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Fantasy Aryamani:- A Pure Alfa Between Two World's

nain11ster

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111ramjain

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Devilrudra

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भाग:–176


“बड़े मजे से सिखाऊंगा” कहते हुये आर्यमणि ने अपनी एक उंगली ऊपर की, और सिर्फ उसी उंगली का क्ला बाहर आ गया। फिर बड़े आराम से वो मायस्प के पास पहुंचा और अपना क्ला ठीक उसके सीने के बीच घुसा दिया। मुखिया चिंखा... "नही आर्यमणि"… काया चिल्लाई, पूरा नायजो समुदाय चिल्लाया, और उसके अगले ही पल सबके आंखों की लेजर चार गुना तेजी से निकलने लगी

नजरों से मौत की रौशनी तो निकल रही थी लेकिन वह मात्र बेबसी के प्रमाण से ज्यादा कुछ नहीं था। आर्यमणि एक नजर बेबस भिड़ को देखकर मुस्कुराया। उसने आहिस्ते से अपना क्ला नीचे खींचा, दर्द भरी चींख मयास्प के मुंह से निकल गयी.… "आर्य तुम मेरी शादी में ऐसा नहीं कर सकते?"… पास खड़ी पलक चिल्लाई...

ओजल:– हमने तुम्हे नही बांधा ड्रामा क्वीन। जा बचा ले अपने दूल्हे को, हम बीच में नही आयेंगे...

पलक:– लड़कों के अकाल पड़े है क्या? खुद की वीर गाथा बहुत सुनाता था। जाने ये मैं क्यों बीच में आऊं। हां लेकिन बराबरी का मौका तो मिलना चाहिए।

काया:– कामिनी बदजात, इंसानों की हिमायती। यहां के अधिकारी कोई गलत शक नही कर रहे थे तुम पर।

पलक:– इंसानों की पैदाइश होकर इंसानों से ही इतनी नफरत। भूल गयी नायजो परिवार को जिनमे इतना जोश भरा रहता था कि एक ही खून होकर भी आपस में संबंध बनाते थे। और नतीजा ऐसा हुआ कि नायजो के सारे मर्द ही नपुंसक हो गये थे। समुदाय गुमान तब कहां था जब इंसानों के आगे टांग फैलाकर बीज डलवाती थी।

काया:– हरामजादी, कुतिया, जाकर इंसानों के बिस्तर गरम कर, अब हमें उसकी ज़रूरत नही। बस एक बार मुझे खोल दे, तेरी औकाद क्या है वो मैं बताऊंगी...

आर्यमणि, का चेहरा पूरा लाल। आंखों से अंगार जैसे बरस रहे हो.… "कोई बचा है मेरे पैक में जो इसको जवाब दे सके।”

महा:– पतिदेव मेरा खून खौल रहा है। कितनी घटिया बातें कर रही है। कान बंद करो, इसे तो मैं जवाब दूंगी...

आर्यमणि:– हां कान बंद कर लिया...

महा, ने कुछ बड़बड़ाया और महज चंद सेकेंड में वह काया, गंदगी में नहा चुकी थी। बदबू ऐसी की आस पास कैद खरे नायजो अपनी नाक सिकोड़ रहे थे।.... “सुनो तुम चिंदी जैसे दूर ग्रह के निवासी। तुम जैसे बदबूदार कीड़े मेरे कैद खाने में रोज ही ऐसे रेंगते है। जिस समुदाय में अपने परिवार के साथ ही संबंध बनाते हो, वो बदबूदार मल से ज्यादा कुछ नहीं। मेटल टूथ इसे अभी चाहकीली तक पहुंचा दो और चाहकीली से कहना इसे कैदखाने तक पहुंचा दे। वहां ये अपने मीनार के सभी कैदियों के मल को साफ करेगी।”...

महा का आदेश और अगले ही पल वह जमीन के अंदर ही घुस गयी, और सब मुंह ताकते रह गये। आर्यमणि भद्दा सा मुंह बनाते... “बस इस बात के लिये मेरे कान बंद करवा दी। टीम किसी को मजा आया क्या?”

निशांत:– अलबेली के मुकाबले तो एक परसेंट भी न था।

ओजल:– अलबेली जैसा कोई नहीं। फिर भी कोशिश अच्छी की दीदी।

महा:– मुझे बताना की अलबेली यहां कैसा जवाब देती। मै कोशिश करूंगी...

आर्यमणि:– कोशिश करने से वैसे जवाब कभी निकल ही नही सकता। वो तो नेचुरल टैलेंट था, क्यों टीम...

पलक:– आर्य इतनी भीड़ को अटकाकर क्या बकवास ही करोगे या आगे भी कुछ करना है।

आर्यमणि:– आगे कुछ करूं उस से पहले अपनी टीम लेकर निकलो... हम कहां मीटिंग करेंगे...

पलक:– वहीं जहां से सबकी शुरवात हुई थी। नागपुर में ही मिलते है।

आर्यमणि:– ठीक है तुम अपने लोगों को लेकर निकलो। मै नागपुर में मिलता हूं। उम्मीद है तुम्हारे पास इन नजायजों को भगाने का कोई कारगर उपाय होगा वरना सबकी लाश इसी भूमि पर गिरेगी...

पलक:– कोई नही लाश भी गिरानी पड़ी तो भी चलेगा... मै हर परिस्थिति के लिये तैयार हूं। और हां आर्य... यहां दर्द और चींख का फिर से वही माहौल होना चाहिए, जिन्हे ये भूल चुके थे। कोई रहम नहीं... मार डालो सबको...

आर्यमणि:– ऐसा बना बनाया माहौल देने का शुक्रिया। शिवम सर पलक के लोगों को जरा नागपुर तक छोड़ आइये...

पलक स्टेज से उतर गयी। वह अपने लोगों को समेटने लगी। ऋषि शिवम, पलक के जिन साथियों को जानते थे उन्हे पहले भी कैद नही किया था। और वो लोग जिन्हे चिन्हित करते गये उन सब को भी छोड़ दिया गया। इधर आर्यमणि उस मायास्प को पहले हील किया बाद में उसे छोड़ते.... “देखूं कितना बड़ा तोप है तू।”...

जैसे ही वह मायस्प छूटा उसके अगले ही पल आर्यमणि के पाऊं के नीचे किरणों का घेरा था। आर्यमणि ने कुछ मंत्र पढ़े और उसके एमुलेट से रौशनी निकलने लगी जो प्रिज्म आकर में आर्यमणि के पूरे शरीर के घेरे थी। मायस्प हालांकि आर्यमणि को पहले ही घेरे में ले चुका था, इसलिए उसने अपना अगला रणनीति शुरू किया। गोल घेरे के चारो ओर 6 रॉड लगाने का।

मायस्प जोड़ से चिल्लाया.... “रॉड कहां है।”..

आर्यमणि एक कदम आगे बढ़कर वह घेरा पार किया और एक झन्नाटेदार थप्पड़ लगाते.... “तू रहने दे भाई रॉड हम ढूंढ लेते है। तुम तीनो (निशांत, महा और ओजल) ऐसा रॉड ढूंढो, जिसके सिरे पर पत्थर लगा हो। ओह हां महा जितने भी लोग यहां कैद है सब पर मेटल टूथ छोड़ दो और उनसे कहो इन सबके पास जो भी पत्थर है उन्हे इकट्ठा कर ले। मै जरा इस रॉयल बेबी की वीरता भी चेक कर लेता हूं।

मायस्प:– देखिए मैं कोई वीर नही। बस वीरों के समूह के साथ जाता था और उनके कारनामों को अपना बता दिया करता था।

आर्यमणि वापस से उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मारा। इस थप्पड़ ने तो जैसे उसके होश उड़ा दिये हो। तुरंत ही उसने एक पोर्टल खोला और जैसे ही अपना पहला कदम उस पोर्टल में रखा आर्यमणि ने मात्र के इशारे किये और हवा को ही रस्सी बनाकर मायास्प के पाऊं में फसाया और खींच दिया। मुंह के बल गिड़ता, जमीन पर घिस्टाते, आर्यमणि के पाऊं में था। आर्यमणि, नीचे बैठकर उसके बालों पर हाथ फेरते..... “क्यों भाई मैदान छोड़कर क्यों भाग रहे थे। अब ये खेल उबाऊ लग रहा है। तू हार गया।”...

इतना कहकर आर्यमणि ने फिर से उसे मंत्रों के जाल में बांध दिया और बाल को मुट्ठी में दबोचकर उसे एक हाथ से ही किसी छिली मुर्गी की तरह उठा लिया। एक बार फिर आर्यमणि अपने एक उंगली के क्ला को बाहर किया और सीधा उसके सीने में घुसाकर थोड़ा सा चीड़ दिया। दर्द की खतरनाक चींख उसके मुंह से निकल गयी। तभी वहां लगे बड़े–बड़े स्क्रीन पर माया की तस्वीर आने लगी। बड़े से बुफर में उसकी आवाज गूंजी..... “सबके हाथ–पाऊं बांधकर एक अकेले मासूम को मारने में क्या वीरता है आर्यमणि।”

आर्यमणि:– तू अभी तक जिंदा है। मुझे लगा मेरे लौटने की खबर सुनकर कहीं आत्महत्या न कर ली हो।

माया:– तू इतना ही बड़ा वीर होता न तो मेरे लोगों को अपनी तिलिस्मी जाल में फसाकर एक मासूम की जान न ले रहा होता।

आर्यमणि:– तूने भी तो यही किया था न... अपने पर आयी तो बिलबिला रही है।"…

माया:– तुम्हारी दोषी मैं हूं, उसने क्या बिगाड़ा है...

आर्यमणि:– मैने किसी का क्या बिगाड़ा था? मेरे दादा वर्धराज ने क्या बिगाड़ा था? गुरु निशि ने क्या बिगाड़ा था? आश्रम के सैकड़ों शिष्य जिन्हे जिंदा जला दिया, उन्होंने क्या बिगाड़ा था? मेरी पत्नी वो तो उल्टा तुम्हारे जुल्मों का शिकार थी। उस निर्दोष ने किसी का क्या बिगाड़ा था? रूही की तरह वो चुलबुली प्यारी अलबेली, जिसके होने से ही चेहरे पर मुस्कान आ जाए। इवान उसने तो अभी दुनिया देखना शुरू ही किया था... क्या बिगाड़ा था इन सबने?... आंखों के सामने जब अपनो की मौत हो तब कैसा लगता है उसका मजा तुम भी ले लो...

मायस्प:– आज तू मुझे मार ले लेकिन मेरे लाखों शागिर्द तुझे ढूंढ निकालेंगे। उस दिन तू खुद को कोसेगा... तेरा सीना चिड़कर दिल बाहर निकाल लेंगे...

“मैने भावना वश अपने सुर क्या नीचे किये तुम तो धमकी देने लगे मेरे दोस्त।”.... आर्यमणि अपने घुसे क्ला को थोड़ा और अंदर घुसाया और पलक झपकते ही सीना चिड़कर मायस्प का धड़कता दिल अपने हथेली पर रखते... "क्या ऐसे ही तू मेरा दिल निकाल लेता... बोल ना भाई... अरे यार ये बोलता क्यों नही"…

आर्यमणि जोड़ से चिल्लाते हुए अपनी बात कह रहा था और दूसरी ओर का पूरा माहौल ही सकते में। आर्यमणि ने उस नायजो का सीना चीड़ दिया, जिसे चर्चाओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता था। सबके मुंह खुले हुये थे। माया गुस्से में फुफकार मारती.... “सिर्फ तू ही नही, पृथ्वी से पूरी मानव सभ्यता को ही हम समाप्त कर देंगे।”

आर्यमणि:– बड़बोली कहीं की। यहां अगर होती तो तुझे चीड़ देता। फिर तेरा बदला धरा का धरा रह जाता। लगता है अभी तेरी अक्ल ठिकाने नही आयी है। रुक तुझे तमाशा दिखाता हूं।

ओजल, बड़ी तेजी से स्टेज तक पहुंचती.... “हमे काम पर लगाकर एक को टपका भी दिया। जीजू थोड़ी देर रुक नही सकते थे।”..

महा:– और स्क्रीन पर ये लड़की कौन है जो गुस्से में लग रही। चेहरे से तो ये भी उस काया की तरह घिनौनी दिख रही।

आर्यमणि:– हां ये है भी घिनौनी। निमेष के साथ उस दिन ये भी थी। खैर आगे का काम देखते है। सो, दूर ग्रह से पहुंचे घिनौने नायजो। पृथ्वी पर गैर कानूनी तरीके से उपस्थिति के लिये मैं तुम सबको यहीं चीड़ दूंगा। लेकिन मेरा दिल कर रहा है कि तुम में से कुछ को जाने दूं, जो मेरी कहानी अपने ग्रह पर सुना सके। तो बताओ कौन बनना चाहेगा वो खुशनसीब.... तुम सब की कोई एक उंगली काम कर रही है उसे बस सीधी कर लो। जिसे भी चुना जायेगा, वह खुशनसीब यहां से जिंदा जायेगा....

माया:– देखो आर्य ऐसा मत करो। तुम जो भी सोच रहे उसे अभी रोक दो। मै वादा करती हूं सबको लेकर पृथ्वी से चली जाऊंगी। लेकिन प्लीज इन्हे कुछ मत करो।

आर्यमणि:– तुम शो इंजॉय करो। आखरी में तुम्हारे काम की बात भी मैं करूंगा। ओजल किसी 2 उंगली उठाने वाले को उसकी कैद से आजाद करो।

मल्टीपल च्वाइस में से ओजल ने एक लड़का और एक लड़की को आजाद किया। आर्यमणि उन दोनो को जिंदा रहने की बधाई देते.... “अभी जिंदा रहने के लिये चुने गये हो। लेकिन जिंदा उसी शर्त पर रह सकते हो जब तुम इस मुखिया के सभी बच्चों की पहचान करवाओ।”

उन दोनो को मात्र एक मिनट का वक्त लगा और उन दोनो ने 4 लड़की, 6 लड़को को चिन्हित कर दिया।.… सभी चिन्हित भाई बहन को अलग छांट दिया गया। आर्यमणि खुद मुखिया बाप के पास पहुंचा...."क्यों भाई कोई फैमिली प्लानिंग नही किये थे क्या, जो इतनी निक्कमी संतान पैदा हो गयी"…

मुखिया अपना सर झटकने लगा। आर्यमणि उसका मुंह खोलते.... "बोलो, क्या कहना चाहते हो।”

मुखिया:– मेरा वादा है कल सुबह होने से पहले मैं तुम सबकी लाश गिरा दूंगा।

आर्यमणि:– अपनी तादात बढ़ाने में तुम सब हैवान बन चुके हो... आज कोई रहम नही होगी। महा मुझे इन भाई बहनों के मौत की चींख क्यों नही सुनाई दे रही। और तुम क्या कर रही हो ओजल, सबको कांटों की चिता का दर्द याद दिलाओ। केवल ये मुखिया और उन दो लोगों को छोड़ देना जिन्होंने हमारी मदद की है।

आर्यमणि के एक आदेश पर फिर से कल्पवृक्ष दंश और त्रिशूल तन गये। देखते ही देखते मंत्रो की कैद में फंसी नायजो की भिड़ कांटों की चिता पर लेटे थे। वही कांटों की चिता जिन्हे नाजयो वाले भूल चुके थे। वही कांटों की चिता जिसपर लेटने के बाद हर नायजो उस वक्त को कोसता की क्यों उसने बॉडी पर ऐसा एक्सपेरिमेंट करवाया जिस वजह से उनकी मौत नही हो सकती और बदन में घुसे 100 से भी ज्यादा मोटे कांटे दर्द का इम्तिहान लेने पर तुले होते।

खैर, ओजल ने सबको बेइंतहा दर्द की चिता पर लिटाकर उनका मुंह पैक कर चुकी थी। उसके अगले ही पल महा का तिलिस्मी त्रिशूल चला और मुखिया के आंखों के सामने उसके सभी बच्चों के सर उसके धर से अलग थे। न तो बोलने का कोई मौका दिया और न ही किसी को खुला छोड़ा। बस मौत के एक इशारे थे और उस इशारे पर मौत का तांडव।

केवल दूर बैठी माया और कैद में फंसी काया को छोड़कर मुखिया के सभी बच्चों की लाश गिर चुकी थी। कांटों की चिता पर लेटा हर नायजो डर के साए में था। हर किसी का मुंह तक बंधा था, वरना गिड़गिड़ाने की आवाज चारो ओर से आती। ओजल और महा दोनो एक साथ.... “और कोई आदेश बॉस।”

आर्यमणि:– महा तुम भी बॉस बोल रही।

महा:– पतिदेव काम के वक्त आपको बॉस बुलाना ज्यादा अच्छा लगता है।

ओजल:– हो गया तुम दोनो का, तो आगे का भी देख ले। इस पूरी भिड़ का करना क्या है।

आर्यमणि:– क्यों माया तुम्हारी बोलती क्यों बंद है बताओ क्या करूं मैं इस भिड़ का।

आर्यमणि की बात सुनकर माया कुछ न बोली सिवाय अपना कनेक्शन काटने के। वहीं खड़ा मुखिया भी लाचार सा दिखा। गिड़गिड़ाता रहा सबको छोड़ दो। लेकिन आर्यमणि के कान पर जूं तक न रेंगी। 2 अतिथि और फुदक रहे थे, सुकेश और मीनाक्षी। आर्यमणि उन्हे कांटों की चिता से उठाकर उनका मुंह खोल दिया.... “क्यों मेरे मौसा, मेरी मौसी... कुछ बोलने को नही है क्या?”...

मीनाक्षी:– क्या इस बात से तू इनकार कर सकता है कि मैने तुझे अपने बेटे की तरह नही चाहा?...

आंखों में थोड़े आंसू थे। दिल भारी था। तेज उसकी रफ्तार थी। दिमाग के एक हिस्से में मीनाक्षी के साथ बिताए अच्छी यादें थी तो दूसरे हिस्से की करवाहट। तेज दौड़ते आर्यमणि मीनाक्षी के पीछे जाकर उसके गर्दन को अपनी भुजाओं से दबोचा और दूसरे हाथ का क्ला निकला पूरा पंजा उसके सर में घुसा था। मीनाक्षी कसमसाती रही। खुद को छुड़ाने की जी तोड़ कोशिश करती रही। मीनाक्षी को छटपटाते देख सुकेश ने हमला बोल दिया। बादल, बिजली, आग पानी सब आर्यमणि के सामने थे बेकार। फिर भी मीनाक्षी को बचाने के लिये सुकेश अपनी बेकार कोशिश करता रहा। मीनाक्षी छटपटाती रही। आर्यमणि के आंख से आंसू बहते रहे।

जब कुछ काम न आया तब बेबस इंसानों की तरह सुकेश आर्यमणि के कदमों में गिड़ा था। रहम की भीख मांगता रहा। शायद दिल अभी उतना पत्थर का नही हुआ था, इसलिए तो आर्यमणि ने अपनी मजबूत पकड़ से मीनाक्षी को आजाद कर दिया। आजाद होते ही मीनाक्षी भी आर्यमणि के पाऊं में गिरी थी, और ये पूरा नजारा एलियन के सिक्योर चैनल से लाइव रिले हो रहा था, जिसे पृथ्वी पर बसा हर नायजो देख रहा था।
Superb👍👍👍
 
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I love Fantasy and Sci-fiction story.
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भाग:–175


टापू पर हुये अल्फा पैक हत्याकांड को लगभग 4 साल हो गये थे। इन 4 सालों में बहुत से बदलाव भी आये थे। आम नायजो के बीच केवल पलक ही पलक छाई थी। उसका जलवा ऐसा था कि जहां भी होती किसी और का वजूद दिखता ही नही था। इसका एक कारण यह भी था कि पलक की तरह सोचने वाले काबिल नायजो की तादात इतनी हो चुकी थी कि किसी भी सिस्टम को चुनौती दे दे। जहां भी जाति हुजूम पीछे चला आता।

आम नायजो के बीच पलक की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर हाई–टेबल वाले चिंता में थे। ऊपर से पलक उन नायजो की भिड़ में ज्यादा रहती थी, जिन्होंने आज तक अपने शरीर पर एक भी एक्सपेरिमेंट न करवाया हो। नायजो नेताओं को पलक पर शक तो था लेकिन बिना सबूत के कुछ कर नही सकते थे, ऊपर से पलक का नेटवर्क।

पलक से जुड़े किसी भी आम सदस्य को ये लोग पूछ–ताछ के लिये जब भी उठाते, वहां पलक या उसके कोर 30 सदस्यों में से कोई एक पहुंच ही जाता। जब पता न लगा सके तब पलक की शादी अपने बीच के किसी नेता से करवाने को साजिश रचने लगे। पलक हर प्रस्ताव को ठुकराती रही। लगातार ठुकराती रही और अंत में विषपर प्लेनेट के राजकुमार और माया के भाई मायस्प का प्रस्ताव स्वीकार कर ली।

मायस्प और पलक की मुलाकात एक मीटिंग के दौरान हुई थी। यह मीटिंग भी तब शुरू हुई जब माया भारत पहुंची थी। उसी के कुछ दिन बाद अल्फा पैक के हत्या की खबर सुर्खियों में थी। पलक को ऐसा लगा जैसे उसके दौड़ रहे मुहिम पर किसी ने पूरा ब्रेक लगा दिया हो। कहां वो आर्यमणि के साथ मिलकर एक साल बाद पृथ्वी से नायजो के अस्तित्व को समाप्त करने वाली थी, और अब फिर से सब कुछ नए सिरे से प्लान करना था।

इसी दौरान पलक ने मायस्प से मेल जोल बढ़ा लिया और पलक को एक आशा की किरण दिखने लगी। इसके बाद दोनो का प्यार पूरा परवान चढ़ा। वैसे मायस्प की लोकप्रियता भी कम नही थी। पूरा समुदाय ही मायस्प पर नाज करता हो जैसे। 5 ग्रहों में बसने वाले दूसरे समुदाय के लोग जब नायजो के लिए खतरा बनते, और नायजो का हर लड़ाका हार जाता तब अंत में मायस्प को बुलाया जाता।

मायस्प और उसकी विशाल कुशल फौज किसी भी दुश्मन से चुटकियों में निपट लेते थे। खुद मायस्प कई सारी शक्तियों का वारिस था जिसमें कुछ अनुवांशिक गुण पिता से मिले थे और बहुत सारी शक्तियां खुद की अर्जित की हुई थी। हां लेकिन मायास्प की वीरता के किस्से और प्रत्यक्ष रूप से मायास्प को देखने के बाद पलक को कभी भी मायस्प के वीर गाथा के किस्सों पर यकीन ही नहीं हुआ। बस वो एक राजकुमार था और पलक के लिये उतना ही काफी था।

काफी ज्यादा हंगामे के बीच दोनो के शादी की तारीख तय हुई। चूंकि यह एक राजशाही शादी थी इसलिए शादी के इंतजामात भी उसी हिसाब से हुआ। मालदीव के टापू का खूबसूरत नजारा और प्रकृति की गोद में शादी के पूरे इंतजाम किए गये थे। नायजो अपनी आखरी शादी में भूमि, केशव और जया द्वारा दिये गये दर्द को भूले नहीं थे, इसलिए सुरक्षा का खास खयाल रखा गया था। हसीन वादियां थी और पलक अपने होने वाले पति मायस्प के साथ ढलते सूरज का लुफ्त उठा रही थी...

मायस्प:– काफी खूबसूरत दृश्य है। लेकिन हमारी शादी विषपर प्लैनेट से होनी चाहिए थी। वहां का नजारा ही अद्भुत होता...

पलक:– तुम्हारे सभी लोग पृथ्वी आ सकते है, लेकिन यहां के बहुत से ऐसे लोग है, जो तुम्हारे ग्रह जाने की तो दूर की बात है, उन्हे तो यह भी पता नही की दूसरे ग्रहों पर जीवन भी बसता है...

मायस्प:– अरे तो उनसे संबंध भी रखने कौन कह रहा... खुद को उनसे अलग करो... बस अपने काम के लिए यहां के प्रजाति का इस्तमाल करो...

पलक:– कुछ चीजें चाह कर भी नही हो पाती मायस्प..

मायस्प:– हां जैसे की वो जानवर आर्यमणि को तुम चाहकर भी भुला नहीं पाई...

पलक:– सच कहूं तो जितना उसे मारने को मैं व्याकुल थी, उतना ही उसके मरने का गम था। पिछले 4 सालों से एक ही ख्याल रोज आता है, काश उसे अपने हाथो से मारती...

मायस्प:– उसे न मार पाई न सही, उन लोगों को तो मार देती, जो तुम्हारे मां–बाप को मार गये... (उज्जवल और अक्षरा, जिसे भूमि, और आर्यमणि के माता–पिता ने मिलकर जला डाला था।)

पलक:– मैने उन्हे मारने का इरादा कब छोड़ा है? केवल ढूंढना बंद की हूं...

मायस्प:– मतलब...

पलक:– बदला तो उन लोगों को भी लेना है। कब तक छिपे रहेंगे?.. पृथ्वी पर शादी करने की एक वजह यह भी थी कि इस भीड़ में अपना बदला लेने, भूमि, जया और केशव जरूर आएंगे...

मायस्प:– बहुत शानदार... वरना मुझे तो लगा तुम भूल चुकी हो...

पलक:– कुछ बाते हम चाहकर भी नही भूल सकते... छोड़ो इन बातों को। तुमने वो वीडियो देख लिया न... बारात कैसे लेकर आनी है...

मायस्प उत्साहित होकर खड़ा हुआ। पलक के होटों को चूमकर वहीं नाग की तरह लहराते हुए... "मैं नगीन–नगीन, नागिन–नागिन, नागिन डांस नाचना"…

पलक खिल–खिलाकर हंस दी। दोनो शादी के पूर्व एक हसीन शाम का लुफ्त उठाकर अपने–अपने स्वीट्स में लौट आए। शादी का दिन था और लोग झूम रहे थे। राजशाही फौज इस बार कमान संभाली थी और चप्पे चप्पे पर उसके आदमी नजर दिये हुये थे। खुफिया तौर पर मेहमानों की जांच लगातार चल रही थी।

पलक को अंदेशा था कि इस शादी में भी हमला होगा, इसलिए उसने भी चप्पे–चप्पे पर अपने आदमियों को लगा रखी थी। मकसद सिर्फ इतना ही था कि यदि भूमि अपने लोगों के साथ पहुंची तो उसे सुरक्षित रास्ता देना, ताकि वो आसानी से अपना काम कर सके। मालदिव के एयरपोर्ट से लेकर टापू तक पलक के लोग नजर बनाए थे। किंतु भूमि अथवा उनके लोगों के होने की कोई खबर नही थी। अंत में पलक भी सुनिश्चित होकर तैयार होने के लिये चल दी।

रंगारंग कार्यक्रम से शादी के महफिल की शुरवात हुई। लड़के वाले जब भारतीय परंपरागत बारात लेकर निकले फिर तो वो लोग भी भूल गये की नायजो परंपरा क्या होती है। सब बिलकुल झूम रहे थे और बैंड बाजा के साथ तरह–तरह के करतब दिखा रहे थे। माया की बहन काया के साथ उसके पिता और विषपर प्लैनेट का मुखिया भी साथ चल रहे थे। सभी झूमते हुए दरवाजे तक पहुंचे। परंपरागत तरीके से सबका स्वागत हुआ। जयमाला स्टेज सजा हुआ था। दुल्हा और दुल्हन की क्या खूब जोड़ी थी। नीचे बड़े से मैदान में सभी आगंतुओं के बैठने की व्यवस्था थी। सबकुछ सही चल रहा था की तभी किनारे पर लगे बड़े–बड़े स्क्रीन पर बिन बुलाए मेहमान को दिखाया जाने लगा। हर किसी का ध्यान स्टेज से हटकर पीछे से आ रहे कुछ लोगों पर पड़ी...

हर किसी की आंखें फैल गई। पलक की नजरें भी उसी ओर गयी। जैसे ही उसकी नजर आर्यमणि से मिली, चेहरे पर अलग ही खुशी थी। मुंह से धीमे कुछ शब्द निकले और वह उठ खड़ी हुई। हर कोई मानो सामने से भूत को आते देख रहा था। और ऐसा मेहसूस भी क्यों न हो... ऐसे नजारे देखकर यही हाल होना था...

सबसे आगे आर्यमणि, उसके साथ महा, ओजल, निशांत और ऋषि शिवम थे। पीछे से भूमि, जया और केशव भी साथ आ रहे थे। इनके अलावा 5–6 संन्यासी और थे। सभी बिलकुल चकाचक तैयार होकर किसी हॉलीवुड स्टार की तरह शिरकत कर रहे थे।

माहौल में बड़बड़ाने की आवाज आने लगी। माया की बहन काया का एक इशारा हुआ और 4 बीस्ट वुल्फ एक साथ आर्यमणि के कारवां को चारो ओर से घेर लिये। आर्यमणि ने हाथ के इशारे से सबको 4 कदम पीछे हटने कहा। वहीं चारो बीस्ट वोल्फ बस अपने मालिक के इशारे का इंतजार कर रहे थे। इधर माया का इशारा हुआ और उधर चार दिशा से चारो बीस्ट वुल्फ आर्यमणि के ऊपर कूद गये।

मोटे धातु समान मजबूत पंजे। हीरे समान कठोर शरीर। वुल्फ और इंसानों का शिकर करके बने ये चारो बीस्ट वुल्फ अपना पूरा पंजा खोलकर आर्यमणि को गंजा करने के इरादे से हवा में कई मीटर ऊपर छलांग लगाकर आर्यमणि के ऊपर ही कूद रहे थे। शायद 4 सालों में आर्यमणि के खौफ को पूरी तरह से भूल चुके थे, या फिर ये चारो बीस्ट वोल्फ सुनी सुनाई बात पर यकीन न करते हो। तभी तो हमला करने कूद गये।

आर्यमणि के नब्ज में हाई टॉक्सिक के अलावा गति जैसे पूरे रफ्तार में बह रही हो। अचानक ही आर्यमणि के सर के ऊपर से उजले धुवांनुमा बड़ा शरीर बाहर आया। वह शरीर इतना विशाल था कि आर्यमणि का उजला धुवां वाला आधा शरीर ही ऊपर 200 फिट से ज्यादा ऊपर तक दिख रहा था। फिर तो जबतक वो चारो बीस्ट वोल्फ आर्यमणि के वास्तविक छोटे से शरीर पर अपने पंजे से प्राणघातक वार करते, उस से पहले ही हवा में उनके साथ कांड हो चुका था।

तभी सबके कानो में विस्फोट की आवाज आयी और आंखों के आगे हैरतंगेज नजारा। सभी बिस्ट वुल्फ पर हवा में ही आर्यमणि के उजले धुवां वाला 100 किलो का इतना तेज मुक्का पड़ा की उनके शरीर के चिथरे चारो ओर मैदान में फैले थे। आवाज विस्फोट जैसे हुआ और पीछे से खून और मांस के लोथरे कण स्वरूप हवा में उर रहे थे...

"देखो मैं ऐसे तैयार होकर लड़ने नही आया। वैसे भी शादी के माहौल में मातम न पसरे इसलिए मेरा रास्ता छोड़ दो"… आर्यमणि रुमाल से अपना हाथ साफ करते हुए अपनी बात कहा... तभी सुकेश भारद्वाज की आवाज आयी… "रास्ता छोड़ दो। आर्य है तो अपना भांजा ही। आखिर किसके परिवार में अन बन नही होती"…

आर्यमणि:– हां सही कहा मौसा जी। इसलिए तो तोहफे में मैं अपने प्यारे जीजा को लेकर आया हूं। आप भी तो अपने दामाद को कई सालो से नही देखे होंगे?

आर्यमणि अपनी बात कहकर बैग के अंदर हाथ डाला और वहां से जयदेव का कटा हुआ सर उछालकर स्टेज पर फेंकते... "जयदेव जीजू लगता है काफी रूठे हुए है... बात ही नही कर रहे।"… जयदेव का कटा हुआ सर देखकर हर नायजो का खून खौल गया... तभी वहां देवगिरी पाठक की आवाज गूंजी... "मार डालो इन सबको"…

देवगिरी की आवाज सुनकर 2 किनारे पर 2 लंबे कतार में नायजो सैनिक खड़े हो गये और खड़े होने के साथ ही अंधाधुन लेजर फायरिंग करने लगे। ठंडी बह रही हवाओं में गर्मी जैसे बढ़ गयी थी। आर्यमणि ने मात्र एक नजर महा और और ओजल को देखा। महा के कलाई पर बंधे एक छोटा सा त्रिशूल जैसे ही महा के हथेली में आयी, वह अपने पूर्ण आकार में थी। धातु का चमचमाता 5 फिट का त्रिशूल। महा त्रिशूल को अपने दोनो हाथों में थाम जैसे ही उसे हवा लहराई। वह तिलिस्मी त्रिशूल हवा में ही थी और उसके ऊपरी हिस्से से कई त्रिशूल निकलकर सीधा निशाने पर। एक किनारे से, एक कतार में खड़े होकर लेजर निकाल रही आंखों के सर हवा में थे और थरथराता, कांपता खून से लथपथ धर जमीन पर।

वहीं ओजल भी अपना कल्पवृक्ष दंश चला चुकी थी। ऐसा लगा जैसे ओजल ने दंश के निचले सिरे पर रबर लगा दिया हो। एक बार दंश उछाली तो दूसरी किनारे से कतार लगाकर लेजर किरणे छोड़ रहे सभी नायजो के गर्दन उसके धर से अलग थे। आर्यमणि पीछे अपने परिवार और संन्यासियों को देखते.... “कुछ ज्यादा हिंसा तो नही लग रहा न।”

एक संन्यासी:– गुरुदेव जर्मनी की हिंसा के मुकाबले बहुत कम। वहां तो सबको काट रहे थे, यहां वध कर रहे।

जाया:– बेटा मेरे लिये ये कुछ ज्यादा ही हो रहा है।

कोई एक और संन्यासी.... “हम सबको लेकर बाहर जाते है।”

इधर नायजो खेमे में जो आर्यमणि डर खत्म सा हो गया था, उसके आतंक देखकर सबके होश उड़ चुके थे। हजारों की भिड़ कुछ पल के लिये स्तब्ध हो गयी। नायजो आगे कुछ कदम उठाते, उस से पहले ही विषपर प्लैनेट का मुखिया सबको रोकते.… "तुम क्या चाहते हो लड़के"…

ओजल:– ओ भोंदू से शक्ल वाले मुखिया, अगली बार बात करने से पहले याद रहे की तुम सात्त्विक आश्रम के एक गुरु से बात कर रहे, जिसका नाम आर्यमणि है। तुम तमीज भूलोगे तो हमें भी तमीज सीखाने आता है...

मुखिया का अंगरक्षक.... “तुझे पता है तू किस से बात कर रही। तेरी पृथ्वी से कहीं बड़े भू भाग के ये मुखिया है। इनके बिना वहां पत्ता भी नही हिलता। सब मात्र कुछ करतब देखकर मौन हो गये क्या? इन बदतमिजों की टोली को उनकी औकाद दिखा दो।”

“मार डालो, मार डालो, मार डालो”.... नायजो की पूरी भिड़ एक साथ चिल्लाने लगी।

मुखिया अपने दोनो हाथ ऊपर करके सबको शांत रहने का इशारा किया.... “कुछ देखा, कुछ सुना। अभी मेरे एक इशारे पर हजारों की भिड़ कूद पड़ेगी। तुम शायद सैकड़ों को मार भी दो लेकिन उसके बाद।”

निशांत:– उसके बाद देखने के लिये यहां कोई जिंदा बचा भी होगा क्या? मुखिया अपने घर और सेना से काफी दूर हो। अपने लोगों को शांत करवा वरना अगली कोई लाश गिरेगी तो वो पहले तेरी ही गिरेगी...

मुखिया:– तुम्हारी जगह है इसलिए इतना बोलने की जुर्रत भी कर गये....

आर्यमणि:– शुक्र कर मेरी जगह है इसलिए इतना शांत भी हूं, वरना कहीं और होता तो अब तक एक भी जीवित नहीं होता। मुखिया अपने लोगों को शांत रख, वरना मेरे अंदर जो अशांति चल रही है, वह कहीं निकलकर बाहर आ गया तो विश्वास मान, मेरा आतंक देखकर भागने के लिये जितनी देर में तू अपना हाथ घुमाकर पोर्टल बनायेगा, उस से पहले मैं तुम्हारी लाश गिरा चुका रहूंगा। अपने लोगों को अनुशासन सिखा।

आर्यमणि अपनी बात समाप्त कर इशारा किया और पूरा अल्फा पैक नायजो की भिड़ के बीच से शिरकत करते हुए स्टेज पर जा पहुंचा। पलक खून भरी नजरो से आर्यमणि को देख रही थी.… "ये लड़की तुम्हे ऐसे क्यों घूर रही है आर्या"… महा सवालिया नजरों से पूछने लगी

आर्यमणि:– तुम खुद क्यों नही पूछ लेती महा..

महा:– पतिदेव मुझे इजाजत दे रहे या फिर मुझे ताने...

ओजल:– तुम दोनो का भी रोमांस इसी मौके पर जगा है। अभी दोनो रोमांस को दबा दो। पहले जरा पुराने हिसाब किताब कर ले...

आर्यमणि:– इन नायजो से क्या हिसाब किताब करना... इनके नाम में ही नाजायज है... यानी की जहां भी है गैर कानूनी तरीके से...

माया की बहन का काया:– भूल गया क्या, कैसे मेरी बहन ने सबको चीड़ दीया था... तू बच कैसे गया, यही बात दिमाग में है...

आर्यमणि:– हां सारी बातें याद है। कैसे पीछे से छिपकर आयी थी... अभी तू, तेरा ये बाप और सबको चिड़ने में मुझे कितना वक्त लगेगा उसका छोटा सा नमूना पहले ही देख चुकी हो। तुम्हारी बहन ने तो पीछे से चिड़ा था न, मै सिखाता हूं सामने से कैसे चिड़ते हैं।

विषपर का मुखिया जो शांति से सब कुछ समझ रहा था और अपने लोगों को रोक रखा था। वह पूर्ण आवेश में आते.... “जो भी मुझे इस हरमजादे आर्यमणि का सर लाकर देगा उसकी शादी मैं अपनी बेटी माया से करवा दूंगा।”...

मुखिया की बात पर पूरी भिड़ ही उग्र हो चुकी थी किंतु ऋषि शिवम और ओजल के एकजुटता वाले मंत्रों ने ऐसा असर किया की कोई अपनी जगह से हील नही पा रहा था। नजरों से लेजर किरणों का प्रयोग हो रहा था लेकिन वो किसी काम की थी नही। ओजल जोड़ से चींखी.... “बॉस इनकी जगह, इनका भिड़, और बेबस भी यही खड़े है। इन्हे सिखाओ की चिड़ते कैसे हैं।”

“बड़े मजे से सिखाऊंगा” कहते हुये आर्यमणि ने अपनी एक उंगली ऊपर की, और सिर्फ उसी उंगली का क्ला बाहर आ गया। फिर बड़े आराम से वो मायस्प के पास पहुंचा और अपना क्ला ठीक उसके सीने के बीच घुसा दिया। मुखिया चिंखा... "नही आर्यमणि"… काया चिल्लाई, पूरा नायजो समुदाय चिल्लाया, और उसके अगले ही पल सबके आंखों की लेजर चार गुना तेजी से निकलने लगी।

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king cobra

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Jabardast badla lekin ye dil abhi bhara noi aur marna hai sasuron ko khub maarna hai kisi ek Jane na deo
 

subodh Jain

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Are yar itne bade tirandaj aur fusi bumb nikle
Ye suru hone se pahle hi khatam ho gaye
Jese nain bhai ke update
Mene to socha tha kuchh dhamaka hoga
Jab nain bhai itne din baad Updet dege to
Fir bhi maja aya
Aap ki lekhni ka to me vese hi kayal hun
Bas Updet dete rahiye kyu ki intejar karna thoda mushkil hota hai
 
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ASR

I don't just read books, wanna to climb & live in
Divine
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nain11ster 🐺 🐺 🐺 🐺 🐺 🐺 🐺
💗 पूरा आनन्द उठाने के लिए अब इन्तजार नहीं किया जा सकता है मित्र continuity यानी कि समरसता भी कोई विषयवस्तु होती है.. अगले अंकों को भी एक साथ प्रेक्षण कर हमारे इस कार्यक्रम यानी कि आर्य संस्कृति समाज की एलियन से गुफ़्तगू उनको तुड़वाना तड़पना उनकी इस तरह की परेशानी परिस्थियों के सामने असहाय होना बहुत कुछ है पढ़ने के लिए...
अब तो माया चुन मुनिया मक्खी रानी व सभी नाजायज परग्रही को किए गए उनके जुल्मों की सजा दी जा रही है..
अद्भुत..
शीघ्र ही अगले अंकों को प्रस्तुत करने की कृपा करें मित्र..
जाय तो जाय कहा.. इन्तेज़ार मे..
जय हो 💦💦💗💗🐺😍🤗😴💖😉
 

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I love Fantasy and Sci-fiction story.
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भाग:–176


“बड़े मजे से सिखाऊंगा” कहते हुये आर्यमणि ने अपनी एक उंगली ऊपर की, और सिर्फ उसी उंगली का क्ला बाहर आ गया। फिर बड़े आराम से वो मायस्प के पास पहुंचा और अपना क्ला ठीक उसके सीने के बीच घुसा दिया। मुखिया चिंखा... "नही आर्यमणि"… काया चिल्लाई, पूरा नायजो समुदाय चिल्लाया, और उसके अगले ही पल सबके आंखों की लेजर चार गुना तेजी से निकलने लगी

नजरों से मौत की रौशनी तो निकल रही थी लेकिन वह मात्र बेबसी के प्रमाण से ज्यादा कुछ नहीं था। आर्यमणि एक नजर बेबस भिड़ को देखकर मुस्कुराया। उसने आहिस्ते से अपना क्ला नीचे खींचा, दर्द भरी चींख मयास्प के मुंह से निकल गयी.… "आर्य तुम मेरी शादी में ऐसा नहीं कर सकते?"… पास खड़ी पलक चिल्लाई...

ओजल:– हमने तुम्हे नही बांधा ड्रामा क्वीन। जा बचा ले अपने दूल्हे को, हम बीच में नही आयेंगे...

पलक:– लड़कों के अकाल पड़े है क्या? खुद की वीर गाथा बहुत सुनाता था। जाने ये मैं क्यों बीच में आऊं। हां लेकिन बराबरी का मौका तो मिलना चाहिए।

काया:– कामिनी बदजात, इंसानों की हिमायती। यहां के अधिकारी कोई गलत शक नही कर रहे थे तुम पर।

पलक:– इंसानों की पैदाइश होकर इंसानों से ही इतनी नफरत। भूल गयी नायजो परिवार को जिनमे इतना जोश भरा रहता था कि एक ही खून होकर भी आपस में संबंध बनाते थे। और नतीजा ऐसा हुआ कि नायजो के सारे मर्द ही नपुंसक हो गये थे। समुदाय गुमान तब कहां था जब इंसानों के आगे टांग फैलाकर बीज डलवाती थी।

काया:– हरामजादी, कुतिया, जाकर इंसानों के बिस्तर गरम कर, अब हमें उसकी ज़रूरत नही। बस एक बार मुझे खोल दे, तेरी औकाद क्या है वो मैं बताऊंगी...

आर्यमणि, का चेहरा पूरा लाल। आंखों से अंगार जैसे बरस रहे हो.… "कोई बचा है मेरे पैक में जो इसको जवाब दे सके।”

महा:– पतिदेव मेरा खून खौल रहा है। कितनी घटिया बातें कर रही है। कान बंद करो, इसे तो मैं जवाब दूंगी...

आर्यमणि:– हां कान बंद कर लिया...

महा, ने कुछ बड़बड़ाया और महज चंद सेकेंड में वह काया, गंदगी में नहा चुकी थी। बदबू ऐसी की आस पास कैद खरे नायजो अपनी नाक सिकोड़ रहे थे।.... “सुनो तुम चिंदी जैसे दूर ग्रह के निवासी। तुम जैसे बदबूदार कीड़े मेरे कैद खाने में रोज ही ऐसे रेंगते है। जिस समुदाय में अपने परिवार के साथ ही संबंध बनाते हो, वो बदबूदार मल से ज्यादा कुछ नहीं। मेटल टूथ इसे अभी चाहकीली तक पहुंचा दो और चाहकीली से कहना इसे कैदखाने तक पहुंचा दे। वहां ये अपने मीनार के सभी कैदियों के मल को साफ करेगी।”...

महा का आदेश और अगले ही पल वह जमीन के अंदर ही घुस गयी, और सब मुंह ताकते रह गये। आर्यमणि भद्दा सा मुंह बनाते... “बस इस बात के लिये मेरे कान बंद करवा दी। टीम किसी को मजा आया क्या?”

निशांत:– अलबेली के मुकाबले तो एक परसेंट भी न था।

ओजल:– अलबेली जैसा कोई नहीं। फिर भी कोशिश अच्छी की दीदी।

महा:– मुझे बताना की अलबेली यहां कैसा जवाब देती। मै कोशिश करूंगी...

आर्यमणि:– कोशिश करने से वैसे जवाब कभी निकल ही नही सकता। वो तो नेचुरल टैलेंट था, क्यों टीम...

पलक:– आर्य इतनी भीड़ को अटकाकर क्या बकवास ही करोगे या आगे भी कुछ करना है।

आर्यमणि:– आगे कुछ करूं उस से पहले अपनी टीम लेकर निकलो... हम कहां मीटिंग करेंगे...

पलक:– वहीं जहां से सबकी शुरवात हुई थी। नागपुर में ही मिलते है।

आर्यमणि:– ठीक है तुम अपने लोगों को लेकर निकलो। मै नागपुर में मिलता हूं। उम्मीद है तुम्हारे पास इन नजायजों को भगाने का कोई कारगर उपाय होगा वरना सबकी लाश इसी भूमि पर गिरेगी...

पलक:– कोई नही लाश भी गिरानी पड़ी तो भी चलेगा... मै हर परिस्थिति के लिये तैयार हूं। और हां आर्य... यहां दर्द और चींख का फिर से वही माहौल होना चाहिए, जिन्हे ये भूल चुके थे। कोई रहम नहीं... मार डालो सबको...

आर्यमणि:– ऐसा बना बनाया माहौल देने का शुक्रिया। शिवम सर पलक के लोगों को जरा नागपुर तक छोड़ आइये...

पलक स्टेज से उतर गयी। वह अपने लोगों को समेटने लगी। ऋषि शिवम, पलक के जिन साथियों को जानते थे उन्हे पहले भी कैद नही किया था। और वो लोग जिन्हे चिन्हित करते गये उन सब को भी छोड़ दिया गया। इधर आर्यमणि उस मायास्प को पहले हील किया बाद में उसे छोड़ते.... “देखूं कितना बड़ा तोप है तू।”...

जैसे ही वह मायस्प छूटा उसके अगले ही पल आर्यमणि के पाऊं के नीचे किरणों का घेरा था। आर्यमणि ने कुछ मंत्र पढ़े और उसके एमुलेट से रौशनी निकलने लगी जो प्रिज्म आकर में आर्यमणि के पूरे शरीर के घेरे थी। मायस्प हालांकि आर्यमणि को पहले ही घेरे में ले चुका था, इसलिए उसने अपना अगला रणनीति शुरू किया। गोल घेरे के चारो ओर 6 रॉड लगाने का।

मायस्प जोड़ से चिल्लाया.... “रॉड कहां है।”..

आर्यमणि एक कदम आगे बढ़कर वह घेरा पार किया और एक झन्नाटेदार थप्पड़ लगाते.... “तू रहने दे भाई रॉड हम ढूंढ लेते है। तुम तीनो (निशांत, महा और ओजल) ऐसा रॉड ढूंढो, जिसके सिरे पर पत्थर लगा हो। ओह हां महा जितने भी लोग यहां कैद है सब पर मेटल टूथ छोड़ दो और उनसे कहो इन सबके पास जो भी पत्थर है उन्हे इकट्ठा कर ले। मै जरा इस रॉयल बेबी की वीरता भी चेक कर लेता हूं।

मायस्प:– देखिए मैं कोई वीर नही। बस वीरों के समूह के साथ जाता था और उनके कारनामों को अपना बता दिया करता था।

आर्यमणि वापस से उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मारा। इस थप्पड़ ने तो जैसे उसके होश उड़ा दिये हो। तुरंत ही उसने एक पोर्टल खोला और जैसे ही अपना पहला कदम उस पोर्टल में रखा आर्यमणि ने मात्र के इशारे किये और हवा को ही रस्सी बनाकर मायास्प के पाऊं में फसाया और खींच दिया। मुंह के बल गिड़ता, जमीन पर घिस्टाते, आर्यमणि के पाऊं में था। आर्यमणि, नीचे बैठकर उसके बालों पर हाथ फेरते..... “क्यों भाई मैदान छोड़कर क्यों भाग रहे थे। अब ये खेल उबाऊ लग रहा है। तू हार गया।”...

इतना कहकर आर्यमणि ने फिर से उसे मंत्रों के जाल में बांध दिया और बाल को मुट्ठी में दबोचकर उसे एक हाथ से ही किसी छिली मुर्गी की तरह उठा लिया। एक बार फिर आर्यमणि अपने एक उंगली के क्ला को बाहर किया और सीधा उसके सीने में घुसाकर थोड़ा सा चीड़ दिया। दर्द की खतरनाक चींख उसके मुंह से निकल गयी। तभी वहां लगे बड़े–बड़े स्क्रीन पर माया की तस्वीर आने लगी। बड़े से बुफर में उसकी आवाज गूंजी..... “सबके हाथ–पाऊं बांधकर एक अकेले मासूम को मारने में क्या वीरता है आर्यमणि।”

आर्यमणि:– तू अभी तक जिंदा है। मुझे लगा मेरे लौटने की खबर सुनकर कहीं आत्महत्या न कर ली हो।

माया:– तू इतना ही बड़ा वीर होता न तो मेरे लोगों को अपनी तिलिस्मी जाल में फसाकर एक मासूम की जान न ले रहा होता।

आर्यमणि:– तूने भी तो यही किया था न... अपने पर आयी तो बिलबिला रही है।"…

माया:– तुम्हारी दोषी मैं हूं, उसने क्या बिगाड़ा है...

आर्यमणि:– मैने किसी का क्या बिगाड़ा था? मेरे दादा वर्धराज ने क्या बिगाड़ा था? गुरु निशि ने क्या बिगाड़ा था? आश्रम के सैकड़ों शिष्य जिन्हे जिंदा जला दिया, उन्होंने क्या बिगाड़ा था? मेरी पत्नी वो तो उल्टा तुम्हारे जुल्मों का शिकार थी। उस निर्दोष ने किसी का क्या बिगाड़ा था? रूही की तरह वो चुलबुली प्यारी अलबेली, जिसके होने से ही चेहरे पर मुस्कान आ जाए। इवान उसने तो अभी दुनिया देखना शुरू ही किया था... क्या बिगाड़ा था इन सबने?... आंखों के सामने जब अपनो की मौत हो तब कैसा लगता है उसका मजा तुम भी ले लो...

मायस्प:– आज तू मुझे मार ले लेकिन मेरे लाखों शागिर्द तुझे ढूंढ निकालेंगे। उस दिन तू खुद को कोसेगा... तेरा सीना चिड़कर दिल बाहर निकाल लेंगे...

“मैने भावना वश अपने सुर क्या नीचे किये तुम तो धमकी देने लगे मेरे दोस्त।”.... आर्यमणि अपने घुसे क्ला को थोड़ा और अंदर घुसाया और पलक झपकते ही सीना चिड़कर मायस्प का धड़कता दिल अपने हथेली पर रखते... "क्या ऐसे ही तू मेरा दिल निकाल लेता... बोल ना भाई... अरे यार ये बोलता क्यों नही"…

आर्यमणि जोड़ से चिल्लाते हुए अपनी बात कह रहा था और दूसरी ओर का पूरा माहौल ही सकते में। आर्यमणि ने उस नायजो का सीना चीड़ दिया, जिसे चर्चाओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता था। सबके मुंह खुले हुये थे। माया गुस्से में फुफकार मारती.... “सिर्फ तू ही नही, पृथ्वी से पूरी मानव सभ्यता को ही हम समाप्त कर देंगे।”

आर्यमणि:– बड़बोली कहीं की। यहां अगर होती तो तुझे चीड़ देता। फिर तेरा बदला धरा का धरा रह जाता। लगता है अभी तेरी अक्ल ठिकाने नही आयी है। रुक तुझे तमाशा दिखाता हूं।

ओजल, बड़ी तेजी से स्टेज तक पहुंचती.... “हमे काम पर लगाकर एक को टपका भी दिया। जीजू थोड़ी देर रुक नही सकते थे।”..

महा:– और स्क्रीन पर ये लड़की कौन है जो गुस्से में लग रही। चेहरे से तो ये भी उस काया की तरह घिनौनी दिख रही।

आर्यमणि:– हां ये है भी घिनौनी। निमेष के साथ उस दिन ये भी थी। खैर आगे का काम देखते है। सो, दूर ग्रह से पहुंचे घिनौने नायजो। पृथ्वी पर गैर कानूनी तरीके से उपस्थिति के लिये मैं तुम सबको यहीं चीड़ दूंगा। लेकिन मेरा दिल कर रहा है कि तुम में से कुछ को जाने दूं, जो मेरी कहानी अपने ग्रह पर सुना सके। तो बताओ कौन बनना चाहेगा वो खुशनसीब.... तुम सब की कोई एक उंगली काम कर रही है उसे बस सीधी कर लो। जिसे भी चुना जायेगा, वह खुशनसीब यहां से जिंदा जायेगा....

माया:– देखो आर्य ऐसा मत करो। तुम जो भी सोच रहे उसे अभी रोक दो। मै वादा करती हूं सबको लेकर पृथ्वी से चली जाऊंगी। लेकिन प्लीज इन्हे कुछ मत करो।

आर्यमणि:– तुम शो इंजॉय करो। आखरी में तुम्हारे काम की बात भी मैं करूंगा। ओजल किसी 2 उंगली उठाने वाले को उसकी कैद से आजाद करो।

मल्टीपल च्वाइस में से ओजल ने एक लड़का और एक लड़की को आजाद किया। आर्यमणि उन दोनो को जिंदा रहने की बधाई देते.... “अभी जिंदा रहने के लिये चुने गये हो। लेकिन जिंदा उसी शर्त पर रह सकते हो जब तुम इस मुखिया के सभी बच्चों की पहचान करवाओ।”

उन दोनो को मात्र एक मिनट का वक्त लगा और उन दोनो ने 4 लड़की, 6 लड़को को चिन्हित कर दिया।.… सभी चिन्हित भाई बहन को अलग छांट दिया गया। आर्यमणि खुद मुखिया बाप के पास पहुंचा...."क्यों भाई कोई फैमिली प्लानिंग नही किये थे क्या, जो इतनी निक्कमी संतान पैदा हो गयी"…

मुखिया अपना सर झटकने लगा। आर्यमणि उसका मुंह खोलते.... "बोलो, क्या कहना चाहते हो।”

मुखिया:– मेरा वादा है कल सुबह होने से पहले मैं तुम सबकी लाश गिरा दूंगा।

आर्यमणि:– अपनी तादात बढ़ाने में तुम सब हैवान बन चुके हो... आज कोई रहम नही होगी। महा मुझे इन भाई बहनों के मौत की चींख क्यों नही सुनाई दे रही। और तुम क्या कर रही हो ओजल, सबको कांटों की चिता का दर्द याद दिलाओ। केवल ये मुखिया और उन दो लोगों को छोड़ देना जिन्होंने हमारी मदद की है।

आर्यमणि के एक आदेश पर फिर से कल्पवृक्ष दंश और त्रिशूल तन गये। देखते ही देखते मंत्रो की कैद में फंसी नायजो की भिड़ कांटों की चिता पर लेटे थे। वही कांटों की चिता जिन्हे नाजयो वाले भूल चुके थे। वही कांटों की चिता जिसपर लेटने के बाद हर नायजो उस वक्त को कोसता की क्यों उसने बॉडी पर ऐसा एक्सपेरिमेंट करवाया जिस वजह से उनकी मौत नही हो सकती और बदन में घुसे 100 से भी ज्यादा मोटे कांटे दर्द का इम्तिहान लेने पर तुले होते।

खैर, ओजल ने सबको बेइंतहा दर्द की चिता पर लिटाकर उनका मुंह पैक कर चुकी थी। उसके अगले ही पल महा का तिलिस्मी त्रिशूल चला और मुखिया के आंखों के सामने उसके सभी बच्चों के सर उसके धर से अलग थे। न तो बोलने का कोई मौका दिया और न ही किसी को खुला छोड़ा। बस मौत के एक इशारे थे और उस इशारे पर मौत का तांडव।

केवल दूर बैठी माया और कैद में फंसी काया को छोड़कर मुखिया के सभी बच्चों की लाश गिर चुकी थी। कांटों की चिता पर लेटा हर नायजो डर के साए में था। हर किसी का मुंह तक बंधा था, वरना गिड़गिड़ाने की आवाज चारो ओर से आती। ओजल और महा दोनो एक साथ.... “और कोई आदेश बॉस।”

आर्यमणि:– महा तुम भी बॉस बोल रही।

महा:– पतिदेव काम के वक्त आपको बॉस बुलाना ज्यादा अच्छा लगता है।

ओजल:– हो गया तुम दोनो का, तो आगे का भी देख ले। इस पूरी भिड़ का करना क्या है।

आर्यमणि:– क्यों माया तुम्हारी बोलती क्यों बंद है बताओ क्या करूं मैं इस भिड़ का।

आर्यमणि की बात सुनकर माया कुछ न बोली सिवाय अपना कनेक्शन काटने के। वहीं खड़ा मुखिया भी लाचार सा दिखा। गिड़गिड़ाता रहा सबको छोड़ दो। लेकिन आर्यमणि के कान पर जूं तक न रेंगी। 2 अतिथि और फुदक रहे थे, सुकेश और मीनाक्षी। आर्यमणि उन्हे कांटों की चिता से उठाकर उनका मुंह खोल दिया.... “क्यों मेरे मौसा, मेरी मौसी... कुछ बोलने को नही है क्या?”...

मीनाक्षी:– क्या इस बात से तू इनकार कर सकता है कि मैने तुझे अपने बेटे की तरह नही चाहा?...

आंखों में थोड़े आंसू थे। दिल भारी था। तेज उसकी रफ्तार थी। दिमाग के एक हिस्से में मीनाक्षी के साथ बिताए अच्छी यादें थी तो दूसरे हिस्से की करवाहट। तेज दौड़ते आर्यमणि मीनाक्षी के पीछे जाकर उसके गर्दन को अपनी भुजाओं से दबोचा और दूसरे हाथ का क्ला निकला पूरा पंजा उसके सर में घुसा था। मीनाक्षी कसमसाती रही। खुद को छुड़ाने की जी तोड़ कोशिश करती रही। मीनाक्षी को छटपटाते देख सुकेश ने हमला बोल दिया। बादल, बिजली, आग पानी सब आर्यमणि के सामने थे बेकार। फिर भी मीनाक्षी को बचाने के लिये सुकेश अपनी बेकार कोशिश करता रहा। मीनाक्षी छटपटाती रही। आर्यमणि के आंख से आंसू बहते रहे।

जब कुछ काम न आया तब बेबस इंसानों की तरह सुकेश आर्यमणि के कदमों में गिड़ा था। रहम की भीख मांगता रहा। शायद दिल अभी उतना पत्थर का नही हुआ था, इसलिए तो आर्यमणि ने अपनी मजबूत पकड़ से मीनाक्षी को आजाद कर दिया। आजाद होते ही मीनाक्षी भी आर्यमणि के पाऊं में गिरी थी, और ये पूरा नजारा एलियन के सिक्योर चैनल से लाइव रिले हो रहा था, जिसे पृथ्वी पर बसा हर नायजो देख रहा था।

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