जासूसी कहानियां हो या इरोटिक साहित्य अक्सर उसे मुख्य साहित्य की धारा से अलग ही देखा जाता है, परन्तु आप का यह प्रयास, ... यह एक लम्बी परपंरा है जासूसी लेखन की जो उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में हिंदी में प्राम्भ हो चुका था।
गोपाल राम गहमरी के साथ हिंदी के जासूसी लेखन की शुरुआत जुडी हुयी है, और सबसे पहले अनुवाद के रूप में १८९६ में उन्होंने प्रसिद्ध बंगाली जासूसी लेखक नागेंद्र दास की कहानी, हिरेर मूल्य या हीरे मूल्य को अनुदित कर वेंकटेश्वर समाचार में छापा, जो प्रसिद्ध वेंकेटेश्वर स्टीम प्रेस मुंबई से प्रकाशित होता था. और इस प्रकार हिंदी में प्रथम जासूसी कहानी छपी. यह सीरियल के रूप में प्रकाशित होती थी। इसी पत्र में मूल जासूसी कहानी 'जोड़ा जासूस; भी गहमरी जी की इसी वर्ष छपी।
उन्नीसवीं शताब्दी के अवसान के पहले गहमरी जी के दो जासूसी उपन्यास हिंदी में प्रकाशित हो चुके थे, अद्भुत लाश (१८९६ ) और गुप्तचर ( १८९९ ).
हिंदी साहित्य में कई विधाओं की जासूसी कहानियों पर भी बंगाल का प्रभाव था। सर्वप्रथम भारतीय भाषाओँ में बंगाली में ही १८८६ में हुआ , नागेन्द्रनाथ गुप्त के उपन्यास से बाद में बहु चर्चित दरोगा का दफ्तर ( जो अभी भी बंगाली और अँगरेजी अनुवाद में उपलब्ध है ) प्रकाशित हुआ जिसके लेखक प्रियनाथ मुखर्जी स्वयं कोलकाता पुलिस में काम करते थे। यह १८९३ में प्रकाशित हुआ.
अगर देखा जाए तो हिंदी और बँगला की यह कहानियां प्रसिद्ध अंग्रेजी कथा के जासूस शर्लाक होल्म्स और उनको रूप देने वाले सर आर्थर कानन डायल की कहानियों के लगभ समकालीन ही है। शर्लाक होल्म्स की पहली कहानी स्टडी इन स्कारलेट १८८७ में छपी।
गहमरी जी ने १९०० में जासूसी नाम की पहली नियमित जासूसी पत्रिका अपने गाँव से प्रकाशित करनी शुरू की जो बहुत अरसे तक चली।
मैं इन सब बातों की चर्चा इस लिए कर रही हूँ की आप यह समझें की आप गहमरी जी की परंपरा के अग्रवाहक हैं। यह माने नहीं रखता की व्यूज दस हजार हैं या दस लाख, या कुछ लोग पढ़ते हैं पर कमेंट नहीं करते, माने यह रखता है की आप एक की लेखनी से हम सब पाठक पाठिकाओं को एक अच्छी कहानी पढ़ने को मिल रही है।