यह ग्लोबल इश्यू नही है बल्कि हमारे देश की पोलिटिकल प्रोपेगेंडा इश्यू है ।
सामाजिक , आर्थिक , धार्मिक के साथ साथ अब साइंस को भी पोलिटिकल इश्यू बना दिया इन्होने ।
कम से कम विज्ञान को तो बाद कर देते यह लोग !
Guruji the second Elon Musk_ Kehte hain
Mere Marne ke baad meri arthi ko uski gali se le jaana
Aur jab woh dikhe toh ek baar mera khada karke use dikha dena

एस्ट्रोजेनिका ने 2021 में ही अपने रिसर्च पेपर में यह बताया था कि थ्रोमबोसिस इसका बहुत ही रेयर साइड इफ़ेक्ट हो सकता है। बाद में पता चला कि यह दस लाख लोगों में से किसी एक व्यक्ति को हो सकता है। अब जिसको थ्रोमबोसिस होगा, उसको इससे मृत्यु की संभावना भी केवल 1% है। अर्थात् इस वैक्सीन को यदि दस करोड़ लोगों को दिया जाय तो किसी एक व्यक्ति में मृत्यु की संभावना बनेगी। जबकि कोरोना से मृत्यु की संभावना अपने आप 2-3% थी अर्थात् 100 में से 2-3 व्यक्ति की। अब आगे और महत्वपूर्ण बात यह है कि कोरोना में जो मौतें हुई उसमें से बहुतों का कारण यहीं थ्रामबोसिस ही था। अतः दस करोड़ में से एक घटने वाली घटना से डरकर, उस घटना को आमंत्रण देना जिससे 100 में से 2 लोगों की मृत्यु हो सकती है, स्पष्ट करता है कि यह समझदारी वाला काम नहीं है । कोविशिल्ड की इफ़ेक्टिविटी बाद में लगभग 90% साबित हुई। अतः उस चीज का विरोध करना जिसने मानवता की इतनी बड़ी सेवा की, निकृष्टता है। ब्लड कैंसर में बोन मैरो ट्रांस्प्लांट के दौरान ही 5-10% मरीज़ों की मृत्यु कैंसर के बजाय केवल उस प्रक्रिया से हो जाती है बावजूद इसके पिछले चार दशक से यह पहली चॉइस है। कभी किसी ने नहीं कहा कि यह इलाज लोगों को मार रहा है क्योंकि किसी भी दवा, इलाज और इंटरवेंशन को समग्रता से देखा जाता है। यह देखा जाता है कि नेट इससे मानवता बच रही है या नहीं। इस हिसाब से मानवता को कोवीशील्ड के आविष्कारकों का धन्यवाद देना चाहिए।
भूपेंद्र सिंह
रक्त विशेषज्ञ
Chandan Hospital, lucknow
@UpExamWale2020

No parchi accepted by mePotari me se parchi dhoond ke nikaalne ka mehn.![]()

पुनः -- यह ग्लोबल इशू है। भारत में कोई केस ही नहीं है। बनेगा भी नहीं।
पॉलिटिक्स की क्या कहें? अगर प्याज पर पॉलिटिक्स हो सकती है, तो किसी भी बात पर हो सकती है। वो तो छोड़ ही दीजिए।
इंग्लैंड में जो केस दायर किया गया है, वो 51 लोगों ने, जिनको TTS की समस्या हुई, दायर किया है। फिलहाल इस लॉ-सूट की वैल्यू US$ 125 मिलियन है। केवल मृत्यु ही एक समस्या नहीं होती -- जिनको दिमाग में ब्लड क्लॉट होता है, उनका जीवन वेजिटेटिव हो जाता है। असमय ही वो अपनी याददाश्त/अंग-सञ्चालन क्षमता इत्यादि खो सकते हैं। यह स्थिति मृत्यु से भी भयावह है और इसके केयर में बहुत खर्च आता है। ऐसा क्लॉट शरीर में कहीं भी हो सकता है।
यह वैसा ही केस है, जैसा जॉनसन एंड जॉनसन के टैलकम पाउडर के खिलाफ दायर किया गया था, इस दावे के साथ कि पाउडर से ओवेरियन कैंसर हुआ है। आज उस लॉ-सूट की वैल्यू US$ 6.5 बिलियन है।
कुछ देशों में वैक्सीन को जबरदस्ती लगाया गया है - जैसे कि ऑस्ट्रेलिया में। अनेकों संस्थानों (सरकारी -- पुलिस, अस्पतालों, शिक्षण, इत्यादि) ने काम पर वापस आने के लिए पहली शर्त यह रख दी कि वैक्सीन लगवाओ, नहीं तो नौकरी नहीं रहेगी। जिन्होंने नहीं लगवाया, उनकी नौकरियाँ सच में चली गईं। Informed consent एक बात होती है, लेकिन informed coercion दूसरी! जब निर्णय लेने में स्वायत्तता नहीं रहती, तब किसी बात के नकारात्मक संज्ञान से विद्रोह उत्पन्न होना लाज़मी ही है।
मेरे एक मित्र के माता-पिता घूमने के लिए उसके पास सिडनी गए थे। जब ऑस्ट्रेलिया में वैक्सीन मिलनी शुरू हुई, तब उनके माता-पिता को अस्ट्राज़ेनेका वाली वैक्सीन लगाई है। वैक्सीन लगने के कोई दस दिनों में उनके पिता के मस्तिष्क में क्लॉट बन गया। पूरे तेरह महीने उनका इलाज चला। न बोल पाते, न किसी को पहचान पाते, और न ही उठ-बैठ पाते। अभी तीन महीने पहले वो चल बसे। कोई AU$ 400,000 का खर्च आया उनकी चिकित्सा पर! मित्र बेचारे लगभग कंगाल हो गए हैं।
अब इस विषय पर और नहीं लिखूँगा - बहस करने का कोई मन नहीं है।
जिन लोगों पर त्रासदी आती है, बस वो ही समझते हैं उसकी मार। बाकी लोगों के लिए ये बातें बस statistics मात्र रहती हैं।![]()
Riky007 SANJU ( V. R. ) Samar SinghAND... surprise, surprise...
AstraZeneca have now quietly stopped producing covid vaccine, and it withdrawing from the EU market [correction at 10:30am : now include global market also...!]
If it is such a life-saver, why is it suddenly removed? If the lawsuit against AZ and this decision are not extremely connected, then I must be from Mars.
What is funny is that no mainstream media has run this MASSIVE news!! Surprise, surprise! [correction at 10:30am : because social media ran with this story, so mainstream media is now forced to take it up and report]
Questions should be asked: how many individuals 'actually' suffered from its side effects? What is the cover up?

In a statement, AstraZeneca said the decision was made because there is now a variety of newer vaccines available that have been adapted to target Covid-19 variants. This had led to a decline in demand for the AstraZeneca vaccine, which is no longer being manufactured or supplied.
In a statement, AstraZeneca said the decision was made because there is now a variety of newer vaccines available that have been adapted to target Covid-19 variants. This had led to a decline in demand for the AstraZeneca vaccine, which is no longer being manufactured or supplied.
“According to independent estimates, over 6.5 million lives were saved in the first year of use alone and over 3bn doses were supplied globally,” the statement said.
“Our efforts have been recognised by governments around the world and are widely regarded as being a critical component of ending the global pandemic. We will now work with regulators and our partners to align on a clear path forward to conclude this chapter and significant contribution to the Covid-19 pandemic.”
Other countries have already stopped supplying the vaccine. It has not been available for use in Australia since March 2023, though its use was already being phased out from June 2021 due to the widespread availability of newer vaccines.
I think the cases were filed after 2021, isn't it?