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Fantasy The Fog and the Sun

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Ayush2017

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अध्याय 20: नया मेहमान और भविष्य की नींव

टोक्यो की ऐतिहासिक जीत को बीते एक साल से ज्यादा का समय हो चुका था। साल 2027 की सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। मुंबई में दिल्ली जैसी कड़क ठंड तो नहीं होती, लेकिन अरब सागर से आने वाली हवाओं में एक सुखद और ठंडी सिहरन जरूर घुल गई थी।

कबीर और अवंतिका की जिंदगी अब एक नए और बेहद खूबसूरत मोड़ पर खड़ी थी। बांद्रा वाले घर का जो छोटा कमरा कभी कबीर के फौजी सामान और बॉक्सिंग गियर्स से भरा रहता था, उसे पिछले कुछ हफ्तों में दोबारा पेंट किया गया था। दीवारों पर अब हल्के नीले और पीले रंग के कार्टून्स मुस्कुरा रहे थे, और कमरे के बीचों-बीच एक छोटा, खूबसूरत पालना रखा था।

जी हाँ, अवंतिका गर्भवती थीं और उनके जीवन में एक नन्हा मेहमान आने वाला था।

शाम के वक्त, कबीर बालकनी में बैठा लकड़ी के एक छोटे खिलौने को तराश रहा था। फौज और मार्शल आर्ट्स में रहने के कारण उसके हाथ बेहद सख्त थे, लेकिन इस वक्त वह उस लकड़ी के टुकड़े पर इतनी नजाकत से काम कर रहा था मानो दुनिया की सबसे नाजुक चीज संभाल रहा हो।

अवंतिका धीरे-धीरे चलती हुई बालकनी में आई। उसके चेहरे पर गर्भावस्था का एक अलौकिक निखार था। उसने कबीर के कंधे पर हाथ रखा, "अभी से खिलौने बनाने शुरू कर दिए? डॉक्टर ने कहा है कि अभी कम से कम दो हफ्ते बाकी हैं।"

कबीर ने उठकर उसे आराम से कुर्सी पर बैठाया और उसके पैरों पर एक गर्म शॉल डाल दी। "तैयारी पहले से पूरी होनी चाहिए, चीफ। फौजी अनुशासन।"

अवंतिका हंस पड़ी। उसने कबीर का हाथ अपने उभरे हुए पेट पर रखा। जैसे ही कबीर की हथेलियों ने अवंतिका के पेट को छुआ, अंदर से एक हल्की सी हलचल महसूस हुई—नन्हे बच्चे की एक नन्हीं लात। কबीर की आँखें चौंक गईं और फिर उनमें ममता का एक ऐसा सैलाब उमड़ आया जिसकी कल्पना उसने अपने जीवन के सबसे अंधकारमय दिनों में कभी नहीं की थी।

"देख रहे हो? अभी से अपने पिता की तरह किक मारना सीख रहा है," अवंतिका ने शरारत से कहा।

कबीर ने झुककर अवंतिका के पेट को चूमा। "मैं इसे सिर्फ लड़ना नहीं सिखाऊंगा, अवंतिका। मैं इसे इस दुनिया से प्यार करना सिखाऊंगा। जो मैंने बहुत देर से सीखा, वह मैं इसे पहले दिन से दूंगा।"
 

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अध्याय 21: 'उम्मीद' का नया चेहरा

कबीर की गैर-मौजूदगी में भी 'उम्मीद' सेंटर अब एक सुचारू मशीन की तरह चल रहा था। आकाश, जो टोक्यो में गोल्ड मेडल जीतकर लौटा था, अब सत्रह साल का हो चुका था। वह न सिर्फ अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था, बल्कि अब वह कबीर का सबसे भरोसेमंद जूनियर कोच भी बन चुका था। अंजलि भी लड़कियों के नए बैच को लीड कर रही थी।

एक दोपहर, कबीर सेंटर का मुआयना करने पहुंचा। अब वहां सिर्फ बच्चे ही नहीं आते थे, बल्कि पास की बस्तियों की कई महिलाएं भी शाम के वक्त डोमेस्टिक वायलेंस (घरेलू हिंसा) से अपनी रक्षा करने के लिए आत्मरक्षा के गुर सीखने आने लगी थीं।

"कबीर भाई!" आकाश दौड़कर उसके पास आया और उसके पैर छुए। "देखिए, इस महीने हमारे सेंटर से दस और बच्चों का सिलेक्शन स्टेट लेवल चैंपियनशिप के लिए हुआ है।"

कबीर ने आकाश की पीठ थपथपाई। "बहुत अच्छे, आकाश। लेकिन याद रखना, मेडल से ज्यादा जरूरी यह है कि जो बच्चे यहाँ आ रहे हैं, वे बाहर जाकर समाज में एक अच्छे नागरिक बनें। किसी कमजोर पर हाथ नहीं उठाना है, हमेशा मजलूम की ढाल बनना है।"

"जी भाई, मुझे आपकी कही एक-एक बात याद है," आकाश ने गर्व से कहा।

कबीर ने पूरे हॉल को देखा। जहाँ कभी जंग लगा लोहा और सन्नाटा था, आज वहां बच्चों की खिलखिलाहट, आत्मविश्वास और उम्मीद की गूंज थी। उसने मन ही मन सोचा कि डिप्रेशन का वो दानव जो उसे कभी खा जाना चाहता था, आज इन साठ-सत्तर बच्चों के भविष्य के आगे कितना बौना साबित हो चुका था।
 

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अध्याय 22: अस्पताल का वो कमरा और पहली चीख

दिसंबर की एक रात, ठीक ३:०० बजे, अवंतिका को लेबर पेन शुरू हुआ। कबीर, जो हमेशा की तरह ऐसे आपातकालीन हालातों के लिए तैयार रहता था, ने दस मिनट के भीतर गाड़ी निकाली और अवंतिका को लेकर लीलावती अस्पताल पहुंचा।

अस्पताल का गलियारा शांत था। कर्नल राणा भी खबर मिलते ही तड़के सुबह अस्पताल पहुंच गए थे। कबीर ऑपरेशन थिएटर के बाहर लगातार चक्कर काट रहा था। उसने अपनी जिंदगी में बड़े से बड़े ऑपरेशन्स झेले थे, दुश्मनों की गोलियों का सामना किया था, लेकिन इस वक्त जो घबराहट और बेचैनी उसके चेहरे पर थी, वह कर्नल राणा ने पहले कभी नहीं देखी थी।

"शांत हो जाओ, कैप्टन," कर्नल राणा ने हंसते हुए उसके कंधे को पकड़ा। "तुमने दुश्मनों के बंकर उड़ाए हैं, यहाँ क्यों कांप रहे हो?"

"सर... यह अलग है। मुझे डर लग रहा है," कबीर ने ईमानदारी से स्वीकार किया।

तभी, सुबह के ठीक ५:४२ बजे, ऑपरेशन थिएटर का भारी दरवाजा खुला और अंदर से एक नन्हीं, तीखी और मासूम चीख गूंज उठी। एक नवजात बच्चे के रोने की आवाज।

कबीर के कदम वहीं ठिठक गए। नर्स बाहर आई, उसके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान थी। "बधाई हो मिस्टर सिंह! बेटी हुई है। माँ और बच्ची दोनों बिल्कुल स्वस्थ हैं।"

'बेटी।' यह शब्द कबीर के कानों में किसी दिव्य संगीत की तरह गूंज गया।

जब कबीर को अंदर जाने की इजाजत मिली, तो उसने देखा कि अवंतिका बेड पर लेटी हुई थी, थकी हुई लेकिन बेहद खुश। उसकी बाहों में एक छोटी सी, गुलाबी मखमली चादर में लिपटी हुई एक नन्हीं परी थी। उसकी आँखें बंद थीं और उसकी नन्हीं उंगलियां हवा में कुछ तलाश रही थीं।

कबीर धीरे से बेड के पास बैठा। अवंतिका ने मुस्कुराकर बच्ची को उसकी तरफ़ बढ़ाया। कबीर ने जब अपनी बड़ी, सख्त और चोटों के निशानों से भरी हथेलियों में उस नन्हीं जान को उठाया, तो उसकी आँखों से आंसुओं का बांध टूट गया। यह पहली बार था जब कबीर रो रहा था, लेकिन ये दुख के आंसू नहीं थे—यह एक पिता के जनम के आंसू थे।

उस नन्हीं बच्ची ने अनजाने में ही कबीर की सबसे छोटी उंगली को अपनी पूरी ताकत से थाम लिया।

"इसका नाम क्या रखेंगे, कबीर?" अवंतिका ने बेहद कमजोर लेकिन मीठी आवाज में पूछा।
कबीर ने अपनी बेटी के नन्हे माथे को चूमा और अवंतिका की तरफ़ देखा। "इसका नाम होगा... 'दिया'। क्योंकि इसने हमारी जिंदगी के बचे-खुचे अंधेरे को भी हमेशा के लिए मिटा दिया है।"
 

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अध्याय 23: अनंत प्रकाश

सवा साल और बीत गया। अब साल 2028 का अंत आ चुका था।

मरीन ड्राइव की वही जानी-पहचानी शाम थी। समंदर की लहरें हमेशा की तरह टेट्रापॉड्स से टकराकर अपना पुराना राग गा रही थीं। लेकिन इस बार फुटपाथ पर टहलने वाले सिर्फ दो लोग नहीं थे।

कबीर अपनी मजबूत बाहों में एक साल की नन्हीं 'दिया' को उठाए हुए था, जो लाल रंग की छोटी सी फ्रॉक पहने हवा में उड़ते गुब्बारों को देखकर ताली बजा रही थी। उसके बगल में अवंतिका चल रही थी, जिसका हाथ हमेशा की तरह कबीर के हाथ में लॉक्ड था।

कर्नल राणा पास ही के एक बेंच पर बैठे उन तीनों को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

"कबीर... डै-डा..." दिया ने अपनी तुतली आवाज में कबीर के गाल को छुआ।

कबीर ने उसे हवा में उछाला और फिर अपनी छाती से लगा लिया। उसने अवंतिका की तरफ़ देखा, जिसकी आँखों में डूबते सूरज की अंबर जैसी रोशनी चमक रही थी।

कबीर को याद आया कि कुछ साल पहले वह इसी समंदर के किनारे खड़ा होकर खुद को खत्म करने के बारे में सोचता था। उसे लगता था कि वह एक असफल सिपाही है जिसके हिस्से में सिर्फ अंधेरा बचा है। लेकिन आज, उसके पास एक अधूरा अतीत नहीं, बल्कि एक पूरा और मुकम्मल भविष्य था। उसने अपनी बीमारी से लड़ना सीखा, उसने प्यार को स्वीकार करना सीखा, और सबसे बढ़कर—उसने खुद को माफ करना सीखा।

सूरज अब पूरी तरह से अरब सागर की लहरों में समा चुका था, लेकिन मरीन ड्राइव की स्ट्रीट लाइट्स और कबीर के दिल के भीतर की रोशनी इतनी पुख्ता थी कि अब वहां दोबारा कभी कोई साया अपनी परछाई नहीं डाल सकता था।

कबीर ने अपनी पत्नी और अपनी बेटी को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया। साए से शुरू हुआ यह सफर अब एक शाश्वत, अनंत और बेहद खूबसूरत सवेरे में तब्दील हो चुका था।

शब्दांत - पूर्णतः समाप्त
 
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