Update 01
1990 का समय था सावन अपनी पूरी शक्ति से बरस रहा था और में अपने नई घर में बिस्तर पर बैठी हुए थी आने समय के बारे में सोच सोच के मेरा दिल बैठा जा रहा था.. इतनी मूसलाधार बारिश हो रही थी लेकिन में पसीने से भीग चुकी थी.. डर के मारे जी करता था जैसे अभी के अभी भाग के मां बापूजी से लिपट जाऊ.. जितना समय जा रहा था मेरे दिल में बैचेनी बड़ थी..
सहेलियों की बाते मुझे जैसे अपने कानो में सुनाई देती.. "अब कहा जायेगी बच के लाली अब तो तेरी भी टूट जायेगी" और उनकी हसी.. मुझे जैसे अभी तक सुनाई दे रही थी.. लेकिन में खुद को संभाल कर कहती.. मेरे पास ऐसा क्या है को टूट जाना है.. और इतने छोटे से छेद में उंगली तक नही जायगी.. सब मिल के मुझे पागल बना रही होगी.. क्या में ही मिली थी.. भला वो क्यों इस में अपना डालने लगे.. और चलो डाले भी जाएगा क्या इस वो.. में खुद पे ही हस दी और अपनी मां की बात को याद करते हुए लेट गई.."बेटी ध्यान रहे दामादजी को नाराज मत करना बस पहली रात को संभाल लेना बच्ची" मेने तुरंत ही पूछ लिया "क्या संभाल लेना ही माई"... मां ने मेरी और देख बड़े प्यार से कहा "बिटिया वो तुझे समझ आ जायेगा बस याद रखना अब तू कल से एक शादी सुदा स्त्री होगी और एक शादीसुदा दुल्हन पर उसके पति का ही हक होता है कल से तू हमारे लिए पराई हो जाएगी.. जो भी ही वही ही बेटी तेरे लिए"
मेने बड़ी मासूमियत से मां से लिपट के कहा "माई मुझे नही जाना.."
एक तेज आवाज के साथ बिजली हुए और तेजी से हवा चलने लगी खड़की बड़ी तेजी से टकरा रही थी दीवार.. में उठ खड़ी हुए और खड़की की और जाने ही वाली थी की कमरे में रोशनी दे रहा दिया भुज गया...
अंजान घर में 18 साल की लड़की अकेली एक कमरे में इतने अंधेरे.. मेरा दिल इसे धड़क रहा था जैसे कोई भूत देख लिया हो...
की तभी मेरे सीने से मेरा दिल ही बाहर निकल आई वैसी मेरी हालत हो गई जब दरवाजे पर किसी की दस्तक हुए.. में वैसे ही पसीने से भीग चुकी थी और अब वे सब..
दरवाजा खटखटाया जा रहा था और में नादान पागल इसे डर रही थी जैसे आज से पहले कभी ये आवाज न सुनी हो..जब मेरा डर कुछ कम हुआ मुझे आवाज सुनाई दी.."में हु दरवाजा खोलिए"
मुझे आवाज जानी पहचानी लगी में जैसे तैसे दरवाजे की और गई और कुंडी हटा दी... दरवाजा खुला और एक तेज बिजली हुए और उसकी रोशनी में मुझे दिखा की सामने एक लड़का खड़ा हुआ है..भीगा हुआ.. अंधेरा इतना था की ने पहचान नहीं पाई ये मेरे पति ही है या कोई और क्यों की हम कभी मिले नही थे एक दूसरे से...
उन्होंने अंदर आके दरवाजा बंद किया और हड़बड़ी में अपना गीला शर्ट उतार के उसे रखने ही वाले थी की वो मुझे देख शर्म से पानी पानी हो गई.. शर्ट तो नीकल गई थी लेकिन पता नहीं अब उन्हे क्या हो गया वो दूसरी और मुंह फेर लिए... बिजली की रोशनी होती तब ही में उन्हे देख पाती.. वो बनियान में खड़े थे.. में जब ठीक से ध्यान दिया तब मुझे उनके बदन का अंदाजा लगा.. वो कही से मेरी उम्र से के नही थे.. उल्टा वो मुझे मेरे छोटे चाचा जितने बड़े लगे.. और वो थे भी बड़े वो करीबन 35 साल के थे.. और मेरे पिताजी ही सिर्फ उन से 10 साल बड़े यानी 45 साल के थे... मेरी बेचैनी और डर और बड़ रहा था...