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Samar_Singh

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parkas

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UPDATE 16

NOW ACTION TIME

भूमि पूजन के साथ दावत खतम कर शायरी की बारी आई जिसमे सभी गांव वालो को खूब हसाया और एक लम्हे ने सबको भावुक भी कर दिया एसे माहोल में जब गीता देवी और संध्या आसू पोंछ के राज को दिलासा दे रहे थे वही दूर पेड़ की आड़ में छिपा अभय अपने आसू बहा रहा था तभी

सत्या बाबू – (राज और उसके दोस्तो से) बहुत ही अच्छी शायरी सुनाई मजा आगया आओ इसी बात पे मेरी तरफ से तुम तीनो के लिए कुछ लाया हू मैं, जल्दी से आसू पोछो और चलो मेरे साथ

तीनों दोस्त सत्या बाबू के साथ चले गए

संध्या – (गीता देवी से) दीदी वो अभय...

गीता देवी –(बीच में टोकते हुए) हा जानती हू वो पेड़ के छिप के आसू बहा रहा है , एसा कर संध्या अभी तू जा रात के 10 बज रहे है अंधेरा भी अच्छा खासा हो गया है मै अभय को देखती हू

अपना मन मार कर गीता देवी की बात मान के संध्या निकल गई हवेली की ओर जबकि इस तरफ अभय..

अभय –(अपने आसू पोंछ रहा था तभी उसे किसी का कॉल आया बिना नंबर देखे कॉल उठा के) कॉन है

सामने से – आज आराम थोड़ा देर से करना क्योंकि वक्त आगया है हमारा सौदा पूरा करने का उसके बाद तू आजाद है

अभय – फिर से खेल रहे हो मेरे साथ

सामने से – नही अभय इस बार कोई खेल नहीं , बाकी की बात मिल के होगी

अभय – बस इतना बताओ कहा मिलेंगे वो लोग

सामने से – डिटेल सेंड कर दी है तुम्हे त्यार हो के जाना हेवी पार्टी होगी (कॉल कट)

अभय – हेलो हेलो...

तभी पीछे से किसी ने अभय के कंधे पे हाथ रखा अभय ने पलट के देखा तो सामने गीता देवी खड़ी थी

अभय –(सामने बड़ी मां को देख के) बड़ी मां आप

गीता देवी –(अपने हाथ से अभय के आसू साफ करके) देखा ना तूने ये तीनों भी तेरी ही राह देख रहे है चला जा बेटा और बता दे इनको

अभय –हा बड़ी मां देखा मैने बस आज की रात गुजार जाय मैं वादा करता हू कल मेरे दोस्त मिलेंगे अभय से इसके बाद आप देखना राज फिर से शायरी लिखेगा दोस्ती पे

गीता देवी – (मुस्कुरा के) जैसा तुझे अच्छा लगे बेटा चल तू भी आराम कर जाके कल कॉलेज भी जाना है ना

अभय – जी बड़ी मां

इतना बोल के गीता देवी जाने लगी तभी अभय ने पीछे से गीता देवी को आवाज दी...

अभय – बड़ी मां

गीता देवी – (पलट के अभय को देखते हुए) हा अभय

अभय –(गीता देवी के पास आके पैर छुए)

गीता देवी – (अपने पैर छूते हुए अभय को देखती रही) क्या बात है अभय

अभय – (मुस्कुरा के) कुछ नही बड़ी मां बस ऐसे ही मन हुआ , अच्छा चलता हू बड़ी मां

बोल के अभय जाने लगा पीछे से गीता देवी गौर से अभय को जाते देख रहे थी

गीता देवी – (मन में – इसे क्या हुआ आज इस तरह से कभी नही किया इसने)

अभय तेजी से हॉस्टल की ओर निकल गया हॉस्टल आते ही अपने रूम में बेड के नीचे से बैग निकाल के खोला अपने कपड़े उतार के बुलेट प्रूफ जैकेट पहनी साथ एक सूट भी पहना और पॉकेट में डाल के बैग बंद करके चुप चाप हॉस्टल की दीवार फांद के निकल गया कही...

गांव के सरहद के बाहर एक सुनसान एरिया में एक फार्म हाउस बना हुआ था उसके अन्दर एक हॉल बना हुआ था जिसमे 50 से 60 आदमी और औरते इक्कठा थे धीरे धीरे हाल में लगी कुर्सियों में लोग आ रहे थे बैठ रहे थे फार्म हाउस की भीड़ के बीच अभय भी आगया था सभी के साथ हाल में जाके बैठ गया तभी किसी के आने से वहा सन्नाटा छा गया हाल की बाकी कुर्सियों के सामने एक चेयर पे आके बैठ गया

ये लोग कोई मामूली लोग नही थे दिल्ली , मुंबई और गुजरात के नामी गैंगस्टर थे जो अपने गैंग के साथ गांव के बाहर किसी फार्म हाउस में आए थे मीटिंग के लिए इनके सामने बैठा था इन सब गैंगस्टरो का सरदार (LEADER)

लीडर – तुम सब को यहां बुलाने का सिर्फ एक कारण है अब तक हमारे ज्यादा तर धंधे बर्बाद कर दिए गए है साथ ही एनकाउंटर के नाम पर हमारे आदमियों को मारा गया है और इस काम को पुलिस और सरकार अंजामंदे रही है जबकि सच तो ये है इन सब के पीछे किंग (KING 👑 ) का हाथ है खुद सामने ना आकर पीठ पीछे वार कर रहा है हमारे ताकी हम सरकार को दोषी माने

1 गैंगस्टर – तो क्या सोचा है तुमने कैसे हम अपना कारोबार करेगे

2 गैंगस्टर – (KING 👑) किंग कोई मामूली इंसान नही है उससे डायरेक्ट उलझना मतलब अपनी मौत को दावत देना होगा

3 गैंगस्टर – पुलिस उसका कुछ नही बिगड़ सकती है क्यों की पुलिस के रिकॉर्ड में उसके किसी भी जुर्म की कोई फाइल कभी बनी ही नही है सरकार उसके हाथ में है ऐसे में कारोबार करना नामुमकिन है

लीडर – तो क्या चाहते हो हम हाथ पे हाथ धर के बैठे रहे करने दे उसे अपनी मनमानी

2 गैंगस्टर – क्यों ना उसके पावर को खतम किया जाय

3 गैंगस्टर – हां बिलकुल एक एक करके उसके नेटवर्क को मिटा देते है बिना नेटवर्क के उसकी कोई पावर नही रहेगी....

अभय इतनी देर से सुन रहा सबकी बात को बीच में बोल पड़ा...

अभय – (बीच में गैंगस्टर की बात काटते हुए) तब तो यहां पे बैठे हुए कुछ लोगो को अपनी जान गवानी पड़ेगी

लीडर – कॉन हो तुम बिना इजाजत हमारे बीच में बोलने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी , कॉन है तुम्हारा बॉस

अभय – मेरा कोई बॉस नही और ना मैं तुम्हारे किसी गैंग का बंदा हू

लीडर – तो तू यह पे आया कैसे और क्या करने आया है यहां पे

अभय – (एक खीच के चाटा मारा लीडर को)



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इसके बाद लीडर के साथ कई लोगो ने मिलके अभय के उपर गन तान दी..

अभय –(हस्ते हुए) जनता है तुम जैसे से नजरे मिला के कोई बात बात करने की हिम्मत नही करता है लेकिन आज मैने किया , दिल खुश हो गया मेरा यार (हस्ते हुए)

लीडर – (हस्ते हुए अपने आदमियों को गन नीचे करने का इशारा करता है) बहोत डेयरिंग है तुझमें किसी की हिम्मत नही मुझे टच भी कर ले तूने तो हाथ उठा दिया , लेकिन तेरी बातो से इंप्रेस हुआ मैं , अब बता क्यों आया है यहां पे तू और क्यों मेरे लोग मारे जाएंगे

अभय – जरा सोच तो इतनी बड़ी मीटिंग शहर और गांव के बाहर जंगल के बीचों बीच जिसके बारे में कोई सपने में भी न सोच सकता हो वहा पर मैं कैसे आगया सोची ये बात तूने नही ना , तो सोच जरा

लीडर – ठीक से बोल क्या कहना चाहता है तू

अभय – यही की तुम्हारे लोगो में से कोई है मिला हुआ है पुलिस से तुम्हारे हर मूवमेंट की जानकारी पुलिस को पहले हो जाती थी इसीलिए आज तुम सब यहां हो , लेकिन एक मजे की बात बताओ यह की मीटिंग के बारे में भी पुलिस को जानकारी दी गईं है और मुझे भेजा गया है इस बात को कन्फर्म करने के लिए (जोर से हसने लगा अभय)

लीडर – कॉन है वो आस्तीन का साप जो पुलिस का कुत्ता बन गया बोल बता नाम उसका

अभय – यहां पे बैठा हुआ कोई भी हो सकता है क्या पता वो तुम्हारा ही बनाया हुआ गैंगस्टर हो या औरतों के गरूप से हो देखो सबको जरा गौर से जिसके आखों में डर दिख जाय समझ लेना वही है

लीडर – (सबकी तरफ देखने लगा ध्यान से फिर अभय से बोला) अगर तू मुझे बता दे बदले में तुझे मु मांगे पैसे मिलेंगे

अभय – 2 गैंगस्टर और उसके साथी है।

अभय का इतना बोलना था तभी लीडर ने 2 गैंगस्टर पर गोली चला दी बदले में 2 गैंगस्टर के बंदे ने फायर किया उसके बाद कई लोगो ने गोली चलाना सूरी कर दी एक दूसरे पे इस बात का फायदा उठा के अभय भी शुरू हो गया सबको मारने



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बाकी के लोग एक दूसरे से आपस में लड़ने में लग गए थे मौके का फायदा उठा के अभय के सामने आता उसे बेरहमी से मरता जाता बिना रहम किए

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कुछ ही देर में सभी गैंगस्टर मारे गए और आखरी में मेन लीडर को मार दिया अभय ने , लेकिन कोई था वहा से दूर कही अपने कंप्यूटर स्क्रीन में ये सारा नजर देख रहा था गौर से

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उसके चेहरे पे एक अजीब सी मुस्कान थी ऐसा मानो जैसे वो एक विजई मुस्कान हो

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सबको मारने के बाद थका हरा अभय हाल में चारो तरफ देखने लगा जहा पे सिर्फ लाशों के सिवा कुछ भी नही बचा था वहा पे

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ऐसे में अभय वहा पे नही रुका और निकल गया वहा से बाहर आते ही अभय के मोबाइल में कॉल आया किसी का

अभय –(कॉल रिसीव करते हुए) कॉन है

सामने से – काम हो गया

अभय – एक छोटी मछली अगर शार्क से लड़े तो क्या होगा , बस वही हुआ है यह पर

सामने से – क्या मतलब...

अभय – (हस्ते हुए) आपकी भेजी हुए मछलियां आ गयी मैने उनको अच्छे से काट कर उनकी अच्छी खातिरदारी भी कर दी , ये मछलियां इस तरह यहां समंदर में रहने लायक नही इन्हे अपने एक्वेरियम में सजा लेना , ये वापस नहीं जाएगी , क्योंकि ये समुंदर मेरी जैसे शार्क मछलियों से भरा पड़ा है (चिल्ला के) I M A WALE

बोलते ही अभय ने कॉल कट कर निकल गया हॉस्टल की ओर जबकि इस तरफ अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन में देख रहा लड़का मुस्कुरा रहा था अभय की बात सुन के उसके पीछे बैठी लड़की ने बोला

लड़की – तो तुम्हारा टेस्ट पूरा हो गया आज अब क्या बोलते हो तुम , (हस्ते हुए) आज बंद कर दी ना उसने तुम्हारी बोलती...

लड़का – पहली बार जब ये मिला था इसकी आखों में मुझे वो आग दिखी थी जो कभी मुझमें थी लेकिन

लड़की – (बीच में) रिलैक्स पुरानी बातो को याद करके अब कोई फायदा नही होगा आज को देखो बीते हुए कल को कोई नही बदल सकता है , एक बार अभय से मिल लो वर्ना उसकी नजर में हम दोनो ही हमेशा गलत बने रहेंगे

लड़का – ठीक है जल्दी मिलूगा अभय से

इस तरफ अभय हॉस्टल में आते ही तुरंत बाथरूम में चला गया शावर लेने लगा बाहर आते ही बेड में लेटने जा रहा था तभी मोबाइल में किसी का कॉल आया अंजान नंबर देख के....

अभय -- (कॉल रिसीव कर के) हेलो...!!

सामने से – ?????

अभय -- हेलो...कौन है ?

तब सामने से आवाज आई.....

संध्या -- मैं हूं...।

अभय -- मैं कौन? कुछ नाम भी तो होगा?

अभय की बात सुनकर सामने से एक बार फिर से आवाज आई...

संध्या – एक अभागी मां हूं, जो अपने बेटे के लिए बहुत तड़प रही है, प्लीज फोन मत काटना अभय।

अभय समझ गया की ये उसकी मां है, वो ये भी समझ गया की जरूर उसकी मां ने एडमिशन फॉर्म से नंबर निकला होगा।

अभय -- (गुस्से में चिल्ला के) तुझे एक बार में समझ नही आता क्या? तेरा और मेरा रास्ता अलग है,। क्यूं तू मेरे पीछे पड़ी है, बचपन तो खा गई मेरा अब क्या बची हुई जिंदगी भी जहन्नुम बनाना चाहती है।

अभय की बात सुनकर संध्या एक बार फिर से रोने लगती है.....


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संध्या -- ना बोल ऐसा अभय, मैं ऐसा कभी सपने में भी नही सोच सकती।

अभय -- (संध्या की बात सुन इस बार शांति से बोला) काश तूने ये सपने में सोचा होता , पर तूने तो...देख अब मैं संभाल गया हूं , तू समझ बात को , मुझे अब तेरी जरूरत नहीं है , और ना ही तेरी परवाह। मैं यहां पर सिर्फ पढ़ने आया हूं , कोई रिश्ता जोड़ने नही। तू अपने दिमाग में ये बात डाल ले की मैं तेरे लिए मर चुका हूं और तू मेरे लिए। तू जैसे अपनी जिंदगी जी रही थी वैसे ही जी , और मुझे भी जीने दे। देख मैं तुझसे गुस्सा नही हूं और ना ही तुझसे नाराज हूं , क्योंकि गुस्सा और नाराजगी अपनो से किया जाता है। तू मेरे लिए दुनिया के भीड़ में चल रही एक इंसान है बस , और कुछ भी नही।

कहते हुए अभय ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.....

संध्या – (रोते हुए मोबाइल को सीने से लगाए) तुझे कैसे बताऊं अभय कितना प्यार है मेरे दिल में तेरे लिए तू नही जानता तू क्या है मेरे लिए काश मेरी गलती माफी के काबिल होती....

एक तरफ अभय कॉल कट करके बेड में लेट गया और छत को घूरता रहा दूसरी तरफ हवेली में अभय के कमरे में संध्या जमीन में बैठी बेड में सीर टीका के रोती रही....

अगले दिन सुबह..

रमिया –(अभय को जागते हुए) बाबू जी ओह बाबू जी उठाए सुबह हो गई है

अभय –(नींद से जागते हुए) अरे तू इतनी सुबह सुबह आ गई

रमिया –(हस्ते हुए) बाबू जी सुबह के 7 बज रहे है

अभय– (हैरानी से) आज सच में देर हो गई मुझे

रमिया – लगता है कल रात देर से सोए हो बाबू जी , ये लिजये चाय पी लीजिए

अभय – (चाय लेते हुए) शुक्रिया रमिया

रमिया – बाबू जी आप त्यार हो जाइए मैं आपके लिए नाश्ता बना देती हू

अभय नहा धो के त्यार हो नाश्ता करके निकल गया कॉलेज की ओर कॉलेज में आते ही अभय ने देखा कॉलेज के ग्राउंड में कई स्टूडेंट्स टहल रहे थे उसमे राज , लल्ला और राजू उनके साथ पायल ये चारो बाते कर रहे थे आपस में...

पायल –(राज से) कल के लिए सॉरी राज मेरी वजह से..

राज – (बीच में ही) अरे तू क्यों माफी मांगती है कोई गलती नही है तेरी बस कल याद आगयी उसकी....चल जाने दे ज्यादा मत सोच तू

पायल –(अभय की तरफ देखते हुए) आगया ये नमूना यहां पर

राज –(चौकते हुए) क्या

पायल –(एक तरफ इशारा करके) वो देख वो आ रहा है नमूना यहां पे

राज , लल्ला और राजू ने देखा तो पाया अभय सामने से आ रहा था उनकी तरफ अभय के आते ही....

पायल – (अभय के आते ही राज से बोली) मैं नीलम के पास जा रही हूं तुम लोग बाते कर

राज कुछ बोलता उससे पहले पायल चली गई...

अभय – (तीनों से) कैसे हो तुम सब कल रात में मजा आगया (राज से) अच्छी शायरी करते हो तुम

राज – अरे ना भाई बस कभी कभी का शौक है ये (और सिगरेट जला के पीने लगा) , खुशी हुई आपको अच्छा लगी यहां की दावत

राजू – यार राज, कितना सिगरेट पिएगा तू, तेरे बापू को पता चला ना टांगे तोड़ देंगे तेरी।

अभय – (राज को सिगरेट पीता देख के मन में – मैने गांव क्या छोड़ा, ये इतना बिगाड़ गया अब तो खबर लेनी पड़ेगी इसकी)

राज की बात सुनकर अभय मुस्कुराते हुए बोला......

अभय -- हां दावत तो खास थी लेकिन इस बार तूने सरपंच की धोती में चूहा नही छोड़ा

राज – अरे नही यार, हर बार तो मैं ही करता हु इस बार तू....

कहते हुए राज चुप हो गया और हाथ से सिगरेट गिर गई , राज के चेहरे के भाव इतनी जल्दी बदले की गिरगिट भी न बदल पाए। उसके तो होश ही उड़ गए, झट से बोला...

अजय -- तू....तुम्हे कै...कैसे पता की मैं सरपंच के धोती में चूहा छोड़ता हूं

राज की बात सुन मुस्कुरा के अभय ने आगे बढ़ते हुए राज को अपने गले से लगा लिया और प्यार से बोला...

अभय -- इतना भी नही बदला हूं, की तू अपने यार को ही नही पहचाना।

गले लगते ही राज का शरीर पूरा कांप सा गया, उसके चेहरे पर अजीब सी शांति और दिल में ठंडक वाला तूफान उठा लगा। कस कर अभय को गले लगाते हुए अजय रोने लगा....

राज इस तरह रो रह था मानो कोई बच्चा रो रहा हो। अभय और राज आज अपनी यारी में एक दूसरे के गले लगे रो रह थे।

राज -- (रोते हुए) कहा चला गया था यार, बहुत याद आती थी यार तेरी।

राज की बात सुनकर, अभय भी अपनी भीगी आखों के साथ बोला...

अभय -- जिंदगी क्या है, वो ही सीखने गया था। पर अब तो आ गया ना।

कहते हुए अभय राज से अलग हो जाता है, अभय राज का चेहरा देखते हुए बोला...

अभय -- अरे तू तो मेरा शेर है, तू कब से रोने लगा। अब ये रोना धोना बंद कर, और हा एक बात....

इससे पहले की अभय कुछ और बोलता वहा खड़े 2 लड़के अभय के गले लग जाते है...

लल्ला – मुझे पहेचान....मैं लल्ला जिसे तुमने आम के पेड़ से नीचे धकेल दिया था और हाथ में मोच आ गई थी।

लल्ला की बात सुनकर अभय बोला...

अभय -- हा तो वो आम भी तो तुझे ही चाहिए था ना।

राजू – मुझे पहचाना मैं राजू हूं

अभय –(हस्ते हुए) तुझे कैसे भूल सकता हूं यार तू तो हमारा नारद मुनि है तू ही तो गांव की हर खबर रखता है हमारा न्यूज पेपर

इस बात पे चारो दोस्त जोर से हसने लगे...

अभय -- अरे मेरे यारो, सब को पहेचान गया । लेकिन एक बात ध्यान से सुनो सब लोग ये बात की मैं ही अभय हूं, ये बात सिर्फ अपने तक रखना मैं नही चाहता हर कोई जान जाय यहां पे मेरे बारे में

अभय अभि बोल ही रहा थे की, राज एक बार फिर से अभय के गले लग जाता है....

अभय -- कुछ ज्यादा नही हो रह है राज, लोग देखेंगे तो कुछ और न समझ ले...।

अभय की बात पर सब हंसन लगे....की तभी कॉलेज के मेन गेट अमन आता है अपनी बाइक से दूसरे गांव के ठाकुर के लड़के के साथ जो अमन का दोस्त था...

अभय – (अमन को देख मुस्कुराते हुए बोला) अब देखना कैसे इसकी जलाता हू मै..

इतना बोल अभय अपने दोस्तो के साथ निकल गया पायल की तरफ जो ग्राउंड के बाहर अपनी दोस्त नीलम से बाते कर रही थी तभी अभय को देख पायल ने राज को बोला.....

पायल -- जरा संभल के, पागलों के साथ रह कर तू भी पागल मत हो जाना।

बोल कर पायल जैसे ही आगे जाने के लिए बढ़ी थी...

अभय -- अब इस कदर कयामत हम पर बरसेगी, तो पागलपन क्या कही जान ही ना निकल जाए।

अभय की बात सुनकर, पायल अभय की तरफ पलटी तो नही, मगर हल्का सा अपना चेहरा घुमाते हुए बोली...

पायल -- इस कयामत का हकदार कोई और है, उम्र बीत जायेगी तुम्हारी, यूं राह तकते तकते...।

ये कह कर पायल हल्के से मुस्कुराई और फिर आगे बढ़ी ही थी की,...

अभय -- अगर मैं कहूं, की वो हकदार मैं ही हूं तो?

पायल इस बार फिर मुस्कुराई.....

पायल -- उसे पता है, मैं उसे कहा मिल सकती हूं।

ये कह कर पायल आगे बढ़ जाती है...। अभय मुस्कुराते हुए अपने दिल पर हाथ रखा ही था की....तभी पीछे से अमन दौड़ के आया और एक किस मार दी अभय की पीठ पर..



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अभय के जमीन पर गिरते ही, पायल, राज और बाकी सभी लोग हैरत से अपनी नज़रे घुमा कर देखते है तो। सामने अमन अपने हाथो में एक मोटा डंडा लेकर खड़ा था।

जल्द ही अभय खड़े होते हुए, अपने कपड़े पर लगी मिट्टी को घाड़ते हुए बोला...

अभय -- अच्छा था, मगर बुजदिलों वाला था पीछे से नही आगे से मरता तब लगता एक मर्द ने वार किया है

अभय की बेबाकी और निडरता देखकर, वहा खड़े सब लड़के आपस में काना फूसी करने लगे। मगर एक अकेली पायल ही थी जो वहा पर खड़ी मुस्कुरा रही थी.....

लड़का – इसी लौंडे ने डिग्री कॉलेज का काम रुकवा दिया था।

अमन के साथ में खड़ा वो लड़का बोला...उस लड़के की बात सुनकर, अमन भी अपनी हरामीगिरी दिखाते हुए बोला...

अमन -- तू यहां पर नया है इसलिए तुझे छोर दिया था मैने शायद तुझे मेरे बारे में पता नही। वो जो लड़की तेरे पीछे खड़ी है, दुबारा उसके आस पास भी मत भटकना, ये अखरी चेतावनी है तेरे लिए

अमन की बात सुनकर, अभय मुस्कुराते हुए एक नजर पीछे मुड़ कर पायल की तरफ देखता है। और वापस अमन की तरफ देख कर बोला।

अभय -- डायलॉग तो ऐसे मार रहा है, जैसे तंबाकू का एडवरटाइजमेंट कर रहा है, चेतावनी...वार्निंग। इस लड़की के आस - पास की बात करता है तू।

ये कह कर अभय, अमन की तरफ ही देखते हुए उल्टे पांव पायल की तरफ चलते हुए...पायल के बराबर में आकर खड़ा हो गया..सब लोग अभय को ही देख रहे थे, राज ने भी अभय के बारे में जैसा सोचा था वैसा ही अभय के अंदर निडरता को पाया , पायल की नजरे तो अभय पर ही टिकी थी। मगर बाकी कॉलेज के स्टूडेंट ये समझ गए थे की जरूर अब कुछ बुरा होने वाला है की तभी वो हुआ....जिस चीज का किसी को अंदाजा भी ना था.....



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पायल ने बिना किसी की परवाह किए अभय को चूमने लगी होठों पर...ये नजारा देख लड़के हो या लड़किया सभी हैरान रह गए क्योंकि जो लड़की किसी से बात तक नहीं करती थी हर वक्त गुमसुम सी रहती थी वो आज अचनाक गांव के कॉलेज पड़ने आए एक नए लड़के को चूम रही थी....

ये नजारा देख जहा सब हैरान थे वही अमन जल भुन रहा था आखों में गुस्से का ज्वालामुखी जैसे फटने वाला हो एसा चेहरा जैसे लाल हो गया था , तभी अमन डंडा ले के मरने आ रहा था अभय को तभी राज ने अमन के पैर पर अपना पैर मार दिया जी कारण अमन गिर गया तभी...

राज – (अभय को आवाज दी) अभय...

अभय –(पायल से किस तोड़ के राज की तरफ देखा)

राज – (डंडा अभय की तरफ उछल दिया जिसे अभय ने पकड़ लिया)

इधर अमन खड़ा हो गया पीछे से जाने कहा से मुनीम अपने 2 लट्ठहरो के साथ जीप से उतरता हुआ नजर आया जिसे देख अभय के गुस्से का पारा बड़ गया बिना किसी की परवाह किए अभय ने एक घुसा मारा अमन के पेट में जिससे अमन अपना पेट पकड़ के जमीन में बैठ गया...

तभी अभय तुरंत दौड़ के गया मुनीम के पास ये देख मुनीम अपने लट्ठहरो के साथ सामने आया अभय के....

मुनीम – ऐ छोरे तू नही जानता किस्से हाथ उठाया है तूने

अपने लट्ठहरो को इशारा किया अपने लट्ठहरो के साथ मुनीम अभय के सामने चला गया हाथ में लाठ लिए तब अभय ने दिखाया कुछ ऐसा...


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हाथ में लट्ठ लिए अपनी कला बाजी दिखाई...

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जिससे दोनो लट्ठहरो की हवा टाइट हो गई उनके हाथ से लट्ठ गिर गया तुरंत भाग गए दोनो..

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और तभी अभय ने मुनीम के पैर में लट्ठ मारी जिसे मुनीम जमीन में गिर गया तब अभय बोला...

अभय – मुनीम इसको पेड़ में बांध दो अगर ये स्कूल न जाय तो , मालकिन इसने अमन बाबू का खाना फेक दिया , क्यों याद आया तुझे हरामजादे

ये सुन मुनीम की आखें बड़ी हो गई....

मुनीम –(डरते हुए) क...क...कॉन हो तुम

अभय – अभय , ठाकुर अभय सिंह , जितनी बार तू मिलेगा मुझे उतनी बार तेरे शशिर का एक अंग तोडूगा मैं...


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इतना बोल अभय ने एक जोर लात मारी मुनीम के पैर में जिससे मुनीम का पैर की हड्डी टूट गई , दर्द में तड़पता हुआ बेहोश हो गया
.
.
.
जारी रहेगा✍️✍️
Bahut hi shanadar update diya hai DEVIL MAXIMUM bhai....
Nice and beautiful update....
 

Rajizexy

Punjabi Doc
Supreme
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UPDATE 4

गांव में हर साल एक मेला लगा करता है जहा पे ठकूरो के कुलदेवी का मंदिर था हर साल वहा पे बंजारे आते थे 10 से 15 दिन के लिए और तभी मेला शुरू हो जाता था गांव। में 10 से 15 दिन तक मेले के चलते पूरा गांव इक्कठा हो जाता था जैसे कोई त्योहार हो गांव वाले वहा जाते झूला झूलते बंजारों से नई नई प्रकार के वस्तु खरीदते साथ ही कुल देवी की पूजा करते थे ठाकुरों के साथ और उस वक्त ठाकुर अपने परिवार के साथ मेले में घूमते फिरते थे लेकिन इस बार गांव वालो की हिम्मत जवाब दे गईं थी कर्ज के चलते

इन सब बातो से अंजान हवेली में अभय के गम में डूबी हुई थी संध्या जिसका फायदा उठा रहा था रमन जो गांव वालो को जमीन को हड़प रहा था कर्ज और ब्याज के नाम पे ताकि डिग्री कॉलेज की स्थापना करवा सके जिसकी स्वीकृति रमन को संध्या से लेनी थी हवेली में गमहीन माहोल के चलते रमन इस बारे में बात नही कर पा रहा था संध्या से

जबकि संध्या अमन का मुंह देख कर जीने लगी थीं, लेकिन हर रात अभय की यादों में आंसू बहाती थी, और ये उसका रोज का रूटीन बन गया था।

और इस तरफ गांव वालों की हर रोज़ मीटिंग होती थीं , की ठाकुराइन से जाकर इस बारे में पूछे की उसने ऐसा क्यूं किया? क्यूं उनकी ज़मीन हड़प ली उसने? पर गांव वाले भी ये समय सही नहीं समझे।

दीन बीतता गया, संध्या भी अब नॉर्मल होने लगी थीं, वो अमन को हद से ज्यादा प्यार करने लगी थीं। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी ख्वाहिश अमन की यूं ही पूरी हो जाती।

देखते ही देखते महीने सालों में व्यतीत होने लगे,,


एक दिन की बात है हवेली में सब नाश्ते की टेबल पर बैठे थे, अमन के सामने पड़ी प्लेट मे देसी घी के पराठे पड़े थे। जिसे वो बहुत चाव से खा रहा था। और मालती अमन को ही गौर से देख रही थीं, की संध्या कितने प्यार से अमन को अपने हाथों से खिला रही थीं।

अमन --"बस करो ना बड़ी मां, अब नहीं खाया जाता, मेरा पेट भर गया हैं।"

संध्या --"बस बेटा, ये आखिरी पराठा, हैं। खा ले।"

अमन ने किसी तरह वो पराठा खाया, मालती अभि भी उन दोनो को ही देख रही थीं कि तभी उसे पुरानी बात याद आई।

जब एक दिन इसी तरह से सब नाश्ता कर रहे थे, अभय भी नाश्ता करते हुऐ गपागप ४ पराठे खा चुका था और पांचवा पराठा खाने के लिऐ मांग रहा था तब

संध्या – (पराठा देते हुऐ अभय से बोली) और कितना खायेगा तेरा तो पेट नहीं भर रहा हैं।

अभय –(हस्ते हुए) तेरे हाथ के पराठे जितने खाऊं पेट तो भर जाता है लेकिन दिल नही भरता

वो दृश्य और आज के दृश्य से मालती किस बात का अनुमान लगा रही थीं ये तो नहीं पता, पर तभी संध्या की नज़रे भी मालती पर पड़ती हैं तो पाती हैं की, मालती उसे और अमन को ही देख रही थीं।
मालती को इस तरह दिखते हुऐ संध्या बोल पड़ी...

संध्या --"तू ऐसे क्या देख रही हैं मालती? नज़र लगाएगी क्या मेरे बेटे को?

संध्या की बात मालती के दिल मे चुभ सी गई,और फिर अचानक ही बोल पड़ी।

मालती --"नहीं दीदी बस पुरानी बातें याद आ गई थीं, अभय की।

और कहते हुऐ मालती अपने कमरे में चली जाती है। संध्या मालती को जाते हुऐ वही खड़ी देखती रहती है......

मालती के जाते ही, संध्या भी अपने कमरे में चली गई। संध्या गुम सूम सी अपने बेड पर बैठी थीं, उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थीं। वो मालती की कही हुई बात पर गौर करने लगी। वो उस दीन को याद करने लगी जब उसने अभय की जम कर पिटाई की थीं। उस दीन हवेली के नौकर भी अभय की पिटाई देख कर सहम गए थे।

बात कुछ यूं थीं की, रमन हवेली में लहू लुहान हो कर अपना सर पकड़े पहुंचा। संध्या उस समय हवेली के हॉल में ही बैठी थीं। संध्या ने जब देखा की रमन के सर से खून बह रहा है, और रमन अपने सर को हाथों से पकड़ा है, तो संध्या घबरा गई। और सोफे पर से उठते हुऐ बोली...

संध्या --" ये...ये क्या हुआ तुम्हे? सर पर चोट कैसे लग गई?

बोलते हुऐ संध्या ने नौकर को आवाज लगाई और डॉक्टर को बुलाने के लिऐ बोली....

संध्या की बात सुनकर रमन कुछ नहीं बोला, बस अपने खून से सने हांथ को सर पर रखे कराह रहा था। रमन को यूं ख़ामोश दर्द में करहता देख, संध्या गुस्से में बोली....

संध्या --"मैं कुछ पूंछ रही हूं तुमसे? कैसे हुआ ये?

"अरे ये क्या बताएंगे बड़ी ठाकुराइन, मैं बताता हूं..."

इस अनजानी आवाज़ ने सांध्य का ध्यान खींचा, तो पाई सामने मुनीम खड़ा था। मुनीम को देख कर रमन गुस्से में चिल्लाया....

रमन --"मुनीम जी, आप जाओ यहां से, कुछ नहीं हुआ है भाभी। ये बस मेरी गलती की वजह से ही अनजाने में लग गया।"

"नहीं बड़ी ठाकुराइन, झूंठ बोल रहे है छोटे मालिक। ये तो आपके...."

रमन --"मुनीम जी... मैने कहा ना आप जाओ।

रमन ने मुनीम की बात बीच में ही काटते हुऐ बोला। मगर इस बार सांध्या ने जोर देते हुऐ कहा....

संध्या --"मुनीम जी, बात क्या है... साफ - साफ बताओ मुझे?"

संध्या की बात सुनकर, मुनीम बिना देरी के बोल पड़ा....

मुनीम --"वो... बड़ी ठाकुराइन, छोटे मालिक का सर अभय बाबा ने पत्थर मार कर फोड़ दीया।"

ये सुनकर संध्या गुस्से में लाल हो गई.…

संध्या --"अभय ने!! पर वो ऐसा क्यूं करेगा?"

मुनीम --"अब क्या बताऊं बड़ी ठाकुराइन, छोटे मालिक और मै बाग की तरफ़ जा रहे थे, तो देखा अभय बाबा गांव के नीच जाति के बच्चों के साथ खेल-कूद कर रहे थे। पता नहीं कौन थे चमार थे, केवट था या पता नहीं कौन से जाति के थे वो बच्चे। यही देख कर छोटे मालिक ने अभय को डाट दिया, ये कहते हुऐ की अपनी बराबरी के जाति वालों के बच्चों के साथ खेलो, हवेली का नाम मत खराब करो। ये सुन कर अभय बाबा, छोटे मालिक से जुबान लड़ाते हुए बोले

अभय – ये सब मेरे दोस्त है, और दोस्ती जात पात नहीं देखती, अगर इनसे दोस्ती करके इनके साथ खेलने में हवेली का नाम खराब होता है तो हो जाए, मुझे कुछ फरक नहीं पड़ता।"

संध्या --"फिर क्या हुआ?

मुनीम --"फिर क्या बड़ी मालकिन, छोटे मालिक ने अभय बाबा से कहा की, अगर भाभी को पता चला तो तेरी खैर नहीं, तो इस पर अभय बाबा ने कहा, अरे वो तो बकलोल है, दिमाग नाम का चीज़ तो है ही नहीं मेरी मां में, वो क्या बोलेगी, ज्यादा से ज्यादा दो चार थप्पड़ मारेगी और क्या, पर तेरा सर तो मै अभी फोडूंगा। और कहते हुऐ अभय बाबा ने जमीन पर पड़ा पत्थर उठा कर छोटे मालिक को दे मारा, और वहां से भाग गए।"

मुनीम की बात सुनकर तो मानो सांध्य का पारा चरम पर था, गुस्से मे आपने दांत की किटकिती बजाते हुऐ बोली...

सांध्य --"बच्चा समझ कर, मैं उसे हर बार नज़र अंदाज़ करते गई। पर अब तो उसके अंदर बड़े छोटे की कद्र भी खत्म होती जा रही है। आज रमन का सर फोड़ा है, और मेरे बारे में भी बुरा भला बोलने लगा है, हद से ज्यादा ही बिगड़ता जा रहा है, आने दो उसे आज बताती हूं की, मैं कितनी बड़ी बकलोल हूं..."

.... भाभी, भाभी... कहां हो तुम, अंदर हों क्या?

इस आवाज़ ने, सांध्य को भूत काल की यादों से वर्तमान की धरती पर ला पटका, अपनी नम हो चुकी आंखो के कोने से छलक पड़े आंसू के कतरों को अपनी हथेली से पोछते हुऐ, सुर्ख पड़ चुकी आवाज़ में बोली...

सांध्य --"हां, अंदर ही हूं।"

बोलते हुऐ वो दरवाज़े की तरफ़ देखने लगी... कमरे में रमन दाखिल हुआ, और संध्या के करीब आते हुऐ बेड पर उसके बगल में बैठते हुऐ बोला।

रमन --"भाभी, मैने सोचा है की, गांव में पिता जी के नाम से एक डिग्री कॉलेज बनवा जाए, अब देखो ना यहां से शहर काफी दूर है, आस - पास के कई गांव के विद्यार्थी को दूर शहरों में जाकर पढ़ाई करनी पड़ती है। अगर हमने अपना डिग्री कॉलेज बनवा कर मान्यता हंसील कर ली, तो विद्यार्थियों को पढ़ाई में आसानी हो जाएंगी।"

रमन की बात सुनते हुऐ, सांध्य बोली.....

संध्या --"ये तो बहुत अच्छी बात है, तुम्हारे बड़े भैया की भी यही ख्वाहिश थीं, वो अभय के नाम पर डिग्री कॉलेज बनाना चाहते थे, पर अब तो अभय रहा ही नहीं, बनवा दो अभय के नाम से ही... वो नहीं कम।से कम मेरे बच्चे का नाम तो रहेगा।"

रमन --"ओ... हो भाभी, तो पहले ही बताना चाहिए था, मैने तो मान्यता लेने वाले फॉर्म पर पिता जी के नाम से भर कर अप्लाई कर दिया। ठीक हैं मैं मुनीम से कह कर चेंज करवाने की कोशिश करूंगा।"

रमन की बात सुनकर संध्या ने कहा...

संध्या --"नहीं ठीक है, रहने दो। पिता जी का नाम भी ठीक है।"

रमन --"ठीक है भाभी, जैसा तुम कहो।"

और ये कह कर रमन जाने लगा तभी... सन्ध्या ने रमन को रोकते हुऐ....

संध्या --"अ... रमन।"

रमन रुकते हुऐ, संध्या की तरफ़ पलटते हुऐ...

रमन --"हां भाभी।"

संध्या --"एक बात पूंछू??"

संध्या की ठहरी और गहरी आवाज़ में ये बात सुनकर रमन एक पल के लिऐ सोच की उलझन में उलझते हुऐ, उलझे हुऐ स्वर मे बोला...

संध्या --"क्या उस रात अभय ने तुम्हे मेरे कमरे में आते देखा था ?

संध्या की ये बात सुन के रमन हड़बड़ा गया उसे हैरानी होने लगी की इतने साल के बाद आज संध्या ऐसी बात क्यों पूछ रही है

रमान -- (अपना थूक निगलते हुए) म..मु..मुझे नहीं लगता भाभी , अभय ने देखा होगा , वैसे भी वो तो 9 साल का बच्चा था भाभी, उसे भला कैसे पता चलेगा? पर आज इतने सालों बाद क्यूं?"
संध्या अपनी गहरी और करुण्डता भरे लहज़े में बोली...
संध्या – उस मनहूस रात के बाद ना जाने क्यूं , मुझे बेचैनी सी होती रहती है, ऐसा लगता है की मेरा दिल भटक रहा है किसी के लिऐ, मुझे पता है की मेरा दिल मेरे अभय के लिऐ भटकता रहता है, मैं खुद से ही अंदर अंदर लड़ती रहती हूं, रात भर रोती रहती हूं, सोचती हूं की मेरा अभय कही से आ जाए बस, ताकी मैं उसे बता सकूं की मैं उससे कितना प्यार करती हूं, माना की मैने बहुत गलतियां की हैं, मैंने उसे जानवरों की तरह पीटा, पर ये सब सिर्फ़ गुस्से में आकर। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, मैं ये ख़ुद को नहीं समझा पा रही हूं, उसे कैसे समझाती। मैं थक गई हूं, जिंदगी बेरंग सी लगने लगी हैं। हर पल उसे भुलाने की कोशिश करती हूं, लेकिन मेरा दिल मुझसे हर बार कहता है की, मेरा अभय आएगा एक दिन जरूर आएगा तू इंतजार कर ? (रोते हुए) हे भगवान क्या करूं? कहां जाऊं? कोई तो राह दिखा दे तू ? नही तो मेरे अभय को वापस भेज दे मेरे पास
कहते हुऐ सन्ध्या फिर रोने लगती है...!
अब रो कर कुछ हासिल नहीं होगा दीदी,"
इस आवाज को सुन रमन और संध्या ने नज़र उठा कर देखा तो सामने मालती खड़ी थीं, संध्या रुवांसी आंखो से मालती की तरफ़ देखते हुऐ थोड़ी चेहरे बेबसी की मुस्कान लाती हुई संध्या मालती से बोली...
संध्या --"एक मां को जब, उसके ही बेटे के लिऐ कोई ताना मारे तो उस मां पर क्या बीतती है, वो एक मां ही समझ सकती है।"
संध्या की बात मालती समझ गई थीं की सन्ध्या का इशारा आज सुबह नाश्ता करते हुऐ उसकी कही हुई बात की तरफ़ थीं
मालती --"अच्छा! तो दीदी आप ताना मारने का बदला ताना मार कर ही ले रही है।"
संध्या को बात भी मालती की बात समझते देरी नहीं लगी, और झट से छटपटाते हुऐ बोली...
संध्या --"नहीं... नहीं, भगवान के लिऐ तू ऐसा ना समझ की, मैं तुझे ताना मार रही हूं। तेरी बात बिलकुल ठीक थीं, मैने कभी अपने अभय को ज्यादा खाना खाने पर ताना मारी थीं, मेरी मति मारी गई थीं, बुद्धि भ्रष्ट हो गई थीं, इस लिऐ ऐसे शब्द मुंह से निकल रहे थे।"
मालती चुप चाप खड़ी संध्या की बात सुनते हुऐ भावुक हो चली आवाज़ मे बोली...
मालती --"भगवान ने मुझे मां बनने का सौभाग्य तो नहीं दीया, पर हां इतना तो पता है दीदी की, बुद्धि हीन मां हो चाहे मति मारी गई मां हो, पागल मां हो चाहे शैतान की ही मां क्यूं ना हो... अपने बच्चे को हर स्थिति में सिर्फ प्यार ही करती है।"
कहते हुऐ मालती रोते हुए अपने कमरे से चली जाति है... और इधर मालती की बातें संध्या को अंदर ही अंदर एक बदचलन मां की उपाधि के तख्ते पर बिठा गई थीं, जो संध्या बर्दाश्त नहीं कर पाई।।
और जोर - जोर से उस कमरे में इस तरह चिल्लाने लगी जैसे पागल खाने में पागल व्यक्ति...
संध्या – ..... हां.... हां मैं एक गिरी हुई औरत हूं, यही सुनना चाहती है ना तू, लेकिन एक बात सुन ले तू भी, मेरे बेटे को मुझसे ज्यादा कोई प्यार नहीं कर सकता है इस दुनिया में...
मालती – अब क्या फ़ायदा दीदी, अब तो प्यार करने वाला रहा ही नहीं... फिर किसको सुना रही हो?"
चिल्लाती हुई संध्या की बात सुनकर मालती भी चिल्लाकर कमरे से बाहर निकलते हुई बोली और फिर वो भी नम आंखों के साथ अपने कमरे में चली गई....इस बीच इन सब बातो के चलते रमन को वहा रुकना खतरे से खाली न लगा इसीलिए चुप चाप कमरे से पहले ही निकल गया रमन
संध्या रोते रोते जाने लगी अपने कमरे की तरफ लेकिन तभी अपने कमरे में ना जाके अभय के कमरे की तरफ चली गई अभय के कमरे को गौर से देखने लगी तभी संध्या की नजर टेबल पर पड़ी जहा अभय पढ़ाई करता था टेबल में रखी अभय की स्कूल की किताबो को देख इसे टेबल की दराज में रखने के दराज को खोलते ही संध्या की नजर पेंटिंग पर पड़ी उसे दराज से नकलते ही संध्या पेंटिंग को देखने लगी हर पेंटिंग के नीचे कुछ लाइनें लिखी थी अभय ने
1 = पेंटिंग

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रिश्तों की इस किताब में, माँ-बाप का पन्ना सबसे खास,
उनके बिना ज़िंदगी लगे बिल्कुल उदास।
वो छांव हैं, तपते सूरज में आराम जैसे,
माँ की वो एक नजर, और पापा का वो एक नाम जैसे।






2 = पेंटिंगimages-9
ज़िन्दगी में मां बाप के सिवा कोई अपना नहीं होता,
टूट जाए ख्वाब तो सपना पूरा नहीं होता,
ज़िंदगी भर पूजा करूगा अपने मां बाप की ,
क्यों की मां बाप से बड़ा भगवान नहीं होता।


3 = पेंटिंग
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तेरे साथ गुजरे लम्हे ही तो
अब मेरे जीने का सहारा है
तुझे कैसे बताऊं बाबा
तेरी यादों का हमें हर हिस्सा प्यारा है बाबा



4 = पेंटिंग
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माता पिता के बिना दुनिया की हर चीज कोरी हैं, दुनिया का सबसे सुंदर संगीत मेरी माँ की लोरी हैं..!!
5 = पेंटिंगimages-71
जिस के होने से मैं खुद को मुक्कम्मल मानता हूँ, मेरे पिता के बाद मैं बस अपने माँ को जानता हूँ..!!
6 = पेंटिंग
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दिल में दर्द सा होता है आँखें ये भर-भर जाती हैं, माँ तेरे साथ बिताये पलों की यादें मुझे जब जब आती हैं।


अभय की बनाई आखरी तस्वीर में सूखे हुए आसू का कतरा देख समझ गई संध्या की तस्वीर बनाते वक्त अभय रो रहा था साथ उसमे लिखी कविता को पड़ के संध्या जमीन में बैठ तस्वीरों को अपने सीने से लगाए रोते रोते बोलने लगी
संध्या – लौट आ लौट आ मेरे बच्चे , तेरी मां तेरे बिना बिल्कुल अधूरी हो गई है , तू जो सजा दे दे सब मंजूर है मुझे , बस एक बार तू लौट के आजा अभय , तुझे कबी नही रोकूगी चाहे कुछ भी कर तू
रोते रोते संध्या जमीन में सो गईं
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जारी रहेगा ✍️✍️
Story is building up nicely 👌👌👌✔️✔️💯
 
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