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Incest ससुराल की नयी दिशा

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prkin

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ससुराल की नयी दिशा
अध्याय ५7: पल्लू का मायका और ससुराल

********

पल्लू का मायका
अब तक:


फागुनी और मायादेवी ने वस्त्र पहने और फागुनी फिर अपने घर की ओर चल पड़ी.

अब आगे:

“ क्यों माँ जी, क्या बात करोगी? मुझे तो कुछ सूझ नहीं रहा है. मैंने सोचा था कि माँ जी ही कोई सुझाव देंगी, पर उन्होंने तो हमारे पाले में ही डाल दिया.” फागुनी बोली.

मायादेवी, “हाँ, मुझे भी समझ नहीं पड़ रहा है. पर किसी प्रकार से मनोज को मनाना ही होगा. नहीं तो चार चार लौड़े हमें ही पेलेंगे.”

फागुनी हँसते हुए, “वैसे वो भी कोई बुरा परिणाम नहीं है हमारे लिए.” फिर गंभीर स्वर में, “पर अगर आप सफल हुईं तो हमारे घर में भी छुपा छुपी का खेल बंद हो जायेगा.”

तभी मायादेवी की दृष्टि एक विज्ञापन पर पढ़ी. वैसे तो ऐसे विज्ञापन बहुत दिखते हैं पर उसे देखकर उसके मन में एक विचार कौंधा. उसने अपना मोबाइल निकाला और फिर ढूँढकर एक नंबर लगाया. घंटी की ध्वनि सुनकर फागुनी को चुप रहने का संकेत दिया.

जब उसकी बात समाप्त हुई तो फागुनी उन्हें आश्चर्य देखने लगी, “आप उन्हें कैसे जानती हो?”

“अरे मेरे ही साथ पढ़ता था, बहुत पीछे पड़ा रहता था, पर तुम्हारे बाबूजी ने ऐसा फँसाया कि किसी और को देखा भी नहीं उनके बाद. वो हमारी सहायता करेगा। देखो क्या होता है, पर बात आरम्भ करने का तो विषय मिल गया.”

जब फागुनी के घर पहुँचे तो मायादेवी को उतारकर फागुनी चली गई और कुछ दूर जाकर गाड़ी पार्क कर दी. माया ने घंटी बजे और मनोज ने द्वार खोला तो माया को देखकर चकित रह गया. आधे घण्टे पहले चुदी हुई मायादेवी बहुत सुंदर लग रही थीं.

“अरे माया, तुम? यहाँ कैसे?”

“आपसे मिलने आई हूँ भाईसाहब.”

“अच्छा, पर जया तो फागुनी के साथ गई है.”

“मुझे पता है, इसीलिए आई हूँ, अंदर आऊँ?”

“अरे हाँ, मैं तुम्हें देखकर ध्यान ही नहीं रख पाया. आओ.”

अंदर जाकर माया को बैठाया और मनोज उसके सामने बैठ गया.

“हाँ बताओ, क्या बात है.”

“आप मेरी बात का बुरा न मानना, पर जया ने आपकी स्वास्थ्य से उपजी समस्या मुझे बताई है.”

मनोज एक पल के लिए स्तब्ध रह गया, परन्तु आयु में ऐसा होता ही है.

“हाँ, उच्च रक्तचाप और मधुमेह के कारण अब मैं उसे उस प्रकार का सुख नहीं दे पता हूँ.”

“मेरे एक मित्र हैं, जिनका इस विषय में गहन अध्ययन है, अपने नाम सुना होगा.” ये कहकर माया ने अपने मित्र का नाम बताया.

“हाँ, मैंने सुना है उनके विषय में. परन्तु कभी सोचा नहीं मिलने को. मेरे डॉक्टर तो कहते हैं…”

“मैंने उनसे बात की है, वो आपको देखने के लिए मान गए हैं. हालाँकि उनका कहना है कि इसमें छह माह से एक वर्ष तक लग सकता है, परन्तु आपकी शक्ति बहुत मात्रा में लौट सकती है. पहले जितनी नहीं, पर अब से अधिक अच्छी.”

“ये तो बहुत अच्छी बात बताई तुमने, जब कहोगी तब चला जाऊँगा।”

“आज ही. मेरे जाने के साथ आप भी चले जाइये.” माया ने उन्हें स्थान और फोन नंबर दे दिया.

मनोज ने माया को देखा, “अगर मैं सही हूँ तो तुम्हें और कुछ भी बोलना है. निसंकोच बोलो, अगर जया के विषय में है तो मैं उसकी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर सकता हूँ.” मनोज को ये समझने में देर नहीं लगी थी कि माया चुदवा कर आई थी और सम्भवतः जया के लिए बात करना चाह रही थी.

“मैं जानती हूँ. तभी आप बाहर से लड़कों को पैसे देकर उसको संतुष्ट करते हैं. पर मेरी बात सुनिए.”

मनोज जितना शांत था ये माया की समझ से परे था. उसने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. मनोज ने अपना हाथ उठाया.

“तुम्हारे पास इसका उपाय है, और तुम्हारे चेहरे की लाली बता रही है कि कुछ समय पहले ही तुमने सम्भोग किया है.”

माया हड़बड़ा गई. फिर संयत हुई और बोली.

“जी, अपने सही समझा है. मैं चाहती हूँ कि आपके स्वास्थ्य लाभ तक जया को भी उस समूह में मिला लूँ, जहाँ से मुझे सुख मिलता है.”

“माया, तुम जानती हो कि मुझे इसमें कोई विशेष आपत्ति नहीं है. पर हम दोनों ने अभी यही सोचा है कि इस प्रकार बाहर के लोगों से संबंध बनाने से और बात बाहर आने से परिवार पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.”

“और अगर परिवार सब हो जाये तो?” माया ने तुरुप का इक्का फेंका.

“क्या कह रही हो? ऐसा कैसे सम्भव है.” मनोज अब लगभग चीख पड़ा.

“अगर मेरी पूरी बात सुनो तो आपको समझ आ जायेगा.”

इसके बाद माया ने संक्षेप में परिवार में चल रहे व्यभिचार वर्णन किया. मनोज का मुँह खुला हुआ था. परन्तु इतने वर्ष बाद उसके लंड ने अंगड़ाई ली तो उसे अचानक ही समस्या का हल मिल गया. अगर माया के मित्र ने उसका उपचार किया तो सम्भव है वो अपनी पत्नी को सुख देने में समर्थ हो जायेगा।

उसने माया की ओर देखा जिसका चेहरा दमक रहा था, जैसे जया का चेहरा चुदाई के बाद चमकता था. वो उठा और माया को रुकने का संकेत देकर अपने कमरे में चला गया. बाहर निकला तो उसने नए कपड़े पहने हुए थे.

“मुझे ये समाधान स्वीकार है. जया को कहो उसे मेरी ओर से अनुमति है. और अब हमें चलना चाहिए, तुम कैसे जाओगी?”

“मुझे फागुनी लेने आएगी. मैं रूकती हूँ यहीं.”

“हाँ, ठीक है. अपने मित्र से कहो मैं उनसे मिलने आ रहा हूँ.”

ये कहकर मनोज आगे बढ़ा तो माया खड़ी हो गई. मनोज ने माया को बाँहों में भर लिया.

“जया के लिए मुझसे बात करने का जो साहस दिखाया है, उसके लिए धन्यवाद. अब मैं चलता हूँ. जया से कहना वो पूरा आनंद ले. मेरा आशीर्वाद उसके साथ है.”

ये कहकर मनोज चला गया और उसकी गाड़ी को जाता देख फागुनी तुरंत आ धमकी.

“क्या हुआ माँ जी?”

“मिशन सफल हुआ. अब चलो जया का भी उद्घाटन कर ही दिया जाये.”

दोनों हँसते हुए घर बंद करके भावना के घर चल दीं.

जब दोनों घर पहुँचे तो वहां वातावरण बहुत गंभीर था. जया को भावना बैठकर समझा बुझा रही थी. चारों लड़के अपने मोबाइल पर व्यस्त थे. उन्हें पता था कि किसी न किसी युक्ति से मायादेवी और फागुनी मामी सफलता प्राप्त करेंगी. उनकी दृष्टि बार बार जया दादी/नानी पर पड़ती और जब वो भी उन्हें देखतीं तो झेंपकर मुंह घुमा लेतीं। कनखियों से उनके लंड देखकर उनकी चुदाई की इच्छा बलवती हो रही थी. परन्तु अपने पति की अनुमति के बिना वो इसका सुख नहीं लेना चाहती थी.

भावना उनकी इस दुविधा से स्वयं भी दुविधा में पड़ गई थी. जहाँ वो चाहती थी कि उसकी माँ भी वही सब सुख पाए जो उन सबको प्राप्त है. परन्तु ये भी सच था कि वो भी अपनी पिता की भावनाओं के प्रति चिंतित थी.

फागुनी और मायादेवी को गए लगभग सवा घण्टे हो चुके थे. माँ बेटी किसी अनिष्ट की आशँका से एक दूसरे को समझा रही थीं कि एक गाड़ी के रुकने की ध्वनि सुनाई दी. अब दोनों के ह्रदय गति बढ़ गई. न जाने क्या समाचार लेकर आएंगी दोनों.

पहले मायादेवी आईं और झटपट कपड़े उतारने लगीं.

“इतनी देर ये सब पहनकर बड़ी उलझन हो रही थी.” उनके बोलने से लगता था मानो वो निर्वस्त्र ही रहती हों. जया और भावना उनको देख रहे थे क्योंकि उन्होंने आकर ये तो बताया ही नहीं कि क्या निष्कर्ष निकला.

फागुनी आई तो उसने भी यही किया. दोनों चुप थीं. अंत में जया से रहा नहीं गया.

“क्या हुआ? क्या बोले वो? मैं उन्हें अपना मुँह दिखा पाऊँगी भी नहीं?” जया रुआँसी सी हो गई. भावना ने उन्हें फिर सँभाला।

मायादेवी आगे आईं और उसके चेहरे को हाथ में लिया और होंठ चूम लिए, “अब गई थी तो खाली हाथ तो लौटने वाली नहीं थी. मैंने भाईसाहब को मना लिया और उन्होंने कहा कि उनका आशीर्वाद तुम्हारे साथ है, निसंकोच अब अपने आनंद के लिए चुदवा सकती हो हम सबसे.”

“उन्हें सब बता दिया?”

“बिना उसके कैसे हो सकता था. वैसे एक बात और भी है.” उसके बाद मायादेवी ने मित्र के विषय में बताया और ये भी बताया कि मनोज उन्हें ही मिलने गए हैं.

ये सुनकर जया बल्लियों उछल पड़ी.

मायादेवी, “मुझे लगता है कि जैसे ही वो ठीक हो जायेंगे, वो भी हमारे साथ जुड़ जाएंगे।”

इतने में शुभम आया और अपनी दादी मायादेवी के पीछे आकर उनके स्तन दबाते हुए बोला, “क्या हुआ दादी?” ये कहते हुए उसने मायादेवी की गर्दन पर चुंबन लिया.

मायादेवी ने अपना एक हाथ पीछे किया और शुभम के लंड को पकड़ा.

“तेरी नानी को हम सबसे चुदवाने का लाइसेंस लेकर आई हूँ. अब इसका भी उद्घाटन कर दो जैसे मेरा किया था तुम बच्चों ने.”

“अरे वाह, दादी. ये हुई न बात!” ये कहते हुए उसने मायादेवी को छोड़ा और अपनी नानी सामने खड़ा हो गया.

“सचमुच नानी! आप जुड़ोगी हमारे साथ!” अब तक सुनकर निकुंज, हरीश और गिरीश भी पास आ गए और जया को घेर लिए.

“हाँ, मैं भी जुड़ूँगी। और हर प्रकार से जुड़ूँगी। पर आज उतना नहीं, आज बस आरम्भ करेंगे. उसके बाद नाना से बात करने के बाद ही कुछ करुँगी।” जया ने उत्तर दिया.

ये सुनकर मायादेवी आगे बढ़ीं.

“सुनो. मेरे विचार से आज केवल निकुंज और शुभम को ही अवसर देते हैं.”

गिरीश और हरीश माँ मुंह लटक गया. “फिर हम?”

“ हरीश और गिरीश तो उन्हें घर में चोद सकते हैं.” जया ने कहा, फिर उनकी ओर देखती हुई उन्हें डाँटा,

“और तुम दोनों, अपनी माँ को क्या ऐसे ही सूखा छोड़ दोगे? सुबह से बेचारी इधर से उधर भाग रही है. न कुछ पिया न कुछ खाया. दादी दिखी नहीं कि लार टपकने लगी?” जया ने कहा तो दोनों भाइयों की गाँड फट गई.

“आप ठीक कहती हो. हम मम्मी का ध्यान रखेंगे. और दोनों दादी का.” दोनों जुड़वाँ भाइयों ने एक स्वर में कहा.

“ठीक है.”

ये कहते हुए उसने फागुनी को संकेत दिया तो वो आगे बढ़ी और अपने दोनों बेटों के लौड़े पकड़कर चुदने चल दी.

निकुंज अति उत्साहित था. पिछली बार मायादेवी के उद्घाटन से उसे वंचित जो रखा गया था. और आज उसके वो दोनों भाई इसका भुगतान कर रहे थे. उसे जब ये पता चल ही गया कि अब नानी भी चुदने के लिए आतुर हैं तो उसने साहस दिखाया और उनके सामने जाकर उनके चेहरे को हाथों में लेकर उनके होंठ चूम लिए. जया ने उसकी गर्दन पर हाथ रखा और अपने होंठों को उससे मिलाकर एक गहरा चुंबन लिया. दोनों इसमें ही डूब गए.

शुभम ने अपनी दादी मायादेवी से पूछा और नानी के पीछे जा खड़ा हुआ. उसने अपने हाथों में उनके स्तन लिए और हल्के से दबाने लगा. ऐसा करने से जया की आग और भड़क गई और उसने निकुंज से चुंबन को और प्रगाढ़ कर दिया. भावना अपनी माँ के इस रूप को देखकर संतुष्ट हुई और मायादेवी को लेकर एक ओर बैठ गई.

जहाँ शुभम और निकुंज अपनी नानी जया की पहली पारिवारिक चुदाई की ओर अग्रसर थे, वहीँ जया आँख बचाकर फागुनी अपने बेटों के साथ स्नानागार में गई और अपनी प्यास बुझाई. इतनी देर की प्यास को उसके दोनों बेटों ने अपने अपने योगदान से बुझाया और फिर फागुनी ने मुँह धोया और हरीश को नीचे लिटाकर उसके लौड़े चढ़ गई. उसे न लंड चाटने थे, न चूत या गाँड चटवानी थी. वो तो अब चुदना चाहती थी. और कुछ ही पलों में उसकी चूत और गाँड में उसके बेटों के लौड़े आवागमन करने लगे.

अपनी नानी के मम्मे दबाते हुए शुभम ने एक हाथ हटाया और उनकी चूत सहलाने लगा.

चूत को छूते ही जया काँप गई, शुभम को अपने हाथ पर एक गीलेपन का अनुभव हुआ. वो जान गया कि नानी चुदने के लिए आतुर है.

“निकुंज, भाई नानी को पलंग पर ले चलो. अब देर मत करो.” ये कहते हुए उसने जया के कान में फुसफुसाया, “नानी, गाँड मरवाती हो क्या?”

जया ने शरमाते हुए हाँ कहा तो शुभम ने मम्मे दबाते हुए कहा, “तब तो आपको बहुत आनंद देंगे.”

निकुंज ने नानी का हाथ थामा और उन्हें पलंग पर ले गया. दादी और भावना उन तीनों को देख रही थीं.

“मैंने कभी न सोचा था कि मैं अपनी ही माँ को अपने बच्चों से चुदवाती हुई देखूँगी।” भावना बोली तो मायादेवी हंसने लगी.

“बोल तो ऐसे रही है मानो मुझे चुदवाती हुई देखने के विषय में सोचा थी.”

“सच माँ जी. कुछ ही दिनों में कितना कुछ घट गया है. आप फिर पल्लू दोनों जुड़ीं और आज मेरी माँ भी, नीतू के विवाह की बात चल रही है. और बाबूजी अब किसी वैद्य से मिलने गए हैं अपने उपचार के लिए.”

“जो होता है बहू, अपने समय से ही होता है. हमें उसे स्वीकार करना चाहिए. मेरा मित्र अवश्य भाईसाहब को पूरा नहीं तो इतना स्वस्थ अवश्य कर देगा कि वो लगभग सामान्य जीवन जी सकेंगे. मुझे लगता है इसके लिए मुझे उसे कोई न कोई पुरुस्कार अवश्य देना होगा.” मायादेवी ने मुस्कुराते हुए कहा.

“आप कैसा पुरुस्कार देंगी, मुझे आभास है. आपके मित्र बहुत भाग्यशाली बनने वाले हैं.” भावना ने उन्हें देखते हुए कहा और अपनी माँ की ओर देखने लगी जो अब अपने पाँव फैलाये लेटी हुई थीं और निकुंज उनकी चूत चाट रहा था. जया ने शुभम का लंड हाथ में पकड़ा हुआ था.

अचानक भावना के मन में एक विचार आया. वो शुभम के पास गई.

“मेरी एक बात मानेगा बेटा?”

“बोलो मम्मी.”

“देख, नानी की पहली चुदाई निकुंज को ही करने दे, मुँह, चूत और गाँड तीनों की. तुम सबने अपनी दादी को इसको मिलाये हुए भोगा था, तो इस बार इसे पहल करने दे. बस थोड़ी थोड़ी देर तीनों स्थानों में, फिर तुम कर लेना और अंत में तुम दोनों मिलकर.”

शुभम ने कोई आपत्ति नहीं की, बल्कि उसने अपना सिर हिलाकर सहमति दे दी. निकुंज ये सुन रहा था और उसे प्रसन्नता हुई कि नानी का उद्घाटन उसे करना है और उसकी ताई जी ने उसे प्राथमिकता दी.

जया ये सुनकर बड़ी उत्तेजित हो रही थी. परिवार में इतना मेल मिलाप और सौहार्द्य देखकर उसका मन प्रसन्न था. उसे विश्वास था कि शीघ्र ही उसे परिवार के अन्य सदस्यों से चुदने का भी अवसर प्राप्त होगा. निकुंज ने जब चूत चाटकर उसका पानी छोड़ा तो वो हल्की सी चीख के साथ ढह गई. फिर उसने बैठते बुए निकुंज को अपने पास बुलाया.

“आ बेटे, अब अपनी नानी को भी अपने लंड का स्वाद दे दे. वैसे बहुत अच्छी चूत चाटता है. बहू बड़ी भाग्यशाली है तेरे जैसे बेटे को पाकर.”

मायादेवी ने भावना से कहा, देख ऐसा कर तू अपनी माँ को संभाल, उसकी सफाई अच्छे से करती रहना, मैं अपनी बहू को देखती हूँ. वहाँ दोनों अपना पानी छोड़ने को हैं तो उसका भी ध्यान रखना होगा.”

भावना ने उनकी ओर देखा और अपनी माँ जया के पास चली गई.

जया ने बड़े प्रेम से निकुंज के लँड को पकड़ा और उसके टोपे पर अपनी जीभ घुमाई. निकुंज सिहर गया, शुभम अपनी माँ के पास आकर खड़ा हो गया. जया ने देर न की और निकुंज के लँड को अपने मुँह में ले लिया.

“माँ, बस अधिक मत करना, दोनों जब एक साथ चोदे तब झड़ने देना. फिर तो जब मन हो इनके साथ आनंद ले सकती हो. आज समय भी कम है.”

जया ने उसकी बात समझी और बस तीन चार मिनट ही अपने नाती का लँड चूसकर छोड़ दिया. निकुंज उसकी टाँगों के बीच में आ बैठा.

भावना अपने भतीजे और माँ के मिलन का पहला अध्याय देख रही थी. उसने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि ऐसा कभी सम्भव होगा. पर यथार्थ यही था. निकुंज का तना लौड़ा अब जया की चूत पर घर्षण कर रहा था. जया कसमसा रही थी. उसने निकुंज को मानो विनती करते हुए संकेत दिया कि वो अब देर न करे. निकुंज भी अधीर था और उसने धीमे से अपनी नानी की चूत में लंड डाला. सुपाड़ा अंदर जाते ही जया ने एक गहरी श्वास छोड़ी और अपनी बेटी को देखा, जिसका ध्यान अपनी माँ की चूत और भतीजे के लँड पर केंद्रित था.

“अब देर न कर, चोद दे अपनी नानी को.” भावना ने निकुंज को बोला। निकुंज ने कुछ और दबाव बनाते हुए कुछ ही देर में अपना पूरा लौड़ा अपनी नानी की चूत में डाल दिया. दोनों इस अद्भुत अनुभूति का आनंद ले रहे थे.

भावना ने दोनों को देखा और सोचा, “चलो, मेरी माँ ने परिवार का पहला लौड़ा ले लिया. अब तो अन्य सबके लिए भी ये राह खुल गई.

जया और निकुंज एक दूसरे के साथ जुड़े होने का आनंद ले रहे थे कि एक तीव्र चीख सुनाई दी. सबने उस ओर देखा जहाँ अब फागुनी काँपते हुए झड़ रही थी. उसके दोनों बेटे उसे चोदे जा रहे थे और उसकी इन चीखों पर मानो कोई ध्यान ही नहीं दे रहे थे. जया ने भावना को देखा तो भावना मुस्कुराई.

“माँ, फागुनी को ऐसी ही चुदाई रास आती है, यही नहीं मेरी सासू माँ भी ऐसी ही चुदाई की इच्छुक रहती हैं. सच कहूँ तो हम सब, मैं, दीप्ति, पल्लू और नीतू भी ऐसी ही चुदाई का सुख पाने की लालसा रखती हैं. आपकी क्या रूचि है.”

“मुझे भी यूँ ही चुदना अच्छा लगता है, पर तेरे बाबूजी के कारण अधिक चीख नहीं सकती. पर अब लगता है इस समस्या का भी समाधान मिल गया है.”

“माँ जी, आज एक बार सामान्य चुदाई करवा लो, आज रात से ऐसी ही चुदाई की जाएगी, जब आपका बेटा अपने बेटों के साथ आपको चोदेगा।”

“पर तेरे बाबूजी?”

उनको फागुनी को संभालने देंगे. वो सब देख लेगी.” फिर निकुंज से बोली, “बेटा, अब देर न कर, फिर तुझे गाँड भी मारनी है और शुभम भी प्रतीक्षा कर रहा है.”

“जी, ताईजी।” ये कहते हुए निकुंज ने धीमी गति से अपनी नानी की चुदाई आरम्भ कर दी. उसे पता था कि उसे पहला अवसर केवल ताला खोलने के लिए दिया गया है. उसके बाद तो नानी की चूत, गाँड और मुँह कभी लंड बिना नहीं रहेंगे.

भावना बड़े संयम से निकुंज की चुदाई को देखती रही फिर कोई पाँच मिनट बाद उसने कहा, “बस बेटा, अब गाँड का भी कल्याण कर दे.”

जया सिहर गई. उसे गाँड मरवाने में जितना आनंद आता था उसकी तुलना चूत से सम्भव नहीं थी. निकुंज ने जया को देखा तो उसने सहमति में सिर हिलाया. इस पूरे प्रकरण में जया ने कुछ भी बोला न था. वो अब भी एक स्वप्न में जी रही थी.

“माँ जी, इसी आसन में रहोगी या घोड़ी बनना चाहोगी?”

जया ने कुछ न कहा और एक करवट ली और घोड़ी बन गई. आगे झुकते हुए उसने अपनी गाँड के दर्शन करवाए तो भावना ने अपने हाथ में ली हुई तेल की शीशी से उसकी गाँड में कुछ बूँदें डाल दीं और फिर निकुंज के लंड पर वही तेल लगाकर उसके लंड को अच्छे से चिकना कर दिया.

“जा बेटा, अब अंतिम किला भी जीत ले.”

उसी समय फागुनी के बेटों ने एक चिंघाड़ भरते हुए अपनी माँ की चूत और गाँड में अपना पानी छोड़ दिया और कुछ पल के बाद पहले गाँड से और फिर फागुनी को हटाते हुए उसकी चूत से लंड निकाल लिया.

मायादेवी तो मानो इस समय को ही प्रतीक्षा में थीं, उन्होंने तुरंत फागुनी की चूत और गाँड को चाटकर उसे चमकाया और फिर बचा हुआ रस भी सोख लिया. इसके पहले कि फागुनी अपनी इच्छा बताती उसने एक एक करके दोनों लौंड़ों को भी चाटकर अपनी इच्छा पूरी कर ली.

“माँ जी, मेरे लिए कुछ न छोड़ा?” फागुनी ने मुंह बनाते हुए कहा.

“अरे तेरे तो घर का माल है. जब मन चाहे खा पी लेना अब. तेरे ऊपर से सब बंधन जो हट गए हैं. चल उनकी चुदाई देखें और फिर थोड़ी प्यास भी लगी है तो इन दोनों से उसका भी उपचार करवा लें.”

“नहीं माँ जी, पहले पेट पूजा, फिर कोई काम दूजा.” फागुनी ने अपने होंठों पर जीभ घुमाई.

“तो चलो फिर.”

चारों फिर स्नानागार की ओर चल पड़े तो भावना ने देखा पर कुछ कहा नहीं.

“मॉम, मैं अभी आया.” शुभम ने कहा और उनके साथ चल पड़ा.

भावना ने अपना सिर निराशा में हिलाया और अपनी माँ की गाँड के छेद पर रखे हुए लंड को देखा. निकुंज ने धीमे से जया की गाँड में लंड को दबाया तो पक्क की ध्वनि से वो सरलता से प्रवेश कर गया. जया ने एक आह भरी और भावना ने जाकर अपनी माँ के मम्मे दबाये.

“माँ, आपका अब परिवार में पूर्ण मिलन हो गया है. अभी निकुंज को गाँड मार लेने दो, फिर शुभम आता है. वो भी ऐसे ही आपको चोदेगा और फिर आप चाहो तो दोनों आपकी मिलकर चुदाई करेंगे. क्या आप दोनों से भी एक साथ चुदना चाहोगी?”

“हाँ, भावना. सच में उस चुदाई में ही परम सुख है.” ये कहते हुए जया ने अपने कूल्हे हिलाये तो निकुंज ने संकेत समझ कर अपने लंड को और अंदर दबाया और जड़ तक समाने के बाद ही ठहरा. इस बार फिर दोनों यूँ ही शिथिल रहे. जहाँ निकुंज को गाँड की तपन का आभास हो रहा था तो जया को अपने नाती के लौड़े की तपन का.

निकुंज ने इस बार अधिक देर न रुकते हुए अपने लंड को आगे पिछे करना आरम्भ कर दिया. और कुछ ही देर में अपनी गति बढ़ा दी. तभी शुभम अपने भाइयों, दादी और मामी के साथ लौट आया. उसकी दादी और मामी के चेहरे दमक रहे थे. उनके चेहरों पर असीम संतुष्टि के भाव थे. शुभम पास कर खड़ा हुआ तो भावना ने कहा की वो अपने लंड को अपनी नानी से चुसवाये.

“माँ, लो अब अपने दूसरे नाती का लंड का स्वाद लो. तब तक निकुंज आपकी गाँड खोल देगा. फिर सरलता से आप दोनों से चुदवा सकेंगी.” भावना ने अपनी कहा तो जया ने तपाक से शुभम के तमतमाए लौड़े को अपने मुँह में लिया और चूसने लगी. निकुंज के लंड को वो मन अनुसार नहीं चूस सकी थीं, इस बार ऐसा नहीं होने देना चाहती थीं.

जया को अपनी गाँड में निकुंज के लौड़े के आवागमन का आभास हुआ तो ध्यान उस ओर चला गया. कहाँ वो अपनी गाँड मरवाने के लिए दो सप्ताह तरसती रहती थी और कहाँ कुछ दिनों में फिर से गाँड की खुजली दूर हो रही थी. आनंद से उसने एक सीत्कार ली और अपना मौन तोड़ दिया.

“हाँ बेटा, खोल दे अपनी नानी गाँड। बड़े दिनों तक तरसना पड़ता है इसे लौड़े लिए. अब तो तुम सब से ही आशा है कि मुझे तरसाओगे नहीं.”

भावना की जहाँ ऑंखें खुली रह गईं वहीँ निकुंज ने धक्के लगाते हुए कहा, “नहीं नानी, अब तो आपको हर दिन चूत और गाँड की सेवा करने के लिए कोई न कोई उपलब्ध होगा. दिन हो या रात, जब मन करे तब आपकी चूत और गाँड मारने के लिए हम सब में कोई न कोई आ जायेगा.”

“बस बेटा, यही आशा है कि रात को गाँड में बैंगन डालकर नहीं सोना होगा.”

भावना ने कभी सोचा भी न था कि उसकी माँ ऐसी भाषा का भी उपयोग करती होंगी.

परन्तु वार्तालाप के कारण शुभम का लंड फिर उपेक्षित हो गया. और भावना ने निकुंज ने कहा कि अब उसका समय पूरा हुआ. बेचारा मन मारकर हटा और भावना ने अपने पुत्र को अपनी माँ की चूत की चुदाई के लिए आमंत्रित किया.

“जा, तू नानी से लंड चुसवा अगर वो चाहें तो.”

निकुंज को अगर कोई शंका थी कि उसकी नानी गाँड से निकले लौड़े को नहीं चाटेगी, तो उसे जया ने पल भर में ही दूर कर दिया.

शुभम ने आगे बढ़कर अपनी नानी की चूत को देखा जो अब हल्की सी खुली और खिली हुई थी. उसने अपना लंड लगाया और इस बार दो धक्कों में ही अंदर डाल दिया. जया ने हल्की सी सिसकी ली पर फिर निकुंज के लंड को चाटने में जुट गई.

“माँ, अधिक मत करना नहीं तो चुदाई से पहले झड़ गया तो समय नष्ट होगा.” भावना ने समझाया तो जया ने भी अपना प्रहार धीमा किया और प्रेम से लंड चूसने लगी. शुभम बड़ी सरलता से नानी की चूत में धक्के लगाए जा रहा था.

“बस, अब नानी की गाँड मार ले फिर दोनों भाई मिलकर चोदना। शुभम ने कोई आपत्ति नहीं की और अपने लंड को नानी की गाँड पर रखा और फिर अंदर धकेल दिया. कुछ ही पल पहले निकुंज ने उसकी राह सरल कर दी थी और उसे अत्यधिक व्यवधान नहीं मिला और कुछ ही पलों में उसकी नानी की गाँड में उसका लौड़ा तीव्र गति से चलायमान हो गया.

अब तक मायादेवी उनके पास आ गई थीं.

“क्यों री, जया कैसा लग रहा है अपने नातियों से छोड़कर?”

“सच में बड़ा सुख है, माया. तेरी कृतज्ञ रहूंगी जब तक जियूँगी जो तूने मुझे ये आनंद दिलाया.”

तभी भावना बोली, “माँ, अब इन दोनों से एक साथ चुदने का भी आनंद ले ही लो. शुभम, जाकर अपना लौड़ा नानी से साफ करवा ले फिर लेट जा. तुझे चूत और निकुंज को गाँड मारनी है.”

उसने भावना को आहत दृष्टि से देखा कि वो उन्हें गाँड क्यों नहीं मारने दे रहीं, पर भावना से उसे प्रेम से आँखों से समझाया कि निकुंज को उन्होंने दादी के समय अनदेखा किया था तो इसका पुरुस्कार निकुंज को ही मिलना था.

शुभम को अपनी माँ का मंतव्य आया तो उसके मन को शांति मिली. वो लेट गया और भावना ने अपनी माँ को सहारा देते हुए उसके लंड पर चढ़ा दिया. चूत में लंड के स्थापित होते ही जया को एक अभूतपूर्व उत्तेजना का अनुभव हुआ. अब तक न जाने कितनी ही बार वो दो दो लौंड़ों से चुदवा चुकी थी, परन्तु आज अपने ही नातियों से इस प्रकार की चुदाई का आनंद प्राप्त करने वाली थी. लंड को पूरा अंदर लेने के बाद भावना ने उसे धीमे से आगे झुकाया.

“माँ, अब नीकु तुम्हारी गाँड मारने वाला है. आपको कोई आपत्ति तो नहीं है न? हमें लगता है कि आपको इसमें आनंद आएगा.”

“नहीं, मुझे तो ऐसी चुदाई में बहुत सुख मिलता है. अब और न रुको और नीकु कहो मेरी गाँड को भर दे.”

फिर उसने अपने नीचे लेटे शुभम देखा और बोली, “जमकर चोदना मुझे तुम दोनों भाई. मुझे ऐसी चुदाई बहुत भाती है.”

“बिलकुल नानी, हमें भी.”

भावना ने निकुंज को संकेत दिया उसने बढ़ते हुए अपना लौड़ा जया की गाँड के लुपलुपाते छेद पर रखा और हल्के धक्के के साथ सुपाड़े को अंदर डाल दिया.

“आह, बहुत अच्छा मेरे बच्चों, आगे बढ़ो.” जया ने कहा तो निकुंज ने बिना संकोच के एक झटका मारा और इस बार लगभग आधा लौड़ा जया की गाँड में समा गया.

“आह, और.” जया ने उत्साहित किया। बस फिर क्या था, निकुंज ने लंड को बाहर खींचा और फिर एक तगड़े धक्के के साथ पूरा लौड़ा अपनी नानी की गाँड में जड़ दिया.

“आह, क्या बात है नीकु. मस्त लौड़ा है तेरा. अब दोनों मुझे अच्छे से चोदो। अब तक झाँकी दिखा रहे थे तो अब पिक्चर दिखाओ. जम कर कूटो।”

भावना अपनी माँ के रूप को देखकर अचंभित भी थी और संतुष्ट भी. उसने उन तीनों छोड़ा और मायादेवी फागुनी के पास जाकर आगे की योजना बनाने लगी. हरीश और गिरीश उनकी बातें सुन रहे थे उन्हें कोई सुझाव देने की अनुमति नहीं थी.

जहां एक ओर फागुनी, भावना और मायादेवी अपनी योजना बना रही थीं वहीँ कमरे के दूसरी ओर से जया की चीखें सुनाई दे रही थीं. वो अपने दोनों नातियों को उत्साहित करते हुए और भीषण रूप से चोदने के लिए बोल रही थीं.

मायादेवी, “लगता है तुम्हारी माँ भी तुम्हारे जैसी ही चुदक्क्ड़ है.”

भावना ने हामी भरी तो मायादेवी ने ठिठोली करते हुए कहा, “क्या पता उसे भी बहू और मेरे जैसे खेल की इच्छा हो, पर बेचारी अपना मन मारकर बैठी हो.”

भावना ने उनकी ओर कुछ क्रोध से देखा, “माँ जी, आप ऐसी बातें न कीजिये. उन्हें छोड़ दीजिये अपने इस खेल से.”

“अरी बहुरानी, हम कौन सा उसे दबाव में डालकर ऐसा करेंगे. उसकी इच्छा हो तो खेले नहीं तो नहीं.”

“माँ जी, पर आप अपनी ओर से कुछ न कहना.”

फागुनी ने कहा, “भाभी, आप चिंता न करो. हम कुछ नहीं करेंगे, न बोलेंगे. पर उन्हें पता तो चलेगा ही, तो अगर वो चाहेंगी तो हम मना भी नहीं करेंगे, और आप भी मत रोकना उन्हें. बस मैं यही कहना चाहती हूँ.”

भावना ने पीछे मुड़कर दो दो लौड़ो से चुदती अपनी माँ की ओर देखा और फागुनी से सहमत हो गई.

फागुनी ने उसे अपनी बाँहों में लिया, “सबकी अपनी रूचि होती है. मैं जानती हूँ तुझे ये सब अच्छा नहीं लगता है, पर प्रेम वश कुछ कहती नहीं हो. यही सबके मन की बात है. मेरी विकृति को पूरा करने के लिए आप सब मुझे सहयोग करते हो.”

भावना ने फागुनी को प्रेम से जकड़ लिया.

“पर, प्रयास करना कि वो दूर रहें.”

“ठीक है. मैं माँ जी को भी समझा दूँगी।”

तभी जया की एक चीत्कार ने सबका ध्यान उस ओर खींच लिया. निकुंज अब गुर्रा रहा था और झड़ने ही वाला था. मायादेवी उसके पास पहुँची और बोलीं, “अंदर मत छोड़ना, लल्ला, नानी को पिला देना.”

निकुंज ने ये सुनकर दो तीन धक्के और लगाए और फिर अपना लौड़ा जया की गाँड से निकाल लिया. मायादेवी ने जया से कहा कि अब वो शुभम के ऊपर से हटे और दोनों का पानी पी ले.

जया अब झड़ते झड़ते थक गई थी, वो एक ओर लुढ़क गई. मायादेवी ने उसे सहारा देकर बैठाया और शुभम और निकुंज से कहा कि अब नानी को पानी पिला दें.

दोनों अपनी नानी के सामने अपने रस से भीगे लौड़े लेकर खड़े हो गए.

“जया, अब तू इन्हें चूस कर इनका पानी पी ले.” मायादेवी ने कहा.

जया ने अपने सामने खड़े दोनों लौंड़ों को देखा और पहले शुभम के लंड को चाटा और फिर उसे पूरी तन्मयता से चूसने लगी. शुभम जो झड़ने के निकट था अधिक न रुक पाया और उसने अपना रस नानी के मुँह में छोड़ दिया.

“कैसा लगा अपनी चूत का स्वाद अपने नाती ने लंड के रस के साथ?” मायादेवी ने प्रेम से पूछा.

“बहुत स्वादिष्ट.”

“तो अब अपनी गाँड का स्वाद भी चख ले, आजा निकुंज बेटा।”

निकुंज तो कबसे इसको प्रतीक्षा में था. जया ने प्रेम से अपनी गाँड से निकले लंड को चाटा और फिर चूसने में जुट गई.

“आह नानी, क्या चूसती हो आप!” ये कहते हुए कुछ ही देर में निकुंज ने भी अपनी नानी के मुँह में अपना रस छोड़ दिया.

तीनों सुस्ताने लगे.

फिर मायादेवी ने कहा, “चलो, आज के लिए इतना ही. अब आगे देखेंगे कब क्या करना है. फागुनी, चल इनको नहला दे फिर घर ले जा.”

“मुझे नहीं नहाना है.” जया ने कहा तो सब चौंक गए. “मैं घर पर ही नहाऊँगी, तब तक इनकी गंध में लिपटी रहना चाहती हूँ.”

“ठीक है. जैसा तुम चाहो.”

फिर जया उठी और अपने वस्त्र पहने. उसने अपने नातियों को चूमा और फिर अपनी बेटी के माथे को चूमते हुए उसे आशीर्वाद दिया. उसके बाद मायादेवी वहीँ रुक गईं और फागुनी जया और अपने बेटों के साथ अपने घर के लिए निकल गई.

जया में मन में संशय था कि न जाने उसके पति क्या सोचेंगे? स्नान न करने का एक ये भी कारण था. अगर उन्होंने मुझे अनुमति दी है तो उन्हें पता होना चाहिए कि मैं किस रूप में उनके पास लौटी हूँ.

चारों अपने अपने विचारों में डूबे हुए कुछ देर में अपने घर पहुंच गए.



क्रमशः
Nice update.....
 

Mass

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Wonderful sexy update bhai...
जाया तो पूर्ण तृप्त हो गयी.

Btw, No one writes orgies and/or gang bang better than you :)

prkin
 
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prkin

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