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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

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Lovely Anand

Love is life
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आह ....तनी धीरे से ...दुखाता
(Exclysively for Xforum)
यह उपन्यास एक ग्रामीण युवती सुगना के जीवन के बारे में है जोअपने परिवार में पनप रहे कामुक संबंधों को रोकना तो दूर उसमें शामिल होती गई। नियति के रचे इस खेल में सुगना अपने परिवार में ही कामुक और अनुचित संबंधों को बढ़ावा देती रही, उसकी क्या मजबूरी थी? क्या उसके कदम अनुचित थे? क्या वह गलत थी? यह प्रश्न पाठक उपन्यास को पढ़कर ही बता सकते हैं। उपन्यास की शुरुआत में तत्कालीन पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए सेक्स को प्रधानता दी गई है जो समय के साथ न्यायोचित तरीके से कथानक की मांग के अनुसार दर्शाया गया है।

इस उपन्यास में इंसेस्ट एक संयोग है।
अनुक्रमणिका
भाग 126 (मध्यांतर)
भाग 127 भाग 128 भाग 129 भाग 130 भाग 131 भाग 132
भाग 133 भाग 134 भाग 135 भाग 136 भाग 137 भाग 138
भाग 139 भाग 140 भाग141 भाग 142 भाग 143 भाग 144 भाग 145 भाग 146 भाग 147 भाग 148 भाग 149 भाग 150 भाग 151 भाग 152 भाग 153 भाग 154 भाग 155 भाग 156 भाग 157 भाग 158 भाग 159 भाग 160 भाग 161भाग 162 भाग 163 भाग 164 भाग 165 भाग 166 भाग 167
 
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tarahb2

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सोनी अभी रसोई की स्लैब से लगकर खड़ी ही थी........
लवलीभाई, आपकी लिखने की क्षमता की दाद देनी पड़ेगी। अत्यंत रसप्रद कहानी है।धन्यवाद।
बिल्कुल छोटी जैसी इसकी जांघें हैं
 

arushi_dayal

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vakharia ji कुछ दिनों से बीमार चल रही थी इसलिए कमेंट नहीं दे पाई…
सोनी का ये डबल चरित्र थोड़ा रहस्यमई होता जा रहा है। सूरज के साथ उसकी आत्मीयता और जिस्मानी संबंध एक सोची समझा प्रयोग है या मात्र एक संजोग। सोनी अच्छी तरह जानती है कि विकास उसे गर्भवती करने में सक्षम नहीं है. शायद वो ये एक मौका सूरज को दे कर उसके शुक्राणु से गर्भवती होने का प्लान कर रही है और फ़िर एक बार सूरज के साथ जिस्मानी संबंध बनाने के बाद उसे जो सुख और संतुष्टि का एहसास हुआ है उससे उसका झुकाव सूरज के प्रति अधिक हुआ है। सूरज जिस जुनून, प्रभुत्व और ताकतवर प्रहार के साथ उसके साथ यौन संबंध बनाता है, वैसा अनुभव उसने पहले कभी नहीं किया था और शायद यही कारण है कि उसने अपने ही भांझा के साथ यौन संबंध के वर्जित फल का आनंद लेने के लिए सभी जोखिम उठाए हैं। शायद तभी तो उसने सूरज को ये अधिकार दिया है...कभी भी और कहीं भी। ये शब्द एक मर्द के लिए अपनी अधीनता व्यक्त करने का उत्तम अभिव्यक्ति है...अब तो बस सोनी सूरज से चुदने का मौका तलाशती रहती है..लखनऊ में वो खाना लेन के लिए सूरज को नहीं बोली...सुबह चाय के बहाने के लिए नाइटी में आना और एक जल्दी सूरज के साथ...सब प्लान किया हुआ लगता है और इन सब आकांक्षाओं में सहयोग कर रही है सुगना की कही हुई बातें ….जिसने संतान संपतमी की रात को उसकी योनि में पहला वीर्य दिया अगले सातो दिन उसके साथ ही संबंध बनाना होगा और हर दिन उसका वीर्य अपनी कोख में संचित करना होगा

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arushi_dayal

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सोनी बिस्तर पर बैठी हुई उलझी है काई सवालो में

सूरज की करी ठुकाई अब रहती है सदा ख्यालो में

बेचारा पति आया है छुटी लेकर पत्नी की भरने गोद

भांजा बीज बो गया पहले ही पिछली रात को चोद

अंग अंग पर छोड़ दिया गया है अपने प्यार की छाप

अब फ़िर से चुदवाने को सोनी तड़प रही खुद आप

सूरज पा चुका था सोनी की चूत पर अब अधिकार

वो जब चाहे चोद सकेगा सोनी की टैंगो के बीच दरा

सूरज ने चोदा था जैसे उस को डाल के अपना लौड़ा

इतनी अच्छे से आज तक किसी और ने नहीं निचोडा


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Lovely Anand

Love is life
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vakharia ji कुछ दिनों से बीमार चल रही थी इसलिए कमेंट नहीं दे पाई…
सोनी का ये डबल चरित्र थोड़ा रहस्यमई होता जा रहा है। सूरज के साथ उसकी आत्मीयता और जिस्मानी संबंध एक सोची समझा प्रयोग है या मात्र एक संजोग। सोनी अच्छी तरह जानती है कि विकास उसे गर्भवती करने में सक्षम नहीं है. शायद वो ये एक मौका सूरज को दे कर उसके शुक्राणु से गर्भवती होने का प्लान कर रही है और फ़िर एक बार सूरज के साथ जिस्मानी संबंध बनाने के बाद उसे जो सुख और संतुष्टि का एहसास हुआ है उससे उसका झुकाव सूरज के प्रति अधिक हुआ है। सूरज जिस जुनून, प्रभुत्व और ताकतवर प्रहार के साथ उसके साथ यौन संबंध बनाता है, वैसा अनुभव उसने पहले कभी नहीं किया था और शायद यही कारण है कि उसने अपने ही भांझा के साथ यौन संबंध के वर्जित फल का आनंद लेने के लिए सभी जोखिम उठाए हैं। शायद तभी तो उसने सूरज को ये अधिकार दिया है...कभी भी और कहीं भी। ये शब्द एक मर्द के लिए अपनी अधीनता व्यक्त करने का उत्तम अभिव्यक्ति है...अब तो बस सोनी सूरज से चुदने का मौका तलाशती रहती है..लखनऊ में वो खाना लेन के लिए सूरज को नहीं बोली...सुबह चाय के बहाने के लिए नाइटी में आना और एक जल्दी सूरज के साथ...सब प्लान किया हुआ लगता है और इन सब आकांक्षाओं में सहयोग कर रही है सुगना की कही हुई बातें ….जिसने संतान संपतमी की रात को उसकी योनि में पहला वीर्य दिया अगले सातो दिन उसके साथ ही संबंध बनाना होगा और हर दिन उसका वीर्य अपनी कोख में संचित करना होगा

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सच हैं सोनी गर्भवती होने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती...
बच्चे ना नाम भी तो चाहिए शायद इसीलिए विकास भी लगा हुआ हो

बाय द वे ये बखारिया जी कौन है जिनका जिक्र आपने पोस्ट में किया है
 
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sunoanuj

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अगले भाग की प्रतीक्षा में है !
 
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LustyArjuna

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भाग 190

सोनी का कलेजा धक-धक कर रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस ट्रिप से डरे या खुश हो। आने वाले दिन उसके लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे, जहाँ उसे दो मर्दों के बीच पिसना था, और उन दोनों को ही यह अहसास दिलाना था कि वही उसके 'असली सारथी' हैं।

उसने मन ही मन अपने इष्ट से प्रार्थना की, पर उसकी प्रार्थना में भी एक अजीब सी माँग थी—वह सूरज की आगोश से दूर नहीं जाना चाहती थी। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान अब एक ऐसे 'रोड ट्रिप' पर निकलने वाला था जहाँ मर्यादा की हर सीमा टूटने वाली थी।


अब आगे..


जब सूरज और विकास अपने अपने कमरे में तैयारी करने चले गए, तब सुगना ने सोनी को अकेला पाकर उसे अपने पास बुलाया। सुगना के मन में अपनी बहन के प्रति अगाध प्रेम था, पर वह इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि सोनी और सूरज के बीच मर्यादा की लक्ष्मण रेखा पहले ही टूट चुकी है। उसे तो बस यही लग रहा था कि सोनी संतान सप्तमी के कठिन अनुष्ठान और विकास के साथ अकेले जाने के विचार से घबरा रही है।

सुगना ने सोनी के माथे पर हाथ फेरते हुए उसे सांत्वना दी।

सुगना (ममता भरे स्वर में): "सोनी, तू इतनी चिंतित क्यों लग रही है? मैं देख रही हूँ जब से यात्रा की बात चली है, तू कुछ खोई-खोई सी है। देख, मैं तेरी बड़ी बहन ही नहीं, तेरी सहेली भी हूँ। अगर विकास जी को लेकर कोई संकोच है, तो मुझसे कह सकती है।"

सोनी ने नज़रें झुका लीं। उसके भीतर एक तुफ़ान मचा था। वह सुगना को कैसे बताती कि उसकी घबराहट विकास को लेकर नहीं, बल्कि उस 'त्रिकोण' को लेकर है जो इस यात्रा में बनने वाला था। सुगना तो सूरज को अभी भी वही भोला बच्चा समझ रही थी जिसे उसने पाल-पोसकर बड़ा किया था, उसे भनक तक नहीं थी कि उसका अपना बेटा उसकी छोटी बहन के जिस्म का राज़दार बन चुका है।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "नहीं दीदी, ऐसी बात नहीं है। बस... घर छोड़कर पहाड़ों पर जाना, और फिर सूरज भी साथ जा रहा है। मुझे डर है कि कहीं मेरी मर्यादा में कोई कमी न आ जाए।"

सुगना हल्के से मुस्कुराई और सोनी का हाथ थामकर बोली:

सुगना: "अरे पगली, तू सूरज की चिंता क्यों करती है? वह तो घर का बच्चा है। वह साथ रहेगा तो विकास जी को पहाड़ों के उन टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर मदद मिलेगी। विकास जी ने ठीक ही कहा, जब वे थक जाएंगे तो सूरज 'ड्राइव' संभाल लेगा। तू बस अपने अनुष्ठान पर ध्यान देना। पहाड़ों की वह ठंडी हवा और एकांत तुझे और विकास जी को एक-दूसरे के और करीब लाएगा।"

सुगना की बातों ने सोनी के दिल में एक अजीब सी टीस पैदा कर दी। सुगना जिसे 'मदद' समझ रही थी, सोनी जानती थी कि वह मदद कितनी 'गहरी' होने वाली थी। उसे याद आया कि कैसे विकास ने कहा था कि वे 'बारी-बारी से ड्राइव' करेंगे। अब सोनी को समझ आ रहा था कि इस यात्रा में वह एक ऐसी 'गाड़ी' बनने वाली है जिसे दो चालक अपनी-अपनी बारी से चलाने वाले थे।

सोनी ने बस इतना ही कहा, "दीदी, आप जैसा कहेंगी वैसा ही होगा।"

पर मन ही मन वह कांप रही थी। सुगना की अज्ञानता सोनी के लिए एक सुरक्षा कवच भी थी और एक बोझ भी। नैनीताल की उन बर्फीली रातों में, एक ही होटल के कमरे या आस-पास के कमरों में, जब विकास अपनी थकावट मिटाने के लिए सोनी का सहारा लेगा और सूरज अपनी 'बारी' का इंतज़ार करेगा, तब सोनी को अपनी देह और आत्मा को दो हिस्सों में बाँटना होगा। विधाता ने जैसे उसके लिए एक ऐसा जाल बुन दिया था जहाँ से निकलना नामुमकिन था, और सुगना अनजाने में ही उसे उस आग की ओर धकेल रही थी।

नैनीताल निकलने से पहले की यह शाम बड़ी मादक और ठहरी हुई सी थी। सूरज और सोनी अंदर सामान समेटने में व्यस्त थे, जबकि सुगना और विकास सोफे पर आमने-सामने बैठे चाय की चुस्कियों का आनंद ले रहे थे। सुगना की साड़ी का पल्ला आज कुछ ढीला था और उसकी आँखों में वह चमक थी जो किसी चंचल साली की होती है, पर बातों में अधिकार एक संचालिका जैसा था।

सुगना (शरारती लहजे में): "क्यों विकास जी, कल तो आप लोग वादियों में खो जाएंगे। पर याद रखिएगा, यह महज़ कोई घूमने-फिरने की सैर नहीं है। यह 'संतान सप्तमी' का वह खेल है जिसकी संचालिका मैं हूँ। जैसा-जैसा मैंने सिखाया है, अगर वैसा ही हुआ, तभी बरकत होगी।"

विकास सुगना के इस नए और बिंदास अंदाज़ को देख दंग था। सुगना की आवाज़ में जो रस था, उसने विकास के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी थी।

विकास (हंसते हुए): "अरे दीदी, जब कमान आपके हाथ में है तो जीत तो पक्की ही है। आपने जो-जो 'पाठ' पढ़ाए हैं, मैं उनका पूरा पालन करूँगा। पर एक बात बताइए..." विकास ने थोड़ा साहस बटोरते हुए सुगना की आँखों में आँखें डालीं, "यदि आपकी देखरेख में यह मिशन कामयाब रहा और हमारे आंगन में किलकारी गूंजी... तो इस संचालिका को बदले में क्या गुरु-दक्षिणा देनी होगी? आखिर इतनी मेहनत तो आप भी कर रही हैं।"

सुगना ने चाय की प्याली टेबल पर रखी और अपनी भारी जाँघों को सहलाते हुए विकास की ओर थोड़ा और झुक गई। उसके बदन से उठती चन्दन की खुशबू विकास के दिमाग पर चढ़ने लगी थी।

सुगना (दबी ज़ुबान में): "गुरु-दक्षिणा? उसने अपनी आंखें नचाते हुए और होंठो पर कातिल मुस्कान लाते हुए सोचने लगी।"

विकास जज्बाती हो गया। उसने अपना हाथ बढ़ाकर सुगना की नरम हथेली को अपनी मुट्ठी में ले लिया। वह धीरे-धीरे उसकी हथेली को अपनी उंगलियों से सहलाने लगा। सुगना ने अपना हाथ खींचा नहीं, बल्कि उस स्पर्श का पूरा मजा लेते हुए उसे एक 'संचालिका' की गरिमा के साथ स्वीकार करने लगी।

चलो वक्त आने पर बताऊंगी…पर फिलहाल अपना सारा ध्यान मेरी सोनी को खुश करने में लगाइए…जो उत्साह अपने बीती रात दिखाया है वह कम नहीं होना चाहिए..

सुगना ने यह बात बोलते हुए अपनी पलके झुका ली…हथेलियों पर विकास का स्पर्श अब उसे और गहरा महसूस हो रहा था। सुगना ने यह बात जिसे कामुकता और चंचलता से की थी यही उसकी खासियत थी विकास के मन में एक अद्भुत और अनजानी सी लहर सी दौड़ गई।

विकास (गहरे स्वर में): "आपका आदेश सर आंखों पर आप एक वादा कीजिए कि हमेशा ऐसे ही हंसते मुस्कुराते रहेंगी.. आपका खुशहाल चेहरा ही इस घर की रौनक है।"

सुगना खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसकी हँसी में वह पुरानी चंचलता लौट आई थी। उसने विकास की आँखों में अपनी दहकती हुई नज़रें गड़ा दीं।

सुगना: "मुकर मत जाइयेगा विकास बाबू! वक्त आने पर माँगूँगी अपना हक। अभी तो बस आप अपनी पूरी ताकत नैनीताल और सोनी की उस 'सेवा' में लगाइये।"

तभी अचानक कमरे का दरवाज़ा खुला और सोनी हाल में आ गई। विकास हड़बड़ा गया और झटके से सुगना का हाथ छोड़ दिया। उसके चेहरे पर पकड़े जाने की घबराहट साफ थी। सोनी की नज़रें विकास के कांपते हाथों और सुगना की उस विजयी मुस्कान पर थमीं। वह भांप गई कि यहाँ जीजा-साली के बीच कोई गहरा 'गुप्त समझौता' हुआ है।

सोनी जानती थी कि सुगना को अपनी बातों के जाल में फंसाना मुमकिन नहीं, पर विकास की इस हालत ने उसे चुटकी लेने का मौका दे दिया।

सोनी (मुस्कुराते हुए ताली बजाकर): "वाह! यहाँ तो जाने से पहले ही बहुत लंबी-चौड़ी 'ट्रेनिंग' चल रही है! विकास जी, नैनीताल जाने से पहले ही दीदी के इतने करीब? कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका इरादा पहाड़ों की ठंड छोड़कर यहीं बनारस की गर्मी में रुकने का है?"

सोनी ने विकास की ओर ताना कसते हुए कहा, "बेचारे विकास जी... दीदी के सामने आते ही इनकी सारी 'मर्दानगी' भीगी बिल्ली बन जाती थी। दीदी, आपने इन्हें कौन सी घुट्टी पिला दी है जो ये आपका हाथ थामने की जुर्रत कर बैठे?"

सुगना ने बड़ी चतुराई से स्थिति को संभाला और तिरछी नज़र से विकास को देखते हुए बोली, "अरे पगली, ये तो बस विदाई का आशीर्वाद ले रहे थे।?"

विकास ने चैन की साँस ली, पर उसके मन में सुगना की वह हँसी और 'गुरु-दक्षिणा' का वह वादा एक गहरे नशे की तरह उतर चुका था। नैनीताल जाने से पहले ही, बनारस के उस सोफे पर रिश्तों का एक नया और मादक अध्याय लिखा जा चुका था।


घर के हर कोने में कल की यात्रा की हलचल थी। सोनी का बदन कल के उस भीषण टकराव के बाद एक अजीब सी सुस्ती और भारीपन में था, पर सूरज की स्थिति इसके बिल्कुल उलट थी। पिछली रात उसे जो सुख प्राप्त हुआ था, उसने उसे शांत करने के बजाय उसकी प्यास को और भी प्रचंड कर दिया था। सूरज के लिए वह मिलन तृप्ति नहीं, बल्कि उस नशे की पहली बूंद जैसा था, जिसने उसके भीतर की आग को और भड़का दिया था।

कल के उस 'मल युद्ध' ने विकास और सोनी को तो एक पल के लिए शांत कर दिया था, लेकिन सूरज का मन रह-रहकर उसी स्पर्श को दोबारा पाने के लिए तड़प रहा था। उसे लग रहा था कि कल जो कुछ हुआ, वह तो बस एक शुरुआत थी, असली प्यास तो अब जागनी शुरू हुई है।

घर में सुगना और बाकी लोगों की मौजूदगी के कारण सन्नाटा मिलना मुश्किल था, पर जैसे ही मौका मिला, सूरज ने दबे पाँव सोनी को एक कोने में घेर लिया।

सूरज (दबी हुई उत्तेजना के साथ): "मौसी, कल रात जो मिला उसने तो मेरी बेचैनी और बढ़ा दी है। मैं तब से बस उसी आग में जल रहा हूँ। मेरा मन और मेरा बदन, दोनों ही आपकी उस नरमी के लिए तड़प रहे हैं।"

सोनी (धीमी आवाज़ में): "सूरज, थोड़ा धैर्य रखो। घर की स्थिति देखो, सब यहाँ हैं। मैं तुम्हारी तड़प समझ रही हूँ, बस कुछ देर और... जैसे ही मौका मिलेगा, मैं तुम्हारी इस प्यास को बुझाने की पूरी कोशिश करूँगी।"

सूरज ने सोनी की आँखों में झलकता वह समर्पण देखा और खुद को थोड़ा संभाला। उसे सोनी पर अटूट विश्वास था। वह जानता था कि भले ही घर में भीड़ हो, पर सोनी उसे उस 'अतृप्ति' के साथ रात नहीं बिताने देगी। सूरज की आँखों में अब नैनीताल की यात्रा से पहले ही एक नई जंग का आह्वान था, जहाँ उसे अपनी इस बढ़ी हुई प्यास को मंज़िल तक पहुँचाना था।

सोनी जब वापस सुगना के पास गई, तो उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसे पता था कि सूरज का यह तनाव आज रात किसी न किसी बहाने से फूटने वाला है, और 'संतान सप्तमी' के इस व्रत में उसे अब एक नई और भीषण अग्निपरीक्षा से गुज़रना होगा।

उधर सोनी का कमरा फिर सजाया जा रहा था। मालती सोनी के कमरे की साथ सजावट और उसे सुंदर सेज को लेकर बड़ी आकर्षित थी.. सोनी का बिस्तर और सरहाना सजाते हुए वह बार-बार उस बिस्तर पर खुद को महसूस करती और अपने प्रेमी राजू के साथ रंगरलियां मनाने की कल्पना कर उसका रोम रोम अलंकृत हो जाता जांघों के बीच वह रसीला द्रव्य उसे अपनी जींस के ऊपर से उसे छूने को आकर्षित करता.. मालती तड़प कर रह जाती और अपनी प्यास अपने कमरे में आने के बाद अपनी मुनिया के दाने को रगड़ते हुए बुझाती।

राजू के साथ उस बिस्तर पर संभोग करने की लालसा मालती के मन में प्रगाढ़ होती जा रही थी।

रात का भोजन समाप्त हो चुका था, लेकिन घर के माहौल में जो एक अनकही गर्माहट थी, वह कम होने का नाम नहीं ले रही थी। सोनी अच्छी तरह जानती थी कि 'संतान सप्तमी' के इस पवित्र और गुप्त अनुष्ठान में उसके शरीर की 'मुनिया' पर हर दिन वीर्यपात होना अनिवार्य था। सूरज इस यज्ञ का पहला और सबसे शक्तिशाली पुजारी था, और सोनी ने मन ही मन यह संकल्प ले लिया था कि आज भी वह सूरज के उस प्रचंड अंश को अपने गर्भ में धारण करके ही रहेगी।

भोजन के बाद बर्तन समेटते हुए भी सोनी का ध्यान बार-बार सीढ़ियों की ओर जा रहा था। सुगना और विकास हॉल में बैठकर कल की यात्रा की अंतिम रूपरेखा तैयार कर रहे थे, और सूरज अपने कमरे में जाने का बहाना बनाकर ऊपर जा चुका था।

सोनी के भीतर एक अजब सी हलचल थी। उसे वह पुराना नियम याद था कि जिस दिन सिंचन नहीं होता, उस दिन अनुष्ठान खंडित माना जाता है। वह सूरज के उस तने हुए अंग की पीड़ा को महसूस कर सकती थी, जो कल रात से ही उसके होठों के स्पर्श के लिए तरस रहा था।

सोनी (स्वगत): "चाहे जो हो जाए, आज रात सूरज का वह तेज व्यर्थ नहीं जाने दूँगी। विधाता ने उसे मेरे लिए ही तो बनाया है।"

जैसे ही घर में सोने की तैयारी होने लगी, सुगना ने विकास से कहा, "विकास जी, आप सोने चलिए, कल सुबह जल्दी निकलना है। सोनी, तू रसोई का काम खत्म करके दूध का गिलास सूरज के कमरे में दे आना "

सोनी के लिए यह आदेश नहीं, बल्कि वह मौका था जिसकी वह प्रार्थना कर रही थी। उसने गरम दूध का गिलास हाथ में लिया, पर उसके हाथ कांप रहे थे। उसे पता था कि जैसे ही वह उस कमरे का दरवाजा बंद करेगी, सूरज का वह संयम, जो उसने दिन भर भीड़ के सामने बनाए रखा था, एक ज्वालामुखी की तरह फटने वाला है।

उसने अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया और भारी कदमों से ऊपर की ओर बढ़ी। उसे पता था कि आज रात की यह 'आहुति' नैनीताल की यात्रा से पहले की सबसे महत्वपूर्ण और गहरी आहुति होने वाली है। सूरज अपने बिस्तर पर उस तड़प के साथ उसका इंतज़ार कर रहा था, जहाँ मर्यादा की सीमाएँ धुंधली पड़ जाती हैं और केवल सृजन की प्यास शेष रह जाती है।

रात के उस सन्नाटे में, सूरज के कमरे का दरवाजा बंद होते ही जैसे वक्त थम गया। सोनी हाथ में दूध का गिलास लिए अभी मुड़ी ही थी कि सूरज ने उसे पीछे से अपनी फौलादी बाहों में भर लिया। सूरज के शरीर की तपन और उसके अंग का वह प्रचंड उभार सोनी की पीठ पर साफ महसूस हो रहा था।

सूरज के हाथ सोनी के नंगे पेट पर थे सोनी ने अपने हाथों से उसे अलग करने की कोशिश की और इसी दौरान उसने सूरज के अंगूठे को सहला दिया सूरज का लंड तनता गया और सोनी के नितंबों के बीच चुभने लगा।

मौसी में आपका ही इंतजार कर रहा था

क्यों किस लिए सोनी ने सूरज को चिढ़ाते हुए पूछा

अरे भूल गई आप आज की आहुति नहीं देनी क्या? सूरज ने बेबाक होकर सोनी की चूचियों को मीसते हुए कहा..

सोनी सूरज को तरसा रही थी उसने अपनी गर्दन घुमाई और सूरज के होंठों को चूमते हुए बोला..


कौन सी आहुति?

सूरज को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी। उसकी सांसें और उसके हाथों की पकड़ सब बयां कर रही थी। उसने बिना वक्त गंवाए सोनी को अपने आलिंगन में और जोर से कस लिया। सोनी की साड़ी का पल्ला कंधे से सरक चुका था। सूरज ने अपने दोनों हाथ सोनी के वक्षों पर मजबूती से जमा दिए और उसे धीरे-धीरे आगे की ओर झुकने पर मजबूर किया।

सोनी समझ चुकी थी कि आज 'सारथी' अपनी पूरी लय में है। उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया, बल्कि खुद को उस समर्पण के लिए तैयार कर लिया जिसके लिए वह यहाँ आई थी। जैसे ही सूरज ने पीछे से उस पर अधिकार जमाया, सोनी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। 'संतान सप्तमी' का वह पुजारी आज अपने पूरे वेग के साथ अपनी मुनिया पर आहुति देने को तैयार था। कमरे में केवल उन दोनों की भारी होती सांसों और धड़कनों का शोर था, जो नैनीताल की यात्रा से पहले इस गुप्त यज्ञ को पूर्ण कर रहे थे।

कमरे के उस मद्धम सन्नाटे में सूरज और सोनी के बीच की मर्यादाएं किसी मोम की तरह पिघल चुकी थीं। सूरज ने जैसे ही सोनी को बिस्तर पर 'डॉगी स्टाइल' में किया, सोनी की साँसें तेज़ हो गईं। वह जानती थी कि सुगना और विकास नीचे इंतज़ार कर रहे होंगे, इसलिए समय की बर्बादी उसे गँवारा नहीं थी।

सूरज उत्तेजना में सोनी की साड़ी उतारने की कोशिश करने लगा, पर सोनी ने उसे रोक दिया।

सोनी (फुसफुसाते हुए): "सूरज, इतना समय नहीं है। बस जल्दी कर ले... कोई ऊपर आ सकता है।"

सोनी ने खुद ही अपनी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर सरकाकर अपने गोरे नितंबों तक समेट लिया। जैसे ही उसकी 'मुनिया' सूरज के सामने उजागर हुई, कमरे का तापमान और बढ़ गया। सूरज ने बिना एक पल की देरी किए, पूरे वेग के साथ सोनी की गहराइयों में प्रवेश कर दिया। समय की अहमियत सोनी भी समझ रही थी और सूरज भी। कमरे में देह से देह के टकराने की 'थप-थप' की आवाज़ें गूँजने लगीं।

सोनी ने उत्तेजना में भर कर सूरज को टोका, "सूरज... धीरे... इतनी ज़ोर से मत कर, आवाज़ बाहर जाएगी।" उसकी यह हिदायत सूरज की रफ्तार को कम करने के बजाय उसे और भी उग्र कर गई।

कुछ ही पलों के उस प्रचंड संघर्ष के बाद, सूरज के पौरुष का बांध टूट गया। उसने एक अंतिम और गहरा प्रहार किया और अपने पूरे अस्तित्व का सार सोनी के गर्भ में उड़ेल दिया। सोनी ने उस गर्माहट को महसूस किया और संतोष की एक गहरी सांस ली।

संभोग के बाद, सोनी ने सूरज के वीर्य से सने उस अंग को अपने हाथों में लिया और बड़ी कोमलता से उसे चूमकर उसका तनाव शांत किया। सूरज ने उसे भावुक होकर गले लगा लिया और उसके होठों को अपने होठों में भरकर उस सुख को पूरी तरह आत्मसात कर लिया।

आलिंगन के बीच ही सोनी ने सूरज की आँखों में आँखें डालकर वह बात कह दी जिसने सूरज के होश उड़ा दिए।

सोनी: "सूरज, नैनीताल ट्रिप में अपनी सारी मुरादें पूरी कर लेना। अगले सात दिन कोई रोक-टोक नहीं है, बस वक्त और मौके का इंतज़ार करना।"

सूरज हक्का-बक्का रह गया। उसे अपनी कानों पर यकीन नहीं हो रहा था।

सूरज: "मौसी... क्या सचमुच? जब चाहे तब?" सोनी (मुस्कुराते हुए): "हाँ, जब चाहे तब, जितना चाहे उतना, और जैसे चाहे वैसे।"

सूरज ने जोश में आकर सोनी को फिर से अपनी बाहों में भरने की कोशिश की, पर सोनी ने उसके मजबूत सीने पर हाथ रखकर उसे बिस्तर पर पीछे धकेल दिया।

सोनी: "बस, अब बहुत हुआ। अब यह दूध पी और सो जा। कल की तैयारी कर और अपने बदन में ताकत बचाकर रख... अभी उस ताकत की बहुत ज़रूरत पड़ने वाली है।"

सोनी ने अपनी साड़ी ठीक की और एक विजयी मुस्कान के साथ कमरे से बाहर निकल गई, पीछे सूरज को एक नई उम्मीद और असीमित उत्तेजना के साथ छोड़ते हुए। नैनीताल की राह अब केवल पहाड़ों की चढ़ाई नहीं, बल्कि वासना के उन शिखरों की यात्रा होने वाली थी जहाँ हर दिन एक नया इतिहास लिखा जाना था।

बनारस की सुबह की ताजी हवाओं में नैनीताल की यात्रा का उत्साह घुला हुआ था। सुगना ने विदाई की रस्म को बड़ी आत्मीयता से निभाया। उसने सूरज को अपने सीने से लगाया, तो उसकी आँखों में ममता की एक चमक थी। उसने अपने बेटे के कान में जो हिदायतें दीं, उनमें एक माँ का स्नेह था, पर वह इस बात से बेखबर थी कि उसके 'कलेजे का टुकड़ा' अब सोनी के 'जिस्म का सारथी' बन चुका है।

जब सोनी ने सुगना के चरण छुए, तो सुगना ने उसे गले लगाकर बड़ी गंभीरता से कहा, "सोनी, सूरज तेरे साथ है तो मुझे चिंता नहीं, पर याद रखना कि तू जिस 'काम' के लिए जा रही है, वह सबसे ऊपर है। अनुष्ठान की पवित्रता बनी रहे।" सोनी ने सुगना को जो आश्वासन दिया, वह नियति के साथ किया गया एक गुप्त करार था। सोनी के कदम जब गाड़ी की ओर बढ़े, तो उसके भीतर एक अजीब सी झुनझुनी थी। उसे पता था कि वह सूरज का ख्याल किस तरह रखने वाली है।

विकास ने जब सुगना से आशीर्वाद लिया, तो सुगना ने उसे वही पुरानी नसीहत दोहराई, जो 'संतान सप्तमी' की सफलता के लिए अनिवार्य थी। सुगना जब अपनी बात पूरी करने के लिए शब्दों की तलाश कर रही थी, तब विकास ने उसकी हिचकिचाहट को भांप लिया। सुगना के भीतर जो एक अजीब सी कामुक सजगता जागी थी, विकास उसे स्वीकार कर चुका था।

विकास (शरारत और दृढ़ता के साथ): > "दीदी, आप फिक्र मत कीजिए। मैं आपकी बहन का भी ख्याल रखूँगा और संतान सप्तमी के लिए आपके निर्देश का भी... अपनी बहन की मुनिया को शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।"

सुगना ने विकास की पीठ पर एक मीठी चपत लगाई। उस शब्द में एक ऐसी सघन अश्लीलता थी जो इतनी आत्मीयता में लिपटी हुई थी कि वह किसी मंत्र की तरह लग रही थी। विकास मुस्कुराते हुए गाड़ी में जाकर बैठ गया।

सूरज ड्राइविंग सीट पर पूरी तरह से तैयार था। उसके हाथों ने जब स्टेयरिंग थामा, तो उसे उस 'कमान' का अहसास हुआ जो उसे अगले सात दिनों तक संभालनी थी। उसने रियर-व्यू मिरर (शीशे) में सोनी की ओर देखा। सोनी की नज़रें भी सूरज की आँखों में समा गईं। उस एक पल के मौन संवाद में नैनीताल की उन बर्फीली वादियों का पूरा खाका खिंच गया।

सुगना ने हाथ हिलाकर उन्हें विदा किया। जैसे ही गाड़ी ने गति पकड़ी, बनारस के घाट और गलियां पीछे छूटने लगीं। सूरज के पैर एक्सीलेटर पर थे, पर उसका मन उस 'ड्राइव' के बारे में सोच रहा था जो उसे विकास के साथ 'बारी-बारी' से सोनी की देह पर करनी था।

सड़क पर भागती वह गाड़ी अब केवल लोहे का एक ढांचा नहीं थी, बल्कि वासना, सृजन और मर्यादाओं के टूटने का एक चलता-फिरता मंदिर बन गई थी। नियति मुस्कुरा रही थी, क्योंकि उसे पता था कि इस यात्रा के अंत तक, सोनी की 'मुनिया' और उसका गर्भ एक नया इतिहास लिखने वाले थे। सफर लंबा था, और प्यास... उससे भी कहीं ज़्यादा गहरी।
Lajwab writing Lovely bhai 🙌....
Story k word's m Kamukta tapak rhi h...... Suraj aur Soni ka yeh kamuk milan bhut badiya se execute kiya h.

Ab aane wale dino me jo Soni ki sawari hone wali Suraj & Vikash se uska intezar hai......
 
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Lovely Anand

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Lajwab writing Lovely bhai 🙌....
Story k word's m Kamukta tapak rhi h...... Suraj aur Soni ka yeh kamuk milan bhut badiya se execute kiya h.

Ab aane wale dino me jo Soni ki sawari hone wali Suraj & Vikash se uska intezar hai..

संतान सप्तमी की अंतिम आहुति अनोखी होगी...जुड़े रहिए
 
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