अगले दिन मम्मी साफ सफाई कर रही थी और मैं आंगन में पौधों को पानी दे रहा था. वो पीछे से आकर बोली,
मम्मी: कल जो कुछ कचरा पड़ा था स्टोर रूम में वो साफ किया?
मैं: कचरा कैसा कचरा?
मम्मी: (धीरे से कान में) अरे बेवकूफ वो कंडोम...
तो मुझे याद आया कि मैंने कंडोम वहीं फेंक दिया था कहीं किसी की नजर ना पड़ जाए उस पर.
मैं: नहीं मैं तो भूल ही गया था.
मम्मी: जा जल्दी जा कर देख.
मैं भागता हुआ स्टोर रूम के तरफ गया, संगीता सीढ़ियों पर झाड़ू लगा रही थी. मैं उसके झाड़ू के ऊपर से भागता हुआ गया.
संगीता: अरे..अरे..क्या कर रहे हो? इतनी जल्दी क्या है?
मैं: तुम नहीं समझोगी.
बोलता हुआ मैं ऊपर गया और देखा तो कंडोम वही फर्श के किनारे में गिरा था. मैं परवाह न करते हुए उसे झट से अपनी जेब में रख लिया और फिर मम्मी के पास लौट आया.
मम्मी: क्या हुआ मिला?
मैं: ले तो लिया पर मेरी जेब में है.
मम्मी: पागल किसी पेपर से उठा लेता.
मैं: जल्दबाजी में कुछ सुझा ही नहीं, संगीता सीढ़ियों पर झाड़ू लगा रही थी.
मम्मी: अच्छा रुक मैं आती हूं.
कुछ देर बाद मम्मी पेपर का टुकड़ा लेकर आई और चुपके से मेरे कंडोम देते ही उसने पेपर में उसे मोड़ दिया और कूड़े की ढेर में फेंक कर जला दिया.
मम्मी की समझदारी का क्या कहना, सच में मुझ जैसे नादान और एक परिपक्व औरत में जमीन आसमान का फर्क होता है. वो जल्दी जज्बातों में न बहकर दिल और दिमाग दोनों से कम लेती है.
मम्मी: जा हाथ धो ले जाकर.
मैं: ओ..मम्मी आप कितनी अच्छी हो!
मम्मी: दूसरों का पता नहीं तुझसे तो अलग डर लगता रहता है मुझे, कब क्या नादानी कर बैठे.
हम सब दोपहर को हाल में ही बैठे टीवी देख रहे थे की तभी पापा आ गए. उन्हें देख हम सबको हैरानी हुई क्योंकि वो कभी दोपहर में नहीं आते बस सब कुछ ठीक हो...
मम्मी: क्या हुआ सब ठीक तो है? आप इतनी जल्दी? पापा: घबराने वाली कोई बात नहीं. आप लोग बैठो मुझे कुछ कहना है.
मम्मी: राहुल पापा के लिए पानी लेकर आ.
पापा: वो क्या है कि मुझे यहां से ट्रांसफर कर दिया गया है तो कल सुबह मुझे जाना है बेंगलुरु के लिए.
मम्मी: क्या इतनी दूर, तो क्या हम अकेले रहेंगे यहां? उन कमीनों को थोड़ा भी समझ नहीं आया.
पापा: अंजू फिक्र मत करो दो महीने की ही तो बात है. आखिर पूरा परिवार राहुल, संगीता साथ में ही तो है यहां.
मम्मी: फिर भी आपकी बहुत फिक्र रहती है, तबीयत भी सही नहीं रहता आपका, मैं भी चलूंगी आपके साथ.
संगीता: हां फिर तो मैं भी चलूंगी.
पापा: तुम सब निश्चिंत रहो और वहां रहोगे भी कैसे मुझे जो क्वार्टर मिला है उसमें पहले से ही और कॉलीग मेरे साथ रहेंगे, मैं लौट आऊंगा दो महीने में और देखो मेरा प्रमोशन अच्छा हो गया तो हम कार भी ले लेंगे.
पर मम्मी तब भी उदास थी. मेरा और मम्मी का रिश्ता एक अलग मोड था लेकिन उसके लिए तो उसका पति ही सब कुछ था और हो भी क्यों ना आखिर उसने उसके साथ फेरे लिए थे और 25 साल साथ बिता चुकी थी. इसीलिए मम्मी की आंखों में पापा के लिए प्यार देखकर मुझे कोई हैरानी नहीं था.
रात को हम सब खाना खा रहे थे पर मम्मी का मन नहीं लग रहा था.
मैं: अब मुस्कुरा भी दो, मैं हूं ना आपका ख्याल रखने के लिए.
पापा: हां अंजू, राहुल है ना बहुत अच्छे से ख्याल रखेगा और हमारी गुड़िया रानी भी तो है.
तभी मौसम का मिजाज भी बदलने लगा कड़कती बिजली के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गया. यह देखकर,
मम्मी: नहीं नहीं! आप मना कर दीजिए मौसम देखिए कितना खराब है.
पापा: अंजू काम है जाना पड़ेगा, प्लीज अपने आप को शांत करो.
क्योंकि पहली बार था जब वो इतने दिनों के लिए दूर जा रहे थे. मुझे पता है इसके बाद रात में पापा ने मम्मी को बहुत समझाया होगा और वो सब कुछ किया होगा जो एक पति अपनी पत्नी को रिझाने के लिए करता है. सच में कितने खुश नसीब है पापा जो उन्हें ऐसी सुंदर और पतिव्रता पत्नी मिली है. हालांकि उसका पतिव्रता होना तो मैंने खत्म कर दिया है लेकिन वो दिल से अभी भी उन्हें सबसे ज्यादा चाहती है.
अगले दिन मम्मी पापा के सफर के लिए कुछ खाना बना रही थी.
मैं तभी किचन में गया और उसके उदास चेहरे को देख कर उसे समझाता हुआ यह कह रहा था की बस दो महीने की बात है आप क्यों इतनी चिंता करती हो. फिर भी वो नहीं मान रही थी तो मैंने धीरे से उसके कमर पर गुदगुदी की और गुदगुदी होते ही वह थोड़ा मुस्कुरा दी.
मम्मी: चल हट बदमाश...मार खाएगा.
मैं: हां मम्मी मारो ना आखरी बार आपने बचपन में ही मारा था और वैसे भी आप गुस्से में और खूबसूरत लगती लगती हो.
मम्मी: हां सही कह रहा है अब तुझे मार की ही जरूरत है.
और मजाक में उसके हाथ में जो करछी था, मेरी तरफ बढ़ाया मारने के लिए. मैं भी वहां से भागा और संगीता के पीछे छुपने लगा.
पापा: अरे क्या हो गया? क्यों मरती हो बेचारे को?
मम्मी: देखिए ना परेशान कर रहा है.
हमारे बीच की यह नोक झोक को देखकर पापा और संगीता भी हंस पड़े.
क्योंकि बारिश कल रात से ही हो रही थी जब पापा के जाने का वक्त हुआ तब भी बारिश नहीं थमा.
मम्मी: राहुल चौक पर से कोई रिक्शावाला होगा उसे लेकर आ.
हम सब छोड़ने जाने वाले थे पापा को. ऐसे तेज बारिश में कोई रिक्शावाला तैयार नहीं हो रहा था चलने को फिर बहुत मानने के बाद एक रिक्शा वाला तैयार हुआ. हम घर से रवाना हुए और जैसे तैसे स्टेशन पहुंचे क्योंकि इतनी ज्यादा बारिश के कारण कई जगहों पर पानी भर गया था.
स्टेशन पहुंचे तो पता चला भारी बारिश के चलते ट्रेन 3 घंटे लेट था और लंबे इंतजार के बाद आखिर ट्रेन आ गई पापा ने भी हम सबसे अलविदा लिया और ट्रेन में बैठे गए.
उनके जाते ही हम जल्दी से स्टेशन के बाहर निकले और रिक्शा वाले को हमारे पते पर जाने के लिए कहा लेकिन कोई रिक्शावाला तैयार नहीं हो रहा था सबका यही कहना था कि बहुत पानी भरा है और ऊपर से हमारा घर जो है वो जंगल के पास पड़ता है, वो इलाका भी बहुत दूर है.
मम्मी ने तरकीब लगाते हुए मामा को फोन किया क्योंकि उनका घर वहां से कुछ ही घंटे की दूरी पर था और उनके पास तो कार भी था. लेकिन उन्होंने कहा कि आज उनका आना भी मुश्किल है वो कहीं काम से बाहर गए हुए थे, उन्होंने कहा कि आज आप लोग पास के होटल में रुक जाओ, वो कल सुबह आएंगे हमें लेने.
मैंने आसपास के होटल में फोन करके कमरे के बारे में पूछा पर कोई कमरा खाली नहीं था क्योंकि ऐसी बारिश में कोई कमरा खाली करके जाने का जोखिम नहीं उठाता. तभी मुझे एक गेस्ट हाउस का पता चला और मैंने उससे पूछा तो उसने बताया कि हां दो कमरा खाली है. जैसे तैसे एक रिक्शा वाले को फिर से मनाया, गेस्ट हाउस थोड़ी ही दूरी पर था वो चलने को तैयार हो गया. और जब हम वहां पहुंचे तो हमने देखा उस गेस्ट हाउस में कुल चार ही कमरे थे और अब तो वो चारों ही खाली थे. वो एक पुराना गेस्ट हाउस था शहर के भीड़ भाड़ से थोड़ा अलग.
मम्मी: क्या बात है भैया आपके इधर तो सारे कमरे खाली हैं.
केयरटेकर: हां बहन जी वो क्या है हमारा गेस्ट हाउस काफी बाहर पड़ जाता है इसीलिए कोई जल्दी आता नहीं.
मम्मी: हां शहर में तो जगह नहीं मिला हमें कहीं भी. संगीता: (धीरे से कान में) भैया यह जगह कुछ अजीब नहीं लग रही?
मैं: छोड़ो ना कौन सा हमें पूरी जिंदगी रहना है बस आज रात की है तो बात है.
केयरटेकर: आप लोग को जब खाना चाहिए होगा तो बता देना मैं मंगवा दूंगा.
मम्मी: फिलहाल तो आप पानी दे दीजिए.
केयरटेकर: कितने कमरे बुक करने हैं.
मम्मी: एक ही करना है.
केयरटेकर: हां पर आप लोगों को कोई असुविधा नहीं हो क्योंकि हर कमरे में एक ही बेड है पर वो बड़े साइज का है.
मम्मी: अगर बड़े साइज का है फिर तो कोई दिक्कत नहीं होगा.
केयरटेकर: नहीं मैं तो इसलिए कह रहा हूं कि आप दोनों तो लेडिस है, अटपटा नहीं लगे लेकिन यह तो मर्द है. मम्मी: इसमें क्या अटपटा लगेगा बेटा है मेरा...
जब हम कमरे पर पहुंचे तो हमने देखा वहां पर एक ठीक-ठाक बेड रखा हुआ था. हमने खिड़की से होती उस बारिश को भी देखा जो कहर बरसा रही थी.
रात को खाना खाने के बाद हम सब बेड पर लेट गए- एक तरफ मैं, दूसरे तरफ संगीता और बीच में मम्मी थी.
थोड़ी देर बात करते हुए संगीता सो गई और मम्मी को भी नींद आ रही थी लेकिन मम्मी के इतने करीब होने की वजह से मेरी नींद उड़ी हुई थी. जब वो दोनों को अच्छे से नींद आ गई तो मैं भी सोने की कोशिश करने लगा क्योंकि संगीता के पास होने की वजह से कुछ कर भी तो नहीं सकता था.
तभी मैंने दिमाग लगाया क्यों ना पैर के पास पड़ी हुई चादर को मम्मी के ऊपर ढक दूं. जिससे अगर मैं कुछ करूं भी तो संगीता की नजर इन सब चीजों पर नहीं पड़े. और वैसे भी कमरे में काफी अंधेरा था बस खिड़कियों से थोड़ी रोशनी आ रही थी. मम्मी को चादर ओढ़ाते हुए मैं उससे चिपक कर लेट गया उसकी कमर मेरी ओर था.
मम्मी के कमर को और जोर से पकड़ कर चिपकने लगा. जिससे मेरा लंड उसके बदन की खुशबू और गांड के गर्मी से खड़ा होने लगा. धीरे से चादर के अंदर हाथ डालकर उसकी साड़ी को ऊपर उठाने लगा, वो अभी भी नींद में थी.
मैंने सोचा क्यों ना मम्मी को थोड़ा आराम दिया जाए तो मैं उसके नंगे जांघों को सहलाने और दबाने लगा जिससे उसे दिन भर की थकान से राहत मिल जाए और सहलाता सहलाता धीरे ऊपर अपने हाथ को ले जाकर उसकी पैंटी में घुसाने लगा और फिर उसकी कमर को भी सहलाने लगा लेकिन जब मैं अपना हाथ धीरे से उसकी चूत की तरफ बढ़ाया तभी वो जाग गई और डर के मारे मेरे हाथ को दूर करने लगी क्योंकि संगीता उसके बगल में ही सोई थी.
तो मैंने अपने हाथों से उसके हाथ को पकड़ते हुए यह सांत्वना देने की कोशिश की की वो निश्चित रहे संगीता को कुछ नहीं पता चलेगा. मैंने उसे चादर से ढक रखा था. थोड़ी देर बाद हम दोनों के हाथों के जकड़न धीरे-धीरे छूटने लगा. मेरा मुंह उसके कान के पास और बदन उसके बदन से सटा हुआ था फिर मैंने धीरे-धीरे उसके जघन (चूत के बालों वाले हिस्से जिसे झांट भी कहते हैं) जिस पर अभी बहुत छोटे-छोटे बाल उगे थे क्योंकि उसने कुछ दिन पहले ही शेविंग किया था. मैंने उस हिस्से को सहलाना शुरू किया तो उसने अपने हाथ से मेरे हाथ को छेड़ा तब मैं फिर से उसके हाथ को पकड़ कर उसी के हाथ से जघन को सहलाना शुरू कर दिया.
उसके लिए यह पल काफी कामुक था क्योंकि उसका बेटा उसी के हाथ से उसका हस्तमैथुन करवा रहा था. वो इस चीज के लिए और खुलकर राजी हो जाए इसके लिए मैंने उसके कान को धीरे-धीरे चाटना शुरू कर दिया. उसके हाथ को इशारा करते हुए नीचे उसकी चूत के उस मुलायम चूत के दाने पर ले जाकर सहलाने लगा.
जिससे उसकी सांस थोड़ी बढ़ गई यह देख उसने अपने दूसरे हाथ से अपना मुंह बंद कर लिया कि किसी तरह की आवाज ना होगा ना हो पाए.
वो भी इस हस्तमैथुन का आनंद लेने लगी. उसका चूत भी बहुत गीला हो चुका था. मम्मी की छाती उत्तेजना के मारे फूल रही थी. मैं चाहता था वो पापा के जाने का गम भूल जाए और ऐसा ही हो रहा था.
मैं: (बहुत धीरे से उसके कान में) मम्मी दूधू पिलाओ ना...
मेरी मांग वैसे ही थी जैसे किसी छोटे बच्चे की. मेरे इस नटखट तरीके को समझते हुए उसने धीरे से अपने हाथ से मेरी जांघों पर एक चटकी मारी.
मैं: प्लीज पीला भी दो.
लेकिन फिर वो मेरे तरफ मुड़ गई उसकी मुड़ते ही मैं उसके रसीले होठों को चूमने लगा. और एक हाथ से उसकी चूत को सहलाना जारी रखा.
इन सब के बीच उसने मासूमियत से अपने ब्लाउज का हुक खोलते हुए अपने स्तन को बाहर निकाल अपनी चूची मेरे मुंह की तरफ देने लगी. मैं देर ना करते हुए तुरंत उसकी चूची को अपने मुंह में भर लिया और ऐसे चूसने लगा जैसे कोई अमृत मिल गया है. इससे उसकी सांसे और तेज होने लगी. मुझे बाहों में जकड़ मेरे बाल को सहलाने लगी जैसे एक माँ अपने बच्चे को दूध पिलाती है.
मैंने अपने चूसते हुए होठों से ही इशारा करके दूसरी चूची भी बाहर निकलने को कहा. वो यह बात समझते हुए ब्लाउज के हुक को पूरा खोल दिया और ब्रा में से दूसरी चूची भी बाहर निकाल दी. लेकिन मैं असमंजस में था की किस चूची को ज्यादा प्यार दूं? तो बारी-बारी से दोनों चूचियों को चूसने लगा और उसकी गर्म सांसे मेरे चेहरे पर पड रही थी.
एक तरह से मैं उसके पूरे बदन को छेड़ रहा था- उसकी रसीली चूचियां मेरे मुंह में और नीचे गीली हो चुकी चूत और हम दोनों की गरम शरीर हवस की आग में तप रहे थे और बाहर वो तूफानी बारिश. मैंने अपना लंड निकलते हुए उसकी चूत से रगड़ने लगा. लेकिन क्योंकि संगीता वहीं पर थी, उसका विरोध देखने को मिला- वो अपने दोनों जांघों को दबाने लगी. मुझे फिर से उसे आश्वासन देना होगा, मैंने अपने हाथों से थोड़ा जोर लगाकर उसकी जांघे खोलने की कोशिश की तो उसने भी थोड़ी सहमति दिखाई.
उसकी दोनों गीली चूचियां मेरे सीने से लगी थी और मैंने उसके होठों को चूमते हुए अपना लंड चूत मे घुसाने की पूरी कोशिश कर रहा था. लंड थोड़ा अंदर जाते ही उसने मेरे होठों को अपने दांत से दबा लिया. मैं भी उसकी बेचैनी समझते हुए धक्का देना शुरू कर दिया और लंड
चूत में धकेल कर पूरी तरह से अंदर बाहर करने लगा.
कुछ देर के इस संभोग के बाद उसकी पैंटी परेशान करने लगी मैंने हाथों को इशारा करते हुए उसे पकड़ने को कहा. मम्मी ने भी सहयोग दिखाते हुए अपनी पैंटी को एक तरफ खींच के रखा था. कुछ देर आगे करने के बाद मैंने उसे फिर से पीछे मुड़ने को कहा था जिससे मैं उसके कमर को पकड़ के और अच्छे से चोद सकूं.
लेकिन वो तैयार नहीं हो रही थी उसे डर था कि फिर मैं जोश में होश खो बैठूंगा तो मैं ही बीच में चला गया लेकिन संगीता जाग गई. यह हम दोनों के लिए खतरे की निशानी थी. मम्मी ने जल्दी से अपनी अपनी साड़ी से स्तनों को ढकते और संभालते हुए,
मम्मी: क्या हुआ बेटा?
संगीता: कुछ नहीं मम्मी, टॉयलेट जाना था.
मम्मी: अच्छा ठीक है जाकर आ जाओ.
संगीता के वहां से उठकर जाते ही मम्मी ने जल्दी से अपने ब्लाउज की हुक बंद की, मेरा लंड उसकी दोनों जांघों के बीच फंसा हुआ था.
मम्मी: छोड़ छोड़...कुछ नहीं करना है अब.
मैं: क्या मम्मी डरती हो इतनी छोटी-छोटी बातों से.
मम्मी: तू तो पागल है मुझे पागल मत कर.
मैं: चलो लगी शर्त हम इसी पोज में लेटे रहते हैं, संगीता को कुछ नहीं पता चलेगा.
मम्मी: नहीं नहीं...मैं यह सब नहीं करने वाली.
मैं: अरे मम्मी कभी तो रिस्क लेना सीखो. शर्त तो लगाओ.
मम्मी: और अगर शर्त हार गई तो मेरी तो इज्जत तार तार हो जाएगी.
मैं: कुछ नहीं होगा मैं सोने का नाटक कर लेता हूं और वैसे भी चादर आपकी कमर तक है ही ब्लाउज बंद कर ही रखा है फिर डर कैसा? लेकिन अगर मैं शर्त जीत गया तो फिर क्या?
वो चिंता भरी नजरों से देख रही थी.
मम्मी: इतना सब कुछ हो चुका है अब क्या चाहिए तुझे?
मैं: अच्छा ठीक है बता देता हूं. आप मेरा मुंह में लोगी. मम्मी: नीच कहीं के शर्म नहीं आती इतनी गंदी बात करते हुए, कुछ नहीं करने वाली मैं.
मैं उसे और गुस्सा नहीं दिलाना चाहता था.
मैं: अच्छा ठीक है मत करना पर शर्त तो लगा कर देख लो.
हम इस पोजीशन में सोए हुए थे, मैं भी सोने का नाटक कर रहा था की संगीता वापस आई और ध्यान न देते हुए लाइट बंद किया और वापस बेड पर लेट गई. लाइट बंद होते ही मैंने उसके कमर की चमड़ी को दबाते हुए इशारा दिया कि मैं शर्त जीत चुका हूं.
हम दोनों शांत पड़े हुए थे इस इंतजार में कब संगीता फिर से सोए इस दौरान में उसकी चूत को सहला रहा था क्योंकि मैं नहीं चाहता था मम्मी की गर्मी शांत हो. इस वजह से उसका चूत अभी भी गीला था, थोड़ी देर बाद जब संगीता के सोने की करने की आवाज आई. मैंने उसके गांड से चिपकते हुए अपना लंड फिर से अंदर घुसा दिया उसने भी मेरे हाथों को पकड़ा हुआ था.
लंड अंदर घुसते ही हम दोनों के हाथों की पकड़ और मजबूत हो गई. मैं बिना आवाज किए अपनी कमर को लहराता हुआ उसकी चूत में लंड को धकेलता रहा. एक बार फिर से यह वो पल बनने जा रहा था जब हम अपनी चरम सीमा पर थे थोड़ी देर और झटके चलने के बाद हम दोनों ने चरमसुख पा लिया. जैसे-जैसे मेरा वीर्य उसकी चूत में छूट रहा था वो भी अपनी चूत को सिकोड़ने की कोशिश कर रही थी.
कुछ देर वैसे ही सोए रहने के बाद मम्मी ने अपनी चूत को मेरे लंड से अलग किया और मेरे पैंट की तरफ हाथ बढ़ाकर लंड को ढक दिया और साड़ी नीचे करके सो गई.
अगले दिन सुबह मामा हमें लेने आने वाले थे.
मम्मी: फटाफट तैयार हो जाओ सब रमेश(मामा) आता ही होगा.
संगीता बाथरूम में मुंह धोने के लिए गइ तभी मैं मम्मी को बालकनी में ले गया.
मैं: मुझे माफ कर दो, कल रात मुझे ऐसा (मुंह में देने वाली बात) नहीं कहना चाहिए था, सॉरी.
मम्मी: गलती करने के बाद फिर माफी मांगता है. तुझे पता है, आज तक तेरे पापा ने कभी इस तरह से मुझसे बात नहीं किया.
मैं: अच्छा अब नहीं होगा.
मम्मी: मैं सिर्फ तेरी खुशी के लिए इतना सब कुछ कर ली और तु अपनी माँ को इज्जत देना तो सीख.
मैं: सॉरी ना मम्मी, गलती हो गई.
मम्मी: अब नहीं करेगा ना? अच्छा सुन और दूसरी गलती जो तूने की है वो तो फिर से भूल गया.
मैं: नहीं मुझे याद है, मैं कहने ही वाला था की मैंने अपना पानी आपके बुर में गिरा दिया था.
मम्मी: चुप हो जाना नालायक...पूरी दुनिया को बताएगा क्या? जो दवा बता रही हूं याद से रास्ते में फार्मेसी से ले लेना.
मैं: पर सब साथ में होंगे तो कैसे लूंगा?
मम्मी: वो मैं देख लूंगी बस दवाई अपने पास रखना और घर जाकर मुझे दे देना.
मम्मी के यह सब कहने के बाद मैं उसे चूमने लगा पर क्योंकि बाहर लोग ना देख ले मम्मी ने तुरंत मुझे हटाते हुए,
मम्मी: बस बस अभी यहां शुरू मत हो जा, संगीता आती ही होगी.
जैसा कि मामा जी हमें लेने आए बारिश बहुत तेज थी. संगीता आगे बैठ गई और मैं मम्मी के साथ पीछे उनके कार में. हम कुछ दूर चल थे कि मेडिकल शॉप दिखते ही मैंने मम्मी को इशारा किया.
मम्मी: राहुल तेरे सर में तो दर्द था ना, जा जाकर मेडिकल स्टोर से दवा ले ले.
मामा: क्या हुआ दीदी राहुल को?
मम्मी: कुछ नहीं सर में दर्द हो गया है, दवा ले लेगा तो सही रहेगा.
मामा: हां क्यों नहीं मैं गाड़ी रोकता हूं जाओ जल्दी.
मैं भी भाग कर स्टोर पर गया और उसे गर्भ निरोधक दवाई और कंडोम का पैकेट चुपचाप जेब में रखकर वापस आ गया. क्योंकि मैं मम्मी के सेहत के साथ खिलवाड़ करना नहीं चाहता था. घर पहुंचे तो मम्मी ने मामा को चाय बनाकर दिया.
मम्मी: रमेश खाना खाकर ही जाओ.
मामा: नहीं नहीं दीदी बहुत लेट हो रहा है और बारिश तो देखो, घर पहुंचते पहुंचते रात हो जाएगा फिर कभी... और आप लोग कब आ रहे हैं हमारे यहां?
संगीता: क्यों मामू कुछ स्पेशल है क्या?
मामा: स्पेशल होगा तभी आओगी?
संगीता: नहीं आप जब बोलो तब आ जाएंगे...
मामा: पिछले बार तो आपने वादा किया था दीदी आने का तब तो जीजा जी की तबीयत ठीक नहीं थी पर अब तो आ सकती हो वो भी बाहर गए हैं. हम घूमने चलेंगे और इसी बहाने कुछ मंदिर भी घूम लेंगे और भी बहुत सारी अच्छी जगह.
मम्मी: हां सोच तो रही हूं.
मैं: हां मम्मी चलो ना गांव घूमने का मजा ही कुछ और है. मम्मी: हां ठीक है पर यह बारिश तो रुके पहले.
मामा: ठीक है, देखिए आप लोग कुछ दिन में मौसम अच्छा रहता है तो बताइए मैं लेने भी आ जाऊंगा.
मम्मी: नहीं रमेश तकलीफ की कोई जरूरत नहीं है हम आ जाएंगे बस मौसम थोड़ा अच्छा हो जाए.
और मामा अपने घर को जाने लगे. मैं भी खुश था और इंतजार कर रहा था कि जल्दी से मौसम अच्छा हो हम भी मामा के घर जा सके क्योंकि पिछले बार वही जगह ऐसी थी जहां मैंने मम्मी के साथ एक अच्छा वक्त गुजारा था.
संगीता भी नहाने के लिए चली गई और मम्मी उसे गौर कर रही थी कब वो जाए.
मम्मी: दवाई मिला कि नहीं?
मैं: कैसे नहीं मिलेगा यह लो...
मेरे दवाई देते ही उसके चेहरे पर एक सुकून था उसने उसे तुरंत छुपाते हुए ब्लाउज में डाल लिया.
मम्मी: मुझे तो डर है मैं कितनी बार यह सब दवाई खाऊंगी...
मैं: फिक्र मत करो मैंने कंडोम ले लिया है अब से हम उसी का इस्तेमाल करेंगे मैं आपको तकलीफ नहीं देना चाहता.
यह सुन, मम्मी भावुक हो गई और मुझे गले से लगा लिया.