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Thanks bhaiबहुत ही जबरदस्त अपडेट हैं भाई मजा आ गया
काम ज्वाला में तडफ रही शीला ने अपने लिए लंड का इंतजाम करने का पहला फासा रसिक की जोरु रुखी पर फेंक दिया और वो सहीं जगह पर जा लगा
बहुत खुब जबरदस्त अपडेट
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा

शुक्रियाSheela to land ke liye pagal hue ja rahi hai aur ab rukhi ke kariye uske mard ko fasane wali hai ab dekhte hai kaise ye rasik ko fasati hai aur sath mai aur kis2 ko fasati hai apni chut ki aag ko bhujane




Waaaahhhhh pehla episode padha Vakharia bhai..... maza aa gaya padh kar......५५ साल की शीला, रात को १० बजे रसोईघर की जूठन फेंकने के लिए बाहर निकली... थोड़ी देर पहले ही बारिश रुकी थी। चारों तरफ पानी के पोखर भरे हुए थे... भीनी मिट्टी की मदमस्त खुशबू से ठंडा वातावरण बेहद कामुक बना देने वाला था। दूर कोने मे एक कुत्तिया... अपनी पुत्ती खुद ही चाट रही थी... शीला देखती रह गई..!! वह सोचने लगी की काश..!! हम औरतें भी यह काम अगर खुद कर पाती तो कितना अच्छा होता... मेरी तरह लंड के बिना तड़पती, न जाने कितनी औरतों को, इस मदमस्त बारिश के मौसम में, तड़पना न पड़ता...
वह घर पर लौटी... और दरवाजा बंद किया... और बिस्तर पर लेट गई।
उसका पति दो साल के लिए, कंपनी के काम से विदेश गया था... और तब से शीला की हालत खराब हो गई थी। वैसे तो पचपन साल की उम्र मे औरतों को चुदाई की इतनी भूख नही होती... पर एकलौती बेटी की शादी हो जाने के बाद... दोनों पति पत्नी अकेले से पड़ गए थे.. पैसा तो काफी था... और उसका पति मदन, ५८ साल की उम्र मे भी.. काफी शौकीन मिजाज था.. रोज रात को वह शीला को नंगी करके अलग अलग आसनों मे भरपूर चोदता.. शीला की उम्र ५५ साल की थी... मेनोपोज़ भी हो चुका था.. फिर भी साली... कूद कूद कर लंड लेती.. शीला का पति मदन, ऐसे अलग अलग प्रयोग करता की शीला पागल हो जाती... उनके घर पर ब्लू-फिल्म की डीवीडी का ढेर पड़ा था.. शीला ने वह सब देख रखी थी.. उसे अपनी चुत चटवाने की बेहद इच्छा हो रही थी... और मदन की नामौजूदगी ने उसकी हालत और खराब कर दी थी।
ऊपर से उस कुत्तीया को अपनी पुत्ती चाटते देख... उसके पूरे बदन मे आग सी लग गई...
अपने नाइट ड्रेस के गाउन से... उसने अपने ४० इंच के साइज़ के दोनों बड़े बड़े गोरे बबले बाहर निकाले.. और अपनी हथेलियों से निप्पलों को मसलने लगी.. आहहहह..!! अभी मदन यहाँ होता तो... अभी मुझ पर टूट पड़ा होता... और अपने हाथ से मेरी चुत सहला रहा होता.. अभी तो उसे आने मे और चार महीने बाकी है.. पिछले २० महीनों से... शीला के भूखे भोसड़े को किसी पुरुष के स्पर्श की जरूरत थी.. पर हाय ये समाज और इज्जत के जूठे ढकोसले..!! जिनके डर के कारण वह अपनी प्यास बुझाने का कोई और जुगाड़ नही कर पा रही थी।
"ओह मदन... तू जल्दी आजा... अब बर्दाश्त नही होता मुझसे...!!" शीला के दिल से एक दबी हुई टीस निकली... और उसे मदन का मदमस्त लोडा याद आ गया.. आज कुछ करना पड़ेगा इस भोसड़े की आग का...
शीला उठकर खड़ी हुई और किचन मे गई... फ्रिज खोलकर उसने एक मोटा ताज़ा बैंगन निकाला.. और उसे ही मदन का लंड समझकर अपनी चुत पर घिसने लगी... बैंगन मदन के लंड से तो पतला था... पर मस्त लंबा था... शीला ने बैंगन को डंठल से पकड़ा और अपने होंठों पर रगड़ने लगी... आँखें बंद कर उसने मदन के सख्त लंड को याद किया और पूरा बैंगन मुंह मे डालकर चूसने लगी... जैसे अपने पति का लंड चूस रही हो... अपनी लार से पूरा बैंगन गीला कर दिया.. और अपने भोसड़े मे घुसा दिया... आहहहहहहह... तड़पती हुई चुत को थोड़ा अच्छा लगा...
आज शीला.. वासना से पागल हो चली थी... वह पूरी नंगी होकर किचन के पीछे बने छोटे से बगीचे मे आ गई... रात के अंधेरे मे अपने बंगले के बगीचे मे अपनी नंगी चुत मे बैंगन घुसेड़कर, स्तनों को मरोड़ते मसलते हुए घूमने लगी.. छिटपुट बारिश शुरू हुई और शीला खुश हो गई.. खड़े खड़े उसने बैंगन से मूठ मारते हुए भीगने का आनंद लिया... मदन के लंड की गैरमौजूदगी में बैंगन से अपने भोंसड़े को ठंडा करने का प्रयत्न करती शीला की नंगी जवानी पर बारिश का पानी... उसके मदमस्त स्तनों से होते हुए... उसकी चुत पर टपक रहा था। विकराल आग को भी ठंडा करने का माद्दा रखने वाले बारिश के पानी ने, शीला की आग को बुझाने के बजाए और भड़का दिया। वास्तविक आग पानी से बुझ जाती है पर वासना की आग तो ओर प्रज्वलित हो जाती है। शीला बागीचे के गीले घास में लेटी हुई थी। बेकाबू हो चुकी हवस को मामूली बैंगन से बुझाने की निरर्थक कोशिश कर रही थी वह। उसे जरूरत थी.. एक मदमस्त मोटे लंबे लंड की... जो उसके फड़फड़ाते हुए भोसड़े को बेहद अंदर तक... बच्चेदानी के मुख तक धक्के लगाकर, गरम गरम वीर्य से सराबोर कर दे। पक-पक पुच-पुच की आवाज के साथ शीला बैंगन को अपनी चुत के अंदर बाहर कर रही थी। आखिर लंड का काम बैंगन ने कर दिया। शीला की वासना की आग बुझ गई.. तड़पती हुई चुत शांत हो गई... और वह झड़कर वही खुले बगीचे में नंगी सो गई... रात के तीन बजे के करीब उसकी आँख खुली और वह उठकर घर के अंदर आई। अपने भोसड़े से उसने पिचका हुआ बैंगन बाहर निकाला.. गीले कपड़े से चुत को पोंछा और फिर नंगी ही सो गई।
सुबह जब वह नींद से जागी तब डोरबेल बज रही थी "दूध वाला रसिक होगा" शीला ने सोचा, इतनी सुबह, ६ बजे और कौन हो सकता है!! शीला ने उठकर दरवाजा खोला... बाहर तेज बारिश हो रही थी। दूधवाला रसिक पूरा भीगा हुआ था.. शीला उसे देखते ही रह गई... कामदेव के अवतार जैसा, बलिष्ठ शरीर, मजबूत कदकाठी, चौड़े कंधे और पेड़ के तने जैसी मोटी जांघें... बड़ी बड़ी मुछों वाला ३५ साल का रसिक.. शीला को देखकर बोला "कैसी हो भाभीजी?"
गाउन के अंदर बिना ब्रा के बोबलों को देखते हुए रसिक एक पल के लिए जैसे भूल ही गया की वह किस काम के लिए आया था!! उसके भीगे हुए पतले कॉटन के पतलून में से उसका लंड उभरने लगा जो शीला की पारखी नजर से छिप नही सका।
"अरे रसिक, तुम तो पूरे भीग चुके हो... यहीं खड़े रहो, में पोंछने के लिए रुमाल लेकर आती हूँ.. अच्छे से जिस्म पोंछ लो वरना झुकाम हो जाएगा" कहकर अपने कूल्हे मटकाती हुई शीला रुमाल लेने चली गई।
"अरे भाभी, रुमाल नही चाहिए,... बस एक बार अपनी बाहों में जकड़ लो मुझे... पूरा जिस्म गरम हो जाएगा" अपने लंड को ठीक करते हुए रसिक ने मन में सोचा.. बहेनचोद साली इस भाभी के एक बोबले में ५-५ लीटर दूध भरा होगा... इतने बड़े है... मेरी भेस से ज्यादा तो इस शीला भाभी के थन बड़े है... एक बार दुहने को मिल जाए तो मज़ा ही आ जाए...
रसिक घर के अंदर ड्रॉइंगरूम में आ गया और डोरक्लोज़र लगा दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
शीला ने आकर रसिक को रुमाल दिया। रसिक अपने कमीज के बटन खोलकर रुमाल से अपनी चौड़ी छाती को पोंछने लगा। शीला अपनी हथेलियाँ मसलते उसे देख रही थी। उसके मदमस्त चुचे गाउन के ऊपर से उभरकर दिख रहे थे। उन्हे देखकर रसिक का लंड पतलून में ही लंबा होता जा रहा था। रसिक के सख्त लंड की साइज़ देखकर... शीला की पुच्ची बेकाबू होने लगी। उसने रसिक को बातों में उलझाना शुरू किया ताकि वह ओर वक्त तक उसके लंड को तांक सके।
"इतनी सुबह जागकर घर घर दूध देने जाता है... थक जाता होगा.. है ना!!" शीला ने कहा
"थक तो जाता हूँ, पर क्या करूँ, काम है करना तो पड़ता ही है... आप जैसे कुछ अच्छे लोग को ही हमारी कदर है.. बाकी सब तो.. खैर जाने दो" रसिक ने कहा। रसिक की नजर शीला के बोबलों पर चिपकी हुई थी.. यह शीला भी जानती थी.. उसकी नजर रसिक के खूँटे जैसे लंड पर थी।
शीला ने पिछले २० महीनों से.. तड़प तड़प कर... मूठ मारकर अपनी इज्जत को संभाले रखा था.. पर आज रसिक के लंड को देखकर वह उत्तेजित हथनी की तरह गुर्राने लगी थी...
"तुझे ठंड लग रही है शायद... रुक में चाय बनाकर लाती हूँ" शीला ने कहा
"अरे रहने दीजिए भाभी, में आपकी चाय पीने रुका तो बाकी सारे घरों की चाय नही बनेगी.. अभी काफी घरों में दूध देने जाना है" रसिक ने कहा
फिर रसिक ने पूछा "भाभी, एक बात पूछूँ? आप दो साल से अकेले रह रही हो.. भैया तो है नही.. आपको डर नही लगता?" यह कहते हुए उस चूतिये ने अपने लंड पर हाथ फेर दिया
रसिक के कहने का मतलब समझ न पाए उतनी भोली तो थी नही शीला!!
"अकेले अकेले डर तो बहोत लगता है रसिक... पर मेरे लिए अपना घर-बार छोड़कर रोज रात को साथ सोने आएगा!!" उदास होकर शीला ने कहा
"चलिए भाभी, में अब चलता हूँ... देर हो गई... आप मेरे मोबाइल में अपना नंबर लिख दीजिए.. कभी अगर दूध देने में देर हो तो आप को फोन कर बता सकूँ"
तिरछी नजर से रसिक के लंड को घूरते हुए शीला ने चुपचाप रसिक के मोबाइल में अपना नंबर स्टोर कर दिया।
"आपके पास तो मेरा नंबर है ही.. कभी बिना काम के भी फोन करते रहना... मुझे अच्छा लगेगा" रसिक ने कहा
शीला को पता चल गया की वह उसे दाने डाल रहा था
"चलता हूँ भाभी" रसिक मुड़कर दरवाजा खोलते हुए बोला
उसके जाते ही दरवाजा बंद हो गया। शीला दरवाजे से लिपट पड़ी, और अपने स्तनों को दरवाजे पर रगड़ने लगी। जिस रुमाल से रसिक ने अपनी छाती पोंछी थी उसमे से आती मर्दाना गंध को सूंघकर उस रुमाल को अपने भोसड़े पर रगड़ते हुए शीला सिसकने लगी।
कवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतल और मेघदूत में जैसे वर्णन किया है बिल्कुल उसी प्रकार.. शीला इस बारिश के मौसम में कामातुर हो गई थी। दूध गरम करने के लिए वो किचन में आई और फिर उसने फ्रिज में से एक मोटा गाजर निकाला। दूध को गरम करने गेस पर चढ़ाया.. और फिर अपने तड़पते भोसड़े में गाजर घुसेड़कर अंदर बाहर करने लगी।
रूम के अंदर बहोत गर्मी हो रही थी.. शीला ने एक खिड़की खोल दी.. खिड़की से आती ठंडी हवा उसके बदन को शीतलता प्रदान कर रही थी और गाजर उसकी चुत को ठंडा कर रहा था। खिड़की में से उसने बाहर सड़क की ओर देखा... सामने ही एक कुत्तीया के पीछे १०-१२ कुत्ते, उसे चोदने की फिराक में पागल होकर आगे पीछे दौड़ रहे थे।
शीला मन में ही सोचने लगी "बहनचोद.. पूरी दुनिया चुत के पीछे भागती है... और यहाँ में एक लंड को तरस रही हूँ"
सांड के लंड जैसा मोटा गाजर उसने पूरा अंदर तक घुसा दिया... उसके मम्मे ऐसे दर्द कर रहे थे जैसे उनमे दूध भर गया हो.. भारी भारी से लगते थे। उस वक्त शीला इतनी गरम हो गई की उसका मन कर रहा था की गैस के लाइटर को अपनी पुच्ची में डालकर स्पार्क करें...
शीला ने अपने सख्त गोभी जैसे मम्मे गाउन के बाहर निकाले... और किचन के प्लेटफ़ॉर्म पर उन्हे रगड़ने लगी.. रसिक की बालों वाली छाती उसकी नजर से हट ही नही रही थी। आखिर दूध की पतीली और शीला के भोसड़े में एक साथ उबाल आया। फरक सिर्फ इतना था की दूध गरम हो गया था और शीला की चुत ठंडी हो गई थी।
रोजमर्रा के कामों से निपटकर, शीला गुलाबी साड़ी में सजधज कर सब्जी लेने के लिए बाजार की ओर निकली। टाइट ब्लाउस में उसके बड़े बड़े स्तन, हर कदम के साथ उछलते थे। आते जाते लोग उन मादक चूचियों को देखकर अपना लंड ठीक करने लग जाते.. उसके मदमस्त कूल्हे, राजपुरी आम जैसे बबले.. और थिरकती चाल...
एक जवान सब्जी वाले के सामने उकड़ूँ बैठकर वह सब्जी देखने लगी। शीला के पैरों की गोरी गोरी पिंडियाँ देखकर सब्जीवाला स्तब्ध रह गया। घुटनों के दबाव के कारण शीला की बड़ी चूचियाँ ब्लाउस से उभरकर बाहर झाँकने लगी थी..
शीला का यह बेनमून हुस्न देखकर सब्जीवाला कुछ पलों के लिए, अपने आप को और अपने धंधे तक को भूल गया।
शीला के दो बबलों को बीच बनी खाई को देखकर सब्जीवाले का छिपकली जैसा लंड एक पल में शक्करकंद जैसा बन गया और एक मिनट बाद मोटी ककड़ी जैसा!!!
"मुली का क्या भाव है?" शीला ने पूछा
"एक किलो के ४० रूपीए"
"ठीक है.. मोटी मोटी मुली निकालकर दे मुझे... एक किलो" शीला ने कहा
"मोटी मुली क्यों? पतली वाली ज्यादा स्वादिष्ट होती है" सब्जीवाले ने ज्ञान दिया
"तुझे जितना कहा गया उतना कर... मुझे मोटी और लंबी मुली ही चाहिए" शीला ने कहा
"क्यों? खाना भी है या किसी ओर काम के लिए चाहिए?"
शीला ने जवाब नही दिया तो सब्जीवाले को ओर जोश चढ़ा
"मुली से तो जलन होगी... आप गाजर ले लो"
"नही चाहिए मुझे गाजर... ये ले पैसे" शीला ने थोड़े गुस्से के साथ उसे १०० का नोट दिया
बाकी खुले पैसे वापिस लौटाते वक्त उस सब्जीवाले ने शीला की कोमल हथेलियों पर हाथ फेर लिया और बोला "और क्या सेवा कर सकता हूँ भाभीजी?"
उसकी ओर गुस्से से घूरते हुए शीला वहाँ से चल दी। उसकी बात वह भलीभाँति समझ सकती थी। पर क्यों बेकार में ऐसे लोगों से उलझे... ऐसा सोचकर वह किराने की दुकान के ओर गई।
बाकी सामान खरीदकर वह रिक्शा में घर आने को निकली। रिक्शा वाला हारामी भी मिरर को शीला के स्तनों पर सेट कर देखते देखते... और मन ही मन में चूसते चूसते... ऑटो चला रहा था।
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एक तरफ घर पर पति की गैरहाजरी, दूसरी तरफ बाहर के लोगों की हलकट नजरें.. तीसरी तरफ भोसड़े में हो रही खुजली तो चौथी तरफ समाज का डर... परेशान हो गई थी शीला!!
घर आकर वह लाश की तरह बिस्तर पर गिरी.. उसकी छाती से साड़ी का पल्लू सरक गया... यौवन के दो शिखरों जैसे उत्तुंग स्तन.. शीला की हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे। लेटे लेटे वह सोच रही थी "बहनचोद, इन माँस के गोलों में भला कुदरत ने ऐसा क्या जादू किया है की जो भी देखता है बस देखता ही रह जाता है!!" फिर वह सोचने लगी की वैसे तो मर्द के लंड में भी ऐसा कौनसा चाँद लगा होता है, जो औरतें देखते ही पानी पानी हो जाती है!!
शीला को अपने पति मदन के लंड की याद आ गई... ८ इंच का... मोटे गाजर जैसा... ओहहह... ईशशश... शीला ने इतनी गहरी सांस ली की उसकी चूचियों के दबाव से ब्लाउस का हुक ही टूट गया।
कुदरत ने मर्दों को लंड देकर, महिलाओं को उनका ग़ुलाम बना दिया... पूरा जीवन... उस लंड के धक्के खा खाकर अपने पति और परिवार को संभालती है.. पूरा दीं घर का काम कर थक के चूर हो चुकी स्त्री को जब उसका पति, मजबूत लंड से धमाधम चोदता है तो स्त्री के जनम जनम की थकान उतर जाती है... और दूसरे दिन की महेनत के लिए तैयार हो जाती है।
शीला ने ब्लाउस के बाकी के हुक भी खोल दिए... अपने मम्मों के बीच की कातिल चिकनी खाई को देखकर उसे याद आ गया की कैसे मदन उसके दो बबलों के बीच में लंड घुसाकर स्तन-चुदाई करता था। शीला से अब रहा नही गया... घाघरा ऊपर कर उसने अपनी भोस पर हाथ फेरा... रस से भीग चुकी थी उसकी चुत... अभी अगर कोई मिल जाए तो... एक ही झटके में पूरा लंड अंदर उतार जाए... इतना गीला था उसका भोसड़ा.. चुत के दोनों होंठ फूलकर कचौड़ी जैसे बन गए थे।
शीला ने चुत के होंठों पर छोटी सी चिमटी काटी... दर्द तो हुआ पर मज़ा भी आया... इसी दर्द में तो स्वर्गिक आनंद छुपा था.. वह उन पंखुड़ियों को और मसलने लगी.. जितना मसलती उतनी ही उसकी आग और भड़कने लगी... "ऊईईई माँ... " शीला के मुंह से कराह निकल गई... हाय.. कहीं से अगर एक लंड का बंदोबस्त हो जाए तो कितना अच्छा होगा... एक सख्त लंड की चाह में वह तड़पने लगी.. थैली में से उसने मोटी मुली निकाली और उस मुली से अपनी चुत को थपथपाया... एक हाथ से भगोष्ठ के संग खेलते हुए दूसरे हाथ में पकड़ी हुई मुली को वह अपने छेद पर रगड़ रही थी। भोसड़े की गर्मी और बर्दाश्त न होने पर, उसने अपनी गांड की नीचे तकिया सटाया और उस गधे के लंड जैसी मुली को अपनी चुत के अंदर घुसा दिया।
लगभग १० इंच लंबी मुली चुत के अंदर जा चुकी थी। अब वह पूरे जोश के साथ मुली को अपने योनिमार्ग में रगड़ने लगी.. ५ मिनट के भीषण मुली-मैथुन के बाद शीला का भोंसड़ा ठंडा हुआ... शीला की छाती तेजी से ऊपर नीचे हो रही थी। सांसें नॉर्मल होने के बाद उसने मुली बहार निकाली। उसके चुत रस से पूरी मुली सन चुकी थी.. उस प्यारी सी मुली को शीला ने अपनी छाती से लगा लिया... बड़ा मज़ा दिया था उस मुली ने! मुली की मोटाई ने आज तृप्त कर दिया शीला को!!
मुली पर लगे चिपचिपे चुत-रस को वह चाटने लगी.. थोड़ा सा रस लेकर अपनी निप्पल पर भी लगाया... और मुली को चाट चाट कर साफ कर दिया।
अब धीरे धीरे उसकी चुत में जलन होने शुरू हो गई.. शीला ने चूतड़ों के नीचे सटे तकिये को निकाल लिया और दोनों जांघें रगड़ती हुई तड़पने लगी... "मर गई!!! बाप रे!! बहुत जल रहा है यह तो अंदर..." जलन बढ़ती ही गई... उस मुली का तीखापन पूरी चुत में फैल चुका था.. वह तुरंत उठी और भागकर किचन में गई.. फ्रिज में से दूध की मलाई निकालकर अपनी चुत में अंदर तक मल दी शीला ने.. !! ठंडी ठंडी दूध की मलाई से उसकी चुत को थोड़ा सा आराम मिला.. और जलन धीरे धीरे कम होने लगी.. शीला अब दोबारा कभी मुली को अपनी चुत के इर्द गिर्द भी भटकने नही देगी... जान ही निकल गई आज तो!!
शाम तक चुत में हल्की हल्की जलन होती ही रही... बहनचोद... लंड नही मिल रहा तभी इन गाजर मूलियों का सहारा लेना पड़ रहा है..!! मादरचोद मदन... हरामी.. अपना लंड यहाँ छोड़कर गया होता तो अच्छा होता... शीला परेशान हो गई थी.. अब इस उम्र में कीसे पटाए??
ThanksBadhiya

शीला अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए निकल गई.. इस बार वह चलते चलते अपने घर पहुंची।
शीला सोच रही थी.. क्या काम होगा कविता को? तभी कविता खुद उसके घर पर आ पहुंची.. बहोत खुश लग रही थी कविता.. शीला जानती थी की बिना लंड से झटके खाए.. किसी स्त्री के चेहरे पर ऐसी मुस्कान खिल ही नहीं सकती..
"सच सच बता कविता.. कल पीयूष ने बराबार चोदा है ना तुझे?" शीला ने पूछा
"पीयूष ने नहीं.. मेरे प्यारे पिंटू ने.. ये सब मेरे पिंटू का ही कमाल है" कहते हुए कविता शीला से लिपट पड़ी
"अच्छा.. !! ये भला कब हुआ?? वो तो कल चला गया था मेरे घर से.. तुम दोनों मिले कब??" शीला ने आश्चर्यसह पूछा
"कल रात पीयूष अपने दोस्तों के साथ मूवी देखने गया था.. मैंने पिंटू को फोन करके बुला तो लिया.. पर सवाल ये था की हम दोनों मिले कैसे!! रात को दस बजे पीयूष हमारी सोसायटी में आ चुका था.. उसने मुझे पीछे वाली गली में मिलने के लिए बुलाया.. पर कमबख्त मेरी सास.. देर तक जागती रहती है.. टीवी पर बकवास सीरियलों ने दिमाग खराब कर रखा है उनका.. बुढ़िया बस टीवी से चिपकी रहती है.. कैसे निकलती बाहर!!"
कविता सारा घटनाक्रम बता रही थी उस दौरान शीला ने उसे बेड पर बिठाया और उसका स्कर्ट घुटनों तक ऊपर करते हुए.. हाथ डालकर उसकी पेन्टी खींच निकाली.. कविता ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और वह बोलती ही रही.. शीला की हरकतों से उसके पतले गोरे बदन में सुरसुरी सी होने लगी.. शीला ने कविता को हल्के से धक्का दिया और उसकी पीठ दीवार के साथ सट गई.. और दीवार के सहारे वह आधी लेटी हुई पोजीशन में आ गई.. शीला ने उसके घुटने मोड़कर पैर चौड़े किए.. कविता की बिना झांटों वाली चिकनी पूत्ती देखकर शीला एक पल के लिए ईर्ष्या से जल उठी.. सफाचट नाजुक मोगरे की कली जैसी कविता की जवान चुत के दोनों होंठ फड़फड़ाने लगे..
शीला ने झुककर कविता की पुच्ची की चूम लिया..
"आह्हहह भाभी.. " कविता कराह उठी
"तू बोलना जारी रख.. फिर किस तरह निकली घर से और कैसे मिले तेरे पिंटू से.. ?"
"ओह्ह भाभी.. क्या कहूँ!! मुझे आपकी याद आ गई.. मैं आपके घर आने के बहाने, छाता लेकर बाहर निकली.. और आपके घर के पीछे जो सुमसान गली है ना.. वहाँ पिंटू को बुला लिया.. हल्की हल्की बारिश हो रही थी.. और उस गली में घर के बाहर को नहीं था.. काफी अंधेरा भी था.. वहीं बिजली के खंभे के पास पिंटू ने मुझे खड़े खड़े पीछे से चोद दिया..पर भाभी.. पिंटू अब पहले के मुकाबले काफी कुछ सीख चुका है.. पहले तो उस अनाड़ी को मेरे छेद के अंदर घुसाना भी ठीक से नहीं आता था.. पर पता नहीं कैसे.. कल रात को उसने किसी अनुभवी मर्द की तरह मेरी ठुकाई की.. पहले पहले तो उसे चुत चाटना भी नहीं आता था..और चुदाई भी ठीक से नहीं कर पाता था.. पर कल रात को उसने मुझे जो चोदा है.. आहाहाहा.. मेरी चुत में दर्द होने लगा तब तक धक्के लगाए उसने.. और जमीन पर बैठकर मेरी चुत भी चाटी.. कुछ समझ में नहीं आ रहा.. मेरा अनाड़ी पिंटू ऑलराउंडर कैसे बन गया?? कहीं किसी बाजारू औरत के पास तो नहीं गया होगा ना!! कुछ तो गड़बड़ है!!"
शीला ने कविता की बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुसकुराते हुए कविता की टाइट चुत पर अपना मुंह चिपका दिया.. कविता ने "ओह्ह.. ओह्ह" सिसकते हुए अपने चूतड़ ऊपर उठा दिए और शीला के सिर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया.. उसकी उत्तेजित चुत में शीला ने दो उँगलियाँ घुसेड़ कर अंदर बाहर करते हुए चाटना शुरू कर दिया.. इस दोहरे हमले के आगे कविता निसहाय थी.. उसे याद आया की पिंटू ने भी पिछली रात बिल्कुल इसी तरह किया था.. पर शीला ने कविता के दिमाग को ज्यादा सोचने की स्थिति में ही नहीं रहने दिया.. अद्भुत, कामुक और शृंगारिक तरीके से हो रही चुत चटाई ने कविता के दिमाग पर ताला लगा दिया..
अपने अमूल्य खजाने को शीला के हाथों में सौंपकर कविता अपने नागपुरी संतरों जैसे उरोजों को मसलकर अपनी आग को बुझाने के निरर्थक प्रयत्न करने लगी.. पर शीला की उंगलियों में असली लंड जैसा मज़ा कहाँ से मिलता !!! कल रात को पिंटू ने बिजली का खंभा पकड़ाकर जिस तरह उसे पीछे से धमाधम शॉट मारे थे उसके झटके कविता की चुत में अब तक लग रहे थे।
"आह्हह भाभी.. अब ओर नहीं रहा जाता मुझसे.. कुछ कीजिए प्लीज.. " शीला ने कविता की पूत्ती को चाटते हुए अपनी उंगलियों को तेजी से अंदर बाहर करना शुरू किया.. कविता के सुंदर स्तनों को देखकर शीला भी गरमा गई.. उसने कविता की चुत से अपनी उँगलियाँ निकाली.. और अपने सारे कपड़े उतार दिए.. कविता तो इस नग्न रूप के ताजमहल की सुंदरता देखकर चकाचौंध हो गई..
"हाय भाभी.. कितना गदराया शरीर है आपका !! ये गोरी गोरी चिकनी मांसल जांघें.. और मदमस्त मोटी गांड.. में लड़की होकर भी ललचा गई देखके.. तो मर्दों की क्या हालत होती होगी.. !!" कहते हुए कविता ने शीला के खरबूजों जैसे स्तनों के साथ खेलना शुरू कर दिया..
शीला ने कविता का मुंह अपने बबलों पर दबा दिया.. गुलाबी रंग की निप्पल को थोड़ी देर चूसते रहने के बाद कविता ने कहा "अगर इसमें दूध आता होता तो कितना मज़ा आता!!! पीयूष कई बार मुझसे कहता है.. उसे दूध भरे मम्मे चूसने की बड़ी इच्छा है.. और हाँ भाभी.. आपसे एक और बात भी पुछनी है"
शीला: "हाँ पूछ ना"
कविता: "कैसे कहूँ.. अमममम.. मेरे पति पीयूष को एक बार आपके बॉल दबाने है.. उसे बहोत पसंद है आपके.. रोज रात को मेरी छाती दबाते हुए वो आपका ही नाम लेता है.. "
सुनते ही शीला के भोसड़े में दस्तक सी लगने लगी.. एक नए लंड की संभावना नजर आते ही उसकी चुत छटपटाने लगी..
"बेशरम.. कैसी गंदी गंदी बातें कर रही है तू कविता.. !! बोलने से पहले सोचती भी नहीं तू.. कुछ भी बोल रही है.. पीयूष को तो में कितने आदर की नजर से देखती हूँ.. वो कभी ऐसी बात नहीं कर सकता!!"
"सच बोल रही हूँ भाभी..मेरे तो छोटे छोटे है.. पीयूष को बड़े बबले पसंद है.. जब देखों तब बड़ी छातियों वाली औरतों की तारीफ करता रहता है.. और जब मौका मिले तब उन्हे ताड़ता रहता है.. "
सुनते ही शीला का भोसड़ा पानी पानी हो गया.. उसने कविता को अपनी बाहों में भर लिया और उसके रसभरे होंठों को एक लंबा चुंबान किया
"अगर तेरा पति मेरे बबले दबाएगा तो तुझे कोई एतराज नहीं होगा ना?? बोलने तक तो बात ठीक है पर कोई भी पत्नी ये बर्दाश्त नहीं कर पाती.. पर तू ध्यान रखना कविता.. कहीं तेरा पति पीयूष किसी गदराई छाती वाली के साथ उलझ ना जाएँ.. नहीं तो तेरा सुखी संसार तहस नहस हो जाएगा.. इन मर्दों का और उनके लोडों का कोई भरोसा नहीं.." शीला ने कहा
ये सुनकर कविता बॉखला गई..
शीला की चुत में शकुनि का दिमाग था.. नई संभावना जागृत होते ही उसकी चुत और दिमाग दोनों पासे फेंकने लगे
कविता की क्लिटोरिस को अपने अंगूठे और उंगली के बीच पकड़कर शीला ने ऐसा दबाया की कविता अपनी कमर उठाते हुए उछल पड़ी.. और बिस्तर पर पटक गई..
"हाईईई भाभी.. मर गई.. आहहहह.. निकल गया मेरा.. !! क्या किया आपने.. कहाँ छु लिया था.. !! मुझे तो मज़ा आ गया भाभी.. ईशशश"
शीला दो घड़ी के लिए थम गई.. जब तक की कविता की सांसें नियंत्रित न हो गई फिर उसने कविता से पूछा
"वैसे पीयूष देखने में तो बड़ा हेंडसम है.. !!"
"हाँ, वो तो है.. " कविता ने जवाब दिया
शीला: "तो तुझे पिंटू से चुदवाना ज्यादा पसंद है या अपने पति पीयूष से??"
कविता: "सच कहूँ भाभी.. तो मुझे पिंटू से चुदना ज्यादा पसंद है.. पिंटू एकदम मस्त है.. और मेरा बचपन का प्रेमी है.. इसलिए उसके साथ ज्यादा मज़ा आता है मुझे.. "
शीला: "ठीक है.. में तुझे एक रास्ता दिखाती हूँ.. तुझे बिल्कुल वैसे ही करना है.. देख.. वैसे मुझे पीयूष से अपने बबले दबवाने का कोई शौक नहीं है.. पर बड़ी छातियों के चक्कर में कहीं वो किसी रंडी से ना उलझ जाएँ ये भी हमें देखना पड़ेगा.. नहीं तो तेरा संसार तबाह हो जाएगा.. समझी!!"
कविता: "ठीक है भाभी.. आप जैसा कहेंगी वैसा ही में करूंगी.. "
शीला: "एक काम कर.. आज गुरुवार है.. कल शुक्रवार को कोई न कोई नया मूवी आएगा.. पीयूष को मूवी देखना पसंद है क्या?"
कविता: "अरे भाभी.. अभी दो दिन पहले ही वो कह रहा था.. की कोई नई मूवी देखने चलते है"
शीला: "वाह.. फिर तो हमारा काम आसान हो गया.. आज रात को तू पीयूष को बोलना की शीला भाभी को मूवी देखने जाना है पर किसी की कंपनी ढूंढ रही है.. तो क्या हम साथ चलें उनके साथ मूवी देखने के लिए..!! और कहना की मुझे शीला भाभी को जल्दी जवाब देना है" कविता को कुछ समझ में नहीं आया पर वह सुनती रही
शीला: "अगर वो आनाकानी करे तो उसे कहना की शायद भीड़ में उसे शीला भाभी के स्तनों को छूने का मौका मिल जाएँ.. ऐसे लालच देगी तो वो तुरंत तैयार हो जाएगा.. समझी..!! में मूवी की चार टिकट बुक करवा देती हूँ.. रात के शो की.. !!"
कविता: "चार टिकट क्यों भाभी??" हम तो सिर्फ तीन ही है ना!!"
शीला: "अरे पगली.. जब पीयूष मेरे मम्मे मसल रहा होगा तब तेरे इन संतरों का रस चुसनेवाला भी कोई चाहिए ना !! तू फोन करके पिंटू को बुलाया लेना.. वहाँ मल्टीप्लेक्स पर हम पीयूष की नजर बचाकर, पिंटू को टिकट थमा देंगे.. और बता देंगे की हॉल में जब पूरा अंधेरा हो तब वो चुपके से आकार तेरे बगल की सीट पर बैठ जाएँ.. तू अपने यार के संग मजे मारना तब तक में तेरे पति का खयाल रखूंगी.. "
शीला की यह योजना सुनकर कविता उछल पड़ी.. प्रेमी को मिलने के लिए वो अपने पति को शीला के पास गिरवी रखने को तैयार थी.. उसकी आँखों में ऐसी चमक आ गई जैसे अभी अभी पिंटू से चुदकर आई हो..
"पर भाभी.. पीयूष को पता चल गया तो?? वो पिंटू को मेरे बॉल मसलते देख लेगा तो क्या करेंगे??" कवर के ऊपर से शॉट खेलने का प्रयास करती शीला के सामने कविता ने एल.बी.डब्ल्यू की अपील की..
जवाब में शीला ने अपने दोनों मस्त स्तनों को आपस में दबा दिया.. और उन दोनों के बीच की दरार दिखाते हुए बोली
"कविता.. इस खाई में आजतक जो भी गिरा है ना.. वो कभी वापिस नहीं लौटा.. तेरे पीयूष को भी इस खाई में ऐसे धकेल दूँगी.. की मूवी के तीन घंटों के दौरान पीयूष ये भी भूल जाएगा की वो शादीशुदा है.. तू चिंता मत कर.. और देख.. प्रेमी के संग रंगरेलियाँ मनानी हो तो रिस्क लेना पड़ेगा.. हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी तो प्रेमी और पति, दोनों को गंवा बैठेगी.. "
कप्तान द्वारा टीम से निकाले जाने की धमकी मिलने के बाद प्लेयर की जो हालत होती है.. वही हालत कविता की हो गई..
कविता ने मन में ठान ली.. "कुछ भी हो जाए भाभी.. इस योजना को हम सफल बनाके ही रहेंगे.. आप बस टिकट का बंदोबस्त कीजिए.. बाकी काम काम मुझपर छोड़ दीजिए"
शीला: "तू टिकट की चिंता मत कर.. पहेले पीयूष को राजी कर.. और पिंटू को मेसेज पर पूरा प्लान बता देना.. और उस चोदू को बोलना की मोबाइल हाथ में ही रखे.. आज कल के लौंडे जीन्स की पिछली पॉकेट में फोन रखकर भूल जाते है.. मल्टीप्लेक्स पर ऐसा कुछ हुआ तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा.. उसे कहना की लेडिज टॉइलेट के पास हमारा इंतज़ार करें.. समझ गई ना तू??"
कविता: "हाँ भाभी.. में पिंटू को सब कुछ समझ दूँगी.. और पीयूष को भी माना लूँगी" अपने टॉप के बटन बंद करते हुए कविता ने इस शैतानी प्लान पर अपनी महोर लगा दी.. और अपने घर चली गई..
शीला ने मुसकुराते हुए अपनी चुत को थपथपाया.. जैसे उसे शाबासी दे रही हो.. अब पीयूष नाम के बकरे को हलाल करने का वक्त आ चुका था
waah ri sheellllaaaa.... kya plan banaya hai......शाम के पाँच बज रहे थे... धोबी का लड़का कपड़े देने आया था.. उसे देखकर शीला का दिल किया की उसे पटाकर ठुकवा ले.. पर उसका सुककड़ शरीर देखकर शीला की सारी इच्छाएं मर गई। जाते जाते वह पापड़तोड़ पहलवान भी शीला के बबलों को घूर रहा था। शीला भी भूखी नागिन की तरह उसे देख रही थी... फिर उसने सोचा की यह २० साल का लौंडा भला कैसे बुझा पाएगी मेरी चुत की प्यास!!!
शीला को चाहिए था एक मजबूत मर्द.. ऐसा मर्द जिसके बोझ तले शीला पूरी दब जाए... जो बिना थके शीला के भोसड़े की सर्विस कर सके... पर ऐसा मर्द कहाँ मिलेगा.. यह शीला को पता नही था
दिन तो जैसे तैसे गुजर जाता था... पर रात निकालनी बड़ी मुश्किल थी। इतने बड़े मकान में वह अकेली... पूरी रात करवटें बदल बदल कर बिताती थी।
५५ वर्ष की अधेड़ उम्र की शीला की कामेच्छा अति तीव्र थी। ऊपर से उसके पति मदन ने उसे ऐसे ऐसे अनोखे आसनों में चोदा था की अब उसे सीधे साधे सेक्स में मज़ा ही नही आता था। रोज रात को वह मादरजात नंगी होकर.. अलग अलग स्टाइल में मूठ मारकर सोने की कोशिश करती। पर जो मज़ा असली लोडे में है.. वह अगर गाजर, ककड़ी या शक्करकंद में होता तो लड़कियां शादी ही क्यों करती!!!
स्त्री का जन्म तभी सफल होता है जब मस्त लंड उसकी चुत में जाकर भरसक चुदाई करता है। मूठ मारना तो मिसकॉल लगाने जैसा है.. कोशिश तो होती है पर सही संपर्क नही होता...
सुबह ५ बजे, फिरसे डोरबेल बजी और शीला की आँख खुल गई। खुले स्तनों को गाउन के अंदर ठूंस कर, एक बटन बंद कर वह दूध लेने के लिए बाहर आई। दरवाजा खोलते ही उसका मूड खराब हो गया। आज रसिक की पत्नी दूध देने आई थी।
"क्यों री, आज धूध देने तू आ गई? तेरा मरद नही आया?" शीला ने पूछते तो पूछ लिया फिर उसे एहसास हुआ की इसका दूसरा अर्थ भी निकल सकता था। गनीमत थी की वह गंवार औरत को ज्यादा सूज नही थी वरना जरूर पूछती की आपको दूध से मतलब है या मेरे मरद से!!!
"वो तो पास के गाँव गया है.. नई भेस खरीदने.. ग्राहक बढ़ते जा रहे है और दूध कम पड़ रहा है... साले जानवर भी चालक बन गए है... जितना खाते है उस हिसाब से दूध नही देते है.. " दूधवाले की पत्नी ने कहा
शीला हंस पड़ी "क्या नाम है तेरा?"
"मेरा नाम रूखी है" उसने जवाब दिया
शीला ने सर से लेकर पैर तक रूखी का निरीक्षण किया... आहाहाहा इन गांवठी औरतों का रूप गजब का होता है..!! शहर की पतली लौंडियो का इसके रूप के आगे कोई मुकाबला ही नही है... ज़ीरो फिगर पाने के चक्कर में.. आजकल की लड़कियों के आम सुखकर गुटलियों जैसे बन जाते है। और नखरे फिर भी दुनिया भर के रहते है। असली रूप तो इस रूखी का था.. उसके बबले शीला से बड़े और भारी थे.. असली फेटवाला दूध पी पी कर रूखी पूर्णतः तंदूरस्त दिख रही थी। उसकी छाती पर लपेटी छोटी सी चुनरी उन बड़े स्तनों को ढंकने में असमर्थ थी। गेंहुआ रंग, ६ फिट का कद, चौड़े कंधे, लचकती कमर और घेरदार घाघरे के पीछे मदमस्त मोटी मोटी जांघें.. झुककर जब वह दूध निकालने गई तब उसकी चोली से आधे से ज्यादा चूचियाँ बाहर निकल गई..
शीला उस दूधवाली के स्तनों को देखती ही रह गई.. वह खुद भी एक स्त्री थी... इसलिए स्तन देखकर उत्तेजित होने का कोई प्रश्न नही था.. पर फिर भी इस गाँव की गोरी की सुंदरता शीला के मन को भा गई। ध्यान से देखने पर शीला ने देखा की रूखी की चोली की कटोरियों पर सूखा हुआ दूध लगा हुआ था.. शीला समज गई.. की उसके स्तनों में दूध आता है.. उसने थोड़े समय पहले ही बच्चे को जनम दिया होगा!! दूध के भराव के कारण उसके स्तन पत्थर जैसे सख्त हो गए थे... उन्हे देखते ही शीला को छूने का दिल किया. वैसे भी शीला १ नंबर की चुदैल तो थी ही..!!
लंड के लिए तरसती शीला.. रूखी का भरपूर जोबन देखकर सिहर गई.. उसका मन इस सौन्दर्य का रस लेने के लिए आतुर हो गया.. और योजना बनाने लगा..
कहते है ना... की प्रसव से उठी हुई और बारिश में भीगी हुई स्त्री के आगे तो इंद्रलोक की अप्सरा भी पानी कम चाय लगती है..!!
"रूखी.. मुझे तुझसे एक बात करनी है.. पर शर्म आ रही है... कैसे कहूँ?" शीला ने पत्ते बिछाना शुरू किया
"इसमें शर्माना क्या? बताइए ना भाभी" रूखी ने कहा
"तू अंदर आजा... बैठ के बात करते है.. "
"भाभी, अब सिर्फ दो चार घरों में ही दूध पहुंचना बाकी है.. वो निपटाकर आती हूँ फिर बैठती हूँ.. थकान भी उतार जाएगी और थोड़ी देर बातें भी हो जाएगी"
"हाँ.. हाँ.. तू दूध देकर आ फिर बात करते है... पर जल्दी आना" शीला ने कहा
"अभी खतम कर आई.. आप तब तक चाय बनाकर रखिए" रूखी यह कहती हुई निकल गई
चाय बनाते बनाते शीला सोच रही थी.. की अगर रूखी के साथ थोड़े संबंध बढ़ाए जाए तो उसके बहाने रसिक का आना जाना भी शुरू हो जाएगा... और फेर उससे ठुकवाने का बंदोबस्त भी हो पाएगा... एक बार हाथ में आए फिर रसिक को गरम करना शीला का बाये हाथ का खेल था.. एक चुची खोलकर दिखाते ही रसिक का लंड सलाम ठोकेगा..
रसिक के लंड का विचार आते ही शीला की जांघों के बीच उसकी मुनिया फिर से गीली होने लगी... खुजली शुरू हो गई.. किचन के प्लेटफ़ॉर्म के कोने से अपनी चुत दबाकर वह बोली "थोड़े समय के लिए शांत हो जा तू.. तेरे लिए लंड का इंतेजाम कर ही रही हूँ.. कुछ न कुछ जुगाड़ तो करना ही पड़ेगा" रूखी को सीढी बनाकर रसिक के लंड तक पहुंचना ही पड़ेगा!!
क्या करूँ... क्या करूँ.. वह सोच रही थी... रूखी अभी आती ही होगी
उसका शैतानी दिमाग काम पर लग गया.. एक विचार मन में आते ही वह खुश हो गई... "हाँ बिल्कुल ऐसा ही करूंगी" मन ही मन में बात करते हुए शीला ने एक प्लेट में थोड़ा सा दूध निकाला और अलमारी के नीचे रख आई.. अब इंतज़ार था रूखी के आने का!!
थोड़ी ही देर में रूखी आ गई... शीला ने उसे अंदर बुलाया और मुख्य दरवाजा बंद कर दिया।
"कहिए भाभी, क्या काम था?" रूखी ने पूछा
५-५ लीटर के कनस्तर जैसी भारी चूचियों को शीला देखती ही रही..
शीला ने संभालकर धीरे धीरे बाजी बिछाई
"रूखी, बात दरअसल ऐसी है की आँगन में रहती बिल्ली ने ३ बच्चे दिए है... बड़े ही प्यारे है.. छोटे छोटे... अब कल रात किसी कमीने ने गाड़ी की पहिये तले उस बिल्ली को कुचल दिया" शीला ने कहा
"हाय दइयाँ.. बेचारी... उसके बच्चे अनाथ हो गए.. " भारी सांस लेकर रूखी ने कहा
"अब में उस बिल्ली के बच्चों के लिए दूध रखती हूँ... पार वह पी ही नही रहे... भेस का दूध उन्हे कैसे हजम होगा? अभी दो दिन की उम्र है बेचारों की.. "
"माँ के दूध के मुकाबले और सारे दूध बेकार है भाभी.. बोतल का दूध पियेंगे तो मर जाएंगे बेचारे" रूखी ने करुणासभर आवाज में कहा
"इसीलिए आज भगवान ने तुझे भेज दिया... अब मुझे चिंता नही है.. वह बच्चे बच जाएंगे" शीला ने कहा
"वो कैसे?" रूखी को समझ नही आया
"देख रूखी... तेरी छाती से दूध आता है... अगर तो रोज अपना थोड़ा थोड़ा दूध निकालकर देगी... तो वह बिचारे बच जाएंगे.. नही तो १-२ दीं में ही मर जाएंगे... और पाप तुझे लगेगा.." शीला की योजना जबरदस्त थी
"अरे, उसमें कौन सी बड़ी बात है!! मुझे तो इतना दूध आता है की मेरे लल्ला का पेट भर जाने के बाद भी बच जाता है"