Amazing update bhai maja aagyaUpdate 06
अरहर के ऊंचे खेतों के बीच खड़ी सविता को अब अपने जेठ और ससुर, दोनों से घिन आने लगी थी। उसके तन-बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उसने घृणा और बेबसी से कमला की तरफ देखा और रोते हुए कहा, "दीदी... तुम कैसी बातें कर रही हो? अगर मैंने उन दोनों में से किसी एक की भी बात मान ली, तो क्या मेरी बदनामी रुक जाएगी? तुम सोच भी कैसे सकती हो? अगर मैंने आज हामी भर दी, तो वो दोनों भूख से पागल भेड़िये हैं। फिर वो सिर्फ रात के सन्नाटे में बंद कमरे के भीतर नहीं रुकेंगे। फिर तो दिन हो या रात... जब उनका मन करेगा, वो मेरे इस बदन को नोंचेंगे, मुझे अपनी मर्जी से भोगेंगे!"
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सविता अपने आँसुओं को पोंछते हुए पगडंडी पर बैठ गई। उसे अच्छी तरह पता था कि इस समाज के मर्द उसकी इस भारी और गदराई काया के लिए कितने तड़पते हैं। जब से उसके पति इस दुनिया को छोड़कर गए थे, उसने अपनी आधी जिंदगी सिर्फ राह चलते मर्दों की उन भूखी और गंदी नजरों से खुद को बचाने में निकाल दी थी। लेकिन तब तक उसके दिल में कम से कम यह सहारा और तसल्ली थी कि उसके घर के भीतर दो मर्द मौजूद हैं। वह अपने जेठ को बड़े भाई जैसा और ससुर को अपने सगे पिता के समान मानती थी। उसे लगता था कि ये दोनों उसकी इज्जत की रक्षा करेंगे, समाज के भेड़ियों के सामने उसकी ढाल बनेंगे।
लेकिन आज... आज उनके दिलों में अपने ही घर की बहू के जिस्म के लिए सुलगती हुई घिनौनी आग को देखकर वह अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी। बड़े भाई जैसा जेठ और पिता समान ससुर, दोनों ही उसकी आबरू के भूखे शिकारी निकले।
सविता को याद आया कि कमला अक्सर घर के काम करते हुए हँसते-मजाक में जेठ और ससुर का नाम लेकर उसे चिढ़ाती थी। तब सविता उसे डांट देती थी। लेकिन आज कमला का वह मजाक, कोई मजाक नहीं रह गया था। वह एक बेहद कड़वी और नग्न सच्चाई के रूप में उसके सामने खड़ा था। सविता ने सुबकते हुए कहा, "कमला दीदी... तुम तो सिर्फ हंसी-मजाक में उनका नाम लेती थीं, लेकिन मुझे क्या पता था कि उन दोनों की सोच इस हद तक घटिया और नीच होगी!"
असल में, सविता का कातिलाना और रसदार बदन ही ऐसा था कि कोई भी मर्द उसे एक बार देख ले तो अपनी सुध-बुध खो बैठता था। अब जब जेठ और ससुर दोनों को यह सुनहरा मौका मिला, तो दोनों ने अपनी पूरी कोशिश लगा दी कि बच्चे को नाम देने के बहाने इस बेसहारा विधवा के मखमली जिस्म से उम्र भर खेलने का लाइसेंस मिल जाए।
सविता जो बहू बनकर अब तक इस घर में पूरे स्वाभिमान से रहती थी, जो कभी इन दोनों मर्दों को घास तक नहीं डालती थी, आज जब वह किसी अनजान का बच्चा अपने पेट में लेकर उनके सामने लाचार खड़ी थी, तो उन दोनों की नजरों में उसकी बची-खुची इज्जत भी गायब हो चुकी थी। अब वह उनके लिए घर की संस्कारी बहू नहीं थी। अब वे उसे एक बिल्कुल अलग, गंदी नजर से देख रहे थे—एक ऐसी प्यासी और आवारा औरत, जिसे बस रात के अंधेरे में चुदने का चस्का लग चुका है, और जिसे यह भी होश नहीं है कि उसके पेट में पल रहे बच्चे का असली बाप कौन है! उनके दिमाग में यही चल रहा था कि यह रण्डी ना जाने किस-किस के नीचे सोकर अपनी आग बुझाती रही है।
शाम ढली और रात का घना अंधेरा पूरे घर पर छा गया। सविता अपने कमरे में अकेली बैठी थी। उसने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ आसमान में काले बादल छाए हुए थे। अचानक उसके शातिर होते दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। उसने एक बड़ा फैसला किया।
वह खुद से बुदबुदाई, "नहीं... आज रात मैं इस बंद और अंधेरे कमरे के भीतर पैर भी नहीं रखूंगी। हर बार मैं इसी कालकोठरी में सोती हूँ और कोई अंधेरे का फायदा उठाकर, नशीली चीज सुंघाकर मेरे इस बदन के साथ खिलवाड़ करके चला जाता है। यह ख्याल मुझे पहले क्यों नहीं आया?"
सविता ने तुरंत अपनी हिम्मत जुटाई। उसने कमरे से अपनी लकड़ी की खाट उठाई और उसे घसीटते हुए आँगन के ठीक बीचों-बीच, खुले आसमान के नीचे ले आई। आज रात हवा थोड़ी ठंडी थी। सविता ने अपनी साड़ी को अपने भारी बदन पर अच्छी तरह से लपेटा, ब्लाउज की हुक को कसकर चेक किया और खाट पर लेट गई।
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उसे पूरा यकीन था कि आज खुले आँगन में उसके साथ कुछ भी गलत नहीं हो पाएगा। अगर कोई दबे पाँव उसकी तरफ बढ़ने की हिमाकत भी करेगा, तो आँगन के खुलेपन में उसकी आहट हो जाएगी। और अगर किसी ने आज दोबारा उसे हाथ लगाने की कोशिश की... तो वह झटके से उठकर उसका चेहरा साफ-साफ देख लेगी। इस तरह उसे अपने पेट में पल रहे बच्चे के असली बाप का पता हमेशा के लिए चल जाएगा। वह आज शिकारी को खुद जाल में फंसाने के लिए तैयार थी।
आँगन के सन्नाटे में लेटे-लेटे सविता आसमान के तारों को निहार रही थी। दिन भर की थकान, जेठ और ससुर की घिनौनी बातें, और दिमाग में चल रहे इस भयंकर बवंडर के बीच सविता को समझ ही नहीं आया कि कब उसकी भारी-भारी आँखें बंद हो गईं और वह एक गहरी, बेखबर नींद के आगोश में समा गई...
रात का सन्नाटा गहरा चुका था। खुले आँगन के बीचों-बीच बिछी खाट पर सोई सविता की आँख जब खुली, तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। हवा की वो ठंडी छुअन जो उसे सोते वक्त महसूस हो रही थी, अब गायब थी। उसकी आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ भयंकर, गहरा काला अंधेरा था। उसने घबराकर अपनी पलकें झपकानी चाहीं, पर उसकी आँखों पर एक मोटा, मखमली कपड़ा कसकर बंधा हुआ था। वह अपनी आँखों को हिला भी नहीं पा रही थी।
एक खौफनाक सिहरन उसके 48 साल के भारी और गदराए बदन में दौड़ गई। उसने डरकर अपने हाथ-पैर हिलाने की कोशिश की, पर उसके दोनों गोरे, भारी हाथ और कसरती पैर खाट के चारों पायों से सूती रस्सियों के सहारे बड़ी बेरहमी से जकड़े जा चुके थे। वह पूरी तरह बेबस, लाचार और बंधक थी। उसने अपनी छाती को सिकोड़ना चाहा, तो उसे अहसास हुआ कि उसके बदन पर कपड़े का एक धागा तक नहीं था। उसकी भारी साड़ी, उसका ब्लाउज, उसकी पेटीकोट... सब कुछ उसके जिस्म से उतारकर एक तरफ फेंका जा चुका था। खुले आँगन की ठंडी रात में उसका मलाई जैसा गोरा, भारी-भरकम और रसदार नंगा बदन पूरी तरह से खुला पड़ा था।
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वह खौफ से चीखने ही वाली थी कि तभी... रात के उस सन्नाटे को चीरती हुई एक बेहद गर्म, मर्दाना स्पर्श उसकी जांघों पर महसूस हुआ। सविता का पूरा वजूद काँप उठा। उसका दिल इतनी जोर से धड़कने लगा मानो छाती फाड़कर बाहर आ जाएगा। उसे लगा कि आज फिर वही शिकारी आ गया है, जो पिछले दो महीने से उसके साथ यह खेल खेल रहा था। लेकिन... अगले ही पल कुछ ऐसा हुआ जिसने सविता के भीतर के डर को एक गहरे, नशीले सन्नाटे में बदल दिया।
आज उस अनजान मर्द के हाथों में वो पुरानी हैवानियत नहीं थी। उसके मजबूत, भारी हाथ सविता के सुडौल नितंबों और भारी जांघों को बहुत ही नरमी से, धीरे-धीरे सहला रहे थे। उसकी उंगलियाँ सविता के मखमली गोरे बदन पर किसी रेशम की तरह रेंग रही थीं। अचानक, उस मर्द के झुके हुए भारी बदन की गर्म सांसें सविता के गले और छाती पर महसूस हुईं। उसके गीले, रसीले होठों ने सविता के फूले हुए, विशाल स्तनों को बहुत ही कोमलता से चूमना शुरू कर दिया। वह उन्हें बेरहमी से भींच नहीं रहा था, बल्कि किसी अनमोल खजाने की तरह सहला रहा था।
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सविता इस अनपेक्षित, बेहद प्यार भरी छुअन से धीरे-धीरे एक अजीब सी मदहोशी के दलदल में धंसने लगी। दोपहर में खेतों में जेठ की वो गंदी नजरें, बूढ़े ससुर की वो घिनौनी और कड़क आवाज में दी गई धमकी, और कमला की वो कड़वी बातें... सविता के दिमाग से वो सारा दर्द, वो सारी घिन एक पल में धुलने लगी। जेठ और ससुर की बातें याद करके उसे उन दोनों से नफरत सी होने लगी थी। उनकी तुलना में, इस अनजान मर्द का यह कोमल स्पर्श उसे अपनी खुद की मिल्कियत जैसा लगने लगा। उसे अहसास हुआ कि यह साया जो भी है, उसे केवल दर्द नहीं, बल्कि चरम सुख भी दे रहा है।
वह अनजान मर्द धीरे-धीरे नीचे की तरफ खिसका। उसके दोनों हाथों ने सविता के उस उभरे हुए, दो महीने के गर्भवती पेट को बहुत ही प्यार से सहलाया। वह काफी देर तक सविता के पेट पर अपने होठों को रखकर चूमता रहा, मानो वह इस अनचाही गर्भावस्था से, अपने उस आने वाले अंश से बेहद खुश हो। एक मर्द का अपनी होने वाली संतान के प्रति यह मौन प्यार देखकर सविता का औरत का दिल पूरी तरह पिघल गया।
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इस मीठी छुअन और कामुकता के चरम ने सविता के भीतर एक ऐसी आग सुलगा दी कि उसकी मतवाली चूत ने पसीने के साथ-साथ अपना गाढ़ा, रसीला पानी छोड़ना शुरू कर दिया। उसका पूरा बदन काम-वासना की आँच में तप रहा था। तभी, उस मर्द के गर्म होठ सविता की जांघों के बीच, उसकी कामुकता के केंद्र पर आकर टिक गए। उसने अपनी गीली, गर्म जुबान से सविता की चूत को चाटना शुरू कर दिया। वह उसे इतनी गहराई और दीवानगी से चख रहा था कि सविता खाट पर बंधे होने के बावजूद अपनी पतली कमर को ऊपर-नेचे लहराने लगी।
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वह मर्द उसे तब तक लगातार चाटता रहा, जब तक कि सविता का अंग-अंग काँप नहीं गया और उसका सारा पानी एक तेज फव्वारे की तरह बाहर नहीं निकल गया। सविता अभी इस सुख के झटके से संभल भी नहीं पाई थी कि वह तगड़ा, भारी मर्द पूरी तरह से उसके ऊपर लेट गया। उसका भारी मर्दाना वजन सविता के 48 साल के गरदाई बदन पर आ गिरा। तभी... सविता को अपनी जांघों के बीच एक बेहद गर्म, लोहे जैसा सख्त और विशाल लँड महसूस हुआ।
जब उस मर्द ने अपने लँड की नोक को सविता की चूत के गीले छेद पर टिकाया और एक धीमा, गहरा धक्का मारा... तो सविता की आँखें पट्टी के पीछे फटी की फटी रह गईं। आज नशीली दवा का असर कम था, और क्योंकि वह मर्द बहुत ही आराम से और बिना किसी जल्दबाजी के सब कुछ कर रहा था, इसलिए सविता को आज उसके आकार का एक-एक इंच अपने भीतर उतरते हुए पूरी बारीकी से महसूस हुआ।
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उसकी बंद आँखों के सामने उस मर्दानगी का आकार तैर गया। वह अंदर ही अंदर सिहर उठी—यह लँड कम से कम 8 से 9 इंच लंबा था, और उसकी मोटाई... उसकी मोटाई सविता की अपनी गोरी और भारी कलाई जितनी चौड़ी थी! जब वह मोटा मूसल उसकी तंग चूत को फाड़ता हुआ अंदर धंसा, तो सविता के पूरे बदन में एक मीठा, तीखा दर्द दौड़ गया।
पर आज उस दर्द में एक अनोखा नशा था। जहाँ एक तरफ जेठ और ससुर का घिनौना रूप था, वहीं इस अनजान मर्द के इस धीमे, गहरे और प्यार भरे धक्कों ने सविता के दिल में एक अजीब सा खिंचाव पैदा कर दिया था। उसे इस साए से, इस अनजान शिकारी से जैसे एक अनजाना प्यार होने लगा था।
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वह मर्द जब बहुत ही धीमी, लयबद्ध रफ्तार से उसके भीतर आ-जा रहा था, तो सविता आज पहली बार दिल से खुश थी। शायद एक वजह यह भी थी कि उसे अब यकीन हो चुका था कि इसी तगड़े मर्द का बीज उसके पेट में पल रहा है। और एक औरत की यह सबसे बड़ी कमजोरी और खूबसूरती होती है कि जिसके अंश को वह अपने पेट में पालती है, उसके आगे वह अपनी रूह, अपना जिस्म और अपनी हर मर्यादा चुपचाप हार बैठती है। वह पूरी तरह उस अनजान लँड के नीचे खुद को सौंप चुकी थी।
खुले आँगन में ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन सविता का गोरा, गदराया हुआ बदन उस भारी मर्द के नीचे कामुकता की तपन से सुलग रहा था। वह मर्द बिना किसी जल्दबाजी के, बहुत ही हक्के-हल्के और गहरे धक्के मारते हुए सविता की तंग चूत को तृप्त कर रहा था। उसके होठ लगातार सविता के कांपते हुए गुलाबी होठों, उसके गले और छाती के भारी उभारों को चूम रहे थे। इस कोमल मर्दाने एहसास, और दिन भर के झेले हुए अपमान के बोझ ने अचानक सविता के भीतर भावनाओं का एक बांध तोड़ दिया।
वह पट्टी बंधी आँखों के पीछे से बिलख-बिलख कर रोने लगी। उसका पूरा भारी जिस्म धक्कों की लय के साथ हिल रहा था। उसने हिचकी लेते हुए कांपती आवाज में अपने दिल का गुबार निकालना शुरू किया, "कौन हो तुम... कुछ बोलते क्यों नहीं? क्यों मुझे इस तरह रोज तड़पाते हो? जानते हो... आज मेरे साथ क्या हुआ? आज मैं जीते-जी मर गई..."
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सविता की इस पहली बात पर, उस मर्द ने कुछ बोले बिना अपनी मजबूत कमर को पीछे खींचा और सविता के भीतर एक गहरा, तेज धक्का मारा—धप्प! उसकी मोटाई ने सविता की चूत की दीवारों को भीतर तक हिला दिया। वह धक्का जैसे उसका जवाब था कि 'मैं सुन रहा हूँ।'
सविता ने कराहते हुए अपने भारी स्तनों को खाट की रस्सियों में ही भींचने की कोशिश की और आगे बोली, "शुरुआत में... शुरुआत में जब तुम आते थे, तो मुझे तुमसे इतनी घिन आती थी... इतना डर लगता था कि मैं लोक-लाज के मारे कुएँ में कूद जाना चाहती थी। मुझे लगता था कि कोई राक्षस मेरी आबरू को रोज लूट कर चला जाता है। लेकिन आज... आज जब मुझे पता चला कि मैं पेट से हूँ, तो मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई..."
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सविता की आखों से आसू पट्टी से सरकते हुए उसके गालों पे आ रहे थे। मर्द ने उसके आंसू पोंछने के लिए अपना अंगूठा उसके गाल पर फेरा, और फिर से एक तेज, गहरा झटका दिया—धप्प! उसकी जांघें सविता के भारी नितंबों से जोर से टकराईं। सविता को उसका यह बेबाक अंदाज इस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा सहारा लग रहा था। कोई तो था, जो बिना कुछ कहे उसकी रूह को सुन रहा था।
सविता ने रोते हुए अपना सिर खाट पर पटकते हुए आगे कहा, "दीदी मुझे आज खेतों में जेठ जी के पास ले गई थी। मुझे लगा था वो बड़े भाई जैसे हैं, मेरी इज्जत बचाएंगे। पर... पर वो तो जानवर निकले। वो मेरी लाचारी का फायदा उठाकर सरेआम मेरे इस 48 साल के बदन का सौदा करने लगे। मेरी कमर, मेरी चूत, मेरे इन भारी थनों को घूरते हुए बोले कि अगर मैं रोज उनके नीचे सोऊँगी, तभी वो मेरे इस बच्चे को अपना नाम देंगे। तुम कुछ बोलते क्यों नहीं? क्या तुम्हें तरस नहीं आता मुझ पर?"
सवाब में उस मर्द ने सविता के दोनों होठों को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें इतनी दीवानगी से चूसा कि सविता की सांसें अटक गईं। चूसते हुए ही उसने नीचे से एक और तीखा, कड़ा धक्का मारा जिसने सविता की नाभि तक सिहरन दौड़ा दी।
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सविता ने मुँह छूटते ही हांफते हुए आगे कहा, "जेठ तो जेठ... जिसे मैं अपना पिता समझ रही थी, उस बूढ़े ससुर की सोच तो उससे भी ज्यादा नीच निकली। वो मुझे पूरे गाँव के सामने रण्डी और कुतिया बोल रहे थे। कह रहे थे कि ना जाने यह किस-किस से चुदकर अपना मुंह काला करवा के आई है। और फिर... फिर अपनी औकात पर आ गए। बोले कि खानदान की नाक बचानी है, तो मुझे हर रात उनके कमरे में, उनकी खाट पर उनके साथ सोना होगा। वो सुरक्षा के बहाने मेरे इस गदराए जिस्म को अपनी मर्जी से निचोड़ना चाहते हैं। मैं कहाँ जाऊँ? इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है..."
उस मर्द ने सविता के गर्भवती पेट पर अपना भारी हाथ रखा, उसे बहुत ही प्यार से सहलाया, और फिर से पूरी ताकत से एक गहरा मूसल अंदर धंसा दिया—धप्प! सविता के मुँह से एक तीखी सिसकारी निकल गई। उस धक्के में एक अजीब सा गुस्सा और सांत्वना दोनों छुपी हुई थी।
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अब सविता की चूत पूरी तरह से रस छोड़ चुकी थी। वह चरम सुख के बिल्कुल करीब थी। उसका पूरा वजूद इस अनजान मर्द के प्यार और कलाई जैसे मोटे लँड के आगे घुटने टेक चुका था। उसने अपनी आख़िरी मर्यादा को भी हवा में उड़ा दिया। वह तड़पते हुए, खाट की रस्सियों को अपनी उंगलियों में भींचते हुए चिल्लाकर बोली, "मुझे अब कोई ऐतराज नहीं है... सुन रहे हो तुम? मुझे कोई लाज-शर्म नहीं चाहिए! तुम मुझे आज ही, इसी वक्त यहाँ से दूर ले जाओ। बहुत दूर... जहाँ ये घिनौने रिश्ते ना हों। मैं पूरी जिंदगी सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी बन कर रहना चाहती हूँ। मैं इस बच्चे के लिए, इस पेट के लिए कभी कुछ नहीं पूछूंगी... बस तुम मेरे इस बच्चे को अपना नाम दे दो... मुझे अपना बना लो!"
यह आखिरी गुहार सुनते ही उस मर्द के भीतर की कामुकता का सैलाब भी बांध तोड़ गया। उसने सविता के दोनों भारी स्तनों को अपने मजबूत हाथों में जकड़ा। उसने एक के बाद एक कई बेहद तेज, कड़े और ताबड़तोड़ धक्के मारने शुरू कर दिए—धप्प! धप्प! धप्प!
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सविता का भारी, गोरा बदन खाट पर पागलों की तरह लहराने लगा। उसकी चूत का सारा पानी एक बार फिर फव्वारे की तरह छूट गया। ठीक उसी पल, उस मर्द ने एक आखिरी, बेहद गहरा और आख़िरी दम तक का झटका मारा, और अपना सारा गर्म, गाढ़ा माल सविता की चूत के गहरे कुएँ में पूरी ताकत से उड़ेल दिया। लँड की गर्मी जब सविता के भीतर फैली, तो उसे एक परम सुकून का अहसास हुआ।
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चोदने के बाद वह मर्द कुछ देर सविता के ऊपर ही हांफता रहा। फिर वह धीरे से नीचे उतरा। उसने कुछ भी नहीं कहा, एक लफ्ज़ भी नहीं बोला। उसने बस बहुत ही गहराई और प्यार से सविता के माथे पर अपने होठ रखे, उसे चूमा, और दबे पाँव आँगन के अंधेरे में ओझल हो गया।
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सविता खाट पर उसी नंगी, बंधी हुई हालत में लेटी रही। जहाँ एक तरफ उसकी चूत से जेठ और ससुर के बजाय इस अपने मर्द का माल बाहर बह रहा था जिससे उसे एक मीठा सुकून मिल रहा था, वहीं दूसरी तरफ उस मर्द के कुछ भी ना बोलने और उसे उसी हाल में छोड़कर चले जाने से उसका दिल एक गहरी निराशा और उदासी से भर गया। वह बस आँसू बहाते हुए सुबह के उजाले का इंतजार करने लगी।
अपने सीने में बरसों से दबा सारा दर्द सविता ने कल रात उस साए के सामने उगल दिया था। अपनी आबरू का वो सबसे बड़ा सच बयां कर देने के बाद, आज उसका मन अंदर से बहुत हल्का महसूस कर रहा था। रात का वह भयंकर तूफ़ान थम चुका था, लेकिन सविता को अभी भी अपनी जांघों के बीच उस भारी मर्द के लँड की चौड़ाई का गहरा अहसास हो रहा था। उसकी मोटाई सविता के अपने हाथ की गोरी और भारी कलाई जितनी थी, जो उसकी तंग चूत को भीतर तक फैलाए हुए थी। चोदने के बाद उस मर्द का जो गाढ़ा, गर्म पानी सविता के अंतस में छूटा था, वह उसकी अंदरूनी दीवारों के मीठे दर्द को किसी गर्म सिकाई की तरह आराम दे रहा था। वह चिपचिपा मर्दाना रस धीरे-धीरे उसकी जांघों से बहकर नीचे खाट के सूती बिछौने को पूरी तरह भिगो चुका था। उस भीगे हुए सुकून और थकान के बीच सविता को पता ही नहीं चला कि कब उसकी भारी आँखें लग गईं।
जब सुबह के सूरज की पहली मखमली किरणें आँगन को चीरती हुई सविता के जिस्म पर पड़ीं, तो उसकी तंद्रा टूटी। उसने भारी पलकों को झपकाते हुए अपनी आँखें खोलीं, तो उसके होश उड़ गए। वह बाहर खुले आँगन में नहीं, बल्कि अपने ही घर के भीतर, अपने उस बंद कमरे की खाट पर सो रही थी! उसकी आँखों की पट्टी और हाथ-पैर की रस्सियाँ गायब थीं, लेकिन उसका पूरा 48 साल का गदराया बदन अभी भी पूरी तरह नंगा था। कपड़े का एक कतरा भी उसकी गोरी काया पर नहीं था। रात का वह रहस्यमयी शिकारी उसे चोदने के बाद न केवल खोल चुका था, बल्कि इतनी खामोशी से उसे अंदर कमरे में लाकर सुला गया था कि उसे भनक तक नहीं लगी।
सविता ने जैसे ही अपनी टांगें फैलाईं, उसे अपनी चूत के घने बालों पर सूख चुका गाढ़ा और पपड़ीदार मर्दाना पानी महसूस हुआ। वह रसीला माल उसकी गोरी जांघों के अंदरूनी हिस्सों पर भी सूखकर सफेद लकीरें बना चुका था, जो कल रात की उस भयंकर चोदना की गवाही दे रहा था।
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अपनी इस नग्न हालत को देखने के बाद भी, आज सविता के चेहरे पर कोई खौफ नहीं था। इसके विपरीत, रात की उस आलिंगनबद्ध चोदना को याद करके उसके रसीले होठों पर एक बेहद प्यारी और शर्मीली मुस्कान तैर गई। वह शर्म के मारे अपनी हथेलियों से अपना चेहरा छिपाने लगी। उसे खुद पर हैरत हो रही थी कि वह एक अनजान साए के आगे इस कदर टूट कैसे गई? उसने एक आम देहाती औरत की तरह रोते-बिलखते हुए अपने दिल का एक-एक दुख, अपने जेठ और ससुर की वो घिनौनी हवस की बातें उस मर्द के सामने क्यों बयां कर दीं?
क्या... क्या उसे उस रोज रात को आने वाले शिकारी से प्यार होने लगा था? सविता का मन इस सोच से घबरा उठा। उसने खुद को झकझोरते हुए सोचा—'नहीं, तू पागल तो नहीं हो गई सविता? उसी मर्द ने पिछले दो महीनों से तुझे नशीली दवा सुंघाकर, रस्सियों से बांधकर ना जाने कितनी बार बेरहमी से निचोड़ा है, तेरे इस भरे-पूरे बदन को एक खिलौने की तरह भोगा है। फिर सिर्फ इसलिए कि वह तेरे पेट में पल रहे इस अनचाहे बच्चे का असली बाप है, तू उसके आगे इतनी लाचार और नरम क्यों पड़ रही है?'
लेकिन सविता का औरत का दिल और उसका शातिर दिमाग अब धीरे-धीरे हकीकत को कुबूल कर रहा था। उसकी इस नरमी का कारण केवल वह बच्चा नहीं था। असल में, उसके पति के मरने के बाद की सालों की वो सूनी जवानी और जिस्म की छुपी हुई तड़प इसका बड़ा कारण थी। और रही-सही कसर कल दोपहर उसके जेठ और ससुर की उस खौफनाक हवस ने पूरी कर दी थी। जहाँ एक तरफ घर के वो दो मर्द उसके जिस्म को नोचने के लिए घात लगाए बैठे थे, वहीं दूसरी तरफ यह अनजान साया उसे बेपनाह चरम सुख और एक अनकहा सा आदर दे रहा था। इस तीखे थ्रिल और कामुकता के जाल में वह अब पूरी तरह फंस चुकी थी।