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Incest कैसे कैसे परिवार

prkin

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अध्याय ४५
**********


दृश्य ४: वर्षा और स्मिता:


वर्षा, समीर, सुलभा और पवन भी बातों में तल्लीन थे.

“मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये परिवार दूसरे परिवारों के साथ भी इस खेल में सम्मिलित है. बाहर जो गोल बिस्तर है वो इसी की ओर संकेत करता है. हमें भी उस गुट या सम्प्रदाय में जुड़ने का अवसर दिया जाये. तब हम क्या करेंगे?”

“हम्म्म, ठीक है. अगर ऐसा होगा तो हमें भी स्वीकार है.”

दूर रिसोर्ट के अन्य कमरे में मधुजी इस वार्तालाप को बहुत ध्यान से सुन रही थीं. उनके और तीनों युवक प्रेमियों के चेहरे पर हर्ष की लहर दौड़ गई.

***********

शाम को रेस्त्रां में जाने पर उन्हें अन्य कुछ परिवार भी दिखे. वर्षा, समीर, सुलभा और पवन ने अब उन्हें भिन्न दृष्टि से देखा और उनकी शंका का समाधान हो गया. जिस प्रकार से परिवारों के सदस्य एक दूसरे से व्यवहार कर रहे थे, उन्हें विश्वास होगया कि वे भी पारिवारिक व्यभिचार के अनुयायी हैं. परन्तु न उन्हें ही उन परिवारों से मिलने की इच्छा थी, न ही वो परिवार भी इसके इच्छुक लग रहे थे. ये सबके लिए उचित था. कुछ देर में मधुजी ने प्रवेश किया और उनके पीछे उनके तीन युवा प्रेमी भी आये. चारों को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ रहा था कि उन सबके बीच में आयु का इतना अंतर था. मधुजी जाकर सब परिवारों से मिलीं, विशेषकर एक परिवार जिसमें उनकी ही आयु की एक महिला थी. उनके साथ उन्होंने कुछ अधिक ही समय बिताया. अंत में स्मिता, सुलभा और वर्षा के पास आईं.

स्मिता से मिलने के बाद उन्होंने वर्षा और सुलभा को देखा और सौंदर्य की प्रशंसा की. उनकी पारखी दृष्टि ने जयंत, राहुल और मेहुल को देखकर उन्हें अपने बिस्तर की शोभा बढ़ाने के लिए उपयुक्य पाया. मोहन ने तो उनके साथ कई बार चुदाई की थी. उन्हें मेहुल के विषय में पता था. पर मेहुल अभी समुदाय से जुड़ा नहीं था, हालाँकि इस माह के मिलन में उसके भी जुड़ने का आवेदन आया हुआ था. जब मधु जी वर्षा और सुलभा से बात कर रही थीं तो स्मिता ने मेहुल के कान में धीमे से कहा.

“इनके साथ वो लड़का देख रहे हो न घुंघराले बालों वाला?” मेहुल ने सिर हिलाया. “उसका नाम सिद्धार्थ है और लंड भी तुम्हारे ही आकार का ही है. अभी पिछले माह ही समुदाय में जुड़ा है, तो मैंने भी देखा है. मधुजी बड़ी प्रशंसक हैं उसकी. अब मेरे बेटे के नीचे आएंगी तब पता चलेगा.” स्मिता ने मानो कोई षड्यंत्र रचा हो. मेहुल मुस्कुरा दिया. उसे अपनी माँ के द्वारा इन विशेष अभियानों पर भेजा जाना बहुत आनंददायक लग रहा था. सुजाता को तो वो अपनी दासी बना ही चुका था और अब मधुजी के तन मन पर अपनी छाप छोड़नी थी. मधुजी ने अपनी बात समाप्त की और उन्हें कल दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया. स्मिता को लगा कि मधुजी कुछ अधिक तीव्रता दिखा रही हैं. परन्तु उसे ध्यान आया कि जब तक गुप्त रिपोर्ट नहीं मिलती मधुजी स्वयं ही कुछ करने की स्थिति में नहीं रहेंगी.

कुछ ही देर में जलपान और मद्यपान आरम्भ हो गया. स्थान और वातावरण को देखते हुए सभी ने सीमित मात्रा में ही मद्यपान किया. वैसे भी बोतलें उनके आवास पर भेजी जाने वाली थीं. जलपान भी अत्यधिक स्वादिस्ट था. इसके बाद उन्हें फिर एक बार रिसोर्ट घुमाया गया. दिन के प्रकाश की सुंदरता से भिन्न रात्रिकालीन सुंदरता थी. सबने इसकी प्रशंसा की और फिर वे रेस्त्रां ही लौट गए. शाम का भोजन आठ बजे तक समाप्त करने की परम्परा थी, जिससे कि सब अतिथि अपने परिवार के साथ आनंद ले सकें.

एक उन्मुक्त वातावरण था और इस बार जब सब रेस्त्रां पहुंचे तो अन्य परिवारों से भी औपचारिक भेंट हुई. नायक परिवार के बड़ों को ये समझने में देर नहीं लगी कि ये परिचय में दिए गए नाम मनघड़ंत थे. पर उन्होंने कुछ दर्शाया नहीं. अपने नाम उन सबने सही ही बताये. इसके बाद सब भोजन करने लगे. इस बार भी बफे की ही व्यवस्था की गई थी और सबको भोजन रुचिकर लगा. भोजन समाप्त होते होते लगभग आठ बज ही गए. मधुजी अपने गुट के साथ व्यस्त थीं. इस बार उनकी आयु की महिला ने उनसे आकर कुछ बात की. आठ बजे सारे परिवार उठकर अपने अपने आवास की ओर चले गए.

स्मिता अपने गुट की मुखिया थी. और अपने आवास पर पहुंचकर उसने वर्षा और सुलभा को बुलाया। ये अब रात्रि के आयोजन की मंत्रणा करने का समय था. विषम सँख्या के कारण कुछ समस्या तो होनी ही थी. तो स्मिता को मुखिया होने के कारण दो पुरुषों का साथ देने का निर्णय हुआ. स्मिता ने महक को बुलाकर उसे सबका निर्णय बताया। अंजलि भी साथ आ गई थी. स्मिता ने अंजलि और श्रेया को दोनों परिवारों को मिलाने का श्रेय दिया. फिर प्रथम चरण की घोषणा की गई.

महिलाओं को युवा लड़के और पुरुषों को लड़कियों का सान्निध्य प्राप्त होना था और इसे सहर्ष ही स्वीकार कर लिया गया.

चूँकि ये दोनों परिवारों का पहला मिलन था ये निर्णय भी लिया गया कि सभी जोड़े पहले कमरों में चले जाएँ जहाँ वो एक सीमा तक एक दूसरे से परिचित हो सकें. दस से पंद्रह मिनट बाद वे सब यहाँ लौटें और फिर आगे की कामक्रीड़ा बढ़ाई जाये. ये सुझाव भी सहर्ष स्वीकार हो गया. छहों जोड़े छह कमरों में लुप्त हो गए.

**********

ये देखकर मधुजी को कुछ निराशा लगी. उनकी इच्छा थी कि सब एक साथ चुदाई करें जिससे उन्हें देखने में समस्या न हो. पर उसके लिए उन्हें अभी परीक्षा करनी होगी. और इस समय का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने जैसे ही अपने साथ लेटे हुए विलास के लंड को मुंह में लिया किसी ने घंटी बजे. विलास, सिद्धार्थ और रवि के चेहरे पर कुछ क्रोध के भाव आये.

मधुजी ने सिद्धार्थ को देखा और बोलीं, “जा खोल, एक और दुल्हन आई है, अपने साथ बाराती लाई है.”

सिद्धार्थ ने द्वार खोला तो वही वृद्ध महिला जिससे मधुजी रेस्त्रां में वार्तालाप कर रही थीं खड़ी हुई थीं. उनके पीछे दो रिसोर्ट के ही लड़के खड़े थे. कमरे में उपस्थित चारों को नग्नावस्था में देख कर किसी को अचरज नहीं हुआ. सिद्धार्थ उस महिला को देख ही रहा था कि उस महिला ने सिद्धार्थ के सीने पर हाथ रखा और अंदर धकेला. साथ ही वो स्वयं अंदर आ गई. उनके पीछे रिसोर्ट के दोनों लड़के भी अंदर आये और कमरा बंद कर दिया.

मधुजी: “आजा रजनी, जैसा मैंने कहा था वैसा ही है सब.” फिर अपने तीनों युवा प्रेमियों को देखकर बोलीं, “ये रजनी है. अपने ही समुदाय से है. तुममें सी कोई मिला है इनसे?”

रवि बोला, “मिलने वाले ढंग से तो नहीं पर इन्हें मैंने अपने मासिक मिलन में अवश्य देखा है. आज इनसे मिलने का भी सौभाग्य मिल गया.”

विलास और सिद्धार्थ को उनका ध्यान नहीं आया. मधुजी ने निर्णय लिया कि समुदाय के भीतर परिवारों के मिलन को और बढ़ावा देना होगा. रजनी अपने कपड़े उतारने में लग गई और उसके साथ आये रिसोर्ट के लड़के भी इसी उपक्रम में लग गए.

“मैंने तुझे इन तीनों से चुदने के लिए आमंत्रित किया है. पर मुख्य रूप से जैसा मैंने पिछले मिलन में कहा था इस सिद्धार्थ के लौड़े को तेरी गाँड में लेने के लिए. शाम से इस बेचारे को तरसा रही थी जिससे कि तेरी गाँड की माँ चोद दे.”

“हाँ, देखने में तो बहुत बड़ा है. पर मैं भी गाँड मरवाने की अनुभवी हूँ. सच में ऐसे लम्बे मोटे लौड़े से गाँड का माल मथने में बहुत आनंद आता है. सिद्धार्थ बेटा, तेरी दादी की आयु की हूँ, अपने पोतों को निराश करके तेरे पास आई हूँ. मुझे निराश मत करना. गाँड पर कोई दया मत करना.”

“बिलकुल, दादी माँ.” ये कहते हुए उन्हें सिद्धार्थ ने जकड़ लिया.


************************

1.


सबसे पहले बाहर आने वाले वर्षा और मोहन थे. कमरों में जाने के समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कुछ तनाव था. इस प्रकार से इन दोनों पड़ोसियों ने कभी भेंट जो नहीं की थी. दस मिनट के बाद एक एक करके कमरे कुल और जोड़े मुख्य कक्ष में आ गए. अंत में आने वाली स्मिता ही थी. एक अंतर जो अंदर जाने और बाहर आने में था वो ये कि अंदर वस्त्रों के साथ गए थे और बाहर नग्नावस्था में आये. छुपी आँखों से एक दूसरे के परिवारों का शारीरिक निरीक्षण किया गया और आश्वस्त हुए कि एक से बढ़कर एक सौंदर्य और पुरुषार्थ के प्रतिबिम्ब सामने थे.

वर्षा और मोहन को एक दूसरे से खुलने में अधिक समय नहीं लगा. वे एक दूसरे को कई वर्षों से जानते थे. मोहन अंजलि से दो या तीन वर्ष ही बड़ा था. वर्षा उसमें कभी कभी अपने भावी दामाद को देखती थी. मोहन के विवाह से उसकी इस इच्छा को चोट पहुंची थी. मोहन ने उसे अपनी बाँहों में लिया और चूमकर बोला।

“मैं जानता हूँ कि आप मुझे अंजलि के लिए चुनना चाहती थीं. परन्तु कोई चिंता नहीं है. अब हम एक दूसरे के साथ हर प्रकार का आनंद ले सकते हैं.”

“तुम्हें कैसे पता?”

“मैं आपकी आँखों में ये देखता था, जब भी हम किसी सभा या पार्टी में मिलते थे. सच तो ये है कि अंजलि मुझे भी अत्यंत प्रिय थी. पर विधि का विधान यही है. आज अंजलि और मैं अपने साथियों के साथ प्रसन्न हैं.”

मोहन ने अपनी बातों के मोहपाश में वर्षा को यूँ बाँधा हुआ था कि उसे पता भी नहीं चला कि कब उसके बाह्य वस्त्र उतर गए. इसके बाद मोहन ने अपने कंपड़ों को उतार फेंका और फिर से वर्षा के पास आकर उसकी ब्रा और पैंटी भी शरीर से मुक्त कर दी. उसे अपने बाहुपाश में लेकर उसके होंठ चूसने लगा. वर्षा ने भी उसका साथ दिया और उसके लंड को अपने हाथ में ले लिया. मोहन भी वर्षा के सुडोल स्तनों से खेलता रहा. एक दूसरे को कुछ और समय एक दूसरे को चूमते रहे फिर बाहर जाने का मन बना लिया. और बाहर निकल गए.



2.


मेहुल को जब पता लगा कि उसे सुलभा का साथ मिला है तो उसकी प्रसन्नता कई गुना बढ़ गई. उसे सुलभा में एक अकथनीय आकर्षण लग रहा था. हालाँकि सुलभा सौंदर्य के माप में उपस्थित अन्य महिलाओं से उन्नीस ही थी, परन्तु मेहुल उसके प्रति अत्यधिक आकर्षित था. सुलभा ने जब उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो मेहुल के शरीर में मानो तीव्र विद्युत् प्रवाह दौड़ गया. कमरे में पहुंच कर मेहुल को पहली बार एक असहजता का अनुभव हुआ. स्वयं को पराक्रमी चोदू समझने वाले मेहुल का आत्मविश्वास न जाने कहाँ खो गया.

“घबराओ मत, मैं तुम्हें खाने की कोई योजना नहीं बना रही हूँ.” सुलभा ने मुस्कुराकर बोला तो मेहुल की सारी झिझक छू-मंतर हो गयी. वो हंस पड़ा.

“सच ये है कि मुझे स्वयं नहीं समझ आ रहा कि मैं आप पर इतना मुग्ध हो गया हूँ. आपके हाथ को छूकर ही मेरी गाँ….” मेहुल बोलते बोलते रुक गया.

सुलभा मुस्कुराने लगी. “मैं समझ गई. पर ये भी बता देती हूँ कि मुझे तुम्हारे भीतर मेरे बेटे राहुल जैसा आकर्षण अनुभव हो रहा है. और मेरा अनुमान है कि तुम चुदाई में उससे उन्नीस नहीं हो.”

ये बोलते हुए सुलभा अपने वस्त्र उतार कर एक ओर रख रही थी. मेहुल उसे एकटक देखे जा रहा था. जब सुलभा निर्वस्त्र होकर पलटी तो मेहुल का मुँह खुला रह गया. सुलभा का साँवला सुगठित शरीर में सच में एक अपूर्व आकर्षण था.

“देख लेना, अब अपने कपड़े उतार लो. अधिक समय नहीं है.” सुलभा ने कहा तो मेहुल को निर्वस्त्र होने में ३० सेकण्ड भी नहीं लगे.

“हम्म, मेरा अनुमान सही है. तुम भी राहुल के ही समान शक्तिशाली लौड़े के स्वामी हो. आशा है कि चोदने में भी निपुण होंगे.”

“जी, अब तक किसी ने कमी नहीं निकाली. हाँ, चाहने वाली स्त्रियों की कमी नहीं है.” मेहुल का आत्मविश्वास लौट आया.

उसने सुलभा को अपनी बाँहों में लिया और उसके होंठ चूसने लगा. सुलभा उसके चुंबन का साथ देने लगी. सुलभा ने मेहुल के लंड को हाथ में लेकर सहलाया और वहीँ दूसरे हाथ से मेहुल का हाथ अपने मम्मों पर रखा. इस स्थिति में चुंबन के पश्चात वो दोनों पूर्ण रूप से उत्तेजित हो गए और उनका कमरे में आने का प्रयोजन सिद्ध हो गया. एक दूसरे का हाथ पकड़े वो बाहर आये तो वर्षा और मोहन पहले ही वहाँ थे और दोनों एक दूसरे को चूम रहे थे. सुलभा ने उन्हें देखा और फिर मेहुल के चेहरे को हाथ में लेकर उसे चूमने लगी.


3.


श्रेया को देखकर पवन का लौड़ा बुरी स्थिति में था. हालाँकि महक भी उतनी ही आकर्षक थी, पर श्रेया का शरीर अधिक माँसल था, जो पवन को अत्यधिक प्रिय था.

“आओ.” उसने श्रेया की ओर हाथ बढ़ाया तो श्रेया ने उसे थामा और उसके साथ मुस्कुराकर चल दी. कमरे में पहुंचकर पवन को पहले तो समझ ही नहीं आया कि वो क्या करे. वो एक ग्रामीण वातावरण में पीएलए बड़ा था, श्रेया जैसी आधुनिक लड़की का सामना उसने कभी नहीं किया था. राहुल के विवाह के पहले उसे इस प्रकार के धनी जीवन का की अनुभव नहीं था. श्रेया ने उसे देखा तो उसे लगा कि वो कुछ झिझक रहे हैं.

“क्या हुआ अँकल? मैं भी तो आपकी बहू अंजलि के समान ही हूँ? क्या मैं आपको अच्छी नहीं लगी? मम्मी को महक के लिए कहूं क्या?”

“अरे नहीं नहीं बेटी. ऐसा कुछ नहीं. बात बस ये है कि मैं गाँव का रहने वाला, राहुल के अंजलि से विवाह के पूर्व अपने ही परिवार में मस्त था. राहुल और मैं सुलभा को सुखी रखते थे. विवाह के बाद सब अच्छा है, पर मैंने इनके सिवाय किसी और से संसर्ग नहीं किया। तो कुछ अटपटा सा लग रहा है.”

“कोई बात नहीं अँकल। जैसे अपने पहली बार अंजलि को अपनी बाँहों में लिया था वैसे ही अब मुझे भी ले लीजिये.”

ये कहते हुए वो पवन से किसी लता के समान लिपट गई. पवन को इससे अधिक प्रोत्साहन नहीं चाहिए था. कुछ ही पलों में दोनों नंगे होकर एक दूसरे को चूम रहे थे और उत्तेजित करने का प्रयास कर रहे थे. श्रेया पवन के लम्बे मोटे लौड़े से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. दोनों कई मिनटों तक एक दूसरे के शरीर से खेले और फिर कमरे से बाहर आ गए. सुलभा और वर्षा की प्रेम लीला देखकर वो फिर से अपनी लीला में लिप्त हो गए.


4.


समीर ने बिना हिचक महक का हाथ लिया और कमरे में चला गया. वो उसके अपूर्व सौंदर्य पर आसक्त था. वो उसे अंजलि का ही दूसरा रूप दिख रही थी.

“तुम सच में मुझे अंजलि ही लग रही हो.”

“तो फिर मुझे अंजलि ही समझो. और जैसे उसे प्रेम करते हो मुझसे भी करो.”

समीर उसकी बात सुनकर भावुक हो गया और आगे बढ़कर उसे अपने सीने से लगा लिया.

“विक्रम सौभाग्यशाली है जो तुम्हारे जैसी बेटी मिली.” फिर कुछ सोचते हुए बोला, “तुम्हारा तो विवाह राणा के घर में हो रहा है न? फिर ये सब कैसे चलेगा?”

महक सकपका गई क्योंकि उसे इस प्रश्न की अपेक्षा ही नहीं थी. उसकी इस उधेड़बुन ने जैसे समीर को एक चेतना दी.

“ओह!” समीर के मुंह से निकला तो महक ने उसे देखा. समीर के चेहरे को देखकर वो समझ गई कि तीर कमान से निकल चुका है. उसने आँखें झुका लीं।

“हाउ इंटरेस्टिंग.” समीर ने कहा. “हाउ वेरी इंटरेस्टिंग.”

महक: “अंकल, हम समय क्यों व्यर्थ कर रहे हैं. इस विषय में आप पापा से चर्चा कर लेना.”

“तुम सही कहती हो. मेरा ही ध्यान बँट गया था. वैसे तुम्हारी सास है बहुत रसीली.”

“अंकल!” ये कहते हुए महक ने अपने कपड़े निकालने आरम्भ किये और शीघ्र ही नग्नावस्था प्राप्त कर ली. समीर उसके दमकते रूप में खो गया पर फिर सम्भलते हुए अपने कपड़े उतार फेंके और महक की ओर बढ़ा.

“वाओ अंकल, यू हैव ए बिग कॉक. आई लव इट.”

“तो चलो चलते हैं.” और दोनों मुख्य कक्ष में चले गए जहाँ का वातावरण देखकर उन्हें आभास हुआ कि उन्होंने तो एक दूसरे को चूमा ही नहीं. दोनों ने एक दूसरे को देखा और इस कमी को पूरा करने में व्यस्त हो गए.


5.


विक्रम अंजलि के साथ कमरे में गया तो उसने अंजलि को गले से लगा लिया.

“क्या हुआ अँकल?”

“मैं उस दिन का धन्यवाद करना चाहता हूँ जिस दिन तुम्हारे घर की चीखों ने हमारे मिलने की राह बनाई थी.”

“जी. माँ जी उस दिन बाप बेटे ने इतनी बुरा रौंदा था कि उनकी चीखें ही नहीं थमी होंगी. वही आपके घर तक सुनाई दे गयीं. पर जो भी होता है भले के ही लिए होता है.”

“हाँ, मेरा भी यही मानना है. तभी तो तुम्हारे जैसी सुंदरी आज मेरी बाँहों में है.”

“श्रेया और महक के सामने तो मैं कुछ भी नहीं हूँ.”

विक्रम का मन तो था कि वो उसे वहीँ पटक के चोद डाले परन्तु उसे अपने समुदाय के लिए कुछ जानकारी और एकत्रित करनी थी.

“तो क्या तुम सब केवल अपने ही परिवार तक इस चुदाई को सीमित रखते हो या पूर्ण उन्मुक्त हो किसी से भी सेक्स करने के लिए?”

अंजलि सोच में पड़ गई. क्या बताना उचित है? फिर बोली.

“ऐसा नहीं है कि हम बाहर किसी को भी चोद सकते हैं. परन्तु कुछ सीमा तक ये अनुमत है. परन्तु ऐसा कम होता है. वो भी राहुल और जयंत के साथ, क्योंकि वे ही सबसे अधिक यात्रा करते हैं. पवन पापाजी और सुलभा मम्मीजी तो मेरे विचार से परिवार के अतिरिक्त पहली बार किसी अन्य से सम्भोग करने वाले हैं आज.” उसने ये नहीं बताया कि कुसुम के परिवार के विषय में कुछ नहीं कहा, वैसे भी उन्हें नायक गृहस्ती में परिवार ही माना जाता था.

विक्रम: “ओह, ये भी ठीक है. हम सब तो नियमित रूप से बाहर का स्वाद लेते रहते हैं. हालाँकि ये बहुत सीमित मात्रा में है, परन्तु इससे हमें चुदाई के नए आयाम देखने और सीखने के लिए मिलते हैं. और ये हमारे अपने सुखी जीवन के लिए सहायक होता है.”

अंजलि: “मुझे भी इसमें कोई बुराई नहीं लगती. सच कहूँ तो हममें से किसी को भी नहीं. परन्तु अब तक इस प्रकार के अवसर कम ही मिलते हैं.”

विक्रम: “और अगर मिलें तो?”

अंजलि: “तो उनका भरपूर लाभ उठाया जायेगा. और मुझे विश्वास है इसमें आप हमारी सहायता करेंगे. अगर मैं सही हूँ तो आप स्विंगर्स हो. है न?”

विक्रम: “सही समझा. इसके विषय में हम कल बात करेंगे. आज तो मिलन की पहली ही रात है.”

एक दूसरे को नंगा करते हुए दोनों ने एक नया समीकरण बना लिया था. विक्रम ने ये जान लिया था कि नायक परिवार समुदाय से जुड़ने में सक्षम है. और अंजलि को नए प्रयोग करने का अवसर मिलने की उत्सुकता थी.

कुछ देर तक चुंबनों का आदान प्रदान करके वे मुख्य कक्ष में अन्य जोड़ों के साथ जा मिले.


6.


जीजा साले ने स्मिता के एक एक हाथ को थामा और अंतिम कमरे में चले गए. राहुल और जयंत प्रसन्न थे. वे कई बार एक साथ कई महिलाओं की चुदाई कर चुके थे. उनमें से स्मिता के समान सुंदर कम ही थीं. उन्हें इस बात का अनुमान ही नहीं था कि स्मिता किस स्तर की चुड़क्कड़ है. उन दोनों की माताओं को लोहा देने में सक्षम थी. राहुल को अपने लंड की शक्ति पर कुछ सीमा तक गर्व भी था, जिसे उससे चुदने वाली महिलाएं और प्रोत्साहित करती थीं.

“ओके राहुल और जयंत. पहले कपड़े निकालो और मुझे देखने दो आज रात मेरी तृप्ति होगी या नहीं.”

स्मिता के ये कहने पर राहुल को कुछ आक्रोश आया पर उसने संयम रखा. उसका लौड़ा इसका उत्तर देने के लिए पर्याप्त था, तो मुंह का उपयोग करने का कोई आशय ही नहीं था. जयंत के भी यही विचार थे और जीजा साले की ऐसी एकसमता थी कि वो स्मिता को एक पाठ पढ़ा सकते थे. परन्तु पहली बार ऐसा करने से स्थिति विपरीत हो सकती थी. जब दोनों ने नंगे होकर स्मिता की ओर मुंह किया तो स्मिता के चेहरे के भाव बदल गए.

“मुझे क्षमा करना. मैंने तुम दोनों से जो शब्द कहे. मैं उन्हें लौटाना चाहूँगी। तुम दोनों अवश्य ही मुझे आज रात पूर्ण संतुष्ट करने के लिए सक्षम हो.” स्मिता बोली तो राहुल और जयंत के क्रोध शांत हो गया.

स्मिता: “और राहुल, मेहुल का लंड तुम्हारे लंड के ही आकार का है. मैं जयंत को कम नहीं आँक रही हूँ. पर मेहुल और तुम्हारे लंड में बहुत समानता है.”

जयंत: “मैं समझता हूँ. राहुल से गाँड मरवाने में हम दोनों की मम्मियों को असीम सुख मिलता है.”

स्मिता: “इसी कारण हम यहाँ हैं. उस रात सुलभा की चुदाई ने ही हमें मिलाया है. गाँड कौन मार रहा था उस रात?”

राहुल: “मैं ही था. माँ की चुदाई किये हुए कई दिन हो गए थे तो उन्होंने ही कहा था गाँड मारने के लिए. मुझे क्या पता था कि इतना चिल्लायेंगी.”

ये सुनकर सब हंसने पड़े और राहुल और जयंत ने बढ़कर स्मिता को नंगा कर दिया. उसके एक एक स्तन को पकड़कर मसला तो स्मिता की सिसकी निकल गई. जयंत और राहुल के लंड खड़े थे जिन्हें सहला कर स्मिता ने खेल को मुख्य अखाड़े में ले जाने का सुझाव दिया.

स्मिता, राहुल और जयंत के बाहर आते ही सबने उनकी ओर देखा. सबके चेहरों पर एक मुस्कराहट थी. हॉल में तेरह वयस्क नंगे खड़े थे और चुदाई के लिए उत्सुक थे.

************

मधुजी और रजनी भी उस गुट को अपने कमरे से देख रहे थे. राहुल और मेहुल के लौडों ने दोनों के मुंह और चूत में पानी भर दिया था. दोनों की आँखें मिलीं और एक मूक संदेश पारित हुआ. दोनों इस समय घुटनों पर थीं और एक दूसरे के सामने थीं. और जहाँ मधुजी की चूत और गाँड दोनों में रिसोर्ट के लड़कों के लौड़े हाथापाई कर रहे थे, वहीं रजनी की गाँड पर सिद्धार्थ ने लौड़ा रखा ही था. विलास और रवि प्रतीक्षारत थे. उनके भी लंड पूरे तने हुए बुलावे के लिए सजग थे.

रिसोर्ट के अन्य कमरों में भी सज्जन नर नारी इसी प्रकार के कौटुम्बिक व्यभिचार में लिप्त थे. कुछ ने रजनी और मधुजी के समान रिसोर्ट के लड़कों या बालाओं को बुलाया हुआ था. रिसोर्ट में कामवासना का ज्वर अपने चरम पर था.

कहीं चुदाई आरम्भ हो चुकी थी तो कहीं आरम्भ होने वाली थी.

रात्रि अभी शेष थी.


क्रमशः
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Nice and superb update....
 

prkin

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prkin

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Next update soon.
 
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Hunk1988

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आप लिखते रहिए मैं अपनी तरफ से हौसला देती रहूंगी। इतने सारे किरदारों के साथ कहानी लिखना दिलचस्प है।
Sirf hausala dene se kaam nhi chalega,kuchh aage badho
 
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dhparikh

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दृश्य ४: वर्षा और स्मिता:


वर्षा, समीर, सुलभा और पवन भी बातों में तल्लीन थे.

“मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये परिवार दूसरे परिवारों के साथ भी इस खेल में सम्मिलित है. बाहर जो गोल बिस्तर है वो इसी की ओर संकेत करता है. हमें भी उस गुट या सम्प्रदाय में जुड़ने का अवसर दिया जाये. तब हम क्या करेंगे?”

“हम्म्म, ठीक है. अगर ऐसा होगा तो हमें भी स्वीकार है.”

दूर रिसोर्ट के अन्य कमरे में मधुजी इस वार्तालाप को बहुत ध्यान से सुन रही थीं. उनके और तीनों युवक प्रेमियों के चेहरे पर हर्ष की लहर दौड़ गई.

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शाम को रेस्त्रां में जाने पर उन्हें अन्य कुछ परिवार भी दिखे. वर्षा, समीर, सुलभा और पवन ने अब उन्हें भिन्न दृष्टि से देखा और उनकी शंका का समाधान हो गया. जिस प्रकार से परिवारों के सदस्य एक दूसरे से व्यवहार कर रहे थे, उन्हें विश्वास होगया कि वे भी पारिवारिक व्यभिचार के अनुयायी हैं. परन्तु न उन्हें ही उन परिवारों से मिलने की इच्छा थी, न ही वो परिवार भी इसके इच्छुक लग रहे थे. ये सबके लिए उचित था. कुछ देर में मधुजी ने प्रवेश किया और उनके पीछे उनके तीन युवा प्रेमी भी आये. चारों को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ रहा था कि उन सबके बीच में आयु का इतना अंतर था. मधुजी जाकर सब परिवारों से मिलीं, विशेषकर एक परिवार जिसमें उनकी ही आयु की एक महिला थी. उनके साथ उन्होंने कुछ अधिक ही समय बिताया. अंत में स्मिता, सुलभा और वर्षा के पास आईं.

स्मिता से मिलने के बाद उन्होंने वर्षा और सुलभा को देखा और सौंदर्य की प्रशंसा की. उनकी पारखी दृष्टि ने जयंत, राहुल और मेहुल को देखकर उन्हें अपने बिस्तर की शोभा बढ़ाने के लिए उपयुक्य पाया. मोहन ने तो उनके साथ कई बार चुदाई की थी. उन्हें मेहुल के विषय में पता था. पर मेहुल अभी समुदाय से जुड़ा नहीं था, हालाँकि इस माह के मिलन में उसके भी जुड़ने का आवेदन आया हुआ था. जब मधु जी वर्षा और सुलभा से बात कर रही थीं तो स्मिता ने मेहुल के कान में धीमे से कहा.

“इनके साथ वो लड़का देख रहे हो न घुंघराले बालों वाला?” मेहुल ने सिर हिलाया. “उसका नाम सिद्धार्थ है और लंड भी तुम्हारे ही आकार का ही है. अभी पिछले माह ही समुदाय में जुड़ा है, तो मैंने भी देखा है. मधुजी बड़ी प्रशंसक हैं उसकी. अब मेरे बेटे के नीचे आएंगी तब पता चलेगा.” स्मिता ने मानो कोई षड्यंत्र रचा हो. मेहुल मुस्कुरा दिया. उसे अपनी माँ के द्वारा इन विशेष अभियानों पर भेजा जाना बहुत आनंददायक लग रहा था. सुजाता को तो वो अपनी दासी बना ही चुका था और अब मधुजी के तन मन पर अपनी छाप छोड़नी थी. मधुजी ने अपनी बात समाप्त की और उन्हें कल दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया. स्मिता को लगा कि मधुजी कुछ अधिक तीव्रता दिखा रही हैं. परन्तु उसे ध्यान आया कि जब तक गुप्त रिपोर्ट नहीं मिलती मधुजी स्वयं ही कुछ करने की स्थिति में नहीं रहेंगी.

कुछ ही देर में जलपान और मद्यपान आरम्भ हो गया. स्थान और वातावरण को देखते हुए सभी ने सीमित मात्रा में ही मद्यपान किया. वैसे भी बोतलें उनके आवास पर भेजी जाने वाली थीं. जलपान भी अत्यधिक स्वादिस्ट था. इसके बाद उन्हें फिर एक बार रिसोर्ट घुमाया गया. दिन के प्रकाश की सुंदरता से भिन्न रात्रिकालीन सुंदरता थी. सबने इसकी प्रशंसा की और फिर वे रेस्त्रां ही लौट गए. शाम का भोजन आठ बजे तक समाप्त करने की परम्परा थी, जिससे कि सब अतिथि अपने परिवार के साथ आनंद ले सकें.

एक उन्मुक्त वातावरण था और इस बार जब सब रेस्त्रां पहुंचे तो अन्य परिवारों से भी औपचारिक भेंट हुई. नायक परिवार के बड़ों को ये समझने में देर नहीं लगी कि ये परिचय में दिए गए नाम मनघड़ंत थे. पर उन्होंने कुछ दर्शाया नहीं. अपने नाम उन सबने सही ही बताये. इसके बाद सब भोजन करने लगे. इस बार भी बफे की ही व्यवस्था की गई थी और सबको भोजन रुचिकर लगा. भोजन समाप्त होते होते लगभग आठ बज ही गए. मधुजी अपने गुट के साथ व्यस्त थीं. इस बार उनकी आयु की महिला ने उनसे आकर कुछ बात की. आठ बजे सारे परिवार उठकर अपने अपने आवास की ओर चले गए.

स्मिता अपने गुट की मुखिया थी. और अपने आवास पर पहुंचकर उसने वर्षा और सुलभा को बुलाया। ये अब रात्रि के आयोजन की मंत्रणा करने का समय था. विषम सँख्या के कारण कुछ समस्या तो होनी ही थी. तो स्मिता को मुखिया होने के कारण दो पुरुषों का साथ देने का निर्णय हुआ. स्मिता ने महक को बुलाकर उसे सबका निर्णय बताया। अंजलि भी साथ आ गई थी. स्मिता ने अंजलि और श्रेया को दोनों परिवारों को मिलाने का श्रेय दिया. फिर प्रथम चरण की घोषणा की गई.

महिलाओं को युवा लड़के और पुरुषों को लड़कियों का सान्निध्य प्राप्त होना था और इसे सहर्ष ही स्वीकार कर लिया गया.

चूँकि ये दोनों परिवारों का पहला मिलन था ये निर्णय भी लिया गया कि सभी जोड़े पहले कमरों में चले जाएँ जहाँ वो एक सीमा तक एक दूसरे से परिचित हो सकें. दस से पंद्रह मिनट बाद वे सब यहाँ लौटें और फिर आगे की कामक्रीड़ा बढ़ाई जाये. ये सुझाव भी सहर्ष स्वीकार हो गया. छहों जोड़े छह कमरों में लुप्त हो गए.

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ये देखकर मधुजी को कुछ निराशा लगी. उनकी इच्छा थी कि सब एक साथ चुदाई करें जिससे उन्हें देखने में समस्या न हो. पर उसके लिए उन्हें अभी परीक्षा करनी होगी. और इस समय का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने जैसे ही अपने साथ लेटे हुए विलास के लंड को मुंह में लिया किसी ने घंटी बजे. विलास, सिद्धार्थ और रवि के चेहरे पर कुछ क्रोध के भाव आये.

मधुजी ने सिद्धार्थ को देखा और बोलीं, “जा खोल, एक और दुल्हन आई है, अपने साथ बाराती लाई है.”

सिद्धार्थ ने द्वार खोला तो वही वृद्ध महिला जिससे मधुजी रेस्त्रां में वार्तालाप कर रही थीं खड़ी हुई थीं. उनके पीछे दो रिसोर्ट के ही लड़के खड़े थे. कमरे में उपस्थित चारों को नग्नावस्था में देख कर किसी को अचरज नहीं हुआ. सिद्धार्थ उस महिला को देख ही रहा था कि उस महिला ने सिद्धार्थ के सीने पर हाथ रखा और अंदर धकेला. साथ ही वो स्वयं अंदर आ गई. उनके पीछे रिसोर्ट के दोनों लड़के भी अंदर आये और कमरा बंद कर दिया.

मधुजी: “आजा रजनी, जैसा मैंने कहा था वैसा ही है सब.” फिर अपने तीनों युवा प्रेमियों को देखकर बोलीं, “ये रजनी है. अपने ही समुदाय से है. तुममें सी कोई मिला है इनसे?”

रवि बोला, “मिलने वाले ढंग से तो नहीं पर इन्हें मैंने अपने मासिक मिलन में अवश्य देखा है. आज इनसे मिलने का भी सौभाग्य मिल गया.”

विलास और सिद्धार्थ को उनका ध्यान नहीं आया. मधुजी ने निर्णय लिया कि समुदाय के भीतर परिवारों के मिलन को और बढ़ावा देना होगा. रजनी अपने कपड़े उतारने में लग गई और उसके साथ आये रिसोर्ट के लड़के भी इसी उपक्रम में लग गए.

“मैंने तुझे इन तीनों से चुदने के लिए आमंत्रित किया है. पर मुख्य रूप से जैसा मैंने पिछले मिलन में कहा था इस सिद्धार्थ के लौड़े को तेरी गाँड में लेने के लिए. शाम से इस बेचारे को तरसा रही थी जिससे कि तेरी गाँड की माँ चोद दे.”

“हाँ, देखने में तो बहुत बड़ा है. पर मैं भी गाँड मरवाने की अनुभवी हूँ. सच में ऐसे लम्बे मोटे लौड़े से गाँड का माल मथने में बहुत आनंद आता है. सिद्धार्थ बेटा, तेरी दादी की आयु की हूँ, अपने पोतों को निराश करके तेरे पास आई हूँ. मुझे निराश मत करना. गाँड पर कोई दया मत करना.”

“बिलकुल, दादी माँ.” ये कहते हुए उन्हें सिद्धार्थ ने जकड़ लिया.


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1.


सबसे पहले बाहर आने वाले वर्षा और मोहन थे. कमरों में जाने के समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कुछ तनाव था. इस प्रकार से इन दोनों पड़ोसियों ने कभी भेंट जो नहीं की थी. दस मिनट के बाद एक एक करके कमरे कुल और जोड़े मुख्य कक्ष में आ गए. अंत में आने वाली स्मिता ही थी. एक अंतर जो अंदर जाने और बाहर आने में था वो ये कि अंदर वस्त्रों के साथ गए थे और बाहर नग्नावस्था में आये. छुपी आँखों से एक दूसरे के परिवारों का शारीरिक निरीक्षण किया गया और आश्वस्त हुए कि एक से बढ़कर एक सौंदर्य और पुरुषार्थ के प्रतिबिम्ब सामने थे.

वर्षा और मोहन को एक दूसरे से खुलने में अधिक समय नहीं लगा. वे एक दूसरे को कई वर्षों से जानते थे. मोहन अंजलि से दो या तीन वर्ष ही बड़ा था. वर्षा उसमें कभी कभी अपने भावी दामाद को देखती थी. मोहन के विवाह से उसकी इस इच्छा को चोट पहुंची थी. मोहन ने उसे अपनी बाँहों में लिया और चूमकर बोला।

“मैं जानता हूँ कि आप मुझे अंजलि के लिए चुनना चाहती थीं. परन्तु कोई चिंता नहीं है. अब हम एक दूसरे के साथ हर प्रकार का आनंद ले सकते हैं.”

“तुम्हें कैसे पता?”

“मैं आपकी आँखों में ये देखता था, जब भी हम किसी सभा या पार्टी में मिलते थे. सच तो ये है कि अंजलि मुझे भी अत्यंत प्रिय थी. पर विधि का विधान यही है. आज अंजलि और मैं अपने साथियों के साथ प्रसन्न हैं.”

मोहन ने अपनी बातों के मोहपाश में वर्षा को यूँ बाँधा हुआ था कि उसे पता भी नहीं चला कि कब उसके बाह्य वस्त्र उतर गए. इसके बाद मोहन ने अपने कंपड़ों को उतार फेंका और फिर से वर्षा के पास आकर उसकी ब्रा और पैंटी भी शरीर से मुक्त कर दी. उसे अपने बाहुपाश में लेकर उसके होंठ चूसने लगा. वर्षा ने भी उसका साथ दिया और उसके लंड को अपने हाथ में ले लिया. मोहन भी वर्षा के सुडोल स्तनों से खेलता रहा. एक दूसरे को कुछ और समय एक दूसरे को चूमते रहे फिर बाहर जाने का मन बना लिया. और बाहर निकल गए.



2.


मेहुल को जब पता लगा कि उसे सुलभा का साथ मिला है तो उसकी प्रसन्नता कई गुना बढ़ गई. उसे सुलभा में एक अकथनीय आकर्षण लग रहा था. हालाँकि सुलभा सौंदर्य के माप में उपस्थित अन्य महिलाओं से उन्नीस ही थी, परन्तु मेहुल उसके प्रति अत्यधिक आकर्षित था. सुलभा ने जब उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो मेहुल के शरीर में मानो तीव्र विद्युत् प्रवाह दौड़ गया. कमरे में पहुंच कर मेहुल को पहली बार एक असहजता का अनुभव हुआ. स्वयं को पराक्रमी चोदू समझने वाले मेहुल का आत्मविश्वास न जाने कहाँ खो गया.

“घबराओ मत, मैं तुम्हें खाने की कोई योजना नहीं बना रही हूँ.” सुलभा ने मुस्कुराकर बोला तो मेहुल की सारी झिझक छू-मंतर हो गयी. वो हंस पड़ा.

“सच ये है कि मुझे स्वयं नहीं समझ आ रहा कि मैं आप पर इतना मुग्ध हो गया हूँ. आपके हाथ को छूकर ही मेरी गाँ….” मेहुल बोलते बोलते रुक गया.

सुलभा मुस्कुराने लगी. “मैं समझ गई. पर ये भी बता देती हूँ कि मुझे तुम्हारे भीतर मेरे बेटे राहुल जैसा आकर्षण अनुभव हो रहा है. और मेरा अनुमान है कि तुम चुदाई में उससे उन्नीस नहीं हो.”

ये बोलते हुए सुलभा अपने वस्त्र उतार कर एक ओर रख रही थी. मेहुल उसे एकटक देखे जा रहा था. जब सुलभा निर्वस्त्र होकर पलटी तो मेहुल का मुँह खुला रह गया. सुलभा का साँवला सुगठित शरीर में सच में एक अपूर्व आकर्षण था.

“देख लेना, अब अपने कपड़े उतार लो. अधिक समय नहीं है.” सुलभा ने कहा तो मेहुल को निर्वस्त्र होने में ३० सेकण्ड भी नहीं लगे.

“हम्म, मेरा अनुमान सही है. तुम भी राहुल के ही समान शक्तिशाली लौड़े के स्वामी हो. आशा है कि चोदने में भी निपुण होंगे.”

“जी, अब तक किसी ने कमी नहीं निकाली. हाँ, चाहने वाली स्त्रियों की कमी नहीं है.” मेहुल का आत्मविश्वास लौट आया.

उसने सुलभा को अपनी बाँहों में लिया और उसके होंठ चूसने लगा. सुलभा उसके चुंबन का साथ देने लगी. सुलभा ने मेहुल के लंड को हाथ में लेकर सहलाया और वहीँ दूसरे हाथ से मेहुल का हाथ अपने मम्मों पर रखा. इस स्थिति में चुंबन के पश्चात वो दोनों पूर्ण रूप से उत्तेजित हो गए और उनका कमरे में आने का प्रयोजन सिद्ध हो गया. एक दूसरे का हाथ पकड़े वो बाहर आये तो वर्षा और मोहन पहले ही वहाँ थे और दोनों एक दूसरे को चूम रहे थे. सुलभा ने उन्हें देखा और फिर मेहुल के चेहरे को हाथ में लेकर उसे चूमने लगी.


3.


श्रेया को देखकर पवन का लौड़ा बुरी स्थिति में था. हालाँकि महक भी उतनी ही आकर्षक थी, पर श्रेया का शरीर अधिक माँसल था, जो पवन को अत्यधिक प्रिय था.

“आओ.” उसने श्रेया की ओर हाथ बढ़ाया तो श्रेया ने उसे थामा और उसके साथ मुस्कुराकर चल दी. कमरे में पहुंचकर पवन को पहले तो समझ ही नहीं आया कि वो क्या करे. वो एक ग्रामीण वातावरण में पीएलए बड़ा था, श्रेया जैसी आधुनिक लड़की का सामना उसने कभी नहीं किया था. राहुल के विवाह के पहले उसे इस प्रकार के धनी जीवन का की अनुभव नहीं था. श्रेया ने उसे देखा तो उसे लगा कि वो कुछ झिझक रहे हैं.

“क्या हुआ अँकल? मैं भी तो आपकी बहू अंजलि के समान ही हूँ? क्या मैं आपको अच्छी नहीं लगी? मम्मी को महक के लिए कहूं क्या?”

“अरे नहीं नहीं बेटी. ऐसा कुछ नहीं. बात बस ये है कि मैं गाँव का रहने वाला, राहुल के अंजलि से विवाह के पूर्व अपने ही परिवार में मस्त था. राहुल और मैं सुलभा को सुखी रखते थे. विवाह के बाद सब अच्छा है, पर मैंने इनके सिवाय किसी और से संसर्ग नहीं किया। तो कुछ अटपटा सा लग रहा है.”

“कोई बात नहीं अँकल। जैसे अपने पहली बार अंजलि को अपनी बाँहों में लिया था वैसे ही अब मुझे भी ले लीजिये.”

ये कहते हुए वो पवन से किसी लता के समान लिपट गई. पवन को इससे अधिक प्रोत्साहन नहीं चाहिए था. कुछ ही पलों में दोनों नंगे होकर एक दूसरे को चूम रहे थे और उत्तेजित करने का प्रयास कर रहे थे. श्रेया पवन के लम्बे मोटे लौड़े से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. दोनों कई मिनटों तक एक दूसरे के शरीर से खेले और फिर कमरे से बाहर आ गए. सुलभा और वर्षा की प्रेम लीला देखकर वो फिर से अपनी लीला में लिप्त हो गए.


4.


समीर ने बिना हिचक महक का हाथ लिया और कमरे में चला गया. वो उसके अपूर्व सौंदर्य पर आसक्त था. वो उसे अंजलि का ही दूसरा रूप दिख रही थी.

“तुम सच में मुझे अंजलि ही लग रही हो.”

“तो फिर मुझे अंजलि ही समझो. और जैसे उसे प्रेम करते हो मुझसे भी करो.”

समीर उसकी बात सुनकर भावुक हो गया और आगे बढ़कर उसे अपने सीने से लगा लिया.

“विक्रम सौभाग्यशाली है जो तुम्हारे जैसी बेटी मिली.” फिर कुछ सोचते हुए बोला, “तुम्हारा तो विवाह राणा के घर में हो रहा है न? फिर ये सब कैसे चलेगा?”

महक सकपका गई क्योंकि उसे इस प्रश्न की अपेक्षा ही नहीं थी. उसकी इस उधेड़बुन ने जैसे समीर को एक चेतना दी.

“ओह!” समीर के मुंह से निकला तो महक ने उसे देखा. समीर के चेहरे को देखकर वो समझ गई कि तीर कमान से निकल चुका है. उसने आँखें झुका लीं।

“हाउ इंटरेस्टिंग.” समीर ने कहा. “हाउ वेरी इंटरेस्टिंग.”

महक: “अंकल, हम समय क्यों व्यर्थ कर रहे हैं. इस विषय में आप पापा से चर्चा कर लेना.”

“तुम सही कहती हो. मेरा ही ध्यान बँट गया था. वैसे तुम्हारी सास है बहुत रसीली.”

“अंकल!” ये कहते हुए महक ने अपने कपड़े निकालने आरम्भ किये और शीघ्र ही नग्नावस्था प्राप्त कर ली. समीर उसके दमकते रूप में खो गया पर फिर सम्भलते हुए अपने कपड़े उतार फेंके और महक की ओर बढ़ा.

“वाओ अंकल, यू हैव ए बिग कॉक. आई लव इट.”

“तो चलो चलते हैं.” और दोनों मुख्य कक्ष में चले गए जहाँ का वातावरण देखकर उन्हें आभास हुआ कि उन्होंने तो एक दूसरे को चूमा ही नहीं. दोनों ने एक दूसरे को देखा और इस कमी को पूरा करने में व्यस्त हो गए.


5.


विक्रम अंजलि के साथ कमरे में गया तो उसने अंजलि को गले से लगा लिया.

“क्या हुआ अँकल?”

“मैं उस दिन का धन्यवाद करना चाहता हूँ जिस दिन तुम्हारे घर की चीखों ने हमारे मिलने की राह बनाई थी.”

“जी. माँ जी उस दिन बाप बेटे ने इतनी बुरा रौंदा था कि उनकी चीखें ही नहीं थमी होंगी. वही आपके घर तक सुनाई दे गयीं. पर जो भी होता है भले के ही लिए होता है.”

“हाँ, मेरा भी यही मानना है. तभी तो तुम्हारे जैसी सुंदरी आज मेरी बाँहों में है.”

“श्रेया और महक के सामने तो मैं कुछ भी नहीं हूँ.”

विक्रम का मन तो था कि वो उसे वहीँ पटक के चोद डाले परन्तु उसे अपने समुदाय के लिए कुछ जानकारी और एकत्रित करनी थी.

“तो क्या तुम सब केवल अपने ही परिवार तक इस चुदाई को सीमित रखते हो या पूर्ण उन्मुक्त हो किसी से भी सेक्स करने के लिए?”

अंजलि सोच में पड़ गई. क्या बताना उचित है? फिर बोली.

“ऐसा नहीं है कि हम बाहर किसी को भी चोद सकते हैं. परन्तु कुछ सीमा तक ये अनुमत है. परन्तु ऐसा कम होता है. वो भी राहुल और जयंत के साथ, क्योंकि वे ही सबसे अधिक यात्रा करते हैं. पवन पापाजी और सुलभा मम्मीजी तो मेरे विचार से परिवार के अतिरिक्त पहली बार किसी अन्य से सम्भोग करने वाले हैं आज.” उसने ये नहीं बताया कि कुसुम के परिवार के विषय में कुछ नहीं कहा, वैसे भी उन्हें नायक गृहस्ती में परिवार ही माना जाता था.

विक्रम: “ओह, ये भी ठीक है. हम सब तो नियमित रूप से बाहर का स्वाद लेते रहते हैं. हालाँकि ये बहुत सीमित मात्रा में है, परन्तु इससे हमें चुदाई के नए आयाम देखने और सीखने के लिए मिलते हैं. और ये हमारे अपने सुखी जीवन के लिए सहायक होता है.”

अंजलि: “मुझे भी इसमें कोई बुराई नहीं लगती. सच कहूँ तो हममें से किसी को भी नहीं. परन्तु अब तक इस प्रकार के अवसर कम ही मिलते हैं.”

विक्रम: “और अगर मिलें तो?”

अंजलि: “तो उनका भरपूर लाभ उठाया जायेगा. और मुझे विश्वास है इसमें आप हमारी सहायता करेंगे. अगर मैं सही हूँ तो आप स्विंगर्स हो. है न?”

विक्रम: “सही समझा. इसके विषय में हम कल बात करेंगे. आज तो मिलन की पहली ही रात है.”

एक दूसरे को नंगा करते हुए दोनों ने एक नया समीकरण बना लिया था. विक्रम ने ये जान लिया था कि नायक परिवार समुदाय से जुड़ने में सक्षम है. और अंजलि को नए प्रयोग करने का अवसर मिलने की उत्सुकता थी.

कुछ देर तक चुंबनों का आदान प्रदान करके वे मुख्य कक्ष में अन्य जोड़ों के साथ जा मिले.


6.


जीजा साले ने स्मिता के एक एक हाथ को थामा और अंतिम कमरे में चले गए. राहुल और जयंत प्रसन्न थे. वे कई बार एक साथ कई महिलाओं की चुदाई कर चुके थे. उनमें से स्मिता के समान सुंदर कम ही थीं. उन्हें इस बात का अनुमान ही नहीं था कि स्मिता किस स्तर की चुड़क्कड़ है. उन दोनों की माताओं को लोहा देने में सक्षम थी. राहुल को अपने लंड की शक्ति पर कुछ सीमा तक गर्व भी था, जिसे उससे चुदने वाली महिलाएं और प्रोत्साहित करती थीं.

“ओके राहुल और जयंत. पहले कपड़े निकालो और मुझे देखने दो आज रात मेरी तृप्ति होगी या नहीं.”

स्मिता के ये कहने पर राहुल को कुछ आक्रोश आया पर उसने संयम रखा. उसका लौड़ा इसका उत्तर देने के लिए पर्याप्त था, तो मुंह का उपयोग करने का कोई आशय ही नहीं था. जयंत के भी यही विचार थे और जीजा साले की ऐसी एकसमता थी कि वो स्मिता को एक पाठ पढ़ा सकते थे. परन्तु पहली बार ऐसा करने से स्थिति विपरीत हो सकती थी. जब दोनों ने नंगे होकर स्मिता की ओर मुंह किया तो स्मिता के चेहरे के भाव बदल गए.

“मुझे क्षमा करना. मैंने तुम दोनों से जो शब्द कहे. मैं उन्हें लौटाना चाहूँगी। तुम दोनों अवश्य ही मुझे आज रात पूर्ण संतुष्ट करने के लिए सक्षम हो.” स्मिता बोली तो राहुल और जयंत के क्रोध शांत हो गया.

स्मिता: “और राहुल, मेहुल का लंड तुम्हारे लंड के ही आकार का है. मैं जयंत को कम नहीं आँक रही हूँ. पर मेहुल और तुम्हारे लंड में बहुत समानता है.”

जयंत: “मैं समझता हूँ. राहुल से गाँड मरवाने में हम दोनों की मम्मियों को असीम सुख मिलता है.”

स्मिता: “इसी कारण हम यहाँ हैं. उस रात सुलभा की चुदाई ने ही हमें मिलाया है. गाँड कौन मार रहा था उस रात?”

राहुल: “मैं ही था. माँ की चुदाई किये हुए कई दिन हो गए थे तो उन्होंने ही कहा था गाँड मारने के लिए. मुझे क्या पता था कि इतना चिल्लायेंगी.”

ये सुनकर सब हंसने पड़े और राहुल और जयंत ने बढ़कर स्मिता को नंगा कर दिया. उसके एक एक स्तन को पकड़कर मसला तो स्मिता की सिसकी निकल गई. जयंत और राहुल के लंड खड़े थे जिन्हें सहला कर स्मिता ने खेल को मुख्य अखाड़े में ले जाने का सुझाव दिया.

स्मिता, राहुल और जयंत के बाहर आते ही सबने उनकी ओर देखा. सबके चेहरों पर एक मुस्कराहट थी. हॉल में तेरह वयस्क नंगे खड़े थे और चुदाई के लिए उत्सुक थे.

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मधुजी और रजनी भी उस गुट को अपने कमरे से देख रहे थे. राहुल और मेहुल के लौडों ने दोनों के मुंह और चूत में पानी भर दिया था. दोनों की आँखें मिलीं और एक मूक संदेश पारित हुआ. दोनों इस समय घुटनों पर थीं और एक दूसरे के सामने थीं. और जहाँ मधुजी की चूत और गाँड दोनों में रिसोर्ट के लड़कों के लौड़े हाथापाई कर रहे थे, वहीं रजनी की गाँड पर सिद्धार्थ ने लौड़ा रखा ही था. विलास और रवि प्रतीक्षारत थे. उनके भी लंड पूरे तने हुए बुलावे के लिए सजग थे.

रिसोर्ट के अन्य कमरों में भी सज्जन नर नारी इसी प्रकार के कौटुम्बिक व्यभिचार में लिप्त थे. कुछ ने रजनी और मधुजी के समान रिसोर्ट के लड़कों या बालाओं को बुलाया हुआ था. रिसोर्ट में कामवासना का ज्वर अपने चरम पर था.

कहीं चुदाई आरम्भ हो चुकी थी तो कहीं आरम्भ होने वाली थी.

रात्रि अभी शेष थी.


क्रमशः
1264300
Nice update....
 
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