो.. हेलो... यु बास्टर्ड... हैलो...

फोन से कुं कुं की आवाज़ आ रही थी l वीर क्रेडल पर रिसीवर को पटक देता है और तुरंत अपना मोबाइल निकाल कर अनु को कॉल लगाता है l फोन बजती रहती है पर अनु फोन नहीं उठा रही थी l फोन कट जाती है पर अनु फोन नहीं उठाती l वीर फिर से कॉल करता है l इसबार अनु फोन उठाती है

अनु - हैलो.
वीर - कहाँ हो तुम..
अनु - आप ही ने तो गाड़ी भेजा था... अभी ऑफिस के कैम्पस में पहुँची हूँ..
वीर - तो तुमने फोन क्यूँ नहीं उठाया..
अनु - वह फोन पर्स में थी..
वीर - ठीक है... जल्दी मेरे केबिन में आओ..

अनु फोन काट कर वीर के केबिन में पहुँचती है l जैसे ही अनु अंदर आती है वीर उसके पास पहुँच कर उसे खिंच कर अपने सीने से लगा लेता है और बड़ी आवेग से अनु को अपने सीने में भींच लेता है l थोड़ी देर बाद अनु को खुद से अलग करता है l अनु उसे हैरानी भरे नजरों से देखती है l वीर झेंप कर अपनी नजर दुसरी ओर कर लेता है

अनु - क्या हुआ..
वीर - क्या.. क्या हुआ... कुछ नहीं... क्या होगा....
अनु - आज आपको क्या हो गया है...
वीर - तुम्हें क्यूँ लग रहा है... मुझे कुछ हो गया है...
अनु - आप खुद से पूछिये... रोज खुद बाहें फैला देते थे... मैं आपके बाहों में समा जाती थी... पर आज आपने मुझे मेरे समझने से पहले ही बाहों में ले लिया... कितना आवेग भरा आलिंगन था...

वीर कुछ नहीं कहता है l मुड़ कर सीधे अपनी कुर्सी की ओर जाता है और वहाँ पर बैठ जाता है l अनु उसके टेबल के सामने आ कर खड़ी होती है और वीर की आँखों में झांकने की कोशिश करती है

वीर - (मस्ती में, गाते हुए
ऐसे ना मुझे तुम देखो सीने से लगा लूँगा...
तुमको मैं चुरा लूँगा तुमसे दिल में बसा लूँगा...
अनु - झूठे...
वीर - (सीरियस हो कर) क्या झूठ बोला तुमसे...
अनु - अगर बताना नहीं चाहते तो मत बताइए... मैं आपको ऐसे डरते हुए नहीं देख सकती... (वीर इस बार अनु की आँखों में देखने लगता है) आप ज़रूर किसी बात से डर गए हैं... बोलिए ना... किस बात से डर गए...

वीर थोड़ी देर के लिए किसी बुत की तरह स्तब्ध रह जाता है, एक गहरी साँस छोड़ते हुए अपना सिर हिला कर इशारे से अपने पास बुलाता है l अनु वीर के पास आकर खड़ी होती है l वीर अनु की हाथ पकड़ कर अनु को अपने गोद में बिठाता है और अपना सिर अनु के सीने पर रख देता है l अनु भी वीर के सिर को अपने सीने से लगा कर वीर की सिर पर अपना सिर रख देती है

वीर - अनु... मैं सिर्फ कहने के लिए राज कुमार हूँ... रईसी को जीता हूँ... पर असल में... यह मेरी बदनसीबी है... क्यूंकि मैं हमेशा अपनी कार की खिड़की से झाँक कर बाहर की दुनिया यानी तुम लोगों की दुनिया को देखा करता था... तुम लोगों की दुनिया में... हर खुशी... हर एहसास.. हर बात... हर ज़ज्बात... मेरी दुनिया के मुकाबले असली लगती थी... मुझे यह बार बार एहसास होता था... के तुम्हारी दुनिया में... मेरी खोखली दुनिया से... बेहतर कुछ तो है... मुझे जलन होती थी... तुम्हारी दुनिया से... धीरे धीरे वह जलन... नफ़रत में बदल गई... इसलिए जो मन में आता था... उसे नफरत की बैसाखी के सहारे दुनिया के उपर अपनी दिल की भड़ास उतारता था... उससे मुझे कोई खुशी भले ही ना मिलता हो... पर मेरी जलन को.. मेरे अंदर की नफरत को सुकून मिलता था.
ऐसे में एक दिन तुम मुझे मिली... मेरी सांसो में... एहसासों में... दिल में... मेरी रूह में उतरती चली गई... मैं खुद को अब दुनिया से बेहतर समझने लगा... तुम्हारा मेरे पास होने से... मुझे हमेशा लगने लगा कि... मेरी दुनिया अब उन लोगों की दुनिया से बेहतर लगने लगी... साथ साथ यह भी महसुस होने लगी... के तुम्हारे दुनिया के लोगों को... मुझसे जलन हो रही है... तुमको मुझसे छीनने की साजिश करने लगे हैं... मेरी दुनिया के लोग भी... तुम्हारी दुनिया के लोग भी... मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता... क्यूंकि मेरी दुनिया... मेरी सोच... मेरी नजर... सिर्फ तुममें... तुम्हारे आसपास.. तुम्हारे इर्दगिर्द सिमट चुका है... इसलिए अब मैं डरा डरा सा रहता हूँ... हर किसी पर शक करने लगा हूँ..

वीर बड़ी ईमानदारी के साथ अपनी जज्बातों को अनु के सामने जाहिर कर रहा था l वीर के हर एक शब्द अनु के दिल में शहद की तरह उतर रही थी l वह अंदर से थर्रा जा रही थी, वह खुशी के मारे वीर को अपने सीने में भींच रही थी

वीर - अनु.
अनु - हूँ...
वीर - कुछ कहोगी नहीं..
अनु - क्या कहूँ..
वीर - मुझे तुमसे... एक भी पल की दूरी बर्दास्त नहीं होती..
अनु - राजकुमार जी..
वीर - हूँ..
अनु - क्या आपको... इस बात का डर है... के मैं आपसे खो जाऊँगी.. या छिन जाऊँगी..
वीर - (अपना मुहँ को अनु के सीने में अंदर की ओर करते हुए हाँ में सिर हिलाता है
अनु - राजकुमार जी... मैं आपकी हूँ... आपकी ही हूँ... आप जैसे हैं... मुझे आप बहुत पसंद हैं... इतना की आपकी खुशी के लिए... अपनी वज़ूद तक मिटा सकती हूँ... (वीर की चेहरे को अपने सीने से अलग कर अपने चेहरे के सामने लाती है) मुझे आपसे... आप ही अलग कर सकते हैं... दुनिया की कोई ताकत मुझे आपसे अलग नहीं कर सकती... और अगर कभी ऐसा हुआ भी... तो वादा करती हूँ... आह तक नहीं करुँगी..
वीर - (अनु की हाथों को अपने चेहरे से हटाते हुए) है... यह तुने कैसे सोच लिया... मैं तुझको... खुद से अलग करूँगा... जी नहीं पाऊँगा..
अनु - तो फिर आप डर किससे रहे हैं..
वीर - (अनु की हाथ को अपने हाथ में लेकर चूमते हुए) अपनी किस्मत से.... मुझे तेरी कसम है अनु... कोई तुझे मुझसे अलग करने की कोशिश भी की... तो वह वीर का वह रुप देखेगा... जो उसकी रूह तक को... कपा जाएगा... मौत से दुआ मांगेगा... अपने साथ ले जाने के लिए... जिंदगी उसकी इतनी खौफनाक बना दूँगा..

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"तो क्या करने का सोचा है तुने"

यह सवाल था वैदेही का उसके दुकान में नास्ता करने आए विश्व से पूछा था l विश्व वैदेही की सवाल को अनसुना कर नास्ता खा रहा था


वैदेही - तु सुन भी रहा है... क्या पुछ रही हूँ.
विश्व - वाह दीदी... क्या पुड़ी सब्जी बनाया है... तुम्हारे हाथ में तो जादू है... क्या बढ़िया खाना बनाया है तुमने... उम्म्म्... उँगलियाँ चाटने से भी... स्वाद नहीं छूट रहा..
वैदेही - (गुस्से में मुस्कराते हुए) ले और थोड़ा सब्जी ले... (कह कर चूल्हे से सब्जी वाली कढ़ाई उठा कर विश्व की प्लेट में थोड़ी सब्जी डाल देती है
टीलु - यह क्या दीदी... मैं भी बैठा हूँ यहाँ... भाई तो मुझे कम प्यार करता है... तुम भी..
वैदेही - वह क्यूँ तुझसे कम प्यार करने लगा...
टीलु - हाँ दीदी... कल मुझे घर में काम में फ़ंसा कर यशपुर चले गए थे...
वैदेही - अच्छा तुझे भी प्यार चाहए... ले फिर... (टीलु के प्लेट पर सब्जी डालते हुए)

विश्व और टीलु पुड़ी सब्जी खाने लगते हैं l अचानक टीलु आह आह कर चिल्लाने लगता है l पर विश्व बड़ी चाव से खाना खा रहा था l उसे ऐसे आराम से खाते देख वैदेही हैरानी से विश्व को देखने लगती है

वैदेही - (तुझे विश्व से) तुझे तीखा नहीं लग रहा... मैंने बाद में... दुबारा जान बुझ कर मुट्ठी भर मिर्च डाल दिया था..
विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम्हारे हाथों में... जहर भी अमृत बन जाए... मैंने देख लिया था... तुम को गुस्से में मिर्च डालते हुए... यह तो सिर्फ मिर्च है...
टीलु - आह आह... ओह.. उह... दीदी... चीनी.. चीनी...

वैदेही जैसे ही चीनी की कप वहाँ रखती है टीलु झपट कर कप को अपने मुहँ में उड़ेल देता है l वैदेही टीलु से माफी मांगते हुए कहती

वैदेही - माफ करना टीलु.. मैं तो विशु को यह एहसास दिलाना चाहती थी... के मैं उससे नाराज हूँ... मेरी बात का ना जवाब दे रहा है... ना ही मेरी सुन रहा है... सॉरी.. हाँ..
टीलु - ऐसा ना कहो दीदी... स्वाद तो बहुत था खाने में... पर यह दुसरी बार जब डलवाया... तो नानी याद आ रही है....
गौरी - कोई ना मेरे बच्चे... जब खाना ख़तम हो जाए... तो मुहँ में और थोड़ी चीनी उड़ेल लेना...
टीलु - आह... चुप कर बुढ़िया...
गौरी - नाशपिटे तेरी नानी बन कर दिलासा दे रही थी...
टीलु - दिलासा के बदले चीनी दे देती... तो नानी दादी सब कह देता...
गौरी - चुप... नासपिटे...

विश्व अपना खाना ख़तम कर हाथ धोने चला जाता है l टीलु भी उसके पीछे पीछे उठ कर चला जाता है l विश्व के साथ साथ अपना हाथ मुहँ धो कर दोनों वैदेही के पास आते हैं l वैदेही मुहँ फुला कर मुहँ फ़ेर लेती है l विश्व मुस्कराते हुए वैदेही की आँचल से अपना हाथ और मुहँ पोंछता है l विश्व के बाद टीलु भी वही दोहराता है l विश्व एक कुर्सी खिंच कर वैदेही के सामने बैठ जाता है

विश्व - दीदी... गुस्सा थूक दो ना
वैदेही - क्यों..
विश्व - गैरों के लिए... अपनों पर गुस्सा करना ठीक है क्या...
वैदेही - गैर... किन्हें गैर कह रहा है तु..
विश्व - वही... जिनके लिए... तुम अपने भाई पर मुहँ फुलाए हुए हो..
वैदेही - (थोड़ी इमोशनल हो कर, विश्व की हाथ पकड़ कर) वे सब हमारे आसपास पड़ोस वाले ही नहीं... हमारे गाँव वाले हैं... तेरे दिल में... क्या उनके लिए कोई दर्द नहीं है..
विश्व - (गंभीर हो कर) नहीं..
वैदेही - (विश्व की हाथ झिड़क देती है) इतने दिन तु गाँव से दुर क्या रहा... तु इतना बेदर्द... निर्मोही कैसे हो गया..
विश्व - किसी से मोह... किसी के लिए दर्द... जिंदा लोगों के लिए पाला जाता है दीदी... मुर्दों के लिए नहीं..
वैदेही - ठीक है... इन गाँव वालों के लिए ना सही... पर उन बच्चों की तो सोच... जिनका तु मामा बना बैठा है..
विश्व - दीदी... इन बे ग़ैरत गाँव वालों के लिए... बहुत सोच रही हो तुम... इतने सालों में... तुमने हर घर की चौखट में जाकर... शनिया और उसके जैसों के मुहँ पर पैसे मार मार कर... कितने घरों की इज़्ज़त पर दाग लगने से बचाया है... बदले में किसीसे पैसे वापस भी नहीं लिये... यहाँ तुम्हारे दुकान पर जो नास्ता खा कर भी पैसे देने लायक नहीं थे... फिर भी उन सबकी घर की लाज बचाया है... पर बदले में क्या मिला... मौका पाते ही... तुम्हारे नाम पर... तुम्हारे ही मुहँ पर फब्तीयाँ कसते हैं..
वैदेही - तो तु उन सब बातों का इस वक़्त बदला ले रहा है..
विश्व - हाँ... ऐसा सोच सकती हो... मेरे गुरु ने कहा था... मदत उसीकी करो... जो मदत मांगे... बिन मांगे किसी को कुछ भी दो... वह उस चीज़ की कदर नहीं करते... जैसे की तुम्हारा... तुमने उन सबकी इतने मदत किए... क्या कदर कर रहे हैं यह लोग...
वैदेही - जो भी हैं... जैसे भी हैं... वे सब हमारे अपने हैं... कोई बहन है... कोई भाई है... कोई मौसा है.. कई मौसी.. कई काका काकी...
विश्व - हाँ हाँ... कोई चाचा... कोई चाची... सब हैं तुम्हारे... पर जैसे ही भैरव सिंह का हुकुम आया... मेरे हुक्का पानी बंद करने की... सब ने तुमसे किनारा कर लिया...
वैदेही - वह लोग डरे हुए हैं...
विश्व - तो... उनका डर उनका अपना है... उन्हें अपने डर से जितना होगा... तब वह अपने किस्मत से लड़ सकेंगे... ना तुम उनके लिए कुछ कर पाओगी... ना ही मैं...
वैदेही - इसका मतलब... तु... परसों पंचायत में नहीं आएगा...
विश्व - नहीं... पंचायत मेरे लिए थोड़ी ना बुलाया गया है..
वैदेही - पर मैं जाऊँगी...
विश्व - ठीक है जाओ फिर...
वैदेही - क्यूँ... तु मेरे साथ नहीं आएगा...
विश्व - दीदी... बात अगर तुम्हारी होती तो मैं कहीं भी जा सकता हूँ.... पर जिनके लिए मेरा हुक्का पानी बंद है... मैं उनके लिए खड़ा नहीं हो सकता...

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कॉलेज की बॅटनीकल गार्डन में छटी गैंग के सदस्य बनानी और तब्बसुम को छोड़ बाकी सभी बैठे हुए हैं

भाश्वती - जिसे देखो सब अपनी अपनी जगह मशगूल हैं.
इतिश्री - कौन कहाँ..
दीप्ति - दुनिया मशगूल है... तो तुझे क्या परेशानी है..
भाश्वती - क्यूँ नहीं होगी... जब से बनानी का राकेश के साथ टांका भीड़ा है... तब से उसकी अटेंडेंस हमारे यहाँ कम हो गई है... और (रुप की ओर इशारा करते हुए) इन मोहतरमा को देखो... जब से ड्राइविंग स्कुल से नैन मक्का हुआ है... तब से हमारे पास हो कर भी... मेरे भैया के ख़यालों में हमेशा खोई रहती हैं..
इतिश्री - इनकी तो ठीक है... पर तब्बसुम कहाँ है..
दीप्ति - वैसे मानना पड़ेगा... जब नंदिनी पहली बार आई थी तब वह मुरझाई मुरझाई या फिर सीरियस रहती थी... अब देखो मन ही मन मुस्करा रही है... हम सब देखो इसके पास बैठे हैं... मगर इसे तो हमारा होश ही नहीं है... अपने में खोई हुई है..
भाश्वती - हाँ यार... देख ना... हम कबसे बतीआ रहे हैं... वह भी इसीके बारे में... पर इस कमबख्त को होश ही नहीं है..
दीप्ति - प्यार का चक्कर है... भाश्वती प्यार का चक्कर है... यह इश्क नहीं आशां बस इतना समझ लीजिए... जिसे यह रोग लग जाये... उसे अंधे बहरे होने से कौन रोक पाए..
इतिश्री - वाह वाह वाह वाह... पर हमारे गैंग में सबसे पहले... तुझे यह रोग लगा था ना... फिर तुने कौनसा एंटी डोड लिया था... के तु प्यार में तो है... पर अंधी बहरी नहीं है..
भाश्वती - ओवर डोज इतिश्री ओवर डोज... प्यार का ओवर डोज..

तीनों लड़कियाँ हँसने लगती हैं l पर इन सब बातों का रुप पर कोई असर नहीं पड़ता l वह इनके पास होते हुए भी अपने में खोई हुई थी l तभी तब्बसुम पार्क में आती है

तब्बसुम - हैलो दोस्तों.
सब - हाय..
तब्बसुम - हे नंदिनी..
सब - श्श्श्श्श्..
तब्बसुम - क्या हुआ..
इतिश्री - यह बेचारी..
भाश्वती - दिल से हारी..
दीप्ति - प्यार की मारी..
इतिश्री - राज दुलारी..
भाश्वती - कर रही है, मेरी भाभी बनने की तैयारी... (सब हँस देते हैं
तब्बसुम - तो अभी इसे होश में लाना है जरूरी.
सब - क्यूँ...
तब्बसुम - यह और (भाश्वती से) तेरे भाई ने मिलकर मेरी वाट लगा दी है...
भाश्वती - क्या...
तब्बसुम - हाँ... (रुप को हिलाती है) ऐ नंदिनी...
रुप - (चौंक कर जागते हुए) क्या... क्या हुआ...
भाश्वती - हमने कुछ नहीं किया...
दीप्ति - हाँ... तेरी प्रताप के साथ हसीन सफर वाली गाड़ी को... तब्बसुम ने ठोक दिया...

रुप बुरी तरह झेंप जाती है l शर्माते हुए अपनी किताबें चेहरे के सामने ले जाती है l तब्बसुम तेजी से किताबों को उसके हाथ से ले लेती है

रुप - किताबें क्यूँ ले ली तुमने..
दीप्ति - हाय कितने लाल लाल गाल हैं... उफ़ उस पर यह शर्म की रंगत... लड़का होती... तो कसम से.. चबा कर खा गई होती...
भाश्वती - इसीलिए तो तो लड़की है... (एक गहरी साँस छोडकर) इन एप्पल जैसे गालों को तो मेरा भाई चबा कर खाएगा...
तब्बसुम - ओ हो... बंद करो यह मज़ाक...
दीप्ति - ऐ... तेरी क्यूँ जल रही है... मज़ाक तो हम
इतिश्री, दीप्ति और भाश्वती - राजकुमारी के साथ कर रहे हैं...
रुप - ऐ... खबर दार जो मुझे राजकुमारी कहा तो...
तब्बसुम - प्लीज... तुम लोग थोड़े शांत रहोगे... नंदिनी... तुमने और प्रताप ने यह क्या किया...
रुप - क्या... हमने क्या किया...

तब्बसुम एक काग़ज़ निकाल कर रुप को दिखाती है l उसमें लिखा था 'सब ए मुशायरा', तारीख xxxx देर शाम xxxx बजे

रुप - इसमें... मेरा क्या वास्ता..
तब्बसुम - अबु ने कहा... यह आइडिया... उन्हें प्रताप ने दिया था... उस दिन जो तुम दोनों मुझे ढूंढते हुए... खुर्दा आए थे....
रुप - व्हाट... तु शायद भूल रही है... उस दिन सिर्फ प्रताप ही... रहमान अंकल से बात कर रहे थे... मैं तो सारा वक़्त तुम्हारे साथ थी... क्या यह प्रोग्राम प्रताप ओर्गानाइज कर रहा है...
तब्बसुम - नहीं... पर प्रताप ने अबु को सलाह दी है कि... इस मुशायरे में... मुझे हर हाल में... पार्टीसिपेट करना चाहिए...
भाश्वती - यानी प्रताप भैया को भी मालुम है... तु चिल्लर छाप शायरी करती है... (रुप को छोड़ सब हँसने लगते हैं)
तब्बसुम - (बिदक कर) शटअप..
रुप - देख तेरे अबु कोई छोटे बच्चे तो नहीं हैं... और... प्रताप ने कुछ सुझाये हैं तो... बात कुछ गहरी ही होगी... मत भूलो... प्रताप.. एक एडवोकेट भी हैं... एडवाइज भी देते रहते हैं... और मैं तो सलाह दूँगी के तु हिस्सा ले... क्यूंकि ना सिर्फ यह टैलेंट हंट है... बल्कि देख इनाम भी बहुत तगड़ा है...
तब्बसुम - यही तो वज़ह है... की मैं बहुत नर्वस हूँ... जैसे मैं कोई मुशायरा में सामिल होने नहीं जा रही हूँ... बल्कि कौन बनेगा करोड़पति में हिस्सा लेने जा रही हूँ...
इतिश्री - वाव... तब तो बहुत मज़ा आयेगा...
तब्बसुम - क्या मजा आयेगा... वह मुशायरे का दिन जितना करीब आता जाएगा... मेरी तो हालात खराब होती जाएगी...
दीप्ति - कोई नहीं... हम सब उस दिन तेरा परफॉर्मेंस देखने आयेंगे...
भाश्वती - ना ना... स्मॉल करेक्शन... उस रात...

सभी तब्बसुम को उस मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए कहते हैं l चूँकि यह एक टैलेंट हंट था और इनाम भी बहुत जबरदस्त था l इतने में बनानी गार्डन में आती है और इनके पास आकर बैठ जाती है

बनानी - किस बात पर बहस चल रही है... (सब चुप हो जाते हैं
भाश्वती - ऐ तु हमारे बीच में मत पड़... तुझे जो पूछना है वह सब नंदिनी से पूछ...
बनानी - क्यूँ...
इतिश्री - यह बता... राकेश ने तुझे कितने बजे छोड़ा..
बनानी - अभी अभी... (फिर चौंक कर) क्या... क्या कहा... वह मैं बस से आई... बस थोड़ी लेट थी...
दीप्ति - ऐ चल चल... हमसे बात छुपा रही है... जबकि पुरे ब्रह्मांड को पता है... रॉकी ने नई नई गाड़ी तेरे लिए ही ली है... रोज तेरा ड्राइवर बन कर तुझे छोड़ने और ले जाने का काम करता है...
बनानी - ऐ खबर दार जो राकेश को ड्राइवर कहा...
भाश्वती - मतलब... तुझे रॉकी ने यहाँ छोड़ कर गया है...
बनानी - (मुहँ बनाते हुए)हाँ...
रुप - जैसा कि दीप्ति ने कहा... जब पुरे ब्रह्मांड को पता है... तो छुपाती क्यूँ है...
बनानी - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) अरे... ऐसी बातों को छुपाने में भी अपना मजा है...
भाश्वती - वाह वाह वाह वाह... मुझे लगता है.. बनानी को भी... मुशायरे में एक बार ट्राय करनी चाहिए...
बनानी - मुशायरा... कैसा मुशायरा...

भाश्वती उसे सब बातेँ बताती है l सब सुन कर बनानी भी तब्बसुम से हिस्सा लेने के लिए कहती है l फिर अचानक अपने सिर पर हाथ मारते हु

बनानी - ऑफ ओ... मैं क्या कहने आई थी... बातों बातों में भूल गई..
रुप - क्या हुआ... क्या भूल गई...
बनानी - अरे हाँ... वह भाश्वती की... विंटेज फिएट की... लगता है बहुत डिमांड है...
भाश्वती - क्या मतलब...
बनानी - अब कार पार्किंग में... ठीक भाश्वती की कार के बगल में... राकेश ने अपनी गाड़ी पार्क की... एज यु ऑल नो... राकेश की गाड़ी नई है... पर मजे की बात जानते हो... कुछ देर बाद... चार पाँच बंदे आए... वह सब... राकेश की कार के बजाय भाश्वती की कार को देखने लगे...
इतिश्री - क्या...
बनानी - हाँ... जानते हो... इस बात पर राकेश को थोड़ा जलन भी हुई...
दीप्ति - हाँ हाँ क्यूँ नहीं... भाश्वती की गाड़ी फिएट पद्मिनी जो है... एकदम एंटीक...

सब हँसने लगते हैं पर रुप नहीं हँसती l वह थोड़ी सोच में पड़ जाती है और अपनी छटी गैंग से "एक्स क्युज मी... तुम लोग क्लास चलो मैं वॉशरुम हो कर आई" कह कर वहाँ से निकल जाती है

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विश्व एक कुर्सी पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था l कमरे में विश्व अकेला ही था l कुछ देर बाद टीलु अपना मुहँ लटकाये अंदर आता है l विश्व उसे देखता है और पूछता

विश्व - क्या हुआ... तुम्हारा मुहँ यूँ क्यूँ उतरा हुआ है..
टीलु - (उसके पास बैठ कर) आज दीदी का मन तुम्हारे वज़ह से दुखा है...
विश्व - (थोडे खामोशी के साथ टीलु को देखता है फिर) वह मेरी दीदी है... मेरी माँ है... उसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ... रही उसे दुख पहुँचाने की बात... तो उसके लिए मुझे कोई अफ़सोस नहीं है... (कह कर अखबार पढ़ना चालू करता है)
टीलु - भाई वैसे दीदी ने क्या गलत कहा...
विश्व - अब तुम मुझसे इस बात पर बहस करना चाहते हो...
टीलु - बहस नहीं... तुमको समझना चाहता हूँ...
विश्व - क्यूँ... तुम्हें लगता है मैं गलत हूँ...
टीलु - नहीं... नहीं तुम गलत नहीं हो सकते... पर दीदी भी कहाँ गलत है...
विश्व - (अखबार एक किनारे रख देता है) याद है... इसी घर के बाहर... एक रात हमें मारने कुछ लोग आए थे...
टीलु - हाँ...
विश्व - अब यह वही लोग हैं... जो लोगों के बीच में घुल कर हमारे लिए... पत्ते बिछा रहे हैं...
टीलु - (हैरानी के साथ) क्या... (फिर उसे कुछ याद आता है) हाँ हाँ... तुमने कहा था... दुसरा हमला... यह लोग... भीड़ के आड़ में करेंगे... मतलब...
विश्व - (मुस्कराता है)
टीलु - पर भाई... यह बात दीदी को समझ में क्यूँ नहीं आ रही...
विश्व - याद है... तुम्हीं कहा करते हो... मेरी दीदी साक्षात अन्नपूर्णा है...
टीलु - हाँ...
विश्व - तो इस गाँव के हर चौखट में पलने वाली जिंदगी के लिए फिक्र तो करेगी ही...
टीलु - इसका मतलब वह पंचायत के सभा में जाएगी...
विश्व - बेशक जाएगी....
टीलु - ओह... कहीं दीदी पर कोई खतरा तो नहीं...
विश्व - देखो टीलु... उन लोगों को अच्छी तरह से मालूम है... चूंकि मेरा हुक्का पानी बंद है... इसलिए गाँव वाले मुझसे तो मदत पूछेंगे नहीं... गाँव के हर बच्चे बूढ़े को मालुम है... जहां औरत... छोटे बच्चे आयेंगे... मेरी दीदी वहाँ कुदेगी... और मेरी दीदी जहां पर होगी... मैं वहाँ पर होउंगा ही...
टीलु - मतलब तुम दोनों पर हमला हो सकता है....
विश्व - यह कोई छोटी प्लान नहीं है... किसी शातिर का दिमाग होगा इसके पीछे...


यह सब सुनने के बाद टीलु का सिर चकरा जाता है l वह कुछ सोचता है फिर वह रसोई में घुस कर कुछ ढूंढने लगता है l कुछ बर्तन गिरने की आवाज से विश्व का ध्यान रसोई के तरफ जाता है l टीलु बाहर आता है और विश्व को देखे वगैर बाहर चला जाता है l विश्व थोड़ा हैरान होता है और अपने भवें सिकुड़ कर कुछ सोचने लगता है और थोड़ी देर बाद खुदको नॉर्मल कर फिर से अखबार उठा कर पढ़ने लगता है l तभी विश्व की मोबाइल पर रिंग बजने लगती है l विश्व स्क्रीन पर नकचढ़ी देखता है l मुस्कराते हुए विश्व फोन उठाता है

विश्व - (छेड़ने के अंदाज में) हैलो
रुप - (थोड़ी सीरियसनेस के साथ) कहाँ हो..
विश्व - (उसी शरारती अंदाज में) आप ही बताइए... मुझे कहाँ होना चाहिए..
रुप - एक बात पूछूं..
विश्व - सिर्फ एक बात... सौ पूछिये..
रुप - तुम मुझे हमेशा... भाश्वती की गाड़ी लेकर आने के लिए क्यूँ कहते थे..
विश्व - (रुप की आवाज में उसे सीरियसनेस का अनुभव होता है) क्या हुआ...
रुप - मुझे पहले यह बताओ... तुम जब भी मुझे मिलने बुलाते थे... भाश्वती की गाड़ी में आने के लिए क्यूँ कहते थे...
विश्व - ताकि आप किसी की नजरों ना आयें... वर्ना आपका मुझसे मिलना... आपके परिवार वालों को पता चल जाता... क्यूँ क्या हुआ...
रुप - पता नहीं पर... मुझे लगता है... मैं अगर भाभी की गाड़ी में आती... तो शायद ठीक रहता...
विश्व - ऐसा सोचने की कोई वज़ह...
रुप - वज़ह है... वज़ह है... याद है उस कमीने को... जिसकी तुमने किन्नरों से जिल्लत करायी थी...
विश्व - हाँ...
रुप - मुझे लगता है... उसके आदमी... उस गाड़ी का पीछा करते हुए... यहाँ तक पहुँच गए हैं...
विश्व - अच्छा... ऐसा लगने की वज़ह...
रुप - (बनानी की पार्किंग वाली बात कह देती है)
विश्व - ह्म्म्म्म... तो इस बात से डर गई मेरी नकचढ़ी...
रुप - देखो... मैं इस वक़्त मज़ाक के मुड़ में नहीं हूँ... मुझे कुछ हो जाए तो वह मुझे मंजुर है... पर मेरी गलत फहमी में मेरी दोस्त को कुछ हो जाए... यह मुझे कतई मंजुर नहीं...
विश्व - तो नकचढ़ी जी... आप यह क्यूँ भूल रही हैं... भाश्वती आपकी दोस्त है... तो मेरी बहन भी तो है...
रुप - हाँ जानती हूँ... पर पता नहीं क्यूँ... मुझे डर सा महसुस हुआ आज भाश्वती के लिए...
विश्व - ओह देवा... क्या हो गया... मैं जिस नकचढ़ी को जानता हूँ... उसे तो दूसरों को डराते हुए देखा है... यह उल्टी गंगा कैसे बहने लगी...
रुप - देखो... मुझे अभी गुस्सा आ रहा है... तुम मेरी बात का सीरियसनेस को समझ नहीं रहे हो....
विश्व - मैं तो यही चाहता हूँ... के आप जब भी मुझसे बात करें... गुस्से को अपनी नाक पर बिठा कर बातेँ करें... कम से कम मुझे लगे तो सही... के मुझसे बात करने वाली मेरी नकचढ़ी है...


रुप शर्मा कर चुपके से हँस देती है और दुसरे हाथ से अपना चेहरा छुपा लेती है, विश्व को उसकी हरकत का एहसास हो जाता है

विश्व - शब-ए-वस्ल क्या जाने क्या याद आया

वो कुछ आप ही आप शर्मा रहे
रुप - (हैरान हो जाती है) क्या तुम मेरे आस-पास हो...
विश्व - पलकें बंद कर महसुस करो मैं हूँ
आपके ख़यालों में... ख्वाबों में... तसबुर में... एहसासों में... साँसों में...
मैं ही मैं हूँ...
रुप - मैं क्या पुछ रही थी... तुम तो शेरों शायरी ले बैठ गए... अरे हाँ याद आया... पहले यह बताओ... क्या मैं भाश्वती के लिए बेफिक्र हो जाऊँ...
विश्व - बेशक... क्यूंकि जो चीज़ हो या शख्स... आपसे जुड़ी हुई हो... उनकी हिफाजत मेरे जिम्मे.... खैर वह बात बताइए... जो अभी आपको याद आया...
रुप - क्या तुमने रहमान अंकल को तब्बसुम का नाम... मुशायरे के लिए सुझाया था...
विश्व - हाँ...
रुप - क्यूँ...
विश्व - आप उनके दोस्त हैं... पर उनके हुनर की कद्रदान नहीं हैं... जब मुझे उनकी हुनर की जानकारी मिली तो लगे हाथ सलाह दे डाली... तब्बसुम जी को सब ए नज्म मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए....
रुप - हूँह्ह्ह्... बड़े आए.. हुनर पहचानने वाले... किसी की दिल की बातों को समझते भी हो...
विश्व - क्या करूँ... मुझसे पहले दिल की बात किसी और ने समझ ली... हम से तो देर बहुत हो गई... जब भी एहसास पुछा... बस एक ही जवाब आई... इट्स अ गर्ल थिंग...
रुप - ही ही ही... (खिल खिला कर हँस देती है) बेवक़ूफ़...
विश्व - और कुछ... आपकी पेश ए खिदमत में बंदा हाजिर है..
रुप - ठीक है... अब राज कुमारी जी... तुम्हें कल फोन पर सुबह संदेश भेजेंगे... बाय...

कह कर रुप फोन काट देती है l विश्व भी मुस्कुराते हुए फोन रखता है कि अचानक रुप की कही अंतिम शब्द उसके मुहँ पर आ जाते हैं

विश्व - सुबह को संदेश... शुभ संदेश..

विश्व फौरन उठता है और किताब की दुकान से लाए शुभ संदेश किताब निकाल कर अच्छे से जाँच करने लगता है l ज्यों ज्यों पन्ने पर पन्ने पलटने लगते हैं उसकी आँखे चौड़ी होने लगती हैं l वह तुरंत अपनी जगह से उठाता है, एक डायरि और पेन लेकर आता है और हर पन्नों से शब्द छान कर लिखने लगता है l कुछ देर बाद उसके सामने एक बड़ा सा संदेश था l विश्व उसे पढ़ने लगता है

" अगर तुम यह संदेश पढ़ रहे हो, मतलब तुम इससे पहले भी अखबारों में मेरे द्वारा भेजे गए संक्षिप्त संदेशों को पढ़ा होगा l तुम्हारे बारे में मुझे उस दिन मालुम हुआ जिस दिन राजा क्षेत्रपाल के महफ़िल में तुम्हारे बारे में चर्चा हो रही थी l कुछ सरकारी अधिकारी थे जिन्होंने राजा क्षेत्रपाल को यह संदेश दिया के जैल से निकल कर राजगड़ का पुर्व सरपंच विश्व प्रताप महापात्र रुप फाउंडेशन स्कैम पर एसआईटी की तहकीकात पर आरटीआई दाखिल किया है l यह समाचार बहुत से लोगों की आँखों की नींद उड़ा रखी है l तुम अपने जगह सही थे पर तुम्हारे आरटीआई दाख़िल करने से उन्हें अपनी भूल को सुधारने का मौका दे दिया तुमने l पुराने केस पर तुम्हें कामयाबी शायद ही मिले पर अब जितने भी नए आर्थिक अपराध हुए हैं या हो रहे हैं l मैं हर एक अपराध का सबसे अहम और प्रमुख गवाह हूँ l अपराध की हर कहानी मैं तुम्हें बता दूँगा पर साक्ष्य तुम्हें ढूँढना होगा l पर इन सब के लिए हमें एक बार आमने सामने हो कर मिलना होगा l तुम बाकायदा अखबार लाते रहना l मैं तुम्हें संदेश के जरिए ही मिलने का दिन और जगह बताऊँगा
तुम्हारा एक शुभ चिंतक

यह संदेश पढ़ कर विश्व डायरि को बंद करता है l तभी कमरे में टीलु आता है

टीलु - भाई... एक खबर है..

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शाम का समय, अखाड़े के एक कोने में शनिया और उसके पट्ठे रेत में भिड़े हुए हैं l सब के सब दाव पर दाव लगाते हुए एक दुसरे को पछाड़ने की कोशिश कर रहे थे l अखाड़े के सामने रोणा अपनी जीप को रोकता है l शनिया मुड़ कर देखता है रोणा जीप से उतर कर उन्हीं के तरफ आ रहा था l रोणा जैसे ही शनिया के सामने खड़ा होता है, शनिया उसे एक जोरदार सलाम टोकता है l रोणा उन सबकी तैयारी देख कर

रोणा - बड़े उतावले लग रहे हो... इस हड्डी तोड़ तैयारी की क्या जरूरत है...
शनिया - दरोगा बाबु... एक बात तो हमें अच्छे से समझ आ गई... दिमाग उसका प्रधान बाबु के जैसा है... ताकत में किसी अड़ियल सांढ के जैसा है... ऐसे दुश्मन से... दिमाग से ही निपटाया जा सकता है... और किसी भी प्रकार से संभलने का मौका देना नहीं चाहिए...
रोणा - ह्म्म्म्म... दुश्मनी बहुत गहरी है... क्यूँ...
शनिया - यह हराम का जना... कुत्ता था... हमारे झुटन पर पलता था... हमारा थूक चाटता था...
रोणा - था... था शनिया था... वह इतिहास है शनिया... अब कि बार उसने तुम सबकी भूगोल बदल कर रख दिया है...
शनिया - मगर इस बार भूगोल उसका बदलेगा... उसे हमेशा हमेशा के लिए इतिहास हम बना देंगे...
रोणा - हूँ... कैसे... क्या करोगे... तुम भुल रहे हो... गाँव में उसका हुक्का पानी बंद है... वह गाँव वालों के झमेले में क्यूँ पड़ेगा...
शनिया - क्या... दरोगा बाबु... बताया तो था आपको... वह भी राजा साहब के सामने...
रोणा - हाँ... तुमने कहा तो है... पर...
शनिया - पर आप पुष्टि कर लेना चाहते हैं... ऐतिहात बरतने के लिए क्यूँ...
रोणा - हाँ... ऐसा समझ सकते हो... फिर भी... तुम लोगों का प्लान क्या है...
शनिया - हमारे पचासों आदमी भीड़ में बिखरे रहेंगे... वह भी हथियारों के साथ...
रोणा - बे भोषड़ी के... तुम लोग ऐसा क्या करोगे के विश्वा बहस में कुदेगा....
शनिया - अरे साब... हम छह सात दिनों से... पत्ते बिछा रहे हैं... विश्वा जब अपने घर में बंद अपने काम में मसरूफ था... हम कर्ज की बात बता कर... सबके घर में मियाँ बीवी के बीच झगड़ा सुलगा चुके थे... कल ही सबके घरों में... कर्ज वाली काग़ज़ और रसीद पहुँचा दिए... और कर्ज माफी के लिए शर्त यह रखा है... की उनके घर की लड़कियों को... हमारे अड्डे पर या घरों पर एक साल तक काम करना होगा...
रोणा - क्या... यह सब भी काग़ज़ों में लिख कर दिए हो...
शनिया - क्या बात कर रहे हैं दरोगा बाबु... ऐसी बेवक़ूफ़ी... वह भी लिखावट में... हमने तो मुहँ जुबानी कह रखा है... जिसे पंचायत में मोहर लगवाएंगे...
विश्व - तो विश्व इस मामले में क्यूँ कर कुदेगा...
शनिया - अरे साब आप तो कभी कभी राजगड़ आते थे... वह भी बुलावे पर... इन कुछ सालों में... वैदेही ही लोगों की छुट मुट खर्च उतार रही थी... और उनको बचा भी रही थी... इस बार भी वैसा ही होगा... वैदेही इन हराम खोरों के लिए पंचायत में हमसे और सरपंच से पक्का लड़ जाएगी... आज भी गाँव के कुछ मर्दों की नजर में वैदेही एक रंडी है... वह लोग नफरत करते हैं वैदेही से... उन लोगों के करीब रह कर मेरे आदमी उनको उकसायेंगे... जैसे ही बहस बढ़ेगी... वैसे ही वैदेही की जिल्लत बढ़ेगी... आखिर भाई है वह... कब तक शांत रहेगा... वह भी मैदान में उतरेगा... तब हम गाँव वालों के तरफ से विश्वा पर हमले के लिए बुलवा देंगे... फिर हर तरफ़ से हथियारों के साथ विश्वा पर टुट पड़ेंगे...
रोणा - ह्म्म्म्म... प्लान तो बढ़िया है... पर हथियार क्यूँ... लाठी डंडो से क्यूँ नहीं...
शनिया - (एक सरसरी भरी साँस छोड़ते हुए) पिछली बार हम समझ गए... इस बार विश्वा को जिंदा नहीं छोड़ना है... आइए दिखाता हूँ...

शनिया अखाड़े के दुसरे किनारे पर रोणा को ले जाता है l रोणा देखता है वहाँ पर एक भट्टी लगा हुआ है जहां कुछ लोहार तरह तरह के हथियार बना रहे हैं l रोणा देखता है दरांती, खुखरी, कुल्हाड़ी, करणी, कुदाल, बेलचा बना रहे हैं l

रोणा - क्या मज़ाक है... तुम विश्वा पर इन से हमला करोगे...
शनिया - हाँ दरोगा बाबु... क्यूंकि आपको रिपोर्ट बनाना है... विश्वा पर हमला गाँव के आम किसानो ने किया... जब लोग इन हथियारों से विश्वा पर टुट पड़ेंगे... तब...

रोणा देखता है शनिया के चेहरे पर शैतानी चमक आ जाती है, शनिया जाकर एक ढाई फिट लंबा तलवार निकालता है l जो भट्टी में जल रही आग की रौशनी से चमक रही थी l

शनिया - यह मैं अपने साथ छुपा कर पंचायत में लेकर जाऊँगा... इसीसे उस हरामजादे को टुकड़ों में काट डालूंगा...
रोणा - नहीं... तुम ऐसा नहीं करोगे...
शनिया - (हैरान हो कर) क्यूँ... ओ समझा... आप उसे गोली मारना चाहते हो...
रोणा - नहीं... तुम्हें वह करना है... जिससे राजा साहब तुम पर बहुत खुश होंगे...
शनिया - अच्छा... राजा साहब विश्वा को जिंदा छोड़ने पर खुश होंगे...
रोणा - जानते हो... मैं भी सात साल पहले विश्वा को गोली मार सकता था... पर मारा नहीं... क्यूंकि राजा साहब चाहते थे... विश्वा जब जैल से छूटे... गली गली रेंगते हुए भीख मांगे... इसलिए उसे जान से मारने के बजाय.. (लहजा बदल जाता है) लंगड़ा लूला टौंटा बना कर छोड़ना.. ताकि वह जिंदगी भर एक जगह बुत की तरह बैठा रहे... हो सके तो उसकी जुबान भी काट देना... पर अंधा मत करना... उसे बहुत कुछ देखना है... मरते दम तक... उसे सिर्फ देखते ही जीना है... ना कुछ कह पाए... ना कुछ कर पाए... सिर्फ देखता रहे... (अचानक एक चुप्पी छा जाती है दोनों के बीच, कुछ देर की चुप्पी के बाद) क्या तुम... तुम्हारे लोग कर पाओगे... विश्वा से उलझ चुके हो तुम लोग... अगर उसने पलटवार किया तो...
शनिया - हाँ दारोगा बाबु हाँ... हम विश्वा के आँखों में मिर्ची झोकेंगे... फिर उसका काम तमाम करेंगे...
रोणा - इतना कुछ सोच रखा है... क्या मेरा वहाँ होना जरूरी है...
शनिया - सरपंच ने कहा था... आपका वहाँ होना... जरूरी है... आप विश्वा को ना सिर्फ पलटवार करने से रोकेंगे... बल्कि उन लोगों को भी रोकेंगे... जो लोग गलती से विश्वा के लिए आगे आयेंगे....
रोणा - ह्म्म्म्म... बहुत खूब... और यह सब तुमने राजा साहब से कही...
शनिया - जी नहीं... यह सब... सरपंच और भीमा ने मिलकर तब कही थी.... जब राजा साहब ने हमारी मार खाने की बात... हमसे ही उगलवा ली थी...
रोणा - ठीक है फिर... परसों मैं पंचायत भवन पहुँच जाऊँगा... तब तक ना तो तुम लोग मुझसे मिलों... ना ही मैं तुम लोगों से मिलूंगा...
शनिया - ठीक है साब... जैसा आप कहें...

रोणा वहाँ से निकल जाता है l शनिया वहाँ खड़ा हो कर रोणा को जाते हुए देख रहा था l तभी उसके पास शुकरा आता है l

शुकरा - क्या बात है शनिया भाई... क्या कह रहा था दरोगा...
शनिया - कुछ नहीं... बोल रहा था... विश्वा को जान से ना मारने के लिए...
शुकरा - क्या... पर क्यूँ...
शनिया - हमें क्या... (शैतानी चमक उसके आँखों में नाचने लगती है) हम तो विश्वा को एक कुत्ते की मौत मारेंगे... उसके इतने टुकड़े करेंगे... के वैदेही बटोरते बटोरते बुढ़ी हो जाएगी... हा हा हा हा...

उधर रोणा की जीप उसके क्वार्टर के सामने रुकती है l वह उतर कर अपने क्वार्टर के दरवाजे के सामने खड़ा होता है l जेब से सिगरेट पैकेट निकाल कर एक सिगरेट मुहँ में लेकर लाइटर ढूंढता जलाने के लिए पर उसे लाइटर नहीं मिलता तो चिढ़ कर सिगरेट जेब में वापस रख देता है l फिर क्वार्टर का दरवाजा खोल कर अंदर आता है l अंदर आते ही लाइट जलाता है उसके बाद कॉबोर्ड से एक शराब की बोतल निकलता है और ढक्कन खोल कर सीधे गटकने लगता है l आधी बोतल ख़तम करने के बाद बोतल डायनिंग टेबल पर रख देता है l उसे डायनिंग टेबल पर लाइटर दिख जाती है l वह जेब से सिगरेट निकाल कर लाइटर से जलाता है l कुछ कस खिंचने के बाद एक शैतानी मुस्कान उसके होंठो पर नाचने लगती है l वह सोफ़े के पास आता है और टी पोए के उपर से चादर खिंच कर हटाता है और अपना सिगरेट को टी पोए पर मसलने वाला होता है कि रुक जाता है l क्यूंकि कल तक उस टी पोए के सन माइका पर विश्व का फोटो था, पर आज उसका फोटो है l यह देख कर उसका नशा उतर जाता है l वह सिगरेट की आँच को अपने हाथ पर लगाता है l

'आह' उसके मुहँ से निकल जाता है l उसे समझ में आता है ना तो वह नींद में है ना ही नशे में l ठीक उसी वक़्त उसके कानों में आवाज पड़ती है
"कैसे हो मेरे राजा"
वह तुरंत उस आवाज के दिशा में मुड़ जाता है l देखता है टीवी पर उस किन्नर की चलती वीडियो पॉज हुआ प़डा है l बड़ी मुश्किल से अपना थूक निगलता है l उसके मुहँ से निकल जाता है

- विश्वा...
विश्व - वाव वाव... क्या बात है... मैं यहाँ हूँ... तुने पता कर लिया...
रोणा - (होलस्टर से गन निकाल कर विश्व पर तानते हुए) यहाँ क्यूँ आए हो...
विश्व - जानता है... किसी की मौजूदगी का यूँ एहसास कौन कर लेता है... या तो वह दिलबर हो... या फिर दुश्मन...
रोणा - मैं तेरा दुश्मन...
विश्व - क्या दुश्मन... चल हट... तु कभी किसीके प्यार की काबिल हो नहीं सकता... और दुश्मनी की लायक है नहीं... पर क्या करें... कुत्ता पागल हो जाए... तो किया क्या जा सकता है...
रोणा - क्या करने आए हो...
विश्व - गन हटा बे... (रोणा गन को विश्व के चेहरे पर ले आता है, तभी उसके कानों में फिर सुनाई देता है "कैसा है मेरे राजा" l यह सुनते ही रोणा गन को नीचे कर लेता है) सुन बे घन चक्कर... जब तु भुवनेश्वर में ही मुझ पर गोली नहीं चला सका... तो यहाँ क्या उखाड़ लेगा बे...
रोणा - तु मुझे ब्लैक मेल कर बड़ा मर्द बन रहा है... इस वीडियो के आड़ में... वर्ना...
विश्व - हाँ वर्ना... वर्ना क्या... तु तो बड़ा मर्द है ना...सुन बे भोषड़ी वाले... तेरे बदन पर वर्दी और सिर पर क्षेत्रपाल का हाथ के आड़ में तुने बड़े मर्दाना काम किया है... है ना... कभी यह वर्दी उतार कर... क्षेत्रपाल का ढाल छोड़ कर... किसी आम आदमी से भीड़ के देख... यकीन मान.. जितनी भी मर्द होने की गुमान है... वह एक पल में दुर हो जाएगी... (रोणा फिर से गन तान देता है) यह बार बार क्या ड्रामा कर रहा है बे... इसे सीने पर खाने के लिए जो जिगर चाहिए... वह मेरे अंदर है... पर इसे चलाने के लिए जो कलेजा चाहिए... वह कलेजा दुर... तुझमें दिल गुर्दा फेफड़ा तक नहीं है... तु खोखला है अंदर से... अगर तुझ में जिगर होता... तो तु मेरी तस्वीर को सिगरेट से जलाने के लिए... चादर के नीचे ढक कर नहीं रखता... (अखबार निकाल कर उसे देते हुए) यह ले इसे पहले पढ़...

रोणा उस पेपर में देखता है कि नभ वाणी न्यूज चैनल वालों ने इनाम की घोषणा उन के लिए की है जो भी ट्रैफ़िक पर हुए किन्नर समावेश में हुए उस आदमी के बारे में सटीक जानकारी देगा l यह न्यूज देख कर रोणा पुरा का पुरा पसीना पसीना हो जाता है l उसके हाथ पैर कांपने लगते हैं l

विश्व - जरा सोच यह खबर जब टेलीकास्ट होगी... तब पुरे ब्रह्मांड को तेरे विषय में मालुम पड़ेगा... कितना फेमस हो जाएगा...
रोणा - (गले से मुश्किल से आवाज़ निकालते हुए) क्यूँ आए हो यहाँ... क्या.. क्या चाहते हो मुझसे...
विश्व - बस इतना.. तु.. या तेरे थाने का कोई भी... पंचायत भवन तो दुर... उसके आसपास नजर नहीं आने चाहिए... (रोणा की आंखे फैल जाते हैं) हाँ कुत्ते हाँ... तु या तेरे कोई भी आदमी मुझे उस दिन पंचायत भवन में नजर नहीं आने चाहिए... और सुन जब तक तु मेरे बातों पर चलता रहेगा... तेरे राज... राज ही रहेंगे... जिस दिन तुने अपनी कुत्ता गिरी के चलते मुझ पर भौंकने की कोशिश भी की... उसी दिन पुरी दुनिया के सामने... तेरा राज खुल जाएगी...
रोणा - सरपंच ने... लिखित में... पुलिस की मौजूदगी मांगी है...
विश्व - फिर भी तु या तेरे थाने का कोई मुझे वहाँ पर दिखने नहीं चाहिए...

कह कर विश्व टीवी के पास जाता है और पीछे से पेन ड्राइव निकाल कर चला जाता है l विश्व के जाने के बाद रोणा धप कर सोफ़े पर बैठ जाता है l

रोणा - एक मौका... सिर्फ एक मौका... तुझे अगर इन राजगड़ के गालियों में पेट के बल रेंगने को और मौत मांगने को मजबूर ना कर दिया... तो मेरा नाम अनिकेत रोणा नहीं....


तभी उसका मोबाइल बजने लगती है l वह निरस मन से मोबाइल निकाल कर देखता है स्क्रीन पर टोनी डिस्प्ले हो रहा था l टोनी का नाम देख कर उसके आँखों में एक चमक उभर जाती है l वह झट से कॉल उठाता है l

रोणा - हैलो...
टोनी - रोणा सर...
रोणा - हाँ क्या खबर निकाला तुमने...
टोनी - आपने जिस गाड़ी की मॉडल और नंबर दिया था... उस गाड़ी का पता चल गया है... पर
रोणा - पर क्या...
टोनी - वह गाड़ी जिस लड़की का है... उसका नाम नंदिनी नहीं है... बल्कि भाश्वती है... और वह xxxx कॉलेज में साईंस फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट है... और भाश्वती वह लड़की नहीं है... जिसकी फोटो आपने मुझे दी थी...
रोणा - (चिल्लाते हुए) क्या बकते हो... (उठ खड़ा होता है)
टोनी - सच कह रहा हूँ रोणा बाबु...
रोणा - तो उस लड़की की बहन या कोई रिश्तेदार भी तो हो सकती है...
टोनी - जी मैंने... सब छान लिया है... भाश्वती के माँ के नाम पर वह गाड़ी है... वह अपनी माँ बाप की इकलौती बेटी है... हमने सोचा शायद नंदिनी भी उसी कॉलेज में पढ़ती हो... पर नंदिनी की फोटो कॉलेज में किसी ने भी नहीं पहचाना...
रोणा - (गुस्से से पुरा जिस्म थर्राने लगता है, बड़ी मुश्किल से पूछता है) ह्म्म्म्म... और...
टोनी - वह... मेरे नए आइडेंटिटी के बारे में...
रोणा - सुन बे हरामी... जिस दिन उस लड़की की पता ढूंढ निकालेगा.... उस दिन मुझे फोन करना... और हाँ जल्दी करना... मेरी सब्र टूटने से पहले तक... वर्ना उसके बाद.....

रोणा फोन काट देता है, और गुस्से से छटपटाते हुए मोबाइल को फर्श पर पटक देता है l और बालों को नोचते हुए सोफ़े पर फैल जाता है
Nice👍👍👍
 
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nice update .veer ke liye sandesha chhoda hai vikram ne aur uske shadi ki baat bhi bata di ,kya us sandesh me anu ke baare me jikr tha ,vikram ko pata lag gaya ho ki anu ko maarne ki supari di gayi hai .
ab ye anjan shaks phir aa gaya veer ko pareshan karne ,anu ke liye pyar badhta hi jaa raha hai veer ka 😍.
veer ne apne dil ka haal baya kar diya anu ko .

shaniya ne apni alag hi planning ki hai vishw ke liye ,rona ki to siti piti gum kar di vishw ne usko kamre me jaake aur dhamki deke 🤣
 

Sidd19

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हमेशा की तरह लाजवाब अपडेट 👌👌👌👌
शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया
इस अपडेट के बारे में क्या कहें👍👍👍 सबसे पहले वीर और विक्रम के भाई जो कि दोस्त से बढ़कर हैं कि एक दूसरे से चिंता
हाँ इनकी इस आत्मीयता का वज़ह भी है
चूंकि दोनों बचपन से ही घर से बाहर रहकर पढ़ाई किए थे और साथ रहे थे
अगले क्षण उस गुमनाम को लौट आना जिसकी आवाज से ही वीर के होश खो जाता है
हाँ अब वीर की परेशानी काफी बढ़ जाने वाली है
अनु और वीर का संवाद दिल को छूने वाला🤩🤩🤩🤩
थैंक्स दोस्त
वैदेही का गांव वालों के लिए विश्व से चिंता जाहिर करना भी बिल्कुल जायज है
हाँ वैदेही को गाँव वालों की बहुत चिंता है जिसकी वज़ह से विश्व गाँव का सरपंच बना था l
उसके बाद छठी गैंग के मस्ती मजाक और रूप का अपने दोस्तों के लिए चिंता जाहिर करने
शुक्रिया मेरे दोस्त
और अंत में विश्वा और राणा के जबरदस्त मुलाकात और सोने पर सुहागा यह रहा कि रोणा और टोनी विश्वा के आगे एक बार फिर बेवकूफ बन गए 😜😜😜😜😜
हाँ यही हार रोणा को और भी उग्र बनाता रहेगा
अगले अपडेट का बहुत बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं भाई
रवि वार को आएगा
 
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