उसने दीवार पर टँगी घड़ी की ओर नज़र दौड़ाई। रात के साढ़े बारह बज रहे थे। चाचा के कमरे में वह करीब दो घंटे रही थी। दो पूरे घंटे…
शरीर में एक बार फिर वह अहसास कौंधा—अंदर का भारीपन, जाँघों के बीच हल्की गीली चिपचिपाहट, स्तनों पर बचे हुए निशान। ग्लानि ने फिर से सीना जकड़ लिया। आँखें भर आईं, लेकिन आँसू नहीं गिरे। वह बस बिस्तर के किनारे बैठ गई।
विनय की पीठ देखती रही।
“तुम्हारे सोते हुए… मैं…” मन में बात पूरी नहीं हो पाई।
कुछ देर वह ऐसे ही बैठी रही। फिर धीरे से साड़ी की गाँठ खोली, ब्लाउज़ ढीला किया और चुपचाप लेट गई। बेटे और विनय के बीच वाली खाली जगह में। पीठ विनय की तरफ़ कर ली। आँखें बंद कीं।
शरीर थका हुआ था। तीन बार झड़ने के बाद, इतने तगड़े सेक्स के बाद, और ऊपर से वह मानसिक तूफ़ान… सब कुछ एक साथ टूट रहा था।
लेटते ही नींद आने लगी।
ऐसी गहरी, भारी नींद जो उसे पिछले कई महीनों से नहीं आई थी। न कोई सपना, न कोई ख्याल। बस अंधेरा और सुन्नता। शरीर ने जैसे हार मान ली हो। आँखें बंद होते ही वह पूरी तरह सो गई—विनय के बगल में, बेटे के पास, चाचा के वीर्य के अहसास के साथ।
Ab aage..............
सरिस्का को रात भर बहुत गहरी और अच्छी नींद आई। कई महीनों बाद ऐसी नींद आई थी जिसमें कोई सपना नहीं, कोई बेचैनी नहीं।
सुबह आँखें थोड़ी देर से खुलीं। घड़ी की तरफ़ देखा तो साढ़े सात बज रहे थे। बेटा और विनय अभी भी सो रहे थे।
उठते ही शरीर का अहसास हुआ। बदन एकदम हल्का लग रहा था, जैसे कोई बोझ उतर गया हो। लेकिन योनि में हल्का-सा दर्द और सूजन बाकी थी—रात की भरपूर, तगड़ी चुदाई का निशान। हर कदम के साथ वह दर्द याद दिला रहा था कि कल रात क्या हुआ था। जाँघों के बीच अभी भी हल्की चिपचिपाहट महसूस हो रही थी।
सरिस्का जल्दी से उठी। नहाकर साड़ी पहन ली। बाल बाँधे और बिना देर किए घर के कामकाज में लग गई। चाय बनाई, नाश्ता तैयार किया, बेटे के स्कूल के कपड़े निकाले। मन में ग्लानि और शर्म का तूफ़ान चल रहा था, लेकिन चेहरे पर सामान्य रखने की कोशिश कर रही थी।
ठीक उसी समय चाचा अपने कमरे से बाहर निकले।
नहा-धोकर, साफ़ कपड़ों में। उनका लंबा-चौड़ा, काला शरीर सुबह की रोशनी में और भी दबंग लग रहा था। सरिस्का की नज़रें अनजाने में उनके बदन पर चली गईं—चौड़े कंधे, बाज़ू, सीना… और फिर दोनों की आँखें मिल गईं।
एक पल के लिए समय रुक गया।
चाचा की निगाह में वही शांत, जानकार मुस्कान थी। जैसे कह रहे हों—“रात याद है न?”
सरिस्का की आँखें झुक गईं। गाल लाल हो गए। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह जल्दी से किचन की तरफ़ मुड़ गई और बर्तन माँजने में लग गई। हाथ काँप रहे थे।
चाचा ने कुछ नहीं कहा। बस सामान्य स्वर में बोले, “बहू, चाय दे देना। फिर बच्चे को स्कूल छोड़ आता हूँ।”
सरिस्का ने सिर झुकाए हुए चाय का कप बढ़ाया। उंगलियाँ छू गईं। एक बिजली सी दौड़ गई। उसने जल्दी से हाथ खींच लिया।
चाचा बेटे को तैयार करके स्कूल ले गए। घर में सिर्फ़ विनय सोए हुए बचे। सरिस्का अकेली थी। शर्म इतनी तेज़ थी कि वह खुद से आँखें नहीं मिला पा रही थी। आईने के सामने जाते हुए भी चेहरा छुपा लेती। मन बार-बार कल रात की तस्वीरें दिखा रहा था—चाचा का भारी शरीर उसके ऊपर, आठ इंच का लंड जड़ तक, तीन-तीन बार झड़ना, और आखिर में वह गाढ़ा वीर्य अंदर भर जाना…
दिन सामान्य बीता। विनय उठे, नाश्ता किया, टीवी देखने लगे। सरिस्का घर के काम निपटाती रही। बातें सामान्य ही हुईं, लेकिन हर सामान्य बात के नीचे शर्म की परत मोटी होती जा रही थी।
शाम को चाचा लौटे।
हाथ में एक छोटी पॉलीथीन की थैली थी। सीधे किचन में आए जहाँ सरिस्का चाय बना रही थी। पास आकर धीमे स्वर में बोले—
“ये ले।”
सरिस्का ने थैली खोली। अंदर नींद की गोलियों की एक छोटी सी पट्टी थी।
आँखें फैलीं। मुँह खुला रह गया। वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन गले से आवाज़ नहीं निकली। बस हैरानी से चाचा की तरफ़ देखने लगी।
चाचा ने एक कदम और पास आकर बहुत धीमे, लेकिन साफ़ स्वर में कहा—
“इन्हें विनय को दे देना। आज रात खाने के बाद। दो गोलियाँ काफी हैं। फिर… रात को मेरे पास आ जाना।”
सरिस्का की साँस अटक गई। गाल जलने लगे। वह कुछ कहना चाहती थी—“नहीं… फिर से नहीं…”—लेकिन शब्द नहीं निकले। चाचा की आँखों में वही दबंग यकीन था। उन्होंने थैली उसके हाथ में दबा दी और बिना और कुछ कहे अपने कमरे की ओर चले गए।
सरिस्का थैली पकड़े खड़ी रही। दिल धड़क रहा था। शर्म, डर, और उसके नीचे दबी हुई एक अजीब सी घबराहट… सब एक साथ।
रात का खाना सामान्य रहा।
विनय टीवी देखते हुए बैठे थे। सरिस्का ने थाली लगाई। हाथ काँप रहे थे। नींद की गोलियों के बारे में सोचकर चाचा अपने कमरे में थे—जानबूझकर बाहर नहीं आए।
खाना खत्म होने के बाद सरिस्का विनय को रोज की दवाइयां देने लगी उनके साथ ही उसने जैसे ही नींद की गोलियां हाथ में ली दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। ग्लानि की एक लहर फिर उठी, लेकिन उसने गिलास विनय की तरफ़ बढ़ा दिया।
“पानी पी लो…” आवाज़ थोड़ी काँप गई।
विनय ने बिना कुछ सोचे गिलास उठाया और पी लिया। पाँच-सात मिनट बाद उनकी आँखें भारी होने लगीं। टीवी की आवाज़ धीमी पड़ती गई। वे बिस्तर पर लुढ़क गए। दस मिनट के अंदर पूरी तरह गहरी नींद में चले गए—साँसें भारी, शरीर शिथिल।
बेटा पहले ही सो चुका था।
घर में सन्नाटा छा गया।
सरिस्का किचन में खड़ी रही। हाथ धोए। साड़ी का पल्लू ठीक किया। सीने में एक अजीब सी घबराहट और शर्म एक साथ दौड़ रही थी। मन कह रहा था—“मत जा… आज मत जा…” लेकिन कदम अपने-आप गलियारे की तरफ़ बढ़ने लगे।
चाचा के कमरे का दरवाज़ा अधखुला था। अंदर हल्की रोशनी जल रही थी।
उसने हल्के हाथ से दरवाज़ा धकेला।
यह सब कुछ 1 महीने पहले हुआ था अब वापस कहानी को विनय के नजरिए से लेकर चलते हैं जहां पर रात में वह सब कुछ देखा है
यहां से कहानी वापस विनय के नजरिया से चलते हैं
रात बीत गई थी, लेकिन विनय की आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से अंदर आने लगी थी। सरिस्का नाइटी में उसके बगल में लेटी हुई थी। उसी नाइटी से अभी भी वह भारी, मर्दाना गंध आ रही थी—खैनी मिली हुई, पसीने की, और कुछ और… जो विनय अब अच्छी तरह पहचान चुका था।
उसने आँखें बंद रखीं। साँसें जानबूझकर धीमी। लेकिन दिमाग में रात की हर आवाज़ घूम रही थी—थप-थप, सिसकियाँ, चाचा की गहरी गुर्राहट, और सरिस्का की वे बेकाबू आवाज़ें जो उसने सात साल में कभी नहीं सुनी थीं।
कुछ देर बाद सरिस्का उठी। धीरे से बच्चे को देखा, फिर विनय की ओर। उसने तकिया ठीक किया और धीमी आवाज़ में बोली, “अभी भी सो रहे हो… रात भर नींद नहीं आई क्या?”
विनय ने आँखें खोलीं। नकली नींद भरी आवाज़ में बोला, “हूँ… थोड़ी देर से जागा हूँ।
सरिस्का बाहर चली गई। किचन से बर्तनों की आवाज़ आने लगी। विनय चारपाई पर पड़ा रहा। व्हीलचेयर अभी भी कोने में खड़ी थी—उतनी ही दूर। उसने एक बार हाथ बढ़ाकर देखा। पहुँच से बाहर।
विनय चारपाई पर पड़ा-पड़ा आँखें फाड़े सोच रहा था—अब तो साफ़ पता चल चुका था कि यह सब एक महीने से चल रहा है, और वह खुद हर रात नींद की गोली निगलकर बेहोश पड़ा रहता था जबकि दीवार के पार उसकी बीवी चाचा के नीचे कराह रही होती थी। उसने सिर्फ़ आवाज़ें सुनी थीं, कुछ देखा नहीं था, लेकिन कल्पना ही काफी थी उसे सहमाने के लिए। जैसे ही चाचा रामबहादुर का चेहरा दिमाग में आता—छह फुट पाँच का विशाल, साँड़ जैसा काला और तगड़ा शरीर, मोटे-मोटे हाथ, भारी छाती और वह मर्दाना गंध—विनय की रूह सचमुच काँप जाती, सीना धक-धक करने लगता और हाथ-पैर ठंडे पड़ जाते। फिर तुरंत सरिस्का की वे रात वाली सिसकियाँ याद आ जातीं—हल्के दर्द में निकली हुई, फिर मज़े से भरी, जोर-जोर की “आह… आउछ… पूरा अंदर…” वाली आवाज़ें, जो उसने सात साल में कभी नहीं सुनी थीं। और उसके साथ सरिस्का का बदला हुआ रूप—पहले वाली संयमित, घरेलू औरत की जगह अब वह गोरा-गदराया, भारी स्तनों और गोल-मटोल नितंबों वाला शरीर जो जानबूझकर कामुक अंदाज़ में हिलता था, टाइट ब्लाउज में निप्पल उभरते हुए, पतली साड़ी में जाँघों की गोलाई साफ़ दिखती हुई, और वह तरीका जिससे वह चाचा के कमरे में जाते समय अपनी गांड को लहरों की तरह हिलाती थी—सब कुछ विनय के मन को और गहरे घाव दे रहा था।
विनय चारपाई पर पड़ा-पड़ा दिमाग दौड़ा रहा था। सिर्फ़ सुनना अब काफी नहीं था। उसे देखना था—अपनी आँखों से देखना था कि दोनों कैसे मिलते हैं, कैसे छूते हैं, कैसे सरिस्का उस साँड़ जैसे शरीर के नीचे कराहती है। कोई जुगाड़ लगाना होगा। कोई तरीका निकालना होगा जिससे वह दीवार के पार की घटनाओं को अपनी आँखों से देख सके। दिमाग में योजनाएँ घूम रही थीं जब किचन से बर्तनों की आवाज़ थम गई।
सरिस्का काम खत्म करके कमरे में आई। उसने एक नई, अच्छी डिज़ाइन वाली साड़ी पहन रखी थी—गहरा मैरून रंग, पतला रेशमी कपड़ा। ब्लाउज लो-कट और टाइट था, और साड़ी की गाँठ नाभि से पूरे चार इंच नीचे बँधी हुई थी। उस गाँठ के नीचे से उसकी नरम, गोरी कमर की गहराई साफ़ झलक रही थी। बदन 36-28-38+ का था, लेकिन आज और भी कामुक लग रहा था। भारी, गोल स्तन ब्लाउज में ठूँसे हुए से थे, हर साँस के साथ हल्के-हल्के ऊपर-नीचे हो रहे थे। निप्पल की उभार साफ़ उभर आई थी। कमर पतली और गहरी, फिर अचानक चौड़े कूल्हे और वह भारी, गोल, भरी हुई गांड—जो चलते समय एक अजीब, बेहद कामुक अंदाज़ में दाएँ-बाएँ हिल रही थी। हर कदम पर नितंबों की मांसपेशियाँ सिकुड़ती और फूलती दिखतीं, साड़ी का किनारा जाँघों के बीच से थोड़ा ऊपर उठ जाता और फिर धीरे से नीचे गिर जाता। गोरी, मोटी जाँघें साड़ी के नीचे से हर हिलने पर उभर रही थीं। बाल खुले थे, गर्दन लंबी, और चेहरे पर एक हल्की सी चमक।
चाचा बेटे को स्कूल छोड़कर वापस आए। तुरंत तैयार हो गए और तीनों विनय के कमरे में ही बैठकर खाना खाने लगे। विनय हर पल दोनों पर नज़र रखे हुए था। एक महीने पहले ऐसा व्यवहार कभी नहीं था। सरिस्का चाचा से बात करते समय एक छिपी हुई, अलग सी मुस्कान लिए रहती थी—वही मुस्कान जो वह हमेशा विनय की नज़रों से बचाकर रखती। उनकी बातों का अंदाज़ पूरी तरह बदल चुका था। छोटी-छोटी बातों में भी एक परिचित अंतरंगता झलकती। चाचा की भारी आवाज़ में हल्की सी मालिकाना तनक, और सरिस्का के जवाबों में एक दबी हुई मिठास।
खाना खत्म होते ही चाचा ने कहा, “मुझे दो दिन के लिए ठेकेदार के काम से बाहर जाना पड़ेगा। शहर से थोड़ी दूर।” फिर जेब से कुछ नोट निकालकर सरिस्का के हाथ में रख दिए। “ये रख ले। ज़रूरत पड़े तो इस्तेमाल कर लेना।”
सरिस्का ने पैसे लिए और सिर हिलाया। फिर चाचा के साथ गेट तक जाने को उठ खड़ी हुई। विनय ने देखा—उसकी गांड फिर से उसी कामुक अंदाज़ में हिल रही थी, जैसे जानबूझकर।
गेट पर दोनों कुछ देर रुके। विनय खिड़की से ठीक से नहीं देख सकता था, लेकिन आवाज़ें हल्की-हल्की आ रही थीं। कुछ बातें हो रही थीं। फिर चाचा की भारी हँसी। सरिस्का की दबी हुई हँसी। लगता था हल्की-फुल्की छेड़खानी हो रही है—शायद हाथ का स्पर्श, या कोई फुसफुसाहट। फिर चाचा चले गए।
सरिस्का गेट बंद करके अंदर आई। चेहरे पर वही छिपी मुस्कान अभी भी बाकी थी। उसने विनय की ओर एक नज़र डाली, फिर सामान्य अंदाज़ में बोली, “चाचा दो दिन के लिए गए हैं…
सरिस्का ने गेट से लौटकर हल्की उदासी भरी आवाज़ में कहा, “चाचा दो दिन के लिए गए हैं… यूँ ही अचानक चले जाते हैं, पहले बताते भी नहीं।” चेहरे पर एक हल्की सी उदासी छाई हुई थी, जो वह छुपाने की कोशिश कर रही थी। विनय का मन तुरंत बैठ गया। दो दिन और इंतज़ार… उसकी योजनाओं पर पानी फिर गया। अब और सब्र करना पड़ेगा। वह मन ही मन प्लान बनाने लगा—जब चाचा लौटेंगे तो कैसे दोनों को एक साथ देख सके।
रात को जब सरिस्का ने सोचा कि विनय गहरी नींद में है, उसने फोन मिलाया। विनय आँखें बंद किए पड़ा रहा, लेकिन कान पूरे खड़े थे। चाचा की मोटी, भारी आवाज़ दूर से अस्पष्ट गूँज रही थी—शब्द साफ़ नहीं आ रहे थे। लेकिन सरिस्का की आवाज़ बिल्कुल साफ़ सुनाई दे रही थी। वह धीमे स्वर में, हल्की सिसकी लिए हुए बोल रही थी—“हाँ… याद आ रहा है… आपका वो… इतना बड़ा… अभी भी दर्द हो रहा है थोड़ा… रात भर कैसे सहा था… दो दिन कैसे कटेंगे… जल्दी आ जाइए ना… मुझे आपकी जरूरत है… हाँ… वैसा ही… पूरा अंदर वाला… सोचते ही गीली हो जाती हूँ…” बातें काफ़ी देर तक चलती रहीं। सरिस्का कभी हल्की हँसी तो कभी दबी सिसकी निकालती। विनय हर शब्द सुन रहा था, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।