अंकल ने एक गहरी हँसी छोड़ी, जो उसकी हद से बाहर की गर्माहट लेकर आई।
मगर तभी…
तभी नीचे दरवाज़े के खुलने की अचानक आवाज़ आई—“खट्ट!”
दीदी एकदम चौंक गईं। जैसे किसी ने उन्हें नींद से जगा दिया हो।
उनकी आँखों में डर तैर गया।
“कोई… कोई आ गया क्या?” वह फुसफुसाईं, और झटके से अंकल की बाँहों से अलग हो गईं।
उनकी साँसें तेज़ चल रही थीं, और माथे पर पसीने की हल्की बूँदें उभर आईं।
अंकल ने धीरे से उनका हाथ पकड़ना चाहा, पर दीदी दो क़दम पीछे हट गईं।
“नहीं… नहीं, अभी नहीं… कोई हमें देख लेगा…”
अंकल ने गंभीरता से उनकी ओर देखा, आवाज़ अब संयमित थी।
“शांत रहो। नीचे देखता हूँ कौन है।”
दीदी ने जल्दी से अपनी चुन्नी ठीक की, बालों को कानों के पीछे किया, और तेज़ी से कमरे की खिड़की की ओर बढ़ीं, जैसे पल भर में दुनिया बदल गई हो।
दीदी खिड़की के पास जाकर पर्दे के कोने से नीचे झाँकने लगीं।
हल्की रौशनी में उन्होंने देखा—माँ थीं। शायद पानी पीने के लिए उठी थीं। हाथ में लोटा था, और वो रसोई की ओर बढ़ रही थीं।
दीदी की साँस रुक-सी गई। चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।
“माँ… जाग गई हैं,” उन्होंने लगभग फुसफुसाते हुए कहा।
अंकल, जो अब तक दरवाज़े की ओर बढ़ चुके थे, वहीं रुक गए।
“क्या उन्होंने कुछ देखा?” उन्होंने चिंतित होकर पूछा।
दीदी ने सिर हिलाया, “नहीं… शायद नहीं। वो सीधे रसोई में चली गईं। लेकिन अगर वो ऊपर आ गईं तो…”
वो जल्दी से अंकल की बाँहों से अलग हो गईं, चुन्नी ठीक की और बालों को सँवारा, जैसे किसी ने सच में कुछ देख लिया हो।
उसका दिल अब भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
अंकल ने धीमे स्वर में कहा, “हम बहुत करीब थे… बस एक पल और…”
दीदी ने उन्हें देखा—आँखों में वही चाहत, मगर अब उसके पीछे एक डर भी था।
“ये सही वक़्त नहीं था,” उन्होंने कहा, स्वर में झिझक और समझदारी की मिलावट थी।
“पर इसका मतलब ये नहीं कि मेरा इरादा बदल गया।”
अंकल की आँखों में हल्की मुस्कान आई।
“मैं समझता हूँ। और मैं इंतज़ार कर सकता हूँ… जितना भी ज़रूरी हो।”
दीदी ने एक बार फिर नीचे झाँका। माँ अब रसोई से लौट रही थीं, और कमरे की ओर मुड़ने लगी थीं।
“जाओ,” दीदी ने जल्दी से कहा। “अब तुम जाओ। कोई हमें एक साथ देख लेगा तो सब कुछ खत्म हो जाएगा।”
अंकल ने चुपचाप दरवाज़ा खोला, एक आख़िरी नज़र दीदी पर डाली, और हल्के कदमों से बाहर चले गए।
सुबह की हल्की धूप छत पर बिखरी हुई थी।
ठंडी हवा चल रही थी, और पूरा घर अब भी नींद से पूरी तरह जागा नहीं था।
अंकल छत पर टहल रहे थे—धीरे-धीरे, जैसे कुछ सोचते हुए।
उनके चेहरे पर सुबह की सुकून भरी शांति थी, मगर आँखों में रात की हल्की परछाई बाकी थी।
उसी वक्त, दीदी भी सीढ़ियाँ चढ़ती हुई छत पर आ गईं।
वो शायद ऐसे ही टहलने के बहाने आई थीं, पर जब उनकी नज़र अंकल पर पड़ी—
एक पल को दोनों रुक गए।
फिर दोनों की निगाहें मिलीं।
और… हल्की मुस्कान दोनों के होठों पर एक साथ खिल गई।
कुछ कहा नहीं गया, मगर उस मुस्कान में सब कुछ था—
वो बात जो अधूरी रह गई थी, वो एहसास जो किसी ने छुपाया नहीं, और वो भरोसा जो बिना शब्दों के भी समझ आ गया।
अंकल ने धीरे से सिर हिलाया, जैसे पूछ रहे हों, “सब ठीक?”
दीदी ने उतनी ही धीमी मुस्कान के साथ जवाब दिया—“हाँ, अब ठीक है।”
फिर दोनों कुछ कदम एक-दूसरे के करीब टहले—कुछ दूर से, लेकिन पास महसूस करते हुए।
बिना बोले, छत पर फैलती सुबह की रोशनी की तरह एक नयी शुरुआत उनके बीच आहिस्ता से उतर रही थी।
अंकल कुछ कदम दीदी के पास आए, दूरी अब भी संभाल रखी थी, लेकिन उनकी आँखों में वही पुरानी गर्माहट लौट आई थी।
धीरे से बोले,
"आज रात… मैं इंतज़ार करूँगा।"
फिर थोड़ी देर रुककर पूछा,
"आओगी ना?"
दीदी का दिल धड़क उठा।
वो नज़रें झुकाकर खड़ी रहीं, जैसे ज़मीन पर कोई जवाब लिखा हो जिसे पढ़ने की कोशिश कर रही हों।
उनका मन तो उसी पल "हाँ" कह देना चाहता था।
दिल में एक बेचैनी थी—जैसे रात की वो अधूरी मुलाकात अब फिर से पूरी करनी हो।
लेकिन होंठों तक आते-आते शब्द रुक गए।
धीरे से बोलीं,
"पता नहीं…"
उनका स्वर धीमा था, पर उसमें झिझक भी थी और चाहत भी।
"मन है… पर कैसे एकदम से हाँ बोल दूँ?"
उनकी आँखों में एक लड़ाई साफ़ झलक रही थी—किसी को चाहने की, लेकिन दुनिया से डरने की।
अंकल ने समझदारी से सिर हिलाया।
“ठीक है… मैं फिर भी इंतज़ार करूँगा। चाहे तुम आओ या नहीं।”
फिर एक आख़िरी मुस्कान के साथ वो मुड़ गए, और छत के दूसरे सिरे की ओर बढ़ गए।
दीदी वहीं खड़ी रहीं… हवा उनके बालों से खेल रही थी, लेकिन उनके भीतर कुछ और ही तूफान चल रहा था।
पूरा दिन जैसे किसी बोझ की तरह बीत रहा था।
दीदी रसोई में गईं, पर सब्ज़ियाँ काटते वक़्त चाकू चलाना भारी लग रहा था।
कपड़े तह करते हुए भी ध्यान बार-बार भटक जाता… नज़रें खिड़की की तरफ जातीं, जैसे आसमान से वक्त को खींच लाना चाहती हों।
हर चीज़ में बेचैनी थी।
एक-एक पल काटना मुश्किल हो रहा था।
घड़ी की सुइयाँ मानो जानबूझकर धीरे चल रही थीं।
माँ कुछ बोलतीं, तो दीदी जवाब देतीं, पर मन कहीं और था।
वो मुस्कुरा रही थीं, मगर वो मुस्कान बस दिखावे की थी।
मन में एक ही ख्याल… “कब रात होगी… कब सब सोएंगे… कब मैं जा सकूंगी…”
हर घंटे के साथ बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
वो खुद से लड़ रही थीं—संकोच से, डर से… पर चाहत उन सब पर भारी थी।
बड़ी मुश्किल से दिन कटा था।
हर घंटा जैसे भारी पत्थर की तरह दिल पर गिरता रहा था।
अब आखिरकार रात हो गई थी।
घर में खाना लग चुका था। माँ खाना खाकर अपने-अपने कमरे में चली गई ।
टीवी की आवाज़ धीरे-धीरे बंद हो गई, और घर में एक शांति उतर आई—वो शांति जिसका दीदी को इंतज़ार था।
लेकिन उनका दिल अब और ज़्यादा तेज़ी से धड़कने लगा था।
वो अब भी इंतज़ार कर रही थीं—कि सब गहरी नींद में चले जाएँ… ताकि वो छत पर जा सकें।
हर आहट पर कान टिके थे।
हर दरवाज़े की बंद होती चिटकनी पर नज़र थी।
इधर अंकल भी अपने कमरे में खाना खा चुके थे।
बिस्तर पर लेटे ज़रूर थे, लेकिन आँखों में नींद नहीं—बस इंतज़ार था।
वो जानते थे, अगर दीदी आईं… तो आज की रात अधूरी नहीं रहेगी।
छत की ओर जाने वाली सीढ़ियाँ जैसे दोनों के दिल से जुड़ी थीं।
हर कदम जो उठेगा, वो एक दहलीज़ पार करेगा—डर से, हिचक से… और दुनिया से।
दीदी की उंगलियाँ धीरे-धीरे दुपट्टे का कोना मरोड़ने लगीं।
हर मिनट अब भारी था, हर साँस अधूरी।
“अब शायद सब सो गए हैं…”
उन्होंने मन ही मन सोचा, और धीमे से उठकर कमरे की बत्ती बुझा दी।
अंधेरे में उनकी आँखें चमक रही थीं… डर भी था, पर उससे बड़ी थी वो चाहत…
अंकल से मिलने की, उस अधूरे स्पर्श को पूरा करने की।