Update 64:
खाना स्वादिष्ट बना था ओर पापा का फेवरेट था । दादी ने पापा को मनाने के लिए आज सबकुछ उनके पसंद का बनाया था । कहते है मर्द के दिल का रास्ता पेट से हो कर जाता है। पापा का दिल भी हर निवाले के साथ पिघलता चला गया और दादी से नाराजगी भी कम होती चली गई ।
उधर प्रज्ञा के साथ जो कमरे में घटना हुई, प्रज्ञा उसे भले ही सब के सामने दर्शा नहीं रही थी । मगर उसे उस घटना ने, झकझोर दिया था । उसका दिल अभी भी जोरो से, धड़क रहा था और वो अपने आप को शांत करने की कोशिश कर रही थी । आखिर ये उसके साथ हुआ भी तो पहली बार था । प्रज्ञा बस ये निर्णय नहीं ले पा रही थी, कि ये जो हुआ अभी पापा के कमरे में उसके साथ , वो उसे अच्छा लगा या बुरा , क्योंकि ये एकदम नया सा अनुभव था उस 18 साल की कच्ची कली के लिए ।
उस बेचारी को तो आज से कुछ दिनों पहले तक, ये भी मालूम नहीं था, कि शुहागरात में क्या होता है , चुदाई किसे कहते है , उसमें क्या क्या होता है ? और तो और,जब प्रज्ञा ये सब सुन के परेशान हो गई थी या जोश में आ के बेचैन सी हो जाती थी तो , उसे तो अपने आप को तृप्त करना भी दादी ने हाल में ही सिखाया था । वो एक नादान , कच्ची कली , लड़की ही तो थी ।
वो एक बार को पापा को देख रही थी। वो शांत थे और आराम से खाना खा रहे थे । चेहरे पे बिल्कुल भी कोई बेचैनी का भाव नहीं । अब पापा इतने अनुभवी आदमी तो थे ही, कि उनका चेहरे को देख कर कोई बात नहीं सकता कि ये आदमी अभी कुछ देर पहले ही अपने बेटी को गोद में बिठा के उसकी बुर की गर्मी महसूस की है और बहक रहा था । और पापा तो सच में अनुभवी थे , पहले प्रज्ञा के मां के साथ जीवन का भरपूर आनंद लिया , उन्हें दो बार गर्भवती किया । फिर प्राची के साथ नया जीवन की शुरुआत की और आज वो भी पापा के कृपा से गर्भ से थी ।
सब अपना खाना चुप चाप खा थे । दादी पापा से बोल पड़ी : बेटा , खाना कैसा बना हुआ है?
पापा दादी से अभी भी बोलना नहीं चाहते थे , मगर अब गुस्सा करने का कोई फायदा नहीं था और वैसे भी अपने मां से कब तक गुस्सा किया जा सकता था ।
पापा: ह्म्म्म...अच्छा है।
दादी : मुझे खुशी है कि तुम्हे खाना पसंद आया बेटा । बेटा , मुझे माफ कर दे। मैने गुस्से में तुझे बुरा भला जो बोल दिया, उसके लिए मै बहुत ही शर्मिंदा हूँ। मैने अपने जिम्मेदार बेटे पे इतना गुस्सा किया इसके लिए मुझे बहुत दुख है बेटा । तेरे कारण ही इस घर में खुशियां लौटी है , घर में एक नया मेहमान आने वाला है और तुझे मैने इस तरह से खरीखोटी सुना दिया, बिना पूरे मामले को जाने, उसके लिए मै बच्चों के सामने तुमसे माफी मांगती हूं।
प्राची : हां पापा, दादी को पूरा मामला पता नहीं था, जिसके कारण उसने आपको दोषी मान लिया, मेरे इस हालत का । पापा दादी को माफ कर दीजिए ।
पापा: अब तेरी हालत कैसी है ?
प्राची : अच्छी है पापा।
पापा: ह्म्म्म...बढ़िया ।
पापा दादी से : आपको थोड़ा सोचना चाहिए था माँ, बोलने से पहले ।
दादी : हां बेटा , तुम दोनों के बीच में जो भी हुआ हो , मुझे उस मामले में नहीं पड़ना चाहिए था । शायद मै ही कुछ ज्यादा इंटरफ़ेयर कर रही थी, एक मियां बीवी के रिश्ते के बीच । गलती तो मेरी भी है । इतनी कम उमर में ही प्राची को गर्भ धारण के लिए बार बार बोला मैने । जबकि मुझे ये तो पता ही था कि कम उमर में गर्भ धारण के लिया गर्भाशय पूरा विकसित नहीं होता । मै ही इस सबकी जिम्मेदार हूं। अभी एक तो प्राची की शादी नहीं करनी चाहिए थी । वो भी मेरे कारण ही हुआ , फिर नई नई शादी का प्राची को मजा लेना चाहिए था , तो मैने उसे बच्चे के लिए दबाव बना दिया । ये सब मेरी गलती है ।
प्राची : दादी ये आप क्या कह रही है । मैने पापा के साथ शादी आपके कहने से जरूर की है , मगर मैं ना चाहती तो ये शादी थोड़ी न होती । मुझे तो पापा से प्यार है। इसलिए मैंने पापा से शादी की । और शादी के बाद गर्भवती होना तो एक लड़की को सौभाग्य होता है । महिलायें गर्भ धारण के लिए तो पता नहीं कितने मन्नत करती है । वो तो पापा के कृपा से मुझे इतना जल्दी गर्भ धारण हो पाया। उसके लिए मुझे कोई दिक्कत नहीं। मुझे तो इस बात की बहुत खुशी है दादी की ,इस घर में मै खुशियां ला सकती हूं।
पापा: मां, आपकी कोई गलती नहीं है। अपने आप को कोसना बंद कर दीजिए । जो हो गया , जो बीत गया , उसे सोच के दुखी होने का कोई मतलब नहीं है । जो होना था, वो हो चुका । मेरी और प्राची की शादी हो चुकी, और अब वो मां बनने वाली है । तो बेहतर यही होगा कि हम आने वाले समय की खुशी बनाए । पिछले बातों को याद कर के खुद को कोसना कोई बुद्धिमान काम नहीं है। ऐसा होता तो मै खुद को भी दोषी ही मानता रहता , एक बाप होके मैने अपनी बेटी से शादी की हामी भरी । मेरी तो यही सबसे बड़ी गलती थी । कौन बाप अपने बेटी से ब्याह रचता है। मगर अगर मै उन सब बातों को ही सोचता रहूंगा, तो अपने प्राची के साथ ,मै कभी वैवाहिक जीवन अच्छे से नहीं बिता सकता था । शादी से पहले वो बेटी थी और शादी के बाद मेरी पत्नी है , तो वर्तमान में मेरा जो रिश्ता प्राची के साथ है , मै उसी को भाग्य का लिखा मान के प्राची संग भरपूर आनंद लिया और अब मेरी बेटी मेरे बच्चे की मां बनने वाली है। ये सब होनी का खेल है मां, इसपे किसी का जोर नहीं , तो इन सब बातों को भूल जाए और आगे बढ़िए। और मैने आपको माफ किया । प्राची की हालत का जिम्मेदारी मेरी भी उतनी ही बनती है। मै भी प्राची के साथ तो बहक ही गया था ।
इस बातचीत में सब ये भूल गए थे कि प्रज्ञा भी वहां बैठी है। प्रज्ञा पापा की बाते सुन के पापा से बहुत प्रभावित हो गई थी । उन्होंने दादी को भी माफ कर दिया था । उसे इस बात की भी खुशी थी ।
दादी : बेटा , तुम ठीक कहते हो , हमे आने वाले खुशियों पे ध्यान देना होगा । प्राची की ख्याल रखना होगा अच्छे से । और सुन , अगर तू मुझे अभी भी गार्जियन मानता है तो एक बात कहना चाहती हु ।
पापा : तुम मेरी मां हो , तो इसमें गार्जियन मनाने वाली क्या बात है , तुम तो हो ही ।
दादी : तो ठीक है , बेटा प्लीज अब प्राची से जितनी दूरी बन सके, शारीरिक रूप से, वो बना ले , मानसिक रूप से तो प्राची को तेरी बहुत जरूरत है। मगर शारीरिक रूप से उससे तुझे दूरी बनानी ही होगी ।
पापा: हां ये बात डॉक्टर ने भी बोला है । तो मै आज से इसे अमल में लाउंगा ।
दादी : ठीक है बेटा , मगर अब मै कोई रिस्क नहीं ले सकती । तुम दोनों को साथ बंद कमरे में सोना भी ठीक नहीं , क्योंकि अगर दो लकड़ी आपस में रगड़ खाएगी, तो चिंगारी निकलेगी ही । और आग लगने का भी खतरा बहुत जायदा है। इसलिए आज से मेरा एक फैसला ये है कि , आज से प्राची मेरे साथ ही सोया करेगी । और तू प्राची से दूरी बना के अपने कमरे ने ही सो।
प्रज्ञा : मगर दीदी शादी से पहले तो मेरे साथ सोती थी , उसे मेरे साथ ही सोने दो दादी ।
दादी : नहीं बेटा , तू नहीं जानती , जब चिंगारी भड़कती है तो कदम बहक सकते है । मै प्राची को अपने देख रेख में रखना चाहती हु । ताकि रात को चाह के भी ये पापा के कमरे में ना जा सके ।
पापा ये सब सुन के, उनपे पहाड़ टूटने जैसा महसूस कर रहे थे । मगर दादी बात तो ठीक कह रही थी। मगर अब प्राची से 6-7 महीने की दूरी , कैसे सहेंगे ? पापा का चेहरा मुर्झा गया , मगर ये जरूरी था प्राची के लिए । तो पापा ने अंत में हामी भर दी ।
अब प्राची का नया ठिकाना , दादी का कमरा होने वाला था और पापा अपने अकेलेपन के साथ 6-7 महीने जीने वाले थे । अब ये समय आगे क्या करवट लेता है , वो किसी को पता नहीं था । प्राची अंदर से दुखी भी हुई थी , उसे अब अपने पति से दूर रहना पसंद नहीं था। मगर अब तो पापा भी मान गए थे और दादी की बात भी सही थी । इस कारण से प्राची भी ये त्याग करने के लिए, दुखी मन से ही, मगर मान गई ।
मगर इस फैसले से सब दुखी नहीं थे। प्रज्ञा इस फैसले से खुश थी । पता नहीं आज उसे क्या हुआ था ? पापा के साथ उस कमरे में हुए घटना के कारण उसके नए अरमान जाग रहे थे । उसे आगे आने वाले समय में कुछ नयापन सा लग रहा था । उसे अचानक प्राची सौतन की तरह लगने लगी थी । मगर ऐसा भी नहीं था कि पापा की वो हरकत उसे बहुत अच्छा लगा हो । वो एकदम ही कंफ्यूज की दशा में थी और ये सब बात को समझने के लिए थोड़ा समय तो प्रज्ञा को चाहिए भी था ।
खैर सब लोग खाना खत्म कर अपने अपने कमरे में गए । आज पापा का कमरा प्राची के वहां ना होने से सुना लग रहा था । वही दादी अपने बगल में प्राची का तकिया लगा के उसका सोने का स्थान सुनिश्चित कर चुकी थी । वही आज प्रज्ञा अपने कमरे ने लेट चुकी थी , और आज उसे जल्दी नींद नहीं आने वाली थी । वो सोच में डूबी थी और सारे बातों को प्रोसेस कर रही थी । उसके लिए आज, जो पापा के साथ हुआ, वो झकझोर देने वाला था । भले ही वो पापा के साथ मजाक करती थी एक साली के तौर पे , मगर इस तरह से उसके और पापा के बीच कुछ होगा , उसकी उसे उम्मीद नहीं थी ।
ये रात उस घर में सबकें लिए नई रात थी । पापा से प्राची अलग हो चुकी थी , प्रज्ञा भी पापा के साथ हुए घटना के कारण कंफ्यूज थी और प्राची को भी अब से आगे दादी के साथ सोना पड़ेगा।
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