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,शालिनी को योग करते समय कमर में थोड़ा खिंचाव होता है, पर दर्द कम था इसलिए वो ज्यादा ध्यान नहीं देती, योग के बाद वो बाबुजी को नहलाने लगती हैं, अब रोज की तरह दोनों के बीच हसी मज़ाक और छेड़छाड़ होती हैं, बाद में बाबुजी तैयार होकर नील से खेलते हैं और शालिनी नहाने जाती हैं, शालिनी आज जल्दी में कपड़े लाना भूल गई थी, और उसने अलमारी में से भी नहीं निकाले थे, इसलिए वो जब तौलिये से शरीर पोछा तब उसे ख्याल आया कि उसने कपड़े लिए ही नहीं, वो बाबुजी से भी कैसे मंगवाए ?,शालिनी बड़ी दुविधा में थी
और हल्के से दरवाजा खोलकर अपने आप को संभालते हुए चोरी छुपी अपने कमरे की ओर चलते हुए जाने लगती है, पर वो भूल गई थी उसने पैरों में पायल पहने हुए हैं, जिसकी "छन छन" की आवाज से बाबुजी को लगा शालिनी नहाकर आ गई है इसलिए वो पिछे मुड़कर देखते हैं और नाश्ते के बारे में पूछने जाते हैं कि तभी उसकी नजर सिर्फ तौलिया लपेटे जा रही अपनी गोरी गोरी बहु पर ठहर जाता है, आज पहली बार उसकी गोरी मांसल जांघें दिखने मिल रही थी, गिले बाल हाथों में चूडिय़ां, पानी की बूंदे जो शालिनी के कामुक शरीर से अलग होना नहीं चाहती थी, गोरी पिण्डी, और गोरे पैरों को देख बाबुजी को पहली बार पता चला कि उसकी बहु कितनी गोरी चिट्टी और सही कटावदार शरीर की मालकिन है,
और दरवाजा बंध कर देती हैं, शालिनी का दिल काफी जोरों से धड़क रहा था, उसे जिसका डर था वहीं हुआ था,
, वैसे उसे कपड़ों से ज्यादा अलग नहीं थे बस ब्लाउज थोड़ा गहरे गले का और लहंगा थोड़ा छोटा था, जिसमें उसकी गोरी पिण्डी दिख रही थी, उसने एसे कपड़े फ़िल्मों में बंजारन को पहने देखा था, कपड़े छोटे होने का कारण वहां का वातावरण भी था, जिससे गर्मी में राहत मिलती, गहरे गले से तो वैसे भी शालिनी को कोई दिक्कत नहीं थी, वो पारदर्शी चुनरी का छोरो को अपने स्तनों के बीच रखकर ब्लाउज से पिन लगा दी जैसे उसने कई गांव की बुढ़ी महिलाओं को देखा था,
शालिनी नजरे चुराती हुई रसोई में दाखिल होती हैं और नास्ता बनाने लगती हैं, बाबुजी भी नील को खिलौने देकर शालिनी की मदद करने रसोई में आते हैं,शालिनी पीछे मुड़कर देखती हैं पर शर्म के कारण कुछ बोलती नहीं, बस चुपचाप अपना काम करती हैं, बाबुजी यह बात समझ रहे थे, इसलिए वो तभी कुछ नहीं बोलते वो बस अपने से हो सके इतनी मदद करते हैं, फिर बाबुजी नील को लेकर आते हैं और शालिनी को देते हैं, शालिनी नील को गोद में लेटा कर स्तनपान करवाने लगती हैं, उधर बाबुजी अपना नास्ता करने लगते है,जब नील का सिर्फ एक स्तन से दुध पीकर पेट भर जाता है तब वो अपना मुँह हटा लेता है, बाबुजी भी नास्ता करके खड़े होने वाले थे कि शालिनी ने उसका हाथ पकडकर रोक दिया।
, फिर ब्लाउज को नीचे से उठाकर अपने स्तन को बाहर निकालती हैं, बाबुजी को आज एक नया और रोमांचित अनुभव हो रहा था क्योंकि आज शालिनी ने अपनी सास के कपड़े पहनकर बाबुजी के मन में अपनी पत्नी के प्रति प्रेम को फिर से जगा दिया, उसे कुछ पल के लिए शालिनी के रूप में अपनी पत्नी दिखने लगी, बाबुजी को अपने पुराने दिन याद आ गए जब ठीक इसी तरह नीरव के स्तनपान करवाने के बाद उसकी पत्नी उसे अपने गोदी में सुलाकर अपने स्तनों से दुध पिलाती थी।
, बाबुजी ने अपने एक हाथ को शालिनी के कमर पर लिपटा लिया और अपनी ओर खींचने लगे जिससे शालिनी के स्तनों का दबाव उसके चेहरे पर आता, शालिनी को अपने ससुर का यह रूप देखकर हैरानी हुई, साथ ही एक आनंद भी मिल रहा था, क्योंकि इस तरह नीरव चूसा कर्ता था, और एकाध बार चाचाजी ने चूसा था, उसके भीतर जो कामुकता दबी हुई सो रही थी आज उसने अंगड़ाई ली थी, जिससे शालिनी को एक अलग प्रकार की खुशी मिल रही थी, बाबुजी के इस प्रकार चूसने से आज उसने अनुभव किया कि उसके दुध का स्त्राव बढ़ रहा हैं,और उसने यह भी ध्यान दिया कि बाबुजी अपनी जीभ से निप्पल के साथ छेड़खानी कर रहे हैं, दुध खत्म होने के बाद भी जब वो चूसन नहीं छोड़ रहे थे तब भी शालिनी को अजीब लगा, क्योंकि बाबुजी कभी एसा नहीं करते थे,
शालिनी की नजर उसपर पड़ती हैं, बाबुजी बाहर चले जाते हैं, इधर शालिनी गर्म हो चुकी थी, उसके योनि मे काम रस बहने लगा था और वो तृप्त होने वाली थी, तेज साँसों लेने से उसके स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे, काफी दिनों बाद आज उस पर वासना हावी हो गई थी, वो भी अपने आप को संभालती हुई चोली सही से पहनकर कर खड़ी होती हैं और नील को खेलने के लिए रख देती हैं और खुद घर के काम करने लगती हैं
पर शालिनी के दिमाग में आज की घटना और बाबुजी के खड़े लिंग का दृश्य बार बार आ जाता था, जिससे शालिनी का मन थोड़ा विचलित और चंचल हो गया था और उसी बात के बारे में सोच रहा था।
तभी उसकी कमर में दर्द होता है जिससे शालिनी की सिसकी निकलती हैं, तभी बाबुजी कमरे में दाखिल होते हैं, क्योंकि बाहर कुछ काम नहीं था, इसलिए वो घर के अंदर आ जाते है ताकि वापिस बीमार ना हो ,शालिनी की दर्द भरी सिसकी सुन बाबुजी चिंतित होते हुए शालिनी के पास आते हैं।
बाबुजी तुरत उसे कमर से पकड़कर संभालते हैं, शालिनी को अपनी गोरी पतली कमर पर बाबुजी जैसे मर्द का कठोर और विशाल हाथ का दबाव महसूस करके कराहती है, बाबुजी उसे संभालकर वापिस बैठा देते हैं, 
बाबुजी शालिनी को पूछते जाते थे कि उसे कहा दर्द हो रहा है, जिससे उसे मालिश करने का पता चले,
शालिनी को पीठ में एक सीधी नस में दर्द हो रहा था, बाबुजी पास बैठे होने से इतना दबाव नहीं दे पाते। 
पर उसे शालिनी के नर्म तकिये जैसे नितंबों का एहसास हो रहा था, बाबुजी तेल को अपने हथेली में लेकर शालिनी की कमर पर गिराकर हल्के हाथों से मालिश करने लगते है, पहेले बाबुजी कोई कोई हिस्सों में मालिश करते हैं फिर जब वो पूरी नंगी लंबी पीठ पर तेल से मालिश करने लगते है तब वो पूरी पीठ पर अपने हाथों को नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे मालिश करते हैं तब शालिनी के चोली की डोरी बीच मे आती थी,
बाबुजी को मालिश करते समय दिक्कत होने लगती हैं, बार बार उसे रुकना पड़ता जिससे उसे ठीक से मालिश नहीं होती
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उनकी बहु इतनी सुन्दर है, हालाकि पहले भी शालिनी की पीठ उन्होंने देखी थी पर इतनी नजदीक से और छुने का मौका पहली बार मिला था, एक पल को उनको अपने बेटे के भाग्य पर दुःख हुआ, जो इतनी सुन्दर पत्नी को छोड़ के चला गया, फिर दूसरे ही पल अपने भाग्य पर खुशी भी हुई क्युकी उनकी वजह से ही आज उनको अपनी बहु के स्तनों से दुध पीने और आज उसकी गोरी सुन्दर पीठ को मालिश करने को मिल रहा है।
तभी दरवाजा खुलने की आवाज आती हैं, वो मुड़कर देखती हैं कि बाबुजी है, वो बस मुस्कराते हुए अपने बाल सही कर रही थी, अभी भी उसके चोली की डोरी खुली हुई थी, बाबुजी शालिनी के इस रूप को देखकर जैसे लोहा चुम्बक की ओर खींचा चला जाता है वैसे बाबुजी शालिनी की ओर खींचे चले जा रहे थे, जैसे ही शालिनी बाल बनाकर अपने चोली की डोरी बांधने हाथ पीछे ले जाती हैं तब बाबुजी के हाथ उसके हाथ पर जाकर उसे रोक देते हैं। 
, बाबुजी की गर्म सांसे उसके ब्लाउज के भीतर जाँ रही थी और बाबुजी के आँखों का आंसू बहकर उसके स्तनों के ढलान पर बहता हुआ ब्लाउज मे समा जाता है, बाबुजी भी अपने हाथ को शालिनी के कमर पर लपेटकर रोने लगते है, आज पहली बार उसे अपना दुःख और मन मे दबे दर्द को व्यक्त करने का मौका मिला था, जिससे वो खुलकर रो रहे थे, अब तक बाबुजी एक मर्द होने के दायरे मे रह रहे थे जिससे वो खुलकर रो नहीं सके थे, पर आज शालिनी के आगोश में वह दायरा टूट गया जिससे पहली बार उसे अपना दर्द जताने का रास्ता दिखा, शालिनी भी उसे खुलकर दर्द बया करने दे रही थी जिससे बाबुजी का मन हल्का हो जाए।



उसे बस एक डर था कि अगर चाचाजी दरवाजा बंध करके सोये होंगे तो वो क्या करेंगी?Super updateUpdate 29
सुनहरी सुबह होने की तैयारी होने लगी थी ठंडी और मद्धम हवा बह रही थी, सभी रात के जोर शोर से मनाए गए रंगारंग कार्यक्रम की थकान मिटाने के लिए गहरी नीन्द में सोये हुए हैं, कुछ बड़े बुजुर्ग थे जो जल्दी जागकर अपनी दिनचर्या में लगे हुए थे, सूर्य क्षितिज पर आने को था, हल्की रोशनी बिखरती हुई सब को अंधेरे से उजाले की ओर ले जा रही थी।
रोज की तरह आज भी बाबुजी सबसे पहले घाघरा चोली पहने सोयी हुई अपनी बहु को देखते हैं, जो उसके पूरे दिन को शुभ बनाती हैं, सिर से लेकर पांव तक निहारने के बाद बाबुजी फ्रेश होने जाते हैं, फिर वापिस आकर खटिया पर बैठे हुए शालिनी के जागने की राह देखते हैं, थोड़ी देर में शालिनी अपनी नींद का त्याग करके अंगडाई लेते हुए जगती है, जब वो अंगड़ाई लेती हैं तब उसका पेट और कमर एकदम पतला चिकना और काफी लंबा और सेक्सी दिखता है
api docs for image hosting,शालिनी बाबुजी को देखकर मुस्कराते हुए खड़ी होती हैं और फ्रेश होने जाती हैं।
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बाद में शालिनी योग के कपड़े पहनने कमरे में जाती हैं, बाबुजी दातुन कर रहे थे, जब शालिनी अपने बाल को बांधते हुए बाहर आती हैं तब उसकी चिकनी बग़ल दिख रही थी, जब बाबुजी का दातुन खत्म होता है तब वो भी शालिनी के साथ योग करने लगते है
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,शालिनी को योग करते समय कमर में थोड़ा खिंचाव होता है, पर दर्द कम था इसलिए वो ज्यादा ध्यान नहीं देती, योग के बाद वो बाबुजी को नहलाने लगती हैं, अब रोज की तरह दोनों के बीच हसी मज़ाक और छेड़छाड़ होती हैं, बाद में बाबुजी तैयार होकर नील से खेलते हैं और शालिनी नहाने जाती हैं, शालिनी आज जल्दी में कपड़े लाना भूल गई थी, और उसने अलमारी में से भी नहीं निकाले थे, इसलिए वो जब तौलिये से शरीर पोछा तब उसे ख्याल आया कि उसने कपड़े लिए ही नहीं, वो बाबुजी से भी कैसे मंगवाए ?,शालिनी बड़ी दुविधा में थी
शालिनी : (मन में..) अरे मैं भी भूल कैसे गई?,बाबुजी से अलमारी में से कैसे मंगवाया जाए?और कैसे समझाया जाए कि कौन से पहनने है?
शालिनी हल्के से दरवाजा खोलकर देखती हैं बाबुजी उसकी ओर पीठ करके नील के साथ खेल रहे हैं, इसलिए वो सोचती हैं, वो तौलिया लपेटकर जल्दी से कमरे में चली जाएगी, वो इसके लिए काफी मन को मजबूत करती हैं, और तौलिया अपने नंगे शरीर पर लपेट लेती हैं,
और हल्के से दरवाजा खोलकर अपने आप को संभालते हुए चोरी छुपी अपने कमरे की ओर चलते हुए जाने लगती है, पर वो भूल गई थी उसने पैरों में पायल पहने हुए हैं, जिसकी "छन छन" की आवाज से बाबुजी को लगा शालिनी नहाकर आ गई है इसलिए वो पिछे मुड़कर देखते हैं और नाश्ते के बारे में पूछने जाते हैं कि तभी उसकी नजर सिर्फ तौलिया लपेटे जा रही अपनी गोरी गोरी बहु पर ठहर जाता है, आज पहली बार उसकी गोरी मांसल जांघें दिखने मिल रही थी, गिले बाल हाथों में चूडिय़ां, पानी की बूंदे जो शालिनी के कामुक शरीर से अलग होना नहीं चाहती थी, गोरी पिण्डी, और गोरे पैरों को देख बाबुजी को पहली बार पता चला कि उसकी बहु कितनी गोरी चिट्टी और सही कटावदार शरीर की मालकिन है,
शालिनी की नज़रे बाबुजी के ऊपर पड़ती हैं, उसे शर्म महसूस होती है, वो तुरत ही अपनी चाल को तेज करते हुए कमरे में दाखिल हो जाती हैं
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और दरवाजा बंध कर देती हैं, शालिनी का दिल काफी जोरों से धड़क रहा था, उसे जिसका डर था वहीं हुआ था,
शालिनी : (मन में..) यह क्या हो गया?बाबुजी ने मुझे इस हालत में देख लिया, बाबुजी क्या सोच रहे होंगे?मैं ही बेवकूफ़ हूं जो एसे चल पड़ी, इससे अच्छा कपड़े मंगवाकर पहन लेती, अब कैसे बाबुजी से नजरे मिला पाऊँगी?
शालिनी अपने मन के विचारों से लड़ते हुए अपने कपड़े ढूंढने लगती हैं, पर जल्दबाजी में उसने अपनी सास का चोली और लहंगा पहन लिया, वो तो जब हूक की जगह डोरी आती हैं तब उसे वास्तविकता का पता चलता है, वो अपने को आईने में देखती हैं, उसपर गांव के परम्परागत कपड़े जच्च रहे थे
, वैसे उसे कपड़ों से ज्यादा अलग नहीं थे बस ब्लाउज थोड़ा गहरे गले का और लहंगा थोड़ा छोटा था, जिसमें उसकी गोरी पिण्डी दिख रही थी, उसने एसे कपड़े फ़िल्मों में बंजारन को पहने देखा था, कपड़े छोटे होने का कारण वहां का वातावरण भी था, जिससे गर्मी में राहत मिलती, गहरे गले से तो वैसे भी शालिनी को कोई दिक्कत नहीं थी, वो पारदर्शी चुनरी का छोरो को अपने स्तनों के बीच रखकर ब्लाउज से पिन लगा दी जैसे उसने कई गांव की बुढ़ी महिलाओं को देखा था,
शालिनी शर्माते हुए बाहर आती हैं, बाबुजी का ध्यान फिरसे कमरे की ओर जाता है, उसने शालिनी को अपनी पत्नी के कपड़े पहने देख के उसको खुशी होती हैं और वो मंत्रमुग्ध होकर बस एकटक देखते रहते हैं,
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शालिनी नजरे चुराती हुई रसोई में दाखिल होती हैं और नास्ता बनाने लगती हैं, बाबुजी भी नील को खिलौने देकर शालिनी की मदद करने रसोई में आते हैं,शालिनी पीछे मुड़कर देखती हैं पर शर्म के कारण कुछ बोलती नहीं, बस चुपचाप अपना काम करती हैं, बाबुजी यह बात समझ रहे थे, इसलिए वो तभी कुछ नहीं बोलते वो बस अपने से हो सके इतनी मदद करते हैं, फिर बाबुजी नील को लेकर आते हैं और शालिनी को देते हैं, शालिनी नील को गोद में लेटा कर स्तनपान करवाने लगती हैं, उधर बाबुजी अपना नास्ता करने लगते है,जब नील का सिर्फ एक स्तन से दुध पीकर पेट भर जाता है तब वो अपना मुँह हटा लेता है, बाबुजी भी नास्ता करके खड़े होने वाले थे कि शालिनी ने उसका हाथ पकडकर रोक दिया।
शालिनी : बाबुजी ! क्या आप....?
बाबुजी : बहु! चलो पहले बात करते हैं, जिससे तुम्हारा मन का बोझ कम हो जाए और तुम पहले जैसी हो जाओ।
शालिनी : मुझे क्या हुआ है?एसा कुछ नहीं है।
बाबुजी : में जानता हूं तुम सुबह के उस घटना से विचलित हो, देखो उस वजह से परेसान होने की जरूरत नहीं है।
शालिनी : वो में अपने कपड़े भूल गई थी और आप नील से खेल रहे थे और आप को कैसे पता होता कि मुझे कोन से कपड़े आज पहनने है, इसलिए...
बाबुजी : मुझे इस सफाई की कोई जरूरत नहीं है, यह तुम्हारा घर है, यहां तुम आजादी से रह सकती हो, और जब एक छत के नीचे रहते हैं तब कभी कभार एसा हो सकता है, तुम्हारा उदाहरण लो, तुम अपने स्तनों की समस्या से कैसे परेसान थी? आज तुम बिना किसी परेसानी से मुझे स्तनपान करवाती हो, और मुझे बीमारी हुई तब तुमने मुझे सम्भाला और तब से लेकर आज तक मुझे नहलाया है, तुम मुझे रोज सिर्फ कच्छे में नहलाने लगी हो, इससे हमारे बीच कभी शर्म या रिश्ता बीच में नहीं आया, यह एक सामन्य बात है, तुम भी इसे ज्यादा मह्त्व ना दो और एक सपना समझ कर भूल जाओ।
शालिनी बाबुजी को अपनी गोदी में सुलाती है, आज पिछे डोरी वाली चोली थी इसलिए वो डोरी खोलकर ब्लाउज ढीला करती हैं
, फिर ब्लाउज को नीचे से उठाकर अपने स्तन को बाहर निकालती हैं, बाबुजी को आज एक नया और रोमांचित अनुभव हो रहा था क्योंकि आज शालिनी ने अपनी सास के कपड़े पहनकर बाबुजी के मन में अपनी पत्नी के प्रति प्रेम को फिर से जगा दिया, उसे कुछ पल के लिए शालिनी के रूप में अपनी पत्नी दिखने लगी, बाबुजी को अपने पुराने दिन याद आ गए जब ठीक इसी तरह नीरव के स्तनपान करवाने के बाद उसकी पत्नी उसे अपने गोदी में सुलाकर अपने स्तनों से दुध पिलाती थी।
आज बाबुजी उसी विचार में भावनात्मक हो गए और शालिनी के स्तन को देखकर उसने तुरत उसपर अपने मुँह लगाकर चूसने लगे, शालिनी भी यह उतावलापन देखकर हैरान हुई पर एक खुशी भी हुई कि बाबुजी सिर्फ चूसने के लिए नहीं चूस रहे पर अपनी भावना के साथ चूस रहे हैं, उसके चूसने मे आज एक अलग ही प्रकार था, आज उतावलापन के साथ एक मालिकाना भाव और थोड़ी कठोरता थी, आज बाबुजी कभी-कभी निप्पल को होठों से खींचते और कभी हल्के दांतों से दबाते, कभी-कभी सिर्फ निप्पल चूसने लगते तो कभी-कभी पूरा मुँह खोलकर स्तन मुँह में लेने लगते
, बाबुजी ने अपने एक हाथ को शालिनी के कमर पर लिपटा लिया और अपनी ओर खींचने लगे जिससे शालिनी के स्तनों का दबाव उसके चेहरे पर आता, शालिनी को अपने ससुर का यह रूप देखकर हैरानी हुई, साथ ही एक आनंद भी मिल रहा था, क्योंकि इस तरह नीरव चूसा कर्ता था, और एकाध बार चाचाजी ने चूसा था, उसके भीतर जो कामुकता दबी हुई सो रही थी आज उसने अंगड़ाई ली थी, जिससे शालिनी को एक अलग प्रकार की खुशी मिल रही थी, बाबुजी के इस प्रकार चूसने से आज उसने अनुभव किया कि उसके दुध का स्त्राव बढ़ रहा हैं,और उसने यह भी ध्यान दिया कि बाबुजी अपनी जीभ से निप्पल के साथ छेड़खानी कर रहे हैं, दुध खत्म होने के बाद भी जब वो चूसन नहीं छोड़ रहे थे तब भी शालिनी को अजीब लगा, क्योंकि बाबुजी कभी एसा नहीं करते थे,
शालिनी को भी आज मजा आ रहा था इसलिए वो भी बिना कुछ करे बाबुजी को मनमानी रीत से चूसने दे रही थी, वो भी बाबुजी के सिर को अपने स्तन मे दबाने लगती, बाबुजी ने अपने दूसरे हाथ से शालिनी के दूसरे स्तन पर ले जाकर चोली के ऊपर से निप्पल ढूंढने लगे, कामुकता के कारण शालिनी की निप्पल तन गई थी जिससे बाबुजी को ज्यादा देर नहीं लगी उसने अपनी उँगलियों से उससे खेलने लगे, कभी वो अपना हाथ फेरकर पूरे स्तन की गोलाई नापते, कभी ब्लाउज के अंदर अपनी उंगली डालते, दोनों ससुर और बहू एक दूसरी दुनिया मे थे, आज पहली बार दोनों के बीच कामुकता ने अपना पहला कदम रखा था, काफी समय तक बाबुजी अपनी मनमर्जी अपनी बहु के स्तनों पर करते रहे, तभी बाहर हॉर्न की आवाज दोनों को असली हकीकत का सामना करवाती हैं, दोनों जैसे थे वैसे ही स्थिर हो गए, शालिनी और बाबुजी दोनों असहजता और शर्म का सामना करते हैं, बाबुजी जल्दी से शालिनी से अलग हुए और नजरे चुराते हुए अपने कपड़े ठीक करने लगते है, तब उसका लिंग पाजामे में तंबू बनाए खड़ा था,
शालिनी की नजर उसपर पड़ती हैं, बाबुजी बाहर चले जाते हैं, इधर शालिनी गर्म हो चुकी थी, उसके योनि मे काम रस बहने लगा था और वो तृप्त होने वाली थी, तेज साँसों लेने से उसके स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे, काफी दिनों बाद आज उस पर वासना हावी हो गई थी, वो भी अपने आप को संभालती हुई चोली सही से पहनकर कर खड़ी होती हैं और नील को खेलने के लिए रख देती हैं और खुद घर के काम करने लगती हैं
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पर शालिनी के दिमाग में आज की घटना और बाबुजी के खड़े लिंग का दृश्य बार बार आ जाता था, जिससे शालिनी का मन थोड़ा विचलित और चंचल हो गया था और उसी बात के बारे में सोच रहा था।
शालिनी : (मन में..)आज क्या हो गया था मुझे? एसा लगता था मानो आज बाबुजी नहीं पर नीरव स्तन चूस रहा हो ,लगता है काफी दिनों से नीरव से दूर रहने और कल वो कामुक बातचीत से मन में एसा भाव आया है, बाबुजी भी आज कुछ अलग ही तरीके से चूस रहे थे, वो भी मानो आज अपनी बहु के नहीं पर अपनी पत्नी के स्तन चूस रहे हो, कुछ भी हो पर चूसने का तरीका बहुत अच्छा लगा, नीरव ने भी एसे कभी नहीं चूसा, मुझे लगता है आज मेने सासु माँ के कपड़े पहने है इसलिए बाबुजी को एसा भाव जगा होगा, वो भी इतने सालों से अकेले ही जी रहे है, मुझे नीरव से दूर हुए कुछ ही समय में यह हाल है तो बाबुजी की तो क्या ही दशा होगी? लगता है आज मेने बाबुजी के भीतर की वो दबी भावना को जगा दिया है, उसका लिंग कैसे तना हुआ दिख रहा था, क्या बाबुजी का लिंग इतना बड़ा है? इतने खुले हुए पाजामे में भी तंबू बना दिया था, नीरव का इतना बड़ा नहीं है।
शालिनी का मन बाबुजी के लिंग के बारे मे सोचने लगता है ,सब काम करते हुए भी उसको पाजामे में तने हुए लिंग का दृश्य और विचार चलते हैं, आज शालिनी ने सोचा था कि सुबह जो उसके कमर में मोच आयी थी उसे ठीक करने के लिए बाबुजी की मदद लेगी पर सुबह की उस घटना के कारण अब उसे शर्म और संकोच हो रहा था,नील को नहलाने के बाद वो पंखे के नीचे आकर बैठ जाती हैं,
तभी उसकी कमर में दर्द होता है जिससे शालिनी की सिसकी निकलती हैं, तभी बाबुजी कमरे में दाखिल होते हैं, क्योंकि बाहर कुछ काम नहीं था, इसलिए वो घर के अंदर आ जाते है ताकि वापिस बीमार ना हो ,शालिनी की दर्द भरी सिसकी सुन बाबुजी चिंतित होते हुए शालिनी के पास आते हैं।
बाबुजी : क्या हुआ बहु ? कहीं चोट लगी है?कहीं दर्द हो रहा है?तुम्हारे मुँह से अभी दर्द भरी आवाज सुनी।
शालिनी : एसा कुछ नहीं है,बस कमर में स्नायु में खिंचाव हो गया है, वो ठीक हो जाएगा आप चिंता ना करे, मैं ठीक हुँ।
बाबुजी : नहीं नहीं, में बिल्कुल भी जोखिम नहीं लेना चाहता,चलो हम अस्पताल चलते हैं, मुजे कुछ हो जाए तो चलेगा, अगर तुम्हें कुछ हुआ तो यह घर ठहर जाएगा, मेरा और मुन्ने का ख्याल कौन रखेगा? तुम्हें खरोंच भी नहीं आनी चाहिए
शालिनी को खुशी होती हैं कि बाबुजी उसका इतना ख्याल रखते हैं।
शालिनी : इतना कुछ नहीं है? बस हल्का सा खिंचाव है, मुझे कुछ नहीं हुआ है
इतना बोलकर वो खड़ी होने जाती हैं तभी फिर से दर्द से चीख निकलती है,
बाबुजी तुरत उसे कमर से पकड़कर संभालते हैं, शालिनी को अपनी गोरी पतली कमर पर बाबुजी जैसे मर्द का कठोर और विशाल हाथ का दबाव महसूस करके कराहती है, बाबुजी उसे संभालकर वापिस बैठा देते हैं,
बाबुजी : चलो अस्पताल चलते हैं।
शालिनी : नहीं बाबुजी, बस थोड़ा सा ही दर्द है, ठीक हो जाएगा।
बाबुजी : अगर दर्द ज्यादा हो जाएगा तो मेरा सब काम करके हालत खराब हो जाएगी,
शालिनी : अच्छाजी ! इसलिए मुझे अस्पताल ले जाने को कहते है, ताकि आपको काम ना करना पड़े
बाबुजी : वो सब मज़ाक की बात है, सच कहूँ तो तुमको या मुन्ने को कुछ नहीं होना चाहिये,
शालिनी : कुछ नहीं हुआ, अब पहले से अच्छा है
बाबुजी : तो एक काम करते हैं, में मालिश कर देता हूं, जिससे अच्छा लगेगा
शालिनी : आपको आती हैं मालिश ?
बाबुजी : और नहीं तो क्या? एक बार करवाकर देखो फिर कहना।
शालिनी भी मान जाती हैं, ताकि अस्पताल ना जाना पड़े, बाबुजी घर का दरवाजा बंध करके चाचाजी के कमरे में जाकर दवाई के बक्से से एक जङीबूंटी वाला तेल लाते हैं जो मांसपेशियों के दर्द में काम आता है, शालिनी बिस्तर पर आकर उल्टा लेट जाती हैं जिससे उसके स्तन दबाव से ब्लाउज से बाहर छलक रहे थे, बाबुजी शालिनी के पास आकर बैठ जाते हैं और कमर पर मालिश करने लगते है,
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बाबुजी शालिनी को पूछते जाते थे कि उसे कहा दर्द हो रहा है, जिससे उसे मालिश करने का पता चले,
शालिनी को पीठ में एक सीधी नस में दर्द हो रहा था, बाबुजी पास बैठे होने से इतना दबाव नहीं दे पाते।
बाबुजी : बहु ! वो जितना देना पड़े उतना दबाव नहीं दे पा रहा इसलिए क्या मैं तुम्हारे ऊपर आकर मालिश कर देता हूं जिससे मालिश अच्छी होगी और राहत भी मिलेगी।
शालिनी : ठीक हैं, अभी आप ही मेरे डॉक्टर है,आप को जो ठीक लगे वो करे।
बाबुजी : वैसे देखा जाए तो आप भी मेरी डॉक्टर है, आप भी मुझे सुबह, दोपहर और रात को अपनी दवाई देती हो।
शालिनी शर्मा जाती हैं, और अपना सिर तकिये में घुसा देती हैं ,बाबुजी अब उल्टी लेटी हुई शालिनी के ऊपर आकर नितंबों के ऊपर आकर दोनों बाजू अपने घुटने मोड़कर बैठ जाते हैं, हालाकि शालिनी पर कोई अपना वजन ना हो इसका ध्यान रखते हुए बाबुजी बैठते हैं,
पर उसे शालिनी के नर्म तकिये जैसे नितंबों का एहसास हो रहा था, बाबुजी तेल को अपने हथेली में लेकर शालिनी की कमर पर गिराकर हल्के हाथों से मालिश करने लगते है, पहेले बाबुजी कोई कोई हिस्सों में मालिश करते हैं फिर जब वो पूरी नंगी लंबी पीठ पर तेल से मालिश करने लगते है तब वो पूरी पीठ पर अपने हाथों को नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे मालिश करते हैं तब शालिनी के चोली की डोरी बीच मे आती थी,
बाबुजी को मालिश करते समय दिक्कत होने लगती हैं, बार बार उसे रुकना पड़ता जिससे उसे ठीक से मालिश नहीं होती
बाबुजी : बहु ! एक काम करोगी?
शालिनी : हाँ! बोलिए क्या करना है?
बाबुजी : वो मालिश करने में ब्लाउज की डोरी बीच में आ रही हैं, क्या इसे खोल सकता हूं?
शालिनी : जी बिलकुल, आप को जैसे ठीक लगे वैसे करिए
बाबुजी कांपते हुए हाथों से चोली को डोरी खोलते हैं, बाबुजी के सामने अब बेदाग लंबी गोरी पीठ थी जो बाबुजी जी द्वारा देखी गई सब से सुन्दर पीठ थी,
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उनकी बहु इतनी सुन्दर है, हालाकि पहले भी शालिनी की पीठ उन्होंने देखी थी पर इतनी नजदीक से और छुने का मौका पहली बार मिला था, एक पल को उनको अपने बेटे के भाग्य पर दुःख हुआ, जो इतनी सुन्दर पत्नी को छोड़ के चला गया, फिर दूसरे ही पल अपने भाग्य पर खुशी भी हुई क्युकी उनकी वजह से ही आज उनको अपनी बहु के स्तनों से दुध पीने और आज उसकी गोरी सुन्दर पीठ को मालिश करने को मिल रहा है।
बाबुजी जैसे ही तेल की एक पतली धार शालिनी के पीठ पर गिराते है, तब शालिनी को पहले ठंडा महसूस होता है, फिर जब बाबुजी मालिश शुरू करते हैं तब बाबुजी का हाथ अपनी बहु के पूरी नंगी पीठ पर घूम रहा था, शालिनी को आज काफी दिनों बाद एक खुरदरे, सख्त और मर्दाना हाथो का अनुभव होता है उसके शरीर में सिहरन दौड़ जाती हैं, जैसे ही बाबुजी तेल को शालिनी के पीठ पर फैलाने और शालिनी के शरीर मे तेल उतरे इसलिए धीरे धीरे दबाव बढ़ाते चले जाते हैं, जब भी शालिनी के दर्द वाले हिस्से मे दबाव पड़ता तब उसके मुँह से सिसकारी निकलने लगती, अब शालिनी को गर्माहट महसूस होने लगती हैं जिसकी एक वजह तेल था और दूसरी वजह बाबुजी के मर्दाना हाथ का स्पर्श था ,मालिश करते समय कभी कभार बाबुजी की उंगलिया शालिनी के बिस्तर से पीचकने से जो स्तनों का हिस्सा दोनों बाजू से बाहर निकला था उसे छु जाती, अब शालिनी को सिर्फ वहीं गर्माहट महसूस होती है जहां दर्द हो रहा था, और उसे अच्छा भी महसूस हो रहा था, करीब 15-20 मिनट के मालिश के बाद बाबुजी शालिनी के ऊपर से हटकर पास बैठ जाते हैं, वो शालिनी को थोड़ी देर एसे ही लेटे रहने को कहते है जिससे तैल सही तरीके से सूख जाए, बाबुजी फिर अपने हाथ धोने जाते हैं और नील को सम्हालने लगते है, फिर वो उसे शालिनी के पास रखकर बाहर काम देखने जाते हैं, अब बस आखिरी का काम रह गया था, फिर सिर्फ चाचाजी के आँगन का काम रहता।
शालिनी भी उल्टा लेटे लेटे अपने बेटे से खेलने लगती हैं अब खाने का समय भी होने लगा था, अब तेल भी सूख गया था, उसे राहत भी लग रही थी, वो खड़ी होती हैं और आईने के सामने आकर खड़ी होती हैं,
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तभी दरवाजा खुलने की आवाज आती हैं, वो मुड़कर देखती हैं कि बाबुजी है, वो बस मुस्कराते हुए अपने बाल सही कर रही थी, अभी भी उसके चोली की डोरी खुली हुई थी, बाबुजी शालिनी के इस रूप को देखकर जैसे लोहा चुम्बक की ओर खींचा चला जाता है वैसे बाबुजी शालिनी की ओर खींचे चले जा रहे थे, जैसे ही शालिनी बाल बनाकर अपने चोली की डोरी बांधने हाथ पीछे ले जाती हैं तब बाबुजी के हाथ उसके हाथ पर जाकर उसे रोक देते हैं।
बाबुजी : इसे खोला मेने था तो इसे बंधेंगे भी हम,
बाबुजी की आवाज में एक आज्ञा और अधिकार की झलक थी, जिससे शालिनी भी अनायास ही मान लेती हैं और अपने हाथ आगे कर लेती हैं, अब बाबुजी के हाथ अडिग थे अब वह कांप नहीं रहे थे, वो अधिकार पूर्वक डोरी बांधते है तब उससे थोड़ी तंग डोरी बंध जाती हैं तब शालिनी के मुँह से सिसक निकल जाती हैं।
शालिनी : आह ... बाबुजी! थोड़ा ढीला करे।
बाबुजी फिर से थोड़ी ढीली डोरी बांधते है, जब शालिनी ने बाबुजी शब्द बोला तब मानो बाबुजी कोई बेहोशी से होश में आए हों एसा लगता है, शालिनी को भी आईने में यह बदलाव दिखता है, बाबुजी डोरी बाँधकर दो कदम पीछे हट जाते हैं और असहजता से माफी माँगकर चले जाते हैं, शालिनी को यह कुछ समझ नहीं आता, पर वो अभी बाबुजी को ज्यादा असहजता महसूस ना हो इसलिए वो कुछ नहीं बोलती और किचन में चली जाती हैं, जहां बाबुजी पहले से आकर खाना बनाने की तैयारी कर रहे थे।
शालिनी : अरे...बाबुजी! आप रहने दो, मे कर लुंगी आप नील के साथ खेलिए।
बाबुजी : (नीचे नजरों से...) तुमको दर्द है, इसलिए आज खाना मैं बनाऊँगा, तुम आराम करो,
शालिनी : ठीक हैं, आपका हुक्म सर आँखों पर
बाबुजी : हुक्म नहीं है, बस विनती है।
शालिनी : पता है, बस मज़ाक कर रही हूं।
बाबुजी खाना बना रहे थे, शालिनी उधर ही प्लेटफॉर्म पर बैठकर बाबुजी से सामान्य बातचीत करती हैं, और साथ ही काम के बारे मे पूछती हैं, बाबुजी भी अब धीरे-धीरे सामन्य होने लगे थे, शालिनी अब सब बर्तन निकालकर खाना खाने की जगह रखने लगती हैं, फिर वो नील को लेकर आती हैं और उसे पीसी हुई दाल खिलाती है, फिर वो और बाबुजी खाने लगते है, बाबुजी का मूड अब सही हो गया था अब वो पहले की तरह बात करने लगे थे।
शालिनी : बाबुजी ! एक बात पूछना चाहती हूं
बाबुजी : तुमको कब से इजाजत की जरूरत पड़ने लगी, बेझिझक पूछो।
शालिनी : धन्यवाद! वो बात ही एसी है, आप बुरा मत लगाना और सच बोलना, छुपाना मत
बाबुजी : एसी क्या गंभीर बात है?, ठीक हैं पूछो, तुमसे क्यूँ छुपाना?
शालिनी : वो अभी जब आप मेरे चोली की डोरी बांध रहे थे फिर अचानक से असहजता से चले गए, क्या हुआ था आपको? देखिए आपने कहा है आप छुपाएं नहीं, हम एक परिवार है और मेने आपसे कुछ नहीं छुपाया, मेरे सब दर्द और पीड़ा आपके साथ साझा किया है
बाबुजी : ठीक हैं, उसमें तुम्हारी गलती नहीं है, वो जो कुछ हुआ वो तुम्हारे कपड़ों की वजह से हुआ।
शालिनी : क्या कपड़े से?
बाबुजी ; हाँ ! यह कपड़े तुम्हारी सास के हैं, जब तुम पीठ करकर अपने को संवारने में लगी हुई थी तब उस पल मुझे लगा मेरी पत्नी खड़ी है जिससे मुझे एक भ्रांति हो गई थी, पर जब तुमने " बाबुजी " शब्द बोला तब में होश में आया और मुझे शर्म आने लगी और में चला आया
शालिनी : ओह..माफ करना,अगर आपको
दुःख हुआ है तो आगे से मम्मीजी के कपड़े नहीं पहनेंगी,
बाबुजी : अरे नहीं...ब्लकि मुझे तो खुशी हुई थी जब तुमने अपनी सास के कपड़े पहने हुए देखा, जिससे उसकी यादों को जीवनदान मिला है, वो तो इतने सालों बाद उसके कपड़े में तुमको देखा तो उसकी याद आ गयी ,और मेरी भावनाएं मुझ पर हावी हो गई, मुझे माफ़ करना।
शालिनी : आप माफी क्यूँ मांग रहे हैं, आपकी कोई गलती नहीं है, इतने साल अपने प्यार से दूर रहना और उसकी यादों मे तड़पना क्या होता है मैं जानती हूं, नीरव को विदेश गये इतने दिन ही हुए हैं फिर भी मुझे उसकी याद तड़पती है,और मेरा प्यार कुछ महीनों में वापिस आ जाएगा और हमारी जिंदगी फिर से सामन्य हो जाएगी पर आपका प्रेम कभी वापिस नहीं आएगा, यह विचार से ही मुझे कंपकंपी हो जाती हैं, फिर भी आप बाहर से खुश दिख रहे है, मुझे पता था कि आप अंदर से एक खालीपन महसूस करते हैं,
बाबुजी : एक तरह से तुम्हारी बात सही है पर जब से तुम और मुन्ना यहां आए हों तब से यह खालीपन थोड़ा कम हुआ है, पर कभी-कभी तुम्हारी सास की याद आ जाती हैं।
शालिनी : अब से मैं कोशिश करूंगी की आपको सासु माँ की याद कम आए,
बाबुजी को अपनी पत्नी की यादें भावुक कर देती हैं और उसके आँखों से आंसू निकलने लगते है, शालिनी यह देख उसे भी भावुकता होती हैं।
शालिनी : (मन में..)बाबुजी कितना प्यार करते हैं अपनी पत्नी से, आज भी उसके लिए आंसू बहाते है, भाग्य का भी कैसा खेल है इतने प्यार करने वाले इंसान से ही उसका प्यार छिन कर उसे अकेला कर देता है, चाचाजी का भी यही हाल है, दोनों दोस्तों की एक जैसी ही कहानी है,एसा लगता है भाग्य ने मुझे इन दोनों प्यार से बिछुड़ चुके और अकेले पड़े को सहारा बनने यहां रखा है, एक स्त्री ही उस वात्सल्य और प्रेम से सब को एकजुट रख सकती हैं, कुदरत का यह एक स्त्री को दिया हुआ वरदान है, मैं भी अपने वात्सल्य से बाबुजी और चाचाजी को सम्भालने का प्रयास करूंगी,
शालिनी शोक के डूबे बाबुजी को अपने सीने से लगा लेती हैं, जिससे बाबुजी का चेहरा उसके स्तनों पर टिका हुआ था
, बाबुजी की गर्म सांसे उसके ब्लाउज के भीतर जाँ रही थी और बाबुजी के आँखों का आंसू बहकर उसके स्तनों के ढलान पर बहता हुआ ब्लाउज मे समा जाता है, बाबुजी भी अपने हाथ को शालिनी के कमर पर लपेटकर रोने लगते है, आज पहली बार उसे अपना दुःख और मन मे दबे दर्द को व्यक्त करने का मौका मिला था, जिससे वो खुलकर रो रहे थे, अब तक बाबुजी एक मर्द होने के दायरे मे रह रहे थे जिससे वो खुलकर रो नहीं सके थे, पर आज शालिनी के आगोश में वह दायरा टूट गया जिससे पहली बार उसे अपना दर्द जताने का रास्ता दिखा, शालिनी भी उसे खुलकर दर्द बया करने दे रही थी जिससे बाबुजी का मन हल्का हो जाए।
इंसान खुलकर वहीं हसने और रोने लगता है जहा वो खुद को निर्भय समझे और अपनापन महसूस करे, आज बाबुजी शालिनी की बाहों में निर्भय होकर रो रहे थे, उसे किसी की परवाह नहीं थी, साथ ही शालिनी भी उसे अपना मानकर उसे सहारा दे रही थी, कुछ देर बाद जब बाबुजी का मन शांत और हल्का हुआ वह शालिनी से अलग हुए और देखा शालिनी की चोली उसके आंसू से थोड़ी भीग गई है,
बाबुजी : माफ करना बहु, तुम्हारे कपड़े भिगा दिए, इस उम्र में अपनी पत्नी के लिए रो रहा था, कितना पागल हूं में,
शालिनी : प्रेम की कोई उम्र नहीं होती बाबुजी ,लगता था आज पहली बार आपने अपना दुख जाहिर किया था और इसमें कोई बुराई नहीं है, कोई तो होना चाहिए कि जिससे हम अपना दुख बाट सके, आज से जब भी आपको दुख हो या सासु माँ की याद सताये तब आप बिना किसी संकोच के मेरे पास आ जाना, और आगे से जब भी आपको अकेलापन सताये तब आप आकर मुझसे गले लग जाना,
बाबुजी : नहीं बहु ! इस सब की जरूरत नहीं है,
शालिनी : हम एक परिवार है, परिवार में हर कोई एकदूसरे का सहारा बनते है, कभी मैं आपका सहारा बन जाऊँगी तो कभी आप मेरा सहारा बन जाना, कभी अगर मुझे नीरव की याद सताये तब में आपके पास आकर अपना अकेलापन दूर करूंगी।
बाबुजी : नहीं मैं यह बारबार नहीं कर सकता, मेरा यही भाग्य है।
शालिनी : आप यह मान लीजिए कि मैं आपका भाग्य बदलने आयी हूं तो, अगर आपको रिश्तों की मर्यादा बीच में आ रही हैं तो आप अपना दोस्त या हमदर्द समझकर मेरे पास आ जाना,
बाबुजी : नहीं बहु यह ठीक नहीं, दूसरों को कैसा लगेगा?
शालिनी : दूसरों की चिंता है और खुद की कोई चिंता नहीं जब आप को अपना दर्द जब एक हद से ज्यादा बढ़ जाएगा तब कोई दूसरा आपका दर्द की चिंता नहीं करेगा, तो आप भी दूसरों की चिंता ना करे, अपने और परिवार के बारे में सोचे
बाबुजी : ठीक है, मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ,
शालिनी : सिर्फ ठीक से काम नहीं चलेगा आप वादा करो, वर्ना आपको नील की सौगंध देनी पड़ेगी।
बाबुजी : नहीं नहीं...मुन्ने को बीच में मत लाओ, मैं वादा कर्ता हूं कि जब भी मुझे याद सताएगी या अकेलापन लगेगा मैं तुम्हारे पास आऊंगा।
बाबुजी फिर से शालिनी के गले लग जाते है, जो दिखाता है कि अब भी बाबुजी को उसकी पत्नी की याद आ रही थी, शालिनी भी उसके बालों में प्यार से उंगलिया फेरकर सहला रही थी, शालिनी को भी यकीन हो गया कि बाबुजी अपना वादा निभाएंगे, और वो खुश भी थी वो चाचाजी के बाद बाबुजी के दुःख कम करने में मददगार साबित हुई ,
बाबुजी शालिनी से अलग हुए, शालिनी और बाबुजी ने मिलकर सब काम निपटा दिए फिर दोनों कमरे में आए, शालिनी नील को सुलाकर बिस्तर पर आयी और अपनी चुन्नी हटाकर चोली घाघरा पहने लेट जाती हैं।
शालिनी : बाबुजी सोने से पहले दुध पीले तो मुझे राहत होगी।
बाबुजी : ठीक हैं, आज मे गोदी में लेटकर पीना चाहता हूं।
शालिनी : जैसे पीना हो वैसे पियो कोई दिक्कत नहीं
शालिनी दरवाजे की ओर पीठ करके बैठ जाती हैं और पीछे से अपनी डोरी खोलने लगती हैं सिर्फ गले वाली डोरी बंधी है जिसपर चोली टीके हुए है, वर्ना चोली गिर जाती और शालिनी पूरी तरीके से अधनंगी हो जाती ,शालिनी की पीठ अब पूरी तरीके से नंगी थी, शालिनी ब्लाउज को ऊपर करके अपने स्तन को बाहर निकालती है तब बाबुजी का मुँह स्तन की ओर खींचा चला जाता है, जैसे ही बाबुजी अपने मुँह से पहली चुस्की भरते हैं शालिनी को राहत की सिसकी निकालती है, बाबुजी के लिए दूध से भरे हुए दोनों स्तन कलश थे जिसे वो अपने हिसाब से और अपना समय लेकर पीने के लिए स्वतंत्र थे, जब वो पहला स्तन चूस रहे थे और अपने एक हाथ शालिनी के कमर पर लपेटा हुआ था,शालिनी भी अपनी उंगलिया उसके सिर पर घुमाकर उसपर अपना वात्सल्य बरसा रही थी,
शालिनी के मन में अभी बाबुजी के लिए वहीं भाव उमड़ रहा था जो थोड़ी देर पहले था, इसलिए वो उसका सिर हल्का अपने स्तन में दबा रही थी।
शालिनी : भाव में आकर...)आह ...बाबुजी पी लीजिए सारा दुध, मुझे दर्द से राहत दिलाए, आपको जब भी मेरा दुध पीने की ईच्छा हो तब बेझिझक बताना, यह आपके लिए हमेसा हाजिर है, आज से मे आपको पूरा अधिकार देती हूं स्तनपान करने का,
बाबुजी भी शालिनी की बात सुनकर खुश भी थे और हैरान भी थे क्युकी वह जानते थे कि शालिनी उसे स्तनपान करवाएगी पर इस तरह खुलेआम साफ़-साफ़ शब्दों मे कहेगी यह यकीन नहीं था, उसे खुशी हुई कि अब उसके और शालिनी के बीच का रिश्ता ज्यादा गहरा हो गया है।
करीब आधे घंटे बाद शालिनी स्तनपान करवाती हैं फिर बाबुजी पेट भरे होने से नींद आने से सो जाते हैं पर शालिनी बस लेटी हुई थी, जब उसे करीब आधे घंटे बाद तक नींद नहीं आती तब वो गर्मी से परेशान होकर बाहर जाने का सोचती हैं जिससे ताजगी महसूस हो, वो अपने कपड़े ठीक से पहनकर चुनरी डालकर बाहर आती हैं उसे लगा था कि अभी सब मजदूर सो रहे होंगे जिससे उसे कोई दिक्कत नहीं होगी, जैसे ही शालिनी घर का दरवाजे के पास आती हैं वो देखती हैं कि दरवाजा खुला रह गया था, उसे पहले डर लगा, फिर वो हिम्मत करके बाहर आयी और देखा कोई नहीं है जिससे उसे राहत हुई, वो बाहर आकर आंगन में आती हैं उसे बातचीत की आवाज सुनाई देती हैं, उसे आवाज जानी-पहचानी लगती हैं, आवाज बाबुजी के घर से जहां काम चल रहा था वहां से आ रही थी, शालिनी दबे पांव जाकर देखी है तब उसकी आँखें खुशी और हैरानी से चौड़ी हो जाती हैं उसके चेहरे पर एक खुशी आ जाती हैं।
शालिनी देखती हैं कि ठेकेदार किसी से बात कर रहा है जब शालिनी ने देखा की वो जिससे बात कर रहा था वो और कोई नहीं चाचाजी थे, शालिनी को पहले यकीन नहीं हुआ, उसने अपने आंखो को मसला और फिर से देखा तब उसे यकीन हुआ कि वह सच मे चाचाजी है, उसके शरीर गर्मी में ठंडा होने लगा, पहले उसे मन किया कि दौड़कर जाए और चाचाजी को गले लग जाये पर फिर समय और स्थान का बोध होने से वो अपनेआप को नियंत्रित करती हैं और मुस्कराते हुए चाचाजी के पास आती हैं।
शालिनी : चाचाजी!
चाचाजी पिछे मुड़ते है और शालिनी को देख मुस्करा देते हैं,
चाचाजी : हाँ बेटी मैं।
शालिनी : आपने ना कोई मेसेज किया और ना कोई फोन किया,
चाचाजी : अगर बताकर आता तो सरप्राइज कैसे देता?और अपने घर भी कोई बताकर थोड़ी ना आता है, और मुझे भी सरप्राइज नहीं मिलता।
शालिनी को समझ नहीं आ रहा था कि चाचाजी किस सरप्राइज की बात कर रहे थे।
शालिनी : आपको कौन सा सरप्राइज मिला?
चाचाजी : यह सब जो बनकर तैयार हुआ है वो सब।
शालिनी : वो सब ठीक है, पर आप आए कब?
इस बात पर चाचाजी और ठेकेदार दोनों एक साथ अलग अलग जवाब देते हैं
चाचाजी : अभी आया
साथ में...ठेकेदार : 1 घंटे पहले
शालिनी : क्या? एक घंटे पहले?आप घर पर क्यूँ नहीं आए?
ठेकेदार : वो तो आए थे पर दरवाजा बंध होने से और आप लोग सो रहे होंगे इसीलिए वो यहां पर आ गए
चाचाजी : हाँ इसलिए..
शालिनी : अपने घर आकर कोई बाहर इंतजारी कर्ता है भला? दरवाजा बंध था तो आप ने घंटी क्यों नहीं बजायी ?
तभी शालिनी को याद आता है कि दरबाजा तो खुला ही था, और 1 घंटे पहले तो बाबुजी को स्तनपान करवा रही थी, तो क्या.....?
शालिनी के चेहरे का रंग धीरे-धीरे फीका पड़ने लगता है, उसे डर लगने लगता है उसके चेहरे पर पसीना आने लगता है
ठेकेदार : चाचाजी लगता है बहु को धूप की आदत नहीं है इसलिए देखो पसीना होने लगा ,आप लोग घर जाइए हमें भी थोड़ी देर में काम चालू करना है।
चाचाजी और शालिनी घर की ओर बढ़ते हैं तब शालिनी अपने विचारों में डूबी हुई थी
शालिनी : (मन में..)अगर चाचाजी 1 घंटे पहले आ गए थे और दरवाजा खुला था तो क्या उसने मुझे बाबुजी को स्तनपान करवाते देखा होगा इसलिए वो बाहर चले आए ताकि हमें परेसानी ना हो,चाचाजी को पता चल गया होगा तो क्या सोच रहे होंगे मेरे बारे मे और बाबुजी के बारे मे? कहीं बाबुजी जो सरप्राइज की बात कर रहे थे क्या वो काम के बारे में था या मेरे बारे मे?
शालिनी के मन में विचारों और संभावना का तूफान चल रहा था, दोनों जब घर के चौखट पर आए तब शालिनी उसे वहीं खड़ा रख कर अंदर जाती हैं और आरती की थाली ले आती हैं तब तक बाबुजी भी जाग गए थे, वो जब चाचाजी को देखते हैं उसे भी हैरानी के साथ खुशी भी हुई, उसका दोस्त वापिस आ गया था, आरती उतारकर शालिनी बाबुजी की नजर उतारती है फिर सब कमरे में आते हैं, चाचाजी पहले नील के पास जाते हैं और सोते हुए नील के सिर पर हाथ फेरते है।
चाचाजी सबसे पहले नहाने जाते हैं, फिर आकर शालिनी ने सब के लिए चाय बनाई थी बाबुजी मजदूर को चाय देने जाते हैं और चाचाजी और शालिनी दोनों साथ मे चाय की चुस्की लेते हुए बैठे थे,
चाचाजी अभी सांकेतिक शब्दों का प्रयोग करके बात करते हैं जिसका मतलब था वो बात कर रहे हैं उसका सही मतलब कुछ दूसरा था ,शालिनी भी उसी तरह के जवाब दे रही थी
चाचाजी : यहां काफी कुछ बदलने लगा है।
शालिनी : हाँ थोड़ा बहुत बदलाव हुआ है ,जो समय की मांग थी जिससे बदलाव करना पड़ा ताकि भविष्य में कोई मुसीबत ना हो।
चाचाजी : हाँ सही कहा, एक तरीके से अच्छा है यह बदलाव से पहले जो था उसको नहीं भूलना चाहिए, उसका भी खास योगदान है, उसकी वज़ह से ही बदलाव आया है, अब तक उसने ही सब संजोए हुए था
शालिनी समझ रही थी कि चाचाजी कोई वस्तु या जगह की नहीं परन्तु अपनी बात कर रहे थे ,तब बाबुजी आ जाते हैं, और तीनों मिलकर सामन्य बातचीत करते हैं, एसे ही शाम हो जाती हैं, शालिनी नील को जगाकर स्तनपान करवाती हैं, पर उसके स्तनों में दुध अभी भी बचा हुआ था, अब शालिनी दुविधा में थी कि वो बाबुजी और चाचाजी में से किसको मदद के लिए कहें।
तभी ठेकेदार बाहर खड़े आवाज लगाता है, जिसे सुन बाबुजी और चाचाजी दोनों बाहर आते हैं क्योंकि अब बाबुजी के घर का काम पूरा हो गया था और कल से चाचाजी से घर मे काम शुरू करना चाहता था, उसे सब पूछना था कि कहा और कितना काम करना है, चाचाजी सब समझाने लगते है, तभी बाबुजी घर वापिस आ जाते हैं क्योंकि उसे पता था शालिनी को अपने स्तन खाली करने है, इसलिए जब तक चाचाजी और ठेकेदार काम समझे तब तक वो शालिनी से स्तनपान कर लेंगे,बाबुजी को जाता देख चाचाजी को भी अंदेशा हो गया था कि बाबुजी क्यु घर जा रहे हैं,वो कुछ नहीं बोलते
बाबुजी भीतर आकर शालिनी को स्तनपान करवाने को कहते है ताकि बाद में रात तक उसे समय नहीं मिलेगा और दर्द सहना पड़ेगा, अभी सब बाहर है इसलिए किसी को शक नहीं होगा, शालिनी भी परिस्थिति समझ कर तुरत बाबुजी को स्तनपान करवाने लगती हैं, आज बाबुजी कुछ जल्दी से ही पी रहे थे, शालिनी को इस घटना से एक रोमांच और डर का एहसास एकसाथ हो रहा था, एक तरफ किसी के आने का डर और दूसरी ओर स्तनपान करवाने की ईच्छा, 15 मिनट बाद बाबुजी अपनी जीभ को अपने होठों पर फेरकर होठों पर लगे मीठे गाढ़े दुध की बूँदों को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहते थे, उसने एक बूंद भी शालिनी के स्तनों मे नही छोड़ी थी, हालाकि अब बाबुजी को भी मन मे एक डर था कि अपने दोस्त के आने से वो कैसे स्तनपान करेंगे, शालिनी और बाबुजी दोनों के चेहरे पर उस डर की चिंता दिखाई दे रही थी।
शालिनी ; बाबुजी ! क्या आप को भी वहीं डर सता रहा है जो मुझे सताता है
बाबुजी : हाँ! अब सब कैसे होगा?
शालिनी : पता नहीं, कोई ना कोई रास्ता निकल आएगा,
दोनों अपनेआप को संभालते हुए सामन्य हो जाते है, जैसे तैसे रात भी हो जाती हैं, सब खाना खा कर आंगन में बैठे थे, बाबुजी चाचाजी को अपने भाई के बारे मे पूछते है और थोड़ी इधर-उधर की बातें होती हैं, फिर बाबुजी और चाचाजी मिलकर जरूरत का समान चाचाजी के घर से बाबुजी के घर पर रख देते है ताकि उधर काम की वज़ह से किसी को तकलीफ ना हो, लेकिन जब सोने की बारी आती हैं तब चाचाजी अपने घर सोने चले जाते हैं, वो बाबुजी और शालिनी के कहने पर भी नहीं रुके।
शालिनी और बाबुजी अपने घर मे आकर बेड पर आकर लेट जाते हैं
बाबुजी : एक तरीके से अच्छा हुआ बलवंत अपने घर गया, जिससे हम बिना डर के अपना काम कर सकेंगे, लगता है भाग्य भी हमारे साथ है
शालिनी: (मन में ..)बाबुजी आपको कैसे समझाये की भाग्य नहीं चाचाजी की वजह से हम स्तनपान कर सकेंगे,अब तो यकीन से कह सकती हूं कि चाचाजी को अपने बारे मे पता चल गया है, इसलिए सायद वो नाराज है, कुछ भी करके इसका रास्ता निकालना पड़ेगा, ताकि यह नाराजगी तीनों के रिस्तों मे दूरी ना पैदा करे,
बाबुजी बिंदास होकर स्तनपान कर रहे थे, पर शालिनी के मन मे चिंता का तूफान था, वह चाचाजी से कैसे बात करेगी और कैसे समजा पायेगी कि सब कैसे हुआ था। आधे घंटे बाद बाबुजी स्तनपान कर के गहरी नींद में जाने लगते है पर शालिनी की नींद उड़ चुकी थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे?
शालिनी : (मन में..)मुझे चाचाजी से बात करनी ही होगी, और पहले की तरह उसे स्तनपान करवाने भी जाना चाहिए ताकि उसे यह ना लगे कि मेने बस उसका फायदा उठाया था, पर अगर वो अभी जाएगी तो उसके स्तनों मे दुध तो था नहीं, इसका क्या जवाब दूंगी चाचाजी को ?कुछ देर बाद जाऊँगी तब तक नया दुध बन जाएगा।
करीब रात के 1 बजे थे बाबुजी और नील गहरी आगोश में थे, शालिनी भी जानती थी कि अभी बाबुजी का गहरी नींद का समय है, इसलिए वो धीरे से बेड पर से उतरकर और अपनी चोली सही से पहनकर दरवाजा खोलकर चाचाजी के घर जाती है,
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उसे बस एक डर था कि अगर चाचाजी दरवाजा बंध करके सोये होंगे तो वो क्या करेंगी?
शालिनी चाचाजी के घर के दरवाजे पर आती है उसका दिल जोरों से धड़क रहा था, जैसे कोई प्रेमिका अपने प्रेमी से चोरी छुपी मिलने आयी हो, जैसे ही वो दरवाजा को हाथ लगाती हैं, तो दरवाजा खुला ही था ,उसे खुशी हुई, और जैसे वो चाचाजी के कमरे में आती हैं और देखती हैं कि चाचाजी लुंगी और बनियान पहने सोये थे, चाचाजी ने भी शालिनी के इंतजार में दरवाजा खुला रखें सो गए थे, शालिनी जैसे ही कमरे में आई उसने अपनी चाल बढ़ा दी ताकि पायल की झनकार से चाचाजी जाग जाए .....
इस महत्वपूर्ण रात का वर्णन विस्तार से होगा, इसलिए उसे अगले अपडेट में पढ़ेंगे...यह रात शालिनी के लिए एक चुनौती से भरी थी, उसके द्वारा लिया गया निर्णय उसके, बाबुजी और चाचाजी के जीवन को बदल सकता है, या तो तीनों गहरे सम्बंध में जुड़ जाएंगे या रिस्तों में दरार आएगी यह सब शालिनी के निर्णय पर आधारित है....
Update 29
सुनहरी सुबह होने की तैयारी होने लगी थी ठंडी और मद्धम हवा बह रही थी, सभी रात के जोर शोर से मनाए गए रंगारंग कार्यक्रम की थकान मिटाने के लिए गहरी नीन्द में सोये हुए हैं, कुछ बड़े बुजुर्ग थे जो जल्दी जागकर अपनी दिनचर्या में लगे हुए थे, सूर्य क्षितिज पर आने को था, हल्की रोशनी बिखरती हुई सब को अंधेरे से उजाले की ओर ले जा रही थी।
रोज की तरह आज भी बाबुजी सबसे पहले घाघरा चोली पहने सोयी हुई अपनी बहु को देखते हैं, जो उसके पूरे दिन को शुभ बनाती हैं, सिर से लेकर पांव तक निहारने के बाद बाबुजी फ्रेश होने जाते हैं, फिर वापिस आकर खटिया पर बैठे हुए शालिनी के जागने की राह देखते हैं, थोड़ी देर में शालिनी अपनी नींद का त्याग करके अंगडाई लेते हुए जगती है, जब वो अंगड़ाई लेती हैं तब उसका पेट और कमर एकदम पतला चिकना और काफी लंबा और सेक्सी दिखता है
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बाद में शालिनी योग के कपड़े पहनने कमरे में जाती हैं, बाबुजी दातुन कर रहे थे, जब शालिनी अपने बाल को बांधते हुए बाहर आती हैं तब उसकी चिकनी बग़ल दिख रही थी, जब बाबुजी का दातुन खत्म होता है तब वो भी शालिनी के साथ योग करने लगते है
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,शालिनी को योग करते समय कमर में थोड़ा खिंचाव होता है, पर दर्द कम था इसलिए वो ज्यादा ध्यान नहीं देती, योग के बाद वो बाबुजी को नहलाने लगती हैं, अब रोज की तरह दोनों के बीच हसी मज़ाक और छेड़छाड़ होती हैं, बाद में बाबुजी तैयार होकर नील से खेलते हैं और शालिनी नहाने जाती हैं, शालिनी आज जल्दी में कपड़े लाना भूल गई थी, और उसने अलमारी में से भी नहीं निकाले थे, इसलिए वो जब तौलिये से शरीर पोछा तब उसे ख्याल आया कि उसने कपड़े लिए ही नहीं, वो बाबुजी से भी कैसे मंगवाए ?,शालिनी बड़ी दुविधा में थी
शालिनी : (मन में..) अरे मैं भी भूल कैसे गई?,बाबुजी से अलमारी में से कैसे मंगवाया जाए?और कैसे समझाया जाए कि कौन से पहनने है?
शालिनी हल्के से दरवाजा खोलकर देखती हैं बाबुजी उसकी ओर पीठ करके नील के साथ खेल रहे हैं, इसलिए वो सोचती हैं, वो तौलिया लपेटकर जल्दी से कमरे में चली जाएगी, वो इसके लिए काफी मन को मजबूत करती हैं, और तौलिया अपने नंगे शरीर पर लपेट लेती हैं,
और हल्के से दरवाजा खोलकर अपने आप को संभालते हुए चोरी छुपी अपने कमरे की ओर चलते हुए जाने लगती है, पर वो भूल गई थी उसने पैरों में पायल पहने हुए हैं, जिसकी "छन छन" की आवाज से बाबुजी को लगा शालिनी नहाकर आ गई है इसलिए वो पिछे मुड़कर देखते हैं और नाश्ते के बारे में पूछने जाते हैं कि तभी उसकी नजर सिर्फ तौलिया लपेटे जा रही अपनी गोरी गोरी बहु पर ठहर जाता है, आज पहली बार उसकी गोरी मांसल जांघें दिखने मिल रही थी, गिले बाल हाथों में चूडिय़ां, पानी की बूंदे जो शालिनी के कामुक शरीर से अलग होना नहीं चाहती थी, गोरी पिण्डी, और गोरे पैरों को देख बाबुजी को पहली बार पता चला कि उसकी बहु कितनी गोरी चिट्टी और सही कटावदार शरीर की मालकिन है,
शालिनी की नज़रे बाबुजी के ऊपर पड़ती हैं, उसे शर्म महसूस होती है, वो तुरत ही अपनी चाल को तेज करते हुए कमरे में दाखिल हो जाती हैं
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और दरवाजा बंध कर देती हैं, शालिनी का दिल काफी जोरों से धड़क रहा था, उसे जिसका डर था वहीं हुआ था,
शालिनी : (मन में..) यह क्या हो गया?बाबुजी ने मुझे इस हालत में देख लिया, बाबुजी क्या सोच रहे होंगे?मैं ही बेवकूफ़ हूं जो एसे चल पड़ी, इससे अच्छा कपड़े मंगवाकर पहन लेती, अब कैसे बाबुजी से नजरे मिला पाऊँगी?
शालिनी अपने मन के विचारों से लड़ते हुए अपने कपड़े ढूंढने लगती हैं, पर जल्दबाजी में उसने अपनी सास का चोली और लहंगा पहन लिया, वो तो जब हूक की जगह डोरी आती हैं तब उसे वास्तविकता का पता चलता है, वो अपने को आईने में देखती हैं, उसपर गांव के परम्परागत कपड़े जच्च रहे थे
, वैसे उसे कपड़ों से ज्यादा अलग नहीं थे बस ब्लाउज थोड़ा गहरे गले का और लहंगा थोड़ा छोटा था, जिसमें उसकी गोरी पिण्डी दिख रही थी, उसने एसे कपड़े फ़िल्मों में बंजारन को पहने देखा था, कपड़े छोटे होने का कारण वहां का वातावरण भी था, जिससे गर्मी में राहत मिलती, गहरे गले से तो वैसे भी शालिनी को कोई दिक्कत नहीं थी, वो पारदर्शी चुनरी का छोरो को अपने स्तनों के बीच रखकर ब्लाउज से पिन लगा दी जैसे उसने कई गांव की बुढ़ी महिलाओं को देखा था,
शालिनी शर्माते हुए बाहर आती हैं, बाबुजी का ध्यान फिरसे कमरे की ओर जाता है, उसने शालिनी को अपनी पत्नी के कपड़े पहने देख के उसको खुशी होती हैं और वो मंत्रमुग्ध होकर बस एकटक देखते रहते हैं,
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शालिनी नजरे चुराती हुई रसोई में दाखिल होती हैं और नास्ता बनाने लगती हैं, बाबुजी भी नील को खिलौने देकर शालिनी की मदद करने रसोई में आते हैं,शालिनी पीछे मुड़कर देखती हैं पर शर्म के कारण कुछ बोलती नहीं, बस चुपचाप अपना काम करती हैं, बाबुजी यह बात समझ रहे थे, इसलिए वो तभी कुछ नहीं बोलते वो बस अपने से हो सके इतनी मदद करते हैं, फिर बाबुजी नील को लेकर आते हैं और शालिनी को देते हैं, शालिनी नील को गोद में लेटा कर स्तनपान करवाने लगती हैं, उधर बाबुजी अपना नास्ता करने लगते है,जब नील का सिर्फ एक स्तन से दुध पीकर पेट भर जाता है तब वो अपना मुँह हटा लेता है, बाबुजी भी नास्ता करके खड़े होने वाले थे कि शालिनी ने उसका हाथ पकडकर रोक दिया।
शालिनी : बाबुजी ! क्या आप....?
बाबुजी : बहु! चलो पहले बात करते हैं, जिससे तुम्हारा मन का बोझ कम हो जाए और तुम पहले जैसी हो जाओ।
शालिनी : मुझे क्या हुआ है?एसा कुछ नहीं है।
बाबुजी : में जानता हूं तुम सुबह के उस घटना से विचलित हो, देखो उस वजह से परेसान होने की जरूरत नहीं है।
शालिनी : वो में अपने कपड़े भूल गई थी और आप नील से खेल रहे थे और आप को कैसे पता होता कि मुझे कोन से कपड़े आज पहनने है, इसलिए...
बाबुजी : मुझे इस सफाई की कोई जरूरत नहीं है, यह तुम्हारा घर है, यहां तुम आजादी से रह सकती हो, और जब एक छत के नीचे रहते हैं तब कभी कभार एसा हो सकता है, तुम्हारा उदाहरण लो, तुम अपने स्तनों की समस्या से कैसे परेसान थी? आज तुम बिना किसी परेसानी से मुझे स्तनपान करवाती हो, और मुझे बीमारी हुई तब तुमने मुझे सम्भाला और तब से लेकर आज तक मुझे नहलाया है, तुम मुझे रोज सिर्फ कच्छे में नहलाने लगी हो, इससे हमारे बीच कभी शर्म या रिश्ता बीच में नहीं आया, यह एक सामन्य बात है, तुम भी इसे ज्यादा मह्त्व ना दो और एक सपना समझ कर भूल जाओ।
शालिनी बाबुजी को अपनी गोदी में सुलाती है, आज पिछे डोरी वाली चोली थी इसलिए वो डोरी खोलकर ब्लाउज ढीला करती हैं
, फिर ब्लाउज को नीचे से उठाकर अपने स्तन को बाहर निकालती हैं, बाबुजी को आज एक नया और रोमांचित अनुभव हो रहा था क्योंकि आज शालिनी ने अपनी सास के कपड़े पहनकर बाबुजी के मन में अपनी पत्नी के प्रति प्रेम को फिर से जगा दिया, उसे कुछ पल के लिए शालिनी के रूप में अपनी पत्नी दिखने लगी, बाबुजी को अपने पुराने दिन याद आ गए जब ठीक इसी तरह नीरव के स्तनपान करवाने के बाद उसकी पत्नी उसे अपने गोदी में सुलाकर अपने स्तनों से दुध पिलाती थी।
आज बाबुजी उसी विचार में भावनात्मक हो गए और शालिनी के स्तन को देखकर उसने तुरत उसपर अपने मुँह लगाकर चूसने लगे, शालिनी भी यह उतावलापन देखकर हैरान हुई पर एक खुशी भी हुई कि बाबुजी सिर्फ चूसने के लिए नहीं चूस रहे पर अपनी भावना के साथ चूस रहे हैं, उसके चूसने मे आज एक अलग ही प्रकार था, आज उतावलापन के साथ एक मालिकाना भाव और थोड़ी कठोरता थी, आज बाबुजी कभी-कभी निप्पल को होठों से खींचते और कभी हल्के दांतों से दबाते, कभी-कभी सिर्फ निप्पल चूसने लगते तो कभी-कभी पूरा मुँह खोलकर स्तन मुँह में लेने लगते
, बाबुजी ने अपने एक हाथ को शालिनी के कमर पर लिपटा लिया और अपनी ओर खींचने लगे जिससे शालिनी के स्तनों का दबाव उसके चेहरे पर आता, शालिनी को अपने ससुर का यह रूप देखकर हैरानी हुई, साथ ही एक आनंद भी मिल रहा था, क्योंकि इस तरह नीरव चूसा कर्ता था, और एकाध बार चाचाजी ने चूसा था, उसके भीतर जो कामुकता दबी हुई सो रही थी आज उसने अंगड़ाई ली थी, जिससे शालिनी को एक अलग प्रकार की खुशी मिल रही थी, बाबुजी के इस प्रकार चूसने से आज उसने अनुभव किया कि उसके दुध का स्त्राव बढ़ रहा हैं,और उसने यह भी ध्यान दिया कि बाबुजी अपनी जीभ से निप्पल के साथ छेड़खानी कर रहे हैं, दुध खत्म होने के बाद भी जब वो चूसन नहीं छोड़ रहे थे तब भी शालिनी को अजीब लगा, क्योंकि बाबुजी कभी एसा नहीं करते थे,
शालिनी को भी आज मजा आ रहा था इसलिए वो भी बिना कुछ करे बाबुजी को मनमानी रीत से चूसने दे रही थी, वो भी बाबुजी के सिर को अपने स्तन मे दबाने लगती, बाबुजी ने अपने दूसरे हाथ से शालिनी के दूसरे स्तन पर ले जाकर चोली के ऊपर से निप्पल ढूंढने लगे, कामुकता के कारण शालिनी की निप्पल तन गई थी जिससे बाबुजी को ज्यादा देर नहीं लगी उसने अपनी उँगलियों से उससे खेलने लगे, कभी वो अपना हाथ फेरकर पूरे स्तन की गोलाई नापते, कभी ब्लाउज के अंदर अपनी उंगली डालते, दोनों ससुर और बहू एक दूसरी दुनिया मे थे, आज पहली बार दोनों के बीच कामुकता ने अपना पहला कदम रखा था, काफी समय तक बाबुजी अपनी मनमर्जी अपनी बहु के स्तनों पर करते रहे, तभी बाहर हॉर्न की आवाज दोनों को असली हकीकत का सामना करवाती हैं, दोनों जैसे थे वैसे ही स्थिर हो गए, शालिनी और बाबुजी दोनों असहजता और शर्म का सामना करते हैं, बाबुजी जल्दी से शालिनी से अलग हुए और नजरे चुराते हुए अपने कपड़े ठीक करने लगते है, तब उसका लिंग पाजामे में तंबू बनाए खड़ा था,
शालिनी की नजर उसपर पड़ती हैं, बाबुजी बाहर चले जाते हैं, इधर शालिनी गर्म हो चुकी थी, उसके योनि मे काम रस बहने लगा था और वो तृप्त होने वाली थी, तेज साँसों लेने से उसके स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे, काफी दिनों बाद आज उस पर वासना हावी हो गई थी, वो भी अपने आप को संभालती हुई चोली सही से पहनकर कर खड़ी होती हैं और नील को खेलने के लिए रख देती हैं और खुद घर के काम करने लगती हैं
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पर शालिनी के दिमाग में आज की घटना और बाबुजी के खड़े लिंग का दृश्य बार बार आ जाता था, जिससे शालिनी का मन थोड़ा विचलित और चंचल हो गया था और उसी बात के बारे में सोच रहा था।
शालिनी : (मन में..)आज क्या हो गया था मुझे? एसा लगता था मानो आज बाबुजी नहीं पर नीरव स्तन चूस रहा हो ,लगता है काफी दिनों से नीरव से दूर रहने और कल वो कामुक बातचीत से मन में एसा भाव आया है, बाबुजी भी आज कुछ अलग ही तरीके से चूस रहे थे, वो भी मानो आज अपनी बहु के नहीं पर अपनी पत्नी के स्तन चूस रहे हो, कुछ भी हो पर चूसने का तरीका बहुत अच्छा लगा, नीरव ने भी एसे कभी नहीं चूसा, मुझे लगता है आज मेने सासु माँ के कपड़े पहने है इसलिए बाबुजी को एसा भाव जगा होगा, वो भी इतने सालों से अकेले ही जी रहे है, मुझे नीरव से दूर हुए कुछ ही समय में यह हाल है तो बाबुजी की तो क्या ही दशा होगी? लगता है आज मेने बाबुजी के भीतर की वो दबी भावना को जगा दिया है, उसका लिंग कैसे तना हुआ दिख रहा था, क्या बाबुजी का लिंग इतना बड़ा है? इतने खुले हुए पाजामे में भी तंबू बना दिया था, नीरव का इतना बड़ा नहीं है।
शालिनी का मन बाबुजी के लिंग के बारे मे सोचने लगता है ,सब काम करते हुए भी उसको पाजामे में तने हुए लिंग का दृश्य और विचार चलते हैं, आज शालिनी ने सोचा था कि सुबह जो उसके कमर में मोच आयी थी उसे ठीक करने के लिए बाबुजी की मदद लेगी पर सुबह की उस घटना के कारण अब उसे शर्म और संकोच हो रहा था,नील को नहलाने के बाद वो पंखे के नीचे आकर बैठ जाती हैं,
तभी उसकी कमर में दर्द होता है जिससे शालिनी की सिसकी निकलती हैं, तभी बाबुजी कमरे में दाखिल होते हैं, क्योंकि बाहर कुछ काम नहीं था, इसलिए वो घर के अंदर आ जाते है ताकि वापिस बीमार ना हो ,शालिनी की दर्द भरी सिसकी सुन बाबुजी चिंतित होते हुए शालिनी के पास आते हैं।
बाबुजी : क्या हुआ बहु ? कहीं चोट लगी है?कहीं दर्द हो रहा है?तुम्हारे मुँह से अभी दर्द भरी आवाज सुनी।
शालिनी : एसा कुछ नहीं है,बस कमर में स्नायु में खिंचाव हो गया है, वो ठीक हो जाएगा आप चिंता ना करे, मैं ठीक हुँ।
बाबुजी : नहीं नहीं, में बिल्कुल भी जोखिम नहीं लेना चाहता,चलो हम अस्पताल चलते हैं, मुजे कुछ हो जाए तो चलेगा, अगर तुम्हें कुछ हुआ तो यह घर ठहर जाएगा, मेरा और मुन्ने का ख्याल कौन रखेगा? तुम्हें खरोंच भी नहीं आनी चाहिए
शालिनी को खुशी होती हैं कि बाबुजी उसका इतना ख्याल रखते हैं।
शालिनी : इतना कुछ नहीं है? बस हल्का सा खिंचाव है, मुझे कुछ नहीं हुआ है
इतना बोलकर वो खड़ी होने जाती हैं तभी फिर से दर्द से चीख निकलती है,
बाबुजी तुरत उसे कमर से पकड़कर संभालते हैं, शालिनी को अपनी गोरी पतली कमर पर बाबुजी जैसे मर्द का कठोर और विशाल हाथ का दबाव महसूस करके कराहती है, बाबुजी उसे संभालकर वापिस बैठा देते हैं,
बाबुजी : चलो अस्पताल चलते हैं।
शालिनी : नहीं बाबुजी, बस थोड़ा सा ही दर्द है, ठीक हो जाएगा।
बाबुजी : अगर दर्द ज्यादा हो जाएगा तो मेरा सब काम करके हालत खराब हो जाएगी,
शालिनी : अच्छाजी ! इसलिए मुझे अस्पताल ले जाने को कहते है, ताकि आपको काम ना करना पड़े
बाबुजी : वो सब मज़ाक की बात है, सच कहूँ तो तुमको या मुन्ने को कुछ नहीं होना चाहिये,
शालिनी : कुछ नहीं हुआ, अब पहले से अच्छा है
बाबुजी : तो एक काम करते हैं, में मालिश कर देता हूं, जिससे अच्छा लगेगा
शालिनी : आपको आती हैं मालिश ?
बाबुजी : और नहीं तो क्या? एक बार करवाकर देखो फिर कहना।
शालिनी भी मान जाती हैं, ताकि अस्पताल ना जाना पड़े, बाबुजी घर का दरवाजा बंध करके चाचाजी के कमरे में जाकर दवाई के बक्से से एक जङीबूंटी वाला तेल लाते हैं जो मांसपेशियों के दर्द में काम आता है, शालिनी बिस्तर पर आकर उल्टा लेट जाती हैं जिससे उसके स्तन दबाव से ब्लाउज से बाहर छलक रहे थे, बाबुजी शालिनी के पास आकर बैठ जाते हैं और कमर पर मालिश करने लगते है,
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बाबुजी शालिनी को पूछते जाते थे कि उसे कहा दर्द हो रहा है, जिससे उसे मालिश करने का पता चले,
शालिनी को पीठ में एक सीधी नस में दर्द हो रहा था, बाबुजी पास बैठे होने से इतना दबाव नहीं दे पाते।
बाबुजी : बहु ! वो जितना देना पड़े उतना दबाव नहीं दे पा रहा इसलिए क्या मैं तुम्हारे ऊपर आकर मालिश कर देता हूं जिससे मालिश अच्छी होगी और राहत भी मिलेगी।
शालिनी : ठीक हैं, अभी आप ही मेरे डॉक्टर है,आप को जो ठीक लगे वो करे।
बाबुजी : वैसे देखा जाए तो आप भी मेरी डॉक्टर है, आप भी मुझे सुबह, दोपहर और रात को अपनी दवाई देती हो।
शालिनी शर्मा जाती हैं, और अपना सिर तकिये में घुसा देती हैं ,बाबुजी अब उल्टी लेटी हुई शालिनी के ऊपर आकर नितंबों के ऊपर आकर दोनों बाजू अपने घुटने मोड़कर बैठ जाते हैं, हालाकि शालिनी पर कोई अपना वजन ना हो इसका ध्यान रखते हुए बाबुजी बैठते हैं,
पर उसे शालिनी के नर्म तकिये जैसे नितंबों का एहसास हो रहा था, बाबुजी तेल को अपने हथेली में लेकर शालिनी की कमर पर गिराकर हल्के हाथों से मालिश करने लगते है, पहेले बाबुजी कोई कोई हिस्सों में मालिश करते हैं फिर जब वो पूरी नंगी लंबी पीठ पर तेल से मालिश करने लगते है तब वो पूरी पीठ पर अपने हाथों को नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे मालिश करते हैं तब शालिनी के चोली की डोरी बीच मे आती थी,
बाबुजी को मालिश करते समय दिक्कत होने लगती हैं, बार बार उसे रुकना पड़ता जिससे उसे ठीक से मालिश नहीं होती
बाबुजी : बहु ! एक काम करोगी?
शालिनी : हाँ! बोलिए क्या करना है?
बाबुजी : वो मालिश करने में ब्लाउज की डोरी बीच में आ रही हैं, क्या इसे खोल सकता हूं?
शालिनी : जी बिलकुल, आप को जैसे ठीक लगे वैसे करिए
बाबुजी कांपते हुए हाथों से चोली को डोरी खोलते हैं, बाबुजी के सामने अब बेदाग लंबी गोरी पीठ थी जो बाबुजी जी द्वारा देखी गई सब से सुन्दर पीठ थी,
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उनकी बहु इतनी सुन्दर है, हालाकि पहले भी शालिनी की पीठ उन्होंने देखी थी पर इतनी नजदीक से और छुने का मौका पहली बार मिला था, एक पल को उनको अपने बेटे के भाग्य पर दुःख हुआ, जो इतनी सुन्दर पत्नी को छोड़ के चला गया, फिर दूसरे ही पल अपने भाग्य पर खुशी भी हुई क्युकी उनकी वजह से ही आज उनको अपनी बहु के स्तनों से दुध पीने और आज उसकी गोरी सुन्दर पीठ को मालिश करने को मिल रहा है।
बाबुजी जैसे ही तेल की एक पतली धार शालिनी के पीठ पर गिराते है, तब शालिनी को पहले ठंडा महसूस होता है, फिर जब बाबुजी मालिश शुरू करते हैं तब बाबुजी का हाथ अपनी बहु के पूरी नंगी पीठ पर घूम रहा था, शालिनी को आज काफी दिनों बाद एक खुरदरे, सख्त और मर्दाना हाथो का अनुभव होता है उसके शरीर में सिहरन दौड़ जाती हैं, जैसे ही बाबुजी तेल को शालिनी के पीठ पर फैलाने और शालिनी के शरीर मे तेल उतरे इसलिए धीरे धीरे दबाव बढ़ाते चले जाते हैं, जब भी शालिनी के दर्द वाले हिस्से मे दबाव पड़ता तब उसके मुँह से सिसकारी निकलने लगती, अब शालिनी को गर्माहट महसूस होने लगती हैं जिसकी एक वजह तेल था और दूसरी वजह बाबुजी के मर्दाना हाथ का स्पर्श था ,मालिश करते समय कभी कभार बाबुजी की उंगलिया शालिनी के बिस्तर से पीचकने से जो स्तनों का हिस्सा दोनों बाजू से बाहर निकला था उसे छु जाती, अब शालिनी को सिर्फ वहीं गर्माहट महसूस होती है जहां दर्द हो रहा था, और उसे अच्छा भी महसूस हो रहा था, करीब 15-20 मिनट के मालिश के बाद बाबुजी शालिनी के ऊपर से हटकर पास बैठ जाते हैं, वो शालिनी को थोड़ी देर एसे ही लेटे रहने को कहते है जिससे तैल सही तरीके से सूख जाए, बाबुजी फिर अपने हाथ धोने जाते हैं और नील को सम्हालने लगते है, फिर वो उसे शालिनी के पास रखकर बाहर काम देखने जाते हैं, अब बस आखिरी का काम रह गया था, फिर सिर्फ चाचाजी के आँगन का काम रहता।
शालिनी भी उल्टा लेटे लेटे अपने बेटे से खेलने लगती हैं अब खाने का समय भी होने लगा था, अब तेल भी सूख गया था, उसे राहत भी लग रही थी, वो खड़ी होती हैं और आईने के सामने आकर खड़ी होती हैं,
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तभी दरवाजा खुलने की आवाज आती हैं, वो मुड़कर देखती हैं कि बाबुजी है, वो बस मुस्कराते हुए अपने बाल सही कर रही थी, अभी भी उसके चोली की डोरी खुली हुई थी, बाबुजी शालिनी के इस रूप को देखकर जैसे लोहा चुम्बक की ओर खींचा चला जाता है वैसे बाबुजी शालिनी की ओर खींचे चले जा रहे थे, जैसे ही शालिनी बाल बनाकर अपने चोली की डोरी बांधने हाथ पीछे ले जाती हैं तब बाबुजी के हाथ उसके हाथ पर जाकर उसे रोक देते हैं।
बाबुजी : इसे खोला मेने था तो इसे बंधेंगे भी हम,
बाबुजी की आवाज में एक आज्ञा और अधिकार की झलक थी, जिससे शालिनी भी अनायास ही मान लेती हैं और अपने हाथ आगे कर लेती हैं, अब बाबुजी के हाथ अडिग थे अब वह कांप नहीं रहे थे, वो अधिकार पूर्वक डोरी बांधते है तब उससे थोड़ी तंग डोरी बंध जाती हैं तब शालिनी के मुँह से सिसक निकल जाती हैं।
शालिनी : आह ... बाबुजी! थोड़ा ढीला करे।
बाबुजी फिर से थोड़ी ढीली डोरी बांधते है, जब शालिनी ने बाबुजी शब्द बोला तब मानो बाबुजी कोई बेहोशी से होश में आए हों एसा लगता है, शालिनी को भी आईने में यह बदलाव दिखता है, बाबुजी डोरी बाँधकर दो कदम पीछे हट जाते हैं और असहजता से माफी माँगकर चले जाते हैं, शालिनी को यह कुछ समझ नहीं आता, पर वो अभी बाबुजी को ज्यादा असहजता महसूस ना हो इसलिए वो कुछ नहीं बोलती और किचन में चली जाती हैं, जहां बाबुजी पहले से आकर खाना बनाने की तैयारी कर रहे थे।
शालिनी : अरे...बाबुजी! आप रहने दो, मे कर लुंगी आप नील के साथ खेलिए।
बाबुजी : (नीचे नजरों से...) तुमको दर्द है, इसलिए आज खाना मैं बनाऊँगा, तुम आराम करो,
शालिनी : ठीक हैं, आपका हुक्म सर आँखों पर
बाबुजी : हुक्म नहीं है, बस विनती है।
शालिनी : पता है, बस मज़ाक कर रही हूं।
बाबुजी खाना बना रहे थे, शालिनी उधर ही प्लेटफॉर्म पर बैठकर बाबुजी से सामान्य बातचीत करती हैं, और साथ ही काम के बारे मे पूछती हैं, बाबुजी भी अब धीरे-धीरे सामन्य होने लगे थे, शालिनी अब सब बर्तन निकालकर खाना खाने की जगह रखने लगती हैं, फिर वो नील को लेकर आती हैं और उसे पीसी हुई दाल खिलाती है, फिर वो और बाबुजी खाने लगते है, बाबुजी का मूड अब सही हो गया था अब वो पहले की तरह बात करने लगे थे।
शालिनी : बाबुजी ! एक बात पूछना चाहती हूं
बाबुजी : तुमको कब से इजाजत की जरूरत पड़ने लगी, बेझिझक पूछो।
शालिनी : धन्यवाद! वो बात ही एसी है, आप बुरा मत लगाना और सच बोलना, छुपाना मत
बाबुजी : एसी क्या गंभीर बात है?, ठीक हैं पूछो, तुमसे क्यूँ छुपाना?
शालिनी : वो अभी जब आप मेरे चोली की डोरी बांध रहे थे फिर अचानक से असहजता से चले गए, क्या हुआ था आपको? देखिए आपने कहा है आप छुपाएं नहीं, हम एक परिवार है और मेने आपसे कुछ नहीं छुपाया, मेरे सब दर्द और पीड़ा आपके साथ साझा किया है
बाबुजी : ठीक हैं, उसमें तुम्हारी गलती नहीं है, वो जो कुछ हुआ वो तुम्हारे कपड़ों की वजह से हुआ।
शालिनी : क्या कपड़े से?
बाबुजी ; हाँ ! यह कपड़े तुम्हारी सास के हैं, जब तुम पीठ करकर अपने को संवारने में लगी हुई थी तब उस पल मुझे लगा मेरी पत्नी खड़ी है जिससे मुझे एक भ्रांति हो गई थी, पर जब तुमने " बाबुजी " शब्द बोला तब में होश में आया और मुझे शर्म आने लगी और में चला आया
शालिनी : ओह..माफ करना,अगर आपको
दुःख हुआ है तो आगे से मम्मीजी के कपड़े नहीं पहनेंगी,
बाबुजी : अरे नहीं...ब्लकि मुझे तो खुशी हुई थी जब तुमने अपनी सास के कपड़े पहने हुए देखा, जिससे उसकी यादों को जीवनदान मिला है, वो तो इतने सालों बाद उसके कपड़े में तुमको देखा तो उसकी याद आ गयी ,और मेरी भावनाएं मुझ पर हावी हो गई, मुझे माफ़ करना।
शालिनी : आप माफी क्यूँ मांग रहे हैं, आपकी कोई गलती नहीं है, इतने साल अपने प्यार से दूर रहना और उसकी यादों मे तड़पना क्या होता है मैं जानती हूं, नीरव को विदेश गये इतने दिन ही हुए हैं फिर भी मुझे उसकी याद तड़पती है,और मेरा प्यार कुछ महीनों में वापिस आ जाएगा और हमारी जिंदगी फिर से सामन्य हो जाएगी पर आपका प्रेम कभी वापिस नहीं आएगा, यह विचार से ही मुझे कंपकंपी हो जाती हैं, फिर भी आप बाहर से खुश दिख रहे है, मुझे पता था कि आप अंदर से एक खालीपन महसूस करते हैं,
बाबुजी : एक तरह से तुम्हारी बात सही है पर जब से तुम और मुन्ना यहां आए हों तब से यह खालीपन थोड़ा कम हुआ है, पर कभी-कभी तुम्हारी सास की याद आ जाती हैं।
शालिनी : अब से मैं कोशिश करूंगी की आपको सासु माँ की याद कम आए,
बाबुजी को अपनी पत्नी की यादें भावुक कर देती हैं और उसके आँखों से आंसू निकलने लगते है, शालिनी यह देख उसे भी भावुकता होती हैं।
शालिनी : (मन में..)बाबुजी कितना प्यार करते हैं अपनी पत्नी से, आज भी उसके लिए आंसू बहाते है, भाग्य का भी कैसा खेल है इतने प्यार करने वाले इंसान से ही उसका प्यार छिन कर उसे अकेला कर देता है, चाचाजी का भी यही हाल है, दोनों दोस्तों की एक जैसी ही कहानी है,एसा लगता है भाग्य ने मुझे इन दोनों प्यार से बिछुड़ चुके और अकेले पड़े को सहारा बनने यहां रखा है, एक स्त्री ही उस वात्सल्य और प्रेम से सब को एकजुट रख सकती हैं, कुदरत का यह एक स्त्री को दिया हुआ वरदान है, मैं भी अपने वात्सल्य से बाबुजी और चाचाजी को सम्भालने का प्रयास करूंगी,
शालिनी शोक के डूबे बाबुजी को अपने सीने से लगा लेती हैं, जिससे बाबुजी का चेहरा उसके स्तनों पर टिका हुआ था
, बाबुजी की गर्म सांसे उसके ब्लाउज के भीतर जाँ रही थी और बाबुजी के आँखों का आंसू बहकर उसके स्तनों के ढलान पर बहता हुआ ब्लाउज मे समा जाता है, बाबुजी भी अपने हाथ को शालिनी के कमर पर लपेटकर रोने लगते है, आज पहली बार उसे अपना दुःख और मन मे दबे दर्द को व्यक्त करने का मौका मिला था, जिससे वो खुलकर रो रहे थे, अब तक बाबुजी एक मर्द होने के दायरे मे रह रहे थे जिससे वो खुलकर रो नहीं सके थे, पर आज शालिनी के आगोश में वह दायरा टूट गया जिससे पहली बार उसे अपना दर्द जताने का रास्ता दिखा, शालिनी भी उसे खुलकर दर्द बया करने दे रही थी जिससे बाबुजी का मन हल्का हो जाए।
इंसान खुलकर वहीं हसने और रोने लगता है जहा वो खुद को निर्भय समझे और अपनापन महसूस करे, आज बाबुजी शालिनी की बाहों में निर्भय होकर रो रहे थे, उसे किसी की परवाह नहीं थी, साथ ही शालिनी भी उसे अपना मानकर उसे सहारा दे रही थी, कुछ देर बाद जब बाबुजी का मन शांत और हल्का हुआ वह शालिनी से अलग हुए और देखा शालिनी की चोली उसके आंसू से थोड़ी भीग गई है,
बाबुजी : माफ करना बहु, तुम्हारे कपड़े भिगा दिए, इस उम्र में अपनी पत्नी के लिए रो रहा था, कितना पागल हूं में,
शालिनी : प्रेम की कोई उम्र नहीं होती बाबुजी ,लगता था आज पहली बार आपने अपना दुख जाहिर किया था और इसमें कोई बुराई नहीं है, कोई तो होना चाहिए कि जिससे हम अपना दुख बाट सके, आज से जब भी आपको दुख हो या सासु माँ की याद सताये तब आप बिना किसी संकोच के मेरे पास आ जाना, और आगे से जब भी आपको अकेलापन सताये तब आप आकर मुझसे गले लग जाना,
बाबुजी : नहीं बहु ! इस सब की जरूरत नहीं है,
शालिनी : हम एक परिवार है, परिवार में हर कोई एकदूसरे का सहारा बनते है, कभी मैं आपका सहारा बन जाऊँगी तो कभी आप मेरा सहारा बन जाना, कभी अगर मुझे नीरव की याद सताये तब में आपके पास आकर अपना अकेलापन दूर करूंगी।
बाबुजी : नहीं मैं यह बारबार नहीं कर सकता, मेरा यही भाग्य है।
शालिनी : आप यह मान लीजिए कि मैं आपका भाग्य बदलने आयी हूं तो, अगर आपको रिश्तों की मर्यादा बीच में आ रही हैं तो आप अपना दोस्त या हमदर्द समझकर मेरे पास आ जाना,
बाबुजी : नहीं बहु यह ठीक नहीं, दूसरों को कैसा लगेगा?
शालिनी : दूसरों की चिंता है और खुद की कोई चिंता नहीं जब आप को अपना दर्द जब एक हद से ज्यादा बढ़ जाएगा तब कोई दूसरा आपका दर्द की चिंता नहीं करेगा, तो आप भी दूसरों की चिंता ना करे, अपने और परिवार के बारे में सोचे
बाबुजी : ठीक है, मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ,
शालिनी : सिर्फ ठीक से काम नहीं चलेगा आप वादा करो, वर्ना आपको नील की सौगंध देनी पड़ेगी।
बाबुजी : नहीं नहीं...मुन्ने को बीच में मत लाओ, मैं वादा कर्ता हूं कि जब भी मुझे याद सताएगी या अकेलापन लगेगा मैं तुम्हारे पास आऊंगा।
बाबुजी फिर से शालिनी के गले लग जाते है, जो दिखाता है कि अब भी बाबुजी को उसकी पत्नी की याद आ रही थी, शालिनी भी उसके बालों में प्यार से उंगलिया फेरकर सहला रही थी, शालिनी को भी यकीन हो गया कि बाबुजी अपना वादा निभाएंगे, और वो खुश भी थी वो चाचाजी के बाद बाबुजी के दुःख कम करने में मददगार साबित हुई ,
बाबुजी शालिनी से अलग हुए, शालिनी और बाबुजी ने मिलकर सब काम निपटा दिए फिर दोनों कमरे में आए, शालिनी नील को सुलाकर बिस्तर पर आयी और अपनी चुन्नी हटाकर चोली घाघरा पहने लेट जाती हैं।
शालिनी : बाबुजी सोने से पहले दुध पीले तो मुझे राहत होगी।
बाबुजी : ठीक हैं, आज मे गोदी में लेटकर पीना चाहता हूं।
शालिनी : जैसे पीना हो वैसे पियो कोई दिक्कत नहीं
शालिनी दरवाजे की ओर पीठ करके बैठ जाती हैं और पीछे से अपनी डोरी खोलने लगती हैं सिर्फ गले वाली डोरी बंधी है जिसपर चोली टीके हुए है, वर्ना चोली गिर जाती और शालिनी पूरी तरीके से अधनंगी हो जाती ,शालिनी की पीठ अब पूरी तरीके से नंगी थी, शालिनी ब्लाउज को ऊपर करके अपने स्तन को बाहर निकालती है तब बाबुजी का मुँह स्तन की ओर खींचा चला जाता है, जैसे ही बाबुजी अपने मुँह से पहली चुस्की भरते हैं शालिनी को राहत की सिसकी निकालती है, बाबुजी के लिए दूध से भरे हुए दोनों स्तन कलश थे जिसे वो अपने हिसाब से और अपना समय लेकर पीने के लिए स्वतंत्र थे, जब वो पहला स्तन चूस रहे थे और अपने एक हाथ शालिनी के कमर पर लपेटा हुआ था,शालिनी भी अपनी उंगलिया उसके सिर पर घुमाकर उसपर अपना वात्सल्य बरसा रही थी,
शालिनी के मन में अभी बाबुजी के लिए वहीं भाव उमड़ रहा था जो थोड़ी देर पहले था, इसलिए वो उसका सिर हल्का अपने स्तन में दबा रही थी।
शालिनी : भाव में आकर...)आह ...बाबुजी पी लीजिए सारा दुध, मुझे दर्द से राहत दिलाए, आपको जब भी मेरा दुध पीने की ईच्छा हो तब बेझिझक बताना, यह आपके लिए हमेसा हाजिर है, आज से मे आपको पूरा अधिकार देती हूं स्तनपान करने का,
बाबुजी भी शालिनी की बात सुनकर खुश भी थे और हैरान भी थे क्युकी वह जानते थे कि शालिनी उसे स्तनपान करवाएगी पर इस तरह खुलेआम साफ़-साफ़ शब्दों मे कहेगी यह यकीन नहीं था, उसे खुशी हुई कि अब उसके और शालिनी के बीच का रिश्ता ज्यादा गहरा हो गया है।
करीब आधे घंटे बाद शालिनी स्तनपान करवाती हैं फिर बाबुजी पेट भरे होने से नींद आने से सो जाते हैं पर शालिनी बस लेटी हुई थी, जब उसे करीब आधे घंटे बाद तक नींद नहीं आती तब वो गर्मी से परेशान होकर बाहर जाने का सोचती हैं जिससे ताजगी महसूस हो, वो अपने कपड़े ठीक से पहनकर चुनरी डालकर बाहर आती हैं उसे लगा था कि अभी सब मजदूर सो रहे होंगे जिससे उसे कोई दिक्कत नहीं होगी, जैसे ही शालिनी घर का दरवाजे के पास आती हैं वो देखती हैं कि दरवाजा खुला रह गया था, उसे पहले डर लगा, फिर वो हिम्मत करके बाहर आयी और देखा कोई नहीं है जिससे उसे राहत हुई, वो बाहर आकर आंगन में आती हैं उसे बातचीत की आवाज सुनाई देती हैं, उसे आवाज जानी-पहचानी लगती हैं, आवाज बाबुजी के घर से जहां काम चल रहा था वहां से आ रही थी, शालिनी दबे पांव जाकर देखी है तब उसकी आँखें खुशी और हैरानी से चौड़ी हो जाती हैं उसके चेहरे पर एक खुशी आ जाती हैं।
शालिनी देखती हैं कि ठेकेदार किसी से बात कर रहा है जब शालिनी ने देखा की वो जिससे बात कर रहा था वो और कोई नहीं चाचाजी थे, शालिनी को पहले यकीन नहीं हुआ, उसने अपने आंखो को मसला और फिर से देखा तब उसे यकीन हुआ कि वह सच मे चाचाजी है, उसके शरीर गर्मी में ठंडा होने लगा, पहले उसे मन किया कि दौड़कर जाए और चाचाजी को गले लग जाये पर फिर समय और स्थान का बोध होने से वो अपनेआप को नियंत्रित करती हैं और मुस्कराते हुए चाचाजी के पास आती हैं।
शालिनी : चाचाजी!
चाचाजी पिछे मुड़ते है और शालिनी को देख मुस्करा देते हैं,
चाचाजी : हाँ बेटी मैं।
शालिनी : आपने ना कोई मेसेज किया और ना कोई फोन किया,
चाचाजी : अगर बताकर आता तो सरप्राइज कैसे देता?और अपने घर भी कोई बताकर थोड़ी ना आता है, और मुझे भी सरप्राइज नहीं मिलता।
शालिनी को समझ नहीं आ रहा था कि चाचाजी किस सरप्राइज की बात कर रहे थे।
शालिनी : आपको कौन सा सरप्राइज मिला?
चाचाजी : यह सब जो बनकर तैयार हुआ है वो सब।
शालिनी : वो सब ठीक है, पर आप आए कब?
इस बात पर चाचाजी और ठेकेदार दोनों एक साथ अलग अलग जवाब देते हैं
चाचाजी : अभी आया
साथ में...ठेकेदार : 1 घंटे पहले
शालिनी : क्या? एक घंटे पहले?आप घर पर क्यूँ नहीं आए?
ठेकेदार : वो तो आए थे पर दरवाजा बंध होने से और आप लोग सो रहे होंगे इसीलिए वो यहां पर आ गए
चाचाजी : हाँ इसलिए..
शालिनी : अपने घर आकर कोई बाहर इंतजारी कर्ता है भला? दरवाजा बंध था तो आप ने घंटी क्यों नहीं बजायी ?
तभी शालिनी को याद आता है कि दरबाजा तो खुला ही था, और 1 घंटे पहले तो बाबुजी को स्तनपान करवा रही थी, तो क्या.....?
शालिनी के चेहरे का रंग धीरे-धीरे फीका पड़ने लगता है, उसे डर लगने लगता है उसके चेहरे पर पसीना आने लगता है
ठेकेदार : चाचाजी लगता है बहु को धूप की आदत नहीं है इसलिए देखो पसीना होने लगा ,आप लोग घर जाइए हमें भी थोड़ी देर में काम चालू करना है।
चाचाजी और शालिनी घर की ओर बढ़ते हैं तब शालिनी अपने विचारों में डूबी हुई थी
शालिनी : (मन में..)अगर चाचाजी 1 घंटे पहले आ गए थे और दरवाजा खुला था तो क्या उसने मुझे बाबुजी को स्तनपान करवाते देखा होगा इसलिए वो बाहर चले आए ताकि हमें परेसानी ना हो,चाचाजी को पता चल गया होगा तो क्या सोच रहे होंगे मेरे बारे मे और बाबुजी के बारे मे? कहीं बाबुजी जो सरप्राइज की बात कर रहे थे क्या वो काम के बारे में था या मेरे बारे मे?
शालिनी के मन में विचारों और संभावना का तूफान चल रहा था, दोनों जब घर के चौखट पर आए तब शालिनी उसे वहीं खड़ा रख कर अंदर जाती हैं और आरती की थाली ले आती हैं तब तक बाबुजी भी जाग गए थे, वो जब चाचाजी को देखते हैं उसे भी हैरानी के साथ खुशी भी हुई, उसका दोस्त वापिस आ गया था, आरती उतारकर शालिनी बाबुजी की नजर उतारती है फिर सब कमरे में आते हैं, चाचाजी पहले नील के पास जाते हैं और सोते हुए नील के सिर पर हाथ फेरते है।
चाचाजी सबसे पहले नहाने जाते हैं, फिर आकर शालिनी ने सब के लिए चाय बनाई थी बाबुजी मजदूर को चाय देने जाते हैं और चाचाजी और शालिनी दोनों साथ मे चाय की चुस्की लेते हुए बैठे थे,
चाचाजी अभी सांकेतिक शब्दों का प्रयोग करके बात करते हैं जिसका मतलब था वो बात कर रहे हैं उसका सही मतलब कुछ दूसरा था ,शालिनी भी उसी तरह के जवाब दे रही थी
चाचाजी : यहां काफी कुछ बदलने लगा है।
शालिनी : हाँ थोड़ा बहुत बदलाव हुआ है ,जो समय की मांग थी जिससे बदलाव करना पड़ा ताकि भविष्य में कोई मुसीबत ना हो।
चाचाजी : हाँ सही कहा, एक तरीके से अच्छा है यह बदलाव से पहले जो था उसको नहीं भूलना चाहिए, उसका भी खास योगदान है, उसकी वज़ह से ही बदलाव आया है, अब तक उसने ही सब संजोए हुए था
शालिनी समझ रही थी कि चाचाजी कोई वस्तु या जगह की नहीं परन्तु अपनी बात कर रहे थे ,तब बाबुजी आ जाते हैं, और तीनों मिलकर सामन्य बातचीत करते हैं, एसे ही शाम हो जाती हैं, शालिनी नील को जगाकर स्तनपान करवाती हैं, पर उसके स्तनों में दुध अभी भी बचा हुआ था, अब शालिनी दुविधा में थी कि वो बाबुजी और चाचाजी में से किसको मदद के लिए कहें।
तभी ठेकेदार बाहर खड़े आवाज लगाता है, जिसे सुन बाबुजी और चाचाजी दोनों बाहर आते हैं क्योंकि अब बाबुजी के घर का काम पूरा हो गया था और कल से चाचाजी से घर मे काम शुरू करना चाहता था, उसे सब पूछना था कि कहा और कितना काम करना है, चाचाजी सब समझाने लगते है, तभी बाबुजी घर वापिस आ जाते हैं क्योंकि उसे पता था शालिनी को अपने स्तन खाली करने है, इसलिए जब तक चाचाजी और ठेकेदार काम समझे तब तक वो शालिनी से स्तनपान कर लेंगे,बाबुजी को जाता देख चाचाजी को भी अंदेशा हो गया था कि बाबुजी क्यु घर जा रहे हैं,वो कुछ नहीं बोलते
बाबुजी भीतर आकर शालिनी को स्तनपान करवाने को कहते है ताकि बाद में रात तक उसे समय नहीं मिलेगा और दर्द सहना पड़ेगा, अभी सब बाहर है इसलिए किसी को शक नहीं होगा, शालिनी भी परिस्थिति समझ कर तुरत बाबुजी को स्तनपान करवाने लगती हैं, आज बाबुजी कुछ जल्दी से ही पी रहे थे, शालिनी को इस घटना से एक रोमांच और डर का एहसास एकसाथ हो रहा था, एक तरफ किसी के आने का डर और दूसरी ओर स्तनपान करवाने की ईच्छा, 15 मिनट बाद बाबुजी अपनी जीभ को अपने होठों पर फेरकर होठों पर लगे मीठे गाढ़े दुध की बूँदों को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहते थे, उसने एक बूंद भी शालिनी के स्तनों मे नही छोड़ी थी, हालाकि अब बाबुजी को भी मन मे एक डर था कि अपने दोस्त के आने से वो कैसे स्तनपान करेंगे, शालिनी और बाबुजी दोनों के चेहरे पर उस डर की चिंता दिखाई दे रही थी।
शालिनी ; बाबुजी ! क्या आप को भी वहीं डर सता रहा है जो मुझे सताता है
बाबुजी : हाँ! अब सब कैसे होगा?
शालिनी : पता नहीं, कोई ना कोई रास्ता निकल आएगा,
दोनों अपनेआप को संभालते हुए सामन्य हो जाते है, जैसे तैसे रात भी हो जाती हैं, सब खाना खा कर आंगन में बैठे थे, बाबुजी चाचाजी को अपने भाई के बारे मे पूछते है और थोड़ी इधर-उधर की बातें होती हैं, फिर बाबुजी और चाचाजी मिलकर जरूरत का समान चाचाजी के घर से बाबुजी के घर पर रख देते है ताकि उधर काम की वज़ह से किसी को तकलीफ ना हो, लेकिन जब सोने की बारी आती हैं तब चाचाजी अपने घर सोने चले जाते हैं, वो बाबुजी और शालिनी के कहने पर भी नहीं रुके।
शालिनी और बाबुजी अपने घर मे आकर बेड पर आकर लेट जाते हैं
बाबुजी : एक तरीके से अच्छा हुआ बलवंत अपने घर गया, जिससे हम बिना डर के अपना काम कर सकेंगे, लगता है भाग्य भी हमारे साथ है
शालिनी: (मन में ..)बाबुजी आपको कैसे समझाये की भाग्य नहीं चाचाजी की वजह से हम स्तनपान कर सकेंगे,अब तो यकीन से कह सकती हूं कि चाचाजी को अपने बारे मे पता चल गया है, इसलिए सायद वो नाराज है, कुछ भी करके इसका रास्ता निकालना पड़ेगा, ताकि यह नाराजगी तीनों के रिस्तों मे दूरी ना पैदा करे,
बाबुजी बिंदास होकर स्तनपान कर रहे थे, पर शालिनी के मन मे चिंता का तूफान था, वह चाचाजी से कैसे बात करेगी और कैसे समजा पायेगी कि सब कैसे हुआ था। आधे घंटे बाद बाबुजी स्तनपान कर के गहरी नींद में जाने लगते है पर शालिनी की नींद उड़ चुकी थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे?
शालिनी : (मन में..)मुझे चाचाजी से बात करनी ही होगी, और पहले की तरह उसे स्तनपान करवाने भी जाना चाहिए ताकि उसे यह ना लगे कि मेने बस उसका फायदा उठाया था, पर अगर वो अभी जाएगी तो उसके स्तनों मे दुध तो था नहीं, इसका क्या जवाब दूंगी चाचाजी को ?कुछ देर बाद जाऊँगी तब तक नया दुध बन जाएगा।
करीब रात के 1 बजे थे बाबुजी और नील गहरी आगोश में थे, शालिनी भी जानती थी कि अभी बाबुजी का गहरी नींद का समय है, इसलिए वो धीरे से बेड पर से उतरकर और अपनी चोली सही से पहनकर दरवाजा खोलकर चाचाजी के घर जाती है,
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उसे बस एक डर था कि अगर चाचाजी दरवाजा बंध करके सोये होंगे तो वो क्या करेंगी?
शालिनी चाचाजी के घर के दरवाजे पर आती है उसका दिल जोरों से धड़क रहा था, जैसे कोई प्रेमिका अपने प्रेमी से चोरी छुपी मिलने आयी हो, जैसे ही वो दरवाजा को हाथ लगाती हैं, तो दरवाजा खुला ही था ,उसे खुशी हुई, और जैसे वो चाचाजी के कमरे में आती हैं और देखती हैं कि चाचाजी लुंगी और बनियान पहने सोये थे, चाचाजी ने भी शालिनी के इंतजार में दरवाजा खुला रखें सो गए थे, शालिनी जैसे ही कमरे में आई उसने अपनी चाल बढ़ा दी ताकि पायल की झनकार से चाचाजी जाग जाए .....
इस महत्वपूर्ण रात का वर्णन विस्तार से होगा, इसलिए उसे अगले अपडेट में पढ़ेंगे...यह रात शालिनी के लिए एक चुनौती से भरी थी, उसके द्वारा लिया गया निर्णय उसके, बाबुजी और चाचाजी के जीवन को बदल सकता है, या तो तीनों गहरे सम्बंध में जुड़ जाएंगे या रिस्तों में दरार आएगी यह सब शालिनी के निर्णय पर आधारित है....
