कोमल जी,
बहुत ही शानदार अपडेट | आप के लेखन कला जादू चल गया, इतना सुंदर की दिल खुश हो गया,|
पलायन की विभीषिका का इतना सटीक विश्लेषण किया है, इसका कोई जबाब नही है,
सारा दर्द शब्दो में उडेल दिया है, दिल मे सीधा लगती हैं|
MC बनते बनते रह गए, कोई बात नही ,आगे बहुत कुछ हो सकता है|
अभी तो खेल शुरू हुआ है|
आप का बहुत बहुत आभार इतने सुंदर लेखन कला का रस पिलाने के लिए|
बहुत आभार, पहले धन्यवाद और आपने इस भाग के उन पहलुओं पर भी टिप्पणी की, जो इस भाग को अलग करता है।
कहानी गाँव की हो, तो भले ही कितनी फंतासी हो पर कभी कभी उसे जिंदगी से भी रूबरू हो ना चाहिए वरना कहानी में कहानी नहीं बचती और गाँव का अकेलेपन का यह दर्द, अब गाँवों से पसर कर कस्बाई शहरों और महानगरों में भी पहुँच गया। गाँव से लोग कमाने बंबई, पंजाब और सूरत जाते है तो कुछ क़तर और सऊदी भी, और शहरों से भी कब्भी दुबई तो कभी ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका, कनाडा, और यादों के साथ माँ पिता, और जब तक माँ पिता साथ साथ हों तब भी, अगर उनमे से एक नहीं है तो अकेले के लिए तो बस,
जैसे खूब रोशन, चहल पहल से भरा घर हो और झट्ट से बिजली चली जाये, सब आवाजें बंद हो जाएँ,
और आपने देखा होगा इसमें बहू ने सास का मन रखने के लिए जो बातें की, होने वाले बच्चों की,
और फिर ननद भौजाई की बातें
एक बार फिर से आभार, इतनी अच्छी टिप्पणी के लिए