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Shayari शायरी और गजल™

TheBlackBlood

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हर इक का दर्द उसी आशुफ़्ता-सर में तन्हा था।
वो एक शख़्स जो सारे नगर में तन्हा था।।

वो आदमी भी जिसे जान-ए-अंजुमन कहिए,
चला जब उठ के तो सारे सफ़र में तन्हा था।।

जो तीर आया गले मिल के दिल से लौट गया,
वो अपने फ़न में मैं अपने हुनर में तन्हा था।।

उस इक दिए से हुए किस क़दर दिए रौशन,
वो इक दिया जो कभी बाम-ओ-दर में तन्हा था।।

सुना है लुट गया कल रात रास्ते में कहीं,
जो एक रह-गुज़री रहगुज़र में तन्हा था।।

उठा ये शोर वहीं से सदाओं का क्यूँ-कर,
वो आदमी तो सुना अपने घर में तन्हा था।।

हर इक में कोई कमी थी हर इक में था कोई ऐब,
धुला हुआ वही बस आब-ए-ज़र में तन्हा था।।

न पा सका कभी ता-उम्र लुत्फ़-ए-तन्हाई,
उमर जो सारे जहाँ की नज़र में तन्हा था।।

_______'उमर' अंसारी
 
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बाहर बाहर सन्नाटा है अंदर अंदर शोर बहुत।
दिल की घनी बस्ती में यारो आन बसे हैं चोर बहुत।।

याद अब उस की आ न सकेगी सोच के ये बैठे थे कि बस,
खुल गए दिल के सारे दरीचे था जो हवा का ज़ोर बहुत।।

मौजें ही पतवार बनेंगी तूफ़ाँ पार लगाएगा,
दरिया के हैं बस दो साहिल कश्ती के हैं छोर बहुत।।

मैं भी अपनी झोंक में था कुछ वो भी अपने ज़ोम में था,
होती भी है कुछ मिरे यारो प्यार की कुछ डोर बहुत।।

फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ तो सह ली लेकिन मौसम-ए-गुल में टूट गिरी,
बोझ फलों का सह नहीं पाई शाख़ कि थी कमज़ोर बहुत।।

दिल से उठा तूफ़ान ये कैसा सारे मंज़र डूब गए,
वर्ना अभी तो इस जंगल में नाच रहे थे मोर बहुत।।

बरसों बाद मिला है मौक़ा आओ लगा लें कश्ती पार,
आज तो यारो सन्नाटा है दरिया के उस ओर बहुत।।

आज यक़ीनन मेंह बरसेगा आज गिरेगी बर्क़ ज़रूर,
अँखियाँ भी पुर-शोर बहुत हैं कजरा भी घनघोर बहुत।।

किस से किस का साथी छूटा किस का 'उमर' क्या हाल हुआ,
पर्बत पर्बत वादी वादी रात मचा था शोर बहुत।।

_______'उमर' अंसारी
 
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ये कौन आया शबिस्ताँ के ख़्वाब पहने हुए
सितारे ओढ़े हुए माहताब पहने हुए

तमाम जिस्म की उर्यानियाँ थीं आँखों में
वो मेरी रूह में उतरा हिजाब पहने हुए

मुझे कहीं कोई चश्मा नज़र नहीं आया
हज़ार दश्त पड़े थे सराब पहने हुए

क़दम क़दम पे थकन साज़-बाज़ करती है
सिसक रहा हूँ सफ़र का अज़ाब पहने हुए

मगर सबात नहीं बे-सबील रस्तों में
कि पाँव सो गए 'साक़ी' रिकाब पहने हुए।।


_______साक़ी फ़ारुख़ी
 
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सफ़र की धूप में चेहरे सुनहरे कर लिए हम ने
वो अंदेशे थे रंग आँखों के गहरे कर लिए हम ने

ख़ुदा की तरह शायद क़ैद हैं अपनी सदाक़त में
अब अपने गिर्द अफ़्सानों के पहरे कर लिए हम ने

ज़माना पेच-अंदर-पेच था हम लोग वहशी थे
ख़याल आज़ार थे लहजे इकहरे कर लिए हम ने

मगर उन सीपियों में पानियों का शोर कैसा था
समुंदर सुनते सुनते कान बहरे कर लिए हम ने

वही जीने की आज़ादी वही मरने की जल्दी है
दिवाली देख ली हम ने दसहरे कर लिए हम ने

_______साक़ी फ़ारुख़ी
 
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ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा।
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा।।

जिस तरह से थोड़ी सी तिरे साथ कटी है,
बाक़ी भी उसी तरह गुज़र जाए तो अच्छा।।

दुनिया की निगाहों में भला क्या है बुरा क्या,
ये बोझ अगर दिल से उतर जाए तो अच्छा।।

वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बरबाद किया है,
इल्ज़ाम किसी और के सर जाए तो अच्छा।।


________साहिर लुधियानवी
 
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“ɪ ᴋɴᴏᴡ ᴡʜᴏ ɪ ᴀᴍ, ᴀɴᴅ ɪ ᴀᴍ ᴅᴀᴍɴ ᴘʀᴏᴜᴅ ᴏꜰ ɪᴛ.”
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Wahhh...wahhhh..waahhhh....

Or pesh kijiye janab.
 
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रास्ते जो भी चमक-दार नज़र आते हैं।
सब तेरी ओढ़नी के तार नज़र आते हैं।।

कोई पागल ही मोहब्बत से नवाज़ेगा मुझे,
आप तो ख़ैर समझदार नज़र आते हैं।।

मैं कहाँ जाऊँ करूँ किस से शिकायत उस की,
हर तरफ़ उस के तरफ़-दार नज़र आते हैं।।

ज़ख़्म भरने लगे हैं पिछली मुलाक़ातों के,
फिर मुलाक़ात के आसार नज़र आते हैं।।

एक ही बार नज़र पड़ती है उन पर 'ताबिश'
और फिर वो ही लगातार नज़र आते हैं।।

______ज़ुबैर अली 'ताबिश'
 

TheBlackBlood

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वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया।
मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया।।

जब उस की बज़्म में दार-ओ-रसन की बात चली,
मैं झट से उठ गया और आगे आ के बैठ गया।।

दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा,
तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया।।

तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर,
ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया।।

जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था,
वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया।।

फिर उस के बा'द कई लोग उठ के जाने लगे,
मैं उठ के जाने का नुस्ख़ा बता के बैठ गया।।

______ज़ुबैर अली 'ताबिश'
 
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