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अध्याय 20: नया मेहमान और भविष्य की नींव
टोक्यो की ऐतिहासिक जीत को बीते एक साल से ज्यादा का समय हो चुका था। साल 2027 की सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। मुंबई में दिल्ली जैसी कड़क ठंड तो नहीं होती, लेकिन अरब सागर से आने वाली हवाओं में एक सुखद और ठंडी सिहरन जरूर घुल गई थी।
कबीर और अवंतिका की जिंदगी अब एक नए और बेहद खूबसूरत मोड़ पर खड़ी थी। बांद्रा वाले घर का जो छोटा कमरा कभी कबीर के फौजी सामान और बॉक्सिंग गियर्स से भरा रहता था, उसे पिछले कुछ हफ्तों में दोबारा पेंट किया गया था। दीवारों पर अब हल्के नीले और पीले रंग के कार्टून्स मुस्कुरा रहे थे, और कमरे के बीचों-बीच एक छोटा, खूबसूरत पालना रखा था।
जी हाँ, अवंतिका गर्भवती थीं और उनके जीवन में एक नन्हा मेहमान आने वाला था।
शाम के वक्त, कबीर बालकनी में बैठा लकड़ी के एक छोटे खिलौने को तराश रहा था। फौज और मार्शल आर्ट्स में रहने के कारण उसके हाथ बेहद सख्त थे, लेकिन इस वक्त वह उस लकड़ी के टुकड़े पर इतनी नजाकत से काम कर रहा था मानो दुनिया की सबसे नाजुक चीज संभाल रहा हो।
अवंतिका धीरे-धीरे चलती हुई बालकनी में आई। उसके चेहरे पर गर्भावस्था का एक अलौकिक निखार था। उसने कबीर के कंधे पर हाथ रखा, "अभी से खिलौने बनाने शुरू कर दिए? डॉक्टर ने कहा है कि अभी कम से कम दो हफ्ते बाकी हैं।"
कबीर ने उठकर उसे आराम से कुर्सी पर बैठाया और उसके पैरों पर एक गर्म शॉल डाल दी। "तैयारी पहले से पूरी होनी चाहिए, चीफ। फौजी अनुशासन।"
अवंतिका हंस पड़ी। उसने कबीर का हाथ अपने उभरे हुए पेट पर रखा। जैसे ही कबीर की हथेलियों ने अवंतिका के पेट को छुआ, अंदर से एक हल्की सी हलचल महसूस हुई—नन्हे बच्चे की एक नन्हीं लात। কबीर की आँखें चौंक गईं और फिर उनमें ममता का एक ऐसा सैलाब उमड़ आया जिसकी कल्पना उसने अपने जीवन के सबसे अंधकारमय दिनों में कभी नहीं की थी।
"देख रहे हो? अभी से अपने पिता की तरह किक मारना सीख रहा है," अवंतिका ने शरारत से कहा।
कबीर ने झुककर अवंतिका के पेट को चूमा। "मैं इसे सिर्फ लड़ना नहीं सिखाऊंगा, अवंतिका। मैं इसे इस दुनिया से प्यार करना सिखाऊंगा। जो मैंने बहुत देर से सीखा, वह मैं इसे पहले दिन से दूंगा।"
टोक्यो की ऐतिहासिक जीत को बीते एक साल से ज्यादा का समय हो चुका था। साल 2027 की सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। मुंबई में दिल्ली जैसी कड़क ठंड तो नहीं होती, लेकिन अरब सागर से आने वाली हवाओं में एक सुखद और ठंडी सिहरन जरूर घुल गई थी।
कबीर और अवंतिका की जिंदगी अब एक नए और बेहद खूबसूरत मोड़ पर खड़ी थी। बांद्रा वाले घर का जो छोटा कमरा कभी कबीर के फौजी सामान और बॉक्सिंग गियर्स से भरा रहता था, उसे पिछले कुछ हफ्तों में दोबारा पेंट किया गया था। दीवारों पर अब हल्के नीले और पीले रंग के कार्टून्स मुस्कुरा रहे थे, और कमरे के बीचों-बीच एक छोटा, खूबसूरत पालना रखा था।
जी हाँ, अवंतिका गर्भवती थीं और उनके जीवन में एक नन्हा मेहमान आने वाला था।
शाम के वक्त, कबीर बालकनी में बैठा लकड़ी के एक छोटे खिलौने को तराश रहा था। फौज और मार्शल आर्ट्स में रहने के कारण उसके हाथ बेहद सख्त थे, लेकिन इस वक्त वह उस लकड़ी के टुकड़े पर इतनी नजाकत से काम कर रहा था मानो दुनिया की सबसे नाजुक चीज संभाल रहा हो।
अवंतिका धीरे-धीरे चलती हुई बालकनी में आई। उसके चेहरे पर गर्भावस्था का एक अलौकिक निखार था। उसने कबीर के कंधे पर हाथ रखा, "अभी से खिलौने बनाने शुरू कर दिए? डॉक्टर ने कहा है कि अभी कम से कम दो हफ्ते बाकी हैं।"
कबीर ने उठकर उसे आराम से कुर्सी पर बैठाया और उसके पैरों पर एक गर्म शॉल डाल दी। "तैयारी पहले से पूरी होनी चाहिए, चीफ। फौजी अनुशासन।"
अवंतिका हंस पड़ी। उसने कबीर का हाथ अपने उभरे हुए पेट पर रखा। जैसे ही कबीर की हथेलियों ने अवंतिका के पेट को छुआ, अंदर से एक हल्की सी हलचल महसूस हुई—नन्हे बच्चे की एक नन्हीं लात। কबीर की आँखें चौंक गईं और फिर उनमें ममता का एक ऐसा सैलाब उमड़ आया जिसकी कल्पना उसने अपने जीवन के सबसे अंधकारमय दिनों में कभी नहीं की थी।
"देख रहे हो? अभी से अपने पिता की तरह किक मारना सीख रहा है," अवंतिका ने शरारत से कहा।
कबीर ने झुककर अवंतिका के पेट को चूमा। "मैं इसे सिर्फ लड़ना नहीं सिखाऊंगा, अवंतिका। मैं इसे इस दुनिया से प्यार करना सिखाऊंगा। जो मैंने बहुत देर से सीखा, वह मैं इसे पहले दिन से दूंगा।"