- 28,196
- 26,400
- 304
वैसे यहां की कथा निराली है.....पुराने चावल जो हो चुके बासी उनसे ही बस इन्हे निभानी है....में तो कब का सड़ चुका इनकी निगाहों मैं, आज तो बस में एक गंध की तरह बसा हुआ हूं इनकी सांसों में.....ये भूल गए दोस्ती यारी लेकिन मैंने हमेशा याद रखी ,मेरा वक्त हमेशा वहीं रहा शायद इनका वक्त बदल गया.....इसलिए दोस्त मैंने परवाह करनी बन्द कर दी.....कोई दो दिन बाद मारता है तो मेरी तरफ से आज मरे![]()
bolti hai




