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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

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What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
  • Poll closed .

Sanju@

Well-Known Member
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अध्याय - 147
━━━━━━༻♥༺━━━━━━


मेरी बात सुन कर दोनों की आंखें भर आईं। दोनों झपट कर मुझसे लिपट गए। मैंने भी दोनों की पीठ थपथपाई। कुछ देर बाद वो दोनों चले गए। उनके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि चलो इनका भी बुरा वक्त टल गया और अब से ये दोनों भी एक अच्छा इंसान बनने की राह पर चल पड़े हैं। ख़ैर कुछ देर मैं वहीं बैठा रहा और फिर भुवन को बता कर अपनी मोटर साईकिल से हवेली की तरफ चल पड़ा।


अब आगे....


शाम को जब मैं अपने खेतों से वापस हवेली आ रहा था तभी अपने घर के बाहर खड़ा रूपचंद्र मिल गया मुझे। ऐसा प्रतीत हवा जैसे वो मेरी ही प्रतीक्षा कर रहा था। उसके हाथ देने पर मैंने अपनी मोटर साईकिल उसके सामने आ कर रोक दी।

"मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था वैभव।" मेरे रुकते ही उसने कहा____"असल में तुमसे एक ज़रूरी बात करनी थी।"

"हां कहो।" मैंने कहा।

"यार मैं कई दिनों से देख रहा हूं कि मेरी बहन रूपा कुछ उदास सी रहती है।" रूपचंद्र ने थोड़ा झिझक के साथ कहा____"और मैं जानता हूं कि उसकी उदासी की वजह क्या है। यकीनन वो तुम्हारे लिए उदास है। शायद उसे बहुत याद आती है तुम्हारी। इस लिए मेरा तुमसे ये कहना है कि एक बार मिल लो उससे।"

रूपचंद्र के मुख से ये बात सुन कर मुझे बड़ा अजीब सा महसूस हुआ। हालाकि मैं जानता था कि रूपचंद्र अब पहले जैसा नहीं रहा था और अब वो सिर्फ अपनी बहन को खुश देखना चाहता था किंतु उसका इस बारे में एकदम से इस तरह खुल कर बात करना मुझे बड़ा अजीब सा लगा था।

"क्या हुआ?" मुझे ख़ामोशी से कुछ सोचते देख उसने पूछा____"तुम क्या सोचने लगे?"

"न...नहीं, कुछ नहीं बस ऐसे ही।" मुझे समझ ना आया कि क्या कहूं।

"कल सुबह मैं तुम्हें यहीं पर मिलूंगा अपनी बहन के साथ।" उसने कहा____"तुम उसे अपने साथ ले जाना। तब तक तुम्हारी ग़ैर मौजूदगी में मैं वहां का काम धाम देखता रहूंगा।"

"ठीक है।" मैंने सिर हिलाया और फिर मोटर साईकिल को आगे बढ़ा दिया।

सारे रास्ते मैं रूपचंद्र और उसकी बहन के बारे में सोचते हुए हवेली पहुंचा। गुसलखाने से हाथ मुंह धोने के बाद मैं बरामदे में मां के पास बैठ गया। मां ने कुसुम को आवाज़ दे कर मेरे लिए चाय लाने को कहा।

मां ने मुझसे मेरा और मेरे काम के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें बता दिया। इस बीच कुसुम चाय ले कर आ गई। मैंने कुसुम से चाय लेते हुए चाची के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वो अपने कमरे में हैं।

जब से मेनका चाची के बारे में वो सब पता चला था तब से वो कुछ बुझी बुझी सी रहने लगीं थी। कहने को तो हम सब सामान्य ही रहने की कोशिश कर रहे थे लेकिन अंदर का हाल अभी भी थोड़ा जुदा था। पहले जैसी बात नहीं रह गई थी। रिश्ते तो अब भी वही थे लेकिन उनमें एक खोखलापन सा महसूस होने लगा था।

मेरे माता पिता भी खुद को सामान्य बनाए रखने की पूरी कोशिश करते थे और इसके लिए वो पहले की ही तरह कुसुम और मेनका चाची से बातें करते थे लेकिन पहले जैसी आत्मिक खुशी नज़र नहीं आती थी।

बहरहाल, चाय पीने के बाद मैं मेनका चाची के कमरे की तरफ बढ़ गया। वैसे तो रोज़ ही मैं उन्हें देखता था और उनसे थोड़ी बहुत बातें कर लेता था जोकि स्पष्ट रूप से औपचारिक ही लगती थीं।

ख़ैर मैं चाची के कमरे के पास पहुंचा। दरवाज़े पर दस्तक दी तो अंदर से आवाज़ आई कि आ जाओ। मैं दरवाज़ा खोल कर अंदर दाख़िल हो गया। नज़र चाची पर पड़ी जो अपने पलंग पर उठ कर बैठ गईं थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही उनके चेहरे पर कई तरह के भाव उभरते नज़र आए।

"ओह! वैभव तुम हो?" फिर वो अपने होठों पर मुस्कान सजाने का प्रयास करती हुई बोलीं____"आओ आओ बैठो मेरे पास।"

"क्या हुआ चाची?" मैं पलंग पर उनके बगल से बैठते हुए पूछा____"शाम ढल गई और आप अभी तक अपने कमरे में हैं? आपकी तबीयत तो ठीक है ना?"

"तबीयत तो ठीक है वैभव।" चाची ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"बस अंदर का हाल ठीक नहीं है।"

"ऐसा क्यों कह रही हैं आप?" मैंने फिक्रमंदी से पूछा।

"हर वक्त हर पल मुझे अपने और तुम्हारे चाचा द्वारा किए गए गुनाह याद आते रहते हैं।" चाची ने संजीदा हो कर कहा____"और फिर मुझे ये एहसास कराते हुए दुखी करते रहते हैं कि कितने बुरे थे हम। मेरे जेठ और मेरी जेठानी ने हमें सगे माता पिता की तरह प्यार और स्नेह दिया और हमने क्या किया? उनके प्यार और स्नेह को ठोकर मार कर उनके साथ इतना बड़ा छल किया?"

"आप कब तक इन बातों को लिए बैठी रहेंगी चाची?" मैंने उनका कोमल हाथ अपने हाथों में ले कर कहा____"जो गुज़र गया उस पर अब मिट्टी डालिए और पहले की तरह ही सबसे मिलिए और सबके साथ हंसिए बोलिए।"

"यही तो नहीं कर पा रही मैं।" चाची ने हताश हो कर कहा____"किसी से नज़रें मिलाने की हिम्मत ही नहीं होती। ख़ुद को चोर और अपराधी महसूस करती हूं मैं। हर वक्त अंदर से कोई चीख चीख कर कहता है कि मेनका कितनी बड़ी पापिन है तू।"

"हर कोई अपने जीवन में कोई न कोई पाप अथवा अपराध करता है चाची।" मैंने जैसे समझाते हुए कहा____"इस दुनिया में दूध का धुला हुआ कोई नहीं है। मैंने भी अपराध किए हैं, मैंने भी पाप किए हैं और मुझे तो मेरे पापों के लिए सज़ा भी मिल चुकी है। जिसे दिल की गहराइयों से प्रेम किया उसको हमेशा के लिए खो चुका हूं। एक ऐसी निर्दोष और मासूम की हत्या का मुजरिम बन बैठा हूं जिसे मुझसे प्रेम करने और मुझसे ब्याह करने की चाहत के चलते मार डाला गया। आज भी अपने अपराधों के एहसास से मन व्यथित होता है लेकिन फिर भी सबकी खुशी के लिए सब कुछ भूल जाने की कोशिश करता रहता हूं। आप भी सब कुछ भूल जाइए चाची। मुझे अपनी वही चाची चाहिए जो बहुत प्यारी हैं, बहुत सुंदर हैं और जो मुझे अपने बेटे की तरह प्यार करती हैं।"

"व...वैभव...मेरे बेटे।" चाची ने भावावेश में आ कर मुझे अपने गले से लगा लिया और फिर सिसक उठीं।

मैंने भी उन्हें पकड़ कर खुद से लिपटा लिया। कुछ देर तक चाची मुझसे लिपटी सिसकती रहीं फिर अलग हुईं। उनकी आंखें रोने सिसकने से सुर्ख हो गईं थी और चेहरा दुख और संताप से व्यथित दिख रहा था।

"क्या अब भी मुझे अपनी सबसे प्यारी चाची समझते हो तुम?" फिर उन्होंने बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"क्या तुम्हें मेरे चेहरे में कोई पापिन नज़र नहीं आती?"

"बिल्कुल भी नहीं।" मैंने कहा____"बल्कि मुझे तो पहले की ही तरह अपनी चाची सबसे प्यारी, सबसे सुंदर और मुझे सबसे ज़्यादा प्यार करने वाली ही नज़र आती हैं।"

"मेरी क़सम खा कर कहो कि ये सच्चे दिल से कह रहे हो तुम।" चाची ने मेरा हाथ अपने सिर पर रख कर कहा____"मेरी क़सम खा कर कहो कि तुम ऐसा सिर्फ मेरा दिल रखने के लिए नहीं कह रहे हो।"

"हां मैं आपकी क़सम खा कर कहता हूं कि मैंने जो भी कहा है वो सच्चे दिल से कहा है।" मैंने कहा____"आप अब भी मेरी वही चाची हैं जो सबसे प्यारी हैं और जो मुझे अपने बेटे की तरह बहुत प्यार करती हैं।"

"ओह! वैभव। मेरा सबसे अच्छा बेटा।" चाची ने खुश हो कर एक बार फिर से मुझे अपने सीने से छुपका लिया। एक बार फिर से उनकी सिसकियां निकल गईं और उनकी आंखें छलक पड़ीं।

"चलिए अब इस तरह से रोइए मत।" मैंने उन्हें खुद से अलग कर के और उनके आंसू पोंछते हुए बड़े स्नेह भाव से कहा____"और मुझसे वादा कीजिए कि अब से आप मेरी प्यारी सी चाची को रुलाएंगी नहीं।"

मेनका चाची की आंख से फिर से आंसू का एक कतरा छलक गया। उन्होंने बड़ी ही ममता से देखा मुझे और फिर मुस्कुराते हुए अपने आंसू पोछने लगीं।

"अब चलिए, कमरे में इस तरह अकेले मत बैठिए।" मैंने कहा____"आपको पता है आपके बिना आज कल ये हवेली शोख और चंचल सी नज़र नहीं आती। इसे फिर से महकाइए, खुद भी खुश रहिए और दूसरों को भी खुशियां दीजिए।"

आख़िर मेरे ऐसा कहने पर चाची के चेहरे पर पहले जैसी रौनक लौटती सी नज़र आई। कुछ ही देर में मैं उन्हें ले कर बाहर आ गया। मां अब भी बरामदे में एक कुर्सी पर बैठी हुईं थी। निर्मला काकी और उसकी बेटी रसोई में थीं। मेनका चाची आ कर मां के पास ही बैठ गईं। मैं ये सोच कर अपने कमरे की तरफ चला गया कि मेरे रहते शायद चाची खुल कर अपनी जेठानी से बातें न कर सकें।

✮✮✮✮

अगले दिन।
सुबह नाश्ता कर के मैं हवेली से निकला। मुझे याद आ गया था कि आज मुझे रूपा से मिलना है और रूपचंद्र के अनुसार मुझे उसे अपने साथ कहीं ले जाना है। इस लिए मैं जीप ले कर हवेली से निकला। मन में रूपा से मिलने की हल्की खुशी तो थी किंतु बार बार ज़हन में भाभी का भी ख़याल आ जाता था। कल रात भी मैं उन्हीं के बारे में सोचता रहा था।

जब मैं जीप से रूपचंद्र के घर के सामने पहुंचा तो देखा रूपचंद्र वहीं मोड़ के किनारे पर पेड़ के पास अकेला खड़ा था। ज़ाहिर है मेरे आने का इंतज़ार कर रहा था वो।

"बस दो मिनट रुको मैं अभी आता हूं। वो मेरे पास आ कर बोला और फिर बिना मेरा कोई जवाब सुने वो लगभग दौड़ता हुआ अपने घर की तरफ चला गया।

कुछ देर बाद जब वो वापस आया तो उसके साथ रूपा भी थी। उसका चेहरा एकदम से खिला हुआ नज़र आ रहा था। ज़ाहिर है मुझसे मिलने और मेरे साथ कहीं अकेले जाने के एहसास से ही वो ख़ुश हो गई थी।

"मेरी बहन का ख़याल रखना वैभव।" रूपा जब जीप में बैठ गई तो रूपचंद्र ने मुझसे कहा____"और हां सम्हल कर जाना। वैसे दोपहर तक आ जाओगे ना?"

"हां।" मैंने सिर हिलाया और जीप को आगे बढ़ा दिया।

सच कहूं तो ये सब मेरे लिए बहुत ही अजीब था। शायद ही कहीं ऐसा हुआ होगा कि ब्याह से पहले ही लड़की का भाई अपनी बहन को उसके होने वाले पति के साथ यूं भेजा होगा, और तो और उसके बाकी घर वालों को भी इससे कोई आपत्ति नहीं हुई होगी।

"देखा।" कुछ दूर आते ही मैंने रूपा से कहा____"मैंने कहा था ना कि तुम्हारा भाई ख़ुद ही समझ जाएगा और फिर बिना तुम्हारे कुछ कहे ही वो तुम्हें मुझसे मिलाने का जुगाड़ कर देगा।"

"हां।" रूपा ने खुशी से मुस्कुराते हुए कहा____"मेरे भैया बहुत अच्छे हैं लेकिन मैं ये चाहती थी कि तुम ही हमारे मिलने का कोई जुगाड़ करते।"

"यार मैं कैसे करता?" मैंने कहा____"तुम्हारे भैया जितनी हिम्मत नहीं है मुझमें। वैसे मानना पड़ेगा, तुम्हारा भाई है बड़े कमाल का। मतलब कि अपनी बहन को इस तरह मेरे साथ अकेले ही भेज दिया।"

"हां तो इसमें ग़लत क्या है?" रूपा ने अपने भाई का पक्ष ले कर कहा____"उन्हें अपनी बहन पर और उसके प्रेम पर पूरा भरोसा है। इससे भी बड़ी बात ये कि उन्हें अपनी बहन की खुशियों का ख़याल है इसी लिए उन्होंने बिना मेरे कुछ कहे ही मेरा हाल समझ लिया और फिर तुम्हारे साथ भेज दिया।"

"हां बिल्कुल।" मैंने कहा____"ख़ैर ये बताओ कि कहां चलना चाहती हो तुम?"

"जहां मेरा साजन मुझे ले जाना चाहे।" रूपा ने बड़े प्रेम भाव से मेरी तरफ देखा।

"ओह! ऐसा क्या?" मैं मुस्कुराया।

"हां जी।" रूपा भी मुस्कुराई।

"ठीक है।" मैंने कहा____"तो सबसे पहले हम चलेंगे अनुराधा से मिलने। फिर अपने मकान में थोड़ा समय गुज़ारेंगे और उसके बाद सरोज काकी के घर ले चलूंगा तुम्हें।"

"हां ऐसा ही करते हैं।" रूपा ने कहा____"वैसे एक दिन मैं मां के साथ गई थी मां (सरोज) से मिलने।"

"अच्छा कब?" मैं उसकी इस बात से चौंका और साथ ही ये सोच कर हैरान भी हुआ कि उसकी मां भी उसके साथ गई थी।

"दो दिन पहले।" रूपा ने बताया____"असल में मैं मां (सरोज) से मिलना चाहती थी और उनका हाल चाल जानना चाहती थी। अपनी मां से जब इस बारे में सब कुछ बताया तो वो बड़ा खुश हुईं और खुद भी मां से मिलने की इच्छा कर बैठीं।"

"तो सरोज काकी से मिलने के बाद तुम्हारी मां को कैसा लगा था?" मैंने पूछा।

"बहुत अच्छा लगा था उन्हें।" रूपा ने उत्साहित भाव से कहा____"जब हम वापस आने लगे तो रास्ते में मां मुझसे कह रहीं थी कि तेरी मां (सरोज) तो तुझे तेरी सगी मां से भी ज़्यादा प्यार करती हैं।"

"ओह! और?"

"और क्या? वो बहुत खुश थीं।" रूपा ने कहा____"ख़ास कर इस बात से कि मैंने उनके (सरोज) दुख दर्द को अपने दुख दर्द की तरह समझा और फिर उनकी इस तरह से देख भाल की। फिर ये भी कहा कि अब जब मैंने उन्हें अपनी मां माना ही है तो बेटी की तरह हमेशा अपना फर्ज़ भी निभाऊं। शायद इसी के चलते वो अपनी बेटी के दुख से निजात पा सकें।"

"हम्म्म्म।"

"फिर उन्होंने ये भी कहा कि मेरा जब भी मन करे तो मैं अपनी दूसरी मां के घर जा सकती हूं।" रूपा ने आगे कहा____"और वहां जा कर अपनी दूसरी मां को बेटी जैसा लाड़ प्यार दे सकती हूं।"

"चलो ये तो अच्छी बात हुई ना।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"इसी बहाने तुम घर से भी निकल सकती हो और मुझसे भी मिल सकती हो।"

"हां।" रूपा ने कहा____"लेकिन लगता है कि तुम्हें मुझसे मिलने की ज़रा भी चाहत नहीं रहती है।"

"अरे! ऐसा क्यों कह रही हो तुम?" मैं एकदम से चौंका।

"क्यों न कहूं?" रूपा ने तुनक कर कहा____"अगर तुम्हें चाहत होती तो तुम मुझसे मिलने का खुद ही कोई जुगाड़ करते। इतने दिनों में एक दिन भी मुझे अपनी सूरत नहीं दिखाई तुमने। वैसे तो बड़ा कहते थे कि अब से मैं तुम्हारी हर दुख तकलीफ़ का ध्यान रखूंगा।"

"यार माफ़ कर दो इस बात के लिए।" मैंने सच में खेद प्रकट किया____"लेकिन यकीन मानों इसके लिए मैं तुम्हारे भाई से कहने की हिम्मत ही नहीं कर सका था। पता नहीं क्यों लेकिन अब मुझे तुम्हारे भाई से इस मामले में बहुत ज़्यादा झिझक होती है बात करने में। मैं तो ये सोच कर हैरान होता हूं कि तुम्हारा भाई कैसे इतनी सहजता से तुम्हारे मामले में मुझसे बातें कर लेता है?"

"वो इस लिए क्योंकि वो अपनी बहन को बहुत प्यार करते हैं।" रूपा ने बड़े गर्व के साथ कहा____"अपनी बहन को खुश करने के लिए वो कुछ भी बिना संकोच के कर सकते हैं।"

"हां ये बात तो मैं अब समझ चुका हूं।" मैंने सिर हिला कर कहा____"तुम्हारा भाई वाकई तुम्हारी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर सकता है।"

"काश! मेरा महबूब भी मुझे ऐसा ही प्यार करता और मेरी खुशी के लिए कुछ भी करता।" रूपा ने मायूसी ज़ाहिर की।

"तो तुम ये समझती हो कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।

"अगर करते हो तो सबूत दो।" रूपा ने भी मेरी तरफ देखते हुए कहा।

मैंने दो पल सोचा और जीप को सड़क पर रोक दिया। रूपा मेरे ऐसा करते ही चौंकी। पलक झपकते ही उसके चेहरे पर घबराहट के भाव उभर आए। शायद ये सोच कर कि कहीं उसकी बातों से मैं नाराज़ तो नहीं हो गया?

रूपा घबराए हुए भाव से अपलक मुझे ही देखे जा रही थी। इधर मैंने जीप रोकने के बाद उसकी तरफ देखा। दिलो दिमाग़ में हलचल सी मच गई थी। मैं थोड़ा उसकी तरफ खिसका और फिर दोनों हाथों में उसके चेहरे को ले लिया। दो पल उसकी आंखों में बड़े प्रेम से देखा। फिर झुक कर पहले उसके माथे को चूमा और फिर उसके सुर्ख़ होठों को अपने होठों की गिरफ़्त में ले लिया। मेरे ऐसा करते ही रूपा का जिस्म कांप सा गया किंतु उसने कोई विरोध नहीं किया।

मैं बहुत ही आहिस्ता से और बड़े ही प्रेम भाव से उसके शहद जैसे मीठे होठों को चूमने चूसने लगा। रूपा कुछ ही पलों में जैसे दूसरी दुनिया में पहुंच गई। मैं क़रीब एक मिनट तक उसके होठों को चूमता चूसता रहा उसके बाद उससे अलग हो गया।

रूपा की सांसें इतने में ही भारी हो गईं थी और आनंद की अनुभूति के चलते उसकी आंखें बंद हो गईं थी। जैसे ही उसे ये आभास हुआ कि मैंने उसे दूर कर दिया है तो उसने अपनी आंखें खोल कर मुझे देखा।

"अपने प्यार का यही सबूत दे सकता हूं।" मैंने उसकी तरफ देखते हुए थोड़ा गंभीर भाव से कहा____"बाकी मुझे नहीं पता कि प्यार का इसके अलावा भी कोई सबूत दिया जाता है। हां अगर तुम्हें पता हो तो बता दो, मैं वो भी कर के दिखा दूंगा।"

"तुम्हें कुछ भी साबित करने की ज़रूरत नहीं है मेरे दिलबर।" रूपा ने दीवानावार सी हो कर कहा____"मैं तो बस तुमसे मज़ाक कर रही थी।"

"हो सकता है कि तुमने मज़ाक किया हो।" मैंने उसी गंभीरता से कहा____"लेकिन मैं अच्छी तरह समझता हूं कि मुझे सच में तुम्हारे प्रेम की कद्र करनी चाहिए और तुमसे वैसा ही प्यार करना चाहिए जैसा मैं अनुराधा से करता था। मेरा यकीन करो, मेरे दिल में तुम्हारे लिए भी प्रेम जैसे ही जज़्बात जन्म ले चुके हैं और इस बात का भी यकीन करो कि आगे चल कर ये जज़्बात और भी गहरे हो जाएंगे। तुम जैसी प्रेम की पुजारन के साथ रहने पर भी अगर मेरे दिल में तुम्हारे लिए प्रेम न जन्मे तो ये ऊपर वाले का क़हर ही समझा जाएगा।"

"बस कुछ मत कहो।" रूपा ने एकदम से मेरा चेहरा थाम लिया____"तुम्हारी इस दीवानी के लिए यही काफी है कि उसका महबूब उसको अपना समझता है और उसे अपनी बना लेना चाहता है।"

"मेरे जीवन के हर ज़र्रे पर तुम्हारा हक़ है।" मैंने कहा____"तुम्हें एक बात बताना चाहता हूं। मेरे माता पिता मेरा ब्याह तुम्हारे साथ साथ रागिनी भाभी से भी करना चाहते हैं। ये बात तुम्हारे घर वालों को भी पता है।"

"य...ये क्या कह रहे हो तुम?" रूपा ने एकदम से चकित हो कर कहा।

"हां रूपा।" मैंने कहा____"मुझे कल ही अपनी मां से इस बात का पता चला है। वैसे तुम्हारे भाई को तो मुझसे भी पहले ये बात पता थी। उसी ने संकेत दे कर इस बात का एहसास कराया था मुझे और फिर मैंने अपनी मां से पूछा। तब मुझे इस बात का पता चला कि पिता जी भाभी के साथ मेरा ब्याह कर देना चाहते हैं। इसी लिए उन्होंने पहले तुम्हारे काका गौरी शंकर को बताया था और फिर उन्होंने भाभी के पिता जी से भी बात की थी।"

"ये तो बड़े ही आश्चर्य की बात है।" रूपा ने आश्चर्य से आंखें फैलाए कहा____"तो क्या दीदी के पिता जी मान गए इस रिश्ते के लिए? और क्या दीदी भी मान गईं हैं? वैसे मुझे ये समझ नहीं आया कि तुम्हारे पिता जी ऐसा क्यों करना चाहते हैं?"

"अपनी बहू का जीवन संवारने के लिए और उन्हें खुशियां देने के लिए।" मैंने कहा____"हालाकि इसके लिए वो भाभी का ब्याह कहीं और भी करवा सकते थे लेकिन ऐसा वो इस लिए करना चाहते हैं क्योंकि वो भाभी को बहुत चाहते हैं और चाहते हैं कि भाभी हमेशा उनकी बहू के रूप में उनकी हवेली में ही रहें। अब क्योंकि वो भाभी को विधवा के रूप में दुखी भी नहीं देख सकते इस लिए उन्होंने उन्हें खुशियां देने के लिए और उनका जीवन फिर से संवारने के लिए उनका ब्याह मुझसे कर देने का निर्णय लिया। कल मां भी मुझसे यही सब कह रहीं थी और मुझसे भी पूछ रहीं थी कि क्या मैं अपनी भाभी को इस तरीके से खुश होते नहीं देखना चाहता? सच कहूं तो कल से इस बारे में सोच सोच कर मैं बड़ी दुविधा और परेशानी में हूं। हालाकि भाभी ये रिश्ता मुश्किल ही है कि स्वीकार करेंगी लेकिन मैं ये भी समझता हूं कि अंततः उन्हें अपने सास ससुर के प्रेम भाव के सामने झुकना ही पड़ेगा और फिर उन्हें ये रिश्ता स्वीकार करना पड़ेगा। अपने माता पिता की खुशी और इच्छा के लिए मुझे भी इस रिश्ते को स्वीकार करना पड़ेगा लेकिन इस सबके बीच मैं तुम्हें किसी भी कीमत नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। मेरे जीवन में तुम्हारी अहमियत भी उतनी ही है जितनी की अनुराधा की। सच कहूं तो मुझ पर सबसे ज़्यादा हक़ ही अब तुम्हारा है रूपा। इसी लिए मैं तुम्हारी इजाज़त के बाद ही इस रिश्ते को स्वीकार करूंगा, अन्यथा नहीं।"

रूपा गहन गंभीरता से मेरी बातें सुन रही थी। मैं जब ये सब बोल कर चुप हो गया तो वो एकदम से चौंकी और फिर मेरी तरफ ग़ौर से देखने लगी। इधर मेरी धड़कनें एकाएक ही बढ़ चलीं थी।

"कल रात से मैं इस सबके बारे में सोचता आ रहा हूं।" जब वो मेरी तरफ देखने लगी तो मैंने फिर से कहा____"एक तरफ जहां इस बात से मैं दुविधा और परेशानी में फंस गया हूं कि आख़िर अब क्या करूं तो वहीं दूसरी तरफ बार बार तुम्हारे बारे में भी सोचता हूं कि मैं अब तुम्हारे साथ कोई भी अन्याय नहीं करना चाहता। मेरे लिए तुमने क्या कुछ नहीं किया है और क्या कुछ नहीं सहा है। इतने पर भी अगर तुम्हारे साथ अन्याय ही होता रहा तो ऊपर वाला मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। मैं सच कहता हूं रूपा, मैं अब तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं कर सकता। मेरी मुकम्मल ज़िंदगी पर अब सिर्फ तुम्हारा ही हक़ है। तुम्हारा जो भी फ़ैसला होगा वही करूंगा मैं।"

"एक समय ऐसा आया था जब मैंने तुम पर सिर्फ अपना ही हक़ समझ लिया था।" रूपा ने गहरी सांस ले कर कहा____"किसी और लड़की से तुम्हारे प्रेम संबंध का जान कर बहुत तकलीफ़ हुई थी मुझे। जब तुम मिले थे तो तुमसे इस बारे में जाने क्या क्या कह गई थी मैं लेकिन फिर जल्द ही समझ आ गया था कि प्रेम में हक़ जैसी कोई बात ही नहीं होती। अगर कुछ होता है तो वो है...सिर्फ प्रेम। पहले यही समझी थी कि अनुराधा के चलते मेरा प्रेम बंट जाएगा लेकिन जल्दी ही समझ आ गया था कि प्रेम कभी नहीं बंटता, बल्कि वो तो और भी ज़्यादा बढ़ता ही रहता है। जब प्रेम का असल मर्म समझ गई तो सब कुछ ठीक हो गया। जिस लड़की के प्रति जलन पैदा हुई थी उसी लड़की के प्रति प्रेम और स्नेह पैदा हो गया। इन सब बातों को कहने का सिर्फ एक ही मतलब है मेरे साजन कि मैं जिससे प्रेम करती हूं उस पर ना हक़ जताना चाहती हूं और ना ही किसी तरह का प्रतिबंध लगाना चाहती हूं। मैं तो अपने दिलबर की दीवानी हूं। अपने दिलबर को सिर्फ प्रेम करूंगी। वो जैसा चाहेगा वैसे ही खुश रहूंगी।"

"र...रूपा।" उसकी बातें मेरी आत्मा तक को झकझोर गईं। जज़्बात बुरी तरह मचल उठे।

उसकी दीवानगी देख और उसकी बातें सुन कर मेरी आंखें भर आईं। मैंने झपट कर उसे अपने सीने से लगा लिया। अपने आपको आज सबसे ज़्यादा खुश किस्मत इंसान होने का एहसास हो रहा था मुझे। कैसी अद्भुत लड़की थी वो। शायद ग़लती से कलियुग में पैदा हो गई थी।

"मुझे इसी तरह प्रेम से अपने सीने से लगा लिया करोगे तो तुम्हारी इस प्रेम दिवानी को बड़ा सुकून मिल जाया करेगा।" मेरे कानों में उसकी रुंधी हुई सी आवाज़ पड़ी____"अपने देवता के होठों को चूम लेने दिया करोगे तो मुझे तृप्ति मिल जाया करेगी। बोलो मेरे साजन, इतना तो करने दोगे न मुझे?"

"ऐसा क्यों कहती हो रूपा?" मैं बहुत ही ज़्यादा तड़प उठा____"मेरे तन और मन पर ही नहीं बल्कि मेरे वजूद के हर ज़र्रे पर तुम्हारा अधिकार है....मेरी रूपा का अधिकार है। मैं चाहता हूं कि मेरी रूपा मुझे ऐसे ही प्रेम करे और हमेशा मुझे धन्य करती रहे। मैं ये भी चाहता हूं कि मेरी रूपा मुझे भी अपनी तरह प्रेम करना सिखाए ताकि मैं भी उसका दीवाना हो कर उससे ऐसे ही प्रेम करूं।"

मेरी ये बातें सुन कर रूपा सिसकते हुए और भी जोरों से मुझसे लिपट गई। ऐसा लगा जैसे वो मुझसे एक पल के लिए भी दूर नहीं होना चाहती थी। मेरा भी उसे खुद से अलग करने का कोई इरादा नहीं था। एक अलग ही एहसास, एक अलग ही सुकून मिल रहा था मुझे।




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अध्याय - 148
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"अरे‌ वाह! किसी के ख़यालों में खोई हुई हैं क्या मेरी ननद रानी?" वंदना ने रागिनी को अपलक एक जगह शून्य में घूरते हुए देखा तो मज़ाकिया लहजे से पूछा____"ज़रा मुझे भी तो बताओ कि आज कल वो कौन है जो ख़यालों में आ कर मेरी प्यारी सी रागिनी को तंग करता है?"

वंदना की ये बातें सुनते ही रागिनी पहले तो चौंक ही पड़ी किंतु फिर खुद को सम्हालते हुए बोली____"ऐसी कोई बात नहीं है भाभी। आप क्यों बेवजह इस तरह मुझे छेड़ती हैं?"

"अरे! मैं कहां छेड़ रही हूं?" वंदना ने रागिनी के दोनों कन्धों पर हाथ रख कर बड़े स्नेह भाव से कहा____"क्या सच में तुम्हें ऐसा लगा है?"

रागिनी कुछ पलों तक अपनी भाभी को अपलक देखती रही, फिर थोड़ा गंभीरता से बोली____"मैं सिर्फ इस सोच में डूबी हुई थी कि इंसानों की किस्मत कितनी अजीब हुआ करती है। वक्त और हालात कितने बेरहम हुआ करते हैं जिसके चलते इंसान कितना बेबस और लाचार हो जाया करता है।"

"हां मानती हूं ये बात।" वंदना ने सामान्य भाव से कहा____"लेकिन ये भी मानती हूं कि कभी कभी इंसानों की किस्मत तारों की तरह भी चमक उठती है। कभी कभी वक्त और हालात इंसानों के लिए सबसे बड़े मरहम भी बन जाते हैं। उस मरहम से जब इंसान का इलाज़ होता है तो इंसान को अपना जीवन एकाएक बड़ा ही ख़ूबसूरत लगने लगता है।"

"क्या आप ये कहना चाहती हैं कि इस समय वक्त और हालात मेरे लिए मरहम ले कर आए हैं?" रागिनी ने अजीब भाव से पूछा____"जिसके चलते मुझे अपना जीवन बड़ा ही सुन्दर लगने लगेगा?"

"बिल्कुल।" वंदना ने कहा____"और ये बात तुम भी अच्छी तरह समझती हो रागिनी। हां ये हो सकता है कि तुम समझते हुए भी उसको मानना नहीं चाहती हो। एक बात हमेशा याद रखो कि वक्त इंसान को अपने अच्छे और बुरे का चुनाव करने के लिए सिर्फ एक ही मौका देता है। इस समय तुम्हारे सामने यही स्थिति है। मेरा तुमसे यही कहना है कि अपनी खुशी के लिए न सही लेकिन अपने सास ससुर की खुशी के लिए इस मौके को थाम लो। ऐसे सास ससुर किसी औरत को बड़ी ही किस्मत से मिलते हैं जो अपनी बहू को बहू नहीं बल्कि अपनी बेटी समझते हों और उसे बेटी की ही तरह प्यार और स्नेह देते हों। यूं तो सास ससुर मुझे भी मिले हैं लेकिन तुम भी जानती हो कि मेरे सास ससुर ने कभी मुझे बेटी कह कर नहीं पुकारा। हालाकि ऐसा भी नहीं है कि वो मुझे प्यार अथवा स्नेह नहीं देते हैं लेकिन औरत को अपने सास ससुर के मुख से बेटी सुनने में जो आनंद और सुकून मिलता है वो बहू सुनने में नहीं मिलता।"

रागिनी को समझ ना आया कि क्या कहे? इस बात को तो वो भी स्वीकार करती थी कि उसके सास ससुर वास्तव में बहुत अच्छे हैं और इसका उसे हमेशा ही गर्व रहा है।

"इंसान को कभी कभी अपने लिए स्वार्थी भी बन जाना चाहिए।" उधर वंदना ने फिर कहा____"इसी में उसका भला होता है। मैं ये नहीं कहती कि तुम जो सोचती हो वो ग़लत है किंतु हां मैं ये ज़रूर कहूंगी कि तुम ज़रूरत से ज़्यादा ही इस रिश्ते के बारे में सोच रही हो। तुम्हारा मन साफ है और तुम्हारा चरित्र भी बहुत पवित्र है, ये बहुत ही अच्छी बात है लेकिन क्या फ़ायदा मन के साफ होने का और चरित्र के पवित्र होने का जब उसकी वजह से तुम्हारे अपने तुम्हें खुशी से अपना जीवन जीते हुए ही न देख सकें?"

"आप ये कैसी बातें कर रहीं हैं भाभी" रागिनी के समूचे जिस्म में झुरझुरी सी हुई____"क्या आप ये कह रही हैं कि मैं अपनों को खुश नहीं देखना चाहती?"

"मैंने ऐसा नहीं कहा।" वंदना ने कहा____"बल्कि ये कहा है कि क्या फ़ायदा उस साफ मन का और पवित्रता का जिसकी वजह से तुम्हारे अपने तुम्हें खुशी से अपना जीवन जीते हुए न देख सकें। तुम्हारे अपने तभी खुश होंगे जब तुम अपने जीवन से खुश होगी।"

"मैं ये सब समझती हूं भाभी।" रागिनी ने अधीरता से कहा____"लेकिन हर बार मेरा मन इसी सोच पर आ कर अटक जाता है कि कैसे इस रिश्ते को अपनाऊं? कैसे अपने देवर को एक पति की नज़र से देखने लगूं? कैसे उसको पति के रूप में अपने मन में बैठाऊं? जब ये सब ख़याल मन में आते हैं तो जैसे द्वंद सा छिड़ जाता है।"

"द्वंद तो तब भी छिड़ता है रागिनी जब किसी लड़की का पहली बार किसी से ब्याह होता है और उसे किसी को अपना पति मानना होता है।" वंदना ने जैसे समझाते हुए कहा____"हर नया रिश्ता शुरू शुरू में अजीब सा ही एहसास कराता है लेकिन फिर उसी रिश्ते से लगाव होने में देर भी नहीं लगती। रिश्ते की डोर में जब दो इंसान बंध जाते हैं तो उसके साथ ही वो उस रिश्ते के एहसास से भी बंध जाते हैं। पति पत्नी के रिश्ते का एहसास कैसा होता है क्या ये भी बताने की ज़रूरत है तुम्हें?"

रागिनी कुछ बोल ना सकी। उसके मन में विचारों का बवंडर सा चल पड़ा था। वंदना उसकी फितरत से अच्छी तरह वाक़िफ थी इस लिए उसने इससे ज़्यादा आगे कुछ भी कहना उचित नहीं समझा। उसने रागिनी के बाएं गाल को बड़े स्नेह से सहलाया और फिर पलट कर चली गई। घर के पीछे अमरूद के पेड़ के पास खड़ी रागिनी मन में ख़यालों के जाने कितने ही विचार लिए अपनी भाभी को जाता देखती रही।

✮✮✮✮

मैं और रूपा जीप से अपने मकान में पहुंचे। उन सब बातों के बाद अब हम दोनों को बहुत ही अच्छा महसूस हो रहा था। रूपा सच में बहुत अद्भुत लड़की थी और मैं इस बात पर गर्व कर रहा था कि ऐसी अद्भुत लड़की मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनने वाली है, या ये कहूं कि बन ही चुकी है।

जीप से उतर कर हम दोनों अनुराधा के विदाई स्थल पर पहुंचे। उस जगह पर पहुंचते ही हम दोनों भावुक हो गए। पलक झपकते ही मानों सारी बातें और सारी यादें ताज़ा सी हो गईं। एक तरफ जहां मेरा मन भारी हो गया वहीं दूसरी तरफ रूपा की जाने क्या सोच कर आंखें नम हो गईं।

"एक दिन वक्त की गर्द में ये जगह ग़ायब सी हो जाएगी।" मैंने अधीरता से कहा____"मैं नहीं चाहता कि ऐसा हो, इस लिए मैंने फ़ैसला किया है कि इस जगह पर एक अच्छा सा चबूतरा बनवाऊंगा जिससे ये जगह हमेशा मेरी आंखों को नज़र आती रहे।"

"सिर्फ चबूतरा नहीं।" रूपा ने भारी गले से कहा____"बल्कि उस चबूतरे के ऊपर अगर मंदिरों जैसा गोल गुम्बद भी हो तो ज़्यादा अच्छा होगा। उससे चबूतरे में छांव रहेगी जिसके चलते मेरी गुड़िया को धूप में तपना नहीं पड़ेगा।"

"ओह! हां सही कहा तुमने।" मैंने उसकी तरफ प्रशंसा की द्रष्टि से देखते हुए कहा____"तुमने बिल्कुल सही बात कही है। अगर चबूतरे के ऊपर कुछ नहीं होगा तो सचमुच मेरी अनुराधा को धूप लगेगी, बारिश के दिनों में वो भीगेंगी भी और ठंड के दिनों में उसे ठंड भी लगेगी। तुमने बहुत ही अच्छा सुझाव दिया है मुझे। मैं अब वैसा ही चबूतरा बनवाऊंगा जिसके ऊपर मंदिरों की तरह गुम्बद हो।"

काफी देर तक हम दोनों उस जगह पर बैठे रहे। मकान में चौकीदारी करने वाले लोग थे जो हमें आया देख एकदम से मुस्तैद से नज़र आने लगे थे। ख़ैर हम दोनों उठे और फिर जीप में बैठ कर सरोज काकी के घर की तरफ चल पड़े। रूपा ख़ामोश थी। उसके चेहरे पर गंभीरता के भाव थे। शायद उसके मन में अब भी अनुराधा के ही ख़याल थे।

कुछ ही देर में मैंने जीप को सरोज काकी के घर के बाहर रोका। घर के बाहर अनूप और मालती की छोटी लड़की खेल रही थी। हमें आया देख वो दोनों जैसे खेलना भूल गए थे। रूपा को देखते ही अनूप का चेहरा खिल उठा था। वो अपनी तोतली भाषा में दीदी आई दीदी आई कह कर खुशियां मनाने लगा था।

रूपा जल्दी ही अनूप के पास पहुंची और उसको दुलार करने लगी। घर का दरवाज़ा खुला हुआ था इस लिए हम सब अंदर दाखिल हो गए। अंदर सरोज काकी अपनी देवरानी मालती के पास बैठी बातें कर रही थी। हमें आया देख वो दोनों बड़ा खुश हुईं। रूपा आगे बढ़ कर सरोज काकी से गले मिली और फिर मालती से भी।

"अब तो किसी बात की परेशानी नहीं है ना काकी?" मैंने मालती से मुखातिब हो कर पूछा____"सब ठीक है ना अब?"

"हां छोटे कुंवर।" उसने कहा____"आपकी कृपा से सब ठीक है। घर मिल गया, ज़मीनें मिल गईं तो अब परेशानी जैसी कोई बात नहीं रही।"

"चलो फिर तो अच्छी बात है।" मैंने कहा।

रूपा ने तब तक एक चारपाई बरामदे में बिछा दी थी। ठंड का मौसम शुरू हो चुका था इस लिए धूप नहीं थी आंगन में। मैं चारपाई पर बैठ गया था जबकि सरोज के ज़ोर देने पर रूपा उसके पास ही बैठ गई थी। उधर मालती मेरे लिए पानी और गुड़ ले आई।

क़रीब एक घंटे तक मैं वहां रहा। उसके बाद मैंने रूपा को चलने का इशारा किया। समय धीरे धीरे बढ़ रहा था। मैंने रूपचंद्र से कहा था कि मैं रूपा को दोपहर तक वापस ले आऊंगा। अतः सरोज काकी से इजाज़त ले कर मैं और रूपा वहां से चल पड़े।

"अभी तो दोपहर होने में समय है।" रूपा ने रास्ते में मुझसे कहा____"क्यों न हम लोग वापस मकान में ही चलें।"

"वहां पर क्या करेंगे?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"वैसे भी वहां चौकीदारी करने वाले लोग हैं। अगर हम वहां रुके और उन्हें मकान से कहीं जाने को कहा तो वो ग़लत सोच बैठेंगे हमारे बारे में।"

"पहले भी तो हम दोनों उस मकान में अकेले ही रहते थे।" रूपा ने कहा____"क्या तब नहीं सोचते रहे होंगे?"

"तब की बात और थी।" मैंने कहा____"क्योंकि तब उन्हें भी पता था कि मेरी मानसिक हालत ठीक नहीं थी और तुम मेरे साथ इसी लिए वहां रहने आई थी।"

"साफ साफ कह दो ना कि मेरे साथ वक्त नहीं बिताना चाहते हो।" रूपा ने हौले से मुंह बना कर कहा____"बहाना बनाने की ज़रूरत नहीं है तुम्हें।"

"क्या सच में तुम्हें ऐसा लगता है कि मैं तुमसे बहाना बनाऊंगा?" मैंने हैरानी से उसे देखा____"अच्छा ठीक है हम वहीं चलते हैं। मैं अपनी रूपा को बस खुश देखना चाहता हूं।"

"सच कह रहे हो?" रूपा ने एकदम से खुश हो कर पूछा।

मैंने हां में सिर हिला दिया। कुछ ही पलों में जीप मकान में पहुंच कर रुकी। चौकीदारी करने वाले लोग झट से बाहर आ गए। वो दो ही लोग थे जबकि बाकी दो सरोज के खेतों पर थे। मैंने दोनों को कुएं से पानी भर लाने को कहा और रूपा को ले कर लकड़ी की चारदीवारी के अंदर आ गया।

"काश! यहां दूध होता।" रूपा ने मकान के अंदर आ कर कहा____"तो मैं तुम्हारे लिए चाय बना देती।"

"अरे! इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" मैंने कहा____"वैसे भी सरोज काकी के यहां तो हमने पी ही थी चाय।"

"फिर क्या करें?" रूपा ने मासूम सी शक्ल बना कर मेरी तरफ देखा।

"जो तुम्हारा दिल करे करो।" मुझे भी जैसे कुछ समझ नहीं आ रहा था इस लिए यही बोला।

"सच में??" रूपा ने सहसा मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा तो मैं एकदम से चौंका।

"ऐसे मत देखो वरना मेरे अंदर पहले वाला वैभव जाग जाएगा।" मैंने उसे घूरते हुए कहा____"और मैं अब ये किसी भी कीमत पर नहीं चाहता कि वो जागे।"

"हाय! मेरे वैभव को क्यों अंदर ही अंदर मार देने पर तुले हो तुम?" रूपा ने कहा____"वैसे सच कहती हूं मुझे तुम्हारा पहले वाला रूप और अंदाज़ ज़्यादा पसंद था।"

"तुम्हें पता है मैंने उन दोनों से पानी लाने को क्यों कहा है?" मैंने कहा____"वो इस लिए ताकि पानी का पूरा मटका तुम्हारे ऊपर उड़ेल सकूं। ठंड के मौसम में जब पानी से नहा जाओगी तो अकल ठिकाने लग जाएगी तुम्हारी।"

"तो ऐसा बोलो ना कि मुझे पानी से भींगा हुआ देखना चाहते हो।" रूपा ने शरारत से मुस्कुराते हुए कहा____"बहाना बनाने की क्या ज़रूरत है तुम्हें। एक काम करो, कुएं के पास ले चलो मुझे और वहां जी भर के पानी से भिंगा लेना मुझे।"

"हद है।" मैंने उसे घूरा____"कुछ भी अनाप शनाप बोले जा रही हो।"

तभी बाहर से आवाज़ आई। शायद वो लोग पानी ले आए थे। मैं और रूपा बाहर आए। रूपा ने मेरे लिए गिलास में भर कर पानी दिया मुझे जिसे ले कर मैं पीने लगा। मेरे बाद रूपा ने भी पिया। उधर दोनों चौकीदार शायद ज़रूरत से ज़्यादा समझदार थे इस लिए बिना मेरे कुछ कहे ही चले गए।

"तो रागिनी दीदी से तुम्हारे ब्याह की लग्न कब बनने वाली है?" मैं बाहर ही तखत पर बैठ गया तो रूपा ने मुझसे पूछा।

"पता नहीं।" मैंने कहा____"अभी तो भाभी की स्वीकृति मिलना बाकी है। जब तक वो राज़ी नहीं होंगी तब तक ये रिश्ता आगे नहीं बढ़ने वाला। वैसे मुझे यकीन है कि भाभी इस रिश्ते को स्वीकृति नहीं देंगी।"

"पर मुझे ऐसा नहीं लगता।" रूपा ने कहा____"मैं ये मानती हूं कि उनके लिए इस रिश्ते को स्वीकार करना आसान नहीं होगा लेकिन अंततः उन्हें राज़ी होना ही पड़ेगा। ऐसा मैं इस लिए कह रही हूं क्योंकि जानती हूं कि वो अपने सास ससुर की भावनाओं को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकतीं हैं।"

"मैं ये तो चाहता था कि उनका जीवन संवर जाए और वो फिर से पहले की तरह खुश रहने लगें।" मैंने अधीरता से कहा____"लेकिन ऐसी कल्पना कभी नहीं की थी कि एक दिन मुझे उनके साथ ब्याह भी करना पड़ेगा। सच कहूं तो मुझे अभी भी इस बात का यकीन नहीं हो रहा है।"

"इंसान के जीवन में ऐसा ही तो होता है।" रूपा ने कहा____"हम जिस चीज़ की कल्पना भी नहीं किए होते वही हो जाया करता है। क्या तुमने इस बात की कल्पना की थी कि तुम एक दिन इस तरह से बदल जाओगे अथवा तुम्हें किसी लड़की से प्रेम हो जाएगा? लेकिन तुम्हारी कल्पना से परे ऐसा हुआ और इस बात का तुम्हारे साथ साथ हम सब भी यकीन कर चुके हैं। ज़ाहिर है यही अवस्था रागिनी दीदी से तुम्हारे ब्याह की भी है। मुझे भी दो बहनों का सुख मिलना था इस लिए मेरी छोटी बहन गई तो अब बड़ी बहन मिल जाएगी। वैसे एक बात कहूं...पता नहीं क्यों, लेकिन अब दीदी को ले कर फिर से नए नए ख़्वाब बुनने से डर लग रहा है मुझे।"

"कैसा डर?" मैंने उसे देखा।

"पहले अनुराधा को ले कर हसीन ख़्वाब बुने थे मैंने।" रूपा ने एकाएक संजीदा हो कर कहा____"लेकिन मेरी बदकिस्मती ने मेरे ख़्वाब पूरे नहीं होने दिए और अब रागिनी दीदी को ले कर ख़्वाब बुनूंगी तो मेरी बदकिस्मती कहीं उन्हें भी न मुझसे छीन ले।"

कहने के साथ ही रूपा का गला रुंध गया। इधर उसकी ये बातें सुन कर मेरी रूह भी कांप गई। पलक झपकते ही सन्नाटे जैसी स्थिति में आ गया था मैं। भले ही ऐसा होना संभव न हो लेकिन फिर भी इस बात के एहसास से एक ख़ौफ सा महसूस हुआ। आंखों के सामने अनुराधा का चेहरा चमक उठा और साथ ही पेड़ से लटकती उसकी भयानक लाश....खून से लथपथ।

"न...नहीं।" मैं हड़बड़ा कर बोल पड़ा____"ऐसा कुछ नहीं होगा रूपा। मेरी भाभी के साथ ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम बेवजह ऐसे ख़याल अपने मन में मत लाओ यार।"

"मुझे माफ़ कर दो मेरे साजन।" रूपा एकदम से सिसक उठी____"मैंने जान बूझ कर ये नहीं कहा और ना ही मैंने जान बूझ कर ऐसा सोचा है। वो तो....वो तो जाने कैसे अचानक से मेरे मन में ये ख़याल उभर आया था?"

"कोई बात नहीं।" मैंने उसको शान्त करने के लिए खुद से छुपका लिया____"मैं जानता हूं कि तुम उनके बारे में ऐसा जान बूझ कर नहीं सोच सकती। मैं भी नहीं सोचना चाहता। उनसे ये रिश्ता हो चाहे ना हो लेकिन मेरी ऊपर वाले से यही प्रार्थना है कि वो हमेशा सलामत रहें और हमेशा खुश रहें।"

"ऐसा ही होगा मेरे दिलबर।" रूपा ने दृढ़ता से कहा____"वो हमेशा हमारे साथ रहेंगी और हमेशा खुश रहेंगी। तुम उनसे ब्याह करोगे और उन्हें ढेर सारी खुशियां दोगे। मैं भी अपनी दीदी को बहुत सारा प्यार करूंगी। पहले भी उनके बारे में मैंने बहुत सुना था कि वो बहुत ही नेक दिल वाली हैं इस लिए मेरी यही इच्छा है कि ऐसी नेकदिल औरत को कभी कोई दुख नहीं होना चाहिए।"

माहौल थोड़ा संजीदा सा हो गया था। कुछ देर और हम लोग वहां बैठे रहे उसके बाद जीप में बैठ कर चल दिए। दोपहर होने वाली थी, अतः मैंने जीप की रफ़्तार बढ़ा दी। जल्दी ही मैं रूपा को लिए उसके घर पहुंच गया। मेरे द्वारा हार्न दिए जाने पर रूपचंद्र जल्दी ही घर से बाहर निकला और भागता हुआ आया। उसके आने से पहले ही रूपा जीप से उतर गई थी। रूपचंद्र ने आ कर मुझे धन्यवाद कहा और फिर रूपा को ले कर चला गया। उसके जाने के बाद मैं भी हवेली की तरफ चल पड़ा।




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मेनका चाची पश्चाताप की आग में जल रही है ये ही उनकी सजा है जो की सही है सब ने मेनका को माफ कर दिया है लेकिन सब को इस दुख से बाहर आने में थोड़ा समय तो लगेगा
वैभव ने रूपा से रागिनी भाभी के बारे में खुल कर बात की साथ ही रूपा को सर्वोपरि मानकर उसके फैसले को मानने को कहा एक बार फिर से रूपा ने रागिनी को अपनी बड़ी बहन मानकर उसको अपनाकर फिर से रूपा ने अपने प्रेम की परीक्षा दे दी है
 

Game888

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Pappu roy

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Bhai ye story ko kya comment karu
Comment kar n liya kuch b nahi hai
Aap likhate ho bahut achcha kya Karun story khatm hone ka baat Karega socha tha Lekin abhi to stri khatm hone wala hai isliye comment abhi kar raha hai itna der se comment karne ke liye sorry
 
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Game888

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Sanju@

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माहौल थोड़ा संजीदा सा हो गया था। कुछ देर और हम लोग वहां बैठे रहे उसके बाद जीप में बैठ कर चल दिए। दोपहर होने वाली थी, अतः मैंने जीप की रफ़्तार बढ़ा दी। जल्दी ही मैं रूपा को लिए उसके घर पहुंच गया। मेरे द्वारा हार्न दिए जाने पर रूपचंद्र जल्दी ही घर से बाहर निकला और भागता हुआ आया। उसके आने से पहले ही रूपा जीप से उतर गई थी। रूपचंद्र ने आ कर मुझे धन्यवाद कहा और फिर रूपा को ले कर चला गया। उसके जाने के बाद मैं भी हवेली की तरफ चल पड़ा।


अब आगे....


दूसरे दिन दोपहर के समय दादा ठाकुर अपने मुंशी किशोरी लाल के साथ बैठक में बैठे हुए थे। गौरी शंकर भी एक कुर्सी पर बैठा हुआ था। वो क़रीब बीस मिनट पहले ही आया था।

"आप क्या सोचने लगे ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने कहा____"मैं आपसे जानना चाहता हूं कि इस बारे में आपकी क्या सलाह है? जवाब में मैं उन्हें क्या कहूं?"

"हमारा ख़याल है कि इस बारे में तुम्हें ज़्यादा कुछ सोचना ही नहीं चाहिए।" दादा ठाकुर ने कहा____"वो लड़के वाले हैं इस लिए उनके मन का ही करना होगा और वैसे भी उनका कहना भी ग़लत नहीं है। रिश्ता जब पहले से ही तय था तो अब संबंध बनाने में देरी करने का कोई मतलब भी नहीं बनता।"

"यानि मैं उन्हें जवाब में ये कह दूं कि मुझे उनका सुझाव मंज़ूर है?" गौरी शंकर ने व्याकुल से लहजे में पूछा।

"बिल्कुल।" दादा ठाकुर ने सिर हिलाया____"और फिर जल्द से जल्द तुम्हें ब्याह की तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। वैसे भी घर की बड़ी बेटियों का ब्याह हो जाने के बाद ही छोटी बेटियों का नंबर लगेगा।"

"हां ये तो आपने सही कहा।" गौरी शंकर हल्के से मुस्कुराया____"मैं आज ही उन्हें अपनी मंजूरी की ख़बर भिजवा देता हूं। उसके बाद मुझे अपने पुरोहित जी से भी मिलना होगा और उनसे लग्न बनाने को कहना होगा।"

"हमारा ख़याल है कि ज़्यादा परेशानी वाली बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने कहा____"एक महीने का समय ठीक रहेगा।"

"ए...एक महीना?" गौरी शंकर की आंखें फैलीं____"ठाकुर साहब इतने कम समय में क्या तैयारियां हो पाएंगी?"

"क्यों नहीं होंगी?" दादा ठाकुर ने कहा____"कहीं तुम ये तो नहीं सोच रहे कि ये सब तुम्हें अकेले ही करना पड़ेगा? अरे! भई तुम अब अकेले नहीं हो, हम भी तो तुम्हारे संबंधी ही बनने वाले हैं। वैसे भी तुम्हारी बेटियां हमारी बेटियां ही हैं। अतः उनके ब्याह की ज़िम्मेदारियां हमें भी तो लेनी हैं।"

"आपने ये कह दिया तो अब मैं सच में निश्चिंत हो गया हूं।" गौरी शंकर ने खुशी से कहा____"वरना सच में मैं ये सोच के घबराने सा लगा था कि अकेले सब कुछ कैसे कर सकूंगा?"

"फ़िक्र मत करो।" दादा ठाकुर ने कहा____"सब कुछ वक्त से पहले और बहुत अच्छे तरीके से हो जाएगा।"

"क्या चंदनपुर से कोई ख़बर आई ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने सहसा कुछ सोचते हुए पूछा____"मेरा मतलब है कि क्या रागिनी बहू वैभव के साथ ब्याह करने को राज़ी हो गईं?"

"वहां से इस बारे में अभी कोई ख़बर नहीं आई है गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ले कर कहा____"हम भी उसके राज़ी होने की ख़बर सुनने का बड़ी शिद्दत से इंतज़ार कर रहे हैं। हम जानते हैं कि रागिनी बहू के लिए इस रिश्ते को स्वीकार करना मुश्किल होगा लेकिन हमें यकीन है कि अंततः वो इस रिश्ते को स्वीकार कर लेगी। वो समझेगी कि ये सब हम उसके भले के लिए ही करना चाहते हैं और सबसे ज़्यादा इस लिए भी कि हम उसके जैसी बेटी को खोना नहीं चाहते। उसको फिर से उसी तरह खुश देखना चाहते हैं जैसे वो हमारे बेटे के जीवित रहते खुश रहा करती थी।"

"हलकान मत होइए ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने अधीरता से कहा____"मुझे भी भरोसा है कि रागिनी बहू इस रिश्ते को ज़रूर स्वीकार कर लेंगी। वैसे मुझे पता चला है कि वैभव को पता चल गया है इस बारे में।"

"हां।" दादा ठाकुर ने कहा____"वैसे उसको तो पता चलना ही था। हमें बस इस बात का डर था कि अनुराधा की वजह से वो इस रिश्ते के बारे में कोई बखेड़ा न खड़ा कर दे। ख़ैर अच्छा हुआ कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। यकीनन ये तुम्हारी भतीजी के ही प्रयासों से संभव हुआ हैं। उसने बहुत ही अच्छी तरह से सम्हाला है उसको और उसके अंदर से हर उस विकार को निकाल कर दूर कर दिया है जिसके चलते वो किसी की कुछ सुन ही नहीं सकता था।"

"ये सब तो ठीक है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन और भी अच्छा तब हो जाए जब वो सफ़ेदपोश पकड़ा जाए। जब तक वो पकड़ में नहीं आता तब तक किसी न किसी अनहोनी अथवा अनिष्ट की आशंका बनी ही रहेगी।"

गौरी शंकर की इस बात से दादा ठाकुर फ़ौरन कुछ बोल ना सके। अलबत्ता किशोरी लाल की तरफ ज़रूर देखा उन्होंने। किशोरी लाल ख़ामोशी से बैठा बातें सुन रहा था।

"वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए हम बता देना चाहते हैं कि सफ़ेदपोश का अब हमें कोई ख़तरा नहीं है।" दादा ठाकुर ने गौरी शंकर से मुखातिब हो कर कहा____"हमारा मतलब है कि उसे कुछ समय पहले पकड़ लिया गया था।"

"क...क्या सच कह रहे हैं आप?" गौरी शंकर हैरत से बोल पड़ा____"स...सफ़ेदपोश को सच में पकड़ लिया है आपने? ये...ये कब हुआ? कैसे पकड़ा आपने उसे?"

"कुछ दिन पहले हमारे आदमियों ने उसके पकड़ लिए जाने की हमें ख़बर दी थी।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ले कर कहा____"ज़ाहिर है उसके बाद हम उससे मिले भी।"

"तो...तो क्या पता चला फिर?" गौरी शंकर ने एकदम उत्सुकता से पूछा____"कौन था वो और क्या आपने उससे पूछा कि ये सब क्यों कर रहा था वो?"

"इस बारे में तुम हमसे ना ही पूछो तो बेहतर है गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने एकाएक गंभीर हो कर कहा____"हालाकि हम जानते हैं कि तुम्हें इस बारे में ना बताना ठीक नहीं है। आख़िर अब तुम हमारे अपने ही हो किंतु यकीन मानो इस संबंध में कुछ भी बताना मानो हमारे लिए बहुत ही मुश्किल है।"

"अगर ऐसी बात है तो जाने दीजिए ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"मैं खुद भी वो सब जानने का इच्छुक नहीं हूं जिसे बताना आपके लिए मुश्किल हो। मेरे लिए तो इतना जान लेना ही जैसे बड़ी बात हो गई है कि सफ़ेदपोश पकड़ लिया गया है और अब उससे कोई ख़तरा नहीं है। सच कहूं तो मैं भी आपकी तरह सफ़ेदपोश के ना पकड़े जाने से बेहद चिंतित था। आख़िर वो वैभव का जानी दुश्मन था, उस वैभव का जिससे मेरी भतीजी प्रेम करती है और जिसके साथ उसका ब्याह होने वाला है। ख़ैर अब जबकि सब कुछ ठीक हो गया है तो मैं भी इस बात से चिंता मुक्त हो गया हूं।"

कुछ देर बाद गौरी शंकर चला गया। दादा ठाकुर अंदर ही अंदर इस बात से ग्लानि सी महसूस करने लगे थे कि उन्होंने गौरी शंकर को सफ़ेदपोश का सच नहीं बताया। इस ग्लानि के चलते उनके चेहरे पर गहन पीड़ा के भाव भी उभर आए थे।

✮✮✮✮

"कुंदनपुर किस लिए गए थे आप?" दादा ठाकुर अपने कमरे में आ कर जब पलंग पर लेट गए तो सुगंधा देवी ने पूछा____"क्या ख़ास तौर पर मेनका के भाई अवधराज से मिलने गए थे आप?"

"कई दिनों से जाने का सोच रहे थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन समय ही नहीं मिल रहा था। असल में हम वहां जा कर अवधराज से पूछना चाहते थे कि जिस मकसद से उसने अपने बहनोई को ये सब करने का पाठ पढ़ाया था उससे क्या हासिल हो गया उसे? क्या उसके पाठ पढ़ाए जाने से उसकी बहन को वो खुशियां मिलीं जिनके लिए उसके बहनोई ने उसके सिखाने पर ये सब किया था?"

"तो क्या आपने वहां जा कर सच में ये सब उससे पूछा?" सुगंधा देगी ने हैरानी से उनकी तरफ देखते हुए पूछा।

"पूछने के लिए ही तो गए थे हम।" दादा ठाकुर ने कहा____"अतः बिना पूछे कैसे वापस आ जाते?"

"बड़ी अजीब बातें कर रहे हैं आप।" सुगंधा देवी ने बेयकीनी से कहा____"ख़ैर तो आपके पूछने पर क्या कहा उसने?"

"क्या कहता?" दादा ठाकुर ने कहा____"हमें वहां देखते ही वो समझ गया था कि उसका भेद खुल चुका है हमारे सामने। उसके बाद जब हमने सबके सामने उससे ये सारे सवाल किए तो सिर झुका लिया उसने। एक बात और, इस सारे खेल में सिर्फ उसी बस का हाथ था। हमारे कहने का मतलब है कि हमारे भाई जगताप को ऐसा करने का ज्ञान देने वाला सिर्फ वही था। उसके बाकी घर वालों को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। कल जब हमने सबके सामने उससे ये सब पूछा था तो बाकी घर वाले भाड़ सा मुंह फाड़े देखते रह गए थे उसे। किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये सब होने की असल वजह क्या थी। उसके बाकी घर वाले तो यही समझते थे कि जगताप की हत्या हमसे दुश्मनी रखने वालों ने की थी। यानि साहूकार और चंद्रकांत ने। वो तो इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि अवधराज ने अपने बहनोई को क्या करने का ज्ञान दिया था। ये भी कि उसके ज्ञान देने पर हमारे भाई ने क्या क्या किया और फिर जगताप की हत्या के बाद वही सब करने का बीड़ा उनकी बहन बेटी ने उठा लिया था।"

"ये सब जानने के बाद उसके बाकी घर वालों ने क्या फिर उसे कुछ नहीं कहा?" सुगंधा देवी ने जिज्ञासा से पूछा।

"पहले तो सबके पैरों तले से ज़मीन ही सरक गई थी।" दादा ठाकुर ने कहा____"किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि हमने जो बताया वो सच है। उसके बाद उन लोगों ने अवधराज से पूछना शुरू किया। अवधराज की चुप्पी ने सबको यकीन दिला दिया। उसके बाद सबकी हालत ख़राब हो गई। बहुत बुरा भला कहा उन लोगों ने अवधराज को और वो ख़ामोशी से सिर झुकाए खड़ा रहा। पश्चाताप से जल रहा था वो। सबके सामने फूट फूट कर ये कहते हुए रो पड़ा कि उसकी वजह से आज उसकी बहन विधवा बनी बैठी है। उसी की वजह से आज ये स्थिति बन गई है।"

"बुरी नीयत से किए कर्मों का फल बुरा ही मिलता है।" सुगंधा देवी ने गहरी सांस ले कर कहा____"उसको अपने बहन और बहनोई के लिए हवेली की सारी संपत्ति और ज़मीन जायदाद चाहिए थी लेकिन मिला क्या? ख़ैर उसके बाद क्या हुआ?"

"होना क्या था?" दादा ठाकुर ने कहा____"और अब भला हो भी क्या सकता था? सब बहुत दुखी थे किंतु हम उन सबको ये कह कर आए हैं कि जब तक हमारे छोटे भाई के दोनों बच्चों की पढ़ाई चल रही है तब तक हम सच्चे दिल से और पूरी ईमानदारी से इस हवेली में रहते हुए उनके लिए वो सब करेंगे जो उनके लिए बेहतर होगा। जिस दिन दोनों बच्चों की पढ़ाई पूरी हो जाएगी उस दिन हम ये हवेली और सारी ज़मीन जायदाद उनकी बहन बेटी यानी मेनका को सौंप देंगे और हम अपने परिवार को ले कर कहीं दूसरी जगह चले जाएंगे।"

"ये...ये क्या कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा____"आपने उनसे ऐसा क्यों कहा?"

"क्योंकि हमारा छोटा भाई यही तो चाहता था और इसी चाहत में तो वो अपनी जान भी गंवा कर चला गया।" दादा ठाकुर ने सहसा दुखी हो कर कहा____"मरने के बाद भी अगर उसकी ये चाहत पूरी न हुई तो उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। इसी लिए हमने उनसे ऐसा कहा और सच कहें तो हम खुद भी यही चाहते हैं। इतना कुछ होने के बाद अब ज़रा भी किसी चीज़ का मोह नहीं रहा हमें। बस यही मन करता है कि इस सबको छोड़ कर कहीं ऐसी जगह चले जाएं जहां दूर दूर तक कोई न हो, कोई छल कपट न हो, सिर्फ शांति हो।"

"मन तो हमारा भी यही करता है ठाकुर साहब।" सुगंधा देवी ने कहा____"लेकिन फिर ये ख़याल आता है कि ऐसे में हमारे बेटे का क्या होगा? बेटे के साथ साथ उनका क्या होगा जो हमारे बेटे के जीवन में उसकी पत्नियां बन कर आने वाली हैं? अपनी तरह उन्हें भी दरबदर कर देना क्या उचित होगा?"

"हम मानते हैं कि ऐसा करना उचित नहीं होगा सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन हम ये भी जानते हैं कि वो हमारे हर फ़ैसले का सम्मान करेंगे और वही करेंगे जो हम चाहेंगे। बाकी ऊपर वाले की इच्छा।"

सुगंधा देवी कुछ कह न सकीं। मन में तरह तरह के विचारों का मानों तूफ़ान सा आ गया था। कुछ देर तक वो दादा ठाकुर को देखती रहीं उसके बाद उनके बगल में लेट गईं।

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"ये सुन कर तो बड़ी राहत महसूस हुई कि सफ़ेदपोश पकड़ लिया गया था।" फूलवती ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"लेकिन ये जान कर बड़ा अजीब लग रहा है कि दादा ठाकुर ने तुम्हें इस बारे में कुछ बताया क्यों नहीं? आख़िर ऐसी क्या वजह हो सकती है इसके पीछे?"

"हां काका।" रूपचंद्र मानों खुद को बोलने से रोक न सका____"दादा ठाकुर ने सफ़ेदपोश के बारे में भला क्यों आपको कुछ नहीं बताया? अब तो हम उनके अपने ही हैं और उनके बेटे वैभव से रूपा का ब्याह होने के बाद तो हमारा उनसे एक अटूट रिश्ता भी बन जाएगा। ऐसे में अगर वो सफ़ेदपोश के बारे में आपको बता भी देते तो क्या हो जाता?"

"शायद कोई ऐसी बात है जिसे वो बताना नहीं चाहते थे।" गौरी शंकर ने कहा____"उनकी बातों से तो यही प्रतीत हुआ था। सफ़ेदपोश के बारे में ज़िक्र होते ही वो एकदम से बेहद गंभीर और संजीदा हो गए थे।"

"बड़ी अजीब बात है।" फूलवती ने कहा____"जो रहस्यमय व्यक्ति उनके बेटे की जान का दुश्मन बना हुआ था उसके पकड़ लिए जाने की बात उन्होंने हमसे छुपाई और तुम्हारे पूछने पर उन्होंने कुछ बताया भी नहीं। क्या तुम्हें नहीं लगता कि ऐसा कर के उन्होंने कहीं न कहीं हमें ये एहसास दिला दिया है कि हम अब भी उनके लिए पराए हैं और वो अभी भी हम पर पूर्ण रूप से भरोसा नहीं करते हैं?"

"वैसे इसमें उनकी कोई ग़लती भी तो नहीं है भौजी।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"हमने जो कुछ उनके साथ किया है उसके चलते क्या आपको लगता है कि इतना जल्दी वो हम पर इस क़दर भरोसा करने लगेंगे कि वो हमें अपनी कोई बहुत ही व्यक्तिगत बातें बताने लगें?"

"मैं मानती हूं कि हम पर वो इतना जल्दी इतना ज़्यादा भरोसा नहीं कर सकते।" फूलवती ने कहा____"लेकिन सवाल है कि सफ़ेदपोश के बारे में तुम्हें बताने में क्या समस्या थी उन्हें? भला ऐसा क्या था सफ़ेदपोश में कि उन्होंने तुम्हें उसके बारे में बताया नहीं?"

गौरी शंकर ख़ुद भी जाने कितनी ही देर से इस सवाल के जवाब को सोचने समझने की कोशिश कर रहा था। जब से वो हवेली से आया था तभी से सोच रहा था लेकिन कुछ समझ नहीं आया था उसे। ये अलग बात है कि उसके मन में कई तरह की आशंकाएं उठ रहीं थी।

"सफ़ेदपोश उनके बेटे का जानी दुश्मन था गौरी।" फूलवती ने कहा____"ज़ाहिर है ऐसे व्यक्ति के पकड़े जाने से दादा ठाकुर को सफलता के साथ साथ बेहद खुशी भी हुई होगी। उनके जैसा व्यक्ति अपने सबसे बड़े ख़तरे के पकड़े जाने पर पूरे गांव वालों को ख़बर करता कि उन्होंने उस सफ़ेदपोश को पकड़ लिया है जो अब तक उनके बेटे की जान का दुश्मन बना हुआ था। इतना ही नहीं जिस तरह से सफ़ेदपोश के बारे में दूर दूर तक सबको पता था उसके चलते उसके पकड़े जाने पर भी ये बात जंगल में लगी आग की तरह हर जगह फैल जाती मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सफ़ेदपोश को उन्होंने कई दिनों पहले पकड़ लिया था और अभी तक इस बारे में गांव में किसी को पता ही नहीं चला है। क्या ये सोचने वाली बात नहीं है कि उन्होंने ऐसे ख़तरनाक व्यक्ति के बारे में सबसे क्यों छुपाया और तो और तुम्हारे पूछने पर भी उन्होंने उसके बारे में तुम्हें कुछ नहीं बताया....क्यों?"

"शायद बदनामी हो जाने की वजह से।" रूपचंद्र ने जैसे संभावना ब्यक्त की।

"किस तरह की बदनामी?" फूलवती ने चौंक कर पूछा।

"सच पता चल जाने की बदनामी।" गौरी शंकर सहसा कहीं खोए हुए से लहजे में बोल पड़ा था।

"क...क्या मतलब?" फूलवती और रूपचंद्र एक साथ चौंके।

"मुझे ऐसा लग रहा है कि सफ़ेदपोश कोई ऐसा व्यक्ति रहा होगा जिसके पकड़े जाने पर अब वो उसका सच नहीं बताना चाहते हैं।" गौरी शंकर ने अजीब भाव से कहा____"वरना ऐसे ख़तरनाक व्यक्ति के बारे में सबको बताने में उन्हें क्या आपत्ति हो सकती थी? एक बात और, उन्होंने उसके बारे में जब मुझे कुछ नहीं बताया तो यकीनन महेंद्र सिंह को भी नहीं बताया होगा।"

"ये सब तो ठीक है।" रूपचंद्र कुछ ज़्यादा ही उत्सुक और व्याकुल सा हो कर बोला____"पर अब सवाल ये है कि ऐसा वो कौन व्यक्ति रहा होगा जो सफ़ेदपोश बना हुआ था और जिसका सच पता चलने के बाद दादा ठाकुर बाकी किसी को भी उसके बारे में बताना नहीं चाहते हैं?"

"कहीं वो सफ़ेदपोश उनका अपना ही तो कोई न रहा होगा?" फूलवती ने चौंकने वाले अंदाज़ से संभावना ज़ाहिर करते हुए कहा।

"ह...हां शायद।" गौरी शंकर के मस्तिष्क में मानों बिजली चमकी____"बिल्कुल ऐसा ही हो सकता है और यकीनन यही वजह हो सकती है उनके द्वारा सफ़ेदपोश के बारे में कुछ भी न बताने की। वो शायद किसी भी सूरत में ये नहीं चाहते हैं कि किसी को उसके बारे में पता चले। शायद यही वजह है कि इतने दिनों के बाद भी किसी को सफ़ेदपोश के पकड़ लिए जाने की भनक तक नहीं लग पाई है।"

"हाय राम!" फूलवती ने आश्चर्य से आंखें फाड़ कर कहा____"मुझे तो अब यकीन सा होने लगा है कि यही बात हो सकती है। मेरा मतलब है कि वाकई में सफ़ेदपोश उनका अपना ही कोई था।"

"लेकिन कौन?" रूपचंद्र बोल पड़ा____"दादा ठाकुर के अपनों में से ऐसा वो कौन हो सकता है जो सफ़ेदपोश बना हुआ था? इससे भी बड़ा सवाल ये है कि अगर वाकई में उनका अपना ही कोई सफ़ेदपोश था तो क्यों था? आख़िर वो ये सब क्यों कर रहा था?"

"सफ़ेदपोश का संबंध दादा ठाकुर के बेटे वैभव से ही नहीं बल्कि चंद्रकांत से भी जुड़ा हुआ नज़र आया था।" गौरी शंकर ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"उसने चंद्रकांत को उसके बेटे के हत्यारे के बारे में बताया था जिसके चलते चंद्रकांत ने अपनी बहू को मार डाला था। इस मामले में दादा ठाकुर और महेंद्र सिंह दोनों ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि सफ़ेदपोश ने चंद्रकांत को उसके बेटे के हत्यारे के बारे में जो कहानी सुनाई थी वो झूठ थी। यानि सफ़ेदपोश ने अपने किसी मकसद के चलते ही ये सब किया था अथवा करवाया था। अब सवाल ये है कि सफ़ेदपोश ने चंद्रकांत को उसके बेटे के हत्यारे के बारे में झूठी कहानी सुना कर उससे अपनी ही बहू को क्यों मरवा डाला? आख़िर ऐसा कर के क्या हासिल हो गया था उसे?"

"अगर ये मान कर चलें कि सफ़ेदपोश दादा ठाकुर के अपनों में से ही कोई था।" रूपचंद्र ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"तो शायद ये समझना आसान ही है कि सफ़ेदपोश ने चंद्रकांत के साथ ऐसा क्यों किया था?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" गौरी शंकर ने आशंकित भाव से उसे देखा।

"मुझे अब समझ आ रहा है काका कि सफ़ेदपोश कौन रहा होगा।" रूपचंद्र सहसा उत्साहित भाव से बोल पड़ा____"शायद दादा ठाकुर का छोटा भाई।"

"ये...ये क्या कह रहे हो तुम?" गौरी शंकर के साथ साथ फूलवती भी बुरी तरह चौंकी।

"हां काका।" रूपचंद्र उत्साहित भाव से ही बोला____"अगर वाकई में सफ़ेदपोश दादा ठाकुर का ही कोई अपना था तो चंद्रकांत से उसका संबंध भी समझ में आ जाता है। आप लोगों ने चंद्रकांत और उसके बेटे के साथ मिल कर मझले ठाकुर यानि जगताप और दादा ठाकुर के बड़े बेटे अभिनव की हत्या की थी। दादा ठाकुर ने बदले के रूप में हमसे तो बदला ले लिया लेकिन चंद्रकांत से नहीं ले सके।"

"इस हिसाब से तो दादा ठाकुर को ही सफ़ेदपोश होना चाहिए।" गौरी शंकर ने उलझन भरे से कहा____"जगताप ठाकुर कैसे हो सकता है सफ़ेदपोश? वो तो हमारे द्वारा मार ही दिया गया था, जबकि उसके मरने के बाद भी सफ़ेदपोश देखा गया था।"

"दादा ठाकुर सफ़ेदपोश इस लिए नहीं हो सकते क्योंकि इस सारे मामले के शुरू होने से पहले किसी की हत्या नहीं हुई थी।" रूपचंद्र ने कहा____"वैसे भी छोटे ठाकुर और अभिनव की हत्या के बाद दादा ठाकुर ने बदले में जो किया वो खुले आम किया था। अगर वो सफ़ेदपोश होते तो उन्हें खुले आम ऐसा करने की क्या ज़रूरत थी? वो छुप कर भी हमारा खात्मा कर सकते थे। जबकि उन्होंने ऐसा नहीं किया, बल्कि खुले आम किया और इस चक्कर में उन्हें अपना मुखिया वाला पद भी गंवा देना पड़ा। इसी से स्पष्ट है कि सफ़ेदपोश वो नहीं बल्कि उनके भाई थे।"

"हैरत की बात है।" गौरी शंकर ने जैसे बड़ी मुश्किल से इस बात को हजम करने की कोशिश करते हुए कहा____"सबसे पहले तो सवाल यही उठता है कि जगताप ठाकुर सफ़ेदपोश क्यों बना होगा और उसने किस वजह से अपने ही बड़े भाई और उसके बेटे का दुश्मन बन गया होगा? दूसरे उसकी हत्या हो जाने के बाद भी सफ़ेदपोश कैसे देखा जाता रहा?"

"आज के युग में राम भरत जैसे भाई नहीं पाए जाते काका।" रूपचंद्र ने कहा____"आज के युग की सच्चाई ये है कि रिश्ते नातों के लिए कोई कुर्बान नहीं होता। संभव है कि छोटे ठाकुर ने सारी धन दौलत को हथिया लेने का सोचा रहा हो और इसी वजह से उन्होंने सफ़ेदपोश का रूप धारण किया रहा हो। खुल कर तो वो कुछ कर नहीं सकते थे इस लिए उन्होंने इस तरह का रास्ता अपनाया होगा। उसके बाद उनकी हत्या हो जाने के चलते सफ़ेदपोश का रूप उनके ही किसी अपने ने धारण कर लिया होगा।"

"यकीन तो नहीं हो रहा।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन जाने क्यों कहीं न कहीं तुम्हारी इन बातों पर यकीन करने का मन भी कर रहा है। बहरहाल, अगर ऐसा ही रहा होगा तो वाकई में ये बड़े ही आश्चर्य की बात है। अगर इस तरीके से सोचा जाए तो कहीं न कहीं सच में ये आभास होता है कि ऐसा ही कुछ रहा होगा। अब सवाल ये है कि अगर वाकई में सफ़ेदपोश जगताप ही था तो वो ख़ुद कैसे मौत का शिकार हो गया? क्या उसे हमारी योजनाओं के बारे में ज़रा भी भनक न लगी रही होगी? दूसरे, उसकी मौत के बाद उसकी जगह सफेदपोश कौन बना होगा?"

"उनके दोनों बेटे तो हो नहीं सकते।" रूपचंद्र ने कहा____"क्योंकि वो दोनों बेहतर शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश में हैं तो अब बचती हैं उनकी धर्म पत्नी और बेटी। कुसुम में इतना साहस और क्षमता नहीं है कि वो सफ़ेदपोश बन कर कोई ख़तरनाक काम कर सके। अब बचीं मझली ठकुराईन तो संभव है कि वो ही जगताप चाचा के बाद सफ़ेदपोश बन गईं रहीं हों।"

"क्या सच में वो सफ़ेदपोश के रूप के ऐसे ख़तरनाक काम कर सकती हैं?" फूलवती ने हैरत से देखते हुए कहा।

"जगताप की हत्या के बाद।" गौरी शंकर ने कुछ सोचते हुए कहा____"दादा ठाकुर ने हमारे अपनों का नर संघार किया था। उसके बाद मामला ठंडा सा पड़ गया था। कुछ दिनों बाद मुरारी के छोटे भाई जगन की मौत हुई और फिर रघुवीर की। जगन को तो ख़ैर वैभव ने गोली मार दी थी लेकिन रघुवीर की हत्या एक रहस्य बन गई थी जोकि अब भी बनी हुई है। रघुवीर की हत्या के बाद उसकी बीवी रजनी की हत्या उसके ही ससुर ने की और नाम जुड़ा सफ़ेदपोश का।"

"मुझे तो लगता है काका कि रघुवीर की हत्या भी सफ़ेदपोश ने ही की होगी।" रूपचंद्र ने तपाक से कहा____"अगर मझली ठकुराईन ही सफ़ेदपोश बनी होंगी तो यकीनन उन्होंने ही रघुवीर की हत्या की होगी। आख़िर उनके पति की हत्या में उसका भी तो हाथ था।"

"हां अब तो मुझे भी ऐसा ही लगता है।" गौरी शंकर ने सिर हिलाया____"लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि अगर सफ़ेदपोश के रूप में अपने पति का बदला लेने के लिए मझली ठकुराईन ने ही रघुवीर की हत्या की थी तो फिर उसने चंद्रकांत के हाथों रजनी को क्यों मरवा डाला? रजनी का तो कोई दोष ही नहीं था, बल्कि असली दोषी तो चंद्रकांत था। उसने चंद्रकांत को क्यों नहीं मार डाला?"

"शायद उसके हाथों बहू को मरवा कर वो चंद्रकांत को दुख और संताप में डुबा देना चाहती थीं।" फूलवती ने जैसे संभावना ब्यक्त की____"जैसा कि ऐसा करने के बाद वो हो भी गया था।"

"हां शायद यही हो सकता है।" गौरी शंकर ने सिर हिलाया।

"तो इसका मतलब ये हुआ कि अब हम जान चुके हैं कि सफ़ेदपोश कौन था?" रूपचंद्र ने कहा____"और क्यों उसके पकड़ लिए जाने की बात दादा ठाकुर ने आपसे ही नहीं बल्कि हर किसी से छिपाई? यानि वो नहीं चाहते कि किसी को उनके घर की इतनी बड़ी हैरतअंगेज
बात पता चले?"

"हां शायद इसी लिए उन्होंने मुझे इस बारे में नहीं बताया।" गौरी शंकर को जैसे अब पूर्ण रूप से मान लेना पड़ा। वो मन ही मन इस रहस्योद्घाटन से बड़ा चकित था____"ख़ैर जो भी हो लेकिन अब हमें भी इस बात को अपने तक ही रखना चाहिए। हमारी बेटी उनकी होने वाली बहू है। आने वाले समय में वो भी उन्हीं के परिवार का हिस्सा बन जाएगी। अतः इस संगीन बात को छुपा के रखना ही बेहतर होगा। मैं नहीं चाहता कि इससे उसकी आने वाली पीढ़ियों पर कोई असर हो।"

"हां सही कहा तुमने।" फूलवती ने कहा____"जो हो गया उसे भुला देना ही बेहतर है। हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि आज दादा ठाकुर की वजह से ही हमारी बेटियों का ब्याह होने वाला है और लोगों के बीच हम सर उठा कर चलने के क़ाबिल बने हैं।"




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अध्याय - 150
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दिन ऐसे ही गुज़रने लगे।
गांव में अस्पताल और विद्यालय का निर्माण कार्य अच्छे तरीके से चलता रहा। गांव के लोग इस सबसे बड़ा खुश और उत्साहित थे। हर तरफ इसी की चर्चा होती थी। मैं और रूपचंद्र निर्माण कार्य की देख रेख में लगे हुए थे। ठंड अब ज़्यादा ही होने लगी थी जिसकी वजह से धूप अब कम ही देखने को मिलती थी। हर तरफ धुंध सी छाई रहती थी। काम करने वालों को तो मेहनत करने से गर्मी मिलती थी जिसकी वजह से उन्हें मज़ा आता था लेकिन जो बैठे हुए सिर्फ देखने वाले थे उन्हें ठंड कंपाने लगी थी।

रूपचंद्र के द्वारा ही मुझे पता चल गया था कि उसके घर में उसके बड़े ताऊ की लड़कियों के ब्याह की तैयारियां होने लगीं हैं। उसकी बहनों के ससुराल वालों ने ब्याह की लग्न बनवा ली थी और सवा महीने बाद शादी होनी थी। दोनों बहनें एक ही घर में ब्याही जाने वाली थीं इस लिए ज़्यादा परेशानी की बात नहीं थी। इस बीच रूपचंद्र के बहुत ज़ोर देने पर मैं एक दो बार उसके घर भी गया। उसके घर वालों ने बहुत ही अच्छे ढंग से मेरा स्वागत सत्कार किया था। रूपा ने भी छुप कर मुझे देखा था।

इधर हवेली में भी अब सामान्य हालात थे। मेनका चाची सबके सामने पहले की ही तरह खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश करती रहती थीं। मां भी उनसे तरीके से ही बातें करती थीं। कुसुम तो भोली और मासूम थी, अतः जल्दी ही वो अपने रंग में आ गई थी और पहले की ही तरह अपनी चंचलता से सबका मन मोहती रहती थी।

मैं भी सबके बीच सामान्य ही था। एक तरफ रूपा के प्रति प्रेम उमड़ रहा था जिसके चलते मन में कई तरह के मीठे ख़याल उभरने लगते थे तो वहीं दूसरी तरफ अनुराधा का ख़याल आते ही दिल में एक टीस सी उभर आती थी। मैं हर रोज़ उसके विदाई स्थल पर जाता था और कुछ देर वहां बैठ कर उसकी यादों में खो जाता था। वहीं से सरोज काकी से मिलने जाता और फिर उसका हाल चाल ले कर खेतों की तरफ निकल जाता। रात को जब खा पी कर अपने कमरे में सोने आता तो मन देर रात तक जाने कहां कहां भटकता रहता और मैं जाने कैसे कैसे ख़यालों में खोता रहता था।

रागिनी भाभी के बारे में जब भी ख़याल आता तो मेरे जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ जाती थी। ना चाहते हुए भी मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ये नियति का कैसा खेल है कि जिस भाभी के प्रति मेरे अंदर सिर्फ आदर और सम्मान की ही भावना है उनके साथ नियति मेरा ब्याह करवाने पर तुल गई है। इसमें कोई शक नहीं कि उनके बेहतर जीवन के लिए सबने जो फ़ैसला किया था वो अपनी जगह सर्वथा उचित था लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इस रिश्ते के प्रति मन में अब भी अजीब से ख़याल उभरते थे।

मैं तो रूपा की सहमति पर भाभी से ब्याह करने को राज़ी हो गया था लेकिन अक्सर सोचता था कि क्या भाभी इस रिश्ते को दिल से स्वीकार करेंगी? मैं जानता था कि अंततः उन्हें भी इस रिश्ते को स्वीकार करना ही पड़ेगा लेकिन मैं ये भी सोचता था कि उनका राज़ी होना एक मज़बूरी ही होगी। यानि दिल से वो यही चाहती हैं कि उनका मुझसे ब्याह न हो।

अजीब से हालात हो गए थे। अजीब सी दुविधा हो गई थी। अजीब से धर्म संकट में फंस गए थे हम दोनों। कुछ दिनों से मेरा बहुत मन कर रहा था भाभी से मिलने का और उनसे इस बारे में बात करने का लेकिन फिर ये सोच कर हिम्मत जवाब दे जाती थी कि आख़िर कैसे नज़र मिला सकूंगा उनसे? मुझे अपने पास आया देख कर कहीं वो मेरे बारे में ग़लत न सोच बैठें। कहीं वो ये न सोच बैठें कि मेरे मन में पहले से ही उनके बारे में ग़लत सोच थी और मैं पहले से ही ये सब चाहता था। जबकि सच तो यही था कि मेरे मन में आज से पहले कभी उनके बारे में ऐसा कुछ भी नहीं था। मैं ये मानता हूं कि एक वक्त था जब मैं उनके रूप सौंदर्य से सम्मोहित हो कर उनकी तरफ आकर्षित हो जाया करता था लेकिन इसमें मेरा क्या दोष था? एक तो मेरा चरित्र ही ऐसा था और दूसरे वो थीं ही इतनी सुंदर कि कोई भी उनकी तरफ आकर्षित हुए बग़ैर नहीं रह सकता था।

मैं जानना चाहता था कि भाभी इस बारे में क्या फ़ैसला करती हैं और ख़ास कर इस बारे में क्या सोचती हैं? कभी कभी मैं खुद को अपराधी सा महसूस करने लगता था। मैं अपनी भाभी को बताना चाहता था कि मेरे मन में ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आज है। हम दोनों के घर वालों ने भले ही हमारा आपस में विवाह कर देने का फ़ैसला ले लिया है लेकिन इसके बावजूद मैं उनके बारे में ग़लत नहीं सोच सकता हूं। मैं उन्हें बताना चाहता था कि मेरे दिल में आज भी उनके प्रति वैसी ही मान सम्मान की भावना मौजूद है जैसे हमेशा से थी। मेरा उनसे ब्याह होना बस नियति की ही मर्ज़ी थी, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है। इस लिए भगवान के लिए वो इस संबंध के चलते मेरे बारे में ऐसा वैसा कुछ भी ना सोचें।

मैं कुछ दिनों से इस सबके बारे में इतना सोचने लगा था कि मेरी हालत अब अजीब सी हो गई थी। मैं बहुत ज़्यादा परेशान, चिंतित और बेचैन रहने लगा था। इस बात को मेरे घर वालों ने भी महसूस किया। मां ने तो एक दिन मुझसे पूछा भी लेकिन मैंने ये सोच कर उन्हें कुछ नहीं बताया कि बेवजह ही वो परेशान और चिंतित हो जाएंगी। हालाकि वो मेरे ना बताने पर भी फिक्रमंद हो उठीं थीं, और फिर एक दिन।

"क्या बात है बेटा?" मेरे कमरे में आ कर मां ने पूछा____"कई दिनों से देख रही हूं तुझे। तू कुछ परेशान और गुमसुम सा नज़र आने लगा है। आख़िर ऐसी कौन सी बात है जिसके चलते तेरी ये हालत हो गई है? मैंने दो दिन पहले भी तुझसे पूछा था लेकिन तूने कुछ नहीं बताया। आख़िर बात क्या है मेरे लाल? क्या अपनी मां को नहीं बताएगा? क्या तू चाहता है कि तेरी मां तुझे ऐसी हालत में देख कर चिंतित हो उठे और दुखी हो जाए?"

"नहीं मां।" मैंने अधीरता से कहा____"मैं ये सपने में भी नहीं चाह सकता कि आप किसी बात से दुखी हो जाएं।"

"तो फिर बता ना बेटा।" मां ने अधीर हो कर कहा____"आख़िर किस बात से तू इतना परेशान दिखने लगा है? कौन सी ऐसी बात है जो तुझे अंदर ही अंदर परेशान किए हुए है? क्या अनुराधा की वजह से तेरी ये हालत है?"

"नहीं मां।" मैंने कहा____"उसकी वजह से नहीं है। उससे तो मैं रोज़ ही मिलता हूं और अपने दिल की बातें भी उसे बताता हूं। मेरी परेशानी कुछ और है मां।"

"तो बता ना बेटा।" मां एकदम व्याकुल सी हो कर बोलीं____"कौन सी परेशानी हो गई है मेरे बेटे को?"

"रागिनी भाभी।" मैंने गंभीरता से कहा____"हां मां, भाभी की वजह से परेशान रहता हूं आज कल।"

"उसकी वजह से?" मां एकदम से चौंकी____"पर उसकी वजह से क्यों बेटा? कहीं तू इस वजह से तो नहीं परेशान है कि हम उससे तेरा ब्याह करवा देना चाहते हैं?"

"नहीं मां, ऐसी बात नहीं है।" मैंने कहा___"बात ये है कि इस रिश्ते के संबंध में वो क्या सोचती होंगी? इससे भी बढ़ कर मेरे बारे में क्या सोचती होंगी?"

"वो क्या सोचेगी?" मां ने कहा____"यही ना कि ये कैसी किस्मत है कि उसे अपने देवर से ब्याह करना पड़ रहा है? मैं मानती हूं बेटा कि उसके लिए भी इस रिश्ते को स्वीकार करना आसान नहीं होगा लेकिन ये भी तो सच ही है कि ऐसा हम इसी लिए करना चाहते हैं क्योंकि इसी में उसका भला है। इसी में उसका जीवन संवर सकता है और वो अपने जीवन में खुश रह सकेगी। तू इस बारे में ज़्यादा मत सोच। मैं मानती हूं कि ये रिश्ता शुरू शुरू में अजीब लगेगा लेकिन बाद में तुम दोनों इस रिश्ते को दिल से अपना कर एक दूसरे से प्रेम करने लगोगे।"

"ये सब तो बाद की बातें हैं मां।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"लेकिन इस वक्त मेरी परेशानी ये है कि मैं खुद को उनका अपराधी सा महसूस करता हूं। मेरे चरित्र के बारे में तो उन्हें भी पता रहा है। ऐसे में अब जब उनसे ब्याह करने का फ़ैसला हो गया तो कहीं न कहीं वो मेरे बारे में ये भी सोचेंगी कि मैं शुरू से ही उनके बारे में ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा और अब जब उनसे ब्याह करने की बात हुई तो मैंने झट से इस रिश्ते को क़बूल कर लिया।"

"ऐसा कुछ भी नहीं है बेटा।" मां ने मेरे बाएं गाल को प्यार से सहलाते हुए कहा____"तू बेवजह ही ये सब सोच कर खुद को दुखी कर रहा है। तू भी जानता है कि तेरी भाभी ने तुझे कभी ग़लत नहीं समझा है। अगर वो तुझे ग़लत समझती तो वो कभी एक पल के लिए भी तेरा पक्ष न लेती और ना ही तुझे एक अच्छा इंसान बनने के लिए तुझ पर ज़ोर डालती। इतना ही नहीं, तेरे साथ कभी वो खेतों पर घूमने भी न जाती। उसे तेरे चरित्र का भले ही पता था लेकिन उसे तुझ पर भरोसा भी था कि तू उसके प्रति कभी ग़लत नहीं सोच सकता है। इसी लिए तो वो तुझे इतना मानती थी और तेरे हर दुख में तेरी ही तरह वो भी दुखी हो जाती थी। जब तेरा बड़ा भाई गुज़रा तो वो सदमे में चली गई थी। हम सबने पूरी कोशिश की थी उसको दुख से उबारने की लेकिन तेरी वजह से वो अपने उस असहनीय दुख से उबर गई। वो अक्सर मुझसे कहती थी कि अगर वैभव जैसा उसका देवर न होता तो आज वो अपने दुख से बाहर न निकल पाती। वो ये भी कहा करती थी कि उसे गर्व है कि ईश्वर ने उसे वैभव जैसा देवर दिया है जो उसके चेहरे पर खुशी लाने के लिए कुछ भी कर सकता है। ये सारी बातें यही ज़ाहिर करती हैं मेरे बेटे कि वो कभी तेरे बारे में ग़लत नहीं सोच सकती। तेरे साथ उसके ब्याह होने वाली बात से भी वो यही सोचती होगी कि इसमें तेरा कोई दोष नहीं है। जो भी हो रहा है उसमें सबसे ज़्यादा क़िस्मत का हाथ है। इस लिए तू ये सब फ़िज़ूल की बातें सोच कर ख़ुद को दुखी मत रख।"

"क्या मैं एक बार भाभी से मिल आऊं?" मैंने धड़कते दिल से मां को देखते हुए उनसे पूछा____"मैं मानता हूं कि मेरा अब उनसे मिलना उचित नहीं होगा लेकिन फिर भी मैं एक बार उनसे मिलना चाहता हूं। उनके सामने घुटनों पर बैठ कर उनसे कहना चाहता हूं कि मेरे मन में उनके प्रति ना पहले कभी कोई ग़लत भावना थी और ना ही आगे कभी हो सकती है। इस रिश्ते के बाद भी उनके प्रति मेरे दिल में वैसी ही मान सम्मान की भावना रहेगी जैसे हमेशा से रही है।"

मेरी बातें सुन कर मां की आंखें भर आईं और अगले ही पल उनकी आंखों से आंसू के कतरे छलक पड़े। उन्होंने लपक कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया। मैं भी किसी छोटे से बच्चे की तरह उनसे छुपक गया। एक असीम सुख और शांति का एहसास हुआ मुझे।

"मैं जानती हूं कि तेरे मन में रागिनी के प्रति बहुत ही ज़्यादा आदर और श्रद्धा जैसा भाव है।" मां ने मुझे खुद से छुपकाए हुए ही कहा____"और सच कहूं तो मुझे इस बात के लिए तुझ पर गर्व है। ख़ैर, तू अपनी भाभी से मिलना चाहता है ना तो ठीक है। मैं आज ही तेरे पिता जी से इस बारे में बात करूंगी और उन्हें समझाऊंगी कि वो इसके लिए तुझे चंदनपुर जाने की अनुमति दे दें।"

"ओह! मां।" मैंने खुशी से उन्हें जोरों से कस लिया____"आपका बहुत बहुत धन्यवाद मां। मैं बता नहीं सकता कि आपके मुख से ये सुन कर मुझे कितना सुकून मिला है।"

"मां को धन्यवाद करता है पागल।" मां ने मुझे खुद से अलग कर के कहा____"अरे! मां तो होती ही है अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर गुज़रने के लिए। ख़ैर अब तू आराम कर और इस बारे में अब कुछ भी सोच कर खुद को परेशान मत कर। चल अब जाती हूं मैं।"

मां ने मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और फिर वो कमरे से चली गईं। इतने दिनों से जिन बातों को सोचते हुए मैं परेशान था वो अब मानों किसी जादू के जैसे छू मंतर हो गईं लगने लगीं थी। मेरा मन अब बहुत हल्का महसूस हो रहा था।

✮✮✮✮

"अरे! शालिनी तू कब आई अपनी ससुराल से?" रागिनी अपनी बचपन की सहेली को अपनी तरफ आते देख एकदम से चौंकी थी।

घर के पीछे कुछ खाली जगह थी जिसे चारो तरफ से लकड़ी की ऊंची दीवार बना कर घेरा हुआ था। उस खाली जगह में एक तरफ कुवां था और दूसरी तरफ कुछ पेड़ पौधे लगे हुए थे जिनमें से कुछ अमरूद के, कुछ कटहल के और एक दो केले के पेड़ थे। रागिनी खाली समय में ज़्यादातर यहीं आ कर बैठ जाया करती थी। गांव में किसी के घर जाना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था। एक शालिनी ही थी जिसके घर वो चली जाया करती थी किंतु उसकी शादी के बाद वहां भी जाना बंद हो गया था। अपने चाचा जी के घर भी चली जाती थी जहां पर वो अपनी भाभियों के पास थोड़ा समय गुज़ार लेती थी।

"आज ही आई हूं।" शालिनी ने उसके क़रीब आ कर कहा____"तेरे बारे में मां ने बताया तो तुझसे मिलने चली आई। सच कहूं तो तेरे बारे में जब वो सब सुना था तो बहुत दुख हुआ था मुझे। यकीन ही नहीं हुआ था कि मेरी इतनी अच्छी सहेली के साथ ऊपर वाला इस तरह का अन्याय कर सकता है।"

"सब किस्मत की बातें हैं शालिनी।" रागिनी ने फीकी सी मुस्कान होठों पर सजा कर कहा____"ख़ैर तू बता, कैसी है तू और जीजा जी कैसे हैं?"

"मैं ठीक हूं और तेरे जीजा जी भी ठीक हैं।" शालिनी ने कहा____"मुझे वंदना भाभी ने बताया कि तेरा फिर से ब्याह करने का फ़ैसला किया है चाचा जी ने?"

शालिनी की इस बात पर रागिनी कुछ बोल ना सकी। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नज़र आए। शालिनी ग़ौर से उसको देखने लगी थी।

"उन्होंने बताया कि तेरा ब्याह तेरे ही देवर से करने का फ़ैसला किया है।" शालिनी ने आगे कहा____"मैं तो उनके मुख से ये सब सुन कर हैरान ही हो गई थी। वैसे सच कहूं तो मुझे तेरा फिर से ब्याह होने की बात सुन कर बहुत खुशी हुई है। ऊपर वाले से यही प्रार्थना करती थी कि मेरी सहेली के जीवन को फिर से खुशियों से भरने का कोई इंतज़ाम कर दो और देखो ऊपर वाले ने मेरी प्रार्थना सुन ली। बस यही जान कर थोड़ी हैरानी हुई कि तेरा ब्याह तेरे ही देवर से करने का फ़ैसला किया चाचा जी ने।"

"पता नहीं ऊपर वाला मुझसे क्या चाहता है शालिनी?" रागिनी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"जो कुछ मैंने सपने में भी नहीं सोचा था वही सब मेरे साथ करता जा रहा है वो। समझ में नहीं आ रहा अपनी ऐसी किस्मत पर रोऊं या खुश होऊं?"

"अरे! ऐसा क्यों कह रही है तू?" शालिनी ने हैरानी से उसे देखते हुए कहा____"मैं मानती हूं कि ऊपर वाले ने इसके पहले तेरे साथ जो किया था वो बहुत ही ग़लत और दुखदाई था लेकिन ये तो बहुत ही अच्छी बात है कि तेरा फिर से ब्याह हो जाएगा और तेरा दुखों से भरा ये जीवन फिर से खुशियों से भर जाएगा।"

"कहना बहुत आसान होता है शालिनी।" रागिनी ने उदास भाव से कहा____"लेकिन अमल करना बहुत मुश्किल होता है। अपने ही देवर को अब पति की नज़र से देखना अथवा सोचना बहुत ही अजीब सी अनुभूति कराता है मुझे।"

"हां मैं समझती हूं इस बात को।" शालिनी ने सिर हिलाते हुए कहा____"समझ सकती हूं कि इस बारे में तेरे मन में जाने कैसे कैसे ख़याल उभरते होंगे लेकिन मैं तुझसे यही कहूंगी कि देवर से ब्याह करने का मामला कोई नया नहीं है। दुनिया में अक्सर परिस्थितियों को देख कर लोगों ने ऐसे निर्णय लिए हैं। तुझे भी इस बात को समझना चाहिए और फ़िज़ूल की बातें अपने मन से निकाल कर सिर्फ अपने जीवन के बारे में सोचना चाहिए। ऊपर वाले की कृपा से तुझे इतना अच्छा ससुराल मिला है। अपनी बेटी की तरह प्यार करने वाले इतने अच्छे सास ससुर मिले हैं और सबसे बड़ी बात तेरा भला चाहते हुए तेरे जीवन को फिर से संवारने के लिए वो तेरा फिर से ब्याह कर देना चाहते हैं। सबके नसीब में ऐसे इंसान नहीं होते रागिनी जो अपनी बहू के लिए इतना कुछ सोचें और करने लगें। क्या हुआ अगर देवर से ब्याह हो जाएगा तेरा? शुरू शुरू में ज़रूर अजीब लगेगा लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। मुझे तो इस बात का भी यकीन है कि आगे चल कर तू खुद अपने देवर के साथ ब्याह हो जाने की बात से यही सोचने लगेगी कि ये अच्छा ही हुआ।"

"मतलब तुझे भी लगता है कि मेरा अपने देवर के साथ ब्याह हो जाने की बात हर तरह से उचित है?" रागिनी ने शालिनी की तरफ ध्यान से देखते हुए कहा।

"हां बिल्कुल।" शालिनी ने स्पष्ट भाव से कहा____"तेरे भले के लिए वो जो भी कर रहे हैं एकदम सही कर रहे हैं। तुझे भी बेकार की बातें नहीं सोचनी चाहिए और इस रिश्ते के लिए राज़ी हो जाना चाहिए। अपने ही पैरों से अपनी अच्छी किस्मत को ठोकर मत मार।"

रागिनी अपलक देखती रह गई शालिनी को। उसे समझ ही न आया कि अब क्या कहे? दिलो दिमाग़ में एकाएक ही हलचल सी मच गई थी।

"अच्छा ये तो बता मेरे होने वाले जीजा जी अभी भी वैसे ही हैं क्या?" शालिनी ने सहसा मुस्कुराते हुए पूछा____"या अब बदल गए हैं वो? और हां, इस रिश्ते के बारे में उनका क्या ख़याल है?"

रागिनी को समझ ना आया कि वो अपनी सहेली से वैभव के बारे में क्या बताए? शालिनी के मुख से होने वाले जीजा जी सुन कर ही उसके समूचे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई थी। मन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभरने लगे थे।

"क्या हुआ?" उसे कुछ न बोलता देख शालिनी ने जैसे उसे ख़यालों से बाहर खींचा____"चुप क्यों हो गई तू? बता ना मेरे होने वाले जीजा जी के बारे में?"

"व...वो अब पहले से बदल गए हैं।" रागिनी ने झिझकते हुए बड़ी मुश्किल से कहा।

"हाय राम! क्या सच में?" शालिनी ने आश्चर्य से आंखें फैला कर रागिनी को देखा____"बड़े आश्चर्य की बात है ये। क्या वो सच में बदल गए हैं?"

रागिनी अजीब सा महसूस करने लगी थी। शालिनी के पूछने पर उसने सिर्फ हां में सिर हिला दिया। ये देख शालिनी को फिर से हैरानी हुई। उसकी आंखों के सामने वैभव का चेहरा चमक उठा और साथ ही गुज़रे समय की यादें भी।

(दोस्तो, ये वही शालिनी है जिसके बारे में वैभव ने अपनी भाभी से उस समय मज़ाक करते हुए ज़िक्र किया था जब वो अपनी भाभी को ले कर उनके मायके चंदनपुर जा रहा था।)

"क्या हुआ?" शालिनी को कहीं खो सा गया देख रागिनी ने उसे देखते हुए पूछा____"अब तू कहां खो गई?"

"व...वो मैं न।" शालिनी एकदम से हड़बड़ा गई। फिर जल्दी से खुद को सम्हालते हुए बोली____"अरे! मैं तो ये सोचने लगी थी कि क्या सच में मेरे होने वाले जीजा जी बदल गए हैं? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा।"

"क्यों नहीं हो रहा भला?" रागिनी को जाने क्यों उसकी बात से बुरा महसूस हुआ जिसके चलते उसने सहसा उसे घूरते हुए कहा____"और हां मुझे पता है कि तू भी उनसे नैन मटक्का कर चुकी है।"

"अ....अरे! ये...ये क्या कह रही है तू?" शालिनी ने बुरी तरह हड़बड़ाते हुए रागिनी को हैरत से देखा____"मेरा उनसे इस तरह का कोई चक्कर नहीं था। पता नहीं क्यों ऐसा बोल रही है तू?"

"मैं ऐसा इस लिए कह रही हूं क्योंकि मुझे उन्होंने ही बताया था जिनसे तेरा नैन मटक्का चला था।" रागिनी ने कहा____"और इतना तो मैं समझती ही हूं कि इस मामले में वो महाशय कितने पहुंचे हुए थे। अगर उन्होंने तेरा ज़िक्र किया था तो मेरे लिए ये यकीन कर लेना सहज ही था कि तेरा उनसे चक्कर था।"

शालिनी भौचक्की सी देखती रह गई रागिनी को। एकदम से ही वो नज़रें चुराने लगी थी। फिर उसने अपनी हालत को काबू किया और चेहरे पर खुशी के भाव लाते हुए कहा____"हां यार, मेरा उनसे चक्कर चल गया था लेकिन यकीन कर बस थोड़ा सा ही चल पाया था। बात इतनी भी नहीं बढ़ी थी कि हमारे बीच कुछ ग़लत हो जाता।"

रागिनी को याद आया कि वैभव ने भी उससे ऐसा ही कुछ कहा था। शालिनी के आख़िरी वाक्य से जाने क्यों रागिनी को राहत सी महसूस हुई।

"ख़ैर ये सब छोड़।" शालिनी ने एकदम सामान्य भाव से कहा____"और ये तो बता कि मेरे होने वाले जीजा जी क्या सच में ही बदल गए हैं?"

"तू तो ऐसे कह रही है जैसे वो कभी बदल ही नहीं सकते थे?" रागिनी को फिर से बुरा लगा, इस लिए उसने उसे घूरा____"वैसे भी उन्होंने कोई क़सम तो खाई नहीं थी कि वो कभी बदलेंगे ही नहीं।"

"हां ये तो है।" शालिनी ने कहा____"लेकिन मैं ये जानने को उत्सुक हूं कि वो बदल कैसे गए और बदले भी हैं तो कितना बदले हैं? क्या एकदम से शरीफ़ ही बन गए हैं वो?"

"हां कुछ ऐसा ही है।" रागिनी के ज़हन में गुज़रे समय की ढेर सारी बातें जैसे चमक उठीं और साथ ही आंखों के सामने ढेर सारी तस्वीरें भी।

"कुछ ऐसा ही है का क्या मतलब है?" शालिनी जैसे बाल की खाल निकालने पर उतारू हो गई____"जो इंसान हमेशा मौज मस्ती करता था और भी ना जाने क्या क्या करता था वो अचानक से शरीफ़ कैसे बन गया?"

"इसके जवाब में बस इतना ही कहूंगी कि हर इंसान वक्त के साथ बदल जाता है।" रागिनी ने थोड़ा बेचैन भाव से कहा____"जीवन में कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं जिसके चलते इंसान को खुद पर बदलाव करना पड़ता है।"

"हां ये तो तू सही कह रही है।" शालिनी ने सिर हिलाते हुए कहा____"वैसे उनका इस तरह से बदल जाना तेरे हिसाब से ठीक है या नहीं?"

"ठीक ही है।" रागिनी ने कहा____"अगर कोई अच्छा इंसान बन जाए और अच्छे अच्छे कर्म करने लगे तो भला इससे अच्छा क्या हो सकता है?"

"यानि मेरे होने वाले जीजा जी अब अच्छे इंसान बन गए हैं।" शालिनी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"और अब अच्छे अच्छे काम करने लगे हैं। ये तो कमाल ही हो गया रागिनी। कहीं ऐसा तो नहीं कि वो तुम्हारे लिए अच्छे बन गए हैं? आख़िर अब तुमसे ब्याह जो होना है उनका।"

"क्या फ़ालतू की बातें कर रही है तू?" रागिनी थोड़ा उखड़ कर बोली____"बिना मतलब कहीं की बात कहीं जोड़े जा रही है तू।"

"अरे! तू गुस्सा क्यों हो रही है?" शालिनी ने हैरानी ज़ाहिर की____"मैंने तो वही कहा है जो मुझे लगा। अब अगर ऐसा नहीं है तो तू ही बता कि उनके इस तरह बदल जाने की क्या वजह है?"

"मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती।" रागिनी ने स्पष्ट भाव से कहा____"तू कोई और बात कर।"

"अच्छा ठीक है।" शालिनी को महसूस हुआ कि रागिनी शायद उसकी बातों से चिढ़ रही है इस लिए कोई और बात करने का ही उसने सोचा____"और बता, यहां कैसा लग रहा है तुझे? मेरा मतलब है कि ससुराल से आए क़रीब ढाई महीने हो गए हैं तुझे तो क्या तुझे अपने ससुराल वालों की याद नहीं आती?"

"आती है।" रागिनी ने सहसा उदास हो कर कहा____"लेकिन अब वहां जा ही नहीं सकती। मेरे सास ससुर और मेरे माता पिता ने अचानक से मेरे सामने ये रिश्ता जो रख दिया है।"

"उन्होंने ये तेरे भले के लिए ही किया है रागिनी।" शालिनी ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"आज भले ही तुझे ये रिश्ता अजीब और बेमन सा लग रहा है लेकिन यकीन मान आगे चल कर इसी रिश्ते से तुझे लगाव हो जाएगा। ख़ैर अपने लिए न सही अपने घर और ससुराल वालों की खुशी के लिए इस रिश्ते के लिए हां कह दे।"

"वो तो कहना ही पड़ेगा मुझे।" रागिनी ने कहा____"इतने दिनों से खुद को इस रिश्ते के लिए ही तो समझा रही हूं। सबके बारे में ही तो सोच रही हूं। ख़ास कर अपने सास ससुर के बारे में। मैं भी जानती हूं कि ऊपर वाले ने मुझे दुनिया के सबसे अच्छे सास ससुर दिए हैं जो मुझे अपनी बेटी मान कर मुझे बहुत प्यार और स्नेह देते हैं। मैं इस रिश्ते को ना कह कर उनकी पवित्र भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा सकती।"

"चल यही सही।" शालिनी के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई____"यही सोच के अब तू इस रिश्ते के लिए हां कह दे। तुझे शायद अंदाज़ा भी नहीं है कि सब तेरे हां कहने का कितनी शिद्दत से इंतज़ार कर रहे हैं और साथ ही तेरे लिए बहुत ज़्यादा फिक्रमंद भी हैं।"

"हां जानती हूं मैं।" रागिनी ने सिर हिलाया।

"तो मैं जा कर वंदना भाभी को बता दूं कि तूने इस रिश्ते के लिए हां कह दिया है?" शालिनी ने खुशी से पूछा।

"न..नहीं नहीं रुक जा ना।" रागिनी एकदम से हड़बड़ा कर बोल पड़ी।

"अब किस बात के लिए रुक जाऊं?" शालिनी ने भौंहें उठा कर देखा उसे____"जो कहना है उसे साफ शब्दों में जल्द से जल्द कह देना चाहिए। बेवजह समय बर्बाद करना अच्छा नहीं होता, समझी।"

रागिनी को समझ ना आया कि क्या कहे? अवाक सी देखती रह गई शालिनी को। उसकी धड़कनें एकदम से तेज़ तेज़ चलने लगीं थी। दिलो दिमाग़ में हलचल सी मच गई थी।

"चल अब यहां से।" शालिनी ने उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए कहा____"हर वक्त अकेले में फ़ालतू की बातें मत सोचा कर। खुशियां खुद चल कर तेरे क़दमों के पास आईं हैं तो उन्हें फ़ौरन अपनी झोली में भर ले।"

रागिनी बदहवास सी उसके साथ खिंचती चली गई। उसकी धड़कनें अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं थी। गोरे चेहरे पर लाज की सुर्खी भी छाने लगी थी। कदाचित ये सोच कर कि उसकी सहेली अभी कुछ ही पलों में वंदना भाभी को बता देगी कि वो वैभव से ब्याह करने के लिए राज़ी हो गई है।

रागिनी को ये सोच कर बड़ा अजीब सा लगने लगा कि जाने क्या सोचेंगे अब उसके माता पिता और भैया भाभी और साथ ही उसकी छोटी बहन भी। कहीं वो सब उसके बारे में कुछ ऊटपटांग तो नहीं सोच बैठेंगे? रागिनी का चेहरा इस एहसास के चलते ही लाज से सुर्ख पड़ता चला गया।





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ठाकुर साहब ने मेनका के भाई की करतूतों को उनके घरवालों के सामने बता कर बहुत ही अच्छा किया है अवधराज को भी एहसास होना चाहिए कि उसकी वजह से उसकी बहन विधवा हो गई साथ ही उसका परिवार भी बिखर गया उसके कारण उसके जीजा और बहन ने बहुत ही बड़ा गुनाह किया है
ठाकुर साहब सच को छुपाने का बहुत प्रयास कर रहे हैं लेकिन वे सच नही छुपा पा रहे हैं किसी ने सही कहा है सच ज्यादा देर तक छुप नही सकता है साथ ही उन्हें अपनो को ना बताने का दुःख भी है
रागिनी वैभव से शादी करने के लिए मान गई है
 
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