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Incest Maa beheno ka pyar

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Miss Demeanor

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बहुत ही दिलचस्प और रोमांचक कहानी! आपकी लिखाई बहुत ही कामुक है।
 
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vs12557

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जैसा कि मैं घर के लिए रवाना हो चुका था. जैसे-जैसे सफर तय होता जा रहा था ट्रेन में बैठे-बैठे मेरी धड़कनों में भी तेजी होने लगी. आखिर इतने दिनों बाद अपनी माँ बहनों से मिलने का उत्साह मेरे हवस की आग को बढ़ाने लगा और साथ ही साथ वही पुरानी वासना जाग उठी, जो पहले से ज्यादा तीव्र थी. लेकिन मेरा दिमाग यह सोच सोच कर परेशान हो रहा था क्या ऐसे ही अगले 4 साल बीतेंगे? सिर्फ चार-पांच दिनों के लिए घर आना और फिर उसी पिंजरे में जाकर कैद हो जाना... कुछ करना होगा ऐसे तो काम नहीं चलेगा. ना तो मैं अपनी बहनों के साथ कुछ नया कर पाऊंगा और ना ही मम्मी के साथ क्योंकि ये कोई चार-पांच दिन का खेल नहीं है. और अगर मुझे कामयाबी मिल भी जाए तो क्या, मुझे तो वापस लौट जाना पड़ेगा और फिर वही फोन पर चैट और टाइम पास. मुझसे ये नहीं होने वाला.


मैंने ठान लिया चाहे कुछ भी हो जाए अब मैं वापस नहीं जाऊंगा. मैंने तुरंत अपने दोस्त को फोन लगाया और उससे सलाह लिया. उसने मुझे एक बहुत बढ़िया तरकीब बताई, डिस्टेंस लर्निंग वाली जिससे ना तो मुझे कॉलेज जाने की जरूरत थी और ना ही कोई वक्त की पाबंदी. मेरा मन यह सुनकर खुशियों से भर गया और बस घर पहुंच कर सबको समझाने का इंतजार करने लगा.

जैसे ही मैं घर पहुंचा मम्मी और मेरी दोनों बेहने बेहद बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही थी. अब तो कुसुम दीदी का भी न जाने कैसे लेकिन भाव बदला हुआ था. बाकियों की तरह वो भी मेरी परवाह करने लगी थी मैं घर के अंदर पहुंचा और तीनों की नजरे मुझ पर थी. पापा बाहर अपने काम पर गए हुए थे, जो की रात को आने वाले थे.


रीना दीदी: आशीष, कितना कमजोर हो गया है!
मम्मी: क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा है. एक तरफ पढ़ाई का प्रेशर और दूसरे तरफ वो बेकार हॉस्टल का खाना.
कुसुम दीदी: तू एक काम क्यों नहीं करता. बाहर रूम लेकर रह ले, पर तुझे तो खाना बनाने भी नहीं आता.
मैं: दीदी, मुझे एक आइडिया आया है. लेकिन आप लोगों का सपोर्ट बहुत जरूरी है.
कुसुम दीदी: कैसा आइडिया?
मैं: क्यों ना मैं डिस्टेंस लर्निंग से पढ़ लूं.
रीना दीदी: लेकिन डिस्टेंस लर्निंग में वो कॉलेज वाली बात नहीं होती आशीष.
मैं: दीदी बात तो पढ़ाई की है ना. घर पर रहकर भी तो पढ़ सकता हूं और आप दोनों भी तो हो पढ़ाने के लिए.
कुसुम दीदी: हां पर...
मैं: कुछ नहीं मैंने सोच लिया है. मैं घर पर रहकर ही पढ़ूंगा. मुझे अब बर्दाश्त नहीं होता घर से दूर रहना, ना अच्छा खाना कुछ भी नहीं.
मम्मी: लेकिन तेरे पापा को तो समझाना पड़ेगा...
मैं: मैं उन्हें समझाऊंगा, जरूरत पड़ी तो गिड़गिड़ा लूंगा उनके आगे पर मुझे अब वापस नहीं जाना.
मम्मी: अच्छा ठीक है, आज रात को बात करते हैं. लेकिन वादा कर अच्छे से पढ़ाई करेगा.
मैं: पक्का वादा!


रात को पापा घर पर आए और वो भी मुझे देखकर काफी खुश थे. हम सब ने साथ में बैठकर खाना खाया. इस दौरान पापा ने पूछा,

पापा: आशीष तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?
मैं: अच्छी चल रही है...


मैंने मम्मी की तरफ देखा तो उसने इशारा किया मुझे अपनी बात कहने का.

मैं: पापा आपसे कुछ बात करनी थी.
पापा: हां हां बोलो.
मैं: (गिड़गिड़ाते हुए) पापा, प्लीज़! मैं वहां वापस नहीं जा सकता. हॉस्टल किसी बुरे सपने जैसा है. जब मैं हर समय बीमार रहता हूं तो पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाता. मैं डिस्टेंस लर्निंग करना चाहता हूं. मैं घर से ही वही डिग्री कर सकता हूं, मैं वादा करता हूं कि मैं और ज़्यादा मेहनत से पढ़ाई करूँगा!
पापा: कॉलेज सिर्फ़ किताबों के बारे में नहीं है, आशीष. ये अनुशासन और आज़ादी के बारे में है. तुम बस अपने बेडरूम में छिपकर इसे पढ़ाई नहीं कह सकते.

तभी मम्मी ने पापा के कंधे पर धीरे से हाथ रखते हुए कहा,

मम्मी: उसकी बात सुनो, उसे देखो, वो अब पहले की तरह स्वस्थ नहीं है. वो महीनों से कैंटीन का वो घटिया खाना खा रहा है. उसका पेट हमेशा खराब रहता है. अगर वो यहाँ रहेगा, तो मैं उसे ठीक से खाना खिला पाऊँगी. उसकी सेहत हॉस्टल के अनुभव से ज़्यादा ज़रूरी है.

पापा: अगर आशीष घर पर रहता है, तो उसे अनुशासन में कौन रखेगा?
कुसुम दीदी: बिल्कुल. हम उसका ख्याल रखेंगे और पढ़ाई में मदद भी करेंगे.

दीदी के इस समर्थन से मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ.


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पापा: ठीक है, अगर तुम्हारी माँ ज़िद कर रही हैं और तुम अच्छे ग्रेड बनाए रखने का वादा करते हो, तो तुम डिस्टेंस लर्निंग चुन सकते हो. लेकिन यह मत सोचना कि इससे तुम्हें आलस करने की छूट मिल जाएगी.

ये सुन मेरे कलेजे को ठंडक पड़ गई, आखिरकार मैं उस बोरिंग कॉलेज से आजाद हो गया. और मेरे चेहरे पर वो मुस्कुराहट फिर से लौट आई जिसे देखकर मेरे घर वाले भी खुश थे. और उस रात कुछ नहीं बस एक सुकून भरी नींद के साथ मैं सो गया.

अगली सुबह आसमान गहरा और काला बादल छाया हुआ था. सुबह से ही लगातार खिड़कियों पर पड़ रही तेज बारिश की बूंदे, जिससे हमारे मोहल्ले की धूल भरी सड़कें अब पानी वाली धाराओ में बदल गई थी.

मैंने देखा मम्मी मेरे कमरे में झाड़ू लगा रही थी और उसका पल्लू बार-बार नीचे की ओर गिर जा रहा था जिससे उसकी लटकती हुई चुचियों का नजारा और उसके बीच की गहराई साफ दिख रहा था. मुझ पर नजर पढ़ते ही वो अपने पल्लू को संभालने लगती.



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घूरती हुई नजर से,

मम्मी: क्या देख रहा है?

मैं उठकर खड़ा हुआ और उसके करीब चला गया, जिससे वो भी रुक गई. और उसे ज़ोर से अपनी बाहों में पकड़ कर चुमने की कोशिश करने लगा. उसने अपने होठों को जोर से दबा रखा था और जैसे ही वो कुछ बोलने के लिए हल्का सा अपना मुंह खोली मैंने तुरंत चूसना शुरू कर दिया.

मम्मी: मम्म्महम्म...इसीलिए तेरा साथ दिया था कि तू यह सब गंदे काम कर सके?
मैं: क्या करूं आपको देखता हूं तो कंट्रोल नहीं होता है. और इससे अच्छा क्या हो सकता है कि एक सुबह की शुरुआत अपनी माँ को चुमने से हो.
मम्मी: दूर हट जा मुझे मत सीखा चूमना किसे कहते हैं.
मैं: क्या मैं आपको चूम भी नहीं सकता?
मम्मी: मैंने कहा ना, मैं सब जानती हूं तेरे मन में क्या चलता है.
मैं: सब जानती हो तो फिर सोचती क्यों हो इतना?
मम्मी: अच्छा, क्योंकि मैं तेरी माँ हूं. भला कोई अपनी माँ के साथ इतना गंदा व्यवहार करता है.
मैं: इसे गंदा व्यवहार नहीं कहते हैं. मुझे तो आपका नशा है.
मम्मी: मार खाएगा अब अपनी किताबों पर ध्यान दें

मैं फिर से एक बार उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया. पकड़ इतनी मजबूत थी उसकी चूची मेरी सीने से पूरी दबी हुई थी और होठ मेरे होठों से सटे हुए थे. वो हिल भी नहीं पा रही थी. लेकिन गुस्से से अपने हाथ में लिए हुए झाड़ू से मुझे मारने की कोशिश जरूर की. मैं उस वक्त उसे अपनी और खींचते हुए बिस्तर पर सुला दिया और फिर उसके गले को, उसके कान को, हर एक हिस्से को चूमना शुरू किया.


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वो अपनी ताकत लगा कर मुझे धकेल रही थी.

मम्मी: हट जाना, क्यों नहीं सुनता है मेरी बात. समझ, मैं नहीं कर सकती यह सब.
मैं: क्यों नहीं? क्या आप मुझसे प्यार नहीं करती?
मम्मी: कोई आ जाएगा छोड़ना.
मैं: किसे पता चल रहा है, देखो आप और मैं अकेले ही तो है. फिर डरती क्यों हो?
मम्मी: मैं बाद में बताऊंगी. अभी मुझे जाने दे.

जैसे तैसे करके उसने अपने आप को मुझसे अलग किया और कमरे के बाहर चली गई. तेज़ बारिश धीरे-धीरे हल्की फुहार में बदल गई और फिर पूरी तरह रुक गई. हवा में गीली मिट्टी की महक घुली हुई थी. मैं बस यही सोच रहा था कि क्या मैं चुपके से रीना दीदी के कमरे में जाऊं, तभी मुझे लिविंग रूम से किसी की आवाज़ सुनाई दी जो मेरा नाम पुकार रही थी.

कुसुम दीदी: उठ गया कि अभी भी सो रहा है?

ये कुसुम दीदी थी. रीना दीदी के उलट, जो धीमी आवाज़ में बात करने वाली और शर्मीली नहीं थी.

मैं: क्या हुआ?

मैं अपनी आँखों से नींद हटाते हुए हॉलवे में निकला. वहां कुसुम दीदी खड़ी थी. वो बाहर जाने के लिए तैयार थी और उसने पीले रंग का, शरीर से चिपका हुआ सलवार-कमीज़ पहना था. वो अपना फ़ोन देख रही थी और बेचैन लग रही थी. उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा,

कुसुम दीदी: आखिरकार बारिश रुक गई है. मुझे घर और अपने लिए कुछ सामान लेने बाज़ार जाना है. चल, तैयार हो जा, इससे पहले की बारिश शुरू हो जाए.
मैं: पर अभी तो मैंने नाश्ता भी नहीं किया है.
कुसुम दीदी: अरे ब्रश कर ले ना. नाश्ता वहां कर लेंगे, मैंने भी नहीं किया.

मैं भी जल्दी से रेडी होकर दीदी के पास आ गया. लेकिन रीना दीदी अभी तक मुझे नहीं मिली. मन में एक अजीब सी घबराहट सी दौड़ गई. कुसुम दीदी के साथ मेरा अभी तक कोई खास अनोखा पल नहीं बीता था. उसके साथ मेरा रिश्ता हमेशा सीधा-सादा रहा था. वो दबंग बड़ी बहन थी, और मैं छोटा भाई जो उसकी बात मानता था. लेकिन जब मैंने उसे कमर पर हाथ रखे वहाँ खड़े देखा, तो मेरी नज़र उसकी कमीज़ के कपड़े पर पड़ी जो उसके सीने पर कसा हुआ था.

कुसुम दीदी: कहां खो गया,जल्दी कर आशु. अगर फिर से बारिश शुरू हो गई तो मैं बाहर भीगना नहीं चाहती.

कुसुम दीदी पिछली सीट पर बैठ गई. बैठते ही वो पीछे की तरफ नहीं बैठी, बल्कि आगे खिसक आई और उसका शरीर मेरी पीठ से कसकर सट गया. मुझे अपनी पीठ पर उसके स्तनों का नरम और भारी दबाव महसूस हुआ और उसने खुद को संभालने के लिए अपनी जांघों से मेरे कूल्हो को कसकर पकड़ लिया.


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मार्केट का सफर असल में जितना होना चाहिए था, उससे कहीं ज्यादा लंबा हो गया. हर बार जब मैं ब्रेक लगा था या फिर गाड़ी की रफ्तार बढ़ता तो दीदी की स्तन मेरी पीठ में दब जाती है और जाएंगे मेरी कूल्हों से रगड़ खा रही थी और ऊपर से उसकी नशीली खुशबू. पता नहीं यह चीज उसे अजीब लगी या नहीं लेकिन मेरा तो लंड खड़ा हो गया.

जब हम आखिरकार भीड़-भाड़ वाले बाज़ार पहुँचे, तो सड़कें लोगों से भरी पड़ी थी. मैंने मोटरसाइकिल एक तंग जगह पर पार्क की,


कुसुम दीदी: पास रहना, भीड़ है, कुंभ के मेले की तरह खो मत जाना.

जब हम तंग गलियों से गुज़रे, तो दीदी ने मेरी कलाई पकड़कर मुझे अपने साथ ले गई. वो मुझे कई दुकानों में ले गई और राशन व घर का सामान चुना. हालाँकि, जब हम कपड़ों वाले सेक्शन में पहुँचे, उसने कुछ रात के सोने के लिए हल्के कपड़े खरीदे और उन्हें अपने शरीर के सामने रखकर देखने लगी.

मैं: ये अच्छी लग रही है आप पर...
कुसुम दीदी: हां, सच्ची! तुझे कुछ लेना है?
मैं: नहीं मुझे तो भूख लग रही है बहुत जोरों से.
कुसुम दीदी: हां हां चल रहे हैं, बस 2 मिनट.


सारी खरीदी के बाद हमने मार्केट में एक बढ़िया चाट समोसा खाया. और घर के लिए लौट गए लेकिन जिस चीज का डर था वही हुआ, रास्ते में एक जोरदार बारिश की शुरुआत.

कुसुम दीदी: ओहो, अब क्या करें?
मैं: दीदी वो देखो, वहां जगह है छुपने की.
कुसुम दीदी: अरे वहां कोई रहता होगा.
मैं: नहीं उस खंडहर में कौन रहेगा? चलो एक बार देखते तो हैं.
कुसुम दीदी: मैं तो पूरी भीग गई.
मैं: चलो जल्दी.

उस कीचड़ भरे रास्ते में जैसे तैसे हम उस लकड़ी की टूटी-फूटी घर के पास पहुंचे. देखा तो वहां कोई नहीं था, भले टूटी फूटी हो लेकिन बारिश से बचने के लिए वो एक बढ़िया जगह थी.

दीदी ठंड से ठिठुर रही थी. मैंने उसे गौर से देखा उसका बदन पानी से पूरा भीगा हुआ था. उसकी कमीज उसके सीने से चिपक गई थी जिससे उसकी चुचियों का उभार साफ़ दिख रहा था और उस पर ब्रा की लाइनिंग. तभी उसकी नजर मुझसे मिली.



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कुसुम दीदी: ऐसे क्या देख रहा है? मुझे ठंड लग रही है.

तभी मैं गर्मी देने के बहाने, उसके पीछे खड़ा हो गया और उसकी कमर को पकड़ कर अपनी और खींचा जिससे उसकी पीठ मेरे सीने से सट गई. उसने इस बात का बिल्कुल बुरा नहीं माना, उसका ध्यान उस मूसलाधार बारिश पर था और ठंड से उसका बदन कांप रहा था. उसका बदन मेरे बदन से सटते ही मेरा लंड खड़ा हो गया जो उसके गांड से रगड़ खा रहा था. मैंने धीरे से अपना हाथ उसके जांघों पर फेरा, जिससे उसकी पैंटी भी मुझे महसूस हुई. उसे अचानक इस बात का एहसास हुआ और वो झटक कर दूर हो गई.

कुसुम दीदी: (चौंकते हुए) क्या था ये?!!
मैं: मतलब?
कुसुम दीदी: आशीष मैं पूछ रही हूं, अभी तुने क्या किया?

मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब जवाब दूं, लेकिन उसके गीले बदन और नरम होठों को देखकर मैं भूल गया कि वो कितनी गुस्से वाली है. मेरी नियत और खराब हो गई. कुछ सोचे समझे बिना, मैं उसके करीब गया और उसके होठों को चूम लिया.



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वह सन्न रह गई और और हिल भी नहीं पाई, इस सदमे से उसके पर वही जम गए थे. उसके बाद उसका चेहरा देखने लायक था. वो गुस्से से एकदम लाल थी और मुझे लगभग पता चल ही गया था कि आगे क्या होने वाला है. एक जोरदार थप्पड़, अब तक मैं अपने घर की सारी औरतों से थप्पड़ खा चुका था.

कुसुम दीदी: (गुस्से में) तो यह है तेरी हकीकत! तू मुझ पर, अपनी बेहन पर डोरे डाल रहा है. आज तेरी खैर नहीं, तू घर चल मैं सबको बताती हूं.
मैं: नहीं-नहीं दीदी, ऐसा मत करना. गलती हो गई, माफ कर दो पर जानबूझकर नहीं किया है.
कुसुम दीदी: तेरी नियत कितनी खराब है. तुने मुझे इतनी गंदी तरह से छुआ कैसे...

मुझे भी एहसास हुआ कि मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी. मुझे रीना दीदी और मम्मी के साथ ही खुश रहना चाहिए था.

मैं: दीदी प्लीज, सॉरी. अब कभी नहीं होगा.
कुसुम दीदी: कहां से सीखा तूने ये सब.
मैं: कहीं से नहीं, कुछ नहीं. दीदी आप मुझे बहुत खूबसूरत लगती हो, मेरा अपने आप पर कंट्रोल नहीं रहा मुझे माफ कर दो मैंने जानबूझकर नहीं किया. प्लीज किसी से मत कहना. मैं हाथ जोड़ता हूं आपके.
कुसुम दीदी: मुझे उसी दिन समझ जाना चाहिए था जब तू हॉस्टल में मीठी-मीठी बातें कर रहा था. क्या चल रहा है तेरे मन में सच-सच बता मुझे!
मैं: दीदी में इतना बड़ा हो गया हूं पर आज तक मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है. दूसरों को देखता हूं तो मुझे जलन होती है. मैं क्या करूं, इसलिए मेरे कुछ समझ में नहीं आया.
कुसुम दीदी: अच्छा मेरा भी कोई बॉयफ्रेंड नहीं है तो मैं क्या मुंह मारते फिरूं हर जगह...और तुझे शर्म नहीं है. भाई का काम होता है अपनी बेहन की हिफाजत करना, अपनी बेहन का ख्याल रखना और तु मेरी ही इज्जत पर हाथ डाल रहा है.
मैं: मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था, बस एक मौका तो दो. दीदी, अब आप जैसे बोलोगी मैं वैसे रहूंगा पर प्लीज मुझे माफ कर दो.

उस बिजली की गड़गड़ाहट और भारी बारिश के बीच कुसुम दीदी का चेहरा असमंजस में दिख रहा था. उसे तय करने में थोड़ी मुश्किल हुई लेकिन फिर,

कुसुम दीदी: ठीक है-ठीक है, इस बार माफ किया. लेकिन अगली बार अगर तुने कुछ भी ऐसा सोचा या करने की कोशिश की तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.

उसकी माफी से मेरे जान में जान आई, नहीं तो न जाने क्या करती. लेकिन उसका डर मेरे मन में तब तक था जब तक हम घर ना पहुंच जाए. बारिश की हल्की धीमी होते ही उसने इशारा किया चलने को. मैंने भी चुपचाप उसका कहना मानकर आगे का सफर तय किया. इस दौरान उसने मुझसे कोई बात नहीं की, बस मैं ही था जो बार-बार उससे माफी की गुहार लगा रहा था कि गलती से भी वो बोल न दे कुछ. जब हम घर पहुंचे तो मुझे कुसुम दीदी के प्रतिक्रिया का इंतजार था.

मैं: दीदी... दीदी, सुनो ना कुछ मत बोलना.
कुसुम दीदी: मुंह बंद रख और चल चुपचाप अंदर.

अंदर पहुंच कर दीदी ने कुछ नहीं बोला. बस नॉर्मल तरीके से सबसे बात करने लगी और फिर अपना कपड़ा चेंज करने चली गई. इससे मुझे राहत की सांस मिली, और उसी के साथ मेरी नजरों ने मेरी प्यारी रीना दीदी को भी देखा. उसके चेहरे पर शर्म थी, जो भी उसने किया था चैटिंग के वक्त. वो मेरे पास आने से बहुत कतरा रही थी और ऐसा लग रहा था जैसे वो दूर रहने में ही अपनी भलाई समझ रही थी. लेकिन कब तक आखिर थे तो हम दोनों एक ही छत के नीचे. मैंने भी उसे देखकर आंख मारी तो उसने शर्मा कर नज़रें फेर ली. उस दिन पापा भी जल्दी घर आ गए थे. मेरे मन में खुशी इस बात की भी थी कि अब मुझे यही रहना है और मेरे पास वक्त ही वक्त है, अपनी माँ बहनों को हासिल करने का.

रात को हम सब ने बाकी दोनों की तरह खाना एक साथ खाया और फिर अपने-अपने कमरे में सोने चले गए मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ यही सोच रहा था कि आज का दिन भी कितना अजीब था पहले हवस और फिर डर हावी हो गया. काश कुसुम दीदी मान जाती, तब तो मजा आ जाता. और उसके बदन उसकी गर्माहट और छुए गए एहसास को याद करके मैंने अपना लंड हिलाया.

हमारे घर में दो बाथरूम थे और एक टॉयलेट. एक टॉयलेट और बाथरूम पीछे आंगन में और एक बाथरूम मेरे कमरे में जिसकी कुंडी खराब थी. इसी वजह से दरवाजा भी नहीं बंद होता था. पर क्योंकि वो कमरे के अंदर था और सिर्फ नहाना ही तो था. इसलिए उससे कोई दिक्कत भी नहीं था. आमतौर पर औरतें उस पीछे वाले बाथरूम और टॉयलेट को इस्तेमाल करती थी. लेकिन अगली सुबह बारिश बहुत तेज था और पीछे वाला बाथरूम इस्तेमाल करना मुश्किल. क्योंकि बाहर निकलते ही शरीर फिर से भीग जाता. इसीलिए मम्मी मेरे कमरे में आई उसने एक सेटिंग मैरून कलर की नाइटी पहनी थी जिसमें उसकी निप्पल की धार दिखाई पड़ रही थी. ऐसा लग रहा था उसने अंदर कोई ब्रा नहीं पहना.

मम्मी: बाहर बहुत बारिश है. मैं आज इसी में नहाने जा रही हूं. तू जा बाहर हॉल में जाकर पढ़ाई कर.
मैं: मम्मी, अभी तो सो कर उठा हूं. अभी कहां पढ़ने जाऊं.
मम्मी: अच्छा ठीक है. मैं जा रही हूं नहाने.



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क्या मौका मिला था मुझे. मैं जानता था मेरे दरवाजे की कुंडी टूटी हुई है और उसके जगह एक छोटा सा छेद हो रखा है, जिसमें अगर सही तरीके से देखा जाए तो पूरे बाथरुम के अंदर का नजारा दिख सकता था. ये मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं था. मैंने मम्मी की परिपक्व चूचियों को देखा था और चूसा भी था, वो बहुत बड़ी नहीं लेकिन मन को लुभाने वाली थी. ऐसी चूचियां, जिसका हर बेटा इंतजार करता है कि काश वो उसे देख पाता, उसे छूकर अपने होठों पर महसूस कर सकता. लेकिन आज वो मौका था जब मैं उससे भी ज्यादा अपनी मम्मी के बदन को निहार सकता था.

जैसे ही वो अंदर गई, उसने शायद किसी भरी बाल्टी से दरवाजे को रोकने की कोशिश की. ये आवाज सुन मैं चौकन्ना हो गया और बस कुछ सेकंड के बाद, मैं दबे पांव दरवाजे के करीब गया. मैंने अपनी आंखें उस छोटी सी छेद पर टिकाई जिससे अंदर देखा जा सकता था. थोड़ी सी मशक्कत जरूर हुई लेकिन फिर नजारा एकदम स्पष्ट था.

मैंने देखा मम्मी ने टॉवल को ऊपर रखा, उसे इस तरह देखकर मेरे दिल की धड़कन मानो इतनी तेज थी जैसे कलेजा फाड़ कर बाहर आ जाएगी. मेरे पलक झपकने से पहले ही उसने तुरंत नाइटी को एक झटके में निकाल दिया.



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मेरा अंदाजा गलत था, उसने ब्रा के साथ-साथ पैंटी भी नहीं पहना था. वो पूरी तरह से नंगी थी और उसकी कैद चूचियां आजाद हो गई और उसका नंगा बदन कयामत ढा रहा था. पहली बार चूचियों के साथ-साथ उसका पूरा नंगा बदन मेरे आंखों के सामने था. यह देख मेरे लंड ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी और पैंट में तनाव बढ़ने लगा.

जैसे ही उसने नाइटी को पूरी तरह से खोलकर एक तरफ रखा और गांड मेरी तरफ करके अपने बालों को पकड़ कर, क्लचर से बांधने लगी. ये देख, मेरे तो होश उड़ गए. मम्मी की चूचियां भले बहुत बड़ी नहीं हो लेकिन उसका गांड बहुत बड़ा था. कसकर लपेटे हुए साड़ी में, उस गांड की चौड़ाई छुप जाती थी पर आज वो भी आवारा हो गए थे. मैं तब भी यकीन नहीं कर पा रहा था कि मैं अपनी माँ की गांड को देख रहा हूं. जी कर रहा था अपने होठों से उसके गांड को चूम लूं और दोनों हाथों से उसे मसल दूँ.



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उसने शावर को चालू किया फिर आगे की तरफ घूमी. ऐसा नजारा, की मेरा खुद पर काबू नहीं रहा. मेरा लंड दर्द कर रहा था, मेरा हाथ लंड को जोर से पकड़े हुए था. और निगाहें मम्मी की चूत पर टिकी थी जो की पूरी तरह से चिकनी थी. मेरे समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करूं? क्या दरवाजा खोलकर अंदर चला जाऊं? या फिर ऐसे ही अपने मन को मार लूं? उस चूत ने मुझे पागल कर दिया. मैं उसे चखना चाहता था, उसे चोदना चाहता था. उस चूत का छेद एक गहराई में छुपा हुआ था जिसे देख पाना मुश्किल था, मैं उसे देखना चाहता था. पहली बार ऐसा लगा कि बिना हिलाए ही मेरे लंड से वीर्य निकल जाएगा.

वो अपने शरीर का बहुत ख्याल रखती थी. 49 साल की उम्र में भी कोई अनचाहा मोटापा नहीं था उसके शरीर पर, एक सुडौल तरीके से ढला हुआ, चौड़े गांड के साथ उसके चेहरे की सुंदरता और मासूमियत. उसने अपने शरीर के एक-एक हिस्से को अच्छी तरह से धोया. खुशबूदार साबुन और शैंपू से पूरा बदन महक उठा. ये देख मेरे मुंह में भी पानी आ गया.



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नहाने के बाद उसने सुंदर सी ब्रा और पैंटी पहनी और ब्लाउज को पहनते हुए हुक लगाने लगी. अब वो नजारे ढक चुके थे, मेरे लिए भी अब वापस बिस्तर पर जाना ही एक उपाय बचा था. इसलिए मैंने भी अपने कदम पीछे हटाए और मम्मी के बाहर आने का इंतजार करने लगा. वो खूबसूरत सी नीली साड़ी में आई.

मम्मी: तू अभी तक सोया हुआ है? उठ ना फटाफट ब्रश कर फिर नाश्ता और फिर पढ़ने बैठ. आलसी हो गया है एकदम से.
मैं: मम्मी एक बात बोलूं?
मम्मी: जानती हूं फिर कुछ उल्टा-पुल्टा बोलेगा...
मैं: आप बहुत खूबसूरत हो.
मम्मी: (शरमाते हुए) चल हो गई तारीफ अब उठ जा.
मैं: गुड मॉर्निंग किस दो.

इस बार कोई तरह की जोर जबरदस्ती नहीं हुई. उसने चुपचाप मेरे माथे पर चुमा और उठकर मुस्कुराते हुए वहां से चली गई, वो एक ममता भरा स्नेह था. और दूसरी तरफ मेरे मन में चल रही उथल-पुथल. मैं यही मना रहा था एक बार ऐसा मौका फिर से मिल जाए.

मैं भी बाहर हॉल में बैठकर पढ़ाई कर रहा था और कुसुम दीदी इस बार बहुत ही सख्त तरीके से मुझे पढ़ा रही थी. क्योंकि उसे उस तरह का बर्ताव जरा भी पसंद नहीं आया जो मैंने उसके साथ किया था. मेरी नज़रें अब रीना दीदी को ढूंढ रही थी पढ़ाई खत्म करके मैंने मम्मी से पूछा.


मैं: दीदी कहां है?
मम्मी: बारिश बहुत जोरों से फिर आने वाली है, जो कपड़े सूखने के लिए रखे थे वो भीग जाएंगे. इसीलिए रीना उसे उतारने गई है पीछे.

मैं तुरंत पीछे की तरफ गया देखा, तो दीदी वहीं पर थी. और मुझे देखकर अपनी नज़रे चुराने लगी.

मैं: मुझसे नाराज हो?

यह कहते हुए मैं पीछे से उसे अपनी बाहों में भर लिया.

रीना दीदी: क्या कर रहा है, छोड़ कोई आ जाएगा.
मैं: कोई नहीं आएगा सब अपने काम में व्यस्त हैं. बोलो ना मुझसे नाराज हो?
रीना दीदी: मैं भला क्यों नाराज रहूंगी.
मैं: मैं जब से आया हूं, आप मुझसे बात नहीं कर रही हो.
रीना दीदी: शर्म नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं मैं जानती हूं कि मुझे कैसा लग रहा है.
मैं: ओ दीदी कौन सी बड़ी बात हो गई. आप खुद सोचो किसी को कुछ नहीं पता है यह बात सिर्फ हम दोनों के बीच ही तो है.
रीना दीदी: तू तो बेशर्म है मुझे क्यों बनाने में लगा हुआ है.


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मैं: (छेड़ते हुए) अच्छा बताओ, ये पैंटी किसकी है?
रीना दीदी: (एक प्रकार से गाली देते हुए) तेरी माँ की.
मैं: मुझे पता है आपकी है.
रीना दीदी: तेरी तो, रुक...जा...

वो मेरे पीछे मजाक में मारने के लिए दौड़ी और मैं भी उसके साथ खेल रहा था. ये दिन तो मेरे लिए बहुत यादगार था क्योंकि पहली बार अपनी माँ की चूत के दर्शन हुए थे. अब इंतजार था आगे का.
 
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