Part 5
रात के उस होश उड़ा देने वाले मंज़र के बाद, जब स्मिता ने अर्जुन की नग्न, कड़क मर्दानगी को अपनी आँखों से देखा था, सुबह की पहली किरण तक उसकी पलकें नहीं झपकी थीं। भोर होते ही वह अपने बिस्तर से उठी। उसका पूरा बदन एक अजीब सी तपन और टूटन से भर रहा था। उसने रात भर अपनी जांघों के बीच जो गीलापन महसूस किया था, उसे साफ़ करने के लिए वह सीधे अपने बेडरूम से जुड़े बाथरूम की तरफ बढ़ी।
जल्दबाजी और रात के उस मानसिक तूफान के कारण, स्मिता से एक बहुत बड़ी चूक हो गई। उसने नहाने से पहले अपनी जो गाढ़े मैरून रंग की, लेस वाली पैन्टी उतारी थी—जो रात भर उसके अपने रसीले, कामुक पानी से भीगकर नम हो चुकी थी—उसे वह वॉशबेसिन के बगल में लगे स्टील के एक हुक पर टांगकर भूल गई। नहाने के बाद उसने हल्के बादामी रंग की एक महीन कॉटन साड़ी पहनी, उसने अपने स्लीवलेस ब्लाउज के नीचे जानबूझकर कोई ब्रा नहीं पहनी थी। स्तनों के निप्पल (nipples) अभी भी कल रात की उत्तेजना से कड़े थे, जो ब्लाउज के पतले कपड़े को अंदर से कुरेद रहे थे। वह बिना पैन्टी पहने ही, अपनी देह को हवा देती हुई किचन की तरफ चली गई।
उसके बाहर निकलते ही, अर्जुन की आँख खुली। रात के अधूरेपन और अपनी माँ के उस साटन गाउन वाले रूप की कल्पना ने उसे भी सोने नहीं दिया था। उसका शरीर इस समय केवल एक हल्के स्लेटी रंग के boxer में था, जिसके आगे का हिस्सा उसकी सुबह की कड़क मर्दानगी के कारण किसी तने हुए तीर की तरह उभरा हुआ था। वह अलसाया हुआ सीधे उसी बाथरूम में घुसा।
बाथरूम के भीतर अभी भी स्मिता के नहाने के बाद की गर्म भाप और उसके 'लक्स' साबुन की भीनी-भीनी, स्त्रीसुलभ खुशबू तैर रही थी। अर्जुन जैसे ही बेसिन के पास अपना मुंह धोने बढ़ा, उसकी नजर ठीक बगल के हुक पर पड़ी।
वहाँ स्मिता की वह भारी, मैरून रंग की नायलॉन-लेस पैन्टी टंगी थी।
अर्जुन की सांसें वहीं थम गईं। उसने आगे बढ़कर अपनी बड़ी, कांपती हुई उंगलियों से उस महीन कपड़े को छुआ। पैन्टी का जो हिस्सा (crotch area) औरत के सबसे निजी अंग को छूता है, वह हिस्सा स्मिता के रात भर के गाढ़े, रसीले पानी से अभी भी हल्का सा नम और चिपचिपा था। अर्जुन ने उस पैन्टी को हुक से उतारा और सीधे अपनी नाक से सटा लिया।
"ओह... माँ..." अर्जुन के मुंह से एक गहरी, दबी हुई कराह निकली।
उस पैन्टी से उसकी माँ के जिस्म की वह असली, तीखी और औरत जात की कस्तूरी जैसी खुशबू आ रही थी, जिसे सूंघते ही अर्जुन का लण्ड पत्थर से भी ज्यादा कड़क हो गया। वह अब खुद पर काबू नहीं रख पा रहा था। उसने अपने दूसरे हाथ से अपने बॉक्सर के भीतर हाथ डाला और अपनी उस मोटी, लंबी और नस-नस उभरी हुई मर्दानगी को बाहर निकाल लिया। उसका वह कड़क औजार इस समय अपनी पूरी लंबाई में तन चुका था, जिसके tip से काम-रस की एक बूंद पहले ही टपक चुकी थी।
उसने माँ की उस भीगी हुई पैन्टी को अपने उस कड़क अंग के चारों तरफ लपेट लिया। रेशमी लेस का वह कपड़ा जब उसकी मर्दानगी की संवेदनशील त्वचा से रगड़ खाया, तो अर्जुन की आँखों के सामने अपनी माँ की वह ५४ साल की भारी, रसीली देह, उनके बड़े-बड़े गोल स्तन और उनके नितंबों की गोलाई नाचने लगी। वह तेजी से अपने हाथ को ऊपर-नीचे चलाने लगा। पैन्टी के कपड़े पर उसकी उंगलियों की पकड़ मजबूत होती गई। उसकी सांसें किसी हांफते हुए जानवर जैसी हो गईं।
बाथरूम के उस बंद एकांत में, केवल कपड़े की सरसराहट और अर्जुन की भारी सांसों की आवाज थी। मात्र कुछ ही पलों के उस तीव्र घर्षण के बाद, अर्जुन के सब्र का बांध टूट गया। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक तगड़ा करंट दौड़ा और उसकी जांघें कांप उठीं। उसके कड़क अंग के मुंह से उसका गाढ़ा, सफ़ेद और गर्म वीर्य एक के बाद एक कई पिचकारियों के साथ बाहर छूटा।
उसने जानबूझकर उस पूरे गाढ़े, दूधिया वीर्य को मां की उसी पैन्टी के बीचों-बीच, उसके अपने रसीले पानी वाले हिस्से पर ही निकाल दिया। वह गाढ़ा रस उस मैरून कपड़े पर फैल गया। अर्जुन ने एक गहरी सांस ली, अपने अंग को वापस अंदर किया, और स्मिता की उस वीर्य से सनी हुई पैन्टी को बिना धोए, वैसे ही वापस उस स्टील के हुक पर टांग दिया। वह यह देखना चाहता था कि उसकी माँ इस सीधे, नग्न संदेश पर क्या प्रतिक्रिया देती है।
करीब आधे घंटे बाद, जब अर्जुन बाहर लिविंग रूम में अखबार पढ़ने का नाटक कर रहा था, स्मिता को अचानक याद आया कि वह अपनी पैन्टी बाथरूम में ही भूल आई है। उसका दिल धक से रह गया। वह तेजी से बाथरूम की तरफ बढ़ी और अंदर घुसकर दरवाजा बंद कर लिया।
उसकी नजर हुक पर पड़ी। पैन्टी वहीं थी। लेकिन जैसे ही वह उसे उठाने के लिए आगे बढ़ी, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
मैरून रंग के उस गहरे कपड़े के ठीक बीच में, जहाँ सुबह उसका अपना पानी लगा था, अब एक बहुत ही गाढ़ा, लसदार और सफ़ेद रंग का धब्बा चमचमा रहा था। वह कोई मामूली दाग नहीं था। वह उसके जवान, तंदुरुस्त बेटे के जिस्म का सबसे शुद्ध निचोड़ था—उसका गाढ़ा वीर्य। वह अभी भी पूरी तरह सूखा नहीं था, बल्कि उसकी चिपचिपाहट और उसकी एक तीखी, ब्लीच जैसी मर्दाना गंध पूरे बाथरूम की हवा में तैर रही थी।
स्मिता की सांसें गले में अटक गईं। उसकी जांघें कांपने लगीं। वह समझ गई कि अर्जुन ने यह जानबूझकर किया है। यह उसकी तरफ से एक सीधा, बिना शब्दों का ऐलान था कि वह अपनी माँ की इस देह को किस कदर चाहता है।
एक पल के लिए समाज और लोकलाज का डर उसके दिमाग में आया, लेकिन अगले ही पल उसके भीतर की कामुक मादा पूरी तरह हावी हो गई। उसने कांपते हाथों से उस पैन्टी को हुक से उतारा। अर्जुन के उस गाढ़े वीर्य की महक उसकी नासिकाओं में समा गई। उसने अपनी आँखें बंद कीं, बाथरूम के दरवाजे से अपनी पीठ टिकाई और धीरे-धीरे नीचे फर्श पर खिसकती चली गई।
उसने उस वीर्य से सनी हुई पैन्टी को अपने चेहरे पर मल लिया। अर्जुन के उस सफ़ेद रस का कुछ हिस्सा उसके होठों और उसकी गालों पर लग गया। वह पूरी तरह से कामुकता के नशे में डूब चुकी थी। उसने अपनी बादामी साड़ी को घुटनों से ऊपर उठा दिया, जिससे उसकी भारी, गोरी और सुडौल जांघें पूरी तरह नंगी हो गईं। नीचे उसने कुछ नहीं पहना था।
उसने उस पैन्टी के उस हिस्से को, जहाँ अर्जुन का वीर्य और उसका अपना पानी आपस में मिल चुके थे, सीधे अपनी योनि (pussy) की दरार पर रख दिया।
"ओह... आअह... बेटा..." स्मिता के होठों से एक तीखी, दबी हुई सिसकी निकली।
उसने उस कपड़े को अपनी योनि की मखमली पंखुड़ियों पर रगड़ना शुरू किया। अर्जुन का वह गाढ़ा रस उसकी अपनी योनि के रसीले पानी के साथ घुलकर एक हो गया। उसने अपनी उंगलियों से अपनी उस कामुक जगह को कपड़े के ऊपर से ही भींचना शुरू किया। उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से पूरी तरह गिर चुका था, और बिना ब्रा के उसके भारी, रसीले स्तन हवा में थरथरा रहे थे। वह अपनी दूसरी हथेली से अपने स्तनों को भींचने लगी, उनके कड़े निप्पल को अपनी उंगलियों से मरोड़ने लगी। अर्जुन के वीर्य का वह स्पर्श उसे चरम सुख की तरफ ले जा रहा था। कुछ ही मिनटों की उस तीव्र रगड़ के बाद, स्मिता का पूरा बदन अकड़ गया, उसकी आँखें उलट गईं, और उसकी योनि ने पानी का एक बहुत बड़ा सैलाब छोड़ दिया। वह फर्श पर बैठी हांफती रही, अर्जुन के रस से तरबतर होकर।
बाथरूम के उस एकांत में अर्जुन के वीर्य का स्वाद और उसकी छुअन अपनी योनि की मखमली पंखुड़ियों पर महसूस करने के बाद, स्मिता ने खुद को साफ़ किया। उसने उस मैरून पैन्टी को हल्के गुनगुने पानी से धोया। लेकिन माँ के संस्कार और इतने सालों की लोकलाज उसके भीतर अभी भी थी। वह सीधे अर्जुन के सामने जाकर नग्नता का प्रदर्शन नहीं कर सकती थी। उसे अपनी झिझक के दायरे में रहकर ही उस कड़क मर्द को इशारा देना था।
उसने उस पैन्टी को घर के भीतर सुखाने के बजाय, लिविंग रूम से जुड़ी हुई गैलरी की डोरी पर ले जाकर टांग दिया। दोपहर ढल चुकी थी और आसमान में अचानक काले-स्याह बादलों का डेरा जमा होने लगा था। मुंबई की मानसूनी हवाओं में एक बार फिर से भारी नमी और ठंडक घुलने लगी थी, जो बारिश के आने का साफ़ संकेत थी।
स्मिता किचन में खड़ी शाम की चाय बना रही थी। उसने एक सादे, हल्के कत्थई रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जिसका पल्लू उसके सीने पर सलीके से लिपटा था। तभी बाहर गड़गड़ाहट हुई और ठंडी हवा का एक तेज झोंका सीधे किचन तक आया।
"अर्जुन!" स्मिता ने किचन से ही अपनी मखमली, भारी आवाज में पुकारा। "बाहर देखो, बारिश आने वाली है। जरा गैलरी से कपड़े उठा लाओ, वरना सब दोबारा भीग जाएंगे।"
लिविंग रूम में सोफे पर बैठा अर्जुन, जो सुबह की उस पैन्टी वाली घटना के बाद से ही अपनी जांघों के बीच सुलगती बेचैनी से जूझ रहा था, तुरंत उठा। "हाँ माँ, लाता हूँ," उसने कहा और गैलरी का कांच का दरवाजा खिसकाकर बाहर आ गया।
गैलरी में तेज हवा चल रही थी। अर्जुन जैसे ही डोरी के पास पहुँचा, वह चौंक गया। डोरी पर कोई और कपड़े नहीं थे—केवल उसकी माँ, स्मिता के सबसे अंतरंग और निजी वस्त्र टंगे थे।
वहाँ मां की वह मैरून रंग की लेस वाली पैन्टी हवा में लहरा रही थी, जिसे अर्जुन ने सुबह अपने वीर्य से सराबोर किया था। साबुन से धुलने के बाद भी, उस महीन नायलॉन के धागों में स्मिता के जिस्म की वह प्राकृतिक, कस्तूरी जैसी खुशबू अभी भी कहीं न कहीं रची-बसी थी। उसके ठीक बगल में स्मिता की दो और पैन्टियाँ टंगी थीं—एक गहरे काले रंग की साटन पैन्टी और एक सफ़ेद सूती ब्रीफ।
अर्जुन के हाथों में एक अजीब सी कपकंपी छूटी। उसने चारों तरफ देखा। बाहर बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। उसने अपनी बड़ी, गठीली हथेलियों में अपनी माँ के उन undies को समेटा। जब मैरून पैन्टी का वह हिस्सा उसकी उंगलियों से छूआ, तो उसे सुबह का अपना वह गाढ़ा, सफ़ेद बहाव याद आ गया जो इस कपड़े के आर-पार हुआ था। उसके शॉर्ट्स के भीतर उसका औजार एक बार फिर से पूरी ताकत से सर उठाने लगा।
वह उन कपड़ों को एक गुच्छे की तरह अपनी छाती से सटाकर लिविंग रूम में वापस आया। स्मिता किचन के दरवाजे पर खड़ी थी। उसकी नजर सीधे अर्जुन के हाथों में दबी अपनी उन पैन्टियों पर पड़ी। उसके चेहरे पर एक हल्की सी लाली दौड़ी, लेकिन उसने अपनी नजरें नहीं झुकाईं।
"माँ, ये... ये तुम्हारे कपड़े," अर्जुन ने अपनी कत्थई आँखों में झिझक लिए, थोड़ा हकलाते हुए कहा।
स्मिता आगे बढ़ी। उसके बदन की सादगी के नीचे एक सुलगती हुई औरत छिपी थी। उसने चाय का कप टेबल पर रखा और अर्जुन के बिल्कुल करीब आकर खड़ी हो गई। इतनी करीब, कि उसके स्तनों का भारी उभार अर्जुन की सैंडो बनियान से छूते-छूते बचा।
"एक काम कर, अर्जुन," स्मिता ने अपनी आवाज को थोड़ा और धीमा, रेशमी करते हुए कहा। "इन्हें मेरे बेडरूम में ले जा। और जो अलमारी है, उसके नीचे वाले drawer में ठीक से तह करके रख दे।"
अर्जुन अपनी माँ के उस सुलगते हुए आदेश को टाल नहीं सका। वह भारी कदमों से स्मिता के खुशबूदार बेडरूम में घुसा। कमरे में 'लैवेंडर' की एक शांत, स्त्रीसुलभ महक थी। उसने अलमारी का भारी दरवाजा खोला और नीचे वाले दराज को बाहर खींचा।
दराज खुलते ही अर्जुन की सांसें भारी हो गईं।
वहाँ स्मिता की अंतरंग दुनिया बिखरी पड़ी थी। अलग-अलग रंगों, डिजाइनों और कपड़ों की पैन्टियाँ और ब्रा वहाँ सलीके से रखी थीं। सिल्क, साटन और नेट की कई ब्रा (bras) थीं जिनके भारी कप्स स्मिता के ३६-डी साइज के स्तनों की गवाही दे रहे थे। अर्जुन ने गैलरी से लाए कपड़ों को वहाँ रखा। वह उस दराज को बंद करने ही वाला था कि पीछे से एक साए की आहट हुई।
मां धीरे-धीरे चलकर अर्जुन के ठीक पीछे आकर खड़ी हो गई। उसकी साड़ी का पल्लू अब थोड़ा ढीला होकर उसके कंधे से नीचे सरक चुका था, जिससे उसकी मखमली पीठ और उसकी छाती का ऊपरी गोरा हिस्सा साफ दिख रहा था।
"रख दिया?" स्मिता ने सीधे अर्जुन की पीठ के पीछे से फुसफुसाया।
उसकी गर्म सांसें अर्जुन की नंगी गर्दन के बालों को सहला गईं।
अर्जुन मुड़ा। वह अब इस मानसिक खिंचाव को और नहीं सह पा रहा था। "हाँ माँ... रख दिया।"
स्मिता ने अलमारी के उस दराज को देखा, फिर अपनी नजरें उठाईं और सीधे अर्जुन की आँखों में आँखें डाल दीं। उसकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ऐसी ढिठाई थी जो केवल एक परिपक्व औरत में ही हो सकती है। वह हल्के से मुस्कुराई—एक ऐसी कामुक, रहस्यमयी मुस्कान जो अर्जुन को पागल कर देने के लिए काफी थी।
"वैसे अर्जुन..." स्मिता ने अपनी आवाज को और मदहोश करते हुए कहा, उसका हाथ अनजाने में अलमारी के हैंडल पर टिक गया, जिससे उसकी छाती और आगे की तरफ तन गई। "रात को तुम... ऐसे ही सो जाते हो क्या? अपने कमरे का दरवाजा पूरा खुला रखकर?"
यह सुनते ही अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका दिल जोर से धड़का। वह समझ गया कि कल रात जब वह पूरी तरह नंगा होकर अपने उस कड़क औजार के साथ सो रहा था, शायद माँ ने उसे देख लिया था।
"माँ... वो... वो रात को कब नींद आई पता ही नहीं चला, तो..." अर्जुन ने सकपकाते हुए अपनी नजरें झुका लीं, उसका चेहरा शर्म और वासना से लाल हो रहा था।
स्मिता ने उसे टोकने या कुंडी लगाने की हिदायत देने के बजाय, अपनी उंगली से अर्जुन की बनियान के कंधे की पट्टी को हल्के से छुआ। वह छुअन इतनी बारीक थी कि अर्जुन के पूरे बदन के रोएं खड़े हो गए।
"मुझे पता है, बेटा," स्मिता ने बहुत ही धीमी, रॉ और कामुक आवाज में कहा, उसकी आँखें एक सेकंड के लिए अर्जुन के शॉर्ट्स के भीतर कड़े हो चुके उस बड़े उभार पर टिकीं। "बेटा, इतना काम न कर, अपनी सेहत का भी ध्यान रख, वैसे नंगे सोने में एक अलग ही आराम होता है, कहते है शरीर के लिए भी सही है, कोई बात नहीं... और इस घर में हमारे अलावा और है ही कौन?"
यह कहकर स्मिता ने अर्जुन की आँखों में एक आखिरी, सुलगती हुई नजर डाली—एक ऐसा मूक संकेत, जिसने यह साफ़ कर दिया था कि दरवाजा अब सिर्फ कमरे का नहीं, बल्कि मर्यादा का भी खुल चुका है।
वह मुस्कुराती हुई कमरे से बाहर निकल गई, और अर्जुन अपनी माँ के कपड़ों की उस खुशबू के बीच, अपने कड़क लंड को थामे वहीं खड़ा हांफता रह गया।
अर्जुन को लगा मां ने अपनी गरिमा को बनाए रखते हुए भी यह 'ग्रीन सिग्नल' दे दिया है कि वह रात को उसके नंगे बदन को देख चुकी है और उसे इससे कोई ऐतराज नहीं है।
अब उसे कुछ लग रहा था कि माँ भी उस जिस्मानी मिलन के लिए शायद तैयार है, और पहले कदम का इंतजार है।