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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

Sanju@

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शीला फिर से अकेली हो गई.. उसे चेतना पर बहोत दया आ रही थी.. बेचारी.. कैसे मदद करू चेतना की?? शीला सोचती रही

शीला का शातिर तेज दिमाग दौड़ने लगा.. उसका दिमाग हर तरह के हलकट विचार करने के लिए सक्षम था.. और जब वह अपने दिमाग और चुत, दोनों का उपयोग कर सोचती.. तब उसे कोई न कोई तरकीब सूझ ही जाती।

उस रात को शीला ने पिंटू को फोन लगाया और उससे गरमागरम बातें करते हुए अपनी चुत में उंगली घिसकर उसे शांत कर दिया।

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रसिक अब हर रोज थोड़ा जल्दी आ जाता और पंद्रह मिनट में शीला को चोदकर दूध देने निकल जाता.. पर शीला को इस जल्दबाजी वाली ठुकाई में ज्यादा मज़ा नहीं आता था। पर बिना सेक्स के रहने से तो ये अच्छा ही था..कम से कम खेलने, चूसने और चुदवाने के लिए एक तगड़ा लंड तो मिला.. यही सोचकर वह समय व्यतीत कर रही थी।

एक दिन सवेरे सवेरे मंदिर जाते हुए उसे अनुमौसी मिल गई। शीला को देखते ही उससे बातें करने रुक गई।

अनुमौसी: "अगले रविवार को हमारा महिला मण्डल यात्रा पर जा रहा है... तुझे चलना है?"

शीला: "हाँ मौसी.. मेरा नाम भी लिखवा देना.. मैं जरूर चलूँगी"

अनुमौसी: "ठीक है.. सुबह सात बजे निकलना है.. तू तैयार रहना.. फिर से वो दूधवाले के साथ उलझ मत जाना.. वरना देर हो जाएगी तो बस छूट जाएगी"

रसिक का जिक्र होते ही शीला के कान चार हो गए.. जिस तरह सवार की एडी लगते ही घोड़े के कान चौकन्ने हो जाते है.. बिल्कुल उसी तरह

शीला: "अरे नहीं नहीं मौसी.. मैं आपसे पहले तैयार हो जाऊँगी.. आप देखना!!"

अनुमौसी: "कितना बोलती है रे तू!! ठीक है.. तू तैयार हो जाएँ फिर हम साथ में निकलेंगे" कहते हुए अनुमौसी मंदिर की ओर चल दी

शीला पूरे दिन सोचती रही.. मौसी ने रसिक का जिक्र क्यों किया!!! कुछ तो राज था.. वरना अनुमौसी ऐसे ही उसका नाम नहीं लेती.. कल रसिक को पूछती हूँ इसके बारे में

जैसे तैसे शीला ने दोपहर तक का समय निकाल ही दिया.. पर फिर उससे रहा नहीं गया.. दोपहर के तीन बजे उसने रसिक को फोन किया.. पर उस चूतिये ने फोन उठाया ही नहीं। पक्का खेत में किसी मज़दूरन की टांगें चौड़ी कर उसकी चुत को पावन कर रहा होगा!!

शीला ने रूखी को फोन मिलाया..

रूखी: "अरे भाभी आप?? कैसे है? आप तो मुझे भूल ही गए!!"

शीला: "नहीं भूली हूँ तुझे.. पर लगता है तू मुझे भूल गई है शायद.. जीवा का डंडा क्या मिल गया तू तो मुझे याद ही नहीं करती!!"

रूखी: "सच कहूँ तो भाभी मैं आपको ही याद कर रही थी.. आप अभी फ्री हो?"

शीला: "हाँ बता.. कुछ खास काम था क्या?"

रूखी: "हाँ भाभी.. आपको एक चीज दिखानी थी.. पर उसके लिए आपको यहाँ मेरे घर पर आना पड़ेगा"

शीला: "तेरे घर?? पर किस बहाने आऊँ तेरे घर रूखी??"

रूखी: "आप एक काम कीजिए.. साथ में एक पतीली लेकर आइए.. कोई पूछे तो कहना की दूध लेने आई हो"

शीला: "ठीक है फिर"

रूखी: "कितनी देर में आओगी भाभी?"

शीला: "१५-२० मिनट में पहुँचती हूँ"

रूखी: "ठीक है.. पर जल्दी आना"

शीला मोबाइल कट करते हुए सोचने लगी.. ऐसा क्या होगा जो रूखी मुझे दिखाना चाहती है!! और जल्दी आने के लिए क्यों कहा!! क्या पता!! जाकर देखती हूँ तब सब पता चल जाएगा..

शीला झटपट तैयार हो गई.. और हात में पतीली लेकर निकल पड़ी.. वैसे तो अगर चल कर जाएंग तो २५-३० मिनट में रूखी के घर पहुँच सकती थी पर शीला ने ऑटो बुला ली.. कमीना ऑटो वाला मिरर सेट करके उसके स्तनों को अपनी नज़रो से ही चूस रहा था.. इस उम्र में भी उसके स्तन पुरुषों का ध्यान आकर्षित कर रहे थे ये देखकर शीला को अच्छा लगा.. उसने जानबूझकर अपना पल्लू गिरा दिया.. और विंध्य पर्वतों के बीच जैसी खाई होती है वैसी अपने स्तनों के बीच की खाई को उजागर कर दिया..

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स्त्री के स्तनों को देखकर मर्द लोग सदियों से उत्तेजित होते आए है.. स्त्री कितनी भी भद्दी क्यों न हो.. उसके उरोज हमेशा आकर्षक होते है। और हर स्त्री को यह पता होता है की इस अमोघ शस्त्र का उपयोग कर कैसे अपने काम निकलवाए जा सकते है

रिक्शा वाला भी सीटी बजाते हुए शीला के दोनों गुंबजों को ताक रहा था.. जान बूझकर वो रिक्शा को धीमी गति पर चला रहा था ताकि ज्यादा से ज्यादा समय तक शीला के स्तनों को देख सकें.. जानबूझकर खड्डे वाले रास्ते पर ऑटो चलाता था ताकि उन स्तनों को उछलते हुए देख सकें। अब वह गीत भी गुनगुनाने लगा था "चोली के पीछे क्या है.. चुनरी के नीचे"

शीला समझ गई की वह क्या देखकर गाना गा रहा था.. १० मिनट के रास्ते में भी कमीने ने २० मिनट लगा दिए.. पहुंचकर जब शीला ने भाड़ा देने के लिए अपने ब्लाउस से पर्स निकाला तब रिक्शा वाले ने पैसे लेने से माना क्या और कहा "मैडम, आपके जैसे ग्राहक मिल जाएँ तो पूरा दिन अच्छा जाता है" आँख मारते हुए वह रिक्शा लेकर चला गया..

शीला रूखी के घर पहुंची.. और दरवाजा खटखटाया.. रूखी ने दरवाजा खोलकर शीला को हाथ से खींचकर अंदर लिया और दरवाजा बंद कर लिया।

"इतनी देर क्यों लगा दी भाभी?" प्यार से शीला के उभारों पर चिमटी काटते हुए रूखी ने कहा

"अरी जल्दी आने के लिए मैंने ऑटो ली थी.. पर वह हरामी रिक्शा वाला मेरे ये दूध के कनस्तर देखकर पागल हो गया.. और जानबूझकर ऑटो आराम से चला रहा था.. क्या करती!! भाड़ा भी नहीं लिया उसने.. सोच तू.. कितना पागल हो गया होगा इन्हे देखकर!!"

रूखी: "बेचारे की बीवी के छोटे छोटे होंगे.. तभी इन्हे देखकर पागल हो गया.. आपके तो पैसे बच गए ना!! वो सब छोड़िए.. भाभी, अब आप उस कोने में छुपकर खड़े हो जाइए.. अभी आपको बढ़िया वाला पिक्चर दिखाती हूँ.. अभी शुरू होगा.. देखकर आप मुझे बताना की मुझे क्या करना चाहिए"

शीला रूखी के दूध भरे स्तनों को देखकर उत्तेजित हो गई.. उसने रूखी से कहा "तेरा दूध पिए कितने दिन हो गए यार.. पहले थोड़ा सा दूध पी लेने दे मुझे.. "

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रूखी: " भाभी.. वो रसिक भी मुझे कितने दिनों से हाथ नहीं लगाता.. मेरा भी बड़ा मन कर रहा है.. पर क्या करू!!"

शीला ने रूखी का हाथ पकड़कर अपने करीब खींच लिया और कोने में ले जाकर पूछा "फिर कैसा रहा उस रात रघु और जीवा के साथ??"

जवाब देने से पहली रूखी ने अपनी तंग चोली के दो हुक खोल दिए और नारियल जैसी चूचियों में से एक बाहर निकालकर शीला के हाथ में थमा दी..

रूखी: "जीवा की तो क्या ही बात करू मैं भाभी.. पूरी रात चोदा था मुझे.. और रघु भी कुछ कम नहीं था.. वो भी मुआ पीछे से उंगली करता रहा"

रूखी की चुची को मसलते हुए शीला ने कहा "तेरे बोबे तो वाकई जबरदस्त है रूखी.." शीला रूखी की निप्पल से खेलते हुए बोली

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रूखी ने शीला का सर पकड़कर अपनी निप्पल के करीब खींचा और बोली "जो भी करना है जल्दी करो भाभी.. अभी पिक्चर बस शुरू होने ही वाला है.. फिर मौका हाथ से निकल जाएगा.. फटाफट चूस लो जितना चाहिए.. फिर घर पर आऊँगी तब इत्मीनान से पीना मेरा दूध.. "

शीला ने रूखी के स्तन को पकड़कर उठाने की कोशिश की.. कम से कम ढाई किलो का वज़न था एक स्तन का!!

"जल्दी कीजिए भाभी.. इसे बाद में नाप लेना.. " रूखी ने बेसब्री से कहा

"रूखी मुझे ये तो बता की आखिर तूने मुझे यहाँ पर किस लिए बुलाया है??"

"सब बताऊँगी भाभी.. थोड़ी शांति रखिए.. आप खुद ही देख पाओगी.. मुझे बताने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी" कहते हुए रूखी ने शीला को अपनी बाहो में भर लिया..

शीला ने रूखी की निप्पल को दबाकर दूध की एक चुस्की लगाई.. और फिर भागकर पिलर के पीछे छुप गई.. और पीछे से देखने लगी की आखिर वो क्या था जो रूखी उसे दिखाना चाहती थी।

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थोड़ी देर के बाद.. ६० साल का एक बूढ़ा घर के अंदर आया.. उम्र भले ही ज्यादा था पर दिलडोल काफी चुस्त और तंदूरस्त था.. उसकी खुली छाती पर घुँघराले सफेद बाल नजर आ रहे थे और कमर के नीचे उसने धोती बांध रखी थी..

पास में रूखी खटिया पर बैठे हुए अपने बच्चे को दूध पीला रही थी

"बहु, क्या कर रहा है मेरा लल्ला?? तुझे तंग तो नहीं करता है ना!! " कहते हुए वह बूढ़ा रूखी के करीब जा पहुंचा और झुककर उस दूध पीते बच्चे के गाल को सहलाने लगा.. रूखी का एक स्तन बाहर लटक रहा था.. यह पूरा द्रश्य शीला पिलर के पीछे छुपकर देख रही थी.. उसे सबकुछ साफ साफ दिखाई दे रहा था.. रूखी के स्तन से बस आधे फुट की दूरी पर था वो बूढ़ा..

शीला समझ गई की वह बूढ़ा.. रूखी का ससुर था..

"तेरी सास जब मंदिर जाती है.. तभी में शांति से इसे देख पाता हूँ.. " कहते हुए वह बूढ़ा खटिया पर रूखी के बगल में बैठ गया

"बहु, मुझे हमारा लल्ला बहोत प्यारा है.. वो कहते है ना.. पूंजी से ज्यादा ब्याज की किंमत होती है.. बस वैसे ही.. " कहते हुए वह रूखी के बेहद आकर्षक दूध टपकाते स्तन को घूरने लगा.. उस बूढ़े की आँखों में बालक की भूख और मर्द की हवस का जलद मिश्रण था..

रूखी: "बापू, अभी माँ लौट आएगी और ऐसे देखेगी तो उन्हे गलतफहमी हो जाएगी.. आप अपने कमरे में चले जाइए.. लल्ला का पेट भर जाए बाद में उसे आप को सौंप दूँगी.. जितना मर्जी खेल लेना फिर"

रूखी का एक स्तन बाहर और एक चोली के अंदर था.. उस १००० वॉल्ट के एलईडी बल्ब जैसे स्तन को देखकर रूखी का ससुर पागल सा हो रहा था.. उस छोटे बच्चे के सिर के बालों को सहलाने के बहाने वो बार बार रूखी के स्तन को छु रहा था.. तभी उस दूध पीते बच्चे के मुंह से निप्पल छूट गई.. वह पीते पीते सो गया था.. रूखी की गुलाबी निप्पल से दूध की तीन चार बूंदें बच्चे के गाल पर गिर गई.. और आखिरी बूंद निप्पल पर अभी भी चिपकी हुई थी..

"अरे अरे बहु.. ऐसे तो कपड़े खराब हो जाएंगे.. साथ में एक रुमाल रखा करो तुम.. " ससुर ने रूखी की निप्पल के नीचे उंगली रख दी

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रूखी के पूरी शरीर में झुनजूनाहट होने लगी.. अपनी सख्त निप्पल पर ससुर के हाथ का स्पर्श होती ही उसका दूसरा स्तन कठोर होकर चोली को फाड़कर बाहर निकलने की धमकी देने लगा.. जो स्तन पहले से बाहर था वो भी सख्त हो गया.. मानों बम की तरह फटने वाला हो

रूखी की निप्पल के नीचे उंगली रखकर ससुर ने दूध की उस बूंद को उंगली पर ले लिया और फिर उसे रूखी के चेहरे के पास लेजकर बोला

"लल्ला को तो रोज दूध पिलाती हो.. कभी खुद भी चखकर देखा है क्या??"

रूखी शर्म से पानी पानी हो गई

"मुझे भला क्या जरूरत है इसे चखने की.. " रूखी ने सिर झुकाकर जवाब दिया

"अरे बेटा.. तुम्हें रोज सबसे पहली बूंद खुद ही चख लेनी चाहिए.. उसके बाद ही लल्ला को पिलाना चाहिए.. क्या पता हमें कोई बीमारी हो और दूध खराब हो गया हो तो लल्ला बेचारा बीमार हो सकता है.. ये ले.. चख कर देख" कहते हुए ससुर ने उस दूध वाली उंगली का स्पर्श रूखी के होंठों से करवाया। रूखी ने अपना मुंह खोला.. ससुर ने अपनी उंगली अंदर डाल दी और थोड़ी देर तक वैसे ही रहने दी.. उंगली को चूसते हुए रूखी की आँखें बंद हो गई.. वह गहरी सांसें लेने लगी.. हर सांस के साथ उसके मादक उन्नत उरोज ऊपर नीचे होने लगे..

अनजाने में रूखी ने अपने ससुर की उंगली को ऐसे चूस लिया जैसे जीवा के लंड को चूस रही हो.. अपने ससुर को उंगली को उसने चाट चाट कर साफ किया.. अब उस बुढ़ऊ ने अपनी दूसरी उंगली भी रूखी के मुंह के अंदर डाली और अंदर बाहर करने लगा.. जैसे अपने लंड को रूखी के मुंह में दे रहा हो.. रूखी की आँखें अभी भी बंद थी..

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रूखी: "बापू.. फिर से दूध की बूंदें टपकने की तैयारी में है.. जल्दी से अपनी उंगली से पोंछ लीजिए वरना मेरे कपड़े गीले हो जाएंगे" रूखी ने अपने ससुर को सेक्स के शतरंज में अप्रत्यक्ष रूप से आमंत्रित कर ही दिया

रूखी ने नजर झुकाकर देखा तो उसके ससुर का लंड धोती के अंदर खड़ा हो चुका था.. भला हो उसकी लंगोट का जिसने उस थिरकते हुए घोड़े जैसे लंड को बांध कर रखा था..

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बूढ़े ने आगे बढ़ने का फैसला किया.. और निप्पल को हल्के से दबाकर अपनी उंगली पर दूध लेकर खुद के मुंह तक ले गया और बोला

"बहु.. मैं चखकर देखूँ एक बार???"

रूखी का यह नया रूप देखकर शीला अचंभित रह गई.. खटिया पर बैठी रूखी का बदन इतना सुंदर लग रहा था.. कुछ ही महीनों पहले हुई डिलीवरी के कारण उसका मांसल शरीर और गदरा गया था..

बूढ़े ससुर ने खुद की उंगली चूसकर रूखी का दूध चख लिया... रूखी शर्म से लाल लाल हो गई..

"बापू.. आपने तो पहले चखा ही होगा ना!! अम्मा का दूध.. जब लल्ला के पापा का जनम हुआ तब.. " रूखी ने धीरे से कहा

"बेटा.. क्या बताऊँ तुझे.. जब रसिक पैदा हुआ था तब तेरी सास के बोब्बे भी तेरी ही तरह सुंदर और रसीले थे.. रसिक ज्यादा दूध नहीं पी पाता था.. इसलिए तेरी सास की छाती दूध से भर जाती.. रात को जब उसकी छाती दर्द करने लगती.. तब वो मुझे आधी रात को जगा देती.. मैं चूस चूस कर उसके बबले खाली कर देता तब जाकर बेचारी को नींद आती थी..

"बापू, लल्ला के पापा तो अब भी ज्यादा नहीं पी पाते.. मुझे भी कभी कभी रात को दर्द होने लगता है.. पर वो पीते ही नहीं है.. पूरी रात मैं दर्द के मारे तड़पती रहती हूँ.. और क्या कर सकती हूँ मैं.. तड़पने के अलावा.. " रूखी ने अपने पत्ते बिछाने शुरू कर दिए

"अरे बहु.. अब मैं मेरे बेटे से ये तो नहीं कह सकता ना.. की अपनी बीवी का दूध चूस दे.. पर हाँ.. एक काम हो सकता है.. रात को जब दूध से तेरी छाती फटने लगे तब मुझे जगा देना.. मैं सारा दूध चूसकर तेरा दर्द कम कर दूंगा.. ठीक है!!"

"आप कितने अच्छे है.. बापू!! देखिए ना.. मेरी छाती दूध से फटी जा रही है.. और लल्ला भी थोड़ा सा ही पीकर सो गया.. अब पता नहीं ये कब जागेगा और दूध पिएगा.. "

"अरे बेटा.. क्यों चिंता कर रही हो!! मैं हूँ ना.. ला मैं तेरा दूध चूसकर तेरी छातियाँ हल्की कर देता हूँ"

"पर बापू.. मुझे बड़ी लाज आती है.. " शरमाते हुए रूखी ने कहा

"अब शर्म करोगी तो फिर दर्द भुगतना पड़ेगा.. और तो मैं कुछ नहीं कर सकता!!"

"नहीं नहीं बापू.. ये लीजिए.. चूस लीजिए.. बहोत दर्द हो रहा है.. " रूखी ने तोप के नाले जैसे दोनों स्तन खोलकर अपने ससुर के सामने पेश कर दिए


रूखी के मदमस्त स्तनों को देखकर उसका ससुर पानी पानी हो गया.. यौवन के कलश जैसे बेहद सुंदर चरबीदार बोब्बे.. बड़े सुंदर लग रहे थे

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अनु मौसी को रसिक और शीला के बारे में पता चल गया है रूखी अपने बूढ़े ससुर को अपना दूध पिला कर तंदुरुस्त करके चुदने वाली है और साथ में लगता है शीला का भी नंबर लगने वाला है
 

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"आप कितने अच्छे है.. बापू!! देखिए ना.. मेरी छाती दूध से फटी जा रही है.. और लल्ला भी थोड़ा सा ही पीकर सो गया.. अब पता नहीं ये कब जागेगा और दूध पिएगा.. "

"अरे बेटा.. क्यों चिंता कर रही हो!! मैं हूँ ना.. ला मैं तेरा दूध चूसकर तेरी छातियाँ हल्की कर देता हूँ"

"पर बापू.. मुझे बड़ी लाज आती है.. " शरमाते हुए रूखी ने कहा

"अब शर्म करोगी तो फिर दर्द भुगतना पड़ेगा.. और तो मैं कुछ नहीं कर सकता!!"

"नहीं नहीं बापू.. ये लीजिए.. चूस लीजिए.. बहोत दर्द हो रहा है.. " रूखी ने तोप के नाले जैसे दोनों स्तन खोलकर अपने ससुर के सामने पेश कर दिए

रूखी के मदमस्त स्तनों को देखकर उसका ससुर पानी पानी हो गया.. यौवन के कलश जैसे बेहद सुंदर चरबीदार बोब्बे.. बड़े सुंदर लग रहे थे

बूढ़े ससुर ने दोनों स्तनों को पकड़कर दबाया

"आह्ह.. दुख रहा है बापू.. " कामातुर रूखी ने कहा

"अपनी भेस के थन जैसे है तेरे चुचे.. " ससुर लार टपकाते हुए बोला.. रूखी ने अपने चेहरे को घूँघट से ढँक लिया.. देखिए इस नारी का चरित्र.. स्तन खुले हुए है और चेहरा ढँक रही है..!! संस्कारी होने का दिखावा करती रूखी का अगर घाघरा उठाया जाएँ.. तो उसकी बिना पेन्टी वाली चुत से.. कल रात जीवा और रघु के साथ हुई चुदाई के अवशेष मिल जाते..

जरा सा ही दबाने पर.. रूखी की निप्पलों से दूध की धार बरसने लगी.. रूखी का दूध उसकी गोद में ही गिरने लगा..

"बेटा.. एक काम करो.. लल्ला को पालने में सुला दो.. नहीं तो हलचल से वो जाग जाएगा.. " ससुर ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा

अपने ब्लाउस से लटक रही दो खुली चूचियों के साथ रूखी खटिया से खड़ी हुई.. और बच्चे को उठाकर बगल के कमरे में पालने के अंदर सुला दिया.. वापिस लौटते वक्त उसकी नजर पिलर के पीछे खड़ी शीला पर गई.. दोनों की नजरे मिली और चेहरे पर शैतानी मुस्कान आ गई..

चलकर आ रही रूखी का अर्धनग्न सौन्दर्य देखकर बूढ़े ससुर का जबड़ा लटक गया.. क्या अद्भुत सौन्दर्य था रूखी का!! पूनम के चाँद जैसे गोरे गोरे दो स्तन देखकर शीला के भोसड़े में भी आग लग गई.. रूखी चलते चलते खटिया तक आई और ससुर के सामने जाकर खड़ी हो गई।

रूखी को देखकर उस बूढ़े की जवानी फूटने लगी.. बिना अपना घूँघट हटाए रूखी ने अपना दाया स्तन ऊपर किया.. उसका ससुर उस स्तन को देखता ही रह गया..

"जल्दी कीजिए बापू.. अम्मा कभी भी वापिस आ जाएगी.. " कहते हुए रूखी ने अपने ससुर का सिर पकड़कर उनके मुंह में अपनी निप्पल दे दी

"ओह बहुरानी.. अमम.. " ६० साल के बूढ़े का लंड धोती के अंदर फुँकारने लगा.. अपने बेटे की जवान बीवी के स्तनों से दूध चूसने की समाजसेवा शुरू कर दी बूढ़े ने....

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"आह्ह.. बापू.. आप तो कैसे चूस रहे है.. ऊईई.. ओह्ह" रूखी ने अपनी निप्पल को ससुर के मुंह में दबा दिया.. वो बूढ़ा भी ऐसे चूस रहा था जैसे दुनिया का सबसे बढ़िया हेल्थ ड्रिंक पी रहा हो.. थोड़ी देर तक चूसने के बाद वह बोला

"बेटा.. गाय के थन जैसी छाती है तेरी.. थोड़ा सा ही चूसने पर पूरा मुंह दूध से भर गया मेरा.. बेचारा लल्ला इतना सारा दूध कहाँ से पी पाएगा!! इतना दूध है की पूरे घर के लिए काफी है.. काश हमारे खेत भी तेरी इन छातियों जीतने उपजाऊ होते"

"ओह्ह बापू.. क्या कर दिया आपने!! मुझे तो कुछ कुछ हो रहा है.. आह्ह.. " रूखी का पूरा जिस्म हवस की आग में झुलसने लगा था। उसका एक हाथ ससुर के सिर पर था और दूसरे हाथ से उसने अपनी भोस सहलाना शुरू कर दिया..

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"आह्ह बापू.. धीरे धीरे.. काटिए मत.. ऊईई माँ.. बस बस बहुत हो गया.. थोड़ा सा लल्ला के लिए भी छोड़ दीजिए.. अभी वो जाग गया तो उसे क्या पिलाऊँगी.. " रूखी और उसके ससुर का यह कामुक मिलन देखते हुए.. शीला ने अपने दोनों स्तन ब्लाउस से बाहर निकाल लिए थे और पागलों की तरह अपनी निप्पलों को मसल रही थी। शीला ने पास पड़े हँसिये को उठाकर उसके लकड़े से बने हेंडल को अपनी चुत पर रगड़ना शुरू कर दिया था। उन दोनों का खेल देखकर शीला का मन कर रहा था की वो भी उस खटिया में जाकर उस बूढ़े से लिपट पड़े.. पर फिलहाल ऐसा करना मुमकिन नहीं था

"तेरी छातियाँ तो रसिक की अम्मा से भी बड़ी बड़ी है.. " आखिर ससुर ने रूखी की निप्पलों को छोड़ दिया

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"आपने तो सारा दूध खतम कर दिया बापू" उस बूढ़े के पीठ पर हाथ पसारते हुए रूखी ने कहा.. वह अपने ससुर को ऐसे सहला रही थी जैसे कसाई हलाल करने से पहले बकरे को सहलाता है..

ससुर ने रूखी की लचकदार चर्बी वाली कमर पर अपना खुरदरा हाथ फेरा.. रूखी के भोसड़े से कामरस की धारा बह रही थी.. बूढ़े ने रूखी के घाघरे में हाथ डालकर उसके गोल मटके जैसे दोनों कूल्हों को पकड़ लिया..

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रूखी को बहोत गुस्सा आ रहा था.. ये बहनचोद हर जगह हाथ फेर रहा है पर मेरी चुत को क्यों नहीं छु रहा!! कैसे कहूँ.. शर्म आ रही है.. और अभी वो बुढ़िया भी आ टपकेगी..

रूखी ने बूढ़े को अपनी छातियों से दूर कर दिया..

"क्या हुआ बहु?" ससुर आश्चर्य से रूखी को देखने लगा

"अब दूसरे वाले की बारी.. दोनों तरफ एक सा वजन होना चाहिए ना.. " कहते हुए रूखी ने अनुभवी रंडी की अदा से अपना दूसरा भारी स्तन ससुर के हाथों में थमा दिया

"बहु.. इतनी भारी छातियों का वज़न नहीं लगता तुझे.. ?? कम से कम ३-४ किलो का होगा एक.. "

बिना जवाब दिए रूखी खटिया पर लेट गई.. और अपने ससुर को बगल में लिटा दिया.. अपना बाँया उरोज मुंह में देते हुए बोली

"बातें बाद में करेंगे.. पहले जो काम करने बैठे है उसे तो खतम कर लो.. कब से बस बोलें ही जा रहे हो..!!" रूखी ने अपने पैर को घुटने से मोड़ा और ऐसी स्थिति में लेकर आई की उसका घुटना सीधा बूढ़े के लंड से जा टकराए..

ससुर की लंगोट.. मधुमक्खी के छत्ते की तरह उभर गई थी.. रूखी के भोसड़े में आग लग गई थी.. उसने ससुर के लंड को अपने घुटने से छूते हुए उसे अपने पास खींचा

"ये क्या कर रही हो बेटा.. नहीं नहीं.. ये ठीक नहीं है"

रूखी ने अपने घुटनों से एक जोरदार धक्का लगा दिया ससुर के लंड पर.. बूढ़े की चीख निकल गई..

"अब चुपचाप जो कहती हूँ वो करो.. दूध तो पी लिया है मेरा.. अब वसूल भी तो करने दो मुझे.. खबरदार जो किसी को एक शब्द भी बताया है तो" अपने ससुर को बाहों में दबाते हुए रूखी ने कहा.. गुस्साई शेरनी जैसी रूखी उस बूढ़े पर टूट पड़ी.. ससुर को नीचे लिटाकर वह उसके ऊपर चढ़ गई.. दोनों के वज़न से खटिया का एक पैर टूट गया.. खटिया के टूटते ही दोनों फर्श पर आ गिरे.. ऐसे गिरे जैसे बुमराह के बाउन्सर के सामने झिम्बाब्वे का बेट्समेन गिर जाता है.. दोनों को मुंह से एक साथ चीख निकल गई.. ससुर इसलिए चीखा की उसकी पीठ नीचे फर्श पर टकराई और रूखी का पूरा वज़न उस पर गया.. रूखी इसलिए चिल्लाई क्योंकी नीचे गिरने के कारण उसकी निप्पलें बूढ़े के मुंह के साथ बड़े जोर से दब गई।

रूखी के वज़न तले लाचार ससुर ऐसे दबा था जैसे महंगाई के बोज तले प्रजा दबी हुई है.. दोनों के जिस्म एक दूसरे में उलझे हुए थे तभी.. बाहर दरवाजा खुलने की आवाज आई.. मर गए.. जिसका डर था वही हुआ.. बुढ़िया आ गई!!

"अरे.. इतनी देर में रसिक की अम्मा वापिस भी आ गई.. !! उसे तो मंदिर में भी चैन नहीं है" कहते हुए ससुर रूखी को अपने शरीर के ऊपर से हटाते हुए खड़ा हुआ और भागकर अपने कमरे में चला गया

रूखी उठकर शीला के पास आई.. शीला हँसिये के हेंडल को अपनी चुत में घुसेड़कर खड़ी खड़ी मुस्कुरा रही थी।

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"कमिनी.. तूने तो अपने ससुर को ही सेट कर लिया" रूखी की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा

"भाभी.. मुझे शक है की मेरे ससुर ने मुझे जीवा के साथ देख लिया है.. जिस रात रघु और जीवा मुझे चोद कर गए थे.. तब से इस बूढ़े ने मुझे सताना शुरू कर दिया था.. मेरे साथ रोज अश्लील बातें करता है और छातियों को घूरता रहता है"

"अच्छा.. तो ये बात है!!" शीला ने कहा

रूखी: "हाँ भाभी.. पर बूढ़ा है बड़े काम की चीज.. छाती तो ऐसे चूस रहा था.. मेरे छेद में से नलके की तरह पानी बहने लगा था.. सब गीला गीला हो गया"

शीला: "साली, एक नंबर की हरामी है तू ..."

रूखी ने शीला के ब्लाउस के बटन बंद करते हुए कहा "इसीलिए तो मुझे हँसिये को अंदर डालने की जरूरत नहीं पड़ती है भाभी" कहते हुए उसने शीला की चुत से हँसिये को खींचकर बाहर निकाला..

तभी शीला के मोबाइल पर कविता का फोन आया.. शीला ने उसके साथ कुछ बात की और फोन रख दिया

रूखी की सास.. कमरे में अंदर आई.. और बोली "अरे रूखी.. शीला बहन को ताज़ा मक्खन जरूर देना"

"हाँ अम्मा.. बस निकालने ही जा रही थी.. "

"और बताइए शीला बहन.. हालचाल ठीक है सब? भैया कैसे है?" शीला के ब्लाउस के दो खुले बटनों को देखते हुए रूखी के सास ने बड़े विचित्र ढंग से पूछा

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शीला: "सब ठीक ही है माजी.. विदेश में भला क्या तकलीफ़ होगी उन्हे!! सारी तकलीफ तो हमे यहाँ ही उठानी पड़ती है"

रूखी की सास भी आखिर एक स्त्री थी.. शीला की आवाज का दर्द और छुपा अर्थ वह समझ सकती थी.. इतने सालों का अनुभव जो था.. रूखी को भी वह बड़े अच्छे से रखती थी.. सास-बहु वाली कोई कड़वाहट नहीं थी। वैसे भी हर सास अपनी बहु का थोड़ा बहुत ऊपर नीचे चला ही लेती है। क्योंकी सास भी कभी बहु थी..

शीला और रूखी के सामने रहस्यमयी मुस्कान के साथ वह कमरे में चली गई। '

शीला: "तेरी सास भी बड़ी खिलाड़ी लगती है मुझे"

रूखी ने हँसकर कहा "सबकुछ आराम से बताऊँगी कभी.. मेरी सास का इतिहास भी बड़ा ही रसीला है"

"ठीक है रूखी, मैं चलती हूँ" रूखी के हाथ से मक्खन का डिब्बा लेते हुए शीला ने कहा

"मैं शाम को आऊँगी भाभी.. फिर आराम से बातें करेंगे"

जाते जाते शीला ने रूखी के ससुर के कमरे के दरवाजे को हल्का सा खोलकर एक नजर डाली.. अंदर का द्रश्य देखकर वह चोंक गई.. वह तुरंत भागकर वापिस आई.. और रूखी को खींचकर ससुर के कमरे के दरवाजे पर ले आई.. दोनों ने छुपकर देखा.. उसका ससुर धोती से लंड निकालकर हिंसक तरीके से हिला रहा था.. देखकर शीला और रूखी दोनों पानी पानी हो गए..

"मेरी सास कहाँ है ?" रूखी ने पूछा.. अर्धखुले दरवाजे से कमरे का पूरा द्रश्य नहीं दिख रहा था रूखी को

"तेरी सास भी अंदर ही है" शीला ने कहा

"तब तो आज पक्का चुदाई का प्रोग्राम होगा अंदर.. मेरा ससुर खिलाड़ी है.. मेरी सास को रंडी बनाकर पेलेगा.. रुको थोड़ी देर.. देखकर जाओ.. मज़ा आएगा" रूखी ने कहा

शीला उत्तेजित हो गई.. उसके लिए ये नया अनुभव था.. उसने पहले कभी किसी अन्य जोड़े को इस तरह चोदते हुए नहीं देखा था.. शीला की मुनिया कामरस से एकदम गीली हो गई.. रूखी के सास और ससुर बातें कर रहे थे.. अपना लंड ढीला न पड़ जाए इसलिए वह बूढ़ा उसे हिलाए जा रहा था.. थोड़ी देर के बाद रूखी की सास अपने पति के बगल में लेट गई.. और रूखी के ससुर को अपने ऊपर खींच लिया..

"अरे वो दोनों बातें करने में लगी हुई है.. अभी कोई नहीं आएगा.. तुम शांति से करो.. काफी दिन हो गए है किए हुए.. पर आज दिन के समय ये तुम्हारा डंडा कैसे खड़ा हो गया आज?? कहीं वो शीला बहन को देखकर तो.. !!! अभी मैं उससे मिली तब उसके ब्लाउस के दो हुक खुले हुए थी.. तुमने कुछ छेड़खानी तो नहीं की ना उसके साथ.. !! वैसे भी वो दो सालों से बिना पति के तरस रही है.. कहीं तुमने तो उसे पानी पिलाने की कोशिश नहीं की है ना?? " रूखी के सास ने अपने पति से पूछा

"पागल हो गई है क्या तू?? मैंने ऐसा वैसा कुछ नहीं किया.. " ससुर ने अपना बचाव करते हुए कहा

"कुछ भी कहो.. आज तुम्हारा लंड कुछ ज्यादा ही सख्त लग रहा था.. इतना सख्त तो हमारी सुहागरात पर भी नहीं हुआ था... " रूखी के सास ने अपने पति का लाई डिटेकटर टेस्ट जारी रखा

"हे ईश्वर.. इन औरतों को कभी भी अपने पति की बात का विश्वास क्यों नहीं होता!! जब देखो तब एक ही बात.. !! चल.. अब मुंह में लेकर चूस.. और इसे एकदम सख्त कर.. फिर से नरम होने लगा... " ससुर ने अपने पत्नी के बाउन्सर के सामने झुककर अपना सिर बचा लिया

"अब इतना कडक तो हो गया है.. और कितना सख्त करना है तुम्हें..!! चोदना है या दीवार में छेद करना है!! चलो.. अब जल्दी से डाल दो.. तुम्हारे ये देखकर मुझे भी कुछ कुछ हो रहा है.. "

रूखी का ससुर तुरंत ऊपर चढ़ गया.. और अपनी पत्नी के ढीले-ढाले भोसड़े को ठोंकने लगा..

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"आह्ह.. जरा धीरे से.. दर्द होता है अंदर.. आहह आह्ह.. !!" सिसकारते हुए रूखी की सास भी ताव में आकर चुदने लगी और उसने भी इस काम-उत्सव में अपना नामांकन करवा दिया

"बाप रे भाभी.. !! देखो तो सही.. इस उम्र में भी ये बूढ़ा कितना जोर लगा रहा है... !! सच ही कहते है.. मर्द और घोडा कभी बूढ़ा नहीं होता!!" रूखी ने शीला से कहा

शीला रूखी के पीछे खड़ी थी.. उसने अपने दोनों हाथों से रूखी की गदराई कमर को सहलाना शुरू कर दिया.. और शीला के मुलायम तकिये जैसे स्तन रूखी की पीठ पर दब रहे थे। दोनों की आँखों के सामने रूखी के सास और ससुर की घमासान चुदाई चल रही थी।

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शीला ने रूखी के चेहरे को पीछे की तरफ खींचा और उसके होंठों को एक गरमागरम चुंबन रसीद कर दिया.. रूखी भी घूमकर शीला के सामने आ गई और दोनों पागल प्रेमियों की तरह एक दूसरे से लिपट गए.. सास-ससुर का कामुक वृद्ध सेक्स देखकर दोनों सखियों की पूत्तियाँ कामरस टपकाने लगी.. शीला ने रूखी की चोली में हाथ डालकर उसके भरावदार स्तनों को मसलन शुरू किया जबकि उसके दूसरे हाथ ने रूखी के घाघरे में घुसकर उसकी चुत का हवाला संभाल लिया था..

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अपने ससुर का मस्त खूंटा देखकर उकसाई हुई रूखी अपनी बेकाबू वासना को शांत करने के लिए शीला के होंठों को चूसने लगी.. कभी शीला रूखी के होंठ चूमती तो कभी रूखी शीला की जीभ को रसगुल्ले की तरह चूसती.. उनकी नज़रों के सामने ही रूखी के सास-ससुर कामक्रीड़ा में इतने मशरूफ़ थे की उन्हे आसपास का कोई ज्ञान न था.. वह दोनों केवल अपनी हवस शांत करने की कोशिश कर रहे थे

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शीला और रूखी.. एक दूसरे के अंगों को सहलाकर.. मसलकर.. बिना लंड के अपनी चूतों की आग को शांत करने के निरर्थक प्रयत्न कर रहे थे। रूखी के भोंसड़े में चार उँगलियाँ अंदर बाहर करते हुए शीला ने कमरे में अंदर नजर डाली.. रूखी की सास.. अपने पति के लंड पर सवार होकर कूद रही थी.. ससुर ने उसकी कमर पकड़कर उसे संतुलित कर रखा था.. और सास गांड उछाल उछाल कर जबरदस्त धक्के लगा रही थी.. काफी जद्दोजहत के आड़ चारों झड़ने में कामयाब हो गए।

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जैसे ही वह बूढ़ी सास अपना रस झड़वाकर लंड से नीचे उतरी.. शीला और रूखी दोनों को जबड़े आश्चर्य से लटक गए.. बाप रे!! ससुर का विकराल लोडा वीर्य से लसलसित होकर अपनी बीवी की चुत से निकलकर ऐसे झटके खा रहा था जैसे को योद्धा युद्ध लड़ने के बाद हांफ रहा हो!!

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"चल रूखी.. मैं अब निकलती हूँ.. अभी तेरी सास बाहर आएगी.. "

"ठीक है भाभी.. आप जाइए.. मैं बाद में आती हूँ आपके घर.. "रूखी ने कहा


शीला अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए निकल गई.. इस बार वह चलते चलते अपने घर पहुंची।
तो ये सरप्राइज था शीला के लिए रूखी को जीवा और रघु के साथ चुदाई करते देख लिया इसके ससुर ने तो रूखी ने ससुर को ही इस खेल में शामिल कर लिया अब तो रूखी के मजे होने वाले हैं रूखी के ससुर इसकी सास की दमदार चुदाई कर रहे हैं
 

Sanju@

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शीला अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए निकल गई.. इस बार वह चलते चलते अपने घर पहुंची।

शीला सोच रही थी.. क्या काम होगा कविता को? तभी कविता खुद उसके घर पर आ पहुंची.. बहोत खुश लग रही थी कविता.. शीला जानती थी की बिना लंड से झटके खाए.. किसी स्त्री के चेहरे पर ऐसी मुस्कान खिल ही नहीं सकती..

"सच सच बता कविता.. कल पीयूष ने बराबार चोदा है ना तुझे?" शीला ने पूछा

"पीयूष ने नहीं.. मेरे प्यारे पिंटू ने.. ये सब मेरे पिंटू का ही कमाल है" कहते हुए कविता शीला से लिपट पड़ी

"अच्छा.. !! ये भला कब हुआ?? वो तो कल चला गया था मेरे घर से.. तुम दोनों मिले कब??" शीला ने आश्चर्यसह पूछा

"कल रात पीयूष अपने दोस्तों के साथ मूवी देखने गया था.. मैंने पिंटू को फोन करके बुला तो लिया.. पर सवाल ये था की हम दोनों मिले कैसे!! रात को दस बजे पीयूष हमारी सोसायटी में आ चुका था.. उसने मुझे पीछे वाली गली में मिलने के लिए बुलाया.. पर कमबख्त मेरी सास.. देर तक जागती रहती है.. टीवी पर बकवास सीरियलों ने दिमाग खराब कर रखा है उनका.. बुढ़िया बस टीवी से चिपकी रहती है.. कैसे निकलती बाहर!!"

कविता सारा घटनाक्रम बता रही थी उस दौरान शीला ने उसे बेड पर बिठाया और उसका स्कर्ट घुटनों तक ऊपर करते हुए.. हाथ डालकर उसकी पेन्टी खींच निकाली.. कविता ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और वह बोलती ही रही.. शीला की हरकतों से उसके पतले गोरे बदन में सुरसुरी सी होने लगी.. शीला ने कविता को हल्के से धक्का दिया और उसकी पीठ दीवार के साथ सट गई.. और दीवार के सहारे वह आधी लेटी हुई पोजीशन में आ गई.. शीला ने उसके घुटने मोड़कर पैर चौड़े किए.. कविता की बिना झांटों वाली चिकनी पूत्ती देखकर शीला एक पल के लिए ईर्ष्या से जल उठी.. सफाचट नाजुक मोगरे की कली जैसी कविता की जवान चुत के दोनों होंठ फड़फड़ाने लगे..

शीला ने झुककर कविता की पुच्ची की चूम लिया..

"आह्हहह भाभी.. " कविता कराह उठी

"तू बोलना जारी रख.. फिर किस तरह निकली घर से और कैसे मिले तेरे पिंटू से.. ?"

"ओह्ह भाभी.. क्या कहूँ!! मुझे आपकी याद आ गई.. मैं आपके घर आने के बहाने, छाता लेकर बाहर निकली.. और आपके घर के पीछे जो सुमसान गली है ना.. वहाँ पिंटू को बुला लिया.. हल्की हल्की बारिश हो रही थी.. और उस गली में घर के बाहर को नहीं था.. काफी अंधेरा भी था.. वहीं बिजली के खंभे के पास पिंटू ने मुझे खड़े खड़े पीछे से चोद दिया..पर भाभी.. पिंटू अब पहले के मुकाबले काफी कुछ सीख चुका है.. पहले तो उस अनाड़ी को मेरे छेद के अंदर घुसाना भी ठीक से नहीं आता था.. पर पता नहीं कैसे.. कल रात को उसने किसी अनुभवी मर्द की तरह मेरी ठुकाई की.. पहले पहले तो उसे चुत चाटना भी नहीं आता था..और चुदाई भी ठीक से नहीं कर पाता था.. पर कल रात को उसने मुझे जो चोदा है.. आहाहाहा.. मेरी चुत में दर्द होने लगा तब तक धक्के लगाए उसने.. और जमीन पर बैठकर मेरी चुत भी चाटी.. कुछ समझ में नहीं आ रहा.. मेरा अनाड़ी पिंटू ऑलराउंडर कैसे बन गया?? कहीं किसी बाजारू औरत के पास तो नहीं गया होगा ना!! कुछ तो गड़बड़ है!!"

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शीला ने कविता की बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुसकुराते हुए कविता की टाइट चुत पर अपना मुंह चिपका दिया.. कविता ने "ओह्ह.. ओह्ह" सिसकते हुए अपने चूतड़ ऊपर उठा दिए और शीला के सिर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया.. उसकी उत्तेजित चुत में शीला ने दो उँगलियाँ घुसेड़ कर अंदर बाहर करते हुए चाटना शुरू कर दिया.. इस दोहरे हमले के आगे कविता निसहाय थी.. उसे याद आया की पिंटू ने भी पिछली रात बिल्कुल इसी तरह किया था.. पर शीला ने कविता के दिमाग को ज्यादा सोचने की स्थिति में ही नहीं रहने दिया.. अद्भुत, कामुक और शृंगारिक तरीके से हो रही चुत चटाई ने कविता के दिमाग पर ताला लगा दिया..

अपने अमूल्य खजाने को शीला के हाथों में सौंपकर कविता अपने नागपुरी संतरों जैसे उरोजों को मसलकर अपनी आग को बुझाने के निरर्थक प्रयत्न करने लगी.. पर शीला की उंगलियों में असली लंड जैसा मज़ा कहाँ से मिलता !!! कल रात को पिंटू ने बिजली का खंभा पकड़ाकर जिस तरह उसे पीछे से धमाधम शॉट मारे थे उसके झटके कविता की चुत में अब तक लग रहे थे।

"आह्हह भाभी.. अब ओर नहीं रहा जाता मुझसे.. कुछ कीजिए प्लीज.. " शीला ने कविता की पूत्ती को चाटते हुए अपनी उंगलियों को तेजी से अंदर बाहर करना शुरू किया.. कविता के सुंदर स्तनों को देखकर शीला भी गरमा गई.. उसने कविता की चुत से अपनी उँगलियाँ निकाली.. और अपने सारे कपड़े उतार दिए.. कविता तो इस नग्न रूप के ताजमहल की सुंदरता देखकर चकाचौंध हो गई..

"हाय भाभी.. कितना गदराया शरीर है आपका !! ये गोरी गोरी चिकनी मांसल जांघें.. और मदमस्त मोटी गांड.. में लड़की होकर भी ललचा गई देखके.. तो मर्दों की क्या हालत होती होगी.. !!" कहते हुए कविता ने शीला के खरबूजों जैसे स्तनों के साथ खेलना शुरू कर दिया..

शीला ने कविता का मुंह अपने बबलों पर दबा दिया.. गुलाबी रंग की निप्पल को थोड़ी देर चूसते रहने के बाद कविता ने कहा "अगर इसमें दूध आता होता तो कितना मज़ा आता!!! पीयूष कई बार मुझसे कहता है.. उसे दूध भरे मम्मे चूसने की बड़ी इच्छा है.. और हाँ भाभी.. आपसे एक और बात भी पुछनी है"

शीला: "हाँ पूछ ना"

कविता: "कैसे कहूँ.. अमममम.. मेरे पति पीयूष को एक बार आपके बॉल दबाने है.. उसे बहोत पसंद है आपके.. रोज रात को मेरी छाती दबाते हुए वो आपका ही नाम लेता है.. "

सुनते ही शीला के भोसड़े में दस्तक सी लगने लगी.. एक नए लंड की संभावना नजर आते ही उसकी चुत छटपटाने लगी..

"बेशरम.. कैसी गंदी गंदी बातें कर रही है तू कविता.. !! बोलने से पहले सोचती भी नहीं तू.. कुछ भी बोल रही है.. पीयूष को तो में कितने आदर की नजर से देखती हूँ.. वो कभी ऐसी बात नहीं कर सकता!!"

"सच बोल रही हूँ भाभी..मेरे तो छोटे छोटे है.. पीयूष को बड़े बबले पसंद है.. जब देखों तब बड़ी छातियों वाली औरतों की तारीफ करता रहता है.. और जब मौका मिले तब उन्हे ताड़ता रहता है.. "

सुनते ही शीला का भोसड़ा पानी पानी हो गया.. उसने कविता को अपनी बाहों में भर लिया और उसके रसभरे होंठों को एक लंबा चुंबान किया

"अगर तेरा पति मेरे बबले दबाएगा तो तुझे कोई एतराज नहीं होगा ना?? बोलने तक तो बात ठीक है पर कोई भी पत्नी ये बर्दाश्त नहीं कर पाती.. पर तू ध्यान रखना कविता.. कहीं तेरा पति पीयूष किसी गदराई छाती वाली के साथ उलझ ना जाएँ.. नहीं तो तेरा सुखी संसार तहस नहस हो जाएगा.. इन मर्दों का और उनके लोडों का कोई भरोसा नहीं.." शीला ने कहा

ये सुनकर कविता बॉखला गई..

शीला की चुत में शकुनि का दिमाग था.. नई संभावना जागृत होते ही उसकी चुत और दिमाग दोनों पासे फेंकने लगे

कविता की क्लिटोरिस को अपने अंगूठे और उंगली के बीच पकड़कर शीला ने ऐसा दबाया की कविता अपनी कमर उठाते हुए उछल पड़ी.. और बिस्तर पर पटक गई..

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"हाईईई भाभी.. मर गई.. आहहहह.. निकल गया मेरा.. !! क्या किया आपने.. कहाँ छु लिया था.. !! मुझे तो मज़ा आ गया भाभी.. ईशशश"

शीला दो घड़ी के लिए थम गई.. जब तक की कविता की सांसें नियंत्रित न हो गई फिर उसने कविता से पूछा

"वैसे पीयूष देखने में तो बड़ा हेंडसम है.. !!"

"हाँ, वो तो है.. " कविता ने जवाब दिया

शीला: "तो तुझे पिंटू से चुदवाना ज्यादा पसंद है या अपने पति पीयूष से??"

कविता: "सच कहूँ भाभी.. तो मुझे पिंटू से चुदना ज्यादा पसंद है.. पिंटू एकदम मस्त है.. और मेरा बचपन का प्रेमी है.. इसलिए उसके साथ ज्यादा मज़ा आता है मुझे.. "

शीला: "ठीक है.. में तुझे एक रास्ता दिखाती हूँ.. तुझे बिल्कुल वैसे ही करना है.. देख.. वैसे मुझे पीयूष से अपने बबले दबवाने का कोई शौक नहीं है.. पर बड़ी छातियों के चक्कर में कहीं वो किसी रंडी से ना उलझ जाएँ ये भी हमें देखना पड़ेगा.. नहीं तो तेरा संसार तबाह हो जाएगा.. समझी!!"

कविता: "ठीक है भाभी.. आप जैसा कहेंगी वैसा ही में करूंगी.. "

शीला: "एक काम कर.. आज गुरुवार है.. कल शुक्रवार को कोई न कोई नया मूवी आएगा.. पीयूष को मूवी देखना पसंद है क्या?"

कविता: "अरे भाभी.. अभी दो दिन पहले ही वो कह रहा था.. की कोई नई मूवी देखने चलते है"

शीला: "वाह.. फिर तो हमारा काम आसान हो गया.. आज रात को तू पीयूष को बोलना की शीला भाभी को मूवी देखने जाना है पर किसी की कंपनी ढूंढ रही है.. तो क्या हम साथ चलें उनके साथ मूवी देखने के लिए..!! और कहना की मुझे शीला भाभी को जल्दी जवाब देना है" कविता को कुछ समझ में नहीं आया पर वह सुनती रही

शीला: "अगर वो आनाकानी करे तो उसे कहना की शायद भीड़ में उसे शीला भाभी के स्तनों को छूने का मौका मिल जाएँ.. ऐसे लालच देगी तो वो तुरंत तैयार हो जाएगा.. समझी..!! में मूवी की चार टिकट बुक करवा देती हूँ.. रात के शो की.. !!"

कविता: "चार टिकट क्यों भाभी??" हम तो सिर्फ तीन ही है ना!!"

शीला: "अरे पगली.. जब पीयूष मेरे मम्मे मसल रहा होगा तब तेरे इन संतरों का रस चुसनेवाला भी कोई चाहिए ना !! तू फोन करके पिंटू को बुलाया लेना.. वहाँ मल्टीप्लेक्स पर हम पीयूष की नजर बचाकर, पिंटू को टिकट थमा देंगे.. और बता देंगे की हॉल में जब पूरा अंधेरा हो तब वो चुपके से आकार तेरे बगल की सीट पर बैठ जाएँ.. तू अपने यार के संग मजे मारना तब तक में तेरे पति का खयाल रखूंगी.. "

शीला की यह योजना सुनकर कविता उछल पड़ी.. प्रेमी को मिलने के लिए वो अपने पति को शीला के पास गिरवी रखने को तैयार थी.. उसकी आँखों में ऐसी चमक आ गई जैसे अभी अभी पिंटू से चुदकर आई हो..

"पर भाभी.. पीयूष को पता चल गया तो?? वो पिंटू को मेरे बॉल मसलते देख लेगा तो क्या करेंगे??" कवर के ऊपर से शॉट खेलने का प्रयास करती शीला के सामने कविता ने एल.बी.डब्ल्यू की अपील की..

जवाब में शीला ने अपने दोनों मस्त स्तनों को आपस में दबा दिया.. और उन दोनों के बीच की दरार दिखाते हुए बोली

"कविता.. इस खाई में आजतक जो भी गिरा है ना.. वो कभी वापिस नहीं लौटा.. तेरे पीयूष को भी इस खाई में ऐसे धकेल दूँगी.. की मूवी के तीन घंटों के दौरान पीयूष ये भी भूल जाएगा की वो शादीशुदा है.. तू चिंता मत कर.. और देख.. प्रेमी के संग रंगरेलियाँ मनानी हो तो रिस्क लेना पड़ेगा.. हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी तो प्रेमी और पति, दोनों को गंवा बैठेगी.. "

कप्तान द्वारा टीम से निकाले जाने की धमकी मिलने के बाद प्लेयर की जो हालत होती है.. वही हालत कविता की हो गई..

कविता ने मन में ठान ली.. "कुछ भी हो जाए भाभी.. इस योजना को हम सफल बनाके ही रहेंगे.. आप बस टिकट का बंदोबस्त कीजिए.. बाकी काम काम मुझपर छोड़ दीजिए"

शीला: "तू टिकट की चिंता मत कर.. पहेले पीयूष को राजी कर.. और पिंटू को मेसेज पर पूरा प्लान बता देना.. और उस चोदू को बोलना की मोबाइल हाथ में ही रखे.. आज कल के लौंडे जीन्स की पिछली पॉकेट में फोन रखकर भूल जाते है.. मल्टीप्लेक्स पर ऐसा कुछ हुआ तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा.. उसे कहना की लेडिज टॉइलेट के पास हमारा इंतज़ार करें.. समझ गई ना तू??"

कविता: "हाँ भाभी.. में पिंटू को सब कुछ समझ दूँगी.. और पीयूष को भी माना लूँगी" अपने टॉप के बटन बंद करते हुए कविता ने इस शैतानी प्लान पर अपनी महोर लगा दी.. और अपने घर चली गई..


शीला ने मुसकुराते हुए अपनी चुत को थपथपाया.. जैसे उसे शाबासी दे रही हो.. अब पीयूष नाम के बकरे को हलाल करने का वक्त आ चुका था
शीला के साथ रहकर कविता में भी हिम्मत आ गई है अब तो उसने अपने यार को बुला कर चुदवा लिया वो भी गली में । शीला ने एक और बकरे को हलाल करने की तैयारी कर ली है
 

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एक ही दिन में शीला और रेणुका एकदम खास सहेलियाँ बन गई.. रात को दोनों ने ब्लू फिल्म की डीवीडी देखते हुए लेस्बियन सेक्स का मज़ा लिया.. फिर एक ही बिस्तर पर नंगी होकर दोनों पड़ी रही.. एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए देर तक बातें करती रही.. समाज की.. घर की.. पति की.. पड़ोसियों की.. बातें करते करते एक दूसरे की बाहों में कब सो गई दोनों को पता ही नहीं चला..

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सुबह पाँच बजे जब रसिक दूध देने आया तब शीला की आँख खुली.. नंगे बदन पर फटाफट गाउन पहनकर शीला दूध लेने बाहर आई.. रसिक शीला को देखकर हमेशा तुरंत उत्तेजित हो जाता.. उसने शीला के स्तनों को छेड़ते हुए दबा दिया और बोला "आज बहोत मन कर रहा है करने का भाभी.. क्या माल लग रही हो आप आज तो!!" शीला के गाउन के अंदर हाथ डालकर उसके स्तन मसलते हुए उसने कहा "अंदर आ जाऊ भाभी?"

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शीला: "आज नहीं रसिक.. आज घर में मेहमान आए हुए है.. "

रसिक: "आप भी ना भाभी.. कभी कभी ही आपसे करने के लिए बोलता हूँ और आप मना कर रही हो"

शीला: "धीरे बॉल रसिक.. मेहमान अंदर सो रहे है.. जाग जाएंगे तो मुसीबत आन पड़ेगी.. वरना मैंने तुझे कभी मना किया है कभी.. ?? आज नहीं हो पाएगा.. तू निकल जल्दी से"

रसिक उदास होकर शीला के स्तन दबाता रहा.. उसका लंड खड़ा हो गया था.. वो चुपचाप खड़ा रहा पर उसने शीला के स्तन नहीं छोड़े..

शीला: "ठीक है.. तू रुक यहाँ " शीला बेडरूम में जाकर देख आई.. रेणुका गहरी नींद में सो रही थी। वो दबे पाँव वापिस आई

शीला: "देख रसिक.. अंदर डालने का सेटिंग तो नहीं हो पाएगा.. मैं तेरा हिला देती हूँ"

शीला ने रसिक की धोती में हाथ डालकर उसका लंड बाहर निकाल लिया.. लोहे के सरिये जैसा सख्त लंड हाथ में लेकर शीला हिलाने लगी.. रसिक शीला के गाउन को उठाकर उसकी चुत में उंगली घिसने लगा.. एक ही मिनट तक ये खेल चला और रसिक के लंड ने पिचकारी छोड़ दी.. शीला की चुत रसिक की उंगली के स्पर्श से पानी पानी हो गई थी.. शीला ने झुककर रसिक के झड़े हुए लंड को चूम लिया और उसे धोती के अंदर रख दिया.. रसिक चला गया

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शीला दूध की पतीली को गेस पर गरम करने रखकर रेणुका की बगल में लेट गई.. उसने गहरी नींद सो रही रेणुका की नंगी चूचियों को ध्यान से देखा.. उसकी हर सांस के साथ चूचियाँ ऊपर नीचे हो रही थी.. शीला ने उन सुंदर स्तनों को हाथ में लिया.. रसिक के स्पर्श से गीली हो चुकी चुत को सहलाते हुए वो रेणुका के स्तनों को मींजने लगी.. तीन उँगलियाँ अपनी भोस में डालकर रसिक मे मर्दाना लंड को याद करते हुए शीला झड़ गई.. रेणुका अब भी नींद में थी.. ऑर्गैज़म का सुख प्राप्त करते ही शीला की आँख लग गई.. जब वो जागी तब रेणुका बिस्तर पर नहीं थी.. शीला ने सोचा की रेणुका बाथरूम में गई होगी.. तभी उसे याद आया.. अरे बाप रे.. दूध गरम करने रखा था वो तो भूल ही गई.. !!! वो भागकर किचन में आई.. रेणुका वहीं खड़ी थी.. चाय बना रही थी.. चाय को छान रही रेणुका को पीछे से बाहों में भर लिया शीला ने और कहा "गुड मॉर्निंग रेणुका.. !!"

पीछे झुककर शीला के स्तनों को दबाकर रेणुका ने भी गुड मॉर्निंग कहा.. "तुम सो रही थी इसलिए मैंने जगाया नहीं.. किचन में आकर देखा तो दूध उबल रहा था.. थोड़ी ओर देर हो जाती तो सारे दूध का सत्यानाश हो जाता.. "

रेणुका के स्तनों को हाथों से मलते हुए शीला ने कहा "थैंक्स रेणुका.. तुझे नींद तो ठीक से आ गई थी ना ??"

रेणुका: "हाँ हाँ.. एकदम घर जैसी नींद आ गई थी मुझे तो.. " चाय छान कर किटली में भरते हुए कहा

दोनों ने ब्रश किया और चाय पीकर एकदम आराम से बैठ गई.. सिर्फ एक ही दिन में शीला का सारा अकेलापन दूर हो गया.. नहा-धो कर दोनों फ्रेश हो गई और बातें करने लगी.. शीला ने रेणुका को चेतना के बारे में बताया.. रेणुका ने भी दिल खोलकर अपनी सारी बातें शीला को बताई

रेणुका: "शीला.. मेरे पड़ोस में एक आदमी रहता है.. वो मुझे रोज ताड़ता है.. मैं जब तक बाहर कपड़े सुखाती हूँ.. वो घर के बाहर खड़ा मुझे देखतय ही रहता है.. मेरे घर के अंदर जाने के बाद ही वो हटता है.. उसका देखना मुझे अच्छा भी लगता है.. इस उम्र में भी कोई हमें देखता है ये जानकर दिल खुश हो जाता है.. "

शीला: "वो तो है.. वैसे तेरी उम्र इतनी ज्यादा भी नहीं है.. उम्र तो अब मेरी हो चली है.. "

रेणुका: "फिर भी इस उम्र में आप सेक्स में इतनी एक्टिव हो ये ताज्जुब की बात है.. वरना आप के उम्र की औरतें भजन कीर्तन करते हुए मरने के इंतज़ार में बैठी रहती है.. सच में.. आपकी फुर्ती और एनर्जी की दाद देनी पड़ेगी.. "

शीला: "देख रेणुका.. मैं और मेरा पति बड़ी ही स्वस्थ विचारधारा रखते है.. वो कहते है की हमारा शरीर बूढ़ा हो जाएँ वो प्रकृति का नियम है.. पर हम मन से चाहे तब तक जवान रह सकते है.. और जहां तक मन से जवान है तब तक संभोग का पूरा आनंद लेते रहना चाहिए.. "

शीला की बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी रेणुका.. उसे ये तो अंदाजा लग ही गया था की शीला कोई साधारण स्त्री नहीं थी.. उसके अंदर कुछ ऐसी विशेषता थी जो अपने संग जुड़े सब को जवान बनाए रखने के लिए काबिल थी..

रेणुका: "तेरी बात बिल्कुल सही है शीला.. हम मन से कितने भी जवान क्यों न हो.. हमारा पार्टनर भी सहयोग देना चाहिए ना!! मेरी जिंदगी तो मेले के चक्कर जैसी है.. मेरा पति और मैं कभी साथ होते ही नहीं है.. !! क्या करू मैं??"

शीला: "रेणुका, मर्द को तैयार करना ये हमारा बाएं हाथ का खेल है.. तुझे पता है.. १००० साल की विश्वामित्र की तपस्या का भंग रंभा ने कैसे किया था?? पति को उत्तेजित करने के लिए जो भी करना पड़े वो सब करना है.. पूरे इन्टरेस्ट के साथ.. पति थका हुआ हो सकता है.. लेकिन उसका लंड तो तैयार कर ही सकते है ना!! और हमें तो उसका ही काम है.."

रेणुका: "अब क्या बताऊँ तुम्हें.. मैं उनका सहलाती हूँ.. तो उनका लंड खड़ा तो हो जाता है.. पर तब तक तो उनके खर्राटें शुरू हो जाते है.. फिर क्या मतलब सारी मेहनत का!!"

शीला हँसते हुए: "बड़ा आसान है.. समस्या तो तब आती है जब पति जाग रहा हो और लंड खर्राटे लेकर सो रहा हो.. वो भले ही सो गए हो.. तू ऊपर चढ़कर चुदवा ले.. हमें तो लंड से मतलब है ना!! वो हमें सामने से मिले या हम खुद ही ले ले.. क्या फरक पड़ता है!! अपनी आग बुझाने से हमें मतलब है.. बाकी दुनिया जाएँ भाड़ में.. !!"

दोनों बातों में उलझी हुई थी तभी शीला के घर कविता आई..

कविता: "कैसे हो भाभी? आप तो जैसे मुझे भूल ही गए.. कहीं मेरी सास ने तो मना नहीं किया है ना आपको?"

शीला: "ओहह कविता.. बैठ ना.. " शीला ने रेणुका से परिचय करवाया कविता का.. "महिला मण्डल से खींचकर लाई हूँ इसे.. अपने मण्डल में शामिल करने को.. अच्छा किया ना मैंने!!"

कविता: "हाई रेणुका.. कैसी हो आप?"

कविता की जवान छाती.. और स्टार्च की हुई चादर जैसी कडक कोरी जवानी को रेणुका अहोभाव से देखती रही.. कविता भी रेणुका के भरे हुए जोबन को ललचाई नजर से देखते हुए सोफ़े पर बैठ गई..

शीला: "कैसे आना हुआ कविता??"

कविता: "कुछ नहीं भाभी.. घर का काम निपटा लिया था.. बैठे बैठे बोर हो रही थी.. सोचा आप से मिल लूँ.. आप तो मुझे भूल गई पर मैं आपको भूलने थोड़े ही दूँगी" वह खिलखिलाकर हंसने लगी..

रेणुका इस प्यारी सी कोमल नाजुक कन्या को देखती रही.. जब कविता झुकती थी तब उसके टॉप में से छोटे छोटे दो स्तनों के बीच की सुंदर लकीर रेणुका के मन को भा गई.. लकीर कोई भी हो.. दो स्तनों के बीच.. कमर की चर्बी के बीच या फिर दो पैरों के बीच.. हमेशा आकर्षित करती है.. स्त्री का सौन्दर्य ढंका हुआ रखकर ज्यादा आनंद देता है.. रेणुका तो कविता के बात करने के लहजे से खुश हो गई..मंदिर की घंटी जैसी सुमधुर आवाज थी कविता की.. रेणुका कविता से अब तक खुलकर बात नहीं कर रही थी.. बस उसका निरीक्षण कर रही थी.. उसे भला ये कहाँ मालूम था की शीला ने इस कविता को भी अपनी जाल में लपेट रखा है!! वैसे कविता और शीला तो खुलकर बातें कर रही थी पर रेणुका की मौजूदगी से कविता भी थोड़ी सी झिझक महसूस कर रही थी.. और वो स्वाभाविक था क्योंकी वह दोनों पहली बार मिल रही थी..

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पिछली रात शीला और रेणुका ने मस्त लेस्बियन सेक्स का आनंद लिया हुआ था इसलिए दोनों शांत बैठी थी.. और दो दिन पहले कविता ने भी बड़े मजे किए थे.. कविता और शीला एक डाल के पंछी थे.. और उसी डाल पर अब रेणुका नाम का पंछी बैठने जा रहा था..

कविता ने शीला से कहा: "मैं आपसे एक बात करने आई हूँ"

शीला: "हाँ बोल ना.. क्या बात है?"

कविता: "भाभी.. पीयूष जहां नौकरी करता है वहाँ से उसे निकाल दिया गया है.. वो बहोत उदास है.. सुबह से कुछ खाया भी नहीं है उसने.. आप पीयूष को कुछ समझाइए ना प्लीज.. मम्मीजी ने भी कहलवाया है.. चिंता हो रही है उसे इस तरह देख कर.. " उसके खूबसूरत चेहरे पर चिंता की रेखाएं स्पष्ट नजर आ रही थी

शीला: "टेंशन क्यों ले रही है पगली.. !! एक नौकरी गई तो दूसरी मिल जाएगी.. चिंता मत कर.. सब ठीक हो जाएगा.. तेरा पीयूष लाखों में एक है.. ऐसे होनहार लड़के को दूसरी नौकरी मिलने में देर नहीं लगेगी"

रेणुका इन दोनों की बातों के बीच में टोकना नहीं चाहती थी इसलिए चुप रही.. पर उसके मन में स्त्री सहज सहानुभूति जागृत हुई कविता के लिए

कविता: "मैं भी वहीं बोल रही हूँ पीयूष को पर मानता ही नहीं है.. बिना खाएं पियें कमरे में पड़ा हुआ है"

शीला: "अभी कहाँ है वोह?"

कविता: "कहीं बाहर निकला अभी.. इसीलिए मैं आपके पास आई.. भाभी, आप उसे फोन कीजिए ना!!"

शीला: "तू चिंता म यात कर.. जहां भी गया होगा वापिस आ जाएगा.. रेणुका, जरा मुझे वहाँ पड़ा कॉर्डलेस फोन तो देना!!"
कविता से नंबर पूछकर शीला ने फोन लगाया

कविता: भाभी आप फोन स्पीकर पर रखिए ताकि मैं भी सुन सकूँ" शीला ने स्पीकर ओन कर दिया

दस बारह रिंग के बाद पीयूष ने फोन उठाया

"हैलो कौन?"

"मैं शीला भाभी.. आपकी पड़ोसन बोल रही हूँ पीयूष जी.. आप कहाँ हो?" शीला इस तरह औपचारिकता से इसलिए बात कर रही थी ताकि पीयूष को अंदाजा लगे की उसके साथ कोई ओर भी है जो सुन रहा है

पीयूष: "अरे शीला भाभी आप? कैसी है? मैं यहीं बाजार में आया हूँ"

शीला: "तुम अभी यहाँ आ सकते हो मेरे घर?"

पीयूष: "पर भाभी.. अभी दिन के समय.. कहीं मम्मी या कविता ने देख लिया तो? ऐसा करता हूँ.. रात को जब कविता सो जाएँ उसके बाद चला आऊँगा.. ठीक है?"

कविता और रेणुका पीयूष की बात सुनकर चौंक गई.. शीला के भी पसीने छूटने लगे

शीला: "अरे पर तुम मेरी बात तो सुन लो पूरी"

शीला की बात को आधे में ही काटकर पीयूष ने कहा "कोई बात नहीं भाभी.. आपने कहा तो मैं अभी आ जाता हूँ आपके घर.. आप तैयार रहना.. भाभी मैं एक बार आपके साथ तसल्ली से करना चाहता हूँ.. पर लगता है ऐसा आराम से करने का मौका मिले ना मिले.. क्या करें.. अब पड़ोस में ही रहते है तो ये सारी तकलीफ तो उठानी ही पड़ेगी. मैं आ रहा हूँ.. आप फोन चालू रखिए"

कविता और रेणुका का चेहरा देखने लायक था.. शीला को इतनी शर्म आई की बात ही मत पूछो.. वो पीयूष का मन शांत करने के लिए बात करने बुला रही थी और वो बेवकूफ ये समझा की शीला उसे चोदने के लिए बुला रही है..

शीला: "तुम मेरी बात सुनो ठीक से.. बिना मेरी बात सुने कुछ भी मत बोलो.. कविता यहाँ मेरे बगल में बैठी है.. तुम यहाँ आओ तुम्हारी नौकरी के बारे में बात करनी है"

पीयूष: "कहीं उसने हमारी बात सुन तो नहीं ली भाभी? अरे हाँ.. मैं तो भूल ही गया.. आप ने लेंडलाइन से फोन किया है.. उसमें कहाँ स्पीकर होता है!! और सुन भी लिया होगा तो क्या हर्ज है.. मैंने भी उसे मूवी के दौरान उसके बगल में बैठे अनजान लड़के के साथ मस्ती करते हुए देखा था.. पर मैं जानबूझकर कुछ नहीं बोला था" पीयूष ने सारे भंडे एक साथ फोड़ दिए आज तो.. कविता को ये सुनकर चक्कर सा आने लगा

शीला: "किसी ने भी कुछ नहीं सुना.. तुम यहाँ आ जाओ बस.. मैं फोन काट रहीं हूँ" शीला ने फोन रख दिया.. रेणुका उसके सामने विचित्र ढंग से देख रही थी.. पीयूष की बात सुनकर उसे इतना तो पता चल ही गया की शीला और पीयूष के बीच कोई खिचड़ी जरूर पक रही थी

थोड़ी देर में पीयूष शीला के घर आ पहुंचा.. वहाँ कविता और रेणुका को देखकर वो सकपका सा गया.. उसने मन ही मन माथा पीट लिया.. क्या सोचकर आया था और क्या निकला!! कहीं कविता ने उनकी बातें सुन ली होगी तो? सुनी हो तो भी क्या?? उसे पता ही है की मुझे शीला भाभी कितने पसंद है !!

शीला: "पीयूष, मैंने सुना की तुम्हारी नौकरी छूट गई है.. सुनकर दुख हुआ पर तुम चिंता मत करना.. दूसरी मिल जाएगी.. कहीं और बात की है तुमने नौकरी के लिए?"

पीयूष: "चल तो रही है.. उसी सिलसिले में बाहर था अभी.. "

रेणुका: "पीयूष, तुम किस तरह का कामकाज जानते हो?"

पीयूष: "मैं कंप्यूटर एकाउंटिंग का काम जानता हूँ" पीयूष इस अनजान औरत को देखता रहा

रेणुका: "मेरे पति का बड़ा बिजनेस है और उन्हे इस तरह के आदमी की जरूरत भी है.. फिलहाल अगर तुम्हारे पास को नौकरी न हो तो मैं उनसे तुम्हारी बात कर सकती हूँ.. अगर बात जम जाएँ तो प्रॉब्लेम सॉल्व हो जाएगा.. "

कविता: "पीयूष, ये रेणुकाजी है.. शीला भाभी की सहेली.. रेणुका जी.. ये मेरे पति है पीयूष" कविता ने दोनों का परिचय करवाया

दोनों ने एक दूसरे का नमस्ते से अभिवादन किया

शीला: "रेणुका तू अपने पति से इस बारे में बात ही कर ले अभी"

रेणुका ने अपने ब्लाउस से मोबाइल निकाला.. निकालते वक्त उसके एक स्तन का उभार दिख गया.. पीयूष ने सूचक नजर से शीला को देखा.. शीला ने उसे आँख मारी.. पीयूष मुस्कुराकर नीचे देखने लगा

रेणुका: "हैलो.. कहाँ हो आप?"

सामने रेणुका का पति राजेश था

राजेश: "मैं अभी जरूरी मीटिंग में हूँ.. जल्दी बता क्या काम था?" राजेश ने थोड़े से क्रोध के साथ कहा

रेणुका ने उसे पीयूष के बारे में बताया

राजेश: "ठीक है.. तुम उन्हे कल या परसों अपनी ऑफिस पर दोपहर के समय भेज देना.. और कुछ?"

रेणुका: "और तो कुछ नहीं.. सब ठीक है.. पर तुम जल्दी वापिस आ जाओ.. मैं अकेले बोर हो रही थी तो २ दिन के लिए अपनी सहेली शीला के घर रहने आई हूँ.. तुम आज शाम को तो लौट आओगे ना?"

राजेश: "सोच तो रहा हूँ की लौट आउ.. आज रात को शायद निकलूँगा तो आते आते देर हो जाएगी.. तू आराम से अपनी सहेली के घर रुक.. और मजे कर.. और हाँ.. अपनी सहेली के पति के साथ फ़्लर्ट करना शुरू मत कर देना.. तेरी आदत मैं जानता हूँ.. हा हा हा हा.. !!"

रेणुका ने कृत्रिम क्रोध के साथ कहा "क्या कुछ भी बोल रहे हो!!! मैंने कब किसी के साथ फ़्लर्ट किया है कभी !! तुम जैसा मेरी मम्मी के साथ फ़्लर्ट करते हो वैसा तो मैंने कभी किसी के साथ नहीं किया.. छोड़ो वो सब.. और जल्दी घर आ जाओ.. बात फ्लर्टिंग से आगे बढ़ जाए उसके पहले"

रेणुका ने फोन रख दिया और कविता के पास बैठकर कहा "मेरी बात हो गई है.. पीयूष तुम परसों इस पते पर पहुँच जाना और मेरे पति राजेश से मिल लेना.. सब ठीक हो जाएगा.. चिंता करने की कोई बात नहीं है"

कविता: "सच !! आप कितनी अच्छी हो रेणुका जी... पीयूष चल अब.. खाना कहा ले.. तेरे भूखे रहने से कुछ नहीं होने वाला"

शीला: "कविता, तू और पीयूष आज यहीं हमारे साथ खाना खाने आओ.. मैं बना दूँगी.. मैं तेरी सास को बता देती हूँ.. तब तक तू किचन में जाके सब्जी काट.. फिर हम साथ में बाकी काम निपटाएंगे.. तब तक मैं और रेणुका तेरी सास को बोलकर आते है."

रेणुका और शीला अनुमौसी से मिलने गए.. पीयूष और कविता अब अकेले थे.. कविता से पीयूष का दुखी चेहरा देखा नहीं जा रहा था.. उसने पीयूष को अपनी बाहों में कसकर पकड़ लिया.. वो किसी भी तरह पीयूष को मूड में लाना चाहती थी.. अपने सुंदर होंठों से पीयूष को चूमते हुए उसने उसका लंड पकड़ लिया

पीयूष: "क्या कर रही है ये तू?? अभी वो रेणुका भाभी और शीला भाभी आती होगी"

कविता ने शरारत करते हुए कहा "ओहो.. रेणुका भाभी.. वो तेरी भाभी कब से बन गई?? अभी वो ब्लाउस से मोबाइल निकाल रही थी तब तू कैसे उनकी छाती को देख रहा था !!"

पीयूष: "वो.. वो.. वो तो मैं वहाँ नहीं देख रहा था" पीयूष की चोरी पकड़ी गई

कविता: "तो और किसकी छातियाँ देख रहे थे ? शीला भाभी की ? अरे हाँ.. मैं तो भूल ही गई.. शीला भाभी के होते हुए तू किसी और की तरफ कभी देखता ही कहाँ है !!"

पीयूष: "तू मेरी बात का गलत मतलब निकाल रही है.. " पीयूष आगे कुछ बोलत उससे पहले कविता ने अपने स्तनों को पीयूष की छाती से रगड़ दिया.. पीयूष का लंड सख्त हो गया..

कविता: "सच सच बता.. तुझे ये रेणुका भाभी कैसी लगी? मेरा तो ठीक है.. मैं तो काम्पिटिशन में ही नहीं हूँ.. पर शीला भाभी और रेणुका भाभी में से तुझे कौन ज्यादा पसंद आया?"

पीयूष: "वो तो बिना देखे कैसे पता लगेगा मुझे !!"

कविता: "साले हलकट.. अपनी बीवी के सामने दूसरी के बबले देखने की बात कर रहा है !! तेरी तो मैं.. " कविता हँसते हुए पीयूष का हाथ मरोड़ने लगी.. पीयूष अपना हाथ छुड़ाकर घर के बाहर निकल गया और दीवार फांदकर अपने घर में घुसा.. कविता शीला के किचन में खाना बनाने पहुंची

पीयूष जब अपने घर पहुंचा तब उसे कुछ विचित्र आवाज़ें सुनाई दी.. अनुमौसी का कमरा बंद था.. पर जिस प्रकार की आवाज़ें आ रही थी वो सुनकर पीयूष चोंक गया

पीयूष घर के बाहर बरामदे से.. अनुमौसी के कमरे की पीछे की तरफ जा पहुंचा.. खिड़की बंद थी पर अंदर की बातें यहाँ से सुनाई पड़ रही थी.. वो चुपके से उनकी बातें सुनने लगा.. जैसे जैसे वो सुनता गया उसका आश्चर्य और बढ़ता गया

अनुमौसी: "शीला हरामी.. उस दिन पिक्चर देख के आने के बाद तू मेरे पीयूष के साथ क्या कर रही थी ? मैंने खिड़की से सबकुछ देखा था..

शीला: "क्या मौसी कुछ भी बोल रही हो !! पीयूष तो मेरे देवर समान है.. आप सोच रही हो ऐसा कुछ भी नहीं था.. "

अनुमौसी: "तू मुझे मत सिख.. समझी ना.. !! ये बाल मैंने धूप में सफेद नहीं किए है.. सब जानती हूँ मैं"

रेणुका: "मौसी अभी पीयूष शीला के घर आया तब.. कैसे कहूँ मैं.. शर्म आती है.. शीला की छातियों को ऐसे घूर रहा था वो !! दाल में कुछ काला तो जरूर है "

अनुमौसी: "शीला, तू मेरे बेटे के संसार में आग मत लगाना.. तेरे रूप का जलवा ही कुछ ऐसा है.. उस दिन जब तू मेरे घर खाना खाकर गई उसके बाद मेरे वो.. उनका ऐसा खड़ा हो गया था की पूछ ही मत.. सच बता.. कहीं मेरे उनके साथ भी तूने कुछ किया तो नहीं था ना !!"

शीला: "मौसी, कब से आप कुछ भी बके जा रही हो.. मैं क्या दोनों बाप बेटे के साथ फ्लर्ट करूंगी?? पीयूष तो जवान है.. पर चिमनलाल तो मेरे बाप के उम्र के है"

अनुमौसी: "शीला, तू हकीकत में क्या चीज है ये मेरे मुंह से मत बुलवा.. मुझे भी भगवान ने आँखें दी है.. सब दिखता है मुझे.. समझी.. रोज सुबह उस रसिक से दूध लेते समय क्या क्या करती है.. वो सब मालूम है मुझे.. साला वो रसिक तेरी जाल में कैसे फंस गया ? मेरे सामने तो कभी देखता तक नहीं है"

शीला: "तो उसे दिखाकर आपको करना क्या है.. मौसी आपकी उमर हो चली है .. शांति से बैठकर भजन कीर्तन कीजिए"

अनुमौसी: "सच कहूँ शीला.. वैसे तो मेरा मन ही उठ गया था इन सब बातों से.. पर तेरे और रसिक के बीच उस सुबह जो कुछ भी देखा उसके बाद मेरे अंदर नए अरमान जाग गए.. वरना मेरे पति का तो १० सालों से खड़ा भी नहीं होता.. तूने ही मेरे अंदर ये सारी हवस जागा दी ही.. आज कल कविता भी बहोत खुश नजर आती है.. सच सच बताना.. कहीं तूने उसे भी रसिक या जीवा के साथ तो नहीं मिलवा दिया ना !! तेरा कोई भरोसा नहीं है.. तू कुछ भी कर सकती है"

सुनकर पीयूष का दिमाग चकराने लगा.. माय गॉड !! मेरी कविता किसी और के साथ !!!! नहीं नहीं.. ऐसा नहीं ओ सकता.. वरना इस बात का मुझे जरूर पता चलता..

अनुमौसी: "देख शीला.. अब तुझसे क्या छुपाना !! तूने मेरे जीवन में नए उमंग जागा दिए है.. मेरे पति ने कभी अपने शरीर का ध्यान नहीं रखा.. पहले उनमें कितना जोश और ताकत थी.. मुझे याद है.. शादी के दूसरे ही साल जब हम महाबलेश्वर गए थे.. !!" मौसी ने दीर्घ सांस छोड़कर बात वहीं पर अटका दी.. रेणुका की मौजूदगी के कारण वह थोड़ी झिझक रही थी.. रेणुका समझदार थी.. उसे महसूस हुआ की उसकी वजह से मौसी अपना दिल हल्का नहीं कर पा रही है.. थोड़ी देर सोचने के बाद उन्होंने तय किया की वो शीला के घर जाकर कविता को खाना बनाने में मदद करेगी..

रेणुका: "आप दोनों बातें कीजिए.. मैं कविता की मदद करने जा रही हूँ.. जब खाना तैयार हो जाएगा तब बुला लूँगी.. " कमरे का दरवाजा खोलकर वो बाहर निकली तब उसे खयाल आया.. शीला के घर तो पीयूष और कविता अकेले होंगे और न जाने क्या कर रहे होंगे.. !! क्यों बेकार में उनके कबाब में हड्डी बनना.. !! ये सोचकर वो शीला के घर नहीं गई.. अब क्या करें?? सोचा यहाँ अनुमौसी के कंपाउंड और बरामदे में चल लिया जाए.. थोड़ी सी वॉक हो जाएगी.. घर का चक्कर लगाते हुए उसने पीछे से पीयूष को खिड़की पर कान लगाकर सुनते हुए देखा.. अरे बाप रे!! ये यहाँ क्या कर रहा है!! रेणुका के पसीने छूट गए.. कहीं वो हम सब की बातें तो छुपकर नहीं सुन रहा !! मर गए.. !! पीयूष ने अब तक रेणुका को नहीं देखा था क्योंकी वो उसकी पीठ के तरफ थी..

अंदर चल रही बातें सुनकर पीयूष गरम हो गया था और उत्तेजना के मारे अपना लंड सहला रहा था.. ये देखकर रेणुका की चुत में झटका लगा.. दोपहर का समय था और रविवार का दिन था.. सब अपने घरों में आराम करते हुए छुट्टी का लुत्फ उठा रहे थे.. इसलिए आजू बाजू कोई भी नहीं था.. कंपाउंड की दीवार भी काफी ऊंची थी इसलिए बाहर गुजर रहे व्यक्ति को अंदर का द्रश्य दिखाई नहीं पड़ता था.. रेणुका को अब ये जानने में दिलचस्पी थी की पीयूष आगे क्या करता है !! इस पर से अंदाजा लग जाएगा की अंदर कैसी बातें हो रही है.. और पता नहीं भी चलेगा तो आखिर शीला तो बाद में बता ही देगी .. !!

पीयूष की हरकतें देखकर रेणुका को इतना पता तो चल ही गया की अंदर कुछ जबरदस्त गरम बातें हो रही थी.. रेणुका वापिस घर के अंदर आ गई.. और जिस कमरे में शीला और अनुमौसी बैठे थे उसके दरवाजे पर कान लगाकर सुनने लगी.. रेणुका को अनुमौसी की सिसकियाँ सुनाई पड़ रही थी

अनुमौसी: "ओहह शीला.. ये तूने क्या कर दिया.. आह्ह.. ऐसा मज़ा तो पहले कभी नहीं आया मुझे.. आहह आहह शीला.. जल्दी कर.. कहीं वो रेणुका वापिस आ गई तो मेरा अधूरा रह जाएगा.. ओह्ह मर गई.. आईईई.. !!"

रेणुका समझ गई की अंदर शीला और मौसी के बीच जबरदस्त लेस्बियन सेक्स चल रहा है.. अब वो वापिस दौड़कर पीयूष जहां था वहाँ चली गई.. वो देखना चाहती थी की पीयूष अब क्या कर रहा है!! पीयूष का लंड अभी अभी वीर्य की पिचकारी मारकर ठुमक रहा था.. नीचे टाइल्स पर उसके वीर्य की बूंदें पड़ी हुई थी.. पीयूष की शर्ट के दो बटन खुले थे.. और उसके जीन्स की चैन भी.. और दीवार का सहारा लेकर.. आँखें बंद कर वो हांफ रहा था.. उसका पतला पर सख्त लंड झटके खाते हुए हिल रहा था.. दोपहर की धूप में उसका लाल सुपाड़ा और वीर्य की बूंदें चमक रही थी..

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पीयूष को इस अवस्था में देखकर रेणुका अपने आप को रोक न पाई और पीयूष के सामने आकर खड़ी हो गई.. बंद आँखों के आगे अंधेरा महसूस होते ही पीयूष ने आँखें खोल दी.. सामने खड़ी रेणुका उसे देखकर मुस्कुरा रही थी.. पीयूष पसीने से तरबतर हो गया था.. रेणुका ने पल्लू से उसके चेहरे के पसीने को पोंछ लिया.. पल्लू हटाते ही रेणुका के गुलाबी ब्लाउस के अंदर छुपे टाइट सुंदर स्तनों को देखकर.. अभी अभी झड़ा हुआ पीयूष का लंड फिरसे अंगड़ाई लेकर जाग गया.. रेणुका ने उसका लंड अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया.. और नीचे झुक के जितना हो सकता था उतना अंदर अपने मुंह में ले लिया..

स्तब्ध होकर पीयूष.. ऐसा महसूस कर रहा था जैसे दोपहर में सपना देख रहा हो.. इस अवर्णनीय पल को पूरे आनंद के साथ महसूस कर रहा था.. रेणुका ने पीयूष का हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रख दिया.. झुककर लंड चूस रही रेणुका के पल्लू के आरपार वी-नेक ब्लाउस से उभर कर बाहर दिख रही.. सफेद दूध जैसी दो चूचियों के बीच की गहरी लकीर देखकर पीयूष पागल सा हो गया.. उसने अपने हाथों से दोनों स्तन दबाए.. सिर्फ ४५ सेकंड में.. बिना लंड को ज्यादा अंदर बाहर किए.. केवल रेणुका के मुंह की गर्मी और उसकी नटखट कारीगरी के कारण.. पीयूष के लंड ने उलटी कर दी.. मुंह में वीर्य छोड़ते वक्त उसने स्तनों को इतने जोर से दबाया की रेणुका को दर्द होने लगा..

पीयूष का लंड जब रेणुका के मुंह से बाहर निकला तब पतला तीन इंच का ही रह गया था.. एक मिनट पहले फटने को तैयार एटमबॉम्ब को रेणुका ने डिफ्यूज़ कर दिया था.. अपने पल्लू से पीयूष के लंड को पोंछकर साफ करते हुए रेणुका ने उसे वापस पीयूष की पतलून के अंदर रख दिया.. और फिर पेंट की चैन बंद कर दी..

रेणुका की इस अदा पर पीयूष फिदा हो गया.. इतना ही नहीं.. पल्लू के जिस हिस्से से उसने लंड को पोंछा था उस हिस्से को सूंघकर रेणुका ने अपना चेहरा पोंछा.. पीयूष तो कायल हो गया रेणुका पर.. !!

उसने रेणुका को अपनी बाहों में लेकर एक जबरदस्त किस कर दी.. दोनों आपस में काफी देर तक एक दूसरे के होंठों को चूसते रहे.. संतुष्ट होने के बाद पीयूष ने कहा "भाभी.. मुझे आपके स्तनों को चूसना है.. "

"अभी नहीं पीयूष.. पता है ना तेरी मम्मी और शीला अंदर बैठे है? फिर कभी.. " कहते हुए रेणुका जाने लगी.. पर पीयूष ने उसका हाथ पकड़ लिया

"प्लीज भाभी.. मेरा बहुत मन कर रहा है.. पता नहीं फिर कभी मौका मिले ना मिले... सिर्फ एक बार चूसने दो मुझे"

"जिद मत कर पीयूष.. मैं तुझे पक्का चूसने का मौका दूँगी.. पर अभी नहीं"

"नहीं भाभी.. अभी करने दो ना प्लीज.. जल्दी से एक बाजू का बॉल बाहर निकाल लो.. मैं दो मिनट से ज्यादा वक्त नहीं लूँगा.. बहुत मन कर रहा है मेरा.. जब शीला भाभी के घर आपने ब्लाउस से मोबाइल निकाला था तब से मैं आपके बबलों का दीवाना हो गया हूँ "

रेणुका सोचकर बोली "अभी मुमकिन नहीं है पीयूष.. मैं घर जाने से पहले कुछ सेटिंग जरूर करूंगी.. पर अभी नहीं.. बहोत रिस्क है तू समझ.. " कहते हुए रेणुका ने अपना पल्लू ठीक किया और जाने लगी.. जाते जाते रेणुका ने पीयूष को गाल को प्यार से सहलाया और पीयूष ने रेणुका के चूतड़ को थपथपाया..

रेणुका के जाने के बाद पीयूष ने अपने कपड़े ठीक किए और शीला के घर गया जहां कविता किचन में बीजी थी.. पीयूष ने सोफ़े पर बैठकर टीवी ओन किया.. पर किसी भी चेनल पर कुछ देखने लायक नहीं था.. टीवी बंद कर वो किचन में आया और कविता से शीला के बारे में अलग अलग तरीकों से पूछताछ करने लगा.. कविता भी शीला की पक्की शिष्या थी.. उसने पीयूष को कुछ भी खास नहीं बताया.. पर उसे संदेह जरूर हुआ की अचानक पीयूष शीला के बारे में ये सब क्यों पूछ रहा था !! आज से पहले तो उसे कभी ऐसी जिज्ञासा नहीं हुई थी.. कहीं शीला भाभी ने सब कुछ बता तो नहीं दिया पीयूष को !! नहीं नहीं.. शीला भाभी ऐसा कभी नहीं कर सकती.. पर फिर भी कुछ बोल नहीं सकते.. कविता के नार्को टेस्ट में पीयूष को कुछ खास पता नहीं चला

तभी अनुमौसी, शीला और रेणुका.. तीनों घर पहुंचे.. पीयूष अपनी माँ का बहुत सम्मान करता था पर आज उसे उनका एक नया ही रूप देखने को मिला.. या यूं कहिए की सुनने को मिला.. आधे घंटे पहले.. जिस तरह उसकी माँ सिसक रही थी.. वह अब भी उसके कानों में गूंज रही थी.. पीयूष ने इंटरनेट पर लेस्बियन सेक्स के अनगिनत फ़ोटो और विडिओ देखे हुए थे.. पर वो सोचता था की ऐसा सब पश्चिमी देशों में होता होगा.. लेकिन आज उसने जो सुना उसके बाद पीयूष की सोच ही बदल गई..

मेरी मम्मी लेस्बियन कैसे हो सकती है!! क्या पापा के साथ उनकी पटती नहीं होगी ? अगर ऐसा होता तो मम्मी किसी अन्य पुरुष के साथ भी सेक्स कर सकती थी.. अगर मम्मी पापा से संतुष्ट नहीं थी तो शीला भाभी के पास जाने का क्या मतलब? मदन भाई की गैरमौजूदगी में भाभी को चुदाई के लिए साथी की जरूरत हो सकती है.. तो फिर खिड़की से शीला भाभी की सिसकियाँ क्यों नहीं सुनाई दी ? आवाज तो सिर्फ मम्मी की ही आ रही थी.. तो क्या शीला भाभी मम्मी की चुत चाट रही होगी? छी छी.. मैं भी क्यों ऐसा गलत सोच रहा हूँ मम्मी के बारे में !!

पीयूष अनुमौसी से आँख तक नहीं मिला पाया.. वैसे देखा जाएँ तो इस घटना में वो प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी तरह से जुड़ा नहीं था.. फिर भी उसे अफसोस हो रहा था की उसने अपनी ही माँ की जातीय ज़िंदगी में दाखल दी.. वह अपनी मर्जी की मालिक थी.. और अपनी इच्छा अनुसार कुछ भी कर सकती थी..

पीयूष को एक ही चिंता थी.. अभी तो मामला शीला भाभी तक सीमित था इसलिए कोई समस्या नहीं थी.. कल जब मदन भाई लौट आएंगे और शीला भाभी उनके साथ व्यस्त हो जाएगी तब मम्मी का क्या होगा? कहीं अपनी आग बुझाने के चक्कर में वो किसी लोफ़र लफंगे मर्द के चंगुल में फंस गई तो !! पर मैं इस बारे में और कर भी क्या सकता हूँ !! पीयूष बड़ी ही असमंजस में फंस गया था

पीयूष के मन में अब भी संवाद चल रहा था .. तू क्यों इसमें कुछ नहीं कर सकता..? और तू नहीं करेगा तो और कौन ध्यान रखेगा? किसी को कानों कान खबर हुई तो पूरे खानदान की इज्जत की माँ चुद जाएगी.. नहीं नहीं.. मम्मी का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा.. मुझे लगता है की मम्मी पहले ऐसी नहीं थी.. शीला भाभी के संग ज्यादा घुलमिल जाने के बाद ही ज्यादा एक्टिव हो गई थी.. मम्मी तो ठीक पर कविता भी आज कल शीला भाभी के साथ ज्यादा संपर्क में रहती है.. कहीं कविता भी शीला भाभी के साथ लेस्बियन....!!!! माय गॉड.. शीला भाभी इतनी खूबसूरत और एक्टिव है.. मदन भाई के बगैर.. दो सालों से बिना सेक्स के वो कैसे रह पाती होगी... !! जरूर उन्हों ने कोई न कोई लंड का जुगाड़ किया ही होगा अपनी प्यास बुझाने के लिए.. कहीं कविता भी भाभी के संग किसी और मर्द के साथ तो नहीं चुदवा रही होगी.. नहीं नहीं.. मेरी कविता ऐसा नहीं कर सकती.. पर कहीं कविता और मेरी मम्मी ही एक दूसरे के साथ तो...... !!!!!

अनुमौसी: "क्या सोच रहा है पीयूष? नौकरी गई तो गई.. इसमें इतना क्या चिंता करना.. !! और वैसे भी.. रेणुका के पति से तेरी बात हो गई है ना!! तू चिंता मत किया कर बेटा" पीयूष के सर को सहलाते हुए मौसी ने कहा "चल अब खाना खा ले" पीयूष का हाथ पकड़कर उसे डाइनिंग टेबल पर बैठा दिया मौसी ने

पीयूष मशीन की तरह बैठ गया और बिना कुछ बोले खाना खाने लगा.. थाली में सब्जी परोसते वक्त अनुमौसी का पल्लू नीचे गिर गया.. पीयूष ने अपनी नजर फेर ली.. छी छी.. ऐसे गंदे विचार मुझे क्यों आ रहे है आज!! वह खाना खाने लगा और फिर अपने घर चला गया.. कल रेणुका भाभी के पति राजेश से मिलने जाना है.. पीयूष घर पहुंचकर अपने सारे कागज ठीक करने लगा..

पीयूष के जाने के बाद कविता, शीला और मौसी टेबल पर बैठकर खाने लगे। रेणुका ने सबसे पहले खाना खतम कर लिया

शीला: "तूने कुछ खाया क्यों नहीं रेणुका? इतनी हड़बड़ी में खतम किया.. आराम से खाना था.. "

रेणुका: "मुझे जितनी भूख थी उतना खा लिया है मैंने.. तू चिंता मत कर" कहते हुए रेणुका उठकर जाने लगी

अनुमौसी: "कहाँ जा रही है तू रेणुका?"

रेणुका: "आप शांति से खाना खाइए.. मैं अभी आती हूँ" कहते हुए रेणुका भागकर अनुमौसी के घर पहुंची.. और पीयूष के कमरे में गई.. पीयूष कागज बिछाकर फ़ाइल कर रहा था.. रेणुका ने कमरे का दरवाजा बंद किया और ब्लाउस के दो हुक खोलकर अपना बायाँ स्तन बाहर निकालकर बोली


"जल्दी कर पीयूष.. वो तीनों खाना खा रहे है इसलिए बड़ी मुश्किल से बचकर आई हूँ.. मैंने तुझे वादा किया था इसलिए पूरा कर रही हूँ.. जल्दी जल्दी कर.. उनके आने से पहले मुझे भागना पड़ेगा.. "
बहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजना से भरपूर कामोत्तेजक अपडेट है भाई मजा आ गया
ये शीला के साथ रेणुका, कविता और अनुमौसी की चौकडी तयार हो गई है
लगता है पियुष ईन सबका बकरा बनने वाला है
खैर देखते हैं आगे क्या होता है
 

Ek number

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रोज की तरह कविता जल्दी जाग गई.. सो रहे पीयूष को अपने शरीर से धकेलते ही "पुचच.. " की आवाज के साथ उसका लंड चुत से बाहर निकला.. पीयूष को सहलाकर वो खड़ी हुई और गाउन पहनकर दूध लेने अपने कंपाउंड में आई..

कविता ने शीला के घर की तरफ नजर डाली.. अंदर लाइट जल रही थी.. ये देख कविता सोचने लगी.. लगता है अभी अभी जागी है शीला भाभी.. पता नहीं खाली बिस्तर के साथ कैसे रात बिताती होंगी बेचारी.. !! दो साल से अकेली रहती है.. रसिक अभी आया नहीं था.. कविता ने सोचा की तब तक नहाने के लिए पानी गरम करने गैस पर रख दूँ


गैस पर गरम पानी का पतीला चढ़ाकर वो अपने मोबाइल पर मेसेज चेक कर रही थी तभी रसिक की साइकल की घंटी सुनाई दी.. अपना मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म पर रखकर उसने पतीली उठाई और दूध लेने के लिए बाहर आई..

अंधेरे में बाहर जो द्रश्य उसे दिखा उससे कविता के पैरों तले से जमीन खिसक गई.. रसिक ने शीला भाभी को जकड़कर रखा था.. वो चिल्लाने ही वाली थी की तब उसे ये एहसास हुआ की रसिक जबरदस्ती नहीं कर रहा था.. बल्कि शीला भाभी अपनी मर्जी से उससे लिपटी हुई थी.. कविता को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.. शीला भाभी जैसी सुशील संस्कारी स्त्री.. दूधवाले के साथ?? छी छी छी.. घिन आ गई कविता को शीला भाभी पर

शीला का ये रोज का खेल था.. रसिक जब भी दूध देने आए तब अंधेरे का फायदा उठाकर मजे कर लेती थी.. शीला के बोझिल जीवन में इससे रस बना रहता था.. और रसिक को भी मज़ा आता था.. शीला और रसिक किसी ने भी कविता को देखा नहीं था.. दोनों अपनी ही मस्ती में मस्त थे.. थोड़ी ही देर के बाद रसिक ने शीला को दूध दिया.. और उसके साथ जो भी दे सकता था वो देकर अनुमौसी के दरवाजे की तरफ आया.. हाथ में पतीली लिए कविता तैयार खड़ी थी..

"कैसी हो भाभी? आज आप दूध लेने आई? मौसी सो रही है क्या?"

कविता ने नफरत भरे सुर के साथ कहा "तुम अपने काम से काम रखो.. मैं दूध लेने आउ या मम्मी आए.. तुम्हें क्या फरक पड़ता है? तुम बस दूध दो और चलते बनो"

"इतना गुस्सा क्यों कर रही हो भाभी.. मैंने तो बस ऐसे ही पूछ लिया.. "

"क्यों? दूध देने के अलावा मौसी का और कुछ भी काम था तुम्हें?"

सुनकर रसिक चोंक गया "अरे भाभी.. मुझे बस दूध का हिसाब लेना था उनसे.. और कोई काम नहीं था.. " दूध देकर रसिक चला गया।

कविता का शक और भी दृढ़ होने लगा.. कहीं मेरी सास भी शीला भाभी के साथ इन गुलछर्रों में शामिल तो नहीं हो गई !! कुछ कहा नहीं जा सकता

दोपहर को काम निपटाकर कविता शीला भाभी के घर आई.. वो जानना चाहती थी की भाभी उससे और क्या क्या छुपा रही थी

बातों ही बातों में उसने पूछ लिया "भाभी.. आपने मदन भाई के अलावा और किसी के साथ सेक्स किया है कभी??"

शीला चोंक गई.. अचानक कविता ने आज ये सवाल क्यों पूछा !!

"देख कविता.. अपना पाप हम खुद ही जानते है.. ये केवल माँ ही जानती है की उसका बेटा किसकी पैदाइश है.. इशारों को अगर समझो.. राज को राज रहने दो.. " शीला गीत गुनगुनाकर कविता को आँख मार दी.. संकेत साफ था.. वो कविता और पिंटू के संबंधों की ओर इशारा कर रही थी

कवित सोच में पड़ गई.. भाभी ने तो मुझे ही शक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया..

"आप ऐसे बात मत बदलिए.. सच सच बताइए ना.. "

शीला: "देख कविता.. गोल गोल मत घुमा.. तेरे दिमाग में क्या चल रहा है मुझे बात दे.. "

शीला और कविता के बीच जिस तरह से लेस्बियन संबंध विकसित हो चुके थे उसके बाद एक दूसरे से शर्माने की कोई आवश्यकता नहीं थी

कविता: "भाभी, मैंने आज सुबह आपको और रसिक को एक साथ देखा.. आप को और कोई नहीं मिला जो एक दूधवाले के साथ.. छी छी.. मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है"

अपने चेहरे पर जरा से भी शिकन लाए बगैर शीला ने शांत चित्त से कविता की जांघ पर हाथ रखकर कहा

शीला: "तेरी बात सही है कविता.. पर मेरी तरह अगर तू ८५५ रातें बिना पति के गुजार कर फिर ये बात बोल रही होती तो तेरी बात का वज़न भी पड़ता.. " कविता स्तब्ध हो गई

कविता: "भाभी.. मैं सिर्फ इतना कह रही थी की कहाँ वो रसिक और कहाँ आप?? कोई तुलना ही नहीं है.. "

शीला: "कविता, एक ५५ साल की.. ढलती जवानी से गुजर रही स्त्री.. किस मुंह से किसी अच्छे घर के लड़के को प्रपोज करेगी.. ये सोचा है तूने कभी? तू अगर पिंटू के साथ पकड़ी भी जाए तो लोग ये समझकर माफ कर देंगे की बच्चे है.. गलती हो जाती है.. पर अगर इस उम्र में लोगों को मेरे बारे में कुछ पता चले तो पूरा समाज थू थू करेगा.. मेरी परेशानी को समझ"

कविता ने कुछ जवाब नहीं दिया.. शीला भाभी की मनोदशा उसे धीरे धीरे समज आने लगी

शीला ने अपनी बात आगे चलाई "एक तरफ लोगों की भूखी नज़रों को मैं नजर अंदाज करती रहती हूँ.. दूसरी तरफ खुद अपने जिस्म की आग से झुलस रही हूँ.. कोई कब तक बर्दाश्त करें !! मैं भी आखिर एक इंसान हूँ.. मेरी भी जरूरतें है.. ८५५ रात कम नहीं होती कविता.. मुझे रसिक के पास वो सुख मिला जो मेरे पति के पास कभी नहीं मिला था.. "

कविता: "मतलब? कौन सा सुख?"

शीला: "वो तू अभी समझ नहीं पाएगी.. जब तेरी उम्र होगी.. तू मेनोपोज़ से गुजरेगी.. तब तुझे समझ आएगा"

कविता: "नहीं भाभी.. मुझे समझाइए ना.. प्लीज। आज नहीं तो कल.. मैं भी उस अवस्था से गुजरूँगी.. आपका मार्गदर्शन तब काम आएगा"

शीला ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात शुरू की

शीला: "ऐसा है कविता... एक-दो डिलीवरी के बाद.. स्त्री के गुप्तांग में ढीलापन आ जाता है.. और मेनोपोज़ के बाद शरीर के अंदर विशिष्ट तब्दीलियाँ होती है.. सेक्स की इच्छा तीव्र हो जाती है.. दूसरी तरफ बढ़ती उम्र के कारण पति के लंड में पहले जैसी सख्ती नहीं रहती.. उत्तेजित होने में भी समय लगता है.. और उत्तेजित हो भी जाएँ तो तुरंत वीर्य स्खलित हो जाता है.. ऐसी सूरत में स्त्री को एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है.. एक तो योनि के शिथिल होने से संभोग में ठीक से मज़ा नहीं आता.. और ऊपर से पति दो तीन धक्कों में ही झड़ जाता है.. इसलिए संतोष ही नहीं मिल पाता.. "

कविता ध्यानपूर्वक शीला भाभी की बातें सुन रही थी..

कविता: "अच्छा.. इसीलिए बड़ी उम्र की स्त्रीओं को जवान लड़के ज्यादा पसंद आते है.. हैं ना!!"

शीला: "कोई कोई पसंद आ जाता है.. पर हर बार ऐसा नहीं होता.. दूसरी बात.. तू आज रात घर पर जाकर.. पीयूष के लंड से ज्यादा मोटी चीज अपनी चुत में डालकर देखना.. और फिर बताना की मज़ा आया की नहीं!!"

कविता: "क्यों? मतलब मैं समझी नहीं"

शीला: "मतलब.. मेरे पति के मुकाबले रसिक का लंड ज्यादा मोटा है.. और मोटे लंड से चुदवाने में हमेशा मज़ा आता है.. ढीले ढाले भोसड़े की अंदरूनी दीवारों के साथ जब मोटे लंड का घर्षण होता है तब इतना मज़ा आता है.. मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती"

कविता: "रसिक का लंड मोटा है मतलब....आपने उसके साथ.. !!!"

शीला: "बड़ा ही मस्त है रसिक का.. तू तो ले भी नहीं पाएगी उसका.. चीखें मारकर मर जाएगी अगर लेने की कोशिश भी करेगी तो.. !!" रसिक का लंड याद आते ही शीला का भोंसड़ा पनियाने लगा.. ये विवरण सुनकर कविता भी सकपकाने लगी

कविता: "माय गॉड.. इतना मोटा है रसिक का?"

शीला: "कुछ ज्यादा ही मोटा.. नॉर्मल लंड से दोगुना मोटा"

कविता: "कितना मोटा होगा? वो मूसल जितना?" किचन में प्लेटफ़ॉर्म पर पड़े मूसल की तरफ इशारा करते हुए कविता ने कहा। उस दौरान उसने मन ही मन पीयूष और पिंटू के लंड की तुलना उस मूसल से कर ली थी.. मूसल काफी मोटा था

शीला: "ये तो कुछ भी नहीं है.. " कहते हुए शीला ने कविता के सामने ही अपना घाघरा ऊपर कर लिया और चुत खुजाते हुए मुठ लगाने लगी.. अपनी चार उंगलियों को एक साथ अंदर बाहर करते हुए उसने कविता से कहा "देख तू.. कितनी ढीली हो गई है.. अब ऐसे में पतला लंड कहाँ से मज़ा देगा मुझे?? तेरी चुत में मुश्किल से दो उँगलियाँ जाती होगी"

कविता भी गरम होने लगी थी "हाँ भाभी.. दो उँगलियाँ डालती हूँ तो भी बहुत दर्द होता है" उसकी तेज सांसें बता रही थी की वह कितनी उत्तेजित हो गई थी.. मोटे लंड के बारे में बातें करते ही उसकी चुत में हलचल होना शुरू हो गया था

कविता: "अब ये सारी बातें सुनकर मुझे मोटा लंड देखने का बड़ा मन कर रहा है भाभी"

शीला: "कैसी बातें कर रही है तू !! लंड को गाजर मुली थोड़ी न है जो फ्रिज से निकाला और तुझे दिखा दिया !!" ठहाका लगाकर हँसते हुए बोली

कविता इस जोक पर जरा भी नहीं हंसी.. वह इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की सोफ़े पर ही अपनी चुत रगड़ने लगी.. जब शीला उसके सामने धड़ल्ले से नंगे भोंसड़े में उँगलियाँ पेल रही थी तो वो भी इतनी छूट तो ले ही सकती थी..

शीला: "अंदर इतनी चूल मची है तो फिर ऊपर ऊपर से क्यों कर रही है !! खोल दे और डाल अपनी उँगलियाँ अंदर"

कविता: "ओहह भाभी.. आपने ये सारी नंगी बातें कर मुझे इतना गरम कर दिया.. मुझसे रहा नहीं जा रहा अब.. भाभी.. आप मेरी चुत में आज तीन उँगलियाँ डालिए.. देखते है क्या होता है"

शीला समझ गई की कविता मोटे लंड जैसा असर महसूस करना चाहती थी

शीला: "दर्द तो नहीं होगा ना तुझे ??"

कविता: "होने दो दर्द अगर होता है तो.. प्लीज डालिए" कहते हुए कविता ने अपना स्कर्ट ऊपर कर दिया और पेन्टी को घुटनों से सरकाते हुए उतार दी..

शीला: "एक बार अगर तू रसिक का लंड देखेगी ना.. तो भूल जाएगी की वो एक दूधवाला है.. ओह.. उसे याद करते ही मेरा पानी निकलने लगा.. "अंदर डाली हुई चार गीली उंगलियों को बाहर निकालकर उसने कविता को दिखाया

कविता सिसकने लगी.. "कुछ कीजिए ना भाभी.. मुझे अंदर जोर की खुजली मची है.. वो किचन में मूसल पड़ा है वही डाल दीजिए"

शीला: "अरे पागल.. उस मूसल से मैंने सुबह ही लहसुन कुटा था.. गलती से भी चुत को छु गया तो नीचे आग लग जाएगी.. " शीला ने झुककर कविता की चुत की एक चुम्मी ले ली.. और अपनी जीभ को क्लिटोरिस पर रगड़ दिया.. साथ ही साथ अपनी उँगलियाँ अंदर डालने लगी

कविता: "उईईई माँ.. डाल दी तीनों उँगलियाँ अंदर?"

शीला: "नही.. अभी केवल दो उँगलियाँ ही गई है अंदर.. " शीला ने कविता की नारंगी दबा दी

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"तीन तो अंदर नहीं ले पाऊँगी.. जल रहा है अंदर"

"तो फिर रसिक का लंड देखने की जिद ही छोड़ दे.. क्यों की उसका लंड एक बार देख लिया तो उससे बिना चुदे रह नहीं पाएगी.. और अगर चुदवाने की कोशिश भी की.. तो दर्जी से सिलवाने पड़ेगी तेरी.. "

"ओह्ह भाभी.. प्लीज.. मुझे एक बार.. बस एक बार देखना है.. आप बुलाइए ना रसिक को.. प्लीज प्लीज प्लीज भाभी"

शीला के मुंह से रसिक के लंड का विवरण सुनकर पिघल गई थी कविता.. उसने भाभी को पटाने के लिए उनके भोसड़े में अपनी उँगलियाँ घोंप दी..

"आह्ह.. कविता.. !!"

"प्लीज भाभी.. मुझे रसिक का एक बार देखना है.. कुछ करो न प्लीज" कविता गिड़गिड़ाने लगी

शीला के भोसड़े से रस का झरना बहने लगा.. "ओह कविता.. तू अभी मुझे उसकी याद मत दिला यार.. " कविता की उंगलियों पर अपने भोसड़े को ऊपर नीचे करते हुए शीला ने कहा.. कविता शीला के उत्तुंग शिखरों जैसे स्तनों को चूमने लगी.. दोनों के बीच उम्र का काफी अंतर था पर उसके बावजूद एक ऐसा संबंध स्थापित हो चुका था जो बड़ा ही अनोखा था।

कविता को इस बात से ताज्जुब हो रहा था की जो उत्तेजना उसे शीला भाभी के जिस्म से खेलने पर प्राप्त होती है.. वैसा उसे पीयूष के साथ कभी महसूस नहीं हुआ था.. पता नहीं ऐसा कौनसा जादू था शीला भाभी में?

शीला ने अब कविता की टांगें चौड़ी कर दी... उसने अपनी उंगलियों से गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों को सहलाया और उसकी गुलाबी क्लिटोरिस को दो उँगलीयों के बीच दबा दिया

"उईई.. आह्ह.. मर गई.. " शीला ने अब चाटना भी शुरू कर दिया "आह्ह भाभी.. इस तरह तो कभी पीयूष भी नहीं चाटता मेरी.. " कविता की कचौड़ी जैसी फुली हुई चुत की दोनों फाँकों को बारी बारी चाट रही थी शीला.. साथ ही साथ वह कविता के अमरूद जैसे स्तनों को मसलती जा रही थी..

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एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए दोनों दो बार स्खलित हो गए.. थोड़ी देर वैसी ही अवस्था में पड़े रहने के बाद कविता शीला के पास आई और उन्हे बाहों में जकड़कर लिपट पड़ी.. बड़े ही प्रेम से उनके होंठों पर गरमागरम चुंबन करते हुए बोली

"शुक्रिया भाभी.. आपके पास आकर जिंदगी के सारे गम भूल जाती हूँ मैं.. आपसे मिलकर ही मुझे पता चला की असली मज़ा किसे कहते है.. और हाँ भाभी.. हम शनिवार को रेणुका भाभी के साथ डिनर पर जाने वाले है.. कंपनी का गेट-टूगेथर है.. उनके पति राजेश जी की कंपनी में पीयूष की नौकरी जो पक्की हो गई है"

"अरे वाह.. ये तो बहोत बड़ी खुशखबरी है.. कविता.. !! देखा.. पीयूष बेकार ही टेंशन कर रहा था.. काबिल और महेनती लोगों को काम मिल ही जाता है.. "

"अब मैं चलूँ भाभी? रात का खाना बनाना है"

"हाँ ठीक है.. मैं भी सोच रही थी मार्केट हो आऊँ.. काफी दिन हो गए है बाजार गए.. कुछ चीजें लानी है"


कविता के जाने के बाद शीला मार्केट से जरूरी सामान ले आई और अपने अस्त व्यस्त घर को ठीक करने में लग गई
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रेणुका: "आप शांति से खाना खाइए.. मैं अभी आती हूँ" कहते हुए रेणुका भागकर अनुमौसी के घर पहुंची.. और पीयूष के कमरे में गई.. पीयूष कागज बिछाकर फ़ाइल कर रहा था.. रेणुका ने कमरे का दरवाजा बंद किया और ब्लाउस के दो हुक खोलकर अपना बायाँ स्तन बाहर निकालकर बोली

"जल्दी कर पीयूष.. वो तीनों खाना खा रहे है इसलिए बड़ी मुश्किल से बचकर आई हूँ.. मैंने तुझे वादा किया था इसलिए पूरा कर रही हूँ.. जल्दी जल्दी कर.. उनके आने से पहले मुझे भागना पड़ेगा.. "

पीयूष स्तब्ध होकर रेणुका के पुष्ट पयोधर स्तनों के सौन्दर्य को देखता ही रहा.. क्या अद्भुत रूप था उन चूचियों का.. आहाहाहा.. स्त्री के स्तनों में ऐसा कौनसा जादू होता है.. जो देखता है बस देखता ही रह जाता है.. "

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"देख क्या रहा है.. जल्दी कर.. मुझे वापिस जाना है"

"भाभी.. आप क्या मस्त लग रही हो.. पर एक ही क्यों खोला? मुझे दोनों स्तन एक साथ नंगे देखने है"

"क्या मुसीबत है यार.. पीयूष तू समझता क्यों नहीं.. अभी तेरी ममी या कविता आ गए तो आफत आ जाएगी.. जिद मत कर.. पूरा भोजन करने की जिद में प्रसाद भी हाथ से जाएगा.. इसलिए बोल रही हूँ.. जल्दी से चूस ले" कहते हुए रेणुका ने अपने स्तन को पीयूष के मुंह के आगे कर दिया..

पीयूष ने पहले अपने हाथ से स्तन को छुआ.. गोरे गोरे मस्त पपीते जैसे.. नरम नरम स्तन.. उसने हल्के से दबाया..

"क्या कर रहा है पागल? ये कोई सुहागरात है जो धीरे धीरे कर रहा है?? जल्दी खतम कर" रेणुका पीयूष से तंग आ गई। उसने पीयूष का सिर पकड़कर अपने बॉल पर दबा दिया.. पीयूष भी असली खिलाड़ी था.. उसने निप्पल को छोड़कर.. आसपास के गोलाकार पर जीभ फेरने लगा.. रेणुका इंतज़ार में थी की कब वो निप्पल को मुंह में लेकर चूसे.. पर ये तो निप्पल के इर्दगिर्द चाटता ही जा रहा था.. निप्पल को नजरअंदाज करते हुए

रेणुका इंतज़ार करते हुए थक गई और ब्लाउस का हुक बंद करने गई.. तब पीयूष ने उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया.. जैसे हाथ में अंगारा पकड़ लिया हो वैसे रेणुका ने अपना हाथ झटके से खींच लिया

"दिमाग खराब हो गया है क्या तेरा !! कबसे समझा रही हूँ पर तू समझता ही नहीं है !!" कहते हुए उसने पीयूष को अपने स्तन से दूर किया.. बड़ी मुश्किल से उस टाइट स्तन को ब्लाउस के अंदर दबोचा और हुक बंद कर दिए। पीयूष उसे देखता ही रह गया रेणुका की इस हरकत को

"भाभी.. आपने चूसने ही नहीं दिया.. मैंने अभी ठीक से देखा तक नहीं है.. पता नहीं फिर कब मौका मिले" कहते हुए नाराज होने की एक्टिंग करने लगा पीयूष

रेणुका ने उसे बाहों में भरकर चूम लिया "कितना क्यूट है रे तू!! ऐसे बातें करेगा तो मुझे प्यार हो जाएगा.. चल अब मुझे जाने दे.. बहोत देर हो गई है.. और हाँ कल टाइम पर राजेश की ऑफिस पहुँच जाना.. मैं राजेश से बात कर लूँगी.. ये मेरा मोबाइल नंबर नोट कर ले.. और जब मर्जी आए तब फोन मत करना.. वरना मेरे पति को शक हो गया तो तेरी नौकरी का एबॉर्शन हो जाएगा.. समझा.. !!"

पीयूष ने अपने नंबर से रेणुका को मिसकॉल किया "मेरा नंबर भी सेव कर लेना भाभी"

"हाँ कर लूँगी.. अब चलती हूँ.. बाय" पीयूष उसे जाते हुए देखता ही रहा

रेणुका जब मौसी के घर से बाहर निकल रही थी तभी मौसी अंदर घुस रहे थे.. दोनों की नजरें मिली.. और रेणुका मुस्कुराकर चली गई। मौसी को कुछ शक तो हुआ पर तब तक रेणुका जा चुकी थी। शीला के घर कुछ देर रुक कर वो अपने घर वापिस लौट गई।

रेणुका के जाते ही शीला फिर से अकेली हो गई.. कितनी चंचल थी रेणुका!! उसकी उपस्थिति से पूरा घर जीवंत लगता था.. उसके जाते ही सब सुना सुना लगने लगा.. शीला को अपनी बेटी वैशाली की याद आ गई.. काफी दिनों से उसके साथ बात नहीं हुई थी.. शीला ने मोबाइल उठाकर तुरंत उसे फोन लगाया

"कैसी हो बेटा ?? तू तो कभी फोन ही नहीं करती मुझे? तेरे पापा भी घर नहीं है.. कम से कम मेरा हाल जानने के लिए तो फोन किया कर !! कितना अकेलापन महसूस कर रही हूँ.. पता है तुझे !!" बेटी के आगे शीला ने अपनी भड़ास निकाली

"मम्मी, मैं काफी दिनों से आपको याद कर रही थी.. पर टाइम ही नहीं मिला.. कैसी हो तुम? पता है.. हम अगले हफ्ते आने वाले है तुमसे मिलने.. !!"

"क्या बात है?" शीला उछल पड़ी

"हाँ मम्मी.. उनको ऑफिस का कुछ काम है तो मुझे भी साथ चलने को कहा.. चार पाँच दिन का काम है.. वो अपना काम निपटाएंगे और हम माँ बेटी साथ में ऐश करेंगे.. "

"बहोत अच्छा.. जल्दी जल्दी आ जा.. मैं अकेले अकेल बोर हो रही हूँ.. तेरे पापा थे तब सब दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना होता था.. अब तो सब फोन पर ही हाल चाल पूछ लेते है.. कोई मिलने भी नहीं आता.. "

"बस मम्मी.. अब मैं आ जाऊँगी तो तेरा दिल लगा रहेगा.. अगले हफ्ते आएंगे.. आने से पहले मैं फोन करूंगी"

"ओके बेटा.. अपना खयाल रखना.. और संजय कुमार को मेरी याद देना"

"ठीक है मम्मी.. रखती हूँ"

शीला भावुक हो गई.. बेटी को विदा करने के बाद उनका घर सुना हो गया था.. उस दिन कितना रोए थे मैं और मदन?? मदन तो रात में नींद से जागकर वैशाली को याद करते हुए रोता था..

शीला ने केलेंडर में देखा.. अभी डेढ़ महीने की देरी थी मदन के लौटने में.. अब की बार तो मैं उसे वापिस जाने ही नहीं दूँगी.. क्या रखा है परदेश में? यहाँ पत्नी बिस्तर पर करवटें ले रही हो और पति परदेश में मजदूरी कर रहा हो.. ये भी भला कोई ज़िंदगी है !! शीला को बड़ी ही तीव्रता से मदन की याद आने लगी.. आज रात उसका फोन आना चाहिए.. जल्दी आजाओ मदन..

छत पर खड़े खड़े किसी से फोन पर बातें करते हुए पीयूष को बगल के घर में शीला भाभी अपने कमरे के सोफ़े पर बैठी हुई नजर आ रही थी.. उसकी नजर शीला से मिलते ही दोनों की आँखें चमक उठी.. शीला के उभारों को देखते हुए पीयूष को रेणुका के बबलों की याद आ गई.. शीला भाभी के बॉल बड़े थे पर रेणुका के स्तन कसे हुए थे.. पर अगर शीला भाभी को एक बार भोगने के लीये मिल जाएँ तो मैं रेणुका भाभी की तरफ देखूँ भी नहीं.. आह्ह.. पीयूष के लंड में एक झटका लगा.. यार.. ये शीला भाभी की नाभि कितनी सेक्सी है !! बिल्कुल कयामत सी.. एक बार चांस मिल जाएँ तो उनकी नाभि को चोदना है.. इतनी मस्त गहरी नाभि है की आधा लंड समा जाएँ अंदर..

पीयूष के दिमाग से शीला भाभी हट ही नहीं रही थी.. ज्यादातर रूप और कामुकता एक साथ एक व्यक्ति में कम ही नजर आते है.. शीला भाभी के पास उन दोनों का जादुई मिश्रण था.. कातिल हुस्न.. आलीशान व्यक्तित्व.. और चुंबकीय स्वभाव.. पीयूष दीवाना हो चुका था उनका.. दूसरी तरफ कविता ऐसा महसूस कर रही थी की पीयूष का उसके तरफ ध्यान कम होता जा रहा था.. वो सोच रही थी की शायद मैं पिंटू की तरफ ढलती जा रही हूँ उस वजह से तो शायद ऐसा लग रहा हो.. कविता ये जानती थी की शादी के बाद उसे पिंटू से नाता तोड़ लेना चाहिए था.. पर कमबख्त दिल का क्या करें.. कितनी कोशिशों के बाद भी वह अपने पहले प्रेम को दिल से निकाल नहीं पा रही थी

दूसरे दिन पीयूष फोन करके राजेश की ऑफिस पहुँच गया.. राजेश ने इंटरव्यू लेकर उसे एक हफ्ते के लिए अपॉइन्ट किया.. और उसे अपनी ऑफिस के मेनेजर महेंद्र के नीचे नियुक्त कर दिया.. पीयूष ने बाहर निकलकर सब से पहले रेणुका भाभी को फोन कर ये समाचार दिए.. बाद में कविता को और अंत में शीला भाभी को फोन किया और अपनी नौकरी लगने की खुशखबरी दी.. राजेश ने पीयूष को एक हफ्ते के लिए उसका काम देखकर नौकरी पक्की करने और तनख्वाह तय करने का वादा किया.. अपनी योग्यता और मेहनत पर पीयूष को पूरा भरोसा था. उसने तय किया की वह पूरे दिल से मेहनत करेगा और राजेश को शिकायत का एक भी मौका नहीं देगा..

पीयूष की नौकरी शुरू हो गई.. तीसरे ही दिन.. मेनेजर महेंद्र ने पीयूष के हाथों में एक बंद कवर रखा और कहा की ये कवर वो अपनी पत्नी को दें.. ये पीयूष की पत्नी के लिए था.. पीयूष अचंभित होकर सोचता रहा की कवर में ऐसा क्या था !!

शाम को घर आकार उसने कविता के हाथ में कवर रख दिया

कविता: "क्या है ये?"

पीयूष: "कवर तेरे हाथों में ही.. तू ही खोलकर बता.. मेरी ऑफिस से दिया है.. और कहा है की तेरे लिए है"

कविता: "मुझे भला कोई क्यूँ कवर भेजेगा तेरी ऑफिस से? नौकरी मैं कर रही हूँ या तुम?"

पीयूष: "अरे यार.. तू वो सब छोड़.. और कवर खोल.. मुझसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा"

कविता ने कवर खोला.. एक एग्रीमेन्ट था जिसमें पीयूष की नौकरी को स्थायी कर दिया गया था और साथ ही उसकी तनख्वाह २५००० तय की गई थी.. और साथ में एक चिट्ठी थी जिसमें लिखा था

"प्रिय पीयूष,

तुम्हें मेरी कंपनी में पर्मनन्ट नौकरी देते हुए मुझे खुशी हो रही है.. मेरी कंपनी को तुम्हारे जैसे होनहार कर्मचारी की जरूरत थी। एक हफ्ते के काम को तीन ही दिन में खतम कर तुमने अपनी योग्यता सिद्ध कर दी है.. मैं अपने स्टाफ को कभी नौकर नहीं समझता.. अपने परिवार का हिस्सा ही समझता हूँ.. इसलिए शनिवार रात को तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को मेरे साथ डिनर पर आने का न्योता दे रहा हूँ.. मेरे परिवार में तुम्हारा स्वागत है.. धन्यवाद और अभिनंदन.. शनिवार शाम को ७:४५ को तुम्हें अपनी पत्नी के साथ होटल मनमन्दिर में आना है.. हमारी ऑफिस का अन्य स्टाफ भी साथ डिनर करेगा.. हर महीने के आखिरी शनिवार को हमारी कंपनी डिनर के लिए मिलते है ताकि पूरा स्टाफ और उनके परिवारजन आपस में मिल सकें.. स्टाफ के साथ पहचान बढ़ाने का तुम्हारे लिए ये अच्छा अवसर रहेगा..

शुभेच्छा सह

राजेश"

ये पढ़कर कविता उछल पड़ी और पीयूष से लिपट गई.. पीयूष और कविता दोनों ही बेहद खुश थे.. पीयूष ने भी कविता के स्तनों को दबाते हुए उसे चूम लिया.. दोनों बेडरूम के अंदर ही थे.. पति और पत्नी एक दूसरे को उत्तेजना प्रदान करने लगे.. और साथ ही साथ एक दूसरे के वस्त्रों को भी उतारने लगे.. दोनों जिस्म नंगे होते ही पीयूष भूखे भेड़िये की तरह कविता पर टूट पड़ा.. कविता भी पीयूष के लंड को मुट्ठी में दबाते हुए अपने संतरों जैसे स्तनों को पीयूष की छाती से रगड़ने लगी.. पीयूष का शरीर उत्तेजना से तप रहा था.. उसका लंड कविता के हाथों में ठुमक रहा था.. पीयूष ने ऊपर उठकर अपना लंड कविता के मुंह में दे दिया.. कविता बड़े प्यार से पीयूष के सुपाड़े को चूसते हुए उसके आँड़ों को सहलाने लगी.. पीछे की तरफ झुककर पीयूष ने कविता की छोटी सी क्लिटोरिस को मसलकर उसे उत्तेजना से पागल कर दिया..

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"आह्ह कविता.. और जोर से चूस.. बहोत मज़ा आ रहा है यार.. " पीयूष तेजी से कविता की क्लिटोरिस को रगड़ रहा था। दूसरे हाथ से उसने कविता के एक स्तन को मरोड़ दिया.. पीयूष ने अपना लंड अब कविता के मुंह से बाहर निकाला और वो कविता की प्यारी पुच्ची को चाटने लगा.. सिहर रही कविता आँखें बंद कर ये सोच रही थी की ऑफिस से आए खत में जो लिखाई थी.. वो पिंटू से काफी मिलती झूलती क्यों लग रही थी? स्कूल में वो पिंटू को पास बैठकर ही पढ़ती थी इसलिए उसकी लिखाई से वो परिचित थी..

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दिमाग में पिंटू का खयाल आते ही कविता में एक अनोखा जोश आ गया.. अपनी चुत चाट रहे पीयूष को बिस्तर पर पटक कर वो उस पर सवार हो गई.. उंगलियों के बीच उसके लंड को पकड़कर अपनी चुत के छेद को उसपर रख दिया और धीरे धीरे बैठ गई.. लंड अंदर घुसते ही उसने बेतहाशा कूदना शुरू कर दिया.. पीयूष लाचार होकर कविता के प्रहारों को लेटे लेटे झेल रहा था.. उछलते हुए कविता ने अपने बाल खोल दिए.. और मदहोश होकर आँखें बंद कर ऊपर नीचे करती ही रही.. खुले हुए बाल.. जंगली जानवर जैसी उत्तेजना..लाल चेहरा.. बंद आँखें.. पीयूष एक पल के लिए उसे देखकर डर सा गया.. बेरहमी से कविता पीयूष पर कूदती ही रही.. उसके कड़े स्तन.. और उत्तेजना के कारण बंदूक की तरह तनी हुई उसकी निप्पलें.. पीयूष ने मसलना शुरू कर दिया.. पागलों की तरह कूद रही कविता जैसे ही अपनी मंजिल पर पहुंची तब "ओह माय गॉड" कहते हुए लंड से उतार गई और बिस्तर पर लेटकर हांफने लगी..


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अब बारी पीयूष की थी.. उसने हांफ रही कविता की जांघें चौड़ी की.. और उसकी गीली मुनिया में एक ही झटके में अपना लंड घुसेड़ दिया.. उसके हर धक्के के साथ कविता कराह रही थी.. कुछ ही धक्कों के बाद पीयूष ने अपना व्हाइट ज्यूस कविता की तंग चुत में दे मारा.. और उसकी छाती पर गिर गया.. लंड को चुत की अंदर ही रखे हुए.. वो दोनों गहरी नींद में.. उसी अवस्था में सो गए..
बहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजना से भरपूर कामोत्तेजक अपडेट है भाई मजा आ गया
 

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रोज की तरह कविता जल्दी जाग गई.. सो रहे पीयूष को अपने शरीर से धकेलते ही "पुचच.. " की आवाज के साथ उसका लंड चुत से बाहर निकला.. पीयूष को सहलाकर वो खड़ी हुई और गाउन पहनकर दूध लेने अपने कंपाउंड में आई..

कविता ने शीला के घर की तरफ नजर डाली.. अंदर लाइट जल रही थी.. ये देख कविता सोचने लगी.. लगता है अभी अभी जागी है शीला भाभी.. पता नहीं खाली बिस्तर के साथ कैसे रात बिताती होंगी बेचारी.. !! दो साल से अकेली रहती है.. रसिक अभी आया नहीं था.. कविता ने सोचा की तब तक नहाने के लिए पानी गरम करने गैस पर रख दूँ


गैस पर गरम पानी का पतीला चढ़ाकर वो अपने मोबाइल पर मेसेज चेक कर रही थी तभी रसिक की साइकल की घंटी सुनाई दी.. अपना मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म पर रखकर उसने पतीली उठाई और दूध लेने के लिए बाहर आई..

अंधेरे में बाहर जो द्रश्य उसे दिखा उससे कविता के पैरों तले से जमीन खिसक गई.. रसिक ने शीला भाभी को जकड़कर रखा था.. वो चिल्लाने ही वाली थी की तब उसे ये एहसास हुआ की रसिक जबरदस्ती नहीं कर रहा था.. बल्कि शीला भाभी अपनी मर्जी से उससे लिपटी हुई थी.. कविता को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.. शीला भाभी जैसी सुशील संस्कारी स्त्री.. दूधवाले के साथ?? छी छी छी.. घिन आ गई कविता को शीला भाभी पर

शीला का ये रोज का खेल था.. रसिक जब भी दूध देने आए तब अंधेरे का फायदा उठाकर मजे कर लेती थी.. शीला के बोझिल जीवन में इससे रस बना रहता था.. और रसिक को भी मज़ा आता था.. शीला और रसिक किसी ने भी कविता को देखा नहीं था.. दोनों अपनी ही मस्ती में मस्त थे.. थोड़ी ही देर के बाद रसिक ने शीला को दूध दिया.. और उसके साथ जो भी दे सकता था वो देकर अनुमौसी के दरवाजे की तरफ आया.. हाथ में पतीली लिए कविता तैयार खड़ी थी..

"कैसी हो भाभी? आज आप दूध लेने आई? मौसी सो रही है क्या?"

कविता ने नफरत भरे सुर के साथ कहा "तुम अपने काम से काम रखो.. मैं दूध लेने आउ या मम्मी आए.. तुम्हें क्या फरक पड़ता है? तुम बस दूध दो और चलते बनो"

"इतना गुस्सा क्यों कर रही हो भाभी.. मैंने तो बस ऐसे ही पूछ लिया.. "

"क्यों? दूध देने के अलावा मौसी का और कुछ भी काम था तुम्हें?"

सुनकर रसिक चोंक गया "अरे भाभी.. मुझे बस दूध का हिसाब लेना था उनसे.. और कोई काम नहीं था.. " दूध देकर रसिक चला गया।

कविता का शक और भी दृढ़ होने लगा.. कहीं मेरी सास भी शीला भाभी के साथ इन गुलछर्रों में शामिल तो नहीं हो गई !! कुछ कहा नहीं जा सकता

दोपहर को काम निपटाकर कविता शीला भाभी के घर आई.. वो जानना चाहती थी की भाभी उससे और क्या क्या छुपा रही थी

बातों ही बातों में उसने पूछ लिया "भाभी.. आपने मदन भाई के अलावा और किसी के साथ सेक्स किया है कभी??"

शीला चोंक गई.. अचानक कविता ने आज ये सवाल क्यों पूछा !!

"देख कविता.. अपना पाप हम खुद ही जानते है.. ये केवल माँ ही जानती है की उसका बेटा किसकी पैदाइश है.. इशारों को अगर समझो.. राज को राज रहने दो.. " शीला गीत गुनगुनाकर कविता को आँख मार दी.. संकेत साफ था.. वो कविता और पिंटू के संबंधों की ओर इशारा कर रही थी

कवित सोच में पड़ गई.. भाभी ने तो मुझे ही शक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया..

"आप ऐसे बात मत बदलिए.. सच सच बताइए ना.. "

शीला: "देख कविता.. गोल गोल मत घुमा.. तेरे दिमाग में क्या चल रहा है मुझे बात दे.. "

शीला और कविता के बीच जिस तरह से लेस्बियन संबंध विकसित हो चुके थे उसके बाद एक दूसरे से शर्माने की कोई आवश्यकता नहीं थी

कविता: "भाभी, मैंने आज सुबह आपको और रसिक को एक साथ देखा.. आप को और कोई नहीं मिला जो एक दूधवाले के साथ.. छी छी.. मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है"

अपने चेहरे पर जरा से भी शिकन लाए बगैर शीला ने शांत चित्त से कविता की जांघ पर हाथ रखकर कहा

शीला: "तेरी बात सही है कविता.. पर मेरी तरह अगर तू ८५५ रातें बिना पति के गुजार कर फिर ये बात बोल रही होती तो तेरी बात का वज़न भी पड़ता.. " कविता स्तब्ध हो गई

कविता: "भाभी.. मैं सिर्फ इतना कह रही थी की कहाँ वो रसिक और कहाँ आप?? कोई तुलना ही नहीं है.. "

शीला: "कविता, एक ५५ साल की.. ढलती जवानी से गुजर रही स्त्री.. किस मुंह से किसी अच्छे घर के लड़के को प्रपोज करेगी.. ये सोचा है तूने कभी? तू अगर पिंटू के साथ पकड़ी भी जाए तो लोग ये समझकर माफ कर देंगे की बच्चे है.. गलती हो जाती है.. पर अगर इस उम्र में लोगों को मेरे बारे में कुछ पता चले तो पूरा समाज थू थू करेगा.. मेरी परेशानी को समझ"

कविता ने कुछ जवाब नहीं दिया.. शीला भाभी की मनोदशा उसे धीरे धीरे समज आने लगी

शीला ने अपनी बात आगे चलाई "एक तरफ लोगों की भूखी नज़रों को मैं नजर अंदाज करती रहती हूँ.. दूसरी तरफ खुद अपने जिस्म की आग से झुलस रही हूँ.. कोई कब तक बर्दाश्त करें !! मैं भी आखिर एक इंसान हूँ.. मेरी भी जरूरतें है.. ८५५ रात कम नहीं होती कविता.. मुझे रसिक के पास वो सुख मिला जो मेरे पति के पास कभी नहीं मिला था.. "

कविता: "मतलब? कौन सा सुख?"

शीला: "वो तू अभी समझ नहीं पाएगी.. जब तेरी उम्र होगी.. तू मेनोपोज़ से गुजरेगी.. तब तुझे समझ आएगा"

कविता: "नहीं भाभी.. मुझे समझाइए ना.. प्लीज। आज नहीं तो कल.. मैं भी उस अवस्था से गुजरूँगी.. आपका मार्गदर्शन तब काम आएगा"

शीला ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात शुरू की

शीला: "ऐसा है कविता... एक-दो डिलीवरी के बाद.. स्त्री के गुप्तांग में ढीलापन आ जाता है.. और मेनोपोज़ के बाद शरीर के अंदर विशिष्ट तब्दीलियाँ होती है.. सेक्स की इच्छा तीव्र हो जाती है.. दूसरी तरफ बढ़ती उम्र के कारण पति के लंड में पहले जैसी सख्ती नहीं रहती.. उत्तेजित होने में भी समय लगता है.. और उत्तेजित हो भी जाएँ तो तुरंत वीर्य स्खलित हो जाता है.. ऐसी सूरत में स्त्री को एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है.. एक तो योनि के शिथिल होने से संभोग में ठीक से मज़ा नहीं आता.. और ऊपर से पति दो तीन धक्कों में ही झड़ जाता है.. इसलिए संतोष ही नहीं मिल पाता.. "

कविता ध्यानपूर्वक शीला भाभी की बातें सुन रही थी..

कविता: "अच्छा.. इसीलिए बड़ी उम्र की स्त्रीओं को जवान लड़के ज्यादा पसंद आते है.. हैं ना!!"

शीला: "कोई कोई पसंद आ जाता है.. पर हर बार ऐसा नहीं होता.. दूसरी बात.. तू आज रात घर पर जाकर.. पीयूष के लंड से ज्यादा मोटी चीज अपनी चुत में डालकर देखना.. और फिर बताना की मज़ा आया की नहीं!!"

कविता: "क्यों? मतलब मैं समझी नहीं"

शीला: "मतलब.. मेरे पति के मुकाबले रसिक का लंड ज्यादा मोटा है.. और मोटे लंड से चुदवाने में हमेशा मज़ा आता है.. ढीले ढाले भोसड़े की अंदरूनी दीवारों के साथ जब मोटे लंड का घर्षण होता है तब इतना मज़ा आता है.. मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती"

कविता: "रसिक का लंड मोटा है मतलब....आपने उसके साथ.. !!!"

शीला: "बड़ा ही मस्त है रसिक का.. तू तो ले भी नहीं पाएगी उसका.. चीखें मारकर मर जाएगी अगर लेने की कोशिश भी करेगी तो.. !!" रसिक का लंड याद आते ही शीला का भोंसड़ा पनियाने लगा.. ये विवरण सुनकर कविता भी सकपकाने लगी

कविता: "माय गॉड.. इतना मोटा है रसिक का?"

शीला: "कुछ ज्यादा ही मोटा.. नॉर्मल लंड से दोगुना मोटा"

कविता: "कितना मोटा होगा? वो मूसल जितना?" किचन में प्लेटफ़ॉर्म पर पड़े मूसल की तरफ इशारा करते हुए कविता ने कहा। उस दौरान उसने मन ही मन पीयूष और पिंटू के लंड की तुलना उस मूसल से कर ली थी.. मूसल काफी मोटा था

शीला: "ये तो कुछ भी नहीं है.. " कहते हुए शीला ने कविता के सामने ही अपना घाघरा ऊपर कर लिया और चुत खुजाते हुए मुठ लगाने लगी.. अपनी चार उंगलियों को एक साथ अंदर बाहर करते हुए उसने कविता से कहा "देख तू.. कितनी ढीली हो गई है.. अब ऐसे में पतला लंड कहाँ से मज़ा देगा मुझे?? तेरी चुत में मुश्किल से दो उँगलियाँ जाती होगी"

कविता भी गरम होने लगी थी "हाँ भाभी.. दो उँगलियाँ डालती हूँ तो भी बहुत दर्द होता है" उसकी तेज सांसें बता रही थी की वह कितनी उत्तेजित हो गई थी.. मोटे लंड के बारे में बातें करते ही उसकी चुत में हलचल होना शुरू हो गया था

कविता: "अब ये सारी बातें सुनकर मुझे मोटा लंड देखने का बड़ा मन कर रहा है भाभी"

शीला: "कैसी बातें कर रही है तू !! लंड को गाजर मुली थोड़ी न है जो फ्रिज से निकाला और तुझे दिखा दिया !!" ठहाका लगाकर हँसते हुए बोली

कविता इस जोक पर जरा भी नहीं हंसी.. वह इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की सोफ़े पर ही अपनी चुत रगड़ने लगी.. जब शीला उसके सामने धड़ल्ले से नंगे भोंसड़े में उँगलियाँ पेल रही थी तो वो भी इतनी छूट तो ले ही सकती थी..

शीला: "अंदर इतनी चूल मची है तो फिर ऊपर ऊपर से क्यों कर रही है !! खोल दे और डाल अपनी उँगलियाँ अंदर"

कविता: "ओहह भाभी.. आपने ये सारी नंगी बातें कर मुझे इतना गरम कर दिया.. मुझसे रहा नहीं जा रहा अब.. भाभी.. आप मेरी चुत में आज तीन उँगलियाँ डालिए.. देखते है क्या होता है"

शीला समझ गई की कविता मोटे लंड जैसा असर महसूस करना चाहती थी

शीला: "दर्द तो नहीं होगा ना तुझे ??"

कविता: "होने दो दर्द अगर होता है तो.. प्लीज डालिए" कहते हुए कविता ने अपना स्कर्ट ऊपर कर दिया और पेन्टी को घुटनों से सरकाते हुए उतार दी..

शीला: "एक बार अगर तू रसिक का लंड देखेगी ना.. तो भूल जाएगी की वो एक दूधवाला है.. ओह.. उसे याद करते ही मेरा पानी निकलने लगा.. "अंदर डाली हुई चार गीली उंगलियों को बाहर निकालकर उसने कविता को दिखाया

कविता सिसकने लगी.. "कुछ कीजिए ना भाभी.. मुझे अंदर जोर की खुजली मची है.. वो किचन में मूसल पड़ा है वही डाल दीजिए"

शीला: "अरे पागल.. उस मूसल से मैंने सुबह ही लहसुन कुटा था.. गलती से भी चुत को छु गया तो नीचे आग लग जाएगी.. " शीला ने झुककर कविता की चुत की एक चुम्मी ले ली.. और अपनी जीभ को क्लिटोरिस पर रगड़ दिया.. साथ ही साथ अपनी उँगलियाँ अंदर डालने लगी

कविता: "उईईई माँ.. डाल दी तीनों उँगलियाँ अंदर?"

शीला: "नही.. अभी केवल दो उँगलियाँ ही गई है अंदर.. " शीला ने कविता की नारंगी दबा दी

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"तीन तो अंदर नहीं ले पाऊँगी.. जल रहा है अंदर"

"तो फिर रसिक का लंड देखने की जिद ही छोड़ दे.. क्यों की उसका लंड एक बार देख लिया तो उससे बिना चुदे रह नहीं पाएगी.. और अगर चुदवाने की कोशिश भी की.. तो दर्जी से सिलवाने पड़ेगी तेरी.. "

"ओह्ह भाभी.. प्लीज.. मुझे एक बार.. बस एक बार देखना है.. आप बुलाइए ना रसिक को.. प्लीज प्लीज प्लीज भाभी"

शीला के मुंह से रसिक के लंड का विवरण सुनकर पिघल गई थी कविता.. उसने भाभी को पटाने के लिए उनके भोसड़े में अपनी उँगलियाँ घोंप दी..

"आह्ह.. कविता.. !!"

"प्लीज भाभी.. मुझे रसिक का एक बार देखना है.. कुछ करो न प्लीज" कविता गिड़गिड़ाने लगी

शीला के भोसड़े से रस का झरना बहने लगा.. "ओह कविता.. तू अभी मुझे उसकी याद मत दिला यार.. " कविता की उंगलियों पर अपने भोसड़े को ऊपर नीचे करते हुए शीला ने कहा.. कविता शीला के उत्तुंग शिखरों जैसे स्तनों को चूमने लगी.. दोनों के बीच उम्र का काफी अंतर था पर उसके बावजूद एक ऐसा संबंध स्थापित हो चुका था जो बड़ा ही अनोखा था।

कविता को इस बात से ताज्जुब हो रहा था की जो उत्तेजना उसे शीला भाभी के जिस्म से खेलने पर प्राप्त होती है.. वैसा उसे पीयूष के साथ कभी महसूस नहीं हुआ था.. पता नहीं ऐसा कौनसा जादू था शीला भाभी में?

शीला ने अब कविता की टांगें चौड़ी कर दी... उसने अपनी उंगलियों से गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों को सहलाया और उसकी गुलाबी क्लिटोरिस को दो उँगलीयों के बीच दबा दिया

"उईई.. आह्ह.. मर गई.. " शीला ने अब चाटना भी शुरू कर दिया "आह्ह भाभी.. इस तरह तो कभी पीयूष भी नहीं चाटता मेरी.. " कविता की कचौड़ी जैसी फुली हुई चुत की दोनों फाँकों को बारी बारी चाट रही थी शीला.. साथ ही साथ वह कविता के अमरूद जैसे स्तनों को मसलती जा रही थी..

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एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए दोनों दो बार स्खलित हो गए.. थोड़ी देर वैसी ही अवस्था में पड़े रहने के बाद कविता शीला के पास आई और उन्हे बाहों में जकड़कर लिपट पड़ी.. बड़े ही प्रेम से उनके होंठों पर गरमागरम चुंबन करते हुए बोली

"शुक्रिया भाभी.. आपके पास आकर जिंदगी के सारे गम भूल जाती हूँ मैं.. आपसे मिलकर ही मुझे पता चला की असली मज़ा किसे कहते है.. और हाँ भाभी.. हम शनिवार को रेणुका भाभी के साथ डिनर पर जाने वाले है.. कंपनी का गेट-टूगेथर है.. उनके पति राजेश जी की कंपनी में पीयूष की नौकरी जो पक्की हो गई है"

"अरे वाह.. ये तो बहोत बड़ी खुशखबरी है.. कविता.. !! देखा.. पीयूष बेकार ही टेंशन कर रहा था.. काबिल और महेनती लोगों को काम मिल ही जाता है.. "

"अब मैं चलूँ भाभी? रात का खाना बनाना है"

"हाँ ठीक है.. मैं भी सोच रही थी मार्केट हो आऊँ.. काफी दिन हो गए है बाजार गए.. कुछ चीजें लानी है"


कविता के जाने के बाद शीला मार्केट से जरूरी सामान ले आई और अपने अस्त व्यस्त घर को ठीक करने में लग गई
बहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजक अपडेट है भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 
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