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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

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What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
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Sanju@

Well-Known Member
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अध्याय - 41
━━━━━━༻♥༺━━━━━━

अब तक....

"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"

दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो ग‌ए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।

अब आगे.....

रात में सबके साथ मैं भी खाना खाने बैठा हुआ था लेकिन मेरा ध्यान खाने की तरफ ज़रा भी नहीं था। रह रह कर ज़हन में उस काका की बातें गूँज उठतीं और मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है? सहसा जगताप चाचा ने मुझे टोका तो मैं हल्के से चौंका और उनकी तरफ देखने लगा। उन्होंने इशारे से ही मुझे खाना खाने के लिए कहा तो मैं चुप चाप भोजन करने लगा। मैंने सिर उठा कर एक नज़र विभोर और अजीत पर डाली। मेरे वो दोनों कमीने भाई बेफ़िक्र हो कर खाने में मगन थे। उन्हें देख कर मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी सा उबल पड़ा जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से दबाया। खाने के बाद पिता जी ने एक बार फिर से मुझसे कहा कि सुबह जल्दी तैयार हो जाना क्योंकि मुझे उनके साथ पंचायत पर जाना है।

अपने कमरे में बेड पर लेटा मैं रात भर करवटें बदलता रहा और मन ही मन मौजूदा परिस्थितियों के बारे में तरह तरह के ख़याल बुनता रहा। मैंने फैसला कर लिया था कि अगले दिन पिता जी से इस बारे में बात करुंगा और फिर जल्द से जल्द इस बारे में कुछ करुंगा। बड़ी मुश्किल से मेरी आँख लगी और मैं नींद की आगोश में चला गया।

बन्द पलकों तले सहसा कुछ अजीब से चित्र उभरने लगे। ठीक वैसे ही जैसे पहले भी दो बार मैं सपने में देख चुका था। मैं एक सुनसान जगह पर एक बड़ी सी शिला पर लेटा हुआ था। चारो तरह अँधेरे की चादर फैली हुई थी। मुझसे क़रीब बीस फिट की दूरी पर घने पेड़ पौधों से युक्त जंगल दिख रहा था जो कि मेरे चारो तरफ ही था। सहसा उन पेड़ पौधों से मुझे अपनी तरफ बढ़ता हुआ गाढ़ा धुआँ दिखा। मैं शिला पर चित्त लेटा हुआ था। मेरे हाथ पैर पूरी तरह आज़ाद थे लेकिन मैं उन्हें अपनी मर्ज़ी से हिला नहीं सकता था। पेड़ों के बीच से निकल कर आता हुआ वो गाढ़ा धुआँ निरंतर मेरी तरफ ही बढ़ता चला आ रहा था। मैं उस गाढ़े धुएं को देख एकदम से घबरा उठा और खुद को उस धुएं से बचाने के लिए उस शिला से उठ कर भागने का सोचा मगर उठना तो दूर की बात थी मैं हिल भी नहीं पा रहा था। उधर वो गाढ़ा धुआँ अब मेरे बेहद क़रीब आ चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे वो धुआँ नहीं बल्कि कोई भयानक यमदूत हो जो धुएं का रूप ले कर मुझे चारो तरफ से घेरते हुए आ रहा था।

उस धुएं को अपने बेहद क़रीब देख कर मैं बुरी तरह उससे बचने के लिए छटपटाने लगा मगर मेरा छटपटाना सिर्फ मेरे मन तक ही था। मैं पूरी ताक़त लगा कर उस शिला से उठ कर भाग जाना चाहता था मगर मेरी हर कोशिश बेकार थी। मेरे देखते ही देखते वो गाढ़ा धुआँ आया और मुझे अपनी चपेट में ले लिया। मैं उस गाढ़े धुएं में पूरी तरह डूब गया। डर और घबराहट से मैं बुरी तरह चीख पड़ा और तभी मेरी आँख खुल गई।

मैं बेड पर उठ कर बैठ गया था और बुरी तरह हांफते हुए इधर उधर देखने लगा था। मेरा चेहरा पसीने से तरबतर था। छत के कुंडे पर झूल रहे पंखे की हवा जैसे मुझ पर कोई असर ही नहीं डाल पा रही थी। मैंने बेड पर बिछे चादर से अपने चेहरे का पसीना पोंछा और फिर लेट कर उस सपने के बारे में सोचने लगा। ये तीसरी बार था जब मुझे इस तरह का सपना आया था। मेरे ज़हन में एक बार फिर से उस काका की बातें गूँज उठीं। पलक झपकते ही मेरे अंदर गुस्सा उभर आया। मेरा मन किया कि अभी यहाँ से जाऊं और उन लोगों का खून कर दूं जिन्होंने ऐसा कुचक्र चला रखा है।

जाने कितनी ही देर तक मैं उस सपने और मौजूदा परिस्थितियों के बारे में सोचता रहा। उसके बाद जाने कब मेरी आँख फिर से लग गई। सुबह मेनका चाची के जगाने पर ही मेरी आँख खुली। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं जल्दी से गुशलखाने में जा कर नहा धो लूं क्योंकि मुझे दादा ठाकुर के साथ पंचायत पर जाना है। चाची की बात सुन कर मैं फ़ौरन ही बेड से उठा और नीचे गुशलखाने की तरफ चल पड़ा।

क़रीब एक घंटे बाद तैयार हो कर मैं बैठक में पहुंचा। पिता जी और जगताप चाचा कुछ बातें कर रहे थे। मुझे देखते ही पिता जी ने मुझसे जीप निकालने के लिए कहा तो मैंने वहीं दीवार पर लगी कील से जीप की चाभी ली और बाहर निकल गया।

ये पहली बार था जब मैं पिता जी के साथ किसी पंचायत पर जा रहा था वरना इसके पहले तो ज़्यादातर जगताप चाचा ही जाते थे या फिर बड़े भ‌इया। पिता जी की जीप के पीछे दो जीपें और जाती थीं जिनमें वो लोग होते थे जो पिता जी की सुरक्षा के लिए होते थे और उनके हाथों में बन्दूखें होती थीं। ख़ैर पिता जी जीप में मेरे बगल से बैठे तो मैंने उनके आदेश पर जीप को आगे बढ़ा दिया। हमारे पीछे वो दोनों जीपें भी चल पड़ीं।

"हमने तुम्हारे लिए एक ख़ास चीज़ मंगवाई है।" रास्ते में पिता जी ने मुझसे कहा____"और तुमसे यही उम्मीद करते हैं कि उस ख़ास चीज़ का तुम ग़लत स्तेमाल नहीं करोगे।"
"ऐसी कौन सी ख़ास चीज़ है पिता जी?" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से पूछा।

"रिवाल्वर।" पिता जी ने ये कह कर मानो धमाका सा किया, और उनकी इस धमाकेदार बात को सुन कर मैं चकित भाव से उनकी तरफ देखने लगा जबकि उन्होंने मेरी तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा____"जैसा कि तुम्हें भी पता है कि आज कल हालात कुछ ठीक नहीं हैं इस लिए हमने तुम्हारी सुरक्षा को देखते हुए यही सोचा कि तुम्हारे पास एक ऐसी चीज़ ज़रूर होनी चाहिए जिससे विकट हालात में तुम बेहतर तरीके से अपनी सुरक्षा कर सको।"

"क्या अभी भी आपको इस बात का पता नहीं चल पाया है कि हमारे खिलाफ़ जो लोग षड़यंत्र रचे हुए हैं वो कौन लोग हैं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा।

"पहले हमें सिर्फ़ अंदेशा था।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन अब यकीन हो चुका है इस बात का। बहुत हद तक हमें ऐसे लोगों पर शक भी है लेकिन जैसा कि हम पहले भी तुमसे कह चुके हैं कि सिर्फ़ शक के आधार पर हम किसी पर भी हाथ नहीं डाल सकते, बल्कि किसी भी बात को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास पुख़्ता सबूतों का होना बेहद ज़रूरी है।"

"यानि आपको ऐसे लोगों पर शक तो है लेकिन पुख़्ता सबूत न होने की वजह से आप खुद को लाचार बना के बैठे हुए हैं।" मैंने बेख़ौफ़ भाव से कहा____"आपका दरोग़ा भी आज तक मुरारी काका के हत्यारे का पता नहीं लगा पाया।"

"उसको ये तो पता चला है कि उस रात जिस नक़ाबपोश की हत्या हुई थी वो कौन था।" पिता जी ने कहा____"लेकिन अभी वो ये पता नहीं लगा पाया है कि उस नक़ाबपोश को उस रात जान से मारने वाला वो सफ़ेदपोश कौन था।"

"मेरा ख़याल है कि उस सफ़ेदपोश का पता लगा पाना अब उस दरोगा के बस का है भी नहीं पिता जी।" मैंने बेझिझक कहा____"लेकिन इस मामले में मुझे कुछ ऐसा पता चला है जिसके बारे में आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकते हैं।"

"क्..क्या मतलब?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"ऐसा क्या पता चला है तुम्हें?"
"यही कि बड़े भैया के सम्बन्ध में की गई कुल गुरु की भविष्यवाणी झूठी है।" मैंने ये कह कर मानो धमाका सा कर दिया था।

"क्...क्या??" पिता जी बुरी तरह उछल पड़े, फिर जल्दी ही सम्हल कर बोले____"ये क्या कह रहे हो तुम?"
"यही सच है पिता जी।" मैंने उनकी तरफ एक नज़र डाल कर कहा____"कुल गुरु ने बड़े भैया के सम्बन्ध में जो भविष्यवाणी की है वो पूरी तरह तो नहीं लेकिन झूठी ज़रूर है। यानी अगर हम चाहें तो बड़े भैया को कुछ नहीं हो सकता।"

"ले...लेकिन।" पिता जी के मुख से बड़ी मुश्किल से अल्फ़ाज़ निकले____"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम? आख़िर ऐसा कहने के पीछे आधार क्या है तुम्हारे पास? कुल गुरु भला हमसे झूठ क्यों कहेंगे कि तुम्हारे बड़े भाई का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है?"

"यही तो एक बड़ा षड़यंत्र है पिता जी।" मैंने पिता जी को इस तरह चकित कर देने पर मन ही मन थोड़ा विजयी महसूस किया, फिर बड़े गर्व से बोला____"आप भी जानते हैं कि कुल गुरु कोई भगवान नहीं हैं बल्कि हमारी ही तरह एक आम इंसान ही हैं और इंसान से डरा धमका कर कुछ भी कराया जा सकता है।"

"मतलब तुम ये कहना चाहते हो कि किसी ने कुल गुरु को बुरी तरह डराया धमकाया?" पिता जी ने पहले जैसे ही चकित भाव से कहा____"और उनसे हमारे बड़े बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी करवाई?"

"बिल्कुल।" मैंने ज़ोर दे कर कहा____"अब क्योंकि आप कुल गुरु की बातों पर आँख बंद कर के भरोसा कर लेंगे इस लिए इस बात को आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकेंगे कि कुल गुरु ने ऐसा किसी के डराने धमकाने से कहा होगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी तुरंत कुछ न बोल सके थे। मेरी तरफ ऐसे देखने लगे थे मानो मैं कोई अजूबा था। वैसे मौजूदा परिस्थितियों में मैं उनके लिए अजूबा ही तो बन गया था।

"हमें अब भी यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा कुछ हो सकता है।" उन्होंने सोचने वाले भाव से किन्तु गंभीरता से कहा____"कुल गुरु ऐसे नहीं हैं कि वो किसी के डराने या धमकाने से हमारे बेटे के बारे में इतना बड़ा झूठ बोल देंगे। तुम्हें जहां से भी ये सब बातें पता चली हैं वो निहायत ही फ़र्ज़ी और बकवास हैं।"

"आप ऐसा इस लिए कह रहे हैं क्योंकि आपको कुल गुरु पर खुद से ज़्यादा भरोसा है और आपकी नज़र में वो कभी भी किसी से झूठ नहीं बोल सकते।" मैंने कहा____"जबकि आपके इसी विश्वास का फ़ायदा हमारे दुश्मनों ने उठाया है। हालांकि कुल गुरु ने जो कुछ आपसे कहा था वो यकीनन हो जाने वाला है। यानी एक तरह से उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं होगी लेकिन ये सब ऐसा हर्गिज़ नहीं होगा जिसे प्राकृतिक कहा जा सके।"

"पता नहीं तुम ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हो?" पिता जी ने झुंझलाते हुए कहा____"कभी कहते हो कि कुल गुरु ने झूठी भविष्यवाणी की थी और कभी कहते हो कि उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं है। आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?"

"क्या आप ये सोच सकते हैं कि बड़े भैया पर किसी ने तंत्र मंत्र करवाया हो सकता है?" मैंने ये कह कर मानो एक और धमाका किया, जिस पर पिता जी ने एक बार फिर से मेरी तरफ आश्चर्य से देखा। जबकि मैंने आगे कहा____"जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने बहुत दूर का सोच कर ही ऐसा खेल रचा है। इसे सीधे तरीके से यूं समझिए कि किसी ने बड़े भैया पर तंत्र मंत्र करवा दिया और हमारे कुल गुरु द्वारा ये भविष्यवाणी आपको सुनवा दी कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। कुल गुरु के कहे को आप विधाता का लेख समझ कर चुप चाप बैठ जाते। आप इस बात को स्वप्न में भी नहीं सोचते कि बड़े भैया के साथ किसी ने तंत्र मंत्र किया हो सकता है जिसके लिए आपको किसी ऐसे तांत्रिक से या किसी जादू मंतर करने वाले के पास जाना चाहिए जो भैया पर किए गए तंत्र मंत्र का इलाज़ कर सके। ज़ाहिर है जब आप ऐसा कुछ करते ही नहीं तो उस तंत्र मंत्र के प्रभाव से बड़े भैया एक दिन ज़रूर ही इस दुनिया से रुखसत हो जाते और आप यही समझते रहते कि ये सब विधाता का ही लेख था। षड़यंत्र करता ने जिस मकसद से ये षड़यंत्र रचा था उसमें वो बड़ी आसानी से सफल हो जाता। वो अपनी दुश्मनी के चलते आपके बड़े बेटे को इतनी आसानी से ख़त्म कर देता और आप अपने बेटे की हुई इस अकस्मात मौत को विधी का लेख ही समझते रहते।"

मेरी बातें सुन कर पिता जी एक बार फिर से मुझे वैसे ही देखने लगे थे जैसे कि मैं कोई अजूबा होऊं। मेरा ख़याल था कि अब उनकी बुद्धि के द्वार खुल चुके थे और ऐसा मुझे उनके चेहरे को देख कर आभास भी होने लगा था।

"यकीनन।" पिता जी गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कह उठे____"हम यकीनन ऐसा कुछ नहीं सोच सकते थे। तुमने बिल्कुल सही कहा कि जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने काफी दूर का सोच कर ही रचा है और इसके लिए उसने हमारे कुल गुरु को भी माध्यम बना लिया। हैरत की बात है कि हमारे कुल गुरु ने उनके कहने पर ऐसा कैसे कह दिया हमसे?"

"बताया न पिता जी कि इंसान से डरा धमका कर कुछ भी करवाया जा सकता है।" मैंने जीप को दाएं तरफ मोड़ते हुए कहा____"कुल गुरु को उन लोगों ने डराया धमकाया होगा या फिर किसी चीज़ से उन्हें मजबूर कर दिया गया होगा।"

"लेकिन तुम्हें ये सब बातें कहां से पता चलीं?" पिता जी ने मेरी तरफ हैरानी से देखते हुए पूछा____"किसने बताया तुम्हें और कब बताया?"

"मुझे ये बातें कल शाम को हमारे ही गांव के एक आदमी द्वारा पता चली हैं पिता जी।" मैंने कहा____"और तभी से मेरा खून ये सोच कर खौला जा रहा है कि जिस किसी ने भी मेरे भाई की मौत का ऐसा गन्दा षड्यंत्र रचा है उसको चीर फाड़ कर रख दूं।"

"नहीं, तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"हमें इस मामले में बहुत ही सावधानी से और बहुत ही बुद्धिमानी से काम लेना होगा। वैसे भी अभी हमें ये नहीं पता है कि ऐसा षड्यंत्रकारी कौन है? अगर हमने बिना सोचे समझे गुस्से में आ कर कोई भी कठोर क़दम उठाया तो हमारा दुश्मन सतर्क हो जाएगा।"

"आपने शायद ध्यान नहीं दिया होगा क्योंकि आप इस सबको विधि का लेख समझ बैठे थे।" मैंने सामने सड़क की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन मैं काफी समय से इस बात को देख कर हैरान था और सोच में पड़ा हुआ था कि बड़े भैया का बर्ताव अचानक से बदल कैसे जाता है। कभी तो वो मुझसे बड़ी ही ख़ुशी से बातें करते हैं और कभी उनके अंदर इतना गुस्सा और इतनी ज़्यादा नफ़रत भर जाती है कि वो मेरी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते। आपको पता है अब तक वो कई बार मुझे अपने इस बदले हुए बर्ताव की वजह से थप्पड़ मार चुके हैं। मुझे समझ नहीं आता था कि आख़िर ऐसा क्या है कि वो अलग अलग समय में दो तरह का बर्ताव करते हुए नज़र आते हैं। कल जब गांव के उस काका द्वारा मुझे ये सब बातें पता चलीं तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ऐसा वो जान बूझ कर नहीं बल्कि उस तंत्र मंत्र के प्रभाव की वजह से ही करते थे।"

पिता जी किसी गहरी सोच में डूबे हुए नज़र आने लगे थे। चेहरे पर कई तरह के भावों का आवा गवन चालू था। मैंने उन्हें इतना विचाराधीन कभी नहीं देखा था।

"हमें गुप्त रूप से कुल गुरु से मिलना होगा।" फिर उन्होंने गंभीर भाव से कहा____"उन्हीं से पता चलेगा कि उनसे हमारे बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी कराने वाला कौन था और उन्होंने किस मजबूरी के तहत ऐसी भविष्यवाणी की थी?"

"आपको जो सही लगे कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मैं भी अब अपने तरीके से कुछ करना चाहता हूं और आप इसके लिए मुझे बिल्कुल भी मना नहीं करेंगे।"

"क्या करना चाहते हो तुम?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"देखो, तुम्हें फिलहाल ऐसा कुछ भी नहीं करना है जिसकी वजह से अब तक के सारे किए कराए पर पानी फिर जाए। इस मामले को हम अपने तरीके से सम्हाल लेंगे।"

"आप बेफ़िक्र रहिए पिता जी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"आप जिस आशंका के चलते मुझे कुछ भी करने से रोक रहे हैं वैसा कुछ नहीं होगा। हालांकि मैं तो सब कुछ डंके की चोट पर करना पसंद करता हूं लेकिन क्योंकि मुझे भी वक़्त और हालात का बखूबी एहसास है इस लिए मैं जो कुछ भी करुंगा वो ठंडे दिमाग़ से और होशो हवास में ही करुंगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी मेरी तरफ अपलक देखने लगे थे। जैसे समझने की कोशिश कर रहे हों कि मेरे अंदर आख़िर चल क्या रहा है? हम दोनों के बीच कुछ देर तक ख़ामोशी रही।

"और क्या बताया था गांव के उस आदमी ने तुम्हें?" पिता जी ने मुझसे पूछा जिसके जवाब में मैंने उन्हें सारी बातें बता दी जिसे सुन कर वो दंग रह गए थे। माथे पर सोचो की लकीरों का मानों जाल सा फ़ैल गया था।

"बड़ी अजीब बात है।" सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"किसी ने हवेली में दो ऐसी नौकरानियों को रखा हुआ है जो नमक तो हवेली का खा रही हैं लेकिन काम उनका कर रही हैं। ख़ैर, सोचने वाली बात है कि उस नौकरानी को ऐसे कौन से कागज़ात हमारे कमरे से निकाल कर लाने का काम सौंपा होगा उन लोगों ने? क्या हमारी ज़मीन जायदाद के कागज़ात या फिर हमारी वसीयत वाले कागज़ात?"

"अगर आपको बुरा न लगे तो मैं एक बात पूछूं आपसे?" मैंने धड़कते दिल से उनकी तरफ देखते हुए कहा तो उन्होंने सामान्य भाव से ही कहा____"क्या पूछना चाहते हो?"

"कागज़ातों के बारे में विचार कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"और सोचिए कि हमारे ऐसे कागज़ातों की सबसे ज़्यादा किसे ज़रूरत हो सकती है? अगर वो कागज़ात वसीयत वाले हैं तो आख़िर ऐसा कौन हो सकता है जो उस नौकरानी के द्वारा आपके कमरे से उस वसीयत को चुरा लेना चाहता है? क्या ऐसा काम जगताप चाचा करवा सकते हैं? संभव है कि उनके मन में ये लालच अथवा ये भावना पनप रही हो कि हवेली का सारा कारोबार सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं की मुट्ठी में होना चाहिए।"

"इस सम्बन्ध में तुम्हारा जगताप पर इस तरह से शक करना जायज़ तो है।" पिता जी ने सामान्य भाव से कहा____"लेकिन ये भी यकीन मानो कि ना तो उसके मन में इस तरह का कोई लालच है और ना ही वो ऐसा किसी से करवा सकता है।"

"आप इतने यकीन से जगताप चाचा के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं?" मैंने पिता जी की तरफ एक नज़र डाली____"जबकि दुनिया का एक सच यही है कि ज़र जोरु और ज़मीन के लिए आज तक कोई किसी का नहीं हुआ।"

"हमारे इस यकीन की वजह ये है कि कुछ समय पहले जब हमने वसीयत बदलवाई थी।" पिता जी ने कहा____"तब हम जगताप को भी अपने साथ ही ले गए थे और सब कुछ उससे पूछ कर ही करवाया था। एक बात और, हमने अपनी सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद के दो हिस्से भी किए थे। हालांकि जगताप इससे सहमत नहीं था पर हमने भविष्य का सोच कर ही ऐसा किया था। हमने उसे समझाया था कि समय के साथ साथ हर इंसान की सोच और मानसिकता बदल जाती है इस लिए कल को किसी भी तरह का ज़मीनी विवाद न हो इस लिए सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद का बटवारा अभी से कर देना ज़्यादा उचित होगा। अब तुम खुद सोचो कि जिस जगताप को हिस्सा करना ही पसंद नहीं था और वो ये कहता था कि उसे ज़मीन जायदाद का मोह नहीं है बल्कि वो सिर्फ़ अपने बड़े भैया की सेवा ही करते रहना चाहता है वो किसी नौकरानी के द्वारा हमारे कमरे से ऐसे कोई कागज़ात क्यों चुराना चाहेगा?"

"जैसा कि आपने खुद कहा कि वक़्त के साथ साथ लोगों की सोच और मानसिकता भी बदल जाती है।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज के वक़्त में जगताप चाचा की सोच और मानसिकता बदल गई हो? जिस समय आपने सम्पूर्ण संपत्ति और ज़मीन जायदाद के दो हिस्से किए थे उस समय उनकी मानसिकता भले ही वैसी रही हो लेकिन ज़रूरी नहीं कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी वो वैसी ही मानसिकता रखते हों? संभव तो ये भी है कि उस समय उन्होंने ये मोह और आपकी सेवा करने वाली बात इसी लिए कही होगी ताकि उनके द्वारा ऐसा कहने से आपके मन में वो अपने प्रति एक अटूट विश्वास बैठा सकें। उनकी योजना रही होगी कि अगर कभी भविष्य में ऐसा कुछ होता नज़र आए तो आप उन पर शक ही न कर सकें। सीधी सी बात है पिता जी कि एक पिता को अपने लिए भले ही किसी चीज़ का लालच न हो लेकिन अपनी औलाद के लिए वो बहुत कुछ कर गुज़रने की मानसिकता रख सकता है।"

"हम मानते हैं कि तुम्हारी ये बातें तर्क़ संगत हैं।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन सिर्फ तर्क़ संगत बातों से कुछ नहीं होता। अगर सच्चाई वाकई में यही है तो इस सच्चाई को साबित करने के लिए भी सबसे पहले हमारे पास किसी ठोस प्रमाण का होना ज़रूरी है। वैसे हमें यकीन है कि जगताप के मन में ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि हमें आज तक ऐसा आभास नहीं हुआ कि उसके मन में ऐसा कुछ है।"

"मौजूदा परिस्थितियों में और कल उस गांव वाले काका के द्वारा ऐसी बातें जानने के बाद।" मैंने कहा____"मैंने इतना ज़रूर समझा है कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना हद दर्ज़े की बेवकूफ़ी होती है। बड़े भैया के सम्बन्ध में मैंने जो कुछ आपको बताया उससे आप समझ ही गए होंगे कि ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप तंत्र मंत्र जैसी चीज़ों का तसव्वुर तक नहीं कर सकते थे। ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप बड़े भैया की मौत को महज विधि का लेख समझ कर अपने बेटे की मौत पर सिर्फ़ और सिर्फ़ दुखी ही होते रहते। जहां तक मुझे याद है कुल गुरु ने अपनी भविष्यवाणी में यही कहा था कि बड़े भैया का जब अंत समय आएगा तब वो बीमार पड़ जाएंगे। अब सवाल ये है कि उनके बीमार पड़ जाने पर क्या आप या हवेली का कोई भी सदस्य सिर्फ हाथ पर हाथ धरे ही बैठा रह जाता? क्या उनकी बिमारी के इलाज़ के लिए कुछ न किया जाता? क्या सब लोग सिर्फ ये सोच कर ही बैठे रहते कि कुल गुरु ने बड़े भैया के लिए ऐसी भविष्यवाणी कर दी है तो अब कुछ हो ही नहीं सकता?"

"आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?" पिता जी ने मेरी तरफ शख़्त भाव से देखा।
"यही कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना कभी कभी बहुत ही ज़्यादा ग़लत और नुक़सानदायक होता है।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैं अपने ही बाप को छोटा बच्चा समझ कर समझा रहा होऊं।

"हम मानते हैं कि हमने ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा कर लिया था।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन हमने कुल गुरु की बातों पर भरोसा भी इसी लिए किया क्योंकि वो हमारे कुल गुरु हैं और उन पर या उनकी किसी भी बात पर शक करना हम पाप समझते थे। ख़ैर अब जब कि हमें सच का पता चल गया है तो हम यही सोच रहे हैं कि वास्तव में भीषण कलियुग आ गया है, जिसके चलते अब हमें अपने ही पूज्य गुरु पर शक करना होगा वरना भरोसा करने की स्थिति में बहुत बड़ा अनर्थ हो सकता है।"

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।



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ठाकुर साहब ने वसीयत के बारे में कुछ भी नही बताया कि वसीयत का बटवारा किस प्रकार से और किस किस के नाम पर है
वैभव का यह कहना कि कुल गुरु को किसी दबाव के तहत झूठ बोलवाया गया । ऐसा बिल्कुल हो सकता है ।
और इसके साथ साथ उसके बड़े भाई को तांत्रिक के द्वारा बीमार भी किया जा रहा है । इस काम के लिए घर की नौकरानी उन का साथ दे रही है कुसुम भी तो वैभव को चाय में दवा मिलाकर पिला रही है
वैभव अब एक समझदार और जिम्मेदार इंसान की तरह सोच रहा है। दादा ठाकुर भी उस पर भरोसा करने लगे है मगर क्या वो अकेला इस गुत्थी को सुलझा पाएगा।
 

Sanju@

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अब तक....

"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"

दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो ग‌ए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।

अब आगे.....

रात में सबके साथ मैं भी खाना खाने बैठा हुआ था लेकिन मेरा ध्यान खाने की तरफ ज़रा भी नहीं था। रह रह कर ज़हन में उस काका की बातें गूँज उठतीं और मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है? सहसा जगताप चाचा ने मुझे टोका तो मैं हल्के से चौंका और उनकी तरफ देखने लगा। उन्होंने इशारे से ही मुझे खाना खाने के लिए कहा तो मैं चुप चाप भोजन करने लगा। मैंने सिर उठा कर एक नज़र विभोर और अजीत पर डाली। मेरे वो दोनों कमीने भाई बेफ़िक्र हो कर खाने में मगन थे। उन्हें देख कर मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी सा उबल पड़ा जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से दबाया। खाने के बाद पिता जी ने एक बार फिर से मुझसे कहा कि सुबह जल्दी तैयार हो जाना क्योंकि मुझे उनके साथ पंचायत पर जाना है।

अपने कमरे में बेड पर लेटा मैं रात भर करवटें बदलता रहा और मन ही मन मौजूदा परिस्थितियों के बारे में तरह तरह के ख़याल बुनता रहा। मैंने फैसला कर लिया था कि अगले दिन पिता जी से इस बारे में बात करुंगा और फिर जल्द से जल्द इस बारे में कुछ करुंगा। बड़ी मुश्किल से मेरी आँख लगी और मैं नींद की आगोश में चला गया।

बन्द पलकों तले सहसा कुछ अजीब से चित्र उभरने लगे। ठीक वैसे ही जैसे पहले भी दो बार मैं सपने में देख चुका था। मैं एक सुनसान जगह पर एक बड़ी सी शिला पर लेटा हुआ था। चारो तरह अँधेरे की चादर फैली हुई थी। मुझसे क़रीब बीस फिट की दूरी पर घने पेड़ पौधों से युक्त जंगल दिख रहा था जो कि मेरे चारो तरफ ही था। सहसा उन पेड़ पौधों से मुझे अपनी तरफ बढ़ता हुआ गाढ़ा धुआँ दिखा। मैं शिला पर चित्त लेटा हुआ था। मेरे हाथ पैर पूरी तरह आज़ाद थे लेकिन मैं उन्हें अपनी मर्ज़ी से हिला नहीं सकता था। पेड़ों के बीच से निकल कर आता हुआ वो गाढ़ा धुआँ निरंतर मेरी तरफ ही बढ़ता चला आ रहा था। मैं उस गाढ़े धुएं को देख एकदम से घबरा उठा और खुद को उस धुएं से बचाने के लिए उस शिला से उठ कर भागने का सोचा मगर उठना तो दूर की बात थी मैं हिल भी नहीं पा रहा था। उधर वो गाढ़ा धुआँ अब मेरे बेहद क़रीब आ चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे वो धुआँ नहीं बल्कि कोई भयानक यमदूत हो जो धुएं का रूप ले कर मुझे चारो तरफ से घेरते हुए आ रहा था।

उस धुएं को अपने बेहद क़रीब देख कर मैं बुरी तरह उससे बचने के लिए छटपटाने लगा मगर मेरा छटपटाना सिर्फ मेरे मन तक ही था। मैं पूरी ताक़त लगा कर उस शिला से उठ कर भाग जाना चाहता था मगर मेरी हर कोशिश बेकार थी। मेरे देखते ही देखते वो गाढ़ा धुआँ आया और मुझे अपनी चपेट में ले लिया। मैं उस गाढ़े धुएं में पूरी तरह डूब गया। डर और घबराहट से मैं बुरी तरह चीख पड़ा और तभी मेरी आँख खुल गई।

मैं बेड पर उठ कर बैठ गया था और बुरी तरह हांफते हुए इधर उधर देखने लगा था। मेरा चेहरा पसीने से तरबतर था। छत के कुंडे पर झूल रहे पंखे की हवा जैसे मुझ पर कोई असर ही नहीं डाल पा रही थी। मैंने बेड पर बिछे चादर से अपने चेहरे का पसीना पोंछा और फिर लेट कर उस सपने के बारे में सोचने लगा। ये तीसरी बार था जब मुझे इस तरह का सपना आया था। मेरे ज़हन में एक बार फिर से उस काका की बातें गूँज उठीं। पलक झपकते ही मेरे अंदर गुस्सा उभर आया। मेरा मन किया कि अभी यहाँ से जाऊं और उन लोगों का खून कर दूं जिन्होंने ऐसा कुचक्र चला रखा है।

जाने कितनी ही देर तक मैं उस सपने और मौजूदा परिस्थितियों के बारे में सोचता रहा। उसके बाद जाने कब मेरी आँख फिर से लग गई। सुबह मेनका चाची के जगाने पर ही मेरी आँख खुली। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं जल्दी से गुशलखाने में जा कर नहा धो लूं क्योंकि मुझे दादा ठाकुर के साथ पंचायत पर जाना है। चाची की बात सुन कर मैं फ़ौरन ही बेड से उठा और नीचे गुशलखाने की तरफ चल पड़ा।

क़रीब एक घंटे बाद तैयार हो कर मैं बैठक में पहुंचा। पिता जी और जगताप चाचा कुछ बातें कर रहे थे। मुझे देखते ही पिता जी ने मुझसे जीप निकालने के लिए कहा तो मैंने वहीं दीवार पर लगी कील से जीप की चाभी ली और बाहर निकल गया।

ये पहली बार था जब मैं पिता जी के साथ किसी पंचायत पर जा रहा था वरना इसके पहले तो ज़्यादातर जगताप चाचा ही जाते थे या फिर बड़े भ‌इया। पिता जी की जीप के पीछे दो जीपें और जाती थीं जिनमें वो लोग होते थे जो पिता जी की सुरक्षा के लिए होते थे और उनके हाथों में बन्दूखें होती थीं। ख़ैर पिता जी जीप में मेरे बगल से बैठे तो मैंने उनके आदेश पर जीप को आगे बढ़ा दिया। हमारे पीछे वो दोनों जीपें भी चल पड़ीं।

"हमने तुम्हारे लिए एक ख़ास चीज़ मंगवाई है।" रास्ते में पिता जी ने मुझसे कहा____"और तुमसे यही उम्मीद करते हैं कि उस ख़ास चीज़ का तुम ग़लत स्तेमाल नहीं करोगे।"
"ऐसी कौन सी ख़ास चीज़ है पिता जी?" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से पूछा।

"रिवाल्वर।" पिता जी ने ये कह कर मानो धमाका सा किया, और उनकी इस धमाकेदार बात को सुन कर मैं चकित भाव से उनकी तरफ देखने लगा जबकि उन्होंने मेरी तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा____"जैसा कि तुम्हें भी पता है कि आज कल हालात कुछ ठीक नहीं हैं इस लिए हमने तुम्हारी सुरक्षा को देखते हुए यही सोचा कि तुम्हारे पास एक ऐसी चीज़ ज़रूर होनी चाहिए जिससे विकट हालात में तुम बेहतर तरीके से अपनी सुरक्षा कर सको।"

"क्या अभी भी आपको इस बात का पता नहीं चल पाया है कि हमारे खिलाफ़ जो लोग षड़यंत्र रचे हुए हैं वो कौन लोग हैं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा।

"पहले हमें सिर्फ़ अंदेशा था।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन अब यकीन हो चुका है इस बात का। बहुत हद तक हमें ऐसे लोगों पर शक भी है लेकिन जैसा कि हम पहले भी तुमसे कह चुके हैं कि सिर्फ़ शक के आधार पर हम किसी पर भी हाथ नहीं डाल सकते, बल्कि किसी भी बात को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास पुख़्ता सबूतों का होना बेहद ज़रूरी है।"

"यानि आपको ऐसे लोगों पर शक तो है लेकिन पुख़्ता सबूत न होने की वजह से आप खुद को लाचार बना के बैठे हुए हैं।" मैंने बेख़ौफ़ भाव से कहा____"आपका दरोग़ा भी आज तक मुरारी काका के हत्यारे का पता नहीं लगा पाया।"

"उसको ये तो पता चला है कि उस रात जिस नक़ाबपोश की हत्या हुई थी वो कौन था।" पिता जी ने कहा____"लेकिन अभी वो ये पता नहीं लगा पाया है कि उस नक़ाबपोश को उस रात जान से मारने वाला वो सफ़ेदपोश कौन था।"

"मेरा ख़याल है कि उस सफ़ेदपोश का पता लगा पाना अब उस दरोगा के बस का है भी नहीं पिता जी।" मैंने बेझिझक कहा____"लेकिन इस मामले में मुझे कुछ ऐसा पता चला है जिसके बारे में आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकते हैं।"

"क्..क्या मतलब?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"ऐसा क्या पता चला है तुम्हें?"
"यही कि बड़े भैया के सम्बन्ध में की गई कुल गुरु की भविष्यवाणी झूठी है।" मैंने ये कह कर मानो धमाका सा कर दिया था।

"क्...क्या??" पिता जी बुरी तरह उछल पड़े, फिर जल्दी ही सम्हल कर बोले____"ये क्या कह रहे हो तुम?"
"यही सच है पिता जी।" मैंने उनकी तरफ एक नज़र डाल कर कहा____"कुल गुरु ने बड़े भैया के सम्बन्ध में जो भविष्यवाणी की है वो पूरी तरह तो नहीं लेकिन झूठी ज़रूर है। यानी अगर हम चाहें तो बड़े भैया को कुछ नहीं हो सकता।"

"ले...लेकिन।" पिता जी के मुख से बड़ी मुश्किल से अल्फ़ाज़ निकले____"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम? आख़िर ऐसा कहने के पीछे आधार क्या है तुम्हारे पास? कुल गुरु भला हमसे झूठ क्यों कहेंगे कि तुम्हारे बड़े भाई का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है?"

"यही तो एक बड़ा षड़यंत्र है पिता जी।" मैंने पिता जी को इस तरह चकित कर देने पर मन ही मन थोड़ा विजयी महसूस किया, फिर बड़े गर्व से बोला____"आप भी जानते हैं कि कुल गुरु कोई भगवान नहीं हैं बल्कि हमारी ही तरह एक आम इंसान ही हैं और इंसान से डरा धमका कर कुछ भी कराया जा सकता है।"

"मतलब तुम ये कहना चाहते हो कि किसी ने कुल गुरु को बुरी तरह डराया धमकाया?" पिता जी ने पहले जैसे ही चकित भाव से कहा____"और उनसे हमारे बड़े बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी करवाई?"

"बिल्कुल।" मैंने ज़ोर दे कर कहा____"अब क्योंकि आप कुल गुरु की बातों पर आँख बंद कर के भरोसा कर लेंगे इस लिए इस बात को आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकेंगे कि कुल गुरु ने ऐसा किसी के डराने धमकाने से कहा होगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी तुरंत कुछ न बोल सके थे। मेरी तरफ ऐसे देखने लगे थे मानो मैं कोई अजूबा था। वैसे मौजूदा परिस्थितियों में मैं उनके लिए अजूबा ही तो बन गया था।

"हमें अब भी यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा कुछ हो सकता है।" उन्होंने सोचने वाले भाव से किन्तु गंभीरता से कहा____"कुल गुरु ऐसे नहीं हैं कि वो किसी के डराने या धमकाने से हमारे बेटे के बारे में इतना बड़ा झूठ बोल देंगे। तुम्हें जहां से भी ये सब बातें पता चली हैं वो निहायत ही फ़र्ज़ी और बकवास हैं।"

"आप ऐसा इस लिए कह रहे हैं क्योंकि आपको कुल गुरु पर खुद से ज़्यादा भरोसा है और आपकी नज़र में वो कभी भी किसी से झूठ नहीं बोल सकते।" मैंने कहा____"जबकि आपके इसी विश्वास का फ़ायदा हमारे दुश्मनों ने उठाया है। हालांकि कुल गुरु ने जो कुछ आपसे कहा था वो यकीनन हो जाने वाला है। यानी एक तरह से उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं होगी लेकिन ये सब ऐसा हर्गिज़ नहीं होगा जिसे प्राकृतिक कहा जा सके।"

"पता नहीं तुम ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हो?" पिता जी ने झुंझलाते हुए कहा____"कभी कहते हो कि कुल गुरु ने झूठी भविष्यवाणी की थी और कभी कहते हो कि उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं है। आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?"

"क्या आप ये सोच सकते हैं कि बड़े भैया पर किसी ने तंत्र मंत्र करवाया हो सकता है?" मैंने ये कह कर मानो एक और धमाका किया, जिस पर पिता जी ने एक बार फिर से मेरी तरफ आश्चर्य से देखा। जबकि मैंने आगे कहा____"जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने बहुत दूर का सोच कर ही ऐसा खेल रचा है। इसे सीधे तरीके से यूं समझिए कि किसी ने बड़े भैया पर तंत्र मंत्र करवा दिया और हमारे कुल गुरु द्वारा ये भविष्यवाणी आपको सुनवा दी कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। कुल गुरु के कहे को आप विधाता का लेख समझ कर चुप चाप बैठ जाते। आप इस बात को स्वप्न में भी नहीं सोचते कि बड़े भैया के साथ किसी ने तंत्र मंत्र किया हो सकता है जिसके लिए आपको किसी ऐसे तांत्रिक से या किसी जादू मंतर करने वाले के पास जाना चाहिए जो भैया पर किए गए तंत्र मंत्र का इलाज़ कर सके। ज़ाहिर है जब आप ऐसा कुछ करते ही नहीं तो उस तंत्र मंत्र के प्रभाव से बड़े भैया एक दिन ज़रूर ही इस दुनिया से रुखसत हो जाते और आप यही समझते रहते कि ये सब विधाता का ही लेख था। षड़यंत्र करता ने जिस मकसद से ये षड़यंत्र रचा था उसमें वो बड़ी आसानी से सफल हो जाता। वो अपनी दुश्मनी के चलते आपके बड़े बेटे को इतनी आसानी से ख़त्म कर देता और आप अपने बेटे की हुई इस अकस्मात मौत को विधी का लेख ही समझते रहते।"

मेरी बातें सुन कर पिता जी एक बार फिर से मुझे वैसे ही देखने लगे थे जैसे कि मैं कोई अजूबा होऊं। मेरा ख़याल था कि अब उनकी बुद्धि के द्वार खुल चुके थे और ऐसा मुझे उनके चेहरे को देख कर आभास भी होने लगा था।

"यकीनन।" पिता जी गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कह उठे____"हम यकीनन ऐसा कुछ नहीं सोच सकते थे। तुमने बिल्कुल सही कहा कि जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने काफी दूर का सोच कर ही रचा है और इसके लिए उसने हमारे कुल गुरु को भी माध्यम बना लिया। हैरत की बात है कि हमारे कुल गुरु ने उनके कहने पर ऐसा कैसे कह दिया हमसे?"

"बताया न पिता जी कि इंसान से डरा धमका कर कुछ भी करवाया जा सकता है।" मैंने जीप को दाएं तरफ मोड़ते हुए कहा____"कुल गुरु को उन लोगों ने डराया धमकाया होगा या फिर किसी चीज़ से उन्हें मजबूर कर दिया गया होगा।"

"लेकिन तुम्हें ये सब बातें कहां से पता चलीं?" पिता जी ने मेरी तरफ हैरानी से देखते हुए पूछा____"किसने बताया तुम्हें और कब बताया?"

"मुझे ये बातें कल शाम को हमारे ही गांव के एक आदमी द्वारा पता चली हैं पिता जी।" मैंने कहा____"और तभी से मेरा खून ये सोच कर खौला जा रहा है कि जिस किसी ने भी मेरे भाई की मौत का ऐसा गन्दा षड्यंत्र रचा है उसको चीर फाड़ कर रख दूं।"

"नहीं, तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"हमें इस मामले में बहुत ही सावधानी से और बहुत ही बुद्धिमानी से काम लेना होगा। वैसे भी अभी हमें ये नहीं पता है कि ऐसा षड्यंत्रकारी कौन है? अगर हमने बिना सोचे समझे गुस्से में आ कर कोई भी कठोर क़दम उठाया तो हमारा दुश्मन सतर्क हो जाएगा।"

"आपने शायद ध्यान नहीं दिया होगा क्योंकि आप इस सबको विधि का लेख समझ बैठे थे।" मैंने सामने सड़क की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन मैं काफी समय से इस बात को देख कर हैरान था और सोच में पड़ा हुआ था कि बड़े भैया का बर्ताव अचानक से बदल कैसे जाता है। कभी तो वो मुझसे बड़ी ही ख़ुशी से बातें करते हैं और कभी उनके अंदर इतना गुस्सा और इतनी ज़्यादा नफ़रत भर जाती है कि वो मेरी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते। आपको पता है अब तक वो कई बार मुझे अपने इस बदले हुए बर्ताव की वजह से थप्पड़ मार चुके हैं। मुझे समझ नहीं आता था कि आख़िर ऐसा क्या है कि वो अलग अलग समय में दो तरह का बर्ताव करते हुए नज़र आते हैं। कल जब गांव के उस काका द्वारा मुझे ये सब बातें पता चलीं तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ऐसा वो जान बूझ कर नहीं बल्कि उस तंत्र मंत्र के प्रभाव की वजह से ही करते थे।"

पिता जी किसी गहरी सोच में डूबे हुए नज़र आने लगे थे। चेहरे पर कई तरह के भावों का आवा गवन चालू था। मैंने उन्हें इतना विचाराधीन कभी नहीं देखा था।

"हमें गुप्त रूप से कुल गुरु से मिलना होगा।" फिर उन्होंने गंभीर भाव से कहा____"उन्हीं से पता चलेगा कि उनसे हमारे बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी कराने वाला कौन था और उन्होंने किस मजबूरी के तहत ऐसी भविष्यवाणी की थी?"

"आपको जो सही लगे कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मैं भी अब अपने तरीके से कुछ करना चाहता हूं और आप इसके लिए मुझे बिल्कुल भी मना नहीं करेंगे।"

"क्या करना चाहते हो तुम?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"देखो, तुम्हें फिलहाल ऐसा कुछ भी नहीं करना है जिसकी वजह से अब तक के सारे किए कराए पर पानी फिर जाए। इस मामले को हम अपने तरीके से सम्हाल लेंगे।"

"आप बेफ़िक्र रहिए पिता जी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"आप जिस आशंका के चलते मुझे कुछ भी करने से रोक रहे हैं वैसा कुछ नहीं होगा। हालांकि मैं तो सब कुछ डंके की चोट पर करना पसंद करता हूं लेकिन क्योंकि मुझे भी वक़्त और हालात का बखूबी एहसास है इस लिए मैं जो कुछ भी करुंगा वो ठंडे दिमाग़ से और होशो हवास में ही करुंगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी मेरी तरफ अपलक देखने लगे थे। जैसे समझने की कोशिश कर रहे हों कि मेरे अंदर आख़िर चल क्या रहा है? हम दोनों के बीच कुछ देर तक ख़ामोशी रही।

"और क्या बताया था गांव के उस आदमी ने तुम्हें?" पिता जी ने मुझसे पूछा जिसके जवाब में मैंने उन्हें सारी बातें बता दी जिसे सुन कर वो दंग रह गए थे। माथे पर सोचो की लकीरों का मानों जाल सा फ़ैल गया था।

"बड़ी अजीब बात है।" सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"किसी ने हवेली में दो ऐसी नौकरानियों को रखा हुआ है जो नमक तो हवेली का खा रही हैं लेकिन काम उनका कर रही हैं। ख़ैर, सोचने वाली बात है कि उस नौकरानी को ऐसे कौन से कागज़ात हमारे कमरे से निकाल कर लाने का काम सौंपा होगा उन लोगों ने? क्या हमारी ज़मीन जायदाद के कागज़ात या फिर हमारी वसीयत वाले कागज़ात?"

"अगर आपको बुरा न लगे तो मैं एक बात पूछूं आपसे?" मैंने धड़कते दिल से उनकी तरफ देखते हुए कहा तो उन्होंने सामान्य भाव से ही कहा____"क्या पूछना चाहते हो?"

"कागज़ातों के बारे में विचार कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"और सोचिए कि हमारे ऐसे कागज़ातों की सबसे ज़्यादा किसे ज़रूरत हो सकती है? अगर वो कागज़ात वसीयत वाले हैं तो आख़िर ऐसा कौन हो सकता है जो उस नौकरानी के द्वारा आपके कमरे से उस वसीयत को चुरा लेना चाहता है? क्या ऐसा काम जगताप चाचा करवा सकते हैं? संभव है कि उनके मन में ये लालच अथवा ये भावना पनप रही हो कि हवेली का सारा कारोबार सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं की मुट्ठी में होना चाहिए।"

"इस सम्बन्ध में तुम्हारा जगताप पर इस तरह से शक करना जायज़ तो है।" पिता जी ने सामान्य भाव से कहा____"लेकिन ये भी यकीन मानो कि ना तो उसके मन में इस तरह का कोई लालच है और ना ही वो ऐसा किसी से करवा सकता है।"

"आप इतने यकीन से जगताप चाचा के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं?" मैंने पिता जी की तरफ एक नज़र डाली____"जबकि दुनिया का एक सच यही है कि ज़र जोरु और ज़मीन के लिए आज तक कोई किसी का नहीं हुआ।"

"हमारे इस यकीन की वजह ये है कि कुछ समय पहले जब हमने वसीयत बदलवाई थी।" पिता जी ने कहा____"तब हम जगताप को भी अपने साथ ही ले गए थे और सब कुछ उससे पूछ कर ही करवाया था। एक बात और, हमने अपनी सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद के दो हिस्से भी किए थे। हालांकि जगताप इससे सहमत नहीं था पर हमने भविष्य का सोच कर ही ऐसा किया था। हमने उसे समझाया था कि समय के साथ साथ हर इंसान की सोच और मानसिकता बदल जाती है इस लिए कल को किसी भी तरह का ज़मीनी विवाद न हो इस लिए सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद का बटवारा अभी से कर देना ज़्यादा उचित होगा। अब तुम खुद सोचो कि जिस जगताप को हिस्सा करना ही पसंद नहीं था और वो ये कहता था कि उसे ज़मीन जायदाद का मोह नहीं है बल्कि वो सिर्फ़ अपने बड़े भैया की सेवा ही करते रहना चाहता है वो किसी नौकरानी के द्वारा हमारे कमरे से ऐसे कोई कागज़ात क्यों चुराना चाहेगा?"

"जैसा कि आपने खुद कहा कि वक़्त के साथ साथ लोगों की सोच और मानसिकता भी बदल जाती है।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज के वक़्त में जगताप चाचा की सोच और मानसिकता बदल गई हो? जिस समय आपने सम्पूर्ण संपत्ति और ज़मीन जायदाद के दो हिस्से किए थे उस समय उनकी मानसिकता भले ही वैसी रही हो लेकिन ज़रूरी नहीं कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी वो वैसी ही मानसिकता रखते हों? संभव तो ये भी है कि उस समय उन्होंने ये मोह और आपकी सेवा करने वाली बात इसी लिए कही होगी ताकि उनके द्वारा ऐसा कहने से आपके मन में वो अपने प्रति एक अटूट विश्वास बैठा सकें। उनकी योजना रही होगी कि अगर कभी भविष्य में ऐसा कुछ होता नज़र आए तो आप उन पर शक ही न कर सकें। सीधी सी बात है पिता जी कि एक पिता को अपने लिए भले ही किसी चीज़ का लालच न हो लेकिन अपनी औलाद के लिए वो बहुत कुछ कर गुज़रने की मानसिकता रख सकता है।"

"हम मानते हैं कि तुम्हारी ये बातें तर्क़ संगत हैं।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन सिर्फ तर्क़ संगत बातों से कुछ नहीं होता। अगर सच्चाई वाकई में यही है तो इस सच्चाई को साबित करने के लिए भी सबसे पहले हमारे पास किसी ठोस प्रमाण का होना ज़रूरी है। वैसे हमें यकीन है कि जगताप के मन में ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि हमें आज तक ऐसा आभास नहीं हुआ कि उसके मन में ऐसा कुछ है।"

"मौजूदा परिस्थितियों में और कल उस गांव वाले काका के द्वारा ऐसी बातें जानने के बाद।" मैंने कहा____"मैंने इतना ज़रूर समझा है कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना हद दर्ज़े की बेवकूफ़ी होती है। बड़े भैया के सम्बन्ध में मैंने जो कुछ आपको बताया उससे आप समझ ही गए होंगे कि ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप तंत्र मंत्र जैसी चीज़ों का तसव्वुर तक नहीं कर सकते थे। ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप बड़े भैया की मौत को महज विधि का लेख समझ कर अपने बेटे की मौत पर सिर्फ़ और सिर्फ़ दुखी ही होते रहते। जहां तक मुझे याद है कुल गुरु ने अपनी भविष्यवाणी में यही कहा था कि बड़े भैया का जब अंत समय आएगा तब वो बीमार पड़ जाएंगे। अब सवाल ये है कि उनके बीमार पड़ जाने पर क्या आप या हवेली का कोई भी सदस्य सिर्फ हाथ पर हाथ धरे ही बैठा रह जाता? क्या उनकी बिमारी के इलाज़ के लिए कुछ न किया जाता? क्या सब लोग सिर्फ ये सोच कर ही बैठे रहते कि कुल गुरु ने बड़े भैया के लिए ऐसी भविष्यवाणी कर दी है तो अब कुछ हो ही नहीं सकता?"

"आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?" पिता जी ने मेरी तरफ शख़्त भाव से देखा।
"यही कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना कभी कभी बहुत ही ज़्यादा ग़लत और नुक़सानदायक होता है।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैं अपने ही बाप को छोटा बच्चा समझ कर समझा रहा होऊं।

"हम मानते हैं कि हमने ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा कर लिया था।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन हमने कुल गुरु की बातों पर भरोसा भी इसी लिए किया क्योंकि वो हमारे कुल गुरु हैं और उन पर या उनकी किसी भी बात पर शक करना हम पाप समझते थे। ख़ैर अब जब कि हमें सच का पता चल गया है तो हम यही सोच रहे हैं कि वास्तव में भीषण कलियुग आ गया है, जिसके चलते अब हमें अपने ही पूज्य गुरु पर शक करना होगा वरना भरोसा करने की स्थिति में बहुत बड़ा अनर्थ हो सकता है।"

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।



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ठाकुर साहब ने वसीयत के बारे में कुछ भी नही बताया कि वसीयत का बटवारा किस प्रकार से और किस किस के नाम पर है
वैभव का यह कहना कि कुल गुरु को किसी दबाव के तहत झूठ बोलवाया गया । ऐसा बिल्कुल हो सकता है ।
और इसके साथ साथ उसके बड़े भाई को तांत्रिक के द्वारा बीमार भी किया जा रहा है । इस काम के लिए घर की नौकरानी उन का साथ दे रही है कुसुम भी तो वैभव को चाय में दवा मिलाकर पिला रही है
वैभव अब एक समझदार और जिम्मेदार इंसान की तरह सोच रहा है। दादा ठाकुर भी उस पर भरोसा करने लगे है मगर क्या वो अकेला इस गुत्थी को सुलझा पाएगा।
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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अध्याय - 42
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अब तक....

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।

अब आगे....

वापस हवेली आते आते दोपहर हो गई थी। माँ ने खाना खाने के लिए कहा लेकिन मैंने उन्हें ये कह कर इंकार कर दिया था कि मुझे किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना है। अपनी बुलेट ले कर मैं सीधा मुरारी के गांव निकल गया था। जैसा कि मैंने पहले भी बताया था कि इधर से जाने पर सबसे पहले गांव से बाहर मुरारी का ही घर पड़ता था। उसके घर के क़रीब पहुंचा तो घर के बाहर ही मुझे सरोज काकी मिल गई थी। मैंने उससे कहा कि थोड़ी देर में लौट कर आऊंगा और अनुराधा के हाथ का बना खाना खाऊंगा। सरोज काकी मेरी बात सुन कर मुस्कुराई और फिर हाँ में सिर हिला दिया था। उसके बाद मैं सीधा जगन के घर पहुंच गया था। जगन घर पर नहीं था। उसकी बीवी ने बताया कि गांव तरफ गए हैं। मेरे कहने पर उसने अपने बेटे को भेजा था जगन को बुला कर लाने के लिए। थोड़ी देर में जब जगन आया तो मुझे अपने घर में देखते ही पहले तो चौंका था फिर ख़ुशी से मुस्कुराने लगा था। उसने मेरे स्वागत के लिए खुद ही जल्दी से जल पान की ब्यवस्था कर दी थी।

जल पान करने के बाद मैंने जगन को बताया कि मैं उसके पास एक ख़ास काम से आया हूं। जगन मेरी बात सुन कर ख़ुशी ख़ुशी बोला कि ये उसकी खुशनसीबी है कि मैं उसके पास किसी काम से आया हूं। ख़ैर मैंने जगन को एक काम सौंपा और कहा कि जल्द से जल्द वो काम कर के मुझे बताए। जगन काम के बारे में सुन कर थोड़ा चौंका भी था और हैरान भी हुआ था लेकिन फिर बोला कि ठीक है वैभव बेटा मैं जल्दी ही ये काम कर के बताता हूं।

जगन के यहाँ कुछ देर मैं रुका और उसके घर का भी हाल चाल लिया उसके बाद मैं अपनी बुलेट ले कर मुरारी काका के घर की तरफ चल पड़ा। कल जब मैं यहाँ आया था तो अनुराधा से कह कर गया था कि दूसरे दिन मैं उसके हाथ का बना खाना खाने आऊंगा। सुबह क्योंकि मुझे पिता जी के साथ पंचायत पर जाना पड़ गया था इस लिए मुझे कुछ ज़्यादा ही देर हो गई थी। ख़ैर मुरारी काका के घर के बाहर मैंने बुलेट खड़ी की। दरवाज़ा खुला ही था तो मैं अंदर दाखिल हो गया। अंदर सरोज काकी अपने बेटे अनूप के पास बैठी थी।

"बड़ी देर लगा दी आने में बेटा।" सरोज काकी ने कहा____"अनु ने बताया था कि आज तुम यहाँ पर खाना खाने आओगे तो मैं बड़ा खुश हुई थी।"
"माफ़ करना काकी।" काकी ने उठ कर बरामदे में रखी चारपाई को बिछाया तो मैं उसमें बैठते हुए बोला____"असल में सुबह पिता जी के साथ पंचायत पर चला गया था इस वजह से आने में देर हो गई वरना तुम तो जानती ही हो कि अनुराधा के हाथ का बना खाना खाने के लिए मैं भागता हुआ यहाँ आता।"

"मैंने उसे समझाया था कि खाना अच्छे से बनाना और सब कुछ तुम्हारी पसंद का ही बनाए।" काकी ने कहा____"इस चक्कर में ये सुबह जल्दी ही उठ गई थी और जल्दी नहा भी लिया था। उसके बाद खाना बनाने की तैयारी में जुट गई थी। जब तुम सुबह नहीं आए तो मैं समझ गई कि कहीं किसी काम में फंस गए होगे। तुम्हारे चक्कर में हम लोगों ने भी नहीं खाया। बस अनूप खाने के लिए रोने लगा था तो इसे खिलाया।"

"तुम भी हद करती हो काकी।" मैंने हैरानी से कहा____"मेरे चक्कर में तुम लोगों को भूखा रहने की भला क्या ज़रूरत थी? वैसे तुम्हें पता है हवेली में माँ ने मुझसे खाना खाने के लिए कहा लेकिन मैंने मना कर दिया उन्हें। अब तुम ही बताओ काकी कि यहाँ के खाने को भुला कर मैं कैसे हवेली का खाना खा लेता और वो भी तब जबकि मैंने अनुराधा से कहा हो कि मैं ज़रूर आऊंगा।"

"यानी हम लोगों की तरह तुम भी भूखे ही घूम रहे हो?" सरोज काकी हंसते हुए बोली____"ख़ैर, अब बातें छोड़ो और चलो जल्दी से हाथ मुँह धो लो। मैं तब तक बैठका लगाती हूं।"

सरोज काकी ने अनुराधा को आवाज़ दी तो वो रसोई से निकल कर बाहर आई। काकी ने उससे कहा कि वो मुझे पानी दे ताकि मैं हाथ पैर धो लूं। काकी की बात सुन कर अनुराधा कोने में रखी बाल्टी का पानी उठा कर नर्दे के पास रख दिया। मैं नर्दे के ही पास आ गया था। मैंने देखा अनुराधा के चेहरे पर अलग ही चमक थी। जैसे ही मुझसे नज़र मिलती तो वो झट से नज़रें हटा लेती और अपनी मुस्कान को छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगती। मैंने उसे छेड़ने का सोचा।

"कहो ठकुराईन क्या हाल चाल हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में ये कहा तो अनुराधा बुरी तरह चौंकी और आँखें फाड़ कर मेरी तरफ देखने लगी। चेहरे पर घबराहट के भाव लिए वो धीमें से ही बोली____"मु..मुझे इस नाम से मत पुकारिए।

"ना, मैं तो अब इसी नाम से पुकारूँगा तुम्हें।" उसने लोटे में भर कर पानी दिया तो मैंने लेते हुए कहा।
"नहीं न।" अनुराधा ने बेबस भाव से कहा____"मां ने सुन लिया तो वो बहुत डाँटेगी मुझे।"

"अगर तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें ठकुराईन न कहूं।" मैंने हाथ धोते हुए कहा____"तो तुम भी मुझे छोटे ठाकुर नहीं कहोगी और काकी के सामने मेरा नाम ले कर पुकारोगी।"

"पर बिना वजह कैसे पुकारूंगी मैं?" अनुराधा ने उलझनपूर्ण भाव से कहा____"वैसे मैंने कहा तो है आपसे कि अब से मैं आपका नाम ले कर ही आपको पुकारुंगी।"

"चलो अब यही तो देखना है।" मैंने खड़े होते हुए कहा____"कि तुम मुझे काकी के सामने मेरे नाम से पुकारती हो कि नहीं।"
"पर मैं बिना वजह कैसे आपको पुकारूंगी भला?" अनुराधा ने मासूमियत से कहा____"ऐसे में तो माँ गुस्सा हो जाएगी।"

"यार तुम काकी से इतना डरती क्यों हो?" मैंने उसे घूरते हुए कहा____"अच्छा मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं। उपाय ये है कि जब मैं खाना खा रहा होऊंगा तो तुम रसोई से ही मेरा नाम लेकर मुझसे पूछना कि मुझे और कुछ चाहिए कि नहीं, ठीक है?"

"और अगर मेरे ऐसा कहने पर माँ ने डांटा तो?" अनुराधा ने मेरी तरफ नज़र उठा कर देखा।
"अरे! मैं हूं न।" मैंने उसे आस्वस्त किया____"काकी अगर तुम्हे डाँटेगी तो मैं काकी को अच्छे से समझा दूंगा।"

मेरी बात सुन कर अनुराधा ने हाँ में सिर हिलाया और चली गई। हाथ पैर धो कर मैं आया तो देखा काकी ने बरामदे की ज़मीन पर एक चादर बिछा दी थी और उसके सामने एक लकड़ी का पीढ़ा रख दिया था जिसके बगल से लोटा ग्लास में पानी रखा हुआ था। मैं आया और उसी चादर में बैठ गया। काकी मेरे पास ही कुछ दूरी पर बैठ गई। कुछ ही देर में अनुराधा थाली ले कर आई और उस लकड़ी के पीढ़े पर रख दिया। थाली में वो सब कुछ था जो मुझे इस घर में सबसे ज़्यादा खाना पसंद था।

खाना शुरू हुआ और खाने के दौरान काकी से इधर उधर की बातें भी शुरू हो ग‌ईं। ये अलग बात है कि मेरा ध्यान काकी से बातों में कम बल्कि इस बात पर ज़्यादा था कि अनुराधा कब रसोई से मेरा नाम ले कर मुझे पुकारती है। इस बीच कई बार अनुराधा रसोई से निकल कर आई और थाली में कुछ न कुछ रख कर चली गई लेकिन एक बार भी उसने वो न किया जो कहने का हमारे बीच समझौता हुआ था। यहाँ तक कि मैं खाना भी खा चुका और हाथ धो कर चारपाई पर भी जा बैठा। इस बात से मुझे अनुराधा पर बेहद गुस्सा आया हुआ था। अभी मैं अपने अंदर उभरे इस गुस्से को काबू में कर ही रहा था कि तभी सरोज काकी का बेटा अनूप काकी से कहने लगा कि उसे दिशा मैदान जाना है। वो पेट पकड़े काकी के सामने आ कर खड़ा हो गया था।

"बेटा तुम यहीं बैठना।" काकी मेरी तरफ देखते हुए बोली____"मैं इसे दिशा मैदान करा के लाती हूं।"
"ठीक है काकी।" मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो गया कि काकी के चले जाने से मुझे अनुराधा के साथ अकेले रहने का मौका मिल गया है लेकिन प्रत्यक्ष में बोला____"लेकिन जल्दी ही आना क्योंकि मुझे हवेली जल्दी जाना है।"

काकी अनूप को ले कर दूसरे वाले दरवाज़े से घर के पीछे की तरफ चली गई। काकी के जाते ही मानो फ़िज़ा में सन्नाटा छा गया। मेरा दिल किया कि अभी उठूं और पलक झपकते ही रसोई में अनुराधा के पास पहुंच जाऊं। अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी अनुराधा रसोई से निकल कर बाहर आई।

"मुझे माफ़ कर दीजिए।" फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए दीन हीन भाव से कहा____"मां के सामने आपका नाम ले कर आपको पुकारने की मुझमें हिम्मत ही न हुई थी। हर बार सोचती थी कि अब पुकारूंगी आपको लेकिन माँ के डर से पुकारा ही नहीं गया मुझसे। माफ़ कर दीजिए मुझे।"

"तुम्हें पता है इस वक़्त मुझे कैसा महसूस हो रहा है?" मैंने संजीदा भाव से कहा____"ऐसा लग रहा है जैसे सरे-बाज़ार लुट गया हूं मैं। भरी महफ़िल में जैसे किसी ने मेरी इज़्ज़त का जनाजा निकाल दिया हो।"

"भगवान के लिए ऐसा मत कहिए।" अनुराधा ने सहसा दुखी भाव से कहा____"मुझे खुद भी बहुत बुरा लग रहा है कि मैंने आपका कहा नहीं माना लेकिन यकीन मानिए माँ के सामने मुझसे कुछ बोला ही नहीं गया।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने जब देखा कि अनुराधा की आँखें नम हो गई हैं तो मुझे एहसास हुआ कि ग़लती उसकी नहीं थी। यकीनन अपनी माँ के सामने उससे बोला नहीं गया होगा। उसकी हालात को समझते हुए मैंने आगे कहा____"मैं समझ सकता हूं कि तुम्हारे लिए ये इतना आसान नहीं था। तुमने कोशिश की यही बड़ी बात है।"

"क्या आप नाराज़ हैं?" उसने मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
"यही तो समस्या है कि मैं तुमसे नाराज़ नहीं हो सकता।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"तुम वो लड़की हो जिसने मुझ जैसे इंसान को मुकम्मल तौर पर बदल दिया है। तुम सच में एक अच्छी लड़की हो अनुराधा। मैं अगर चाहूं भी तो तुमसे नाराज़ नहीं हो सकता। कभी कभी सोचता हूं कि क्या तुमने कोई जादू कर दिया है मुझ पर?"

"ये...ये क्या कह रहे हैं आप?" अनुराधा बुरी तरह चौंकी।
"वही जो मैं महसूस करता हूं।" मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा____"कुछ तो किया ही है तुमने। कभी खुद भी सोचना इस बारे में।"

"पता नहीं आप ये क्या बोले जा रहे हैं।" अनुराधा ने सिर झुका कर कहा____"मैं तो बस इतना जानती हूं कि मैं किसी के साथ कुछ भी करने का सोच भी नहीं सकती।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने कहा____"मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि आज कल वक़्त और हालात ठीक नहीं हैं इस लिए अपना और अपने परिवार का ख़याल रखना। एक बात और, अगर किसी भी तरह की ऐसी वैसी कोई बात समझ में आए तो सीधा उस जगह पर चली जाना जहां पर मेरा नया मकान बन रहा है। वहां पर तुम्हें भुवन नाम का एक आदमी मिलेगा, उसे तुम बता देना।"

"क्या कुछ होने वाला है वैभव जी?" अनुराधा ने मेरा नाम ले कर कहा____"क्या वो साहूकार का लड़का फिर से कुछ करने वाला है?"

"किसी का भरोसा नहीं है अनुराधा।" मैंने कहा____"कौन कब क्या करेगा इस बारे में ठीक से कुछ नहीं कह सकते। इसी लिए कह रहा हूं कि ख़याल रखना। रात में दरवाज़े अच्छे से बंद कर के रखना, और अगर कोई दरवाज़ा खुलवाए तो पहले ये जान लेना कि बाहर कौन है। कोई अजनबी कितना भी ज़ोर देकर कहे मगर दरवाज़ा मत खोलना।"

"आपकी ये बातें सुन कर तो मुझे अब घबराहट होने लगी है वैभव जी।" अनुराधा ने चिंतित भाव से कहा____"आज तक मेरे बाबू जी के हत्यारे का पता नहीं चला। हमारा ये घर वैसे भी गांव से बाहर अलग बना हुआ है जिससे अगर कोई ऐसी बात हुई भी तो जल्दी से कोई हमारी मदद के लिए नहीं आ सकता।"

"फ़िक्र मत करो।" मैंने कहा____"मेरे रहते ऐसी वैसी कोई बात नहीं होगी। मैं तुम लोगों की सुरक्षा का कोई अच्छा सा इंतजाम कर दूंगा।"

अभी मैं उससे बात ही कर रहा था कि तभी अनुराधा का भाई अनूप दूसरे वाले दरवाज़े से आँगन में दाखिल हुआ। उसे देख अनुराधा जल्दी से मुझसे दूर चली गई। अनूप के पीछे सरोज काकी भी आ गई। थोड़ी देर मैं वहां रुका उसके बाद बुलेट ले कर शहर की तरफ निकल गया। समय आ गया था कुछ अलग करने का और कुछ ज़रूरी काम करने का।

[][][][][]

उस वक़्त शाम ढल चुकी थी।
हमारे गांव से क़रीब तीस किलो मीटर की दूरी पर एक गांव था जिसका नाम था नाहरपुर। नाहरपुर के पास ही एक जंगल था। उस जंगल के बीच में ही वो तांत्रिक अपने परिवार के साथ रहता था जिसके बारे में जगन काका ने पता कर के मुझे बताया था। मैं और जगताप चाचा अपने कुछ आदमियों के साथ जीप में वहां पहुंचे थे। जंगल के अंदर जीप नहीं जा सकती थी इस लिए जीप को बाहर ही खड़ी कर के हम सब जंगल के अंदर की तरफ गए थे। हम सबके हाथों में बड़ी बड़ी बन्दूखें थी जबकि मेरे पास पिता जी द्वारा दिया हुआ रिवाल्वर था। जंगल के बीचो बीच तांत्रिक की एक बड़ी सी कुटिया बनी हुई थी। उस कुटिया के अगल बगल और भी दो कुटिया बनी हुईं थी। हम सब के अंदर बेहद गुस्सा भरा हुआ था, ख़ास कर मेरे अंदर मगर जैसे ही हम सब तांत्रिक की कुटिया के पास पहुंचे तो वहां के वातावरण में गूंजते चीखो पुकार को सुन कर हम सब एकदम से रुक गए थे।

हम लोगों को समझ न आया था कि आख़िर ये चीखो पुकार किस बात का था? एक दो औरतें थी और दो तीन लड़के लड़कियां। सबके सब दहाड़ें मार मार कर रो रहे थे। मुझे किसी बात की आशंका हुई तो मैंने जगताप चाचा को फ़ौरन ही कुटिया के पास पहुंचने को कहा था। जब हम सब वहां पहुंचे तो रोने धोने की आवाज़ और भी तेज़ सुनाई देने लगी। जगताप चाचा ने हमारे एक आदमी को कुटिया के अंदर जा कर पता करने को कहा। आदमी गया और थोड़ी ही देर में उसने बताया कि अंदर एक औरत है जो किसी की लाश के पास बैठी बुरी तरह रो रही है और उसके साथ उसके छोटे बड़े बच्चे भी रोए जा रहे हैं।

हम सब तेज़ी से अंदर दाख़िर हुए। हम लोगों को देख कर उन सबका रोना धोना एकदम से बंद हो गया। जगताप चाचा के पूछने पर उस औरत ने बताया कि किसी ने उसके तांत्रिक पति की हत्या कर दी है। उसकी बात सुन कर जहां जगताप चाचा स्तब्ध रह गए थे वहीं मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पैरों तले से ज़मीन ही गायब हो गई हो। दिलो दिमाग़ कुछ पलों के लिए मानो कुंद सा पड़ गया था। फिर जब ज़हन ने काम करना शुरू किया तो मेरे दिमाग़ में बस एक ही बात आई कि षड्यंत्रकारियों को शायद पता चल गया होगा कि उनका भेद खुल चुका है इस लिए उन्होंने उस तांत्रिक की भी जान ले ली जिसके द्वारा हम उनके पास पहुंच सकते थे। पलक झपकते ही सारे किए कराए पर पानी फिर गया था। सारी मेहनत और सारी होशियारी बेकार साबित हो गई थी।

जगताप चाचा के पूछने पर उस औरत ने बताया कि सुबह के क़रीब ग्यारह बजे उसका तांत्रिक पति किसी काम के सिलसिले से कुटिया से गया था। जब वो दिन ढलने के बाद भी वापस न आया तो उसने अपने सोलह वर्षीय बेटे को उसका पता लगाने के लिए भेजा था। उसके बाद जब उसका बेटा वापस आया तो उसके साथ में उसका मरा हुआ पति भी था जिसके पेट में किसी तेज़ धार वाले हथियार के कई सारे गहरे घाव थे। उसका बेटा अपने पिता की लाश को बड़ी मुश्किल से बांस की बनाई गई अर्थी में लिटा कर लाया था।

तान्त्रिक की बीवी कोई पचास के आस पास वाली उम्र की औरत थी। उसके चार बच्चे थे। जिनमें से पहले एक पच्चीस वर्षीय शादी शुदा बेटी थी और फिर एक सोलह वर्षीय वही बेटा जो अपने पिता की लाश को ले कर आया था। उसके बाद दो और बच्चे थे जिनमें से एक लड़का और एक लड़की थी। तांत्रिक की बीवी ने बताया कि अभी डेढ़ घंटे पहले ही उसका बेटा अपने पिता की लाश ले कर आया था। बेटे के अनुसार तांत्रिक की लाश जंगल में ही एक जगह पड़ी मिली थी।

मैंने और जगताप चाचा ने उस औरत से ज़्यादातर यही जानने की कोशिश की थी कि तांत्रिक की हत्या किसने की होगी और पिछले कुछ समय से ऐसे कौन से लोग उससे मिलने आए थे। हमारे पूछने पर उस औरत का जवाब यही था कि उसके तांत्रिक पति के पास बहुत से लोग आते थे इस लिए वो ये नहीं बता सकती कि किसने उसके पति की हत्या की होगी। मैं समझ गया था कि अब यहाँ पर हमें ऐसी कोई भी जानकारी नहीं मिल सकती थी जिससे ये पता चल सके कि तांत्रिक को किसने मेरे बड़े भाई और मुझ पर तंत्र क्रिया करने के लिए कहा होगा?

किसी हारे हुए जुआंरी की तरह हम सब वहां से वापस चल पड़े थे। मुझे उम्मीद थी कि हवेली में पिता जी से इस बारे में ज़रूर कुछ ऐसा पता चलेगा क्योंकि वो कुछ आदमियों के साथ कुल गुरु से मिलने गए हुए थे। हम रात के क़रीब आठ बजे हवेली पहुंचे थे। हमें नहीं पता था कि हवेली में एक नया ही काण्ड हुआ देखने को मिलेगा।

पिता जी वापस आ चुके थे। ये देख कर मेरे मन में सब कुछ जानने की ब्याकुलता और उत्सुकता भर गई थी लेकिन जल्दी ही पता चला कि हवेली की एक नौकरानी ने ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर ली है। हवेली में इस बात के चलते बड़ा अजीब सा माहौल छाया हुआ था।

"ये सब कैसे हुआ बड़े भैया?" जगताप चाचा ने उस नौकरानी की लाश को देखते हुए पूछा____"ऐसी क्या बात हुई कि इसने ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर ली?"
"यही तो हमारी समझ में भी नहीं आ रहा जगताप।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"अभी कुछ देर पहले जब हम यहाँ आए तभी हमें पता चला कि ये नौकरानी हवेली के एक कमरे में मेनका को मरी हुई मिली थी।"

"बड़ी हैरत की बात है।" जगताप चाचा ने सोचपूर्ण भाव से कहा____"पर इसने ऐसा क्यों किया होगा? वैसे ये मेनका को कब मिली थी?"
"जब तुम लोग यहाँ से गए थे तब।" पिता जी ने कहा____"किसी काम के लिए जब इसको हवेली में खोजा गया तो ये किसी को नज़र ही नहीं आई थी। तुम्हें तो पता ही है कि कुछ नौकरानियाँ शाम का अपना काम करने के बाद अपने अपने घर चली जाती हैं। मेनका ने बाकी नौकरानियों को भी इसकी खोज में लगाया और खुद भी खोजती रही। काफी खोजबीन के बाद मेनका को ये ऊपर के उस कमरे में मिली जो हमेशा खाली ही रहता है।"

"इसके घर वालों को सूचित किया गया या नहीं?" सहसा मैंने पूछने की हिमाक़त की।
"हवेली में इस तरह इसकी लाश को देख कर सब घबरा गए थे।" पिता जी ने बताया____"इस लिए किसी ने इसके घर वालों तक ख़बर नहीं भेजवाई थी लेकिन अब भेजवाना ही पड़ेगा।"

"हवेली में इस तरह किसी नौकरानी का खुद ख़ुशी कर लेना बहुत सी संगीन बात है पिता जी।" मैंने कहा____"गांव वालों को पता चला तो लोग तरह तरह की बातें करने लगेंगे। गांव के साहूकार तो और भी इस मामले को उछालेंगे। हमें बहुत ही सोच समझ कर इस बारे में कोई काम करना होगा।"

"हमने दरोगा को इत्तिला भेजी है।" पिता जी ने कहा____"वो आएगा और इस मामले की जांच करेगा। जगताप तुम इसके घर वालों तक ख़बर भेजवा दो और उन्हें समझाओ कि ये जो कुछ भी हुआ है उसकी पूरी ईमानदारी से जांच करवाई जाएगी। हालांकि मामला खुद ख़ुशी का है लेकिन ये पता करने की ज़रूर कोशिश की जाएगी कि इसने खुद ख़ुशी क्यों की अथवा इसे खुद ख़ुशी करने पर किसने मजबूर किया था?"

"जो हुकुम बड़े भइया।" जगताप चाचा ने सिर नवा कर कहा और हवेली से बाहर चले गए।

मुझे इस सबकी ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। न तो उस तांत्रिक की इस तरह हत्या हो जाने की और ना ही इस नौकरानी के इस तरह खुद ख़ुशी कर लेने की। सहसा मुझे उस नौकरानी का ख़याल आया जो उस रात विभोर और अजीत के साथ मज़े कर रही थी। मैंने आस पास नज़र घुमाई लेकिन वो नज़र न आई। मैंने सोचा इस नौकरानी की इस तरह खुद ख़ुशी कर लेने से कहीं वो भी न कुछ कर बैठे या फिर उसके साथ कोई कुछ कर न दे। मैं फ़ौरन ही अंदर की तरफ भागा और उसकी खोज करने लगा लेकिन वो मुझे नज़र न आई। उसके न मिलने से मेरे मन में तरह तरह की आशंकाए उभरने लगीं और साथ ही ये सोच कर मुझे घबराहट सी भी होने लगी कि अगर वो न मिली या उसके साथ कुछ हो गया तो मेरे हाथ से एक और मौका निकल जाएगा। मैं पागलों की तरह हवेली के ज़र्रे ज़र्रे पर उसे खोज रहा था लेकिन उसे तो मानो मिलना ही नहीं था। अचानक मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि कहीं वो हवेली से खिसक न गई हो। उसने देखा होगा कि एक नौकरानी ने खुद ख़ुशी कर ली है तो उसके मन में भी यही ख़याल आया होगा कि कहीं वो भी पकड़ी न जाए इस लिए मौका देख कर भाग निकली होगी।

मैं फ़ौरन ही हवेली से बाहर निकला। अपने साथ एक आदमी को लिया और तेज़ क़दमों से चलते हुए उस औरत के घर की तरफ चल पड़ा। मैं उसे इस तरह हाथ से नहीं निकल जाने देना चाहता था। अगर उसके साथ कुछ हो गया तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो जानी थी। एक वही थी जो मुझे बता सकती थी कि वो कुसुम को किस बात पर मजबूर किए हुए थी या फिर ये कहूं कि विभोर और अजीत उसे कौन सी पट्टियां पढ़ा कर मेरे खिलाफ़ किए हुए हैं?

क़रीब दस मिनट लगे मुझे उस औरत के घर तक पहुंचने में। वो औरत हमारे गांव की ही थी। उसके घर वाले हमारे खेतों में काम करते थे। उसका पति बाहर ही चारपाई पर बैठा मिल गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो जल्दी से चारपाई से उठा और हाथ जोड़ कर सलाम किया। मैंने बिना किसी भूमिका के उससे पूछा कि उसकी बीवी कहां है? वो मेरे पूछने पर थोड़ा घबरा सा गया और बोला कि अभी अभी वो दिशा मैदान के लिए गई है। मैंने उस आदमी से दूसरा सवाल यही पूछा कि दिशा मैदान के लिए वो किस तरफ गई है। उस आदमी के बताने पर मैं अपने आदमी के साथ फ़ौरन ही उस तरफ बढ़ चला। औरत का पति बुरी तरह डर गया था और उलझन में पड़ गया था। इधर मैं यही सोच रहा था कि रात के साढ़े आठ बजे उस औरत का दिशा मैदान के लिए जाना क्या स्वभाविक हो सकता है या इसके पीछे कोई और वजह हो सकती है? आम तौर पर गांव की औरतें दिन ढले ही दिशा मैदान के लिए निकल जाती थीं।

इसे किस्मत कहिए या इत्तेफ़ाक़ कि मैं अपने आदमी के साथ बिल्कुल सही दिशा में ही आया था क्योंकि वो औरत हल्की चांदनी रात में मुझे कुछ दूरी पर दिख गई थी। वो तेज़ी से बढ़ी चली जा रही थी। मैंने अपने आदमी को इशारा किया कि वो भाग कर जाए और उसे पकड़ ले। मेरा हुकुम मिलते ही शम्भू नाम का मेरा आदमी उस औरत की तरफ भाग चला। अपने क़रीब जैसे ही किसी के दौड़ते हुए आने का आभास हुआ तो उस औरत ने पलट कर देखा और बुरी तरह डर कर उसने भागना ही चाहा था कि लड़खड़ा कर वहीं ज़मीन पर गिर गई। जब तक वो सम्हल कर खड़ी होती तब तक शम्भू किसी जिन्न की तरह उसके सिर पर जा खड़ा हुआ था। उसके बाद शम्भू ने उस औरत की कलाई पकड़ी और ज़बरदस्ती खींचते हुए उसे मेरे पास ले आया। मुझ पर नज़र पड़ते ही मानो उस औरत की नानी मर गई।


━━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
Wah Subham bhai cha gaye.
Ab lagta hai kuch raj khulega .
Nokrani hi batayegi ki kusum ko kyu blackmail Kiya ja raha h.
Or sayad or bhi kuch maloom ho mujhe to lagta h is saare fasat ki jad jagtap ke dono bete hi h.
 

Lib am

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अध्याय - 42
━━━━━━༻♥༺━━━━━━

अब तक....

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।

अब आगे....

वापस हवेली आते आते दोपहर हो गई थी। माँ ने खाना खाने के लिए कहा लेकिन मैंने उन्हें ये कह कर इंकार कर दिया था कि मुझे किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना है। अपनी बुलेट ले कर मैं सीधा मुरारी के गांव निकल गया था। जैसा कि मैंने पहले भी बताया था कि इधर से जाने पर सबसे पहले गांव से बाहर मुरारी का ही घर पड़ता था। उसके घर के क़रीब पहुंचा तो घर के बाहर ही मुझे सरोज काकी मिल गई थी। मैंने उससे कहा कि थोड़ी देर में लौट कर आऊंगा और अनुराधा के हाथ का बना खाना खाऊंगा। सरोज काकी मेरी बात सुन कर मुस्कुराई और फिर हाँ में सिर हिला दिया था। उसके बाद मैं सीधा जगन के घर पहुंच गया था। जगन घर पर नहीं था। उसकी बीवी ने बताया कि गांव तरफ गए हैं। मेरे कहने पर उसने अपने बेटे को भेजा था जगन को बुला कर लाने के लिए। थोड़ी देर में जब जगन आया तो मुझे अपने घर में देखते ही पहले तो चौंका था फिर ख़ुशी से मुस्कुराने लगा था। उसने मेरे स्वागत के लिए खुद ही जल्दी से जल पान की ब्यवस्था कर दी थी।

जल पान करने के बाद मैंने जगन को बताया कि मैं उसके पास एक ख़ास काम से आया हूं। जगन मेरी बात सुन कर ख़ुशी ख़ुशी बोला कि ये उसकी खुशनसीबी है कि मैं उसके पास किसी काम से आया हूं। ख़ैर मैंने जगन को एक काम सौंपा और कहा कि जल्द से जल्द वो काम कर के मुझे बताए। जगन काम के बारे में सुन कर थोड़ा चौंका भी था और हैरान भी हुआ था लेकिन फिर बोला कि ठीक है वैभव बेटा मैं जल्दी ही ये काम कर के बताता हूं।

जगन के यहाँ कुछ देर मैं रुका और उसके घर का भी हाल चाल लिया उसके बाद मैं अपनी बुलेट ले कर मुरारी काका के घर की तरफ चल पड़ा। कल जब मैं यहाँ आया था तो अनुराधा से कह कर गया था कि दूसरे दिन मैं उसके हाथ का बना खाना खाने आऊंगा। सुबह क्योंकि मुझे पिता जी के साथ पंचायत पर जाना पड़ गया था इस लिए मुझे कुछ ज़्यादा ही देर हो गई थी। ख़ैर मुरारी काका के घर के बाहर मैंने बुलेट खड़ी की। दरवाज़ा खुला ही था तो मैं अंदर दाखिल हो गया। अंदर सरोज काकी अपने बेटे अनूप के पास बैठी थी।

"बड़ी देर लगा दी आने में बेटा।" सरोज काकी ने कहा____"अनु ने बताया था कि आज तुम यहाँ पर खाना खाने आओगे तो मैं बड़ा खुश हुई थी।"
"माफ़ करना काकी।" काकी ने उठ कर बरामदे में रखी चारपाई को बिछाया तो मैं उसमें बैठते हुए बोला____"असल में सुबह पिता जी के साथ पंचायत पर चला गया था इस वजह से आने में देर हो गई वरना तुम तो जानती ही हो कि अनुराधा के हाथ का बना खाना खाने के लिए मैं भागता हुआ यहाँ आता।"

"मैंने उसे समझाया था कि खाना अच्छे से बनाना और सब कुछ तुम्हारी पसंद का ही बनाए।" काकी ने कहा____"इस चक्कर में ये सुबह जल्दी ही उठ गई थी और जल्दी नहा भी लिया था। उसके बाद खाना बनाने की तैयारी में जुट गई थी। जब तुम सुबह नहीं आए तो मैं समझ गई कि कहीं किसी काम में फंस गए होगे। तुम्हारे चक्कर में हम लोगों ने भी नहीं खाया। बस अनूप खाने के लिए रोने लगा था तो इसे खिलाया।"

"तुम भी हद करती हो काकी।" मैंने हैरानी से कहा____"मेरे चक्कर में तुम लोगों को भूखा रहने की भला क्या ज़रूरत थी? वैसे तुम्हें पता है हवेली में माँ ने मुझसे खाना खाने के लिए कहा लेकिन मैंने मना कर दिया उन्हें। अब तुम ही बताओ काकी कि यहाँ के खाने को भुला कर मैं कैसे हवेली का खाना खा लेता और वो भी तब जबकि मैंने अनुराधा से कहा हो कि मैं ज़रूर आऊंगा।"

"यानी हम लोगों की तरह तुम भी भूखे ही घूम रहे हो?" सरोज काकी हंसते हुए बोली____"ख़ैर, अब बातें छोड़ो और चलो जल्दी से हाथ मुँह धो लो। मैं तब तक बैठका लगाती हूं।"

सरोज काकी ने अनुराधा को आवाज़ दी तो वो रसोई से निकल कर बाहर आई। काकी ने उससे कहा कि वो मुझे पानी दे ताकि मैं हाथ पैर धो लूं। काकी की बात सुन कर अनुराधा कोने में रखी बाल्टी का पानी उठा कर नर्दे के पास रख दिया। मैं नर्दे के ही पास आ गया था। मैंने देखा अनुराधा के चेहरे पर अलग ही चमक थी। जैसे ही मुझसे नज़र मिलती तो वो झट से नज़रें हटा लेती और अपनी मुस्कान को छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगती। मैंने उसे छेड़ने का सोचा।

"कहो ठकुराईन क्या हाल चाल हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में ये कहा तो अनुराधा बुरी तरह चौंकी और आँखें फाड़ कर मेरी तरफ देखने लगी। चेहरे पर घबराहट के भाव लिए वो धीमें से ही बोली____"मु..मुझे इस नाम से मत पुकारिए।

"ना, मैं तो अब इसी नाम से पुकारूँगा तुम्हें।" उसने लोटे में भर कर पानी दिया तो मैंने लेते हुए कहा।
"नहीं न।" अनुराधा ने बेबस भाव से कहा____"मां ने सुन लिया तो वो बहुत डाँटेगी मुझे।"

"अगर तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें ठकुराईन न कहूं।" मैंने हाथ धोते हुए कहा____"तो तुम भी मुझे छोटे ठाकुर नहीं कहोगी और काकी के सामने मेरा नाम ले कर पुकारोगी।"

"पर बिना वजह कैसे पुकारूंगी मैं?" अनुराधा ने उलझनपूर्ण भाव से कहा____"वैसे मैंने कहा तो है आपसे कि अब से मैं आपका नाम ले कर ही आपको पुकारुंगी।"

"चलो अब यही तो देखना है।" मैंने खड़े होते हुए कहा____"कि तुम मुझे काकी के सामने मेरे नाम से पुकारती हो कि नहीं।"
"पर मैं बिना वजह कैसे आपको पुकारूंगी भला?" अनुराधा ने मासूमियत से कहा____"ऐसे में तो माँ गुस्सा हो जाएगी।"

"यार तुम काकी से इतना डरती क्यों हो?" मैंने उसे घूरते हुए कहा____"अच्छा मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं। उपाय ये है कि जब मैं खाना खा रहा होऊंगा तो तुम रसोई से ही मेरा नाम लेकर मुझसे पूछना कि मुझे और कुछ चाहिए कि नहीं, ठीक है?"

"और अगर मेरे ऐसा कहने पर माँ ने डांटा तो?" अनुराधा ने मेरी तरफ नज़र उठा कर देखा।
"अरे! मैं हूं न।" मैंने उसे आस्वस्त किया____"काकी अगर तुम्हे डाँटेगी तो मैं काकी को अच्छे से समझा दूंगा।"

मेरी बात सुन कर अनुराधा ने हाँ में सिर हिलाया और चली गई। हाथ पैर धो कर मैं आया तो देखा काकी ने बरामदे की ज़मीन पर एक चादर बिछा दी थी और उसके सामने एक लकड़ी का पीढ़ा रख दिया था जिसके बगल से लोटा ग्लास में पानी रखा हुआ था। मैं आया और उसी चादर में बैठ गया। काकी मेरे पास ही कुछ दूरी पर बैठ गई। कुछ ही देर में अनुराधा थाली ले कर आई और उस लकड़ी के पीढ़े पर रख दिया। थाली में वो सब कुछ था जो मुझे इस घर में सबसे ज़्यादा खाना पसंद था।

खाना शुरू हुआ और खाने के दौरान काकी से इधर उधर की बातें भी शुरू हो ग‌ईं। ये अलग बात है कि मेरा ध्यान काकी से बातों में कम बल्कि इस बात पर ज़्यादा था कि अनुराधा कब रसोई से मेरा नाम ले कर मुझे पुकारती है। इस बीच कई बार अनुराधा रसोई से निकल कर आई और थाली में कुछ न कुछ रख कर चली गई लेकिन एक बार भी उसने वो न किया जो कहने का हमारे बीच समझौता हुआ था। यहाँ तक कि मैं खाना भी खा चुका और हाथ धो कर चारपाई पर भी जा बैठा। इस बात से मुझे अनुराधा पर बेहद गुस्सा आया हुआ था। अभी मैं अपने अंदर उभरे इस गुस्से को काबू में कर ही रहा था कि तभी सरोज काकी का बेटा अनूप काकी से कहने लगा कि उसे दिशा मैदान जाना है। वो पेट पकड़े काकी के सामने आ कर खड़ा हो गया था।

"बेटा तुम यहीं बैठना।" काकी मेरी तरफ देखते हुए बोली____"मैं इसे दिशा मैदान करा के लाती हूं।"
"ठीक है काकी।" मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो गया कि काकी के चले जाने से मुझे अनुराधा के साथ अकेले रहने का मौका मिल गया है लेकिन प्रत्यक्ष में बोला____"लेकिन जल्दी ही आना क्योंकि मुझे हवेली जल्दी जाना है।"

काकी अनूप को ले कर दूसरे वाले दरवाज़े से घर के पीछे की तरफ चली गई। काकी के जाते ही मानो फ़िज़ा में सन्नाटा छा गया। मेरा दिल किया कि अभी उठूं और पलक झपकते ही रसोई में अनुराधा के पास पहुंच जाऊं। अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी अनुराधा रसोई से निकल कर बाहर आई।

"मुझे माफ़ कर दीजिए।" फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए दीन हीन भाव से कहा____"मां के सामने आपका नाम ले कर आपको पुकारने की मुझमें हिम्मत ही न हुई थी। हर बार सोचती थी कि अब पुकारूंगी आपको लेकिन माँ के डर से पुकारा ही नहीं गया मुझसे। माफ़ कर दीजिए मुझे।"

"तुम्हें पता है इस वक़्त मुझे कैसा महसूस हो रहा है?" मैंने संजीदा भाव से कहा____"ऐसा लग रहा है जैसे सरे-बाज़ार लुट गया हूं मैं। भरी महफ़िल में जैसे किसी ने मेरी इज़्ज़त का जनाजा निकाल दिया हो।"

"भगवान के लिए ऐसा मत कहिए।" अनुराधा ने सहसा दुखी भाव से कहा____"मुझे खुद भी बहुत बुरा लग रहा है कि मैंने आपका कहा नहीं माना लेकिन यकीन मानिए माँ के सामने मुझसे कुछ बोला ही नहीं गया।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने जब देखा कि अनुराधा की आँखें नम हो गई हैं तो मुझे एहसास हुआ कि ग़लती उसकी नहीं थी। यकीनन अपनी माँ के सामने उससे बोला नहीं गया होगा। उसकी हालात को समझते हुए मैंने आगे कहा____"मैं समझ सकता हूं कि तुम्हारे लिए ये इतना आसान नहीं था। तुमने कोशिश की यही बड़ी बात है।"

"क्या आप नाराज़ हैं?" उसने मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
"यही तो समस्या है कि मैं तुमसे नाराज़ नहीं हो सकता।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"तुम वो लड़की हो जिसने मुझ जैसे इंसान को मुकम्मल तौर पर बदल दिया है। तुम सच में एक अच्छी लड़की हो अनुराधा। मैं अगर चाहूं भी तो तुमसे नाराज़ नहीं हो सकता। कभी कभी सोचता हूं कि क्या तुमने कोई जादू कर दिया है मुझ पर?"

"ये...ये क्या कह रहे हैं आप?" अनुराधा बुरी तरह चौंकी।
"वही जो मैं महसूस करता हूं।" मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा____"कुछ तो किया ही है तुमने। कभी खुद भी सोचना इस बारे में।"

"पता नहीं आप ये क्या बोले जा रहे हैं।" अनुराधा ने सिर झुका कर कहा____"मैं तो बस इतना जानती हूं कि मैं किसी के साथ कुछ भी करने का सोच भी नहीं सकती।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने कहा____"मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि आज कल वक़्त और हालात ठीक नहीं हैं इस लिए अपना और अपने परिवार का ख़याल रखना। एक बात और, अगर किसी भी तरह की ऐसी वैसी कोई बात समझ में आए तो सीधा उस जगह पर चली जाना जहां पर मेरा नया मकान बन रहा है। वहां पर तुम्हें भुवन नाम का एक आदमी मिलेगा, उसे तुम बता देना।"

"क्या कुछ होने वाला है वैभव जी?" अनुराधा ने मेरा नाम ले कर कहा____"क्या वो साहूकार का लड़का फिर से कुछ करने वाला है?"

"किसी का भरोसा नहीं है अनुराधा।" मैंने कहा____"कौन कब क्या करेगा इस बारे में ठीक से कुछ नहीं कह सकते। इसी लिए कह रहा हूं कि ख़याल रखना। रात में दरवाज़े अच्छे से बंद कर के रखना, और अगर कोई दरवाज़ा खुलवाए तो पहले ये जान लेना कि बाहर कौन है। कोई अजनबी कितना भी ज़ोर देकर कहे मगर दरवाज़ा मत खोलना।"

"आपकी ये बातें सुन कर तो मुझे अब घबराहट होने लगी है वैभव जी।" अनुराधा ने चिंतित भाव से कहा____"आज तक मेरे बाबू जी के हत्यारे का पता नहीं चला। हमारा ये घर वैसे भी गांव से बाहर अलग बना हुआ है जिससे अगर कोई ऐसी बात हुई भी तो जल्दी से कोई हमारी मदद के लिए नहीं आ सकता।"

"फ़िक्र मत करो।" मैंने कहा____"मेरे रहते ऐसी वैसी कोई बात नहीं होगी। मैं तुम लोगों की सुरक्षा का कोई अच्छा सा इंतजाम कर दूंगा।"

अभी मैं उससे बात ही कर रहा था कि तभी अनुराधा का भाई अनूप दूसरे वाले दरवाज़े से आँगन में दाखिल हुआ। उसे देख अनुराधा जल्दी से मुझसे दूर चली गई। अनूप के पीछे सरोज काकी भी आ गई। थोड़ी देर मैं वहां रुका उसके बाद बुलेट ले कर शहर की तरफ निकल गया। समय आ गया था कुछ अलग करने का और कुछ ज़रूरी काम करने का।

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उस वक़्त शाम ढल चुकी थी।
हमारे गांव से क़रीब तीस किलो मीटर की दूरी पर एक गांव था जिसका नाम था नाहरपुर। नाहरपुर के पास ही एक जंगल था। उस जंगल के बीच में ही वो तांत्रिक अपने परिवार के साथ रहता था जिसके बारे में जगन काका ने पता कर के मुझे बताया था। मैं और जगताप चाचा अपने कुछ आदमियों के साथ जीप में वहां पहुंचे थे। जंगल के अंदर जीप नहीं जा सकती थी इस लिए जीप को बाहर ही खड़ी कर के हम सब जंगल के अंदर की तरफ गए थे। हम सबके हाथों में बड़ी बड़ी बन्दूखें थी जबकि मेरे पास पिता जी द्वारा दिया हुआ रिवाल्वर था। जंगल के बीचो बीच तांत्रिक की एक बड़ी सी कुटिया बनी हुई थी। उस कुटिया के अगल बगल और भी दो कुटिया बनी हुईं थी। हम सब के अंदर बेहद गुस्सा भरा हुआ था, ख़ास कर मेरे अंदर मगर जैसे ही हम सब तांत्रिक की कुटिया के पास पहुंचे तो वहां के वातावरण में गूंजते चीखो पुकार को सुन कर हम सब एकदम से रुक गए थे।

हम लोगों को समझ न आया था कि आख़िर ये चीखो पुकार किस बात का था? एक दो औरतें थी और दो तीन लड़के लड़कियां। सबके सब दहाड़ें मार मार कर रो रहे थे। मुझे किसी बात की आशंका हुई तो मैंने जगताप चाचा को फ़ौरन ही कुटिया के पास पहुंचने को कहा था। जब हम सब वहां पहुंचे तो रोने धोने की आवाज़ और भी तेज़ सुनाई देने लगी। जगताप चाचा ने हमारे एक आदमी को कुटिया के अंदर जा कर पता करने को कहा। आदमी गया और थोड़ी ही देर में उसने बताया कि अंदर एक औरत है जो किसी की लाश के पास बैठी बुरी तरह रो रही है और उसके साथ उसके छोटे बड़े बच्चे भी रोए जा रहे हैं।

हम सब तेज़ी से अंदर दाख़िर हुए। हम लोगों को देख कर उन सबका रोना धोना एकदम से बंद हो गया। जगताप चाचा के पूछने पर उस औरत ने बताया कि किसी ने उसके तांत्रिक पति की हत्या कर दी है। उसकी बात सुन कर जहां जगताप चाचा स्तब्ध रह गए थे वहीं मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पैरों तले से ज़मीन ही गायब हो गई हो। दिलो दिमाग़ कुछ पलों के लिए मानो कुंद सा पड़ गया था। फिर जब ज़हन ने काम करना शुरू किया तो मेरे दिमाग़ में बस एक ही बात आई कि षड्यंत्रकारियों को शायद पता चल गया होगा कि उनका भेद खुल चुका है इस लिए उन्होंने उस तांत्रिक की भी जान ले ली जिसके द्वारा हम उनके पास पहुंच सकते थे। पलक झपकते ही सारे किए कराए पर पानी फिर गया था। सारी मेहनत और सारी होशियारी बेकार साबित हो गई थी।

जगताप चाचा के पूछने पर उस औरत ने बताया कि सुबह के क़रीब ग्यारह बजे उसका तांत्रिक पति किसी काम के सिलसिले से कुटिया से गया था। जब वो दिन ढलने के बाद भी वापस न आया तो उसने अपने सोलह वर्षीय बेटे को उसका पता लगाने के लिए भेजा था। उसके बाद जब उसका बेटा वापस आया तो उसके साथ में उसका मरा हुआ पति भी था जिसके पेट में किसी तेज़ धार वाले हथियार के कई सारे गहरे घाव थे। उसका बेटा अपने पिता की लाश को बड़ी मुश्किल से बांस की बनाई गई अर्थी में लिटा कर लाया था।

तान्त्रिक की बीवी कोई पचास के आस पास वाली उम्र की औरत थी। उसके चार बच्चे थे। जिनमें से पहले एक पच्चीस वर्षीय शादी शुदा बेटी थी और फिर एक सोलह वर्षीय वही बेटा जो अपने पिता की लाश को ले कर आया था। उसके बाद दो और बच्चे थे जिनमें से एक लड़का और एक लड़की थी। तांत्रिक की बीवी ने बताया कि अभी डेढ़ घंटे पहले ही उसका बेटा अपने पिता की लाश ले कर आया था। बेटे के अनुसार तांत्रिक की लाश जंगल में ही एक जगह पड़ी मिली थी।

मैंने और जगताप चाचा ने उस औरत से ज़्यादातर यही जानने की कोशिश की थी कि तांत्रिक की हत्या किसने की होगी और पिछले कुछ समय से ऐसे कौन से लोग उससे मिलने आए थे। हमारे पूछने पर उस औरत का जवाब यही था कि उसके तांत्रिक पति के पास बहुत से लोग आते थे इस लिए वो ये नहीं बता सकती कि किसने उसके पति की हत्या की होगी। मैं समझ गया था कि अब यहाँ पर हमें ऐसी कोई भी जानकारी नहीं मिल सकती थी जिससे ये पता चल सके कि तांत्रिक को किसने मेरे बड़े भाई और मुझ पर तंत्र क्रिया करने के लिए कहा होगा?

किसी हारे हुए जुआंरी की तरह हम सब वहां से वापस चल पड़े थे। मुझे उम्मीद थी कि हवेली में पिता जी से इस बारे में ज़रूर कुछ ऐसा पता चलेगा क्योंकि वो कुछ आदमियों के साथ कुल गुरु से मिलने गए हुए थे। हम रात के क़रीब आठ बजे हवेली पहुंचे थे। हमें नहीं पता था कि हवेली में एक नया ही काण्ड हुआ देखने को मिलेगा।

पिता जी वापस आ चुके थे। ये देख कर मेरे मन में सब कुछ जानने की ब्याकुलता और उत्सुकता भर गई थी लेकिन जल्दी ही पता चला कि हवेली की एक नौकरानी ने ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर ली है। हवेली में इस बात के चलते बड़ा अजीब सा माहौल छाया हुआ था।

"ये सब कैसे हुआ बड़े भैया?" जगताप चाचा ने उस नौकरानी की लाश को देखते हुए पूछा____"ऐसी क्या बात हुई कि इसने ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर ली?"
"यही तो हमारी समझ में भी नहीं आ रहा जगताप।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"अभी कुछ देर पहले जब हम यहाँ आए तभी हमें पता चला कि ये नौकरानी हवेली के एक कमरे में मेनका को मरी हुई मिली थी।"

"बड़ी हैरत की बात है।" जगताप चाचा ने सोचपूर्ण भाव से कहा____"पर इसने ऐसा क्यों किया होगा? वैसे ये मेनका को कब मिली थी?"
"जब तुम लोग यहाँ से गए थे तब।" पिता जी ने कहा____"किसी काम के लिए जब इसको हवेली में खोजा गया तो ये किसी को नज़र ही नहीं आई थी। तुम्हें तो पता ही है कि कुछ नौकरानियाँ शाम का अपना काम करने के बाद अपने अपने घर चली जाती हैं। मेनका ने बाकी नौकरानियों को भी इसकी खोज में लगाया और खुद भी खोजती रही। काफी खोजबीन के बाद मेनका को ये ऊपर के उस कमरे में मिली जो हमेशा खाली ही रहता है।"

"इसके घर वालों को सूचित किया गया या नहीं?" सहसा मैंने पूछने की हिमाक़त की।
"हवेली में इस तरह इसकी लाश को देख कर सब घबरा गए थे।" पिता जी ने बताया____"इस लिए किसी ने इसके घर वालों तक ख़बर नहीं भेजवाई थी लेकिन अब भेजवाना ही पड़ेगा।"

"हवेली में इस तरह किसी नौकरानी का खुद ख़ुशी कर लेना बहुत सी संगीन बात है पिता जी।" मैंने कहा____"गांव वालों को पता चला तो लोग तरह तरह की बातें करने लगेंगे। गांव के साहूकार तो और भी इस मामले को उछालेंगे। हमें बहुत ही सोच समझ कर इस बारे में कोई काम करना होगा।"

"हमने दरोगा को इत्तिला भेजी है।" पिता जी ने कहा____"वो आएगा और इस मामले की जांच करेगा। जगताप तुम इसके घर वालों तक ख़बर भेजवा दो और उन्हें समझाओ कि ये जो कुछ भी हुआ है उसकी पूरी ईमानदारी से जांच करवाई जाएगी। हालांकि मामला खुद ख़ुशी का है लेकिन ये पता करने की ज़रूर कोशिश की जाएगी कि इसने खुद ख़ुशी क्यों की अथवा इसे खुद ख़ुशी करने पर किसने मजबूर किया था?"

"जो हुकुम बड़े भइया।" जगताप चाचा ने सिर नवा कर कहा और हवेली से बाहर चले गए।

मुझे इस सबकी ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। न तो उस तांत्रिक की इस तरह हत्या हो जाने की और ना ही इस नौकरानी के इस तरह खुद ख़ुशी कर लेने की। सहसा मुझे उस नौकरानी का ख़याल आया जो उस रात विभोर और अजीत के साथ मज़े कर रही थी। मैंने आस पास नज़र घुमाई लेकिन वो नज़र न आई। मैंने सोचा इस नौकरानी की इस तरह खुद ख़ुशी कर लेने से कहीं वो भी न कुछ कर बैठे या फिर उसके साथ कोई कुछ कर न दे। मैं फ़ौरन ही अंदर की तरफ भागा और उसकी खोज करने लगा लेकिन वो मुझे नज़र न आई। उसके न मिलने से मेरे मन में तरह तरह की आशंकाए उभरने लगीं और साथ ही ये सोच कर मुझे घबराहट सी भी होने लगी कि अगर वो न मिली या उसके साथ कुछ हो गया तो मेरे हाथ से एक और मौका निकल जाएगा। मैं पागलों की तरह हवेली के ज़र्रे ज़र्रे पर उसे खोज रहा था लेकिन उसे तो मानो मिलना ही नहीं था। अचानक मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि कहीं वो हवेली से खिसक न गई हो। उसने देखा होगा कि एक नौकरानी ने खुद ख़ुशी कर ली है तो उसके मन में भी यही ख़याल आया होगा कि कहीं वो भी पकड़ी न जाए इस लिए मौका देख कर भाग निकली होगी।

मैं फ़ौरन ही हवेली से बाहर निकला। अपने साथ एक आदमी को लिया और तेज़ क़दमों से चलते हुए उस औरत के घर की तरफ चल पड़ा। मैं उसे इस तरह हाथ से नहीं निकल जाने देना चाहता था। अगर उसके साथ कुछ हो गया तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो जानी थी। एक वही थी जो मुझे बता सकती थी कि वो कुसुम को किस बात पर मजबूर किए हुए थी या फिर ये कहूं कि विभोर और अजीत उसे कौन सी पट्टियां पढ़ा कर मेरे खिलाफ़ किए हुए हैं?

क़रीब दस मिनट लगे मुझे उस औरत के घर तक पहुंचने में। वो औरत हमारे गांव की ही थी। उसके घर वाले हमारे खेतों में काम करते थे। उसका पति बाहर ही चारपाई पर बैठा मिल गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो जल्दी से चारपाई से उठा और हाथ जोड़ कर सलाम किया। मैंने बिना किसी भूमिका के उससे पूछा कि उसकी बीवी कहां है? वो मेरे पूछने पर थोड़ा घबरा सा गया और बोला कि अभी अभी वो दिशा मैदान के लिए गई है। मैंने उस आदमी से दूसरा सवाल यही पूछा कि दिशा मैदान के लिए वो किस तरफ गई है। उस आदमी के बताने पर मैं अपने आदमी के साथ फ़ौरन ही उस तरफ बढ़ चला। औरत का पति बुरी तरह डर गया था और उलझन में पड़ गया था। इधर मैं यही सोच रहा था कि रात के साढ़े आठ बजे उस औरत का दिशा मैदान के लिए जाना क्या स्वभाविक हो सकता है या इसके पीछे कोई और वजह हो सकती है? आम तौर पर गांव की औरतें दिन ढले ही दिशा मैदान के लिए निकल जाती थीं।

इसे किस्मत कहिए या इत्तेफ़ाक़ कि मैं अपने आदमी के साथ बिल्कुल सही दिशा में ही आया था क्योंकि वो औरत हल्की चांदनी रात में मुझे कुछ दूरी पर दिख गई थी। वो तेज़ी से बढ़ी चली जा रही थी। मैंने अपने आदमी को इशारा किया कि वो भाग कर जाए और उसे पकड़ ले। मेरा हुकुम मिलते ही शम्भू नाम का मेरा आदमी उस औरत की तरफ भाग चला। अपने क़रीब जैसे ही किसी के दौड़ते हुए आने का आभास हुआ तो उस औरत ने पलट कर देखा और बुरी तरह डर कर उसने भागना ही चाहा था कि लड़खड़ा कर वहीं ज़मीन पर गिर गई। जब तक वो सम्हल कर खड़ी होती तब तक शम्भू किसी जिन्न की तरह उसके सिर पर जा खड़ा हुआ था। उसके बाद शम्भू ने उस औरत की कलाई पकड़ी और ज़बरदस्ती खींचते हुए उसे मेरे पास ले आया। मुझ पर नज़र पड़ते ही मानो उस औरत की नानी मर गई।


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कोई बहुत ही खास है जो हर बात की खबर रखता है हवेली की। अब तो लगता है की जगताप या उसकी बीवी भी हो सकते है इन सब में, बेटे तो पक्का है ही मिले हुए। देखना होगा की जो औरत पकड़ी गई है वो क्या बताती है।
 
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ASR

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TheBlackBlood मित्र अखिरकार आप अपने दौर मे पुनः आ गये व रहस्य से भरी ठाकुर वैभव की दुनिया को और रोमांचक बना दिया 😊 उसका खिलंदड़ापन बनाय रखिएगा यही आपकी कहानी का ट्रंप कार्ड है, अब कई रहस्य से पर्दा उठेगा, अनुराधा प्रसंग, ठाकुर साहब व वैभव संबाद, वैभव का समस्या के समाधान के लिए प्रयत्न, नई मुश्किलों का आना, मजेदार अपडेट है 😍
अगले घटनाक्रम व विस्तृत अपडेट के इंतजार में..
 

agmr66608

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वाह क्या अनुच्छेद दिये है मित्र। पहले चरण मे अनुराधा के संग की थोड़ा अकेले मे बातचीत और फिर दूसरे ही चरण मे भयानक कारवाई का सिलसिला शुरू। समझ मे नहीं आया। कल ही दादा ठाकुर को बताया गया और आज ही दो बाकीया वो भी एक साथ!!!!! मामला सीधा तो कतई नहीं। कहीं दादा ठाकुर खुद यह सब के पीछे तो नहीं? अगर ऐसा है तो बैभव के लिए भयानक समय आनेवाला है। बहुत ही रोचक मोड़ पर ले आये है कहानी को। अगला अनुच्छेद के प्रतीक्षा मे रहेंगे। धन्यबाद।
 
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