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अध्याय 10: अतीत की एक आखिरी दस्तक
उसी शाम, कबीर और अवंतिका कर्नल राणा के घर पहुंचे। राणा साहब अब पूरी तरह से ठीक हो चुके थे, हालांकि भायखला की घटना के बाद उन्होंने बांद्रा में एक शांत और हरियाली वाले इलाके में अपना फ्लैट ले लिया था। वह बालकनी में बैठे पुरानी यादों की एक एल्बम देख रहे थे जब कबीर अंदर आया।
"आओ, कबीर। आओ, बेटा," राणा साहब ने मुस्कुराते हुए अपनी छड़ी को एक तरफ़ रखा। "अवंतिका, तुम कैसी हो?"
"मैं बिल्कुल ठीक हूँ, अंकल," अवंतिका ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
राणा साहब ने कबीर को ऊपर से नीचे तक देखा। कबीर का चेहरा अब शांत था, उसकी आँखों में वह भयानक तनाव और बेचैनी नहीं थी जो कर्नल ने सालों से देखी थी। "कबीर, तुम्हारी थेरेपिस्ट डॉ. अंजलि का कल मेरे पास फोन आया था।"
कबीर ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "जी सर? क्या कहा उन्होंने?"
राणा साहब ने कबीर का कंधा थपथपाया, "उन्होंने कहा कि तुम बहुत तेजी से रिकवर कर रहे हो। जो इंसान कभी अपने अंदर के दर्द को लफ्जों में बयां नहीं कर पाता था, वह अब खुलकर बात करता है। कबीर, मुझे तुम पर बहुत फख्र है। तुमने अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।"
कबीर की आँखें थोड़ी नम हो गईं। उसने कहा, "सर, जब तक दिल में कोई मकसद न हो, तब तक इंसान सिर्फ एक जिंदा लाश की तरह होता है। अवंतिका और इन बच्चों ने मुझे वह मकसद दिया है।"
तभी राणा साहब का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया। उन्होंने टेबल पर रखा एक सील बंद सरकारी लिफाफा कबीर की तरफ़ बढ़ाया। "यह आज सुबह दिल्ली से आया है, कबीर। गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) से।"
कबीर ने चौंककर लिफाफा लिया और उसे खोला। अंदर एक आधिकारिक पत्र था। भारत सरकार कबीर की स्पेशल फोर्सेज की पुरानी सेवाओं और हाल ही में अंडरवर्ल्ड के सिंडिकेट को खत्म करने में दिखाए गए अदम्य साहस के लिए उसे 'कीर्ति चक्र' (शौर्य पुरस्कार) से सम्मानित करना चाहती थी। अगले महीने राष्ट्रपति भवन में यह समारोह होना तय हुआ था।
अवंतिका ने पत्र पढ़ा और उसकी आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए। "कबीर! यह तो अद्भुत है! तुम्हें वह सम्मान मिल रहा है जिसके तुम हकदार हो।"
कबीर ने उस मेडल के लेटर को देखा। कुछ महीने पहले तक, शायद वह इस सम्मान को स्वीकार करने से मना कर देता, क्योंकि उसका मानना था कि वह अपने साथियों को नहीं बचा पाया। लेकिन आज, उसे समझ आ गया था कि अतीत को बदला नहीं जा सकता, पर भविष्य को सुरक्षित जरूर किया जा सकता है।
"मैं जाऊंगा, सर," कबीर ने राणा साहब की आँखों में देखते हुए कहा। "मैं यह मेडल अपने उन साथियों के नाम पर लूंगा जो वापस नहीं आ पाए।"
राणा साहब ने मुस्कुराते हुए सैल्यूट किया, "दैट्स लाइक माई बॉय।"
उसी शाम, कबीर और अवंतिका कर्नल राणा के घर पहुंचे। राणा साहब अब पूरी तरह से ठीक हो चुके थे, हालांकि भायखला की घटना के बाद उन्होंने बांद्रा में एक शांत और हरियाली वाले इलाके में अपना फ्लैट ले लिया था। वह बालकनी में बैठे पुरानी यादों की एक एल्बम देख रहे थे जब कबीर अंदर आया।
"आओ, कबीर। आओ, बेटा," राणा साहब ने मुस्कुराते हुए अपनी छड़ी को एक तरफ़ रखा। "अवंतिका, तुम कैसी हो?"
"मैं बिल्कुल ठीक हूँ, अंकल," अवंतिका ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
राणा साहब ने कबीर को ऊपर से नीचे तक देखा। कबीर का चेहरा अब शांत था, उसकी आँखों में वह भयानक तनाव और बेचैनी नहीं थी जो कर्नल ने सालों से देखी थी। "कबीर, तुम्हारी थेरेपिस्ट डॉ. अंजलि का कल मेरे पास फोन आया था।"
कबीर ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "जी सर? क्या कहा उन्होंने?"
राणा साहब ने कबीर का कंधा थपथपाया, "उन्होंने कहा कि तुम बहुत तेजी से रिकवर कर रहे हो। जो इंसान कभी अपने अंदर के दर्द को लफ्जों में बयां नहीं कर पाता था, वह अब खुलकर बात करता है। कबीर, मुझे तुम पर बहुत फख्र है। तुमने अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।"
कबीर की आँखें थोड़ी नम हो गईं। उसने कहा, "सर, जब तक दिल में कोई मकसद न हो, तब तक इंसान सिर्फ एक जिंदा लाश की तरह होता है। अवंतिका और इन बच्चों ने मुझे वह मकसद दिया है।"
तभी राणा साहब का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया। उन्होंने टेबल पर रखा एक सील बंद सरकारी लिफाफा कबीर की तरफ़ बढ़ाया। "यह आज सुबह दिल्ली से आया है, कबीर। गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) से।"
कबीर ने चौंककर लिफाफा लिया और उसे खोला। अंदर एक आधिकारिक पत्र था। भारत सरकार कबीर की स्पेशल फोर्सेज की पुरानी सेवाओं और हाल ही में अंडरवर्ल्ड के सिंडिकेट को खत्म करने में दिखाए गए अदम्य साहस के लिए उसे 'कीर्ति चक्र' (शौर्य पुरस्कार) से सम्मानित करना चाहती थी। अगले महीने राष्ट्रपति भवन में यह समारोह होना तय हुआ था।
अवंतिका ने पत्र पढ़ा और उसकी आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए। "कबीर! यह तो अद्भुत है! तुम्हें वह सम्मान मिल रहा है जिसके तुम हकदार हो।"
कबीर ने उस मेडल के लेटर को देखा। कुछ महीने पहले तक, शायद वह इस सम्मान को स्वीकार करने से मना कर देता, क्योंकि उसका मानना था कि वह अपने साथियों को नहीं बचा पाया। लेकिन आज, उसे समझ आ गया था कि अतीत को बदला नहीं जा सकता, पर भविष्य को सुरक्षित जरूर किया जा सकता है।
"मैं जाऊंगा, सर," कबीर ने राणा साहब की आँखों में देखते हुए कहा। "मैं यह मेडल अपने उन साथियों के नाम पर लूंगा जो वापस नहीं आ पाए।"
राणा साहब ने मुस्कुराते हुए सैल्यूट किया, "दैट्स लाइक माई बॉय।"