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Thriller आधी रात, सूनी खटिया और शिकारी

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Premkumar65

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Update 02

उस हादसे के बाद, सविता ने लगातार कई रातों तक कमरे में जागने और सिर्फ सोने का नाटक करने का फैसला किया। वह पूरी-पूरी रात आँखें मूँदे खटिया पर सीधी लेटी रहती और हर छोटी से छोटी आहट को सुनने की कोशिश करती। लेकिन लगातार चार-पाँच दिनों तक रात के सन्नाटे में कुछ भी नहीं हुआ। घर का माहौल एकदम शांत रहा। धीरे-धीरे सविता के मन का वह खौफ कम होने लगा और उसे लगने लगा कि कमला दीदी की बातें और उसका अपना डर सिर्फ एक वहम था। उसने खुद को पूरी तरह तसल्ली दे दी कि उमस और बदन की बढ़ती गरमी की वजह से ही उसने खुद नींद में अपने सारे कपड़े उतार दिए होंगे।

दिन इसी तरह सामान्य तरीके से बीतते चले गए और सविता का डर पूरी तरह गायब हो चुका था। लेकिन तभी एक रात, नियति ने उसके साथ वह खौफनाक खेल खेला जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।

रात के करीब दो बज रहे थे, जब घने अंधेरे के बीच सविता को गहरी नींद में अपनी दाहिनी चूची पर किसी बहुत ही गर्म, गीले और भारी स्पर्श का अहसास हुआ। उसे साफ महसूस हुआ कि कोई बहुत ही भूखे अंदाज़ में उसके कड़े हो चुके निप्पल को अपने मुँह में भींचकर चूँस रहा है। उस तीखे और रसीले स्पर्श से सविता की आँखें झटके से खुल गईं। कमरे में घाघ अंधेरा पसरा हुआ था और हाथ को हाथ भी दिखाई नहीं दे रहा था। उसने हड़बड़ाकर जैसे ही उठना चाहा और अपने हाथ हिलाए, तो खौफ के मारे उसका गला पूरी तरह सूख गया।

वह एक बार फिर अपनी खटिया पर पूरी तरह से नग्न हालत में पड़ी हुई थी। उसके भारी पेटीकोट और ब्लाउज का नामोनिशान नहीं था। लेकिन इस बार का नज़ारा सिर्फ कपड़े उतरने तक महदूद नहीं था। जैसे ही उसने अपने दोनों हाथों को अपने भारी बदन पर फेरा, उसे समझ आया कि उस अदृश्य शिकारी ने उसके जिस्म के साथ कितनी बेबाकी से खेला था।

उसके पूरे कातिलाना और भरे-पूरे शरीर का हाल इस समय देखने लायक था। केवल उसके दोनों कड़े और भारी स्तनों पर ही नहीं, बल्कि उसकी गोरी नाभि, उसके चिकने पेट के निचले हिस्से और उसकी दोनों भारी-भरकम दूधिया जाँघों के बीच तक हर जगह एक अजीब सा गीलापन महसूस हो रहा था। किसी ने बड़ी ही फुर्सत और दीवानगी से उसके मक्खन जैसे गोरे जिस्म के एक-एक उभार को चाट-चाटकर पूरी तरह से तर कर दिया था। उसकी योनि के द्वार पर जमे उस लार के गाढ़े और ठंडे अहसास को महसूस करते ही सविता की रूह काँप उठी। वह समझ गई कि गहरी नींद में उसे कोई नशीली चीज़ सुंघाई गई थी, जिसके नशे में वह सुध-बुध खो चुकी थी, और उसी बेहोशी का फायदा उठाकर उस अज्ञात मर्द ने उसके इस ४८ साल के गदराए हुए बदन का कोना-कोना चखकर उसे अपनी हवस की मलाई से सराबोर कर दिया था। अंधेरे कमरे में सविता अपनी इस पूरी तरह भीगी और नग्न काया को समेटे डर और एक अनजानी कामुक उत्तेजना के भयंकर चक्रव्यूह में घुटने टेक चुकी थी।

रात के उस डरावने साए से पीछा छुड़ाने के लिए सविता ने हिम्मत जुटाई। उसने सोचा कि वह इसी वक्त दबे पाँव बाहर जाएगी और घर के बाकी मर्दों के कमरों में झाँककर देखेगी कि कौन अपनी खटिया से गायब है। वह अपनी लाज बचाने के लिए झटपट अपना ब्लाउज और पेटीकोट बदन पर डालती है और कमरे से बाहर निकलती है। लेकिन बाहर इतना घना अंधेरा था कि उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वह जैसे ही आगे बढ़ी, उसका पैर लड़खड़ाया और वह सीधे अपने बेटे चिंटू की खटिया से टकराकर उसके ऊपर जा गिरी।

उसका वह 48 साल का भारी-भरकम और गदराया हुआ बदन सीधे चिंटू के जवान जिस्म से जा टकराया। अचानक आए इस भारी वजन और स्पर्श की वजह से चिंटू की गहरी नींद टूट गई। नींद के झोंके में, बिना कुछ सोचे-समझे, चिंटू का मजबूत हाथ सीधे आगे बढ़ा और उसने सविता के ब्लाउज के भीतर दबे एक भारी चूची को गलती से कसकर पकड़ लिया। अपनी हथेली में उस विशाल और मखमली उभार का अहसास होते ही चिंटू को झटके से समझ आया कि यह तो उसकी अपनी माँ का बदन है। उसने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया और घबराकर माफ़ी माँगते हुए पूछने लगा, "क्या हुआ मम्मी? आप ठीक तो हो ना? आधी रात को यहाँ कैसे गिर गईं?" सविता ने बात संभालते हुए कोई बहाना बनाया और वापस अपने कमरे में आ गई।

अगली सुबह जैसे ही घर के सभी मर्द काम के लिए बाहर चले गए, सविता हाँफती हुई और भागती हुई सीधे अपनी जेठानी कमला के पास पहुँची। उसने रात में अपने जिस्म के साथ हुए उस घिनौने खेल और चिंटू की खटिया पर गिरने वाली पूरी बात सच-सच बता दी।

सविता की यह दास्तान सुनकर कमला ज़ोर से हँसी और उसे चिढ़ाते हुए बोली, "क्यों छोटी? सच बता, क्या तुझे भी अब इस छुपे हुए खेल में मज़ा आने लगा है क्या? तेरे बदन पर इतनी बड़ी आफ़त आ गई, कोई तेरे पूरे जिस्म को चाटकर तर कर गया और तू घोड़े बेचकर सोती रही?"

सविता ने रोने जैसी सूरत बनाकर अपनी सफ़ाई दी, "नहीं दीदी! मैं सच कह रही हूँ, मुझे कुछ भी याद नहीं है। जब मेरी आँख खुली, तब कोई मेरी चूची चूस रहा था। मुझे तो पक्का लगता है कि किसी ने मुझे कोई नशीली चीज़ सुँघा दी थी।"

चूची चूसने और पूरे बदन को सिर्फ चाटने की बात सुनते ही कमला का दिमाग अचानक ठनक गया। वह फौरन गंभीर होकर बोली, "सुन छोटी, अगर घर का कोई बड़ा मर्द होता, तो वह अब तक तेरी चूत में अपना खड़ा लँड डाल चुका होता। सिर्फ बदन को चाटना और चूची चूसना... ऐसा बचपना और तड़प कोई जवान लड़का ही कर सकता है। कहीं यह सब करने वाला तेरा अपना जवान बेटा चिंटू तो नहीं है? मैंने कई बार देखा है, जब तू घर में काम करती है, तो वह भी पीछे से तुझे बड़ी गंदी नज़रों से घूरता रहता है।" कमला की यह बात सुनते ही सविता के पैरों तले से ज़मीन पूरी तरह खिसक गई।

कमला के मुँह से चिंटू का नाम सुनते ही सविता का गोरा चेहरा एकदम सफेद पड़ गया। उसने झटके से कमला की बाहों से खुद को अलग किया और खटिया पर उठकर बैठ गई। अपनी ही कोख से जन्मे जवान बेटे पर ऐसा घिनौना इल्जाम सुनकर उसका माँ का दिल अंदर तक तड़प उठा।

उसने गुस्से और घबराहट में अपनी आँखें बड़ी-बड़ी करते हुए कहा, "दीदी! तुम ये कैसी बहकी-बहकी बातें लेकर बैठ गईं? चिंटू मेरा बेटा है, मेरी छाती का दूध पीकर बड़ा हुआ है वो! तुम उसे इस पाप के खेल में कैसे घसीट सकती हो? वह तो अपनी माँ के लिए ऐसा गंदा विचार सपने में भी नहीं सोच सकता। रात को जो कुछ भी हुआ, वह सिर्फ एक भूल थी। अंधेरे में जब मैं अचानक उसकी खटिया पर गिरी, तो नींद के झोंके में उसने अनजाने में मुझे छू लिया था। लेकिन जैसे ही उसे समझ आया कि वह उसकी अपनी माँ का बदन है, उसने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया था। वह मुझसे कितना डरता है, उसने रोनी सूरत बनाकर मुझसे माफ़ी माँगी और पूछा कि क्या मैं ठीक हूँ। वह शहर में दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह खटता है, आते ही थका-हारा सो जाता है। मेरा बच्चा ऐसा कभी नहीं कर सकता!"

कमला ने सविता की बात सुनकर गहरी सांस ली और रहस्यमयी अंदाज़ में अपना सिर हिलाया। उसने एक अनुभवी और शातिर औरत की तरह सविता के गोरे कंधे पर अपना मजबूत हाथ रखा और चबा-चबाकर बोली, "छोटी, तू ममता के जाल में अंधी हो रही है। चिंटू अब कोई छोटा बच्चा नहीं रहा, वह चौबीस साल का पूरा जवान गबरू मर्द हो चुका है। तू उसे अब भी गोदी का लाल समझ रही है, लेकिन उसकी आँखों की भूखी जवानी को तू नहीं पहचानती। मैंने खुद अपनी आँखों से कई बार देखा है कि जब तू आँगन में झुककर झाड़ू लगाती है या कपड़े सुखाती है, तो वह पीछे से तेरे इस भारी और गदराए हुए बदन को टिक-टिकी लगाए घूरता रहता है। तू खुद सोच, अगर जेठ जी या ससुर जी होते, तो वे अब तक तेरी चूत का ताला तोड़कर अपना काम कर चुके होते। सिर्फ बदन को पागलों की तरह चाटना और आधी रात को चूची चूसना... यह बचपना और तड़प किसी भूखे जवान लड़के की ही हरकत होती है। और फिर शहर में रहने के कारण चिंटू को ही ऐसी नशीली चीज़ों की समझ और जुगाड़ है, जिसे सुँघाकर वह तुझे बेसुध कर देता है।"

कमला की बातें सुनकर सविता का जी बैठने लगा था, लेकिन उसका माँ का दिल हार मानने को तैयार नहीं था। वह किसी भी हाल में अपने कलेजे के टुकड़े चिंटू के सिर से इस कीचड़ को धोना चाहती थी। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को कसकर उँगलियों में भींचा और कमला के सामने अपने जेठ और ससुर के खिलाफ अपने तर्क सामने रखे।

सविता ने अपनी जेठानी की आँखों में आँखें डालकर कहा, "दीदी, तुम चिंटू को शहर वाला समझकर सारा दोष उसी पर मढ़ रही हो, लेकिन तुम अपने घर के पुराने मर्दों को भूल रही हो। जेठ जी और ससुर जी खेतों पर भले ही सीधे बनते हों, पर असली साज़िश उनके दिमाग में भी चल सकती है। तुम कहती हो कि बड़े होने की वजह से वे ऐसी हरकत क्यों करेंगे, लेकिन क्या पता वे अपनी चालाकी की वजह से सीधे-सीधे ज़बरदस्ती न कर रहे हों? वे अच्छी तरह जानते हैं कि अगर उन्होंने ज़बरदस्ती की, तो मैं चिल्ला दूँगी, पूरा गाँव इकट्ठा हो जाएगा और खानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी। इसीलिए वे खुलकर सामने आने से डरते हैं।"

सविता ने थोड़ा और करीब आकर धीमी आवाज़ में कहा, "क्या पता जेठ जी सालों से मेरे इस गोरे और भारी बदन को देखकर अंदर ही अंदर सुलग रहे हों, पर बदनामी के डर से सिर्फ रात के अंधेरे में आकर मेरी चूची चूसकर और बदन चाटकर ही अपनी प्यास बुझा लेते हों? और ससुर जी को तो पूरा गाँव जानता है, बूढ़े भले हो गए हैं पर ज़मींदारी का रोब आज भी है। वे मुझे इस घर में बांधकर रखना चाहते हैं। अगर वे मेरे कमरे में आकर नशीली चीज़ सुँघाकर मेरे कपड़े उतारते हैं, तो इसके पीछे उनका एक बहुत बड़ा डर हो सकता है। वे सिर्फ मेरी जवानी का मज़ा लेना चाहते हैं, वह भी बिना किसी सबूत के। और सारा शक चिंटू पर जाए, इसीलिए तो रात को जब मैं बाहर निकली, तो अंधेरे में चिंटू की खटिया मेरे रास्ते में आई। क्या पता किसी ने जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया हो कि सारा इल्ज़ाम चिंटू पर ही आ जाए?"

सविता की इस नई दलील को सुनकर इस बार कमला की बोलती बंद हो गई। सविता ने अपने जेठ और ससुर के ऊपर जो शक जताया था, उसने मामले को और भी ज़्यादा पेचीदा बना दिया था। अब दोनों औरतों के मन में घर के तीनों मर्दों को लेकर एक भयंकर जंग छिड़ चुकी थी।
Achhi kashamkash chal rahi hai dono auraton me.
 
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Premkumar65

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Update 05

कमला के कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था। सविता खाट पर बैठी अपने आँसू पोंछ रही थी। कमला हाथ बाँधे कमरे में चक्कर काट रही थी। उसका सांवला और भारी-भरकम कसरती बदन गुस्से की वजह से तप रहा था।

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वह अचानक सविता के पास आई। उसके गोरे, गदराए हुए कंधे पर अपना मजबूत हाथ रखा। उसने कंधे को कसकर दबाया और फुसफुसाकर बोली, "सुन छोटी, रोने से आफत नहीं टलेगी। दो महीने का बच्चा पेट में आ गया है। कुछ दिनों में पेट बाहर दिखने लगेगा। पूरा गाँव थू-थू करेगा। हमें आज ही इस बच्चे के असली बाप का पता लगाना होगा।"

सविता ने कांपते हुए अपनी दूधिया आँखें उठाईं, "कैसी तरकीब दीदी? मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा। लाज के मारे मेरा दम निकला जा रहा है।"

कमला के होठों पर एक शातिर मुस्कान तैर गई। उसने सविता के ब्लाउज के ऊपर से छलकते हुए भारी उभारों को छुआ और बोली, "हम अभी इसी वक्त खेतों पर चलेंगे। तेरे जेठ वहाँ अकेले काम कर रहे हैं। मैं सीधे उन पर इल्जाम लगाऊंगी कि उन्होंने ही रात के अंधेरे में तेरे साथ यह सब किया है। अगर वो मुजरिम हुए, तो पकड़े जाएंगे।"

सविता शर्म से पानी-पानी हो गई। उसका पूरा 48 साल का भारी जिस्म काँप उठा। उसने घबराकर कमला के हाथ पकड़ लिए, "नहीं दीदी! जेठ जी के सामने ऐसी बात मत करो। मैं उनके सामने कभी आँख भी नहीं उठा पाऊंगी।"

कमला ने जबरदस्ती सविता को खाट से उठाया। उसकी अस्त-व्यस्त साड़ी को ठीक किया। उसे खींचते हुए घर के पिछले दरवाजे से खेतों की तरफ ले चली।

दोपहर की तेज धूप खिली हुई थी। खेतों का वह कोना बिल्कुल सुनसान था। वहाँ ऊंचे-ऊंचे गन्ने के लहलहाते खेत थे। सविता का जेठ अकेला कुदाल चला रहा था। उसका बदन पसीने से लथपथ था। एक तगड़े देहाती मर्द की ताकत उसकी चौड़ी छाती से साफ झलक रही थी।

उसने कमला और सविता को आते देखा तो कुदाल रोक दी। उसकी नजरें तुरंत सविता के उस भारी-भरकम, गदराए और पसीने से भीगे बदन पर जा टिकीं। धूप की वजह से सविता का गोरा चेहरा सुर्ख लाल हो चुका था। उसकी भारी छाती तेज सांसों के कारण ऊपर-नीचे हो रही थी। इसे देखकर जेठ के भीतर का मर्द मचल उठा।

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कमला अपने पति के करीब आई। उसने हाथ नचाते हुए बेहद कड़े लहजे में कहा, "सुनिए जी, जरा हाथ रोकिए। आज आपको सच उगलना ही होगा।"

जेठ ने माथे का पसीना पोंछा, "क्या हुआ? इस वक्त यहाँ क्यों आई हो?"

कमला ने सविता की तरफ इशारा किया, "हमारी छोटी दो महीने की गर्भवती है। यह माँ बनने वाली है। मुझे पूरा यकीन है कि रात के अंधेरे में इसके कमरे की कुंडी खोलकर इसके इस मक्खन जैसे गोरे बदन को तर करने वाले आप ही हैं!"

जेठ के होश उड़ गए। उसने अचरज से अपनी आँखें फाड़कर सविता के उस भरे-पूरे पेट को देखा, जो साड़ी के भीतर से साफ गदराया हुआ लग रहा था। वह सकपका गया। उसने अपनी कुदाल को जमीन पर पटका और गुस्से में बोला, "क्या? तुम पागल तो नहीं हो गई हो कमला? कुछ भी बक रही हो! सविता पेट से है तो इसमें मेरा नाम क्यों घसीट रही हो?"

कमला ने अपनी भौहें सिकाड़कर कहा, "तो और कौन करेगा? तुम्हारी नजरें हमेशा इसकी पतली कमर और भारी चूत पर टिकी रहती हैं।"

जेठ ने अपनी आवाज को और ऊंचा किया। वह सीधा सविता के बिल्कुल करीब आ गया। उसने सविता के कांपते हुए बदन को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए, उसके एक-एक अंग की तरफ सीधा अपनी उंगली से इशारा करना शुरू कर दिया।

जेठ ने सविता की साड़ी के पार से छलकती हुई उसकी भारी चूत और जाँघों की तरफ इशारा करते हुए चिल्लाकर कहा, "कमला, जरा आँखें खोलकर इसके जिस्म को देख! ऐसी गदराई और भारी-भरकम औरत की चूत मारने में तो अच्छे-भले मर्द की जान ही निकल जाए! इसके इस मलाईदार चौड़े नितंबों और भारी जाँघों का वजन संभालना कोई हँसी-मजाक है क्या?"

फिर उसने सविता के ब्लाउज के भीतर कसे हुए विशाल और फूले हुए स्तनों की तरफ उंगली उठाई, "इसके इन भारी और बड़े-बड़े थनों को दबाने और चूसने में ही आधी रात बीत जाए! मैं तो हर रात तुम्हारे पास सोता हूँ कमला। तुम्हारी रोज लेता हूँ और तुम्हारे साथ ही मेरा सारा पानी तुम खुद निचोड़ लेती हो। जब तुम्हारे साथ ही मेरा सारा दम निकल जाता है, तो इसके इस गदराए और भारी बदन की चूत फाड़ने की ताकत मेरे भीतर कहाँ से बचेगी?"

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जेठ के मुँह से अपने जिस्म के एक-एक प्राइवेट अंग का ऐसा खुला और बेबाक ज़िक्र सुनकर सविता के पैरों तले से ज़मीन पूरी तरह खिसक गई। लाज और शर्म के मारे उसका चेहरा एकदम सुर्ख लाल पड़ गया। उसे ऐसा महसूस होने लगा मानो जेठ की वे भूखी उंगलियाँ और गंदी नजरें खुलेआम धूप में उसके पूरे कपड़े उतारकर उसे नंगा कर रही हों। वह मारे शर्म के अपनी छाती को दोनों हाथों से भींचने लगी।

सविता ने रोते हुए, हिचकियाँ लेते हुए दबी आवाज़ में कहा, "जेठ... जेठ जी! बस करो... लाज की लाज तो मत बेचो खाओ। दीदी के सामने मेरे बदन की ऐसी गंदी बातें मत करो... मेरा दम घुट रहा है।"

लेकिन जेठ रुकने का नाम नहीं ले रहा था। उसने कमला की तरफ पलटकर आगे कहा, "जरा सोचो, अगर मैं अगले दिन खेतों पर काम करने के बजाय सोता ही रहूँगा और तुम दोनों औरतों को अपना माल दिया, तो मेरा तो कचुंबर ही निकल जाएगा! अरे, हमारे बापूजी और इसका अपना जवान बेटा चिंटू... उन दोनों को तो घर में कोई चूत मिल नहीं रही है! घर में तुम्हारे जैसी एक औरत मेरे पास है, लेकिन उन दोनों के पास तो हाथ साफ करने के लिए कोई दूसरी औरत भी नहीं है।"

सविता ने अपने दोनों हाथों से अपने कान बंद करने की कोशिश की, "नहीं... नहीं! चुप हो जाओ जेठ जी... चिंटू मेरा बेटा है, बापूजी मेरे पिता समान हैं... ऐसा घिनौना पाप उनके सिर मत मढ़ो..."

जेठ ने उसकी बात को पूरी तरह अनसुना करते हुए कहा, "वे दोनों ही घर में इस सविता को देखकर, इसके इस गदराए और नंगे जिस्म को साड़ी के पार से निहार कर सबसे ज्यादा तड़पते होंगे। असली भूख तो उन दोनों के भीतर सुलग रही है, क्योंकि उनके पास अपनी प्यास बुझाने का कोई जरिया नहीं है। तो सारा इल्जाम सिर्फ मुझ पर ही क्यों मढ़ रही हो?"

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सविता का माँ का दिल और एक औरत का वजूद इस बातचीत से पूरी तरह टूट चुका था। वह बस काँप रही थी और ज़मीन में धंस जाना चाहती थी।

जेठ ने जब देखा कि कमला उसकी इन दलीलों से पूरी तरह खामोश हो गई है, तो उसकी आँखों में अचानक एक भयंकर, भूखी और कामुक चमक आ गई। वह और करीब आ गया।

उसने सविता के उस 48 साल के मलाई जैसे गोरे, भारी-भरकम बदन को अपनी नजरों से पूरी तरह नापा। वह मुस्कुराकर बोला, "देखो, बच्चा तो मेरा नहीं है... यह बात मैं भी जानता हूँ और तुम दोनों भी।"

कमला ने पूछा, "तो फिर अब आगे क्या होगा?"

जेठ ने मुस्कुराते हुए अपनी चाल चली और बोला, "अगर तुम दोनों चाहती हो कि इस बच्चे को समाज में एक नाम मिले और खानदान की इज्जत बची रहे, तो मेरी भी एक शर्त है।"

सविता ने डरते हुए अपनी आँखें उठाईं। जेठ ने सीधे उसकी आँखों में देखा, "अगर सविता आगे से हमेशा मेरे साथ ही रहेगी, अपने इस गदराए और रसीले जिस्म पर मुझे पूरा और खुला हक देगी, तो मैं दुनिया के सामने इस बच्चे को अपना नाम दे सकता हूँ।"

सविता के पैरों तले से जमीन खिसक गई। जेठ ने आगे कहा, "मुझे अपनी इस खूबसूरत, गोरी देवरानी की जवानी का रस चखने का मौका मिले, तो मैं पूरी जिंदगी की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हूँ। अब से तुम दोनों औरतें मेरे साथ रहोगी, एक ही छत के नीचे और एक ही बिस्तर पर। बोलो सविता, तुम्हें जेठ की यह शर्त मंजूर है?"

यह तीखी शर्त सुनते ही सविता का गला सूख गया। क्या अब उसे समाज की नजरों के सामने, खुलेआम अपने सगे जेठ के साथ सोना होगा? क्या अब हर रात उसकी खाट पर जेठ का यह भारी और तगड़ा मर्दाना बदन आकर उसकी आबरू को भोगेगा?

अपमान का यह घड़ा सविता के सब्र से बाहर हो गया। वह अब एक पल भी वहाँ खड़ी नहीं रह सकी। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने जोर से रोते हुए अपना सिर हिलाया और वह पागलों की तरह खेतों से गाँव के रास्ते की तरफ भाग खड़ी हुई।

"सविता! छोटी! रुक... सुन तो सही!" कमला ने पीछे से आवाज लगाई।

सविता ने मुड़कर नहीं देखा। उसका भारी बदन साड़ी संभाले हुए खेतों की पगडंडियों पर तेजी से दौड़ रहा था। कमला ने गुस्से में अपने पति को घूरा और फिर तेजी से दौड़ती हुई सविता के पीछे उसे पकड़ने और काबू में करने के लिए भाग पड़ी।

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सविता बदहवास होकर खेतों की पगडंडी पर दौड़े जा रही थी। उसका भारी और गदराया हुआ बदन हांफ रहा था। तेज दौड़ने की वजह से उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार कंधे से सरक रहा था। उसकी आँखों से बहते आँसू गोरे गालों को भिगो रहे थे।

पीछे से कमला ने अपनी कसरती काया का पूरा जोर लगाया। उसने दौड़कर सीधे सविता का हाथ पकड़ लिया। उसने सविता को एक ऊंचे गन्ने के खेत की ओट में खींच लिया, जहाँ दूर-दूर तक कोई देखने वाला नहीं था।

कमला ने हांफते हुए सविता के दोनों कंधे पकड़े। उन्हें झकझोरते हुए बोली, "अरे रुक! कहाँ भागी जा रही है पागलों की तरह? मेरी बात तो सुन!"

सविता ने रोते हुए अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, "मुझे जाने दो दीदी! मुझे घर जाने दो। जेठ जी ने जो कहा... वैसी घिनौना बात मैं जीते जी कभी मंजूर नहीं कर सकती। मेरा दम घुट रहा है।"

कमला ने उसे और कसकर पकड़ा। उसका सांवला चेहरा अब बेहद गंभीर और शातिर हो चुका था। उसने अपनी आवाज को धीमा लेकिन बेहद वजनदार बनाते हुए कहा, "पागल मत बन, छोटी! ठंडे दिमाग से सोच। मेरे पति यानी तेरे जेठ तेरे इस बच्चे को अपना नाम देने के लिए तैयार हैं। इससे बड़ी बात और क्या होगी?"

सविता ने तड़पकर कहा, "पर दीदी, वो इस नाम के बदले मुझसे मेरे जिस्म का सौदा मांग रहे हैं! क्या तुम एक पत्नी होकर यह सब सह लोगी?"

कमला ने एक ठंडी सांस ली। उसने सविता के गोरे, पसीने से तर गाल को सहलाने लगी। वह बड़े ही अजीब और बेबाक लहजे में बोली, "अरे, इस पेट में पल रहे बच्चे का असली बाप कौन है, इससे क्या फर्क पड़ता है? कोई भी हो! अब तो वो आ गया है ना? और जहाँ तक बात मेरे पति की है, तो मैं हूँ ना तेरे साथ। हम दोनों बहनें बनकर, एक ही मर्द के साथ इस घर में राज करेंगी। वो तुझे भी उतना ही प्यार देंगे, जितना मुझे देते हैं। बल्कि तेरे इस मलाई जैसे बदन के लिए तो वो मुझसे भी ज्यादा तड़पेंगे। तुझे जो सुख और प्यार चाहिए, वो सब मिलेगा। मान जा छोटी, घर की बात घर में ही रह जाएगी।"

कमला की ये बातें सविता के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरीं। वह अवाक होकर अपनी जेठानी का चेहरा देखने लगी।

कमला ने सविता के चेहरे पर आए खौफ को देखा, तो उसने अपनी बात का पैंतरा बदला। उसने सविता के और करीब आकर, बहुत ही बेबाक अंदाज में फुसफुसाते हुए कहा, "और सुन छोटी, तू इतनी लाज क्यों दिखा रही है? वैसे भी पिछले दो महीनों से रात के अंधेरे में कोई न कोई अनजान मर्द तेरे कमरे में आकर तुझे भोग ही रहा है ना? तू रोज रात को किसी न किसी से चुद ही रही है! जब रोज़ कोई न कोई अनजान आकर तेरा ये गदराया हुआ बदन मसल कर चला जाता है, तो अब से अगर मेरा मर्द ही तेरी ले लेगा तो इसमें क्या फर्क पड़ जाएगा? रोज़ चुदना ही तो है, इसके लिए रोना क्या, पगली!"

सविता का मुँह खुला का खुला रह गया। कमला ने उसकी कमर पर अपना कड़ा हाथ फेरते हुए आगे कहा, "कम से कम मेरा मर्द तुझे पूरी आज़ादी देकर चोदेगा। तू जब चाहे उनके सामने नखरे भी कर सकती है। तू अपनी मर्जी चला सकती है। वो तुझे एक दासी की तरह नहीं, बल्कि एक रानी की तरह रखेंगे। रात के अंधेरे में बेहोशी में जबरदस्ती चुदने से तो लाख गुना अच्छा है कि तू पूरी आज़ादी के साथ, अपनी मर्जी से मेरे मर्द के नीचे सोए!"

कमला के मुँह से 'रोज़ चुदने' और 'आज़ादी से चोदने' की यह कड़वी और नग्न सच्चाई सुनकर सविता अंदर तक पूरी तरह काँप उठी। उसका पूरा वजूद शर्म से पानी-पानी हो गया। वह ऐसी जिंदगी के बारे में सोच भी कैसे सकती थी?

सविता ने अपना सिर जोर-जोर से हिलाया और रोते हुए बोली, "नहीं दीदी, तुम नहीं समझ रही हो! मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती हूँ? मेरा जवान बेटा चिंटू... वो 24 साल का लड़का है। जब वो शहर से घर आएगा, और अपनी माँ को अपने ताऊजी के कमरे की तरफ जाते देखेगा, तो उसके दिल पर क्या बीतेगी?"

सविता की आँखें खौफ से फटी की फटी रह गईं। उसके दिमाग में एक बेहद भयानक मंज़र तैर गया। उसने कल्पना की कि रात के सन्नाटे में जब वह अपने जेठ के बिस्तर पर उनके भारी और तगड़े बदन के नीचे दबी होगी, और जेठ की भूखी छुअन के कारण उसके मुँह से सिसकारियाँ निकलेंगी... और वही सिसकारियाँ अगर बगल के कमरे में सो रहे उसके जवान बेटे चिंटू के कानों तक पहुँच गईं, तो क्या होगा?

इस खौफनाक सोच मात्र से सविता के रोंगटे खड़े हो गए। उसने अपनी छाती को दोनों हाथों से भींच लिया, मानो वह उस दर्द और शर्म को छुपाना चाहती हो। वह बिलख-बिलख कर रोने लगी, "नहीं दीदी, नहीं! जब चिंटू अपनी माँ की वो सिसकारियाँ सुनेगा, तो मैं उसे अपनी कौन सी सूरत दिखाऊंगा? वो अपनी माँ से नफरत करने लगेगा। मैं तो जीते जी मर जाऊँगी दीदी... मैं जीते जी मर जाऊँगी। इससे अच्छा है कि मैं अपनी जान दे दूँ।"

कमला ने तुरंत सविता के मुँह पर अपना हाथ रख दिया। उसकी आँखें सिकुड़ गईं। वह समझ गई कि सविता को काबू में करने के लिए अब ममता और लोक-लाज के डर का आखिरी पासा फेंकना ही होगा।

गन्ने के खेत की ओट में सविता को बेबस और रोता पाकर कमला ने उसका हाथ दोबारा कसकर थाम लिया। वह फुसफुसाकर बोली, "चल, यहाँ पगडंडी पर खड़े होकर रोने-धोने से कोई हल नहीं निकलेगा। मेरे पति की शर्त तुझे मंजूर नहीं है, तो अब आखिरी रास्ता एक ही बचा है। हम सीधे बापूजी के पास चलते हैं। ससुर जी घर के सबसे सयाने और बड़े बुजुर्ग हैं। खानदान की इज्जत बचाने के लिए वो कोई न कोई बीच का रास्ता जरूर निकाल लेंगे।"

सविता कांपते हुए अपनी जेठानी के पीछे-पीछे चलने लगी। उसके पैर मिट्टी में धंस रहे थे। वह अंदर से अच्छी तरह जानती थी कि उसके ससुर एक बेहद गुस्से वाले, कड़क और रूढ़िवादी जमींदार मर्द थे। पूरे इलाके में उनके नाम की धौंस चलती थी। उन्हें अपने खानदान की आन-बान और शान अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी थी। वह औरतों को हमेशा पैर की जूती समझने और उन्हें घर के भीतर लंबे परदे में दबाकर रखने के सख्त कायल थे।

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खेत के दूसरे छोर पर, एक बड़े नीम के पेड़ के नीचे ठंडी छांव में ससुर जी की खाट बिछी हुई थी। दोपहर की तेज धूप और उमस भरी गर्मी के कारण उन्होंने बदन पर ऊपर कुछ नहीं पहना था। वह सिर्फ एक सफेद सूती धोती घुटनों तक बांधी हुई खाट पर अधलेटे थे। उम्र के इस पड़ाव में भी उनका देहाती बुढ़ापा साफ झलक रहा था। उनकी चौड़ी छाती पर घने सफेद बाल थे, जो कुदाल चलाने और खेतों की मिट्टी की वजह से कहीं-कहीं सने हुए थे। सिर के बाल और मूंछें पूरी तरह सफेद हो चुकी थीं, पर उनकी जमींदारी कड़क आँखों में आज भी एक अजीब सा रोब और भारीपन था।

जैसे ही दोनों बहुएं नीम के पेड़ के नीचे आकर खड़ी हुईं, ससुर जी खाट पर उठकर बैठ गए। दोनों बहुओं ने लोक-लाज के कारण अपनी साड़ी के पल्लू से लंबा घूंघट काढ़ रखा था। ससुर जी ने खाट पर बैठते हुए अपनी धोती को थोड़ा ठीक किया और अपनी भारी आवाज में पूछा, "तुम दोनों इस तपती दोपहर में यहाँ खेतों पर क्या कर रही हो? घर पर कोई काम-धंधा नहीं है क्या?"

कमला ने एक कदम आगे बढ़ाया और घूंघट के पीछे से दबी आवाज में कहा, "बापूजी... एक बहुत बड़ा अनर्थ हो गया है। घर की इज्जत पर बहुत बड़ी आफत आ गई है।"

ससुर जी ने अपनी घनी सफेद भौहें सिकाड़ीं और कड़ककर पूछा, "कैसी आफत? साफ-साफ बता, बात क्या है?"

कमला ने पीछे खड़ी सविता को थोड़ा आगे खींचते हुए कहा, "बापूजी, हमारी छोटी... यानी सविता के साथ पिछले दो महीने से रात के अंधेरे में कोई बहुत गंदा काम कर रहा था। उसे कुछ सुंघाकर बेबस कर दिया जाता था।"

ससुर जी खाट पर थोड़े और आगे खिसक आए, "क्या बक रही है? सीधा बोल, क्या हुआ है इसके साथ?"

कमला ने अपनी नजरें झुका लीं, "बापूजी... सविता दो महीने की गर्भवती हो गई है। इसके पेट में बच्चा ठहर गया है।"

यह सुनते ही जैसे नीम के पेड़ के नीचे बिजली कड़क उठी। ससुर जी के चेहरे की नसें गुस्से से तन गईं। उनकी आँखें सुर्ख लाल हो गईं। उन्होंने खाट के पाए पर अपना मजबूत हाथ जोर से मारा और गरजते हुए कहा, "क्या कहा तुमने?! गर्भवती?! यह पेट से हो गई है?!"

सविता डर के मारे थर-थर कांपने लगी और घूंघट के भीतर सुबकने लगी।

ससुर जी खाट से खड़े हो गए और चिल्लाए, "किसके काले पाप को अपने पेट में लेकर घूम रही है तू? पूरे खानदान का नाम मिट्टी में मिला देगी! छिनाल कहीं की!"

सविता के मुँह से रोते हुए सिर्फ इतना ही निकला, "बा... बापूजी... मैं... मैं बेकसूर हूँ..."

ससुर जी ने उसकी बात काटते हुए कहा, "बेकसूर?! हमारे जीते-जी इस घर में यह मुंह काला करवा कर आई है, और कहती है बेकसूर है!"

कमला ने तुरंत स्थिति को संभालने के लिए अपने हाथ जोड़े और ससुर के करीब जाकर फुसफुसाकर कहा, "बापूजी, गुस्सा मत कीजिए। बात को ठंडे दिमाग से समझिए। पाप तो हुआ है, लेकिन यह किसी बाहर वाले का पाप नहीं है।"

ससुर जी ने मूंछों को हाथ लगाया, "बाहर का नहीं है? तो क्या मतलब है तेरा?"

कमला ने उकसाने वाले और थोड़े सेक्सी लहजे में कहा, "बापूजी, यह इसी घर का बीज है। आप ही सोचिए, आपके होते हुए इस घर की ऊंची दहलीज को पार करके अंदर कदम रखने की हिम्मत और किसकी हो सकती है? सब आपके नाम से कांपते हैं।"

अपनी ऐसी तारीफ और मर्दानगी की बात सुनकर बूढ़े जमींदार के अहंकार को हवा मिल गई। उनका गुस्सा थोड़ा थमा, पर आँखों की चमक बदल गई। उन्होंने अपनी घनी सफेद मूंछों को कड़क हाथ से ताव दिया।

ससुर जी सीधे सविता के बिल्कुल करीब आकर खड़े हो गए। उनकी बूढ़ी और अनुभवी नजरें सविता की पतली कमर और साड़ी के पार से छलकते हुए उसके भारी, गदराए हुए 48 साल के मलाईदार जिस्म को ऊपर से नीचे तक घूरने लगीं।

ससुर जी के होठों पर एक घिनौनी मुस्कान आ गई, "हूँ... तभी मैं कहूँ कि मेरे बेटे को मरे जमाना बीत गया, फिर भी यह बहू इतनी खुश और खिली-खिली कैसे रहती है!"

सविता शर्म के मारे अपनी छाती को हाथों से भींचने लगी। ससुर जी ने आगे बढ़कर उसके घूंघट को थोड़ा पीछे खिसकाया, "देख जरा इसके बदन को, जवानी ढलने चली पर काया कैसी गदराई हुई है, जैसे दूध की मलाई हो! सच-सच बता बहू, कौन चोद रहा है तुझे रात के अंधेरे में?"

सविता ने कांपती आवाज में रोते हुए कहा, "बा... बापूजी... ऐसा मत... मत कहिए..."

ससुर जी ने उसकी जांघों और भारी नितंबों को घूरते हुए पूछा, "किसका पानी पीकर तेरा यह बदन इतना सुडौल हो रहा है? तेरा जेठ तेरी लेता है या तेरा अपना जवान बेटा चिंटू तेरे बिस्तर पर आता है?"

अपने ही ससुर के मुँह से सगे बेटे चिंटू का नाम इस तरह सुनकर सविता का कलेजा मुँह को आ गया। उसने रोते-बिलखते हुए घूंघट के अंदर से अपने हाथ जोड़े और कहा, "न... नहीं बापूजी! ऐसा मत बोलिए! अपनी जुबान से ऐसा घोर पाप मत निकालिए।"

ससुर जी ने आँखें तरेरीं, "तो फिर यह पेट कैसे आ गया?"

सविता ने बिलखते हुए सफ़ाई दी, "चिं... चिंटू मेरा बच्चा है बापूजी, वो तो बहुत सीधा लड़का है। वो अपनी माँ के बारे में ऐसा सोच भी नहीं सकता। उसके बारे में ऐसी गंदी बात मत कहिए बापूजी, मुझे यहीं जान से मार डालिए पर मेरे बच्चे के सिर ऐसा पाप मत मढ़िए..."

सविता की बात सुनते ही ससुर का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्हें लगा कि एक बहू उनके सामने जुबान लड़ा रही है। उन्होंने झटके से सविता का गोरा, गदराया हुआ बाहु पकड़ा और उसे पीछे धकेला।

ससुर जी भयंकर गुस्से में और कठोर मर्दाने लहजे में चिल्लाकर बोले, "तो क्या मैंने तुझे पेट से किया है, रण्डी?!"

सविता दर्द से कराह उठी, "बा... बापूजी... मेरा वो मतलब नहीं था..."

ससुर जी ने रूखेपन से चिल्लाते हुए कहा, "अपनी सफाई मुझे मत दे! किसी और के पाप को छिपाने के लिए अब मेरे घर के मर्दों का नाम उछालेगी? साली कुतिया कहीं की! रात को मजे लूटती है और अब यहाँ आकर सती सावित्री बन रही है!"

सविता पहली बार अपने बूढ़े ससुर का यह रूप देख रही थी। हमेशा समाज में मान-मर्यादा की बातें करने वाले ससुर के भीतर से आज एक भूखा जानवर बाहर आ गया था।

यह देखकर कमला तुरंत ससुर के पैरों में बैठ गई। हड़बड़ाहट में नीचे बैठते समय उसकी साड़ी का पल्लू उसके कांधे से पूरी तरह सरक कर जमीन पर गिर गया, जिससे कमला के भारी स्तन और गहरा सांवला बदन ससुर के ठीक सामने पूरी तरह खुल गया।

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कमला ने जानबूझकर अपने पल्लू को वापस नहीं संभाला और अपने स्तनों का उभार ससुर को दिखाते हुए उनके पैरों को सहलाने लगी। उसने एक शातिर लेकिन कामुक मुस्कान के साथ कहा, "बापूजी, गुस्सा थूक दीजिए। शांत हो जाइए।"

ससुर की नजरें नीचे बैठी कमला के खुले हुए बदन पर टिक गईं, "तू बीच में मत बोल कमला!"

कमला ने ससुर की जांघों को दबाते हुए एक अदा के साथ कहा, "बापूजी, अगर आप इस बच्चे को अपना नाम नहीं देंगे, तो पूरा गाँव हम पर थूकेगा। आपके रहते खानदान की इज्जत चौराहे पर नीलाम हो जाएगी। आप ही इस घर के मालिक हैं, हमारी लाज बचा लीजिए बापूजी। इसे अपना नाम दे दीजिए।"

ससुर की नजरें कमला के खुले बदन से हटकर वापस सामने खड़ी सविता की भारी जांघों पर टिक गईं। उनके भीतर का बूढ़ा जमींदार अब अपनी असली कामुक चाल पर आ चुका था। उन्होंने एक गहरी और भारी सांस ली।

ससुर जी खाट पर वापस बैठते हुए बोले, "चल, खानदान की नाक बचाने के लिए और तेरी बात रखने के लिए मैं इस बार तो इस बच्चे को अपना नाम दे दूँ... इसे दुनिया को अपना खून बता दूँ।"

कमला मुस्कुराई, "आपका बड़ा उपकार होगा बापूजी।"

ससुर जी ने मूंछों पर दोबारा हाथ फेरा, "लेकिन इसकी क्या गारंटी है? यह तो कल को फिर से आकर रोएगी कि रात को कोई मुझे चोद गया और मैं फिर से माँ बन गई! तब मैं किस-किस का नाम छुपाता फिरूंगा?"

सविता ने सुबकते हुए कहा, "बा... बापूजी, मैं अब अपने कमरे को अंदर से हमेशा मजबूत रखूंगी..."

ससुर ने उसकी बात अनसुनी करते हुए कठोरता से कहा, "मुझे क्या पता यह खानदान का खून है या किसी आवारा का? इस रण्डी का बदन देखकर तो किसी भी मर्द की नियत डोल जाए! बहू, इसके भीतर की जो आग है ना, वो इतनी आसानी से शांत नहीं होने वाली। ना जाने यह चुपके-चुपके किस-किस से चुद रही होगी और मजे ले रही होगी!"

सविता शर्म और अपमान के मारे ज़मीन में धंस जाना चाहती थी। उसका रो-रोकर बुरा हाल था।

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तभी ससुर जी ने सविता के भारी स्तन और पतली कमर की तरफ अपनी उंगली से सीधा इशारा किया और कड़ककर अपनी शर्त रखी, "इसलिए मेरा आखिरी फैसला सुन लो! अगर इस बच्चे को मेरा नाम चाहिए, तो यह सविता अब से हर रात मेरे कमरे में, मेरी खाट पर मेरे साथ सोएगी।"

सविता के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह घबराते हुए हकलाकर बोली, "बा... बापूजी... आपके कमरे में...?"

ससुर जी ने एक शातिर मुस्कान के साथ कहा, "हाँ, मैं खुद अपनी बाहों में इसे सुलाऊंगा। मैं भी तो देखूं कि मेरे होते हुए घर का या बाहर का कौन सा मर्द इसके कमरे की कुंडी खोलने और इसके इस गदराए बदन को हाथ लगाने की हिम्मत करता है! अब से इसके इस जिस्म पर सिर्फ मेरा पहरा होगा।"

नीम के पेड़ की छांव और बूढ़े ससुर की वह डरावनी, गरजती हुई आवाज को पीछे छोड़ दोनों बहुएं वापस घर की पगडंडी पर चल पड़ीं। दोपहर की धूप अब और तीखी हो चुकी थी, लेकिन सविता का पूरा बदन भीतर से बिल्कुल ठंडा पड़ चुका था। उसके पैर मन-मन भर के भारी हो रहे थे, मानो वो जमीन में धंसते जा रहे हों। उसका भारी, गदराया हुआ सीना तेज-तेज सांसों के चलने से बुरी तरह ऊपर-नीचे हो रहा था। आँखों से बहते आँसू उसकी सूती साड़ी के पल्लू को पूरी तरह भिगो चुके थे। वह रह-रहकर अपनी हिचकियाँ रोक रही थी, पर रोना था कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था।

कमला आगे-आगे कड़े कदमों से चल रही थी। सविता की लगातार सुबकने की आवाज़ सुनकर उसका पारा चढ़ गया। वह अचानक पगडंडी के एक सुनसान मोड़ पर रुकी, जहाँ दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे अरहर के खेत थे। उसने झटके से पीछे मुड़कर सविता का गोरा, भारी हाथ पकड़ा और उसे एक झटके से अपनी तरफ खींचते हुए थोड़े कड़े और डांटते हुए लहजे में बोली, "बस कर अब! कितना रोएगी? सुबह से देख रही हूँ, सिर्फ आँसू बहाए जा रही है। एक बात बता, जब वो रात के अंधेरे में आकर तुझे खूंटे से बांधता है, जब वो तेरे इस मलाईदार बदन को बेरहमी से नोचता है, तब क्यों नहीं थोड़ा दम दिखाती? तब थोड़ी हिम्मत करके चिल्ला देती, शोर मचा देती, तो आज यह नौबत ही क्यों आती?"

सविता ने रोते हुए अपनी बड़ी-बड़ी, सूजी हुई आँखें उठाईं। उसका घूंघट पूरी तरह पीछे सरक चुका था, जिससे उसका सुर्ख लाल चेहरा और गले पर पसीने की बूंदें साफ चमक रही थीं। उसने हिचकी लेते हुए कांपती आवाज में कहा, "दी... दीदी! तुम... तुम समझती क्यों नहीं हो? मैं... मैं कैसे चिल्लाती? जब मेरी आँख खुलती है, तो मेरा पूरा जिस्म पूरी तरह नंगा होता है। हाथ-पैर खाट के पायों से जकड़े होते हैं।"

वह अपनी साड़ी के पल्लू को छाती पर और कसते हुए आगे बोली, "मेरे बदन पर... मेरे इन भारी थनों पर, जांघों पर... उसके दांतों के काटने के निशान होते हैं... चूसने के लाल-लाल गहरे धब्बे पड़े होते हैं। वह मुझे पूरी तरह अपनी हवस में बांधकर रखता है। अगर मैं चिल्लाती भी, तो वह तो अंधेरे का फायदा उठाकर पिछवाड़े से भाग जाता। लेकिन मेरी आवाज़ सुनकर जब तुम सब दौड़कर कमरे में आते... और मुझे उस बेहद शर्मनाक, नंगी हालत में देखते... तो मैं अपनी क्या सूरत दिखाती?"

सविता का गला रूंध गया, उसने अपनी आँखें मूँद लीं और तड़पकर कहा, "मेरा जवान बेटा चिंटू... वो अपनी माँ को इस हाल में देखकर क्या सोचता दीदी? उसकी नजरों में तो मैं जीते जी मर जाती। और... और जेठ जी और ससुर जी... अगर वो दोनों मेरे उस नंगे, भरे-पूरे बदन को अपनी आँखों से देख लेते, तो क्या होता? वो तो तुमने आज खुद अपनी आँखों से देख ही लिया ना! जेठ जी खेतों में खड़े होकर मेरे बदन के अंगों का नाम ले-लेकर हवस की बातें कर रहे थे। उन्हें अपनी बहू के लिए ऐसी गंदी बात बोलते हुए जरा भी शर्म नहीं आई। अगर वो मुझे रात को नंगा देख लेते, तो वो तो अगले ही दिन से खुलेआम मेरे बिस्तर पर आने की जिद करते! क्या तब भी वो यही सब नहीं बोलते जो आज उन्होंने सरेआम कहा है?"

कमला ने उसकी बात सुनी, पर उसके चेहरे पर दया का एक भी भाव नहीं आया। वह हाथ बांधकर सविता के गदराए बदन को देखने लगी।

सविता ने ससुर की बात याद करते हुए अपने चेहरे को हाथों से छिपा लिया और रोते हुए कहा, "और... और जिस बूढ़े को मैं अब तक अपने पिता के समान समझ रही थी... उस ससुर की सोच कितनी घिनौनी और नीच निकली दीदी! तुम सुन रही थी ना वो क्या कह रहे थे? वो मुझे सीधे-सीधे अपने कमरे में, अपनी खाट पर सुलाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने साफ शब्दों में तो नहीं कहा, लेकिन उनका इरादा क्या था, क्या तुम समझ नहीं पाईं? वो मेरी सुरक्षा का बहाना बनाकर मेरे इस बदन के साथ खेलना चाहते हैं, इसे अपनी मर्जी से निचोड़ना चाहते हैं। दीदी, तुम सब देख रही थी ना... उनका असली जानवर कैसे बाहर आ गया था?"

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कमला ने एक गहरी सांस ली। उसने आगे बढ़कर सविता के हाथों को उसके चेहरे से हटाया। उसकी आँखें बेहद शातिर और ठंडी हो चुकी थीं। उसने सविता के भारी और थर-थर कांपते कूल्हों पर अपना हाथ रखा और एक तीखे, कामुक लहजे में फुसफुसाकर बोली, "देख छोटी... रोना-धोना बंद कर और मेरी बात कान खोलकर सुन। अब जो होना था, वो हो चुका है। तेरे पेट में दो महीने का बच्चा पल रहा है, जिसे छुपाया नहीं जा सकता। तू अपने जवान बेटे चिंटू को तो यह सब कभी बता नहीं सकती, क्योंकि वो इस सच को बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।"

कमला ने सविता के चेहरे को थोड़ा ऊपर उठाया और बोली, "अब इस बच्चे को इस खानदान का नाम दिलाने के लिए और समाज के सामने अपनी इज्जत बचाने के लिए, तुझे खुद ही फैसला करना होगा। तेरे सामने अब यही दो मर्द हैं। अब तुझे खुद चुनना होगा कि तुझे किसके साथ रहना है, किसके बिस्तर को गर्म करना है। तू बिल्कुल सही कह रही है, बापूजी को तेरी कोई फिक्र नहीं है। वो तो सिर्फ इस बुढ़ापे में तेरी इस भारी, सुडौल काया को अपनी बाहों में भींचना चाहते हैं। वो सुरक्षा के बहाने तेरे इस गोरे जिस्म का सारा रस निचोड़ना चाहते हैं।"

कमला ने एक पल का ठहराव लिया और अपनी उंगली से वापस खेतों की तरफ इशारा करते हुए कहा, "या तो तू बापूजी की शर्त मानकर हर रात उनके कमरे की खाट पर अपनी पीठ लगा, या फिर वापस मेरे मर्द के पास चल। मेरा मर्द कम से कम जवान है, तगड़ा है, और वो तुझे अपनी रानी बनाकर रखेगा। तू उसके सामने नखरे भी कर पाएगी। अब फैसला तेरे हाथ में है छोटी... बता, इस भारी और रसदार बदन को चखने के लिए तू इन दोनों मर्दों में से किसे चुनेगी?"


सविता पगडंडी के बीचों-बीच खड़ी होकर सन्न रह गई। गन्ने और अरहर के ऊंचे खेतों के बीच, दोपहर के सन्नाटे में, उसे ऐसा लगा मानो उसका वजूद दो भूखे भेड़ियों के बीच पूरी तरह घिर चुका है।
Nice update. Savita ko majhdhar me chhod diya hai.
 
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Premkumar65

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Update 05

कमला के कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था। सविता खाट पर बैठी अपने आँसू पोंछ रही थी। कमला हाथ बाँधे कमरे में चक्कर काट रही थी। उसका सांवला और भारी-भरकम कसरती बदन गुस्से की वजह से तप रहा था।

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वह अचानक सविता के पास आई। उसके गोरे, गदराए हुए कंधे पर अपना मजबूत हाथ रखा। उसने कंधे को कसकर दबाया और फुसफुसाकर बोली, "सुन छोटी, रोने से आफत नहीं टलेगी। दो महीने का बच्चा पेट में आ गया है। कुछ दिनों में पेट बाहर दिखने लगेगा। पूरा गाँव थू-थू करेगा। हमें आज ही इस बच्चे के असली बाप का पता लगाना होगा।"

सविता ने कांपते हुए अपनी दूधिया आँखें उठाईं, "कैसी तरकीब दीदी? मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा। लाज के मारे मेरा दम निकला जा रहा है।"

कमला के होठों पर एक शातिर मुस्कान तैर गई। उसने सविता के ब्लाउज के ऊपर से छलकते हुए भारी उभारों को छुआ और बोली, "हम अभी इसी वक्त खेतों पर चलेंगे। तेरे जेठ वहाँ अकेले काम कर रहे हैं। मैं सीधे उन पर इल्जाम लगाऊंगी कि उन्होंने ही रात के अंधेरे में तेरे साथ यह सब किया है। अगर वो मुजरिम हुए, तो पकड़े जाएंगे।"

सविता शर्म से पानी-पानी हो गई। उसका पूरा 48 साल का भारी जिस्म काँप उठा। उसने घबराकर कमला के हाथ पकड़ लिए, "नहीं दीदी! जेठ जी के सामने ऐसी बात मत करो। मैं उनके सामने कभी आँख भी नहीं उठा पाऊंगी।"

कमला ने जबरदस्ती सविता को खाट से उठाया। उसकी अस्त-व्यस्त साड़ी को ठीक किया। उसे खींचते हुए घर के पिछले दरवाजे से खेतों की तरफ ले चली।

दोपहर की तेज धूप खिली हुई थी। खेतों का वह कोना बिल्कुल सुनसान था। वहाँ ऊंचे-ऊंचे गन्ने के लहलहाते खेत थे। सविता का जेठ अकेला कुदाल चला रहा था। उसका बदन पसीने से लथपथ था। एक तगड़े देहाती मर्द की ताकत उसकी चौड़ी छाती से साफ झलक रही थी।

उसने कमला और सविता को आते देखा तो कुदाल रोक दी। उसकी नजरें तुरंत सविता के उस भारी-भरकम, गदराए और पसीने से भीगे बदन पर जा टिकीं। धूप की वजह से सविता का गोरा चेहरा सुर्ख लाल हो चुका था। उसकी भारी छाती तेज सांसों के कारण ऊपर-नीचे हो रही थी। इसे देखकर जेठ के भीतर का मर्द मचल उठा।

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कमला अपने पति के करीब आई। उसने हाथ नचाते हुए बेहद कड़े लहजे में कहा, "सुनिए जी, जरा हाथ रोकिए। आज आपको सच उगलना ही होगा।"

जेठ ने माथे का पसीना पोंछा, "क्या हुआ? इस वक्त यहाँ क्यों आई हो?"

कमला ने सविता की तरफ इशारा किया, "हमारी छोटी दो महीने की गर्भवती है। यह माँ बनने वाली है। मुझे पूरा यकीन है कि रात के अंधेरे में इसके कमरे की कुंडी खोलकर इसके इस मक्खन जैसे गोरे बदन को तर करने वाले आप ही हैं!"

जेठ के होश उड़ गए। उसने अचरज से अपनी आँखें फाड़कर सविता के उस भरे-पूरे पेट को देखा, जो साड़ी के भीतर से साफ गदराया हुआ लग रहा था। वह सकपका गया। उसने अपनी कुदाल को जमीन पर पटका और गुस्से में बोला, "क्या? तुम पागल तो नहीं हो गई हो कमला? कुछ भी बक रही हो! सविता पेट से है तो इसमें मेरा नाम क्यों घसीट रही हो?"

कमला ने अपनी भौहें सिकाड़कर कहा, "तो और कौन करेगा? तुम्हारी नजरें हमेशा इसकी पतली कमर और भारी चूत पर टिकी रहती हैं।"

जेठ ने अपनी आवाज को और ऊंचा किया। वह सीधा सविता के बिल्कुल करीब आ गया। उसने सविता के कांपते हुए बदन को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए, उसके एक-एक अंग की तरफ सीधा अपनी उंगली से इशारा करना शुरू कर दिया।

जेठ ने सविता की साड़ी के पार से छलकती हुई उसकी भारी चूत और जाँघों की तरफ इशारा करते हुए चिल्लाकर कहा, "कमला, जरा आँखें खोलकर इसके जिस्म को देख! ऐसी गदराई और भारी-भरकम औरत की चूत मारने में तो अच्छे-भले मर्द की जान ही निकल जाए! इसके इस मलाईदार चौड़े नितंबों और भारी जाँघों का वजन संभालना कोई हँसी-मजाक है क्या?"

फिर उसने सविता के ब्लाउज के भीतर कसे हुए विशाल और फूले हुए स्तनों की तरफ उंगली उठाई, "इसके इन भारी और बड़े-बड़े थनों को दबाने और चूसने में ही आधी रात बीत जाए! मैं तो हर रात तुम्हारे पास सोता हूँ कमला। तुम्हारी रोज लेता हूँ और तुम्हारे साथ ही मेरा सारा पानी तुम खुद निचोड़ लेती हो। जब तुम्हारे साथ ही मेरा सारा दम निकल जाता है, तो इसके इस गदराए और भारी बदन की चूत फाड़ने की ताकत मेरे भीतर कहाँ से बचेगी?"

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जेठ के मुँह से अपने जिस्म के एक-एक प्राइवेट अंग का ऐसा खुला और बेबाक ज़िक्र सुनकर सविता के पैरों तले से ज़मीन पूरी तरह खिसक गई। लाज और शर्म के मारे उसका चेहरा एकदम सुर्ख लाल पड़ गया। उसे ऐसा महसूस होने लगा मानो जेठ की वे भूखी उंगलियाँ और गंदी नजरें खुलेआम धूप में उसके पूरे कपड़े उतारकर उसे नंगा कर रही हों। वह मारे शर्म के अपनी छाती को दोनों हाथों से भींचने लगी।

सविता ने रोते हुए, हिचकियाँ लेते हुए दबी आवाज़ में कहा, "जेठ... जेठ जी! बस करो... लाज की लाज तो मत बेचो खाओ। दीदी के सामने मेरे बदन की ऐसी गंदी बातें मत करो... मेरा दम घुट रहा है।"

लेकिन जेठ रुकने का नाम नहीं ले रहा था। उसने कमला की तरफ पलटकर आगे कहा, "जरा सोचो, अगर मैं अगले दिन खेतों पर काम करने के बजाय सोता ही रहूँगा और तुम दोनों औरतों को अपना माल दिया, तो मेरा तो कचुंबर ही निकल जाएगा! अरे, हमारे बापूजी और इसका अपना जवान बेटा चिंटू... उन दोनों को तो घर में कोई चूत मिल नहीं रही है! घर में तुम्हारे जैसी एक औरत मेरे पास है, लेकिन उन दोनों के पास तो हाथ साफ करने के लिए कोई दूसरी औरत भी नहीं है।"

सविता ने अपने दोनों हाथों से अपने कान बंद करने की कोशिश की, "नहीं... नहीं! चुप हो जाओ जेठ जी... चिंटू मेरा बेटा है, बापूजी मेरे पिता समान हैं... ऐसा घिनौना पाप उनके सिर मत मढ़ो..."

जेठ ने उसकी बात को पूरी तरह अनसुना करते हुए कहा, "वे दोनों ही घर में इस सविता को देखकर, इसके इस गदराए और नंगे जिस्म को साड़ी के पार से निहार कर सबसे ज्यादा तड़पते होंगे। असली भूख तो उन दोनों के भीतर सुलग रही है, क्योंकि उनके पास अपनी प्यास बुझाने का कोई जरिया नहीं है। तो सारा इल्जाम सिर्फ मुझ पर ही क्यों मढ़ रही हो?"

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सविता का माँ का दिल और एक औरत का वजूद इस बातचीत से पूरी तरह टूट चुका था। वह बस काँप रही थी और ज़मीन में धंस जाना चाहती थी।

जेठ ने जब देखा कि कमला उसकी इन दलीलों से पूरी तरह खामोश हो गई है, तो उसकी आँखों में अचानक एक भयंकर, भूखी और कामुक चमक आ गई। वह और करीब आ गया।

उसने सविता के उस 48 साल के मलाई जैसे गोरे, भारी-भरकम बदन को अपनी नजरों से पूरी तरह नापा। वह मुस्कुराकर बोला, "देखो, बच्चा तो मेरा नहीं है... यह बात मैं भी जानता हूँ और तुम दोनों भी।"

कमला ने पूछा, "तो फिर अब आगे क्या होगा?"

जेठ ने मुस्कुराते हुए अपनी चाल चली और बोला, "अगर तुम दोनों चाहती हो कि इस बच्चे को समाज में एक नाम मिले और खानदान की इज्जत बची रहे, तो मेरी भी एक शर्त है।"

सविता ने डरते हुए अपनी आँखें उठाईं। जेठ ने सीधे उसकी आँखों में देखा, "अगर सविता आगे से हमेशा मेरे साथ ही रहेगी, अपने इस गदराए और रसीले जिस्म पर मुझे पूरा और खुला हक देगी, तो मैं दुनिया के सामने इस बच्चे को अपना नाम दे सकता हूँ।"

सविता के पैरों तले से जमीन खिसक गई। जेठ ने आगे कहा, "मुझे अपनी इस खूबसूरत, गोरी देवरानी की जवानी का रस चखने का मौका मिले, तो मैं पूरी जिंदगी की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हूँ। अब से तुम दोनों औरतें मेरे साथ रहोगी, एक ही छत के नीचे और एक ही बिस्तर पर। बोलो सविता, तुम्हें जेठ की यह शर्त मंजूर है?"

यह तीखी शर्त सुनते ही सविता का गला सूख गया। क्या अब उसे समाज की नजरों के सामने, खुलेआम अपने सगे जेठ के साथ सोना होगा? क्या अब हर रात उसकी खाट पर जेठ का यह भारी और तगड़ा मर्दाना बदन आकर उसकी आबरू को भोगेगा?

अपमान का यह घड़ा सविता के सब्र से बाहर हो गया। वह अब एक पल भी वहाँ खड़ी नहीं रह सकी। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने जोर से रोते हुए अपना सिर हिलाया और वह पागलों की तरह खेतों से गाँव के रास्ते की तरफ भाग खड़ी हुई।

"सविता! छोटी! रुक... सुन तो सही!" कमला ने पीछे से आवाज लगाई।

सविता ने मुड़कर नहीं देखा। उसका भारी बदन साड़ी संभाले हुए खेतों की पगडंडियों पर तेजी से दौड़ रहा था। कमला ने गुस्से में अपने पति को घूरा और फिर तेजी से दौड़ती हुई सविता के पीछे उसे पकड़ने और काबू में करने के लिए भाग पड़ी।

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सविता बदहवास होकर खेतों की पगडंडी पर दौड़े जा रही थी। उसका भारी और गदराया हुआ बदन हांफ रहा था। तेज दौड़ने की वजह से उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार कंधे से सरक रहा था। उसकी आँखों से बहते आँसू गोरे गालों को भिगो रहे थे।

पीछे से कमला ने अपनी कसरती काया का पूरा जोर लगाया। उसने दौड़कर सीधे सविता का हाथ पकड़ लिया। उसने सविता को एक ऊंचे गन्ने के खेत की ओट में खींच लिया, जहाँ दूर-दूर तक कोई देखने वाला नहीं था।

कमला ने हांफते हुए सविता के दोनों कंधे पकड़े। उन्हें झकझोरते हुए बोली, "अरे रुक! कहाँ भागी जा रही है पागलों की तरह? मेरी बात तो सुन!"

सविता ने रोते हुए अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, "मुझे जाने दो दीदी! मुझे घर जाने दो। जेठ जी ने जो कहा... वैसी घिनौना बात मैं जीते जी कभी मंजूर नहीं कर सकती। मेरा दम घुट रहा है।"

कमला ने उसे और कसकर पकड़ा। उसका सांवला चेहरा अब बेहद गंभीर और शातिर हो चुका था। उसने अपनी आवाज को धीमा लेकिन बेहद वजनदार बनाते हुए कहा, "पागल मत बन, छोटी! ठंडे दिमाग से सोच। मेरे पति यानी तेरे जेठ तेरे इस बच्चे को अपना नाम देने के लिए तैयार हैं। इससे बड़ी बात और क्या होगी?"

सविता ने तड़पकर कहा, "पर दीदी, वो इस नाम के बदले मुझसे मेरे जिस्म का सौदा मांग रहे हैं! क्या तुम एक पत्नी होकर यह सब सह लोगी?"

कमला ने एक ठंडी सांस ली। उसने सविता के गोरे, पसीने से तर गाल को सहलाने लगी। वह बड़े ही अजीब और बेबाक लहजे में बोली, "अरे, इस पेट में पल रहे बच्चे का असली बाप कौन है, इससे क्या फर्क पड़ता है? कोई भी हो! अब तो वो आ गया है ना? और जहाँ तक बात मेरे पति की है, तो मैं हूँ ना तेरे साथ। हम दोनों बहनें बनकर, एक ही मर्द के साथ इस घर में राज करेंगी। वो तुझे भी उतना ही प्यार देंगे, जितना मुझे देते हैं। बल्कि तेरे इस मलाई जैसे बदन के लिए तो वो मुझसे भी ज्यादा तड़पेंगे। तुझे जो सुख और प्यार चाहिए, वो सब मिलेगा। मान जा छोटी, घर की बात घर में ही रह जाएगी।"

कमला की ये बातें सविता के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरीं। वह अवाक होकर अपनी जेठानी का चेहरा देखने लगी।

कमला ने सविता के चेहरे पर आए खौफ को देखा, तो उसने अपनी बात का पैंतरा बदला। उसने सविता के और करीब आकर, बहुत ही बेबाक अंदाज में फुसफुसाते हुए कहा, "और सुन छोटी, तू इतनी लाज क्यों दिखा रही है? वैसे भी पिछले दो महीनों से रात के अंधेरे में कोई न कोई अनजान मर्द तेरे कमरे में आकर तुझे भोग ही रहा है ना? तू रोज रात को किसी न किसी से चुद ही रही है! जब रोज़ कोई न कोई अनजान आकर तेरा ये गदराया हुआ बदन मसल कर चला जाता है, तो अब से अगर मेरा मर्द ही तेरी ले लेगा तो इसमें क्या फर्क पड़ जाएगा? रोज़ चुदना ही तो है, इसके लिए रोना क्या, पगली!"

सविता का मुँह खुला का खुला रह गया। कमला ने उसकी कमर पर अपना कड़ा हाथ फेरते हुए आगे कहा, "कम से कम मेरा मर्द तुझे पूरी आज़ादी देकर चोदेगा। तू जब चाहे उनके सामने नखरे भी कर सकती है। तू अपनी मर्जी चला सकती है। वो तुझे एक दासी की तरह नहीं, बल्कि एक रानी की तरह रखेंगे। रात के अंधेरे में बेहोशी में जबरदस्ती चुदने से तो लाख गुना अच्छा है कि तू पूरी आज़ादी के साथ, अपनी मर्जी से मेरे मर्द के नीचे सोए!"

कमला के मुँह से 'रोज़ चुदने' और 'आज़ादी से चोदने' की यह कड़वी और नग्न सच्चाई सुनकर सविता अंदर तक पूरी तरह काँप उठी। उसका पूरा वजूद शर्म से पानी-पानी हो गया। वह ऐसी जिंदगी के बारे में सोच भी कैसे सकती थी?

सविता ने अपना सिर जोर-जोर से हिलाया और रोते हुए बोली, "नहीं दीदी, तुम नहीं समझ रही हो! मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती हूँ? मेरा जवान बेटा चिंटू... वो 24 साल का लड़का है। जब वो शहर से घर आएगा, और अपनी माँ को अपने ताऊजी के कमरे की तरफ जाते देखेगा, तो उसके दिल पर क्या बीतेगी?"

सविता की आँखें खौफ से फटी की फटी रह गईं। उसके दिमाग में एक बेहद भयानक मंज़र तैर गया। उसने कल्पना की कि रात के सन्नाटे में जब वह अपने जेठ के बिस्तर पर उनके भारी और तगड़े बदन के नीचे दबी होगी, और जेठ की भूखी छुअन के कारण उसके मुँह से सिसकारियाँ निकलेंगी... और वही सिसकारियाँ अगर बगल के कमरे में सो रहे उसके जवान बेटे चिंटू के कानों तक पहुँच गईं, तो क्या होगा?

इस खौफनाक सोच मात्र से सविता के रोंगटे खड़े हो गए। उसने अपनी छाती को दोनों हाथों से भींच लिया, मानो वह उस दर्द और शर्म को छुपाना चाहती हो। वह बिलख-बिलख कर रोने लगी, "नहीं दीदी, नहीं! जब चिंटू अपनी माँ की वो सिसकारियाँ सुनेगा, तो मैं उसे अपनी कौन सी सूरत दिखाऊंगा? वो अपनी माँ से नफरत करने लगेगा। मैं तो जीते जी मर जाऊँगी दीदी... मैं जीते जी मर जाऊँगी। इससे अच्छा है कि मैं अपनी जान दे दूँ।"

कमला ने तुरंत सविता के मुँह पर अपना हाथ रख दिया। उसकी आँखें सिकुड़ गईं। वह समझ गई कि सविता को काबू में करने के लिए अब ममता और लोक-लाज के डर का आखिरी पासा फेंकना ही होगा।

गन्ने के खेत की ओट में सविता को बेबस और रोता पाकर कमला ने उसका हाथ दोबारा कसकर थाम लिया। वह फुसफुसाकर बोली, "चल, यहाँ पगडंडी पर खड़े होकर रोने-धोने से कोई हल नहीं निकलेगा। मेरे पति की शर्त तुझे मंजूर नहीं है, तो अब आखिरी रास्ता एक ही बचा है। हम सीधे बापूजी के पास चलते हैं। ससुर जी घर के सबसे सयाने और बड़े बुजुर्ग हैं। खानदान की इज्जत बचाने के लिए वो कोई न कोई बीच का रास्ता जरूर निकाल लेंगे।"

सविता कांपते हुए अपनी जेठानी के पीछे-पीछे चलने लगी। उसके पैर मिट्टी में धंस रहे थे। वह अंदर से अच्छी तरह जानती थी कि उसके ससुर एक बेहद गुस्से वाले, कड़क और रूढ़िवादी जमींदार मर्द थे। पूरे इलाके में उनके नाम की धौंस चलती थी। उन्हें अपने खानदान की आन-बान और शान अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी थी। वह औरतों को हमेशा पैर की जूती समझने और उन्हें घर के भीतर लंबे परदे में दबाकर रखने के सख्त कायल थे।

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खेत के दूसरे छोर पर, एक बड़े नीम के पेड़ के नीचे ठंडी छांव में ससुर जी की खाट बिछी हुई थी। दोपहर की तेज धूप और उमस भरी गर्मी के कारण उन्होंने बदन पर ऊपर कुछ नहीं पहना था। वह सिर्फ एक सफेद सूती धोती घुटनों तक बांधी हुई खाट पर अधलेटे थे। उम्र के इस पड़ाव में भी उनका देहाती बुढ़ापा साफ झलक रहा था। उनकी चौड़ी छाती पर घने सफेद बाल थे, जो कुदाल चलाने और खेतों की मिट्टी की वजह से कहीं-कहीं सने हुए थे। सिर के बाल और मूंछें पूरी तरह सफेद हो चुकी थीं, पर उनकी जमींदारी कड़क आँखों में आज भी एक अजीब सा रोब और भारीपन था।

जैसे ही दोनों बहुएं नीम के पेड़ के नीचे आकर खड़ी हुईं, ससुर जी खाट पर उठकर बैठ गए। दोनों बहुओं ने लोक-लाज के कारण अपनी साड़ी के पल्लू से लंबा घूंघट काढ़ रखा था। ससुर जी ने खाट पर बैठते हुए अपनी धोती को थोड़ा ठीक किया और अपनी भारी आवाज में पूछा, "तुम दोनों इस तपती दोपहर में यहाँ खेतों पर क्या कर रही हो? घर पर कोई काम-धंधा नहीं है क्या?"

कमला ने एक कदम आगे बढ़ाया और घूंघट के पीछे से दबी आवाज में कहा, "बापूजी... एक बहुत बड़ा अनर्थ हो गया है। घर की इज्जत पर बहुत बड़ी आफत आ गई है।"

ससुर जी ने अपनी घनी सफेद भौहें सिकाड़ीं और कड़ककर पूछा, "कैसी आफत? साफ-साफ बता, बात क्या है?"

कमला ने पीछे खड़ी सविता को थोड़ा आगे खींचते हुए कहा, "बापूजी, हमारी छोटी... यानी सविता के साथ पिछले दो महीने से रात के अंधेरे में कोई बहुत गंदा काम कर रहा था। उसे कुछ सुंघाकर बेबस कर दिया जाता था।"

ससुर जी खाट पर थोड़े और आगे खिसक आए, "क्या बक रही है? सीधा बोल, क्या हुआ है इसके साथ?"

कमला ने अपनी नजरें झुका लीं, "बापूजी... सविता दो महीने की गर्भवती हो गई है। इसके पेट में बच्चा ठहर गया है।"

यह सुनते ही जैसे नीम के पेड़ के नीचे बिजली कड़क उठी। ससुर जी के चेहरे की नसें गुस्से से तन गईं। उनकी आँखें सुर्ख लाल हो गईं। उन्होंने खाट के पाए पर अपना मजबूत हाथ जोर से मारा और गरजते हुए कहा, "क्या कहा तुमने?! गर्भवती?! यह पेट से हो गई है?!"

सविता डर के मारे थर-थर कांपने लगी और घूंघट के भीतर सुबकने लगी।

ससुर जी खाट से खड़े हो गए और चिल्लाए, "किसके काले पाप को अपने पेट में लेकर घूम रही है तू? पूरे खानदान का नाम मिट्टी में मिला देगी! छिनाल कहीं की!"

सविता के मुँह से रोते हुए सिर्फ इतना ही निकला, "बा... बापूजी... मैं... मैं बेकसूर हूँ..."

ससुर जी ने उसकी बात काटते हुए कहा, "बेकसूर?! हमारे जीते-जी इस घर में यह मुंह काला करवा कर आई है, और कहती है बेकसूर है!"

कमला ने तुरंत स्थिति को संभालने के लिए अपने हाथ जोड़े और ससुर के करीब जाकर फुसफुसाकर कहा, "बापूजी, गुस्सा मत कीजिए। बात को ठंडे दिमाग से समझिए। पाप तो हुआ है, लेकिन यह किसी बाहर वाले का पाप नहीं है।"

ससुर जी ने मूंछों को हाथ लगाया, "बाहर का नहीं है? तो क्या मतलब है तेरा?"

कमला ने उकसाने वाले और थोड़े सेक्सी लहजे में कहा, "बापूजी, यह इसी घर का बीज है। आप ही सोचिए, आपके होते हुए इस घर की ऊंची दहलीज को पार करके अंदर कदम रखने की हिम्मत और किसकी हो सकती है? सब आपके नाम से कांपते हैं।"

अपनी ऐसी तारीफ और मर्दानगी की बात सुनकर बूढ़े जमींदार के अहंकार को हवा मिल गई। उनका गुस्सा थोड़ा थमा, पर आँखों की चमक बदल गई। उन्होंने अपनी घनी सफेद मूंछों को कड़क हाथ से ताव दिया।

ससुर जी सीधे सविता के बिल्कुल करीब आकर खड़े हो गए। उनकी बूढ़ी और अनुभवी नजरें सविता की पतली कमर और साड़ी के पार से छलकते हुए उसके भारी, गदराए हुए 48 साल के मलाईदार जिस्म को ऊपर से नीचे तक घूरने लगीं।

ससुर जी के होठों पर एक घिनौनी मुस्कान आ गई, "हूँ... तभी मैं कहूँ कि मेरे बेटे को मरे जमाना बीत गया, फिर भी यह बहू इतनी खुश और खिली-खिली कैसे रहती है!"

सविता शर्म के मारे अपनी छाती को हाथों से भींचने लगी। ससुर जी ने आगे बढ़कर उसके घूंघट को थोड़ा पीछे खिसकाया, "देख जरा इसके बदन को, जवानी ढलने चली पर काया कैसी गदराई हुई है, जैसे दूध की मलाई हो! सच-सच बता बहू, कौन चोद रहा है तुझे रात के अंधेरे में?"

सविता ने कांपती आवाज में रोते हुए कहा, "बा... बापूजी... ऐसा मत... मत कहिए..."

ससुर जी ने उसकी जांघों और भारी नितंबों को घूरते हुए पूछा, "किसका पानी पीकर तेरा यह बदन इतना सुडौल हो रहा है? तेरा जेठ तेरी लेता है या तेरा अपना जवान बेटा चिंटू तेरे बिस्तर पर आता है?"

अपने ही ससुर के मुँह से सगे बेटे चिंटू का नाम इस तरह सुनकर सविता का कलेजा मुँह को आ गया। उसने रोते-बिलखते हुए घूंघट के अंदर से अपने हाथ जोड़े और कहा, "न... नहीं बापूजी! ऐसा मत बोलिए! अपनी जुबान से ऐसा घोर पाप मत निकालिए।"

ससुर जी ने आँखें तरेरीं, "तो फिर यह पेट कैसे आ गया?"

सविता ने बिलखते हुए सफ़ाई दी, "चिं... चिंटू मेरा बच्चा है बापूजी, वो तो बहुत सीधा लड़का है। वो अपनी माँ के बारे में ऐसा सोच भी नहीं सकता। उसके बारे में ऐसी गंदी बात मत कहिए बापूजी, मुझे यहीं जान से मार डालिए पर मेरे बच्चे के सिर ऐसा पाप मत मढ़िए..."

सविता की बात सुनते ही ससुर का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्हें लगा कि एक बहू उनके सामने जुबान लड़ा रही है। उन्होंने झटके से सविता का गोरा, गदराया हुआ बाहु पकड़ा और उसे पीछे धकेला।

ससुर जी भयंकर गुस्से में और कठोर मर्दाने लहजे में चिल्लाकर बोले, "तो क्या मैंने तुझे पेट से किया है, रण्डी?!"

सविता दर्द से कराह उठी, "बा... बापूजी... मेरा वो मतलब नहीं था..."

ससुर जी ने रूखेपन से चिल्लाते हुए कहा, "अपनी सफाई मुझे मत दे! किसी और के पाप को छिपाने के लिए अब मेरे घर के मर्दों का नाम उछालेगी? साली कुतिया कहीं की! रात को मजे लूटती है और अब यहाँ आकर सती सावित्री बन रही है!"

सविता पहली बार अपने बूढ़े ससुर का यह रूप देख रही थी। हमेशा समाज में मान-मर्यादा की बातें करने वाले ससुर के भीतर से आज एक भूखा जानवर बाहर आ गया था।

यह देखकर कमला तुरंत ससुर के पैरों में बैठ गई। हड़बड़ाहट में नीचे बैठते समय उसकी साड़ी का पल्लू उसके कांधे से पूरी तरह सरक कर जमीन पर गिर गया, जिससे कमला के भारी स्तन और गहरा सांवला बदन ससुर के ठीक सामने पूरी तरह खुल गया।

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कमला ने जानबूझकर अपने पल्लू को वापस नहीं संभाला और अपने स्तनों का उभार ससुर को दिखाते हुए उनके पैरों को सहलाने लगी। उसने एक शातिर लेकिन कामुक मुस्कान के साथ कहा, "बापूजी, गुस्सा थूक दीजिए। शांत हो जाइए।"

ससुर की नजरें नीचे बैठी कमला के खुले हुए बदन पर टिक गईं, "तू बीच में मत बोल कमला!"

कमला ने ससुर की जांघों को दबाते हुए एक अदा के साथ कहा, "बापूजी, अगर आप इस बच्चे को अपना नाम नहीं देंगे, तो पूरा गाँव हम पर थूकेगा। आपके रहते खानदान की इज्जत चौराहे पर नीलाम हो जाएगी। आप ही इस घर के मालिक हैं, हमारी लाज बचा लीजिए बापूजी। इसे अपना नाम दे दीजिए।"

ससुर की नजरें कमला के खुले बदन से हटकर वापस सामने खड़ी सविता की भारी जांघों पर टिक गईं। उनके भीतर का बूढ़ा जमींदार अब अपनी असली कामुक चाल पर आ चुका था। उन्होंने एक गहरी और भारी सांस ली।

ससुर जी खाट पर वापस बैठते हुए बोले, "चल, खानदान की नाक बचाने के लिए और तेरी बात रखने के लिए मैं इस बार तो इस बच्चे को अपना नाम दे दूँ... इसे दुनिया को अपना खून बता दूँ।"

कमला मुस्कुराई, "आपका बड़ा उपकार होगा बापूजी।"

ससुर जी ने मूंछों पर दोबारा हाथ फेरा, "लेकिन इसकी क्या गारंटी है? यह तो कल को फिर से आकर रोएगी कि रात को कोई मुझे चोद गया और मैं फिर से माँ बन गई! तब मैं किस-किस का नाम छुपाता फिरूंगा?"

सविता ने सुबकते हुए कहा, "बा... बापूजी, मैं अब अपने कमरे को अंदर से हमेशा मजबूत रखूंगी..."

ससुर ने उसकी बात अनसुनी करते हुए कठोरता से कहा, "मुझे क्या पता यह खानदान का खून है या किसी आवारा का? इस रण्डी का बदन देखकर तो किसी भी मर्द की नियत डोल जाए! बहू, इसके भीतर की जो आग है ना, वो इतनी आसानी से शांत नहीं होने वाली। ना जाने यह चुपके-चुपके किस-किस से चुद रही होगी और मजे ले रही होगी!"

सविता शर्म और अपमान के मारे ज़मीन में धंस जाना चाहती थी। उसका रो-रोकर बुरा हाल था।

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तभी ससुर जी ने सविता के भारी स्तन और पतली कमर की तरफ अपनी उंगली से सीधा इशारा किया और कड़ककर अपनी शर्त रखी, "इसलिए मेरा आखिरी फैसला सुन लो! अगर इस बच्चे को मेरा नाम चाहिए, तो यह सविता अब से हर रात मेरे कमरे में, मेरी खाट पर मेरे साथ सोएगी।"

सविता के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह घबराते हुए हकलाकर बोली, "बा... बापूजी... आपके कमरे में...?"

ससुर जी ने एक शातिर मुस्कान के साथ कहा, "हाँ, मैं खुद अपनी बाहों में इसे सुलाऊंगा। मैं भी तो देखूं कि मेरे होते हुए घर का या बाहर का कौन सा मर्द इसके कमरे की कुंडी खोलने और इसके इस गदराए बदन को हाथ लगाने की हिम्मत करता है! अब से इसके इस जिस्म पर सिर्फ मेरा पहरा होगा।"

नीम के पेड़ की छांव और बूढ़े ससुर की वह डरावनी, गरजती हुई आवाज को पीछे छोड़ दोनों बहुएं वापस घर की पगडंडी पर चल पड़ीं। दोपहर की धूप अब और तीखी हो चुकी थी, लेकिन सविता का पूरा बदन भीतर से बिल्कुल ठंडा पड़ चुका था। उसके पैर मन-मन भर के भारी हो रहे थे, मानो वो जमीन में धंसते जा रहे हों। उसका भारी, गदराया हुआ सीना तेज-तेज सांसों के चलने से बुरी तरह ऊपर-नीचे हो रहा था। आँखों से बहते आँसू उसकी सूती साड़ी के पल्लू को पूरी तरह भिगो चुके थे। वह रह-रहकर अपनी हिचकियाँ रोक रही थी, पर रोना था कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था।

कमला आगे-आगे कड़े कदमों से चल रही थी। सविता की लगातार सुबकने की आवाज़ सुनकर उसका पारा चढ़ गया। वह अचानक पगडंडी के एक सुनसान मोड़ पर रुकी, जहाँ दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे अरहर के खेत थे। उसने झटके से पीछे मुड़कर सविता का गोरा, भारी हाथ पकड़ा और उसे एक झटके से अपनी तरफ खींचते हुए थोड़े कड़े और डांटते हुए लहजे में बोली, "बस कर अब! कितना रोएगी? सुबह से देख रही हूँ, सिर्फ आँसू बहाए जा रही है। एक बात बता, जब वो रात के अंधेरे में आकर तुझे खूंटे से बांधता है, जब वो तेरे इस मलाईदार बदन को बेरहमी से नोचता है, तब क्यों नहीं थोड़ा दम दिखाती? तब थोड़ी हिम्मत करके चिल्ला देती, शोर मचा देती, तो आज यह नौबत ही क्यों आती?"

सविता ने रोते हुए अपनी बड़ी-बड़ी, सूजी हुई आँखें उठाईं। उसका घूंघट पूरी तरह पीछे सरक चुका था, जिससे उसका सुर्ख लाल चेहरा और गले पर पसीने की बूंदें साफ चमक रही थीं। उसने हिचकी लेते हुए कांपती आवाज में कहा, "दी... दीदी! तुम... तुम समझती क्यों नहीं हो? मैं... मैं कैसे चिल्लाती? जब मेरी आँख खुलती है, तो मेरा पूरा जिस्म पूरी तरह नंगा होता है। हाथ-पैर खाट के पायों से जकड़े होते हैं।"

वह अपनी साड़ी के पल्लू को छाती पर और कसते हुए आगे बोली, "मेरे बदन पर... मेरे इन भारी थनों पर, जांघों पर... उसके दांतों के काटने के निशान होते हैं... चूसने के लाल-लाल गहरे धब्बे पड़े होते हैं। वह मुझे पूरी तरह अपनी हवस में बांधकर रखता है। अगर मैं चिल्लाती भी, तो वह तो अंधेरे का फायदा उठाकर पिछवाड़े से भाग जाता। लेकिन मेरी आवाज़ सुनकर जब तुम सब दौड़कर कमरे में आते... और मुझे उस बेहद शर्मनाक, नंगी हालत में देखते... तो मैं अपनी क्या सूरत दिखाती?"

सविता का गला रूंध गया, उसने अपनी आँखें मूँद लीं और तड़पकर कहा, "मेरा जवान बेटा चिंटू... वो अपनी माँ को इस हाल में देखकर क्या सोचता दीदी? उसकी नजरों में तो मैं जीते जी मर जाती। और... और जेठ जी और ससुर जी... अगर वो दोनों मेरे उस नंगे, भरे-पूरे बदन को अपनी आँखों से देख लेते, तो क्या होता? वो तो तुमने आज खुद अपनी आँखों से देख ही लिया ना! जेठ जी खेतों में खड़े होकर मेरे बदन के अंगों का नाम ले-लेकर हवस की बातें कर रहे थे। उन्हें अपनी बहू के लिए ऐसी गंदी बात बोलते हुए जरा भी शर्म नहीं आई। अगर वो मुझे रात को नंगा देख लेते, तो वो तो अगले ही दिन से खुलेआम मेरे बिस्तर पर आने की जिद करते! क्या तब भी वो यही सब नहीं बोलते जो आज उन्होंने सरेआम कहा है?"

कमला ने उसकी बात सुनी, पर उसके चेहरे पर दया का एक भी भाव नहीं आया। वह हाथ बांधकर सविता के गदराए बदन को देखने लगी।

सविता ने ससुर की बात याद करते हुए अपने चेहरे को हाथों से छिपा लिया और रोते हुए कहा, "और... और जिस बूढ़े को मैं अब तक अपने पिता के समान समझ रही थी... उस ससुर की सोच कितनी घिनौनी और नीच निकली दीदी! तुम सुन रही थी ना वो क्या कह रहे थे? वो मुझे सीधे-सीधे अपने कमरे में, अपनी खाट पर सुलाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने साफ शब्दों में तो नहीं कहा, लेकिन उनका इरादा क्या था, क्या तुम समझ नहीं पाईं? वो मेरी सुरक्षा का बहाना बनाकर मेरे इस बदन के साथ खेलना चाहते हैं, इसे अपनी मर्जी से निचोड़ना चाहते हैं। दीदी, तुम सब देख रही थी ना... उनका असली जानवर कैसे बाहर आ गया था?"

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कमला ने एक गहरी सांस ली। उसने आगे बढ़कर सविता के हाथों को उसके चेहरे से हटाया। उसकी आँखें बेहद शातिर और ठंडी हो चुकी थीं। उसने सविता के भारी और थर-थर कांपते कूल्हों पर अपना हाथ रखा और एक तीखे, कामुक लहजे में फुसफुसाकर बोली, "देख छोटी... रोना-धोना बंद कर और मेरी बात कान खोलकर सुन। अब जो होना था, वो हो चुका है। तेरे पेट में दो महीने का बच्चा पल रहा है, जिसे छुपाया नहीं जा सकता। तू अपने जवान बेटे चिंटू को तो यह सब कभी बता नहीं सकती, क्योंकि वो इस सच को बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।"

कमला ने सविता के चेहरे को थोड़ा ऊपर उठाया और बोली, "अब इस बच्चे को इस खानदान का नाम दिलाने के लिए और समाज के सामने अपनी इज्जत बचाने के लिए, तुझे खुद ही फैसला करना होगा। तेरे सामने अब यही दो मर्द हैं। अब तुझे खुद चुनना होगा कि तुझे किसके साथ रहना है, किसके बिस्तर को गर्म करना है। तू बिल्कुल सही कह रही है, बापूजी को तेरी कोई फिक्र नहीं है। वो तो सिर्फ इस बुढ़ापे में तेरी इस भारी, सुडौल काया को अपनी बाहों में भींचना चाहते हैं। वो सुरक्षा के बहाने तेरे इस गोरे जिस्म का सारा रस निचोड़ना चाहते हैं।"

कमला ने एक पल का ठहराव लिया और अपनी उंगली से वापस खेतों की तरफ इशारा करते हुए कहा, "या तो तू बापूजी की शर्त मानकर हर रात उनके कमरे की खाट पर अपनी पीठ लगा, या फिर वापस मेरे मर्द के पास चल। मेरा मर्द कम से कम जवान है, तगड़ा है, और वो तुझे अपनी रानी बनाकर रखेगा। तू उसके सामने नखरे भी कर पाएगी। अब फैसला तेरे हाथ में है छोटी... बता, इस भारी और रसदार बदन को चखने के लिए तू इन दोनों मर्दों में से किसे चुनेगी?"


सविता पगडंडी के बीचों-बीच खड़ी होकर सन्न रह गई। गन्ने और अरहर के ऊंचे खेतों के बीच, दोपहर के सन्नाटे में, उसे ऐसा लगा मानो उसका वजूद दो भूखे भेड़ियों के बीच पूरी तरह घिर चुका है।
Nice update. Savita ko majhdhar me chhod diya hai.
 
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sunoanuj

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बहुत ही सुन्दर और शानदार लिख रहे हो आप !
अब सविता का क्या होगा !

अगले भाग की प्रतीक्षा में है !
 
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sunoanuj

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बहुत ही सुन्दर और शानदार लिख रहे हो आप !
अब सविता का क्या होगा !

अगले भाग की प्रतीक्षा में है !
 
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