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Adultery Didi Ki Dilchaspiyaan

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Being Slut

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अगली सुबह कुछ अलग ही थी। हवा में ताज़गी थी, और सूरज की हल्की-हल्की किरणें कमरे में आ रही थीं। हमेशा की तरह मैं सबसे पहले उठने वाला था, लेकिन उस दिन दीदी मुझसे भी पहले जाग चुकी थीं।
रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी। मैंने चौंककर देखा — दीदी चाय बना रही थीं। ये थोड़ा अजीब था, क्योंकि आमतौर पर वो देर से उठती थीं और चाय माँ बनाती थीं।


मैंने पूछा, "दीदी, आज इतनी सुबह-सुबह?"


वो मुस्कराईं, पर उस मुस्कान में कुछ बदला हुआ था। बोलीं, "बस यूँ ही नींद जल्दी खुल गई। अच्छा लग रहा है... सुबह की शांति में थोड़ी देर अकेले रहना।"


मुझे महसूस हुआ कि दीदी आज कुछ अलग थीं। उन्होंने अपना पसंदीदा हल्का गुलाबी सूती कुर्ता पहना था — जो वो बहुत कम पहनती थीं। उनका चेहरा शांत था, लेकिन आंखों में जैसे कोई कहानी चल रही हो।


तभी दरवाज़े की घंटी बजी।


मैं दौड़कर दरवाज़ा खोलने गया। सामने अंकल खड़े थे — वही हमारे पड़ोसी, जो कुछ वक़्त से दीदी से ज़्यादा बातें करने लगे थे। उनके हाथ में अख़बार और एक डिब्बा था।


"गुड मॉर्निंग बेटा," उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "कल हलवा बनाया था, सोचा तुम्हारी दीदी को भी दे आऊं।"


मैंने उन्हें अंदर बुलाया और दीदी की तरफ देखा। दीदी थोड़ी सकपकाईं, लेकिन मुस्कराते हुए बोलीं, "अरे, इसकी क्या ज़रूरत थी अंकल?"


अंकल ने हँसते हुए जवाब दिया, "ज़रूरत नहीं, मन था बस।"


कमरे में कुछ सेकंड का सन्नाटा छा गया। मैं पास खड़ा सब देख रहा था। उस ख़ामोशी में कोई अजीबपन नहीं था — बल्कि एक अपनापन था।
जैसे कुछ बिना कहे समझा जा रहा हो।


मैंने महसूस किया — दीदी अब अंकल को सिर्फ एक पड़ोसी नहीं मानतीं।
कुछ तो बदल गया था... और अब वो सिर्फ मेरी कल्पना नहीं थी।
Bahut jada khubsurat kahani hai
Man k haal kiya khub likha hai 👍
 
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अंकल ने एक गहरी हँसी छोड़ी, जो उसकी हद से बाहर की गर्माहट लेकर आई।
मगर तभी…


तभी नीचे दरवाज़े के खुलने की अचानक आवाज़ आई—“खट्ट!”
दीदी एकदम चौंक गईं। जैसे किसी ने उन्हें नींद से जगा दिया हो।


उनकी आँखों में डर तैर गया।
“कोई… कोई आ गया क्या?” वह फुसफुसाईं, और झटके से अंकल की बाँहों से अलग हो गईं।


उनकी साँसें तेज़ चल रही थीं, और माथे पर पसीने की हल्की बूँदें उभर आईं।
अंकल ने धीरे से उनका हाथ पकड़ना चाहा, पर दीदी दो क़दम पीछे हट गईं।


“नहीं… नहीं, अभी नहीं… कोई हमें देख लेगा…”


अंकल ने गंभीरता से उनकी ओर देखा, आवाज़ अब संयमित थी।
“शांत रहो। नीचे देखता हूँ कौन है।”


दीदी ने जल्दी से अपनी चुन्नी ठीक की, बालों को कानों के पीछे किया, और तेज़ी से कमरे की खिड़की की ओर बढ़ीं, जैसे पल भर में दुनिया बदल गई हो।

दीदी खिड़की के पास जाकर पर्दे के कोने से नीचे झाँकने लगीं।
हल्की रौशनी में उन्होंने देखा—माँ थीं। शायद पानी पीने के लिए उठी थीं। हाथ में लोटा था, और वो रसोई की ओर बढ़ रही थीं।


दीदी की साँस रुक-सी गई। चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।
“माँ… जाग गई हैं,” उन्होंने लगभग फुसफुसाते हुए कहा।


अंकल, जो अब तक दरवाज़े की ओर बढ़ चुके थे, वहीं रुक गए।
“क्या उन्होंने कुछ देखा?” उन्होंने चिंतित होकर पूछा।


दीदी ने सिर हिलाया, “नहीं… शायद नहीं। वो सीधे रसोई में चली गईं। लेकिन अगर वो ऊपर आ गईं तो…”


वो जल्दी से अंकल की बाँहों से अलग हो गईं, चुन्नी ठीक की और बालों को सँवारा, जैसे किसी ने सच में कुछ देख लिया हो।
उसका दिल अब भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।


अंकल ने धीमे स्वर में कहा, “हम बहुत करीब थे… बस एक पल और…”


दीदी ने उन्हें देखा—आँखों में वही चाहत, मगर अब उसके पीछे एक डर भी था।
“ये सही वक़्त नहीं था,” उन्होंने कहा, स्वर में झिझक और समझदारी की मिलावट थी।
“पर इसका मतलब ये नहीं कि मेरा इरादा बदल गया।”


अंकल की आँखों में हल्की मुस्कान आई।
“मैं समझता हूँ। और मैं इंतज़ार कर सकता हूँ… जितना भी ज़रूरी हो।”


दीदी ने एक बार फिर नीचे झाँका। माँ अब रसोई से लौट रही थीं, और कमरे की ओर मुड़ने लगी थीं।


“जाओ,” दीदी ने जल्दी से कहा। “अब तुम जाओ। कोई हमें एक साथ देख लेगा तो सब कुछ खत्म हो जाएगा।”


अंकल ने चुपचाप दरवाज़ा खोला, एक आख़िरी नज़र दीदी पर डाली, और हल्के कदमों से बाहर चले गए।

सुबह की हल्की धूप छत पर बिखरी हुई थी।
ठंडी हवा चल रही थी, और पूरा घर अब भी नींद से पूरी तरह जागा नहीं था।


अंकल छत पर टहल रहे थे—धीरे-धीरे, जैसे कुछ सोचते हुए।
उनके चेहरे पर सुबह की सुकून भरी शांति थी, मगर आँखों में रात की हल्की परछाई बाकी थी।


उसी वक्त, दीदी भी सीढ़ियाँ चढ़ती हुई छत पर आ गईं।
वो शायद ऐसे ही टहलने के बहाने आई थीं, पर जब उनकी नज़र अंकल पर पड़ी—
एक पल को दोनों रुक गए।


फिर दोनों की निगाहें मिलीं।


और… हल्की मुस्कान दोनों के होठों पर एक साथ खिल गई।


कुछ कहा नहीं गया, मगर उस मुस्कान में सब कुछ था—
वो बात जो अधूरी रह गई थी, वो एहसास जो किसी ने छुपाया नहीं, और वो भरोसा जो बिना शब्दों के भी समझ आ गया।


अंकल ने धीरे से सिर हिलाया, जैसे पूछ रहे हों, “सब ठीक?”
दीदी ने उतनी ही धीमी मुस्कान के साथ जवाब दिया—“हाँ, अब ठीक है।”


फिर दोनों कुछ कदम एक-दूसरे के करीब टहले—कुछ दूर से, लेकिन पास महसूस करते हुए।
बिना बोले, छत पर फैलती सुबह की रोशनी की तरह एक नयी शुरुआत उनके बीच आहिस्ता से उतर रही थी।

अंकल कुछ कदम दीदी के पास आए, दूरी अब भी संभाल रखी थी, लेकिन उनकी आँखों में वही पुरानी गर्माहट लौट आई थी।


धीरे से बोले,
"आज रात… मैं इंतज़ार करूँगा।"
फिर थोड़ी देर रुककर पूछा,
"आओगी ना?"


दीदी का दिल धड़क उठा।
वो नज़रें झुकाकर खड़ी रहीं, जैसे ज़मीन पर कोई जवाब लिखा हो जिसे पढ़ने की कोशिश कर रही हों।


उनका मन तो उसी पल "हाँ" कह देना चाहता था।
दिल में एक बेचैनी थी—जैसे रात की वो अधूरी मुलाकात अब फिर से पूरी करनी हो।


लेकिन होंठों तक आते-आते शब्द रुक गए।


धीरे से बोलीं,
"पता नहीं…"


उनका स्वर धीमा था, पर उसमें झिझक भी थी और चाहत भी।
"मन है… पर कैसे एकदम से हाँ बोल दूँ?"
उनकी आँखों में एक लड़ाई साफ़ झलक रही थी—किसी को चाहने की, लेकिन दुनिया से डरने की।


अंकल ने समझदारी से सिर हिलाया।
“ठीक है… मैं फिर भी इंतज़ार करूँगा। चाहे तुम आओ या नहीं।”


फिर एक आख़िरी मुस्कान के साथ वो मुड़ गए, और छत के दूसरे सिरे की ओर बढ़ गए।


दीदी वहीं खड़ी रहीं… हवा उनके बालों से खेल रही थी, लेकिन उनके भीतर कुछ और ही तूफान चल रहा था।


पूरा दिन जैसे किसी बोझ की तरह बीत रहा था।


दीदी रसोई में गईं, पर सब्ज़ियाँ काटते वक़्त चाकू चलाना भारी लग रहा था।
कपड़े तह करते हुए भी ध्यान बार-बार भटक जाता… नज़रें खिड़की की तरफ जातीं, जैसे आसमान से वक्त को खींच लाना चाहती हों।


हर चीज़ में बेचैनी थी।
एक-एक पल काटना मुश्किल हो रहा था।
घड़ी की सुइयाँ मानो जानबूझकर धीरे चल रही थीं।


माँ कुछ बोलतीं, तो दीदी जवाब देतीं, पर मन कहीं और था।
वो मुस्कुरा रही थीं, मगर वो मुस्कान बस दिखावे की थी।


मन में एक ही ख्याल… “कब रात होगी… कब सब सोएंगे… कब मैं जा सकूंगी…”


हर घंटे के साथ बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
वो खुद से लड़ रही थीं—संकोच से, डर से… पर चाहत उन सब पर भारी थी।

बड़ी मुश्किल से दिन कटा था।
हर घंटा जैसे भारी पत्थर की तरह दिल पर गिरता रहा था।
अब आखिरकार रात हो गई थी।


घर में खाना लग चुका था। माँ खाना खाकर अपने-अपने कमरे में चली गई ।
टीवी की आवाज़ धीरे-धीरे बंद हो गई, और घर में एक शांति उतर आई—वो शांति जिसका दीदी को इंतज़ार था।


लेकिन उनका दिल अब और ज़्यादा तेज़ी से धड़कने लगा था।
वो अब भी इंतज़ार कर रही थीं—कि सब गहरी नींद में चले जाएँ… ताकि वो छत पर जा सकें।


हर आहट पर कान टिके थे।
हर दरवाज़े की बंद होती चिटकनी पर नज़र थी।


इधर अंकल भी अपने कमरे में खाना खा चुके थे।
बिस्तर पर लेटे ज़रूर थे, लेकिन आँखों में नींद नहीं—बस इंतज़ार था।


वो जानते थे, अगर दीदी आईं… तो आज की रात अधूरी नहीं रहेगी।


छत की ओर जाने वाली सीढ़ियाँ जैसे दोनों के दिल से जुड़ी थीं।
हर कदम जो उठेगा, वो एक दहलीज़ पार करेगा—डर से, हिचक से… और दुनिया से।


दीदी की उंगलियाँ धीरे-धीरे दुपट्टे का कोना मरोड़ने लगीं।
हर मिनट अब भारी था, हर साँस अधूरी।


“अब शायद सब सो गए हैं…”
उन्होंने मन ही मन सोचा, और धीमे से उठकर कमरे की बत्ती बुझा दी।


अंधेरे में उनकी आँखें चमक रही थीं… डर भी था, पर उससे बड़ी थी वो चाहत…
अंकल से मिलने की, उस अधूरे स्पर्श को पूरा करने की।
 
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कमरा अब पूरी तरह अंधेरे में डूब चुका था।
माँ की सांसों की गूंज, पंखे की धीमी आवाज़ और रात की खामोशी—सब एक साथ मिलकर एक साज़ जैसा बज रहे थे।


दीदी धीरे-धीरे उठीं।
चादर एक कोने में सरकाई, फिर नंगे पाँव फर्श पर कदम रखा ताकि कोई आवाज़ न हो।


दुपट्टा ठीक किया, और एक आखिरी बार दरवाज़े की ओर देखा—सब सो रहे थे।


धीरे-धीरे, साँसें रोके हुए, वो सीढ़ियों की तरफ बढ़ीं।
हर सीढ़ी पर पैर रखते वक़्त दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कता।
कहीं कोई जाग न जाए… कहीं कुछ छूट न जाए।


आख़िरकार वो छत पर पहुँच गईं।


हल्की चांदनी पूरे आकाश पर बिछी थी।
हवा में रात की ठंडक थी, पर दीदी के शरीर में गर्मी की लहर दौड़ रही थी।


और वहाँ… छत के एक कोने में अंकल खड़े थे।


वो पहले से ही वहाँ थे—कमर पर हाथ टिकाए, छत की मुंडेर से टिककर आसमान की ओर देख रहे थे।
जैसे ही दीदी की आहट आई, उन्होंने तुरंत मुड़कर देखा।


दोनों की निगाहें मिलीं।



एक पल को वक़्त थम गया।


अंकल के चेहरे पर राहत की हल्की मुस्कान थी,
"मैं जानता था… तुम आओगी," उन्होंने धीमे से कहा।


दीदी कुछ नहीं बोलीं, बस पास आकर खड़ी हो गईं।
उनकी आँखें बहुत कुछ कह रही थीं—डर, तड़प, इंतज़ार… और अब एक अजीब-सी शांति।


अंकल ने धीरे से उनका हाथ पकड़ा,

फिर अंकल ने धीरे से कहा,
“चलो… मेरे कमरे में चलते हैं।”


दीदी की नज़रें थोड़ी देर के लिए जमीं पर टिक गईं, फिर उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।
उनका दिल अब विश्वास और उम्मीद से भरा था, लेकिन साथ ही एक हल्की सी घबराहट भी।


अंकल ने उनका हाथ फिर से थामा और दोनों छत से नीचे उतरे।
कमरे की खिड़की से चाँदनी अभी भी अंदर आ रही थी, जो कमरे को हल्की रोशनी दे रही थी।


अंकल ने धीरे से दरवाज़ा खोला और कहा,
“यहाँ हम आराम से बात कर सकते हैं… बिना किसी डर के।”


दीदी ने कदम अंदर रखा, और जैसे ही कमरे का दरवाज़ा बंद हुआ, दोनों के बीच की खामोशी भी एक नए सुकून में बदल गई।


अंकल ने दीदी की ओर देखा, उनकी आँखों में वही पुरानी चाहत और अब एक नई मजबूती थी।
“मैं तुम्हारे साथ हर कदम चलने को तैयार हूँ,” उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा।


दीदी ने गहरी साँस ली और मुस्कुरा दी,
“मैं भी… अब हम अकेले हैं।”


कमरे की दीवारों में अब सिर्फ़ उनकी बातचीत और दिल की धड़कनों की गूँज थी—एक ऐसी गूँज जो ज़िंदगी भर साथ चलने का वादा थी।
 
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अंकल ने दीदी को अपनी बाहों में भरा तो ऐसा लगा जैसे समय कुछ पलों के लिए थम गया हो। दीदी की साँसें उनकी छाती से टकराकर लौट रही थीं, और उन धड़कनों में एक नर्म कम्पन था — जैसे दोनों की आत्माएँ एक ही लय में साँस ले रही हों।


दीदी ने धीरे-से अपना सिर उनकी गर्दन में छुपा लिया। वह सुकून, वह अपनापन — जिसे वह सालों से तरस रही थी — अब बिल्कुल पास था, छूने जितना क़रीब।


अंकल ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा, जैसे किसी पुराने ज़ख़्म को सहला रहे हों। फिर उनकी उँगलियाँ दीदी के गालों पर पहुँचीं, और आँखों से बिखरते भावों को पढ़ने लगीं।


“तुम जानती हो न,” अंकल ने धीरे से कहा, “तुम्हारे बिना ये सब अधूरा था।”


दीदी की आँखें भीग गईं, पर उनमें डर नहीं था — बस एक सच्चा भरोसा झलक रहा था। उन्होंने अपने होंठों से अंकल के हाथ को छुआ, जैसे उस वक़्त को, उस इश्क़ को, और उस साथ को हमेशा के लिए अपने भीतर कैद कर लेना चाहती हों।


कमरे की हवा अब भीनी-भीनी सी गवाही दे रही थी — उन जज़्बातों की, जो बरसों से रोके गए थे… और अब आखिरकार बहने लगे थे।

दीदी ने धीरे से अपना चेहरा ऊपर उठाया। उनकी आँखें सीधे अंकल की आँखों से मिलीं — वहाँ कोई हिचक नहीं थी, कोई छुपाव नहीं। सिर्फ़ सच था। वही सच, जिसे दोनों ने बरसों से महसूस किया था, पर शब्दों में कभी नहीं ढाला।


“तुम्हें कभी जाने नहीं दूँगी अब,” दीदी ने फुसफुसाकर कहा।


अंकल ने हल्की मुस्कान के साथ उनके माथे को चूमा, फिर धीमे से बोले, “अब जब तुमने थाम ही लिया है… तो मैं खुद को छोड़ भी कैसे सकता हूँ?”


खिड़की से हल्की हवा आई, और कमरे की धीमी रौशनी में उनके साए आपस में ऐसे मिले जैसे दो अलग-अलग ज़िंदगियाँ अब एक ही कहानी बन गई हों।


दीदी ने उनके सीने पर अपना सिर रख दिया। अंकल की उँगलियाँ अब उसकी उंगलियों में उलझ चुकी थीं। बिना कुछ कहे, दोनों उस मौन में डूबे थे जो किसी भी शब्द से ज़्यादा बोलता था।


कुछ देर बाद दीदी ने धीरे से पूछा, “अब क्या?”


अंकल ने उसकी ओर देखा, फिर मुस्कराकर बोले,
“अब हर सुबह तुम्हारी आँखों में जागना है। हर शाम तुम्हारी मुस्कान में उतरना है। और हर खामोशी में बस तुम्हारा नाम सुनना है।”
 
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इस कहानी में अनकहे लफ्ज़ भी एक अजीब सिहरन पैदा कर रहे है...

अगली कड़ी की प्रतीक्षा में...
 
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sanu0956

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उन्होंने धीरे से कहा, “इतनी देर से तुम कह रहे थे… लेकिन मैं सुन ही नहीं पा रही थी। शायद डर था कि ये सपना है, और जागते ही सब छिन जाएगा।”


अंकल ने उसकी उंगलियाँ और कसकर थाम लीं।


“अगर ये सपना है,” उन्होंने कहा, “तो मैं कभी नहीं चाहूँगा कि तुम जागो। और अगर हकीकत है, तो मैं वादा करता हूँ — अब कोई डर तुम्हारे पास नहीं आएगा।”


कमरे की खामोशी अब सुकून बन गई थी।


बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। बूंदों की टप-टप भीतर तक गूंज रही थी।


दीदी ने गहरी साँस ली, फिर आँखें बंद कर लीं — जैसे उस पल को हमेशा के लिए अपनी रूह में बसा लेना चाहती हों।


और अंकल... बस उसे देखते रहे।


मानो पहली बार किसी ने उन्हें पूरी तरह से देखा हो — बिना शर्त, बिना डर।


अंकल ने दीदी की आँखों में एक टुक देख कर मुस्कराया। उनकी नज़रों में वो सुकून था जो किसी दरिया के किनारे बैठने पर मिलता है। फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपने बाज़ुओं को दीदी के चारों ओर लपेट लिया — जैसे कोई अपनी सबसे क़ीमती चीज़ को दुनिया की हर तकलीफ़ से बचाना चाहता हो।
दीदी पहली बार इस तरह किसी की बाहों में थीं। उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, साँसें थोड़ी तेज़ थीं, और होंठों पर एक अनकही सी बेचैनी तैर रही थी।
अचानक, बेहद नर्म लम्हे में, अंकल ने उसके चेहरे को हल्के से अपने हाथों में लिया और उसकी आँखों में गहराई से देखा — जैसे कोई एक अनकहा इज़हार कर रहा हो।
फिर उन्होंने दीदी के होंठों पर एक बेहद सधा, बेहद नरम, बेहद प्यार से भरा पहला चुंबन रखा।
वो पल जैसे समय से परे था।
दीदी की पलकों ने खुद-ब-खुद झुक कर उस एहसास को अपने अंदर समेट लिया। ये उनके जीवन का पहला चुंबन था — मासूम, कोमल और पूरी तरह से उनका।
उस पल में ना कोई सवाल था, ना कोई जवाब। बस एक एहसास था... कि वो अब कभी अकेली नहीं रहेंगी।

अभी भी वो पास-पास थे।


दीदी की पलकों पर थमी हुई ख़ामोशी धीरे-धीरे पिघलने लगी थी। उनकी साँसों की गर्माहट अब हवा में घुल चुकी थी, और कमरे की रौशनी जैसे उन्हें ही देख रही थी — दो दिल, जो बरसों से पास आने की हिम्मत नहीं कर पाए थे, आज हर दीवार गिरा चुके थे।


अंकल ने उसके चेहरे को दोनों हथेलियों में थाम लिया — जैसे कोई सबसे नाज़ुक चीज़ को छू रहा हो, डरते हुए, प्यार में डूबे हुए।


“तुम्हें पता है…” अंकल ने धीमे स्वर में कहा, “मैंने बहुत बार इस पल की कल्पना की थी… पर हक़ीक़त इससे कहीं ज़्यादा खूबसूरत है।”


दीदी ने आँखें खोलीं — गीली पलकों के पीछे से झाँकती मोहब्बत की रोशनी जैसे पूरी दुनिया को रोशन कर रही थी।


अचानक, उन्होंने खुद को अंकल के और करीब खींच लिया। उनके हाथ अब अंकल की गर्दन के पीछे टिक गए थे, और उनका माथा माथे से आ लगा। उस स्पर्श में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, कोई वासना नहीं — सिर्फ़ एक गहरी, स्थिर, और सच्ची चाहत।


अगले पल, अंकल ने धीरे से उसकी नाक को अपनी नाक से छुआ — वो मासूम, मीठा सा नक-किस, जो सिर्फ़ प्यार की सबसे प्यारी भाषा में होता है।


फिर उन्होंने उसके गाल पर, पलकों पर, और धीरे से उसकी ठुड्डी के पास एक-एक कर चूम लिया — जैसे हर चुंबन से कहना चाह रहे हों, "तुम मेरे हो, मेरे दिल की धड़कन हो।"


दीदी अब पूरी तरह उनकी बाँहों में थी।


वो काँप रही थीं, पर डर से नहीं… उस एहसास से जो पहली बार किसी ने पूरी तरह उन्हें अपना माना हो।


“अब हर लम्हा तुम्हारे साथ जीना है,” अंकल ने फुसफुसाते हुए कहा, “तुम्हारे होंठों से हर सुबह की शुरुआत करनी है… और हर रात तुम्हारी बाँहों में खो जाना है।”


दीदी ने उसकी बातों का जवाब नहीं दिया — बस अपने होंठ दुबारा उसके होंठों पर रख दिए।


इस बार चुंबन थोड़ा लंबा था… थोड़ा और गहरा… और बिल्कुल वैसा, जैसा दो आत्माएँ करती हैं जब वो पूरी तरह एक-दूसरे में समा जाना चाहें।


कमरे की हवा अब और भी गर्म हो चुकी थी।


खिड़की से आती चाँदनी उनके चेहरों पर पड़ रही थी, जैसे आसमान खुद इस प्यार को देख रहा हो और मुस्कुरा रहा हो।


ये एक रात नहीं थी।
ये दो दिलों का मिलन था।
एक अधूरी कहानी का पहला पूरा पन्ना।
 
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