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Trinity

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Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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"अर्ध नारी" (Adultry + lesbion)


हमें अक्सर वो कहानिया पसंद आती है, जिन कहानियों में हम खुद को थोड़ा ढूंढ पाते है। ये कोई कहानी नही, बल्कि ये वास्तविक किस्सा है। आज के दौर में हमारे देश के बहुत से राज्य जैसे हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान के छोटे छोटे शहरों और गाँवों में सबसे बड़ी समस्या लड़को की शादी की। शहर और गाँव अविवाहित लड़को से भरे पड़े है, युवा धीरे धीरे अधेड़ होते जा रहे है, लेकिन उनका विवाह नही हो रहा। शादी के लिए लड़कियों का तो जैसे अकाल सा पड़ गया है।

अपने परिवार का वंश आगे बढ़ाने के लिए लोग पैसा देकर दलालों के माध्यम से अपने बेटो का विवाह कर रहे हैं लेकिन ये दलाल कभी कभी सीधे साधे लोगों के साथ धोखा भी कर देते है। इसी धोखे से हुए विवाह/शादी के बाद उस लड़के के साथ क्या हुआ उसी पर आधारित ये कहानी है।

मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में विशाल उम्र 35 साल, अपनी बहन शिल्पा उम्र 25 साल के साथ रहता है। विशाल ने दलाल के माध्यम से शादी की। सुहाग रात की रात संभोग के दोरान उसे पता चला कि जिस लड़की (कृति) के साथ लड़की समझ कर उसने शादी की वो एक ट्रांसजेंडर थी। विशाल एक समझ दार युवक था, उसने रात भर बिना कोई हंगामा किये सुबह होने का इंतजार किया।

सुबह जब अपनी बहन और रिश्तेदारों के बीच उसने अपनी पत्नी के बारे में सभी को बताया तो किसी के पास कोई जबाब नही था, वो दलाल जिसने शादी कराई थी उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसे समझ नही आ रहा था अपनी पत्नी कृति के साथ वो क्या करे.... साथ रखे या छोड़ दे..???

विशाल समझदार था उसने कोई भी फैसला जल्दबाजी में ना लेते हुए कुछ दिन बीत जाने का इंतजार किया देखते देखते एक महिना निकल गया...... शिल्पा जानती थी कि उसके भाई ने एक ट्रांसजेंडर से शादी की है. शुरू शुरू में तो उसे थोडा अजीब लगा था पर उसकी कृति भाभी इतनी प्यारी थी कि धीरे धीरे उसने अपने भाई और कृति के रिश्ते को स्वीकार कर लिया था. अब उसे अपने भैया-भाभी के बीच सिर्फ पति-पत्नी का प्यार दिखाई देता था… उनके लिंग नहीं.
आखिर होना भी ऐसा ही चाहिए. पर समाज को ये बात समझने में थोडा समय लग जाता है.

भले कृति एक ट्रांसजेंडर थी पर किसी साधारण पत्नी की ही तरह थी वो. आखिर एक औरत थी वो. फर्क तो देखने वाले की नज़र में होता है. कृति के बूब्स पहले ही काफी बड़े थे और कृति का फिगर भी आकर्षक था, विशाल की नज़र में कृति का लिंग एक स्त्री का ही लिंग था… और विशाल को कृति के लिंग को छूकर हिलाना, चूमना और चूसना भी पसंद था. यदि घर में शिल्पा न होती तो विशाल तो शाम को काम से घर आते ही अपनी पत्नी की साड़ी उठाकर और उसकी पतली सी लेस वाली पेंटी उतारकर उसके साथ सेक्स करने लगते. विशाल कृति को एक संपूर्ण स्त्री मान चुका था. वो कृति को पूरा सम्मान देता था जो समाज में एक पत्नी को मिलना चाहिए. कृति भी अपने पति के व्यवहार से खुद को बड़ी भाग्यशाली मानती थी.

पति के जाने के बाद भी एक गृहिणी के लिए घर में बहुत से काम होते है… कृति को भी बहुत कुछ करना था. सबसे पहले तो शिल्पा के लिए टिफ़िन पैक करना था. इसलिए कृति शिल्पा के कमरे की ओर बढ़ चली ताकि उससे पूछ सके कि आज कितने बजे जॉब के लिए निकल रही है वो.

शिल्पा के कमरे के बाहर से ही कृति ने आवाज़ दी… “शिल्पा”.

“अन्दर आ जाओ भाभी”, शिल्पा ने जवाब दिया. जिसे सुनकर कृति दरवाज़ा खोलकर अन्दर आ गयी. अन्दर आते ही उसने देखा कि शिल्पा सिर्फ पेंटी पहनी हुई है और पूरी तरह से नग्न है. उसे ऐसी हालत में देखते ही कृति पीछे मुड गयी और बोली, “ओहो शिल्पा… कितनी बार तुझसे कहा है कि कपडे पहन कर रहाकर.”

पर शिल्पा ने मुडती हुई कृति का तुरंत हाथ पकड़ा और अपनी बांहों में खिंच लायी. शिल्पा के नग्न स्तन उसकी भाभी के स्तनों से अब लग रहे थे. “भाभी अब तुमसे क्या शर्माना. हम दोनों औरतें ही तो है. और वैसे भी मेरे बूब्स और आपके बूब्स में ज्यादा फर्क कहाँ है?”

“चल हट. बहुत बेशर्म हो गयी है तू. औरतों के बीच भी कुछ मर्यादा होती है.”, कृति ने शिल्पा को अपने से दूर धकेलते हुए कहा जिससे शिल्पा के स्तन कृति के हाथो से और दब गए.

“भाभी तुम भी न बहुत शर्माती हो. रुको मैं एक मिनट में कपडे पहनती हूँ.”, शिल्पा बोली और अपनी ब्रा पहनने लगी. और फिर उसने एक छोटी सी स्कर्ट पहनी और ऊपर से एक सेक्सी टॉप जिसमे उसका क्लीवेज काफी गहरा लग रहा था.

“आज ऑफिस नहीं जाओगी?”, कृति ने पूछा.

“नहीं भाभी. आज तो मैं अपने बॉयफ्रेंड के साथ सिनेमा जाऊंगी.”, शिल्पा मुस्कुराते हुए बोली.

शिल्पा तैयार हो चुकी थी. लिप ग्लॉस लगाये आज उसके होंठ बेहद रसीले लग रहे थे. काफी बिंदास स्वाभाव की लड़की थी शिल्पा. तैयार होकर वो अपनी ट्रांसजेंडर भाभी के करीब आई और उसका हाथ पकड़ कर बोली, “भाभी तुम यदि शरमाओ न तो एक बात का जवाब दोगी?”

“क्या सवाल है?”, कृति तो सवाल सुनने के पहले ही घबरायी हुई थी.

“क्या तुम लंड चुस्ती हो?”, शिल्पा ने बेझिझक अपनी भाभी की आँखों में देखते हुए पूछा.

“छी… ऐसा नहीं बोलते”, कृति ने शिल्पा से मुंह फेर कर अपनी साड़ी के पल्लू को पकड़ कर घुमाने लगी. वो अब भी नर्वस थी.

“ठीक है.. ठीक है.. तो ये बताओ क्या आप मेरे भैया को ब्लो जॉब देती हो?”, शिल्पा हँसते हुए बोली.

“बहुत बदतमीज़ हो गई है तू शिल्पा.”, कृति ने बिना शिल्पा की ओर देखे कहा.

“अरे भाभी… प्लीज़ बताओ न…

“हाँ, चुस्ती हूँ मैं उनका लंड.”, थोड़ी शर्माती थोड़ी मुस्काती कृति ने अपनी साड़ी से मुंह छिपाते हुए कहा. तो शिल्पा भी मुस्कुरा दी. “… पर तू क्यों पूछ रही है?”, कृति ने शिल्पा से पूछा.

“भाभी… मैं सोच रही हूँ कि अब से अपने बॉयफ्रेंड को खुश करने के लिए उसके लंड को चुसू. आखिर इससे गर्भवती होने का डर नहीं रहता न?”

“शिल्पा… शादी से पहले ये सब ठीक नहीं है.”, कृति ने एक भाभी के नज़रिए से कहा.

“ओहो भाभी.. अब तुम भी बुड्डी आंटियों की तरह लेक्चर न दो.

शिल्पा की बात सही थी इसलिए कृति चुप रह गयी.

“अच्छा भाभी… आप मुझे सिखाओगी कि लंड कैसे चूसते है?”, शिल्पा ने पूछा. तो कृति ने नटखट आँखों से उसकी ओर देखा और बोली, “चुप कर… कुछ भी कहती रहती है. मैं नहीं सिखाने वाली तुझे.”

“भाभी… क्यों इतने नखरे दिखा रही हो? ज़रा सिखा दोगी तो तुम्हारा कुछ बिगड़ जाएगा क्या?”, शिल्पा ने कृति का हाथ पकड़ते हुए कहा और कृति ने बिस्तर पर बैठकर अपने आँचल को संवारा और आँखें बंद कर बोली, “ठीक है तो तू सुन…”

“पर आँखें क्यों बंद कर रही हो भाभी?”

“मैं आँखें खोलकर तेरे सामने नहीं कह सकती. तुझे सुनना है तो सुन.”, कृति बोली.

“ठीक है. तुम आँखें बंद कर के ही सिखा दो.”, और शिल्पा अपनी भाभी से चिपक कर बैठ गयी.

“सबसे पहले उनके बेहद करीब जाना… इतने करीब कि तुम्हारे बूब्स उनके सीने से लग जाए. फिर उनकी बांहों को अपने दोनों हाथो से पकड़ कर उनके तन से लगकर खड़ी हो जाना. और फिर उनकी नजरो में देखते हुए उनके होंठो को चूमना”

कृति की बात सुन शिल्पा ने कृति की ब्लाउज की आस्तीन पर से उसकी दोनों बांहों को पकड़ा और उसे बिस्तर से उठाया और कृति के सीने से चिपक गयी. कृति की आँखें अब भी बंद थी और उसे समझ नहीं आया कि शिल्पा क्या कर रही है. पर शिल्पा अपनी भाभी के बूब्स से अपने बूब्स दबाकर बेहद करीब आ गयी और अपनी भाभी के मुलायम होंठो पर अपने होंठो से हल्का सा चुम्बन देकर बोली, “ऐसे?”

शिल्पा की गर्म सांसें और बूब्स को अपने सीने पर महसूस कर कृति एक बार फिर नर्वस होने लगी. और वो अपनी आँखें बंद की रही. शिल्पा अपनी भाभी के साथ कुछ ऐसा वैसा तो नहीं करेगी? ऐसे विश्वास के साथ कृति गहरी सांसें लेने लगी.

“इसके बाद क्या करना है भाभी?”, शिल्पा ने जब कहा तो कृति जैसे वापस होश में आते हुए बोली, “… और फिर… और फिर… धीरे धीरे उनके तन पर हाथ फेरते हुए उनकी पेंट के उस हिस्से पर ले जाना और उसे ऊपर से ही पकड़ने की कोशिश करना. इस वक़्त उनका लंड धीरे धीरे कर खड़ा होने की कोशिश करेगा.”

तो शिल्पा भी अपनी भाभी की साड़ी पर से ही उनके तन पर हाथ फेरते हुए उनकी कमर के निचे उस हिस्से तक ले गयी जहाँ प्लेट के पीछे कृति का लंड छुपा हुआ था. उसके ऊपर हाथ फेरते हुए शिल्पा ने धीरे से कृति के लंड को साड़ी के ऊपर से ही पकड़ने की कोशिश की. कृति भाभी का लंड इस वक़्त मुलायम से थोडा सख्त होने लगा था. “और आगे भाभी…”, शिल्पा आंहे भरती हुई बोली.

“… और फिर धीरे धीरे अपने बूब्स को उनके तन से दबाकर पूरे शरीर को छूते हुए निचे अपने घुटनों पर चली जाना.” और शिल्पा ने वैसा ही किया कृति की साड़ी पर शिल्पा के फिसलते हुए बूब्स धीरे धीरे उसके लंड के पास पहुच गए.

अब उनके लंड को फिर से अपने हाथो से उनकी पेंट के ऊपर से ही सहलाना.. जब तक वो थोडा और सख्त न हो जाए.” भाभी की बात सुन शिल्पा ने एक बार फिर भाभी की साड़ी की प्लेट के बीच हाथ डाला और ऊपर से ही उनके लंड को सहलाने लगी. कृति का लंड अब और सख्त हो चला था. आज तक कृति को इसके पहले किसी लड़की ने इस तरह छुआ नहीं था. वो तो हमेशा से ही अपने पति की ही थी. पर उसकी ननद शिल्पा आज उसे बेहद उकसा रही थी. शिल्पा को भी अपनी भाभी की सैटिन साड़ी को छूने में मज़ा आ रहा था. वो भी उत्सुक थी जानने के लिए कि उसकी भाभी का लंड आखिर कैसा है. छूने पर तो कृति का लंड शिल्पा को बड़ा ही लग रहा था पर उसने अब तक उसे देखा नहीं था. वो तो जैसे उसे देखने को बेताब हो रही थी. साड़ी में उसकी भाभी के लंड की उभरती हुई आकृति उसे उकसा रही थी.

कृति और शिल्पा… इन दोनों औरतों को एहसास ही नहीं रहा कि ये जो वो कर रही थी उन्हें इस तरह मदहोश करने लगेगा. इसके पहले न कभी कृति का और न ही शिल्पा का किसी औरत में इंटरेस्ट था… फिर भी दोनों इस तरह मदहोश हो रही थी.

शिल्पा ने कृति कीकमर पर हाथ फेरा और फिर साड़ी हटाकर अपने होंठो से उनकी नाभि को चूम लिया और फिर अपने दोनों हाथो से भाभी की कमर को पकड़कर उन्हें बिस्तर पर लिटा उनके ऊपर चढ़ने लगी.
जहाँ उसने अपनी भाभी की नाभि और थिरकती कमर को खूब चूमा.

कृति ने अपने लंड के इतने पास शिल्पा को चुमते हुए महसूस किया तो वो और मचल उठी… और खुद अपने हाथो से अपने ब्लाउज पर से अपने बूब्स को मसलने लगी.

अब उनके पेंट की ज़िप खोलकर उनके लंड को धीरे से बाहर निकालना.”, कृति आगे शिल्पा को बताती रही.

कृति भाभी ने तो पेंट पहनी नहीं थी इसलिए शिल्पा उनकी साड़ी के निचे से हाथ ले जाते हुए उनकी साड़ी को ऊपर उठाने लगी और उनके मखमली पैरो को छूने लगी और फिर उनकी जांघो पर अपने हाथ फेरने लगी. कृति अब पूरी तरह मचल उठी थी… वो तड़प रही थी कि कब शिल्पा उसके उफनते हुए लंड को पकडे पर शिल्पा अपनी भाभी को और उकसाती रही. कुछ देर जांघो को छूने के बाद शिल्पा ने कृति की साड़ी को और ऊपर उठाया और उनकी पेंटी पर उभरे हुए लंड को अपने हाथो से छूने लगी. अब तो उनके लंड का आकर उस पेंटी में साफ़ दिख रहा था. शिल्पा खुद अब उसे निकाल कर छूने को बेचैन हो गयी थी. उसने अपनी भाभी की पेंटी को निचे कर अपनी भाभी का लंड बाहर निकाल दिया… जिसे देखकर शिल्पा की आँखों में चमक आ गयी.

ये लंड बेहद ख़ास था… गुलाबी और साफ़ सुथरा.. जिसके आसपास एक भी बाल न था. चमकदार, गुलाबी, और बेहद सुन्दर लंड था वो… इतना साफ़ तो उसे कोई कृति की तरह की औरत ही रख सकती थी. शिल्पा उसे तुरंत चूस लेना चाहती थी पर उसे तो अभी अपनी भाभी को और तडपाना था.

“अब वो लंड तुम्हारे होंठो के लिए बेताब हो रहा होगा. पर तुम उसे कुछ देर अपने हाथो से छूना…” कृति बंद आँखों से मदमस्त होते हुए बोली और अपने होंठो को खुद ही कांटने लगी.

शिल्पा ने भी वैसा ही किया और उसकी आँखों के सामने वो लंड और मचलने लगा.

उफ़… शिल्पा के लिए खुद को उस लंड को चूसने से रोक पाना बेहद मुश्किल हो रहा था पर उसने सिर्फ उसे चूमा. तो वो लंड और मचलकर हिलोरे मारने लगा.

शिल्पा खुद बेचैन हो गयी थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो खुद को उकसा रही है या भाभी को? “.. अब अपने हाथो से उसे पकड़ कर अपनी गर्म सांसें उस पर छोड़ना और फिर धीरे धीरे अपने होंठो को उस पर लपेट देना. और फिर अपने होंठो को धीरे धीरे उस लंड को अपने मुंह में लेना शुरू करना…. पर सिर्फ ऊपर का हिस्सा… एक अच्छी औरत अभी उस लंड को इसी तरह से और उकसाती है.”

फिर शिल्पा ने अपने लिप ग्लॉस लगे रसीले होंठो से उस लंड को लपेटा और फिर उसे धीरे धीरे मुंह में लेने लगी. उसकी भाभी का लंड शिल्पा के मुंह में जाने को बेताब होने लगा . इतने नर्म होंठ कभी उसने अपने लंड पर महसूस नहीं किये थे. और फिर शिल्पा ने अपनी भाभी के लंड को थोडा सा चूसकर अपने मुंह से बाहर निकाल दिया.

और अब… और अब…”, कृति बदहवास हो रही थी, “… अब अपनी जीभ से उस लंड की लम्बाई को निचे से ऊपर तक चाटना…” शिल्पा भी अपनी भाभी की मदहोशी से मचल कर उस लंड को जीभ से निचे से ऊपर तक चाटने लगी.

“… और अब… और अब… एक बार फिर….”, कृति से अपने बूब्स को मसलते हुए बोला भी न जा रहा था “… उसकी भाभी बेचैन हुए जा रही थी.

कृति की सांसें बहुत तेज़ होती जा रही थी… मचलती हुई कृति के पूरे जिस्म में आग लग चुकी थी और उसका बदन लहराने लगा… और उसके पैर भी सरकने लगी.. कमर थिरकने लगी… अब उससे रहा नहीं जा रहा था और वो उत्साह में लगभग चीख उठी..”अब चुस्ती क्यों नहीं है साली! कितना तडपाएगी मुझे…?” और उसने शिल्पा का सर पकड़ कर दबा दिया कि वो पूरे लंड को मुंह में ले ले.

भाभी को इस तरह तड़पते देख शिल्पा भी अब पूरे उत्साह से भाभी के गुलाबी लंड को चूसने लगी और अपने मुंह में अन्दर बाहर करने लगी… उसे बेहद मज़ा आ रहा था. उसके हर स्ट्रोक पर उसकी भाभी आँहें भरती और मदहोशी भरी आवाजें निकालती. इन दोनों औरतों को बेहद मज़ा आ रहा था… पर इस बेहद उत्तेजित समय का अंत भी जल्दी आता है… और जल्दी ही उसकी भाभी के लंड से रस बाहर आने लगा. शायद हॉर्मोन की वजह से उस लंड से रस कम आता था जिसे शिल्पा ने अपनी भाभी के पेटीकोट से ही पोंछ लिया. दोनों औरतें अब थक चुकी थी और ख़ुशी के मारे वहीँ एक दुसरे पर निढाल हो गयी.

थोड़ी देर बाद शिल्पा अपनी भाभी की बांहों से बाहर निकलकर बिस्तर पर उठ बैठी और भाभी की ओर मुस्कुराती हुई देख कर बोली, “भाभी अब सचमुच बहुत अच्छे से सिखाती हो.”

शिल्पा की बात सुन कृति शर्मा गयी. आज ननद और भाभी का रिश्ता ही बदल गया था. दोनों एक दुसरे की आँखों में एक चमक देख सकती थी.

“अच्छा भाभी… मैं शाम को मिलूंगी तुमसे.”, शिल्पा बिस्तर से उठने लगी तो कृति ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया… “इतनी जल्दी क्या है?

“भाभी… मेरा बॉयफ्रेंड मेरा इंतज़ार कर रहा है. मैं शाम को जल्दी आऊंगी… पक्का.”, शिल्पा ने कहा और झट से पर्स उठाकर कमरे से बाहर चल दी.

और कृति उस कमरे में बिस्तर में वैसे ही लेटी रही… वो सोच में पड़ गयी थी कि ये सब क्या हुआ? उसे अपने पति विशाल का ख्याल आने लगा… यदि उन्हें पता लगा तो क्या करेगी वो? इसी दुविधा में कृति वहीँ सोचती रह गयी.

बेचैन होकर उलटती पलटती कृति की दोपहर कैसे बीत गयी पता भी नहीं चला. इतनी देर बिस्तर पर बिताने के बाद भी वो थकी हुई थी. उठते ही उसने एक सफ़ेद रंग की सैटिन साड़ी निकाली जिसकी हरे रंग की बॉर्डर थी और हरे रंग के ही फुल-पत्तियों के प्रिंट थे. उस साड़ी से मैच करता हुआ एक नेट का पारदर्शी ब्लाउज था जिसके अन्दर सब कुछ दीखता था.

तैयार होकर कृति किचन आकर खाना बनाने में व्यस्त हो गयी. करीब एक घंटे बाद घर का दरवाज़ा खुला. कृति की ननंद शिल्पा दौड़ी चली आई और पूरे उत्साह के साथ आकर अपनी भाभी को पीछे से पकड़ ली. बहुत खुश लग रही थी वो.

कृति भी इस वक़्त खुश थी तो उसने पूछा, “क्या बात है? बड़ी खुश लग रही हो?”

शिल्पा ने कृति के कान के पास अपने होंठ लाकर धीमी आवाज़ में कहा, “भाभी.. धीरेन्द्र तो आज बहुत खुश हो गया.” न जाने क्यों कृति का मन एक बार फिर विचलित होने लगा. “कौन धीरेन्द्र?”, कृति ने रुखी आवाज़ में कहा.

कृति जानती थी कि धीरेन्द्र कौन है और शिल्पा ब्लो जॉब के बारे में बात कर रही थी. न जाने क्यों शिल्पा और उसके बॉयफ्रेंड के बारे में सोचकर ही कृति के मन में थोडा सा गुस्सा आने लगा. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो ऐसा क्यों सोच रही है. क्या उसे जलन हो रही थी शिल्पा को किसी और के साथ सेक्स करते हुए सोच कर? मगर क्यों? वो तो खुद अपने पति के साथ ख़ुश थी… फिर शिल्पा जिसके साथ जो चाहे करे.. उसे क्या?

शिल्पा की बात को अनदेखा कर कृति ने बड़ी बेरुखी से कहा, “जाकर खाने की मेज सजाओ. तुम्हारे भैया आ गए है और खाने का इंतज़ार कर रहे है.

शिल्पा अपनी भाभी के मुंह से ऐसी बात सुनकर आश्चर्य में थी. भाभी उसकी ख़ुशी में शामिल क्यों नहीं हो रही है? सोचते हुए शिल्पा खाना मेज पर लगाने लगी.

थोड़ी देर बाद सभी बिना ज्यादा कुछ बोले खाना खाकर अपने कमरे में चले गए.
शिल्पा को अनदेखा कर कृति अपने बेडरूम आ गयी जहाँ उसके पति विशाल उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे. उनकी आँखों की आतुरता देख कृति मुस्कुराते हुए बोली, “ज़रा रुको मैं अभी आती हूँ.” और पति को तडपाती हुई कृति कमर मटकाते हुए कमरे से लगे बाथरूम चली गयी.

बाथरूम में आते ही कृति ने ब्लाउज में लगी हुई पिन को खोलकर अपने पल्लू को उतारा और फिर अपना ब्लाउज उतारने लगी. ब्लाउज को किनारे में रख कृति ने अपनी ब्रा उतार दी. और फिर से ब्लाउज पहनने लगी. ब्लाउज पहनकर कृति ने खुद को आईने में देखा. उसके हरे पारदर्शी ब्लाउज में उसके बड़े बड़े निप्पल साफ़ झलक रहे थे. फिर कृति ने अपने हाथो को ब्लाउज के अन्दर डालकर अपने स्तनों को ब्लाउज में सही तरह से एडजस्ट किया कि उसके निप्पल पॉइंट कर उभरे हुए दिखे. संतुष्ट होने पर कृति ने एक बार फिर अपनी सैटिन साड़ी के पल्लू को अपने कंधे पर चढ़ाया और फिर अपनी बिंदी को माथे पर सही जगह पर लगाया. कृति इस वक़्त बेहद हॉट दिख रही थी. और फिर उसने अपने होंठो पर लिप ग्लॉस लगाया ताकि उसके होंठ चुमते वक़्त और रसीले लगे. कृति ने एक बार फिर अपने आँचल को संभाला और मुस्कुराती हुई बाथरूम से निकल कर बेडरूम आ गयी.

बिस्तर पर अपनी लेटी हुई पत्नी की ब्लाउज में खुली हुई पीठ और सैटिन साड़ी में लिपटी हुई खुबसूरत बड़ी सी गांड देख विशाल और बेचैन हो उठे. सचमुच कृति को अपने पति को रिझाना बखूबी आता था.

विशाल अब अपने हाथ कृति के ब्लाउज पर फेरने लगे और उसके स्तन दबाने लगे. कृति भी मुस्कुराती हुई अपने हाथ पीछे कर अपने पति के सर को अपने और करीब लाने लगी ताकि वो उसे गर्दन पर अच्छी तरह चूम सके. “आज तो तुमने ब्रा भी नहीं पहनी है डार्लिंग. अब मुझसे और रुका नहीं जाएगा.”, विशाल ने कहा.

“तो आपको रोक कौन रहा है जानू… मैं तो आपकी ही हूँ.”, कृति ने मदहोशी भरी आवाज़ में कहा.

विशाल अब और उत्साह से कृति के बूब्स के बीच हाथ डालकर दबाने लगे और फिर उसकी पीठ पर चूमने लगे. धीरे धीरे उन्होंने हाथो को निचे ले जाकर कृति की साड़ी की चुन्नटो के बीच ले गए जहाँ उन्होंने कृति के लंड को पकड़ लिया और उसे सहलाने लगे.

“ कृति का लंड भी खड़ा हो रहा था पर उसके दिल में कुछ और था. वो नहीं चाहती थी कि आज विशाल उसका लंड चुसे.

विशाल अब भी कृति के लंड को उसकी साड़ी पर से ही सहला रहे थे तो कृति ने अपने एक हाथ से उसे हटाया. और अपने हाथ को अपने पीछे लिपटे हुए पति के पैजामे में डाला और उनका खड़ा लंड अपने कोमल हाथों से बाहर निकाल कर उसे हिलाने लगी. हिलते हाथो के साथ उसकी हरे कांच की चूड़ियों की खनक बेहद मोहक लग रही थी. कृति ने फिर उस लंड को अपनी गांड पर दबाया. विशाल का लंड कृति के नर्म हाथो और गांड के बीच मचल उठा…

बिना ब्रा के तो वैसे भी कृति के स्तन आज़ाद ही थे. कृति की ब्लाउज की सारी हुक खुलते ही विशाल ने उन दोनों हिलते हुए स्तनों को अपने दोनों हाथो से जोरो से मसल दिया तो कृति एक मीठे दर्द भरी आंह निकाल कर मचलने लगी. मदमस्त होती कृति ने भी अपने हाथो से विशाल के सर को अपने बूब्स पर और जोर से दबाया और उनके सर को अपने सैटिन साड़ी के आँचल से ढँक दिया.

कुछ देर तक अपनी पत्नी के स्तनों का आनंद लेने के बाद विशाल ने अपनी पत्नी को पलटाकर उठाया और उसे डौगी पोजीशन में बिस्तर में तैयार किया और खुद पत्नी की गांड के पीछे आ गए. इस वक़्त कृति के बाल बिखर गए थे, ब्लाउज खुला हुआ था जिसमे से उसके स्तन उस पोजीशन में लटक कर झूल रहे थे.

कृति तो जैसे अब मदहोश हो चुकी थी. अब वो अपनी गांड को मदहोशी में लहराने लगी और अपने पति के लंड को और तरसाने लगी. पर वो तो खुद तरस रही थी. अपनी पत्नी की तड़प देखकर विशाल ने भी झट से अपने लंड को कृति के अन्दर डाल दिया. उस एक झटके में कृति तो जैसे झूम उठी और उसके मुंह से एक आवाज़ एक आंह निकल पड़ी. कामुकता की मारी कृति अपने एक हाथ से अपने स्तनों को छूकर दबाने लगी. और विशाल भी अपने एक हाथ से कृति की डोग्गी पोजीशन में झूलते हुए स्तनों को पकड़ कर दबाने लगे. “और जोर से दबाओ न!”, कृति मदहोशी में लगभग चीख उठी. तो पत्नी की बात सुनकर विशाल और जोर से दबाने लगे और जोर जोर से अपने लंड को अन्दर बाहर करने लगे. इस दौरान कृति के मुंह से निकलने वाली आन्हें और तेज़ हो गयी थी.

अक्सर कृति ऐसी आवाजें नहीं निकाला करती थी क्योंकि उसकी ननंद शिल्पा बगल के कमरे में ही सोया करती थी. पर आज न जाने कृति को क्या हो गया था, उसे बिलकुल परवाह नहीं थी कि उसकी ये चरम उत्तेजना में निकलने वाली आवाजें किसे सुनाई देती है. विशाल अपनी पत्नी के बड़े स्तनों को और जोर जोर से मसल मसल कर उसे और आनंद दे रहे थे, और वहीँ गांड में लंड को भी बड़े तेज़ी से अन्दर बाहर कर रहे थे.

और फिर कुछ समय में पति-पत्नी के बीच की ये लीला पूरी हो गयी. दोनों के चेहरे पर एक संतुष्टि का भाव था. आज कृति बाकी दिनों के मुकाबले बहुत ज्यादा कामोत्तेजित थी. चाहे जो भी वजह थी इसके पीछे, विशाल बहुत खुश थे. पर होता है न कि अक्सर ऐसी रातें यूँ ही ख़त्म नहीं हो जाती. खासकर पति तो अपनी पत्नी को छूकर पूरी रात उकसाते रहते है. और कृति बिस्तर में ही बेचैन होकर अपने तन को काबू में करने की कोशिश करती पर दोनों के जिस्म एक दुसरे के और करीब आ जाते.

और देखते ही देखते न जाने कब सुबह हो गयी दोनों को पता भी न चला. कृति बिस्तर में अभी भी पति की बांहों में लेटी हुई थी. उसने ब्लाउज तो पहना हुआ था पर उसके हुक खुले हुए थे और स्तन बाहर निकले हुए थे. कितने सुन्दर और सुडौल लग रहे थे वो स्तन. कृति की कमर के निचे अब भी साड़ी लिपटी हुई थी. साड़ी पहनने का यह तो फायदा है कि उसे बिना उतारे ही प्यार करने का आनंद लिया जा सकता है. और फिर उस साड़ी का मोहक कपडा यदि सैटिन हो तो पति पत्नी दोनों ही उसके स्पर्श से और उत्तेजित हो जाते है.

कृति ने अपनी साड़ी जो उठकर घुटनों के ऊपर तक आ गयी थी, उसे सरकाकर निचे किया. और फिर अपने ब्लाउज के हुक लगाने लगी.

मुस्कुराती हुई कृति जब किचन पहुंची तो उसने देखा कि उसकी ननंद शिल्पा जाग चुकी थी और ब्रेड टोस्ट का नाश्ता कर रही थी.

उसने शिल्पा को अनदेखा करते हुए किचन में जाकर अपने काम करने लगी. सबसे पहले तो उसने अपने बालों को बांधकर जूडा बनाया और फिर पति के लिए चाय बनाने लगी.

इस वक़्त शिल्पा का चेहरा भी कुछ उखड़ा हुआ था.

“लगता है कल रात पति-पत्नी के बीच बहुत प्रेम लीला हुई है.”, शिल्पा ने अपनी भाभी से कहा. उसकी आवाज़ में एक गुस्सा साफ़ झलक रहा था. आखिर उसे रात को पति-पत्नी की क्रीडा के दौरान आवाजें सुनाई पड़ ही गयी थी. पर क्यों नाराज़ थी वो कृति से? आखिर कृति भाभी ने तो उसे वो सीखाया था जो कल अपने बॉयफ्रेंड धीरेन्द्र के साथ आजमा सकी थी. कल शाम को तो अपनी भाभी को ये सब बताते हुए बड़ी खुश थी वो. फिर क्यों आज वो इतनी नाराज़ थी, ये तो वो खुद भी नहीं जानती थी.

“हाँ.. हमने कल रात प्यार किया है. तुझे क्या करना है?”, कृति ने भी लगभग उखड़े स्वर में जवाब दिया.

अपनी भाभी से रुखा जवाब मिलने पर शिल्पा बिना कुछ कहे उठकर किचन से अपने कमरे की ओर चली गयी. और कृति भी अपने पति के लिए खाना बनाने में व्यस्त हो गयी.

कल दिन में जब कृति की ननंद शिल्पा ने कृति के लिंग को चूसकर ब्लो जॉब दिया था उसके बाद से ही उसके मन में एक ग्लानी थी. कल के पहले कृति के जिस्म को उसके पति विशाल के अलावा किसी ने नहीं छुआ था… न किसी आदमी ने और न ही किसी औरत ने. पर कल? कल कृति ने अपने पति के पीछे उन्हें धोखा दिया और वो भी उनकी बहन के साथ. उसके मन में ग्लानी तो होनी ही थी. पर इसके अलावा भी कुछ और बात थी.

कल तक जो ननंद भाभी के बीच एक प्यार भरा रिश्ता था वो एक बार में ही जिस्म की आग में झुलसते हुए कही बिखर गया था.

भले ही कृति एक सीधी साड़ी गृहिणी थी पर उसे भी अपने रूप पर गर्व था. शिल्पा की चिंता छोड़ कर कृति ने अपने ब्लाउज को अपनी साड़ी से ढंका और अब नहाने के लिए बाथरूम आ गयी. बाथरूम में आकर कृति ने धीरे धीरे खुद को आईने में देख अपनी साड़ी उतारनी शुरू की. और फिर उसके बाद अपनी ब्लाउज को खोलने लगी. बिना ब्रा के उसके स्तन ब्लाउज से तुरंत बाहर निकल आये. और कृति ने अपने निप्पल को पकड़ कर मसलना शुरू कर दिया. जल्दी ही कृति का लंड खड़ा हो चूका था और उसकी वजह से उसका पेटीकोट उठ चूका था. आखिर उसने अन्दर पेंटी तक नहीं पहनी थी.

उत्तेजना में कृति ने अपना पेटीकोट उतारा और फिर अपने खड़े लंड को और सहलाने लगी. कठोर निप्पल और खड़े लंड के साथ वो आईने में बड़ी सेक्सी लग रही थी. खुद के लंड को देख वो बड़ी खुश हुई. गुलाबी चमचमाता हुआ और बिलकुल साफ़ सुथरा लिंग था कृति का जिसके आसपास एक बाल तक नहीं था. और फिर मुस्कुराती हुई कृति शावर में जाकर नहाने लगी. वो चाहती तो उत्तेजना में वो खुद को और सहला सकती थी. पर इतनी खुबसूरत औरत भला खुद को खुश करे? ये तो अपमान ही होगा न? जब पूरी दुनिया में कोई भी उसके जिस्म को छूकर उसे खुश करने को बेताब होगा तो वो क्यों भला खुद मेहनत करे? हंसती मुसकुराती हुई कृति नहाकर बाहर निकली और उसने एक सुन्दर सी लेस वाली ब्रा पहनी. भीगे बालो में बहुत ही सेक्सी लग रही कृति की ब्रा ने जब उसके बूब्स को अपने अन्दर कैद किया तब जाकर उसका खुद के तन पर थोडा सा वश वापस आने लगा था. और फिर कृति ने धीरे से अपने कोमल पैरो पर एक हलकी सी सैटिन पेंटी को सरकाया और खुद के चिकने पैरो को अपनी उँगलियों से छूते हुए कृति ने वो पेंटी पहन ली. और फिर उसके बाद एक मैचिंग पेटीकोट में अपनी कमर को लहराती हुई नाडा बांधकर कृति अब साड़ी पहनने को तैयार थी.

वैसे तो कृति को अपनी ब्रा के ऊपर ब्लाउज पहनना चाहिए था पर आज उसने बिना ब्लाउज के ही साड़ी पहनने की सोची. घर में वैसे भी सिर्फ शिल्पा थी आज कृति को उसके रहने न रहने से फर्क नहीं पड़ता था. और फिर कृति ने अपने बड़े बड़े कुलहो पर अपनी साड़ी को लपेटा और अपने साड़ी में एक एक प्लेट सलीके से बनाने लगी. भीगे लम्बे बालो में इतने करीने से प्लेट बनती हुई कृति को इस वक़्त कोई देख लेता तो यकीनन ही उसका खुद पर काबू नहीं रहता.

और यदि वहां शिल्पा होती तो? क्या शिल्पा अपनी भाभी के स्तनों को दबाती हुई अपने घुटनों पर बैठकर अपनी भाभी की साड़ी उठाती और उनके लंड को बाहर निकाल कर अपने रसीले होंठो से चुस्ती? हाय, ये कैसा ख्याल आ रहा था कृति के मन में? ये विचार आकर उसके जिस्म में आग लगा रहे थे.

जहाँ एक ओर कृति अपने मन से लड़ रही थी वहीँ उसकी ननंद शिल्पा की मनोदशा कुछ अलग ही थी. अपने कमरे में बिस्तर में नाइटी पहनी शिल्पा लेटी हुई थी और उसके मन में एक गुस्सा भरा हुआ था. करवटें बदलती हुई शिल्पा के मन में अपनी भाभी के प्रति क्यों इतना गुस्सा था वो खुद समझ नहीं पा रही थी. यदि उसकी भाभी ने अपने पति के साथ रात को सेक्स किया तो शिल्पा को इस बात से क्यों फर्क पड़ रहा था? आखिर वो भी तो अपने बॉयफ्रेंड के साथ सेक्स करके खुश थी? रह रह कर उसके मन में धीरेन्द्र के साथ सेक्स की जगह उसे कल दोपहर को अपनी भाभी के साथ किये सेक्स की तसवीरें आ रही थी जब वो अपनी भाभी का गुलाबी लंड चूस रही थी. ऐसा क्यों हो रहा था उसेक साथ? धीरेन्द्र को छोड़ वो भाभी के बारे में क्यों सोच रही थी? खुद के मन को शिल्पा खुद ही नहीं समझ पा रही थी. ऐसे ही न जाने क्या क्या सोचती हुई शिल्पा न तो आज नहाई थी और न आज ऑफिस गयी थी.

फिर शिल्पा बिना कुछ सोचे समझे अपनी घुटनों तक की नाइटी पहने हुए ही अपने कमरे से बाहर आ गयी. बाहर आकर उसने देखा कि उसकी भाभी सोफे पर बैठी हुई अपने घुटनों को मोड़े हुए गृहशोभा मैगज़ीन पढ़ रही थी. उसकी भाभी ने तो आज ब्लाउज भी नहीं पहना था. बस खुले पल्ले के साथ ब्रा को ढंककर साड़ी पहनी हुई उसकी भाभी उसे बेहद आकर्षक भी लग रही थी.

उसकी भाभी की गोरी कमर में सॉफ्ट सी नाभि के निचे साड़ी की खुबसूरत प्लेट्स के पीछे उसकी भाभी का लंड छुपा है, यह ख्याल उसके मन में क्यों आ रहा था? पर शिल्पा की ओर ज्यादा ध्यान न देते हुए कृति ने अपने एक पैर को दुसरे पैर पर रखा और अपनी नाभि को साड़ी से ढंकते हुए हाथ में रखी मैगज़ीन का पन्ने पलट कर देखने लगी. कृति शिल्पा को अनदेखा करने का ड्रामा कर रही थी. वो उसे सच में अनदेखा करना चाहती थी पर कर नहीं पा रही थी. इसलिए अपनी मैगज़ीन में ध्यान देने की कोशिश कर रही थी. पर वहां भी उसका दिल कहाँ लग रहा था?

अपनी भाभी की ऐसी हरकत देखकर एक बार फिर शिल्पा के दिल में गुस्सा बढ़ गया. और वो गुस्से में ही अपनी भाभी के बगल में आकर बैठ गयी. कृति की नज़र अब शिल्पा के गोरी चिकनी टांगो पर थी. उसे पता था कि बिना नहाई हुई शिल्पा के बिखरे बाल और उस नाइटी में उसकी गोरी चिकनी टाँगे सभी कुछ कृति को उकसा रही थी.

कृति ने शिल्पा को अनदेखा किया तो उससे रहा नहीं गया और वो गुस्से से अपनी भाभी पर चीख पड़ी, “क्यों भाभी रात को अपने पति के साथ बीतने के बाद भी तुम्हारे जिस्म की आग नहीं बुझी जो तुम अब भी इस तरह से अपने स्तन निकाले बेशर्मो की तरह बैठी हो?”

बहुत कडवी बात कह दी थी शिल्पा ने. तो कृति भला कैसे चुप रहती? “मेरे जिस्म की आग से तुझे क्या करना है? हाँ मैं सोयी थी अपने पति के साथ. कम से कम अपने पति के साथ ही कर रही थी न. किसी ऐरे गिरे आदमी का लंड तो नहीं चूस रही थी न मैं? और वैसे भी तुझे क्या फर्क पड़ता है कि मैं क्या करती हूँ?”, कृति ने भी गुस्से में मैगज़ीन को बंदकर पटकते हुए कहा.

“भाभी!”, “मुझे क्या फर्क पड़ता है? जानना चाहती हो मुझे क्या फर्क पड़ता है?”, शिल्पा ने और भी गुस्से में कहा तो कृति बस उसकी ओर देखते ही रह गयी. और फिर एक झटके में शिल्पा ने अपनी भाभी की बांह को जोरो से अपनी ओर ऐसे खिंचा कि दोनों के स्तन एक दुसरे से दब गए… और दोनों के चेहरे बेहद करीब आ गए. इतने करीब कि जब शिल्पा ने कृति के होंठो को जोरो से चूमा तो कृति उसे रोकने के लिए कुछ कर भी नहीं सकी. दोनों के स्तन और निप्पल तुरंत ही फूलकर एक दुसरे को दबाने लगे. शिल्पा अपनी भाभी के बालों में उंगलियाँ फेरती हुई अपनी भाभी को मदहोश होकर चूमने लगी… और एक हाथ से भाभी की साड़ी पर से उनके स्तनों को दबाने लगी.

जब दो खुबसूरत औरतों के जिस्म एक दुसरे के लिए बेकाबू हो, तब गुस्से को प्यार में बदलने में बहुत समय नहीं लगता है. अब शिल्पा के चुम्बन में गुस्सा नहीं प्यार और पैशन था. लेकिन कृति अब भी अपने दिल की बात कह देना चाहती थी. और अपने अपमान का बदला लेती हुई कृति ने शिल्पा से कहा, “तुझे लंड चूसने का बड़ा शौक है न?

तो आज अपने भाभी के लंड से चुद कर भी देख ले.” “तो तुम्हे रोक कौन रहा है भाभी?”, शिल्पा बोली और उसने अपने दोनों पैरो को फैला दिया और अपनी नाइटी उठाकर अपनी पेंटी को सरकाकर अपनी योनी को अपनी भाभी के लिए खोल दिया. उत्तेजना में कृति ने अपनी साड़ी से अपने लंड को निकाला और तुरंत ही शिल्पा की योनी में एक झटके में डाल दिया. कृति के लिए ये पहला अनुभव था पर शिल्पा की योनी के अन्दर उसके लंड के जाते ही उसे एक चरम आनंद महसूस हुआ. और कामोत्तेजना में बदहवास कृति अपने लंड को शिल्पा की योनी में अन्दर बाहर करने लगी. कृति के स्तन ऐसा करते हुए झूलने लगे और उसके लम्बे बाल शिल्पा के सीने पर लहराने लगे.

ननंद और भाभी के बीच ये पल बेहद कामुक था. दोनों कभी एक दुसरे के होंठो को जोरो से चूमती, कभी कांटती तो कभी एक दुसरे के स्तनों को दबाकर चुस्ती और फिर निप्पल को दांतों से कांटती. आखिर दोनों औरतें थी तो जानती थी कि कैसे एक दुसरे के स्तनों को मसल कर उन्हें आनंद देना है. ऐसा पल ऐसी उत्तेजना ऐसी कामुकता तो उन्होंने कभी किसी आदमी के साथ महसूस नहीं किया था. कुछ तो ख़ास था इस पल में जो इन लहराते हुए कोमल जिस्मो को इतना मादक बना रहे थे.

वहीँ कृति जीवन में पहली बार अपने लिंग का इस तरह एक औरत की योनी में कर रही थी. उसके लिए बिलकुल नया और कामुक अनुभव था ये. शिल्पा के स्तनों को दबाकर और उसकी योनी में अपने लिंग को डालकर इतना आनंद मिलेगा उसे, ऐसा तो उसने कभी सोची भी नहीं थी.

ये सच था कि उसके पति विशाल उसका लिंग कभी कभी चूसते थे, कभी खुद अपना लिंग कृति की गांड में डालते थे, उसका भी अपना मज़ा था पर ये पल तो उससे भी ज्यादा उतावला करने वाला था. और फिर लिपटते रगड़ते उन दोनों औरतों के नर्म जिस्म एक दुसरे में समाकर थोड़ी देर में शांत हो गए. दोनों औरतों के चेहरे पर एक अलग सी ख़ुशी थी. और दोनों एक दुसरे की बांहों में एक दुसरे को देखती रह गयी.

“भाभी, अब हम दोनों क्या करेंगी? इन सबका क्या मतलब है? हमारे रिश्तो का क्या होगा अब?”, शिल्पा ने अपने स्तनों पर लेटी हुई कृति के बालों को उँगलियों से सहलाते हुए पूछा. एक ही लाइन में बहुत कठिन सवाल कर दिए थे शिल्पा ने.

ये सवाल उसके मन को भी विचलित कर रहे थे. यदि कृति अपनी ननंद के साथ ये रिश्ता बनाये रखती है तो उसके पति विशाल का क्या होगा? अपने पति को छोड़कर वो शिल्पा के साथ क्या जीवन बिता सकती है? पर वो तो गलत होगा. आखिर विशाल उससे न जाने कितना ही प्यार करते है. और फिर उन्होंने उसे एक औरत होने का सम्मान दिलाया है जो शायद ही इस समाज में कृति जैसी औरत को कोई दिलाता. उसे एहसास था कि एक पत्नी होने का सौभाग्य उसे मिला है जो उसके जैसी औरतों के लिए बस एक सपना होता है. नहीं, वो विशाल को नहीं छोड़ सकती चाहे उसे शिल्पा के साथ जैसा भी लगा हो. पर शिल्पा के प्रति अपने आकर्षण का क्या करेगी वो?

“हम कुछ न कुछ करेंगे शिल्पा.” और फिर उसने शिल्पा के होंठो को अपने होंठो से चूसते हुए उसे दिलासा दिलाने की कोशिश की.

पर कृति का चुम्बन शिल्पा को दिलासा न दिला सका. कृति का लिंग अब नरम हो चूका था और अब भी शिल्पा की योनी में ही था. अपनी भाभी की साड़ी को पकड़कर उसके मखमली कपडे पर सुन्दर फूलो के प्रिंट को निहारती हुई शिल्पा भी कुछ विचारो में खो गयी थी. उसके दिल में अब एक चाहत घर कर गयी थी कि अब से उसकी भाभी सिर्फ और सिर्फ उसकी हो, किसी और की नहीं. पर वो अपने भैया के साथ ऐसा कैसे कर सकती है? जिस भाई और भाभी ने उसे इतना प्यार दिया था उन्ही का घर उजाड़ कर वो कैसे रह सकती है.

वैसे भी अपने भाई का जीवन यदि उसने बर्बाद कर दिया तो ये समाज उसके और कृति भाभी के रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगा. और फिर कृति को भी समाज में इज्ज़त नहीं दिला सकेगी वो जो उसके भाई के साथ कृति को रहते हुए मिलती थी. उफ्फ.. ये कैसी स्थिति में फंस गयी थी ये दोनों औरतें. करे तो करे भी क्या ये दोनों अब? फिर भी जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिल जाता तब तक दोनों एक ही घर में साथ में खुश तो रह ही सकती है. शायद दोनों यही सोच रही थी और दोनों एक दुसरे की ओर मुस्कुरा कर देखने लगी.

दिन बित रहे थे और समय के साथ कृति और शिल्पा एक दुसरे के बेहद करीब आते जा रहे थे. और विशाल इन सबसे अनभिज्ञ थे. क्योंकि अपने पति के प्रति कृतज्ञ कृति अपने पति की भरपूर सेवा करती और वो सब कुछ करती जो एक पत्नी से अपेक्षित था.

शिल्पा का दिल भले धीरेन्द्र पर पूरी तरह से नहीं आया था पर वो अपनी भाभी की मजबूरी जानती थी, इसलिए जब धीरेन्द्र ने उससे शादी की बात की तो उसने हाँ कर दी थी.

कृति से बेहद प्यार करने लगी थी शिल्पा और शायद इसलिए उसने अपनी शादी के एक हफ्ते पहले एक रात उसने सुहागन के जोड़े में कृति के साथ अपनी सुहागरात मनाई थी.

पर फिर किस्मत ने भी ऐसा खेल खेला कि शिल्पा को पता चला कि वो माँ नहीं बन सकती है. डॉक्टर ने उसे बताया था कि धीरेन्द्र में ही कुछ कमी है. पर ये बात वो धीरेन्द्र को बताती तो वो तो बिलकुल टूट जाता. इसलिए उसने अपनी प्यारी कृति भाभी के साथ मिलकर तय किया कि वो कृति के अंश से अपनी कोख में बच्चा पैदा करेगी. और आखिर में उन दोनों की कोशिश रंग लायी और कृति ने अपने लंड के रस से शिल्पा को गर्भवती कर दिया था. कृति और शिल्पा को छोड़ कर इस राज़ को कोई भी नहीं जानता था.

और जब ९ महीने बाद शिल्पा ने जब एक प्यारे से बच्चे को जन्म दिया कृति ने तो सपने में भी नहीं सोची थी कि वो कभी एक माँ बन सकेगी, उसका अपना अंश उसकी गोद में खेलेगा. पर शायद किस्मत ने उसके और शिल्पा के बीच रिश्ता इसी वजह से बनाया था कि कृति एक औरत के साथ साथ एक माँ भी बन सके. कितनी भाग्यशाली थी कृति और कितना भाग्यशाली था वो बच्चा जिसकी दो मांएं थी!

समाप्त
आपने विषय अच्छा उठाया है, लेकिन इंसेस्ट घुसाना मेरे समझ से परे था।

शिल्पा ने कृति को स्वीकार किया, लेकिन आकर्षित कब हो गई वो? और दूसरी बात, ट्रांसजेंडर का जहां तक मुझे पता है, स्पर्म काउंट इतना नही होता की वो बाप बन सकें।

फिर भी आपकी कहानी का विषय, नैरेशन और एग्जिक्यूशन तीनों अच्छा था।

रेटिंग: 9/10
 
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Story- " The 14th. Feb."
Writer- Love 1994.


शायद वो 14 फरवरी की रात होगी जब नेहा और राज , दोनो प्रेमी युगल एक वहशी जानवर के शिकार हो गए थे और उसके ठीक तीन साल बाद टीना , रोहित , श्वेता , वरूण और आकाश को भी उस जानवर ने मौत के घाट उतार दिया था।
कहानी बहुत ही बेहतरीन पर दुखदपूर्ण थी। दुखद इसलिए कि जो लोग मारे गए थे , वो नौजवान लड़के एवं प्रेमी थे। दुखद इसलिए कि वो जानवर अभी भी उस घने जंगल मे जिंदा मौजूद है।
कहानी की शुरुआत काफी अच्छी थी। नेहा और राज की मौत के बाद जब इन पांच दोस्तों की एन्ट्री उसी जगह पर हुई और उस जानवर ने फिर से अपना वही रूप दिखाया तो मुझे लगा शायद इस बार यह जानवर अपने मंसूबे पूरा करने मे कामयाब नही होगा। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ और जानवर ने सभी की हत्या कर दी।
कहानी का प्रारम्भ और क्लाइमेक्स दोनो काफी दर्दनाक और डरावना था। बहुत खुबसूरती से इस पुरे प्रकरण को लिखा था आपने।
आप की लेखनी से मै पहले से ही परिचित हूं। आप बहुत ही बेहतरीन राइटर है , ये मै पहले से ही जानता हूं। इस कहानी को भी बहुत खुबसूरती से लिखा है।
लेकिन कहानी का क्लाइमेक्स मेरे लिए थोड़ा निराशाजनक रहा। जानवर की भी हत्या कर देनी चाहिए थी।

एक रोमांटिक कहानी लिखने वाले राइटर अपने कम्फर्ट जोन से हटकर कुछ अलग लिखने का प्रयास किया , यही बहुत बड़ी बात थी।
बहुत जबरदस्त लिखा है आपने लव भाई।
मुझे आप की कहानी बहुत पसंद आई।
 

Mahi Maurya

Dil Se Dil Tak
Supreme
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कहानी- डबल क्रॉस
रचनाकार- Adirshi महोदय


बहुत ही बेहतरीन और शानदार कहानी। एक रोलेक्स घड़ी के चोरी पर डबल क्रॉस की कहानी को बहुत अच्छे से पेश किया गया है।

हिंदी सिनेमा और अंडरवर्ड का रिश्ता कोई नया नहीं है। ये बहुत पुराना रिश्ता है। इस रिश्ते के चपेट में ऋषि कपूर, संजय दत्त, मंदाकिनी और मोनिका बेदी जैसी कई जानी-मानी हस्तियां आ चुकी हैं। दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, छोटा सकील जैसे अंडरवर्ल्ड डानो की एक वक्त तूती बोलती थी हिंदी सिनेमा में।

शशि खन्ना एक बहुत बड़ा फिल्मी नायक जो अपनी फिल्म के प्रोमोशन के दौरान रोलेक्स घड़ी पहन कर जाता है, शोएब और अब्दुल नमक दो चोर मौका देखकर उसकी घड़ी पार कर देते हैं और मुस्ताक नामक चोरी का सामान खरीदने वाले को बेच देते हैं। बहुत खुफिया तरीके से घड़ी के चोरी होने की जांच की जाती है और चोरों को पकड़ लिया जाता है।

ये घड़ी चोरी का असली मकसद इंसोरेंस का पैसा हड़पना था जो लगभग 5 करोड़ का था, क्योंकि असली घड़ी तो लंगड़ा ले गया था। कहानी में अंत तक सस्पेन्स बना रहा घड़ी को लेकर। बाद में जो सच्चाई सामने आई वो अपेक्षित नहीं थी। शशि खन्ना ने दिमाग से काम लेते हुए अपनी घड़ी भी वापस पा ली और इंसोरेंस का पैसा भी हड़प लिया।
 

manu@84

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आपने विषय अच्छा उठाया है, लेकिन इंसेस्ट घुसाना मेरे समझ से परे था।

शिल्पा ने कृति को स्वीकार किया, लेकिन आकर्षित कब हो गई वो? और दूसरी बात, ट्रांसजेंडर का जहां तक मुझे पता है, स्पर्म काउंट इतना नही होता की वो बाप बन सकें।

फिर भी आपकी कहानी का विषय, नैरेशन और एग्जिक्यूशन तीनों अच्छा था।

रेटिंग: 9/10
शुक्रिया रिकी दोस्त

आपके सवाल वाजिब है,

"मै मजबूर था, शब्दों की मर्यादा, लिमिट के कारण बहुत कुछ लिख नही पाया, वरन आपके सारे सवाल के जबाब खुद ब खुद मिल जाते""

यहाँ ट्रांस का उल्लेख " Shemale " से है, जिसको भी मै शब्दों की लिमिट के चलते explian नही कर सका।

खैर भूल चूक हुयी उसके लिए क्षमा प्राथी हू।
 
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Mahi Maurya

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कहानी- जब मिले राजकुमारी और राजकुमार
रचनाकार- deeppreeti जी

कहानी औसत दर्जे की है। समझ नहीं आया कि रचनाकार कहानी के माध्यम से क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं। राजपरिवार में ऐसा होना वो भी सबके सामने, थोड़ा अजीब लगता है। कहानी की गति ज्यादा है। प्रस्तुतिकरण भी ठीक ठाक है। लेकिन कहानी का उद्देश्य सार्थक नहीं हो पाया है।
 

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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शैली
"लगता है मैडम को बहुत भूख लगी थी आज."



रोटी का एक निवाला मुंह में रखते हुए सुधीर मुस्करा कर बोला. सुधीर की बात शैली के कानों में मानो पड़ी ही नहीं. वो काँटे वाले चम्मच से पहले डबल आमलेट के 1 बड़े से टुकड़े को खाई, फिर प्लेट में ही रखे दो अंडों में से एक उठा कर थोड़ा-थोड़ा कर के खाने लगी.



सुधीर ने दोबारा पूछने का कष्ट नहीं किया. उसका इंश्योरेंस वाला जॉब उसे अक्सर देर शाम को लौटने को मजबूर करती है. आज भी यही हुआ --- रात के 9 बज गए उसे घर लौटने में. कुछ देर आराम करने के बाद अपनी धर्मपत्नी को खाना लगाने के बारे में पूछा. भूख तो शैली को भी लगी थी. अतः उसने तुरंत हाँ कर दी.



आम तौर पर दोनों पति-पत्नी रात को थोड़ा ही खाते हैं पर आज शैली कुछ ज़्यादा ही खा रही है देख कर सुधीर को बहुत आश्चर्य हुआ.



खाने की बात दोबारा छेड़ कर सुधीर ने किसी और विषय पर बात करने का सोचा,



"राजू आया था क्या आज?"



"नहीं." अंगुलियाँ चाटते शैली बहुत छोटा सा उत्तर दी.



"ओफ़्फ़्फ़..! परेशान हो गया इस लड़के से. जब भी फोन करो, कहता है की आज जाऊँगा, कल जाऊँगा... पर आता नहीं है. ऐसे कैसे चलेगा?"



"किसी और लड़के को बुला लो."



"वही करूँगा. इसे 1 अंतिम अवसर दूंगा --- अगर आ गया तो ठीक है; वर्ना इसके मालिक से ही कहूँगा कोई दूसरा लड़का भेजने के लिए. कुछ और दिन की देरी सह लोगी न तुम?"



"हम्म." --- शैली पूर्ववत शुष्क स्वर में बोली.



"नाराज़ हो क्या किसी बात पर?" सुधीर तनिक चिंतित होते हुए पूछा.



"नहीं. क्यों?"



"बस ऐसे ही." सुधीर बात को आगे बढ़ाना नहीं चाहा.



खाते - खाते शैली का हाथ थोड़ा धीरे चलने लगा. अपने रूखे हरकत का आभास हुआ उसे. तुरंत ही अपनी आवाज़ में नरमी लाते हुए प्यार से पूछी,



"और कुछ लोगे?"



"हम्म?"



सुधीर की प्लेट की ओर आँखों से इशारा करते हुए दोबारा पूछी,



"और कुछ चाहिए?"



कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था सुधीर ने की उसकी नज़र शैली की नाईटी से झाँकती 2 इंच की क्लीवेज पर पड़ गई जोकि उस समय बहुत प्यारी लग रही थी...



मुस्करा कर बोला,



"तुम."



जवाब सुनते ही शैली की आँखों में शरारत तैर गई और होंठों में मुस्कान...







------------------- और फ़िर आधी रात तक बेडरूम में दोनों की यौन-कुश्ती चलती रही.







अगले दिन, ऑफिस के लिए निकलते हुए रास्ते में 'मनसुख एंड संस' के मालिक के भाई से मिलकर उसी दिन राजू या कोई और इलेक्ट्रीशियन को घर भेजने के लिए बोल दिया.



कुछ दूर आगे बढ़ कर 1 मंदिर के पास अपनी गाड़ी रोका. मंदिर के बगल में स्थित 1 कुटिया के दरवाज़े पर दस्तक देते हुए पुकारा,



"पंडित जी!"



2-3 बार पुकारने के बाद एक अधेड़ आयु की महिला मुस्कराती हुई अंदर से आई..



"अरे माँ जी आप! नमस्ते, पंडितजी नहीं हैं क्या?"



"नहीं. वो घर के काम से निकले हैं."



"ओह... ठीक है --- ये कुछ सामान लाया हूँ..." कहते हुए सुधीर ने 2 जूट के थैले आगे बढ़ा दिया.



जैसे ही पंडिताइन ने उन थैलों को छुआ, उनके पूरे शरीर में एक तेज़ सिहरन दौड़ गई. एक क्षण के लिए उनके चेहरे का रंग ही मानो उड़ गया. वो बड़े विस्मय से सुधीर को देखी और "अभी आई" बोल कर थैलों को बिना लिए ही अंदर के कमरे की ओर तेज़ कदमों से चली गई. वहाँ पूजा घर में एक जगह रखे एक पात्र से गंगाजल लेकर स्वयं पर छिड़क कर देवी माँ की फोटो के पास रखे एक लाल फूल को हाथ में ले कर १ मंत्र पढ़ते हुए कागज़ के एक छोटे टुकड़े में लपेट कर लाल धागे से बाँधते हुए बाहर दरवाज़े पर आई और अब तक असमंजस की स्थिति में खड़े सुधीर को वो बँधा कागज़ का टुकड़ा देते हुए बोली,



"बेटा, इसे अच्छे से रखो --- कहीं गिरना या छूटना नहीं चाहिए. बहुत सावधानी से रखना.... और, शैली कैसी है?"



"वो ठीक है माँ जी, पर आप ऐसे क्यों....?" सुधीर की बात ख़त्म होने से पहले ही पंडिताइन बोली, "कुछ नहीं बेटा, बस ऐसे ही पूछी; लेकिन मेरी ये बात याद रखना की ये जो कागज़ मैंने तुम्हें बाँध कर दिया है ये हमेशा तुम्हारे पास रहे. ठीक है?"



"ठीक है माँ जी, आप जैसा कहें." कह कर सुधीर ने उन दो थैलों को फिर आगे बढ़ा दिया. पंडिताइन थैलों को स्वीकार करते हुए सुधीर की मंगल कामना के आशय से ढेर सारी आशीर्वाद दी.



पंडिताइन को प्रणाम कर के मन में कई तरह के सवाल लिए सुधीर ऑफिस के लिए निकल गया.







शाम को घर लौटते समय रास्ते में 'मनसुख एंड संस्' के मालिक मनसुख भाई से भेंट हो गई. औपचारिक कुशलक्षेम वाले बातों के बाद अचानक से याद आने पर सुधीर ने पूछा, "अच्छा मनसुख भाई, आज कोई मेरे घर गया की नहीं? राजू तो बस १ बार; पहले दिन ही गया था उसके बाद कभी आया नहीं. भाई, आपके यहाँ तो और भी लोग काम करते हैं न? उन्हीं में से किसी और को भेज दो. बिजली की समस्या से अब और मुकाबला नहीं किया जा रहा."



सुधीर न जाने इसी तरह कितनी ही और बातें करता पर मनसुख भाई के गंभीर और घोर चिंतित चेहरे को देख कर उसे अपनी बातों पर ब्रेक देना पड़ा. धीरे से पूछा,



"क्या हुआ? सब ठीक है न?"



जवाब में मनसुख भाई कुछ कदमों की दूरी पर स्थित १ चाय की टपरी की ओर इशारा करते हुए बोला, "आओ, उधर बैठते हैं."



सुधीर के प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही मनसुख उधर चला गया. सुधीर भी अपनी गाड़ी को चुपचाप टपरी की ओर बढ़ा दिया.



चाय का आर्डर दे कर पास रखे बैठने के लिए पाँच बेंचों में से एक उठा कर मनसुख थोड़ा पीछे चला गया और १ जगह रख कर खुद उसपे बैठते हुए सुधीर को भी बैठने का इशारा किया.



"राजू हो या पप्पू, कोई भी तेरे घर जाने के लिए राजी नहीं है."



"क्या!? लेकिन क्यों?" सुधीर हैरान हो गया.



मनसुख तनिक चुप रह कर बोला, "सुन पाएगा?"



"पहले बताइए तो सही."



"उन्हें तुम्हारे घर जाने से डर लगता है."



"ऐसा क्यों?" सुधीर की उत्सुकता और उत्तेजना बढ़ने लगी.



"उन्हें तुम्हारी बीवी से डर लगता है."



"मेरी बीवी से? ---- हाहाहा --- बीवी से तो पति को डरना चाहिए." सुधीर हँस पड़ा. उसे वाकई लगा की मनसुख मज़ाक कर रहा है… वह खिलखिला कर हँसने लगा. मनसुख उसे टोकते हुए बोला,



"दो दिन राजू को भेजा था और एक दिन पप्पू को. राजू का पहला दिन तो ठीकठाक गुज़रा था पर अगले दिन न जाने वहाँ ऐसा क्या हुआ की वो अब वहाँ जाना तो क्या, जाने की बात करने से भी कतराता है. उसके मना कर देने पर पप्पू को भेजा था --- उसकी भी डर से बहुत बुरी हालत थी. पूछने पर दोनों लगभग एक सा जवाब देते हैं; ---- 'घर का वातावरण बहुत भारी है. मरघट सी चुप्पी छाई रहती है.... और न जाने क्या-क्या --- दोनों तो शैली जी की आँखों के रंग का बदल जाने का भी दावा करते हैं.'



" क.. क्या... आँखों का... रंग बदल... क्या बकवास है. कहाँ है वो दोनों, मुझे बात करनी है उसने." सुधीर को बिल्कुल भी ऐसी बातों पर यकीन नहीं हुआ.



विवशता में सिर न में हिलाते हुए मनसुख बोला, "वे दोनों ही कुछ दिनों की छुट्टी ले कर अपने - अपने गाँव चले गए हैं."



कुछ क्षण दोनों चुप रहे --- मनसुख को समझ नहीं आ रहा था की सभी बातें सुधीर को कैसे बताए और सुधीर को मनसुख की कही गई बातें ठीक से गले से नहीं उतर रही थी.



अचानक मनसुख को कुछ सूझा --- सुधीर की ओर थोड़ा झुक कर पूछा, "उस रात के बाद कोई उपाय किए थे?"



सवाल सुनते ही सुधीर की आँखों के आगे करीब दो सप्ताह पहले घटी १ घटना मानो तैर सी गई....



'एक रात सुधीर पत्नी शैली के साथ मनसुख भाई की गाड़ी से एक पार्टी से लौट रहा था. कार मनसुख ही चला रहा था. बगल की सीट पे उसकी बीवी बैठी थी. चारों काफ़ी हँसी - ख़ुशी ढेर सारी बातें कर रहे थे. दोनों की ही बीवियाँ बहुत बातूनी हैं और कभी भी किसी भी विषय पर बात कर लेती हैं. उस रात को भी यही कर थी दोनों. खिलखिला कर हँस रही थी और बातें कर रही थी. दोनों मर्द तो बस उनकी बातें सुन-सुन कर बीच - बीच में हँस - मुस्करा दे रहे थे.



"ज़रा रोकिएगा." मनसुख की पत्नी दीप्ति बोली.



मनसुख दीप्ति की मंशा समझ कर कार को तुरंत ही साइड कर के रोक दिया. अब रात के इस घनघोर अँधेरे में दीप्ति जाए तो जाए कैसे? इसलिए वो शैली की ओर देखी. शैली तो जैसे तैयार बैठी थी --- फिर वो और दीप्ति तेज़ क़दमों से गाड़ी से यही कोई 10 क़दमों की दूरी पर स्थित झाड़ियों के पीछे चली गयीं.



सुधीर और मनसुख गाड़ी से बाहर निकल कर सुट्टा सुलगा लिए.



अभी कुछ ही क्षण बीते थे की दीप्ति दौड़ती, चीखती-चिल्लाती हुई उन दोनों की ओर भाग कर आती हुई दिखाई दी. उन दोनों के पास आ कर रोते हुए पीछे झाड़ियों की ओर इशारा करने लगी. सुधीर शैली को पुकारते हुए उन झाड़ियों की तरफ़ दौड़ा; मनसुख दीप्ति को ले कर सुधीर के पीछे हो लिया. जब तीनों एकसाथ उस जगह पहुँचे तो वहाँ का नज़ारा देख कर कुछ पलों के लिए उनको खुद की भी सुध न रही.







शैली एक पेड़ के सामने निर्विकार भाव से खड़ी थी. उस जगह पर बड़ी तेज़ प्रवाह से हवा चल रही थी --- और इसी हवा से शैली के अब तक जुड़े में बँधे लम्बे बाल खुल चुके थे और बहुत ही भयानक तरीके लहरा रहे थे. शैली एकटक दृष्टि से उस पेड़ को देखे जा रही थी. पहले सुधीर ने ३-४ बार शैली को आवाज़ दी और फिर मनसुख और दीप्ति ने भी उसे ज़ोरों से पुकारा --- किन्तु शैली पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा. वो चुपचाप बुत बनी खड़ी रही.



अब तक वहाँ के माहौल से सुधीर और दंपति द्वय को ये आभास हो चुका था की जो कुछ भी हो रहा है वो अत्यंत अशुभ और अमांगलिक है. ईश्वर का नाम लेते हुए सुधीर आगे बढ़ा और शैली को पुकारते हुए पीछे से उसके कँधे को छुआ. छूते ही शैली बेसुध हो कर गिर पड़ी थी. किसी तरह से उसे सँभालते हुए घर लाया था सुधीर.



अगले ३-४ दिनों तक बहुत बीमार रही थी शैली. बेहोशी की हालत में अनर्गल बातें कर रही थी. तब दीप्ति के सुझाव पर मनसुख ने माता रानी मंदिर वाले पंडितजी से सुधीर की भेंट करवाई थी और पंडितजी के द्वारा घर इत्यादि के शुद्धिकरण के बाद अगले दिन से ही शैली की तबियत में सुधार होने लगा था. शैली के पूरी तरह से ठीक हो जाने के कारण ही सुधीर का भरोसा माता रानी और पंडितजी पर और भी ज़्यादा बढ़ गया था --- इसलिए अवसर पाते ही पंडितजी के लिए कुछ न कुछ ले कर जाता था.'







(वर्तमान में)....



परेशान सा शक्ल बनाते हुए सुधीर बोला,



"नहीं भाई, मैंने तो और कोई उपाय नहीं किया."



उसकी बात खत्म होते - होते मनसुख पूछ बैठा, "अच्छा, इधर कुछ दिनों से अपनी वाइफ में कोई बदलाव महसूस किए हो क्या?"



"हाँ, उसकी भूख बहुत बढ़ गयी है...." थोड़ा नियंत्रित हो कर बोला सुधीर --- भूख खाने के मामले में और सेक्स के मामले में; दोनों में ही कई गुना बढ़ चुकी है उसकी बीवी, ये बात वो अपने तक में ही रखना चाहता है.



मनसुख कुछ बोलता; उसके पहले ही सुधीर का सेलफोन बजने लगा ---- पंडितजी का था ---- रिसीव करते ही उनका बड़ा चिंतित, गंभीर व उद्विग्नतायुक्त स्वर सुनाई दिया. दोनों के बीच कुछ देर बातें हुई. जब कॉल डिस्कनेक्ट कर मनसुख की ओर देखा तो मनसुख ने पाया कि सुधीर पहले से भी कहीं अधिक चिंताग्रस्त और रुआँसा लग रहा है. पूछने पर बोला, "पंडितजी कह रहे थे की आज की रात बहुत भयंकर है. मुझे अत्यंत सावधान रहना होगा. शैली से आज रात दूरी बनाए रखनी है और अलग कमरे में सोना है."



मनसुख को बहुत अजीब लगा ये... तुरंत ही पंडितजी के ऐसा कहने का कारण पूछ बैठा.



सुधीर बेबसी में सिर हिलाते हुए बोला, "पता नहीं. तुमने तो सुना ही अभी, मैंने भी उनसे कारण जानना चाहा पर उन्होंने बार-बार यही कहा की आज की रात बहुत खतरनाक है."



मनसुख को भी समझ नहीं आया की इस पर क्या कहा जाए. इसलिए सुधीर को ढाँढस बँधाया और ईश्वर पर भरोसा रखने बोला. सच कहा जाए तो अब मनसुख को भी किसी अनहोनी का डर लगने लगा था.



कुछ देर बैठ कर दोनों अपने - अपने घरों की ओर बढ़ गए.



-------







रात में खाना खा कर दोनों सोने चले गए. सुधीर काम का बहाना कर दूसरे कमरे में चला गया. वो अक्सर ही दूसरे कमरे में ऑफिस के बचे-खुचे कामकाज निपटाता रहता है ताकि शैली को सोने में परेशानी न हो. आज तो वैसे भी दोनों में बहुत कम बात हुई. सुधीर ने नोटिस किया की शैली आज अपने प्लेट में बहुत कम खाना परोसी है. पूछने पर बोली की उसका खाना खाने का कोई खास मन नहीं है आज.



"सॉरी शैली, बहुत दिन हो गए तुमको बाहर कहीं खाने को ले कर नहीं गया. एक नया रेस्टोरेंट खुला है कुछ ही दूरी पर; सोच रहा हूँ हम कल वहाँ खाने चलें --- चलोगी?"



"हम्म... ठीक है. आज कुछ और खा लूँगी." शैली काँटावाला चम्मच से पनीर का एक टुकड़ा मुँह में रखते हुए एक खास अंदाज़ में बोली. इस अंदाज़ को सुधीर बखूबी समझता है; इसलिए पहले तो वो झेंप गया और फिर दूसरे ही पल खुद को संयत करते हुए ऑफिस के काम को निपटाने की बात बोला.



इसपर शैली पहले तो आश्चर्य से सुधीर को देखी, फिर बच्चों सा मुँह बना कर उसे चिढ़ाई और फिर एक अलग ही अदा-ओ-अंदाज़ में बोली, "सारे मर्द एक जैसे ही होते हैं --- बोलो कुछ, वो समझेंगे कुछ! हमेशा यही सब चलता है दिमाग में. तुम्हें सफाई देने या खुश होने की ज़रूरत नहीं है. मैं वाकई कुछ और खाने की बात कर रही थी. समथिंग वैरी टेस्टी."



सुधीर ज़रा सा मुस्कराया. शाम से ही उसके दिमाग में पंडितजी के दिए गए निर्देश घूम रहे हैं.



खाना ख़त्म कर मुँह धोने के तुरंत बाद ही सुधीर दूसरे कमरे में जा कर अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया --- और दिनों की की भाँति शैली को किस कर के गुड नाईट नहीं बोला --- पर हैरानी की बात तो ये हुई की इस पर शैली भी कुछ नहीं बोली. हल्का सा भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.



कुछ देर तक फाइलों को उलट - पलट कर देखने के बाद सुधीर १ नॉवेल ले कर बेड पर लेट गया. रात में सोने से पहले कुछ देर किताब पढ़ना बहुत पसंद है सुधीर को. आज भी यही करने का इरादा है.



पढ़ते-पढ़ते कब आँख लगी इसका पता ही नहीं चला उसे. गहरी नींद में होने के कारण जब एकदम से हड़बड़ा कर उठा तब कुछ क्षणों के लिए दिमाग सुन्न सा हो गया था. संयत होते ही गौर किया, दरवाज़े पर लगातार दस्तक हो रही है --- किन्तु मृदु , हल्के हाथों से --- आराम से.



दस्तकों को सुन ही रहा था की कानों में एक मीठी आवाज़ आई, "सुधीर!"



‘शैली?! अभी--?!’ सुधीर दीवार घड़ी की ओर देखा... २:३० बज रहे हैं!! 'शैली अभी...ऊफ्फ' सोचना बहुत कुछ चाहा उसने पर सोच न पाया.



अचानक से दस्तक पर ध्यान गया... 'कुछ अलग लग रहा है न?! य.. ये... ये तो हाथों से की जाने वाली दस्तक नहीं है.... पर... है तो दस्तक ही.... ओह... ओह नहीं.. ये तो न... नाखूनों से...!'



सुधीर इतना तो समझ गया शैली नाखूनों से दरवाज़े पर 'खट-खट' की आवाज़ से दस्तक कर रही है लेकिन ये नहीं समझ पाया की उसके नाखून भला इतने बड़े कब हो गए. एक तो शैली को बड़े नाख़ून रखना कतई पसंद नहीं और वैसे भी रोज़ ही सुधीर की नज़र किसी न किसी कारणवश शैली के हाथों पर जाती रही है --- अगर हाल - फ़िलहाल में उसने नाख़ून बढ़ाए होते तो सुधीर को मालूम चल जाता.



नाखूनों से दस्तक देने के साथ ही साथ दरवाज़े को खरोंचें जाने की भी आवाज़ आने लगी...



इस बार बहुत अजीब तरह से शैली उसे पुकारी,



"सस्स.... स... सु.. सुधीरररर..!!"



पूरा शरीर काँप गया उसका --- पल भर में पसीने में नहा गया. बहुत खतरनाक, डरावने तरीके से उसे बुला रही थी शैली.



"स... सु.. सुधीरररर.... प्लीज़ सुनो.... दर...वाज़ा... खोलो..." शैली की आवाज़ में प्यार है, प्यास है लेकिन न जाने क्यों बिल्कुल अलग और डरावना है.



सुधीर मना करने के लिए बोलने जा ही रहा था --- पर ये क्या --- डर के मारे उसके आवाज़ को लकवा मार गया शायद. बेचारा जितना ज़ोर लगाता कुछ बोलने के लिए, उतना ही उसका शरीर काँपने लगता --- दिल की धड़कने बढ़ जाती.



"सुधीररर... क्या हुआ.. तुम्हारी धड़कन... इतनी... क.. क्यों... तेज़ है....???"



'य.. ये क्या... श.. शैली म... मेरी धड़कन स... सुन रही है.... प.. पर क... कैसे??' सुधीर कुछ नहीं बोला, सिर्फ़ सोचा --- गला तो पहले से ही सूख गया था उसका.



"हाँ सुधीर, म.. मैं सुन सकती हूँ... ही - ही - ही... दर... वाज़ा खोलो न... मुझे तुम्हारे सा... साथ सो.. सोना है.. अकेले न.. नींद नहीं आती न... ही - ही - ही"



‘श.. श.... शैली...? ये... शैली नहीं हो सकती... ये.. ऐसे सर्द, बुढ़िया जैसी हँसी शैली की नहीं हो सकती....’



कुछ देर तक यही खेल चलता रहा.



फिर एकाएक ऐसा लगा की शैली धीरे - धीरे दरवाज़े से दूर हट गई. वो शायद किसी और कमरे में चली गई है. पास रखे पानी के बोतल से पानी पीने लगा था सुधीर की कि तभी उसे हड्डी टूटने जैसा शब्द सुनाई दिया.



फिर...



'चर्र्ब - चर्र्ब' की आवाज़ से कुछ चबा कर खाने जैसा सुनाई दिया.



हर 1 से 2 मिनट के अंदर 'चर्र्ब - चर्र्ब' की आवाज़ बिल्कुल साफ़ --- बहुत साफ़ सुनाई देने लगी --- इसके अलावा रात के इस पहर में हर ओर केवल सन्नाटा छाया हुआ था. एक शायद रह - रह कर झींगुरों की आवाज़ वातावरण में तैर रही थी. और हाँ, काफ़ी देर से हवाओं के तेज़ चलने का आभास हो रहा था सुधीर को.



पसीने की एक पतली धारा सिर के पिछले हिस्से से बहती हुई रीढ़ की हड्डी के सीध में कमर तक चली गई. शाम को फ़ोन पर पंडितजी के साथ हुई बात और उनके द्वारा दिए गए सख्त निर्देश अक्षरशः स्वतः स्मरण होने लगे सुधीर को... 'बेटा, कुछ भी हो जाए, आधी रात के बाद अपने कमरे का दरवाज़ा बिल्कुल मत खोलना.'



अचानक 'धड़ाम' से बहुत ज़ोर की आवाज़ हुई.



सुधीर कुछ देर रुक कर आगे बढ़ा और बहुत धीरे से दरवाज़ा खोला.... शैली की चिंता होने लगी थी.



बड़े हॉल वाले कमरे को छोड़ बाकी सारे कमरों की लाइट ऑफ थी. हॉल रूम से ३ कदम आगे बालकनी का दरवाज़ा खुला था और वहाँ से पूर्णिमा की चाँद की रौशनी अंदर हॉल रूम के एक बड़े हिस्से को प्रकाशित कर रही थी. बालकनी का दरवाज़ा का खुला रहना अजीब था क्योंकि रात में यह दरवाज़ा हमेशा बंद रहता है. दूसरे कमरों की ओर देखता सुधीर को बालकनी में कुछ हिलता हुआ प्रतीत हुआ. हॉल को पार करते - करते देखा, बालकनी वाले फ़र्श पर किसी की परछाई बन रही है.



उत्सुकता के साथ - साथ डर का एक सिहरन दौड़ गया पूरे शरीर में.



दरवाज़े से दूरी बनाए रखते हुए सुधीर ने बालकनी में झाँका --- और इसी के साथ दुनिया भर का आश्चर्य और भय का पिटारा मानो उसकी झोली में आ गिरा हो ---- आँखें देख कर भी भरोसा नहीं कर पा रही....



शैली बालकनी के रेलिंग पर दोनों पैरों के पंजों के बल पर बैठी, माँस के एक बड़े से टुकड़े को बहुत चाव से चाट - चाट कर खा रही है!! बाल बिखरे, फैले हुए हैं --- ठीक वैसे ही जैसे उस रात को उस पेड़ के सामने खड़े रहने के समय था! उसके दोनों हाथों की अंगुलियों के नाख़ून 4-5 इंच लंबे और नुकीले हो गए हैं! सामने के दाँत भी जंगली जानवरों के दाँतों के समान लंबे और नुकीले हैं!



हाथों में पकड़े माँस को बिना रत्ती भर के दिक्कत के वो अपने पैने दाँतों से फाड़ और चबाए जा रही थी --- न जाने कितने दिनों की भूखी थी वो --- खाने की तीव्रता व मुँह के किनारों से टपकते लार तो इसी बात की चुगली कर रहे थे. गुलाबी नाईटी खून से तर थी.



"शैलीsss!" सुधीर के गले से एक घुटी सी चीख निकली. चीख निकल तो गई लेकिन इसी के साथ उसे डर ने और कस कर जकड़ लिया; क्योंकि... शैली उसकी आवाज़ सुन चुकी थी --- और --- अब उसकी लाल आँखें सुधीर को एकटक घूरने लगीं. सुधीर की धड़कन तेज़ हो गई, नथुनों से निकलती साँसों की आवाज़ अब उसे खुद सुनाई देने लगीं, शरीर का तापमान एक ही समय उठता और गिरता महसूस होने लगा.



शैली अपने पति को देखते हुए बालकनी से नीचे उतरी; माँस को अभी भी पकड़े हुए थी... दो कदम आगे बढ़ कर ठिठक गई... लाल आँखों से सुधीर के कुर्ते के दायीं पॉकेट की ओर देखी... सुधीर को ध्यान आया --- पंडिताइन द्वारा दिए गए उस कागज़ के टुकड़े को उसने सोने के समय रुमाल के एक कोने से बाँध कर पॉकेट में रख लिया था. शैली को आगे बढ़ते न देख कर सुधीर को उस कागज़ की याद आई... इससे थोड़ी हिम्मत बँधी. इतना समझ गया की कम से कम उसकी जान पर कोई आफ़त नहीं आने वाली... इसलिए जहाँ था वहीं खड़े रहने का फैसला किया.





इधर शैली से आगे न बढ़ा जा रहा था... सुधीर की आँखों में आँखें डाल कर उसे देखने लगी. सुधीर ने देखा की शैली की आँखें किसी बिल्ली की तरह हो गई है.. और चमकीली भी..



अचानक से शैली की आँखें नम हो गईं... अब तक पशुता की झलक देती चेहरे और आँखों में एकदम से मानवीयता दिखने लगी --- ढेर सारा दर्द, पीड़ा, शिकायत... और न जाने क्या - क्या...



सुधीर अपने अगले कदम के बारे में सोच ही रहा था की ठीक तभी शैली हाथों से माँस के उस टुकड़े को गिरा दी और एकदम सीधी खड़ी हो गई... ऊपर आसमान की ओर सिर उठाई और पूर्णिमा की गोल चाँद को देखते हुए एक हृदयविदारक कर्णभेदी चीख चीखी... ऐसी खतरनाक व भयानक चीख थी की मानो कान के पर्दे फट कर उनसे खून ही निकल जाए.



यह चीख रात के सन्नाटे में दूर - दूर तक फैलती चली गई... एक अजीब सी तड़प व विवशता का आभास दे गई वह चीख..



चीख कई क्षणों तक गूँजती रही.



जब वातावरण शांत हुआ तब बहुत आर्त दृष्टि से अपने पति को देखी... कुछ क्षण सुधीर के चेहरे को निहारने के बाद एकदम से पलटी और दौड़ कर बालकनी के रेलिंग पर चढ़ कर एक घोर असंभव और विश्वास से परे, एक बहुत ही लम्बी दूरी की छलाँग लगाई...





"शैलीsss!!" सुधीर एक बदहवास पागल की तरह चिल्लाता हुआ बालकनी के पास आ कर खड़ा हुआ... पर ये क्या?!! शैली का कहीं भी कोई निशान तक नहीं. इधर-उधर और जहाँ तक नज़र जा सकती थी वहाँ तक देखा सुधीर ने --- शैली कहीं नहीं दिखी. पूर्णिमा की चाँद की रौशनी भी शायद उसे ढूँढ़ पाने में अक्षम थी.



रुँधा गला और आँखों में आँसू लिए सुधीर वहीं खड़ा रहा... मन में ये ज्वलंत आशा लिए की शायद अभी शैली कहीं टहलती हुई दिख जाएगी.







समाप्त
आपने अपनी खासियत हॉरर की ही कहानी लिखी है, और आप पाठकों के मन में डर पैदा करने में कुछ हद तक कामयाब भी हुए हैं, ये कहानी आपकी करीब 3800 शब्दों की है, और कहानी को आप थोड़ा आगे भी बढ़ा कर अच्छा या बुरा जैसा चाहे अंत कर सकते थे, और ऐसा न करना थोड़ी निराशा देता है। और कई सवालों के जवाब पाठकों के लिए छोड़ जाता है।

फिर भी बेहतरीन हॉरर कहानी है आपकी

रेटिंग: 8/10
 

Love 1994

SHARPSHOOTER
Supreme
16,242
13,980
229
Story- " The 14th. Feb."
Writer- Love 1994.


शायद वो 14 फरवरी की रात होगी जब नेहा और राज , दोनो प्रेमी युगल एक वहशी जानवर के शिकार हो गए थे और उसके ठीक तीन साल बाद टीना , रोहित , श्वेता , वरूण और आकाश को भी उस जानवर ने मौत के घाट उतार दिया था।
कहानी बहुत ही बेहतरीन पर दुखदपूर्ण थी। दुखद इसलिए कि जो लोग मारे गए थे , वो नौजवान लड़के एवं प्रेमी थे। दुखद इसलिए कि वो जानवर अभी भी उस घने जंगल मे जिंदा मौजूद है।
कहानी की शुरुआत काफी अच्छी थी। नेहा और राज की मौत के बाद जब इन पांच दोस्तों की एन्ट्री उसी जगह पर हुई और उस जानवर ने फिर से अपना वही रूप दिखाया तो मुझे लगा शायद इस बार यह जानवर अपने मंसूबे पूरा करने मे कामयाब नही होगा। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ और जानवर ने सभी की हत्या कर दी।
कहानी का प्रारम्भ और क्लाइमेक्स दोनो काफी दर्दनाक और डरावना था। बहुत खुबसूरती से इस पुरे प्रकरण को लिखा था आपने।
आप की लेखनी से मै पहले से ही परिचित हूं। आप बहुत ही बेहतरीन राइटर है , ये मै पहले से ही जानता हूं। इस कहानी को भी बहुत खुबसूरती से लिखा है।
लेकिन कहानी का क्लाइमेक्स मेरे लिए थोड़ा निराशाजनक रहा। जानवर की भी हत्या कर देनी चाहिए थी।

एक रोमांटिक कहानी लिखने वाले राइटर अपने कम्फर्ट जोन से हटकर कुछ अलग लिखने का प्रयास किया , यही बहुत बड़ी बात थी।
बहुत जबरदस्त लिखा है आपने लव भाई।
मुझे आप की कहानी बहुत पसंद आई।

Thanks itne achhe review ke liye :hug:

Aap ne sahi kaha hai ki story ki ending fiki he
Lekin mujhe utna time nahi milta daily life me ki ab story likh saku

Lekin contest ke liye story likhni hi thi to jitna ho saka aur time mila usme kardiya

Ha wese aap jaise dosto ko naraj bhi nahi kar sakta is liye try karunga contest ke baad is story ko SS me ek sahi ending de saku
Kyu ki 7 murder huwe hai ab tak ya shayad aur bhi huwe ho ya hone wale ho toh unka pata lagane wala bhi to koi hona chahiye na :hint:

Bas contest ka maja lijiye contest ke baad milenge

Ha aaj raat mil sakte hai wese :hmm:
 

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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SAFAR -
Jeet ka? Haar ka ?
ya... Vastvikta ka ??



USSR Red Army ke tanks aur Allied forces ki bombings se, Berlin sahit samast Nazi Germany chhalni ho rahi thi.


"Soviets ne hume gher liya hai... mai.. mai ye yudh haar.. chuka hun...
kuch Commanders.. Generals.. ne bhi bagawat kar di hai.. kya yahi hai meri Germany ka bhavishya..!?? ye.. ye kya ho gaya..?
mai ye yudh jeet sakta tha... haan MAI YE YUDH JEET SAKTA THA!! lekin.. kaise.....!???
"


:gunfire2:
BAM! 💥 DHADAAK! BOOM! 💥 BAM! ! :gunfire2:




"Kuch bhi ho jaaye, mai surrender nahi kar sakta..! naahi Soviets aur Allies ka bandi ban sakta hu..! bhagna mere usulon ke khilaaf hai.. matlab.. sirff...... ek hi raasta bachta hai....!
AATMHATYAA...... "



Aatmhatya ke baare me sochte hi sabse pehle jo mere dil-o-dimaag me khyaal aaya wo tha. . Eva ka....


Eva Braun - meri mohabbat.. meri humdum.. mai use kuch nahi hone de sakta tha!



"Eva ko mai kuch nahi hone dunga!! use kahin safe jagah par bhejna hoga jald se jald! "


Aanan-faanan me maine Eva se baat ki. Uske jaane ke sabhi bandobast ho chuke the, intzaar tha.. to bas uski rajamandi ka.


Lekin, bhala kya mere dil ka tukda mujhse door ho sakta tha? Sahi socha aapne!
Eva ke uttar ne mujhe ander se lahuluhaan kar diya tha.


Uska kehna tha -

"Manga tha tumko humesha ke liye..
Khud ko mitakar mujhe kyu jinda lash banana chahte ho!
Jeena to tha tere saath hi...
Kyu na maut ke in palon me hi, bante hai ek doosre ke saathi..!? "



Mai... mai itna bhavuk kabhi nahi hua jitna aaj Eva ki in baaton se hua tha.. bina aansuon ke, bina alaap-vilaap ke dil se rona kya hota hai.. mai aaj ise achhe se samajh pa raha tha.

Kaash ki maine power, authority ko tavajjo nahi di hoti.. kaash ki maine apna saara samay Eva ki khushiyon me lagaya hota..
kaash.. kaash.. KAASHH!!



29/04/1945
Führerbunker
Just Before the Midnight




Eva ki ichchaanusaar, hum apne kareebi staff ki maujoodgi me shadi ke bandhan me bandh chuke the.


Mai samajh nahi paa raha tha ki meri jaan Eva, jo ab meri jeevan sangini ban gayi thi, iska me jashn manau, ya phir.. usko mai maut ke kareeb le aaya, iska shok karu..?


Lekin.. uski aankhon ki chamak.. meri dulhan banne ke baad uske chehre par chhayi beshkeemti muskan.. uske chehre ka noor aur noor ka taaj ban rahi uski halki si sharmo haya..
Kaash ki.. waqt yahi tham jaata... 😫😍😫


Meri nazaren baar baar Eva ki or jaa rahi thi. Sukoon.. aatmiyeta aur man ko thandak de rahi thi Eva ki har ek jhalak, har ek adah..


Halaanki Bunker ka maahaul manhusiyat se bhara hua tha jisse mere close staff ki badhaiyaan bhi kisi shok sabha ki tarah lag rahi thi.


Khair.. unki badhayiyaan batorne ke baad mai aur Eva apne room me, ek dusre ki baahon me the. Mujhe ab koi parwaah nahi thi, na mere empire ki, aur naa hi yudh ki.
Dil aur dimaag donon prem ras me doobe hue the akhir.. meri chahat Eva jo mere saath thi!


Aisa nahi tha ki, humne pehle kabhi ek doosre se sharirik sukh na bhoga ho. Lekin aaj ka anubhav.. kuch alag hi tha. ..


Hum ek doosre ki aankhon me khoye hue apni sambhog kriya me lipt the. Ek doosre ko akhiri baar achhe se mehsoos kar rahe the, pyaar jata rahe the. Abhi ka ye ehsaas pehle ki tulna me bahut gehra aur vilakshan tha.

:sex:


Eva ke doosri baar faarig hone ke saath hi mai bhi faarig hokar uske oopar nidhaal ho gaya. Hum donon ki saansen fool rahi thi, humare honthon par sukoon bhari muskan saji hui thi aur.. nazaren.... ve to abhi bhi ek doosre ki aankhon me taktaki lagaye hue thi.


Lekin najron ki taktaki ko viraam dekar Eva ne apni aankein moond li aur mere chehre par jagah jagah apne raseele honthon se chumbanon ki barish karne lagi. Aur ant me humare honth, chumban ki giraft me aa gaye. :smooch:


Ek doosre ka haath thaame hum abhi bhi nagn hi laite hue the. Eva to so chuki thi lekin meri aankhon se neend koso door thi. Usko apni baahon me liye mai aaj ke din ki planning kar raha tha, ki subordinates se kaise sabhi dastawej aur nishaniyaan khatam karwani hai. Kaise wo humari dead bodies ko thikane lagayenge etc.



30/04/1945


Last strategic meeting me General Wielding ne bataya ki bunker ki poori ammunition khatam ho chuki hai aur isliye yudh mahaj 24 ghante ka hi reh gaya hai....


Matlab... ant ab kareeb tha... !


Khair mera dhyaan to Eva ki khushiyon par hi tha. Apne antim samay me, meri koshish yahi thi ki uski madhur muskan, uske chehre ka noor gayab na hone du.


Aaj kitchen staff ke saath Eva bhi lunch bana rahi thi. Kitni positive soch thi uski aur..


Lunch taiyaar hone tak mai bache hue bharosemand subordinates ko sab kuch mitane ke nirdesh, kaise mitana hai uski prakriya aur sath hi, apna vasiyat-nama bhi bata raha tha.


Baharhaal apne kareebi staff ke sath lunch karne ke baad hum donon miya biwi ka, sabhi ko aakhiri alwida kehne ka samay aa gaya tha.


Sabhi bhavuk the lekin majaal hai ki Eva ki khushi me koi kami aayi ho. Uski khushi mere saath hone me thi aur meri khushi.... uski khushi me.. !



Dophar ke 14:30 baj rahe the jab hum apne kamre me dakhil hue.


Ek doosre ka haath thaame hum sofe par baithe aur fir ek doorse ko jee bhar kar dekhne lage.. :love1:


Meri manodasha sthir nahi thi.. karan tha to sirf Eva.. uski deewangi, uska pyaar itna mahan tha ki wo mere saath khushi khushi marne jaa rahi thi..
Usko maut ke muh tak laate hue mera man khataas se bhar gaya tha.. 😢



Khair.. ab samay aa chuka tha...


Eva ko cyanide ki goli dete hue mere haath kampkapa rahe the.. meri sakht aankhein bhi aansuon se bhar gayi thi.. :cry2:
Magar Eva.. to Eva thi..! mere kampkapate haath se goli apne haath me lete hue usne mere haath ko majbooti se pakad liya. Aur.. meri nam aankhon ko chumte hue mujhe kaskar apni baanhon me bhar liya.


Kuch der baad hum alag hue aur ab humare chehre par dridh nishchay wale bhaav the.


Maine apni pistol nikalte hue Eva ki or dekha to usne bhi sehmati me apna sar hila diya.


Ek doosre ka haath thaame hue hum maut ko gale lagane jaa rahe the.


Eva ke cyanide goli khate hi maine bhi apni kanpati par pistol taan kar, fire kar diya!


Paa !!! :suicide:


Bullet nikalne ki aawaaj ke saath hi mujhe wo, apne sar ke andar slow motion me dhasti hui prateet hui..


Jaise jaise bullet mere sar ke ander ghusti ja rahi thi waise waise maano koi mujhe mere hi sharir se kheech kar alag kar raha tha..


Ant me, bullet ke sar se aar-paar hote hi mai bhi khud se door do gaya tha.


Ye kya hua.. kyu hua mujhe kuch andaja nahi tha.


Bas ehsaas tha to khudke ke khiche jaane ka..



Ji haan! bullet ki slow motion gati ke vipareet, mai ghane andhkaar me badi tez gati se kahin door khicha chala jaa raha tha!


Akhirkaar.. ye ajeeb anubhav bhi jald hi samapt hua. Mai ruk gaya tha lekin kahan tha, kyu tha mujhe kuch nahi pata tha..


Khair dheere dheere roshni ki kirne mere aas paas ke andhkaar ko mitaane lagi. Jab sab kuch saaf hua to pata chala ki mai aasmaan me kahin tha!
Poora andhkaar mit-te hi jab maine aas paas dekha to wahan.. tha sirf neela aasmaan aur udte badal.. fir maine aashcharya-chakit hote hue khud ko dekhne ki koshish ki..


Aur iss koshish me mujhe pata chala ki mere naa haath the, naa pair.. mera sharir nahi tha.. jo tha wo maatra khud ke hone ka ehsaas .. aur bina aankhon ke hote hue bhi mai, apne aas paas ka sab kuch saaf saaf dekh paa raha tha.


Lekin.. jaise hi maine neeche jamin par dekha to... mere aashcharya ki koi seema nahi rahi ! :shocked2:
Agar abhi meri aankein hoti to putliyaan aankhein faad kar baahar aa gayi hoti!


Neeche.. milo door tak jitni dharti mujhe dikhayi de rahi thi, weh poori dharti tamaam susajjit ratho, maha-ratho, haathiyon, ghudsawaron, aur paidal sainikon se bhari hui thi!


Aisa alaukik drashya.. aisi abhilakshan yudh bhoomi, yudh samagri aur yudh ke nayak evam sainik gan, maine kabhi sapne me bhi nahi soche the.


Halaanki ye yudhbhoomi pauranik kathaon, kivdantiyon wali lag rahi thi magar neeche maujood har ek yoddha bahut balshali aur tejasvi lag raha tha..


Iss bhishan pracheen sena ke aage mujhe meri Modern Highly Calibrated Nazi Army dhool jaisi lag rahi thi. Agar ye pracheen sena mere paas hoti to duniya ko mai 1 baar nahi balki ananto baar jeet chuka hota!


Ek baat jaroor gaur karne wali thi aur wo ye ki neeche maujood sabhi log kisi murti ki tarah sthir the .. unme koi halchal nahi ho rahi thi..


Achanak meri najar ek maharathi ke rath pad padi! auron se vipareet, rath par sawaar yeh ati balishth tejasvi maharathi natmastak mudra me khada hua tha aur uske sameep hi.. ahaa ek manohar vyaktitva, saarthi ke roop me khada tha.


"Koi itna sunder aur.. itna perfect kaise ho sakta hai !!?? "


Shyam varn, adbhut tej, saumya muskan, mahabalshali shareer.. kul mila kar divyata se paripoorn, mahapurush wala vyaktitva...!


Ve mahapurush kuch bol rahe the aur natmastak maharathi sun raha tha.. jaise hi mujhe unki vartalaap sunne ki prabal ichcha hui tyon hi mujhe unki ucch swaron wali adarsh dumdaar awaaj sunai dene lagi!


" विषयों वस्तुओं के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है। "



"Kya..? agar laukik cheejon ke baare me sochenge nahi, unhe prapt karne ke liye prayaas nahi karenge to manushya jeevan ka matlab hi kya reh jayega..? "

" Aage badhne ki mahatvakanksha hi kamna hoti hai.. lekin.. krodh... yani gussa.. haan ! jo mai chahta tha agar vo mujhe nahi milta tha to mera gussa saatve aasmaan par pahuch jata tha... lekin kya vishay vastuon ki kaamna karna bura tha..?
Kya matrabhoomi ki jeet, uske vikaas ka sochna bura tha..??" 🤨




" क्रोध से मनुष्य की मति मारी जाती है यानी मूढ़ हो जाती है जिससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद का अपना ही नाश कर बैठता है। "



"Ye... oh Lord! yahi to hota aa raha tha mere saath!! ... mai apne ahankaar me andha ho gaya tha.. sochne laga tha ki mai hi sab kuch hun.. meri hi buddhi naash ho gayi thi jo maine Poland aur USSR par hamla kiya... nateeja.... mera .. khud ka hi naash ho gaya..!! " 😖




" किंतु हे पार्थ! आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। "



"Huh.. yaani aatma amar hai..! matlab.. mai.. ek aatma hu... mai haara nahi hu!! dusmano ka bandi na bankar mai jeet chuka hu HAHAHA!!
...... :sigh2:
...... :sigh2:
To abhi me ek aatma hun.. lekin aise jeevan ka matlab hi kya hai....."


"Agar... meri aatma amar hai to phir sabki aatmaye bhi amar hongi ! Eva.... "




Eva ka dhyaan aate hi mai, apne chaaron aur use dhundhne ki koshish karne laga.
Mai use awaaj dena chaahta tha. Uska naam jor jor se pukaarna chaahta tha lekin... mere paas aawaaj nikalne ke liye na to muh tha aur naa hi gala..


Tabhi mujhe yaad aya ki mai to apne astitva ke hone ke ehsaas ke alawa kuch bhi nahi tha.... matlab Eva ko dhundh paana bilkul asambhav tha...


Ghoor nirasha ne mujhe gher liya... 😥
Eva ki yaad me mai prathna kar raha tha ki kaash meri aatma ka bhi naash ho jaye.. ke tabhi achanak se samuche vatavaran me ek divya prakash phail gaya!


Aur.. jab maine prakash ke srot ka peecha karte hue neeche se oopar ki or dekha to...



".........aahhhhHHHHHHHHHHHHHH"



Meri sandigdh aankhein chudhiyan gayi !!! meri chetna ka jarra jarra kampaayman hone laga tha!
laga... jaise mai iss alaukik prakash me jalkal bhasm ho jaunga!


Mere saamne jo tha uska mai kya hi batau... saame ek viraat roop ko dekhkar mai aashcharya se sunn pad gaya tha..
Unke viraat roop ki naa to koi shuruwat thi aur naa hi ant! ye roop har ek disha me lagataar badh raha tha!
Roshni itni thi ki maano saikadon suraj ek hi jagah par aakar ek saath jal rahe ho..
Iss adbhut anant swaroop me anginat muh, aankhein, haath, vibhinn tarah ke alaukik haathiyaar aur jaduyi tools maujood the..!


Sunnn pada hua mera astitv maano viraat roop ke aparimit tej se pighal ne laga tha...
Naa to mai kuch soch paa raha tha aur naahi kuch samajh paa raha tha ki kya ho raha hai.. bas mehsoos kar paa raha tha ki shayad ab iss aparimit tej se mai, poori tarah se khatam ho raha hu.....

....
....
....



"... ehhuhhmm........ "

".. ehmm.. kya hua tha..? laga tha jaise saara brahmand ek jhatke me dekh liya ho.. uhhh.. ye shor kaisa ho raha hai..? mai to pighal kar khatam hone wala tha..? mai kuch dekh kyu nahi paa raha hu..? "




Pata nahi kiya hua tha.. mai to pighal raha tha lekin parmeshwar jaane ki, kaise abhi bhi mera astitva maujood tha. Lekin ye shoor gul kaisa sunai de raha tha. Khair.. thodi der jiddojahat karne ke baad mujhe kuch kuch dhundhla dhundhla dikhaai dene laga.. aur jab najar saaf hui to..


Aashcharya.. shraddha.. peeda.. glani.. jaise kayi bhaavon ka toofan mere ander umad pada..


Mai samay ke hazaaron saal peeche aa gaya tha.. aur jo wakya mere saamne chal raha tha wo tha.. crucifixion ka....


Saamne ki ghatnaon ko dekh paana mere liye ab bahut mushkil ho raha tha.. 🥺😣
Kaise un par itne atyaachaar ho rahe the lekin.. fir bhi unke man me, unki aankhon me sabke liye kshma bhaav hi the..

Shareer lahuluhaan tha... 😥 lekin.. unke chehre par chhaya sabke prati aseem prem bhaav jyo-ka-tyo bana hua tha..


Mera bhaavuk hriday saamne ke nazare ko dekh kar chhalni ho raha tha, usme se cheekh pukaar uth rahi thi ki ruk jaao..!! itni badi bhool mat karo..!! lekin kuch kar sakne me mai to asahaay tha.. asaksham tha..


Isi kram me achanak mujhe mere khud ke kukrityon ki yaad aa gayi..



"OHHH.. MYY.. LORDD.........!!!! " 😰


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" Maine bhi masumon par kitne atyachaar kiye the... 😨 budhe, bache, auratein, jawan.... sab par maine bahut julm kiye.. "


" Superior race? Jews? Final solution? kitna bada moorkh tha mai.. kitna bura kiya maine nirdosh logon ke saath..

Concentration camps.. gas chambers.. laboratories.. dead cells aur naa jaane kya kya ghinhone tareeke akhtiyaar kar liye the maine .. "



Ek insaan hokar bhi mai kaise apni insaniyat haar gaya tha.


Aatm glani ki tsunami mujhe dooba rahi thi. Ab mujhe apni koi sudh nahi thi.. mai ghoor pashchataap ki agni me jal raha tha..
kayi vishaal parvaton se bhi jyada bhaar khud ke ander mehsoos kar raha tha..


Mujhe khud se bahut jyada ghrina ho rahi thi ki kaise mai manav shareer me chhipa hua ek darinda tha.. 😰


Mai khoon ke aansun rona chaahta tha.. khud ko khatam kar dena chaahta tha.. lekin ab shayad.. pashchataap ke bhaar ke tale dab kar, mratyu ko praapt karke bhi til til karke marna.. yahi meri niyati thi..


Mere ander to jaise gilaani ke pattharon ki varsha ho rahi thi jinke bhaar ke tale me dhasa jaa raha tha.


Achanak muje laga jaise me aasman se badi tez gati ke saath neeche gir raha hun.. khair ab mujhe koi parwaah nahi thi..
Kaash.. mai samay me wapas jaa sakta.. kaash mai apni har ek bhool ko sudhaar sakta.. 😰


BAM!


Dhapp se mai kisi kathor patthar ke oopar jaa gira. Aise gir kar mujh jaisi tuchh, giri hui, neech, chetna kahu ya aatma, ka kya nuksaan hona tha..?
Abtak mujhe pashchataap ke vishaal -kaye pattar, jo mujhe swayam me mehsoos to ho rahe the, ve bhari patthar, bahar ki duniya me bhi dikhai dene lage..


Apne chaaron or dekhne par ek taraf mujhe, ek gufa jaisi sanrachna dikhayi padi!


IMG-20230228-141818.jpg



Khaas baat ye thi ki woh gufa, antarman ko thandak pahuchane wale sheetal prakash se bhari hui thi.. aisa lag raha tha maano uske andar arbon ki sankhya me parlaukik heere ✨💎💎💎 ✨ rakhe ho..


Ye prakash adbhut aur alaukik tha.. !


Chumbak jaise uss sheetal prakash ki or mai khincha chala jaa raha tha.. aur jaise hi mera uss prakash se milan hua to, prakash ki chamak apni parakashtha ko paar kar gayi !


Aur mujhe aisa laga.. jaise mere wajood ka uss prakash me poorn-taya vilay ho gaya ho.


Vilay hote hi ek alag hi parmanand ki lahar mere andar umad padi. Pehle jahan aatm-glaani ki agnivarsha ho rahi thi wahan jaise ab sheetal chandan baras raha tha..
Mai sabkuch prakash me aur prakash ko khud me mehsoos kar paa raha tha.. laga.. jaise sab kuch, ye samoocha brahmand ek hi hai!


Maa ki godi aur uski thapki me, jitna prem aur dulaar hota hai, us roshni ke aalingan me mujhe, mamta ke prem aur dulaar se bhi kahin guna jyada aatmiyeta aur apnepan ka anubhav ho raha tha..


Ab bhitar ki ladai.., pashchataap ka bhaar.. sab kuch mit chuka tha.. bhatke hue tukde ko uska mool mil chuka tha!


Iss roshni me mai humesha ke liye rehna chaahta tha. Khud ko isme samarpit karna chaahta tha par.. shayad abhi mere sabhi paap dhule nahi the...


Aisa mujhe isliye laga kyuki ab naa to wo gufa kahi dikh rahi thi aur naa hi uska sukoon dene wala prakash kahin maujood tha. Kuch tha to bas pehle ki tarah ghup andhkaar.


Andhkaar me anginat samanya roshni ke punj the.. jab dhyaan se dekha to pata chala ki ye andhkaar.. antariksh tha aur roshni ke punj asankhyaat taare.


Ishwariye prakash ki mahima se andar ke patthar to mit chuke the lekin baahar ke patthar, ab badal chuke the. Abhi mai.. shayad... asteroid belt ke beech me maujood tha!

Lekin.. yeh kya.. Mercury, Venus.., Mars..? aur.. Mars....!! aaj mere saath kya ho raha tha mai ab tak nahi samajh paaya tha aur ab ye....!


Mother Earth kahan thi..!?? mai achambhit tha. Jab mujhe wajah jaane ki utsukta hui to bas... fir kya tha, khud ba khud udta chala gaya mai us naye Mars ki or..
Ek aur naya safar shuru ho chuka tha. ..


Lekin... ye ho kya raha tha !? jaise jaise mai naye Mars ki or badhta jaa raha tha uska swaroop bhi badalta jaa raha tha. Dheere dheere wo Mars laal 🔴 na rehkar kuch kuch kaale aur bhure rang ka ho gaya tha.



Jaise hi mai uske thode aur paas pahucha to ab weh kaale baadloon aur kaale dhuein se poora dhaka hua tha!
Ek aashanka jiska mujhe bhaan hua wo ye ki kya.. yeh.. Earth thi !!?? :shocking:


Jawab bhi mujhe jald hi mil gaya kyuki jab mai thode aur paas pahucha to mujhe Earth ke jaane pehchane landforms ka bhaan hone laga tha... antar bas ye tha ki abhi maano Sahara Desert har jagah phail chuka tha aur sabhi samudra , glaciers sookh chuke the!


Apne planet ko aisa dekhkar mujhe bahut peeda hui. Jaise hi maine Earth ki exosphere me pravesh kiya to mujhe Europe saaf saaf dikhne laga.. lekin haryali kaa naamo nishan nahi tha! iske alawa, Africa continent Europe se jaa mila tha jisse Mediterranean Sea ki jagah par Great Himalayas jaisi ek nayi range ban gayi thi!


Dheere dheere mai aur neeche aata gaya aur ab thodi haryali ke saath saath kuch pradushit nadiyaan bhi najar aane lagi. Jo alag tha wo the bade bade smooth roads jo poore Europe me makdi ke jaal ki tarah phaile hue the. Roads ke alawa mujhe ab suder, tez trains aur bahut unchi unchi kaanch ki imaartein bhi dikhne lagi..!


Mai aashcharya-chakit tha. Ye sab maine pehle kabhi nahi dekha tha. Khair jaise jaise mai troposphere tak aaya to mere aashcharya ko khatam karte hue, neeche ki sabhi cheejein jaani pehchani lagne lagi..


"Ye sab kya ho raha hai... k-kya... wo Mars.. Earth ka bhavishya tha..! agar haan to phir.. shayad aatma ke awala.. sab kuch nashwar hai.. kuch bhi sthaayi nahi hai..
Mai jab jinda tha to kya paana chaah raha tha..? Kyu mai yudh ke liye itna lalayit tha..?? Sirf jhoothi takat aur shaan ke liye? apne tuchh ghamand ki poorti ke liye..??"



Waqt ne mujhe dubara usi sawal par lakar khada kar diya jahan se ye saare ajeebo gareeb anubhav shuru hue the.


Jaldi hi mujhe apna ujda Germany najar aane laga.. har taraf tabahi ka manjar tha.. meri manodasha peeda aur tees se bhari hui thi.



Kuch hi palon me ab mai, apne toote- foote bunker ke oopar tha. Ek najar dekh kar hi pata chal raha tha ki Red Army ne saikdon gole yahan par daage the.. anginat gooliyan barsaayi thi..


Dharti ke najdik aate hi mujhe 2 parthiv shareer dadhakti jwala me jalte hue dikhai diye. Samajhne me mujhe der nahi lagi ki wo jalte hue shareer mere aur Eva ke hi the...


Major Otto Günsche ne mere nirdeshanusaar petrol daalkar humare parthiv shareeron ka daah sanskaar kar diya tha.


"Evaa... hh......... "



Ek dard bhari marod uth gayi thi mere andar uske parthiv shareer ko raakh banta dekh kar..


Mujhe bahut ichha ho rahi thi ki kaash mai uske shareer ko ek aakhiri baar chhu sakta.. :angrysad:
Kaash mai apni aatma ko bhi uske shareer ke saath jala sakta..


Apni kaamnaon ke ulat mai un jalte shareeron ke aaspaas, to kabhi aag ke beech- o - beech sirf bhatak raha tha.. aur.. apni taqdeer ke garm thapedo ko majburan jhel raha tha..


Eva ko raakh me tabdeel hote dekh kar mere antarman me bas ek hi dardbhari pukaar uthi..


Duniya ko raakh karne chala tha... ..
Khud hi raakh ban kar reh gaya..
Aisa kya gunah kiya tha..?
Ki apno ko to khoya hi,
Khudke wajood se bhi bhatakta chala gaya....





640px-Stars-Stripes-Hitler-Dead2.jpg
बहुत अच्छा विषय उठाया आपने अपनी इस कहानी के द्वारा, और हिटलर के अंतिम समय का वर्णन, और उसकी और ईवा की कहानी का वर्णन भी अच्छी तरह से किया है। मौत के बाद आत्मा द्वारा वास्तविकता से परिचित होना भी अच्छे से दर्शाया है।

कहानी अपने विषय, प्रस्तुति और पटकथा में अव्वल दर्जे की है।

रेटिंग: 9.5/10
 
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Story- " Supernatural Intelligence "
Writer- Over Lord.


क्या ही शानदार कहानी लिखा है आप ने ! भौतिक वस्तुओं के साथ साथ अलौकिक और सुपर नेचुरल चीजें दिखाकर हमे अच्छा खासा भ्रमित कर दिया।
Emma कोई भुत प्रेत नही बल्कि एक होलोग्राफिक सिस्टम था। साइंस का करिश्मा था।
सच मे , अगर ऐसा टेक्नोलॉजी या सिस्टम आ जाए तो यह एक चमत्कार ही होगा।
सबकुछ आउटस्टैंडिंग लिखा है आप ने। प्राकृतिक सौंदर्य , आध्यात्मिक परिवेश , डर का एहसास सबकुछ माइंड ब्लोइंग था।
इंग्लिश मे लिखे होने के कारण यह कहानी अवश्य ही रीडर्स से कनेक्टेड न हो पाई हो , लेकिन मुझे विश्वास है जूरी के साथ यह जरूर ही कनेक्ट होगी।
बहुत खुबसूरत कहानी लगा मुझे।
 
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Darkk Soul

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आपने अपनी खासियत हॉरर की ही कहानी लिखी है, और आप पाठकों के मन में डर पैदा करने में कुछ हद तक कामयाब भी हुए हैं, ये कहानी आपकी करीब 3800 शब्दों की है, और कहानी को आप थोड़ा आगे भी बढ़ा कर अच्छा या बुरा जैसा चाहे अंत कर सकते थे, और ऐसा न करना थोड़ी निराशा देता है। और कई सवालों के जवाब पाठकों के लिए छोड़ जाता है।

फिर भी बेहतरीन हॉरर कहानी है आपकी

रेटिंग: 8/10

बहुत धन्यवाद आपका भाई इस रिव्यु के लिए.

जहाँ तक कहानी में शब्द सँख्या एवं उसपे आधारित कहानी की लंबाई की बात है तो आप तो स्वयं जानते ही हैं की बिना लाग-लपेट के यदि कहानी एकबार शुरू कर के समाप्त की जाए तो वो कब, कहाँ और कितने शब्द संख्या पर समाप्त होगी; इस पर आमतौर पर लेखक का कोई ज़ोर नहीं होता है... (बशर्ते यदि वो चाहे तो जबरदस्ती कहानी को खींच सकता है.)

दूसरी बात ये की हर हॉरर कहानी एक सा नहीं होता है. हरेक हॉरर कहानी अपने स्तर पर अपनी प्रकृतिनुसार भिन्न होती है. जैसे की:- किसी कहानी में देश, काल, स्थान, व्यक्ति, कारण, समाधान इत्यादि सबका होना अत्यावश्यक होता है तो किसी में स्थान, व्यक्ति व कारण पर्याप्त होते हैं, किसी में कारण एवं समाधान ही सब कुछ होता है तो किसी में किसी व्यक्ति विशेष की 'कल्पना' सर्वाधिक आवश्यक होती है. पहली वाली श्रेणी को छोड़ कर बाकी सभी पूर्ण होते हुए भी अपूर्ण सा प्रतीत होते हैं; जोकि गलत भी नहीं है --- हाँ, नरैशन कम्पलीट होनी चाहिए. मेरे द्वारा रचित ये कहानी भी कुछ ऐसी ही है.

(बाकी सब छोड़िए, ये तो सोचिए की सुधीर के साथ कितना बुरा हुआ... संसार उजड़ गया बेचारे का... उसके बिना किसी गलती के)
 
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