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Incest Ek Chaat Ke Niche (Family Saga)

Ankit 887427

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Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 32
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🗓️ Last Update On 14/12/2025
 
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rahul king

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Chapter 14

(Hello Guys Sorry, Just because of some work I can't upload story until Christmas, If you just want some transaction for jerk off you can use gemini as Ktboss And Captain_Cool are doing)

रमन अभी बोलकर हटी ही थी कि हरलीन दीदी कमरे के अंदर आ गई।

दिलराज: मैंने जल्दी से तकिया उठाया और अपनी जाँघों पर रख दिया, और लंड को छिपा लिया। "आप क्या कर रही हो यहाँ, दीदी? बाहर जाओ! थोडी दर रुककर आना! थोड़ी शर्म कर लो, दीदी! बिना बताए अंदर आ गईं, बता तो देती!" (मन में थोड़ा-थोड़ा हँस रहा था।)

बाहर खड़ी कमल ख़ुश होती है और हरलीन को गाली देती है। "ऐसे ही लगी थी कुत्ती बोलने कि मैंने दिलराज को दी है! दिलराज तो गालियाँ दे रहा है उसे! रिश्ते का मान रखना आता है मेरे भाई को!

हरलीन: दिलराज की बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उसे पता था यह वो ऊपर-ऊपर से बोल रहा है। "ओए, रमन! तुझे शर्म नहीं आती, कुत्तिये? कपड़े पहन ले! और कितनी देनी है मेरे भाई को?"

रमन: "हाए नी! कहाँ मर गई थी तू, हरलीन? तेरा ही इंतज़ार कर रही थी! अभी तो सिर्फ़ दो राऊंड ही हुए हैं! सुबह तक दूँगी मैं तो तेरे भाई को! मजा ही बड़ा देता है तेरा भाई!"

बाहर खड़ी कमल: "इसका भी पता नहीं लगता! अभी कह कर गई थी, चूत मरवाऊँगी, अब आराम करने को कह रही है! इसका भी समझ नहीं आता!"

रमण: "बेचारा किसको कह रही है? पूरा साँड़ है तेरा भाई! एक बार चढ़ता है, फिर पुरा मजा करवाता है! चल, एक राउंड हो जाए! दिलराज! अपनी बहन को भी भोलापन दिखा दे अपना!"

दिलराज: "पागल हो गई है, रमन, तू! दीदी के सामने कैसे? दीदी! आप बाहर बैठ जाओ! थोड़ा टाइम और रुको! बस एक राउंड ही लगाना है मैंने भी और।"

हरलीन: "मुझे बाहर नहीं बैठना अकेली! अब डर लगता है बाहर अकेली को।"

रमन: "चल फिर, यहाँ बैठकर देख अपने भाई की परफ़ॉर्मेंस!" रमन ने दिलराज की जाँघों से तकिया उठाया, साइड पर रखा, और पैरों के बीच में बैठकर लंड मुँह में भर लिया और चूसने लगी। "आह्ह्ह्म्म्!"

दिलराज: "क्या कर रही है, रमन! आह्ह्ह्म्म्! दीदी! तुम जाओ यहाँ से!"

रमन: (लंड मुँह से निकालती हुई बोली) "कहीं नहीं जाना! तेरी रंडी बहन यहीं रहेगी!"

दिलराज: मैंने ज़ोर से एक थप्पड़ रमन के मुँह पर मारा। "कैसे बकवास कर रही है! बहन है मेरी वो!"

रमन: "अच्छा! तभी कल पूरे स्वाद से चोदा अपनी बहन को!" रमन ने लंड को हाथ में पकड़ा और कहा, "यही लंड धकेला था तूने अपनी बहन की चूत में!" और मुँह में भरकर चूसने लगी। "आह्ह्ह्म्म्! ग्लूप! ग्लूप! अंह्ह्ह्म्म्!"

हरलीन: दिलराज के पास जाकर, "सॉरी, दिलराज! गलती से मुँह से निकल गया था। यह कुत्ती सामने सब कुछ बोल देती है।"

हरलीन अभी इतना ही बोली थी कि मैंने उसकी गर्दन पकड़ी और होंठ चूसने लगा। "उम्माह्ह्ह्ह! आह्ह्ह्म्म्!" नीचे बैठी रमन लंड चूस रही थी।

रमन: "आह्ह्ह्म्म्म्!" (लंड मुँह से निकाला) "आह्ह्ह! अब बनी बात!"

मैं उठकर खड़ा हुआ, और हरलीन दीदी के भी कपड़े उतार दिए। कमरे मे अब हम तीनों नंगे खड़े थे।

बाहर कमल का बुरा हाल था अंदर का माहौल देखकर। "यह तो सच ही कह रही थी! कैसे नंगे हुए हैं! बेशर्म! बहन-भाई का लिहाज़ ही नहीं रहा!"

हरलीन: "हाए, दिलराज! बड़ा कंट्रोल करके रखा हुआ था। अब नहीं होगा! डाल दे अंदर अपना लंड! आह्ह्ह्म्म्! उम्मह्ह्ह्ह!" (चुंबन करती हुई बोली।)

रमन: "देख! कैसे हवासी फिर रही है तेरी बहन! दिलराज! धकेल दे! और कुछ न हो जाए तेरी बहन को!"

मैंने दीदी को पकड़ा और बिस्तर पर लंबा लिटा दिया। रमन मेरे पास आई, लंड को मुँह में डालकर गीला किया, और दीदी की चूत पर रख दिया। मैंने धीरे-धीरे लंड अंदर धकेल दिया। हरलीन दीदी की चूत गीली होने के कारण लंड फिसलता हुआ अंदर चला गया। "आह्ह्ह्ह! दीदी! मज़ा आ गया! हाए!" और दीदी के ऊपर लंबा लेटकर स्तन चूसने लगा। "आह्ह्ह्म्म्म्! म्मूह्ह्ह! आह्ह्ह!"

हरलीन: "आह्ह्ह्ह! हाए! ओए, दिलराज! आह्ह्ह! लगा ज़ोर! आह्ह्ह! हाए!"

पूरी तसल्ली से हरलीन की चूत मारी। और माल झड़ने वाला था, तो हरलीन दीदी और रमन दोनों नीचे बैठ गईं। मैंने सारा माल दीदी और रमन के मुँह पर निकाल दिया। दोनों औरतें एक-दूसरे के मुँह में मुँह डालकर चूसने लगीं।

रमन: "आह्ह्ह्म्म्म्! मूह्ह्हा! हरलीन! मजा दिला दिया तूने तो आज! अपने भाई के आगे घोड़ी करवा के!"

हरलीन: "आह्ह्ह्म्म्म्! मुझे भी मजा आ गया! कैसा लगा मेरे भाई के माल का स्वाद? तेरे भाई से ज़्यादा स्वाद देता है कि नहीं?"

रमन: "हाँ, कुत्तिये! मेरे भाई से ज़्यादा मजा देता है! वो तो बस ठोककर सो जाता है, फिर नहीं पूछता! तेरा भाई तो पूरा ख़्याल रखता है!"

मैं अपनी तारीफ़ सुनकर ख़ुश हो रहा था। दोनों नीचे बैठी चुंबन कर रही थीं। "चलो, तुम आराम कर लो अब, दीदी! मैं भी चलता हूँ अपने कमरे में।"

हरलीन: "हाँ, ठीक है। सो जा तू भी। हम भी सोती हैं बस अब।" वह खड़ी होती है, दिलराज को गले लगाती है, गाल पर चुंबन करती है। "मूह्ह्हा! मेरा प्यारा भाई! गुड नाइट!"

बाहर खड़ी कमल सारा कुछ देख रही थी। उसकी चूत में आग लगी हुई थी। दिलराज बाहर आने लगा, तो कमल साइड में हो गई जहाँ दिलराज की नज़र न पड़े।

दिलराज अपने कमरे में जाकर सो गया। कमल का बुरा हाल था। चूत पानी छोड़ रही थी। हरलीन रमन को बिस्तर पर सुलाकर बाहर की तरफ़ आई, जहाँ कमल खड़ी थी।

हरलीन: "कैसा लगा, कमल दिदी? मज़ा आया?"

कमल: "नी कुत्तिये! तूने तो शर्म ही उतार दी! अपने छोटे भाई के साथ ही सो गई!"

हरलीन: "अच्छा! आग तो तुम्हे भी लगा दी है, जो हाथ अभी तक सलवार में डाला हुआ है!"

कमल: "भूल गई थी! हाथ सलवार में ही है अभी! बाहर निकाला। आग तो लगनी ही थी! इतने दिनों से सूखी पड़ी

थी! आज देखकर गीली हो गई!"

हरलीन: "अच्छा! पर अब तो उँगली से ही काम चलाना पड़ेगा! दिलराज तो सो गया होगा अब! बिचारे ने आज मेहनत बड़ी की है।"

कमल: (सलवार के ऊपर से चूत रगड़ती हुई) "आहो! बिचारे ने दो गर्म चुते ठंडी की हैं!"

हरलीन: (थोड़ा हँसकर) "दो नहीं, कमल! तीन की हैं!"

कमल: "तीसरी कौन सी है?"

हरलीन: "जो तेरे साथ सोई है कमरे में! सबसे पहले वो ही ठंडी होकर आई है दिलराज से!

कमल: "चल! ऐसे न बकवास मार! माँ है दिलराज की वो!"

हरलीन: "अच्छा! और मैं भी तो बहन हूँ!"

कमल: "सच कह! मम्मी भी मरवाती है दिलराज से अपनी?"

हरलीन: "हाँ! मैंने आज ही देखी थी, घोड़ी हुई थी दिलराज के आगे!"

कमल: (चूत रगड़ती हुई) "हाए! मतलब मैं ही रह गई हूँ अकेली इस घर में बची!"

हरलीन: "कोई न! कल को तेरी बारी है!"

कमल: "मैं कैसे करूँगी? पागल हो गई है! मैं कैसे कहूँ दिलराज को?"

हरलीन: "कोई न! मैं समझा दूँगी अपने आप! तू जा अब अपनी चूत को ठंडा कर आज! कल को तो दिलराज ने ही ठंडी करनी है!" और मैं भी चलती हूँ सोने अब।"

कमल हाँ में सिर हिलाती हुई कमरे की तरफ़ चल दी। जहाँ माँ को सोई हुई देखती है, और सोचती है ("चूत मरवाकर अपने पुत्त से, कैसे गाँड़ निकालकर पड़ी है! शर्म ही उतार दी है दोनों माँ-बेटियों ने!")

और बाथरूम में जाकर सलवार का नाड़ा खोलती है। सलवार पैरों में गिर जाती है। कमीज़ को स्तनों के ऊपर करके शीशे के सामने खड़ी हो जाती है। एक हाथ से स्तन दबाने लगती है और एक हाथ चूत पर रखती है। चूत पूरी गीली हुई पड़ी थी।

"हाए! दिलराज! तूने तो अपनी बड़ी बहन की भी चूत गीली कर दी! आह्ह्ह्म्म्! कल को चढ़ना अपनी बड़ी बहन पर तू! हाए! कर देना ठंडी मेरी चूत भी, जैसे मम्मी की और हरलीन की की है! आह्ह्ह्ह! हाए! नी कमल! तेरी चूत मारेगा तेरा भाई! आह्ह्ह्म्म्!"

वह ज़ोर-ज़ोर से उँगली अपनी चूत के अंदर-बाहर करने लगी। "आह्ह्ह्ह! निकाल दिया पानी, दिलराज! हाए!"

चूत से पानी निकालकर, दो मिनट के लिए फ़्लश वाली सीट पर बैठ जाती है। "आह्ह्ह्म्म्! साला! सोचकर इतना मजा आया! जब करेगा दिलराज, तब तो और भी आएगा!" उठकर सलवार बाँधती है, और बाथरूम से बाहर आकर मम्मी के साथ साइड मैं सो जाती है।


Gifs will be uploaded on Christmas Holidays
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Jabardast update bro
 

kas1709

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Chapter 14

(Hello Guys Sorry, Just because of some work I can't upload story until Christmas, If you just want some transaction for jerk off you can use gemini as Ktboss And Captain_Cool are doing)

रमन अभी बोलकर हटी ही थी कि हरलीन दीदी कमरे के अंदर आ गई।

दिलराज: मैंने जल्दी से तकिया उठाया और अपनी जाँघों पर रख दिया, और लंड को छिपा लिया। "आप क्या कर रही हो यहाँ, दीदी? बाहर जाओ! थोडी दर रुककर आना! थोड़ी शर्म कर लो, दीदी! बिना बताए अंदर आ गईं, बता तो देती!" (मन में थोड़ा-थोड़ा हँस रहा था।)

बाहर खड़ी कमल ख़ुश होती है और हरलीन को गाली देती है। "ऐसे ही लगी थी कुत्ती बोलने कि मैंने दिलराज को दी है! दिलराज तो गालियाँ दे रहा है उसे! रिश्ते का मान रखना आता है मेरे भाई को!

हरलीन: दिलराज की बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उसे पता था यह वो ऊपर-ऊपर से बोल रहा है। "ओए, रमन! तुझे शर्म नहीं आती, कुत्तिये? कपड़े पहन ले! और कितनी देनी है मेरे भाई को?"

रमन: "हाए नी! कहाँ मर गई थी तू, हरलीन? तेरा ही इंतज़ार कर रही थी! अभी तो सिर्फ़ दो राऊंड ही हुए हैं! सुबह तक दूँगी मैं तो तेरे भाई को! मजा ही बड़ा देता है तेरा भाई!"

बाहर खड़ी कमल: "इसका भी पता नहीं लगता! अभी कह कर गई थी, चूत मरवाऊँगी, अब आराम करने को कह रही है! इसका भी समझ नहीं आता!"

रमण: "बेचारा किसको कह रही है? पूरा साँड़ है तेरा भाई! एक बार चढ़ता है, फिर पुरा मजा करवाता है! चल, एक राउंड हो जाए! दिलराज! अपनी बहन को भी भोलापन दिखा दे अपना!"

दिलराज: "पागल हो गई है, रमन, तू! दीदी के सामने कैसे? दीदी! आप बाहर बैठ जाओ! थोड़ा टाइम और रुको! बस एक राउंड ही लगाना है मैंने भी और।"

हरलीन: "मुझे बाहर नहीं बैठना अकेली! अब डर लगता है बाहर अकेली को।"

रमन: "चल फिर, यहाँ बैठकर देख अपने भाई की परफ़ॉर्मेंस!" रमन ने दिलराज की जाँघों से तकिया उठाया, साइड पर रखा, और पैरों के बीच में बैठकर लंड मुँह में भर लिया और चूसने लगी। "आह्ह्ह्म्म्!"

दिलराज: "क्या कर रही है, रमन! आह्ह्ह्म्म्! दीदी! तुम जाओ यहाँ से!"

रमन: (लंड मुँह से निकालती हुई बोली) "कहीं नहीं जाना! तेरी रंडी बहन यहीं रहेगी!"

दिलराज: मैंने ज़ोर से एक थप्पड़ रमन के मुँह पर मारा। "कैसे बकवास कर रही है! बहन है मेरी वो!"

रमन: "अच्छा! तभी कल पूरे स्वाद से चोदा अपनी बहन को!" रमन ने लंड को हाथ में पकड़ा और कहा, "यही लंड धकेला था तूने अपनी बहन की चूत में!" और मुँह में भरकर चूसने लगी। "आह्ह्ह्म्म्! ग्लूप! ग्लूप! अंह्ह्ह्म्म्!"

हरलीन: दिलराज के पास जाकर, "सॉरी, दिलराज! गलती से मुँह से निकल गया था। यह कुत्ती सामने सब कुछ बोल देती है।"

हरलीन अभी इतना ही बोली थी कि मैंने उसकी गर्दन पकड़ी और होंठ चूसने लगा। "उम्माह्ह्ह्ह! आह्ह्ह्म्म्!" नीचे बैठी रमन लंड चूस रही थी।

रमन: "आह्ह्ह्म्म्म्!" (लंड मुँह से निकाला) "आह्ह्ह! अब बनी बात!"

मैं उठकर खड़ा हुआ, और हरलीन दीदी के भी कपड़े उतार दिए। कमरे मे अब हम तीनों नंगे खड़े थे।

बाहर कमल का बुरा हाल था अंदर का माहौल देखकर। "यह तो सच ही कह रही थी! कैसे नंगे हुए हैं! बेशर्म! बहन-भाई का लिहाज़ ही नहीं रहा!"

हरलीन: "हाए, दिलराज! बड़ा कंट्रोल करके रखा हुआ था। अब नहीं होगा! डाल दे अंदर अपना लंड! आह्ह्ह्म्म्! उम्मह्ह्ह्ह!" (चुंबन करती हुई बोली।)

रमन: "देख! कैसे हवासी फिर रही है तेरी बहन! दिलराज! धकेल दे! और कुछ न हो जाए तेरी बहन को!"

मैंने दीदी को पकड़ा और बिस्तर पर लंबा लिटा दिया। रमन मेरे पास आई, लंड को मुँह में डालकर गीला किया, और दीदी की चूत पर रख दिया। मैंने धीरे-धीरे लंड अंदर धकेल दिया। हरलीन दीदी की चूत गीली होने के कारण लंड फिसलता हुआ अंदर चला गया। "आह्ह्ह्ह! दीदी! मज़ा आ गया! हाए!" और दीदी के ऊपर लंबा लेटकर स्तन चूसने लगा। "आह्ह्ह्म्म्म्! म्मूह्ह्ह! आह्ह्ह!"

हरलीन: "आह्ह्ह्ह! हाए! ओए, दिलराज! आह्ह्ह! लगा ज़ोर! आह्ह्ह! हाए!"

पूरी तसल्ली से हरलीन की चूत मारी। और माल झड़ने वाला था, तो हरलीन दीदी और रमन दोनों नीचे बैठ गईं। मैंने सारा माल दीदी और रमन के मुँह पर निकाल दिया। दोनों औरतें एक-दूसरे के मुँह में मुँह डालकर चूसने लगीं।

रमन: "आह्ह्ह्म्म्म्! मूह्ह्हा! हरलीन! मजा दिला दिया तूने तो आज! अपने भाई के आगे घोड़ी करवा के!"

हरलीन: "आह्ह्ह्म्म्म्! मुझे भी मजा आ गया! कैसा लगा मेरे भाई के माल का स्वाद? तेरे भाई से ज़्यादा स्वाद देता है कि नहीं?"

रमन: "हाँ, कुत्तिये! मेरे भाई से ज़्यादा मजा देता है! वो तो बस ठोककर सो जाता है, फिर नहीं पूछता! तेरा भाई तो पूरा ख़्याल रखता है!"

मैं अपनी तारीफ़ सुनकर ख़ुश हो रहा था। दोनों नीचे बैठी चुंबन कर रही थीं। "चलो, तुम आराम कर लो अब, दीदी! मैं भी चलता हूँ अपने कमरे में।"

हरलीन: "हाँ, ठीक है। सो जा तू भी। हम भी सोती हैं बस अब।" वह खड़ी होती है, दिलराज को गले लगाती है, गाल पर चुंबन करती है। "मूह्ह्हा! मेरा प्यारा भाई! गुड नाइट!"

बाहर खड़ी कमल सारा कुछ देख रही थी। उसकी चूत में आग लगी हुई थी। दिलराज बाहर आने लगा, तो कमल साइड में हो गई जहाँ दिलराज की नज़र न पड़े।

दिलराज अपने कमरे में जाकर सो गया। कमल का बुरा हाल था। चूत पानी छोड़ रही थी। हरलीन रमन को बिस्तर पर सुलाकर बाहर की तरफ़ आई, जहाँ कमल खड़ी थी।

हरलीन: "कैसा लगा, कमल दिदी? मज़ा आया?"

कमल: "नी कुत्तिये! तूने तो शर्म ही उतार दी! अपने छोटे भाई के साथ ही सो गई!"

हरलीन: "अच्छा! आग तो तुम्हे भी लगा दी है, जो हाथ अभी तक सलवार में डाला हुआ है!"

कमल: "भूल गई थी! हाथ सलवार में ही है अभी! बाहर निकाला। आग तो लगनी ही थी! इतने दिनों से सूखी पड़ी

थी! आज देखकर गीली हो गई!"

हरलीन: "अच्छा! पर अब तो उँगली से ही काम चलाना पड़ेगा! दिलराज तो सो गया होगा अब! बिचारे ने आज मेहनत बड़ी की है।"

कमल: (सलवार के ऊपर से चूत रगड़ती हुई) "आहो! बिचारे ने दो गर्म चुते ठंडी की हैं!"

हरलीन: (थोड़ा हँसकर) "दो नहीं, कमल! तीन की हैं!"

कमल: "तीसरी कौन सी है?"

हरलीन: "जो तेरे साथ सोई है कमरे में! सबसे पहले वो ही ठंडी होकर आई है दिलराज से!

कमल: "चल! ऐसे न बकवास मार! माँ है दिलराज की वो!"

हरलीन: "अच्छा! और मैं भी तो बहन हूँ!"

कमल: "सच कह! मम्मी भी मरवाती है दिलराज से अपनी?"

हरलीन: "हाँ! मैंने आज ही देखी थी, घोड़ी हुई थी दिलराज के आगे!"

कमल: (चूत रगड़ती हुई) "हाए! मतलब मैं ही रह गई हूँ अकेली इस घर में बची!"

हरलीन: "कोई न! कल को तेरी बारी है!"

कमल: "मैं कैसे करूँगी? पागल हो गई है! मैं कैसे कहूँ दिलराज को?"

हरलीन: "कोई न! मैं समझा दूँगी अपने आप! तू जा अब अपनी चूत को ठंडा कर आज! कल को तो दिलराज ने ही ठंडी करनी है!" और मैं भी चलती हूँ सोने अब।"

कमल हाँ में सिर हिलाती हुई कमरे की तरफ़ चल दी। जहाँ माँ को सोई हुई देखती है, और सोचती है ("चूत मरवाकर अपने पुत्त से, कैसे गाँड़ निकालकर पड़ी है! शर्म ही उतार दी है दोनों माँ-बेटियों ने!")

और बाथरूम में जाकर सलवार का नाड़ा खोलती है। सलवार पैरों में गिर जाती है। कमीज़ को स्तनों के ऊपर करके शीशे के सामने खड़ी हो जाती है। एक हाथ से स्तन दबाने लगती है और एक हाथ चूत पर रखती है। चूत पूरी गीली हुई पड़ी थी।

"हाए! दिलराज! तूने तो अपनी बड़ी बहन की भी चूत गीली कर दी! आह्ह्ह्म्म्! कल को चढ़ना अपनी बड़ी बहन पर तू! हाए! कर देना ठंडी मेरी चूत भी, जैसे मम्मी की और हरलीन की की है! आह्ह्ह्ह! हाए! नी कमल! तेरी चूत मारेगा तेरा भाई! आह्ह्ह्म्म्!"

वह ज़ोर-ज़ोर से उँगली अपनी चूत के अंदर-बाहर करने लगी। "आह्ह्ह्ह! निकाल दिया पानी, दिलराज! हाए!"

चूत से पानी निकालकर, दो मिनट के लिए फ़्लश वाली सीट पर बैठ जाती है। "आह्ह्ह्म्म्! साला! सोचकर इतना मजा आया! जब करेगा दिलराज, तब तो और भी आएगा!" उठकर सलवार बाँधती है, और बाथरूम से बाहर आकर मम्मी के साथ साइड मैं सो जाती है।


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रमन अभी बोलकर हटी ही थी कि हरलीन दीदी कमरे के अंदर आ गई।

दिलराज: मैंने जल्दी से तकिया उठाया और अपनी जाँघों पर रख दिया, और लंड को छिपा लिया। "आप क्या कर रही हो यहाँ, दीदी? बाहर जाओ! थोडी दर रुककर आना! थोड़ी शर्म कर लो, दीदी! बिना बताए अंदर आ गईं, बता तो देती!" (मन में थोड़ा-थोड़ा हँस रहा था।)

बाहर खड़ी कमल ख़ुश होती है और हरलीन को गाली देती है। "ऐसे ही लगी थी कुत्ती बोलने कि मैंने दिलराज को दी है! दिलराज तो गालियाँ दे रहा है उसे! रिश्ते का मान रखना आता है मेरे भाई को!

हरलीन: दिलराज की बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उसे पता था यह वो ऊपर-ऊपर से बोल रहा है। "ओए, रमन! तुझे शर्म नहीं आती, कुत्तिये? कपड़े पहन ले! और कितनी देनी है मेरे भाई को?"

रमन: "हाए नी! कहाँ मर गई थी तू, हरलीन? तेरा ही इंतज़ार कर रही थी! अभी तो सिर्फ़ दो राऊंड ही हुए हैं! सुबह तक दूँगी मैं तो तेरे भाई को! मजा ही बड़ा देता है तेरा भाई!"

बाहर खड़ी कमल: "इसका भी पता नहीं लगता! अभी कह कर गई थी, चूत मरवाऊँगी, अब आराम करने को कह रही है! इसका भी समझ नहीं आता!"

रमण: "बेचारा किसको कह रही है? पूरा साँड़ है तेरा भाई! एक बार चढ़ता है, फिर पुरा मजा करवाता है! चल, एक राउंड हो जाए! दिलराज! अपनी बहन को भी भोलापन दिखा दे अपना!"

दिलराज: "पागल हो गई है, रमन, तू! दीदी के सामने कैसे? दीदी! आप बाहर बैठ जाओ! थोड़ा टाइम और रुको! बस एक राउंड ही लगाना है मैंने भी और।"

हरलीन: "मुझे बाहर नहीं बैठना अकेली! अब डर लगता है बाहर अकेली को।"

रमन: "चल फिर, यहाँ बैठकर देख अपने भाई की परफ़ॉर्मेंस!" रमन ने दिलराज की जाँघों से तकिया उठाया, साइड पर रखा, और पैरों के बीच में बैठकर लंड मुँह में भर लिया और चूसने लगी। "आह्ह्ह्म्म्!"

दिलराज: "क्या कर रही है, रमन! आह्ह्ह्म्म्! दीदी! तुम जाओ यहाँ से!"

रमन: (लंड मुँह से निकालती हुई बोली) "कहीं नहीं जाना! तेरी रंडी बहन यहीं रहेगी!"

दिलराज: मैंने ज़ोर से एक थप्पड़ रमन के मुँह पर मारा। "कैसे बकवास कर रही है! बहन है मेरी वो!"

रमन: "अच्छा! तभी कल पूरे स्वाद से चोदा अपनी बहन को!" रमन ने लंड को हाथ में पकड़ा और कहा, "यही लंड धकेला था तूने अपनी बहन की चूत में!" और मुँह में भरकर चूसने लगी। "आह्ह्ह्म्म्! ग्लूप! ग्लूप! अंह्ह्ह्म्म्!"

हरलीन: दिलराज के पास जाकर, "सॉरी, दिलराज! गलती से मुँह से निकल गया था। यह कुत्ती सामने सब कुछ बोल देती है।"

हरलीन अभी इतना ही बोली थी कि मैंने उसकी गर्दन पकड़ी और होंठ चूसने लगा। "उम्माह्ह्ह्ह! आह्ह्ह्म्म्!" नीचे बैठी रमन लंड चूस रही थी।

रमन: "आह्ह्ह्म्म्म्!" (लंड मुँह से निकाला) "आह्ह्ह! अब बनी बात!"

मैं उठकर खड़ा हुआ, और हरलीन दीदी के भी कपड़े उतार दिए। कमरे मे अब हम तीनों नंगे खड़े थे।

बाहर कमल का बुरा हाल था अंदर का माहौल देखकर। "यह तो सच ही कह रही थी! कैसे नंगे हुए हैं! बेशर्म! बहन-भाई का लिहाज़ ही नहीं रहा!"

हरलीन: "हाए, दिलराज! बड़ा कंट्रोल करके रखा हुआ था। अब नहीं होगा! डाल दे अंदर अपना लंड! आह्ह्ह्म्म्! उम्मह्ह्ह्ह!" (चुंबन करती हुई बोली।)

रमन: "देख! कैसे हवासी फिर रही है तेरी बहन! दिलराज! धकेल दे! और कुछ न हो जाए तेरी बहन को!"

मैंने दीदी को पकड़ा और बिस्तर पर लंबा लिटा दिया। रमन मेरे पास आई, लंड को मुँह में डालकर गीला किया, और दीदी की चूत पर रख दिया। मैंने धीरे-धीरे लंड अंदर धकेल दिया। हरलीन दीदी की चूत गीली होने के कारण लंड फिसलता हुआ अंदर चला गया। "आह्ह्ह्ह! दीदी! मज़ा आ गया! हाए!" और दीदी के ऊपर लंबा लेटकर स्तन चूसने लगा। "आह्ह्ह्म्म्म्! म्मूह्ह्ह! आह्ह्ह!"

हरलीन: "आह्ह्ह्ह! हाए! ओए, दिलराज! आह्ह्ह! लगा ज़ोर! आह्ह्ह! हाए!"

पूरी तसल्ली से हरलीन की चूत मारी। और माल झड़ने वाला था, तो हरलीन दीदी और रमन दोनों नीचे बैठ गईं। मैंने सारा माल दीदी और रमन के मुँह पर निकाल दिया। दोनों औरतें एक-दूसरे के मुँह में मुँह डालकर चूसने लगीं।

रमन: "आह्ह्ह्म्म्म्! मूह्ह्हा! हरलीन! मजा दिला दिया तूने तो आज! अपने भाई के आगे घोड़ी करवा के!"

हरलीन: "आह्ह्ह्म्म्म्! मुझे भी मजा आ गया! कैसा लगा मेरे भाई के माल का स्वाद? तेरे भाई से ज़्यादा स्वाद देता है कि नहीं?"

रमन: "हाँ, कुत्तिये! मेरे भाई से ज़्यादा मजा देता है! वो तो बस ठोककर सो जाता है, फिर नहीं पूछता! तेरा भाई तो पूरा ख़्याल रखता है!"

मैं अपनी तारीफ़ सुनकर ख़ुश हो रहा था। दोनों नीचे बैठी चुंबन कर रही थीं। "चलो, तुम आराम कर लो अब, दीदी! मैं भी चलता हूँ अपने कमरे में।"

हरलीन: "हाँ, ठीक है। सो जा तू भी। हम भी सोती हैं बस अब।" वह खड़ी होती है, दिलराज को गले लगाती है, गाल पर चुंबन करती है। "मूह्ह्हा! मेरा प्यारा भाई! गुड नाइट!"

बाहर खड़ी कमल सारा कुछ देख रही थी। उसकी चूत में आग लगी हुई थी। दिलराज बाहर आने लगा, तो कमल साइड में हो गई जहाँ दिलराज की नज़र न पड़े।

दिलराज अपने कमरे में जाकर सो गया। कमल का बुरा हाल था। चूत पानी छोड़ रही थी। हरलीन रमन को बिस्तर पर सुलाकर बाहर की तरफ़ आई, जहाँ कमल खड़ी थी।

हरलीन: "कैसा लगा, कमल दिदी? मज़ा आया?"

कमल: "नी कुत्तिये! तूने तो शर्म ही उतार दी! अपने छोटे भाई के साथ ही सो गई!"

हरलीन: "अच्छा! आग तो तुम्हे भी लगा दी है, जो हाथ अभी तक सलवार में डाला हुआ है!"

कमल: "भूल गई थी! हाथ सलवार में ही है अभी! बाहर निकाला। आग तो लगनी ही थी! इतने दिनों से सूखी पड़ी

थी! आज देखकर गीली हो गई!"

हरलीन: "अच्छा! पर अब तो उँगली से ही काम चलाना पड़ेगा! दिलराज तो सो गया होगा अब! बिचारे ने आज मेहनत बड़ी की है।"

कमल: (सलवार के ऊपर से चूत रगड़ती हुई) "आहो! बिचारे ने दो गर्म चुते ठंडी की हैं!"

हरलीन: (थोड़ा हँसकर) "दो नहीं, कमल! तीन की हैं!"

कमल: "तीसरी कौन सी है?"

हरलीन: "जो तेरे साथ सोई है कमरे में! सबसे पहले वो ही ठंडी होकर आई है दिलराज से!

कमल: "चल! ऐसे न बकवास मार! माँ है दिलराज की वो!"

हरलीन: "अच्छा! और मैं भी तो बहन हूँ!"

कमल: "सच कह! मम्मी भी मरवाती है दिलराज से अपनी?"

हरलीन: "हाँ! मैंने आज ही देखी थी, घोड़ी हुई थी दिलराज के आगे!"

कमल: (चूत रगड़ती हुई) "हाए! मतलब मैं ही रह गई हूँ अकेली इस घर में बची!"

हरलीन: "कोई न! कल को तेरी बारी है!"

कमल: "मैं कैसे करूँगी? पागल हो गई है! मैं कैसे कहूँ दिलराज को?"

हरलीन: "कोई न! मैं समझा दूँगी अपने आप! तू जा अब अपनी चूत को ठंडा कर आज! कल को तो दिलराज ने ही ठंडी करनी है!" और मैं भी चलती हूँ सोने अब।"

कमल हाँ में सिर हिलाती हुई कमरे की तरफ़ चल दी। जहाँ माँ को सोई हुई देखती है, और सोचती है ("चूत मरवाकर अपने पुत्त से, कैसे गाँड़ निकालकर पड़ी है! शर्म ही उतार दी है दोनों माँ-बेटियों ने!")

और बाथरूम में जाकर सलवार का नाड़ा खोलती है। सलवार पैरों में गिर जाती है। कमीज़ को स्तनों के ऊपर करके शीशे के सामने खड़ी हो जाती है। एक हाथ से स्तन दबाने लगती है और एक हाथ चूत पर रखती है। चूत पूरी गीली हुई पड़ी थी।

"हाए! दिलराज! तूने तो अपनी बड़ी बहन की भी चूत गीली कर दी! आह्ह्ह्म्म्! कल को चढ़ना अपनी बड़ी बहन पर तू! हाए! कर देना ठंडी मेरी चूत भी, जैसे मम्मी की और हरलीन की की है! आह्ह्ह्ह! हाए! नी कमल! तेरी चूत मारेगा तेरा भाई! आह्ह्ह्म्म्!"

वह ज़ोर-ज़ोर से उँगली अपनी चूत के अंदर-बाहर करने लगी। "आह्ह्ह्ह! निकाल दिया पानी, दिलराज! हाए!"

चूत से पानी निकालकर, दो मिनट के लिए फ़्लश वाली सीट पर बैठ जाती है। "आह्ह्ह्म्म्! साला! सोचकर इतना मजा आया! जब करेगा दिलराज, तब तो और भी आएगा!" उठकर सलवार बाँधती है, और बाथरूम से बाहर आकर मम्मी के साथ साइड मैं सो जाती है।


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Very erotic ji 👌👌👌
 
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