एक सौ बीसवां अपडेट
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रुप बाथरूम से तरोताजा हो कर वार्ड रोब के सामने खड़ी हो जाती है उसमें में से कपड़े छान लेने के बाद एक अच्छी कॉम्बिनेशन निकाल कर पहन लेती है फिर आईने के सामने खड़ी हो कर संवरने लगती है l ठक ठक ठक की आवाज से उसकी ध्यान दरवाजे पर जाति है l वह जाकर दरवाजा खोलती है l सामने शुभ्रा खड़ी थी l
शुभ्रा - क्या मैं अंदर आ सकती हूँ...
रुप - क्या भाभी... ऐसे पुछ कर बेगाना तो मत कीजिए...
शुभ्रा, कमरे के अंदर आती है l उसे वार्ड रोब खुला मिलता है l जिसे देख कर उसके होठों पर एक मुस्कराहट आ जाती है l
शुभ्रा - हूं.. हूँ.. आज कल फेशन सेंस और कलर कॉम्बिनेशन की अच्छी जानकारी हो गई है तुम्हें... ह्म्म्म्म... (रुप की ओर मुड़ कर) और संवरने भी खूब लगी हो... हाँ यह बात और है... जिसके लिए संवर रही हो... वह यहाँ नहीं है...
रुप - (मुस्कराते हुए) तो क्या हुआ भाभी... यह आज की जेनरेशन है... (इतना कह कर रुप एक सेल्फी ले लेती है) इसे मैं प्रताप पास भेज दूंगी... और वह अपना कमेंट कर देगा...
शुभ्रा - (थोड़ी गंभीर हो जाती है) नंदिनी... तुम्हें नहीं लगता... तुम अपनी प्यार के रास्ते पर... गाड़ी बहुत तेजी से भगा रही हो... बीच रास्ते में बहुत से गड्ढे.... अड़चनें.. रुकावटें आयेंगी... पर तुम बहुत बेफिक्र लग रही हो...
रुप - तो आने दीजिए ना भाभी... (अपनी हाथ फैला कर घूमते हुए) मुझे तो अभी उड़ना ही है... (अचानक रुक जाती है) वैसे भाभी... आप किचन के या डायनिंग टेबल वजाए यहाँ... इस वक़्त...
शुभ्रा - कल तुमने कॉलेज क्यूँ बंक किया...
रुप - (चेहरे का भाव ऐसा हो जाता है जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई, अपना सिर झुका लेती है)
शुभ्रा - जानती हो... तुम्हारे सभी दोस्तों के पास मेरा नंबर है... फोन तो नहीं करती थीं... पर तुम्हारे बारे में कभी कभी चैट जरूर करके पूछती थीं.. मैंने कल चैट से उन्हें मेसेज किया था... के तुम आ गई हो... और उन्हें सरप्राइज देने वाली हो...
शुभ्रा - (वैसे ही सिर झुकाए चुप रहती है)
शुभ्रा - तुम अपनी प्यार को हासिल करने गई... पर अपने दोस्तों को कैसे भूल गई... जितने भी दिन तुम गाँव में रुकी... ना उनको तुमने फोन किया... ना चैट... हाँ... बात चूंकि राजगड़ की थी... इसलिए तुम्हारे दोस्तों ने फोन नहीं किया था... याद है.. यह वही दोस्त हैं... जो तुम्हारे अंदर की इस नंदिनी को बाहर निकाला था... क्या प्रताप के आने से तुम उन्हें भूल गई या... किनारा कर लिया...
रुप - (चेहरा सख्त हो जाता है) नहीं भाभी... यह इल्ज़ाम है... तोहमत है मुझ पर... मैं नहीं भुली हूँ... मैं जब राजगड़ गई थी... तभी मैंने अपने दोस्तों से कह दिया था... के जब तक मैं ना लौटुं तब तक... नो कॉल.. नो चैट.... हाँ कल मेरा उन्हें सरप्राइज देने का प्लान था... पर नहीं दे पाई... इसीलिए कल दोपहर को ही बनानी और दीप्ति से बात कर ली थी... और उनसे माफी भी मांग ली थी... पर यह क्या भाभी... आप मेरे दोस्तों को आगे रख कर... मुझ पर मेरे प्यार की अपराध बोध का बोझ क्यूँ डाल रही हैं...
शुभ्रा - तो कल... कल तुम कॉलेज के बहाने... गई कहाँ थी...
रुप - (सपाट लहजे में) अपने घर...
शुभ्रा - (हैरान हो कर) क्या... क्या मतलब... अपने घर...
रुप - कल वीर भैया को ड्रॉप करने के बाद... अचानक मेरे मन में आया कि... मुझे एक बार... अपने होने वाले सास ससुर से मिलना चाहिए... इसलिए कटक चली गई थी...
शुभ्रा - (हैरान हो कर) मतलब प्रतिभा मैम...
रुप - जी भाभी...
शुभ्रा अपने कानों के पास बालों को पकड़ कर बैठ जाती है l वह अपना सिर उठा कर रुप की आँखों में झांकने की कोशिश करती है l
शुभ्रा - मैंने झूठ नहीं कहा था... तुम... बेलगाम,बेकाबू हो कर भाग रही हो... संभल कर... नंदिनी... संभल कर... जब गिरोगी... तो मुहँ के बल गिरोगी...
रुप - (मुस्करा कर) जब थामने वाला मजबुत बांह वाला हो... (आँख वींक करते हुए) तो डर किस बात की भाभी...
शुभ्रा - इतना भरोसा है तुम्हें प्रताप पर...
रुप - जी बिलकुल... मुझे मेरे प्रताप इतना भरोसा है कि... अब तो मैंने अपनी आँखे बंद कर ली है... फिर भी मुझे यकीन है... मंजिल मुझे मिल जाएगी...
शुभ्रा - हूँ... समझ सकती हूँ... मेरे कहने का मतलब है कि... तुम... थोड़ा धीरज धरो... तुम्हारा यह उतावला पन... कहीं तुम्हारा और प्रताप का भेद ना खोल दे... तुम समझ रही हो ना... तुम उस परिवार की बेटी हो... जो अपनी नाक की आन के लिए... किसी भी हद तक जा सकते हैं...
रुप - हाँ जानती हूँ... पर... भाभी सच्चाई एक ना एक दिन तो सामने आएगी ही...
शुभ्रा - तब तुम्हें... राजा साहब के पसंद से... उनकी मर्जी से शादी करनी होगी....
रुप - नहीं भाभी... ऐसा कभी नहीं होगा... मेरा प्रताप ऐसा होने नहीं देगा....
शुभ्रा - (एक बेबसी सी भाव से रुप की ओर देख कर) या तो तुम ओवर कंफीडेंट हो... या फिर बेवक़ूफ़... मैं तुम्हें बात छुपाने के लिए नहीं... संभालने के लिए कह रही हूँ...
रुप - भाभी... मैंने कुछ भी नहीं छुपाया है... ना आपसे... ना चाची माँ से... क्यूंकि आप दोनों मेरे बहुत करीब हैं... और रही परिवार की बात... आप जिस परिवार की बात कर रही हैं... वह परिवार अब रिश्तों के अहं में नहीं जी रहे हैं... रिश्तों के व्यापार में जी रहे हैं... वह मेरी शादी... राज घराना देख कर शादी करा तो रहे हैं... पर असलियत में... उन्हें केन्द्रीय राजनीति में एक सीढ़ी चाहिए थी... जिसे वह दसपल्ला राज घराने के जरिए... हासिल करना चाहते हैं... आप अपनी ही बात देख लो...
शुभ्रा - तुम कहना क्या चाहती हो...
रुप - भाभी याद है... जब मैं यहाँ आई थी... मुझसे आपने एक वादा किया था... मेरे हर फैसले में आप साथ देंगी... साथ रहेंगी...
शुभ्रा - साथ हूँ... तभी तो... तुम्हें आगाह कर रही हूँ...
रुप - पर आज दोस्त बन कर नहीं... आज आप मेरी भाभी बन कर बात कर रही हैं...
शुभ्रा - (बिदक जाती है) यह क्या कह रही हो नंदिनी... तुम्हारी भाभी और दोस्त में अंतर क्या है...
रुप - अंतर है भाभी... अंतर है... आप सिर्फ दोस्त होतीं तो बात अलग होती... आज आप मिसेज विक्रम सिंह बन कर बात कर रही हैं...
शुभ्रा - (जबड़े भिंच जाती है, पर चुप रहती है)
रुप - बुरा मत मानना भाभी... और... दिल पर मत लेना... मैंने कभी भी... आपसे कोई भी बात नहीं छुपाया है... पर हाँ... कल की बात छुपाया जरूर था.... पर ऐसा था नहीं की मैं आपको बताती नहीं... (शुभ्रा कुछ भी जवाब नहीं देती) आपको दर्द है कि मैंने बताया नहीं... मैं बताने वाली थी... पर आपको अकेले में बताना चाहती थी... कल आप भैया के साथ ऑफिस में थीं... और भैया के साथ लौटीं भी... सारा वक़्त... उन्हीं के साथ थीं... इसलिए मौका नहीं मिला...
शुभ्रा - तो तुम मौका बनाती... मौका तुम्हें बनाना चाहिए था...
रुप - कैसे भाभी... और कब... आप अपनी दुनिया में खोई हुई थी... कब बताती...
शुभ्रा - यह कोई लॉजिक नहीं हुआ....
रुप - बात यही है भाभी... बात यही है... यह महल नुमा घर... इतना बड़ा घर... रहने को पचासों लोग रह सकते हैं... पर रहते कितने हैं... सिर्फ चार लोग... और हर एक कि अपनी अपनी दुनिया है... हम... सिर्फ खाने के टेबल को छोड़.. कभी भी और कहीं भी... इकट्ठा हुए हैं... आप ही बताइए कब... जब हम एक दूसरे से खुले... घुले... मिले.. आज हम चारों की दुनिया मिलती है... सिर्फ डायनिंग टेबल पर... फिर... वही किस्सा... हम अपनी अपनी कमरे में... अपनी अपनी दुनिया बना कर उसी में खो जाते हैं... यह एक घर है... पर इस घर की दुनिया एक नहीं है... इस घर में एक नहीं चार चार दुनिया बसती है...
शुभ्रा - ऐसा... ऐसा हर घर में होता है...
रुप - नहीं भाभी... ऐसा हर घर में नहीं होता... मैं जिस घर में कल गई थी... वह घर भले ही छोटा था... पर उस घर में सिर्फ एक ही दुनिया बसती है... उस घर में रहने वाला उसी घर की दुनिया का हिस्सा होता है...
शुभ्रा - नंदिनी... तुम इस घर में आजाद हो... कभी भी... किसी ने कहाँ तुम्हें टोका है...
रुप - नहीं... किसी ने नहीं रोका... पर खुद को बंधन में जकड़ी हुई सी मेहसूस करती हूँ... यहाँ उड़ान के लिए ऊँचा आसमान है... पर फिर भी यह आसमान पिंजरे में कैद लगता है... पर उस छोटे से घर में... सारा का सारा आसमान छोटा लगता है... इसीलिये मैं उस घर की आसमान में अपना हिस्से की उड़ान उड़ने गई थी...
शुभ्रा - (नरम पड़ते हुए) शायद तुम सच कह रही हो... तुम्हें लेकर थोड़ी हायपर हो रही हूँ... पर चिंता तो रहेगी ही ना... जरा सोचो... अगर विक्की को मालुम हो गया... तो... तुम खुद को धर्मसंकट में पाओगी...
रुप - नहीं भाभी... मैंने प्यार किया है... इसीलिए आपसे कभी कुछ छुपाया नहीं है... और रही धर्म संकट की बात... तो वह भैया के लिए होगा... मेरे लिए नहीं...
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क्या.... हैरानी भरे भाव से पुछता है भीमा l
हाँ तुमने सही सुना... बल्लभ भीमा से कहता है l
रोणा के सरकारी आवास में बल्लभ ने खबर भिजवा कर भैरव सिंह के सबसे खास भीमा को बुलाया था l विश्वा ने जो जो शनिया और उसके साथियों के साथ किया था सब कुछ बता दिया दिया था l सब सुनने के बाद भीमा चौंक पड़ा था l भीमा अपनी नजरें घुमाता है l सिर शर्म के मारे झुकाए खड़े थे शनिया और उसके साथी और एक कोने में रोणा खामोश मुहँ लटकाये एक जगह बैठा हुआ था l
भीमा - परसों रात को कांड हुआ... तुम लोग मुझे बताने की सोचा भी नहीं...
शनिया - वह... भीमा भाई.. हमें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था... विश्वा ऐसा कुछ करेगा...
सत्तू - हाँ भीमा भाई... शनिया भाई सही कह रहे हैं... सात साल पहले... जो एक बच्चा लग रहा था... पर आज ऐसा लग रहा है... जैसे कच्चा चबा जाएगा... और डकार भी नहीं लेगा...
भीमा - कमीने... उसके बारे में बता रहा है... या बड़ाई कर रहा है... जानता है... राजा साहब को मालुम हुआ तो क्या होगा...
बल्लभ - राजा साहब तक यह खबर ना पहुँचे... इसीलिये तुमको बुलाया है...
भीमा - यह आप क्या कह रहे हैं वक़ील बाबु... आप होश में तो हैं... अगर राजा साहब को खबर ना किया... तो उस हरामजादे की हिम्मत बढ़ जाएगी...
भूरा - लेकिन हमारी शामत आ जाएगी....
भीमा - सो तो आएगी ही... इतने साल राजा साहब के नाम पर रोटियाँ तोड़ी है... बोटीयाँ नोची है... उन्हीं के नाम पर लौंडीया लेकर खेत में हल घुमाए थे... पर जब नमक का हक अदा करने का वक़्त आया... तुम लोग किसी काम में ना आए....
भीमा के इतने कहने से ही कमरे में एकदम से मरघट की ख़ामोशी पसर जाती है l सबके चेहरे पर डर साफ दिख रहा था l जैसे सांप सूँघ गया हो l कमरे में रोणा था मगर वह शुरु से ही चुप था l
बल्लभ - (समझाते हुए) देखो भीमा... मैं तुम से इनकी वकालत नहीं कर रहा हूँ... बस इतना चाहता हूँ... तुम अपने साथियों को कुछ वक़्त का मोहलत दे दो...
भीमा - पर विश्वा... कैसे... ऐसे सांढ जैसे पट्ठों को...
भूरा - हमने भी यही सोचा था... ऊपर से हथियार बंद थे सब... पर... हमने पलक झपकाने की गलती कर दी... जब तक बात समझ पाये... तब तक... हमारे किसी के भी हाथों में हथियार नहीं थे...
भीमा - यह क्या बक रहे हो...
सत्तू - हाँ भीमा भाई... बिजली सी फुर्ती... सांड सा ताकत... फिर हमें गाँव के गालियों में दौड़ाया... और हमारे ही डंडे से हमारा पिछवाड़ा सुताया... आह.. अब तक ठीक से बैठ भी नहीं पा रहे हैं...
भीमा - तो मुझे बुला लिया होता... मैं उसे अपने हाथों से तोड़ कर... मरोड़ कर किसी किनारे फेंक दिया होता...
रोणा - भीमा... अगर तुम उससे हार गए होते... तो... तब गाँव में तुम्हारी अभी जो धाक है... वह भी कहीं की नहीं रहती...
भीमा - यह क्या कह रहे हो दरोगा बाबु...
बल्लभ - दरोगा... सही कह रहा है भीमा... हमने उसके बारे में जितनी भी खबर ली थी... उससे इतना मालुम हो पाया था... की वह एक खतरनाक लड़ाका बन गया है... तुम और तुम्हारे जैसे कइयों को... एक साथ पलक झपकते ही मसल सकता है...
भीमा के माथे पर बल पड़ जाता है l वह एक बार शनिया और उसके साथियों की ओर देखता है और फिर रोणा की ओर देखने लगता है l
भीमा - जो हुआ.. वह कोई छोटी बात नहीं है.... गाँव भर में जिसने भी देखा होगा... सब काना फुसी कर रहे होंगे... बात सिर्फ मार पीट तक रह गई होती तो भी ठीक था... पर विश्वा ने इन गधों को गालियों में दौड़ा दौड़ा कर मारा है... अगर राजा साहब को मालुम हुआ तो...
बल्लभ - कौन कहेगा... कौन बतायेगा... राजा साहब तक... खबर या तो तुम... या मैं... या फिर रोणा लेकर जाता है... हम ही अपना मुहँ सी लें... तो...
भीमा - कब तक...
शनिया - सिर्फ अगले झड़प तक...
भीमा - क्या...
शनिया - हाँ... अगले झड़प तक... हम इस बार पुरी तैयारी करेंगे... रात की अंधेरे में नहीं... इस बार दिन के उजाले में... पूरे गाँव वालों के सामने...
भीमा - (कुछ सोचने के बाद) ठीक है... मैं वकील बाबु की बात रख लेता हूँ... कोशिश करूँगा... राजा साहब तक खबर ना पहुँचे.. फिर भी... कितने दिनों तक...
शनिया - जब तक... दरोगा बाबु... छुट्टी मना कर वापस नहीं आ जाते...
भीमा - क्या... दरोगा बाबु... छुट्टी में जा रहे हैं...
रोणा - हाँ भीमा... महीना डेढ़ महीना हो गया... कुछ ऐसा हो गया है... जिसकी उम्मीद मैंने कभी कि नहीं थी... दिमाग घुम गया है... फिर से खुद को दुरुस्त कर दस पंद्रह दिनों में वापस आ जाऊँगा... (भीमा को सोच में देख कर) अब क्या सोच रहे हो...
भीमा - मेरे बाल सफेद हो रहे हैं... ना अपने बाप दादा ओं कभी सुना... ना कभी देखा... राजा साहब के खिलाफ कोई सिर उठाया है... अपनी ताकत दिखाया है... जो हुआ ठीक नहीं हुआ है...
बल्लभ - तुम भुल रहे हो... यह वही विश्वा है... जिसने साथ साल पहले महल में घुसा था... तुम्हारे ही आँखों के सामने... तब वह एक मामूली नौजवान था... पर इन सात सालों में... वह बड़े बड़े मुजरिमों के बीच रह कर आया है... दिमाग और ताकत से अब वह जैसा है... उससे निपटने उसका एक अलग तरह को तोड़ निकालना पड़ेगा.. पर ताकत से नहीं दिमाग से...
भीमा - वह तो आपको करना ही पड़ेगा... वर्ना कौन सा मुहँ लेकर यह लोग... राजा साहब के सेवा में खड़े हो पाएंगे... (शनिया और उसके साथियों से) राजा साहब को अपनी मूंछें बहुत प्यारी हैं... उस पर ताव के बदले वह खुद को भी अहमियत नहीं देते... अगली बार या तो जीत कर आना... या फिर... राजगड़ छोड़ कर चले जाना...
भीमा की बात सुनने के बाद सबकी हलक में से थूक निगलना तक मुश्किल हो गया l तभी रोणा का फोन बजने लगता है l रोणा फोन निकाल कर देखता है l राजा साहब डिस्प्ले हो रहा था l राजा साहब नाम देख कर उसके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगती हैं l
बल्लभ - किस का फोन है...
वह कांपते हाथों से फोन का डिस्प्ले दिखाता है, राजा साहब देख कर बल्लभ के माथे पर भी बल पड़ जाते हैं l फिर भी हिम्मत कर के कहता है
बल्लभ - स्पीकर पर डाल और बात कर...
रोणा - (कॉल उठा कर) है... हैलो...
भैरव सिंह - रोणा... वकील को लेकर हमसे आकर तुरंत मिलो...
रोणा - जी.. जी राजा साहब...
फोन कट जाता है l वहाँ पर मौजूद सभी लोगों की हालत एक जैसी थी l
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पैदल चलते हुए विश्व और टीलु दोनों गाँव में प्रवेश करते हैं l शनिया और उसके साथियों की पिटाई के बाद विश्व के बारे में गाँव में चर्चा तो हो रही है पर विश्व से लोग अनुरुप दूरी भी बनाए रखे हुए हैं l गाँव में प्रवेश करते ही विश्व को देख कर पहचान कर उससे दुर खड़े हो जा रहे हैं और कुछ लोग रास्ता बदल दे रहे हैं l यह सब देख कर टीलु से रहा नहीं जाता l
टीलु - भाई...
विश्व - ह्म्म्म्म...
टीलु - सारे लोग तो तुमसे डर रहे हैं... सब दूरी बना रहे हैं...
विश्व - तो करने दो... हमें क्या...
टीलु - फिर उस आंदोलन का क्या...
विश्व - अभी यह लोग मुर्दों की तरह अपनी नपुंसकता की कब्र में सोये हुए हैं... मैं अभी कुछ भी कर लूँ.. यह जागेंगे नहीं...
टीलु - तो फिर...
विश्व - वक़्त आने दो... एक टर्निंग पइंट... तब कोई एक जागेगा... उसे देख दुसरे भी जागेंगे...
टीलु - ठीक है भाई... आपकी माया... आप ही जानों... पर भाई यह सुबह सुबह जा कर... यशपुर से अखबार लाना जरूरी था क्या...
विश्व - हाँ... जैल में रहते हुए... मुझे अखबार पढ़ने की चस्का लग गया था... अब बिना अखबार के... वक़्त बिताना भारी पड़ रहा है... और राजगड़ में कोई अखबार नहीं पढ़ता...
टीलु - ओ... तो इसलिए... तुमने यशपुर से अखबार लाने का फैसला किया...
विश्व - हाँ..
टीलु - एक काम करता हूँ फिर... रोज सुबह मैं यशपुर जा कर अखबार ले आता हूँ...
विश्व - और मैं क्या करूँ...
टीलु - भाई... आप भाभी के साथ फोन पर गप्पे लड़ाओ... थोड़ा रोमांस करो...
विश्व - अब तुम मुझसे मार खाओगे...
टीलु - ना... ऐसी गलती कभी मत करना... मैं भाभी को बोल दूँगा... तुम्हारा कंप्लेंट कर दूँगा... सोच लो...
विश्व - तुम मुझे डरा रहे हो...
टीलु - हाँ बिल्कुल... क्यूँ के मैं जानता हूँ... तुम भाभी से डरते हो... हा हा हा...
विश्व टीलु को मारने के लिए दौड़ता है l टीलु भी हँसते हुए विश्व को छकाते हुए आगे आगे भागता है l उन दोनों की पकड़म पकड़ाई देख कर उन्हें देख रहे बच्चे खुशी के मारे ताली बजाने लगते हैं l विश्व टीलु को पकड़ लेता है और टीलु की कलाई मोड़ देता है l टीलु ऐसे मजाकिया चेहरा बना कर दर्द जाहिर करता है कि बच्चे हंसते हुए उछल उछल कर ताली बजाते हैं l फिर विश्व टीलु को छोड़ देता है तो टीलु भागते हुए वैदेही के नाश्ते की दुकान के सामने खड़ा हो जाता है l
वैदेही - क्या हुआ... भाग कर क्यूँ आया है... और विशु कहाँ है..
टीलु हांफते हुए इशारा करता है l विश्व भी भागते हुए आ रहा था l विश्व भागते हुए सीधे दुकान के अंदर घुस जाता है और एक टेबल पर बैठ जाता है l
वैदेही - तुम दोनों... भागते हुए क्यूँ आ रहे हो...
विश्व - हम रेस लगा रहे थे... कौन सबसे पहले तुम्हारे हाथ का खाना खाएगा... कमबख्त जीत गया...
विदेशी - (टीलु से) तो तु बाहर क्यूँ खड़ा है... अंदर आ...
टीलु अंदर आता है और विश्व के बगल में बैठ जाता है l वैदेही दोनों के लिए टेबल पर नाश्ता लगा देती है l वैदेही की नाश्ते की दुकान में अब लोगों का आवाजाही बंद हो चुकी है l फिर भी वैदेही रोज अपनी दुकान खोल कर लोगों की प्रतीक्षा करती रहती है l आज भी कोई नहीं आया था l बस दो जन विश्व और टीलु खाना खा रहे हैं l
वैदेही - तो कब निकल रहा है...
विश्व - (खाना खाते हुए) कल... कल रात को...
वैदेही - सिर्फ मासी से मिलने जा रहा है... या कोई और काम भी है...
विश्व - दीदी... एक साहब हैं... नाम है... स्वपन जोडार... उनकी कंपनी में... मैं लीगल एडवाइजर हूँ... तो उन साहब के काम काज के... अब तक की सारी स्टैटिटीक्स देख कर...कुछ सुझाव दे कर... वापस आ जाऊँगा...
वैदेही - हाँ... मासी बता रही थी... पर मेरे समझ में नहीं आ रहा... तुने उस नौकरी के लिए हाँ कैसे कह दी... तुझे उस नौकरी की क्या जरूरत थी...
विश्वा - दीदी... हम जो लड़ाई लड़ रहे हैं... उसमें हमारे सिवा कोई और ज़द में नहीं आना चाहिए... खास कर वह लोग... जो किसी ना किसी तरह से हमसे जुड़े हुए हैं...
वैदेही - ओ... पर मान ले... भैरव सिंह को मासी और मौसा जी के बारे में पता चल गया... तो... तु यहाँ रहके... उनकी हिफाजत कैसे करेगा...
विश्व खाना ख़तम कर उठता है और हाथ धोने चला जाता है l हाथ धो कर जब वैदेही के सामने आता है तो वैदेही अपना पल्लू देती है जिससे विश्व अपना मुहँ और हाथ साफ करता है l
वैदेही - तुने बताया नहीं... मासी और मौसा जी का हिफाजत कैसे करेगा...
विश्व - दीदी... उन्हीं के हिफाज़त के लिए ही तो मैं जोडार साहब के पास नौकरी करने के लिए राजी हुआ हूँ...
वैदेही - क्या... तेरे नौकरी से... उनकी हिफाजत का क्या मतलब हुआ...
विश्व - हम कभी कभी... जोश जोश में... दाव चल देते हैं... जो हमारे दुश्मन के लिए मौका बना दे देता है... मेरे खयाल से... भैरव सिंह को... अब तक माँ और... डैड के बारे में... पता चल चुका होगा....
वैदेही - (चौंक कर) क्या... कैसे..
विश्व - हाँ.... मुझे महल में... पिनाक सिंह पहचान गया था... और यह बात... भैरव सिंह के पास जाहिर भी कर चुका होगा...
वैदेही - ओ... तो फिर...
विश्व - जोडार साहब के पास नौकरी के लिए इसलिए राजी हुआ था... क्यूंकि उनकी अपनी सिक्युरिटी सर्विस है... और नौकरी के लिए मेरी शर्त यही थी... कि मेरी गैर हाजिरी में... उन पर नजर रखी जाए... और मुझे बराबर खबर किया जाए...
वैदेही - ह्म्म्म्म... तो बात यह है...
तब तक टीलु भी खाना ख़तम कर हाथ मुहँ धोने चला जाता है और वापस आ कर अपने हाथ अपने शर्ट पर रगड़ कर पोछते हुए साफ करने लगता है l वैदेही देखती है
वैदेही - रुक... अपनी झूठे हाथ साफ कर आया... पर अपनी शर्ट क्यूँ गंदा कर रहा है... यह ले...
अपना पल्लू बढ़ाती है, टीलु हैरान हो जाता है और विश्व की देखने लगता है l विश्व भी हैरान था l
वैदेही - (टीलु से) उसके तरफ क्या देख रहा है... जैसा वह मेरे लिए है... वैसा तु भी है... (विश्व से) है ना विशु...
विश्व - (अपनी जगह से उछल कर खड़ा हो जाता है, हकलाते हुए) हाँ... हाँ दीदी हाँ...
वैदेही - (टीलु से) ले... अपना हाथ और मुहँ साफ कर ले...
टीलु की आँखे नम हो जाते हैं l भीगी आँखों से अपना हाथ साफ करता है, फिर वैदेही के आगे हाथ जोड़ देता है l
वैदेही - मैं जानती हूँ... तु विशु का दोस्त है... जैल में इसके साथ था...
यह एक और झटका था विश्व और टीलु के लिए l दोनों आँखे फाड़े पहले एक दुसरे को देखते हैं फिर वैदेही की ओर देखते हैं l
वैदेही - (मुस्कराते हुए विश्व से) मैं इसे बुद्धू बुलाती थी... पर तुने जैसे ही इसे टीलु कह कर बुलाया... तब मुझे सारी बात समझ में आ गई... तु भुल रहा है... तेरे बारे में... मैं मासी से सारी ख़बरें रखा करती थी... पता करने भुवनेश्वर जाया करती थी... बेशक तेरे चार दोस्तों से मिली कभी नहीं थी... पर मासी से उनके बारे में कई बार जिक्र सुना था... सीलु.. मिलु.. यह टीलु.. और जिलु...
टीलु - वाव... दीदी... तुम्हारा दिमाग भी क्या ग़ज़ब की है...
वैदेही - है ना...
विश्व - आखिर क्यूँ ना हो... दीदी जो हो मेरी...
वैदेही - (टीलु से) अब यह पागलों वाली हरकतें छोड़...
टीलु - ठीक है दीदी... आप जान गई... अब छुपाना ठीक नहीं है... पर मुझे कहीं जाने के लिए मत कहना.. मेरा यहाँ रहना विश्वा भाई और आपकी लड़ाई के लिए बहुत जरूरी है...
वैदेही - पर तु यहाँ... आवाराओं जैसे घुमते हुए करता क्या है...
टीलु - यही मेरी खासियत है दीदी... मैं यहाँ दुश्मन के खेमे की ख़बरें निकालता हूँ... जिसे जानना विश्वा भाई के लिए जरूरी है...
वैदेही - अच्छा... जैसे...
टीलु - जैसे कि... अब दरोगा रोणा... कुछ दिनों के लिए... राजगड़ से गायब होने वाला है...
वैदेही - (हैरान हो कर) क्या... पर क्यूँ...
टीलु - क्या दीदी... पिछले डेढ़ महीनों में... आपने और विश्वा भाई ने... उसकी जो हालत खराब कर रखी है... उसका दिमागी संतुलन बिगड़ गया है... उसे दुरुस्त करने के लिए ही... कुछ दिनों के लिए छुट्टी पर जा रहा है... शायद आज ही...
वैदेही - विशु... तुने शनिया और उसके आदमियों की जो हालात की है... वह पलट वार तो जरूर करेंगे...
विश्व - हाँ दीदी... सपोले जो हैं... डसेंगे जरूर... पर इस बार रात के अंधेरे में नहीं... दिन के उजाले में करेंगे...
वैदेही - तु कैसे कह सकता है...
विश्व - वह इसलिए कि... मैं उन लोगों के बीच रह कर... पल कर बड़ा हुआ हूँ... उनकी जेहन और उनकी सोच को अच्छी तरह से समझता हूँ... इन लोगों को यह वहम था... के उनकी ताकत के वज़ह से... भैरव सिंह का खौफ है यहाँ... जब कि सच्चाइ यह थी के भैरव सिंह के खौफ के वज़ह से ही... यहाँ के दादा बने हुए थे... यह भरम टुट गया...
टीलु - पर भाई... यह तुम कैसे कह सकते हो कि... वह लोग इस बार दिन के उजाले में हमला करेंगे... रात की बात तो भूले नहीं होंगे वह लोग...
विश्व - इसीलिये तो दिन के उजाले में हमला करेंगे... पर वह लोग इस बार.. भीड़ की मदत लेंगे... गाँव के लोगों की नज़रों से गिरा कर... उनके गुस्से को सहारा बना कर.. उन्हीं लोगों के आड़ में... उन्हीं लोगों में से एक हो कर हमला करेंगे..
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वीर अपने केबिन में टहल रहा था, वह इस कदर गहरी सोच में खोया हुआ था कि कमरे के अंदर कुछ देर पहले अनु आ कर खड़ी हो कर देख रही थी पर वीर को आज पहली बार अनु के आने का एहसास नहीं होता l अनु को हैरानी होती है, क्यूंकि वीर को हमेशा उसके आने का या कमरे में होने का एहसास हो जाता था l पर आज नहीं हुआ, अनु अपना गला खरासती है
अनु - अहेम... अहेम...
वीर चौंक कर अनु की तरफ देखता है l अनु को देखते ही उसके चेहरे पर रौनक आ जाती है l वह अपनी बाहें खोल देता है अनु भागते हुए उसके गले लग जाती है l कुछ देर के लिए दोनों की आँखे बंद हो जाती है l
अनु - राज कुमार जी...
वीर - हूँ...
अनु - आज आप परेशान हैं...
वीर - हाँ...
अनु - आज शाम को... आपके अपनों से मेरी मुलाकात है... इसलिए...
वीर - नहीं... मैं परेशान किसी और बात से हूँ...
अनु - (वीर से अलग हो कर) कोई और बात...
वीर - हाँ...
अनु - क्या मुझसे कोई गलती हो गई...
वीर - (एक प्यार भरा चपत लगाते हुए) तुम से कोई गलती हो सकती है भला...
अनु - फिर आपकी परेशानी की वज़ह...
वीर - (एक उदासी भरा लंबी साँस छोड़ते हुए) आज सुबह मेरे ऑफिस आने के बाद... मृत्युंजय मेरे कमरे में आया था... अपना इस्तीफा लेकर...
अनु - क्या... इस्तीफा...
वीर - हाँ... बेचारे के साथ... बहुत ही गलत हुआ है... पहले पिता... फिर माँ... दोनों चल बसे.. अब बहन.. वह घर छोड़ कर किसीके साथ चली गई... वह टूटा हुआ है बेचारा...
अनु - फिर... आपने क्या उसका इस्तीफा..
वीर - नहीं अनु नहीं... मैंने उससे वादा किया है... उससे कुछ दिन की मोहलत माँगा है... अब किसी भी तरह से उसकी बहन का पता लगाना है... पर कैसे... कहाँ से... इसी बात को लेकर मैं परेशान था...
अनु - ओह... आप फिक्र ना करें राजकुमार जी... पुष्पा जरूर मिल जाएगी...
वीर - (मुस्कराता है) हाँ... जरूर मिल जाएगी... तुमने जो कह दिया है... (तभी दरवाजे पर दस्तक होता है) कम इन...
दरवाजा खोल कर महांती अंदर आते आते रुक जाता है और अंदर आने के लिए झिझकता है l उसके झिझक को अनु समझ जाती है l
अनु - आप बातेँ कीजिए... मैं आपके लिए कॉफी लेकर आती हूँ...
वीर - हाँ...
अनु बाहर चली जाती है l वीर एक गहरी साँस छोड़ते हुए महांती के तरफ देखता है l
महांती - कहिये राज कुमार... कैसे याद किया...
वीर - महांती... तुम जानते हो.. कुछ दिन पहले... मृत्युंजय के साथ क्या हुआ था...
महांती - जी...
वीर - हमने उसे वादा किया था... के उसकी बहन को हम ढूंढ निकलेंगे... पर...
महांती - राजकुमार... मैंने अपने लोगों के जरिए... केके पर नजर रखा हुआ है... पर अभी तक... कोई क्लू नहीं मिला है... पर यकीन रखिए... दो या तीन दिन और... हमें घर का भेदी मिल जाएगा... वह भी पक्के सबूतों के साथ...
वीर - ठीक है... वह काम जितना जरूरी है... मृत्युंजय की बहन की पहेली भी उतनी जरूरी है... हम अगर अपनी स्टाफ के परिवार की ही देखभाल नहीं रख सकते... उनके बारे में ख़बर नहीं रख सकते... फिर हमारी यह सर्विस किस काम की महांती...
महांती - आपने ठीक कहा राजकुमार जी... पर मेरा वादा है... सिर्फ तीन दिन... आपके सामने हमारे घर का भेदी भी होगा.. और मृत्युंजय की बहन भी होगी...
तभी दरवाज़े पर दस्तक होती है, और फिर दरवाजा खुल जाता है l एक फ़ूड ट्रॉली में दो कप और एक जग को ढकेलते हुए अनु अंदर आती है l
महांती - ओके राजकुमार... मुझे इजाजत दीजिए...
अनु - सर... मैं आपके लिए कॉफी लेकर आई हूँ...
महांती - दो कप लाई हो... तुम राजकुमार को कॉफी पीने में साथ दो... एक्सक्युज भी... (कह कर महांती कमरे से निकल जाता है) (अनु वीर से) अब मैं इस कॉफी का क्या करूँ...
वीर - क्या करूँ मतलब... सुना नहीं... तुम्हारे सर ने तुमसे क्या कहा... कॉफी पीने में.. मेरा साथ दो...
अनु थोड़ी शर्मा जाती है और जग से कॉफी कप में डालने लगती है l एक कप के भर जाने पर जब जग को दुसरे कप की ओर ले जाती है तभी
वीर - बस बस... एक ही कप रहने दो...
अनु - ठीक है...
वीर - क्यूँ तुम नहीं पियोगी...
अनु - कैसे... अपने तो मना कर दिया...
वीर - अरे.. मैंने पीने से कहाँ मना किया...
अनु - मतलब... आप नहीं पियेंगे...
वीर - मैं भी पीयूंगा और तुम भी पियोगी...
अनु - मतलब...
वीर - (अपना माथा पीटने लगता है) है भगवान...
अनु - अरे अरे.. ऐसा क्यूँ कर रहे हैं... और मैंने क्या गलत पूछा...
वीर - (बड़े प्यार से) अरे मेरी जान.. हम दोनों एक ही कप से कॉफी पियेंगे...
इतना सुनते ही अनु का चेहरा शर्म से लाल हो जाती है l अपनी निचली होंठ को दबा कर सिर झुका कर मंद मंद मुस्कराने लगती है l वीर कप उठा कर एक सीप लेता है और कप को अनु की ओर बढ़ा देता है l अनु शर्म से आँखे बंद कर कॉफी की सीप लेती है l उसका मुहँ बिगड़ जाता है
अनु - इयाक्... इसमें तो शक्कर डालना भूल गई...
वीर - क्या बात कर रही हो... दिखाओ... (वीर एक सीप लेता है) अरे कहाँ... कितना मीठा लग रहा है... तुम भी ना...
अनु - (हैरानी के साथ) क्या... (वीर के हाथ से कप लेकर सीप लेती है) इइइइ... कहाँ...
वीर - (अनु के हाथ से कप लेकर) उम्म्म्म्म... क्या टेस्टी है... वाह..
अनु - (मासूमियत के साथ मुहँ बना कर) आप मेरी मज़ाक उड़ा रहे हैं...
वीर - अरे मेरी प्यारी अनु... मेरी भोली अनु... मैं सपने में भी तुम्हारा मज़ाक नहीं उड़ा सकता... मैं तो यह बता रहा था... के तुम कितनी मीठी हो... के तुम्हारे होठों से लग भर जाने से... यह कॉफी कितनी मीठी हो गई...
अनु - (शर्मा कर) झूठे...
वीर - क्या... क्या कहा...
अनु - (थोड़ी सहम जाती है) मैं.. वह.. कुछ नहीं...
वीर - अनु... तुमको मेरी कसम... जो तुमने कहा वह दुबारा कहो..
अनु - (अपनी आँखे जोर से बंद कर लेती है) झूठे...
वीर - हा हा हा.. ओ.. हो... अनु...
खुशी के मारे उछल पड़ता है और अनु को अपने पास खिंच कर उसके गाल पर एक लंबी चुंबन जड़ देता है l अनु अपनी आँखे खोल कर हैरानी से वीर को देखती है l
वीर - (चहकते हुए) आज पहली बार... तुम थोड़ी खुली हो... वर्ना... तुम्हारे मुहँ से यह राजकुमार सुन सुन कर बोर हो गया था... एक बार फिर से कहो ना...
अनु - (फिर से अपने होंठ को दांतों तले चबा कर सिर शर्म से झुका लेती है और अपना सिर ना में हिलाती है)
वीर - नहीं कहोगी... तुम्हें मेरी कसम...
अनु - (अपना हाथ वीर के मुहँ पर रख कर) यह बार बार कसम तो मत दीजिए...
वीर - (एक बच्चे की तरह अनुरोध करते हुए) प्लीज अनु.. मेरी प्यारी अनु... कहो ना कहो...
अनु - (वीर की हालत देख कर हँस देती है) झूठे... बस और नहीं कहूँगी...
वीर - कोई नहीं... मैं तुम्हारे मुहँ से निकलवा लूँगा देख लेना...
अनु अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लेती है l वीर खुशी के मारे उसे अपने गले से लगा लेता है l
वीर - अनु...
अनु - जी...
वीर - आज तुमने मुझे बहुत बड़ी खुशी दी है... जी कर रहा है... आज तुम पर सबकुछ लुटा दूँ... एक काम करता हूँ... मैं ड्राइवर को बोल देता हूँ... तुम मेरी गाड़ी में किसी मॉल में जाकर... अपने लिए खूब मार्केटिंग करो... और मेरे लिए भी थोड़ा बहुत कर दो...
अनु - (चौंक कर वीर से अलग होते हुए) क्या... वह मैंने जितने भी पैसे बचाए हैं... वह शादी के दिन के लिए... अभी कैसे खर्च कर दूँ...
वीर - (अपना क्रेडिट कार्ड निकाल कर) यह लो इससे करो...
अनु - यह तो आपका है... मैं अभी से कैसे.. नहीं नहीं... यह ठीक नहीं रहेगा... वैसे भी... मार्केटिंग किस लिए..वह भी आपके वगैर क्यूँ..
वीर - इसलिए.. इस राजकुमार की शहजादी को खुद भी कुछ करना चाहिए कि नहीं... मैं जानना चाहता हूँ... तुम कितना खर्च कर सकती हो...
अनु - क्या... नहीं नहीं... मुझसे फिजूल खर्च नहीं होगा... वह भी किस हक से...
वीर - कमाल करती हो... जब माँ ने तुम्हें अपने कंगन पहना दिए... तब से तुम्हारा मुझ पर... और मुझसे जुड़े हर एक चीज़ पर तुम्हारा हक है... इसलिए... (मनाने के तरीके से) जाओ जाओ... प्लीज ना... तुम्हारे हर एक खर्च का मेसेज... मेरे मोबाइल पर आनी चाहिए...
बहुत आनाकानी के बाद अनु तैयार होती है l वह झिझकते हुए वीर से क्रेडिट कार्ड ले कर वीर की गाड़ी से मॉल की तरफ जाती है l
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महल का दिवान ए खास
एक लंबी बैठक वाली टेबल के एक सिरे पर भैरव सिंह और पिनाक बैठे हुए हैं l भीमा भागते हुए आता है
भीमा - हुकुम...
भैरव सिंह - कहाँ थे तुम अब तक...
भीमा - जी गाँव के अंदर चला गया था...
भैरव सिंह - कोई खास बात...
भीमा - जी कुछ नहीं... सब ठीक है...
पिनाक - विश्वा आया हुआ है ना... गाँव में उसके प्रति रवैय्या कैसा है...
भीमा - गाँव वाले आपके हुकुम बजा रहे हैं... वैदेही के नाश्ते के दुकान पर अब कोई जा नहीं रहा है...
पिनाक - बहुत अच्छे... हा हा हा... क्षेत्रपाल का हुकुम... भाग्य की लकीर है... कौन लांघ सकता है...
भीमा - जी हुकुम...
भैरव सिंह - अभी तक... रोणा और प्रधान नहीं आए हैं...
भीमा - वही बताने आया था हुकुम... (भैरव सिंह तीखी नजर से भीमा की ओर देखता है) माफी हुकुम... (सकपका कर) वे लोग आ गए हैं... और अंदर आने के लिए आपसे इजाजत मांग रहे हैं...
भैरव सिंह - अंदर ले आओ उन्हें...
भीमा बिना पीठ किए पीछे जाता है और उन लोगों को अपने साथ लेकर अंदर आता है l रोणा और बल्लभ आकर भैरव सिंह के सामने सिर झुकाए खड़े होते हैं l भीमा एक किनारे जा कर खड़ा हो जाता है l
भैरव सिंह - बैठो...
दोनों - हम ठीक हैं राजा साहब...
भैरव सिंह - बैठ जाओ... तुम लोगों से हमें कुछ जानकारी चाहिए...
रोणा और बल्लभ दोनों एक दुसरे की ओर देखते हैं फिर टेबल के दुसरे सिरे पर पड़े चेयर पर बैठ जाते हैं l
भैरव सिंह - तुम दोनों... विश्व के बारे में पता लगाने गए थे... पर तुम्हारे हाथ कुछ ज्यादा लगा नहीं था... है ना...
रोणा - (पसीना पसीना होने लगता है) जी.. जी राजा साहब...
भैरव सिंह - क्या तुम लोग.. विश्वा के मुहँ बोले माँ बाप से मिले...
दोनों हैरानी से उछल पड़ते हैं l और एक साथ - मुहँ बोले माँ बाप...
रोणा - जी.. जी.. नहीं... हमने जितना भी जाना था... श्रीधर परिड़ा के जरिए जाना... उसने हमें यह सब नहीं बताया...
बल्लभ - जी राजा साहब... विश्वा तो साथ साल जैल में रहा... ऐसे में... कब और कौन उसके मुहँ बोले माँ बाप बन गए...
पिनाक - मतलब तुम दोनों वहाँ उसके साथ सिर्फ कबड्डी खेल रहे थे... जो बार बार मुहँ की खा रहे थे...
दोनों चुप हो जाते हैं l पिनाक भीमा को इशारे से पास बुलाता है और अपना मोबाइल देकर रोणा और बल्लभ को दिखाने के लिए बोलता है l भीमा जब मोबाइल में सेनापति दंपति की फोटो दिखाता है l दोनों फिर से उछल पड़ते हैं l उनकी प्रतिक्रिया देख कर
भैरव सिंह - क्या हुआ... तुम दोनों ऐसे क्यूँ चौंक गए...
बल्लभ - यह तो.. मशहूर वकील प्रतिभा सेनापति है... और यह उसका पति रिटायर्ड जैल सुपरिटेंडेंट तापस सेनापति है...
पिनाक - मतलब तुम दोनों... मिल चुके हो उनसे...
रोणा - हाँ... पर... वैदेही तो... प्रतिभा सेनापति को मासी कहती है... जिसने वैदेही के लिए... हाईकोर्ट में... एफिडेविट दायर किया है... इसी लिए हम मिलने गए थे... पर घर पर तापस था नहीं...
भैरव सिंह - फिर...
रोणा चुप हो जाता है और सिर झुका कर बैठ जाता है, बल्लभ भी कुछ कहने के वजाए अपना बग़ल झांकने लगता है l भैरव इन दोनों के हरकत देख कर कड़क आवाज से l
भैरव सिंह - फिर...
बल्लभ - हम जिस दिन मिसेज सेनापति से मिलने गए थे... उस दिन उसके घर में उसका पति नहीं था... पर कुछ लड़कियाँ थीं... स्टूडेंट लग रही थीं... मेरे खयाल से... शायद किसी इंटरेंशीप के लिए सुझाव लेने आई थीं... (प्रतिभा के घर में जो सब हुआ था सब कुछ बता देता है)
भैरव सिंह - हूँ... और...
बल्लभ - यह... इस रोणा के वज़ह से थोड़ी गड़बड़ हो गई...
भैरव सिंह - क्या गड़बड़ी हुई...
बल्लभ - यह कमीना ठरकी... एक लड़की पर नजर और जुबान खराब कर बैठा... बदले में उस लड़की ने इसे चांटा मार दिया... उसके बाद... मिसेज सेनापति ने हमें घर से निकाल दिया...
पिनाक - हा हा हा हा हा... ( हँसने लगता है) कमीना है एक नंबर का हरामी... जहां लड़की देखी... लार टपकाना शुरु...
रोणा शर्मिंदगी से अपने अगल बगल झांकने लगता है l उसके इस हालत पर भैरव सिंह भी मुस्करा देता है l
बल्लभ - छोटे राजा जी... बात पर कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा है...
पिनाक - मतलब...
बल्लभ - यह जैल में रहकर यह माँ बाप बनाया... या जैल से निकल कर...
पिनाक - उससे क्या होता है... बस इतना समझ लो... सेनापति दंपति... विश्वा के मुहँ बोले माँ बाप हैं...
रोणा - आह... (खीज कर) ओह शीट...
पिनाक - क्या हुआ...
रोणा - मतलब... विश्वा मेरे आसपास ही था... और उस रात... वह हमें टैक्सी में होटल में छोड़ा था... और... और...
पिनाक - और...
रोणा - (भैरव सिंह से) राजा साहब... मेरी सिक्स्थ सेंस... मुझे कुछ कह रहा है... आप कहें तो अर्ज़ करूँ... (भैरव सिंह इशारे से हाँ कहता है) विश्वा जैल में रह कर... उसने माँ बाप बना लिया... अगर प्रधान का अंदाजा सही है तो...
भैरव सिंह - कौन सा अंदाजा...
रोणा - जो लड़कियाँ वहाँ पर थीं... अगर वह इंटरेंशीप के लिए वहाँ थीं... उनमें से एक लड़की... जैसे उस घर की हो... हमें पानी पिलाई थी... हो ना हो... उसका विश्वा के साथ कुछ ना कुछ रिश्ता होगा...
भैरव सिंह - कैसे कह सकते हो...
रोणा - क्यूंकि उस लड़की से बद जुबानी का बदला... विश्वा ने मुझसे होटल में... गरम पानी से नहला कर ली थी...
पिनाक - जैल में रह कर.. वह किसी लड़की से कैसे दोस्ती कर सकता है...
बल्लभ - रोणा के बातों में वजन तो है... चार्ल्स शोभराज की इंटरव्यू लेने आई लड़की... अखिर उसके प्यार में पड़ गई थी... तो यहाँ क्यों नहीं ऐसा हो सकता...
भैरव सिंह - अगर रोणा के बातों में जरा सा भी सच्चाई है... तो हमें उस लड़की का पता लगाना पड़ेगा... हमें विश्व की एक कमजोर नस चाहिए... जिसे दबाते ही.. वह चीखने लगेगा... तड़पने लगेगा...
रोणा - राजासाहब यह काम आप मुझे सौंप दीजिए... मैंने उस लड़की को देखा है... (अपने गाल को सहलाते हुए) उससे थप्पड़ भी खाया है...
भैरव सिंह - ठीक है... जाओ... और उस लड़की की पुरी जानकारी निकाल कर लाओ... वहाँ पर मेरा एक आदमी भी है... उससे मिल लेना... जरूरत पड़ने पर.. उससे मदत भी लेना... वह लड़की कौन है.. क्या करती है...
रोणा - राजा साहब अगर जरूरत पड़ी तो... आपके उस आदमी से मदत लूँगा... पर इस बार कोई चूक नहीं होगी... मैं सब पता लूँगा... उस लड़की के बारे में...
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रुप गाड़ी चला रही है l गाड़ी में और चार दोस्त बैठे हुए हैं l दीप्ति, बनानी, भाष्वती और इतिश्री l तब्बसुम नहीं थी l रुप तब्बसुम के बारे में ही सोचते हुए गाड़ी चला रही थी l पर उसके बाकी साथी गाड़ी के भीतर हल्ला कर रहे थे l रुप की उखड़ी हुई सूरत देख कर
बनानी - ओह... कॉम ऑन यार... आज हम सब मस्ती के मुड़ में हैं... और तु है कि.. मुहँ लटकाए हुए है..
रुप - याद है.. मेरे राजगड़ जाने से पहले... तब्बसुम कॉलेज नहीं आ रही थी... और अब तक उसका पता नहीं है...
दीप्ति - अरे... हमने उससे फोन पर कॉन्टेक्ट किया था... वह जब भुवनेश्वर में है ही नहीं तो... हम क्या करें...
रुप - इतने दिन...
भाष्वती - हाँ बहुत दिन हो गए... वह कभी कभी अपने तरफ से फोन कर देती.. बाकी समय... उसका फोन स्विच ऑफ रहता है... इसलिए हमारी तरफ से कॉन्टेक्ट हो नहीं पाती..
इतिश्री - हमने पुछा था... तो तब उसने कहा था कि... वह ऐसी जगह है... जहां मोबाइल पर सिग्नल मुश्किल से आती है...
रुप - हाँ... वह सब तो ठीक है... पर... अपना गैंग तो उसके वगैर अधुरा ही लग रहा है... है ना...
दीप्ति - हाँ वह तो है...
बनानी - लेट्स चेंज द टॉपिक... अब तुम हमें ट्रीट कहाँ दे रही हो...
रुप - मुझे क्या पता... तुम लोग बोलो... कहाँ चाहिए...
भाष्वती - एक काम करते हैं... क्यूँ ना... xxx मॉल चलें... फेशन बाजार में थोड़ा टाइम पास हो जाएगा... फूड कोर्ट में ट्रीट...
सब - हाँ हाँ यह बढ़िया आइडिया है...
रुप - ओके ओके... चलो चलते हैं...
भाष्वती - देखो.. आज सिर्फ ट्रीट तक ठीक है...
रुप - तो कल से... कल से क्या कुछ और चाहिए...
भाष्वती - यस बेबी... कल से गाड़ी हमारी है... हम गाड़ी चलाएंगे और सिखायेंगे...
बनानी - वाव... बढ़िया आइडिया है... भाष्वती ड्राइविंग स्कुल में हम... ड्राइविंग सीखेंगे... ये ये ये...
रुप - और मैं क्या करूंगी तब तक...
भाष्वती - तु.. मेरे पापा की विंटेज मॉडल से काम चलायेगी... (सब हँसने लगते हैं)
रुप - (अपना मुहँ बना कर) वेरी फनी... हाँ..
गाड़ी xxx मॉल के पार्किंग में पहुँचती है l सब गाड़ी से उतर जाते हैं, रुप की गाड़ी लॉक करने के बाद सब मॉल के अंदर चले जाते हैं l अंदर सब मिलकर एक के बाद एक कई दुकानें छान डालते हैं l फिर आखिर में एक दुकान पर आते हैं जहां तरह तरह के नये नये फेशन के कपड़ों से सजा हुआ था l रुप और उसके दोस्त फेशन के उस रंग बिरंगी दुनिया से मोहित हो जाते हैं l सभी अपना अपना कोना ढूंढ कर अपनी अपनी काम में मशगूल हो जाते हैं l रुप अपने लिए कपड़े देखते देखते उसको नजर एक कोने में सजे कुछ मेल पुतलों पर पड़ती है l जिन्हें नए नए फेशनेबल शर्ट और पेंट और ब्लेजर से सजाये गए हैं l उन पुतलों को देख कर रुप के चेहरे पर एक मुस्कान खिल उठती है l वह उन पुतलों में विश्व को इमेजिन करने लगती है l जैसे जैसे विश्व को उन कपड़ों में इमेजिन करने लगती है उसकी मुस्कान और भी गहरी होने लगती है l वह जाकर बीच वाले पुतले के सामने खड़ी हो जाती है l वहाँ पर एक सेल्स मेन खड़ा था जिसे वह कहती है
- वह वाला दिखाना...
एक दूसरी आवाज में भी यही सुनाई दी, वह हैरान हो कर उस आवाज की ओर देखती है l एक लड़की जो भवें सिकुड़ कर रुप को देख रही थी l
रुप - तुम...
लड़की - हाँ मैं...
रुप - देखो... इसे मैंने पहले चॉइस किया है...
लड़की - तुमसे पहले मैंने पसंद किया है...
रुप - व्हाट..
लड़की - ए हट..
रुप - देखो लास्ट टाइम... तुम्हें बक्कल ले जाने दिया... लेकिन इस बार नहीं...
लड़की - (बिदक कर) लास्ट टाइम... क्या लास्ट टाइम... वह लास्ट टाइम नहीं... फास्ट टाइम था... लास्ट टाइम कह कर मेरा हक मारना चाहती हो...
रुप - ओह गॉड... रीडिक्लस.. इसमें हक वाली बात कहाँ से आ गई..
लड़की - फिर अँग्रेजी झाड़ रही हो..
रुप - ओके... ओके... देखो यह मैं अपने किसी खास के लिए लेना चाहती हूँ...
लड़की - मैं भी इसे अपने राजकुमार के लिए लेना चाहती हूँ...
रुप - व्हाट... देखो प्लीज... तुम कुछ और देख लो.. मैं पेमेंट कर दूंगी...
लड़की - ऐ... चल हट.. पैसा किसे दिखा रही हो... तुम कुछ और देख लो... मैं पैसे दे दूंगी...
तभी रुप की दोस्त सब वहाँ पहुँचते हैं l दीप्ति उस लड़की को धमकाते हुए कहती है
दीप्ति - ऐ... तु जानती है... किससे बात कर रही है...
लड़की - ओ.. तो तुम अपनी गैंग लेकर आई हो... फिर भी... मैं किसी से नहीं डरती...
भाष्वती - ऐ... अगर हम ज़बरदस्ती ले लें तो...
लड़की - ऐ... जो मेरे राजकुमार के लिए मैंने सोच लिया है... उसके लिए मैं जान पर खेल जाऊँगी... (सेल्स मेन से) पैक करो इसे...
सेल्समेन जो अब तक उनकी लड़ाई का मजे ले रहा था l वह मजे लेने के लिए रुप की ओर देखता है l रुप उसे ऐसे देखती है जैसे वह कच्चा चबा जाएगी l तभी बनानी पूछती है
बनानी - नंदिनी... तुम यह किस के लिए लेना चाहती हो...
रुप - (जुबान लड़खड़ाने लगती है) वह कुछ नहीं... बस यूँ ही
लड़की - तो इसका मतलब... जान बुझ कर... मुझे परेशान कर रही थीं... पिछली बार का बदला ले रही थी...
बनानी - क्या... पिछली बार का... किस बात का..
रुप - क क कुछ नहीं.. चलो यहाँ से चलते हैं...
सब वहाँ से चलने लगते हैं l रुप एक बार मुड़ कर उस लड़की को देखती है l वह लड़की भी हैरानी से रुप की ओर एक टक देखे जा रही थी
आज पहली बार शुभ्रा ने रूप से थोड़े रूखे अंदाज में बात की थी और इस बात को रूप ने शुभा को जाहिर भी कर दिया और द हेल का सच भी बता दिया की चार लोग चार अलग अलग दुनिया में रहते है। शुभ्रा अब किंकर्तव्यविमूढ़ की स्तिथि में पहुंच चुकी है और ये रूखापन, गुस्सा और बोखलाहट भी इसी बात की है कि जल्दी ही उसे विक्की या रूप में से किसी एक तरह होना पड़ेगा और जहां विक्की उसका प्यार है वही द हेल में रूप ही थी जिसने ना सिर्फ शुभ्रा को समझा बल्कि उसका एक दोस्त की तरह साथ दिया जब विक्रम अपनी ही दुनिया में खोया था और इस दोनो को मिलाया भी रूप ने ही है तो इस धर्म संख्या में सबसे ज्यादा शुभ्रा ही है क्योंकि वीर और रूप को अपनी चाहत और स्तिथि पता है। विक्रम भी अपने वचन और विश्व की असलियत की वजह से कहीं ना कहीं विश्व सपोर्ट ना भी करे तो भी पूरे दिल से दुश्मनी भी नही करेगा।
अपने चमचों की पिटाई की खबर अब भीमा को भी मिल गई है और फट अब उसकी भी गई है कि जब भैरव को सब पता चलेगा तो पता नही लकड़बग्गो का शिकार बनेंगे या मगरमच्छ का। इसीलिए उसने भी बल्लव की बात को समझ कर ये बात अभी छुपाना ही ठीक समझा।
वैदेही की दुकान तो भैरव के आदेश से बंद ही हो गई है मगर वो दुकान बस एक जरिया थी समय काटने और विश्व के आने का इंतजार करने का। मगर जैसे आज वैदेही ने टीलू को पहचाना और सारी असलियत बताई तो विश्व और टीलू दोनो की तोते उड़ गए सारी बात सुन कर, वैसे भी जो लड़की मेडिकल की तैयारी कर रही हो उसका ये सब बाते समझना कोई मुश्किल नहीं था।
वीर अनु के प्यार की वजह से मट्टू पर शक नही कर रहा है जोकि उसकी एक बड़ी गलती साबित हो सकती है अगर अपने बदले के चक्कर में उसने अनु को कोई हानि पहुंचाई तो। महंती पता नही क्या सोच रहा है और क्या कर रहा है इस मामले में लेकिन वो 3-4 दिन में ये कैसे सुलझाने वाला है तो ये भी देखना बनता है।
अब भैरव ने बल्लव और रोड़ा की पेशी तो करवा दी है और प्रतिभा और तापस को भी घेरने की साजिश अब शुरू हो सकती है मगर रोड़ा ने जो रूप का जिक्र करके अपने दिमाग को चलता है वो आगे उसको बहुत भरी पड़ने वाला है क्योंकि जब विश्व को पता चलेगा तो वो अलग बजाएगा और अगर रूप ने शिकायत की तो फिर रोड़ा को सड़क पर पड़े रोड़े की तरह लात मार कर फेंक दिया जाएगा। क्योंकि अब रोड़ा भी कटक जाएगा और विश्व भी।
रूप अपनी छटी गैंग को मानने लगी थी और काफी हद तक सफल भी हुई मगर एक बार फिर रूप और अनु का सामना सामना हो गया और शायद इस बार दोनो ने ही एक दूसरे को पहचान लिया है तो शाम की मुलाकात मस्त होने वाली है जब दोनो एक दूसरे से मिलेंगे।
बहुत ही शानदार अपडेट।
विश्व और वैदेही और काफी हद तक रूप की जिंदगी के सफर पे ये लाइनें याद आ गई।
बजाय प्यार की शबनम मेरे गुलिस्ताँ में
बरसते रहते हैं हर सिम्त मौत के साये
सियहियों से उलझ पड़ती हैं मेरी आँखें
कोई नहीं कोई भी नहीं जो बतलाये
कितनी देर उजालों की राह देखे
कोई नहीं हैं कोई भी नहीं न पास न दुर
बस याद हैं दिल की धड़कन
अपनी चाहत का जो एलान किये जाती हैं
ज़िन्दगी है जो जिए जाती हैं खून के घूँट पीये जाती हैं
ख्वाब आँखों से सिये जाती हैं
अब न कोई पास हैं
फिर भी एहसास हैं
सिहायियो में उलझी पड़ी
जीने की एक आस हैं
यादो का जंगल यह दिल
काँटों से जल थल यह दिल
चुभते कांटें यादो के, दामन से चुनता हूँ
गिरती दीवारों के, आँचल में ज़िंदा हूँ.