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Fantasy The Fog and the Sun

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Ayush2017

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अध्याय 10: अतीत की एक आखिरी दस्त

उसी शाम, कबीर और अवंतिका कर्नल राणा के घर पहुंचे। राणा साहब अब पूरी तरह से ठीक हो चुके थे, हालांकि भायखला की घटना के बाद उन्होंने बांद्रा में एक शांत और हरियाली वाले इलाके में अपना फ्लैट ले लिया था। वह बालकनी में बैठे पुरानी यादों की एक एल्बम देख रहे थे जब कबीर अंदर आया।

"आओ, कबीर। आओ, बेटा," राणा साहब ने मुस्कुराते हुए अपनी छड़ी को एक तरफ़ रखा। "अवंतिका, तुम कैसी हो?"

"मैं बिल्कुल ठीक हूँ, अंकल," अवंतिका ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया।

राणा साहब ने कबीर को ऊपर से नीचे तक देखा। कबीर का चेहरा अब शांत था, उसकी आँखों में वह भयानक तनाव और बेचैनी नहीं थी जो कर्नल ने सालों से देखी थी। "कबीर, तुम्हारी थेरेपिस्ट डॉ. अंजलि का कल मेरे पास फोन आया था।"

कबीर ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "जी सर? क्या कहा उन्होंने?"

राणा साहब ने कबीर का कंधा थपथपाया, "उन्होंने कहा कि तुम बहुत तेजी से रिकवर कर रहे हो। जो इंसान कभी अपने अंदर के दर्द को लफ्जों में बयां नहीं कर पाता था, वह अब खुलकर बात करता है। कबीर, मुझे तुम पर बहुत फख्र है। तुमने अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।"

कबीर की आँखें थोड़ी नम हो गईं। उसने कहा, "सर, जब तक दिल में कोई मकसद न हो, तब तक इंसान सिर्फ एक जिंदा लाश की तरह होता है। अवंतिका और इन बच्चों ने मुझे वह मकसद दिया है।"

तभी राणा साहब का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया। उन्होंने टेबल पर रखा एक सील बंद सरकारी लिफाफा कबीर की तरफ़ बढ़ाया। "यह आज सुबह दिल्ली से आया है, कबीर। गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) से।"

कबीर ने चौंककर लिफाफा लिया और उसे खोला। अंदर एक आधिकारिक पत्र था। भारत सरकार कबीर की स्पेशल फोर्सेज की पुरानी सेवाओं और हाल ही में अंडरवर्ल्ड के सिंडिकेट को खत्म करने में दिखाए गए अदम्य साहस के लिए उसे 'कीर्ति चक्र' (शौर्य पुरस्कार) से सम्मानित करना चाहती थी। अगले महीने राष्ट्रपति भवन में यह समारोह होना तय हुआ था।

अवंतिका ने पत्र पढ़ा और उसकी आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए। "कबीर! यह तो अद्भुत है! तुम्हें वह सम्मान मिल रहा है जिसके तुम हकदार हो।"

कबीर ने उस मेडल के लेटर को देखा। कुछ महीने पहले तक, शायद वह इस सम्मान को स्वीकार करने से मना कर देता, क्योंकि उसका मानना था कि वह अपने साथियों को नहीं बचा पाया। लेकिन आज, उसे समझ आ गया था कि अतीत को बदला नहीं जा सकता, पर भविष्य को सुरक्षित जरूर किया जा सकता है।

"मैं जाऊंगा, सर," कबीर ने राणा साहब की आँखों में देखते हुए कहा। "मैं यह मेडल अपने उन साथियों के नाम पर लूंगा जो वापस नहीं आ पाए।"

राणा साहब ने मुस्कुराते हुए सैल्यूट किया, "दैट्स लाइक माई बॉय।"
 

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अध्याय 11: रोशनी का जश्न


एक महीने बाद, दिल्ली का राष्ट्रपति भवन रोशनी से जगमगा रहा था। देश के सबसे प्रतिष्ठित वीआईपी, सैन्य अधिकारी और उनके परिवार वहां मौजूद थे। हॉल के भीतर एक अजीब सा गौरवमयी सन्नाटा था।


"कैप्टन कबीर सिंह... स्पेशल फोर्सेज!" उद्घोषक की भारी आवाज गूंजी।


कबीर अपनी पूरी सैन्य वर्दी (सेरेमोनियल ड्रेस) में, सीने पर लगे पुराने मेडल्स के साथ गरिमापूर्ण कदमों से आगे बढ़ा। उसका लुक इतना प्रभावशाली था कि पूरे हॉल की नजरें उस पर टिक गईं। उसने राष्ट्रपति के सामने जाकर कड़ा सैल्यूट किया। राष्ट्रपति ने मुस्कुराते हुए उसके सीने पर 'कीर्ति चक्र' का मेडल लगाया और उससे हाथ मिलाया।


जब तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा, तो कबीर ने दर्शकों की भीड़ में बैठी अवंतिका की तरफ़ देखा। अवंतिका ने लाल रंग की साड़ी पहनी थी, और उसकी आँखों से बहते आंसू उसकी बेहद ख़ुशी और गर्व को बयां कर रहे थे। उसके बगल में बैठे कर्नल राणा भी गर्व से मुस्कुरा रहे थे।


समारोह के बाद, राष्ट्रपति भवन के लॉन में मीडिया और मेहमानों का ताँता लगा था। कबीर इन सब से दूर, एक शांत कोने में अवंतिका के साथ आकर खड़ा हो गया।


"यह मेडल बहुत भारी है," कबीर ने अपने सीने पर लगे चक्र को छूते हुए हल्के अंदाज में कहा।


"यह तुम्हारी आत्मा के वजन से ज्यादा भारी नहीं है, कबीर," अवंतिका ने उसका हाथ थामते हुए कहा। "आज तुम पूरी तरह से आज़ाद हो गए हो।"


कबीर ने आसमान की तरफ़ देखा, जहाँ शाम के तारे धीरे-धीरे टिमटिमाने लगे थे। दिल्ली की ठंडी हवा उनके चेहरों को छूकर गुजर रही थी। उसने अवंतिका को अपने करीब किया।


"अवंतिका, जब मैं उस अंधेरे कबाड़खाने में शेट्टी से लड़ रहा था, जब उसने मुझे उस लोहे के पाइप से मारा था... तो एक सेकंड के लिए मेरा दिमाग फिर से उसी पुराने डिप्रेशन के गड्ढे में गिर गया था। मुझे लगा था कि मैं वहीं मर जाऊंगा," कबीर ने पहली बार उस रात का अपना सबसे बड़ा डर साझा किया।


"फिर क्या हुआ?" अवंतिका ने उसकी छाती पर हाथ रखते हुए पूछा।


"फिर मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई दी," कबीर ने सीधे उसकी आँखों में देखा, जहाँ प्यार का एक अनंत समंदर था। "उस आवाज ने मुझे याद दिलाया कि बाहर कोई मेरा इंतजार कर रहा है। कोई है जिसके लिए मेरा जिंदा रहना जरूरी है। अवंतिका, तुमने मुझे सिर्फ दुश्मनों से नहीं बचाया... तुमने मुझे खुद से बचाया है।"


अवंतिका ने मुस्कुराते हुए अपना सिर कबीर के दिल पर रख दिया, जहाँ अब कोई खौफनाक सन्नाटा नहीं, बल्कि एक स्थिर और शांत धड़कन चल रही थी।


"हम हमेशा एक-दूसरे को बचाएंगे, कबीर," उसने धीरे से कहा।

उपसंहार: साए से सवेरे तक


दो दिन बाद, वे वापस मुंबई लौट आए। रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। कबीर और अवंतिका मरीन ड्राइव के किनारे अपनी गाड़ी खड़ी करके फुटपाथ पर टहल रहे थे। समंदर की लहरें हमेशा की तरह टेट्रापॉड्स से टकराकर सफेद झाग बना रही थीं। सड़कों पर स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी पानी पर बिखर रही थी।


यह वही जगह थी जहाँ कुछ महीने पहले अवंतिका ने कबीर का हाथ थामकर उससे अपनी परछाइयों से बाहर आने को कहा था।


आज, दोनों शांत खड़े थे। कबीर ने अपनी पॉकेट से अपना पुराना वॉक-इन क्लोजेट का की-चेन निकाला, जो उसने सेना के दिनों से अपने पास रखा था, और उसे समंदर की गहरी लहरों में फेंक दिया। यह उसके अतीत के उस आखिरी हिस्से को विदा करने का तरीका था।


"अब कोई साया नहीं है, कबीर?" अवंतिका ने पूछा।


कबीर ने उसकी कमर में हाथ डाला और उसे अपनी तरफ़ खींचते हुए मुस्कुराया, "नहीं। अब सिर्फ धूप है... और तुम हो।"


सामने अरब सागर के क्षितिज पर, मुंबई की रात के बीच भी एक अजीब सा उजाला था। कबीर को पता था कि डिप्रेशन एक ऐसा मेहमान है जो शायद कभी-कभी बिना बुलाए दोबारा दस्तक दे सकता है। जिंदगी हमेशा इतनी परफेक्ट नहीं रहेगी। लेकिन अब उसके पास उस लड़ाई को लड़ने के लिए हथियार थे—अवंतिका का निश्छल प्यार, उन बच्चों का भरोसा और खुद को स्वीकार करने की हिम्मत।


कबीर ने अवंतिका के होठों पर एक धीमा और गहरा चुंबन अंकित किया। यह चुंबन किसी सुरक्षा एजेंट का अपनी क्लाइंट के लिए नहीं था, न ही किसी टूटे हुए सिपाही का था। यह एक ऐसे इंसान का था जिसने अपनी जिंदगी के सबसे भयानक अंधेरे को हराकर, आखिरकार अपने हिस्से के सवेरे को पा लिया था।


लहरें आती रहीं, टकराती रहीं, और कबीर तथा अवंतिका का हाथ थामे हुए वह साया हमेशा-हमेशा के लिए उस सुनहरी सुबह की रोशनी में विलीन हो गया।
 

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अध्याय 12: जीवन के नए रंग और 'उम्मीद' का विस्तार

दिल्ली से लौटने के बाद कबीर की जिंदगी ने एक नई रफ्तार पकड़ ली थी। 'कीर्ति चक्र' का मेडल अब उसके घर की एक साधारण सी अलमारी में रखा था, लेकिन उसकी असली चमक कबीर के काम में दिख रही थीI
'उम्मीद' सेंटर में अब बच्चों की संख्या पच्चीस से बढ़कर साठ हो चुकी थी। लोअर परेल की उस पुरानी मिल में अब सिर्फ कराटे की 'कियाई' (चीख) नहीं गूंजती थी, बल्कि वहां अब बच्चों के लिए एक छोटी सी लाइब्रेरी और कंप्यूटर लैब भी बन चुकी थी, जिसका पूरा सेटअप अवंतिका की कंपनी ने स्पॉन्सर किया था।

दिसंबर का महीना आ चुका था। मुंबई की हल्की ठंडक में मरीन ड्राइव की शामें और भी खूबसूरत हो जाती थीं। कबीर अब हर हफ्ते डॉ. अंजलि के पास जाता था। अब उनकी मुलाकातें एक मरीज और डॉक्टर जैसी नहीं, बल्कि दो दोस्तों जैसी होती थीं, जो जीवन के उतार-चढ़ाव पर चर्चा करते थे।

"कबीर, तुम अब अपनी भावनाओं को छुपाते नहीं हो," एक सेशन के दौरान डॉ. अंजलि ने कॉफी का मग टेबल पर रखते हुए कहा था। "पहले जब तुम आते थे, तो तुम्हारे कंधे झुके होते थे और तुम नजरें चुराते थे। आज तुम सीधे मेरी आँखों में देखकर बात कर रहे हो। यह तुम्हारी सबसे बड़ी जीत है।"

कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा था, "मैम, जब आपके पास घर लौटकर बात करने के लिए कोई ऐसा इंसान हो जो आपकी खामोशी को भी समझता हो, तो शब्द अपने आप बाहर आ जाते हैं।"
 

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अध्याय 13: अवंतिका का नया मिशन

अवंतिका ने उस बड़े कॉर्पोरेट घोटाले को उजागर करके देश के सिस्टम में एक बहुत बड़ी सफाई की थी, लेकिन इसके बाद उसकी जिम्मेदारियां और बढ़ गई थीं। उसे अब सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर 'साइबर सिक्योरिटी और डेटा प्रोटेक्शन' के लिए एक सलाहकार के रूप में बुलाया जाने लगा था।

एक शाम, अवंतिका अपने दफ्तर में बैठी कुछ नए प्रोजेक्ट्स की फाइल्स देख रही थी, तभी कबीर वहां बिना किसी आहट के दाखिल हुआ। उसके हाथ में एक छोटा सा डिब्बा था।
"आज भी तुम बिल्कुल साये की तरह आते हो, कबीर," अवंतिका ने अपनी फाइलें बंद करते हुए कहा।

"आदत से मजबूर हूँ," कबीर ने हंसते हुए कहा और वह डिब्बा उसकी टेबल पर रख दिया। "यह तुम्हारे लिए है।"

अवंतिका ने डिब्बा खोला, तो अंदर कबाड़खाने की उस क्रेन के मैग्नेट का एक छोटा सा, पॉलिश किया हुआ लोहे का टुकड़ा था, जिसे एक खूबसूरत की-चेन का रूप दिया गया था। उस पर लिखा था—'माई चालाकी पार्टनर'।

अवंतिका की हंसी छूट गई। उसने उठकर कबीर को गले लगा लिया। "यह दुनिया का सबसे अजीब और सबसे खूबसूरत गिफ्ट है, कबीर। थैंक यू।"

"यह मुझे हमेशा याद दिलाएगा कि जब मैं जिंदगी की सबसे बड़ी जंग हार रहा था, तब तुमने अपनी बुद्धिमानी से मेरा हाथ थाम लिया था," कबीर ने उसकी जुल्फों को संवारते हुए कहा।
 

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अध्याय 14: एक नया संकल्प

वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहा। साल 2026 की शुरुआत हो चुकी थी। 'उम्मीद' सेंटर के पहले बैच के तीन बच्चों का चयन नेशनल जूनियर मार्शल आर्ट्स चैंपियनशिप के लिए हो चुका था। यह कबीर और अवंतिका की साझा मेहनत का सबसे बड़ा पुरस्कार था।

कर्नल राणा भी अब अक्सर शाम को जिम आते थे और बच्चों को अनुशासन के गुर सिखाते थे। एक दिन, जब बच्चे प्रैक्टिस कर रहे थे, राणा साहब ने कबीर को पास बुलाया।

"कबीर, तुमने कभी सोचा है कि तुम्हारी और अवंतिका की इस कहानी का अगला चैप्टर क्या होना चाहिए?" राणा साहब ने शरारती मुस्कान के साथ पूछा।

कबीर ने दूर खड़ी अवंतिका को देखा, जो एक बच्ची को कंप्यूटर पर कोडिंग सिखा रही थी। "मैं समझा नहीं, सर।"

"कबीर, फौज में हमें हर मोर्चे पर आगे बढ़ना सिखाया जाता है, रुकना नहीं," कर्नल ने उसकी पीठ थपथपाई। "वह लड़की तुम्हारी ढाल बनी, तुम्हारा सवेरा बनी। अब वक्त है कि तुम उसे अपनी जिंदगी का हमेशा के लिए हिस्सा बना लो।"

कबीर के दिल की धड़कन तेज हो गई। उसने हमेशा खुद को एक सिपाही और एक रक्षक के रूप में देखा था, लेकिन एक पति, एक परिवार के मुखिया के रूप में उसने कभी खुद की कल्पना नहीं की थी। मगर अब, उस विचार से उसे डर नहीं लग रहा था, बल्कि एक अजीब सा सुकून मिल रहा था।
 
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अध्याय 15: समंदर, साक्षी और सात फेरे

साल के मध्य में, जब मुंबई पर मानसून की पहली फुहारें पड़ने ही वाली थीं, मरीन ड्राइव के सामने बने एक छोटे से प्राचीन मंदिर में शहनाई की गूंज सुनाई दी। कोई बड़ा कॉर्पोरेट तमाशा नहीं, कोई मीडिया की भीड़ नहीं—सिर्फ कर्नल राणा, कबीर के जिम के साठ बच्चे, और 'ब्लैक नाइट सिक्योरिटी' के कुछ पुराने साथी वहां मौजूद थे।

कबीर ने हल्के शेरवानी सूट में और अवंतिका ने एक पारंपरिक लाल और सुनहरी साड़ी में मंडप में प्रवेश किया। अग्नि के सामने फेरे लेते हुए, कबीर ने जब अवंतिका की मांग में सिंदूर भरा, तो मंदिर का पूरा प्रांगण बच्चों की तालियों और कर्नल राणा के भावुक आंसुओं से गूंज उठा।

"मैम से अब 'टाई' (भाभी) बन गईं!" जिम के सबसे छोटे बच्चे 'छोटू' ने चिल्लाकर कहा, जिससे वहां मौजूद हर शख्स ठहाका मारकर हंस पड़ा।

रात को, जब शादी की रस्में खत्म हुईं, दोनों अपने नए घर की बालकनी में आकर खड़े हुए। यह घर उन्होंने बांद्रा के समंदर के ठीक सामने लिया था। बाहर हल्की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी और समंदर की लहरें अपनी पूरी ताकत से किनारे से टकरा रही थीं।

कबीर ने अवंतिका को पीछे से अपनी बाहों में घेर लिया।

"मिस्टर कबीर सिंह, अब तुम्हारी जिंदगी की कमान पूरी तरह मेरे हाथ में है," अवंतिका ने पीछे मुड़कर उसके गले में हाथ डालते हुए कहा।

"मैं अपनी मर्जी से इस कैद को कुबूल करता हूँ, माय चीफ," कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा।

उस रात, मुंबई की बारिश में कोई खौफ नहीं था, कोई छुपा हुआ हमलावर नहीं था, और कबीर के दिमाग में कोई पुराना साया नहीं था। कबीर सिंह ने अपनी जिंदगी की दो सबसे बड़ी जंग जीत ली थीं—एक बॉर्डर पर दुश्मनों के खिलाफ, और दूसरी अपने ही भीतर के अंधेरे के खिलाफ। और इन दोनों जंगों के बाद जो सवेरा हुआ था, उसकी रोशनी इतनी तेज थी कि अब वहां दोबारा कभी अंधेरा नहीं हो सकता था।

समंदर की लहरें गवाही दे रही थीं कि एक रक्षक को आखिरकार अपनी मंजिल, अपना प्यार और अपनी 'उम्मीद' मिल चुकी थी।
 

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अध्याय 16: जीवन का नया अध्याय और 'उम्मीद' की नई उड़ान

शादी के बाद के महीने किसी खूबसूरत ख्वाब की तरह गुजर रहे थे। साल 2026 की मानसूनी बारिश अब थम चुकी थी और मुंबई की सड़कों पर त्योहारों की रौनक छाने लगी थी। कबीर और अवंतिका के बांद्रा वाले घर की बालकनी से अब हर सुबह समंदर पर बिखरती सुनहरी धूप दोनों का स्वागत करती थी।

कबीर के जीवन में अब एक ठहराव आ चुका था, लेकिन उसकी ऊर्जा और उसका मिशन पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुका था। 'उम्मीद' सेंटर सिर्फ लोअर परेल की एक पुरानी मिल तक सीमित नहीं रहा। अवंतिका के कॉर्पोरेट संपर्कों और कबीर की अथक मेहनत के चलते, मुंबई के तीन और स्लम इलाकों में 'उम्मीद' की नई शाखाएं खोल दी गई थीं। अब लगभग ढाई सौ बच्चे कबीर और उसकी टीम से आत्मरक्षा, अनुशासन और कंप्यूटर की शिक्षा ले रहे थे।

एक शनिवार की सुबह, कबीर जिम में बच्चों को 'काता' (कराटे का एक विशेष फॉर्म) सिखा रहा था, तभी उसने देखा कि अवंतिका हाथ में एक फाइल लिए अंदर आ रही है। उसके चेहरे पर एक ऐसी खुशी थी जिसे वह छुपा नहीं पा रही थी।

कबीर ने बच्चों को प्रैक्टिस जारी रखने का इशारा किया और अवंतिका के पास आया। "आज चेहरे पर इतनी चमक क्यों है, चीफ?" उसने हल्के अंदाज में पूछा।

अवंतिका ने फाइल कबीर के हाथ में थमा दी। "यह देखो, कबीर। खेल मंत्रालय (Ministry of Youth Affairs and Sports) से आधिकारिक पत्र आया है। हमारे सेंटर के दो बच्चों—आकाश और अंजलि—का चयन इंटरनेशनल जूनियर मार्शल आर्ट्स चैंपियनशिप के लिए हुआ है, जो अगले महीने टोक्यो में होने वाली है।"

कबीर ने पत्र को देखा। उसकी आँखें गर्व से भर आईं। आकाश वही लड़का था जो कभी भायखला की तंग गलियों में जेब कतरी करता था, और आज वह देश का प्रतिनिधित्व करने जा रहा था। कबीर को महसूस हुआ कि उसके भीतर का जो खालीपन था, वह इन बच्चों की कामयाबी से पूरी तरह भर चुका था।

"यह सिर्फ उनकी जीत नहीं है, अवंतिका," कबीर ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। "यह इस बात का सबूत है कि सही दिशा मिले, तो अंधेरे से अंधेरे कोने से भी हीरा निकल सकता है।"
 

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अध्याय 17: टोक्यो का सफर और एक नई परीक्षा

टोक्यो जाने की तैयारियां जोरों पर थीं। कबीर खुद बच्चों के साथ कोच और मेंटर बनकर जा रहा था। अवंतिका अपने बिजनेस कमिटमेंट्स के कारण मुंबई में ही रुकने वाली थी, लेकिन उसने बच्चों के रहने, खाने और किट्स का सारा इंतजाम बेहतरीन तरीके से करवाया था।

रवानगी की रात, छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कर्नल राणा भी बच्चों को हौसला देने पहुंचे थे।

"कबीर," कर्नल राणा ने उसे एक तरफ़ ले जाकर कहा। "तुम पहली बार एक सैनिक या बॉडीगार्ड के रूप में नहीं, बल्कि एक गुरु के रूप में देश से बाहर जा रहे हो। याद रखना, एक सिपाही सिर्फ सरहद पर नहीं लड़ता, वह जहां भी जाता है, अपने देश का मान बढ़ाता है। मुझे तुम पर भरोसा है।"

कबीर ने कर्नल राणा के पैर छुए और उन्हें गले लगाया। फिर वह अवंतिका की तरफ़ मुड़ा। अवंतिका की आँखों में थोड़ी सी उदासी थी, क्योंकि शादी के बाद वे पहली बार एक-दूसरे से दो हफ्तों के लिए दूर हो रहे थे।

"अपना ख्याल रखना, कबीर," अवंतिका ने उसके जैकेट के कॉलर को ठीक करते हुए कहा। "और समय पर खाना खाना। तुम्हारी थेरेपिस्ट ने कहा है कि रूटीन नहीं छूटना चाहिए।"

कबीर ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ चूम लिया। "अब मेरा थेरेपिस्ट, मेरा डॉक्टर और मेरा सब कुछ तुम ही हो। मैं बहुत जल्द वापस आऊंगा, वो भी मेडल के साथ।"
 

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अध्याय 18: उगते सूरज की भूमि में गूंजी 'उम्मीद'

टोक्यो का 'योयोगिकी नेशनल जिम्नेजियम' खचाखच भरा हुआ था। चारों तरफ़ अलग-अलग देशों के झंडे लहरा रहे थे। कबीर भारतीय टीम के ट्रैकसूट में बच्चों के साथ एरिना के किनारे खड़ा था।

मुकाबले बेहद कड़े थे। जापान, रूस और चीन के खिलाड़ी तकनीक और ताकत में बहुत आगे थे। अंजलि अपने दूसरे राउंड में एक कड़े मुकाबले के बाद बाहर हो गई, जिससे वह बहुत उदास थी और रो रही थी।

कबीर उसके पास घुटनों के बल बैठा और उसके आंसू पोंछे। "अंजलि, मेरी तरफ़ देखो। हारना कोई शर्म की बात नहीं है। शर्म तब होती है जब तुम हारने के डर से लड़ना छोड़ दो। तुमने बहुत शानदार फाइट की। आज जो सीखा है, वह कल तुम्हें चैंपियन बनाएगा।"

कबीर के शब्दों ने जादू का काम किया। अंजलि ने मुस्कुराकर सिर हिलाया और अपने साथी आकाश का हौसला बढ़ाने लगी, जो अब फाइनल में पहुंच चुका था।

फाइनल मुकाबला आकाश और जापान के लोकल चैंपियन 'केनजी' के बीच था। केनजी के हर मूव पर पूरा स्टेडियम चीख रहा था। पहले दो राउंड्स में केनजी ने अपने तेज किक्स की बदौलत पॉइंट टेबल पर बढ़त बना ली थी। आकाश थका हुआ और नर्वस लग रहा था।

तीसरे और आखिरी राउंड के ब्रेक में कबीर ने आकाश के चेहरे पर पानी छिड़का। "आकाश, मेरी बात ध्यान से सुनो। वह तुमसे ज्यादा ताकतवर हो सकता है, लेकिन उसके पास वो वजह नहीं है जो तुम्हारे पास है। याद करो भायखला की वो रातें, याद करो उस भूख को जिससे तुम लड़कर यहाँ तक पहुंचे हो। अपनी पूरी ताकत को अपनी एकाग्रता में बदलो। जब वह हमला करे, तो पीछे मत हटना... काउंटर अटैक करो!"

लास्ट राउंड का हुटर बजा। केनजी एक और राउंडहाउस किक मारने के लिए आगे बढ़ा। लेकिन इस बार आकाश अपनी जगह से हिला नहीं। जैसे ही केनजी की किक हवा में आई, आकाश ने नीचे झुककर उसके मूव को डॉज किया और एक परफेक्ट 'ग्याकू-सुकी' (रिवर्स पंच) सीधे केनजी के चेस्ट गार्ड पर जड़ दिया।

थुड!

केनजी फर्श पर गिर पड़ा। रेफरी की गिनती शुरू हुई... एक, दो, तीन... दस! केनजी उठ नहीं पाया।

"विजेता... इंडिया!" उद्घोषक की आवाज गूंजी।

पूरे स्टेडियम में सन्नाटा छा गया, लेकिन भारतीय कोने से कबीर, अंजलि और भारतीय स्टाफ चीख पड़े। आकाश ने तिरंगा अपने हाथों में लिया और सीधे कबीर के गले लग गया। कबीर की आँखों से आंसू बह निकले—यह उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत पल था। उसने तुरंत वीडियो कॉल के जरिए मुंबई में अवंतिका को यह नजारा दिखाया। स्क्रीन पर अवंतिका भी ख़ुशी से रो रही थी।
 

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अध्याय 19: रक्षक का परम सुख

जब कबीर और बच्चे गोल्ड मेडल के साथ मुंबई लौटे, तो एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किसी नेशनल हीरोज की तरह हुआ। 'उम्मीद' सेंटर के बाकी बच्चे ढोल-नगाड़ों के साथ वहां मौजूद थे। कर्नल राणा और अवंतिका ने फूलों के हार पहनाकर उनका स्वागत किया।

उस रात, जब सारा जश्न थम गया और बच्चे अपने-अपने घरों को लौट गए, कबीर और अवंतिका अपने बांद्रा वाले घर की बालकनी में चाय के कप हाथ में लिए बैठे थे। बाहर समंदर शांत था, और चांद की रोशनी पानी पर तैर रही थी।

कबीर ने आकाश का गोल्ड मेडल टेबल पर रखा।

"तो, मिस्टर कबीर सिंह... कैसा लग रहा है?" अवंतिका ने उसकी बांह में अपना हाथ डालते हुए पूछा।

कबीर ने समंदर की ठंडी हवा को महसूस किया। उसने अपने अतीत को याद किया—वह अंधेरा कमरा, वो एंटी-डिप्रेसेंट गोलियां, वो अकेलेपन का खौफ। और फिर उसने आज को देखा—एक सफल गुरु, एक गौरवान्वित पति, और एक ऐसा इंसान जिसके पास अब दूसरों की जिंदगी बदलने की ताकत थी।

"अवंतिका," कबीर ने बहुत ही शांत और तृप्त आवाज में कहा। "जब मैं फौज में था, तो मैं देश की रक्षा करता था। जब मैं तुम्हारा बॉडीगार्ड बना, तो मैंने तुम्हारी रक्षा की। लेकिन आज मुझे समझ आया कि एक सच्चे रक्षक का परम सुख क्या है।"

"क्या है?" अवंतिका ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।

"किसी को इस काबिल बना देना कि उसे फिर कभी किसी और रक्षक की जरूरत न पड़े," कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा। "मैंने इन बच्चों को खुद से लड़ना सिखाया है। अब वे अपने हक की लड़ाई खुद लड़ सकते हैं।"

अवंतिका ने अपना सिर उसके मजबूत कंधे पर टिका दिया। कबीर ने उसे और करीब खींच लिया।

मुंबई की वो रात हमेशा की तरह हसीन थी, पर कबीर के लिए वह खास थी। अब उसके भीतर कोई जंग नहीं चल रही थी, कोई कोहरा नहीं था। उसकी रूह अब पूरी तरह से शांत और आज़ाद थी। कबीर सिंह ने अपने हिस्से के साए को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया था, और अब वह अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत, अनंत सवेरे की रोशनी में सांस ले रहा था।
 
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