Update- 15
किरन ने तकिया अपने सिर से हटा कर दोनों जाँघों के बीच में रखा और मस्ती में करवट बदलने लगी, कभी इस तरफ करवट लेकर लेटती कभी उस तरफ करवट लेकर लेटती, कभी मन ही मन मुस्कुराती कभी जोश में तकिए को दोनों जाँघों से भींचती, एक बार पलटकर उसने अपनी अम्मा को देखा तो हल्का झेंप सी गयी, रात के अंधेरे में ज्यादा तो नही दिख रहा था पर इतना तो आभास हो ही गया था कि उसकी अम्मा भी अभी जग ही रही थी और उसे ही देख रही थी।
अंजली- क्या हुआ नींद नही आ रही क्या तुझे?
किरन- मच्छर लग रहे हैं न, नींद तो बहुत कस के लगी है पर ये मच्छर सोने दे तब तो।
अंजली- तो जा के मच्छरदानी ले आ.....लगा ले, वहीं बरामदे में मेरी मच्छरदानी रखी है...जहाँ सत्येन्द्र सो रहा है.....जा ले आ।
किरन- ठीक कहती हो अम्मा ले आती हूँ नही तो सो नही पाऊंगी....और ये भाई भी न....ये नही की बाहर सो जाऊं खुले में...वहां बरामदे में लेटा हैं अकेला।
किरन खाट से उठकर जाने लगी तो उसकी अम्मा फिर बोली- लेटने दे जिसका जहां मन करे लेटे।
किरन- अम्मा तुम्हारे लिए भी ले आऊं मच्छरदानी।
अंजली- नही रहने दे मुझे नही लगाना, मुझे तो घुटन होती है उसमें, मेरी तो ऐसे ही आदत है सोने की।
किरन- हां तुम तो लगाती ही नही हो।
किरन उठकर बरामदे में गयी, और उसके आने की आहट जैसे ही सत्तू को हुई वो चुप करके सोने का नाटक करने लगा, वैसे वो छोड़ना तो अपनी बहन को भी नही चाहता था पर आज उसका पूरा मन अल्का पर था, पर फिर भी उसका मन मचल ही गया, जब किरन ने बरामदे में आकर धीरे से बोला- देवर जी......ओ मेरे देवर जी....सो गए क्या?
सत्तू हल्का सा कसमसाया और ऐसे अभिनय किया जैसे किरन की आवाज सुनकर ही जागा हो, बरामदे में अंधेरा थोड़ा ज्यादा था, सत्तू धीरे से बोला- भौजी......मेरी भौजी आयी है क्या चोरी चोरी मुझसे मिलने।
किरन- हां आयी है अपने देवर से मिलने पर धीरे बोलो देवर जी कोई सुन लेगा।
किरन धीरे से सत्तू की खाट पर बगल में बैठती हुई बोली।
सत्तू- सुनने दो, जब एक भौजी दुनियां की नज़र बचा कर रात को अकेले में अपने देवर की खाट पर आई है उससे मिलने... तो मन कहाँ मानेगा अब।
सत्तू ने किरन का हाँथ धीरे से अपने हाँथ में ले लिया, सत्तू खाट पर दाहिने ओर करवट लेकर लेटा था, जब किरन खाट पर बैठने लगी तो वो थोड़ा पीछे सरक गया और उसको बैठने की जगह दी, किरन सत्तू से ऐसे चिपक कर बैठी की उसकी गुदाज गांड लगभग सत्तू के लंड और जाँघों के आसपास बिल्कुल चिपक गयी, अपनी सगी बहन का इसतरह उसपर लदकर बैठना सत्तू का मन बहकाने के लिए काफी था, सत्तू का मन अब अल्का से थोड़ा हटकर किरन की ओर आने लगा।
किरन- अच्छा तो चिल्लाओ फिर, ताकि ये जालिम जमाना जान जाए और एक भौजी को उसके नए नवेले देवर से अलग कर दे, तरसते रहना फिर।
सत्तू ने किरन का हाँथ अपने हाँथ में ले लिया और हल्का सा दबाते हुए बोला- तरसाओगी तो तरसेंगे।
किरन- तरसाना होता तो ऐसे आती रात को।
(किरन ने फुसफुसाकर धीरे से बोला)
सत्तू- तो एक हो जाओ अपने देवर से, इतनी दूर क्यों हो मेरी भौजी।
किरन- अम्मा अभी जग रही हैं, नही तो हो जाती कब का।
सत्तू- क्या?
किरन- हाँ, सच
सत्तू- तो फिर मेरी भौजी, तुम तो उनके बगल में ही लेटी थी न।
किरन- हम्म
सत्तू- तो आयी कैसे?
किरन धीरे से हंसते हुए- मेरे देवर का प्यार खींच लाया।
सत्तू- फिर भी....अम्मा अगर जग रही होंगी तो तुम नही आ सकती, इतना तो जानता ही हूँ।
किरन- दो चीज़ें हैं एक तो अपने देवर के बिना अब रहा नही जाता इसलिए मिलने आ गयी और दूसरा...मच्छरदानी
सत्तू- मच्छरदानी
किरन- हां.... मच्छरदानी....बाहर मच्छर काट रहे हैं बहुत....अम्मा बोली जा बरामदे में रखी है ले आ.....बस मौका मिल गया
सत्तू- मच्छर काट रहे हैं मेरी भौजी को।
किरन- अब तुम नही काटोगे तो.....कोई और ही कटेगा न।
(किरन ने ये बात थोड़ा धीरे से कही)
सत्तू- मैं तो कल सुबह टयूबवेल वाले दालान में ही काटने को तैयार था मेरी भौजी, सबकुछ काट लेता तेरा पर तुम्ही ने रोक दिया कि अभी नही, मेरी ससुराल में चलके जो करना है कर लेना।
सत्तू ने किरन को अपने ऊपर खींचते हुए बोला, किरन का अब शर्म से बुरा हाल होने लगा, पर शर्माते हुए भी किरन अपने भाई के मर्दाना जिस्म से लिपटने से खुद को रोक न पाई और
धीरे से सत्तू के बगल में लेटने लगी, हल्का सा सिसकते हुए बोली- अम्मा को शक हो जाएगा देवर जी...अगर देर हो गयी जाने में तो...थोड़ा सब्र करो......पता है सब्र का फल मीठा होता है।
सत्तू ने खींचकर किरन को बाहों में भर ही लिया, मना करते करते किरन भी कस के सत्तू की बाहों में समा ही गयी, एक तरफ वो मना भी कर रही थी दूसरी तरफ सत्तू के ऊपर लेटती भी जा रही थी, दोनों की सांसें तेज होने लगी, किरन डर भी रही थी कि कहीं अम्मा को शक न हो जाये, पर सत्तू समझ नही रहा था, अब वो धीरे से किरन को नीचे करते हुए उसके ऊपर चढ़ने लगा, हल्का सा सिसकते हुए किरन सत्तू के नीचे आने लगी और कुछ ही पल में सत्तू अपनी सगी बहन के ऊपर चढ़ चुका था, किरन की आंखें मस्ती में बंद हो गयी, उसने खुद ही अपने पैर उठाकर सत्तू की कमर में लपेट दिए, सत्तू धीरे धीरे अपने होंठ किरन के गाल पर रगड़ने लगा तो किरन धीरे से उसके बालों को सहलाने लगी, फिर बड़े प्यार से हल्की सी सिसकी लेते हुए बोली- अपनी भौजी के ऊपर कोई ऐसे चढ़ता है....गंदे.....भौजी मां समान होती है पता है न....ईईईईईशशशशशश......ऊऊऊईई.....माँ....... धीरे धीरे.....काट मत
सत्तू ने कस के किरन के गालों को होंठों में भरकर भरकर चूमना और काटना शुरू कर दिया
सत्तू- जो भी हो भौजी पर मजा तो इसी में आता है न......भौजी के ऊपर देवर न चढ़े तो ये रिश्ता पूरा कैसे होगा, और जिसकी भौजी इतनी मस्त हो वो भला कैसे रोक सकता है खुद को.....और क्या भौजी नही चाहती देवर को अपने ऊपर चढ़वाना।
किरन ये सुनकर शर्मा गयी, एक तो सत्तू लगातार उसके गालों और गर्दन के पास चूमे और काटे जा रहा था, ऊपर ये ऐसी कामुक बातें उत्तेजना को चरम पर पहुचाने में कोई कसर नही छोड़ रही थी, किरन शर्म से चुप हो गयी।
सत्तू- बोल न भौजी
किरन धीरे से शर्मा कर बोली- चाहती है चढ़वाना अपने ऊपर।
सत्तू- हाय... मेरी भौजी।
सत्तू ने अपने दोनों हाँथ नीचे ले जाकर किरन की फैली हुई गांड थाम ली और पूरी गुदाज गांड को अच्छे से हाँथ फेर फेर के दबा दबा के सहलाने लगा, किरन ने अपने दोनों पैर अपने भाई की कमर पर लपेट रखे थे जिससे उसकी गांड नीचे से अच्छे से उठ चुकी थी जिसका बड़े अच्छे से मुआयना किया जा सकता था। जैसे ही सत्तू ने अपनी बहन की गांड को दोनों हाँथ में भर भरकर अच्छे से दबा दबा कर सहलाना शुरू किया, किरन अपने सगे भाई के हाँथ अपनी गांड पर महसूस कर शर्म और उत्तेजना से सिरह उठी, दोनों बदहवास हो गए, आज पहली बार दोनों भाई बहन के बीच कुछ ऐसा हो रहा था जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नही की होगी, और रिश्ता था देवर भाभी का, पर मूल रूप से वो थे तो भाई बहन ही, इसलिए मूल रिश्ते का आनंद दोनों को अत्यंत उत्तेजित कर रहा था, और उसमे तड़का लगा रहा था देवर भाभी का रिश्ता।
किरन सिसकते हुए धीरे से बोली- बस....देवर जी.....आआआआह.......शर्म आ रही है......कितना सहलाओगे उसको......अभी बस करो नही तो तुम्हारी ये भौजी बहक जाएगी.......और अभी सबकुछ करने का सही वक्त नही है.....मेरे राजा....
सत्तू ने किरन की गांड को दोनों हांथों से सहलाते हुए उसके कान के पास मुँह ले जाकर बोला- कितने चौड़े और नरम नरम हैं ये मेरी भौजी, आज पहली बार इन्हें सहलाकर मानो मैं जन्नत में पहुंच गया।
किरन का शर्म से बुरा हाल था, एक तो सत्तू उसके ऊपर पूरी तरह चढ़ा हुआ था, ऊपर से लगातार चूमे जा रहा था और करीब 2 3 मिनट तक अच्छे से उसकी गांड दबा दबा कर सहलाते हुए जब ये बात उसने कही तो किरन शर्म से दोहरी हो गयी, अपने भाई के मुंह से इतनी कामुक बात सुनकर उसकी उत्तेजना अब बेकाबू होने लगी थी, उसकी बूर अब रिसना चालू हो गयी, जैसे ही उसका ध्यान अपनी बूर पर गया, सलवार के ऊपर से ही अपने सगे भाई के लोहे समान लंड के अहसाह मात्र से उसकी आआह निकल गयी, जैसे ही किरन ने हल्के से आआह भरी, सत्तू ने किरन की बूर पर अपने लंड को ठीक से भिड़ाकर और अच्छे से दबा दिया, किरन गनगना कर अपने भाई से और कस के लिपट गयी, उसकी बूर उत्तेजना में अब इतनी उभर गयी थी कि पैंटी और सलवार के अंदर होते हुए भी सत्तू को उसकी बूर की फांकें साफ महसूस हो रही थी और उन फाकों के बीच में सत्तू अपना मूसल जैसा लंड भिड़ाकर हौले हौले रगड़ रहा था, और दोनों हाँथों से उसकी पूरी गांड को लगातार सहला भी रहा था। उत्तेजना में मदहोश हो गए दोनों।
कुछ देर में किरन ने बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला और धीरे से सत्तू के चेहरे को अपनी हथेली में लेकर बोली- देवर जी बस....
सत्तू- नही भौजी....थोड़ा और... रगड़ने दो न......ऊपर ऊपर
किरन- रगड़ लेना जी भरके.....पर मेरी बात सुन पगलू..... अम्मा को शक हो जायेगा.......समझा कर न.....ऐसे पागल बनना ठीक नही...
सत्तू- मुझे मेरे सब्र का फल खाना है
किरन- खा लेना मेरे देवर जी ये फल तो तुम्हारा ही है, पर यहां नही, और एकांत में.....जहां कोई दखल न दे सके, यहां तो सबको पता चल जाएगा न।
सत्तू- क्या पता चल जाएगा मेरी भौजी?
सत्तू ने अपना लंड किरन की बूर पर कपड़ों के ऊपर से ही धसाते हुए बोला तो किरण अपने नितम्बों को चिहुंकते हुए हल्का सा उचकाकर बोली- यही की एक देवर भाभी का वो वाला फल खाता है।
और कहकर शर्माते हुए सत्तू से लिपट गयी।
जैसे ही किरन ने ये लाइन बोली सत्तू ने अपने होंठ उसके दहकते होंठों पर रख दिये, दोनों की आंखें वासना में बंद हो गयी, दोनों एक दूसरे के होंठो को चूसने लगे, एक बार फिर हल्की सिसकी गूंज उठी।
आज पहली बार किरन अपने सगे भाई के नीचे लेटी थी, उसने कभी सोचा भी नही था कि एक दिन वो अपने सगे भाई के साथ ये सब करेगी, इतना भी मजा जीवन में आ सकता है इसका उसे पहले कभी अंदाजा भी नही था, उसका सगा भाई आज उसका देवर बन चुका था, और आज रात के अंधेरे में दोनों कैसे गुथे हुए थे।
अभी दोनों ने एक दूसरे को चूमना शुरू ही किया था कि बाहर से अंजली की आवाज आई- किरन..... मिली नही क्या मच्छरदानी, अंधेरे में मिल नही रही तो टॉर्च ले जा।
इतना सुनते ही दोनों हड़बड़ा के उठ गए, सत्तू खाट पर लेट गया और किरन अपने कपड़े सही करते हुए बगल ही बक्से पर रखी मच्छरदानी उठाते हुए बोली- हां अम्मा मिल गयी, आती हूँ, अपनी साँसों को काबू करने में उसे कुछ वक्त लग गया।
किरन- देखा मेरे देवर जी...बोला था न यहां ठीक नही।
सत्तू- रहा नही जाता भौजी....क्या करूँ, सब्र का फल खाना है मुझे।
किरन हल्का सा हंसते हुए- पर यहां ये लोग खाने नही देंगे समझे देवर जी.....इसलिए वहीं चलो जहां कहती हूँ।
सत्तू- ठीक है मेरी भौजी.....ले चलूंगा तुझे वहीं....जहां तुम चाहती हो।
किरन ने झट से सत्तू को होंठों को चूमा और जल्दी से बरामदे से बाहर आ गयी, अपनी खाट पर उसने मच्छरदानी लगाई और लेट गयी, साँसे उसकी अब भी तेज ही चल रही थी, उसने अपनी अम्मा को धीरे से आवाज लगाई, उसकी अम्मा ने बड़ी मुश्किल से 'उऊँ' बोला तो वो समझ गयी कि अम्मा अब नींद में हैं, वो भी सत्तू के साथ कि गयी रासलीला के आनंद में डूबी हुई धीरे धीरे नींद के आगोश में चली गयी।