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Wow tharkipo bhai kya jabardast update diya land khada ho gya ab to Pani nikalna hi padegaऔरत— बिल्कुल देखना भाई साहब, पर याद रखना इसके बाद बाहर की दुनिया में न आप हमें जानते हो न हम आपको। बाकी अगर और अच्छे से जानने का मन हो तो तरीका आप जानते हो।
औरत ने पर्चे की ओर इशारा किया और दोनों आगे बढ़ गए। आगे जाकर उन्होंने पीयूष से भी थोड़ी बात की और उन्हें भी पर्चा दिया और बाहर निकल गए। इसके बाद पहले महिपाल और फिर पीयूष भी बाहर निकल गए, बहुत से सवाल और मन में अनेक ख्यालों के साथ।
अपडेट 252
करीब आधे घंटे के बाद चारों लोग एक रेस्तराँ में थे, खाना खा रहे थे। खाते हुए भी ज्यादा बातचीत नहीं हो रही थी। सबके मन में बहुत कुछ था, पर शुरू कैसे करें ये नहीं पता था। अभी सब कितने साधारण और आदर्श परिवार की तरह लग रहे थे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है।
पीयूष ने महिपाल की ओर देखा और दोनों के बीच आँखों ही आँखों में इशारा हुआ।
पीयूष— फिल्म तो बड़ी मस्त थी।
पीयूष ने मुस्कुराते हुए कहा।
सविता और रानी ने उसकी बात सुनी और नजरें झुकाकर खाती रहीं।
महिपाल— हाँ भाई, ऐसी फिल्म तो आज तक नहीं देखी थी। बहुत मजा आया।
महिपाल ने हँसते हुए कहा, तो सविता और रानी भी मुस्कुरा दीं...
पीयूष— अरे सब लोग इतना चुप-चुप क्यों हो? जो हुआ सो हुआ, अब देखो आगे ये ही हो सकता है। अगर तुम लोगों को अच्छा न लगा हो तो आगे से नहीं करेंगे, पर चुप रहकर कोई फायदा थोड़ी है।
महिपाल— और अच्छा लगा हो तो?
महिपाल ने सविता और रानी की ओर देखते हुए कहा, तो दोनों ही इस बात से थोड़ी हैरान हुईं और एक-दूसरे की ओर देखने लगीं।
महिपाल— अरे इसमें सोचने वाली बात तो ये भी है न कि अच्छा नहीं लगा तो नहीं करेंगे, पर अच्छा लगा हो तो?
पीयूष— तो करेंगे।
पीयूष ने झटके से बोल दिया, तो दोनों औरतों की नजर उस पर पड़ गई।
पीयूष— अरे मुझे क्यों देख रहे हो? मैंने तो जो पूछा उसका जवाब दिया है।
सविता— तुम लोगों ने न जाने क्या-क्या कराया हमसे इस उम्र में। कोई ठीक-ठाक फिल्म नहीं देख सकते थे?
रानी भी अपनी सास की हाँ में हाँ मिलाते हुए बोली— हाँ मम्मी जी, हमें तो बस फिल्म देखनी थी और इन्होंने न जाने क्या-क्या करा लिया।
रानी ये बोलते हुए शर्मा गई।
पीयूष— अरे मैंने क्या करा लिया? सब सबकी मर्जी से हुआ है। अब सारा इल्जाम मुझ पर लगा रही हो। अच्छा, सच-सच बताओ, तुम्हें मजा नहीं आया?
महिपाल— हाँ ये बात सही कही। तुम भी बताओ, तुम्हें अच्छा नहीं लगा?
महिपाल ने सविता की ओर देखते हुए पूछा।
सविता— बात अच्छे लगने की नहीं है, बात सही-गलत की है। जो हुआ है वो गलत ही न?
महिपाल— अरे तुम भी न क्या लेकर बैठ गई। हम सब लोग व्यस्क हैं, जो कर रहे हैं मर्जी से कर रहे हैं, फिर ये गलत कैसे हुआ?
पीयूष— बिल्कुल सही बोला पापा ने।
सविता— अरे व्यस्क हैं फिर भी एक मर्यादा होती है। किसी को पता चला तो जानते हो कितनी बदनामी होगी।
महिपाल— अरे कौन बताने जा रहा है? समाज का सोचना छोड़ो, ये तो हमारी शादी के भी खिलाफ था। तब अगर सोचते तो आज तुम हमारे साथ नहीं बैठी होतीं।
सविता ये सुनकर चुप हो गई।
पीयूष— और क्या, हमारे लिए सबसे जरूरी है हमारा परिवार और हमारी खुशी। हम खुश हैं तो समाज की क्या चिंता करना?
महिपाल— और क्या, अब बच्चे इतना आगे बढ़कर खुल रहे हैं तो हमें भी आगे बढ़ना चाहिए और खुलकर जीना चाहिए।
रानी थोड़ा सकुचाते हुए बोली— मम्मी जी, मुझे लगता है ये और पापा जी सही कह रहे हैं।
सविता सोचने लगी और उसे फिर से अपने और निलेश व सभ्या के बीच की चुदाई याद आ गई। और फिर खुद से किया वो वादा भी कि अगर उसका पति चाहेगा तो वो वही करेगी, चाहे वो गलत ही क्यों न हो।
ये सोचते हुए उसने फैसला किया और फिर अपने पति और बेटे की ओर देख मुस्कुराई और बोली— ऐसा है तो सच में मजा तो आया।
पीयूष— ये हुई न बात!
पीयूष खुश होते हुए बोला। महिपाल और रानी के चेहरे पर भी मुस्कान थी।
महिपाल— चलो, पर अभी भी आधा दिन बाकी है? अब क्या करना है?
रानी— हाँ, अभी घर जाकर भी फायदा नहीं। कुछ और करते हैं?
सविता— और क्या? फिर से फिल्म देखें?
पीयूष— मेरे पास उससे अच्छा एक उपाय है।
पीयूष मुस्कुराते हुए कहता है।
चोदमपुर
इधर चोदमपुर में राजपाल खेतों का काम निपटाकर वापस अपने घर की ओर लौटे तो देखा दरवाजा खुला हुआ था। अंदर आकर देखा तो सभ्या को बरामदे में झाड़ू लगाते पाया।
राजपाल— अरे बहू, तुम कब आई?
राजपाल ने अपना गमछा एक ओर रखते हुए पूछा।
सभ्या— थोड़ी देर पहले ही आई भाई साहब। वो जीजी हमें एक चाबी दे गई थी न, तो उसी से खोल लिया। तुम बैठो भाई साहब, पानी लाती हूँ।
राजपाल— अरे बिल्कुल सही किया।
राजपाल पास में पड़ी खाट पर बैठ गया। इतने में सभ्या ने पानी लाकर उसे दिया और फिर झाड़ू लगाने लगी।
सभ्या— भाई साहब, खाना तो घर बन रहा है। अभी कुछ चाय वगैरह बना दूँ?
राजपाल— नहीं बहू, अभी थोड़ा ठंडा लूँ। फिर नहा कर ही पीयूँगा चाय वगैरह। अब पूरा बदन पसीना-पसीना हो रहा है।
सभ्या— हाँ सही में भाई साहब, गर्मी बहुत है आज। धूप तेज है न।
राजपाल— वहाँ क्या हुआ? पूजा हो गई? बात हुई तेरी शालू या किसी से?
राजपाल ने अपनी पसीने से भीगी बनियान को उतार कर एक ओर रखते हुए कहा।
सभ्या— हाँ भाई साहब, हुई थी। तब बोल रहे थे कि दोपहर का मुहूर्त है। अब तो शायद शुरू हो गई होगी।
सभ्या ने अपने चेहरे से पसीना पोंछते हुए कहा।
राजपाल की नजर सभ्या के चेहरे से होते हुए उसके गोरे कामुक पेट, और बीच में गोल गहरी नाभि पर फिसलने लगी जो पल्लू के पीछे से आंख मिचौली कर रही थी और छुप छुप के दर्शन दे रही थी, राजपाल के मन में एक सिहरन होने लगी।
राजपाल— चल बढ़िया है, फिर आज तो रुकेंगे ही वो लोग वहीं।
सभ्या— आज ही नहीं भाई साहब, कल भी रुकेंगे भैया आने ही नहीं दे रहे बोल रहे हैं एक दो दिन रुक कर ही जाओगे अब। फिर भी जीजी बोल रही थी परसों उजियारा होते ही निकल लेंगे।
राजपाल: चल ठीक भी है अब गए हैं तो एक आध दिन रुक भी आयेंगे। वैसे भी कहां इतनी जल्दी आना जाना होता है,
राजपाल ने सभ्या के पेट और कमर को निहारते हुए ही कहा, राजपाल सोचने लगे जबसे निलेश उसे लेकर यहां चोदमपुर में बसे तबसे ही सभ्या को देखा है जबसे वो बिल्कुल छरहरी सी सुंदर पतली सी दुल्हन थी। हमेशा से ही सभ्या के बदन में एक अलग सी सुंदरता रही है, कामुकता और सौंदर्य का अदभुत मिश्रण है सभ्या का बदन।
पर राजपाल ने हमेशा ही उसे छुपकर एक आध नज़र ही देखा, क्योंकि रिश्ते में जेठ जो लगते थे और रिश्ते की मर्यादा को भी निभाना तो सबसे जरूरी था, इसलिए जैसे ही वो सामने होती राजपाल मुंह दूसरी ओर कर लेते थे, पर अब जब उनके परिवार इतने खुल चुके थे और वो अपनी बहू तक को चोद चुके थे तो अब उनके ऊपर से मर्यादा का पर्दा हट चुका था, और छूट मिल चुकी थी, इसी छूट का फायदा उठाते हुए राजपाल उठे और सीधे सभ्या के पास गए और उसे पीछे से बाहों में भर लिया और अपने बदन को उसके बदन से पीछे से की ओर से चिपका दिया। राजपाल के ऐसा करते ही सभ्या भी सिसकी और उसके हाथ से झाड़ू छूट कर गिर पड़ी। राजपाल के हाथ सभ्या के पेट पर चलने लगे उसके मखमली पेट को हाथों से मसलने लगे। और साथ ही पेट से होते हुए ऊपर उसके ब्लाउज़ के ऊपर से उसकी चूचियों तक दबाने लगे।
सभ्या: आह भाई साहब।
सभ्या ने सिसकते हुए कहा,
राजपाल: ओह बहू तेरा पेट कितना मुलायम है मखमली है आह।
सभ्या: उम्म भाई साहब आराम से।
सभ्या ने अपने जेठ के हाथों को अपने बदन पर पाकर सिहरते हुए कहा, वो जेठ जिन्हे उसने हमेशा मर्यादा और सम्मान के घूंघट के पीछे से देखा था, काफी समय तो वो उनके सामने चेहरा ढंक कर रखती थी जब बच्चे बड़े हो गए तब से भले ही उसका घूंघट थोड़ा ऊपर हो गया था पर आज भी उनके सामने सिर पर हमेशा ही पल्लू रहता था,
तो अब तक जिन्हें इतने सम्मान से और मर्यादा में रहकर देखा आज उन्हीं के द्वारा अपना बदन मसल वाना सभ्या को उत्तेजित करने लगा, उसे अपने चूतड़ों के पीछे राजपाल की बढ़ती उत्तेजना का भी आभास हो रहा था जिसे वो धीरे धीरे से उसके चूतड़ों में घिस रहे थे।
राजपाल: आह बहू तेरा बदन मन करता है इसे मसलता रहूं, खेलता रहूं कितना कामुक है।
सभ्या: आह भाई साहब, ओह तुम्हारी बहू हूं जो चाहे करो, आह।
राजपाल ने ये सुना और सभ्या के चेहरे को अपनी ओर घुमाया और फिर अपने होंठों को उसके रसीले होंठों पर रख दिया और चूसने लगे, सभ्या भी उनका साथ देने लगी, राजपाल सभ्या के पेट को लगातार मसलते हुए उसके होंठों का स्वाद ले रहे थे वहीं सभ्या भी गरम होते हुए अपना पेट और कमर सहलाते हुए राजपाल का साथ दे रही थी।
राजपाल को इतने वर्षों बाद सभ्या के बदन को उसके रसीले होंठों को चखने का उनके रस को चूसने का मौका मिला था और इस मौके को वो ऐसे ही नहीं जाने देना चाहते थे, और सभ्या के होंठों को लगातार चूसे जा रहे थे, पेट को मसलते हुए उनके हाथ ब्लाउज़ के ऊपर से ही सभ्या की मोटी चूचियों को मसल रहे थे,
काफी देर बाद राजपाल ने सभ्या के होंठों को छोड़ा तो दोनों हाँफ रहे थे,
राजपाल: वाह बहू कितने रसीले होंठ हैं तेरे, मन ही नहीं भरता चूसने से।
राजपाल ने उसकी चूचियों को मसलते हुए कहा,
सभ्या: क्या भाईसाहब तुम भी न,
सभ्या ने शर्मा कर उनके सीने में मुंह छुपा लिया, राजपाल को उसकी ये अदा बहुत पसंद आई, और वो बेकाबू होते हुए उसकी गर्दन और सीने को चूमने लगे, चाटने लगे, सभ्या उनकी हरकतों से आहें भरने लगी, धीरे धीरे राजपाल नीचे की ओर उसे चूमते हुए सरकने लगे और ब्लाउज़ के ऊपर से ही उसकी चूचियों को चूमने लगे तो सभ्या ने भी अपना सीना उनके लिए उभार दिया,
उसके सीने को चूमते हुए राजपाल नीचे घुटनों पर बैठ गए और सभ्या के पेट को मसलते हुए अपने होंठ उसके पेट पर रख दिए और सभ्या की एक गहरी सिसकी निकल गई, एक हाथ से राजपाल ने सभ्या की कामुक कमर को थामा और दूसरे हाथ से उसके पेट को सहलाते हुए, होंठों से उसके मखमली कोमल पेट का स्वाद लेने लगे, सभ्या भी गरम होते हुए अपनी कमर और पेट मसलते हुए आहें भर रही थी
सभ्या: आह भाई साहब ओह ओहम आह।
राजपाल: ओह बहू तेरा पेट, तेरा ये बदन बिल्कुल मक्खन है आह ऐसा कोमल ऐसा स्वाद आज तक कहीं नहीं चखा।
सभ्या: ओह भाई साहब आज चख लो आह जितना चखना है, तुम्हारी सेवा करना तो मेरा कर्तव्य है।
राजपाल: हां बहू आज नहीं छोडूंगा, आज अपनी भूख तेरे बदन से ही मिटाऊंगा।
सभ्या: हां भाई साहब खा जाइए ओह आह उम्मम।
सभ्या बोलते बोलते रुक गई और सिसकने लगी जैसे ही राजपाल ने अपनी जीभ उसकी नाभि में घुसा दी, सभ्या के हाथ राजपाल के सिर पर कस गए और वो उनके सिर को अपने पेट में दबाने लगी, वहीं राजपाल ने अपने पंजों को सभ्या के चूतड़ों पर कस दिया, और उन्हें भी मसलते हुए सभ्या की नाभी में जीभ घुसा घुसा कर चूसने लगे,
सभ्या: अहम्म ऐसे ही आह।
राजपाल ने काफी देर तक उसकी नाभी को चूसा और उतनी देर तक सभ्या मचलती और सिसकती रही। राजपाल फिर उठे और एक बार फिर से सभ्या के पीछे से चिपक गए और हाथ आगे लेजाकर उसकी चूचियों को ब्लाउज के ऊपर से ही दबाने लगे,
राजपाल: ये कितनी बड़ी बड़ी हैं बहू तेरी मोटी चूचियों का उभार तो मैं छुप छुप कर देखते आया हूं,
सभ्या: पर इन्हीं मोटी चूचियों को अपने हाथों में लेकर मसल रहे हो भाई साहब, आह ओह।
राजपाल: आह पर अब इन्हें छुप कर और सिर्फ इनके उभार को नहीं, तेरी चूचियों को नंगा देखना है बहू,
ये कहते हुए राजपाल सभ्या के ब्लाउज के हुक खोलने लगे, हर हुक के साथ सभ्या की मोटी चूचियों का दर्शन होने लगा था और जैसे ही आखिरी हुक खुला, राजपाल ने ब्लाउज़ के दोनों पाटों को पकड़ कर फैला दिया और सभ्या की कामुक मोटी चूचियों को देख उन पर अपने पंजे जमा दिए,
राजपाल: आह बहू क्या कामुक और मस्त चूचियां हैं तेरी जैसी सोची थी उनसे भी मस्त।
राजपाल सभ्या की चुचियों को मसलते हुए बोले,
सभ्या: ओह हां भाई साहब मुझे भी अपने पीछे की चुभन से पता चल रहा है कि तुम्हे कितना पसंद आ रही हैं।
सभ्या ने अपना हाथ पीछे ले जा कर राजपाल के मोटे लंड को धोती के ऊपर से ही सहलाते हुए कहा, वहीं राजपाल के हाथ लगातार सभ्या की चूचियों पर चल रहे थे।
सभ्या: आह ओह भाई साहब नहा लीजिए न तब तक मैं चाय रख देती हूं।
राजपाल: अरे चाय नहीं बहू अभी तो दूध पीने का मन है ये कहते हुए राजपाल ने सभ्या को घुमाया और उसकी एक चूची को मुंह में भर लिया और चूसने लगे तो दूसरी को लगातार मसल रहे थे।
सभ्या उनकी बाहों में सिसक रही थी,
दूसरी ओर शहर में महिपाल का परिवार एक टैक्सी में सवार होकर आगे बढ़ रहा था, कार एक बड़े से घर के सामने जाकर रुकी और सब उतरे,
महिपाल: ये ही पता है न?
पियूष: हां पता तो ये ही है, रुको फोन करता हूं
पियूष फोन लगाता है और फिर कुछ देर बाद घर का छोटा दरवाज़ा खुलता है और एक आदमी बाहर निकलता है ये वही आदमी था जो उन्हें फ़िल्म देखते हुए मिला था, वो उन्हें अंदर ले जाता है। और सोफे पर सबको बिठाता है, चारों घर को देख रहे थे जो काफी आलिशान बना हुआ था।
आदमी: वैसे उम्मीद नहीं की थी कि आप लोगों से इतनी जल्दी मिलना होगा, पर बहुत खुशी हो रही है कि अपने मेरा आग्रह स्वीकार किया,
महिपाल: दरअसल हम लोग यहां के नहीं है काफी दूर से आए हुए हैं और फिर आपका निमंत्रण मिला तो फिर सोचा कि न जाने फिर कब इस शहर में आना जाना हो इसीलिए सोचा आज ही क्यों नहीं।
आदमी: अरे बिल्कुल सही किया भाई साहब। वैसे आप इस नए जोड़े को पहले से जानते हैं या तभी मिले?
महिपाल: नहीं नहीं जिस तरह से आप से मिले उसी तरह इनसे भी।
पियूष: जी मैं और मेरी पत्नी भी दूसरे शहर में नौकरी करते हैं यहां एक दोस्त की शादी में आए थे फिर यहां घूमने निकले सोचा शहर घूम लेंगे फिर फ़िल्म का प्लान बन गया और बाकी फिर तो आप जानते ही हैं।
आदमी: देखा ये ही तो है किस्मत, आज आपको हमारा मेहमान बनाना था इसीलिए सही जगह ले ही आई,
इतने में ही एक औरत भी हॉल में कोलड्रिंक से सजी हुई ट्रे लेकर आती है जिसे देख सबके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है ये वही औरत थी जो उस समय आदमी के साथ थी।
आदमी: इनसे तो आप मिल ही चुके हैं ये हैं मेरी पत्नी।
औरत भी सबकी ओर देख मुस्कुराती है और कहती है: इतनी जल्दी कौन भूल सकता है मुझे, वैसे सोचा नहीं था कि इतनी जल्दी आप सबको देखने का मौका मिलेगा, पर सच में आपने बहुत अच्छा किया जो हमारा निमंत्रण स्वीकार किया।
औरत ने महिपाल की ओर कोलड्रिंक बढ़ाते हुए कहा,
महिपाल: जी हमें भी बहुत इच्छा थी आप लोगों से फिर से मिलने की।
महिपाल ने कोलड्रिंक का गिलास हाथ में लेते हुए औरत की ओर देख कर कहा तो औरत ने एक कामुक मुस्कान दी।
आदमी: देखिए वैसे तो आप लोग खुद भी समझदार हैं फिर भी बता देता हूं कि हम लोग खुले विचारों के लोग हैं और हमारे शौक और अय्याशी तो आप ने देख ही ली है पर हमें भी समाज में सभ्यता और मर्यादा का मुखौटा पहन कर रहना पड़ता है, इसलिए इन बंद कमरों में जो होता है वो बाहर नहीं जाता, अपनी सुरक्षा और अपने मेहमानों की सुरक्षा के लिए ये बहुत ज़रूरी हो जाता है, इसलिए आप लोगों से भी यही प्रार्थना है कि जो यहां हो वो यहीं तक रखें और बाहर की दुनिया में हम अनजान ही रहें तो अच्छा है।
औरत: हां आपको इस तरह मिलना है तो कभी भी फोन कीजिए हम आपका स्वागत करेंगे।
महिपाल: जी नहीं आप लोग बिल्कुल सही कह रहे हैं, सम्मान और सुरक्षा के डर से ही हम लोग इतनी दूर हैं अगर आप हमारे आस पास के होते तो हम कभी आपके यहां नहीं आते।
पियूष: मेरा भी यही मानना है। हमें भी अपनी प्राइवसी को देखना पड़ता है।
औरत: बिल्कुल हमारा यही मानना है कि खुल कर मज़े करो पर एक दूसरे के बारे में जितना कम जानो उतना अच्छा है।
रानी: बिल्कुल सही कहा आपने।
औरत: इसीलिए तो देखिए हमने न आपसे आपके नाम पूछे और न अपने बताए।
पियूष: अजी छोड़िए नाम में क्या रखा है।
इस पर सब एक ठहाके के साथ हंस पड़े।
औरत: फिर भी बुलाने के लिए आप लोग हमें रीता और रवि कह सकते हैं ये हमारे असली नाम नहीं हैं।
आदमी: पर इंसान असली हैं हम लोग।
इस पर फिर से सब हंस पड़े।
दूसरी ओर चोदमपुर में राजपाल के घर में वो और सभ्या अब कमरे के अंदर आ चुके थे, सभ्या का ब्लाउज़ नीचे पड़ा हुआ था वहीं उसका पल्लू नीचे लटक रहा था और राजपाल अब भी उसके पीछे थे और उसकी मोटी चूचियों को मसलते हुए उसकी गर्दन और गालों को चूम रहे थे,
सभ्या: ओह भाई साहब तुम्हारा हथियार कितना कड़क होकर चुभ रहा है आह।
राजपाल: अरे बहू अब तुझे इस हालत में पाकर नहीं चुभेगा तो कब चुभेगा,
राजपाल ने गरम होते हुए सभ्या की चूचियों को मसलते हुए बोला,
सभ्या: पर भाई साहब पहले कुछ खा आह पी लेते तो अच्छा रहता न।
राजपाल: बहु अभी तो बस मुझे तेरी भूख है और कुछ नहीं चाहिए मन करता है तुझे ही खा जाऊं।
राजपाल ने सभ्या को पलटते हुए बोला,
सभ्या: तो खा ही लीजिए अब भाई साहब कम से कम भूखे तो नहीं रहोगे,
सभ्या ने राजपाल की आंखों में देखते हुए कहा, राजपाल ने भी उसके होंठों पर तुरंत अपने होंठ रख दिए और दोबारा से चूसने लगे,
राजपाल के हाथ सभ्या की नंगी पीठ और कमर की कामुक सिलवटों पर रेंग रहे थे, और फिर धीरे धीरे से हाथ नीचे खिसकने लगे, जल्दी दोनों हाथ सभ्या के गोल मटोल चूतड़ों को साड़ी के ऊपर से ही सहला रहे थे, फिर धीरे धीरे राजपाल ने साड़ी और पेटिकोट को ऊपर खिसकाना शुरू कर दिया और कुछ ही देर में राजपाल के हाथ सभ्या के नंगे चूतड़ों को मसल रहे थे, उनके पंजे सभ्या के मखमली चूतड़ों में गड़ रहे थे, पर तबसे फिर भी दोनों के होंठ अलग नहीं हुए थे और लगातार एक दूसरे को चूस रहे थे सभ्या की साड़ी को ऊपर कर राजपाल ने उसके पेटीकोट को नीचे खींच दिया तो उसका नाडा खुल गया और पेटीकोट सरकते हुए नीचे उसके पैरों में गिर पड़ा, राजपाल के हाथ दोबारा सभ्या के चूतड़ों को मसलने लगे।
सभ्या के बदन पर अब सिर्फ उसकी अधखुली साड़ी थी जिसे पीछे से राजपाल ने पीठ पर अटका दिया था और आगे से वो लटक रही थी
राजपाल ने कुछ देर सभ्या के चूतड़ों को हाथों से मसला और उसके होंठों को चूसते रहे फिर उसके होंठो को छोड़ा और उसकी पीठ को चूमते हुए नीचे की ओर बढ़ने लगे, कुछ ही देर में राजपाल अपने घुटनों पर थे और उनके चेहरे के सामने सभ्या के नंगे गोल मटोल उभरे हुए चूतड थे जिनकी दरार के बीच कुछ नहीं दिख रहा था, राजपाल ने दोनों चूतड़ों पर फिर से हाथों को जमाया और उन्हें फैलाया, सभ्या खुद ब खुद थोड़ा आगे को झुक गई, जिससे राजपाल के आगे उसके चूतड और फैल गए, उसके चूतड़ों की दरार के बीच उसकी गांड का भूरा छेद उसके नीचे गीली रस बहाती चूत को देख कर राजपाल के मुंह में पानी आ गया,
राजपाल: बहू मुझे यकीन नहीं हो रहा मैं तेरी नंगी चूत को देख रहा हूं, कितना सुंदर है तेरी चूत और गांड।
सभ्या: अब तो यकीन कर लो भाई साहब,
ये कहते हुए सभ्या ने अपने चूतड़ों को पीछे की ओर धकेल दिया तो राजपाल का चेहरा उसके चूतड़ों के बीच घुस गया, सभ्या ने हाथ पीछे लेजाकर राजपाल के चेहरे को पकड़ा और उसके मुंह पर अपने चूतड़ों को घिसने लगी अपनी कमर घुमा घुमा कर।
सभ्या: क्यों भाई आह साहब, अब तो आया न यकीन।
राजपाल ने जवाब में सिर्फ एक हुंकार भरी और फिर पागलों की तरह अपनी जीभ को बाहर निकाल कर सभ्या की चूत और गांड चाटने लगे।
जिससे सभ्या की भी सिसकियां निकलने लगी।
सभ्या: ओह भाई साहब ओह ओहम आह ऐसे ही।
राजपाल की जीभ सभ्या की चूत के होंठों पर चल रही थी तो सभ्या खुद ही अपने हाथों से अपनी चूचियों को मसल रही थी, राजपाल का लंड कड़क होकर ठुमके मार रहा था, उनके लिए अब और रुकना मुश्किल होता जा रहा था, और फिर राजपाल के सब्र का बांध टूटा तो वो फुर्ती में खड़े हुए और अपनी धोती को उतार फेंका और पूरे नंगे हो गए, अपने लंड को पकड़ कर उन्होंने सभ्या के चूतड़ों के बीच लगाया और उसे उसकी चूत के द्वार पर रखा तो दोनों की ही सिसकी निकल गई।
राजपाल: आह बहू घुसा दूं?
सभ्या: आह हां भाई साहब, चोद दो अपनी बहू को आह्ह्ह्ह,
सभ्या के इतने बोलने भर की देर थी कि राजपाल ने धक्का लहा कर सभ्या की चूत में लंड घुसा दिया और सभ्या की एक चीख निकल गई। सभ्या की गर्म चूत को अंदर से महसूस कर तो राजपाल उत्तेजना से पागल हो गए, और ताबड़तोड़ धक्के लगाकर उसे चोदने लगे, सभ्या की मोटी चूचियों को थाम कर वो लगातार धक्के लगा रहे थे, वहीं सभ्या भी अपने जेठ की चुदाई का मज़ा लेते हुए आहें भर रही थी।
राजपाल: ओह बहू ओह तेरी चूत कितनी गरम है अंदर से लग रहा है आह लग रहा है लोड़ा तप रहा है।
सभ्या: ओह भाई साहब ओह हां तुम्हारा कड़क मोटा लोड़ा भी मूसल की तरह आह बहू की चूत की कुटाई कर रहा है, आह कूटो ऐसे ही चटनी बना दो भाई साहब,
राजपाल: आह बहू ऐसे ही कुटुंगा आह और फिर अपनी दही भी तो मिलानी है तेरी चटनी से,
सभ्या: आह्ह्ह्ह ऐसे ही मारो भाई साहब, चोदो, चोदो।
सभ्या की बातों से जोश में आते हुए राजपाल और तगड़े धक्कों से उसे चोदने लगे, उत्तेजना का वेग और सालों बाद सभ्या के कामुक बदन को पाने के सुख ने उन्हें ज़्यादा देर टिकने नहीं दिया और कुछ देर बाद ही वो हुंकार मारते हुए सभ्या से पीछे से चिपक गए और अपने लंड से पिचकारी छोड़ने लगे। दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे से लिपट गए। सभ्या की चूत से राजपाल का गाढ़ा वीर्य धीरे-धीरे बहकर बाहर आने लगा।
शहर में नाश्ते और बातों का दौर खत्म हो रहा था, महिपाल और उसका परिवार मेजबानों की ओर देख रहे थे कि आगे का क़दम क्या होने वाला है,
आदमी: चलिए बातें तो बहुत हो गईं, अंदर के कमरे में चलें?
औरत: और क्या ये लोग भी सोच रहे होंगे कि सिर्फ बातें करने के लिए ही बुलाया है क्या?
पियूष: नहीं नहीं जी ऐसी बात नहीं है, बातों में ही इतना अच्छा लग रहा है,
आदमी: अरे आगे इतना अच्छा लगेगा कि बातें भूल जाओगे छोटे भाई।
औरत: अरे पर इन्हें अंदर वाले कमरे में जाने का नियम तो समझा दो।
आदमी: अरे हां भाई हमारे अंदर वाले कमरे का नियम ये है कि वहां कपड़ों में प्रवेश नहीं मिलता,
ये सुन सब एक दूसरे की ओर देख मुस्कुराने लगे,
महिपाल: ये तो बढ़िया नियम है भाई साहब, और इसके अलावा भी कोई नियम है?
औरत: यही भाई साहब कि सब शर्म, समाज के नियम आदि को भूल कर खुल कर मज़ा लो, और तब तक लो जब तक बिल्कुल थक न जाओ।
पियूष: ये नियम मुझे सबसे ज्यादा पसंद आया,
इस पर सब हंसने लगे,
औरत और आदमी उन्हें लेकर हॉल के अंदर घुसते हुए एक गैलरी और फिर एक कमरा पड़ा जहां आदमी ने सबसे कपड़े उतारने को कहा, और खुद भी कपड़े उतारने लगा, मर्दों ने तो तुरंत कपड़े उतार लिए और वो अंदर चले गए, अंदर जाकर महिपाल और पीयूष ने देखा कि बड़ा सा कमरा था जिसके एक तरफ एक बड़ा सा बेड पड़ा हुआ था अच्छे से मखमली बिस्तर से तैयार होकर, कमरे के दूसरी ओर सोफे लगे हुए थे बीच में कालीन बिछा था कोनों में रखी छोटी टेबलों पर पानी और हल्का फुल्के नाश्ते का सामान रखा था,
पियूष: कमरा तो बहुत अच्छा सजाया है भाई साहब,
महिपाल: हां काफी सुन्दर लग रहा है।
आदमी: ज़रूरत के हिसाब से ही बनवाया है भाई साहब, खुल कर मज़े लेने के लिए, इसे में और मेरी पत्नी कामभवन कहते हैं।
पियूष: अरे वाह नाम भी बहुत ही सोच समझ कर रखा है,
तीनों मर्द नंगे खड़े हुए बातें कर रहे थे, इतने में ही तीनों औरतें भी अंदर आईं और औरत ने दरवाज़ा लगा दिया।
आदमी: अब बातों में ज़्यादा समय नहीं लगाते और शुरू हो जाते हैं,
ये कह वो अपनी पत्नी को बाहों में भर लेता है और उसके होंठों को चूसने लगता है, उसकी देखा देखी, पियूष और महिपाल भी अपनी अपनी पत्नियों के साथ शुरू हो जाते हैं।
पियूष बेड पर चढ़ कर लेट जाता है वहीं रानी बिना झिझक के बिना शर्माए हुए उसकी टांगों के पास बैठकर झुक जाती है और उसके लंड को पकड़ कर सहलाने लगती है, और फिर मुंह में भर लेती है और पूरी लगन और जोश से चूसने लगती है
पियूष भी अपनी पत्नी के मुंह की गर्माहट पाकर सिहरने लगता है, रानी जिसके लिए आज का दिन बिल्कुल अलग ही जा रहा था, पहले जो फिल्म देखते हुए हुआ और फिर अब वो लोग अनजान आदमी के घर में बिस्तर पर नंगे थे ये सब अहसास से बहुत उत्तेजित हो रही थी और उसकी उत्तेजना उसके लंड चूसने में दिख रही थी।
उत्तेजना तो सविता की भी कम नहीं थी, जो अभी आंखें बंद कर के सोफे पर बैठी थी और आहें भर रही थी क्योंकि उसके पति महिपाल अभी उसके सामने अपने घुटनों पर बैठे थे और उसकी मोटी चूचियों को चूसते हुए उसकी चूत को सहला रहे थे जिस से उसका पूरा बदन मचल रहा था, उनके बगल में ही उसी की तरह ही रीता भी बैठी थी और रवि उसकी चूत चाट रहा था उसकी जांघो के बीच मुंह घुसा कर, पूरे कमरे से आहें और सिसकियों की आवाज़ आ रही थी जो कि सिर्फ अभी शुरुआत थी।
चोदमपुर
दूसरी ओर झड़ने के बाद राजपाल को सभ्या ने नहाने के लिए कहा था कि भाई साहब नहा लीजिए तब तक मैं चाय बना देती हूं तुम्हारे लिए पर सभ्या के लिए चाय बनाना भी मुश्किल हो रहा था क्योंकि राजपाल नहाने की जगह कुछ और तरीके से गर्मी शांत कर रहे थे,
चूल्हे पर चाय उबल रही थी तो वहीं चूल्हे के बगल में राजपाल का लंड सभ्या की गर्म चूत में तप रहा था, राजपाल सभ्या की कमर को पकड़ कर पीछे से दनादन धक्के लगा रहे थे,
सभ्या: आह भाई साहब तुम्हे नहाने को बोला था और तुम क्या करने लगे आह्ह्ह्ह।
राजपाल: बहू आज तेरी कोई बात मानने का मन नहीं है, आज तो मुझे अपनी सुननी है और तेरे साथ करनी है,
सभ्या: ओह इतने बेसब्र हो रहे हो भाई साहब कम से कम चाय तो बन जाने देते,
राजपाल: चाय से ज़्यादा गर्म तो तेरी चूत है बहू इसका स्वाद ही लेने दे पहले।
राजपाल ने धक्के मारते हुए कहा, हर धक्के पर सभ्या के चूतड़ लहरा रहे थे और चूचे झूल रहे थे।
दूसरी ओर शहर में कामभवन में नज़ारा थोड़ा बदल गया था और वहां का तापमान भी बढ़ता नज़र आ रहा था, तीनों जोड़े कामसुख के अद्भुत आनंद का मज़ा ले रहे थे, चुदाई करने का अपना अलग मज़ा है पर दूसरों के सामने सारी शर्म छोड़ कर चुदाई करने का मज़ा कुछ खास ही था जो इन्हें महसूस हो रहा था, महिपाल, सविता, पियूष और रानी के लिए तो खास कर क्योंकि वो तो अपने परिवार के सदस्यों के सामने ही इस अदभुत आनंद का स्वाद ले रहे थे जो उनकी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था।
सोफे पर पीछे की के सविता थी जो अपने पति की ओर पीठ करके उनके लंड पर उछल रही थी वहीं महिपाल पत्नी की कमर को थामे उसे सहयोग कर रहे थे, उनके बगल में रीता, रवि के लंड पर उछल रही थी उनसे थोड़ा सा आगे ही एक छोटी कुर्सी पर रानी लेटी थी और उसकी चूत में पियूष का लंड अंदर बाहर हो रहा था।
रवि: क्यों भाई साहब कैसा लग रहा है काम भवन का मज़ा।
महिपाल: आह ऐसा मज़ा तो आज तक नहीं लिया आह इतना खुल कर अजनबियों के सामने करने में बहुत मजा आ रहा है।
रीता: क्या करने में, जब करने में नहीं शर्मा आह रहे तो बोलने में क्यों शर्मा रहे हो?
महिपाल: हां आह चुदाई करने में भाभी जी।
रवि: अरे सुनो भाई साहब और छोटे भाई थोड़ा सम्भल कर चुदाई करना, अभी झड़ना नहीं है,
महिपाल: क्यों रवि भाई साहब ऐसा क्यों?
रवि: अरे ओह रुक रुक करेंगे तो काफी देर तक कर पाएंगे, वैसे भी अभी तो बस शुरुआत है।
पियूष: बिल्कुल सही कहा भैया,
रवि: हां तभी जब लगे निकलने वाला है तो रुक जाना थोड़ा आराम कर लेना और फिर दोबारा शुरू हो जाना,
रीता: आह बहन जी पर हम औरतों के लिए ऐसा नहीं है हम जितना चाहे उतना कर सकते हैं।
सविता: पर मर्द ही रुक जाएंगे तो हम कैसे करेंगे रीता?
रीता: बस देखती जाओ बहन जी।
थोड़ी देर बाद ऐसा ही हुआ जब रवि को महसूस हुआ कि वो झड़ने वाला है तो वो रीता से दूर हो गया और कौने की टेबल से पानी लेकर पीने लगा अपनी सांसों को थामते हुए कमरे में चल रही चुदाई को देखने लगा, वहीं रीता थोड़ा आगे खिसक कर पियूष और रानी की चुदाई देखने लगी जहां रानी सोफे पर बैठे पियूष के लंड पर कूद रही थी, और दोनों ही पूरी तरह उत्तेजित होकर चुदाई कर रहे थे, रीता उन्हें देखते हुए अपनी चूत सहलाने लगी, कुछ पल बाद रीता ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और रानी की कमर पर रख दिया और उसकी कमर को सहलाने लगी, वहीं रानी लगातार उछल रही थी, रीता का हाथ भी रानी के पेट पर चलने लगा।
रानी भी एक औरत का हाथ अपने बदन पर यूं पाकर थोड़ा असहज हुई पर अभी चुदाई करते हुए ये उसके लिए ज़्यादा फ़र्क डालने वाली बात नहीं थी वो लगातार पीयूष के लंड पर उछल रही थी, रीता का हाथ उसके पेट पर से चलते हुए अगले ही पल रानी की चूची पर आ गया और वो उसे खुश होते हुए दबाने लगी उससे खेलने लगी, इस अहसास से रानी के बदन में एक अलग सिहरन होने लगी कि एक औरत उसके बदन से खेल रही है, वहीं रीत हंसते हुए उसका जोश बढ़ाते हुए उसकी चूची से खेल रही थी।
वहीं बिस्तर पर सविता झुकी हुई थी और पीछे से उसे महिपाल चोद रहा था, महिपाल सोफे पर अपने बेटे और बहू की छुड़ाई भी लगातार देख रहे थे और अब रीता का उनकी बहू के बदन से खेलते देख महिपाल के लंड में रस भरने लगा, और जैसे ही महिपाल को लगा कि वो झड़ने के करीब है तो उसने भी सविता की चूत से लंड निकाला और पीछे बैठ गया और हांफने लगा, सविता भी आगे की ओर लुढ़क गई और सांसे लेने लगी,
उधर पियूष को भी ये अहसास था कि रीता उसकी पत्नी के बदन से खेल रही है ये सोचते उसका भी जोश बढ़ रहा था,
रीता: आह बहन ऐसे ही उछल अपने पति के लंड पर, आह तेरी चूचियां कितनी मस्त लग रही हैं आह कितनी मखमली हैं।
रानी: आह ओह हां अह।
रीता: मज़ा आ रहा है?
रानी: आह हां बहुत मज़ा आअजज्ज आ रहा है,
रीता: और चाहिए?
रानी: अग्ह्ह्हः हां।
ये सुनते ही रीता ने अपने होंठ रानी की चूची पर रख दिए और पूरे जोश में उसकी चूची चूसने लगी वहीं रानी के लिए तो ये बहुत गरम करने वाला हो गया उसकी उत्तेजना और बढ़ गई। रीता बिना रुके पूरे जोश से रानी की चूची चूसने लगी, साथ ही दूसरी चूची को दबा रही थी, वहीं पियूष नीचे से लगातार धक्के लगा रहा था अपनी पत्नी की कसी हुई गरम चूत में,
महिपाल और सविता के लिए भी ये नया था कि कैसे एक औरत दूसरी औरत के साथ ये कर रही थी वो भी उनकी खुद की बहू के साथ, पीयूष के लिए तो ये और भी उत्तेजित करने वाला दृश्य था क्योंकि उसके इतने करीब जो हो रहा था पर इसका असर उस पर ऐसा हुआ कि वो खुद को रोक नहीं पाया और रानी की चूत में धक्के लगाता गया और फिर उसके लंड ने पिचकारी छोड़ना शुरू कर दिया एक के बाद एक, वहीं रानी पर भी दोहरा हमला हो रहा था, चूत में पति का लंड तो चूचियों पर रीता का मुंह तो वो भी पियूष के साथ ही झड़ने लगी चिल्लाती हुई, सिसकियां भरती हुई,
कुछ देर बाद पाती पत्नी दोनों ही हांफते हुए ढीले पड़ गए तो जाकर रीता ने रानी की चूची से मुंह हटाया और मुस्कुराते हुए देखा, जिससे रानी के चेहरे पर भी एक हल्की सी मुस्कान फैल गई।
रीता: क्यों बहन मज़ा आया?
रानी: आह पूछो मत आह ऐसा तो पहले कभी नहीं किया। कि किसी औरत ने मेरी चूची चूसी हो।
सविता: हां ये सब कुछ नया है हिम्मते लिए तो,
सविता ने बनते हुए बोला हालांकि वो सभ्या के साथ पहले भी एक बार सब कुछ कर चुकी थी,
रीता: अरे बहन जी तो फिर तुम अभी असली सुख से कोसों दूर हो और बहुत कुछ सीखना बाकी है, रीता ये कहते हुए उठी और सविता की ओर चल पड़ी और कुछ ही पलों में उसके बगल में बिस्तर पर थी।
रीता ने धीरे से हाथ बढ़ाया और सविता की कमर पर रख दिया, सविता ने भी एक मुस्कान दी उसे, बाकी सारे मर्द इस पल को गौर से देख रहे थे और उनके लंड ठुमके मार रहे थे, पियूष का लंड भी दोबारा कड़क होने लगा था,
रीता आगे झुकी और उसने अपने होंठों को सविता के पेट पर रख दिया और चूमने लगी, तो सविता का हाथ खुद ब खुद उसके सिर को सहलाने लगा, सविता का बदन सिहरने लगा, रानी, पियूष, महिपाल ध्यान से देख रहे थे तो रवि के चेहरे पर एक जानी पहचानी मुस्कान थी जैसे वो जानता हो कि उसकी पत्नी क्या कर रही है, रीता सविता के पेट को चूमते हुए ऊपर की ओर बढ़ने लगी, और कुछ ही पलों में वो सविता के ऊपर थी और फिर उसके होंठ सविता के होंठों में उलझे हुए थे, सविता ने भी एक पल को देर नहीं की और उसका साथ देने लगी, दोनों एक दूसरे के होंठों को उत्तेजना में चूसने लगी वहीं रीता ने सविता की टांगों को फैला दिया और अपनी टांगे उसके बीच में फंसा कर अपनी चूत को सविता की चूत से घिसने लगी।
इसका एहसास होते ही सविता का बदन मचलने लगा उसके हाथ रीता के चूतड़ों पर कसने लगे, वहीं वो रीता के होंठों को पूरे जोश के साथ चूसने लगी, बाकी सब सांसे थाम कर ये नज़ारा देख रहे थे, कुछ ही देर में सविता का बदन कांपने लगा और वो थरथरा कर झड़ने लगी और उसके साथ साथ रीता भी, दोनों औरतें एक साथ झड़कर ढीली होकर लेट गईं।
दोनों औरतें—सविता और रीता—अब एक-दूसरे से लिपटी हुईं, हाँफती हुईं, पसीने से तरबतर, बिस्तर पर लेटी हुई थीं।
उनकी साँसें अभी भी तेज़ चल रही थीं, जैसे अभी-अभी कोई तूफ़ान गुज़रा हो। सविता की आँखें आधी बंद, होंठों पर हल्की मुस्कान, और रीता का हाथ अभी भी सविता की कमर पर, धीरे-धीरे सहलाते हुए। दोनों की चूतें अभी भी गीली थीं, एक-दूसरे के रस से सनी हुईं।
कमरे में अब सन्नाटा नहीं था—सिर्फ़ भारी साँसों की आवाज़, कभी-कभी निकलने वाली हल्की सिसकी, और तीन मर्दों की तेज़ होती साँसें। महिपाल, पीयूष और रवि—तीनों नंगे, लंड कड़क, आँखों में भूख नजर आ रही थी।
उनकी नज़रें बार-बार सविता और रीता पर टिक रही थीं, फिर रानी की ओर, जो अब भी थोड़ी हाँफ रही थी, पियूष के वीर्य से भरी हुई, चेहरा लाल, आँखों में नई चमक।
रीता ने धीरे से सविता के कानों में फुसफुसाया,
"कैसा लगा बहन जी... पहली बार किसी औरत के साथ झड़ना?"
सविता ने आँखें खोलीं, शरमाते हुए मुस्कुराई,
"बहुत... बहुत अलग था। यक़ीन नहीं हो रहा हम दोनों एक साथ खड़े।"
उसकी आवाज़ में अभी भी काँपन था।
रीता हँसी, फिर उठी। उसके बदन पर पसीने की चमक, मोटी चूचियाँ हिल रही थीं। वो धीरे-धीरे कमरे के बीच में आई और बोली: हम औरतों का तो एक एक बार हो गया है तो थोड़ा नाश्ता हो जाए फिर आगे बहुत मेहनत करनी है।
इस पर सब मुस्कुरा पड़े।
चोदमपुर
चूल्हे पर चाय खौल चुकी थी पर सभ्या ने हाथ बढ़ाकर चूल्हे को बंद कर दिया था क्योंकि अभी चाय पीने के लिए समय ही कहां था क्योंकि एक बार फिर से सभ्या की चूत को राजपाल ने अपने रस से भर दिया था और दोनों हाँफ रहे थे, राजपाल ने सभ्या की कमर से हाथ हटाया तो सभ्या की टाँगें काँप रही थीं। उसकी चूत से राजपाल का गाढ़ा, गरम वीर्य धीरे-धीरे बहकर जांघों पर लकीरें बना रहा था। सभ्या ने हाँफते हुए, आँखों में अभी भी उत्तेजना की चमक लिए कहा—
"भाई साहब... अब तो सच में नहा लीजिए... पूरा बदन चिपचिपा हो गया है..."
राजपाल ने गहरी साँस ली, फिर मुस्कुराते हुए सभ्या के होंठों पर एक आखिरी, गहरा चुम्बन दिया।
"ठीक है बहू... लेकिन अकेले नहीं। आज तुझे भी साथ लेकर नहाता हूँ।"
सभ्या की आँखें चौड़ी हुईं, फिर शरमाते हुए मुस्कुरा दी।
राजपाल ने उसे गोद में उठाया—जैसे कोई दुल्हन को उठाता है—और आंगन की ओर ले गया। जहां किनारे पर पुराना सा नहाने का पत्थर और बाल्टी में पानी तैयार था। दोपहर की धूप अब थोड़ी नरम हो चुकी थी, पर हवा में अभी भी गर्मी थी।
राजपाल ने सभ्या को धीरे से नीचे उतारा।
आंगन में सभ्या पूरी नंगी खड़ी थी—गोरी त्वचा पर पसीने की चमक, मोटी चूचियाँ थोड़ी लटकी हुईं, गहरी नाभि, और जांघों के बीच से अभी भी सफेद धारियाँ बह रही थीं।
राजपाल ने बाल्टी से पानी निकाला और पहले खुद पर डाला। ठंडे पानी की बूँदें उसके बदन पर फिसलकर नीचे गिर रही थीं। फिर उसने सभ्या को पास खींचा।
"आ जा बहू... आज तुझे मैं नहलाता हूँ।"
सभ्या ने शरमाते हुए सिर झुका लिया। राजपाल ने साबुन उठाया और उसने पहले अपने हाथों पर साबुन लगाया, झाग बनाया, फिर दोनों हाथ सभ्या के पेट पर रख दिए।
सभ्या की सिसकी निकल गई।
"आह्ह... भाई साहब..."
राजपाल के हाथ धीरे-धीरे पेट पर घूम रहे थे। साबुन की नरमी और ठंडक से सभ्या का बदन सिहर उठा। राजपाल ने पेट से ऊपर बढ़ते हुए दोनों चूचियों को थामा। झागदार हाथों से चूचियों को मसलने लगा—गोल-गोल, ऊपर-नीचे, निप्पलों को अंगूठे से रगड़ते हुए। सभ्या की चूचियाँ साबुन से चमकने लगीं, फिसलन से भरी हुई।
"ओह्ह... कितनी नरम... कितनी मोटी... बहू, ये चूचियाँ।
सभ्या ने पीछे झुककर राजपाल के सीने से अपना सिर टिका दिया। राजपाल का लंड फिर से खड़ा हो चुका था। वो सभ्या के पीछे पूरी तरह चिपक गया। उसका कड़ा लंड सभ्या के चूतड़ों की दरार में फिसलने लगा।
राजपाल ने एक हाथ नीचे ले जाकर सभ्या की चूत पर रख दिया। साबुन लगे हाथों से चूत के होंठों को सहलाया, क्लिट पर अंगूठा घुमाया। सभ्या की कमर हिलने लगी।
"आह्ह... भाई साहब... वहाँ... ओह्ह..."
राजपाल ने पीछे से अपना लंड सभ्या की चूत के द्वार पर लगाया।
"बहू... फिर से अंदर डालूँ?"
सभ्या ने हाँ में सिर हिलाया, आवाज़ काँपती हुई—
"हाँ... डाल दो भाई साहब जब तक मन न भरे ..."
राजपाल ने कमर पकड़ी और धीरे से अंदर धकेला।
सभ्या की चूत अभी भी पहले की चुदाई से ढीली और गीली थी, लेकिन राजपाल के मोटे लंड ने फिर से उसे खोल दिया। एक लंबी सिसकी दोनों के गले से निकली।
अब राजपाल धीरे-धीरे धक्के देने लगा।
साथ-साथ उसके हाथ सभ्या के बदन पर साबुन मलते रहे। एक हाथ चूचियों पर, दूसरा पेट और नाभि पर। साबुन का झाग इतना हो गया कि दोनों के बदन फिसलने लगे। हर धक्के के साथ चूतड़ों पर थप्पड़ जैसी आवाज़ हो रही थी। पानी की बूँदें, साबुन का झाग और दोनों की आहें—सब मिलकर आंगन को कामुक ध्वनि से भर रहे थे।
राजपाल ने सभ्या का एक पैर थोड़ा ऊपर उठाया, एक पीढ़े के किनारे पर टिका दिया। अब चूत और खुलकर नजर आने लगी। धक्के और गहरे होने लगे।
"आह्ह... बहू... तेरी चूत... कितनी गरम... कितनी चिकनी... साबुन लगाकर और भी फिसलन भरी हो गई..."
सभ्या की चूचियाँ हर धक्के पर हिल रही थीं, साबुन की बूँदें उड़कर फर्श पर गिर रही थीं।
"ओह्ह... भाई साहब... और तेज़... आह्ह... फाड़ दो... अपनी बहू की चूत को..."
राजपाल ने गति बढ़ाई। उसके हाथ अब सभ्या की कमर पर कसकर थे। लंड पूरी तरह अंदर-बाहर हो रहा था। चूत से साबुन और रस का मिश्रण बनकर सफेद झाग बन रहा था।
कुछ मिनट बाद राजपाल को फिर से वो सिहरन महसूस हुई।
"बहू... फिर निकलने वाला है... आह्ह..."
सभ्या ने पीछे हाथ बढ़ाकर राजपाल के चूतड़ पकड़े, उसे और अंदर खींचा।
"अंदर ही... भर दीजिए... आह्ह... अपनी बहू की चूत में फिर से..."
राजपाल ने आखिरी कुछ जोरदार धक्के मारे और फिर से हुंकार भरकर सभ्या की चूत के अंदर गाढ़ा वीर्य उड़ेल दिया।
दोनों एक साथ थरथराए। सभ्या की चूत से वीर्य और साबुन का मिश्रण बहकर जांघों पर गिरने लगा।
काफी देर तक दोनों ऐसे ही खड़े रहे—राजपाल सभ्या के पीछे चिपका हुआ, लंड अभी भी अंदर, दोनों हाँफते हुए।
फिर राजपाल ने धीरे से लंड बाहर निकाला। सभ्या की चूत से सफेद धार बहकर नीचे गिर रही थी।
राजपाल ने फिर बाल्टी से पानी उठाया और इस बार दोनों को साथ-साथ नहलाया।
साबुन से साफ़, पानी से धुली हुई सभ्या अब भी चमक रही थी। राजपाल ने उसे तौलिये से पोंछा, फिर अपनी बाहों में भर लिया।
सभ्या ने उसकी छाती पर सिर रखकर कहा— अब चाय पीएँगे।
जिसे सुनकर राजपाल हंस पड़े।
राजपाल: चल बहू अंदर चल कर कपड़े पहन ले आज चाय ही पीते हैं।
दोनों कमरे के अंदर चल दिए।
जारी रहेगी
Dear brother once again you proved why you are the best on this platform, you have amazing skills to write a mega story, so we were waiting for your update, we hoe you will not dissapoint usअपडेट 252 पेज नंबर 1215 पर पोस्ट कर दी गई है, अच्छे से बड़े बड़े रिव्यू दें और लाइक्स की संख्या भी बढ़ाओ मित्रो। बहुत मेहनत से लिखता हूं।